सुपर एल नीनो की संभावनाएं

हा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।

मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।

सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।

यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।

एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।

इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।

एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।

युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।

एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बाढ़ और सूखे का कारण है एल नीनो

दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।

एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।

एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में  बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।

दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एल नीनो

सुशील जोशी

ने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?

एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।

परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।

यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।

इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।

दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही  मौसम की भविष्यवाणी। 

इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।

ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।

एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया। 

1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।

इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)

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घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

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जंक फूड से परेशान बंदरों का अजीब व्यवहार

जिब्राल्टर की चट्टानों पर रहने वाले मशहूर बंदरों में इन दिनों एक अजीब आदत देखी जा रही है। वे भोजन के बाद मिट्टी भी खा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उनके अस्वस्थ खान-पान की वजह से हो रहा है जो उस इलाके में आने वाले पर्यटक (Tourists) उनको खिला रहे हैं।

गौरतलब है कि जिब्राल्टर (Gibraltar) में करीब 230 मकाक (Macaque) बंदर हैं, जो अलग-अलग समूहों में रहते हैं। हालांकि वहां के अधिकारी उन्हें संतुलित भोजन देते हैं, लेकिन कई पर्यटक नियम तोड़कर उन्हें चिप्स, चॉकलेट, आइसक्रीम और मीठे पेय दे देते हैं। इस कारण धीरे-धीरे उनके खाने की आदत बदल गई है। 2022 से 2024 के बीच किए गए अध्ययन में पाया गया कि उनके भोजन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अब मनुष्यों द्वारा दिया जा रहा जंक फूड (Junk Food) है।

वैज्ञानिकों ने देखा कि जो बंदर पर्यटकों के ज़्यादा संपर्क में आते हैं, वे सबसे ज़्यादा जंक फूड  और मिट्टी खाते हैं। छुट्टियों के समय, जब पर्यटक अधिक आते हैं और उन्हें ज़्यादा खाना  देते हैं, तब मिट्टी खाने की यह आदत और बढ़ जाती है। वहीं जो बंदर पर्यटन इलाकों से दूर रहते हैं, वे मिट्टी बिल्कुल नहीं खाते – इससे पता चलता है कि यह व्यवहार मनुष्यों के चलते है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी उनके पाचन तंत्र (Digestive System) को बचाने में मदद करती है। जंक फूड में वसा, शर्करा और नमक अधिक होता है लेकिन फाइबर कम होता है, जिससे पेट के अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है। मिट्टी में मौजूद खनिज और सूक्ष्मजीव (Microbes) इस संतुलन को सुधारने में मदद कर सकते हैं। कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि बंदर आइसक्रीम या ब्रेड खाने के तुरंत बाद मिट्टी खाते हैं, जिससे लगता है कि वे पेट ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह भी पता चला है कि मिट्टी खाने की यह आदत एक-दूसरे से सीखकर आती है। बंदरों के अलग-अलग समूह अलग तरह की मिट्टी पसंद करते हैं। ज़्यादातर लाल मिट्टी (टेरा रोसा) खाते हैं, जबकि सड़क के पास रहने वाले कुछ बंदर (Monkey) डामर मिली मिट्टी खाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह आदत अधिक पोषण पाने के लिए नहीं है, क्योंकि गर्भवती या बच्चे को दूध पिलाने वाली मादा बंदरों में यह आदत नहीं देखी गई। यानी यह जंक फूड के बुरे असर को बेअसर करने के लिए ही खाई जाती है।

लेकिन मिट्टी खाने का यह तरीका सुरक्षित नहीं है। ज़्यादातर वे जो मिट्टी खाते हैं, सड़क किनारे की होती है, जहां गाड़ियों का प्रदूषण हो सकता है। यह स्वास्थ्य (Health) पर बुरा असर डाल सकता है। इसलिए वैज्ञानिक अब इस मिट्टी की जांच कर देखना चाहते हैं कि यह बंदरों के लिए कितनी सुरक्षित है।

वैसे, मिट्टी खाना (जियोफैगी) मनुष्यों और जानवरों दोनों में देखा जाता है और आम तौर पर शरीर को साफ करने या खनिज पाने से जुड़ा होता है। लेकिन बंदरों में यह आदत मनुष्यों की संगत के चलते आई है।

भलाई इसी में है कि लोग बंदरों को खाना देना बंद करें। क्योंकि आपकी साधारण-सी लगने वाली बातें भी उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर बुरा असर डाल सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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संगीत का जन्म और विकास

