नैकेड मोल रैट (Heterocephalus glaber) को हिन्दी में नग्न तिल चूहा कहा जाता है। इसे सैंड पपी (sand puppy) भी कहते हैं। इसके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। ये पूर्वी अफ्रीका के सूखे इलाकों में ज़मीन के नीचे सुरंग बनाकर रहने वाले अनोखे जीव हैं। ये सामाजिक जीव हैं और इनकी बस्ती में सिर्फ एक मादा (रानी) ही प्रजनन कार्य करती है।
टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा की तंत्रिका वैज्ञानिक मेलिसा होम्स के अनुसार लंबे समय से यह एक पहेली रही है कि कैसे इनके समूह में केवल एक मादा (रानी) ही प्रजनन (reproduction) का कार्य करती है जबकि समूह की शेष सभी मादाएं (females) रानी की संतानों के पालन पोषण और भोजन जुटाने जैसे काम करती हैं। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़े हैं।
हाल ही में नग्न तिल चूहे के बारे में नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रानी एक प्रकार के रसायन का स्राव करती है, जिसकी गंध से समूह में उपस्थित अन्य मादाओं की प्रजनन क्रिया रोक दी जाती है! यह गंध अन्य मादा में हॉर्मोन (hormone) बनने की प्रक्रिया पर असर डालती है, और उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता दब जाती है। यह अध्ययन बर्लिन स्थित मैक्स डेलब्रुक सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक मोहम्मद खल्लाफ और उनके साथियों ने किया है। उन्होंने एक बस्ती में अलग-अलग सामाजिक श्रेणी के नग्न तिल चूहों के शरीर पर से फोहों में सोखकर रसायन प्राप्त किए। उन्होंने पाया कि एक रसायन है (आइसोप्रोपाइल मिरिस्टेट, आई.पी.एम.) जो रानी के शरीर पर तो प्रचुरता में उपस्थित था लेकिन बस्ती के अन्य सदस्यों पर नगण्य ही था। और तो और, रानी चूहे में भी इस रसायन की मात्रा प्रजनन चक्र के अनुसार बदलती है; विशेषकर अंडोत्सर्ग के समय सर्वाधिक रहती है। मस्तिष्क इमेजिंग (brain imaging) में भी देखा गया कि प्रजनन में अक्षम मादाएं ही आई.पी.एम. (IPM) की गंध के प्रति संवेदनशील होती हैं।
हालांकि मधुमक्खियों, चींटियों, दीमकों आदि कई अन्य सामाजिक (यूसोशल) जन्तुओं में भी सिर्फ रानी प्रजनन कार्य करती है, लेकिन उनमें बस्ती की बाकी मादा सदस्यों के प्रजनन अंग अविकसित रहते हैं और उनमें एक हॉर्मोन प्रोलैक्टिन (prolectin) का स्तर भी बढ़ा हुआ रहता है। परन्तु नग्न तिल चूहों में सभी मादाओं में प्रजनन क्षमता होते हुए भी वे यौवनारंभ (प्यूबर्टी) में ही अटकी रह जाती हैं, कभी संतानोत्पत्ति नहीं करतीं।
खल्लाफ की टीम ने इस रसायन की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रयोग और किया था। उन्होंने कुछ प्रजनन-अक्षम (unreproductive) चुहियाओं को बस्ती से अलग कर दिया और शेष मादाओं में एक औषधि की मदद से उनकी गंध संवेदना (smell senses) को अवरुद्ध कर दिया। दोनों ही मामलों में ऐसी मादाओं में प्रोलैक्टिन का स्तर घट गया और वे नरों के साथ समागम करने में समर्थ हो गईं। यह भी देखा गया कि रानी की अनुपस्थिति में भी सिर्फ आई.पी.एम. की उपस्थिति प्रजनन को रोकने के लिए पर्याप्त थी। (स्रोत फीचर्स)
पिछली शताब्दी पर नज़र डालें तो औद्योगिक विकास (industrial revolution) की पहचान विशाल कारखानों, ऊंची चिमनियों, इस्पात संयंत्रों और मशीनों की गूंज से होती थी। ये किसी देश की आर्थिक शक्ति और औद्योगिक प्रगति के प्रतीक माने जाते थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में विकास का चेहरा बदल चुका है। आज विशाल, शांत और अत्याधुनिक इमारतें नई अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही हैं। इनमें न मशीनों का शोर सुनाई देता है, न धुएं के गुबार उठते हैं, फिर भी दुनिया की लगभग हर डिजिटल गतिविधि की नींव इन्हीं पर टिकी है। इन्हीं नई आधुनिक इमारतों को हम डैटा सेंटर (data centre) के नाम से जानते हैं।
