लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (atomic clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…
हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…
यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।
1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल (timekeepers) ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।
दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।
अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (neagtive leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)
नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?
नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।
इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।
1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा
इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।
2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार
अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।
3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध
रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।
2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।
4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें
चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।
5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है
यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।
6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल
भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।
7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग
तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।
8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध
घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।
9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों
शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।
10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत
मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।
चलते–चलते
विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।
इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।
अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)
लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (nuclear clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…
हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (Leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…
यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।
1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।
दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल (global timekeepers) जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।
अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (negative leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)
यह तो देखा गया है कि जब अंतरिक्ष यात्री लंबी अंतरिक्ष यात्रा (space travel) के बाद धरती पर लौटते हैं तो उनके शरीर में कमज़ोरी के लक्षण दिखाई देते हैं। अब शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि इसकी वजह यह है कि अंतरिक्ष के कम गुरुत्वाकर्षण (gravity) के असर से माइटोकॉण्ड्रिया के कामकाज में क्षीणता आती है। माइटोकॉण्ड्रिया समस्त जीवों की कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जो उन्हें ऊर्जा मुहैया कराता है। वैसे यह बात तो पूर्व में अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में भेजे गए कई चूहों और कोशिकाओं के अध्ययन से पता थी कि अल्प गुरुत्व की परिस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इस क्षति की क्रियाविधि क्या है। अब जापान के नेशनल साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (राइकेन) के आणविक जीव वैज्ञानिक शिनतारो इवासाकी की टीम ने इसका और बारीकी से अध्ययन किया है। इसमें उन्होंने राइबोसोम पर ध्यान दिया।
कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण तीन चरणों में होता है। सबसे पहले आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) के आधार पर एक अन्य अणु आरएनए बनाया जाता है। आरएनए कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम (ribosome) से जुड़ जाता है। फिर राइबोसोम से आरएनए के खंड कोशिका द्रव्य में से उपयुक्त अमीनो अम्लों को लाकर राइबोसोम पर सही क्रम में जमाते हैं और इन अमीनो अम्लों को जोड़कर प्रोटीन बनता है। इवासाकी देखना चाहते थे कि कम या शून्य गुरुत्व (zero gravity) का राइबोसोम के कामकाज पर क्या असर होता है।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर कुछ कोशिकाएं 24 या 48 घंटों तक संवर्धित कीं और उन्हें फ्रीज़ कर दिया। साथ ही साथ, कुछ कोशिकाओं को सेंट्रीफ्यूज में रखकर संवर्धित किया। सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) लगभग धरती जैसी गुरुत्व परिस्थिति बनाता है।
