पांच करोड़ वर्ष पहले की जंगल गाथा              

डॉ. किशोर पंवार

इन दिनों ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है और तरह-तरह के पर्यावरणीय खतरों की बातें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होती रहती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। जियोलॉजिकल इतिहास (geological history) को देखें तो पता चलता है कि ऐसा पूर्व में भी हो चुका है; इस धरा पर हमारे पदार्पण से करोड़ों वर्षों पहले। यह घटना लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व जिस काल खंड में घटी थी उसे पैलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम (पीईटीएम) (Paleocene-eocene thermal maximum- PETM) कहा गया है। पृथ्वी के इतिहास में 6.6 करोड़ से 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को पैलियोसीन युग और 5.6 करोड़ से 3.39 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को इयोसीन युग कहा जाता है।

हाल ही में अमेरिका में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने उस कालखंड के वनों के घनेपन (Forest density) के बारे में बहुत ही शानदार जानकारी उपलब्ध कराई है। यह आश्चर्यजनक है कि जब हम नहीं थे, उस अतीत के बारे में इतनी विस्तार पूर्वक जानकारी कैसे हासिल की गई। आइए देखते हैं।

यह महती काम सैमुअल ऑश्चिन ग्लोबल सेंटर फॉर आइस एज रिसर्च की रेगन डन, व्योमिंग विश्वविद्यालय में प्रोफसर एलेन कुरानो और उनकी टीम ने किया है। टीम ने व्योमिंग के हैना बेसिन से पीईटीएम से पहले और बाद के सैकड़ों नमूने एकत्र करके उन प्राचीन जंगलों के जीवाश्म प्रमाणों की खोज की। इस जीवाश्म रिकॉर्ड (fossil records) का उपयोग करते हुए उन्होंने उस काल की गाथा को पुनः रचा है। आज से लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व, पृथ्वी के वन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए थे। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव के सबसे तीव्र दौरों में से एक की शुरुआत में तो जंगल ज़्यादा घने और हरे-भरे हो गए थे। लेकिन फिर यह वृक्षावरण झीना होने लगा। वैश्विक तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि के कारण गर्मी और सूखे ने जंगलों पर दबाव डाला, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। जंगलों की ऊपरी छतरी खुल गई, जिससे ज़मीन पर अधिक सूर्य की रोशनी पड़ने लगी और भूभाग में पानी की गति में बदलाव आ गया।

वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन अमेरिका के एक राज्य दक्षिण व्योमिंग (south wyoming) में किया है जहां पर फॉसिल ब्यूट राष्ट्रीय स्मारक स्थित है। यहां पर पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व से लेकर तीन करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व के जंतुओं और पौधों के शानदार जीवाश्म मिलते हैं।

ऊपरी परत (चंदवा या कैनपी) जंगल की भू-सतह तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा, तापमान, जलीय आवास और वन द्वारा संग्रहित की जा सकने वाली कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करती है। इस तरह, यह कैनपी और इसका घनापन पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने के तरीके का सबसे स्पष्ट संकेतक बन जाते हैं। वर्तमान जंगलों के घनेपन के आकलन का सर्वोत्तम तरीका लीफ एरिया इंडेक्स (Leaf Area Index – LAI) का है।

लीफ एरिया इंडेक्स

यह पत्तियों के कुल क्षेत्रफल और पेड़ के नीचे की भूमि के क्षेत्रफल का अनुपात है – इसमें नापा जाता है कि पेड़ों का फैलाव कितनी भूमि पर है और उन पेड़ों की पत्तियों का कुल क्षेत्रफल कितना है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मापदंड है। यह तो जानी-मानी बात है कि किसी पेड़ पर सारी पत्तियां एक बराबर ऊंचाई पर नहीं लगी होतीं – वे अलग-अलग परतों में जमी होती हैं। इसके अध्ययन को फिलोमेट्री (phyllometry) कहा जाता है। सबसे ऊपर वाली पत्तियों पर भरपूर प्रकाश पड़ता है, निचली पत्तियों पर कम। अंतत: नीचे की ज़मीन जो प्रकाश पहुंचेगा वह इन सारी पत्तियों की रुकावट के बाद ही पहुंचेगा। वनों का घनापन छाया, तापमान, जल हानि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है।

लेकिन सवाल तो यह है कि साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में रहे जंगलों का लीफ एरिया इंडेक्स कैसे निकाला जाए।

पुरातन जंगल का लीफ एरिया इंडेक्स

डन, कुरानो और उनके साथियों ने इसी सवाल के जवाब में एक नया तरीका खोज निकाला है। यह देखा गया है कि पत्तियों की कोशिका का आकार (shape of leaf cells) उनके विकास के दौरान प्राप्त धूप की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, छाया में उगने वाली पत्तियां धूप की तलाश में फैलते समय लंबी और अधिक चौड़ी कोशिकाएं विकसित करती हैं। वहीं, अधिक धूप में उगने वाली पत्तियां छोटी और गोल कोशिकाएं विकसित करती हैं।

लेकिन इसका अध्ययन तो आजकल की पत्तियों में किया जा सकता है। साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व (5 crore yeras ago) जो पत्तियां गिरी होंगी वे तो पूरी तरह सड़-गल गई होंगी। यानी उनकी कोशिकाओं का अध्ययन तो हो नहीं सकता। यहां एक दूसरा सुराग काम आया। यह सुराग था पत्ती की क्यूटिकल के टुकड़े।