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

त 21 जून को सालाना विश्व संगीत दिवस मनाया गया। यह मौका है इस बात को समझने का कि प्राचीन समय से अब तक संगीत और ताल कैसे विकसित हुए। क्योटो विश्वविद्यालय के प्रायमेट रिसर्च इंस्टीट्यूट के युको हटोरी और मसाकी टोमोनागा का अध्ययन बताता है कि जब चिम्पैंजियों के समूह को एक धुन सुनाई जाती थी तो वे लयबद्ध ढंग थिरकने लगते थे! हालांकि, उनके स्वर यंत्र (वोकल कॉर्ड) गायन के लिए विकसित नहीं हुए हैं; वे केवल गुर्रा सकते हैं। लेकिन उक्त अध्ययन दर्शाता है कि हम मनुष्यों को वानरों से मात्र हमारे कई जीन्स और रक्त समूह विरासत में नहीं मिले हैं, बल्कि हमारी लय-ताल की समझ भी मिली है!

तो फिर, हम मनुष्यों ने गाना और वाद्ययंत्र बजाना कब शुरू किया? शोधकर्ताओं ने यह बताया है कि मनुष्यों ने बोलना पुरा-पाषाण युग (जो 25 लाख साल पहले से 10,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है) के दौरान शुरू किया, और उसके थोड़े समय बाद ‘गाना’ शुरू किया। मनुष्यों में गाने और बजाने की क्षमता के प्रमाण लगभग 40,000 साल पहले से मिलते हैं; वैज्ञानिकों को लगभग 40,000 साल पुरानी एक बांसुरी मिली है जो जानवर की हड्डी से बनाई गई थी। इसमें ‘सुर’ बजाने के लिए पांच छेद हैं। निम्नलिखित साइट्स पर जाकर इसका पूरा लुत्फ उठाएं:

https://www.science.org/content/article/ancient-flutes-suggest-rich-life-stone-age-europe

https://www.classicfm.com/discover-music/instruments/flute/worlds-oldest-instrument-neanderthal-flute

राग और ताल

संगीत का वास्तविक लिपिबद्ध रूप युरोप और मध्य पूर्व में संभवत: 9वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान सूक्त (Hymns) गायन और वादन के लिए हुआ था। इस संगीत लिपि में संकेतों (‘do, re, ma, fa, po, la, ti’) के बीच रिक्त स्थान होते थे। ऐसा माना जाता है कि भारत में वैदिक काल (1500-600 ईसा पूर्व) में सुरों (‘सा, रे, गा, मा, प, ध, नी’) का चिह्नाकंन हुआ था। डॉ. जमीला सिद्दीकी लिखती हैं कि हमारे पास ‘सा, रे, गा, मा, प, ध, नी’ सुर थे। आप इन्हें एम. एस. सुब्बलक्ष्मी को राग जगनमोहिनी में ‘सोबिलु सप्तस्वर’ गाते हुए और संत त्यागराज द्वारा रचित ‘रूपक ताल’ में सुन सकते हैं। तब से लेकर अब तक हमने ज्यामितीय और शास्त्रीय तरीके से सुरों को व्यवस्थित करके संगीत में काफी प्रगति कर ली है और अपने संगीत के रस को आगे बढ़ाया है।

लेकिन ज़रूरी नहीं है कि आप सिर्फ शास्त्रीय संगीत के कदरदान या श्रोता रहें और सिर्फ एम. एस. सुब्बलक्ष्मी, बिस्मिल्लाह खान, बाख, बीथोवेन या मोज़ार्ट को ही सुनें। आप जैज़, कव्वाली, सुगम और फिल्मी संगीत को भी सुनने का आनंद ले सकते हैं, जैसा कि कई लोग करते हैं। वे भी सप्तक या कुछ सुरों और ताल-संगत के साथ निबद्ध किए गए होते हैं। समूचे देश, यहां तक कि समूची दुनिया में लोग लोकसंगीत को चाव से सुनते हैं। हाल ही में साइंटिफिक अमेरिकन में एलिसन पार्शल की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसमें बताया गया है कि दुनिया के अलग-अलग इलाकों में  लोकगीत लगभग एक समान हैं और इनके लहजे और तान के कारण लोग इन्हें सुनने का आनंद लेते हैं।