जब सारे नमूनों का धरती पर लाकर विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन कोशिकाओं को अल्प-गुरुत्व में रखा गया था उनमें सेंट्रीफ्यूज में रखी कोशिकाओं की अपेक्षा माइटोकॉण्ड्रियल एम-आरएनए (mitochondrial m-RNA) कण कम थे और उनके माइटोकॉण्ड्रिया के राइबोसोम ने कम प्रोटीन बनाए थे।
इसी प्रकार के असर एक कृमि सी. एलेगेन्स पर देखे गए। ऐसे कुछ कृमियों को अंतरिक्ष स्टेशन के अल्प गुरुत्व में चार दिन रखा गया था जबकि कुछ को सेंट्रीफ्यूज में पाला गया था।
इवासाकी की टीम ने ऐसे ही कुछ प्रयोग धरती की एक प्रयोगशाला में किए थे। इसके लिए उन्होंने क्लिनोस्टेट नाम के उपकरण का इस्तेमाल किया था, जो अल्प-गुरुत्व की परिस्थिति पैदा करता है। जब मानव कोशिकाओं को 24 घंटे क्लिनोस्टेट (clinostat) में रखा गया तो उनमें 13 प्रोटीन का उत्पादन कम हुआ। 48 घंटे और 72 घंटे रखने पर तो माइटोकॉण्ड्रियल प्रोटीन्स का उत्पादन और भी कम हुआ।
इस असर की एक क्रियाविधि भी सुझाई गई है कि गुरुत्वाकर्षण के चलते कोशिकाएं के आपस में चिपकने के ज़रिए माइटोकॉण्ड्रिया पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण शून्य कर दिया जाए, तो यह असर भी क्षीण हो जाता है और प्रोटीन (protein) उत्पादन कम हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)
मनुष्यों ने सदियों से आकाश की ओर देखकर ब्रह्माण्ड (universe) के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। दूरबीनों के आविष्कार से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष वेधशालाओं (Modern Space Laboratories) तक विज्ञान ने हमें ब्रह्माण्ड की अद्भुत झलक दिखाई है। इसी क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन खगोल विज्ञान के इतिहास में एक मील का पत्थर बनने जा रही है। यह अत्याधुनिक अंतरिक्ष दूरबीन ब्रह्माण्ड के विस्तार, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी और हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित ग्रहों (एक्सोप्लैनेट) के बारे में नई जानकारियां प्रदान करेगी।
इस दूरबीन का नाम प्रसिद्ध अमेरिकी खगोलविद नैन्सी ग्रेस रोमन (Nncy grace roman) के सम्मान में रखा गया है। नैन्सी ग्रेस रोमन को आधुनिक अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की अग्रदूत माना जाता है। उन्हें अक्सर हबल स्पेस टेलीस्कोप की जननी (Mother of Hubble) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हबल मिशन की अवधारणा और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन का प्राथमिक दर्पण (प्राइमरी मिरर) 2.4 मीटर व्यास का है, जो हबल अंतरिक्ष दूरबीन के दर्पण के बराबर है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत विशाल दृष्टि क्षेत्र (फील्ड ऑफ व्यू) है, और यह हबल की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक क्षेत्र को एक साथ देख सकती है।
प्रमुख उपकरण
यह दूरबीन 21वीं सदी की सबसे उन्नत अंतरिक्ष वेधशालाओं में से एक है। इसमें मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए हैं – वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट (WFI) तथा कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (CGI)।
1. वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट: इस दूरबीन का मुख्य वैज्ञानिक उपकरण है। यह एक अत्याधुनिक निकट-अवरक्त (नीयर इन्फ्रारेड) कैमरा और स्पेक्ट्रोस्कोपिक प्रणाली (Spectroscopic system) है, जो 0.5 से 2.3 माइक्रॉन तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का अध्ययन करती है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं:
300 मेगापिक्सेल का कैमरा
0.281 वर्ग डिग्री का विशाल दृष्टि क्षेत्र
इमेजिंग तथा स्लिटलेस स्पेक्ट्रोस्कोपी, दोनों की सुविधा
अत्यंत संवेदनशील अवरक्त डिटेक्टर
विशाल खगोलीय सर्वेक्षणों के लिए उपयुक्त
डब्ल्यूएफआई के मुख्य उप घटक
(क) फोकल प्लेन ऐरे: यह डब्ल्यूएफआई का ‘हृदय’ (Heart of WFI) है। इसमें 18 उन्नत H4RG-10 डिटेक्टर लगे हैं। प्रत्येक डिटेक्टर से कुल मिलाकर लगभग 300 मेगापिक्सेल का चित्रण संभव होता है।
(ख) इमेजिंग फिल्टर प्रणाली: डब्ल्यूएफआई में 8 वैज्ञानिक फिल्टर लगाए गए हैं। इन फिल्टरों की सहायता से वैज्ञानिक विभिन्न तरंगदैर्घ्यों 9wavelength) पर निहारिकाओं, तारों और निहारिकाओं का अध्ययन कर सकेंगे।
(ग) ग्रिज़्म: ग्रिज़्म, दरअसल ग्रेटिंग और प्रिज़्म का संयुक्त रूप है। इसका काम प्रकाश को विभिन्न रंगों (वर्णक्रम) में विभाजित करना, निहारिकाओं की दूरी और गति मापना और ब्रह्माण्ड के विस्तार (Universal expansion) की दर निर्धारित करना है।
(घ) लो-रिज़ोल्यूशन प्रिज़्म: इसका उपयोग मंद एवं अत्यधिक दूरस्थ निहारिकाओं का अध्ययन, प्रारंभिक ब्रह्माण्ड के अवलोकन और डार्क एनर्जी सर्वेक्षणों (Drak energy survey) में सहायता करना है।
2. कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट: यह एक तकनीकी प्रदर्शन उपकरण है जिसे तारों के प्रकाश को अवरुद्ध करने और दूरस्थ एक्सोप्लैनेट (Exoplanet) की सीधी छवि प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
