जीएम खाद्यों पर पूर्ण प्रतिबंध ही सबसे उचित नीति है – भरत डोगरा

जेनेटिक रूप से परिवर्तित (जीएम) खाद्यों के नियमन के लिए सरकारी नीति पर हाल के समय पर तीखी बहस देखी गई है। सरकारी स्तर पर जनता व विशेषज्ञों से इस बारे में राय मांगी गई। अनेक संगठनों व संस्थानों ने कहा कि जीएम खाद्यों पर पहले से जो पूर्ण प्रतिबंध चला आ रहा है, वही जारी रहना चाहिए। हाल ही में भारत के 160 डॉक्टरों का एक संयुक्त बयान जारी हुआ है जिसमें जीएम खाद्यों के अनेक खतरों को बताते हुए इन पर लगे प्रतिबंध को जारी रखने का आग्रह किया गया है।

भारत में जीएम सरसों व बीटी बैंगन पर बहस के दौरान भी जीएम खाद्यों पर पर्याप्त जानकारियां सामने आ चुकी हैं। दूसरी ओर, आयातित जीएम खाद्यों व विशेषकर प्रोसेस्ड आयातों पर से रोक हटाने के लिए दबाव बढ़ रहा है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग से प्राप्त की गई फसलों का मनुष्यों व सभी जीवों के स्वास्थ्य पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ सकता है। निष्ठावान वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से जीएम फसलों के गंभीर खतरों को बताने वाले दर्जनों अध्ययन उपलब्ध हैं। जैफरी एम. स्मिथ की पुस्तक जेनेटिक रुले (जुआ) में ऐसे दर्जनों अध्ययनों का सार-संक्षेप उपलब्ध है। इनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में आमाशय, लीवर, आंतों जैसे विभिन्न अंगों के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की चर्चा है। जीएम फसल या उत्पाद खाने वाले पशु-पक्षियों के मरने या बीमार होने तथा मनुष्यों में भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का वर्णन है।

वैज्ञानिकों के संगठन युनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स ने कुछ समय पहले कहा था कि जेनेटिक इंजीनियरिंग उत्पादों पर फिलहाल रोक लगनी चाहिए क्योंकि ये असुरक्षित हैं। इनसे उपभोक्ताओं, किसानों व पर्यावरण को कई खतरे हैं। 11 देशों के वैज्ञानिकों की इंडिपेंडेंट साइंस पैनल ने जीएम फसलों के स्वास्थ्य के लिए अनेक संभावित दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाया है। जैसे प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल असर, एलर्जी, जन्मजात विकार, गर्भपात आदि। भारत में सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के पूर्व निदेशक प्रो. पुष्प भार्गव ने कहा था कि बीटी बैंगन को स्वीकृति देना एक बड़ी आपदा बुलाने जैसा है।

भारत में बीटी बैंगन के संदर्भ में विश्व के 17 विख्यात वैज्ञानिकों ने एक पत्र लिखकर इस बारे में नवीनतम जानकारी उपलब्ध करवाई थी। पत्र में कहा गया है कि जीएम प्रक्रिया से गुज़रने वाले पौधे का जैव-रासायनिक संघटन व कार्यिकी बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाते हैं जिससे उसमें नए विषैले या एलर्जी उत्पन्न करने वाले तत्त्वों का प्रवेश हो सकता है व उसके पोषण गुण/परिवर्तित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए गैर-जीएम मक्का की तुलना में मक्के की जीएम किस्म जीएम एमओएन 810 में 40 प्रोटीनों की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण हद तक बदल जाती है।

जीव-जंतुओं पर जीएम खाद्य के नकारात्मक स्वास्थ्य असर किडनी, लीवर, आहार नली, रक्त कोशिका, रक्त जैव रसायन व प्रतिरोधक क्षमता पर सामने आ चुके हैं।

17 वैज्ञानिकों के इस पत्र में आगे कहा गया कि जिन जीएम फसलों को स्वीकृति मिल चुकी है उनके संदर्भ में भी अध्ययनों में यही नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम नज़र आए हैं, जिससे पता चलता है कि कितनी अपूर्ण जानकारी के आधार पर जीएम फसलों स्वीकृति दे दी जाती है।

