डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

हमारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद प्रोटीन अंगों के सुचारू कामकाज और उनके विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन के निर्माण में 20 से ज़्यादा अमीनो एसिड्स (amino acids) की भूमिका होती है, ये प्रोटीन के बिल्डिंग (building blocks) ब्लॉक होते हैं। अमीनो एसिड शृंखला का क्रम ही कोशिकाओं में हर प्रोटीन की बनावट और कार्य तय करता है।
इनमें से कई अमीनो एसिड विशिष्ट कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं। मसलन, ग्लाइसिन (glycine) नामक अमीनो एसिड रक्त कोशिकाओं के लिए बहुत आवश्यक हैं; ल्यूसीन (leucine) अमीनो एसिड मांसपेशियों के विकास, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा निर्माण में शामिल होता है। शरीर में आठ और अनिवार्य अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें शरीर खुद नहीं बना सकता। अंगों को कार्यक्षम रखने के लिए इन्हें बाहर से यानी आहार (या पूरक) के रूप में लेना पड़ता है।
हर अंग के लिए ऊर्जा माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) से बनती है (प्राचीन ग्रीक में, माइटो का मतलब है धागे जैसा और कॉन्ड्रियन का मतलब है दाने)। माइटोकॉन्ड्रिया धागे जैसे अनोखे कोशिकांग होते हैं जो हर कोशिका में हज़ारों की संख्या में पाए जाते हैं। ये हमारे शरीर के ज़्यादातर अंगों के ऊर्जा के स्रोत होते हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका में ऊर्जा की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। ये एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट (ATP) अणु बनाते हैं, जो कोशिका के लिए ऊर्जा का स्रोत है। कुल मिलाकर माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका की बैटरी होते हैं, जो ATP का इस्तेमाल करके उसे चार्ज करते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और मूल कोशिका के बीच का जुड़ाव बहुत ज़रूरी है क्योंकि ऑक्सीकरण (oxidation) और श्वसन के दौरान इस कोशिकांग की झिल्ली खराब हो सकती है, जिससे कोशिका का काम प्रभावित हो सकता है।
उदाहरण के लिए, एक वयस्क मनुष्य के हृदय में 2 अरब से ज़्यादा मांसपेशीय कोशिकाएं होती हैं जो बिना रुके काम करती रहती हैं, और इनमें से हर कोशिका में 5000 से 8000 माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं। हृदय के धड़कने के लिए ज़रूरी ज़्यादातर ऊर्जा इन्हीं माइटोकॉन्ड्रिया से मिलती है।
शरीर के हर अंग को सुचारू काम करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहिए होती है। जब किसी अंग को ज़्यादा ऊर्जा चाहिए होती है तो नए माइटोकॉन्ड्रिया बनते हैं, लेकिन साथ ही ज़्यादा कार्यभार के कारण हुई क्षति के चलते कुछ माइटोकॉन्ड्रिया को खत्म भी करना पड़ता है।
इस प्रक्रिया के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया बनाने वाले प्रोटीन खत्म हो जाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली (membrane) के प्रोटीन खत्म नहीं होने चाहिए। बल्कि ज़रूरत उन्हें अधिक संख्या में खत्म होने से बचाने के तरीके खोजे जाने की है। वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की खोज कर रहे हैं जिनसे इन बाहरी भित्तियों को तनाव के कारण पूरी तरह ठप्प होने से बचाया जा सके, क्योंकि इससे चयापचय और बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
ल्यूसीन की भूमिका
यहीं पर अहम अमीनो एसिड ल्यूसीन काम आता है। यह शाखित शृंखला वाले अमीनो एसिड (BCAA) परिवार का हिस्सा है, जिसमें आइसोल्यूसीन (Isoleucine) और वैलीन (valine) जैसे अमीनो एसिड भी शामिल हैं। इनकी ज़रूरत मांसपेशियों, तंत्रिका तंत्र, हृदय और मस्तिष्क जैसे अंगों के विकास और कामकाज के लिए होती है।
BCAA मानव शरीर में नहीं बनते हैं, इसलिए इन्हें आहार (भोजन) के माध्यम से ग्रहण करना पड़ता है। इनके बिना, माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली ठीक से बन नहीं पाती या टिकी नहीं रह पाती। पिछले वर्ष जर्मनी के कोलोन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एक्सेलेंस क्लस्टर ऑन एजिंग एंड एजिंग-एसोसिएटेड डिसीज़ेस के एक दल ने अध्ययन के लिए सी. एलिगेंस (Caenorhabditis elegans) नाम के छोटे गोल कृमि को मॉडल जीव के तौर पर चुना। नेचर सेल बायोलॉजी में प्रकाशित उनके नतीजों से पता चला कि BCAA ल्यूसीन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली के प्रोटीन को समय-पूर्व खराब होने से रोकता है। ल्यूसीन इस काम को अंजाम SEL1L नामक प्रोटीन के साथ मिलकर देता है। SEL1L प्रोटीन क्षतिग्रस्त या विकृत प्रोटीन्स को पहचानता और हटाता है।
इस तरह, ल्यूसीन कोशिकाओं और अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है और ज़्यादा ऊर्जा भी देता है। यह जानना अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या दूसरे BCAA भी कोशिकाओं की सुरक्षा में ऐसी ही अहम भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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