प्रकाश प्रदूषण: विकास की चकाचौंध में गुम होती रातें 

सुदर्शन सोलंकी

रोशनी को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण (light pollution) एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।

भारतीय शहरों की स्थिति 

क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश (illuminated sky) तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।

भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:

– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।

– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।

– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।

एलईडी का विरोधाभास

भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों (energy efficient technology) का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।

हालांकि सोडियम वैपर लाइट (sodium vapour light) की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

जैवविविधता पर प्रहार

पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।

प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों (high voltage LED’s) के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।

कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।

मानव स्वास्थ्य 

अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन (melatonin hormone) का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।

भारत में नीतिगत शून्य

दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प (hallogen lamp) की रोशनी इस तरह की होती है।

फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।

भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।

समाधान

प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:

– डाउन-शिल्डेड लाइटें (down shielded lights) लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।

– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।

– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।

प्राकृतिक अंधेरा (natural darkness) कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन (invaluable resource) है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डार्विन का अंदाज़ा सही था: यह पौधा कीटभक्षी है

दौलत सिंह तंवर

विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।

सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।

चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।

हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।

शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।

अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।

इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।

विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।

यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनों की अनोखी अनुकूलन क्षमता

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में उष्णकटिबंधीय जंगलों (tropical forests) को सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता रहा है। लेकिन नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक खोज ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। शोधकर्ताओं ने कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको के वनों के विभिन्न पेड़ों पर सूखे के प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया।

पाया गया कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग पेड़ों में पानी की उपलब्धता और वातावरण के अनुकूल अपने हिसाब से परिवर्तन (adaptations) होते हैं। इस तरह के पूर्व अध्ययन अलग-अलग प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित थे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना था कि एक ही प्रजाति के सभी पेड़ सूखे के प्रति लगभग एक जैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिको में प्राकृतिक वर्षा की मात्रा के आधार पर छह वन क्षेत्रों को चिन्हित किया। सालाना  85 सेंटीमीटर वर्षा वाले सूखे ग्वानिका वन (guanica forest) से लेकर 450 सेंटीमीटर वाले लुक्विलो वर्षावन (luquilo rainforest) में 18 विभिन्न प्रजातियों के 290 पेड़ों का परीक्षण किया। हर एक पेड़ से शाखाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनके सूखने की प्रक्रिया को जांचा। जांच के दौरान हर पांच मिनट के अंतराल पर शाखाओं की तस्वीर ली गईं। तनों के जल विभव (वाटर पोटेंशियल) और वाहिका-रोध (एम्बोलिज़्म) को भी मापा गया। जल विभव से आशय होता है कि किसी स्थान से पानी किस ओर बहेगा और वाहिका-अवरोध का मतलब होता है कि पानी की कमी का कितना तनाव होने पर संवहनी ऊतक (ज़ायलम) की नलिकाओं में हवा के बुलबुले बनकर पानी का प्रवाह रोक देंगे।

18 में से 17 प्रजातियों के पेड़ों में वर्षा की मात्रा से सम्बंधित अंतर साफ दिखे। सूखे क्षेत्र वाले पेड़ों के संवहनी ऊतकों में एम्बोलिज़्म (embolism) के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। ये पेड़ सूखे के हालत में भी पर्ण रंध्रों (स्टोमैटा) को खुले रखने में सक्षम थे, जिससे पानी की कमी होते हुए भी नियंत्रित तौर पर भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) जारी रही।

दूसरी ओर, नमी वाले वन क्षेत्रों के पेड़ों के तनों और पत्तियों में पानी संग्रह करने की अधिक क्षमता पाई गई।

शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate areas) में एक ही प्रजाति के पेड़ों में वातावरण के अनुसार ऐसा अनुकूलन अक्सर कम ही देखने को मिलता है, लेकिन प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। इस अनुकूलन क्षमता का एक कारण वर्षावन की ज्वालामुखीय मिट्टी है, जो नमी बेहतर ढंग से सोखती है। जबकि सूखे क्षेत्र में चूना पत्थर (limestone) की मिट्टी पानी नहीं रोक पाती। 