आज मोबाइल से किया गया भुगतान, किसी विद्यार्थी की ऑनलाइन कक्षा, अस्पताल का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, किसान के मोबाइल पर पहुंचा मौसम का पूर्वानुमान, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर या कोई भी संवाद, इनमें से कोई भी गतिविधि डैटा सेंटरों के बिना संभव नहीं है। हर डिजिटल क्रिया (digital action) अंतत: किसी न किसी डैटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां सूचनाएं संग्रहित होती हैं, उनका विश्लेषण होता है और वे कुछ ही क्षणों में हमारे पास वापस लौट आती हैं।
यही वजह है कि डिजिटल दुनिया जितनी आभासी और अदृश्य दिखाई देती है, उसकी बुनियाद उतनी ही ठोस और वास्तविक है। यह केवल इंटरनेट या सॉफ्टवेयर का संसार नहीं, बल्कि विशाल डैटा सेंटरों, लाखों सर्वरों, निरंतर बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले संचार नेटवर्क और बड़ी मात्रा में ऊर्जा तथा जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विशाल भौतिक अधोसंरचना (giant physical infrastructure) है।
पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धि (एआई) (AI) ने इस पूरी व्यवस्था को नई गति दी है। चैटबॉट, भाषा अनुवाद, चित्र निर्माण, वीडियो विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक गणनाओं जैसे कार्यों के लिए पहले से कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता पड़ रही है। इस वजह से दुनिया भर में नए डैटा सेंटर्स के निर्माण की होड़ शुरू हो गई है।
अंतर्राष्ट्रीय शोध के अनुसार वर्तमान में विश्व में लगभग 11,800 डैटा सेंटर संचालित हैं। भारत में भी इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और वह एशिया के प्रमुख डैटा सेंटर बाज़ारों में शामिल हो चुका है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई, क्लाउड सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस विस्तार को और गति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डैटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने कभी सड़कें, रेलमार्ग और बिजलीघर थे। वे निवेश आकर्षित करते हैं, रोज़गार सृजित करते हैं और डिजिटल सेवाओं (digital services) की विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।
लेकिन हर ‘विकास’ अपने साथ कुछ अनदेखे प्रश्न भी लेकर आता है। लंबे समय तक डैटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल।
डिजिटल दुनिया: अदृश्य प्यास
हमारा डैटा ‘क्लाउड’ (cloud) में सुरक्षित होता है। क्लाउड कोई काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि हज़ारों सर्वरों से भरे विशाल डैटा सेंटरों का नेटवर्क है। हर ई-मेल, हर डिजिटल भुगतान, हर वीडियो, हर ऑनलाइन खोज और हर एआई अनुरोध इन्हीं सर्वरों (servers) पर संसाधित होता है।
ये सर्वर दिन-रात लगातार काम करते हैं। जितनी अधिक गणनाएं होती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि यह तापमान नियंत्रित न किया जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं बाधित हो सकती हैं, यहां तक कि ठप भी हो सकती हैं। इसलिए शीतलन (कूलिंग) (cooling) डैटा सेंटर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
बड़े डैटा सेंटरों में सर्वरों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग टॉवर, चिलर और वाष्पीकरण आधारित शीतलन प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। पानी गर्मी को तेज़ी से अवशोषित (absorb) करता है, इसलिए यह बड़े डैटा सेंटरों के लिए प्रभावी शीतलक (coolent) माना जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल सुविधाओं की बढ़ती मांग के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगती है।
यही वह प्रश्न है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस शुरू कर दी है। क्या एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया पहले से ही जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है? और यदि हां, तो क्या भविष्य का डिजिटल विकास जल सुरक्षा के साथ संतुलन (balance) बनाकर आगे बढ़ सकेगा?
इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक भी हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि डिजिटल प्रगति (digital progress) वास्तव में टिकाऊ विकास का आधार बनती है या प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) पर एक नया दबाव।
कितने प्यासे हैं डैटा सेंटर
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार लगभग 100 मेगावॉट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डैटा सेंटर (hyperscale data centre) केवल शीतलन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर तक पानी उपयोग कर सकता है। यह मात्रा कई छोटे कस्बों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर है। पानी का उपयोग केवल शीतलन टॉवरों में ही नहीं होता, बल्कि आर्द्रता नियंत्रण और अन्य सहायक प्रणालियों में भी किया जाता है।
भारत में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु पर कार्य करने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का अनुमान है कि वर्ष 2024 में देश के डैटा सेंटरों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया था। यदि वर्तमान विस्तार की गति बनी रही, तो 2030 तक यह खपत दुगनी से अधिक हो सकती है। यह अनुमान केवल उद्योग के आकार का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की नीति सम्बंधी चुनौती का भी संकेत देता है।
हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि सभी डैटा सेंटर समान मात्रा में पानी उपयोग नहीं करते। कुछ आधुनिक केंद्र कम जल-आधारित या लगभग जल-रहित शीतलन तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि पुराने केंद्र अपेक्षाकृत अधिक पानी पर निर्भर हैं। इसलिए भविष्य की दिशा केवल डैटा सेंटरों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जल-दक्षता (water-use efficiency) से भी तय होगी।
एआई ने क्यों बढ़ाई चुनौती?
एआई ने डैटा सेंटरों की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। पहले अधिकांश डैटा सेंटर ई-मेल, वेबसाइट, क्लाउड स्टोरेज और सामान्य इंटरनेट सेवाओं के लिए बनाए जाते थे। अब उन्हें लार्ड लैंग्वेज मॉडल (large language model), मशीन लर्निंग, वीडियो विश्लेषण, वैज्ञानिक अनुसंधान और जटिल गणनाओं का भार भी उठाना पड़ रहा है।
एआई आधारित प्रोसेसर पारंपरिक सर्वरों (traditional servers) की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं और अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं। जिसके कारण शीतलन प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है। आज डैटा सेंटरों की योजना केवल बिजली उपलब्धता के आधार पर नहीं बनाई जा रही, बल्कि स्थानीय तापमान, जल उपलब्धता और जलवायु जोखिम को भी ध्यान में रखा जा रहा है।
एआई ने नई विडंबना पैदा कर दी है। एक ओर, यह जलवायु परिवर्तन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। वहीं, यदि इसकी आधारभूत अधोसंरचना संसाधनों का बेतहाशा उपयोग करेगी तो वही तकनीक पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा सकती है।
दोहरी चुनौती
भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं (digital economy) में से एक है। सरकार डैटा सेंटर, एआई और सेमीकंडक्टर (semiconductor) जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहन दे रही है। दूसरी ओर, देश के अनेक हिस्से पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। अनियमित मानसून, घटता भूजल, बढ़ते तापमान और तेज़ी से बढ़ते शहर जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।
यही कारण है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, डिजिटल अधोसंरचना का विस्तार आवश्यक है। दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह विस्तार स्थानीय जल संसाधनों की कीमत पर न हो। यदि भविष्य के डैटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थापित होते हैं जहां पहले से ही पेयजल संकट है, तो उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच संसाधनों को लेकर तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अब डैटा सेंटरों की योजना को केवल निवेश और रोज़गार के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि जल सुरक्षा (water savings), शहरी नियोजन और जलवायु अनुकूलन (climate adoptations) के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।
दुनिया क्या सीख रही है?
