तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर

ह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।

अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।

तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।

सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।

नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।

इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।

शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।

वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चमकते मशरूम से रोशनी देने वाले पौधे बनाने का सफर

दौलत सिंह तंवर

ल्पना कीजिए, रात के घने अंधेरे में सड़क के किनारे लगे पेड़-पौधे बिना किसी बिजली या तार के एक हल्की, सुकून देने वाली रोशनी बिखेर रहे हों। आधुनिक वनस्पति विज्ञान (botany) और जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) ने इस कल्पना को हकीकत में बदलना शुरू कर दिया है। यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि कैसे प्रयोगशालाओं में आज ‘बायोलुमिनेसेंट’ (जैव-संदीप्त – bioluminescent plants) पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो भविष्य में हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का एक हरा-भरा विकल्प बन सकते हैं।

जैवसंदीप्ति

गर्मियों की रात में चमकते जुगनुओं को हम सभी ने देखा है। गहरे समुद्र में रहने वाली कुछ मछलियां, जेलीफिश या जंगलों में पाए जाने वाले कुछ कवक भी अंधेरे में चमकते हैं। जीवों द्वारा अपने शरीर के भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करने की इस अद्भुत प्रक्रिया को ‘बायोलुमिनेसेंस’ यानी जैव-संदीप्ति कहा जाता है।

मुख्य रूप से यह चमक दो रसायनों का प्रभाव होती है: ‘ल्यूसिफेरिन’ (luciferin) जो ऑक्सीजन से क्रिया करके प्रकाश उत्पन्न करने वाला अणु है, और ‘ल्यूसिफेरेज़’ (luciferase enzyme)  वह एंज़ाइम है जो इस अभिक्रिया को गति देता है। प्रकृति में यह गुण जीवों के शिकारियों से बचने, साथी को आकर्षित करने या शिकार को लुभाने में मदद करता है। लेकिन वनस्पति जगत में, प्राकृतिक रूप से पौधों में यह गुण नहीं पाया जाता।

पौधों से रोशनी पैदा करवाने का विचार वनस्पति विज्ञानियों के लिए नया नहीं है। 1980 के दशक के अंत में वैज्ञानिकों ने जुगनू का जीन तंबाकू के पौधे में डालकर उसे संदीप्त बनाने का प्रयास किया था। प्रयोग काफी हद तक सफल रहा था, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी व्यावहारिक खामी थी। पौधा लगातार रोशनी दे पाए, उसके लिए बाहर से ल्यूसिफेरिन का छिड़काव करना पड़ता था। वैज्ञानिकों को एक ऐसे तरीके की तलाश थी जिसमें पौधा अपनी चयापचय प्रक्रिया (plant metabolism) के ज़रिए खुद अपना प्रकाश उत्पन्न करे – बिना किसी बाहरी रसायन या मदद के।

मशरूम से मिला समाधान

सफलता हाल ही के वर्षों में मिली, जब वैज्ञानिकों ने जुगनू को छोड़कर प्राकृतिक रूप से चमकने वाले कवक (फफूंद) (glowing fungi) का रुख किया। नियोनोथोपेनस नंबी नामक एक ज़हरीले और चमकने वाले मशरूम (Neonothopanus nambi) का गहराई से अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह कवक एक विशेष चयापचय चक्र का उपयोग करता है जिसे ‘कैफिक एसिड चक्र’ कहते हैं। रोचक बात यह है कि           कैफिक एसिड (caffeic acid) सभी पौधों में प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। पौधे इसका उपयोग लिग्निन बनाने (lignin formation) के लिए करते हैं, जो पौधों की कोशिका भित्ति को मज़बूती और कठोरता प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने कवक के उन चार प्रमुख जीन्स की पहचान की जो कैफिक एसिड को ल्यूसिफेरिन में बदलते हैं और फिर प्रकाश उत्सर्जित करने के बाद उसे वापस कैफिक एसिड में बदल देते हैं। वनस्पति विज्ञानियों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से इन चार जीन्स को पहले                तंबाकू (Nicotiana tabaccum) और बाद में पिटूनिया (Petunia hybrida) जैसे पौधों के डीएनए में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया।

नए जेनेटिक रूप से संशोधित पौधों ने अपने पूरे जीवनचक्र में बीज से लेकर अंकुरण, पत्तियों के विकास और परिपक्वता तक निरंतर हरे रंग की रोशनी उत्सर्जित की। यह प्रकाश पत्तियों, तनों, जड़ों और फूलों, सभी हिस्सों से निकल रहा था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसके लिए किसी बाहरी रसायन, पराबैंगनी प्रकाश या बिजली की कोई आवश्यकता नहीं थी। पौधे की               अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली ही इस रोशनी का स्थायी स्रोत बन गई थी।