यह खोज जलवायु परिवर्तन के अनुसार वन संरक्षण मॉडलों (forest conservation models) को ज़्यादा सटीक बनाने में मददगार साबित होगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक किसी प्रजाति की एक निश्चित क्षमता के बजाय स्थानीय स्तर पर होने वाले अनुकूलन को भी शामिल कर सकेंगे। यह अध्ययन पेड़ों के लचीले स्वभाव को तो दर्शाता है, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक एक चेतावनी भी दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता वैश्विक तापमान और सूखे जैसे हालात इन पेड़ों की सहनशीलता की सीमा को लांघ सकते हैं, जिससे भविष्य में वनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ये शैल चित्र क्या इंसानी खून से बनाए गए हैं?

म तौर पर प्राचीन समय के शैल चित्र ऐसी चट्टानों पर मिलते हैं जो थोड़ी गुफानुमा या ढंकी हुई हों। प्राचीन लोगों ने जब खुली चट्टान या खड़ी-चट्टानों पर चित्रकारी की भी है तो उनका मौसम-पानी की मार के कारण सलामत बचा रहना मुश्किल रहा है। लेकिन अब शैल चित्रों (Rock paintings) का ऐसा समूह मिला है जो खड़ी चट्टान के खुले पहलू पर होने के बाद भी सदियों से सही-सलामत है।

चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी (Zuojiang River Valley) की सपाट, खड़ी चट्टानों पर बने शैल चित्र हवा-पानी की सीधी मार पड़ने के बावजूद आज भी एकदम नुमाया और अक्षुण्ण हैं। ये रंग चट्टानों से इतनी मज़बूती से चिपके हैं कि यदि वे उखड़ते हैं, तो रंग के साथ चूना-पत्थर की परत भी साथ झड़ जाती है। ये शैल-चित्र ज़ुओजियांग नदी के साथ-साथ 260 किलोमीटर लंबाई में फैली चूना-पत्थर (कार्स्ट लाइमस्टोन) की खड़ी चट्टानों पर करीब 80 पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं। ये स्थल ज़ुओजियांग हुआशान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप (Zuojiang rock art cultural landscape) नाम से जाने जाते हैं।

ये चित्र लगभग 2000 साल से अधिक पुराने हैं। इन्हें लोयुए संस्कृति के लोगों ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवीं के बीच लगभग लगभग 700 साल की अवधि में बनाया था। लोयुए समाज (luoyue) दक्षिणी चीन में रहने वाला एक मातृसत्तात्मक समाज (matrilineal society) था। ये लोग प्राय: शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे।

लोयुए संस्कृति के लोगों ने कमोबेश इन चित्रों में दोनों हाथ ऊपर किए हुए उकड़ू बैठी मुद्रा में नग्न पुरुषों की टोली, पंखों का ताज पहने एक विशालकाय व्यक्ति, आसपास कुछ जानवर और प्राचीन रस्मों में बजने वाले ढोल और घंटियां गेरुआ लाल रंग में बनाए हैं। साथ ही, गर्भवती महिलाओं और प्रसव का चित्रण मिलता है।

काफी समय से वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे यह मुक्ताकाश शैल चित्र दीर्घा मौसम की इतनी कड़ी मार कैसे झेल पाई, जबकि अन्य स्थलों पर इसके सैकड़ों साल बाद बने शैल चित्र मिट चुके हैं या धुंधले पड़ चुके हैं।

इस हैरानी ने ही शेडोंग युनिवर्सिटी की रसायनशास्त्री मेंग वू और उनके साथियों को चट्टानों के तीन स्थलों पर चित्रों के झड़े हुए टुकड़ों का अवरक्त प्रकाश (Infrared spectroscopy) और इलेक्ट्रॉन बीम से विश्लेषण करने को उकसाया। अवरक्त प्रकाश की मदद से उन्होंने इन चित्रों के रंगों में इस्तेमाल घटकों की आणविक स्तर पर पहचान की। और अत्यंत सूक्ष्म स्तर इसके कण-गठन (टेक्स्चर) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम का इस्तेमाल किया।

