समुद्र तल में छिपे हैं शुरुआती जीवन के राज़!

लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति (origin of life) कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है।

जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) (phosphate) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए (DNA or RNA) की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया (reaction) करता है।

तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया? 

गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं (microbiology lab) में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया – डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) – मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण (oxidation) करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है।

फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया में से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।

इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एन्ज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक (catalyst) की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स

समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) (hydrothermal vents) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है।

एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम (palledium) जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।

इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट (phosphate) में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था। 

हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी (oxygen less earth) पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा।

आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन तो चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियां संक्रमण से कैसे बचाव करती हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।

सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।

सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं। 

इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था। 

एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।

प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।

कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।

इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।  

बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पक्षियों की लंबी-लंबी यात्राएं और वापसी

ह चमत्कार ही लगता है कि कई पक्षी (Birds) हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, साल-दर-साल सही ठिकाने पर पहुंच जाते हैं और वापिस उड़कर अपने घर भी आ जाते हैं। और पक्षी ही नहीं समुद्री कछुए (Sea Turtels) तथा कई अन्य जानवर भी यह करतब करते हैं। सवाल यह उठता है कि ये प्राणी इस प्रवास (Migration) के दौरान अपना मार्ग कैसे ढूंढते हैं।

इसका जवाब खोजते-खोजते यह समझ में आया है कि ये जीव किसकी प्रकार से पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) को ताड़कर दिशा का अंदाज़ लगा लेते हैं।

चुंबकत्व आधारित दिशा-निर्धारण की क्षमता (Magnetoreception) कई जंतुओं में देखी गई है। जैसे पक्षी, कछुए, शार्क, और कुत्ते। कुछ शोधकर्ता तो मानते हैं कि मनुष्य में भी थोड़ी बची-खुची क्षमता है। खैर, यह काफी गरमागर्म बहस का विषय रहा है कि यह चुंबकीय ज्ञानेंद्री (Magnetic Sensory) कैसे काम करती है। एक परिकल्पना यह रही है कि जंतुओं के ऊतकों में मैग्नेटाइट नामक लवण के छोटे-छोटे रवे होते हैं। ये रवे एक तरह से चुंबकीय दिक्सूचक (Compass) का काम करते हैं।

एक ज़्यादा हालिया परिकल्पना आंखों के रेटिना पर केंद्रित है। इसमें माना जाता है कि रेटिना के प्रोटीन्स (क्रिप्टोक्रोम्स) (Chryptochromes) चुंबकीय क्षेत्र के प्रति संवेदी होते हैं। इसके अनुसार प्रवासी सॉन्ग बर्ड्स हल्के से धुंधलके में भी सही दिशा में उड़ते रह सकते हैं।

फिर पिछले साल होमिंग पिजन्स (घर लौटने वाले कबूतर) पर शोध करके एक और नवीन प्रक्रिया उजागर हुई है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि बदलते चुंबकीय क्षेत्र से इन कबूतरों के अंदरुनी कान में विद्युत धाराएं (Electric current) पैदा होती हैं। ये विद्युत धाराएं मस्तिष्क तक पहुंचने वाली तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती हैं।

मज़ेदार बात है कि इस अध्ययन की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के पक्षी वैज्ञानिक मार्टिन वाइकेल्स्की और बॉन विश्वविद्यालय के प्रतिरक्षा वैज्ञानिक क्रिस्टियन कर्ट्स के बीच बातचीत के दौरान वाइकेल्स्की ने जंतु प्रवास में चुंबकत्व की भूमिका का विवरण दिया। यह सुनकर कर्ट्स ने बताया कि उन्होंने चूहों और मनुष्य की तिल्ली (प्लीहा) से प्राप्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं (मैक्रोफेज) में बारीक चुंबकीय लौह कण देखे जो तब बनते हैं जब मैक्रोफेज (Macrophage) पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके उनके लौह परमाणु जज़्ब कर लेती हैं। क्या इसी तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होमिंग पिजन्स (Homing Piegons) को प्रवास के दौरान दिशा-निर्धारण में मदद कर सकती हैं?