भविष्य की संभावनाएं 

रोशनी देने वाले पौधे महज़ प्रयोगशाला का चमत्कार नहीं हैं। इनके कई व्यावहारिक और पर्यावरणीय उपयोग (sustainable innovation) हो सकते हैं:

शून्यकार्बन स्ट्रीट लाइट्स (zero carbon lighting): दुनिया भर में स्ट्रीट लाइट्स और सजावटी रोशनी में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन और बिजली की खपत होती है। यदि भविष्य में इन जैवसंदीप्त पेड़ों                    की चमक को बढ़ाया जा सके तो ये सड़कों, पार्कों को रोशन करने का एक प्राकृतिक, शून्य-कार्बन विकल्प बन सकते हैं। जो जलवायु परिवर्तन (climate change solution) से लड़ने में अहम होगा।

इनडोर लाइटिंग (indoor lighting plants): घरों के अंदर ये पौधे एक ‘लिविंग लैंप’ (living lamp) की तरह काम कर सकते हैं। रात के समय ये एक मंद, प्राकृतिक रोशनी देंगे जिससे बिजली की बचत होगी। हाल ही में ‘फायरफ्लाई पेटूनिया’ नाम से कुछ पौधे अमेरिकी बाज़ार में आम लोगों के लिए उतारे भी गए हैं।

फसलों की स्वास्थ्य निगरानी (crop monitoring): वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग करके         पौधों को ऐसा बनाया जा सकता है कि जब वे किसी तनाव (plant stress) में हों (जैसे पानी की कमी, कीटों का हमला, या मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी), तो उनकी चमक का रंग या उसकी तीव्रता बदल जाए।     इससे किसानों को फसल के बीमार होने से बहुत पहले ही संकेत मिल जाएगा।

चुनौतियां और आगे की राह 

हालांकि यह तकनीक बहुत आशाजनक है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले कई वैज्ञानिक और पारिस्थितिक चुनौतियों (scientific challenges) का समाधान करना बाकी है:

रोशनी की तीव्रता (light intensity): वर्तमान में इन पौधों से निकलने वाली रोशनी बहुत तेज़ नहीं है। आप इसकी रोशनी में कोई किताब नहीं पढ़ सकते। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य जेनेटिक कोड (genetic optimization)  में सुधार करके इस रोशनी को कई गुना तक बढ़ाना है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (ecosystem impact): प्रकृति में ऐसे चमकीले पेड़-पौधे लगाने से पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि स्थानीय कीटों, परागण करने वाले जीवों और रात में सक्रिय रहने वाले जंतुओं (nocturnal animals) पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। कहीं यह उनके प्राकृतिक व्यवहार या जीवन चक्र को भ्रमित तो नहीं करेगा?

पौधे की ऊर्जा खपत (energy metabolism): लगातार प्रकाश उत्पन्न करने में पौधे की काफी ऊर्जा खर्च होती है। वनस्पति विज्ञानियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रकाश उत्पन्न करने की यह प्रक्रिया पौधे के सामान्य विकास, उसके फलने-फूलने या उसकी जीवन अवधि पर कोई नकारात्मक प्रभाव न डाले। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा

आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों (mammals species) की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक (zoonotic pathogens) है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य-जीव व्यापार और तस्करी (illegal wildlife trafficking) बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।

यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।

अध्ययन स्तनधारी जीवों (wild mammals) पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब (genetic similarity) हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं (infection risk)। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।

अध्ययन में वन्य-जीव व्यापार के तरीकों (trade practices) को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क (direct exposure) संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार (legal wildlife trade) भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने (pathogen adaptation) का ज़्यादा मौका मिलता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम (wildlife regulations) बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी (pandemic prevention) के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।

फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों (exotic pet trade) के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

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चींटियों का एक अनूठा सम्बंध

दिन-रात मेहनत करने वाली चींटियां (ants behavior) एकता और परस्पर ताल-मेल बनाकर अपने समूह के साथ वफादारी से काम करती हैं। उन्हें दूसरे समूह की दखलंदाज़ी बिल्कुल नहीं भाती — लगभग हर समय वे दूसरे समूह के प्रति आक्रामक बर्ताव ही करती हैं| हालांकि चींटियां माहू (पौधों का रस चूसने वाले कीट, जिसे तेला या चेपा भी कहते हैं) के साथ साझेदारी का सम्बंध रखती हैं, क्योंकि माहू चींटियों को शहद जैसा चिपचिपा अपशिष्ट पदार्थ ‘हनीड्यू’ (honeydew secretion) भोजन के रूप में देते हैं, वहीं बदले में चींटियां गुबरैला जैसे शिकारियों से उनकी रक्षा (symbiotic relationship) करती हैं और अन्य भोजन के स्थानों तक पहुंचाती हैं; कभी तो सर्दियों में आवास भी देती हैं|

