कृत्रिम रोशनी मच्छरों को देर तक सक्रिय रखती हैं

सा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।

जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।

मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए  मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।

पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है  और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।

सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।

देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।

अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।

शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कृत्रिम अंडा और विलुप्त पक्षियों को पुनर्जीवन

कोलोसल बायोसाइन्स नाम की एक कंपनी ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो विलुप्त पक्षियों (Extinct Birds) को वापिस अस्तित्व में ला सकेगी और जोखिमग्रस्त पक्षियों को बचा सकेगी। हालांकि यह तकनीक और इसकी बारीकियों को कहीं प्रकाशित नहीं किया गया है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

तकनीक क्या है?

मुर्गी द्वारा अंडा देने के 24-48 घंटे के अंदर उस अंडे में मौजूद सारी सामग्री (निषेचित भ्रूण सहित, लेकिन बाहरी खोल नहीं) एक कृत्रिम अंडे (Artificial Egg) में डाल दी जाती है। इसके बाद का सारा विकास कृत्रिम अंडे के अंदर होता है।

कृत्रिम अंडा 3-डी प्रिंटिंग विधि (3-D Printing Method) से बनाई गई एक षट्कोण फ्रेम (Hexagonal Frame) होती है, जिसमें अंदर सिलिकॉन की झिल्ली (Silicon Membrane) का अस्तर होता है। असली अंडे की खोल के समान यह नमी को बनाए रखती है, ऑक्सीजन को अंदर जाने देती है और बैक्टीरिया को अंदर नहीं जाने देती। भ्रूण के लिए पोषण की व्यवस्था मूल अंडे की सामग्री से होती है। इस जुगाड़ का उपयोग करके लगभग 2 दर्ज़न चूज़ों को विकसित किया जा चुका है। अब कोलोसल को उम्मीद है कि वह इसकी मदद से दक्षिणी द्वीप पर कभी पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी मोआ (Dinornis robustus) को पुनर्जीवन देगी। न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 3 मीटर ऊंचा यह पक्षी पंद्रहवीं शताब्दी में विलुप्त हो गया था। इसके अंडे लगभग फुटबॉल के आकार के होते थे।

प्रेस विज्ञप्ति को देखकर वैज्ञानिकों को लगता है कि कोलोसल का यह आविष्कार शायद एक बड़ा कदम साबित होगा। वैसे इस तरह से कृत्रिम परिवेश में भ्रूण को विकसित करके चूज़े पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं।

जैसे 1998 में ऐसा पहला सफल प्रयास हुआ था। जापान के युताका तहारा, कात्सुया ओबारा और मासामिची कामिहिरा के दल ने एक कुदरती तौर पर निषेचित अंडे को पहले दो दिन तक कुदरती रूप से इन्क्यूबेशन (Incubation) बाद उसके अंदर की सामग्री को कांच के मर्तबान में रख दिया गया था। साथ में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) डाला गया था जो खोल निर्माण के लिए ज़रूरी होता है। इसी तरह के अगले प्रयास में पारदर्शी प्लास्टिक प्यालों का उपयोग किया गया था। इसमें मुर्गी द्वारा अंडा देने के तुरंत बाद भ्रूण (Fetus) को कृत्रिम अंडे में रख दिया गया था। गौरतलब है कि तहारा एक हाई स्कूल शिक्षक हैं और वे अपने छात्रों के साथ यह प्रयोग करते रहते हैं।

दरअसल, कोलोसल के कृत्रिम अंडे की एक खासियत है वह झिल्ली जो उसने विकसित की है। इसके चलते भ्रूण का विकास ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा पर होता है जबकि तहारा और साथियों ने जो कृत्रिम अंडा बनाया था उसमें ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह से ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। कोलोसल द्वारा विकसित कृत्रिम अंडे की एक विशेषता यह है कि उसमें ऊपर एक पारदर्शी झरोखा है जिसके ज़रिए भ्रूण के विकास (Fetus Development) पर नज़र रखी जा सकती है।

विकसित होते अंडे का सतत निरीक्षण इसलिए भी ज़रूरी होगा कि विलुप्त पक्षियों के जीन्स में संशोधन किए जाएंगे और उनके असर पर नज़र रखनी होगी।

कुल मिलाकर माना जा रहा है कि भ्रूण विकास में कृत्रिम अंडों के निर्माण में हम आगे तो बढ़े हैं, लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक

लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।

इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।

अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।

इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।

यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।

स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।

इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।

शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।

फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हाथी और गुबरैले का एक अनोखा नाता

विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?

हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।

छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।

दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।

ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।

इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।

इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई। 

वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।

दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा। 

वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

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अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

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तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर

ह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।

अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।

तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।

सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।

नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।

इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।

शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।

वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चमकते मशरूम से रोशनी देने वाले पौधे बनाने का सफर

दौलत सिंह तंवर

ल्पना कीजिए, रात के घने अंधेरे में सड़क के किनारे लगे पेड़-पौधे बिना किसी बिजली या तार के एक हल्की, सुकून देने वाली रोशनी बिखेर रहे हों। आधुनिक वनस्पति विज्ञान (botany) और जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) ने इस कल्पना को हकीकत में बदलना शुरू कर दिया है। यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि कैसे प्रयोगशालाओं में आज ‘बायोलुमिनेसेंट’ (जैव-संदीप्त – bioluminescent plants) पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो भविष्य में हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का एक हरा-भरा विकल्प बन सकते हैं।

जैवसंदीप्ति

गर्मियों की रात में चमकते जुगनुओं को हम सभी ने देखा है। गहरे समुद्र में रहने वाली कुछ मछलियां, जेलीफिश या जंगलों में पाए जाने वाले कुछ कवक भी अंधेरे में चमकते हैं। जीवों द्वारा अपने शरीर के भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करने की इस अद्भुत प्रक्रिया को ‘बायोलुमिनेसेंस’ यानी जैव-संदीप्ति कहा जाता है।

मुख्य रूप से यह चमक दो रसायनों का प्रभाव होती है: ‘ल्यूसिफेरिन’ (luciferin) जो ऑक्सीजन से क्रिया करके प्रकाश उत्पन्न करने वाला अणु है, और ‘ल्यूसिफेरेज़’ (luciferase enzyme)  वह एंज़ाइम है जो इस अभिक्रिया को गति देता है। प्रकृति में यह गुण जीवों के शिकारियों से बचने, साथी को आकर्षित करने या शिकार को लुभाने में मदद करता है। लेकिन वनस्पति जगत में, प्राकृतिक रूप से पौधों में यह गुण नहीं पाया जाता।

पौधों से रोशनी पैदा करवाने का विचार वनस्पति विज्ञानियों के लिए नया नहीं है। 1980 के दशक के अंत में वैज्ञानिकों ने जुगनू का जीन तंबाकू के पौधे में डालकर उसे संदीप्त बनाने का प्रयास किया था। प्रयोग काफी हद तक सफल रहा था, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी व्यावहारिक खामी थी। पौधा लगातार रोशनी दे पाए, उसके लिए बाहर से ल्यूसिफेरिन का छिड़काव करना पड़ता था। वैज्ञानिकों को एक ऐसे तरीके की तलाश थी जिसमें पौधा अपनी चयापचय प्रक्रिया (plant metabolism) के ज़रिए खुद अपना प्रकाश उत्पन्न करे – बिना किसी बाहरी रसायन या मदद के।

