सुपर एल नीनो की संभावनाएं

हा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।

मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।

सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।

यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।

एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।

इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।

एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।

युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।

एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बाढ़ और सूखे का कारण है एल नीनो

दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।

एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।

एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में  बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।

दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एल नीनो

सुशील जोशी

ने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?

एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।

परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।

यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।

इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।

दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही  मौसम की भविष्यवाणी। 

इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।

ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।

एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया। 

1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।

इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)

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गैलीलियो की हस्तलिखित टिप्पणियों से एक विचार प्रक्रिया पर रोशनी

हाल ही में हुई एक खोज (historical discovery) से इस बात पर नई रोशनी पड़ी है कि गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei) एक वैज्ञानिक क्रांति के अगुआ कैसे बने। यह खोज एक इतिहासकार इवान मलारा ने फ्लोरेंस स्थित इटली की नेशनल सेंट्रल लायब्रेरी (National Central Library Florence) में की है। मलारा उस पुस्तकालय में दुनिया की सबसे प्राचीन खगोल शास्त्रीय पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे। यह पुस्तक थी क्लॉडियस टोलेमी द्वारा दूसरी शताब्दी में लिखी गई अल्माजेस्ट (Almagest)।

अल्माजेस्ट में भूकेंद्रित ब्रह्मांड (geocentric model) की दृष्टि पेश की गई थी और यह अगली कई सदियों तक इस विषय की मार्गदर्शक पुस्तक बनी रही थी। मलारा के हाथ में जो प्रति थी वह सोलहवीं सदी   में छपी थी।

पन्ने पलटते-पलटते मलारा का ध्यान एक विचित्र बात पर गया। उसके एक लगभग खाली पन्ने पर बाइबल (Bible scripture) का एक सूक्त (Psalm 145) हाथ से लिखा गया था। और इसकी लिखावट बहुत जानी-पहचानी लग रही थी। उनको पूरा यकीन था कि यह मशहूर खगोल शास्त्री (astronomer) गैलीलियो की       लिखावट है।

और पन्ने पलटते हुए मलारा को समझ में आया कि अल्माजेस्ट की उस प्रति पर हाशियों में गैलीलियो ने भरपूर टिप्पणियां (marginal notes) दर्ज की हैं। उन्होंने इस खोज का विवरण जर्नल फॉर दी हिस्ट्री ऑफ एस्ट्रॉनॉमी (history of astronomy journal) में प्रकाशन के लिए प्रस्त्तुत किया है। यह पर्चा विज्ञान के इतिहास में एक निहायत (या शायद सबसे अहम) परिवर्तन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है।

मलारा का कहना है कि वैसे तो गैलीलियो की टिप्पणियों से सजी कोई भी पुस्तक दुर्लभ ही होगी लेकिन अल्माजेस्ट तो दुर्लभ में भी दुर्लभ है। आज के दौर में गैलीलियो के गुण गाए जाते हैं कि उन्होंने प्राचीन ज्ञान को खारिज करने में मदद की। अल्माजेस्ट 14 सदियों तक इस प्राचीन ज्ञान का साकार रूप थी। लेकिन अल्माजेस्ट का टीकायुक्त संस्करण (annotated version) एक ज़्यादा बारीक तस्वीर पेश करता है।

गैलीलियो की ये टिप्पणियां संभवत 1590 में अंकित की गई थीं – यानी उनके द्वारा चंद्रमा और बृहस्पति के दूरबीनी अवलोकनों (telescope observations) से लगभग दो दशक पूर्व। ये एक ऐसे व्यक्ति का परिचय देती हैं जो एक ओर तो टोलेमी का सम्मान करता था तथा दूसरी ओर उनकी रचना की चीरफाड़ भी कर रहा था। मलारा का तर्क है कि गैलीलियो टोलेमी के विचारों से अलग हट पाए क्योंकि वे पारंपरिक ब्रह्मांड (classical cosmology) की तस्वीर के तर्कों से भली-भांति परिचित थे और उनके विश्लेषण ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था सूर्य-केंद्रित प्रणाली (heliocentric model) स्वयं टोलेमी के गणितीय तर्क को ज़्यादा पूर्णता देगी।

आम तौर पर इतिहासकार गैलीलियो का चित्रण इस तरह करते हैं कि वे मूलत: दार्शनिक या शायद राजनैतिक कारणों (philosophical debate) से प्रेरित थे। लेकिन अल्माजेस्ट के पन्नों पर अंकित टिप्पणियों ने मलारा को आश्वस्त कर दिया कि गैलीलियो किसी सनक पर सवार होकर ब्रह्मांड के नए विचार तक नहीं पहुंचे थे, बल्कि पारंपरिक गणितीय खगोल शास्त्र (mathematical astronomy) पर महारत रखने और उसका गहन विश्लेषण करने के बाद पहुंचे थे।

इसके बाद तो मलारा ने ज़्यादा व्यवस्थित और विस्तृत छानबीन (archival research) शुरू कर दी। उन्होंने बरसों तक वे उद्धरण इकट्ठे किए जिनमें गैलीलियो टोलेमी की रचना की तकनीकी बारीकियां उभारते हैं    और अपना तर्क विकसित करते हैं। इसी क्रम में उन्हें फ्लोरेंस में अल्माजेस्ट की टीकासहित प्रति (annotated manuscript) हाथ लगी।

