मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

ज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.tripadvisor.in/Attraction_Review-g2282389-d3913026-Reviews-Gandhi_Sagar_Dam-Neemuch_Neemuch_District_Madhya_Pradesh.html

जलवायु परिवर्तन से गायब हो सकता है कोहरा

र गर्मी के मौसम में कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली में तेज़ गर्मी से राहत एक अनोखे तरीके से मिलती है – समुद्र से आने वाली घनी धुंध। यह हवा को ठंडा करती है और ज़मीन को हल्की नमी देती है। लोगों के लिए यह कुदरती कूलर जैसा काम करती है, और खेतों व जंगलों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अधिक गर्मी के कारण यह धुंध भविष्य में कम हो सकती है।

गौरतलब है कि धुंध तब बनती है जब समुद्र की नम हवा ठंडी होकर पानी की छोटी-छोटी बूंदों में बदल जाती है और ज़मीन की ओर बढ़ती है। भले ही यह बारिश जितनी बड़ी चीज़ न लगे, लेकिन इसका असर बहुत अहम होता है। जैसे कैलिफोर्निया के रेडवुड जंगलों में यह गर्मियों में लगभग आधा पानी उपलब्ध कराती है। वहीं सैलिनास वैली जैसे खेती वाले इलाकों में यह लेट्यूस और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों को नमी देती है। शहरों में भी यह हवा में मौजूद प्रदूषण को पकड़कर उसे कम करने में मदद करती है।

इतनी महत्वपूर्ण होने के बावजूद, धुंध पर अब तक ज़्यादा वैज्ञानिक ध्यान नहीं दिया गया है। वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि कुछ सालों में धुंध ज़्यादा क्यों होती है, इसमें कौन-कौन से रसायन होते हैं और बढ़ते तापमान का इस पर क्या असर पड़ेगा। बारिश और सूखे जैसे विषयों की तुलना में धुंध को लंबे समय तक एक छोटी और स्थानीय घटना माना गया। अब इसी कमी को दूर करने के लिए बड़े स्तर पर नया शोध शुरू किया जा रहा है।

पैसिफिक कोस्टल फॉग रिसर्च नामक एक पांच साल का प्रोजेक्ट धुंध को पहले से कहीं अधिक गहराई से समझने की कोशिश करेगा। करीब 36.5 लाख डॉलर की मदद से चलने वाला यह प्रोजेक्ट ज़मीन पर किए जाने वाले माप और उन्नत कंप्यूटर मॉडल का उपयोग करेगा, ताकि यह जाना जा सके कि धुंध कैसे बनती है, इसमें क्या-क्या होता है और भविष्य में यह कैसे बदल सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक जटिल पर्यावरणीय पहेली को समझने का मौका है।

धुंध का अध्ययन करना मुश्किल इसलिए है क्योंकि यह समुद्र, हवा और भूमि तीनों के बीच बनती है। इसके बनने के लिए ठंडे समुद्र और गर्म तटीय इलाकों के बीच तापमान में अंतर होना ज़रूरी है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण जब समुद्र और भूमि दोनों का तापमान बदल रहा है, तो यह संतुलन भी बिगड़ सकता है। गर्म समुद्र धुंध बनने की प्रक्रिया को कमज़ोर कर सकते हैं, जबकि गर्म भूमि धुंध को अपनी ओर ज़्यादा खींच सकती है। इन दोनों असर को एक साथ समझना मुश्किल है, इसलिए भविष्य के सही अनुमान लगाना अभी आसान नहीं है।

कुछ संकेत ऐसे भी मिल रहे हैं कि धुंध पहले से कम हो रही है। पुराने आंकड़ों के आधार पर किए गए शोध बताते हैं कि कैलिफोर्निया में पिछले कई दशकों में धुंध की मात्रा घटी है। लेकिन यह पूरी तरह पक्का नहीं है, क्योंकि डैटा सीमित है और उपग्रह तस्वीरों में धुंध को दूसरे बादलों से अलग पहचानना मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि ज़्यादा सटीक माप की ज़रूरत है, ताकि यह पता चल सके कि यह बदलाव सच में हो रहा है या नहीं, और क्या इसके लिए जलवायु परिवर्तन ज़िम्मेदार है।