दुनिया की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस चुनौती को स्वीकार कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कंपनियां ऐसे डैटा सेंटर विकसित कर रही हैं जिनमें कम पानी का उपयोग हो, उपचारित अपशिष्ट जल (waste water) का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए और वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) को अनिवार्य बनाया जाए। माइक्रोसॉफ्ट का दावा है कि उसने पिछले दो दशकों में अपने डैटा सेंटरों की वॉटर यूज़ इफेक्टिवनेस में लगभग 90 प्रतिशत सुधार किया है।
युरोप और अमेरिका के कई क्षेत्रों में अब नए डैटा सेंटरों की स्वीकृति देते समय केवल बिजली की उपलब्धता नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी आकलन किया जाता है कि उनका स्थानीय जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में डैटा सेंटरों की सफलता केवल उनकी कंप्यूटिंग क्षमता (computing capacity) से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा और जल दक्षता से भी आंकी जाएगी।
भारत के पास मौका है कि वह डैटा सेंटर उद्योग को ऐसी दिशा दे, जो डिजिटल विकास और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करे। इसके लिए डैटा सेंटरों की स्थापना की प्रक्रिया में जल उपलब्धता और जल प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन आवश्यक होता है, उसी प्रकार बड़े डैटा सेंटरों के लिए स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन भी अनिवार्य रूप से निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
जल ही नहीं, ऊर्जा भी अहम
यह भी गौरतलब है कि डैटा सेंटरों पर चर्चा अक्सर पानी तक सीमित रह जाती है, जबकि उनका ऊर्जा उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई के विस्तार के साथ दुनिया भर में बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि यह ऊर्जा कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त होगी, तो निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) बढ़ेगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और गंभीर होगी।
इसलिए भविष्य का टिकाऊ डैटा सेंटर वह होगा, जो कम पानी ही नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का भी उपयोग करे। सौर व पवन ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल सर्वर, उन्नत चिप प्रौद्योगिकी तथा स्मार्ट कूलिंग सिस्टम (smart cooling system) इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल संरचना का भविष्य केवल अधिक शक्तिशाली कंप्यूटरों में नहीं, बल्कि संसाधन-दक्ष प्रणालियों (resource efficient systems) में निहित है।
विकास की नई कसौटी
इक्कीसवीं सदी का विकास केवल तकनीकी विस्तार का नाम नहीं है। वह इस बात की भी परीक्षा है कि हम प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) का उपयोग कितनी ज़िम्मेदारी से करते हैं। यदि डिजिटल विकास की कीमत सूखते भूजल, बढ़ते जल संघर्ष और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में चुकानी पड़े, तो वह विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता। इसलिए अब विकास का नया सूत्र केवल डिजिटल फर्स्ट नहीं, बल्कि डिजिटल एंड मोस्ट सस्टेनेबल (digiital & most sustainable) होना चाहिए।
डिजिटल भारत का सपना केवल तेज़ इंटरनेट, विशाल डैटा सेंटरों और अत्याधुनिक एआई से पूरा नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात से भी तय होगी कि इन तकनीकों के विकास में पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का कितना नुकसान या सम्मान किया जाता है। यदि आज दूरदर्शी नीतियां अपनाई जाती हैं, तो भारत डिजिटल प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच एक संतुलित मॉडल (balanced model) प्रस्तुत कर सकता है। ज़ाहिर है, यही भविष्य की टिकाऊ अर्थव्यवस्था की वास्तविक पहचान होगी। (स्रोत फीचर्स)