जब उन्होंने इसके एक पन्ने पर सूक्त 145 मिला तो उनकी आंखों से नींद उड़ गई। दरअसल ये सूक्त ईश्वर की स्तुति (religious text) में लिखे गए हैं। उन्होंने तत्काल ईमेल से इसकी सूचना गैलीलियो के दो मुख्य अध्येताओं (Galileo scholars) को दी। और उन्होंने पुष्टि कर दी कि लिखावट सचमुच गैलीलियो की है। इसके लिए उन्होंने लिखावट विशेषज्ञ से सलाह ली थी।

मलारा के लिए यह अत्यंत रोमांच का क्षण था। पहली बात यह थी कि पहली बार उन्होंने अल्माजेस्ट की प्रति देखी थी जिसमें बाइबल के किसी सूक्त का ज़िक्र था और वह भी गैलीलियो की लिखावट में। यह साफ तौर पर गैलीलियो की उस रूढ़ छवि (scientist vs church debate) को चुनौती दे रहा था जिसमें उन्हें धार्मिक सत्ता को ललकारते ही बताया जाता है। फिर मलारा को गणितज्ञ अलेसांद्रो मार्चेटी द्वारा 1673 में लिखा गया एक पत्र (historical letter) याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि गैलीलियो जब भी अल्माजेस्ट लेकर बैठते तो वे प्रार्थना ज़रूर करते थे।

मलारा का कहना है कि हम जब गैलीलियो के बारे में सोचते हैं, तो जो एक तस्वीर सामने आती है वह होती है एक वैज्ञानिक सेलेब्रिटी (science icon) की जो चर्च और हज़ारों वर्षों के संचित ज्ञान दोनों का विरोध करता है। लेकिन यह विचार कभी नहीं आता कि इतिहास का सबसे मशहूर मूर्तिभंजक (paradigm shift thinker) कैसे इस क्रांतिकारी नज़रिए तक पहुंचा। (स्रोत फीचर्स)

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चांद पर आलू उगाने के प्रयास

चंद्रमा पर फसल उगाने (Moon farming) का विचार, जो पहले सिर्फ विज्ञान-कथाओं का विषय था, अब धीरे-धीरे सच के करीब आ रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि आलू, जो बहुत आसानी से अलग-अलग परिस्थितियों में उग सकता है, चंद्रमा पर भी उग सकता है लेकिन इसके लिए पृथ्वी से कुछ मदद ज़रूरी होगी। इससे यह विश्वास पैदा होता है कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री (space missions food) लंबे मिशनों के दौरान अपना भोजन खुद उगा सकेंगे।

वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की मिट्टी जैसी मिट्टी बनाई, जिसे रेगोलिथ (lunar regolith) कहा जाता है। असली चंद्रमा की मिट्टी में पौधों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व (soil nutrients) नहीं होते, इसलिए उसमें खेती करना बहुत कठिन है। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें थोड़ी मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए द्वारा बनाई खाद) मिलाई। उन्होंने पाया कि रेगोलिथ में सिर्फ 5 प्रतिशत खाद मिलाने से चंद्रमा सरीखे चुनौतीपूर्ण वातावरण में भी आलू उगने लगे।

इस प्रयोग में पाया गया कि आलू के पौधे लगभग दो महीने तक जीवित रह सकते हैं और उनमें कंद (खाने वाला हिस्सा) भी विकसित हो सकता है। यह अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए अच्छी खबर है, खासकर तब जब नासा जैसी एजेंसियां चंद्रमा (NASA moon base) पर स्थायी ठिकानों की योजना बना रही हैं। आलू को अंतरिक्ष खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह पोषण से भरपूर है और विभिन्न परिस्थितियों में आसानी से उगता है।

अलबत्ता, अध्ययन (research findings) में कुछ सीमाएं भी सामने आई हैं। चंद्रमा जैसी मिट्टी में उगाए गए आलुओं के डीएनए विश्लेषण से पता चला कि उनमें तनाव सम्बंधी जीन्स सक्रिय हुए थे। साथ ही इनमें तांबा और ज़िंक (heavy metals toxicity) जैसी धातुओं की मात्रा ज़्यादा पाई गई, जो मनुष्यों के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं। हालांकि, इन आलुओं का पोषण स्तर (nutritional value) पृथ्वी पर उगाए गए आलुओं के बराबर ही रहा, जो शोधकर्ताओं के लिए हैरानी की बात थी।

साथ ही, वैज्ञानिकों (space environment challenges) का कहना है कि यह प्रयोग चंद्रमा की असल कठिन परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं दर्शाता। प्रयोग में तीव्र विकिरण, तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव (extreme temperature) और वायुमंडल की लगभग अनुपस्थिति जैसी चीजें शामिल नहीं थीं। असल स्थितियों में खेती और मुश्किल होगी। फिर भी, यह शोध अंतरिक्ष में टिकाऊ जीवन (sustainable space living) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगे के प्रयोगों में अलग-अलग किस्म के आलुओं को परखा जाएगा, ताकि यह पता चल सके कि कौन-सी किस्म चंद्रमा की परिस्थितियों में बेहतर उग सकती है। वैज्ञानिक यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि भविष्य में पौधों में ऐसे बदलाव (genetic modification crops) किए जा सकेंगे, जिससे वे अंतरिक्ष में ज़्यादा अच्छी तरह जीवित रह सकें। (स्रोत फीचर्स)

