हमारे देश के मौजूदा स्वास्थ्य परिदृश्य में, जहां डेंगू, मलेरिया, टीबी, हृदय रोग और मधुमेह़ जैसी बीमारियां पहले से ही भारी दबाव पड़ रही हैं, सेप्सिस एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है जो अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन सबसे घातक साबित होता है। देश के अस्पतालों में सेप्सिस अब एक रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। गहन चिकित्सा कक्ष (ICU) में भर्ती हर चौथा मरीज़ किसी न किसी संक्रमण से उपजी सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में पाया जाता है। नवजात मृत्यु के कारणों की पड़ताल करें तो लगभग एक-तिहाई मौतें सीधे सेप्सिस से जुड़ी मिलती हैं।
ग्रामीण भारत में यह स्थिति और भी घातक रूप ले लेती है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और संक्रमण की पहचान अक्सर देर से होती है। कई बार समय पर एंटीबायोटिक या सही हस्तक्षेप न मिलने पर मरीज़ कुछ ही घंटों में मौत के करीब पहुंच जाता है।
दरअसल, सेप्सिस को केवल संक्रमण की जटिलता मानना भ्रामक है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अनियंत्रित होकर अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है और संक्रमण से पैदा हुई सूजन पूरे शरीर में फैलकर दिल, फेफड़ों, गुर्दों और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा देती है। सरल शब्दों में, सेप्सिस संक्रमण के कारण शरीर का अपने ही खिलाफ सिर उठाना है। और, यही इसे इतना घातक और उग्र बना देता है।
हमारे देश में सेप्सिस की भयावहता इस बात से भी साफ होती है कि अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीज़ों के लिए मृत्यु का बड़ा कारण अब यही बनता जा रहा है। नवजात शिशुओं में यह स्थिति कई बार जन्म के तुरंत बाद होने वाले संक्रमणों से उभरती है। प्रसूता-गर्भवती महिलाओं, बुजु़र्गों और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हमारे देश में सेप्सिस एक छिपी महामारी की तरह व्यवहार करता है। अन्य बीमारियों की अंतिम और सबसे घातक कड़ी अक्सर यही बनता है। इसलिए सेप्सिस को अब एक अलग स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए विशेष रणनीति तैयार करने की ज़रूरत है।
आंकड़े बताते है कि दुनिया भर में सेप्सिस हर साल एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान लेता है, जो वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ के अध्ययन बताते हैं कि सेप्सिस की सर्वाधिक मार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ती है, जिनमें भारत भी शामिल है। अपने देश में वर्ष 2017 के अनुमान के अनुसार लगभग 1 करोड़ 13 लाख मामले और करीब 29 लाख मौतें इसी के कारण हुई हैं। आईसीयू आधारित शोध बताते हैं कि देश के गहन चिकित्सा कक्षों में हर दो में से एक मरीज़ किसी न किसी रूप में सेप्सिस से पीड़ित पाया जाता है, और ऐसे मरीज़ों की अस्पताल मृत्यु दर 30–40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। नवजात शिशुओं में यह बोझ और भी भारी है, जहां करीब एक-तिहाई मौतें संक्रमणजन्य सेप्सिस से जुड़ी पाई गई हैं।
लेकिन इस गंभीर बीमारी पर हो रहे शोध की स्थिति निराशाजनक है। दुनिया और भारत में, सेप्सिस पर होने वाला अधिकांश वैज्ञानिक कार्य अभी भी उस पुराने ढांचे पर टिका है, जिसमें चूहों, खरगोशों, गिनी पिगों, बकरियों, कुत्तों और कभी-कभी बंदरों तक पर प्रयोग किए जाते हैं। इन जानवरों को प्रयोगशाला की परिस्थितियों में जबरन संक्रमित किया जाता है, आंतों में छेद करके बैक्टीरिया फैलाया जाता है या उन्हें बैक्टीरियल ज़हर की उच्च खुराक दी जाती है। लेकिन मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया इन जानवरों से इतनी अलग है कि ऐसे प्रयोगों से मिलने वाले परिणाम मनुष्यों पर लगभग कभी लागू नहीं होते।
पिछले चार दशकों में डेढ़ सौ से अधिक ऐसी दवाएं रही हैं, जो चूहों या अन्य जंतुओं में सेप्सिस का इलाज करती दिखीं, पर मानव परीक्षण में पूरी तरह असफल रहीं। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों, जैसे – स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, एनआईएच आदि का निष्कर्ष है कि जंतु-आधारित मॉडल सेप्सिस का मानव स्वरूप समझने के लिए विश्वसनीय साधन नहीं हैं।
अपने देश में भी स्थिति अलग नहीं है। आईसीएमआर के कई प्रतिष्ठित केंद्र, कुछ ऐम्स संस्थान और निजी बायोमेडिकल प्रयोगशालाएं आज भी जंतु-आधारित मॉडल को सेप्सिस अध्ययन का आधार बनाए हुए हैं। इन परीक्षणों की पारदर्शिता कम है और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक परिणाम अत्यंत सीमित। जिस बीमारी के कारण अस्पतालों में लाखों मरीज़ चुपचाप मौत के करीब पहुंच रहे हों, उसके शोध का तरीका अगर मानव-प्रासंगिक न हो तो समाधान हमेशा दूर ही बना रहेगा।
अलबत्ता, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ वैज्ञानिक संस्थान नई दिशाएं भी टटोल रहे हैं। आईआईटी मद्रास का ऑर्गन्स-ऑन-चिप्स कार्यक्रम, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) का सेप्सिस प्रेडिक्शन मॉडल, ऐम्स दिल्ली में नवजात सेप्सिस के लिए विकसित बायोमार्कर और कुछ निजी प्रयोगशालाओं में एआई आधारित सेप्सिस अलर्ट सिस्टम ये सब संकेत देते हैं कि भारत आधुनिक, मानव-आधारित विज्ञान अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दुनिया भर में अब एआई-आधारित निदान और कम्प्यूटेशनल सिमुलेशन को भविष्य की दिशा माना जा रहा है। ये पद्धतियां न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि जानवरों पर होने वाली क्रूरता और वैज्ञानिक विफलताओं से भी मुक्त हैं।
भारत में सेप्सिस की भयावहता जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से हमें विज्ञान की दिशा बदलने की ज़रूरत है। आधुनिक तकनीकें हमारे सामने उपलब्ध हैं। ज़रूरत सिर्फ यह है कि हम पुरानी, अप्रासंगिक और अमानवीय शोध पद्धतियों को पीछे छोड़कर वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक, मानवीय और प्रभावी मॉडल अपनाएं। सेप्सिस के खिलाफ यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम विज्ञान और संवेदना दोनों के सही मिश्रण के साथ आगे बढ़े। भारत को स्वास्थ्य विज्ञान के इस नए युग में कदम रखने की आवश्यकता है। यह परिवर्तन न सिर्फ लाखों लोगों की जान बचा सकता है बल्कि अनगिनत जानवरों को अनावश्यक और पीड़ादायक प्रयोगों से भी मुक्त कर सकता है।(स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में हुई एक खोज (historical discovery) से इस बात पर नई रोशनी पड़ी है कि गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei) एक वैज्ञानिक क्रांति के अगुआ कैसे बने। यह खोज एक इतिहासकार इवान मलारा ने फ्लोरेंस स्थित इटली की नेशनल सेंट्रल लायब्रेरी (National Central Library Florence) में की है। मलारा उस पुस्तकालय में दुनिया की सबसे प्राचीन खगोल शास्त्रीय पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे। यह पुस्तक थी क्लॉडियस टोलेमी द्वारा दूसरी शताब्दी में लिखी गई अल्माजेस्ट (Almagest)।
अल्माजेस्ट में भूकेंद्रित ब्रह्मांड (geocentric model) की दृष्टि पेश की गई थी और यह अगली कई सदियों तक इस विषय की मार्गदर्शक पुस्तक बनी रही थी। मलारा के हाथ में जो प्रति थी वह सोलहवीं सदी में छपी थी।
पन्ने पलटते-पलटते मलारा का ध्यान एक विचित्र बात पर गया। उसके एक लगभग खाली पन्ने पर बाइबल (Bible scripture) का एक सूक्त (Psalm 145) हाथ से लिखा गया था। और इसकी लिखावट बहुत जानी-पहचानी लग रही थी। उनको पूरा यकीन था कि यह मशहूर खगोल शास्त्री (astronomer) गैलीलियो की लिखावट है।
और पन्ने पलटते हुए मलारा को समझ में आया कि अल्माजेस्ट की उस प्रति पर हाशियों में गैलीलियो ने भरपूर टिप्पणियां (marginal notes) दर्ज की हैं। उन्होंने इस खोज का विवरण जर्नलफॉरदीहिस्ट्रीऑफएस्ट्रॉनॉमी (history of astronomy journal) में प्रकाशन के लिए प्रस्त्तुत किया है। यह पर्चा विज्ञान के इतिहास में एक निहायत (या शायद सबसे अहम) परिवर्तन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है।
मलारा का कहना है कि वैसे तो गैलीलियो की टिप्पणियों से सजी कोई भी पुस्तक दुर्लभ ही होगी लेकिन अल्माजेस्ट तो दुर्लभ में भी दुर्लभ है। आज के दौर में गैलीलियो के गुण गाए जाते हैं कि उन्होंने प्राचीन ज्ञान को खारिज करने में मदद की। अल्माजेस्ट 14 सदियों तक इस प्राचीन ज्ञान का साकार रूप थी। लेकिन अल्माजेस्ट का टीकायुक्त संस्करण (annotated version) एक ज़्यादा बारीक तस्वीर पेश करता है।
गैलीलियो की ये टिप्पणियां संभवत 1590 में अंकित की गई थीं – यानी उनके द्वारा चंद्रमा और बृहस्पति के दूरबीनी अवलोकनों (telescope observations) से लगभग दो दशक पूर्व। ये एक ऐसे व्यक्ति का परिचय देती हैं जो एक ओर तो टोलेमी का सम्मान करता था तथा दूसरी ओर उनकी रचना की चीरफाड़ भी कर रहा था। मलारा का तर्क है कि गैलीलियो टोलेमी के विचारों से अलग हट पाए क्योंकि वे पारंपरिक ब्रह्मांड (classical cosmology) की तस्वीर के तर्कों से भली-भांति परिचित थे और उनके विश्लेषण ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था सूर्य-केंद्रित प्रणाली (heliocentric model) स्वयं टोलेमी के गणितीय तर्क को ज़्यादा पूर्णता देगी।
आम तौर पर इतिहासकार गैलीलियो का चित्रण इस तरह करते हैं कि वे मूलत: दार्शनिक या शायद राजनैतिक कारणों (philosophical debate) से प्रेरित थे। लेकिन अल्माजेस्ट के पन्नों पर अंकित टिप्पणियों ने मलारा को आश्वस्त कर दिया कि गैलीलियो किसी सनक पर सवार होकर ब्रह्मांड के नए विचार तक नहीं पहुंचे थे, बल्कि पारंपरिक गणितीय खगोल शास्त्र (mathematical astronomy) पर महारत रखने और उसका गहन विश्लेषण करने के बाद पहुंचे थे।
इसके बाद तो मलारा ने ज़्यादा व्यवस्थित और विस्तृत छानबीन (archival research) शुरू कर दी। उन्होंने बरसों तक वे उद्धरण इकट्ठे किए जिनमें गैलीलियो टोलेमी की रचना की तकनीकी बारीकियां उभारते हैं और अपना तर्क विकसित करते हैं। इसी क्रम में उन्हें फ्लोरेंस में अल्माजेस्ट की टीकासहित प्रति (annotated manuscript) हाथ लगी।
जब उन्होंने इसके एक पन्ने पर सूक्त 145 मिला तो उनकी आंखों से नींद उड़ गई। दरअसल ये सूक्त ईश्वर की स्तुति (religious text) में लिखे गए हैं। उन्होंने तत्काल ईमेल से इसकी सूचना गैलीलियो के दो मुख्य अध्येताओं (Galileo scholars) को दी। और उन्होंने पुष्टि कर दी कि लिखावट सचमुच गैलीलियो की है। इसके लिए उन्होंने लिखावट विशेषज्ञ से सलाह ली थी।
मलारा के लिए यह अत्यंत रोमांच का क्षण था। पहली बात यह थी कि पहली बार उन्होंने अल्माजेस्ट की प्रति देखी थी जिसमें बाइबल के किसी सूक्त का ज़िक्र था और वह भी गैलीलियो की लिखावट में। यह साफ तौर पर गैलीलियो की उस रूढ़ छवि (scientist vs church debate) को चुनौती दे रहा था जिसमें उन्हें धार्मिक सत्ता को ललकारते ही बताया जाता है। फिर मलारा को गणितज्ञ अलेसांद्रो मार्चेटी द्वारा 1673 में लिखा गया एक पत्र (historical letter) याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि गैलीलियो जब भी अल्माजेस्ट लेकर बैठते तो वे प्रार्थना ज़रूर करते थे।
मलारा का कहना है कि हम जब गैलीलियो के बारे में सोचते हैं, तो जो एक तस्वीर सामने आती है वह होती है एक वैज्ञानिक सेलेब्रिटी (science icon) की जो चर्च और हज़ारों वर्षों के संचित ज्ञान दोनों का विरोध करता है। लेकिन यह विचार कभी नहीं आता कि इतिहास का सबसे मशहूर मूर्तिभंजक (paradigm shift thinker) कैसे इस क्रांतिकारी नज़रिए तक पहुंचा। (स्रोत फीचर्स)
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प्राणिविज्ञान (Zoology) केवरिष्ठप्राध्यापकप्रोफेसरअशोकशर्माने 1975 मेंपीएच.डी. कीउपाधिकेलिएअपनाशोधप्रबंध (थीसिस) हिंदीभाषा (Hindi language in science)मेंप्रस्तुतकियाथा।यहविज्ञानमेंहिंदीमेंप्रथमशोधप्रबंध (first PhD thesis in Hindi)था।इससाल 2025 मेंउनकीइसउपलब्धिके 50 वर्षपूरेहोगएहैं।विज्ञानसंचारक (science communicator)चक्रेशजैननेइसप्रसंगपरडॉ. अशोकशर्मासेभेंटवार्ताकी।यहांप्रस्तुतहैउनसेकीगईभेंटवार्ता।
हिंदीमेंथीसिसलिखनेकाविचारकैसेआया?