सामान्यत: कोई ग्रह अपने तारे की तुलना में अरबों गुना कम चमकदार होता है। इसलिए ग्रह सीधे दिखाई नहीं देते। सीजीआई विशेष तकनीकों की सहायता से तारे के प्रकाश को दबाकर ग्रहों को देखने योग्य बनाता है।
कोरोनाग्राफ की प्रमुख तकनीकें
(क) कोरोनाग्राफ मास्क: विशेष रूप से निर्मित सूक्ष्म ऑप्टिकल मास्क (optical mask) तारे के प्रकाश को अवरुद्ध करते हैं। इसका लाभ ग्रहों को सीधे देखने में सहायता, तारकीय प्रकाश के प्रभाव को कम करना और ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन करना है।
(ख) डिफॉर्मेबल मिरर: ये ऐसे दर्पण हैं जिनका आकार अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर बदला जा सकता है। इनका कार्य प्रकाशीय विकृतियों को दूर करना, चित्रों की स्पष्टता बढ़ाना और ग्रहों की पहचान को सटीक बनाना है।
(ग) वेवफ्रंट सेंसिंग एवं नियंत्रण प्रणाली: इसका कार्य प्रकाशीय त्रुटियों का पता लगाना, स्वतः सुधार करना और उच्च कंट्रास्ट वाली छवियां प्राप्त करना है।
(घ) इलेक्ट्रॉन मल्टीप्लाइंग सीसीडी डिटेक्टर: ये अत्यंत संवेदनशील डिटेक्टर होते हैं। ये बहुत कम प्रकाश को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं।
मानवता के लिए महत्व
1. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विकास को समझने में मदद: एक बड़ा प्रश्न रहा है – ‘ब्रह्माण्ड कैसे बना और यह कैसे विकसित हो रहा है।’ रोमन अंतरिक्ष दूरबीन (Roman space telescope) अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके ब्रह्माण्ड का एक विशाल त्रि-आयामी मानचित्र (3-D structure) तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि बिग बैंग (Big bang) के बाद ब्रह्माण्ड कैसे विकसित हुआ, निहारिकाएं कैसे बनीं और समय के साथ उनकी संरचना में क्या परिवर्तन हुए। इस प्रकार रोमन दूरबीन हमें अपने ब्रह्माण्डीय इतिहास को समझने में सहायता करेगी।
2. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर के रहस्य को समझना: वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ब्रह्माण्ड का लगभग 68 प्रतिशत भाग डार्क एनर्जी से बना है। यह एक रहस्यमयी शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के विस्तार को लगातार तेज़ कर रही है। आज तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते कि डार्क एनर्जी वास्तव में क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? यह भविष्य में ब्रह्माण्ड को किस दिशा में ले जाएगी? रोमन अंतरिक्ष दूरबीन लाखों सुपरनोवा 9supernova) तथा अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके डार्क एनर्जी के व्यवहार को समझने में सहायता करेगी। यदि डार्क एनर्जी का रहस्य सुलझ जाता है, तो यह आधुनिक भौतिकी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक होगा।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्रह्माण्ड का लगभग 27 प्रतिशत भाग डार्क मैटर से बना है, लेकिन इसे प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं देखा गया है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन गुरुत्वीय लेंसिंग तकनीक (gravitational lensing technique) का उपयोग करके डार्क मैटर के वितरण का मानचित्र तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक समझ सकेंगे कि डार्क मैटर कहां स्थित है। यह निहारिकाओं को कैसे प्रभावित करता है और ब्रह्माण्ड की संरचना में इसकी क्या भूमिका है। यह अध्ययन आधुनिक खगोल विज्ञान और कण भौतिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
3. पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज: क्या ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के अतिरिक्त कहीं और जीवन मौजूद है? यह प्रश्न सदियों से मानव जिज्ञासा का विषय रहा है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन हज़ारों नए एक्सोप्लैनेट्स की खोज करेगी। इनमें से कुछ ग्रह अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में हो सकते हैं, जहां तरल जल की उपस्थिति संभव है।
इन खोजों से पृथ्वी जैसे ग्रहों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकेगा, जीवन की संभावनाओं (life expectency) का अध्ययन होगा, भविष्य के अंतरतारकीय अभियानों (interstellar mission) की दिशा तय होगी। यदि किसी ग्रह पर जीवन के संकेत मिलते हैं, तो यह मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक होगी।
4. मानव ज्ञान की सीमाओं का विस्तार: इतिहास बताता है कि प्रत्येक बड़ी वैज्ञानिक खोज ने मानव सोच को बदल दिया है। कॉपरनिकस ने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं है। गैलीलियो ने दूरबीन से आकाश का अध्ययन किया। हबल ने दिखाया था कि हमारी आकाशगंगा (galaxy) अकेली निहारिका नहीं है। जेम्स वेब दूरबीन ने प्रारंभिक ब्रह्माण्ड की झलक दिखाई थी।
उसी प्रकार रोमन अंतरिक्ष दूरबीन मानव ज्ञान की सीमाओं को और आगे बढ़ाएगी। यह हमें उन प्रश्नों के उत्तर खोजने में मदद करेगी जिनके बारे में आज केवल अनुमान लगाए जाते हैं।
5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को गति: अंतरिक्ष मिशनों के लिए विकसित तकनीकें अक्सर पृथ्वी पर भी उपयोगी सिद्ध होती हैं। भविष्य में इन तकनीकों का उपयोग चिकित्सा, दूरसंचार, रक्षा, मौसम विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान में किया जा सकता है। इस प्रकार यह मिशन अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन की गुणवत्ता (quality of life) को भी बेहतर बनाएगा।
6. अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों को प्रेरणा: बड़े वैज्ञानिक मिशन केवल अनुसंधान ही नहीं करते, बल्कि नई पीढ़ी को प्रेरित भी करते हैं। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति रुचि अवश्य बढ़ाएगी।
7. अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा: आधुनिक अंतरिक्ष अनुसंधान किसी एक देश का कार्य नहीं है। रोमन मिशन में कई देशों के वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं। लिहाज़ा, यह मिशन वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग को मज़बूत करेगा, ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाएगा और मानवता को साझा वैज्ञानिक लक्ष्यों की ओर प्रेरित करेगा।
रोमन अंतरिक्ष दूरबीन में प्रयुक्त कई तकनीकें भविष्य के मिशनों के लिए परीक्षण मंच (टेक्नॉलोजी डिमांस्ट्रेशन) का कार्य करेंगी। विशेष रूप से इसका कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (coronagraph instrument) भविष्य में ऐसी दूरबीनों के निर्माण का आधार बनेगा जो पृथ्वी जैसे बाह्यग्रहों की प्रत्यक्ष तस्वीरें ले सकें। इस प्रकार रोमन मिशन आने वाले दशकों के अंतरिक्ष अनुसंधान की नींव रखेगा।
अतः रोमन अंतरिक्ष दूरबीन केवल एक दूरबीन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, विकास और भविष्य को समझने का एक शक्तिशाली साधन भी है। (स्रोत फीचर्स)
खगोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट (बाह्यग्रहोंं) पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष प्रमाण देखे हैं। यह एक महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को उनके तारे के हानिकारक विकिरण से सुरक्षित रखते हैं, जिससे उन पर जीवन की संभावना बढ़ जाती हैं।
एक्सोप्लैनेट वे ग्रह होते हैं जो हमारे सूर्य के अलावा किसी अन्य तारे की परिक्रमा करते हैं। इन दूरस्थ ग्रहों पर जीवन की खोज खगोल विज्ञान के सबसे रोमांचक क्षेत्रों में से एक है। पृथ्वी पर, हमारा चुंबकीय क्षेत्र (electromagnetic space) हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक सौर तूफानों और विकिरण से बचाता है, जिससे हमारे ग्रह पर जीवन संभव हो पाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी एक्सोप्लैनेट (exoplanet) पर एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति उस ग्रह को निवास योग्य बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं।
हमारे सौरमंडल (solar system) के अधिकांश ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित हैं। इस नई खोज में जिन सात एक्सोप्लैनेट का अध्ययन किया गया, वे अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रह हैं। पहले भी पृथ्वी के आकार के सात ग्रहों की खोज की गई है जो एक ही तारे की परिक्रमा कर रहे हैं, जिनमें से कुछ पर जीवन की संभावना जताई जा रही है। वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) जैसे पृथ्वी समान चट्टानी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना विशेष रूप से उत्साहजनक है।
इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने सात अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण किया है, जो इस प्रकार है:
1. खगोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर के सात ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष संकेत पाए हैं।
2. यह खोज जीवन की संभावनाओं की तलाश में महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को हानिकारक विकिरण से बचाते हैं।
3. इन ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण चिली और हवाई में स्थित दूरबीनों से प्राप्त डेटा का उपयोग करके किया गया।
4. कुछ शोधों में प्रॉक्सिमा (proxima) प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत भी मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी जैसे पड़ोसी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति का सुझाव देते हैं।
5. पृथ्वी के आकार के एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना भी जीवन की उपस्थिति का संकेत मानी जा रही है।
ऐसे ग्रह वैज्ञानिकों की विशेष रुचि के केंद्र हैं। इनमें से कुछ पृथ्वी जैसे आकार के हैं और अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में स्थित हैं। जूलिया वी. सीडेल और उनके सहयोगियों द्वारा की गई यह खोज 2 जून, 2026 को नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में “मैग्नेटिक फील्ड स्ट्रेंथ ऑफ हॉट जाएंट एक्सोप्लेनेट्स कंसिस्टेंट विद सोलर सिस्टम वैल्यू” शीर्षक से प्रकाशित हुई है।
हाल ही में खोजे गये सात दूरस्थ बाह्यग्रह:- ट्रापिस्ट-1ई TRAPPIST-1e ट्रापिस्ट-1एफ TRAPPIST-1f ट्रापिस्ट-1जी TRAPPIST-1 g प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी Proxima Centauri b केप्लर-186एफ Kepler-186f एलएचएस-1140 बी LHS 1140 b के2-18 बी K2-18b
चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता
1. हानिकारक विकिरण से सुरक्षा: तारे लगातार उच्च ऊर्जा वाले कण और विकिरण उत्सर्जित करते हैं। यदि किसी ग्रह के पास मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, तो ये कण सीधे उसके वायुमंडल और सतह तक पहुंच सकते हैं।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक ढाल (shield) की तरह कार्य करता है और अधिकांश सौर पवन (solar air) को मोड़ देता है।
2. वायुमंडल की रक्षा: चुंबकीय क्षेत्र ग्रह के वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन हो जाने से बचाता है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र बहुत कमज़ोर है। परिणामस्वरूप, सौर पवन ने धीरे-धीरे उसके अधिकांश वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन कर दिया। इसी कारण आज मंगल (mars) शुष्क और ठंडा दिखाई देता है।
3. तरल जल का संरक्षण: यदि वायुमंडल सुरक्षित रहेगा तो सतह पर तापमान नियंत्रित रहेगा और पानी लंबे समय तक तरल अवस्था में रह सकता है। जीवन के लिए यह एक महत्वपूर्ण शर्त मानी जाती है।
चुंबकीय क्षेत्र की खोज
एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्रों का पता लगाना एक जटिल कार्य है क्योंकि ये ग्रह बहुत दूर हैं और सीधे अवलोकन करना मुश्किल है। खगोलविद आमतौर पर अप्रत्यक्ष तरीकों पर निर्भर करते हैं।
1. रेडियो उत्सर्जन: जब किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने तारे से आने वाले आवेशित कणों (जैसे सौर पवन) के साथ अंतर्क्रिया करता है, तो इससे अक्सर रेडियो तरंगें (radio waves) उत्पन्न होती हैं। इन रेडियो तरंग संकेतों को पृथ्वी पर स्थित रेडियो दूरबीनों (radio telescopes) द्वारा पता लगाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, पृथ्वी के आकार के चट्टानी एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) से लगातार आने वाले रेडियो संकेतों का पता लगाया गया है। यह संकेत उस ग्रह पर एक चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का एक मज़बूत संकेतक माना जाता है।
2. वायुमंडलीय अवलोकन और क्षरण का विश्लेषण: किसी ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके वायुमंडल को तारे के हानिकारक विकिरण (radiations)और सौर पवन से बचाता है। यदि किसी ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर या अनुपस्थित है, तो उसका वायुमंडल समय के साथ क्षरित हो सकता है। खगोलविद एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल के संघटन और उसके क्षरण की दर का अध्ययन करके चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अनुमान लगा सकते हैं।
3. तारे और ग्रह के बीच चुंबकीय अंतःक्रिया: कुछ मामलों में, किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने मेज़बान तारे के चुंबकीय क्षेत्र के साथ अंतःक्रिया कर सकता है। यह अंतःक्रिया तारे की गतिविधि (जैसे सौर फ्लेयर्स या स्टारस्पॉट) में परिवर्तन ला सकती है, जिसे दूरबीनों द्वारा मापा जा सकता है। इस तरह की अंतःक्रियाओं का पता लगाना ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अप्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान कर सकता है।
उदाहरण के लिए, प्रॉक्सिमा बी (Proxima b) जैसे पड़ोसी एक्सोप्लैनेट के लिए प्रॉक्सिमा प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी पर एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की संभावना का संकेत देते हैं।
4. ध्रुवीकरण मापन: चुंबकीय क्षेत्र प्रकाश के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से, एक्सोप्लैनेट से परावर्तित या उत्सर्जित प्रकाश के ध्रुवीकरण का मापन उसके चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है। हालांकि, यह विधि अत्यधिक संवेदनशील और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।
चुंबकीय क्षेत्र और जीवन संभावना
किसी ग्रह पर जीवन को संभव बनाने के लिए चुंबकीय क्षेत्र एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच हो सकता है, लेकिन यह जीवन के अस्तित्व की गारंटी नहीं देता। जीवन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए कई भौतिक, रासायनिक और जैविक परिस्थितियों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है।
इसे एक घर के उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि चुंबकीय क्षेत्र घर की मज़बूत दीवार है, तो जीवन के लिए जल, वायुमंडल, तापमान और आवश्यक रासायनिक तत्व उस घर की नींव, छत और भोजन के समान हैं। केवल दीवार होने से घर रहने योग्य नहीं बन जाता। इसके लिए निम्नलिखित अन्य तत्व भी आवश्यक हैं:
1. तरल जल की उपलब्धता: वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल में हुई थी। पानी को ‘सार्वभौमिक विलायक’ (universal solvent) कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न रासायनिक पदार्थों को घोलकर जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं को संभव बनाता है। सजीव कोशिकाओं में होने वाली लगभग सभी प्रक्रियाएं पानी की उपस्थिति में ही संपन्न होती हैं।