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चंद्रमा के प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र का रहस्य

गभग पचास वर्ष पूर्व अपोलो मिशन (Apollo Moon mission) से लाई गई चंद्रमा की चट्टानों (Moon rocks samples) में मौजूद खनिज बताते हैं कि करीब 3.5 अरब साल पूर्व चंद्रमा पर बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र था, जो लाखों साल तक बना रहा। लेकिन इतनी ताकतवर चुंबकीय शक्ति के लिए चंद्रमा के भीतर पिघला और गतिशील कोर (molten lunar core) होना ज़रूरी है। वैज्ञानिकों का मानना था कि चांद का अपेक्षाकृत छोटी साइज़ का कोर जल्दी ठंडा हो गया होगा। लेकिन उसी समय की कुछ अन्य चट्टानें संकेत दे रही थीं कि चंद्रमा का चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर था। इन दोनों अवलोकनों के कारण रहस्य पैदा हुआ।

अब एक नए अध्ययन से राह खुली है। नेचर जियोसाइंस (Nature Geoscience journal) में प्रकाशित शोध के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि 4 अरब से 3.5 अरब साल पूर्व के दरम्यान बार-बार सीमित समय के लिए लेकिन बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनता था।

अपोलो मिशन द्वारा लाई गई कुछ ज्वालामुखीय चट्टानों (volcanic lunar rocks) की ध्यानपूर्वक जांच से पता चला कि उनमें कम टाइटेनियम वाली चट्टानों की तुलना में अधिक टाइटेनियम वाली चट्टानों में चुंबकीय शक्ति अधिक थी। यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों तरह की चट्टानें चुंबकीय जानकारी सहेजकर रखने में समान रूप से सक्षम थीं। यानी फर्क चट्टानों की चुंबकीय सूचना को सहेजने की क्षमता (magnetic record) में नहीं, बल्कि इस बात में था कि उनकी चुंबकीय क्षेत्र पैदा करने की क्षमता में अंतर था।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अरबों साल पहले चंद्रमा के अंदर, मेंटल (lunar mantle) की गहराई में मौजूद टाइटेनियम-समृद्ध चट्टानें (titanium rich rocks) समय-समय पर पिघलती थीं। जिसके लिए गर्मी कोर तथा आसपास के पदार्थ से मिलती था। इससे कुछ समय के लिए कोर में मंथन शुरू हो जाता और एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (planetary magnetic field) बन जाता था। जब यह पिघला हुआ मैग्मा सतह पर ठंडा होकर ठोस बन जाता, तो उस समय का चुंबकीय असर उसके भीतर दर्ज रह जाता था।

इस नए विचार के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार और लंबे समय तक बना रहने वाला चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि वहां बार-बार बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र थोड़े-थोड़े समय (5,000 साल से भी कम के समय) के लिए बनता था। शेष लंबे समय तक कमज़ोर चुंबकीय क्षेत्र (weak magnetic field) रहता था। यही वजह हो सकती है कि कुछ चट्टानों में शक्तिशाली चुंबकीय गुण (magnetic signatures) दिखता है, जबकि उसी समय की अन्य चट्टानों में नहीं।

यह अंतर शायद नमूने इकट्ठा करने की जगह (sample collection sites) के कारण हो सकता है। अपोलो मिशन ज़्यादातर ज्वालामुखीय मैदानों में उतरे थे, जहां बार-बार लावा बहा था। संभव है कि वहां ऐसी चट्टानें ज़्यादा मिली हों जो विस्फोटों के दौरान बनी थीं, जिससे ऐसा लगा कि चुंबकीय क्षेत्र लंबे समय तक लगातार शक्तिशाली था।

कुछ विशेषज्ञों का मत है कि यह नया विचार चंद्रमा के पूरे चुंबकीय इतिहास (lunar magnetic history) को नहीं समझा पाता। फिर भी यह जांच के लिए एक नई दिशा (future lunar research) ज़रूर देता है।

आगे की प्रगति नए मिशनों से लाए जाने वाले नमूनों (lunar sample return missions) की मदद से आगे बढ़ेगी, जैसे चीन के चंद्रमिशन (China Moon mission) के नमूनों के अध्ययन से। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उड़ान के लिए तैयार आर्टेमिस-2

डॉ. इरफान ह्यूमन

नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस-SLS) रॉकेट और ओरायन अंतरिक्ष यान 17 जनवरी, 2026 को आर्टेमिस-2 मिशन (Artemis 2 mission) के लिए लॉन्च पैड पर पहुंच गया है। हालांकि, इस मिशन के लॉन्च की तारीख अभी भी अनिश्चित है। यह रोलआउट आर्टेमिस-2 की अंतिम तैयारी का शुरुआती चरण है। यह पहला क्रूड एसएलएस/ओरायन मिशन है और दिसंबर 1972 के बाद पहली बार मनुष्य को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट – Low earth orbit) से आगे ले जाने वाली अंतरिक्ष उड़ान बनने को तैयार है। चार अंतरिक्ष यात्री, रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैंसेन, इस दस दिवसीय मिशन पर चंद्रमा के चारों ओर घूमेंगे।