आजकल हम हर दिन जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के बारे में सुनते हैं। गर्मियां लगातार लंबी और अधिक गर्म होती जा रही हैं, बेमौसम बारिश हो रही है और सर्दियां सिकुड़ रही हैं। जब मौसम अचानक बदलता है, तो मनुष्य तो अपने घरों में एसी या हीटर चालू कर लेते हैं। जानवर और पक्षी ठंडी या गर्म जगहों की ओर पलायन कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन पेड़-पौधों का क्या होता है, जो अपनी जड़ों से ज़मीन से बंधे होते हैं? उनके पास भागने या छिपने का कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें तो उसी जगह पर रहकर बदलते मौसम से लड़ना होता है।
अलबत्ता, किसी भी जीव को नए माहौल में खुद को ढालने में हज़ारों-लाखों साल लगते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) तो बहुत तेज़ी से हो रहा है। तो क्या पौधे इतनी जल्दी खुद को बदल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान के इतिहास का बहुत बड़ा और अद्भुत प्रयोग एरेबिडॉप्सिस थेलियाना पर किया है।
एरेबिडॉप्सिस थेलियाना
इस कहानी का मुख्य किरदार एक बहुत ही छोटा और आम-सा दिखने वाला पौधा थेल क्रेस है, जिसका वैज्ञानिक नाम एरेबिडॉप्सिस थेलियाना (Arabidopsis thaliana) है। यह सरसों वनस्पति कुल (brassica family) का एक जंगली पौधा है।
आप सोच रहे होंगे कि आम, नीम या गेहूं जैसे बड़े और ज़रूरी पौधों को छोड़कर वैज्ञानिकों ने इस छोटे से खरपतवार (weed) को क्यों चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दुनिया में यह पौधा एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। इसका आकार छोटा होता है, इसे उगाना आसान है, इसका जीवनचक्र बहुत छोटा (कुछ ही हफ्तों का) होता है। और, सबसे बड़ी बात, वैज्ञानिकों को इसकी आनुवंशिक सामग्री यानी डीएनए (DNA) की पूरी जानकारी है। इसलिए इसमें होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को वैज्ञानिक आसानी से पकड़ सकते हैं।
महा–प्रयोग
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मोई एक्सपोसिटो-अलोंसो के नेतृत्व में दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह जानने का फैसला किया कि पौधे तेज़ी से बदलते मौसम के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रयोग वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2022 के बीच 5 वर्षों तक किया गया। इसके नतीजे 26 मार्च 2026 को साइन्स में प्रकाशित किए गए हैं। प्रयोग की योजना अनोखी थी। दुनिया भर से एरेबिडॉप्सिस थेलियाना के 231 अलग-अलग स्ट्रेन्स इकट्ठे किए। ये सभी थे तो एरेबिडॉप्सिस थेलियाना, लेकिन हर एक के डीएनए में थोड़ा-थोड़ा अंतर था, जिसकी वजह से इनके गुणधर्मों (traits) में छोटे-मोटे अंतर थे। उन्होंने सभी 231 स्ट्रेन्स के बराबर-बराबर संख्या में बीजों का एक मिश्रण तैयार किया। बीजों के इस मिश्रण को दुनिया के 30 अलग-अलग स्थानों पर बोया गया। इनमें स्पेन की तेज़ गर्मी, उत्तरी युरोप की कड़ाके की ठंड और मध्य पूर्व (जैसे नेगेव रेगिस्तान) की भयंकर सूखे जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सबसे खास बात यह थी कि बीजों को बोने के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें कोई खाद-पानी या सुरक्षा नहीं दी। उन्हें पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे, प्राकृतिक रूप से बढ़ने, फूलने और अपने बीज गिराने के लिए छोड़ दिया। पांच सालों में पौधों की कई पीढ़ियां आई-गईं।
चौंकाने वाले परिणाम