पत्ती की सबसे बाहरी जीवित परत (एपिडर्मिस) के ऊपर एक पतली सुरक्षा परत चढ़ी होती है जिसे क्यूटिकल कहते हैं। क्यूटिकल एक अघुलनशील पॉलीमर से बनी होती है। यह जल-अवरोधी गुण (water-resistent quality) प्रदान करती है। इसकी रचना, आकार-प्रकार एपिडर्मिस कोशिकाओं से मेल खाते हैं। अतः क्यूटिकल के अध्ययन से एपिडर्मिस कोशिकाओं की रचना के बारे में खास जानकारी मिलती है। रोचक बात है कि क्यूटिकल का अपघटन करोड़ों सालों तक नहीं होता। पौधों के जीवाश्म अवसादी (तलछटी) चट्टानों में पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन का सीमित संचय होता है। इनमें जीवाश्म का संरक्षण अच्छी तरह से हो जाता है। जीवाश्मों में पत्तियों के ये खंडित क्यूटिकल अवशेष संरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों ने क्यूटिकल और एपिडर्मिस कोशिकाओं के इस सम्बंध को प्राचीन जंगलों के पुनर्निर्माण के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। इसे सटीक रूप से समझने के लिए, पहले उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्तमान जंगलों से मिट्टी के नमूने लिए, जिनमें विभिन्न सघनता (varied plant density) वाले पेड़ों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। मिट्टी के प्रत्येक नमूने में कई अलग-अलग पेड़-पौधों द्वारा छोड़ी गई क्यूटिकल पाई जाती है।

क्यूटिकल और एपिडर्मिस (leaf cuticle & epidermis) कोशिकाओं की रचना (गोल बनाम लंबी) की तुलना करने पर स्पष्ट हो गया कि अधिक घनी कैनपी वाले नमूनों में अधिक लंबी कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जबकि विरल कैनपी नमूनों में अधिक गोलाकार कोशिकाएं पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने पेड़ के नीचे की भूमि पर कैमरे लगाए, जिनके मुंह ऊपर की ओर थे। इनमें कैद तस्वीरों से पता चल गया कि भूमि पर कितनी रोशनी पहुंच रही है जो जंगल के घनेपन का द्योतक है। फिर इसका सम्बंध उन्होंने क्यूटिकल की कोशिकाओं से जोड़ा।

क्यूटिकल के आधार पर हज़ारों एपिडर्मिस कोशिकाओं के आकार की तुलना शोधकर्ताओं ने उनके द्वारा वास्तव में आकलित लीफ एरिया इंडेक्स से की। देखा गया कि पत्ती की कोशिकाओं का आकार लीफ एरिया इंडेक्स से और इस प्रकार से जंगल के घनत्व से निकट से संम्बधित है। कोशिकाएं जितनी अधिक लंबी होती हैं, उनके ऊपर वन आवरण उतना ही घना होता है। इस रिश्ते ने लाखों साल पहले व्योमिंग के जंगलों की बनावट का पुनर्निर्माण करने और यह दिखाने में मदद की कि समय के साथ वे कैसे बदलते रहे। (LAI & forest density relation)

पीईटीएम के दौरान वन संरचना में आए बदलावों (forest development changes) को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने से पौधों की वृद्धि, बायोमास और उत्पादकता कैसे प्रभावित होती है। अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड वनों के लिए हानिकारक है क्योंकि इसके साथ होने वाली गर्मी और सूखा पेड़ों पर दबाव डालते हैं और इससे कई पेड़ों की मृत्यु हो जाती है।

इस शोध से पता चलता है कि पीईटीएम के दौरान, वनों की ऊपरी परत अधिक खुली (open canopy) हो गई थी, बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई थी, और इस बदलाव ने जलवायु, पोषक तत्वों के चक्रण, अपक्षय और निश्चित रूप से, वनों में रहने वाले जानवरों को प्रभावित किया।

जंगल: हद कर दी आपने

एक बात यह पता चली कि तीव्र वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से ठीक पहले, वनों का घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जो संभवतः वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का परिणाम था क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड पेड़-पौधों को प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बोहायड्रेट व अन्य सामग्री के निर्माण में मददगार होती है। लिहाज़ा, वातावरण में अधिक कार्बन डाईऑक्साइड हो, तो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) ज़्यादा होगा और उनकी वृद्धि भी ज़्यादा होगी।   

लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड का एक अन्य असर भी होता है – ग्रीनहाउस प्रभाव (green house effect), जिसके कारण तापमान बढ़ता है। तो वह शुरुआती हरा-भरा जंगल ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। तापमान बढ़ने के साथ-साथ, गर्मी और सूखे के चलते पेड़ों के मरने से जंगल की ऊपरी परत तेज़ी से झीनी होती गई।

लेकिन 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व के प्राचीन जंगलों की कहानी उनके पतन के साथ समाप्त नहीं होती है। समय के साथ, गर्म जलवायु में चट्टानों के विघटन (जिसे अपक्षय कहा जाता है) (rock weathering) की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे हवा से कार्बन को खींचकर समुद्री तलछट में जमा कर दिया। इससे एक बार फिर वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी आई, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु ठंडी हुई और पानी अधिक आसानी से उपलब्ध हो गया। वन आवरण फिर से विकसित हो गए और अंततः वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से पहले की तुलना में और भी अधिक घने हो गए। वनों के विस्तार के साथ, संभवतः मिट्टी को स्थिर करने, जल-चक्र को नियंत्रित करने और वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने की उनकी क्षमता बहाल हो गई। जब पेड़-पौधे फिर से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखने लगे तो ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने और ग्रह के दीर्घकालिक पुनरुद्धार को बढ़ावा देने में मदद मिली। लेकिन इसमें एक लाख वर्षों से भी अधिक समय लगा।

वर्तमान परिदृश्य

इस घटनाक्रम में आज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक छिपा है। दुनिया में इस समय कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन केवल तभी जब तापमान और पानी पेड़ों की सहनशीलता की सीमा (saturation limit) के भीतर रहें। एक हद से ज़्यादा गर्मी, सूखा, कीड़े, रोगजनक और जंगल की आग कार्बन डाईऑक्साइड के किसी भी वृद्धिकारक प्रभाव को खत्म कर सकते हैं।

विश्व भर में, तापमान में वृद्धि (temperature increase) के साथ-साथ लकड़ी, फसलों और चारागाहों के लिए वनों की कटाई से जंगलों की सहनशीलता और भी कम हो रही है, जिसके कारण कई जंगलों में पहले से ही कम होने के संकेत दिखने  लगे हैं।