विज्ञान विषयों पर लिखना एक अहम (science writing in Hindi) काम है। जिन दिनों मैं कॉलेज पढ़ रहा था, उस समय विज्ञान विषय में हिंदी में अच्छी और स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं, जबकि अंग्रेज़ी में बहुत अच्छी और प्रामाणिक किताबें उपलब्ध होती थीं।
जब मेरा पीएच.डी. का सिलसिला शुरू हुआ, उन दिनों डॉ. वेदप्रताप वैदिक (वरिष्ठ पत्रकार और समाचार एजेंसी पीटीआई में भाषा के पूर्व संपादक) का इंदौर में अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन चल रहा था। शायद उन्होंने थीसिस हिंदी में लिखी थी और इसमें दिक्कत आई थी। इस कारण उनको लगा था कि अंग्रेज़ी हटाकर हिंदी (Hindi vs English in education) आना चाहिए। यह आंदोलन बहुत अच्छा चला था और इससे मुझे हिंदी में थीसिस लेखन की प्रेरणा मिली थी।
हालांकि मेरा सोचना है कि अंग्रेज़ी हटाओ एक नकारात्मक विचार है। इसकी बजाय क्यों न हिंदी को थोड़ा विकसित और संपन्न किया जाए। मैं शुरू से ही यह मानता रहा हूं कि हिंदी में इतनी क्षमता है कि इसमें स्नातक व स्नातकोत्तर शिक्षा ही नहीं बल्कि पीएच.डी. शोध प्रबंध (PhD in Hindi, higher education in Hindi) भी लिखे जा सकते हैं। थोड़े से प्रयास और मेहनत की ज़रूरत है।
हिंदीमेंशोधमार्गदर्शकमिलनेमेंकोईकठिनाईआई?
विज्ञान में अब तक कोई भी थीसिस हिंदी भाषा में नहीं लिखी गई थी। मुझे लगा कि इस काम को हाथ में लेना चाहिए और एक चुनौती (Hindi thesis challenge) के रूप में लेना चाहिए। तो, मैंने इस बारे में कुछ प्राध्यापकों से विचार-विमर्श किया। संयोग से मुझे एक युवा प्राध्यापक डॉ. सुरेश्वर प्रसाद शर्मा मार्गदर्शन देने के लिए तैयार हो गए। कालान्तर में डॉ. शर्मा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के वाइस चासंलर भी रहे।
मैंने उनके मार्गदर्शन में शोध प्रबंध लिखना शुरू किया और यह काम 1975 में पूरा हो गया। हालांकि पीएच.डी. अवॉर्ड होने में बहुत समय लगा। क्योंकि हिंदी में लिखी थीसिस को बहुत से लोगों ने मंगवा तो लिया, लेकिन बाद में अस्वीकृत कर वापस लौटा दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरी थीसिस (Delhi University thesis) मूल्यांकन के लिए भेजी गई थी। वहां के तत्कालीन विभाग प्रमुख और प्राध्यापक मेरी थीसिस लगभग एक साल तक अपने पास रखे रहे, जांची भी नहीं और लौटाई भी नहीं। इस सिलसिले में काफी पत्र-व्यवहार करने के बाद ही थीसिस लौटाई। बाद में एक दूसरे प्रोफेसर के पास मूल्यांकन के लिए भेजी गई। उसके बाद पीएच.डी. अवार्ड हुई।
हां, और इसमें दो बातें मददगार रहीं। पहली, मेरी स्वयं की हिंदी बहुत अच्छी है। दूसरी, मेरी थीसिस के गाइड हिंदी के बड़े विद्वान थे।
हालांकि, विज्ञान में हिंदी में थीसिस लिखने में मुझे कुछ अधिक परिश्रम करना पड़ा था, क्योंकि सारे संदर्भ (research references) अंग्रेज़ी में ही मिलते थे। दूसरा, सभी शोध जर्नल्स अंग्रेज़ी भाषा में होते थे। ऐसी स्थिति में सबसे पहले उनको पढ़ा-समझा। और फिर हिंदी में लिखा। काम कठिन तो था ही, लेकिन मेरे युवा और परिश्रमी मार्गदर्शक डॉ. शर्मा के कारण यह संभव हो सका।
डॉ. अशोक शर्मा लगभग चार दशकों तक प्राणि विज्ञान के प्राध्यापक रहे हैं। एक लंबी अवधि तक होल्कर साइंस कॉलेज, इंदौर में शिक्षण और शोध में सक्रिय रहे डॉ. शर्मा ने धार और बड़वाह के महाविद्यालयों में भी अध्यापन किया है।
वे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम से भी जुड़े रहे हैं। जीवन के उत्तरार्द्ध में वे मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी की प्रकाशन गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।
हिंदीमेंथीसिसलिखनेपरउसकीप्रामाणिकताकोलेकरसवालहुए?
दरअसल, डॉ. शर्मा का कहना था कि जब तक थीसिस से सम्बंधित शोध लेख किसी अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (international journal publication) में प्रकाशित नहीं हो जाते, तब तक हम इसे प्रस्तुत नहीं करेंगे। उनका विचार था कि यह प्रामाणिकता के लिए ज़रूरी है। मेरी थीसिस के सभी अध्याय केनेडियनजर्नलऑफज़ुऑलॉजी(Canadian Journal of Zoology) में प्रकाशित हुए। इसलिए पीएच.डी. अवॉर्ड होने में ज़्यादा कठिनाई नहीं हुई।
थीसिसप्रकाशनकोलेकरकुछप्रयासहुएथे?
मुझे 1977 में थीसिस अवॉर्ड हो गई थी। उसके बाद जब प्रकाशन की बात आई तो कुछ चीज़ें सामने आईं। पहली तो यह है कि विशेष रूप से प्राणि विज्ञान के शोध कार्य में फोटोग्रॉफ बहुत अधिक होते हैं। मैंने रीटारीटा (Rita rita) नामक मछली की रीप्रोडक्टिव एन्डोक्रॉइनोलॉजी (fish reproductive endocrinology) पर शोध किया था। इसमें लगभग 250 फोटोग्रॉफ थे। इतने सारे फोटो की थीसिस का प्रकाशन बहुत महंगा था। कोई भी प्रकाशक इसे छापने के लिए तैयार नहीं हुआ। दूसरा यह है कि इसकी आर्थिक वैल्यू नहीं (low commercial value) थी। इन दोनों कारणों से थीसिस प्रकाशित नहीं हुई।
लेकिन, इस पूरे प्रयास में विशेष रूप से जो उल्लेखनीय बात है वह ‘समय’ है। आज के समय बहुत सारी सुविधाएं हैं। अब, हिंदी बहुत ज़्यादा प्रचलित है। ठीक-ठाक साहित्य हिंदी (Hindi science literature) में है। लेकिन उन दिनों हिंदी में विज्ञान का साहित्य बहुत कम था। हिंदी में विज्ञान की पत्र-पत्रिकाएं (science magazines in Hindi) गिनी-चुनी थीं। अनुसंधान पत्रिकाओं का तो अभाव ही था। कुल मिलाकर कहा जा सकता है आज के दौर में इसका इतना महत्व नहीं है, जितना उन दिनों था।
मैंने कुछ लेख लिखे हैं, जो उन दिनों प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘नई दुनिया’ में प्रकाशित हुए हैं। विद्यार्थियों को प्राणि विज्ञान विषय समझाने के लिए हिंदी (science education in Hindi) को ही चुना है। मैं लंबे समय तक होल्कर साइंस कॉलेज, इंदौर में प्राध्यापक रहा हूं। यहां हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों माध्यम में विद्यार्थी होते थे। जिन विद्यार्थी की पिछली पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम में हुई थी, उनकी मैंने काफी सहायता की और विषय को सरलतम तरीके से हिंदी में समझाने की पूरी कोशिश की। मैं इस दिशा में किए गए अपने प्रयासों से संतुष्ट हूं। (स्रोत फीचर्स)
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विगत दो सदी में भारत में विज्ञान लेखन वृहद स्तर पर हुआ है और कई विशिष्ट शैलियों का विकास हुआ है। इन्हें पुस्तकों तथा पत्रिकाओं के ज़रिए पाठकों तक पहुंचाया जा चुका है। यहां मूलत: विज्ञान पत्रिकाओं की चर्चा की गई है।
पत्रिकाओंकीविषयवस्तु
शुरुआत में भारतीय विज्ञान पत्रिकाओं में 19वीं सदी का समय मूल रूप से साहित्य, सूचना और शिक्षा पर केंद्रित रहा। विज्ञान को भी प्राथमिक स्तर पर साहित्यिक मनीषियों, पत्रिकाओं ने जगह दी। भारतीय संदर्भ में विज्ञान जागृति की अलख जगाने की शुरुआत सर्वप्रथम साहित्यिक पत्रिकाओं से हुई। साहित्यिक पत्रिकाओं ने जनमानस में विज्ञान जागरण के प्रति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विज्ञान जागरण की पहली आधार स्तंभ बांग्ला भाषा बनी। अप्रैल 1818 में श्रीरामपुर (ज़िला हुगली, पश्चिम बंगाल) के बेपटिस्ट मिशनरियों ने बांग्ला और अंग्रेज़ी में मासिक दिग्दर्शन पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। इसके संपादक थे क्लार्क मार्शमैन (1793-1877)। दिग्दर्शन का हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया था। पत्रिका के हिंदी में अंक में दो वैज्ञानिक लेख प्रकाशित किए गए थे – ‘अमेरिका की खोज’ और ‘बैलून द्वारा आकाश यात्रा’। यह भारत में विज्ञान प्रकाशन का पहला कदम था।
जनवरी 1878 से बनारस से प्रकाशित द्विभाषी पत्रिका काशी को हिंदी में विज्ञान लोकप्रियकरण का पहला उदाहरण माना जा सकता है। बालेश्वर प्रसाद के संपादन और रामानंद के प्रबंधन में चन्द्रप्रभा प्रेस द्वारा हिंदी और उर्दू में यह पत्रिका हर शुक्रवार को प्रकाशित होती थी। इसके मुखपृष्ठ पर छपा होता था – ‘ए वीकली एजुकेशनल जर्नल ऑफ साइंस, लिटरेचर एण्ड न्यूज़ इन हिन्दुस्तानी’।
विज्ञानपत्रिकाओंकाआरंभ
विज्ञान पत्रिकाओं में सर्वप्रथम विज्ञान के किसी एक विषय को ही आधार बनाते हुए प्रकाशन आरंभ हुआ। चिकित्सा पहला मुख्य विषय रहा जिस पर किसी विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन हुआ। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार चिकित्सा विषय की पहली पत्रिका 1842 में चिकित्सासोपान नाम से श्रीराम शास्त्री के संपादन में प्रकाशित हुई। इसके बाद सन 1881 में प्रयाग से आरोग्यदर्पण नाम से चिकित्सा सम्बंधी विषयों को लेकर एक और पत्रिका प्रकाशित हुई।
चिकित्सा के बाद कृषि मुख्य विषय रहा जिस पर पत्रिका प्रकाशन हुआ। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार कृषि की पहली पत्रिका 1911 में किसानमित्र नाम से पटना से रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा हिंदी भाषा में प्रकाशित की गई।
अलबत्ता विज्ञान के और भी विविध विषय थे जो अभी तक अछूते रहे थे। 20वीं सदी के दूसरे दशक में विज्ञान के सभी विषयों को समावेशित कर उन पर लेख, समाचार और जानकारी प्रकाशित करने का कार्य हुआ। विशुद्ध रूप से विज्ञान पत्रिका होने का श्रेय विज्ञान नामक पत्रिका को जाता है। 1913 में प्रयागराज में विज्ञान परिषद की स्थापना की गई थी जिसने 1915 से विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया था।
विज्ञान पत्रिका के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम प्राणिशास्त्रनामक पत्रिका का आता है। इसका प्रकाशन प्रसिद्ध विद्वान देवी शंकर मिश्र द्वारा किया गया। 1948 में देवी शंकर द्वारा भारतीय प्राणिशास्त्र परिषद की स्थापना की गई थी और इसी परिषद के अंतर्गत 1948 में प्राणिशास्त्र का प्रकाशन आरंभ किया गया।