संगीत के लाभ

जब आप संगीत सुनते हैं, तो आपका स्वास्थ्य सुधरता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि संगीत प्रार्थना/भजन है, गायन है या वादन, शास्त्रीय है या पारंपरिक, लोकप्रिय है या फिल्मी गीत है। जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी की वेबसाइट कहती है कि अगर आप अपने दिमाग को जवां रखना चाहते हैं, तो गाएं-बजाएं या संगीत सुनें। गाना या बजाना सीखने से एकाग्रता, याददाश्त, मूड और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। यह बात स्कूल और कॉलेज जाने वालों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कहते हैं, संगीत सीखना या सुनना बुज़ुर्गों को वृद्धावस्था से जुड़ी समस्याओं से बचने में भी मदद करता है।

भारत में कई संगीत अकादमियां हैं, जो समय-समय पर संगीत उत्सव आयोजित करती हैं। यहां हम स्थापित संगीतकारों और युवा कलाकारों को कर्नाटक, हिंदुस्तानी और पश्चिमी शैलियों में गाते-बजाते सुन सकते हैं। तो इन उत्सवों में जाएं और संगीत का आनंद उठाएं! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ओज़ोन-अनुकूल शीतलक इतने भी सुरक्षित नहीं

र्यावरण अनुकूल रेफ्रिजरेंट की खोज में हाइड्रोफ्लोरोओलीफिन्स (एचएफओ) एक बेहतरीन विकल्प माना जाता है। इसे ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने तथा ओज़ोन परत ह्रास के समाधान के रूप में भी काफी प्रोत्साहन मिला था। लेकिन अब, अध्ययनों में इस विकल्प के कुछ चिंताजनक पहलू सामने आए हैं।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एचएफओ के कुछ प्रकारों को फ्लोरोफॉर्म गैस बनाने का दोषी पाया है। यह गैस ग्लोबल वार्मिंग के लिहाज़ से कार्बन डाईऑक्साइड से 14,800 गुना अधिक खतरनाक है। गौरतलब है कि एचएफओ को वायुमंडल में तेज़ी से नष्ट होने और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए बनाया गया था।

शोधकर्ताओं ने नियंत्रित वातावरण में पांच अलग-अलग एचएफओ का परीक्षण किया। चैम्बर में दो दिनों तक ओज़ोन से इनकी क्रिया कराने के बाद टीम ने परिणामी गैसों का विश्लेषण किया। मालूम हुआ कि ओज़ोन से क्रिया करके पांच में से तीन एचएफओ ने अल्प मात्रा में फ्लोरोफॉर्म बनाया था।

इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं ने एक वायुमंडलीय मॉडल निर्मित किया। संभवत: अधिकांश एचएफओ अणु ऑक्सीडेंट यौगिकों के साथ प्रतिक्रिया करके नष्ट हो जाएंगे। अलबत्ता, इनका कुछ हिस्सा ओज़ोन के साथ जुड़ जाता है (लगभग 0.13 से 2.96 प्रतिशत)जिसके अवांछित पर्यावरणीय परिणाम होंगे। इतनी कम अभिक्रिया का कारण यह है कि समताप मंडल में ओज़ोन की सांद्रता ही कम है।

यह शोध बताता है कि पर्यावरण में किसी भी पदार्थ को छोड़ने से पहले व्यापक आकलन की आवश्यकता है।

इसके अलावा, कुछ एचएफओ वातावरण में ट्राइफ्लोरोएसिटिक एसिड जैसे हानिकारक पदार्थों में परिवर्तित हो सकते हैं। इसके चलते जल प्रदूषण की चिंता पैदा होती है। वैसे भी आने वाले दशक में युरोपीय संघ ने अधिकांश एचएफओ को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना बनाई है। देखा जाए तो तकनीकी प्रगति और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच एक नाज़ुक संतुलन बनाने के लिए सावधानीपूर्वक जांच और सक्रिय उपायों की आवश्यकता होगी। ‘ओज़ोन-हितैषी’ रेफ्रिजरेंट की खोज नवाचार और पर्यावरणीय प्रबंधन के बीच पर्याप्त संतुलन की मांग करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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महामारियों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय संधि

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में एक संधि का मसौदा जारी किया है। इस संधि में ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि भविष्य में कोई महामारी सामने आए तो टीके, दवाइयां, निदान के परीक्षण वगैरह का पूरी दुनिया में समतामूलक वितरण संभव हो सके। उम्मीद की जा रही है कि अनुमोदन के बाद यह संधि कानूनी रूप से बंधनकारी होगी।