बेहतर जानकारी जुटाने के लिए वैज्ञानिक कैलिफोर्निया के समुद्री किनारों पर कई जगहों – शहरों, जंगलों और खेतों – में खास उपकरण लगाएंगे। ये उपकरण हवा से धुंध की पानी की छोटी-छोटी बूंदों को पकड़ते हैं, जिससे पता चल सके कि धुंध कितना पानी देती है और उसमें कौन-कौन से पदार्थ मौजूद हैं। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि धुंध पर्यावरण को कितनी नमी देती है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव आ रहा है।

इस प्रोजेक्ट में यह भी देखा जाएगा कि धुंध अपने साथ क्या-क्या लेकर आती है। पहले के अध्ययनों में पाया गया है कि इसमें कुछ विषैले हानिकारक पदार्थ भी हो सकते हैं, जो मनुष्यों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अब वैज्ञानिक इसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों का भी अध्ययन करेंगे, जो समुद्र से भूमि तक आ सकते हैं। इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर इसके असर को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

फील्ड पर किए जा रहे काम के साथ-साथ वैज्ञानिक बेहतर कंप्यूटर मॉडल का भी इस्तेमाल करेंगे, जो तटीय इलाकों को करीब से समझते हुए पूरे विश्व के पैटर्न को भी ध्यान में रखते हैं। इन मॉडलों की मदद से वे अतीत और आने वाले समय की स्थिति का अनुमान लगाकर यह समझने की कोशिश करेंगे कि धुंध में हो रहे बदलाव प्राकृतिक हैं या ग्लोबल वार्मिंग की वजह से। इससे भविष्य में धुंध के व्यवहार का ज़्यादा साफ अंदाज़ा मिल सकेगा।

फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इतने जटिल सिस्टम को समझने के लिए पांच साल का समय कम हो सकता है, क्योंकि इसमें कई चीज़ें एक साथ असर डालती हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग मानते हैं कि यह प्रयास एक ऐसे क्षेत्र में बहुत ज़रूरी और बड़ा कदम है, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया था।

यह शोध सिर्फ कैलिफोर्निया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्र किनारे बनने वाली धुंध दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे इलाकों में भी पाई जाती है, जहां यह सूखे क्षेत्रों में पानी का अहम स्रोत बन सकती है। वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इस काम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ेगा और नए तरीके सामने आएंगे – जैसे धुंध से पीने का पानी प्राप्त करना।

आखिर में, धुंध सिर्फ एक साधारण मौसमी घटना नहीं है। यह समुद्र, ज़मीन और हवा को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे वैज्ञानिक अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। जैसे-जैसे जलवायु गर्म हो रही है, धुंध को समझना और भी ज़रूरी हो जाएगा – ताकि हम पर्यावरण में हो रहे बदलावों का सही अनुमान लगा सकें और उन जल स्रोतों व पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा कर सकें, जो इस नाज़ुक धुंध पर निर्भर हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.magnific.com/free-photo/aerial-view-forest-shrouded-morning-fog_6889308.htm#fromView=keyword&page=1&position=4&uuid=6e898618-1d68-4eec-ae27-320ce4021ca0&query=Nature+fog