भारत सरकार द्वारा भी आज़ादी के बाद विज्ञान प्रसार को बढ़ावा देने का कार्य आरंभ किया गया। इसके लिए सन 1952 से भारत सरकार की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद द्वारा विज्ञानप्रगति पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया। पत्रिका अपने उत्कृष्ट प्रकाशन तथा सामग्री के लिए सन 2022 में राष्ट्रीय राजभाषा कीर्ति सम्मान से भी सम्मानित हो चुकी है।
विज्ञान संसार की एक और महत्वपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन 1961 में इंडियन प्रेस, प्रयाग द्वारा विज्ञानजगत नाम से हुआ। इस सचित्र मासिक पत्रिका के संपादक आर. डी. विद्यार्थी थे।
सन 1969 से भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई द्वारा वैज्ञानिक विषयों पर वैज्ञानिक नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। पत्रिका के शुरुआती अंकों का संपादन ब्रजमोहन पांडे, डॉ. प्रताप कुमार माथुर, उमेश चंद्र मिश्र तथा माधव सक्सेना द्वारा किया गया था।
भारत सरकार के उपक्रम द्वारा एक और राष्ट्रीय पत्रिका आविष्कार का प्रकाशन सन 1971 से नेशनल रिसर्च डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन, नई दिल्ली द्वारा किया जा रहा है।
हिंदी विज्ञान पत्रिकाओं के प्रकाशन इतिहास के क्रम में सन 2018 तक कई अन्य पत्रिकाएं भी प्रकाशित की गईं। इनकी सूची लेख के अंत में दी गई है।
सामाजिकप्रभाव
साक्षरता के स्तर को बढ़ाने तथा जन-जागृति पैदा करने में पत्र-पत्रिकाओं की विशेष भूमिका रही है। इस दृष्टिकोण से हिंदी की विज्ञान पत्रिकाओं ने अपने सौ वर्षों से भी लंबे सफर में महत्वपूर्ण कार्य किया है। पत्रिकाओं ने जनमानस और विद्यार्थियों में तार्किक वैज्ञानिक सोच विकसित करने का कार्य किया। नवागत विज्ञान लेखकों का सृजन हुआ। हिंदी विज्ञान लेखन हिंदी साहित्य की नई विधा के रूप में स्थापित हुआ। महिलाओं को भी विज्ञान लेखन के प्रति आकृष्ट करने का कार्य विज्ञान पत्रिकाओं ने किया। विज्ञान विषयों पर प्रकाशित महत्वपूर्ण विशेषांकों ने विषय विशेष पर सामाजिक जागरूकता उत्पन्न की। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitVf5P6yMvwMuuwqLOvfVseEAPAQWzmmr78kt6gLaYYXRPKI7qrx1weRTi3zTXZ6zO4HQRFFUcaECJmstVf0NLFa8Hd60U6xE6Zreij6onLkanm_LWGGjLe5uHKVg6dn9Pk1FbPkAJMtbm/s1600/hindi+science+magazines.jpg
कॉलेज स्तरीय विज्ञान शिक्षा का एक निर्विवाद उद्देश्य शिक्षार्थियों को आलोचनात्मक चिंतकों के रूप में तैयार करना है। विज्ञान शिक्षण का यह दायित्व है कि शिक्षार्थियों में तर्कसंगत सोच विकसित करके उन्हें सशक्त बनाए। लेकिन भारतीय कॉलेज और विश्वविद्यालयीन विज्ञान शिक्षा इस मुहावरे पर टिकी है कि विज्ञान को रटकर सीखा जा सकता है जिसमें दुर्भाग्य से तर्कसंगत सोच का तत्व नदारद होता है।
इस समस्या पर मीडिया और सरकारी रिपोर्टों में और उच्च शिक्षा से सम्बंधित कई पुस्तकों और जर्नलों में भी इसका ज़िक्र किया गया है। इन सभी अध्ययनों में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत के कॉलेज और विश्वविद्यालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के उद्देश्यों से हटकर ऐसे परिसरों में बदल गए हैं जो वर्ष के अंत में होने वाली अप्रासंगिक परीक्षाओं के लिए शिक्षार्थियों की कोचिंग करते हैं (सिखाते नहीं हैं)। यहां यह याद रखना भी लाज़मी है कि experiment (प्रयोग) और experience (अनुभव) शब्द लैटिन शब्द experīrī से आए हैं, जिसका अर्थ है ‘किसी चीज़ को पूरी तरह और गहनता से करने का प्रयास करना।’ प्रयोग करना और अनुभव करना सत्य की खोज, वैज्ञानिक सत्य की खोज से जुड़ा है। वैज्ञानिक सत्य को दिमाग से ग्रहण करना होता है और दिमाग के करीब रखना होता है। यह बात एरिस्टोकल्स प्लेटो (लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के समय से ऐसी ही रही है।
सोच-विचार मनुष्यों की एक अनोखी क्षमता है। चूंकि विज्ञान ज्ञान-प्राप्ति का एक प्रयास है, इसलिए इसमें सोच-विचार की आवश्यकता होती है। इसका अभ्यास एथेंस के सुकरात (लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) द्वारा किया गया था जिसे सुकराती पद्धति कहा जाता है। जब शिक्षकों और विद्यार्थियों द्वारा तर्कसंगत चुनौतियों और प्रति-चुनौतियों के आधार पर विज्ञान सीखा-सिखाया जाता है तब यह पद्धति सुगमता और त्वरित स्पष्टता प्रदान करती है। यह पद्धति सिर्फ प्राचीन यूनान के लिए विशेष नहीं थी, बल्कि प्राचीन भारत में भी यह एक प्रचलित पद्धति थी जिसका प्रमाण प्रश्नोपनिषद (पहली शताब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है। लेकिन हमने ज्ञान की खोज और उसके निर्माण में प्रश्नोत्तर (द्वंद्वात्मक, संवादात्मक) पद्धति को अनदेखा कर दिया है।
शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच सार्थक चुनौतियां और तर्कपूर्ण प्रति-चुनौतियां दोनों की धारणाओं को उजागर करती हैं। यह पद्धति किसी समस्या या मुद्दे को पहचानने व वैध ठहराने में वस्तुनिष्ठता का समर्थन करती है और वस्तुनिष्ठता समझ को संभव बनाती है। संक्षेप में कहें तो तर्कसंगत सोच ‘मनन’ करने की क्षमता है जिसमें व्यक्ति किसी मुद्दे पर तार्किक, स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से सावधानीपूर्वक और गहराई से सोच-विचार करता है। आलोचनात्मक विचारक स्वयं अपने एहसासों पर विचार करते हैं, अपनी धारणाओं को चुनौती देते हैं, और उत्तर तथा समाधान तलाशते हैं। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अनुमान लगाते हैं कि भविष्य में उनके उत्तर और समाधान दूसरों के लिए अर्थपूर्ण होंगे या नहीं। एक आलोचनात्मक विचारक ज्ञात को विभेदित करता है और इसी के माध्यम से वह अज्ञात को जानने का प्रयास करता है। यह क्षमता शिक्षार्थियों को नए प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय कॉलेजी विज्ञान शिक्षार्थियों में आलोचनात्मक सोच की क्षमता पैदा करने और विश्लेषणात्मक कौशल विकसित करने के लिए अपर्याप्त है। इस अपर्याप्तता का एक आम कारण है कि व्याख्याता ‘तथ्यों’ (सूचनाओं) पर ज़ोर देते हैं और स्मृति-आधारित परीक्षाओं के लिए तैयार करते हैं; वे विज्ञान के तार्किक विकास को समझाने तथा यह समझाने का प्रयास नहीं करते कि कैसे तथ्यों और अवधारणाओं का विकास तर्क और तर्कसंगत वितर्कों के माध्यम से होता है। मौखिक और लिखित दोनों रूपों में संवाद विधा के साथ दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों को सीखने की प्रक्रिया में शामिल करने से सक्रिय सीखने में मदद मिलती है, और इसे भारतीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के विज्ञान शिक्षण में शामिल करने की आवश्यकता है।
आलोचनात्मक सोच में प्रशिक्षण के लिए ऐसे विज्ञान कार्यक्रमों की महती ज़रूरत है जो विचारों के तार्किक विकास को तथा क्रमिक रूप से स्थापित प्रमाणों को सामने रखें। आज तार्किक सोच वाले नागरिकों को तैयार करने के लिए चल रहे समन्वित प्रयास और कक्षाओं में उपयोग की जाने वाली शिक्षण विधियों के बीच एक बड़ी खाई है।
इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं कि जीव विज्ञान की स्नातक कक्षा में प्रकाश संश्लेषण का आकर्षक विषय कैसे पढ़ाया जाता है। बहुत थोड़े से शिक्षक अपने विद्यार्थियों को प्रेरित करते होंगे कि वे पिछले 200 वर्षों में प्रकाश संश्लेषण की विकसित होती समझ को चरण-दर-चरण पढ़ें, चर्चा करें और लिखें। क्या कभी 1779 में प्रकाशित यान इंगेनहौज़ (1730-1799) के क्लासिक प्रकाशन की बात की जाती है जिसमें प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में प्रकाश की भूमिका पर ज़ोर दिया गया था? कितने शिक्षक हैं जो जीव विज्ञान के नए विद्यार्थियों को इंगेनहौज़ के मोनोग्राफ पर हॉवर्ड स्प्रैग रीड (1876‒1950) की टिप्पणी को पढ़ने, उस पर चर्चा करने और उसका मूल्यांकन करने के लिए कहते हैं? हममें से कितने शिक्षक इंगेनहौज़ के मोनोग्राफ (1779) में विकसित दलीलों के तार्किक क्रम को स्पष्ट करते हैं जो यान बैप्टिस्टा फान हेलमॉन्ट (1580-1644) और जोसेफ प्रिस्टले (1733-1904) के कामों पर विकसित हुआ था।
कहना न होगा कि कैसे इंगेनहौज़ द्वारा दी गई प्रकाश संश्लेषण की व्याख्या ने निकोलस-थियोडोर सोश्योर (1767-1845), जूलियस रॉबर्ट फॉन मेयर (1814-1878), जूलियस फॉन सैक्स (1832-1897) और कॉर्नेलिस फान नील (1897-1985) को प्रेरित किया था और इन वैज्ञानिकों ने समझ को आगे बढ़ाया था। आज हम बड़ी उदारता से 6CO2 + 6H2O + प्रकाश ऊर्जा → C6H12O6 + 6O2 समीकरण का उपयोग करते हैं, और कॉर्नेलिस फान नील (1897-1985) का ज़िक्र तक नहीं करते। जबकि नील ने ही सबसे पहले इस समीकरण को CO2 + 2H2A + प्रकाश ऊर्जा → [CH2O] + 2A + H2O के रूप में प्रतिपादित किया था।
यह समीकरण 1931 में आर्काइव्स ऑफ माइक्रोबायोलॉजी एंड रिक्यूइल डेस ट्रैवॉक्स बोटेनिक्सनेरलैंडेस में प्रकाशित हुआ था। पिछले कुछ दशकों में प्रकाश-निर्भर और प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रियाओं तथा प्रकाश संश्लेषण के केल्विन चक्र के आणविक चरणों को स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ जोड़ा गया है। यहां इस बात पर ज़ोर देना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ये सभी मील के पत्थर हैं जो तर्क और तार्किक चिंतन के तत्वों को उजागर करते हैं और वैज्ञानिक समझ के हर सूक्ष्म चरण से जुड़े हैं। प्रकाश संश्लेषण के विषय में ज्ञान की प्रगति इसका एक उदाहरण है। अब सवाल यह है कि क्या हम विज्ञान की उस भावना, उत्साह और आनंद को अपने शिक्षार्थियों तक उत्साहपूर्वक पहुंचा रहे हैं।