लेकिन 2006 में एक कीट वैज्ञानिक ने एरिज़ोना के रेगिस्तान (Arizona desert ecosystem) में चींटियों का एकदम विपरीत बर्ताव देखा| कीट वैज्ञानिक मार्क मोफेट ने इसी अनुभव को इकॉलॉजी एण्ड इवोल्यूशन शोध पत्रिका में प्रकाशित कर यह सुझाया है कि शायद चींटियों में यह साफ-सफाई से जुड़ी साझेदारी का पहला उदाहरण होगा| उन्होंने अनुभव साझा किया कि दो अलग-अलग प्रजातियों की चींटियां एक-दूसरे के साथ शांति से पेश आ रहीं थीं। इनमें से एक थी लाल टींटी या रेड हार्वेस्टर चींटी (Pogonomyrmex barbatus), जो गहरे भूरे-लाल रंग की और 5-7 मि.मी. तक लंबी होती है। और दूसरी थीं कोन या पिरामिड चींटियां (जीनस – Dorymyrmex), जो पीले-भूरे रंग की होती हैं और इनकी लंबाई 3-3.5 मि.मी होती है (हार्वेस्टर चींटियों की एक-तिहाई)। मोफेट ने देखा कि छोटी चींटियां बड़ी चींटियों का शरीर साफ कर रहीं थी, यहां तक की बड़ी चींटियां अपने धारदार जबड़े खोलकर छोटी चींटियों से सफाई करवा रहीं थीं, मानो उन्हें मज़ा आ रहा हो| पांच दिन तक लगातार निरीक्षण के आधार पर कीट वैज्ञानिक का अनुमान है कि छोटी चींटियों को सफाई के दौरान भोजन मिलता होगा; जैसे वे कुछ परजीवियों को खा रही होंगी या हटा रही होंगी या फिर वे फायदेमंद सूक्ष्मजीवों का आदान-प्रदान कर रही होंगी|

चींटियों के अब तक ज्ञात व्यवहार के चलते यह बात अंचभा लग सकती है। लेकिन जीव जगत में ऐसी बहुत से सम्बंध और साझेदारियां देखने को मिलती हैं जिसमें दो भिन्न प्रजातियों के प्राणी परस्पर लाभांवित होते हैं। इन सम्बंधों को जीवविज्ञान में परस्परता (mutualism) कहा जाता है|    ऐसे सम्बंध में दोनों जीवों को फायदा मिलता है। प्रकृति में इसके असंख्य उदाहरणों में से कुछ की बात करते हैं:

पक्षी एवं शाकाहारी जंतु – पक्षियों (जैसे ऑक्सपेकर या बगुला) को जंतुओं के शरीर से किलनी वगैरह भोजन के रूप में मिलती है और बदले में जंतुओं (जैसे भैंस, गेंडे) को कीटों और परजीवियों से निजात (parasite control) मिलती है।

परागणकर्ता और फूल – मधुमक्खियों जैसे कीटों को फूलों से भोजन के रूप में मकरंद (pollination process) मिलता है और बदले में कीट उनके परागण में मदद करते हैं।

मगरमच्छ एवं प्लोवर पक्षी – जबड़ा खोलकर मगरमच्छ आराम से प्लोवर पक्षी से दांतों की सफाई (cleaning symbiosis example) करवाता है, और प्लोवर पक्षी के भोजन का इंतज़ाम हो जाता है। इस पक्षी को डेंटिस्ट भी कहते हैं।

जड़ एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण बैक्टीरिया – बैक्टीरिया पौधों को नाइट्रोजन (nitrogen fixation) उपलब्ध कराते हैं और बदले में पौधे आवास व भोजन देते हैं।

अर्थात सहजीविता (symbiosis) का रिश्ता भोजन, सुरक्षा और प्रजनन में सहयोग की दृष्टि से पारिस्थितिक संतुलन के लिए ज़रूरी है| ये तो हुआ फायदे का सम्बंध। कुछ सम्बंध ऐसे भी होते हैं जहां एक जीव को लाभ होता है, लेकिन दूसरे जीव को न तो लाभ होता है न हानि। इसे ‘सहभोजी सम्बंध’ (commensalism) कहते हैं। जैसे, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड (एपिफाइटिक ऑर्किड) सूर्य की रोशनी के लिए ऊंची शाखाओं पर केवल आश्रय लेते हैं, इससे पेड़ों को कोई नुकसान नहीं होता| वहीं, एक ऐसा भी सम्बंध है जहां एक जीव को लाभ होता है लेकिन दूसरे जीव को हानि होती है। इसे ‘परजीवी सम्बंध’ (parasitism) कहते हैं। जूं, जोंक, कृमि जैसे परजीवी पोषण और जीवनचक्र के लिए जंतुओं और मनुष्यों के शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। वनस्पतियों में, अमरबेल (Cuscuta reflexa),   स्ट्राइगा (Striga प्रजातियां) जैसे परजीवी पौधे अन्य पेड़-पौधों पर पोषण, आश्रय और प्रजनन के लिए निर्भर रहते हैं| 

