ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

लवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूकंप जोखिम का नया नक्शा आया और चला गया

माधव केलकर

पिछले साल यानी नवंबर 2025 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेडर्ड (बी.आई.एस.) ने भारत के लिए भूकंप जोखिम वाले इलाकों का नया नक्शा जारी किया था। इससे पहले सन 2016 में भी बी.आई.एस. (BIS) द्वारा एक नक्शा जारी किया गया था, उसको आधार मानकर ही भारत में इमारतें, भवन, सड़कें, पुल, हवाई अड्डे आदि का निर्माण निर्धारित भवन मानकों के अनुसार किया जा रहा था। लगभग 9 साल बाद आए इस नक्शे के बारे में बताया गया है कि भारत की टेक्टॉनिक गतिविधियों, सक्रिय फॉल्ट ज़ोन, उपग्रहों से प्राप्त जानकारी आदि आंकड़ों की रोशनी में यह भूकंप प्रवण क्षेत्रों (earthquake-prone area/ seismic zone) को दर्शाने वाला नक्शा बनाया गया है। इस नक्शे के बारे में एक और बात कही जाती है कि यह नक्शा भूगर्भीय तथ्यों के आधार पर बनाया गया है। इसलिए ज़मीन के ऊपर मौजूद कोई जगह प्रशासनिक, सामरिक या व्यापारिक दृष्टि से कितनी भी महत्वपूर्ण हो, उसे भूकंपीय खतरे के लिहाज़ से जिस ज़ोन में होना चाहिए, उसी ज़ोन में दिखाया गया है। जगह के महत्व के आधार पर ज़ोन की सीमा-रेखा के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई है।

बहरहाल, नए भूकंपीय जोखिम नक्शे को जारी करने के महज़ चार-पांच महीनों के बाद वापस ले लिया गया। एक बार फिर हम पुराने नक्शे पर लौट आए हैं। नया नक्शा वापस क्यों हुआ इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। बस, कुछ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। चलिए, पहले नए नक्शे की कुछ खास बातों को देखने से पहले पिछले कुछ पन्ने पलटते हैं।

सन 2025 से पहले के नक्शे

भारत को भौगोलिक रूप से तीन मुख्य टेक्टॉनिक क्षेत्रों (tectonic areas) में बांटा जा सकता है: उत्तर में हिमालय,  हिमालय से सटा गंगा-सिंधु का मैदान और दक्षिण में प्रायद्वीपीय भारत। भारत में इन तीनों भौगोलिक क्षेत्रों में भूकंप के खतरे और उससे जुड़े जोखिमों का स्तर अलग-अलग है। इसलिए, 1935 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत का पहला भूकंप संभावित इलाकों का नक्शा तैयार किया। इसमें ज़मीन के हिस्सों को भारी, मध्यम और हल्के से लेकर बिना नुकसान वाले क्षेत्रों में बांटा गया था। यह भारत के उपरोक्त  तीन भौगोलिक क्षेत्रों से काफी हद तक मेल खाता था।

पूरा हिमालय क्षेत्र तेज़ तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय प्लेट युरेशियन प्लेट की ओर लगातार लगभग 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से बढ़ रही है, जिससे धरातल के नीचे की चट्टानी परतों में तनाव पैदा होता है और फिर वह छूटता है।

पिछले सवा सौ साल में हिमालय क्षेत्र में चार बड़े भूकंपों का रिकॉर्ड है: शिलांग भूकंप (1897, तीव्रता 8.1), कांगड़ा भूकंप (1905, तीव्रता 7.9), बिहार-नेपाल भूकंप (1934, तीव्रता 8.3), और असम-तिब्बत भूकंप (1950, तीव्रता 8.6)।

इनमें से शिलांग भूकंप के अलावा बाकी भूकंप सीधे तौर पर हिमालयी प्लेट की सीमा से जुड़े हैं। इसके अलावा, हिमालय के कई हिस्सों की पहचान ‘सिस्मिक गैप’ (भूकंपीय अंतराल) के तौर पर की गई है, जहां भविष्य में कभी भी विनाशकारी भूकंप आने की आशंका है।

हिमालयी प्लेट-टकराव वाले इलाके से सटे घनी आबादी वाले सिंधु-गंगा के मैदान भी बड़े हिमालयी भूकंपों और तेज़ स्थानीय भूकंपों के प्रति बहुत संवेदनशील हैं, क्योंकि यहां की मोटी अवसादी परत ज़मीन की हलचल को बढ़ा देती है। साथ ही, प्रायद्वीपीय भारत के कुछ अलग-थलग हिस्सों में मध्यम तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं, जिनसे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।

1935 तक प्रायद्वीपीय भारत में कोई उल्लेखनीय भूकंप दर्ज नहीं हुआ था। इसलिए इस पूरे इलाके को तीव्र भूकंप संभावित ज़ोन से बाहर रखा गया था।

1960 के दशक में प्लेट टेक्टॉनिक्स (tectonic plates) के सिद्धांत को मान्यता मिलने के बाद भारत में भारतीय प्लेट, युरेशियन प्लेट के खिसकने की गति, हिमालय की ऊंचाई बढ़ने, हिमालय के इलाके में मौजूद भ्रंश रेखा वगैरह का अध्ययन किया जाने लगा। इसी समय नर्मदा-सोन-ताप्ती नदी घाटियों में मौजूद भ्रंश रेखा के बारे में भी जानकारियां जुटाने का सिलसिला शुरू हुआ। इन सब शोधकार्यों की वजह से 1970 में भारत को भूकंप प्रवणता वाले पांच क्षेत्रों (ज़ोन) में बांटा गया। ज़ोन 2 में भूकंप का खतरा बेहद कम था। जबकि ज़ोन 5 में भूकंप का सबसे ज़्यादा खतरा था। ज़ोन 5 में हर साल कम तीव्रता के दर्ज़न भर भूकंप दर्ज होते थे। लेकिन खतरनाक तीव्रता के भूकंप कुछेक सालों में एक बार आते थे। ज़ोन 3 और 4 में भूकंप का खतरा तो था लेकिन यहां भी बड़े भूकंप की आशंका कम आंकी गई थी।

भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहला भूकंपीय ज़ोन मानचित्र जारी किया था। 1970 में इसका संशोधित रूप ज़ारी किया गया। सन 2002 में जो भूकंपीय मानचित्र जारी किया गया उसमें ज़ोन 1 को खत्म कर उसे ज़ोन 2 में मिला दिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में भारत के कई शहरों में भूकंप मापी उपकरण (seismograph) लगाकर इनका एक नेटवर्क बनाया गया है। इसकी बदौलत ज़ोन 2, 3 व 4 में भी ज़मीन के भीतर की हलचलों पर करीबी नज़र रखना संभव हुआ है। साथ ही, हिमालय, तराई इलाके, कच्छ का रन, राजस्थान और उत्तर-पूर्व के राज्यों के नीचे की ज़मीनी हलचलों को बेहतर तरीके से परखा गया है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लेते हैं। इस प्रदेश में ऊपरी सतह जितनी स्थिर दिखती है सतह के कुछ किलोमीटर नीचे उतनी स्थिरता नहीं है। सोन-नर्मदा उत्तरी भ्रंश, सोन-नर्मदा दक्षिणी भ्रंश, बड़वानी-सुक्ता भ्रंश, ताप्ती उत्तरी भ्रंश, गोविलगढ़ भ्रंश जैसी कई टूट-फूट व दरारें हैं, और वहां की चट्टानी परतों में ढेर सारी ऊर्जा संचित है।

भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2016 में भी नक्शा जारी किया था।

सन 2025 का नक्शा

पिछले तीन-चार दशक के दौरान भारत और पड़ोसी देशों में आए प्रमुख भूकंपों में शामिल हैं: बिहार-नेपाल भूकंप (1988, तीव्रता 6.8), उत्तरकाशी भूकंप (1991, तीव्रता 6.8), किल्लारी-लातूर भूकंप (1993, तीव्रता 6.3), जबलपुर भूकंप (1997, तीव्रता 6.1), चमोली भूकंप (1999 तीव्रता 6.5), भुज भूकंप (2001, तीव्रता 7.7), हिंद महासागर सुनामी (2004, तीव्रता 9.3), कश्मीर भूकंप (2005, तीव्रता 7.6), सिक्किम भूकंप (2011, तीव्रता 6.9) और नेपाल भूकंप (2015, तीsव्रता 7.9)।

इन भूकंपों के बाद की गई जांच-पड़ताल से पता चला कि इनमें ज़्यादातर मौतें मुख्य रूप से उन इमारतों और ढांचों के ढहने से हुईं जो भूकंप-रोधी डिज़ाइन नियमों का पालन नहीं करते थे। दुनिया के कई अन्य हिस्सों में इतनी ही तीव्रता वाले भूकंपों से जान-माल का इतना भारी नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि वहां इमारतें और ढांचे भूकंप-रोधी खूबियों के साथ और सख्त तकनीकी-कानूनी नियमों के अंतर्गत  बनाए गए थे। इसलिए, यह समझदारी की बात है कि भारत में विकास की प्रक्रिया में भूकंप से होने वाले जोखिम को कम करने के उपायों को शामिल किया जाए। इसके लिए देश के भूकंप जोखिम ज़ोन्स (जो मात्रात्मक रूप से और अधिक वास्तविक डैटा पर आधारित हों) के आधार पर भूकंप-रोधी डिज़ाइन (earthquake resistant designs) वाली इमारतें और बुनियादी ढांचे बनाए जाने चाहिए।

अपने अनुभवों और युरोप, जापान वगैरह द्वारा अपनाए जा रहे मानकों की रोशनी में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2025 में नया भूकंपीय जोखिम का नक्शा जारी किया गया। सन 2025 में जारी किए गए नक्शे में पूर्ववर्ती नक्शों के मुकाबले एक नया ज़ोन यानी ज़ोन नंबर 6 जोड़ा गया है। पूर्ववर्ती बाकी ज़ोन के एरिया को भी बढ़ाया-घटाया गया है।

नए नक्शे में छत्तीसगढ़, मध्य भारत, दक्कन के पठार के कुछ इलाकों के अलावा दक्षिण भारत के राज्यों को ज़ोन 2 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की आशंका बेहद कम है।

मध्य भारत, नर्मदा घाटी, झारखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा के कुछ इलाकों को ज़ोन 3 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की मध्यम संभावना है।

ज़ोन 4 में उत्तरी मैदान, दिल्ली के कुछ इलाके शामिल हैं। नर्मदा-सोन घाटी के कुछ इलाके भी ज़ोन 4 में शामिल किए गए हैं। यह वह इलाका है जहां भूकंप का उच्च खतरा मौजूद है।

ज़ोन 5 में गुजरात और उत्तर पूर्वी राज्य और हिमालय के तराई वाले इलाके भी शामिल हैं। यहां तीव्र भूकंप का खतरा है।

ज़ोन 6 में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक का पूरा हिमालय क्षेत्र शामिल है, जहां तीव्रतम भूकंप का खतरा है।

इस नए नक्शे के मुताबिक भारत का काफी बड़ा इलाका ज़ोन 4, 5, 6 यानी तीव्र भूकंप प्रवण इलाके में आता है।

इस नक्शे में यदि कोई शहर निम्न जोखिम वाले ज़ोन में है लेकिन निम्न और उच्च जोखिम ज़ोन की सीमा पर है, तो उस शहर को उच्च ज़ोन में गिना जाएगा और उस पर वे सब मानक लागू होंगे जो ज़्यादा खतरे वाले ज़ोन पर लागू होते हैं।

नया नक्शा, नए पेंच

नया नक्शा प्रस्तावित करते ही यह समझ में आने लगा कि इस नक्शे के ज़ोन 5 और ज़ोन 6 में उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत, हिमालय की तराई और मध्य हिमालय के इलाके शामिल हैं। इसलिए भविष्य में प्रस्तावित परियोजनाओं, पुलों, सुरंगों, सड़कों, भवनों, अस्पतालों, बांधों, पर्यटन विस्तार कार्यक्रम सभी पर उस ज़ोन के भूकंप सुरक्षा मानक लागू होंगे और जो परियोजनाएं शुरू हो रही हैं उनकी लागत नए मानकों को लागू करने की वजह से बढ़ जाएगी।

इसी तरह ज़ोन 5 में पुरानी इमारतों का मज़बूतीकरण करना भी अनिवार्य हो जाएगा।

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और आपदा प्रबंधन टीमों को एक बड़े इलाके में राहत और बचाव का काम करने के लिए तैयार रहना होगा।

शायद, एक बेहतर तकनीक के सहारे भूवैज्ञानिकों ने भारत के भूकंप प्रवण इलाके का नक्शा तैयार किया है। जिसमें हिमालय, तराई, भुज-कच्छ जैसे भूकंप के पारंपरिक इलाकों के अलावा भारत के कई अन्य इलाकों की भूगर्भीय स्थितियों का आकलन करके खतरे के दायरे को बताया गया है। भारतीय मानक ब्यूरो ने इन खतरों को समझते हुए हर इलाके के लिए सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं के लिए मानक तैयार किए थे।