पहले होंगे पूर्वाभ्यास

लॉन्च पैड पर पहुंचने के बाद, यात्री वाहन की तकनीकी जांच और परीक्षण किए जा रहे हैं, जिसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी इंटरफरेंस टेस्ट (radio frequency interference test) शामिल हैं, जो वीएबी के अंदर नहीं किए जा सकते। वीएबी यानी व्हीकल असेंबली बिल्डिंग (Vehicle Assembly Building) नासा का वह विशाल भवन है जहां रॉकेट और अंतरिक्ष यान असेंबल किए जाते हैं। आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्री पैड पर इमरजेंसी एस्केप प्रक्रियाओं का पूर्वाभ्यास भी करेंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होगा वेट ड्रेस रिहर्सल, जिसमें एसएलएस को लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन जैसे ईंधन से भरा जाएगा और एक प्रैक्टिस उल्टी गिनती की जाएगी, जो टी-माइनस 29 सेकंड पर रुक जाएगा। रिहर्सल में सब कुछ असली प्रक्षेपण जैसा ही होगा, लेकिन उड़ान नहीं होगी।

नासा ने 2022 में आर्टेमिस-1 (Artemis 1) के लॉन्च से पहले तीन वेट ड्रेस रिहर्सल (wet dress rehearsal) किए थे और हाइड्रोजन लीक (hydrogen leak) जैसी समस्याओं के कारण दो लॉन्च प्रयास रद्द कर दिए थे। आर्टेमिस-1 से मिले सबक आर्टेमिस-2 की सफलता की संभावना बढ़ाएंगे।

प्रक्षेपण तिथि

वेट ड्रेस रिहर्सल लॉन्च की तारीख तय करने में मुख्य कारक होगी। हालांकि नासा 6 से 11 फरवरी को लक्ष्य बना रहा है, लेकिन एजेंसी ने औपचारिक प्रक्षेपण तारीख घोषित नहीं की है। अगर प्रक्षेपण 11 फरवरी तक नहीं हुआ, तो अगला मौका मार्च की शुरुआत में ही बनेगा।

जटिल कारक

प्रक्षेपण में एक रोड़ा है नासा का क्रू-12 लॉन्च (Crew-12 mission), जो फिलहाल 15 फरवरी से पहले नहीं होगा। क्रू-11 की 15 जनवरी को स्टेशन से जल्द वापसी ने एजेंसी को तैयारी तेज़ करने को प्रेरित किया।

हालांकि नासा प्रशासक जेरेड इसाकमैन का कहना है कि आर्टेमिस-2 और क्रू-12 स्वतंत्र अभियान हैं, लेकिन अधिकारियों ने संभावित टकराव स्वीकार किया है। दोनों के ट्रैकिंग एंड डैटा रिले सैटेलाइट नेटवर्क (Tracking and Data Relay Satellite System – TDRSS) तक पहुंच और लॉन्च साइट्स के संसाधन साझा हैं। दोनों को एक साथ लॉन्च करना समझदारी नहीं है। लेकिन नासा दोनों की तैयारी जारी रखेगा। जिसमें भी कोई समस्या आएगी वो टलेगा या प्रक्षेपण के लिए दोनों में से एक को चुनना पड़ेगा।

आर्टेमिस-1 से एक बदलाव यह है कि नासा ने मोबाइल प्रक्षेपण प्लेटफॉर्म (mobile launch platform)  पर कामकाजी प्लेटफॉर्म जोड़े हैं ताकि सिस्टम हार्डवेयर का पुन:परीक्षण पैड पर ही हो सके। अर्थात यदि पहला प्रक्षेपण सफल नहीं होता, तो यान को वीएबी में वापस रोल न करना पड़े, यह अगले प्रक्षेपण तक वहीं बना रहे।

अधिकारी यह भी कहते हैं कि वे बाहरी दबावों से सतर्क हैं जो ‘लॉन्च फीवर’ पैदा कर सकते हैं, जिसमें जनता और राजनीतिक स्वार्थ और दबाव शामिल हैं। कार्यकारी सहायक प्रशासक लकीशा हॉकिंस ने बताया कि राजनीतिक दबाव उनके मन में मिशन के प्रति रुचि और उत्साह का एक स्रोत है। दूसरी ओर, एजेंसी का ध्यान इस बात पर है कि प्रक्षेपण क्रू के लिए सही और सुरक्षित रहे।

आर्टेमिस-2 के उपकरण

आर्टेमिस-2 में कई वैज्ञानिक उपकरण और प्रयोग शामिल हैं जो अंतरिक्ष पर्यावरण, विकिरण, और मानव स्वास्थ्य (space radiation, human health in space) पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे। चूंकि अंतरिक्ष यान में जगह सीमित है, इसलिए इसमें बड़े वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि रेडिएशन सेंसर, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे कॉम्पैक्ट डिवाइस हैं। कुछ मुख्य उपकरणों की चर्चा यहां की जा रही है।

विकिरण मॉनिटरिंग उपकरण

अंतरिक्ष में विकिरण (space radiation exposure) एक बड़ी चुनौती है, इसलिए आर्टेमिस-2 में कई सेंसर लगाए गए हैं जो विकिरण स्तर को मापेंगे। ये उपकरण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य के मिशनों के लिए डैटा इकट्ठा करने में मदद करेंगे।

1. हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन असेसर्स (एचईआरए-HERA): ओरायन कैप्सूल के अंदर विभिन्न स्थानों पर छह सक्रिय विकिरण सेंसर लगाए गए हैं। ये सूर्य से उत्पन्न अंतरिक्ष मौसमी घटनाओं (जैसे सोलर फ्लेयर्स) से उत्पन्न खतरनाक विकिरण का पता लगाते हैं और चेतावनी देते हैं। अगर विकिरण अधिक हो, तो मिशन कंट्रोल अंतरिक्ष यात्रियों को शेल्टर बनाने की सलाह दे सकता है। यह आर्टेमिस-1 से सीखे गए सबकों पर आधारित है।

2. क्रू एक्टिव डोसिमीटर (crew dosimeter): प्रत्येक अंतरिक्ष यात्री को एक छोटा-सा डिवाइस दिया जाएगा, जिसे वे अपनी जेब में रखेंगे। यह व्यक्तिगत विकिरण एक्सपोज़र को मापता है। आर्टेमिस-1 में मैनेक्विन पर इसका उपयोग किया गया था, लेकिन अब पहली बार क्रू के साथ लो अर्थ ऑर्बिट से बाहर इस्तेमाल होगा।

3. एम-42 ईएक्सटी (M-42 EXT): जर्मन स्पेस एजेंसी (डीएलआर) के साथ साझेदारी में विकसित, यह एक अपडेटेड विकिरण सेंसर है जो ओरायन में लगाया जाएगा। यह आर्टेमिस-1 के एम-42 का उन्नत संस्करण है और विकिरण के प्रभाव को और बेहतर तरीके से माप सकेगा।

4. आर्चर प्रणाली (ARCHER system): आर्चर एक व्यापक प्रणाली है जो विकिरण स्तर को मॉनिटर करती है और क्रू की स्वास्थ्य स्थिति पर इसके प्रभाव का अध्ययन करती है। यह आंतरिक और बाहरी विकिरण को ट्रैक करेगी।

ऑर्गनऑनचिप

एवेटार (ए वर्चुअल एस्ट्रोनॉट टिशू एनालॉग रेस्पॉन्स) एक क्रांतिकारी प्रयोग है जिसमें यूएसबी ड्राइव जितने छोटे ‘ऑर्गन-ऑन-ए-चिप’ उपकरण का उपयोग किया जाएगा। ये उपकरण मानव ऊतकों की नकल करते हैं और विकिरण तथा माइक्रोग्रैविटी (microgravity) के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। मसलन, ये गुर्दे या फेफड़ों पर बढ़ते विकिरण का असर देखेंगे। यह पहली बार है जब ऐसी तकनीक वैन एलन बेल्ट (Van Allen belts) से बाहर इस्तेमाल होगी। अंतरिक्ष यात्री इन उपकरणों से रीयल-टाइम डैटा इकट्ठा करेंगे, जो अलगाव और सीमित स्थान के प्रभाव को भी मापेंगे।

ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम

ओरायन आर्टेमिस-2 ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (optical communication system – ओ2ओ) एक लेज़र-आधारित संचार प्रणाली (laser communication) है जो पृथ्वी से उच्च गति डैटा ट्रांसफर करेगी। इसमें एक 4-इंची टेलीस्कोप, दो गिंबल्स, मॉडेम और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। यह पारंपरिक रेडियो संचार से तेज़ है और भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

कैमरा और इमेजिंग उपकरण

हाई-एंड हैसलब्लाड और निकॉन डिजिटल कैमरे (Hasselblad camera, Nikon space camera) चंद्रमा की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेंगे, जो पहले के मिशनों से बेहतर होंगी।

जैविक प्रयोग

आर्टेमिस-2 में कुछ जैविक नमूने ले जाए जा सकते हैं। खमीर, हरी शैवाल, कवक और बीजों पर विकिरण के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। ये प्रयोग डीएनए पर अंतरिक्ष यात्रा के असर को समझने (DNA damage in space) में मदद करेंगे।

अंतरिक्ष यात्री विशेष कागज़ पर लार एकत्र करेंगे, क्योंकि रेफ्रिजरेशन उपलब्ध नहीं होगा। यह स्वास्थ्य और तनाव से जुड़े बायोमार्कर्स (biomarkers) का अध्ययन करेगा। साथ ही, नींद, तनाव और अलगाव के प्रभाव के अध्ययन लिए शारीरिक और व्यवहारगत डैटा भी इकट्ठा किया जाएगा। ये उपकरण मंगल जैसे लंबे मिशनों के लिए महत्वपूर्ण डैटा देंगे।

आर्टेमिस-2 दशकों बाद पहला ऐसा मिशन है जहां इंसान चंद्रमा के करीब (human return to the Moon) पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या मंगल ग्रह के शहर बर्फ से बनाए जाएंगे?

