
नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।
वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।
शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।
अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।
जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSA-5-l2V9WemhHOHNHJcN4oBbZNf2-zdF0D8Q0dxCYQMn8Jhf08zEPyPs&s=10