अब मामला आता है इन मानकों का पालन करवाने का। यहां आकर हम सिर्फ कयास ही लगा सकते है कि शायद आगे की परियोजनाओं और इन मानकों में ताल-मेल बिठाना कठिन लगने लगा हो। यह भी सोचा गया हो कि पुराने मानक अब भी उपयोगी हैं। इसलिए पुराने मानकों को लागू रखने पर लौट आए हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गाज़ा: तबाही के साये में शोध कार्य

युद्ध (war), तबाही (destruction) और अनिश्चितता (uncertainty) के बावजूद, गाज़ा (Gaza) के वैज्ञानिक (scientists) अपने शोध (research) कार्य जारी रख रहे हैं। वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि शोध (scientific research) न केवल विनाश (documentation of destruction) के दस्तावेज़ीकरण और पुनर्निर्माण (reconstruction efforts) प्रयासों में मदद करता है, बल्कि मानवीय संकटों (humanitarian crisis) के समाधान के लिए भी आवश्यक है। 19 जनवरी को हमास (Hamas) और इस्राइल (Israel) के बीच अस्थायी संघर्ष विराम (ceasefire) से वैज्ञानिकों को स्थिति का आकलन करने का अवसर मिला है।

न्यूरोसाइंटिस्ट (neuroscientist) खमीस एलसी, जो वर्तमान में घायलों का इलाज कर रहे हैं, युद्ध के प्रभावों को दर्ज करने और प्रकाशित करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। इसी तरह, जलवाहित रोगों (waterborne diseases) के विशेषज्ञ सामर अबूज़र सुधार व पुनर्निर्माण में शोध (scientific studies) की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, विज्ञान (science) और शिक्षा (education) के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के चलते वैज्ञानिकों (Gaza scientists) ने अपना काम जारी रखा है।

युद्ध (conflict) के कारण गाज़ा की 22 लाख आबादी में से 90 प्रतिशत बेघर (homeless) हो गई है। भोजन (food crisis), पानी (water shortage), स्वास्थ्य सेवाएं (healthcare services) और शिक्षा (education crisis) जैसी बुनियादी सुविधाएं या तो नष्ट हो गई हैं या अत्यधिक सीमित रह गई हैं। बमबारी (airstrikes) से तबाह इलाकों से मलबा हटाना एक बड़ी चुनौती है। गाज़ा (Palestine conflict) के प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में करीब 100 किलोग्राम मलबा जमा है जिसमें खतरनाक पदार्थ (hazardous materials) भी मौजूद हैं।

गाज़ा में पानी (clean water crisis) की स्थिति भी गंभीर है। यहां 97 प्रतिशत पानी भूजल स्रोतों (groundwater contamination) से आता है, जो अत्यधिक असुरक्षित हैं और इनके दूषित होने का खतरा भी है। युद्ध (war damage) से पहले भी महज 10 प्रतिशत लोगों को साफ पानी (safe drinking water) मिलता था, लेकिन अब मात्र 4 प्रतिशत लोगों को ही मिल रहा है। टूटी-फूटी सीवेज लाइन (damaged sewage system) के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे डायरिया (diarrhea) और हेपेटाइटिस (hepatitis outbreak) जैसी जलवाहित बीमारियों (waterborne infections) का खतरा बढ़ गया है।

युद्ध (war crisis) के कारण गाज़ा (Gaza universities) के 21 उच्च शिक्षण संस्थानों में से 15 बुरी तरह क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके हैं। अस्पतालों (hospitals in Gaza) की स्थिति भी गंभीर है – लगभग आधे पूरी तरह बंद हैं, जबकि बाकी सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों (chronic diseases) से जूझ रहे 11,000 मरीज़ों को न तो इलाज मिल रहा है और न ही उनके पास विदेश में उपचार का कोई अवसर है।

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि सबसे पहले आवास (housing rehabilitation), सीवेज मरम्मत (sewage repair) और स्वास्थ्य सेवाओं (health services restoration) को बहाल करना ज़रूरी है। ऑनलाइन-लर्निंग विशेषज्ञ (online education expert) आया अलमशहरावी अस्थायी शिविर (temporary shelters) और घरों के पुनर्निर्माण (home reconstruction) के लिए तुरंत कदम उठाने की अपील कर रही हैं। वे खुद एक बमबारी (bombing survivor) में बचीं, जिसमें उनके अपार्टमेंट में 30 लोगों की जान चली गई, और अब वे एक शरणार्थी शिविर (refugee camp) में रह रही हैं।

भारी विनाश (mass destruction) के बावजूद, गाज़ा (Gaza research community) के वैज्ञानिक समुदाय का संकल्प अटूट है। वे इस संकट (ongoing crisis) का दस्तावेज़ीकरण कर रहे हैं और भविष्य के पुनर्निर्माण (future rebuilding) में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह साबित करता है कि युद्ध (war-torn regions) के कठिन समय में भी ज्ञान (knowledge) और शोध (scientific progress) को आगे बढ़ते रहना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गाज़ा: बच्चों पर युद्ध का मनोवैज्ञानिक असर

हालिया अध्ययन ने गाज़ा के बच्चों पर युद्ध के विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभावों (psychological Impacts) का एक दिल दहला देने वाला खुलासा किया है। पता चला है कि 96 प्रतिशत बच्चों का मानना है कि उनकी मृत्यु अवश्यंभावी है। वॉर चाइल्ड एलायंस (Child war alliance) के सहयोग से गाज़ा स्थित एक एनजीओ (NGO) द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में बच्चों के गहरे भावनात्मक और मानसिक संकट को उजागर किया गया है। इस अध्ययन में शामिल लगभग आधे बच्चों ने अपने ऊपर होने वाले भारी आघात के कारण मरने की इच्छा व्यक्त की है। 

यह रिपोर्ट गाज़ा में जीवन की जो तस्वीर पेश करती है, उसमें बच्चे लगातार डर(Fear), चिंता(Anxiety) और क्षति से जूझ रहे हैं। लगभग 79 प्रतिशत बच्चे दुस्वप्न (Nightmares) देखते हैं, 73 प्रतिशत में आक्रामकता(Aggression) के लक्षण दिखाई देते हैं, और 92 प्रतिशत को अपने वर्तमान हालात को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस होती है। ये लक्षण उस गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संकेत हैं, जो बमबारियां(Bombardments) देखने, अपनों को खोने और घर से बेघर होने जैसी त्रासदियों का सामना करने से पड़े हैं।