इमारतों और प्रकृति के बीच तालमेल

वन लोगों को सुरक्षित आवास (safe housing) देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि आजकल जिस ढंग से इनका निर्माण व प्रबंधन किया जाता है, वह अक्सर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है। निर्माण कार्य से कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions), जल प्रदूषण (water pollution) और कचरा उत्पन्न होता है। विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और कचरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा निर्माण कार्य से आता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारे लिए विकास की परिभाषा में प्रकृति शामिल ही नहीं है। हम प्रकृति को एक असीम संसाधन और कूड़ागाह की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी असंतुलन के कारण पर्यावरण को नुकसान और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम (environmental health risks) बढ़ रहे हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए अब केवल ‘टिकाऊ’ यानी नुकसान कम करने की सोच (sustainable development) से आगे बढ़कर ‘रीजनरेटिव डिज़ाइन’ की बात हो रही है। इसका मकसद ऐसे भवन और शहर बनाना है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे सुधारें। यानी सिर्फ संसाधनों का कम इस्तेमाल नहीं, बल्कि प्राकृतिक चक्रों को फिर से मज़बूत करना, जैव विविधता बढ़ाना और पर्यावरण को स्वस्थ बनाना इसका लक्ष्य है। यह सोच प्रकृति से प्रेरित (nature inspired design)  है, जहां हर चीज़ संतुलन में रहती है और संसाधनों का बार-बार उपयोग होता है।

शहर एक जीवित तंत्र

रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक अहम विचार यह है कि शहरों को एक जीवित तंत्र (urban ecosystem) की तरह देखा जाए। जैसे प्रकृति में एक ही समय पर कई काम होते हैं – पानी साफ करना, ऑक्सीजन बनाना, कार्बन थामना और जीवों को आश्रय देना – वैसे ही शहरों को भी इस तरह डिज़ाइन किया जा सकता है कि वे ये सब काम एक साथ कर सकें। इसके लिए योजनाकार किसी क्षेत्र के प्राकृतिक तंत्र (ecological planning) के काम करने के काम तरीके को समझकर उसके अनुसार शहर को विकसित करने की कोशिश कर सकते हैं।

इसका मतलब है कि हर क्षेत्र के शहर के लिए अलग-अलग तरीके (climate responsive design) अपनाए जाएं। जैसे ठंडे इलाकों में शहरों में ज़्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं ताकि हवा साफ हो और वायुमंडलीय कार्बन में कमी आए। वहीं सूखे इलाकों में ऐसे पौधे लगाए जा सकते हैं जो कम पानी में भी जीवित रह सकते हैं।

प्रकृति ने बदले शहर

दुनिया के कई उदाहरण (urban design examples) दिखाते हैं कि प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन शहरों को बेहतर बना सकती हैं। दक्षिण कोरिया के सियोल में एक बड़ी सड़क हटाकर उसके नीचे छिपी नदी को फिर से जीवित किया गया, जिससे शहर में एक हरा-भरा क्षेत्र बना। इससे न सिर्फ पर्यावरण सुधरा, बल्कि शहर का तापमान और ट्रैफिक भी कम हुआ। इसी तरह चीन में स्पंज सिटी मॉडल (sponge city concept) अपनाया गया, जहां पार्क, झीलें और ऐसी सतहें बनाई गईं जो बारिश का पानी सोख लेती हैं और बाढ़ रोकती हैं। इससे पानी की बचत (rainwater management) होती है, शहर ठंडा रहता है और लोगों के लिए बेहतर जगहें बनती हैं।

संसाधनों का पुनर्चक्रण

रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत (circular economy) है कि शहरों में संसाधनों के उपयोग को नए तरीके से समझा जाए। अभी हमारी व्यवस्था ऐसी है कि चीज़ें निकाली जाती हैं, इस्तेमाल की जाती हैं और फिर फेंक दी जाती हैं (linear economy)। लेकिन प्रकृति में ऐसा नहीं होता – वहां हर चीज़ का बार-बार उपयोग होता है, यानी एक का कचरा किसी और का संसाधन बन जाता है। अगर यही तरीका शहरों में अपनाया जाए, तो कचरा कम हो सकता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग (resource efficiency) हो सकता है।