मंगल तक पहुंचना मानव जाति का एक बड़ा सपना रहा है, और अब यह सपना सच होता दिख रहा है (Mars mission, human settlement on Mars)। लेकिन मंगल पर उतरना ही काफी नहीं है। अगर इंसानों को वहां लंबे समय तक रहना है, तो उन्हें ऐसी मज़बूत और सुरक्षित जगहों की ज़रूरत होगी जो कड़ी ठंड, खतरनाक विकिरण और अकेलेपन से बचा सकें। पृथ्वी से निर्माण सामग्री ले जाना बहुत महंगा और धीमा होगा। इसी वजह से वैज्ञानिक वहीं मौजूद एक संसाधन को समाधान मान रहे हैं – बर्फ (Martian ice) । पृथ्वी की प्राकृतिक बर्फीली गुफाओं से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि क्या मंगल पर भी ऐसे बर्फीले ढांचे बनाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि मंगल ग्रह सूखा नहीं है। उसकी सतह पर और उसके नीचे काफी मात्रा में बर्फ मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बर्फ से ऐसे मज़बूत और गर्मी कैद करने वाले घर बनाए जा सकते हैं, जिनमें मनुष्य रह सकें। ये बर्फीले घर एक तरफ तो विकिरण से सुरक्षा (radiation shielding) देंगे और दूसरी तरफ सूरज की आवश्यक रोशनी (natural light habitats) अंदर आने देंगे, जिससे जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा मिलेगा।

यह विचार भले ही विज्ञान-कथा जैसा लगे, लेकिन वैज्ञानिक इसे लेकर गंभीर हैं। लंबे समय के लिए अंतरिक्ष में इंसानों को बसाने (space habitation) की सबसे बड़ी चुनौती है बार-बार पृथ्वी से रसद भेजना, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा है। अगर मंगल पर मौजूद चीज़ों से ही काम लिया जाए, तो खर्च और खतरा दोनों कम हो सकते हैं। बर्फ इस मामले में खास है, क्योंकि इसे संभालना अपेक्षाकृत आसान है और इसके फायदे हैं।

मंगल पर निर्माण के लिए दो मुख्य चीज़ें मानी जाती हैं – बर्फ और रेगोलिथ (धूल-मिट्टी और पत्थरों की परत) (Martian regolith, space construction materials)। रेगोलिथ में उपयोगी तत्व होते हैं, लेकिन उन्हें निकालने के लिए भारी मशीनें और बहुत ज़्यादा गर्मी चाहिए। इसके उलट, बर्फ को कम ऊर्जा में पिघलाया, ढाला और फिर से जमाया जा सकता है।

यह प्रस्तावित आवास गुंबदाकार होंगे, जिनकी साइज़ लगभग एक हैक्टर (Mars habitat ice dome structures)  होगी। इनके भीतर रहने की जगह, काम करने के हिस्से और खेती के क्षेत्र अलग-अलग होंगे। कंप्यूटर मॉडल बताते हैं कि सिर्फ कुछ मीटर मोटी बर्फ की दीवारें भी मंगल के बेहद ठंडे औसत तापमान (–120 डिग्री सेल्सियस) को अंदर करीब –20 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकती हैं। यह तापमान अब भी ठंडा है, लेकिन अतिरिक्त हीटिंग से संभाला जा सकता है और इससे बर्फ पिघलती भी नहीं।

बर्फ की बनावट भी उम्मीद से बेहतर है। शोध बताते हैं कि अगर बर्फ में हाइड्रोजेल (hydrogel reinforcement) जैसे जैविक पदार्थ मिलाए जाएं, तो वह ज़्यादा मज़बूत और लचीली हो सकती है, जिससे दरार पड़ने का खतरा कम होता है। एक बड़ी चुनौती है सब्लीमेशन, यानी मंगल के विरल वातावरण में बर्फ का सीधे भाप बन जाना। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास जल-रोधी अस्तर लगाकर इसे रोका जा सकता है, हालांकि ऐसा अस्तर शायद पृथ्वी से ले जाना पड़े।

बर्फ का सबसे बड़ा फायदा सूरज की रोशनी से उसका रिश्ता है। रेगोलिथ के विपरीत, बर्फ हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है लेकिन उपयोगी रोशनी और गर्मी को अंदर आने देती है। तो विकिरण से सुरक्षा मिलेगी, साथ ही पौधे उगाने, नींद के चक्र को ठीक रखने और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा देने के लिए ज़रूरी प्राकृतिक रोशनी मिलती रहेगी।

हालांकि इस विचार की कुछ सीमाएं (technical challenges) भी हैं। बड़े बर्फीले ढांचे बनाने के लिए भारी मात्रा में बर्फ को संसाधित करना होगा। शुरुआती अनुमान बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी बिजली उपलब्ध होने पर भी रोज़ केवल लगभग 15 वर्ग मीटर बर्फ (energy constraints) ही तैयार की जा सकती है। मंगल पर आने वाले धूल भरे तूफान भी समस्या पैदा करेंगे, क्योंकि बर्फ पर जमी धूल उसकी पारदर्शिता और गर्मी रोकने की क्षमता घटा देती है। इसके अलावा बर्फ निकालने के लिए उपकरण तो पृथ्वी से ही ले जाने होंगे।

इन चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्यम अवधि के लिए बर्फ के घर रहवास के लिए काम आ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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शनि के चंद्रमा टाइटन का ओझल बर्फीला महासागर

रीब दो दशकों से शनि ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (titan) वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। माना जाता था कि उसकी मोटी बर्फीली सतह के नीचे तरल पानी का एक विशाल महासागर (subsurface ocean) छिपा है, जो जीवन की संभावना के लिए काफी अहम है। लेकिन हालिया शोध के अनुसार शायद ऐसा नहीं है।