अंत में, इतना ही कहा जा सकता है कि प्रकृति (nature observation) में ऐसी कई व्यवस्थाएं और सम्बंध हैं जो अभी तक मनुष्यों की नज़र और समझ से ओझल हैं। ज़रूरत है सिर्फ थोड़ा ध्यानपूर्वक अवलोकन (scientific observation) और निरीक्षण करने की। हमारे आस-पास ही दुर्लभ प्राकृतिक अजूबे मौजूद है, उनके बारे में हमें पता चल सकता है, ज़रूरत है तो बस थोड़े धैर्य और एकाग्रता की। (स्रोत फीचर्स)

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ये पक्षी सचमुच ‘चूसते’ हैं

तितलियां फूलों से मकरंद चूसती (nectar feeding) हैं। वालरस और अधिकतर मछलियां अपने भोजन का भक्षण चूस कर करती हैं। हम मनुष्य भी कितनी ही चीज़ें चूसकर निगलते हैं। लेकिन पक्षी? वैज्ञानिकों ने अब तक पक्षियों में चूसने की क्रिया नहीं देखी थी। लेकिन करंट बायोलॉजी (Current Biology journal) में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि सनबर्ड मकरंदपान चूसकर ही करते हैं। यह खोज और भी रोमांचक इसलिए है कि हम मनुष्य या अन्य कशेरुकी जब चूसकर किसी चीज़ का पान करते हैं तो मुंह थोड़ा सिकोड़ते हैं। लेकिन सनबर्ड में यह पहला मामला देखने को मिला है जब कोई कशेरूकी बिना अपने मुंह का आकार बदले, सिर्फ अपनी जीभ से पैदा किए गए सक्शन (खिंचाव) (tongue suction mechanism) के ज़रिए कुछ पान करता है।

सनबर्ड और हमिंगबर्ड (hummingbird comparison) की चोंच पतली व लंबी होती है, जो अभिसारी विकास का उदाहरण है। अभिसारी विकास यानी कई अलग-अलग असम्बंधित प्रजातियों में एक से पर्यावरणीय दवाब के कारण एक जैसे अंगों का विकास। जीवविज्ञानी डेविड क्यूबन (David Hu research) की इनमें दिलचस्पी जगी। ये दोनों तरह के पक्षी आम तौर पर अपनी चोंच की मदद से घंटीनुमा फूलों के अंदर मौजूद मकरंद को पी लेते हैं। हमिंगबर्ड के मकरंद पीने का तरीका ऐसा है कि वे अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालते हैं, जिससे जीभ की नोक पर मकरंद चिपक जाता है। फिर वे जीभ को चोंच के अंदर ले जाते हैं और चोंच को कसकर बंद करके जीभ को निचोड़ते (capillary action feeding) हैं जिससे मकरंद उनके मुंह में आ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तौलिए को निचोड़ने से पानी निकलता है।

वाशिंगटन युनिवर्सिटी (University of Washington study) के क्यूबन जानना चाहते थे कि क्या सनबर्ड भी ऐसा ही करती हैं या उनके रसपान का तरीका अलग है। यह पता करने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया में सनबर्ड की सात प्रजातियों का हाई-स्पीड कैमरे (high speed camera analysis) की मदद से मकरंदपान का वीडियो बनाया। इसके लिए उन्होंने थ्री-डी प्रिंटर की मदद से नकली फूल बनाए। इन फूल के निचले हिस्से को एक स्क्रीन के नीचे रखा, ताकि वे पक्षियों को परेशान किए बिना उनकी जीभ की हरकत को फिल्मा सकें। चूंकि सनबर्ड की जीभ पारभासी होती है, इसलिए वे जीभ से बहते हुए मकरंद को देख सकते थे। आप भी इस प्रक्रिया का आनंद इन वेबसाइट्स पर ले सकते हैं:

https://news.berkeley.edu/2026/04/13/sunbirds-suck-scientists-find-hummingbirds-dont

वीडियो ध्यान से देखने पर पता चला कि हमिंगबर्ड के विपरीत, सनबर्ड ने अपनी जीभ को फूल के अंदर सिर्फ एक बार डाला। उन्होंने जीभ को वहीं रखा जब तक कि पूरा मकरंद नहीं पी लिया और तब तक अपनी चोंच भी बंद नहीं की। देखा गया कि सनबर्ड मकरंदपान (feeding pattern) करते समय अपनी जीभ को बस थोड़ा सा ही अंदर खींचते थे। और कभी-कभी चोंच के अंदर जीभ को ऊपर-नीचे भी करते थे।