इस सर्वे में 504 बच्चों के देखभालकर्ताओं से जानकारी जुटाई गई। इनमें से कई परिवारों में विकलांग, घायल या अकेले रह रहे बच्चे हैं। यह गाज़ा में 19 लाख से अधिक विस्थापित फिलिस्तीनियों(Palestinians) के मानवीय संकट को उजागर करता है, जिनमें से आधे बच्चे हैं। इनमें से कई बच्चों को बार-बार अपने मोहल्लों से भागने पर मजबूर होना पड़ा है, और अनुमान है कि लगभग 17,000 बच्चे अब अपने माता-पिता (Parents) से बिछड़ चुके हैं। 

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन अनुभवों के गहरे और स्थायी प्रभाव हो सकते हैं। बुरे सपने देखना, सामाजिक रूप से अलग-थलग होना, एकाग्रता में कठिनाई और यहां तक कि शारीरिक दर्द जैसी समस्याएं आम हैं। रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ऐसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं (mental health problems) लंबे समय तक भावनात्मक और व्यवहारिक बदलाव ला सकती हैं, जिससे सदमा पीढ़ियों तक बना रह सकता है।

यह अच्छी बात है कि राहत पहुंचाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं, जिसमें वॉर चाइल्ड (war child) और उसके साझेदारों ने 17,000 बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता (mental health support) दी है। लेकिन संकट का पैमाना बहुत बड़ा है, और संगठन का लक्ष्य अगले तीन दशकों में अपनी सबसे बड़ी मानवीय प्रतिक्रिया के तहत 10 लाख बच्चों की मदद करना है। 

वॉर चाइल्ड यूके (war child UK) की सीईओ हेलेन पैटिन्सन ने मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य आपदा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संकट में बदलने से रोकने के लिए तुरंत अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया। उन्होंने गाज़ा के बच्चों पर पड़े अदृश्य घावों के साथ-साथ घरों, अस्पतालों और स्कूलों के विनाश को दूर करने के लिए वैश्विक हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जोशीमठ: सुरंगों से हिमालय में हुई तबाही का नतीजा – प्रमोद भार्गव

मूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से जल विद्युत संयंत्रों और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के तहत हिमालय क्षेत्र में रेल यातायात और कई छोटी हिमालयी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस अनियोजित आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय दरकने लगा है जहां मानव बसाहटें जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहने वाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करती चली आ रही थीं। हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट किया और उसे विकास का नाम दे दिया। जोशीमठ संकट इसी ‘विकास’ का नतीजा है।

उत्तराखंड के चमोली ज़िले में स्थित जोशीमठ शहर ने कई अप्रिय कारणों से नीति-नियंताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों ने जोशीमठ के बारह दिनों में 5.4 सेंटीमीटर धंस जाने की जानकारी दी है। धंसती धरती की इस सच्चाई को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उत्तराखंड सरकार ने इसरो समेत कई सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे मीडिया के साथ जानकारी साझा न करें। नतीजतन इसरो की बेवसाइट से ये चित्र हटा दिए गए हैं। सरकार का यह उपाय भूलों से सबक लेने की बजाय उन पर धूल डालने जैसा है।

भारत सरकार और राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद हठपूर्वक पर्यावरण के प्रतिकूल जिन विकास योजनाओं को चुना है, उनके चलते यदि लोग अपने गांव और आजीविका के साधनों से हाथ धो रहे हैं, तो सवाल है कि ये परियोजनाएं किसलिए और किसके लिए हैं?

नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन  तथा रेल और बिजली के विकास से जुड़ी तमाम कंपनियों का दावा है कि धरती धंसने में निर्माणाधीन परियोजनाओं की कोई भूमिका नहीं है।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर एक लाख तीस हज़ार करोड़ की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है और नदियों पर बांध निर्माण के लिए नींव हेतु गहरे गड्ढे खोदकर खंभे व दीवारें खड़े किए जा रहे हैं। कई जगह सुरंगें बनाकर पानी की धार को संयंत्र के टर्बाइन पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन तेज़ बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडों के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ रही हैं। यही नहीं, कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए किए जा रहे भीषण विस्फोट भी हिमालय को थर्रा रहे हैं।

हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन हैं। सबसे बड़ी रेल परियोजना के कारण उत्तराखंड के चार ज़िलों (टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) के तीस से ज़्यादा गांवों को विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हज़ार परिवार विस्थापन की चपेट में आ गए हैं। रुद्रप्रयाग ज़िले के मरोड़ा गांव के सभी घर दरक गए हैं। रेल विभाग ने इनके विस्थापन की तैयारी कर ली है। यदि ये विकास इसी तरह जारी रहते हैं तो बर्बादी का नक्शा बहुत विस्तृत होगा। दरअसल ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना 125 किमी लंबी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो 14.8 कि.मी. लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बाकी 15 सुरंगों में ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ की बजाय अब पीपलकोठी तक होगा। भू-गर्भीय सर्वेक्षण के बाद रेल विकास निगम ने जोशीमठ क्षेत्र की भौगोलिक संरचना को परियोजना के अनुकूल नहीं पाया था। अच्छी बात है कि अब इस परियोजना का अंतिम पड़ाव पीपलकोठी कर दिया है। हिमालय की ठोस व कठोर अंदरूनी सतहों में ये विस्फोट दरारें पैदा करके पेड़ों की जड़ें भी हिला रहे हैं। कई अन्य ज़िलों के गांवों के नीचे से सुरंगें निकाली जा रही हैं। इनके धमाकों से घरों में दरारें आ गई हैं। वैसे भी पहाड़ी राज्यों में घर ढलानयुक्त ज़मीन पर ऊंची नींव देकर बनाए जाते हैं जो निर्माण के लिहाज से ही कमज़ोर होते हैं। ऐसे में विस्फोट इन घरों को और कमज़ोर कर रहे हैं। हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी ज़्यादा संवेदनशील है। रेल परियोजनाएं इसी नदी से सटे पहाड़ों के नीचे और ऊपर निर्माणाधीन हैं। 

दरअसल उत्तराखंड का भूगोल बीते डेढ़ दशक में तेज़ी से बदला है। चौबीस हज़ार करोड़ रुपए की ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना ने विकास और बदलाव की ऊंची छलांग तो लगाई है, लेकिन इन योजनाओं ने खतरों की नई सुरंगें भी खोल दी हैं। उत्तराखंड के सबसे बड़े पहाड़ी शहर श्रीनगर के नीचे से भी सुरंग निकल रही है। नतीजतन धमाकों के चलते 150 से ज़्यादा घरों में दरारें आ गई हैं। पौड़ी जिले के मलेथा, लक्ष्मोली, स्वोत और डेवली में 771 घरों में दरारें आ चुकी है।