आज, मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि उस काल की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रही है। जीवाश्म रिकॉर्ड यह तो बताते हैं कि वन पुनर्जीवित (forest restoration) हो सकते हैं, बशर्ते मनुष्य उन्हें उन सीमाओं से आगे न धकेलें, जिनसे उबरने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डन आगे कहती हैं, “पेड़ अद्भुत हैं। जंगल हर दिन करोड़ों टन कार्बन सोखते हैं, लेकिन जब जंगल कम होने लगते हैं, तो कार्बन सोखने वाले सोख्ते भी कम होने लगते हैं। पीईटीएम हमें याद दिलाता है कि जब जंगल कम होते हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे जलवायु तंत्र पर पड़ते हैं। मानव जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व गति को कम करने में वनों की क्षमता को देखते हुए, इनकी रक्षा और पुनर्स्थापन (forest re-establishment & conservation) करना ही बुद्धिमानी होगी।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.sciencenews.org/wp-content/uploads/sites/2/2020/04/040120_cg_antarctica_forest_feat.jpg

शहरों में हरियाली के लिए पेड़ सोच-समझकर चुनें

हम सबने मनुष्य की सहूलियत के लिए बड़े से लेकर छोटे शहरों को तेज़ी से क्रॉन्कीट के जंगलों (concrete forests) में तब्दील होते देखा है। पहले तो शहरों के और फिर शहरों के आसपास के खेतों और जंगलों में नैसर्गिक रूप से लगे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई हुई और उनकी जगह इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर ने ले ली।

जब गर्माती दुनिया और बदलती जलवायु की समस्या ने पैर पसारे तो वनीकरण, वृक्षारोपण और शहरी हरितीकरण (green cities) के प्रयास शुरू हुए। शहरों को हरा-भरा करने के एक प्रयास में शहरों में सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों में लगाने के लिए ऐसे पेड़-पौधे चुन लिए जाते हैं जो तेज़ी से बड़े हो सकें; इससे शहर में जल्द हरियाली दिखने लगती है। लेकिन इस तरह के पेड़ों के चुनाव के अपने जोखिम हैं। वनीकरण और हरितीकरण के लिए कुछ पेड़-पौधों को चुनने से जैव-विविधता में कमी का जोखिम तो है ही, लेकिन एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये पेड़-पौधे वायु प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

पेड़ की वायु प्रदूषण में भूमिका, यह बात सुनकर हैरत हो सकती है। लेकिन कुछ पेड़ों से प्रकाश संश्लेषण के समय उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) (Volatile organic compounds) और वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड्स की अभिक्रिया से ओज़ोन बनती है। वायुमंडल की निचली परतों में ओज़ोन  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इससे श्वास नली में सूजन, दमा और फेफड़ों सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।

यहां गौरतलब बात यह है कि पेड़ों से उत्सर्जित VOC खुद वायु प्रदूषण (air pollution) में योगदान नहीं देते हैं, बल्कि जब ये मनुष्य की गतिविधियों के चलते उत्सर्जित होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) से अभिक्रिया करते हैं, तब वे हानिकारक ओज़ोन बनाते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि VOCs महज़ वनस्पतियों द्वारा उत्सर्जित नहीं होते, मनुष्य द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तमाम खुशबूदार चीज़ों, जीवाश्म ईंधनों, रसायन उद्योग वगैरह भी VOC उत्सर्जन का कारण हैं।

चीन की जिनान युनिवर्सिटी के वायुमंडल रसायन विज्ञानी बिन युआन ओज़ोन प्रदूषण (ozone pollution) पर मानवीय गतिविधियों के असर समझने की कोशिश रहे थे, तभी कुछ आंकड़ों ने उन्हें चौंकाया – उन्होंने पाया कि शहरी पेड़-पौधे ओज़ोन उत्सर्जन में पूर्व-अनुमानित स्तर से कहीं ज़्यादा योगदान दे रहे थे। इन आंकड़ों ने उन्हें आगे अध्ययन को उकसाया।

यह तो मालूम था कि कई वनस्पति प्रजातियां VOCs उत्सर्जित करती हैं, और कुछ प्रजातियां अन्य की तुलना में ज़्यादा VOCs उत्सर्जित करती हैं। इन प्रजातियों में वीपिंग विलो (Salix babylonica) और पॉपलर (Populus वंश) के पेड़ शामिल हैं। ये पेड़ आजकल शहरों को जल्दी हरा-भरा बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, खासकर चीन के शहरों में। भारत के शहरी बगीचों और सड़कों के किनारे भी आजकल वीपिंग विलो (weeping willow) काफी दिखाई देते हैं, और पॉपलर के पेड़ व्यावसायिक दृष्टि से शहरों के बाहर काफी लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में आइसोप्रीन (isoprene) नामक यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो एक प्रकार का VOC है और प्रकाश संश्लेषण के उप-उत्पाद के रूप में बनता है।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन चीन के बीज़िंग शहर पर केंद्रित किया। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बीजिंग शहर की हवा के नमूने लिए, साथ ही शहर के आसपास के निगरानी केंद्रों से ओज़ोन सम्बंधी डैटा लिया। उन्होंने पाया कि मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच बीजिंग में कुल VOC उत्सर्जन में पेड़-पौधों का योगदान लगभग 10 प्रतिशत था, बाकी हिस्सा मानवीय गतिविधियों (Human practices) से आया था।

उन्होंने 24 अन्य बड़े शहरों में लगाए गए पेड़ों की प्रजातियों का भी अध्ययन किया ताकि उनके द्वारा होने वाले संभावित आइसोप्रीन उत्सर्जन (emissions) का अंदाज़ मिल सके। पाया गया कि बीजिंग में लगभग 35 प्रतिशत पेड़ ऐसे हैं जो आइसोप्रीन उत्सर्जन करते हैं। और तो और सिडनी, मेलबर्न समेत ज़्यादातर शहरों में आइसोप्रीन का उत्सर्जन बीजिंग से भी ज़्यादा है। मसलन सिडनी में लगभग 65 प्रतिशत पेड़ आइसोप्रीन उत्सर्जन करने वाले हैं।