क्यूबन और उनके साथियों (scientific findings) का कहना है कि जीभ की ऐसी हरकत सनबर्ड की जीभ की बनावट के साथ मिलकर, एक खिंचाव (suction) पैदा करती है। इन पक्षियों की जीभ के ऊपरी हिस्से पर एक V-आकार की नाली होती है। जब वे अपनी जीभ को चोंच के ऊपरी हिस्से से दबाते हैं, तो वह चपटी हो जाती है और नाली सिकुड़ जाती है। जीभ को नीचे की ओर खींचने से चोंच के ऊपरी हिस्से और नाली के बीच जगह बन जाती है, जिससे एक खिंचाव (fluid dynamics mechanism) पैदा होता है जो फूलों से रस को अंदर खींच लेता है। टीम ने तरल पदार्थों की गतिशीलता की कंप्यूटर मॉडलिंग की और इससे उन्हें समझ आया कि रस को अंदर खींचने के संभावित अन्य कारणों, जैसे केशिका क्रिया (capillary action), इस मामले में काम नहीं करते। यह जानना कि सनबर्ड अपनी जीभ का इस्तेमाल खाने के लिए कैसे करते हैं, इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि फूलों के साथ उनका विकास एक साथ कैसे हुआ और हमिंगबर्ड की तुलना में उनके खाने का तरीका अलग क्यों है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कुत्ते कब पालतू बने?

चाहे गांव हो या शहर, ऐसा कोई गली-मोहल्ला नहीं होगा जहां कुत्ते (street dogs) दिखाई न दें। जहां-जहां मनुष्यों की आबादी है, कुत्ते वहां-वहां दिख ही जाते हैं। आजकल तो ऐसी खबरें भी सुनने को मिलती हैं कि गली में घूमते कुत्ते कुछ ज़्यादा ही आक्रामक (dog aggression) हो गए हैं, और लोग गली के कुत्तों से थोड़ा कतराने लगे हैं। लेकिन कभी कुत्ते मनुष्यों के लिए बहुत खास हुआ करते थे। सुरक्षा से लेकर रास्तों की पहचान तक में वे काम आते थे। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आज कुत्तों का कोई महत्व नहीं रहा। लोग प्रेमवश उन्हें पालते हैं; पुलिस नशीले पदार्थों को ढूंढने में, लोगों की पहचान करने में, ढूंढने में कुत्तों की मदद लेती है; लोगों के सहायकों (service dogs) के रूप में भी वे काम आते हैं।

लेकिन सवाल है कि कुत्ते (dog domestication) ठीक कब से मनुष्यों के साथ हैं। और भेड़ियों से कुत्ते में कब विकसित होना शुरू हुए? वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि कुत्ते भूरे भेड़ियों (gray wolves) के वंशज हैं, लेकिन उनके लिए यह सवाल हमेशा सवाल ही रहा कि यह विकास प्रक्रिया ठीक-ठीक कब, कहां, कैसे चली।

अब तक, सबसे प्राचीन कुत्ते के जो पुख्ता जीवाश्म प्रमाण (fossil evidence) मिले हैं वे लगभग 11,000 साल पुराने हैं, जो उत्तर-पश्चिमी रूस के एक खुदाई स्थल से मिले थे। हालांकि इसके बाद और इसके पहले पुरातत्वविदों को खुदाई स्थल से इससे भी कहीं ज़्यादा प्राचीन हड्डियां मिली थीं, जिनकी कद-काठी देखने में भेड़ियों की बजाय कुत्तों जैसी थी – जैसे खोपड़ियां छोटी और चौड़ी थीं। यह इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि ये बदलाव भेड़ियों के पालतू बनने की प्रक्रिया (domestication process) के दौरान उनमें आए थे। लेकिन पक्के तौर पर कुछ कहने के लिए इनके बारे में ज़रूरी विस्तृत जेनेटिक जानकारी (genetic data) उपलब्ध नहीं थी। तो मामला वहीं अटका रहा।

अब हालिया अध्ययन इस बारे में थोड़ा प्रकाश डालता है। दरअसल वर्ष 2004 में, मध्य तुर्की के पुनारबश नामक एक शिकारी-संग्राहक काल के खुदाई स्थल (Pinarbasi Turkey site) से वैज्ञानिकों को एक मानव कब्र के ठीक पास की कब्र में तीन पिल्लों की हड्डियां मिली थीं। हड्डियां इतनी छोटी थीं कि यह बताना मुश्किल था कि वे भेड़िए के पिल्लों की थीं या कुत्तों के पिल्लों की। मानव कब्र के इतने पास मिलने से ऐसा लगता था कि वे कुत्तों के पिल्लों की ही होंगी। लेकिन जब यह पता किया गया कि वे कितनी पुरानी हैं तो पता चला कि वे करीब 15,800 साल पुरानी हैं। यानी कुत्ते के अब तक मिले पक्के प्रमाणों (ancient dog fossils) से भी 5000 साल पुरानी!