डेनमार्क के कालुंडबर्ग (industrial symbiosis Kalundborg) में इसका अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है, जहां उद्योग एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग करते हैं। एक जगह की बची हुई ऊर्जा या कचरा दूसरी जगह काम आ जाता है। इससे ऊर्जा, जल उपयोग और प्रदूषण तीनों में कमी आती है। इसी तरह ब्रिटेन और स्वीडन में भी कचरे को उपयोगी चीज़ों में बदलने (waste recycling) के प्रयास किए गए हैं, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा हुआ है।

निर्माण सामग्री पर विचार

निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री (building materials) को भी प्रकृति के सिद्धांतों के अनुसार बदलने की ज़रूरत है। आज कई पारंपरिक सामग्री ज़हरीले रसायनों और ऊर्जा के भारी उपभोग से बनती हैं, जो इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है। इसकी बजाय रीजनरेटिव डिज़ाइन ऐसी सामग्री (eco friendly materials) के उपयोग पर ज़ोर देता है जो सुरक्षित हों, दोबारा इस्तेमाल की जा सकें और स्थानीय रूप से उपलब्ध हों, ताकि वे आसानी से प्राकृतिक चक्र में वापस जा सकें।

प्रकृति हमें इसका अच्छा उदाहरण देती है। प्राकृतिक सामग्री (biomaterials) कुछ सीमित और सुरक्षित पदार्थों से बनती हैं, फिर भी वे मज़बूत और उपयोगी होती हैं। इन्हीं से सीखकर वैज्ञानिक नई सामग्री विकसित कर रहे हैं, जो टिकाऊ भी हों और अच्छा प्रदर्शन भी करें। जैसे पौधों के कचरे और कवक से बनी इंसुलेशन (fungal insulation) सामग्री, जो पेट्रोलियम से बने उत्पादों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।

प्रकृति से प्रेरित स्मार्ट निर्माण

प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि चीज़ें कम संसाधनों में और आसानी से कैसे बनाई जा सकती हैं (efficient construction)। जहां उद्योगों में सामान बनाने के लिए ज़्यादा तापमान, भारी मशीनें और अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है, वहीं प्रकृति साधारण परिस्थितियों में ही मज़बूत चीज़ें बना लेती है। मसलन, मकड़ी का जाला (spider silk strength) सामान्य तापमान पर बनता है, लेकिन वह बहुत मज़बूत और लचीला होता है।

अब नई तकनीकें, जैसे 3-डी प्रिंटिंग (3D printing construction), इन सिद्धांतों को अपनाने में मदद कर रही हैं। प्रकृति में कम सामग्री का उपयोग करके उसे इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वह ज़्यादा मज़बूत बने। इसी तरह इंजीनियर अब डिजिटल तकनीक से हल्की लेकिन मज़बूत संरचनाएं बना रहे हैं, जिनमें कम सामग्री और ऊर्जा लगती है। इस तरह बेहतर डिज़ाइन पर ध्यान देकर निर्माण को अधिक प्रभावी और टिकाऊ (smart architecture) बनाया जा सकता है।

मज़बूत और स्वस्थ शहर

अगर इमारतों और शहरों को प्रकृति के अनुसार बनाया जाए, तो इसके कई फायदे (green buildings benefits) मिल सकते हैं। इससे पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा, जलवायु परिवर्तन (climate change adaptation) के असर से निपटना आसान होगा और लोगों के रहने के लिए अधिक स्वस्थ परिवेश मिलेगा। हरित भवन शहरों का तापमान कम कर सकते हैं, हवा को साफ कर सकते हैं और लोगों के लिए बेहतर सार्वजनिक स्थान (urban green spaces) बना सकते हैं। साथ ही, संसाधनों का पुनर्चक्रित उपयोग खर्च घटा सकता है और नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकता है।

लेकिन इसे सफल बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों – जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, डिज़ाइन और नीति – के लोगों को मिलकर काम करना होगा। अंतत: शहरों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम प्रकृति से कितना सीखते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आधुनिक टेक्नॉलॉजी के चालक: दुर्लभ मृदा तत्व