मशरूम से मिला समाधान

सफलता हाल ही के वर्षों में मिली, जब वैज्ञानिकों ने जुगनू को छोड़कर प्राकृतिक रूप से चमकने वाले कवक (फफूंद) (glowing fungi) का रुख किया। नियोनोथोपेनस नंबी नामक एक ज़हरीले और चमकने वाले मशरूम (Neonothopanus nambi) का गहराई से अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह कवक एक विशेष चयापचय चक्र का उपयोग करता है जिसे ‘कैफिक एसिड चक्र’ कहते हैं। रोचक बात यह है कि           कैफिक एसिड (caffeic acid) सभी पौधों में प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। पौधे इसका उपयोग लिग्निन बनाने (lignin formation) के लिए करते हैं, जो पौधों की कोशिका भित्ति को मज़बूती और कठोरता प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने कवक के उन चार प्रमुख जीन्स की पहचान की जो कैफिक एसिड को ल्यूसिफेरिन में बदलते हैं और फिर प्रकाश उत्सर्जित करने के बाद उसे वापस कैफिक एसिड में बदल देते हैं। वनस्पति विज्ञानियों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से इन चार जीन्स को पहले                तंबाकू (Nicotiana tabaccum) और बाद में पिटूनिया (Petunia hybrida) जैसे पौधों के डीएनए में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया।

नए जेनेटिक रूप से संशोधित पौधों ने अपने पूरे जीवनचक्र में बीज से लेकर अंकुरण, पत्तियों के विकास और परिपक्वता तक निरंतर हरे रंग की रोशनी उत्सर्जित की। यह प्रकाश पत्तियों, तनों, जड़ों और फूलों, सभी हिस्सों से निकल रहा था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसके लिए किसी बाहरी रसायन, पराबैंगनी प्रकाश या बिजली की कोई आवश्यकता नहीं थी। पौधे की               अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली ही इस रोशनी का स्थायी स्रोत बन गई थी।

भविष्य की संभावनाएं 

रोशनी देने वाले पौधे महज़ प्रयोगशाला का चमत्कार नहीं हैं। इनके कई व्यावहारिक और पर्यावरणीय उपयोग (sustainable innovation) हो सकते हैं:

शून्यकार्बन स्ट्रीट लाइट्स (zero carbon lighting): दुनिया भर में स्ट्रीट लाइट्स और सजावटी रोशनी में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन और बिजली की खपत होती है। यदि भविष्य में इन जैवसंदीप्त पेड़ों                    की चमक को बढ़ाया जा सके तो ये सड़कों, पार्कों को रोशन करने का एक प्राकृतिक, शून्य-कार्बन विकल्प बन सकते हैं। जो जलवायु परिवर्तन (climate change solution) से लड़ने में अहम होगा।

इनडोर लाइटिंग (indoor lighting plants): घरों के अंदर ये पौधे एक ‘लिविंग लैंप’ (living lamp) की तरह काम कर सकते हैं। रात के समय ये एक मंद, प्राकृतिक रोशनी देंगे जिससे बिजली की बचत होगी। हाल ही में ‘फायरफ्लाई पेटूनिया’ नाम से कुछ पौधे अमेरिकी बाज़ार में आम लोगों के लिए उतारे भी गए हैं।

फसलों की स्वास्थ्य निगरानी (crop monitoring): वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग करके         पौधों को ऐसा बनाया जा सकता है कि जब वे किसी तनाव (plant stress) में हों (जैसे पानी की कमी, कीटों का हमला, या मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी), तो उनकी चमक का रंग या उसकी तीव्रता बदल जाए।     इससे किसानों को फसल के बीमार होने से बहुत पहले ही संकेत मिल जाएगा।

चुनौतियां और आगे की राह 

हालांकि यह तकनीक बहुत आशाजनक है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले कई वैज्ञानिक और पारिस्थितिक चुनौतियों (scientific challenges) का समाधान करना बाकी है:

रोशनी की तीव्रता (light intensity): वर्तमान में इन पौधों से निकलने वाली रोशनी बहुत तेज़ नहीं है। आप इसकी रोशनी में कोई किताब नहीं पढ़ सकते। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य जेनेटिक कोड (genetic optimization)  में सुधार करके इस रोशनी को कई गुना तक बढ़ाना है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (ecosystem impact): प्रकृति में ऐसे चमकीले पेड़-पौधे लगाने से पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि स्थानीय कीटों, परागण करने वाले जीवों और रात में सक्रिय रहने वाले जंतुओं (nocturnal animals) पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। कहीं यह उनके प्राकृतिक व्यवहार या जीवन चक्र को भ्रमित तो नहीं करेगा?