फिर क्या था, शोधकर्ताओं ने उनमें से एक पिल्ले का डीएनए अनुक्रमण किया। इसके साथ ही, उन्होंने दक्षिणी इंग्लैंड की गॉग गुफाओं (Gough’s Cave England) (14,300 साल प्राचीन) और उत्तरी स्विट्ज़रलैंड की केसलरलॉक गुफाओं (Kesslerloch Cave Switzerland) (14,200 साल प्राचीन) से मिले कुत्ते सरीखे जानवरों का भी डीएनए अनुक्रमण किया। विश्लेषण में पता चला कि पुनारबश से मिले अवषेश पूर्णत: कुत्ते के थे, और उसमें भेड़िए जैसे कोई अंश नहीं थे। इसके अलावा अन्य दो गुफाओं से मिले अवशेष भी कुत्तों के ही निकले।

और तो और तुर्की, इंग्लैंड और स्विट्ज़रलैंड के खुदाई स्थलों के बीच भले ही भौगोलिक दूरी और सांस्कृतिक अंतर बहुत ज़्यादा है लेकिन इन तीनों स्थलों से मिले कुत्तों के जीनोम (genome similarity) एक-दूसरे के काफी समान थे। मसलन गॉग गुफाओं के रहवासी मैडेलेनियन संस्कृति का हिस्सा थे और वे बेहतरीन गुफा-चित्रकारी और इंसानी खोपड़ियों से प्याले बनाने के लिए जाने जाते हैं। वहीं, पुनारबश में एंटोलियन शिकारी-संग्रहकर्ता (Anatolian hunter gatherers) लोग रहते थे। जिनके वंशजों ने बाद में युरोप में खेती-बाड़ी की शुरुआत की। शोधकर्ता कहते हैं कि इन अलग-अलग संस्कृतियों के इंसानों के डीएनए में अंतर था, लेकिन कुत्तों के डीएनए में ऐसा कोई अंतर नहीं दिखा। इससे अंदाज़ा मिलता है कि ये सभी कुत्ते एक ही मूल आबादी से विकसित हुए थे। यानी ये कुत्ते युरोप के आदि-कुत्ते थे – कुत्तों की एक ऐसी प्राचीन नस्ल, जो उस समय तक किसी खास काम के लिए विशेष रूप से विकसित नहीं हुई थी। बाद में कुत्तों को कई तरह के काम करने के लिए पाला गया, जैसे शिकार (hunting dogs) में मदद करने के लिए, रखवाले के तौर पर।

अलग-अलग जगहों पर मिले कुत्तों और इंसानों के डीएनए के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि लगभग 21,000 से 12,000 साल पहले तक पूरे दक्षिणी और पूर्वी युरोप में रहने वाले एपिग्रेवेटियन लोग (Epigravettian culture) शायद पूरे महाद्वीप में कुत्तों को फैलाने में मददगार रहे होंगे।

एक अन्य अध्ययन भी ऐसा ही कुछ इशारा करता है। जब शुरुआती किसान युरोप में आकर बसे और अपने साथ कुत्ते लाए तब नवागंतुक मनुष्यों ने तो लगभग पूरी तरह से पहले से मौजूद युरोपीय लोगों की जगह ले ली। लेकिन कुत्तों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। नवागंतुक कुत्तों के साथ-साथ पहले से मौजूद कुत्ते भी बने रहे। लगभग 9000 से 7000 साल पहले (युरोप में कृषि आगमन से पहले और बाद का समय) के कुत्तों के अवशेषों का विश्लेषण (ancient DNA analysis) करके पता चला है कि युरोपीय कुत्तों के डीएनए का केवल लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ही पूर्वी कुत्तों के डीएनए से प्रतिस्थापित हुआ था। इससे पता चलता है कि प्रवासी किसानों को युरोपीय कुत्ते विशेष रूप से उपयोगी लगे होंगे और उन्होंने इन कुत्तों को अपने साथ शामिल किया, न कि उन्हें अपने कुत्तों से बदलने की कोशिश की। लेकिन उत्तरी अमेरिका में इसका ठीक उल्टा हुआ, जहां उपनिवेश बनाने वाले युरोपीय लोगों (European colonization) ने मूल कुत्तों को लगभग पूरी तरह से विलुप्त कर दिया। ऐसा शायद नवागंतुक कुत्तों का उपयोगिता या खूबी के कारण हुआ होगा।

नेचर में प्रकाशित (Nature journal study) उपरोक्त दोनों ही अध्ययन कुत्ते के विकास और फैलाव पर थोड़ी रोशनी तो डालते हैं लेकिन फिर भी इस सवाल का जवाब अभी पूरा नहीं देते हैं कि अंतत: कुत्ते कहां से आए। उम्मीद है कि आगे ऐसी ही और खोजें और तफ्तीश (future research) इस सवाल को सुलझाने में मददगार होंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी पर ‘आज़माइशी’ जीवन की खोज 