प्रकाश संश्लेषण के उदाहरण से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के विज्ञान शिक्षण के संदर्भ में विज्ञान के इतिहास और दर्शन का ज्ञान तथा उसकी समझ अनिवार्य है। प्रकाश संश्लेषण का उदाहरण दशकों तक चले विज्ञान के क्रमिक और तार्किक विकास का संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण है। जब इसे विश्वसनीय ढंग से शिक्षार्थियों को समझाया जाता है, तो यह उन्हें बताता है और समर्थ बनाता है कि हम साथ मिलकर एक बौद्धिक कवायद में शामिल हैं जो हमें प्रकृति, विधियों और सूचनाओं के सोपानों में गहराई से गोता लगाने को प्रेरित करती है। सही तरीके से संप्रेषित करने पर यह विधि शिक्षार्थियों के मन में सवाल पैदा करती है और जब इन सवालों को सही तरह से सम्बोधित किया जाता है तो सत्य के नए-नए आयाम खुलते जाते हैं। इस तरह से एक विचारशील शिक्षार्थी के विकास को बढ़ावा मिलता है। रचनात्मक रूप से शिक्षार्थियों को अग्रणी नवाचारों (जैसे टीके, ‘गति-दूरी-समय’ के बीच सम्बंध, गुरुत्वाकर्षण तरंगें, आवर्त सारणी), संसाधनों की खोज (उदाहरण के लिए नैनोकण), और नवीन डिज़ाइनों के विकास (उदाहरण के लिए कैल्कुलस आधारित संरचनात्मक इंजीनियरिंग) में प्रयासों को पुन: जीने का मौका देकर एक प्रवीण शिक्षक बेहतरीन परिणाम प्राप्त कर सकता है। इसके साथ-साथ कोई रचनात्मक शिक्षक मध्यवर्ती कदमों को भी स्पष्ट करता चलेगा जो आगमनात्मक या निगमनात्मक सोच और आनुभविक या तर्कवादी सोच से आगे बढ़ते हैं। कोई भी प्रतिबद्ध शिक्षक कक्षा में चल रहे संवाद में मिथ्याकरण यानी फाल्सीफिकेशन के सिद्धांत की व्याख्या करेगा – इस लिहाज़ से कि यह उपलब्ध सिद्धांतों व अवधारणाओं की सत्यपरकता का आकलन करने का एक चरण होता है। वह यह भी बात करेगा कि कैसे पैराडाइम परिवर्तनों ने हमारी समझ को प्रभावित किया है जबकि उस समझ को कभी सही और सत्य माना जा रहा था। एक अच्छे अकादमिक व्यक्ति का अपने शिक्षार्थियों के लिए एक संक्षिप्त संदेश यही होगा कि वैज्ञानिक ज्ञान क्रांतिकारी परिवर्तनों के माध्यम से नई व्याख्याओं के साथ आगे बढ़ता है जो पूर्ववर्ती व्याख्याओं का स्थान ले लेती हैं।
प्रासंगिक कहानियों और उदाहरणों के साथ पढ़ाया जाने वाला विज्ञान का इतिहास और दर्शन छात्रों को एक व्यापक समझ देगा। यह उनकी बनी-बनाई समझ को हटाकर नए विचारों के बीज बोएगा। दार्शनिक बुनियादों – जैसे फ्रांसिस बेकन के प्रत्यक्षवाद से लेकर रेने देकार्ते के तार्किक अंतर्ज्ञान तक, कार्ल पॉपर के मिथ्याकरण से लेकर थॉमस कुन के पैराडाइम परिवर्तन तक – को जब कारगर ढंग से तथ्यों और सिद्धांतों से जोड़ा जाएगा और कलात्मक ढंग से पेश किया जाएगा तो वे विज्ञान के विद्यार्थियों में अवलोकनों, तर्क और स्पष्टता के बीच गतिशील सम्बंध उजागर करेंगे। शिक्षकों के ऐसे प्रयास निश्चित रूप से विद्यार्थियों को आगे और दूर तक सोचने की ओर ले जाएंगे। इन कारणों से कॉलेज और विश्वविद्यालयों के विज्ञान शिक्षण में विज्ञान के इतिहास व दर्शन को कल्पनाशील ढंग से और तथ्यामक विज्ञान के ताने-बाने में पिरोकर शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए सांस्कृतिक जानकारी या विशिष्ट मानव हितों की बात की जा सकती है। इस प्रकार गठित जानकारी को एक ऐसे संदर्भ में रखा जा सकता है जो शिक्षार्थियों को अपने निजी दायरे से प्रतिक्रिया देने और अपने दृष्टिकोण को लागू करने के अवसर पैदा करे।
मुख्यधारा विज्ञान शिक्षण में विज्ञान के दर्शन व इतिहास को शामिल करने का प्रमुख मकसद यह होगा कि विद्यार्थी प्रमाणों की वैकल्पिक व्याख्याओं पर विचार करने, उनकी तुलना व उनके बीच अंतर देखने की क्षमता विकसित कर सकें, तराश सकें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक जब विज्ञान के इतिहास और दर्शन पर चर्चा करें, तब वे शिक्षार्थियों को ऐसे सवाल पूछने को प्रोत्साहित करें – ‘हमें यह कैसे पता चला?’ और ‘ऐसा कहने के पीछे प्रमाण क्या है?’ ये सवाल वे स्वयं से या सार्वजनिक रूप से पूछ सकते हैं। ये सवाल प्रभावी रूप से ज्ञानमीमांसा से जुड़े हैं। यह शिक्षार्थियों को अपने पिछले ज्ञान को पहचानने और महत्व देने में सक्षम बनाने के अवसर प्रदान करता है जो निर्मितिवाद यानी कंस्ट्रक्टिविज़्म की ओर एक कदम है। निर्मितिवाद इस बात पर ज़ोर देता है कि शिक्षार्थियों को इस तरह से सशक्त बनाया जाए कि वे जो कुछ भी करते हैं, उसका अर्थ निकाल सकें ताकि सीखना सर्वोत्तम हो।
मेरी निम्नलिखित टिप्पणी पर अलिप्त भाव से विचार करने की आवश्यकता है। क्या हम पूरे विश्वास और संतुष्टि से कह सकते हैं कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली विज्ञान शिक्षा हमारे शिक्षार्थियों में रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने की अनिवार्य आवश्यकता को पूरा करती है? हालांकि इसमें अपवाद अवश्य हो सकते हैं और इस टिप्पणी को सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी सत्य है कि जैव-भौतिक दुनिया से सम्बंधित कुछ प्रयोगों को सीखना और उन्हें परीक्षा हॉल में पूरी ईमानदारी से दोहरा देने के कौशल का निर्माण निश्चित रूप से न तो विज्ञान सीखना है और न ही विज्ञान शिक्षण है। विज्ञान को सीखने-सिखाने के लिए व्यावहारिक तथा अनुभवात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जो कक्षा से परे कौशल, योग्यता और क्षमता के विकास को बढ़ावा देता है। यह दृष्टिकोण शिक्षार्थियों को ज्ञानमीमांसीय खुलेपन के आधार पर ज्ञान का निर्माण करने में सक्षम बनाता है, जिससे उन्हें न केवल विज्ञान के बारे में जानने का मौका मिलता है बल्कि वे इसे सही मायनों में समझ भी पाते हैं। क्या हम शिक्षार्थियों को सशक्त बनाने और वैज्ञानिक ज्ञान को सबसे प्रभावी ढंग से प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करने के लिए अपनी रचनात्मक बुद्धि का लाभ उठा रहे हैं? यदि इसका उत्तर ‘हां’ है, तो मुझे खुशी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.famousscientists.org/images1/jan-ingenhousz.jpg
हर वर्ष 14 मार्च को दुनिया भर में, विशेषकर अमेरिका में, राष्ट्रीय पाई दिवस उत्सव की तरह मनाया जाता है। वास्तव में पाई दिवस गणित के एक मशहूर संकेत ‘π’ पर आधारित है। वैसे तो गणितीय संकेत बहुत सारे हैं, लेकिन पाई में कुछ खास बात है।
वास्तव में, पाई किसी वृत्त की परिधि और उसके व्यास के बीच सम्बंध को दर्शाता है। वृत्त चाहे किसी भी साइज़ का हो, जब उसकी परिधि को व्यास से विभाजित किया जाता है तो उत्तर हमेशा पाई ही होता है। इस तरह से पाई एक सार्वभौमिक संख्या है, जिसका मान हमेशा 3.14 होता है। वैसे पाई के मान में दशमलव के बाद की संख्या एक अंतहीन, न दोहराई जाने वाली लड़ी है। कुछ गणित-प्रेमी अधिक से अधिक दशमलव स्थानों को याद करने की भी प्रतिस्पर्धा करते हैं। अब तक का गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड दशमलव के बाद 70,000 अंकों को याद रखने का है।
गौरतलब है कि गणित और विज्ञान में पाई का बहुत महत्व है। यह वृत्तों और गोले के क्षेत्रफल तथा आयतन की गणना, अणुओं से लेकर पृथ्वी जैसे खगोलीय पिंडों और यहां तक कि अंतरिक्ष यान निर्माण तक के हिसाब-किताब तक में सहायक है। विभिन्न गणितीय समीकरणों में इसकी उपस्थिति के कारण यह गणितज्ञों के लिए एक आकर्षक जिज्ञासा है। पाई सिर्फ एक संख्या नहीं है बल्कि यह ब्रह्मांड को समझने का एक बुनियादी पहलू है, जिसका उपयोग परमाणुओं से लेकर अंतरिक्ष की जटिल गणनाओं में किया जाता है।
पाई दिवस उत्सव की शुरुआत 1988 में भौतिक विज्ञानी लैरी शॉ द्वारा की गई थी। यह तारीख पाई के पहले तीन अंकों 3.14 से मेल खाती है यानी तीसरे माह (मार्च) की चौदहवीं तारीख। संयोग से यह अल्बर्ट आइंस्टाइन का जन्मदिन भी है।
वैसे तो अनेकों सभ्यताएं कई शताब्दियों से पाई के बारे में जानती आई हैं, लेकिन पाई दिवस को 2009 में मान्यता मिली। लैरी शॉ का विचार था कि गणित और हमारे जीवन में पाई के महत्व का जश्न मनाने का एक मज़ेदार और आकर्षक तरीका बनाया जाए। इसका एक प्रमुख उद्देश्य सभी उम्र के लोगों को संख्याओं की सुंदरता और हमारे आसपास की दुनिया में उनके अनुप्रयोगों की सराहना करने के लिए प्रेरित करना था। पाई दिवस के उत्सव में अमूमन लोग एक स्वादिष्ट अमेरिकी पकवान पाई का आनंद लेते हैं और पाई से सम्बंधित गतिविधियां करते हैं। इन गतिविधियों में पाई पकाना, पाई के दशमलव के बाद के अंक सुनाना, या पाई सम्बंधी खेल-कूद शामिल हैं। इस दिन शिक्षक सीखने-सिखाने को मज़ेदार बनाने के लिए अपने पाठ्यक्रम में पाई से सम्बंधित पाठ जोड़ते हैं। पाई दिवस लोगों को एक साथ आने और गणित के चमत्कारों का जश्न मनाने, संख्याओं और प्राकृतिक दुनिया की सुंदरता के प्रति जिज्ञासा और प्रशंसा की भावना को बढ़ावा देने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://assets3.cbsnewsstatic.com/hub/i/r/2024/03/14/8bda2ca8-cdfc-45a6-954a-508ffbb3c0d6/thumbnail/1200×630/92779dc16c87ed5030dc9ac8e1b7e2bf/gettyimages-165311405.jpg?v=3d62f4cc0092e6eb151a9685301ed284
अक्टूबर माह में एनसीईआरटी ने अंग्रेज़ी और हिंदी में चंद्रयान-3 पर 10 शैक्षिक मॉड्यूल्स जारी किए। इनका उद्देश्य लाखों स्कूली बच्चों को हालिया चंद्रयान मिशन की जानकारी प्रदान करना है। प्रेस और मीडिया में गंभीर आलोचना के बाद इन मॉड्यूल्स को एनसीईआरटी के वेबपेज से हटा लिया गया था, लेकिन सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति के बाद इसे पुन: अपलोड कर दिया गया। सरकारी विज्ञप्ति में मॉड्यूल्स का बचाव करते हुए कहा गया है कि “पौराणिक कथाएं और दर्शन विचारों को जन्म देते हैं और ये विचार नवाचार एवं अनुसंधान की ओर ले जाते हैं।”
गौरतलब है कि इन मॉड्यूल्स को नई शिक्षा नीति (एनईपी 2020) में वर्णित सीखने के विभिन्न चरणों (फाउंडेशनल, प्रायमरी, मिडिल स्कूल, सेकंडरी और हायर सेकंडरी) के अनुसार तैयार किया गया है। यह काफी हैरानी की बात है कि इन मॉड्यूल्स की सामग्री में कई वैज्ञानिक और तकनीकी त्रुटियां हैं जिनमें से कुछ का आगे ज़िक्र किया जा रहा है। इसके अलावा, इनमें छद्म वैज्ञानिक दावे किए गए हैं, भ्रामक वैज्ञानिक सामग्री है और यहां तक कि एक नाज़ी वैज्ञानिक का हवाला भी दिया गया है जो एनसीईआरटी सामग्री के सामान्य मानकों से मेल नहीं खाता है। अंग्रेज़ी संस्करण में व्याकरण सम्बंधी त्रुटिया तो हैं ही।