पौधे की ऊर्जा खपत (energy metabolism): लगातार प्रकाश उत्पन्न करने में पौधे की काफी ऊर्जा खर्च होती है। वनस्पति विज्ञानियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रकाश उत्पन्न करने की यह प्रक्रिया पौधे के सामान्य विकास, उसके फलने-फूलने या उसकी जीवन अवधि पर कोई नकारात्मक प्रभाव न डाले। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा

आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों (mammals species) की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक (zoonotic pathogens) है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य-जीव व्यापार और तस्करी (illegal wildlife trafficking) बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।

यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।

अध्ययन स्तनधारी जीवों (wild mammals) पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब (genetic similarity) हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं (infection risk)। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।

अध्ययन में वन्य-जीव व्यापार के तरीकों (trade practices) को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क (direct exposure) संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार (legal wildlife trade) भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने (pathogen adaptation) का ज़्यादा मौका मिलता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम (wildlife regulations) बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी (pandemic prevention) के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।

फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों (exotic pet trade) के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियों का एक अनूठा सम्बंध

दिन-रात मेहनत करने वाली चींटियां (ants behavior) एकता और परस्पर ताल-मेल बनाकर अपने समूह के साथ वफादारी से काम करती हैं। उन्हें दूसरे समूह की दखलंदाज़ी बिल्कुल नहीं भाती — लगभग हर समय वे दूसरे समूह के प्रति आक्रामक बर्ताव ही करती हैं| हालांकि चींटियां माहू (पौधों का रस चूसने वाले कीट, जिसे तेला या चेपा भी कहते हैं) के साथ साझेदारी का सम्बंध रखती हैं, क्योंकि माहू चींटियों को शहद जैसा चिपचिपा अपशिष्ट पदार्थ ‘हनीड्यू’ (honeydew secretion) भोजन के रूप में देते हैं, वहीं बदले में चींटियां गुबरैला जैसे शिकारियों से उनकी रक्षा (symbiotic relationship) करती हैं और अन्य भोजन के स्थानों तक पहुंचाती हैं; कभी तो सर्दियों में आवास भी देती हैं|

लेकिन 2006 में एक कीट वैज्ञानिक ने एरिज़ोना के रेगिस्तान (Arizona desert ecosystem) में चींटियों का एकदम विपरीत बर्ताव देखा| कीट वैज्ञानिक मार्क मोफेट ने इसी अनुभव को इकॉलॉजी एण्ड इवोल्यूशन शोध पत्रिका में प्रकाशित कर यह सुझाया है कि शायद चींटियों में यह साफ-सफाई से जुड़ी साझेदारी का पहला उदाहरण होगा| उन्होंने अनुभव साझा किया कि दो अलग-अलग प्रजातियों की चींटियां एक-दूसरे के साथ शांति से पेश आ रहीं थीं। इनमें से एक थी लाल टींटी या रेड हार्वेस्टर चींटी (Pogonomyrmex barbatus), जो गहरे भूरे-लाल रंग की और 5-7 मि.मी. तक लंबी होती है। और दूसरी थीं कोन या पिरामिड चींटियां (जीनस – Dorymyrmex), जो पीले-भूरे रंग की होती हैं और इनकी लंबाई 3-3.5 मि.मी होती है (हार्वेस्टर चींटियों की एक-तिहाई)। मोफेट ने देखा कि छोटी चींटियां बड़ी चींटियों का शरीर साफ कर रहीं थी, यहां तक की बड़ी चींटियां अपने धारदार जबड़े खोलकर छोटी चींटियों से सफाई करवा रहीं थीं, मानो उन्हें मज़ा आ रहा हो| पांच दिन तक लगातार निरीक्षण के आधार पर कीट वैज्ञानिक का अनुमान है कि छोटी चींटियों को सफाई के दौरान भोजन मिलता होगा; जैसे वे कुछ परजीवियों को खा रही होंगी या हटा रही होंगी या फिर वे फायदेमंद सूक्ष्मजीवों का आदान-प्रदान कर रही होंगी|