डॉ. इरफ़ान ह्यूमन

जीवाश्म (fossils) वे अश्मीभूत अवशेष या निशान होते हैं जो किसी प्राचीन सजीव के मरने के बाद लाखों- करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि जीवाश्म हमेशा पूरे के पूरे जीव के रूप में मिलें, बल्कि इनके कुछ हिस्से अश्मीभूत रूप मिल सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत, खोल या कवच (सीप, घोंघे के), पत्ती या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारा के जीवों की)। एडिआकारा के जीवाश्म अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनमें अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (Geological Society of America) के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत बारीक विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, वह भी ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यत: संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता।

दरअसल, जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश (soft bodied organisms), वे जीव लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं मिल पाते। फिर, बलुआ-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिनमें पानी आसानी से रिस सकता है। ये चट्टानें आम तौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती हैं। ऐसे हालातों में नाज़ु़क जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले कुछ असाधारण हुआ। इसे एडिआकारन काल (Ediacaran period) कहा जाता है। इस दौरान समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता (exceptional fossilization) के साथ संरक्षित हो गए।

लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पूर्व से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास (geological time scale) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहली बार बड़े, जटिल और नग्न आंखों से देखे जा सकने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में अधिकांश जीवों के शरीर में न तो हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे, बस त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अत: एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग (Precambrian era) का अंतिम दौर था, जिसके बाद कैंब्रियन युग शुरू हुआ।

ये जीव कैंब्रियन जैविक विस्फोट (Cambrian explosion) से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध जंतु जीवन का तेज़ी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे विकसित प्रक्रिया (gradual evolution) का परिणाम मानते हैं।

येल विश्वविद्यालय (Yale University) की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन (Lydia Tarhan) इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ़्यूज़’ कहती हैं, जिसमें एडिआकारा जीव समूह के जानवर  आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।

अश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया (fossilization process)

इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना विकासक्रम (evolutionary history) में उनके स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया एक अध्ययन, जो जियोलॉजी पत्रिका (Geology journal) के 15 दिसम्बर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है: Authigenic clays shaped Ediacara-style exceptional fossilization।

अध्ययन में शोधकर्ताओं (scientific study) ने एक नई रासायनिक तकनीक अपनाई। उन्होंने न्यूफाउंडलैंड और उत्तर-पश्चिमी कनाडा से मिले एडिआकारा जीवाश्मों में लीथियम समस्थानिकों का विश्लेषण किया। इनमें वे जीवाश्म भी शामिल थे जो रेतीले और कीचड़युक्त दोनों प्रकार के तलछट में सुरक्षित थे। इन समस्थानिकों से यह पता लगाने में मदद मिली कि क्या मिट्टी के खनिजों ने अश्मीभूत करने में भूमिका निभाई और क्या ये मिट्टियां ज़मीन से बहकर आई थीं (डिट्राइटल क्ले – detrital clay) या समुद्र तल के भीतर ही बनी थीं (ऑथिजेनिक क्ले)।

पता चला कि डिट्राइटल मिट्टी के कण पहले से ही उस तलछट में मौजूद थे, जिसने इन जीवों को ढंका था। इन्हीं कणों की सतह पर नई मिट्टियां समुद्र तल के भीतर ही बनने लगीं। सिलिका और लौह से भरपूर समुद्री जल तथा एडिआकारन काल के महासागरों की असामान्य रसायनिकी (ocean chemistry) ने इन ऑथिजेनिक मिट्टियों को बढ़ने में मदद की।

असल में, ये मिट्टियां प्राकृतिक सीमेंट (natural cementation) की तरह काम करने लगीं। इन्होंने रेत के कणों को आपस में बांध दिया और कोमल ऊतकों की महीन आकृतियों और छापों को रेत-पत्थर में स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। डॉ. टार्हन भविष्य में इसी लीथियम समस्थानिक तकनीक (geochemical analysis) को अन्य क्षेत्रों और कालों के जीवाश्मों पर लागू करने की योजना बना रही हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ऐसी ही प्रक्रियाएं कहीं और भी सक्रिय थीं। फिलहाल, यह अध्ययन हमें उस दौर की पृथ्वी की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर (ancient Earth history) देता है, जब जंतु जीवन के विकास में एक निर्णायक मोड़ आया था।

यह खोज उस पुरानी धारणा (scientific theory) को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारा बायोटा (Ediacara biota) इसलिए सुरक्षित रहे क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मज़बूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड (preservation conditions) में बच पाना असाधारण पर्यावरणीय परिस्थितियों का परिणाम था।

कहां मिलते हैं ये जीवाश्म

एडिआकारा बायोटा के जीवाश्म (global fossil sites) ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में मध्य प्रदेश (भीमबैठका) और राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) (India fossil sites) के प्राचीन तलछटों में इनके पाए जाने का दावा है।