इस प्रकार की गलत जानकारी विद्यार्थियों तक पहुंचे तो काफी नुकसान कर सकती है। और तो और, सामग्री का घटिया प्रस्तुतीकरण विद्यार्थियों को इस रोमांचक क्षेत्र से विमुख कर देगा।
वैज्ञानिक समुदाय के सदस्यों और सभी तर्कसंगत सोच वाले नागरिकों को इस घटिया ढंग से तैयार की गई सामग्री को खारिज कर देना चाहिए। व्यापक आलोचना के बाद एनसीईआरटी द्वारा इस सामग्री को वेबसाइट से हटाना और सरकार द्वारा पौराणिक कथाओं का हवाला देते हुए उन्हें वापस प्रसारित करना न तो उचित है और न ही ऐसा दोबारा होना चाहिए। एआईपीएसएन मांग करता है कि एनसीईआरटी इन मॉड्यूल्स को स्थायी रूप से हटा दे। चंद्रयान पर एनसीईआरटी मॉड्यूल्स में वैज्ञानिक त्रुटियों, छद्म वैज्ञानिक दावों और मिथकों की बानगी –
1. बुनियादी स्तर (कोड 1.1एफ, केजी और कक्षा 1-2):
मॉड्यूल उवाच: (चंद्रयान-2 के संदर्भ में) …इस बार रॉकेट के पुर्ज़े में कुछ तकनीकी खामी के कारण उसका धरती से संपर्क टूट गया। टिप्पणी: लॉन्चर रॉकेट ने ठीक तरह से काम किया। जबकि लैंडर सतह पर उतरने में विफल रहा, लेकिन चंद्रयान का ऑर्बाइटर मॉड्यूल काम करता रहा और इससे इसरो को डैटा भी प्राप्त होता रहा।
2. प्राथमिक स्तर (कोड 1.2पी, कक्षा 3-5):
मॉड्यूल उवाच: इस रॉकेट के तीन प्रमुख हिस्से हैं – प्रोपल्शन मॉड्यूल, रोवर मॉड्यूल और लैंडर मॉड्यूल जो हमें चंद्रमा के बारे में जानकारी भेजता है। टिप्पणी: चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान को रॉकेट (एलएमवी3) अंतरिक्ष में लेकर गया था। अंतरिक्ष यान में एक ऑर्बाइटर और एक लैंडर था। रोवर को लैंडर के अंदर रखा गया था ताकि चंद्रमा की सतह पर उतरने के बाद उसे बाहर निकाला जा सके।
3. माध्यमिक स्कूल स्तर (कोड: 1.3एम, कक्षा 6-8):
मॉड्यूल उवाच: प्राचीन साहित्य में वैमानिक शास्त्र ‘विमान विज्ञान’ से पता चलता है कि उन दिनों हमारे देश में उड़ने वाले वाहनों का ज्ञान था (इस पुस्तक में इंजनों के निर्माण, कार्यप्रणालियों और जायरोस्कोपिक सिस्टम के दिमाग चकरा देने वाले विवरण हैं)। टिप्पणी: कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि बहुप्रचारित वैमानिक शास्त्र की रचना 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुई है और इसमें वर्णित डिज़ाइन, इंजन और उपकरण पूरी तरह से काल्पनिक, अवैज्ञानिक और नाकारा हैं।
मॉड्यूल उवाच: वेद भारतीय ग्रंथों में सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। इनमें विभिन्न देवताओं को पशुओं, आम तौर पर घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले पहिएदार रथों पर ले जाने का उल्लेख मिलता है। ये रथ उड़ भी सकते थे। उड़ने वाले रथों या उड़ने वाले वाहनों (विमान) का उपयोग किए जाने का उल्लेख भी मिलता है। ऐसी मान्यता है कि हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार सभी देवताओं के पास अपना वाहन था जिसका उपयोग वे एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए करते थे। माना जाता है कि वाहनों का उपयोग अंतरिक्ष में सहजता और बिना किसी शोर के यात्रा करने के लिए किया जाता था। ऐसे ही एक विमान – पुष्पक विमान (जिसका शाब्दिक अर्थ ‘पुष्प रथ’ है) का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। टिप्पणी: विभिन्न वैदिक ग्रंथों और महाकाव्यों में उड़ने वाले वाहनों के ये सभी उल्लेख कवियों की कल्पनाएं हैं। दुनिया भर की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं के साहित्य में उनके देवताओं के आकाश में उड़ने का उल्लेख मिलता है। इन्हें प्राचीन काल में उड़ने वाले वाहनों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता है। 1961 में यूरी गागरिन द्वारा अंतरिक्ष की यात्रा करने से पहले किसी भी मानव द्वारा अंतरिक्ष यात्रा के लिए पृथ्वी छोड़ने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है।
मॉड्यूल उवाच: आधुनिक भारत ने वैमानिकी विज्ञान की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अंतरिक्ष अनुसंधान में उल्लेखनीय प्रगति की है। टिप्पणी: जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, ऐसे साहित्यिक संदर्भ कई प्राचीन सभ्यताओं में पाए जा सकते हैं और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए साराभाई और अन्य वैज्ञानिकों के प्रयास इन काव्यात्मक कथाओं का उत्पाद नहीं हैं। ऐसा दावा करना साराभाई की विरासत और कई समकालीन वैज्ञानिकों के अग्रणी कार्यों का अपमान होगा।
मॉड्यूल उवाच: चंद्रमा पर ऐसी चोटियां भी हैं जहां हर समय सूर्य का प्रकाश मौजूद होता है तथा ये चंद्र गतिविधियों की सहायता हेतु विद्युत उत्पन्न करने के उत्कृष्ट अवसर पैदा कर सकती हैं। टिप्पणी: भले ही चंद्रमा के घूर्णन की धुरी क्रांतिवृत्त (एक्लिप्टिक) तल के लगभग लंबवत है, लेकिन किसी भी पर्वत शिखर पर ‘निरंतर सूर्य का प्रकाश’ तभी हो सकता है जब वह लगभग दक्षिणी ध्रुव पर हो। चंद्रयान-3 का अवतरण स्थल चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से 500 कि.मी. से अधिक दूर है। ऐसे में अवतरण स्थल के पास ऐसी पर्वत चोटियों का पता लगाना संभव नहीं है।
मॉड्यूल उवाच: (गतिविधि-1) चंद्रयान-3 बनाने में उपयोग की जाने वाली स्वदेशी सामग्रियों की सूची बनाएं जिसने चंद्रयान-3 को एक बजट अनुकूल मिशन बनाया। टिप्पणी: इसरो ने सार्वजनिक रूप से इस सम्बंध में कोई शैक्षिक सामग्री जारी नहीं की है और इसलिए यह गतिविधि केवल अटकलबाज़ी और बिना समझे इसरो की वेबसाइट से शब्दजाल को पुन: प्रस्तुत करने का खेल है।
मॉड्यूल उवाच: प्राचीन भारतीय ग्रंथों और विमर्शों में वैमानिकी सहित विभिन्न विषयों पर वैज्ञानिक ज्ञान के बाहुल्य हैं। टिप्पणी: जैसी कि ऊपर चर्चा की गई है, ये ग्रंथ या तो काव्यात्मक कल्पनाएं हैं या कदापि प्राचीन नहीं हैं।
4. माध्यमिक स्तर (कोड्स 1.4एस – 1.7एस, कक्षा 9-10):
मॉड्यूल उवाच(कोड 1.4एस): “चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव कहां है?” चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव चंद्रमा पर 90 डिग्री दक्षिण स्थित सबसे अंतिम दक्षिणी बिंदु है। टिप्पणी: यह टॉटोलॉजी (पुनरुक्ति) है, जो किसी भी शैक्षिक पाठ में अवांछनीय है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.4एस): पहले के चंद्रमा मिशनों, यानी ‘ऑर्बिटल मिशन’ और ‘फ्लाईबाई मिशन’ के आधार पर यह पाया गया कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में कुछ गहरे गड्ढों… टिप्पणी: यदि कोई अंतरिक्ष यान किसी खगोलीय पिंड के चारों ओर की कक्षा में प्रवेश किए बिना उसके करीब से गुज़रता है, तो इसे ‘फ्लाईबाई मिशन’ कहा जाता है। इस परिभाषा से चलें, तो किसी भी फ्लाईबाई मिशन ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की छानबीन नहीं की है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.4एस): चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कई ऐसे पहाड़ हैं जो पृथ्वी की ओर नहीं हैं और ग्राउंड रेडियो वेधशाला से ऐसे खगोलीय रेडियो सिग्नल प्राप्त करने के लिए ये आदर्श स्थान हैं। टिप्पणी: इसका चंद्रयान मिशन से कोई सम्बंध नहीं है। इसके अलावा, “ग्राउंड वेधशाला से संकेत प्राप्त करने” का कोई मतलब नहीं है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.5एस): चैत्र महीने का नाम चित्रा नक्षत्र के नाम पर रखा गया है जो इस अवधि के दौरान चंद्रमा के सामने गोचर करता है। टिप्पणी: वास्तव में नक्षत्र पृष्ठभूमि है और चंद्रमा उसके सामने पारगमन करता है। इन मॉड्यूल में कई मान्यताओं व लोककथाओं का ज़िक्र है। जैसे भारतीय परंपराओं में चंद्रमा चंद्रदेव के रूप में जाना जाता है जो दयालु देवता है और शांति और अनुग्रह का संचार करता है…। हालांकि लेखक इस मान्यता का श्रेय लोककथाओं को देते हैं, लेकिन यहां इससे बचना चाहिए। अव्वल तो ये अप्रासंगिक हैं और यदि इनका उल्लेख करना ही है तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि चंद्रमा की किरणों में शीतलता देने जैसे गुण वैज्ञानिक रूप से समर्थित नहीं हैं।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.6एस): (गतिविधि 1) ग्रह और उपग्रह सहित सौर मंडल का एक अनुकृति मॉडल बनाएं। सौर मंडल की एक अनुकृति बनाएं → सौर मंडल के केंद्र में सूर्य का पता लगाएं → सूर्य की परिक्रमा करने वाला अण्डाकार पथ बनाएं → प्रत्येक अण्डाकार पथ पर ग्रहों के नाम बताएं → प्रत्येक ग्रह के उपग्रह का पता लगाएं जो ग्रह की परिक्रमा करता है → हमारे ग्रह का चंद्रमा दिखाएं। टिप्पणी: भाषा का स्तर इतना खराब है कि पाठ का अर्थ ही नहीं बनता है। जैसेे “सूर्य की परिक्रमा करने वाला अण्डाकार पथ बनाएं”; ज़रा सोचिए पथ कैसे परिक्रमा करेंगे, या कैसे उपग्रह प्रत्येक ग्रह पर स्थित हो सकते हैं। दरअसल, यह उस गतिविधि का एक नया संस्करण है जो एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक में पहले से मौजूद है। यदि पुस्तक के उस अध्याय का वही हिस्सा लिख देते तो बेहतर होता।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.6एस): पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा हमारे रात्रि आकाश का सबसे चमकीला और सबसे बड़ा खगोलीय पिंड दिखाई देता है। चंद्रमा से पृथ्वी को अनेक लाभ मिलते हैं। चंद्रमा पृथ्वी की धुरी के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है, जिससे अपेक्षाकृत स्थिर जलवायु बनती है। यह ज्वार भी बनाता है और पृथ्वी को सौर हवाओं से बचाता है, जो ब्रह्मांड के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन के लिए आदर्श है। टिप्पणी: यह एक खराब तरीके से लिखा गया पैराग्राफ है जो बहुत सारी गलतफहमियां पैदा करता है। चंद्रमा सबसे बड़ा पिंड प्रतीत होता है, लेकिन ऐसा उसकी निकटता के कारण है। यह भी वैज्ञानिक रूप से गलत है कि चंद्रमा पृथ्वी को सौर हवाओं से बचाता है, और इसी वाक्य के दूसरा भाग “ब्रह्मांड के अध्ययन के लिए आदर्श” का पहले भाग से कोई सम्बंध नहीं है, और यह यहां अर्थहीन है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.6एस): मिशन (चंद्रयान-2) ने चंद्र क्रेटर में एक बर्फ की चादर की खोज की। टिप्पणी: यह वैज्ञानिक परिणामों का पूर्णत: गलत प्रस्तुतिकरण है। मिशन ने पानी के अणुओं की मौजूदगी की पुष्टि की थी।