यदि किसी ग्रह पर पानी पूरी तरह बर्फ बन जाए, या अत्यधिक गर्मी के कारण वाष्पित हो जाए, तो जीवन की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसी कारण वैज्ञानिक किसी ग्रह को रहने योग्य मानने से पहले यह देखते हैं कि वह अपने तारे के रहने योग्य क्षेत्र (हैबिटेबल ज़ोन) (habitable zone) में स्थित है या नहीं, जहां पानी तरल रूप में मौजूद रह सकता है।
2. स्थिर वायुमंडल: वायुमंडल किसी ग्रह के लिए सुरक्षा चादर की तरह कार्य करता है। इसके प्रमुख कार्य हैं-
– तापमान को नियंत्रित करना
– हानिकारक विकिरण रोकना
– पानी को संरक्षित रखना
– जीवन के लिए आवश्यक गैसें उपलब्ध कराना
पृथ्वी का वायुमंडल लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन से बना है। यही संतुलन जीवन को संभव बनाता है। यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना हो, तो दिन में भीषण गर्मी और रात में कड़ाके की ठंड हो सकती है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना है, जिसके कारण वहां जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पातीं।
3. उपयुक्त तापमान: जीवन के लिए तापमान का संतुलित होना आवश्यक है। अत्यधिक ठंड में पानी जम जाता है, रासायनिक अभिक्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं। अत्यधिक गर्मी में जैविक अणु टूट सकते हैं, पानी वाष्पित हो सकता है। पृथ्वी पर औसत तापमान जीवन के लिए अनुकूल है। इसके विपरीत शुक्र ग्रह का सतही तापमान लगभग 460 डिग्री सेल्सियस है। मंगल पर तापमान अक्सर शून्य से बहुत नीचे चला जाता है। दोनों जगह जीवन के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं।
4. आवश्यक रासायनिक तत्व: पृथ्वी पर ज्ञात सभी जीव मुख्य रूप से कुछ मूल तत्वों से बने हैं-
– कार्बन
– हाइड्रोजन
– ऑक्सीजन
– नाइट्रोजन
– फॉस्फोरस
– सल्फर
इन्हें कभी-कभी ‘सीएचएनओपीएस’ (CHNOPS) तत्व कहा जाता है। कार्बन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जटिल अणुओं और डीएनए (DNA) जैसी संरचनाओं का निर्माण कर सकता है। यदि किसी ग्रह पर ये तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं, तो जीवन के निर्माण की संभावना कम हो जाती है।
5. लंबे समय तक स्थिर पर्यावरण: जीवन को विकसित होने में लाखों या अरबों वर्ष लग सकते हैं। पृथ्वी पर जीवन लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया था; जटिल जीवों को विकसित होने में तो और भी अधिक समय लगा।
यदि किसी ग्रह पर बार-बार विनाशकारी विकिरण वर्षा, अत्यधिक ज्वालामुखीय गतिविधियां, लगातार उल्कापिंडों की बौछार, या तारे की अस्थिरता होती रहे, तो जीवन के विकास की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इसलिए केवल जीवन की उत्पत्ति ही नहीं, बल्कि उसका लंबे समय तक टिके रहना भी महत्वपूर्ण है।
चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन
क्या चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है? यह प्रश्न आधुनिक खगोलजीवविज्ञान (Astrobiology) के सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते थे कि जीवन के लिए एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र लगभग अपरिहार्य है। लेकिन हाल के दशकों में हुए अध्ययनों ने संकेत दिया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है, विशेषकर सूक्ष्मजीवी (microbial) जीवन। हालांकि, ऐसे वातावरण में जीवन का अस्तित्व और विकास अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
किसी ग्रह के पास चुंबकीय क्षेत्र न हो तो
1. सौर पवन (सोलर विंड) सीधे ग्रह के वायुमंडल से टकराएगी।
2. उच्च-ऊर्जा कण सतह तक पहुंचेंगे।
3. वायुमंडल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में उड़ सकता है।
4. डीएनए और अन्य जैविक अणुओं को विकिरण से क्षति पहुंच सकती है।
फिर भी कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन समस्याओं को कम कर सकती हैं। जैसे,
1. अत्यंत घने वायुमंडल की प्राकृतिक ढाल: यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत घना हो, तो वह स्वयं विकिरण से रक्षा कर सकता है। पृथ्वी पर भी हमारी सुरक्षा केवल चुंबकीय क्षेत्र से नहीं होती, बल्कि वायुमंडल भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, शुक्र के पास पृथ्वी जैसा मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी उसका वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में लगभग 90 गुना अधिक घना है। ऐसा घना वायुमंडल अधिकांश कॉस्मिक किरणों (cosmic rays) को रोक सकता है; तापमान को स्थिर रखने में मदद कर सकता है; और सतह पर विकिरण का प्रभाव कम कर सकता है। हालांकि शुक्र पर अत्यधिक तापमान जीवन के लिए बाधा है, लेकिन यह उदाहरण दिखाता है कि वायुमंडल कभी-कभी चुंबकीय क्षेत्र की कमी की आंशिक भरपाई कर सकता है।
2. भूमिगत जीवन (सबसर्फेस लाइफ): पृथ्वी पर अनेक जीव ऐसे स्थानों पर पाए गए हैं जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुंचता। वैज्ञानिकों ने गहरी खानों में, भूमिगत चट्टानों में, कई किलोमीटर नीचे स्थित जलाशयों में सूक्ष्मजीव खोजे हैं। ये जीव ऊर्जा प्राप्त करते हैं रासायनिक अभिक्रियाओं से, खनिजों से और भू-तापीय (जियोथर्मल) (geothermal) स्रोतों से। अर्थात यदि किसी ग्रह की सतह विकिरण के कारण रहने योग्य न हो, तो जीवन भूमिगत विकसित हो सकता है। कुछ मीटर से लेकर कुछ किलोमीटर मोटी चट्टानें विकिरण को प्रभावी ढंग से रोक सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की सतह के नीचे आज भी सूक्ष्मजीवी जीवन मौजूद हो सकता है।