पता चला कि रंग बनाने के लिए लोयुए कलाकारों ने पहले अत्यधिक तपाए गए चूना-पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) और जानवरों की हड्डियों से एक गाढ़ा पेस्ट बनाया। इस पेस्ट में उन्होंने पानी और खून मिलाकर एक चिकना और पतला घोल तैयार किया। इस घोल में मौजूद बुझा हुआ चूना, कैल्शियम फॉस्फेट (calcium phosphate) और खून के प्रोटीन रंग को बांधे रखने का काम करते थे। लाल रंग के लिए उन्होंने स्थानीय लाल मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) का इस्तेमाल किया।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (electron microscopy) में उन्हें चित्रों की अलग-अलग परतें दिखाई दीं, जिससे पता चला कि चट्टान पर चित्रकारी दो चरणों में की गई थी। पहले चरण में चट्टान की सतह पर प्राइमर (primer) के तौर पर रक्त-युक्त घोल लगाया गया था और फिर इस अध-सूखे अस्तर पर लाल मिट्टी का रंग चढ़ाया गया था। जैसे ही बुझा हुआ चूना हवा की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ क्रिया करता था, रक्त-प्रोटीन कैल्शियम कार्बोनेट के ‘जैव-खनिजीकरण’ (biomineralization) को बढ़ावा देते थे, जिससे रंग चट्टान की सतह के साथ मज़बूती से जुड़ जाता था।

जब शोध दल ने रक्त का विश्लेषण किया, तो उन्हें उसमें जानवरों के साथ-साथ मानव रक्त के प्रोटीन (human blood protein) भी मिले। वू बताती है कि वे नमूनों में मानव रक्त के निशान मिलने से भौंचक्की रह गई थीं। वे सोचने लगीं कि क्या ये कलाकार चित्रकारी के लिए खुद अपने शरीर पर घाव करते थे? क्या लोगों की बलि दी जाती थी? लेकिन तभी उन्हें एक बात सूझी – उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। उन्होंने सोचा कि शायद खून कम हिंसक तरीके से इकट्ठा किया गया होगा, जैसे माहवारी या प्रसव का।

वू की टीम ने खून की और भी बारीकी से जांच की, तो उन्हें उसमें दो प्रोटीन – प्रोलैक्टिन-इंड्यूसिबल प्रोटीन (protein inducible protein) और लैक्टोफेरिन (lactoferin) – की थोड़ी मात्रा मिली। ये दोनों प्रोटीन रक्त में गर्भावस्था के आखिरी समय में बढ़ जाते हैं। चूंकि लोयुए लोग मातृवंशीय परंपरा को मानते थे, और भित्ति-चित्रों में गर्भवती महिलाओं और बच्चे के जन्म चित्रित किए गए हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रसव के दौरान निकलने वाले खून को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े अनुष्ठानों के लिए इकट्ठा किया जाता होगा। वैसे भी, चित्रकारी के लिए हर वर्ग मीटर पर खून की बस चंद मिलीलीटर मात्रा की ही ज़रूरत रहती होगी।

अन्य शोधकर्ता कहते हैं वैसे तो अध्ययन बहुत सावधानी से और विस्तार से किया गया है। फिर भी, इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वह खून गर्भवती महिलाओं (pregnant females) का ही था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसानी खून के संकेत बहुत हल्के थे, और इनमें 2000 सालों तक चट्टान की सतह पर मौसम की मार झेलने के कोई रासायनिक संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शायद ये रसायन नमूनों की जांच के दौरान के दौरान मिल गए होंगे।

पूरे दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम इतिहास में वापिस जाकर लोयुए लोगों से बात करके कुछ पक्का नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्राचीन लोग न सिर्फ चित्रकारी करके अपनी संस्कृति की जानकारी दर्ज कर रहे थे, बल्कि वे कुशल बायोकेमिकल इंजीनियर (skilled biochemical engineers) थे। यह अध्ययन विस्तार से जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस के आगामी किसी अंक में प्रकाशित होगा। (स्रोत फीचर्स)

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