लेकिन सवाल था इस विचार की प्रायोगिक जांच का। कर्ट्स के दिमाग में एक आइडिया था और इस आइडिया को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक शोधकर्ता क्लिविया लिसोव्स्की को शामिल कर लिया। लिसोव्स्की की रुचि यह समझने में थी कि कोशिकाएं अपने पर्यावरण को कैसे भांपती हैं।

सबसे पहले तो लिसोव्स्की ने यह जांच की कि क्या कबूतरों की विभिन्न प्रजातियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (Immune Cells) में वैसे ही चुंबकीय कण पाए जाते हैं जैसे चूहों में देखे गए थे। लिसोव्स्की और उनकी टीम को उम्मीद थी कि ऐसी कोशिकाओं का जखीरा प्लीहा में मिलेगा क्योंकि वहीं पर तो मैक्रोफेज लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने का काम करते हैं। लेकिन अपेक्षा के विपरीत, एक बढ़िया चुंबकत्व-मापी (मैग्नेटोमीटर) ने दर्शाया कि सारे ऊतकों में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय संकेत लीवर (यकृत, जिगर) में मिल रहे थे। हालांकि संकेत क्षीण थे लेकिन वे मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) के हिसाब से काफी शक्तिशाली थे।

होमिंग पिजन्स के ऊतकों की पतली-पतली स्लाइस निकालकर अभिरंजित (Staining) करके यह पक्का हो गया कि लीवर के मैक्रोफेज में फेरिटिन (Ferritin) नामक लौह कण भरपूर मात्रा में थे लेकिन ये प्लीहा, मस्तिष्क और चोंच में नदारद थे। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) से अवलोकन से यह भी स्पष्ट हो गया कि कबूतरों के लीवर के मैक्रोफेज के आसपास थे। यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों और पक्षियों में प्लीहा (Spleen) की तंत्रिकाएं मैक्रोफेज से संवाद करती हैं और दोनों में ही ये तंत्रिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ती हैं।

अब एक उम्दा प्रयोग से इस बात की जांच की गई कि ये लौह-प्रचुर मैक्रोफेज चुंबकीय कम्पास की तरह कैसे काम करते होंगे। इस प्रयोग में एक औषधि क्लोड्रोनेट लिपोसोम की मदद से मैक्रोफेज को सुप्त कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने 34 होमिंग पिजन्स को प्रशिक्षित किया कि वे ठीक पूर्व दिशा में 19 किलोमीटर की उड़ान भरें।

दिन के समय तो कबूतर दिशा-निर्धारण के लिए सूर्य की स्थिति की मदद लेते हैं। लेकिन जब घने बादल छाए हों, तो दिशा के लिए वे चुंबकत्व के सहारे रहते हैं। एक झील (लेक कॉन्स्टेन्स) के नज़दीक शोधकर्ता दल ने 18 कबूतरों को क्लोड्रोनेट (Clodronate) का इंजेक्शन दिया और 24 घंटे बाद उन्हें एक-एक करके उस समय छोड़ा गया जब घने बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ओझल था। ज़ाहिर है, इन पक्षियों पर जीपीएस चस्पा किया गया था जिसकी मदद से शोधकर्ता इनकी उड़ान पर नज़र रख सकते थे।

बादल आच्छादित आकाश के समय तो कबूतरों को 19 किलोमीटर सही-सही उड़ने में उस स्थिति में कोई दिक्कत नहीं आई जब उनके मैक्रोफेज सही-सलामत थे। लेकिन जब क्लोड्रोनेट इंजेक्शन ने उनके लीवर मैक्रोफेज को ठप कर दिया, तब वे खुले धूप वाले आकाश में तो आसानी से उड़े लेकिन मेघाच्छादित आकाश (Cloudy sky) में उन कबूतरों को दिशा तलाशने में खासी परेशानी हुई जिनके लीवर मैक्रोफेज ठप कर दिए गए थे। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं दिशा निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।

इंजेक्शन-प्राप्त समस्त 18 पक्षी बहुत भटक गए थे और तभी घर लौट पाए जब आसमान साफ हो गया। दूसरी ओर, जिन 16 पक्षियों को नकली इंजेक्शन दिया गया था वे सीधे घर लौट आए।

यह देखने के लिए कि क्या औषधि कबूतरों को सामान्य रूप से दिग्भ्रमित कर देती है, शोधकर्ताओं ने औषधि-उपचारित पक्षियों को खुले आकाश की परिस्थिति में भी छोड़ा। सारे के सारे बगैर किसी परेशानी के वापिस लौट आए।

कई वैज्ञानिकों ने इस खोज को रोमांचक बताया है लेकिन आगे और छानबीन का सुझाव दिया है। जैसे बोलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के वर्नर बिंगमैन का सुझाव है कि लीवर के मैक्रोफेज को ठप करने की बजाय लीवर की चुंबकीय सूचना के साथ छेड़चाड़ करके देखा जाए। इस तरह का एक प्रयोग 1970 के दशक में किया गया था। उस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने होमिंग पिजन्स को चुंबकीय कुंडली (Magnetic coil) पहना दी थी जो उनके सिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करती थी। देखा गया था कि ये कबूतर उल्टी दिशा में उड़ चले थे।

बहरहाल, वाइकेल्सकी का कहना है कि यदि सही साबित हुआ, तो शायद यह प्रक्रिया मधुमक्खियों से लेकर चमगादड़ों, शार्क और व्हेल्स तक के लिए एक समान हो। (स्रोत फीचर्स)

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कृत्रिम रोशनी मच्छरों को देर तक सक्रिय रखती हैं

सा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।

जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।

मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए  मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।

पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है  और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।

सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।

देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।

अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।

शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)

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कृत्रिम अंडा और विलुप्त पक्षियों को पुनर्जीवन

कोलोसल बायोसाइन्स नाम की एक कंपनी ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो विलुप्त पक्षियों (Extinct Birds) को वापिस अस्तित्व में ला सकेगी और जोखिमग्रस्त पक्षियों को बचा सकेगी। हालांकि यह तकनीक और इसकी बारीकियों को कहीं प्रकाशित नहीं किया गया है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

तकनीक क्या है?