डॉ. सुशील जोशी

मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।

कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।

फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।

हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।

हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।

आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।

कार्बन के बाद आए तत्व

सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।

दुर्लभ मृदा तत्व

दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।

उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।

अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।

सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।

और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।

दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता

पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।

वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।

तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।

अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।

दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।

दुर्लभ मृदाओं के गुण

आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।

बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।

चुंबकत्व

चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।

इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f  कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।

लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।

दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।

दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।

प्रकाशउत्सर्जन

किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।

विद्युतीय गुण

दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।

धातुकर्म की दिक्कतें

दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।

दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।

इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।

भूराजनीतिक समस्याएं

विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।

कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।

उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।

जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।

फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।

आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।

ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।

ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।

एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।

एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।

फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।

जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।

इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी  प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तेहरान में ‘ब्लैक रेन’ से बढ़ा स्वास्थ्य संकट

हाल ही में ईरान की राजधानी तेहरान में मिसाइल हमलों (missile attacks) के बाद घना धुआं और काली बारिश (ब्लैक रेन-black rain) देखी गई है। इन हमलों में तेल भंडार और रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा, जिससे भारी प्रदूषण फैल गया। इसके चलते वर्षा पर्यावरण और मनुष्यों दोनों के लिए नुकसानदेह बारिश में बदल गई।

ब्लैक रेन का मतलब ऐसी बारिश से है जिसमें वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक घुल जाते हैं। तेहरान में यह प्रदूषण जलते हुए तेल और ईंधन से पैदा हुआ है। जब ये पदार्थ जलते हैं, तो वायुमंडल में हाइड्रोकार्बन, सल्फर ऑक्साइड्स, नाइट्रोजन यौगिक और बेंज़ीन जैसे कई खतरनाक रसायन (toxic chemicals) फैल जाते हैं। जब बारिश इस प्रदूषित वायु से होकर गुज़रती है, तो ये कण उसमें घुल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बारिश का पानी काला और हानिकारक बन जाता है।

बारिश का काला रंग मुख्य रूप से कालिख (soot) की वजह से होता है, जो अधूरी तरह से जलने पर बनने वाले बहुत छोटे कार्बन कण होते हैं। इसके अलावा, हमलों में टूटे-फूटे भवनों से निकली धूल और औद्योगिक कचरा भी इसमें मिल सकता है, जिससे यह और ज़्यादा हानिकारक बन जाता है। यानी ब्लैक रेन इस बात का संकेत है कि हवा अत्यधिक प्रदूषित (air pollution indicator) है।

तेहरान की भौगोलिक स्थिति ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। यह शहर अल्बोर्ज़ पहाड़ों (Alborz mountains) के पास स्थित है, जहां तापमान व्युत्क्रमण (temperature inversion) की स्थिति बन जाती है। यानी गर्म हवा ऊपर और ठंडी हवा नीचे फंस जाती है, जिससे प्रदूषित हवा ऊपर नहीं उठ पाती और फैल नहीं पाती। नतीजतन, ज़हरीले कण भूमि के पास ही बने रहते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों (health experts) की चिंता यह है कि लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं और दूषित बारिश के संपर्क में आ रहे हैं। धुआं और बहुत बारीक कण सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी (heart and lung disease) है। गंभीर मामलों में यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण भी बन सकता है। शिशु और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनका शरीर अभी विकसित हो ही रहा है।

एक बड़ी चिंता अतिसूक्ष्म (PM2.5) कणों की है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं। इससे हृदयरोग, उच्च रक्तचाप (high blood pressure) के अलावा मस्तिष्क (brain health risk) पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बारिश में मौजूद रसायन त्वचा और आंखों में जलन (skin and eye irritation) पैदा कर सकते हैं और अधिक मात्रा में होने पर गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