चूंकि VOC सीधे ओज़ोन नहीं बनाते हैं, इसलिए शहर के ओज़ोन प्रदूषण में पेड़-पौधों के योगदान का आकलन करने के लिए उन्होंने एक तरीका अपनाया। उन्होंने देखा कि वातावरण में VOCs कितनी तेज़ी से हाइड्रॉक्सिल मूलकों के साथ अभिक्रिया करते हैं। दरअसल, हाइड्रॉक्सिल VOCs के साथ अभिक्रिया करके पेरोक्सी रेडिकल (peroxy radicle) बनाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके ऐसे यौगिक बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश में ओज़ोन में बदल जाते हैं। पाया गया कि ओज़ोन बनाने वाले रसायन में 52 प्रतिशत हिस्सा पेड़-पौधों का था, आइसोप्रीन मुख्य योगदानकर्ता था।

हालांकि मानवीय गतिविधियों से होने वाला कुल VOC उत्सर्जन पेड़-पौधों से होने वाले उत्सर्जन से ज़्यादा था, लेकिन ओज़ोन बनने में उनका योगदान पेड़-पौधों की तुलना में कम था।

यह तो जानी-मानी बात है कि तापमान बढ़ने के साथ VOCs और ओज़ोन का उत्पादन बढ़ता है। पाया गया कि 35 डिग्री सेल्सियस पर VOCs के साथ हाइड्रॉक्सिल की अभिक्रिया दर 20 डिग्री सेल्सियस की तुलना में सात गुना ज़्यादा थी।

शोधकर्ताओं ने बीजिंग के शहरी गर्म टापू प्रभाव (शहरी इलाकों का आसपास के इलाकों की तुलना में ज़्यादा गर्म होना) पर भी विचार किया। अनुमान है कि गर्मियों में दिन के समय, जब अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस होता है, तब शहर में 0.8 डिग्री सेल्सियस की अधिकता आइसोप्रीन उत्सर्जन को 12 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यानी गर्माती पृथ्वी (global warming) शहरी पेड़-पौधों से होने वाले VOC उत्सर्जन को और भी बढ़ा सकती है।

यहां सचेत रहने वाली कुछ बातें हैं। एक यह कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में VOC उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है, जिसे थामने की ज़रूरत है। साथ ही साथ NOx उत्सर्जन को कम करने की भी ज़रूरत है क्योंकि VOC और इनकी आपसी अभिक्रिया से ही ओज़ोन बनती है – NOx के बिना VOCs ओज़ोन प्रदूषण में योगदान नहीं दे सकते।

दूसरा यह कि साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित अध्ययन के इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हमें पेड़ नहीं लगाने चाहिए। पेड़ों के कई फायदे हैं, जिन्हें यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं लगती। ज़रूरत है कि शहरों का हरितीकरण करते समय शहरों और जलवायु के अनुकूल (climate adaptive trees) पेड़-पौधे चुने जाएं।

वैसे भारत के संदर्भ में भी VOC उत्सर्जक पेड़ों के असर को मापना दिलचस्प होगा क्योंकि यहां के शहरों में भी वीपिंग विलो अब काफी देखने को मिलते हैं, और पॉपलर के पेड़ों को उनके व्यवसायिक उपयोग के लिए शहरों के बाहर लगाया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://citygreen.com/wp-content/uploads/2021/10/Wulugul-Walk-Photos-1-Recovered.jpg

डार्विन का अंदाज़ा सही था: यह पौधा कीटभक्षी है

दौलत सिंह तंवर

विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।

सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।

चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।

हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।

शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।

अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।

इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।

विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।

यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcTbWhgWDhur-FG0bQ87Yd6UVPVaqaHhyqkprrAWHyNDlls2FntCYibPeCM&s=10

वनों की अनोखी अनुकूलन क्षमता

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में उष्णकटिबंधीय जंगलों (tropical forests) को सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता रहा है। लेकिन नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक खोज ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। शोधकर्ताओं ने कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको के वनों के विभिन्न पेड़ों पर सूखे के प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया।

पाया गया कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग पेड़ों में पानी की उपलब्धता और वातावरण के अनुकूल अपने हिसाब से परिवर्तन (adaptations) होते हैं। इस तरह के पूर्व अध्ययन अलग-अलग प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित थे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना था कि एक ही प्रजाति के सभी पेड़ सूखे के प्रति लगभग एक जैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिको में प्राकृतिक वर्षा की मात्रा के आधार पर छह वन क्षेत्रों को चिन्हित किया। सालाना  85 सेंटीमीटर वर्षा वाले सूखे ग्वानिका वन (guanica forest) से लेकर 450 सेंटीमीटर वाले लुक्विलो वर्षावन (luquilo rainforest) में 18 विभिन्न प्रजातियों के 290 पेड़ों का परीक्षण किया। हर एक पेड़ से शाखाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनके सूखने की प्रक्रिया को जांचा। जांच के दौरान हर पांच मिनट के अंतराल पर शाखाओं की तस्वीर ली गईं। तनों के जल विभव (वाटर पोटेंशियल) और वाहिका-रोध (एम्बोलिज़्म) को भी मापा गया। जल विभव से आशय होता है कि किसी स्थान से पानी किस ओर बहेगा और वाहिका-अवरोध का मतलब होता है कि पानी की कमी का कितना तनाव होने पर संवहनी ऊतक (ज़ायलम) की नलिकाओं में हवा के बुलबुले बनकर पानी का प्रवाह रोक देंगे।

18 में से 17 प्रजातियों के पेड़ों में वर्षा की मात्रा से सम्बंधित अंतर साफ दिखे। सूखे क्षेत्र वाले पेड़ों के संवहनी ऊतकों में एम्बोलिज़्म (embolism) के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। ये पेड़ सूखे के हालत में भी पर्ण रंध्रों (स्टोमैटा) को खुले रखने में सक्षम थे, जिससे पानी की कमी होते हुए भी नियंत्रित तौर पर भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) जारी रही।

दूसरी ओर, नमी वाले वन क्षेत्रों के पेड़ों के तनों और पत्तियों में पानी संग्रह करने की अधिक क्षमता पाई गई।

शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate areas) में एक ही प्रजाति के पेड़ों में वातावरण के अनुसार ऐसा अनुकूलन अक्सर कम ही देखने को मिलता है, लेकिन प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। इस अनुकूलन क्षमता का एक कारण वर्षावन की ज्वालामुखीय मिट्टी है, जो नमी बेहतर ढंग से सोखती है। जबकि सूखे क्षेत्र में चूना पत्थर (limestone) की मिट्टी पानी नहीं रोक पाती। 

