अब लैब में बनेंगे ‘मिनी’ मस्तिष्क!

हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल  विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है। 

पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।  

हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना। 

शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।

पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा। 

शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।

भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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