मसौदा देखने के बाद कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि मसौदा अत्यंत महत्वाकांक्षी है और यह कोविड-19 महामारी के दौरान देखे गए असंतुलन को संबोधित करता है। लेकिन विशेषज्ञों को चिंता इस बात की है कि जो देश इसका पालन नहीं करेंगे उन्हें कैसे बाध्य किया जाएगा और दंडित करने की व्यवस्था क्या होगी।

इतना तो सभी मानते हैं कि पिछली महामारी में कई तरह के असंतुलन देखे गए थे। उदाहरण के लिए, उच्च आमदनी वाले देशों में 73 प्रतिशत लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिली थी लेकिन निम्न आमदनी वाले देशों में मात्र 31 प्रतिशत लोगों को ही एक खुराक मिल पाई थी।

बहरहाल, अब इस मसौदे पर चर्चा शुरू होगी और जैसा कि होता आया है चर्चा के दौरान काफी वाद-विवाद चलेंगे, संशोधन होंगे। कोशिश यह है कि इस संधि को 2024 में पारित करके लागू कर दिया जाए।

मसौदे का प्रमुख सरोकार समता से है। संधि के अनुच्छेदों में व्यवस्था है कि औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले घटकों की आपूर्ति और वितरण के लिए एक वैश्विक नेटवर्क स्थापित किया जाए। साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि टीकों व औषधियों के विकास व अनुसंधान को सुदृढ़ किया जाए और जानकारी को पूरी दुनिया के साथ खुले रूप से साझा किया जाए।

मसौदे में सभी पक्षों से आव्हान है कि वे महामारी के दौरान बौद्धिक संपदा को कुछ समय के लिए मुक्त रखें ताकि टीकों, चिकित्सा उपकरणों, मास्कों, निदान परीक्षणों और दवाइयों का त्वरित उत्पादन हो सके। यदि अगली महामारी से पहले इन शर्तों पर स्वीकृति हो जाती है तो हम कोविड-19 महामारी के दौरान देखी गई कई दिक्कतों से बच सकेंगे। 2020 में दक्षिण अफ्रीका और भारत ने सुझाव दिया था कुछ समय के लिए टीकों, दवाइयों और नैदानिक परीक्षणों से सम्बंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों को मुल्तवी रखा जाए, लेकिन इस प्रस्ताव को विश्व व्यापार संगठन ने निरस्त कर दिया था हालांकि 60 देशों ने इसका समर्थन किया था।

संधि में रोगजनकों और जीनोम्स सम्बंधी जानकारी साझा करने पर भी काफी ज़ोर दिया गया है। इस संदर्भ में कम आमदनी वाले देश चाहते हैं कि इस तरह की जीव वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर विकसित उत्पाद उन्हें किफायती दामों पर मिलें। संधि में प्रस्ताव है कि सारे हस्ताक्षरकर्ता पक्ष अपने पास उपलब्ध रोगजनक विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रयोगशाला को उनकी खोज के चंद घंटों के अंदर उपलब्ध कराएंगे। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि जीनोम सम्बंधी जानकारी को सार्वजनिक स्थल पर अपलोड कर दिया जाएगा। दूसरी ओर, देश उनके द्वारा उत्पादित 20 प्रतिशत टीके, नैदानिक परीक्षण और दवाइयां विश्व स्वास्थ्य संगठन को मुहैया करवाएंगे – आधे दान के रूप में और आधे किफायती दामों पर।

संधि के मसौदे की एक शर्त यह है कि सारे पक्षों को अपने सालाना स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा महामारी की रोकथाम व निपटान के लिए आवंटित करना होगा। इसके अलावा एक निश्चित राशि विकासशील देशों को महामारी की तैयारी में मदद देने के लिए भी रखना होगी।

अलबत्ता, विशेषज्ञों को लगता है कि यदि देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं, तो इसे लागू करवाने की व्यवस्था इस मसौदे में काफी कमज़ोर है। जैसे कानूनी रूप से बंधनकारी संधि में ‘करेंगे’ की बजाय ‘प्रोत्साहित’ किया जाएगा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। यानी पूरा मामला अभी भी स्वैच्छिक अनुपालन पर टिका है। उम्मीद है कि वार्ताओं में मसले को सुलझा लिया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनों की कटाई के दुष्प्रभाव – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1990 के बाद से सदी के अंत तक, 11 अरब मनुष्यों का पेट भरने की खातिर 42 करोड़ हैक्टर वन अन्य भूमि उपयोगों (जैसे कृषि, औद्योगिक और जैव ईंधन वगैरह) में तबदील करके गंवा दिए गए हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत, चीन और अफ्रीका जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों पर होगा।