बहरहाल, प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे जितना हो सके घर के अंदर रहें और मौसम बदलने का इन्तज़ार करें।

तेहरान की यह स्थिति दिखाती है कि युद्ध (war environmental impact) के दौरान पर्यावरण को हुआ नुकसान बहुत जल्दी एक बड़े स्वास्थ्य संकट (public health crisis) में बदल सकता है, जिसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय तनाव और बढ़ता जल संकट

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार पानी के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया की जल व्यवस्था दम तोड़ रही है। कई नदियां, ग्लेशियर और भूजल भंडार (groundwater depletion) अपनी प्राकृतिक सीमा से ज़्यादा दबाव में हैं, और संभव है कि वे पहले जैसी स्थिति में फिर कभी न लौट सकें।

ग्लेशियर तेज़ी से पिघल (glacier melting) रहे हैं, जिससे नदियों का बहाव बदल रहा है। राजनीतिक तनाव इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। कई देशों के बीच पानी बंटवारे से जुड़े समझौते दबाव में आ गए हैं। अप्रैल 2025 में भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जो 1960 से सिंधु नदी तंत्र (Indus river system) के इस्तेमाल को तय करती थी। दूसरी ओर, अफगानिस्तान कुनार नदी पर एक बड़े जलाशय निर्माण की योजना बना रहा है, जिससे पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी में कमी आ सकती है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता (Ganga water treaty) भी दिसंबर में खत्म होने वाला है। नया समझौता न होने से नदी पर निर्भर लगभग 63 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, पानी से सम्बंधित पुराने समझौतों (water agreements) को बनाए रखना ही काफी नहीं है बल्कि उन्हें आज की परिस्थितियों के अनुसार ढालना होगा। पहले के समझौते उस समय के स्थिर जल स्तर को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण बारिश, ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव के पैटर्न पहले जैसे नहीं रहे। नवीनतम जानकारी उपलब्ध हो, तो समस्याओं का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।

आजकल वैज्ञानिक ‘डिजिटल ट्विन’ (digital twin technology) नामक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कंप्यूटर पर नदी प्रणाली का एक आभासी मॉडल बनाया जाता है, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का नदी पर क्या असर पड़ेगा। चीन की यांग्त्से नदी घाटी में इस तकनीक का इस्तेमाल जल प्रबंधन (smart water management) को बेहतर बनाने के लिए किया जा चुका है।

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) कई युद्धों और राजनीतिक तनाव के बावजूद दशकों तक चलती रही। इसका एक कारण यह था कि इसमें विश्व बैंक जैसे तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका थी और दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति भी बनाई गई थी। और पानी से जुड़े ढांचे और परियोजनाओं (water infrastructure projects) के लिए साझा वित्तीय व्यवस्था भी रखी गई थी।

ऐसी संस्थाओं को और मज़बूत होना चाहिए, ताकि वे पूरे नदी क्षेत्र (river basin management) के प्रबंधन में डैटा के आधार पर फैसले ले सकें। नदियों को केवल पानी के स्रोत के रूप में देखने की बजाय उन्हें समग्र प्राकृतिक तंत्र (ecosystem approach) के रूप में समझना होगा। बेहतर जानकारी, आपसी सहयोग और लचीले समझौतों की मदद से अभी भी आने वाले वैश्विक जल संकट (future water crisis) को टाला जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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बढ़ती गर्मी से कीटों पर बढ़ता संकट

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।

गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।

कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research)  से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।

अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।

इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।

यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।

कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन और पौधों का जल्दी फूलना

दुनिया भर में कई पौधों में अब पहले की तुलना में जल्दी फूल खिलने लगे हैं। पूरा ध्यान बढ़ते तापमान (global warming) पर जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार केवल गर्मी बढ़ना ही इसका कारण नहीं है। जैसे, ग्रीनहाउसों (greenhouse experiments) में सिर्फ ज़्यादा तापमान देने से फूल समय से पहले नहीं खिले। एक नए अध्ययन से पता चला है कि पत्तियों पर जमा होने वाली ओस की बूंदें (dew droplets on leaves) इस जल्दबाज़ी की वजह हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब पानी की बहुत सूक्ष्म बूंदें (micro water droplets) पत्तियों पर जमती हैं, तो वे कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करवाती हैं। ये अभिक्रियाएं पौधे को संकेत देती हैं कि अब फूल बनाने का समय आ गया है। तो लगता है कि केवल बढ़ता तापमान नहीं, बढ़ती नमी के कारण बनने वाली ओस भी पौधों के व्यवहार (plant behavior) को प्रभावित कर सकती है।

पहले किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट था कि थोक पानी (bulk water) की तुलना में पानी की बहुत छोटी बूंदें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। जब ऐसी सूक्ष्म बूंदें किसी ठोस अजैविक सतह पर बनती हैं, तो उनमें खास रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। देखा गया था कि इन अभिक्रियाओं के कारण वहां मूलक (free radicals)  बनते हैं जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) होते हैं। इस अवलोकन से यह सवाल पैदा हुआ कि यदि ऐसी ही बूंदें किसी सजीव सतह (जैसे पत्ती) पर जमें तो क्या परिणाम होगा।

इसको समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक छोटे फूलदार पौधे एरेबिडॉप्सिस थैलियाना (Arabidopsis thaliana plant)पर प्रयोग किए। यह ब्रेसिकेसी कुल (Brassicaceae family) का पौधा है।

विस्तृत प्रयोगों में पाया गया कि इस पौधे की पत्तियों पर ओस जमने पर, वहां होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (hydrogen peroxide)  और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide molecule)  बनते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड पौधों और जंतुओं में एक जाना-माना महत्वपूर्ण संकेतक अणु है। यह बूंद से पौधे की कोशिकाओं में पहुंचकर ऐसी जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू करवाता है, जो अंतत: पुष्पन की प्रक्रिया (flowering process) को सक्रिय कर देती हैं।

पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों में जुटाए गए ब्रेसिकेसी कुल के लगभग 1.2 करोड़ पौधों के पुष्पन रिकॉर्ड (plant flowering data) का विश्लेषण किया। उन्होंने फूल खिलने के समय की तुलना 11 अलग-अलग मौसम सम्बंधी कारकों से की। फूल खिलने के समय का सम्बंध तापमान (temperature change) और दिन की लंबाई के अलावा ओस बिंदु से भी देखा गया। ओस बिंदु हवा में उपस्थित नमी (air humidity) और हवा के तापमान से जुड़ा है।

हालांकि सभी वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं लेकिन यदि ये निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो वैज्ञानिकों की यह समझ बदल सकती है कि गर्माती जलवायु (climate change) में पौधे कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यदि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा की नमी में छोटे बदलाव भी फूल आने के समय को प्रभावित कर सकते हैं, तो इस शोध का व्यावहारिक उपयोग (agricultural application) भी हो सकता है। भविष्य में किसान नियंत्रित फुहार या हल्की नमी देकर फूलने का समय बदल सकते हैं और फसल उत्पादन (crop yield improvement) बढ़ा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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कितना माइक्रोप्लास्टिक है वातावरण में ?

माइक्रोप्लास्टिक (microplastic pollution) अब धरती के लगभग हर हिस्से में फैल चुका है – सहारा रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फ तक। लेकिन एक सवाल अब तक बना हुआ है: हवा में कितना माइक्रोप्लास्टिक (airborne microplastics) तैर रहा है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका जवाब बेहद चिंताजनक बताया है।

नेचर में प्रकाशित शोध (Nature journal study) के अनुसार, हर साल भूमि पर होने वाली मानवीय गतिविधियां लगभग 600 क्वाड्रिलियन (6 शंख या 6×1017) माइक्रोप्लास्टिक कण हवा में छोड़ती हैं। यह मात्रा समुद्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक से करीब 20 गुना अधिक है। इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत समुद्र हैं; वास्तव में तो भूमि से होने वाला प्रदूषण (land-based pollution) कहीं बड़ा कारण है।