टाइटन के अंदर महासागर होने का विचार 2000 के दशक के अंत में कैसिनी अंतरिक्ष यान (Cassini spacecraft) के आंकड़ों से आया था। कैसिनी जब-जब टाइटन के पास से गुज़रा, तो रेडियो संकेतों ने उसकी गति में बहुत हल्के बदलाव दर्ज किए। इससे टाइटन के गुरुत्वाकर्षण और आकार में हल्के बदलाव का पता चला। शनि के खिंचाव से टाइटन थोड़ा फैलता-सिकुड़ता दिखा, जिससे सतह पर 10 मीटर से ऊंचे ज्वार-भाटे जैसे प्रभाव बने। वैज्ञानिकों ने तब निष्कर्ष निकाला कि इतनी लचक तभी संभव है, जब बर्फ के नीचे तरल पानी का महासागर हो (liquid water ocean)।

इस सोच के चलते टाइटन को महासागरीय चंद्रमा के खास समूह में रखा गया था, जिसमें युरोपा और एन्सेलेडस (Europa Enceladus) जैसे चंद्रमा भी हैं। यह विचार टाइटन में कार्बनिक रसायन की भरपूर उपस्थिति के कारण भी था।

लेकिन नेचर में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। ग्रह वैज्ञानिक फ्लावियो पेट्रिका और उनकी टीम का कहना है कि टाइटन के भीतर कभी महासागर रहा होगा, लेकिन आज वह शायद जम चुका है। हालांकि, उसकी मोटी बर्फीली परत के अंदर कुछ जगहों पर पिघले पानी के छोटे-छोटे पोखर हो सकते हैं।

इस बहस की जड़ है ऊर्जा। अगर टाइटन के अंदर अब भी बड़ा तरल महासागर होता, तो शनि के खिंचाव से पैदा होने वाली गर्मी का बड़ा हिस्सा उस महासागर को गर्म (tidal heating, internal energy) रखने में लग जाता। लेकिन कैसिनी द्वारा 124 नज़दीकी उड़ानों के डैटा का दोबारा विश्लेषण करने पर पता चला कि टाइटन बहुत ज़्यादा ऊर्जा बाहर छोड़ रहा है – करीब 4 टेरावॉट, जो आधुनिक मानव सभ्यता की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा ज़रूरत के बराबर है। इतनी अधिक गर्मी का उत्सर्जन किसी विशाल तरल महासागर की उपस्थिति से मेल नहीं खाता।

इसमें एक और उलझन है। समय के साथ शनि के ज्वारीय खिंचाव को टाइटन की कक्षा को वृत्ताकार और स्थिर (orbital dynamics) बना देना चाहिए था, लेकिन टाइटन आज भी दीर्घवृत्ताकार पथ (elliptical orbit) पर घूम रहा है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि बहुत पहले किसी क्षुद्रग्रह की टक्कर ने इसकी कक्षा बिगाड़ दी होगी। लेकिन नया मॉडल एक आसान वजह बताता है: अगर टाइटन के भीतर तरल महासागर नहीं है, तो ऊर्जा को सोखने वाला कोई माध्यम नहीं होगा और कक्षा अस्थिर बनी रहेगी।

पेट्रिका की टीम ने टाइटन के दो मॉडल बनाए – एक जिसमें भीतर महासागर हो और दूसरा जिसमें न हो (interior planetary modeling)। जिस मॉडल में महासागर नहीं है, बल्कि करीब 500 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे चट्टानी कोर है, वही टाइटन से मिलने वाले आंकड़ों से बेहतर मेल खाता है (rocky core)। यह मॉडल टाइटन की गर्मी के उत्सर्जन, उसके झुकाव और शनि के खिंचाव के प्रति उसके व्यवहार, इन सभी बातों को एक ही ढांचे में समझाता है।

हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं। कुछ का कहना है कि टाइटन को ‘महासागरीय चंद्रमाओं’ की सूची से हटाने के लिए और ठोस सबूतों की ज़रूरत (evidence based research)है।

और तो और, इस नई खोज से टाइटन पर जीवन की संभावना (life on Titan) पूरी तरह खत्म नहीं होती। उल्टा, कुछ शोधकर्ताओं को यह विचार और भी संभावनाओं से भरा लगता है क्योंकि इसके अनुसार एक बड़े महासागर की जगह टाइटन की बर्फ के नीचे कई छोटी-छोटी तरल जल-राशियां हो सकती हैं, शायद कुछ तो अटलांटिक महासागर से भी बड़ी। ऐसे सीमित जल-क्षेत्र जीवन के लिए ज़रूरी रसायनों को बेहतर ढंग से सांद्रित कर सकते हैं।

इस बहस का जवाब शायद नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन (NASA Dragonfly mission) से मिलेगा, जो 2034 में टाइटन पर उतरने वाला है। यह मिशन ऐसे उपकरण लेकर जाएगा जो भूकंपीय तरंगों (seismic waves) को माप सकेंगे, जो ठोस बर्फ और तरल पानी में अलग-अलग तरह से व्यवहार करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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दूरबीनों के लिए बाधा बन रहे हज़ारों उपग्रह

दुनिया भर में इंटरनेट की मांग (internet demand) बढ़ने के कारण हज़ारों नए उपग्रह छोड़े जा रहे हैं। खगोलविद इन इंटरनेट उपग्रहों से काफी चिंतित हैं। दरअसल, ये उपग्रह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और ऐसी रेडियो तरंगें (radio waves) छोड़ते हैं जो संवेदनशील दूरबीनों के लिए बाधा बन रही हैं।

एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2040 तक लगभग पांच लाख उपग्रह (satellite mega-constellation) पृथ्वी की कक्षा में होंगे। इतनी बड़ी संख्या में उपग्रह उन्नत अंतरिक्ष दूरबीनों की तस्वीरों को बिगाड़ सकते हैं। नासा (NASA)  के सिमुलेशन से पता चला है कि उपग्रहों का महाजाल चार प्रमुख दूरबीनों – हबल, Xuntian, SPHEREx, और ARRAKIHS – पर क्या असर डालेगा। परिणाम चिंताजनक हैं।

खगोलविदों को उम्मीद थी कि यदि दूरबीनों को पृथ्वी की सतह (Earth surface) से दूर अंतरिक्ष में रखा जाए, तो वे उपग्रहों की चमकीली लकीरों (satellite streaks) से बच सकेंगे। लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह उम्मीद बेमानी थी। भविष्य में 540 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थापित हबल दूरबीन (Hubble Space Telescope) की हर तीन में से एक तस्वीर में उपग्रह का खलल दिखाई देगा। विस्तृत परास वाली अंतरिक्ष दूरबीनों की हालत इससे भी बुरी होगी – SPHEREx और ARRAKIHS की लगभग हर तस्वीर में कम से कम एक चमकीली लकीर होगी। और, 2026 में लॉन्च होने वाली Xuntian दूरबीन की एक तस्वीर में 90 से अधिक उपग्रह लकीरें दिखने की संभावना है।

इस समस्या से बचना इसलिए लगभग असंभव है क्योंकि अधिकतर उपग्रह 500 से 700 कि.मी. की ऊंचाई (Low Earth Orbit – LEO) पर परिक्रमा करते हैं; कुछ तो 8000 कि.मी. तक भी स्थापित किए जाते हैं। यानी ये उपग्रह निचली कक्षा में मौजूद हर दूरबीन की तस्वीरों में डैटा (astronomical data) को नुकसान पहुंचाएंगे।

हालांकि, कंपनियों ने इन्हें थोड़ा ‘डार्क’ (dark satellite) बनाने की कोशिश की है, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। कई उपग्रह अभी भी काफी चमकीले (optical brightness) हैं। इसके अलावा इनके रेडियो सिग्नल (radio interference) दूर-दूर तक रेडियो दूरबीनों के काम में बाधा डाल रहे हैं।

तस्वीरों से उपग्रह की लकीरों को हटाने वाला सॉफ्टवेयर (image processing software) भी पूरा समाधान नहीं दे पाता है। कई बार वह सही काम नहीं करता, और जब करता है, तो तस्वीरों में ‘शोर’ बढ़ जाता है और माप में अनिश्चितता (measurement uncertainty) आ जाती है।

नासा के सिमुलेशन मॉडल (simulation models) के अनुसार अंतरिक्ष में मौजूद दूरबीनें भी उपग्रहों की लकीरों से प्रभावित होंगी। उपग्रहों का असर दो बातों पर निर्भर करता है: एक, दूरबीन की ऊंचाई (orbital altitude) पर – जितनी ऊंचाई पर दूरबीन होगी उस पर उपग्रहों का असर उतना ही कम होगा। दूसरी, दूरबीन के दृश्य क्षेत्र (field of view) पर। जितना बड़ा दृश्य क्षेत्र होगा, उतनी ही ज़्यादा उपग्रह लकीरें दिखेंगी।

इस स्थिति में Xuntian (450 कि.मी. की कक्षा) बहुत अधिक संवेदनशील होगा। इसका दृश्य क्षेत्र हबल से 300 गुना बड़ा (wide field telescope) है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें दिखेगी। पूरे आकाश का अवरक्त सर्वे (infrared sky survey) करने वाला SPHEREx एक फ्रेम में चांद से 200 गुना बड़ा क्षेत्र कैप्चर करता है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें होंगी।

हालांकि, कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि स्थिति हर जगह इतनी भयावह नहीं होगी। उदाहरण के लिए ARRAKIHS दूरबीन ज़्यादातर ‘सीधे ऊपर’ देखेगी, इसलिए उसकी कुछ तस्वीरों में लकीरें कम हो सकती हैं। फिर भी अनुमान बताते हैं कि लगभग 96 प्रतिशत तस्वीरें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित (affected observations) होंगी।

इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक ने कुछ संभावित उपाय सुझाए हैं:

  • उपग्रहों की ऊंचाई (satellite altitude) सीमित की जाए, ताकि अंतरिक्ष दूरबीनें उनसे ऊपर की कक्षा में रखी जा सकें।
  • उपग्रहों की ट्रैकिंग (satellite tracking) को अधिक सटीक बनाया जाए, ताकि दूरबीनें उन्हें पहचानकर बच सकें या बाद में लकीरों को हटाया जा सके।
  • उपग्रहों को और अधिक ‘डार्क’ बनाया जाए, ताकि वे कम चमकें (low reflectivity)।

ये सारे उपाय कहने में आसान हैं लेकिन उपग्रहों का यह जाल चिंताजनक है। जो आकाश कभी प्राकृतिक प्रयोगशाला (natural laboratory) था, वह अब एक औद्योगिक क्षेत्र बनता जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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