रेल परियोजनाओं के अलावा यहां बारह हज़ार करोड़ रुपए की लागत से बारहमासी मार्ग निर्माणाधीन हैं। इन मार्गों पर पुलों के निर्माण के लिए भी कहीं सुरंगें बनाई जा रही हैं, तो कहीं घाटियों के बीच पुल बनाने के लिए मज़बूत आधार स्तंभ बनाए जा रहे हैं।

उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। यदि यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेषता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं, एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन‘ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिस सुरंग से होकर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों एवं नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा जाएगा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। बांधों के निर्माण हिमालय के लिए पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भू-स्खलन और केदारनाथ जैसी प्रलय की आपदा का कारण बन चुके हैं।

उत्तराखंड भूकंप के सबसे खतरनाक ज़ोन-5 में आता है। कम तीव्रता के भूकंप यहां निरंतर आते रहते हैं। मानसून में हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी ज़िलों में भू-स्खलन, बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। पहाड़ों के दरकने के साथ छोटे-छोटे भूकंप भी देखने में आ रहे हैं। उत्तराखंड और हिमाचल में बीते सात सालों में 130 से ज़्यादा छोटे भूकंप आए हैं। हिमाचल और उत्तराखंड में जल विद्युत और रेल परियोजनाओं ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है। टिहरी पर बने बांध को रोकने के लिए तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक भी हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई तो गंगा तो अस्तित्व खोएगी ही, हिमालय की अन्य नदियां भी अस्तित्व के संकट से जुझेंगी। अतएव जोशीमठ का जो भयावह मानचित्र आज दिखाई दे रहा है, वह और-और विस्तृत होता चला जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पाकिस्तान में सदी की सबसे भीषण बाढ़

स वर्ष पाकिस्तान सदी की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। देश का एक-तिहाई हिस्सा जलमग्न हो गया है। बाढ़ ने लगभग 3.3 करोड़ लोगों को विस्थापित किया और 1200 से अधिक लोग मारे गए। कई ऐतिहासिक इमारतों को भी काफी नुकसान पहुंचा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार इस तबाही की शुरुआत इस वर्ष भीषण ग्रीष्म लहर से हुई। अप्रैल और मई माह के दौरान कई स्थानों पर काफी लंबे समय तक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। जैकबाबाद शहर में तो तापमान 51 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहा। पाकिस्तान के कुछ स्थान विश्व के सबसे गर्म स्थानों में रहे।

गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है। लिहाज़ा गर्म मौसम को देखते हुए कई मौसम विज्ञानियों ने इस वर्ष की शुरुआत में ही जुलाई से सितंबर के बीच देश में सामान्य से अधिक वर्षा होने की चेतवानी दी थी।

जलवायु वैज्ञानिक अतहर हुसैन के अनुसार भीषण गर्मी से हिमनदों के पिघलने से सिंधु की सहायक नदियों में जल-प्रवाह बढ़ा जो अंततः सिंधु नदी में पहुंचा। सिंधु नदी पाकिस्तान की सबसे बड़ी नदी है जो देश के उत्तरी क्षेत्र से शुरू होकर दक्षिण तक बहती है। इस नदी से कई शहरों और कृषि की ज़रूरतें पूरी होती हैं। जुलाई माह में हिमाच्छादित क्षेत्रों का दौरा करने पर सिंधु की सहायक हुनज़ा नदी में भारी प्रवाह और कीचड़ भरा पानी देखा गया। कीचड़ वाला पानी इस बात का संकेत था कि हिमनद काफी तेज़ी से पिघल रहे हैं और तेज़ी से बहता पानी अपने साथ तलछट लेकर बह रहा है। इसके अलावा कई झीलों की बर्फीली मेड़ें फूट गईं और उनका पानी सिंधु में पहुंचा।

ग्रीष्म लहर के साथ ही एक और बात हुई – अरब सागर में कम दबाव का सिस्टम बना जिसकी वजह से जून की शुरुआत में ही पाकिस्तान के तटीय प्रांतों में भारी बारिश हुई। इस तरह का सिस्टम बनना काफी असामान्य था। इस वर्ष पाकिस्तान के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से तीन गुना और दक्षिण पाकिस्तान स्थित सिंध और बलूचिस्तान में औसत से पांच गुना वर्षा हुई। एक बार ज़मीन पर आने के बाद इस पानी को जाने के लिए कोई जगह नहीं थी, सो इसने तबाही मचा दी।

कुछ मौसम एजेंसियों ने ला-नीना जलवायु घटना की भी भविष्यवाणी की थी जिसका सम्बंध भारत और पाकिस्तान में भारी मानसून से देखा गया है। संभवत: ला-नीना प्रभाव इस वर्ष के अंत तक जारी रहेगा।

शायद मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग ने भी वर्षा को तेज़ किया होगा। इस संदर्भ में 1986 से 2015 के बीच पाकिस्तान के तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की वृद्धि हुई है जो वैश्विक औसत से अधिक है।

तबाही को बढ़ाने में कमज़ोर चेतावनी प्रणाली, खराब आपदा प्रबंधन, राजनीतिक अस्थिरता और बेतरतीब शहरी विकास सहित अन्य कारकों की भी भूमिका रही है। जल निकासी और जल भंडारण के बुनियादी ढांचे की कमी के साथ-साथ बाढ़ संभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। (स्रोत फीचर्स)
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उत्तराखंड आपदा पर वाटर कॉनफ्लिक्ट फोरम का वक्तव्य

वॉटर कॉनफ्लिकट फोरम देश में पानी के मुद्दों से सरोकार रखने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए संवाद मंच है। पिछले लगभग 20 वर्षों से यह विभिन्न मुद्दों पर काम करता रहा है। उत्तराखंड की हाल की घटनाओं पर फोरम ने एक वक्तव्य जारी किया है और कई लोगों ने इस पर हस्ताक्षर करके अनुमोदन किया है ।

विगत 7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के ऋषि गंगा और धौली गंगा की घटनाओं ने एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र बहुत दबाव में है और रोज़-ब-रोज़ दुर्बल होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन और उसके असर अब बहस का विषय नहीं हैं। वर्तमान में इन परिवर्तनों ने हिमालय जैसी नवोदित और बेचैन पर्वत शृंखला को और भी कमज़ोर बना दिया है। हिमालय के अंतर्गत भी हिमनद, हिमनद झीलों, खड़ी घाटियों और विरल वनस्पतियों जैसे स्थान अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संवेदनशील हैं। ये इलाके मामूली से मानव हस्तक्षेप से बड़ी आपदा का रूप ले सकते हैं।