बढ़ते तापमान के कारण

खाद्य व कृषि संगठन द्वारा प्रकाशित वैश्विक वन संसाधन आकलन बताता है कि पृथ्वी पर 31 प्रतिशत भूमि वन से ढंकी है। जब पेड़ काटे जाते हैं तो वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड जमा होने लगती है, नतीजतन वैश्विक तापमान बढ़ता है।

वनों की कटाई के कारण ग्रीनहाउस गैसों (CO2, CH4, N2O, SO2 व CFCs) का वैश्विक उत्सर्जन 11 प्रतिशत बढ़ा है।

इस संदर्भ में हारवर्ड युनिवर्सिटी पब्लिक हेल्थ ग्रुप आगे बताता है कि वनों की कटाई के कारण डेंगू-मलेरिया जैसे रोगों के लिए ज़िम्मेदार कीटाणु बढ़ते हैं, जो मनुष्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

एनवॉयरमेंटल सोसाइटी ऑफ इंडिया के डॉ. एस. बी. कद्रेकर बताते हैं कि सिर्फ पेड़ ही नहीं बल्कि मिट्टी और पानी को भी बचाना होगा। वनों की कटाई में एक प्रतिशत की वृद्धि होने से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में 0.93 प्रतिशत की कमी आती है, जो पेयजल के लिए कुओं और छोटे नदी-नालों पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वाष्पोत्सर्जन से पेड़ वायुमंडल में पानी छोड़ते हैं, जो वर्षा के रूप में वापस ज़मीन पर गिरता है। इस तरह, वनों की कटाई के कारण दोहरी मार पड़ती है। पृथ्वी का लगभग 31 प्रतिशत थल क्षेत्र (3.9 अरब हैक्टर) वन से ढंका है। लेकिन कई देशों में खाद्य आपूर्ति, विकास और प्रौद्योगिकी के नाम पर वनों की अत्यधिक कटाई होती है।

भारत में स्थिति

भारत में कुल वनाच्छादन लगभग 8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 22 प्रतिशत है। इनमें से अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का 87 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है।

डॉ. पंकज सक्सेरिया बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने लकड़ी निर्यात करने के लिए वहां एक बंदरगाह स्थापित किया था। वर्तमान सरकार की नज़र इन द्वीपों पर अपनी नौसेना का विस्तार करने के लिए और लोगों को यहां न सिर्फ सैर-सपाटा करने बल्कि बसने के लिए आकर्षित के लिए है। इसलिए इन द्वीपों को बचाने के लिए काफी कुछ करने की ज़रूरत है।

जम्मू और काश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में क्रमशः 21,000, 24,000 और 16,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। भारत सरकार ने इन क्षेत्रों में अंडरपास और ओवरपास राजमार्ग बनाने के लिए वनों का काफी बड़ा हिस्सा काट दिया है।

इसी तरह, गोवा में लगभग 2219 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। यहां की सरकार मुंबई और गोवा को फोर-लेन राजमार्ग से जोड़ने के लिए यहां अनगिनत पेड़ काट रही है। स्थानीय अधिकारियों द्वारा लगभग 31,000 पेड़ काटे जा चुके हैं।

इसी तरह, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) NH163 पर 45 किलोमीटर लंबी टू-लेन को फोर-लेन करने के लिए तैयार है। ऐसा करने के लिए वे तेलंगाना के चेवेल्ला मंडल में 9000 बरगद के पेड़ों को काटने के लिए तैयार हैं।

ये विशाल बरगद के पेड़ सदियों पुराने हैं, जिन्हें निज़ाम और अन्य वन-प्रेमी समूहों ने लगाया था।

निष्कर्षत:, ये वनों की कटाई के कुछ बुरे प्रभाव हैं और हमें इसका विरोध करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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दुनिया की सबसे प्राचीन अंग-विच्छेद सर्जरी