3. बर्फ के नीचे महासागर: यह संभावना वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित करती है। हमारे सौरमंडल में ऐसे कई पिंड हैं जिनकी सतह बर्फ से ढंकी है लेकिन नीचे विशाल महासागर होने की संभावना है। उदाहरण के लिए, यूरोपा (Europa)और एंसेलेडस (Enceladus)। इन पिंडों पर कई किलोमीटर मोटी बर्फ मौजूद है लेकिन नीचे तरल जल के महासागर होने के प्रमाण मिले हैं। ज्वारीय बलों (टाइडल फोर्सेस) के कारण आंतरिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।
बर्फ की मोटी परत विकिरण से सुरक्षा देती है; तापमान को स्थिर रखती है; जल को तरल अवस्था में बनाए रख सकती है। यदि वहां जीवन है, तो उसे चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
4. समुद्र की गहराइयों में जीवन: पृथ्वी पर समुद्र की गहराइयों में स्थित हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास अद्भुत जीव समुदाय पाए गए हैं। इन स्थानों पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता। ऊर्जा का स्रोत रासायनिक पदार्थ होते हैं। जीव प्रकाश संश्लेषण नहीं बल्कि रासायनिक संश्लेषण (कीमोसिंथेसिस) (chemosynthesis)पर निर्भर रहते हैं। इस खोज ने वैज्ञानिकों की सोच बदल दी है। अब माना जाता है कि जीवन को हमेशा सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी दूरस्थ ग्रह या ग्रह के चंद्रमा पर भूमिगत समंदर और भू-तापीय ऊर्जा का स्रोत मौजूद है, तो वहां जीवन विकसित हो सकता है।
5. विकिरण–सहिष्णु जीव: पृथ्वी पर कुछ जीव अत्यधिक विकिरण भी सहन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए टार्डीग्रेड (जलीय भालू) और डाइनोकोकस रेडियोड्यूरैन्स (Deinococcus radiodurans) जैसे विकिरण-रोधी जीवाणु। ये जीव डीएनए क्षति की मरम्मत कर सकते हैं। अत्यधिक विकिरण में जीवित रह सकते हैं। कठोर वातावरण में भी टिके रह सकते हैं। इससे संकेत मिलता है कि कुछ प्रकार का जीवन हमारी अपेक्षा से अधिक कठोर परिस्थितियों को सहन कर सकता है।
भविष्य की खोजें
हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रत्यक्ष प्रमाण की खोज एक्सोप्लैनेट पर जीवन की खोज के लिए एक नया मानदंड स्थापित करती है। चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति उन ग्रहों की पहचान करने में मदद करेगी जो अधिक निवास योग्य हो सकते हैं। आधुनिक वेधशालाएं (radio observatory) और अंतरिक्ष दूरबीनें (जैसे जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन) तथा आगामी रेडियो वेधशाला परियोजनाएं एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडल और चुंबकीय क्षेत्रों का अधिक सटीक अध्ययन कर रही हैं। इनके प्रयासों से आने वाले वर्षों में यह संभव है कि वैज्ञानिक किसी ऐसे ग्रह की पहचान कर लें जहां पृथ्वी जैसी परिस्थितियां और जीवन के संकेत मौजूद हों।
अतः भविष्य के अध्ययनों में इन ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की शक्ति और स्थिरता को मापना महत्वपूर्ण होगा और यह समझने में मदद करेगा कि क्या जीवन के लिए आवश्यक स्थितियां हमारे सौरमंडल से परे भी मौजूद हैं। (स्रोत फीचर्स)
कहा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।
मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।
सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।
यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।
एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।
इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।
एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।
युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।
एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)
दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।
एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।
एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।
दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
आने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?
एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।
परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।
यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।
इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।
दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही मौसम की भविष्यवाणी।
इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।
ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।
एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया।
1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।
इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)