यह खोज जलवायु परिवर्तन के अनुसार वन संरक्षण मॉडलों (forest conservation models) को ज़्यादा सटीक बनाने में मददगार साबित होगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक किसी प्रजाति की एक निश्चित क्षमता के बजाय स्थानीय स्तर पर होने वाले अनुकूलन को भी शामिल कर सकेंगे। यह अध्ययन पेड़ों के लचीले स्वभाव को तो दर्शाता है, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक एक चेतावनी भी दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता वैश्विक तापमान और सूखे जैसे हालात इन पेड़ों की सहनशीलता की सीमा को लांघ सकते हैं, जिससे भविष्य में वनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://lacgeo.com/sites/default/files/el_yunque_rain_forest_opt%20%281%29.jpg

पौधों और कीटों की जुगलबंदी

अपूर्वा आचार्य

कल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।

वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।

युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।

अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।

पेड़–पौधों की वंशवृद्धि

वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।

दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?

परागण: कुदरती कूरियर सेवा 

फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।

परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।

देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है। 

चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।

हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।

जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।

फूलदार पौधे और कीटों का सह–विकास

लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।

फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।

इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए। 

पौधों और कीटों के बदलाव

विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।

साज–सज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।

मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।

चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।

कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।

परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है। 

गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।

यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।

जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।

क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।  

हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।

परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।

वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां

वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।

बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।

परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।

अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://greenacreslandscapeinc.com/wp-content/uploads/2019/05/bee-on-yellow-flower.jpg

वैश्विक महाप्रयोग: वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

दौलत सिंह तंवर

आजकल हम हर दिन जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के बारे में सुनते हैं। गर्मियां लगातार लंबी और अधिक गर्म होती जा रही हैं, बेमौसम बारिश हो रही है और सर्दियां सिकुड़ रही हैं। जब मौसम अचानक बदलता है, तो मनुष्य तो अपने घरों में एसी या हीटर चालू कर लेते हैं। जानवर और पक्षी ठंडी या गर्म जगहों की ओर पलायन कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन पेड़-पौधों का क्या होता है, जो अपनी जड़ों से ज़मीन से बंधे होते हैं? उनके पास भागने या छिपने का कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें तो उसी जगह पर रहकर बदलते मौसम से लड़ना होता है।

अलबत्ता, किसी भी जीव को नए माहौल में खुद को ढालने में हज़ारों-लाखों साल लगते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) तो बहुत तेज़ी से हो रहा है। तो क्या पौधे इतनी जल्दी खुद को बदल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान के इतिहास का बहुत बड़ा और अद्भुत प्रयोग एरेबिडॉप्सिस थेलियाना पर किया है।

एरेबिडॉप्सिस थेलियाना

इस कहानी का मुख्य किरदार एक बहुत ही छोटा और आम-सा दिखने वाला पौधा थेल क्रेस है, जिसका वैज्ञानिक नाम एरेबिडॉप्सिस थेलियाना (Arabidopsis thaliana) है। यह सरसों वनस्पति कुल (brassica family) का एक जंगली पौधा है।

आप सोच रहे होंगे कि आम, नीम या गेहूं जैसे बड़े और ज़रूरी पौधों को छोड़कर वैज्ञानिकों ने इस छोटे से खरपतवार (weed) को क्यों चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दुनिया में यह पौधा एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। इसका आकार छोटा होता है, इसे उगाना आसान है, इसका जीवनचक्र बहुत छोटा (कुछ ही हफ्तों का) होता है। और, सबसे बड़ी बात, वैज्ञानिकों को इसकी आनुवंशिक सामग्री यानी डीएनए (DNA) की पूरी जानकारी है। इसलिए इसमें होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को वैज्ञानिक आसानी से पकड़ सकते हैं।

महा-प्रयोग

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मोई एक्सपोसिटो-अलोंसो के नेतृत्व में दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह जानने का फैसला किया कि पौधे तेज़ी से बदलते मौसम के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रयोग वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2022 के बीच 5 वर्षों तक किया गया। इसके नतीजे 26 मार्च 2026 को साइन्स में प्रकाशित किए गए हैं। प्रयोग की योजना अनोखी थी। दुनिया भर से एरेबिडॉप्सिस थेलियाना के 231 अलग-अलग स्ट्रेन्स इकट्ठे किए। ये सभी थे तो एरेबिडॉप्सिस थेलियाना, लेकिन हर एक के डीएनए में थोड़ा-थोड़ा अंतर था, जिसकी वजह से इनके गुणधर्मों (traits) में छोटे-मोटे अंतर थे। उन्होंने सभी 231 स्ट्रेन्स के बराबर-बराबर संख्या में बीजों का एक मिश्रण तैयार किया। बीजों के इस मिश्रण को दुनिया के 30 अलग-अलग स्थानों पर बोया गया। इनमें स्पेन की तेज़ गर्मी, उत्तरी युरोप की कड़ाके की ठंड और मध्य पूर्व (जैसे नेगेव रेगिस्तान) की भयंकर सूखे जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सबसे खास बात यह थी कि बीजों को बोने के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें कोई खाद-पानी या सुरक्षा नहीं दी। उन्हें पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे, प्राकृतिक रूप से बढ़ने, फूलने और अपने बीज गिराने के लिए छोड़ दिया। पांच सालों में पौधों की कई पीढ़ियां आई-गईं।