पूर्वी बोर्नियो के घने जंगल में स्थित लियांग टेबो नामक गुफा की खुदाई में मिले लगभग 31,000 साल पुराने कंकाल ने शोधकर्ताओं को थोड़ा हैरत में डाल दिया था। हैरानी की वजह थी कि यह पूरा का पूरा कंकाल साबु  त था लेकिन इसका सिर्फ बाएं पैर का निचला हिस्सा गायब था। पड़ताल करने पर शोधकर्ताओं ने इसे शल्य क्रिया द्वारा किया गया अंग-विच्छेद पाया। यह 31,000 साल पहले तब किया गया था जब आधुनिक समय के समान शल्य चिकित्सा उपकरण, एंटीबायोटिक या दर्द निवारक दवाएं नहीं थीं। इससे पता चलता है कि उस समय के दक्षिण पूर्वी एशिया में रहने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता चिकित्सा विशेषज्ञता के तो धनी थे ही उनमें अपने साथियों के प्रति हमदर्दी भी हुआ करती थी।

ईस्ट कालीमंतन कल्चरल हेरिटेज प्रिज़र्वेशन सेंटर की पुरातत्वविद एंडिका आरिफ द्राजत प्रियत्नो और उनके साथियों ने 2020 में गुफा के फर्श की खुदाई करना शुरू किया तो उन्हें एक मानव कंकाल मिला। इसे पारंपरिक रीति से दफन किया गया था जिसमें दाएं घुटने को मोड़कर सीने से सटा दिया जाता है और बाईं टांग को सीधा रखा जाता है। उसके सिर और हाथ के ऊपर पत्थर इस तरह रखे थे जैसे कि वे कब्र की निशानी हों। कंकाल का लिंग तो निर्धारित नहीं किया जा सका लेकिन जिस समय उसकी मृत्यु हुई थी उस समय उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष रही होगी। उसके सिर के पास थोड़ी-सी गेरू मिट्टी भी दफन थी। इससे लगता है कि गुफा की दीवारों पर बने भित्ति चित्र उसी कबीले के लोगों ने बनाए होंगे।

कंकाल को पूरी तरह निकालने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि कंकाल में सिर्फ बाएं पैर की पिंडली से नीचे का हिस्सा गायब था, लेकिन बाकी कंकाल साबुत था। पिंडली में दो हड्डियां होती हैं और उस कंकाल में ये दोनों नीचे की ओर जुड़ी हुई थीं। और टांग सपाट तरीके से कटी हुई थी। ऐसा नहीं लगता था कि वह हिस्सा कुचला गया था या चकनाचूर हो गया था – अर्थात पैर का वह हिस्सा कोई चट्टान गिरने या किसी जानवर के काटने से नहीं कटा था बल्कि किसी धारदार औज़ार से सफाई से काटा गया था। दूसरे शब्दों में इस हिस्से की सर्जरी की गई थी।

कब्र के ठीक ऊपर और नीचे की तलछट परतों में चारकोल की रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि यह कब्र लगभग 31,000 साल पुरानी है। एक अन्य तकनीक – इलेक्ट्रॉन स्पिन रेज़ोनेंस डेटिंग – से कंकाल का काल निर्धारण करने पर वह भी इतने ही पुराने होने की पुष्टि करता है।

इन साक्ष्यों के आधार पर नेचर में शोधकर्ता बताते हैं कि सफल अंग-विच्छेद का यह अब तक का सबसे प्राचीन मामला है। इसके पहले, वर्तमान फ्रांस में शल्य-क्रिया द्वारा अंग-विच्छेद (कंधे के नीचे की बांह काटने) का लगभग 7000 साल पूर्व का मामला मिला था।

शोधकर्ता यह तो ठीक-ठीक नहीं बता सके हैं कि वास्तव में अंग काटने की ज़रूरत क्यों पड़ी थी – किसी बीमारी या संक्रमण की वजह से या अचानक किसी तेज़ आघात की वजह से। लेकिन पिंडली की हड्डियों के जुड़े होने की दशा के आधार पर उनका कहना है कि शल्य-क्रिया के बाद वह मनुष्य 6 से 9 साल और जीवित रहा होगा/होगी। जिस क्षेत्र में यह कंकाल पाया गया है वह उष्णकटिबंधीय क्षेत्र है; घाव या चोट पर संक्रमण तेज़ी से फैलता है, बिना एंटीसेप्टिक के उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। शोधकर्ताओं का कहना है ऐसे वातावरण में सफल शल्य क्रिया का मतलब है कि उन लोगों के पास शल्य-क्रिया और उसके उपरांत आने वाली समस्याओं से निपटने का ज्ञान था। और, बोर्नियो की समृद्ध जैव विविधता में चिकित्सकीय गुणों वाली वनस्पतियां भरपूर हैं। वे लोग इस क्षेत्र में हजारों सालों से रहते आए थे, तो संभावना है कि वे स्थानीय पौधों के औषधीय गुणों से परिचित रहे होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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