निर्मित, निर्माणाधीन या नियोजित बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं, बराजों, सुरंगों, चौड़ी सड़कों और यहां तक कि रेल मार्ग जैसे मानव हस्तक्षेप पूरे हिमालय क्षेत्र में फैले हुए हैं। अब तक वर्ष 2012, 2013, 2016 और 2021 की हालियां घटनाएं हमें निरंतर चेतावनी दे रही हैं। इस परिस्थिति में हिमालय क्षेत्र में पहले से हो चुके नुकसान की भरपाई करने के लिए अविलंब निवारक व निर्णायक कदम उठाने होंगे।

7 फरवरी की घटनाओं की सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध जानकारी संकेत देती है कि नदी के मार्ग में निर्मित पनबिजली परियोजनाओं जैसे अवरोधों के चलते ऋषि गंगा घाटी में एक हानिरहित प्राकृतिक घटना ने विनाशकारी रूप ले लिया जिसके चलते जान-माल का काफी नुकसान हुआ। इस दौरान बाढ़ चेतावनी प्रणाली भी विफल रही।

इस घटना के मद्देनज़र, वॉटर कॉनफ्लिक्ट फोरम देश के राजनीतिक और कार्यकारी प्रतिष्ठान से निम्नलिखित मांगें करता है:

1. जान-माल के नुकसान के लिए ज़िम्मेदारों की विभिन्न स्तरों पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जाए; दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए और ऐसे प्रोटोकॉल व प्रक्रियाएं स्थापित की जाएं ताकि भविष्य में ऐसी प्राकृतिक घटनाएं आपदा में न बदलें।

2. दो क्षतिग्रस्त जलविद्युत परियोजनाओं, ऋषि गंगा और तपोवन, को तत्काल रद्द किया जाए और नदी के रास्ते से मलबे को साफ किया जाए।

3. 2014 की उत्तराखंड आपदा के कारणों का विश्लेषण कर चुकी रवि चोपड़ा समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द कार्यान्वित किया जाए और प्राथमिकता के आधार पर उत्तराखंड राज्य में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को रद्द किया जाए। यह ध्यान देने वाली बात है कि इस विषय में उच्च स्तरीय न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं यानी सर्वोच्च न्यायलय और पीएमओ ने इस दिशा में कदम उठाए थे लेकिन अभी तक इन्हें लागू नहीं किया गया है।

4. भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि हिमालय क्षेत्र के सभी राज्यों में मौजूदा बांधों की आपदा संभावना की स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा की जाए।

5. हिमालय एक नवीन पर्वत शृंखला है और यदि इसकी भूगर्भीय दुर्बलता और भूकंपीय संवेदनशीलता को अनदेखा किया जाता है तो जलवायु परिवर्तन की घटनाएं इसे नए परिवर्तनों के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देंगी। इसलिए पश्चिमी घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल की तर्ज़ पर हिमालय क्षेत्र में वर्तमान विकास कार्यक्रमों और परियोजनाओं की व्यापक समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र बहु-विषयी विशेषज्ञ समूह का गठन किया जाना चाहिए जो समयबद्ध तरीके से काम करे। यह समीक्षा परियोजना-आधारित समीक्षा न होकर एक व्यापक, संचयी, क्षेत्रीय समीक्षा होनी चाहिए जो सभी परियोजनाओं (जिसमें सड़क, रेलवे, बांध, सुरंग, पर्यटन केंद्र, कॉलोनी, टाउनशिप और तथाकथित वनरोपण शामिल हों) के संयुक्त प्रभावों के साथ जलवायु परिवर्तन और भूकंपीयता के मौजूदा खतरों को भी ध्यान में रखे।

6. एक सहभागी प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए हिमालयी नदियों और स्थानीय लोगों के पारिस्थितिकी तंत्र एवं आजीविका की सुरक्षा के लिए एक वैकल्पिक विकास नीति/रणनीति विकसित की जानी चाहिए। हिमालय क्षेत्र में बेलगाम विकास पर रोक लगानी चाहिए; इसकी बजाय हिमालय क्षेत्र में न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के साथ उसे एक प्राकृतिक विरासत के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही जैविक और जैव-विविधता आधारित कृषि, टिकाऊ पशुपालन, विकेंद्रीकृत जल प्रणाली, स्थानीय वन और जैव-र्इंधन आधारित विनिर्माण, शिल्प और समुदाय द्वारा संचालित पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए। इसमें पारिस्थितिक रूप से हानिकारक कृषि, जन पर्यटन आदि जैसे कार्यों को हतोत्साहित करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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मैडागास्कर के विशालकाय जीव कैसे खत्म हो गए

क समय मैडागास्कर में एलीफैंट बर्ड, विशाल कछुए और यहां तक कि विशालकाय लीमर रहा करते थे। लेकिन आज इस क्षेत्र में सिर्फ छोटे जीव ही पाए जाते हैं। शोधकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर काफी बहस होती रही है कि दोष मनुष्यों का है या जलवायु परिवर्तन का। लेकिन हाल ही में हिंद महासागर के एक द्वीप की गुफाओं से प्राप्त तलछट से इसके जवाब के संकेत मिले हैं: सूखे की परिस्थितियों ने विशालकाय जीवों के लिए जीवन काफी कठिन ज़रूर बना दिया था लेकिन एलीफैंट बर्ड के ताबूत में आखरी कील तो मनुष्यों ने ही ठोंकी है।    

अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट से 425 किलोमीटर दूर मैडागास्कर मनुष्यों द्वारा बसाया गया सबसे आखिरी स्थान माना जाता था। लेकिन दो वर्ष पहले शोधकर्ताओं को 10,500 वर्ष पुरानी हाथियों की हड्डियां मिलीं हैं जिनकी हत्या की गई थी। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य और विशालकाय जीव हज़ारों वर्षों साथ-साथ रहे थे लेकिन ये विशाल जीव लगभग 1500 वर्ष पहले विलुप्त हो गए।

इस क्षेत्र की जलवायु का इतिहास समझने के लिए शियान जियाटोंग युनिवर्सिटी के भू-वैज्ञानिक हई चेंग और उनके स्नातक छात्र हांग्लिंग ली ने मैडागास्कर से 1600 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटे टापू रॉड्रिग्स पर गुफाओं का रुख किया। यह टापू काफी दूर और अलग-थलग स्थित है, जिसकी वजह से यह प्राचीन जलवायु की जानकारी एकत्रित करने के लिए बढ़िया स्थान था। मानव गतिविधियां न होने से अभी भी यहां स्टैलैक्टाइट तथा स्टैलैग्माइट सलामत थे।