, “बर्फ की चादर” से मतलब तो बर्फ की मोटी परत होती है, जबकि चंद्रमा के गड्ढों में मिली पानी की मात्रा एक चादर बनाने के लिए बहुत ही कम है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.6एस): निकट भविष्य में ‘चंदा मामा दूर के’ नारे की जगह ‘चंदा मामा टूर के’ कहा जाएगा। टिप्पणी: यह निकट भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान के विकास व दिशा का पूरी तरह भ्रामक चित्रण है। वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन इसरो की प्राथमिकता नहीं है। और अंतरिक्ष पर्यटन (यहां तक कि पृथ्वी की कक्षाओं के निकट भी पर्यटन) कम से कम एक-दो पीढ़ी तक अधिकांश मानव आबादी के लिए अत्यधिक महंगा बना रहेगा।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.7एस): पृथ्वी को अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में लगभग 24 घंटे लगते हैं। जिसमें से हम 12 घंटे सूर्य के संपर्क में रहते हैं और 12 घंटे अंधेरे में डूबे रहते हैं। यह पृथ्वी पर एक पूरे दिन का चक्र पूरा करता है। इसी प्रकार, चंद्रमा का एक हिस्सा एक चंद्र दिवस के लिए सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रहता है जो पृथ्वी पर लगभग 14 दिनों के बराबर होता है। टिप्पणी: एक चंद्र दिवस 27.3 पृथ्वी दिवस के बराबर होता है। 14 दिन की अवधि लगभग आधे चंद्र दिवस के बराबर होती है। इसे एक चंद्र दिवस कहना उसी पाठ में पृथ्वी दिवस (24 घंटे) की परिभाषा से मेल नहीं खाता है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.7एस): 240.25 घंटे, या 10 दिन और 6 घंटे। टिप्पणी: 10 दिन 6 घंटे 246 घंटे होंगे, न कि 240.25 घंटे।
5. उच्च माध्यमिक स्तर (1.8एचएस-1.10एचएस, ग्रेड 11-12)
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.8एचएस): एक बार जब कोई रॉकेट पृथ्वी से एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंच जाता है तो यह उपग्रह या अंतरिक्ष यान को छोड़ देता है। टिप्पणी: सिर्फ यह कहना कि कोई उपग्रह छोड़ दिया गया है बिना यह कहे कि कक्षा में छोड़ दिया गया है, तो वाक्य का अर्थ पूरी तरह से बदल जाता है। सही वाक्य इस प्रकार होना चाहिए: “एक बार जब कोई रॉकेट पृथ्वी से एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंच जाता है, तो यह उपग्रह या अंतरिक्ष यान को वांछित कक्षा में पहुंचा देता है।”
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.9एचएस): ये संचार उपग्रह सी-बैंड, विस्तारित सी-बैंड, केयू-बैंड, केए/केयू बैंड और एस-बैंड सहित विभिन्न आवृत्ति बैंड के ट्रांसपोंडरों से सुसज्जित हैं। टिप्पणी: क्या छात्र जानते हैं कि ये बैंड क्या हैं? स्पष्टीकरण के बिना शब्दों की बौछार शैक्षणिक रूप से उपयोगी नहीं है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.9एचएस): एस्ट्रोसैट, भारत की पहली खगोलीय अंतरिक्ष वेधशाला है,… टिप्पणी: मज़ेदार बात यह है कि इसे “ग्रहों का अनुसंधान” शीर्षक के अंतर्गत रखा गया है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.9एचएस): पृथ्वी पर हमारे पास 24 घंटे का एक दिन होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है। हालांकि, यही स्थिति चंद्रमा के लिए समान नहीं है। इसे एक चक्कर पूरा करने में लगभग 14 पृथ्वी दिवस लगते हैं। दिनांक, 23 अगस्त 2023, चंद्र दिवस (पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर) की शुरुआत को चिह्नित करती है। टिप्पणी: पंक्तियों को इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए: “हालांकि, चंद्रमा पर स्थिति ऐसी ही नहीं है।” इसे एक चक्कर पूरा करने में लगभग 27.3 पृथ्वी दिवस लगते हैं, इसलिए चंद्रमा पर प्रत्येक स्थान को लगभग 14 पृथ्वी दिवसों तक लगातार सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है। दिनांक, 23 अगस्त 2023, अवतरण स्थान के लिए दिन के उजाले की अवधि की शुरुआत को चिह्नित करती है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.10एचएस): जैसे-जैसे हम इस ब्रह्मांडीय यात्रा में गहराई से उतरते हैं, हम दूरदर्शी इंजीनियर वर्नर वॉन ब्रान (रॉकेट विज्ञान के जनक) की अदम्य भावना से प्रेरित हुए बिना नहीं रह पाते, जिन्होंने सितारों तक पहुंचने के सपनों को वायुमंडल के आर-पार जाने वाले मूर्त रॉकेट में बदल दिया। उनकी विशाल उपलब्धियों ने अंतरिक्ष के असीमित विस्तार को एक प्राप्य सीमा में बदल दिया, जहां अन्वेषण के लिए मानव की लालसा उड़ान भर सकती थी। टिप्पणी: और इस कथन को देकर हम आसानी से यूएस के साथ जुड़कर इस तथ्य पर लीपा-पोती कर देते हैं कि वॉन ब्रॉन एक नाज़ी वैज्ञानिक थे जिन्होंने हिटलर के लिए मिसाइल V2 का निर्माण किया था।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.10एचएस): वेलोड्रोम या मौत के कुएं का आकार एक छिन्नक की तरह है, सवार की कक्षा एक समतल की तरह है जो इस कुएं (शंकु) की धुरी को काटती है इस तरह सवार दीर्घ-वृत्ताकार पथ पर आगे बढ़ रहा है। टिप्पणी: क्या विद्यार्थी व्याकरण की दृष्टि से गलत संवेदनहीन विवरण को समझ पाएंगे?
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.10एचएस): … अगर उसे चंद्र गमन करना है तो वांछित गति प्राप्त करने के लिए उसे भी अपनी गति बढ़ानी होगी ताकि यह चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र तक पहुंच सके। टिप्पणी: इसे इस तरह लिखना चाहिए था “… ताकि यह चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव क्षेत्र तक पहुंच सके”, गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र नहीं क्योंकि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र तो अनंत तक फैला हुआ है।
मॉड्यूल उवाच (कोड 1.10एचएस): यदि किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाला उपग्रह उस ग्रह के बराबर है, तो बाइनरी सिस्टम (जैसे पृथ्वी और चंद्रमा) उनके सामान्य केंद्रक (बैरीसेंटर) के चारों ओर घूमते हैं।टिप्पणी: पिंड हमेशा अपने सामान्य बैरीसेंटर के चारों ओर घूमेंगे। यदि एक पिंड दूसरे पिंड की तुलना में बहुत अधिक विशाल है, तो इस प्रणाली का बैरीसेंटर बड़े पिंड के केंद्र के करीब होगा और इसलिए इसकी गति नज़र नहीं आएगी। बात बस इतनी ही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/aajtak/images/story/202311/ncert_chandrayaan_module_controversy-sixteen_nine.jpg?size=948:533
कृत्रिम बुद्धि के युग में, चैटजीपीटी एक शक्तिशाली साधन के रूप में उभरा है। यह पलभर में आकर्षक लेख, सोशल मीडिया पोस्ट, निबंध, कोड और ईमेल सहित विभिन्न लिखित सामग्री तैयार कर सकता है। इन क्षमताओं को देखते हुए शिक्षाविदों को डर है कि छात्र इसका उपयोग अपने शैक्षणिक कार्यों में कर सकते हैं। साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार इसके द्वारा निर्मित सामग्री कॉलेज छात्रों के काम की गुणवत्ता के बराबर या उससे भी बेहतर हो सकती है। इस प्रकार से चैटजीपीटी शिक्षकों को वर्तमान शिक्षण विधियों और मूल्यांकन मानदंडों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करता है।
अबू धाबी स्थित न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के कंप्यूटर वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने विभिन्न विषयों में 233 मूल्यांकन प्रश्नों का अध्ययन किया। उन्होंने छात्रों और चैटजीपीटी दोनों से प्राप्त जवाबों का निष्पक्ष ग्रेडर्स द्वारा मूल्यांकन करवाया। आश्चर्यजनक रूप से लगभग 30 प्रतिशत पाठ्यक्रमों में चैटजीपीटी के जवाबों को मानव छात्रों के जवाबों के बराबर या बेहतर ग्रेड मिले। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि कृत्रिम बुद्धि के विकास के साथ यह प्रतिशत बढ़ेगा।
इतना ही नहीं, जीपीटी-3.5 और जीपीटी-4 जैसे जनरेटिव एआई मॉडल ने एसएटी, जीआरई, बार और एलएसएटी जैसी पेशेवर परीक्षाओं में उत्कृष्टता का प्रदर्शन किया है। इन्होंने मेडिकल कॉलेज की प्रवेश परीक्षाओं और अमेरिका के उच्च स्तरीय आइवी लीग फाइनल में मानव औसत से भी बेहतर परिणाम दिए हैं। ये निष्कर्ष शिक्षा में एआई के बढ़ते प्रभाव को उजागर करने के साथ-साथ शिक्षकों को बदलते परिदृश्य के अनुरूप ढलने के लिए प्रेरित करते हैं।
शैक्षणिक बेईमानी के लिए चैटजीपीटी के उपयोग का मुकाबला करने के लिए कुछ शिक्षकों ने स्वयं एआई के साथ प्रयोग करना शुरू किए हैं। बर्लिन स्थित कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर डेबोरा वेबर-वुल्फ चैटजीपीटी के माध्यम से परीक्षा और होमवर्क प्रश्न तैयार करती हैं और फिर उन्हें इस तरह संशोधित करती हैं कि वे एआई के लिए चुनौतीपूर्ण बन जाएं। वैसे इस रणनीति की अपनी सीमाएं हैं और संभव है कि एआई तकनीकें इसका भी कोई हल निकाल लेंगी।
देखा जाए तो नकल या धोखाधड़ी का मामला एआई की पैदाइश नहीं है। पूर्व में भी कई जगहों पर निबंध-लेखन सेवाएं उपलब्ध होती थीं लेकिन एआई ने इसे अधिक सुलभ और सरल बना दिया है। एक तरह से यह शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य पर भी गंभीर सवाल उठाता है कि छात्र सीखने और दक्षता हासिल करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं या केवल अच्छे ग्रेड पाने का प्रयास कर रहे हैं।
