
यह तो देखा गया है कि जब अंतरिक्ष यात्री लंबी अंतरिक्ष यात्रा (space travel) के बाद धरती पर लौटते हैं तो उनके शरीर में कमज़ोरी के लक्षण दिखाई देते हैं। अब शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि इसकी वजह यह है कि अंतरिक्ष के कम गुरुत्वाकर्षण (gravity) के असर से माइटोकॉण्ड्रिया के कामकाज में क्षीणता आती है। माइटोकॉण्ड्रिया समस्त जीवों की कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जो उन्हें ऊर्जा मुहैया कराता है। वैसे यह बात तो पूर्व में अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में भेजे गए कई चूहों और कोशिकाओं के अध्ययन से पता थी कि अल्प गुरुत्व की परिस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इस क्षति की क्रियाविधि क्या है। अब जापान के नेशनल साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (राइकेन) के आणविक जीव वैज्ञानिक शिनतारो इवासाकी की टीम ने इसका और बारीकी से अध्ययन किया है। इसमें उन्होंने राइबोसोम पर ध्यान दिया।
कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण तीन चरणों में होता है। सबसे पहले आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) के आधार पर एक अन्य अणु आरएनए बनाया जाता है। आरएनए कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम (ribosome) से जुड़ जाता है। फिर राइबोसोम से आरएनए के खंड कोशिका द्रव्य में से उपयुक्त अमीनो अम्लों को लाकर राइबोसोम पर सही क्रम में जमाते हैं और इन अमीनो अम्लों को जोड़कर प्रोटीन बनता है। इवासाकी देखना चाहते थे कि कम या शून्य गुरुत्व (zero gravity) का राइबोसोम के कामकाज पर क्या असर होता है।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर कुछ कोशिकाएं 24 या 48 घंटों तक संवर्धित कीं और उन्हें फ्रीज़ कर दिया। साथ ही साथ, कुछ कोशिकाओं को सेंट्रीफ्यूज में रखकर संवर्धित किया। सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) लगभग धरती जैसी गुरुत्व परिस्थिति बनाता है।
जब सारे नमूनों का धरती पर लाकर विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन कोशिकाओं को अल्प-गुरुत्व में रखा गया था उनमें सेंट्रीफ्यूज में रखी कोशिकाओं की अपेक्षा माइटोकॉण्ड्रियल एम-आरएनए (mitochondrial m-RNA) कण कम थे और उनके माइटोकॉण्ड्रिया के राइबोसोम ने कम प्रोटीन बनाए थे।
इसी प्रकार के असर एक कृमि सी. एलेगेन्स पर देखे गए। ऐसे कुछ कृमियों को अंतरिक्ष स्टेशन के अल्प गुरुत्व में चार दिन रखा गया था जबकि कुछ को सेंट्रीफ्यूज में पाला गया था।
इवासाकी की टीम ने ऐसे ही कुछ प्रयोग धरती की एक प्रयोगशाला में किए थे। इसके लिए उन्होंने क्लिनोस्टेट नाम के उपकरण का इस्तेमाल किया था, जो अल्प-गुरुत्व की परिस्थिति पैदा करता है। जब मानव कोशिकाओं को 24 घंटे क्लिनोस्टेट (clinostat) में रखा गया तो उनमें 13 प्रोटीन का उत्पादन कम हुआ। 48 घंटे और 72 घंटे रखने पर तो माइटोकॉण्ड्रियल प्रोटीन्स का उत्पादन और भी कम हुआ।
इस असर की एक क्रियाविधि भी सुझाई गई है कि गुरुत्वाकर्षण के चलते कोशिकाएं के आपस में चिपकने के ज़रिए माइटोकॉण्ड्रिया पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण शून्य कर दिया जाए, तो यह असर भी क्षीण हो जाता है और प्रोटीन (protein) उत्पादन कम हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)
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