कुमार सिद्धार्थ

जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।
ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।
ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।
पारिस्थितिक प्रहरी
ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।
भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।
इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।
एशिया में स्थिति
भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।
ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।
शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।
ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।
इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।
संकट केवल वृक्षों का नहीं
यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।
एक वैश्विक चेतावनी
ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।
समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।
संरक्षण
ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।
भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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