सबसे पहले शोधकर्ताओं ने तलछट के खंडों का काल निर्धारण किया। कई जगहों पर तो वे पिछले 8000 वर्षों के लिए दशक-दशक तक की परिशुद्धता से काल निर्धारण कर पाए। इसके बाद उन्होंने परत-दर-परत ऑक्सीजन और कार्बन के भारी समस्थानिकों तथा सूक्ष्म मात्रा में पाए गए तत्वों का विश्लेषण किया जिससे अतीत में जलवायु में नमी के स्तर का पता लगाया जा सके। साइंस एडवांसेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर ने इस दौरान चार बड़े सूखों का सामना किया था। इनमें से सूखे की एक घटना 1500 वर्ष पूर्व बड़े स्तर पर विलुप्तिकरण की घटना के साथ भी मेल खाती है। चेंग का मानना है कि इसके पूर्व में होने वाली सूखे की घटनाओं से भी ये जीव बच निकले थे। इससे ऐसा लगता है कि मनुष्यों द्वारा अत्यधिक शिकार और आवास स्थल नष्ट करना निर्णायक रहा।

इस अध्ययन से अन्य शोधकर्ताओं को मैडागास्कर और आसपास के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त हुई है। लेकिन अध्ययन मात्र एक छोटे टापू पर किया गया है जबकि यह क्षेत्र काफी विशाल है और यहां अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों के अलावा अलग-अलग मानव सभ्यताएं भी मौजूद रही होंगी। ऐसे में विभिन्न स्थानों में विलुप्त होने की परिस्थितियां भी काफी अलग-अलग हो सकती हैं।(स्रोत फीचर्स)

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जंगल कटाई और महामारी की संभावना

काफी समय से इकॉलॉजीविदों को आशंका रही है कि मनुष्यों द्वारा जंगल काटे जाने और सड़कों आदि के निर्माण से जैव विविधता में आई कमी के चलते कोविड-19 जैसी महामारियों का जोखिम बढ़ जाता है। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि जैसे-जैसे कुछ प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, जीवित रहने वाली प्रजातियों, जैसे चमगादड़ और चूहे, में ऐसे घातक रोगजनकों की मेज़बानी करने की संभावना बढ़ रही है जो मनुष्यों में छलांग लगा सकते हैं। गौरतलब है कि 6 महाद्वीपों पर लगभग 6800 पारिस्थितिक समुदायों पर किए गए विश्लेषण से सबूत मिले हैं कि जैव विविधता में ह्रास और बीमारियों के प्रकोप में सम्बंध है लेकिन आने वाली महामारियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इकोलॉजिकल मॉडलर केट जोन्स और उनके सहयोगी काफी समय से जैव विविधता, भूमि उपयोग और उभरते हुए संक्रामक रोगों के बीच सम्बंधों पर काम कर रहे हैं और ऐसे खतरों की चेतावनी भी दे रहे हैं लेकिन हालिया कोविड-19 प्रकोप के बाद से उनके अध्ययन को महत्व मिल पाया है। अब इसकी मदद से विश्व भर के समुदायों में महामारी के जोखिम और ऐसे क्षेत्रों का पता लगाया जा रहा है जहां भविष्य में महामारी उभरने की संभावना हो सकती है।

इंटरगवर्मेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज़ (आईपीबीईएस) ने इस विषय पर एक ऑनलाइन कार्यशाला आयोजित की है ताकि निष्कर्ष सितंबर में होने वाले संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मलेन में प्रस्तुत किए जा सकें। कुछ वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, वायरस विज्ञानियों और पारिस्थितिक विज्ञानियों के समूह भी सरकारों से वनों की कटाई तथा वन्य जीवों के व्यापार पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं ताकि महामारियों के जोखिम को कम किया जा सके। उनका कहना है कि मात्र इस व्यापार पर प्रतिबंध लगाने से काम नहीं बनेगा बल्कि उन परिस्थितियों को भी बदलना होगा जो लोगों को जंगल काटने व वन्य जीवों का शिकार करने पर मजबूर करती हैं। 

जोन्स और अन्य लोगों द्वारा किए गए अध्ययन कई मामलों में इस बात की पुष्टि करते हैं कि जैव विविधता में कमी के परिणामस्वरूप कुछ प्रजातियों ने बड़े पैमाने पर अन्य प्रजातियों का स्थान ले लिया है। ये वे प्रजातियां हैं जो ऐसे रोगजनकों की मेज़बानी करती हैं जो मनुष्यों में फैल सकते हैं। नवीनतम विश्लेषण में जंगलों से लेकर शहरों तक फैले 32 लाख से अधिक पारिस्थितिक अध्ययनों के विश्लेषण से उन्होंने पाया कि वन क्षेत्र के शहरी क्षेत्र में परिवर्तित होने तथा जैव विविधता में कमी होने से मनुष्यों में रोग प्रसारित करने वाले 143 स्तनधारी जीवों की तादाद बढ़ी है।     

इसके साथ ही जोन्स की टीम मानव आबादी में रोग संचरण की संभावना पर भी काम कर रही है। उन्होंने पहले भी अफ्रीका में एबोला वायरस के प्रकोप के लिए इस प्रकार का मूल्यांकन किया है। इसके लिए विकास के रुझानों, संभावित रोग फैलाने वाली प्रजातियों की उपस्थिति और सामाजिक-आर्थिक कारकों के आधार पर कुछ रिस्क मैप तैयार किए हैं जो किसी क्षेत्र में वायरस के फैलने की गति को निर्धारित करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में टीम ने कांगो के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले प्रकोपों का सटीक अनुमान लगाया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि भूमि उपयोग, पारिस्थितिकी, जलवायु, और जैव विविधता जैसे कारकों के बीच सम्बंध स्थापित कर भविष्य के खतरों का पता लगाया जा सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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महामारी और गणित – दीपक थानवी

कोरोना वायरस महामारी से पूरा विश्व प्रभावित हो चुका है। इस अभूतपूर्व आपदा से निपटने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे रहा है। स्वास्थ्यकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों से लेकर घर में बंद सामान्य व्यक्ति तक। गैर-सरकारी संस्थाएं और समाजसेवी भी अपने स्तर पर नागरिकों की सेवा कर रहे हैं। दूसरी ओर वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी संस्थाएं इस महामारी को समझने की कोशिश कर रही हैं। वे परीक्षण करने की मानक विधि को लगातार विकसित कर रही हैं और मरीज़ों के उपचार के लिए दवा-टीके की खोज भी कर रही हैं।