चौंकाने वाले परिणाम

डार्विन के विकासवाद (darwin’s theory of evolution) के अनुसार, विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। लेकिन जब पांच साल बाद वैज्ञानिकों ने उन 30 जगहों से पौधों के नए बीजों और डीएनए की जांच की तो नतीजे हैरान करने वाले थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 3 से 5 पीढ़ियों के भीतर ही पौधों में स्थानीय जलवायु के हिसाब से बदलाव हो गए थे। इसे रैपिड इवोल्यूशन (त्वरित विकास) (rapid evolution) कहा जाता है। हर जगह के पौधों में ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके से अनुकूलन (adaptation) हुआ। जो पौधे गर्म जगहों पर लगाए गए थे, उनके डीएनए में ऐसे बदलाव देखे गए जो उन्हें कम पानी में जीवित रहने और भीषण गर्मी सहने की ताकत देते थे। ठंडी जगहों वाले पौधों में ऐसे जीन विकसित हुए जो पाले (frost) से उनकी रक्षा कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वसंत ऋतु को पहचानने में था। गर्म इलाकों में पौधों ने जल्दी फूल देना शुरू कर दिया ताकि ज़्यादा गर्मी पड़ने से पहले ही वे बीज पैदा कर सकें। पौधों की डीएनए संरचना ही बदल गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जीन्स नए सिरे से विकसित हुए थे या कुदरती विविधता में से चुन भर लिए गए थे।

जेनेटिक विविधता का जादू

इस प्रयोग से एक बहुत बड़ा सबक यह मिला कि कोई भी प्रजाति तभी बच सकती है, जब उसके अंदर विविधता हो। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक टूलबॉक्स (toolbox) है जिसमें सिर्फ हथौड़े रखे हैं। अगर आपको कोई पेंच कसना हो, तो आप हथौड़े से वह काम नहीं कर सकते। लेकिन अगर आपके टूलबॉक्स में पेंचकस, प्लास और हथौड़ा सब कुछ है, तो आप हर तरह की समस्या सुलझा सकते हैं।

बिल्कुल इसी तरह, वैज्ञानिकों ने जो 231 तरह के बीजों का मिश्रण बनाया था वह एक टूलबॉक्स की तरह था। जब सूखा पड़ा, तो वे पौधे मर गए जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए था, लेकिन उसी मिश्रण में मौजूद वे पौधे बच गए जिनके अंदर सूखे से लड़ने वाले जीन मौजूद थे। इन्हीं बचे हुए पौधों ने आगे चलकर अपनी आबादी बढ़ाई। अर्थ सीधा-सा है, जैव विविधता (biodiversity) प्रकृति का सबसे बड़ा टूलबॉक्स है। अगर हम जंगलों और पौधों की विविधता को नष्ट करेंगे, तो हम उनसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत भी छीन लेंगे।

अनुकूलन की भी सीमा है

यह प्रयोग जहां एक तरफ उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बहुत गंभीर चेतावनी भी देता है। क्या पौधे हर तरह के खराब मौसम को झेल सकते हैं? जवाब है, नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि अत्यधिक विषम परिस्थितियों, जैसे तपते रेगिस्तान या अत्यधिक सूखे, में त्वरित विकास भी पौधों को नहीं बचा सका। तीन साल के भीतर ही इन इलाकों से पौधे पूरी तरह विलुप्त हो गए। उनके डीएनए में अनियमित बदलाव (irregular changes) होने लगे, जो इस बात का संकेत था कि तनाव इतना ज़्यादा हो चुका था कि प्रकृति का सुरक्षा तंत्र टूट गया। यह हमें बताता है कि पौधों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति और तीव्रता अगर एक सीमा से पार हो गई, तो जंगल-के-जंगल और खेत-के-खेत नष्ट हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://mediasvc.eurekalert.org/Api/v1/Multimedia/7dc66bff-0d39-4a00-9463-91828a008d7e/Rendition/low-res/Content/Public

साल वनों का संकट और एकीकृत कीट प्रबंधन

सुदर्शन सोलंकी

मध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।

प्रकोप के कारक

यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।

परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे

आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।

दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल  जाते हैं।

शुद्ध वन और जैव–विविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।

वृक्षों पर प्रभाव

वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।

लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।

भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:

सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।

सब–हिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।

वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।

क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?

पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।

एकीकृत कीट प्रबंधन

घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।

इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।

एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।

जैविक नियंत्रण  भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।

डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://t3.ftcdn.net/jpg/03/55/67/26/360_F_355672659_vuAfawFES4TIFsICwpUlhLNyOsGVPFjB.jpg

वनस्पतियों का अदृश्य संवाद

सुदर्शन सोलंकी

बीसवीं सदी के अंत तक, पादप पारिस्थितिकी मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक चयन’ और प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा (Interspecific Competition) के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह स्थापित धारणा थी कि किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में वनस्पति केवल सूर्य के प्रकाश, जल और मृदा के पोषक तत्वों के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं। फिर, 1997 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की पादप विज्ञानी डॉ. सुज़ैन सिमार्ड द्वारा नेचर में प्रकाशित एक ऐतिहासिक शोध पत्र ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।

सिमार्ड और उनकी टीम ने कार्बन-14 (कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक) और कार्बन-13 (स्थिर समस्थानिक) का उपयोग करके यह प्रमाणित किया कि वनस्पतियां आपस में कवक-तंतुओं के माध्यम से रासायनिक रूप से जुड़ी हुई हैं। इस सहजीवी प्रणाली को माइकोराइज़ल नेटवर्क (mycorrhizal network) कहा गया, जो पादप विज्ञान में पारस्परिक सहयोग की एक नई धारणा के रूप में सामने आई। यह भूमिगत फफूंदों (कवक) और पौधों की जड़ों के बीच समन्वय होता है। एक मायने में यह पादप विज्ञान में पैराडाइम शिफ्ट था।

संरचना और सहजीवन

माइकोराइज़ल नेटवर्क  भूमिगत अंतःसंचार प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार के कवकों पर आधारित होती है। एक होते हैं एक्टोमाइकोराइज़ा (actomycorrhiza), जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण वनों के वृक्षों की जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरे होते हैं अर्बस्कुलर माइकोराइज़ा (arbuscular mycorrhiza), जो पादप जड़ों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश करके घनिष्ठ अंतःसम्बंध स्थापित करते हैं।

यह नेटवर्क एक परिष्कृत जैविक और पारस्परिक सहजीवी विनिमय से संचालित होता है। प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया से पादप कार्बन का स्थिरीकरण करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। वे उसका लगभग 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा इन कवक तंतुओं (मायसेलियम) (mycellium) को स्थानांतरित कर देते हैं। बदले में, ये कवक तंतु (जो अपनी सूक्ष्म संरचना के कारण मिट्टी के अत्यंत बारीक छिद्रों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं) पेड़-पौधों को पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त करने में मददगार होते हैं। यह जटिल नेटवर्क वनस्पति जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 1000 गुना तक विस्तृत कर देता है, जिससे पूरे वन क्षेत्र की पोषण क्षमता सुदृढ़ होती है।