चींटियों के अब तक ज्ञात व्यवहार के चलते यह बात अंचभा लग सकती है। लेकिन जीव जगत में ऐसी बहुत से सम्बंध और साझेदारियां देखने को मिलती हैं जिसमें दो भिन्न प्रजातियों के प्राणी परस्पर लाभांवित होते हैं। इन सम्बंधों को जीवविज्ञान में परस्परता (mutualism) कहा जाता है|    ऐसे सम्बंध में दोनों जीवों को फायदा मिलता है। प्रकृति में इसके असंख्य उदाहरणों में से कुछ की बात करते हैं:

पक्षी एवं शाकाहारी जंतु – पक्षियों (जैसे ऑक्सपेकर या बगुला) को जंतुओं के शरीर से किलनी वगैरह भोजन के रूप में मिलती है और बदले में जंतुओं (जैसे भैंस, गेंडे) को कीटों और परजीवियों से निजात (parasite control) मिलती है।

परागणकर्ता और फूल – मधुमक्खियों जैसे कीटों को फूलों से भोजन के रूप में मकरंद (pollination process) मिलता है और बदले में कीट उनके परागण में मदद करते हैं।

मगरमच्छ एवं प्लोवर पक्षी – जबड़ा खोलकर मगरमच्छ आराम से प्लोवर पक्षी से दांतों की सफाई (cleaning symbiosis example) करवाता है, और प्लोवर पक्षी के भोजन का इंतज़ाम हो जाता है। इस पक्षी को डेंटिस्ट भी कहते हैं।

जड़ एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण बैक्टीरिया – बैक्टीरिया पौधों को नाइट्रोजन (nitrogen fixation) उपलब्ध कराते हैं और बदले में पौधे आवास व भोजन देते हैं।

अर्थात सहजीविता (symbiosis) का रिश्ता भोजन, सुरक्षा और प्रजनन में सहयोग की दृष्टि से पारिस्थितिक संतुलन के लिए ज़रूरी है| ये तो हुआ फायदे का सम्बंध। कुछ सम्बंध ऐसे भी होते हैं जहां एक जीव को लाभ होता है, लेकिन दूसरे जीव को न तो लाभ होता है न हानि। इसे ‘सहभोजी सम्बंध’ (commensalism) कहते हैं। जैसे, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड (एपिफाइटिक ऑर्किड) सूर्य की रोशनी के लिए ऊंची शाखाओं पर केवल आश्रय लेते हैं, इससे पेड़ों को कोई नुकसान नहीं होता| वहीं, एक ऐसा भी सम्बंध है जहां एक जीव को लाभ होता है लेकिन दूसरे जीव को हानि होती है। इसे ‘परजीवी सम्बंध’ (parasitism) कहते हैं। जूं, जोंक, कृमि जैसे परजीवी पोषण और जीवनचक्र के लिए जंतुओं और मनुष्यों के शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। वनस्पतियों में, अमरबेल (Cuscuta reflexa),   स्ट्राइगा (Striga प्रजातियां) जैसे परजीवी पौधे अन्य पेड़-पौधों पर पोषण, आश्रय और प्रजनन के लिए निर्भर रहते हैं| 

अंत में, इतना ही कहा जा सकता है कि प्रकृति (nature observation) में ऐसी कई व्यवस्थाएं और सम्बंध हैं जो अभी तक मनुष्यों की नज़र और समझ से ओझल हैं। ज़रूरत है सिर्फ थोड़ा ध्यानपूर्वक अवलोकन (scientific observation) और निरीक्षण करने की। हमारे आस-पास ही दुर्लभ प्राकृतिक अजूबे मौजूद है, उनके बारे में हमें पता चल सकता है, ज़रूरत है तो बस थोड़े धैर्य और एकाग्रता की। (स्रोत फीचर्स)

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