शोध में, भूमि के ऊपर की हवा के हर घन मीटर में औसतन 0.08 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि समुद्र के ऊपर यह संख्या केवल 0.003 कण थी। आसान शब्दों में कहें तो हम जो हवा सांस के साथ अंदर ले रहे हैं, उसमें मौजूद ज़्यादातर माइक्रोप्लास्टिक मानव गतिविधियों से आ रहे हैं – जैसे यातायात (vehicular emissions), कारखाने, शहरों की धूल, सिंथेटिक कपड़ों के रेशे और कचरे से।

माइक्रोप्लास्टिक बहुत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से लेकर पांच मिलीमीटर तक होता है। ये इतने हल्के होते हैं कि हवा इन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और ये दूर- दूर तक फैल सकते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद इन्हें हटाना लगभग असंभव होता है और ये सालों तक बने रहते हैं (persistent environmental pollution)।

पहले हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लेकर किए गए अनुमान बहुत अलग-अलग थे – कहीं बहुत कम कण बताए गए थे, तो कहीं सैकड़ों। इस नए अध्ययन (global microplastic study) से यह समझ में आता है कि ऐसा क्यों हुआ। पहले के शोध अक्सर सीमित इलाकों के आंकड़ों या प्लास्टिक उपयोग के मोटे-मोटे अनुमानों पर आधारित थे। इसके विपरीत, इस अध्ययन में दुनिया भर के 283 स्थानों से जुटाए गए 2782 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक डैटा (global data analysis) तैयार हो सका है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एंड्रियास स्टोल के अनुसार इस शोध से एक बात तो साफ है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत भूमि है, न कि समुद्र। हालांकि अभी भी कुछ जानकारियों की कमी है, लेकिन दिशा अब स्पष्ट है। उम्मीद है कि यह अध्ययन आगे होने वाले शोध (future climate research) के लिए आधार बनेगा। बहरहाल, प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हवा में भी मौजूद है जिसमें हम सांस लेते हैं, और इसके लंबे समय के असर (health impact) क्या होंगे यह एक बड़ा सवाल है। (स्रोत फीचर्स)

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अच्छा खाएं, पृथ्वी की सीमा में खाएं

अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (ultra processed food) मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह – पृथ्वी – की सेहत (planetary health) को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौजूं है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं (planetary boundaries)का उल्लंघन कर लिया है। यहां उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।

म अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत (earth system health) का मामला है। कैसे?

यदि आप इस पहलू को थोड़ा खंगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं उसके उत्पादन (food production) में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए।

मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं

पहला, गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।)

दूसरा, प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागानों से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेंहूं, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियां पकाना वगैरह।

तीसरा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।

मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (global greenhouse gas emissions) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है। और, दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण (nutrient pollution) और जैव विविधता के नुकसान (biodiversity loss) का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)

वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन (unhealthy diet) के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया Reserved: पृथ्वी की सीमा-रेखाएं
2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने नौ सीमाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़) की पहचान की थी, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने का मतलब है हम सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएं हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।
की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहां लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं (safe operating space) के अंदर पूरी हो रही हैं।

ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है। लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियां, गिरियां, फलियां और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।

अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियां, फल, फलियां और गिरियां नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (processed food consumption) पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा (added sugar), संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।

कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों (food systems) के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार (sustainable diet) दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।

नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने (food waste reduction) और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव (policy interventions) करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई (deforestation) में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।

सरकारों को ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है – रेड मीट का उत्पादन (meat production) लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन (plant based food production) लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।

लेकिन यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालांकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) (economic benefits) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।

यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव (market influence) में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएं; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश (dietary guidelines) तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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