हाल ही में हुई एक खोज (historical discovery) से इस बात पर नई रोशनी पड़ी है कि गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei) एक वैज्ञानिक क्रांति के अगुआ कैसे बने। यह खोज एक इतिहासकार इवान मलारा ने फ्लोरेंस स्थित इटली की नेशनल सेंट्रल लायब्रेरी (National Central Library Florence) में की है। मलारा उस पुस्तकालय में दुनिया की सबसे प्राचीन खगोल शास्त्रीय पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे। यह पुस्तक थी क्लॉडियस टोलेमी द्वारा दूसरी शताब्दी में लिखी गई अल्माजेस्ट (Almagest)।
अल्माजेस्ट में भूकेंद्रित ब्रह्मांड (geocentric model) की दृष्टि पेश की गई थी और यह अगली कई सदियों तक इस विषय की मार्गदर्शक पुस्तक बनी रही थी। मलारा के हाथ में जो प्रति थी वह सोलहवीं सदी में छपी थी।
पन्ने पलटते-पलटते मलारा का ध्यान एक विचित्र बात पर गया। उसके एक लगभग खाली पन्ने पर बाइबल (Bible scripture) का एक सूक्त (Psalm 145) हाथ से लिखा गया था। और इसकी लिखावट बहुत जानी-पहचानी लग रही थी। उनको पूरा यकीन था कि यह मशहूर खगोल शास्त्री (astronomer) गैलीलियो की लिखावट है।
और पन्ने पलटते हुए मलारा को समझ में आया कि अल्माजेस्ट की उस प्रति पर हाशियों में गैलीलियो ने भरपूर टिप्पणियां (marginal notes) दर्ज की हैं। उन्होंने इस खोज का विवरण जर्नलफॉरदीहिस्ट्रीऑफएस्ट्रॉनॉमी (history of astronomy journal) में प्रकाशन के लिए प्रस्त्तुत किया है। यह पर्चा विज्ञान के इतिहास में एक निहायत (या शायद सबसे अहम) परिवर्तन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है।
मलारा का कहना है कि वैसे तो गैलीलियो की टिप्पणियों से सजी कोई भी पुस्तक दुर्लभ ही होगी लेकिन अल्माजेस्ट तो दुर्लभ में भी दुर्लभ है। आज के दौर में गैलीलियो के गुण गाए जाते हैं कि उन्होंने प्राचीन ज्ञान को खारिज करने में मदद की। अल्माजेस्ट 14 सदियों तक इस प्राचीन ज्ञान का साकार रूप थी। लेकिन अल्माजेस्ट का टीकायुक्त संस्करण (annotated version) एक ज़्यादा बारीक तस्वीर पेश करता है।
गैलीलियो की ये टिप्पणियां संभवत 1590 में अंकित की गई थीं – यानी उनके द्वारा चंद्रमा और बृहस्पति के दूरबीनी अवलोकनों (telescope observations) से लगभग दो दशक पूर्व। ये एक ऐसे व्यक्ति का परिचय देती हैं जो एक ओर तो टोलेमी का सम्मान करता था तथा दूसरी ओर उनकी रचना की चीरफाड़ भी कर रहा था। मलारा का तर्क है कि गैलीलियो टोलेमी के विचारों से अलग हट पाए क्योंकि वे पारंपरिक ब्रह्मांड (classical cosmology) की तस्वीर के तर्कों से भली-भांति परिचित थे और उनके विश्लेषण ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था सूर्य-केंद्रित प्रणाली (heliocentric model) स्वयं टोलेमी के गणितीय तर्क को ज़्यादा पूर्णता देगी।
आम तौर पर इतिहासकार गैलीलियो का चित्रण इस तरह करते हैं कि वे मूलत: दार्शनिक या शायद राजनैतिक कारणों (philosophical debate) से प्रेरित थे। लेकिन अल्माजेस्ट के पन्नों पर अंकित टिप्पणियों ने मलारा को आश्वस्त कर दिया कि गैलीलियो किसी सनक पर सवार होकर ब्रह्मांड के नए विचार तक नहीं पहुंचे थे, बल्कि पारंपरिक गणितीय खगोल शास्त्र (mathematical astronomy) पर महारत रखने और उसका गहन विश्लेषण करने के बाद पहुंचे थे।
इसके बाद तो मलारा ने ज़्यादा व्यवस्थित और विस्तृत छानबीन (archival research) शुरू कर दी। उन्होंने बरसों तक वे उद्धरण इकट्ठे किए जिनमें गैलीलियो टोलेमी की रचना की तकनीकी बारीकियां उभारते हैं और अपना तर्क विकसित करते हैं। इसी क्रम में उन्हें फ्लोरेंस में अल्माजेस्ट की टीकासहित प्रति (annotated manuscript) हाथ लगी।
जब उन्होंने इसके एक पन्ने पर सूक्त 145 मिला तो उनकी आंखों से नींद उड़ गई। दरअसल ये सूक्त ईश्वर की स्तुति (religious text) में लिखे गए हैं। उन्होंने तत्काल ईमेल से इसकी सूचना गैलीलियो के दो मुख्य अध्येताओं (Galileo scholars) को दी। और उन्होंने पुष्टि कर दी कि लिखावट सचमुच गैलीलियो की है। इसके लिए उन्होंने लिखावट विशेषज्ञ से सलाह ली थी।
मलारा के लिए यह अत्यंत रोमांच का क्षण था। पहली बात यह थी कि पहली बार उन्होंने अल्माजेस्ट की प्रति देखी थी जिसमें बाइबल के किसी सूक्त का ज़िक्र था और वह भी गैलीलियो की लिखावट में। यह साफ तौर पर गैलीलियो की उस रूढ़ छवि (scientist vs church debate) को चुनौती दे रहा था जिसमें उन्हें धार्मिक सत्ता को ललकारते ही बताया जाता है। फिर मलारा को गणितज्ञ अलेसांद्रो मार्चेटी द्वारा 1673 में लिखा गया एक पत्र (historical letter) याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि गैलीलियो जब भी अल्माजेस्ट लेकर बैठते तो वे प्रार्थना ज़रूर करते थे।
मलारा का कहना है कि हम जब गैलीलियो के बारे में सोचते हैं, तो जो एक तस्वीर सामने आती है वह होती है एक वैज्ञानिक सेलेब्रिटी (science icon) की जो चर्च और हज़ारों वर्षों के संचित ज्ञान दोनों का विरोध करता है। लेकिन यह विचार कभी नहीं आता कि इतिहास का सबसे मशहूर मूर्तिभंजक (paradigm shift thinker) कैसे इस क्रांतिकारी नज़रिए तक पहुंचा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th-thumbnailer.cdn-si-edu.com/mxCYS9gfdJHCvmaaWBSWUqtmQzM=/1026×684/filters:no_upscale():focal(960×640:961×641)/https://tf-cmsv2-smithsonianmag-media.s3.amazonaws.com/filer_public/07/1a/071af71a-3ebc-44dc-b4b9-f4ca3c6f6a7f/galileo.png