वैज्ञानिकों के लिए अब भी यह पहेली है कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा (extinct life forms) थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी ‘आज़माइशी जीवन रूप’ (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फॉर्म्स – experimental life forms) भी कहा जाता है।

जो भी हो, हम आज जो जीवन देखते हैं, वह जीवाश्मों की डायरी (history of life on Earth) पढ़कर ही समझा गया है, वरना पृथ्वी का अतीत पूरी तरह रहस्य बना रहता! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ती गर्मी से कीटों पर बढ़ता संकट

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।

गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।

कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research)  से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।

अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।

इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।

यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।

कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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उड़ते समय भौंरे खुद को ठंडा कैसे रखते हैं?

भौंरे (bumblebees) ज़बर्दस्त उड़ाके होते हैं। वे लगभग 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकते हैं। इतनी तेज़ उड़ान के दौरान उनकी मांसपेशियां फड़फड़ाकर काफी गर्मी पैदा करती हैं। तो उड़ते समय भौंरे का शरीर बहुत गर्म हो सकता है। जैसे कार का इंजन (engine overheating), जिसे ठंडा न किया जाए तो खूब गर्म हो सकता है। तो भौंरे उड़ान के दौरान गर्म होकर झुलस क्यों नहीं जाते?

नए शोध (scientific research) से पता चला है कि वे अपने पंखों की तेज़ फड़फड़ाहट से बहने वाली हवा के ज़रिए खुद को ठंडा रखते हैं: जब भौंरा हवा में एक जगह ठहरकर उड़ता है, तो उसके पंखों से नीचे की ओर बहती हवा उसके शरीर का तापमान (body temperature cooling) लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तक कम कर देती है। इतने छोटे कीट के लिए यह बहुत बड़ी राहत है।

उड़ान के दौरान भौंरों की मांसपेशियां (flight muscles) बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करती हैं। ठंड में तो यह गर्मी उड़ान के लिए वार्मअप (muscle warm-up) में काम आ जाती है। लेकिन गर्मियों में यह खतरनाक साबित होती है।

अतिरिक्त गर्मी (heat stress) से निपटने के उनके कुछ तरीके तो पहले से मालूम हैं। वे अपने वक्षस्थल (thorax) (जहां उड़ान की मांसपेशियां होती हैं) से गर्मी को शरीर के पिछले हिस्से तक एक खास द्रव के जरिए पहुंचा सकते हैं। वैज्ञानिक यह भी देखते रहे हैं कि धूप (solar heating) उन्हें कितना गर्म करती है और पसीने जैसी प्रक्रिया (वाष्पीकरण) से उन्हें कितनी ठंडक मिलती है। इन सबको मिलाकर वैज्ञानिक ‘ऊष्मा संतुलन मॉडल’ (heat balance model) कहते हैं। लेकिन अब तक एक बात स्पष्ट नहीं थी: क्या उनके पंखों से पैदा होने वाला वायु प्रवाह (airflow from wings) भी उन्हें ठंडा करने में मदद करता है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने भौंरों को एक खास प्रयोगशाला कक्ष (laboratory experiment) में रखा, जहां हवा की गति मापने वाले उपकरण (air velocity sensors) लगे थे। जब भौंरे नकली फूलों के ऊपर मंडरा रहे थे, तब शोधकर्ताओं ने देखा कि उनके आसपास हवा लगभग 0.25 से 2 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बह रही थी। धुंध जैसी हल्की फुहार का इस्तेमाल करके उन्होंने यह भी देखा कि हवा उनके शरीर के चारों ओर कैसे फैलती है।

यह जानने के लिए कि यह हवा उन्हें कितनी ठंडक देती है, वैज्ञानिकों ने और भी परीक्षण किए। उन्होंने भौंरों के शरीर में बहुत छोटे तापमापी (micro temperature sensors) लगाए और हवा की वही स्थिति बनाई। तापमान में बदलाव (thermal measurement) की तुलना करके उन्होंने पाया कि अगर पंखों से पैदा होने वाली यह ठंडक न मिले, तो भौंरा दो मिनट से भी कम समय में तपकर टपक सकता है।

यानी भौंरों के पंखों से पैदा होने वाला हवा का बहाव (natural cooling system) एक तरह का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम है। हालांकि वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि जब भौंरे उड़ते-उड़ते आगे बढ़ते हैं, तब यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।

यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि बढ़ते वैश्विक तापमान (global warming) का सीधा असर भौंरों के जीवित रहने और परागण की क्षमता पर पड़ सकता है। अगर हम समझ लें कि भौंरे अपने शरीर की गर्मी को कैसे नियंत्रित (thermoregulation in insects) करते हैं, तो शायद भौंरो के बचाव के कुछ कारगर कदम (bumblebee conservation) उठा सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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