यह ध्यान देने वाली बात है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अक्सर विषय की वास्तविक समझ की बजाय ग्रेड पर अधिक ज़ोर देती है। ऐसे में छात्र ज्ञान अर्जन की बजाय बेहतर ग्रेड प्राप्त करने के लिए अनुचित रणनीति अपना रहे हैं। धोखाधड़ी में एआई का उपयोग इस बड़ी समस्या का एक लक्षण मात्र है। इसलिए, शिक्षकों को अपना ध्यान एआई-आधारित धोखाधड़ी से निपटने की बजाय अकादमिक बेईमानी के मूल कारणों पर केंद्रित करना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि धोखाधड़ी और साहित्यिक चोरी की प्रवृत्ति सीखने के प्रति छात्रों के दृष्टिकोण से उत्पन्न होती है। यदि छात्रों को वास्तव में किसी कौशल में महारत हासिल करने के लिए प्रेरित किया जाए तो धोखाधड़ी की संभावना कम होती है। लेकिन जब उनका प्राथमिक लक्ष्य किसी भी कीमत पर उच्च ग्रेड प्राप्त करना हो तब वे एक साधन के रूप में एआई का सहारा क्यों नहीं लेंगे? इससे निपटने के लिए, ग्रेड की बजाय सीखने-समझने की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।
देखा जाए तो, एआई-आधारित धोखाधड़ी मूल्यांकन प्रक्रिया को कमज़ोर करने के अलावा छात्रों में लेखन कौशल के विकास में भी बाधा डालती है। लेखन विभिन्न व्यवसायों के लिए एक आवश्यक बुनियादी कौशल है और यह अवधारणाओं के बीच सम्बंध बनाने, समझ को बढ़ावा देने, स्मृति में सुधार और रिकॉल जैसी संज्ञान प्रक्रियाओं को बढ़ाता है। जो छात्र असाइनमेंट लिखने के लिए पूरी तरह से एआई पर निर्भर रहते हैं वे इन संज्ञान लाभों से भी चूक जाते हैं।
दरअसल, एआई को एक खतरे के रूप में देखने की बजाय, शिक्षक इसे अपनी शिक्षण रणनीतियों में शामिल कर सकते हैं। इसमें छात्र एआई ट्यूटर टूल का उपयोग करके घर पर सीखने के स्व-निर्देशित तरीके अपना सकते हैं और कक्षा के समय का उपयोग सहपाठियों के साथ परियोजनाओं पर काम के लिए कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, व्यक्तिगत फीडबैक और प्रक्रिया-केंद्रित मूल्यांकन (जिसमें महत्व अंतिम उत्तर का नहीं बल्कि सीखने की प्रक्रिया का हो) अपनाकर एआई-आधारित धोखाधड़ी को कमज़ोर किया जा सकता है। ऐसे मूल्यांकन में समय तो लगेगा लेकिन इसमें एआई साधनों की मदद से रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।
इसके अलावा, शिक्षक छात्रों को नैतिकतापूर्ण उपयोग और पारदर्शिता को प्रोत्साहित करते हुए विचार-मंथन और विचार निर्माण के लिए एआई टूल का उपयोग करना सिखा सकते हैं। उपरोक्त अध्ययन में यह भी सामने आया कि चैटजीपीटी तथ्य-आधारित प्रश्नों का उत्तर देने में उत्कृष्ट होता है लेकिन अवधारणात्मक मामलों में पीछे रहता है। इसलिए रटंत की बजाय विश्लेषण और संश्लेषण आधारित मूल्यांकन से एआई का गलत हस्तक्षेप कम हो सकता है।
ज़ाहिर है एआई सहायक और हानिकारक दोनों हो सकता है। लिहाज़ा यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्र यह समझ पाएं कि एआई का उपयोग अपने प्रयासों को कम करने में नहीं बल्कि सीखने के अनुभव को समृद्ध करने के लिए कब और कैसे किया जाए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.analyticsinsight.net/wp-content/uploads/2023/04/ChatGPT-in-Education-Sector-Benefits-and-Challenge.jpg
हाल ही में इस्रायली संसद द्वारा देश के धार्मिक स्कूलों का बजट बढ़ाने का निर्णय काफी चर्चा में है। चूंकि इन स्कूलों में विज्ञान और गणित विषय नहीं पढ़ाए जाते इसलिए शोध समुदाय का मानना है कि इस कदम से देश के युवा आवश्यक तकनीकी ज्ञान और कौशल प्राप्त नहीं कर पाएंगे जिसके बिना वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस्राइल की हिस्सेदारी कम होने की आशंका रहेगी।
वर्तमान में इस्राइल में अति-रूढ़िवादी हरेदी (यहूदी) समुदाय की जनसंख्या लगभग 13 प्रतिशत है। लेकिन हरेदी स्कूलों में लगभग 26 प्रतिशत यहूदी छात्र और कुल इस्राइली छात्रों में से 20 प्रतिशत पढ़ते हैं। सरकार द्वारा वित्तपोषित इन स्कूलों में विशेष रूप से लड़कों को ताउम्र यहूदी धर्म ग्रंथ और कानून पढ़ने के लिए तैयार किया जाता है। इनमें से अधिकांश लड़के कभी भी धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन नहीं करते हैं। हालांकि, हरेदी लड़कियों को राज्य-अनुमोदित पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। इसमें धर्मनिरपेक्ष विषय होते हैं लेकिन गैर-हरेदी छात्राओं को पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम की तुलना में यह काफी निम्न स्तर का है।
हरेदी शिक्षा के समर्थकों का मत है कि ये स्कूल बौद्धिक रूप मज़बूत लोगों को तैयार करते हैं जो विश्व में यहूदी पहचान को मज़बूत करने का पवित्र दायित्व निभाते हैं। दूसरी ओर, आलोचकों के अनुसार इन स्कूलों से हरेदी समुदाय में गरीबी और बेरोज़गारी दर में वृद्धि होती रही है। वर्तमान में हरेदी समुदाय के लगभग आधे पुरुष बेरोज़गार हैं। इसके साथ ही गणित, विज्ञान और अंग्रेज़ी में इस्रायली छात्रों की औसत दक्षता अन्य विकसित देशों के औसत से काफी नीचे है। ऐसे में सरकार का यह निर्णय इस्राइल को तीसरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर ले जाएगा।
पूर्व में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू हरेदी स्कूलों में विज्ञान, गणित और अंग्रेजी सहित धर्मनिरपेक्ष विषयों को पढ़ाने की इच्छा तो ज़ाहिर कर चुके हैं लेकिन गठबंधन सरकार (जिसमें धार्मिक कट्टरपंथी और राष्ट्रवादी दल शामिल है) के दबाव के कारण बजट प्रस्ताव में ऐसी कोई शर्त शामिल नहीं की जा सकी है।
अलबत्ता, कुछ विज्ञान और प्रौद्योगिकी समर्थकों द्वारा हरेदी स्कूलों से उत्तीर्ण छात्रों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। 2021-22 के दौरान 5000 से अधिक हरेदी छात्रों को हाई स्कूल के बाद तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दाखिला दिया गया है। इसके साथ ही लगभग 15,600 छात्रों ने कॉलेज डिग्री प्राप्त की है। बुनियादी धर्मनिरपेक्ष शिक्षा न मिलने के कारण हरेदी हाई स्कूल के छात्रों की गणित, विज्ञान और अंग्रेज़ी में पकड़ कमज़ोर होती है लेकिन उनकी कठोर धार्मिक शिक्षा में उन्हें रटना और विश्लेषण करना होता है जिससे उनमें ‘कैसे सीखें’ की समझ विकसित होती है। यह उनकी शैक्षिक खाई को पाटने का रास्ता बन सकती है। लेकिन स्पष्ट रूप से खाई तो है। (स्रोत फीचर्स)
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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा दसवीं की विज्ञान पाठ्यपुस्तक से जैव विकास के सिद्धांत और आवर्त सारणी को हटाने के निर्णय से एक बड़ी बहस छिड़ गई है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जानी-मानी और सबसे पुरानी विज्ञान पत्रिकाओं में से एक नेचर ने भी इस मुद्दे को अहम मानते हुए इस पर संपादकीय लिखा है।
एनसीईआरटी ने इन अध्यायों के विलोपन को यह कहकर उचित ठहराया है कि पाठ्यक्रम के ‘युक्तियुक्तकरण’ के लिए इन अध्यायों को हटाया गया है ताकि विद्यार्थियों पर बोझ कम हो जाए। लेकिन नए संस्करण और पिछले संस्करण की पाठ्यपुस्तकों को देखने के बाद ऐसा लगता है कि वास्तविक कारण बहुत अलग होंगे। इन अध्यायों का विलोपन स्कूलों में विज्ञान की शिक्षण पद्धति पर सवाल उठाता है। जिस तरीके से और जो अध्याय (या विषय) हटाए गए हैं उससे लगता है कि अध्यायों को सुविचारित तरीके से नहीं हटाया गया है बल्कि मात्र कैंची चलाई गई है।
ऐसा करने का संभावित कारण वर्तमान शासन की विज्ञान विरोधी विचारधारा को बताया जा रहा है। लेकिन, इस कतर-ब्योंत में अभिजात्य पूर्वाग्रह वाली एक टेक्नोक्रेटिक मानसिकता अधिक प्रभावी प्रतीत होती है। यह मानसिकता नई शिक्षा नीति की पहचान बनती जा रही है।
विलोपन के कारण
विलोपन के पहले यह पाठ्यपुस्तक पहली बार 2006 में प्रकाशित हुई थी जो राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF, 2005) के अनुरूप थी। प्रसिद्ध ब्रह्मांडविद और विज्ञान प्रचारक प्रोफेसर जयंत वी. नार्लीकर इसकी सलाहकार समिति के प्रमुख थे और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भौतिकी की प्रोफेसर रूपमंजरी घोष पाठ्यपुस्तक समिति की प्रमुख थीं। उस समय पाठ्यपुस्तक को किशोर विद्यार्थियों को बांधने वाली बनाने के संजीदा प्रयास किए गए थे। उस पाठ्यपुस्तक के अध्यायों में जगह-जगह पर पूर्व अध्यायों और खंडो में चर्चित सामग्री का ज़िक्र किया जाता था। यह एक ऐसा तरीका है जो न सिर्फ विद्यार्थियों को सीखी जा चुकी अवधारणाएं/विषय भलीभांति याद दिलाने में मदद करता है बल्कि विभिन्न टॉपिक/विषयों के बीच जुड़ाव बनाता है और पूरी पाठ्यपुस्तक में तारतम्य बनता है।
2023-24 के शैक्षणिक सत्र की तेरह अध्यायों वाली ‘युक्ति-युक्त’ पाठ्यपुस्तक में अपवर्तन और परावर्तन पर एक नए अध्याय को छोड़कर बाकी सामग्री लगभग वैसी ही है। पाठ्यपुस्तक से आवर्त सारणी का पूरा अध्याय, जैव विकास का आधा अध्याय, विद्युत मोटर और विद्युत चुम्बकीय प्रेरण वाले अध्याय के कुछ हिस्से, और ऊर्जा के स्रोत और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के अध्याय हटा दिए गए हैं।
पाठ्यपुस्तक की संरचना और हटाए गए अध्यायों का सम्बंध चौंकानेवाला है। आवर्त सारणी का विलोपित अध्याय विलोपन-पूर्व वाली पाठ्यपुस्तक के रसायन विज्ञान वाले खंड का अंतिम अध्याय था। जैव विकास का हटाया गया अध्याय जीव विज्ञान वाले खंड का अंतिम हिस्सा था। विद्युत चुम्बकीय प्रेरण वाला खंड भौतिकी का अंतिम से ठीक पहले वाला खंड था। यह जानते हुए कि पहले वाले खंडों और अध्यायों की सामग्री का ज़िक्र अक्सर बाद वाले अध्यायों में किया जाता है, यदि जल्दबाज़ी में पाठ्यपुस्तक के ‘युक्ति-युक्तकरण’ का काम किया जाएगा, तो अंतिम अध्यायों और खंडों को हटाना ठीक ही लगेगा। दूसरी ओर, बीच के खंडों या अध्यायों को हटाया जाता तो अन्य जगहों पर उनके ज़िक्र (या जुड़ाव) को ‘युक्ति-युक्त’ बनाने के लिए उन अध्यायों को दोबारा लिखना ज़रूरी हो जाता।
बहिष्कारी शिक्षण शास्त्र
हो सकता है कि अध्यायों या खंडों को हटा देने का यह पैटर्न सबसे आसान रहा हो, लेकिन इसने पाठ्यपुस्तक की शैक्षणिक दिशा को तोड़-मरोड़ दिया है। दसवीं कक्षा में विज्ञान अनिवार्य विषय है। इसलिए इसके पाठ्यक्रम में यह झलकना चाहिए कि दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले किसी भी भारतीय (विद्यार्थी) से क्या अपेक्षित है, भले ही वह आगे चलकर विज्ञान विषय न पढ़े या औपचारिक शिक्षा छोड़ दे।