मुर्गी द्वारा अंडा देने के 24-48 घंटे के अंदर उस अंडे में मौजूद सारी सामग्री (निषेचित भ्रूण सहित, लेकिन बाहरी खोल नहीं) एक कृत्रिम अंडे (Artificial Egg) में डाल दी जाती है। इसके बाद का सारा विकास कृत्रिम अंडे के अंदर होता है।

कृत्रिम अंडा 3-डी प्रिंटिंग विधि (3-D Printing Method) से बनाई गई एक षट्कोण फ्रेम (Hexagonal Frame) होती है, जिसमें अंदर सिलिकॉन की झिल्ली (Silicon Membrane) का अस्तर होता है। असली अंडे की खोल के समान यह नमी को बनाए रखती है, ऑक्सीजन को अंदर जाने देती है और बैक्टीरिया को अंदर नहीं जाने देती। भ्रूण के लिए पोषण की व्यवस्था मूल अंडे की सामग्री से होती है। इस जुगाड़ का उपयोग करके लगभग 2 दर्ज़न चूज़ों को विकसित किया जा चुका है। अब कोलोसल को उम्मीद है कि वह इसकी मदद से दक्षिणी द्वीप पर कभी पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी मोआ (Dinornis robustus) को पुनर्जीवन देगी। न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 3 मीटर ऊंचा यह पक्षी पंद्रहवीं शताब्दी में विलुप्त हो गया था। इसके अंडे लगभग फुटबॉल के आकार के होते थे।

प्रेस विज्ञप्ति को देखकर वैज्ञानिकों को लगता है कि कोलोसल का यह आविष्कार शायद एक बड़ा कदम साबित होगा। वैसे इस तरह से कृत्रिम परिवेश में भ्रूण को विकसित करके चूज़े पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं।

जैसे 1998 में ऐसा पहला सफल प्रयास हुआ था। जापान के युताका तहारा, कात्सुया ओबारा और मासामिची कामिहिरा के दल ने एक कुदरती तौर पर निषेचित अंडे को पहले दो दिन तक कुदरती रूप से इन्क्यूबेशन (Incubation) बाद उसके अंदर की सामग्री को कांच के मर्तबान में रख दिया गया था। साथ में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) डाला गया था जो खोल निर्माण के लिए ज़रूरी होता है। इसी तरह के अगले प्रयास में पारदर्शी प्लास्टिक प्यालों का उपयोग किया गया था। इसमें मुर्गी द्वारा अंडा देने के तुरंत बाद भ्रूण (Fetus) को कृत्रिम अंडे में रख दिया गया था। गौरतलब है कि तहारा एक हाई स्कूल शिक्षक हैं और वे अपने छात्रों के साथ यह प्रयोग करते रहते हैं।

दरअसल, कोलोसल के कृत्रिम अंडे की एक खासियत है वह झिल्ली जो उसने विकसित की है। इसके चलते भ्रूण का विकास ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा पर होता है जबकि तहारा और साथियों ने जो कृत्रिम अंडा बनाया था उसमें ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह से ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। कोलोसल द्वारा विकसित कृत्रिम अंडे की एक विशेषता यह है कि उसमें ऊपर एक पारदर्शी झरोखा है जिसके ज़रिए भ्रूण के विकास (Fetus Development) पर नज़र रखी जा सकती है।

विकसित होते अंडे का सतत निरीक्षण इसलिए भी ज़रूरी होगा कि विलुप्त पक्षियों के जीन्स में संशोधन किए जाएंगे और उनके असर पर नज़र रखनी होगी।

कुल मिलाकर माना जा रहा है कि भ्रूण विकास में कृत्रिम अंडों के निर्माण में हम आगे तो बढ़े हैं, लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। (स्रोत फीचर्स)

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फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक

लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।

इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।

अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।

इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।

यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।

स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।

इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।

शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।

फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हाथी और गुबरैले का एक अनोखा नाता

विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?

हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।

छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।

दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।

ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।

इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।

इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई। 

वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।

दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा। 

वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

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तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर

ह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।

अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।

तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।

सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।

नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।

इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।

शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।

वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

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