डार्विन के विकासवाद (darwin’s theory of evolution) के अनुसार, विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। लेकिन जब पांच साल बाद वैज्ञानिकों ने उन 30 जगहों से पौधों के नए बीजों और डीएनए की जांच की तो नतीजे हैरान करने वाले थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 3 से 5 पीढ़ियों के भीतर ही पौधों में स्थानीय जलवायु के हिसाब से बदलाव हो गए थे। इसे रैपिड इवोल्यूशन (त्वरित विकास) (rapid evolution) कहा जाता है। हर जगह के पौधों में ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके से अनुकूलन (adaptation) हुआ। जो पौधे गर्म जगहों पर लगाए गए थे, उनके डीएनए में ऐसे बदलाव देखे गए जो उन्हें कम पानी में जीवित रहने और भीषण गर्मी सहने की ताकत देते थे। ठंडी जगहों वाले पौधों में ऐसे जीन विकसित हुए जो पाले (frost) से उनकी रक्षा कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वसंत ऋतु को पहचानने में था। गर्म इलाकों में पौधों ने जल्दी फूल देना शुरू कर दिया ताकि ज़्यादा गर्मी पड़ने से पहले ही वे बीज पैदा कर सकें। पौधों की डीएनए संरचना ही बदल गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जीन्स नए सिरे से विकसित हुए थे या कुदरती विविधता में से चुन भर लिए गए थे।
जेनेटिक विविधता का जादू
इस प्रयोग से एक बहुत बड़ा सबक यह मिला कि कोई भी प्रजाति तभी बच सकती है, जब उसके अंदर विविधता हो। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक टूलबॉक्स (toolbox) है जिसमें सिर्फ हथौड़े रखे हैं। अगर आपको कोई पेंच कसना हो, तो आप हथौड़े से वह काम नहीं कर सकते। लेकिन अगर आपके टूलबॉक्स में पेंचकस, प्लास और हथौड़ा सब कुछ है, तो आप हर तरह की समस्या सुलझा सकते हैं।
बिल्कुल इसी तरह, वैज्ञानिकों ने जो 231 तरह के बीजों का मिश्रण बनाया था वह एक टूलबॉक्स की तरह था। जब सूखा पड़ा, तो वे पौधे मर गए जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए था, लेकिन उसी मिश्रण में मौजूद वे पौधे बच गए जिनके अंदर सूखे से लड़ने वाले जीन मौजूद थे। इन्हीं बचे हुए पौधों ने आगे चलकर अपनी आबादी बढ़ाई। अर्थ सीधा-सा है, जैव विविधता (biodiversity) प्रकृति का सबसे बड़ा टूलबॉक्स है। अगर हम जंगलों और पौधों की विविधता को नष्ट करेंगे, तो हम उनसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत भी छीन लेंगे।
अनुकूलन की भी सीमा है
यह प्रयोग जहां एक तरफ उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बहुत गंभीर चेतावनी भी देता है। क्या पौधे हर तरह के खराब मौसम को झेल सकते हैं? जवाब है, नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि अत्यधिक विषम परिस्थितियों, जैसे तपते रेगिस्तान या अत्यधिक सूखे, में त्वरित विकास भी पौधों को नहीं बचा सका। तीन साल के भीतर ही इन इलाकों से पौधे पूरी तरह विलुप्त हो गए। उनके डीएनए में अनियमित बदलाव (irregular changes) होने लगे, जो इस बात का संकेत था कि तनाव इतना ज़्यादा हो चुका था कि प्रकृति का सुरक्षा तंत्र टूट गया। यह हमें बताता है कि पौधों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति और तीव्रता अगर एक सीमा से पार हो गई, तो जंगल-के-जंगल और खेत-के-खेत नष्ट हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
मध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।
प्रकोप के कारक
यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।
परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे
आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।
दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल जाते हैं।
शुद्ध वन और जैव–विविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।
वृक्षों पर प्रभाव
वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।
लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।
भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:
सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।
सब–हिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।
वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।
क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?
पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।
एकीकृत कीट प्रबंधन
घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।
इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।
एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।
जैविक नियंत्रण भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।
डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)
दुनिया भर के शहरी और जंगली पेड़ों पर भारी आक्रमण हो चुका है। एक कीट विशालकाय पेड़ों को तेज़ी से तबाह करने पर तुला है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक एक छोटे से भृंग (बीटल) की आक्रामक प्रजाति दक्षिण अफ्रीका की ‘ओक सिटी’ (oak city)कहे जाने वाले स्टेलनबोश शहर के ऐतिहासिक और विशाल इंग्लिश ओक पेड़ों को तबाह करने के बाद अब कैलिफोर्निया, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के पेड़ों को अपना शिकार बना रही है।
पोलीफेगस शॉट-होल बोरर (Euwallacea fornicatus) (polyphagous shot hole borer beetle) भृंग मात्र 2 मि.मी. लंबा (तिल बराबर) होता है। मूल रूप से पूर्वी एशिया (चीन, वियतनाम) में पाए जाने वाला यह कीट पिद्दा होने के कारण जाने-अनजाने लकड़ी के सामान, पैकेजिंग खोकों और पौधों के आयात-निर्यात के ज़रिए दुनिया भर में अपनी जड़ें जमा चुका है।
मादा भृंग पेड़ के तनों में बारीक सुराख करके अंडे देती है और साथ में एक सहजीवी कवक छोड़ देती है। इस कवक के फलकाय (fungal fruiting bodies) को नवजात भृंग भोजन के रूप में लेते हैं। लेकिन नवजात भृंगों (infant beetels) द्वारा बनाई गई संकरी सुरंगे और कवक की लगातार वृद्धि से पेड़ की जल प्रणाली पूरी तरह ठप हो जाती है, और धीरे-धीरे पेड़ का तना भुरभुरा होकर सूख जाता है।
चिंताजनक बात यह है कि इस भृंग की केवल एक मादा ही संक्रमण फैलाने के लिए काफी होती है। क्योंकि मादा के अनिषेचित अंडों (unfertilized egg) से नर भृंग पैदा होते हैं, जो उसी मादा से प्रजनन कर सकते हैं। मादा कीट उड़कर अन्य स्वस्थ पेड़ों को संक्रमित कर सकती है, जबकि नर भृंग उड़ नहीं पाते और उसी पेड़ पर बने रहते हैं।
शॉट-होल बोरर जैसी कई प्रजातियां हैं, जिनके बीच अंतर करना लगभग नामुमकिन है। इसी कारण लगभग एक दशक तक यह कीट कैलिफोर्निया में मौजूद होने के बावजूद ओझल रहा। शुरुआती दौर में, भ्रमवश इसे ‘टी शॉट-होल बोरर’ (Euwallacea perbrevis) मान लिया गया था। अब शोधकर्ताओं ने डीएनए अनुक्रमण की मदद से दोनों प्रजातियों में अंतर स्पष्ट कर लिया है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि ये भृंग अपने मूल स्थानों से कम से कम छह बार दूसरे देशों तक पहुंच चुके हैं। यह भी अनुमान है कि भविष्य में ये भूमध्य सागर के इलाकों, दक्षिण-पूर्वी अमेरिका, मेडागास्कर, और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में तबाही मचा सकते हैं। वन कीटविज्ञानी नकामुराकारे इसे पेड़ों के लिए ‘उभरते भयानक तूफान’ के तौर पर देखते हैं।
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में 2021 में इसकी रोकथाम के लिए चार करोड़ डॉलर और पांच हज़ार संक्रमित पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है। फिर भी इस कीट का खात्मा नहीं हो पाया। वैसे इस कीट और कवक की जोड़ी देखने के बाद रोकथाम के नए उपाय मिलने की उम्मीद है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो यह कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के फलदार पेड़ों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। (स्रोत फीचर्स)
दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।
समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।
हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।
खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।
अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी ई. कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने ई. कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें पैदा कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।
शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।
ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)