कक्षा दसवीं की विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने वाले विद्यार्थी समूह सर्वग्राही हैं। एक महत्वपूर्ण पैरामीटर उन विद्यार्थियों की संख्या है जो दसवीं के आगे विज्ञान की पढ़ाई नहीं करते, और जिनके लिए यह पाठ्यक्रम विज्ञान की अंतिम औपचारिक शिक्षा होगी।
भारत में औपचारिक शिक्षा में दाखिले का ढांचा पिरामिडनुमा है। 2018 के आंकड़ों के अनुसार, दसवीं कक्षा की परीक्षा देने वाले लगभग 20 प्रतिशत विद्यार्थियों ने अगले पड़ाव से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी। उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं (ग्यारहवीं और बारहवीं) से उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय की ड्रॉपआउट दर और भी अधिक है। सकल दाखिला अनुपात आंकड़ों के अनुसार, उच्चतर माध्यमिक स्तर पर उत्तीर्ण लगभग आधे विद्यार्थी आगे जाकर कॉलेज (स्नातक) में प्रवेश नहीं लेते हैं। दसवीं कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की कुल ड्रॉपआउट दर 60 प्रतिशत है।
विज्ञान पढ़ने वाले विद्यार्थियों का पिरामिडनुमा ढांचा और भी कठिन है। दसवीं पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी विज्ञान पढ़ते हैं। इसके बाद मात्र लगभग 42 प्रतिशत विद्यार्थी ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा में विज्ञान विषय लेते हैं। लेकिन 26 प्रतिशत विद्यार्थी ही स्नातक स्तर पर, यानी बी.एससी, बी.टेक, बीसीए, बी.फार्मा, एमबीबीएस और बी.एससी. (नर्सिंग) में, विज्ञान पढ़ते हैं। शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर दर्ज विद्यार्थियों की संख्या और विज्ञान पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या के डैटा को साथ देखने से पता चलता है कि दसवीं में पढ़ने वाले हर 10 में से सात विद्यार्थी अगली कक्षाओं में विज्ञान विषय नहीं लेते हैं, और इन्हीं दस में सिर्फ एक विद्यार्थी कॉलेज/युनिवर्सिटी स्तर पर विज्ञान की किसी शाखा में पढ़ाई जारी रखता है।
उपरोक्त अनुपात माध्यमिक कक्षाओं में विज्ञान शिक्षण की चुनौती को दर्शाता है। विज्ञान ज्ञान का एक संचयी निकाय है, और इसकी पढ़ाई बहुत ही क्रमबद्ध होती है। एक स्तर पर सरल अवधारणाओं को सीखे बगैर अगले स्तर की जटिल अवधारणाओं को नहीं समझा जा सकता है। इसलिए विज्ञान शिक्षण का कम से कम एक उद्देश्य विद्यार्थियों को अगले स्तर के अध्ययन के लिए तैयार करना है। वैसे यह उद्देश्य केवल दसवीं कक्षा के क्रमश: उन एक-तिहाई और दस प्रतिशत विद्यार्थियों के लिए है जो उच्चतर माध्यमिक या उच्च शिक्षा में विज्ञान की पढ़ाई जारी रखते हैं। बाकी बचे अधिकांश विद्यार्थियों, जिनके लिए दसवीं कक्षा तक की विज्ञान शिक्षा आखिरी औपचारिक विज्ञान शिक्षा है, के लिए विज्ञान शिक्षण का उद्देश्य यह नहीं हो सकता।
पहले समूह के (विज्ञान की पढ़ाई जारी रखने वाले) विद्यार्थियों को विज्ञान की अमूर्त अवधारणाओं और सिद्धांतों को समझने और वैज्ञानिक तकनीकों, यानी समस्या-समाधान और प्रयोगशाला विधियों, में महारत हासिल करने की आवश्यकता होती है। दूसरे समूह के (विज्ञान की पढ़ाई या पढ़ाई ही छोड़ देने वाले) विद्यार्थियों को व्यक्तिगत विकास और सामाजिक जीवन में विज्ञान के महत्व को आत्मसात करने की आवश्यकता है। उन्हें दुनिया के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आम ज़िंदगी से विज्ञान के सम्बंध के बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है।
ये दोनों उद्देश्य एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। दरअसल, बहुसंख्य विद्यार्थियों को भी प्रयोगशाला के तरीकों और समस्या-समाधान के कुछ अनुभव मिलने चाहिए। ये दोनों शैक्षणिक उद्देश्य और उन्हें हासिल करने के तरीके अलग-अलग हैं और हमेशा तना-तनी में रहते हैं। इनके बीच संतुलन बनाने की कोशिश को विद्यार्थियों के उपरोक्त दोनों समूहों की आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में होना चाहिए।
पाठ्यचर्या बनाने वालों, पाठ्यपुस्तक लेखकों, शिक्षकों और प्रश्नपत्र तैयार करने वालों के लिए बहुत ही विविध आवश्यकताओं और प्रेरणाओं वाले विद्यार्थियों के लिए एकल पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली बनाना आसान काम नहीं है। सामान्य प्रवृत्ति होती है कि सरल से जटिलता की ओर बढ़ते हुए विभिन्न विषयों, अवधारणाओं, समस्याओं और प्रश्नों से लदी एक पाठ्यपुस्तक बना दें और उम्मीद करें कि जो विद्यार्थी विज्ञान की पढ़ाई जारी रखेंगे वे कठिन और सरल दोनों हिस्सों तक पहुंच बना लेंगे; जबकि अन्य विद्यार्थी जो आगे की कक्षाओं में विज्ञान नहीं पढ़ना चाहते हैं वे कठिन हिस्सों को सीखे बिना किसी तरह काम चला लेंगे।
शिक्षण शास्त्र की दृष्टि से यह तरीका गलत है। यह पहले समूह के विद्यार्थियों के उद्देश्य को तो पूरा कर सकता है लेकिन दूसरे समूह की आवश्यकताओं का अवमूल्यन करता है और उन्हें पिछड़े और असफल लोगों की श्रेणी में धकेल देता है।
उपरोक्त विचारों के प्रकाश में यह स्पष्ट होता है कि दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों के आनन-फानन किए गए ‘युक्तियुक्तकरण’ ने उन विद्यार्थियों के बड़े समूह की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करना अधिक मुश्किल बना दिया है जो आगे विज्ञान की पढ़ाई जारी नहीं रखने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और प्रदूषण ने पर्यावरण विज्ञान के कुछ हिस्सों को आम चर्चा का अभिन्न अंग बना दिया है। सभी विद्यार्थी परिष्कृत सिद्धांतों और अवधारणाओं में महारत हासिल किए बिना जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार कारणों को खोजने और हरित ऊर्जा स्रोतों की ज़रूरत को समझने में विज्ञान की भूमिका समझ सकते हैं। दसवीं कक्षा की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक से पर्यावरण विज्ञान के तीन में से दो अध्यायों के विलोपन ने आम विद्यार्थियों को वृहत सार्वजनिक सरोकार के लिए विज्ञान के महत्व को समझने के एक बहुत ही उपयोगी अवसर से वंचित कर दिया है।
जैव विकास का सिद्धांत और आवर्त सारणी विशिष्ट अवधारणाओं और अवलोकन पर आधारित हैं। अलबत्ता, जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के अन्य विषयों की तुलना में, इन विषयों में सामान्य विचार भी शामिल हैं जिन्हें आसानी से ग्रहण किया और समझा जा सकता है। तथ्य यह है कि ये दोनों विषय/अवधारणाएं पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और रासायनिक गुणों के वितरण की एकीकृत छवि बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, इनकी बारीकियों को समझे बिना भी दुनिया की वैज्ञानिक तस्वीर बनाने में इनकी भूमिका को आसानी से समझा जा सकता है।
विद्यार्थियों के सिर से बोझ कम करने के लिए ‘युक्तिसंगत’ बनाई गई वर्तमान पाठ्यपुस्तक की खासियतें विचित्र हैं। इसमें जीन हस्तांतरण के मेंडल के नियमों को तो यथावत रखा गया है, जो कि बहुत विशिष्ट और अमूर्त हैं और जिन्हें अधिकांश विद्यार्थी याद भर कर लेते हैं, लेकिन इसमें जैव विकास के लिए कोई जगह नहीं है जबकि इसकी मुख्य विचारों/बातों को सरल तरीके से बताया जा सकता है।
पर्यावरण विज्ञान, आवर्त सारणी और जैव विकास के अध्यायों को हटाने, और अपवर्तन एवं परावर्तन पर एक अध्याय, जिसमें लेंस और गोलीय दर्पणों के लिए प्रकाश किरण सम्बंधी नियम और सूत्र हैं, जोड़ने के साथ नई ‘युक्तिसंगत’ पाठ्यपुस्तक का संतुलन ज़ाहिर तौर पर अमूर्त और विशिष्ट विषयों की तरफ झुक गया है। इन विषयों में महारत हासिल करने के लिए बार-बार अनुभव और अभ्यास की आवश्यकता होती है, जो भारत में बड़े पैमाने पर स्कूल के बाहर कोचिंग में मिलता है। नई पाठ्यपुस्तक में क्षति उन सामान्य विषयों की हुई है जिन्हें सभी विद्यार्थी पढ़कर और चर्चा करके समझ सकते हैं।
जैसी कि ऊपर चर्चा की गई है, पारंपरिक सोच के अनुसार अपवर्तन और परावर्तन जैसे विषयों को ‘आसान’ माना जाता है। पर्यावरण विज्ञान, आवर्त सारणी और जैव विकास के अध्यायों का विलोपन उन अधिकांश विद्यार्थियों को शिक्षा से बहिष्कृत करने जैसा है जिनके आगे जाकर विज्ञान विषय पढ़ने की संभावना नहीं है।
चुनिंदा विषयों को हटाना निर्धारित वैचारिक प्रतिबद्धताओं का परिणाम नहीं बल्कि एक आसान समाधान लगता है। अलबत्ता, इसके शैक्षणिक निहितार्थ भारतीय शिक्षा प्रणाली में किए जा रहे परिवर्तनों के साथ फिट बैठते हैं। नई शिक्षा नीति को अपनाने के साथ ही भारतीय शिक्षा खुलकर तकनीकी दृष्टिकोण के अधीन आ गई है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य तकनीकी कर्मचारी तैयार करना है जिनकी क्षमताओं को आसानी से मात्रात्मक पैमाने पर नापा जा सके। देश भर में एक समान पाठ्यक्रम लागू करने की कोशिशें, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल से लेकर विश्वविद्यालय में प्रवेश तक राष्ट्रव्यापी एकल परीक्षाओं को जबरन लागू करना, शैक्षणिक संस्थानों की रैंकिंग पर ज़ोर देना आदि सभी उस योजना का हिस्सा हैं जिसका प्राथमिक उद्देश्य बाज़ार के लिए कुशल और अकुशल कर्मचारियों की फौज बनाना है। पिरामिडनुमा परिणाम इस व्यवस्था के ढांचे में ही निहित हैं। इस व्यवस्था में विज्ञान शिक्षा एक आवश्यक कौशल आधार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस ढांचे का कोई अन्य उद्देश्य, जैसे कि विद्यार्थियों में दुनिया को देखने का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक स्वभाव विकसित करने में मदद करना, प्राथमिकता नहीं है। इस ढांचे में उन विद्यार्थियों की शैक्षणिक आवश्यकताओं के लिए कोई जगह नहीं है जिनकी विज्ञान की पढ़ाई आगे जारी रहने की संभावना नहीं है। वैसे भी उन विद्यार्थियों पर विफल होने का ठप्पा लगा ही दिया गया है! (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://mcmscache.epapr.in/post_images/website_350/post_33087266/full.png