
एक प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।
2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।
वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।
न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी। विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।
इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं।
ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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