अभी एक महत्त्वपूर्ण काम महामारी से प्रभावित होने वाले भविष्य का विश्लेषण करना है। और यह संभव हो पाता है गणित की मदद से। इतिहास गवाह है कि आपदाओं से निपटने में गणित ने एक साधन की भूमिका निभाई है। गणितीय सिद्धान्तों को कंप्यूटर मॉडल में उपयोग किया जाता है। फिर कंप्यूटर मॉडल इन सिद्धान्तों की सहायता से डैटा पर कार्य करता है और परिणाम देता है। इन मॉडल्स को गणितीय मॉडल्स भी कहा जाता है।

वैज्ञानिक अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग गणितीय मॉडल्स का उपयोग करते हैं। इन गणितीय मॉडल्स का उपयोग महामारी से सम्बंधित जानकारी पता करने के लिए होता है। जैसे – किसी देश, क्षेत्र या शहर में महामारी से संक्रमित होने वाले मरीज़ों की संख्या कितनी हो सकती है? बदतर स्थिति में कितने आईसीयू बिस्तर और वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ सकती है? और कब हमारा स्वास्थ्य-तंत्र नाकाम होने लगेगा?

कोरोना वायरस महामारी से संक्रमित मरीज़ों की संख्या बहुत ही तेज़ी से बढ़ रही है। सभी देश संक्रमण की वृद्धि दर को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इस महामारी से लड़ने के लिए सभी देश अलग-अलग गणितीय मॉडल्स की सहायता ले रहे हैं। एक ही महामारी से लड़ने के लिए इतने सारे मॉडल्स होने के कई कारण हैं। मॉडल डैटा के आधार पर काम करता है। जनसंख्या, संक्रमित मरीज़ों की संख्या, ठीक हो चुके मरीज़ों की संख्या, संक्रमण दर आदि सभी कारक हर देश के लिए समान नहीं हो सकते हैं। अत: हर देश का अपना डैटा व मॉडल होता है।

इन सारे मॉडल्स का आधार एसआईआर (SIR) मॉडल है। इस मॉडल को करमैक और मैक्केन्ड्रिक ने स्थापित किया था। 1920 के दशक में, दोनों ने देखा कि किसी संक्रमण के संपर्क में जो आबादी है, उसे तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है – संवेदनशील, संक्रमित, और संक्रमण-मुक्त। संवेदनशील लोग वे हैं जिन्हें अभी तक बीमारी नहीं हुई है। संक्रमित लोग वे हैं जो वर्तमान में संक्रमित हैं। संक्रमण-मुक्त लोग वे हैं जो पहले बीमार थे और अब स्वस्थ हो गए हैं।

करमैक और मैक्केन्ड्रिक ने इनमें से प्रत्येक समूह में गणितीय रूप से संख्याओं को प्रदर्शित करने का एक तरीका खोजा। उन्होंने अपने इस विचार को अवकल समीकरणों के रूप में लिखा। इससे यह पता लगाया जा सकता था कि जनसंख्या का कौन-सा अंश, भविष्य में किसी एक समूह से दूसरे समूह में प्रवेश करेगा।

निश्चित रूप से एसआईआर मॉडल महामारी के फैलने की जानकारी देता है। मॉडल को पहले से ही कुछ मान्यताएं बता दी जाती हैं। फिर उसके अनुसार वह डैटा को समूहों में विभाजित करके भविष्य में होने वाले संक्रमण के अनुमान को चित्रों और आंकड़ों में दर्शाता है। एक बुनियादी मान्यता यह भी होती है कि संक्रमित समूह वाला व्यक्ति संवेदनशील समूह वाले व्यक्ति के साथ बातचीत करके, उसे संक्रमित करके संक्रमित समूह में भी परिवर्तित कर सकता है। जब संक्रमित समूह बढ़ता है तब संवेदनशील समूह घटता है। संक्रमित व्यक्ति ठीक भी हो सकता है। इस स्थिति में मॉडल संक्रमित व्यक्ति के डैटा को संक्रमित समूह से हटाकर संक्रमण-मुक्त समूह में डाल देता है।

संक्रमण का संवेदनशील समूह से संक्रमित समूह की ओर जाने के कई कारण हो सकते हैं। संक्रमण का फैलाव संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से हो सकता है। संक्रमण पानी, हवा या किसी वस्तु की सतह के माध्यम से भी हो सकता है। इसके अलावा, रोग की गतिशीलता का अध्ययन विभिन्न पैमानों पर किया जा सकता है: एकल व्यक्ति, लोगों के छोटे समूह और संपूर्ण आबादी के रूप में। उपलब्ध आंकड़ों की जटिलता के आधार पर विभिन्न मॉडल्स को चुना जाता है।

कभी-कभी बुनियादी मॉडल के लिए अतिरिक्त समूह भी बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, कोई संक्रमित व्यक्ति जो कोई लक्षण प्रदर्शित नहीं कर रहा है वह एक नया समूह बन सकता है। कभी-कभी उम्र जैसे अतिरिक्त कारकों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता होती है।

रोग से सम्बंधित जानकारी और इसके फैलाव की विधि के आधार पर बने डैटा पर एसआईआर मॉडल को निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन जब कोई बीमारी नई होती है – मौजूदा महामारी के मामले में ‘नए कोरोनावायरस’ के ‘नया’ होने के कारण विश्वसनीय डैटा मिलना मुश्किल हो जाता है। और यह पारंपरिक एसआईआर मॉडल सामाजिक दूरी और घर में बंद रहने के आदेशों जैसे व्यवहार और नीतिगत बदलावों को ध्यान में नहीं रखता है।

इसलिए मौजूदा स्थितियों का आकलन करते हुए गणितज्ञ और वैज्ञानिक मिलकर नए गणितीय मॉडल्स का उपयोग कर रहे हैं और सुविधानुसार मॉडल्स विकसित भी कर रहे हैं। इन मॉडल्स की सहायता से सरकार को नीतियां बनाने में मदद मिल रही है। गणित और कंप्यूटर की यह शक्तिशाली जोड़ी हमारे स्वास्थ्य तंत्र को इस अभूतपूर्व महामारी से लड़ने में बहुत मदद कर रही है। और सरकारों को संकेत भी कर रही है कि कोरी राजनीति करने की बजाय शिक्षा और स्वास्थ्य के विकास पर ज़ोर देना आवश्यक है। आज की तारीख में कई देशों में स्थिति नियंत्रण में आ गई है। उम्मीद है कि जल्द ही पूरे विश्व के गलियारों और बगीचों में, स्कूलों और मैदानों में, सड़कों और सांस्कृतिक स्थलों पर फिर से चहल-पहल शुरू हो जाएगी।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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