संकेतन तंत्र

पादपों में जंतुओं की तरह कोई केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली नहीं होती, परंतु वे विशिष्ट जैव-रासायनिक और विद्युतीय संकेतों के माध्यम से इस कवक नेटवर्क (funal network) को एक ‘सिग्नलिंग चैनल’ (signaling channel) की तरह उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे कई तरह के संकेत (signals) प्रेषित कर पाते हैं। जैसे,

शाकाहारी आक्रमण: जब किसी वन क्षेत्र में शाकाहारी कीटों का हमला होता है, तो प्रभावित पादप तुरंत जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic acid) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्पादन करते हैं। इसे वे अपनी जड़ों के माध्यम से कवक जाल में पहुंचा देते हैं। यह रासायनिक संकेत पड़ोसी पादपों तक पहुंचता है। यह एक उद्दीपन होता है जिससे वे पादप अपनी पत्तियों में टैनिन और फिनोलिक्स जैसे विषाक्त रसायनों का संचय बढ़ा लेते हैं, जिससे पत्तियां कीटों के लिए अभोज्य हो जाती हैं।

जल तनाव: गंभीर जल तनाव या सूखे की स्थिति में पादपों द्वारा उत्सर्जित एब्सिसिक एसिड (ABA) इस नेटवर्क के माध्यम से अन्य वृक्षों को सचेत करता है, जिससे वे अपने पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) को आंशिक रूप से बंद कर वाष्पोत्सर्जन की दर घटा लेते हैं।

रोगजनक कवक का आक्रमण: प्रयोगशालाओं में देखे गए साक्ष्यों के अनुसार, रोगजनक कवक (disease causing fungi) के आक्रमण के समय सैलिसिलिक एसिड का प्रवाह पूरे नेटवर्क में सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेज़िस्टेंस (systemic accquired resistence) को सक्रिय करता है, जिससे स्वस्थ पादपों में मात्र 6 से 18 घंटे के भीतर रक्षात्मक एंज़ाइम क्रियाशील हो जाते हैं।

‘मदर ट्री’ (Mother tree) और सहोदरों की पहचान: इस नेटवर्क का सबसे विस्मयकारी वैज्ञानिक पहलू तब सामने आता है जब हम वन के सबसे वयोवृद्ध और विशाल वृक्षों का अध्ययन करते हैं। जिन्हें पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘मदर ट्री’ या ‘हब ट्री’ (hub tree) कहा जाता है। ये विशाल वृक्ष इस भूमिगत कवक जाल के मुख्य केंद्र या ‘राउटर’ (router) की तरह कार्य करते हैं, जहां से ऊर्जा और संसाधनों का प्रवाह नियंत्रित होता है। कभी-कभी वन के सघन चंदवे या छतरी के कारण छोटे नवजात पौधों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता और वे प्रकाश संश्लेषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसा होने पर ये मदर ट्री इस कवक नेटवर्क के माध्यम से अपने संचित कार्बन और नाइट्रोजन को उन कमज़ोर पौधों की ओर प्रवाहित करते हैं।

कनाडा के वनों में किए गए अध्ययनों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि ये वृद्ध वृक्ष सहोदर पहचान (किन्शिप रिकग्निशन) (kinship recognition) की क्षमता रखते हैं। वे रासायनिक संकेतों के माध्यम से यह पहचान लेते हैं कि कौन-सा अंकुरित पौधा उन्हीं के बीजों से विकसित हुआ है, और वे जानबूझकर अपनी प्रजाति के और विशेषकर अपने स्वयं के सहोदर पौधों को अन्य पौधों की तुलना में अधिक मात्रा में पोषण और सुरक्षात्मक रसायन स्थानांतरित करते हैं। और तो और, जब ये मदर ट्री मरणासन्न अवस्था में होते हैं, तो वे अपनी बची हुई अधिकांश कार्बनिक ऊर्जा और रक्षात्मक आनुवंशिक सूचनाएं इस नेटवर्क के ज़रिए युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं। यह वनस्पति जगत की एक अदभुत प्राकृतिक वसीयत है।

पारिस्थितिकीय संकट 

यह भूमिगत तंत्र हमें जितना सुदृढ़ दिखाई देता है, आधुनिक मानवीय हस्तक्षेपों के प्रति उतना ही संवेदनशील भी है। वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई और सघन एकफसली कृषि (moncropping) के कारण यह सदियों पुराना माइकोराइज़ल नेटवर्क खंडित हो रहा है, जिससे वनों की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की इस कवक संरचना को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे कृत्रिम रूप से उगाए गए पौधे इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो जाते हैं।

यद्यपि समकालीन पादप विज्ञान ने इस ‘अदृश्य संवाद’ की बुनियादी रूपरेखा को समझ लिया है, परंतु विभिन्न पादप प्रजातियों के मध्य होने वाले सूक्ष्म रासायनिक विनिमय के पूर्ण कोड को डिकोड करना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंततः, यह शोध हमें यह संदेश देता है कि वन केवल वृक्षों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि एक एकीकृत, परस्पर निर्भर और सचेत जैव-प्रणाली हैं, जिनका संरक्षण समग्र रूप में ही संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://aleximreh.wordpress.com/wp-content/uploads/2021/08/micelia.jpg

सूखे से मात नहीं खाते ये गगनचुंबी पेड़!

यह मानना स्वाभाविक लगता है कि ऊंचे पेड़, छोटे पेड़ों की तुलना में सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। क्योंकि सूखे के हालात में लंबे पेड़ जड़ों से एक हद से ऊपर पानी पहुंचाने में नाकामयाब रहेंगे और जल्दी दम तोड़ देंगे। लेकिन हाल के एक अध्ययन ने इस सोच को बदल दिया है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन मलेशिया के बोर्नियो द्वीप (borneo island) स्थित काबिली सेपिलोक फॉरेस्ट रिज़र्व में कार्डिफ युनिवर्सिटी के वन पारिस्थितिकीविद पाउलो बिटनकोर्ट और उनकी टीम ने डिप्टेरोकार्प जीनस (वंश) के पेड़ों पर किया। डिप्टेरोकार्प (Dypterocarp) दुनिया के सबसे ऊंचे और विशाल पेड़ों में शुमार है, जिनकी ऊंचाई लगभग 45 मीटर से 100 मीटर तक होती है। ये दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical rainforests) में ऊंचाई वाले इलाकों में पाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने डिप्टेरोकार्प की पांच प्रजातियों के 38 अलग-अलग पेड़ों (ऊंचाई 7.1 मीटर से लेकर 71 मीटर) की शाखाओं और तने के भीतरी हिस्से (ट्रंक कोर) (trunk core) के नमूने लिए। अलग-अलग ऊंचाई वाले पेड़ों से लिए गए नमूनों का अध्ययन करके आसानी से पता लगाया जा सका कि ऊंचाई बढ़ने से पेड़ों की जल-प्रणाली (vascular system) पर क्या असर पड़ता है और बदलते पर्यावरण के प्रति ये ऊंचे पेड़ कैसे अनुकूलन करते हैं। 

अध्ययन में पाया गया कि ऊंचे पेड़ों में सूखे के दौरान पानी की आपूर्ति के लिए कुछ अंदरूनी बदलाव हुए थे। लंबे पेड़ों के तनों के निचले हिस्से वाली जल वाहिकाएं (ज़ायलम) (xylem) छोटे पेड़ों की तुलना में दुगनी चौड़ी थीं – चौड़ी वाहिकाएं होने से घर्षण कम हुआ और पानी के ऊपर पहुंचने में रुकावट भी कम हुई।

आम तौर पर सूखे की स्थिति में पेड़ों की जल वाहिकाओं में हवा के बुलबुले (air space) बन जाते हैं, जिससे पानी के स्थानांतरण में रुकावट पैदा होती है। इस प्रक्रिया को ‘एम्बोलिज़्म’ (embolism) कहते हैं। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने नमूनों वाले ऊतकों में एम्बोलिज़्म के लक्षण कृत्रिम रूप से पैदा करके उनके निर्जलीकरण (dessication) की सीमा का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि छोटे और ऊंचे पेड़ों के ऊतक एम्बोलिज़्म के प्रति एक जैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे थे। जिससे यह साबित हुआ कि पेड़ की ऊंचाई और एम्बोलिज़्म जैसी परिस्थिति का इनके सूखे के प्रति संवेदनशीलता से कोई सीधा सम्बंध नहीं हैं। अलबत्ता, छोटे पेड़ों की तरह ही ये बड़े पेड़ भी एम्बोलिज़्म से खुद-ब-खुद निपट रहे थे।

इसके साथ ही यह भी देखा गया कि इन विशाल पेड़ों के ऊपरी भाग की पत्तियां, निचले भाग की पत्तियों के मुकाबले सूखा सहन करने में ज़्यादा सक्षम थीं। ये पत्तियां पानी की भारी कमी होने पर भी मुरझाने की बजाय प्रकाश संश्लेषण (photosyntesis) की प्रक्रिया कर पा रही थीं।

इस निष्कर्ष को और भी गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एल नीनो (el nino) से प्रभावित हुए 42 अन्य डिप्टेरोकार्प पेड़ों को जांचा। परिणाम चौंकाने वाले थे। सूखे से निपटने के लिए ऊंचे और छोटे पेड़ों की वृद्धि समान रूप से धीमी हुई थी। ऐसे ही एक अन्य अध्ययन में यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के पारिस्थितिकीविद एड्रियन दास ने पाया था कि सूखे के हालात में पेड़ों की ऊंचाई की बजाय कीट या बीमारियों के प्रकोप जैसे अन्य बाहरी कारणों का असर ज़्यादा होता है।

पेड़ों में पानी के पहुंचने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और अनोखी है, जिसका सटीक अंदाज़ा सिर्फ पेड़ की ऊंचाई से नहीं लगाया जा सकता। यह प्रक्रिया विशेष ऊतकों (जिन्हें ज़ाइलम कहा जाता है) के माध्यम से होती है। इस प्रक्रिया में एक से अधिक तंत्र शामिल होते हैं, जैसे – परासरण (osmosis) के द्वारा जड़ों द्वारा पानी सोखा जाना, पत्तियों के पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) (stomata) से होने वाले वाष्पोत्सर्जन की वजह से उत्पन्न खिंचाव (ट्रांसपिरेशनल पुल), जड़ों द्वारा आरोपित दाब (रूट प्रेशर), और केशिका क्रिया (केपिलरी एक्शन)। ये सब मिलकर पानी को गुरुत्वाकर्षण (gravitational force) के विरुद्ध पेड़ के ऊपरी भाग तक पहुंचाते हैं।

अब तक वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के चलते विशाल पेड़ों को सूखे के प्रति कमज़ोर मानते आ रहे थे। लेकिन इस अध्ययन ने वैज्ञानिकों को चेताया है कि केवल पेड़ की लंबाई नापकर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह सूखा झेल सकेगा या नहीं। साथ ही, यह भी फिलहाल स्पष्ट नहीं है कि अन्य वंशों के पेड़ भी सूखे से निपटने के लिए ऐसे ही बदलाव अपनाते हैं या नहीं। इसलिए वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर वन संरक्षण के मॉडल (forest conservation models) तैयार करते समय नए तरीके अपनाने होंगे। बहरहाल, सूखे में इन विशाल पेड़ों का इस मज़बूती से टिके रहना एक सकारात्मक संकेत है। आखिरकार, ये विशाल पेड़ जंगलों के फेफड़े और रीढ़ हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.istockphoto.com/id/2211647702/photo/foggy-morning-at-danum-valley-rain-forest-in-lahad-datu-sabah.jpg?s=612×612&w=0&k=20&c=_ZAZZIpc2EApA9eaygc_Hqdd4496manNogVKOyuXTc0=

ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.ehbp.com/wp-content/uploads/2018/02/5-English-Oak-Quercus-robur.jpg