बीटी मक्का पर मानसेंटो कंपनी के अनुसंधान का जब पुनर्मूल्यांकन हुआ तो अल्प-कालीन अध्ययन में भी नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम दिखाई दिए। बीटी के विषैलेपन से एलर्जी का खतरा जुड़ा हुआ है। बीटी बैंगन जंतुओं को खिलाने के अध्ययनों पर महिको-मानसेंटो ने के दस्तावेज में लीवर, किडनी, खून व पैंक्रियास पर नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम नज़र आते हैं। अल्पकालीन (केवल 90 दिन या उससे भी कम) अध्ययन में भी प्रतिकूल परिणाम नज़र आए। लंबे समय के अध्ययन से और भी प्रतिकूल परिणाम सामने आते। अत: इन वैज्ञानिकों ने कहा कि बीटी बैंगन के सुरक्षित होने के दावे का कोई औचित्य नहीं है।

बीटी कपास या उसके अवशेष खाने के बाद या ऐसे खेत में चरने के बाद अनेक भेड़-बकरियों के मरने व अनेक पशुओं के बीमार होने के समाचार मिले हैं। डॉ. सागरी रामदास ने इस मामले पर विस्तृत अनुसंधान किया है। उन्होंने बताया है कि ऐसे मामले विशेषकर आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक व महाराष्ट्र में सामने आए हैं। पर अनुसंधान तंत्र ने इस पर बहुत कम ध्यान दिया है। भेड़ बकरी चराने वालों ने स्पष्ट बताया कि सामान्य कपास के खेतों में चरने पर ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं पहले नहीं देखी गई थीं। हरियाणा में दुधारू पशुओं को बीटी काटन बीज व खली खिलाने के बाद उनमें दूध कम होने व प्रजनन की गंभीर समस्याएं सामने आईं।

बीटी बैंगन पर रोक लगाते हुए तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जो दस्तावेज जारी किया था, उसमें उन्होंने बताया था कि स्वास्थ्य के खतरे के बारे में उन्होंने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक व भारतीय सरकार के औषधि नियंत्रक से चर्चा की थी। इन दोनों अधिकारियों ने कहा कि विषैलेपन व स्वास्थ्य के खतरे सम्बंधी स्वतंत्र परीक्षण होने चाहिए।

लगभग 100 डाक्टरों के एक संगठन ‘खाद्य व सुरक्षा के लिए डाक्टर’ ने भी पर्यावरण मंत्री को जीएम खाद्य व विशेषकर बीटी बैंगन के खतरे के बारे में जानकारी भेजी। उनके दस्तावेज में बताया गया कि पारिस्थितिकीय चिकित्सा शास्त्र की अमेरिका अकादमी ने अपनी संस्तुति में कहा है कि जीएम खाद्य से बहुत खतरे जुड़े हैं व इन पर मनुष्य के स्वास्थ्य की सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त परीक्षण नहीं हुए हैं।

तीन वैज्ञानिकों मे वान हो, हार्टमट मेयर व जो कमिन्स ने जेनेटिक इंजीनियंरिंग की विफलताओं की पोल खोलते हुए एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज इकॉलाजिस्ट पत्रिका में प्रकाशित किया है। इस दस्तावेज के अनुसार बहुचर्चित चमत्कारी ‘सूअर’ या ‘सुपरपिग’, जिसके लिए मनुष्य की वृद्वि के हारमोन प्राप्त किए गए थे, बुरी तरह ‘फ्लॉप’ हो चुका है। इस तरह जो सूअर वास्तव में तैयार हुआ उसको अल्सर थे, वह जोड़ों के दर्द से पीड़ित था, अंधा था और नपुसंक था।

इसी तरह तेज़ी से बढ़ने वाली मछलियों के जीन्स प्राप्त कर जो सुपरसैलमन मछली तैयार की गई उसका सिर बहुत बड़ा था, वह न तो ठीक से देख सकती थी, न सांस ले सकती थी, न भोजन ग्रहण कर सकती थी व इस कारण शीघ्र ही मर जाती थी।

बहुचर्चित भेड़ डॉली के जो क्लोन तैयार हुए वे असामान्य थे व सामान्य भेड़ के बच्चों की तुलना में जन्म के समय उनकी मृत्यु की संभावना आठ गुणा अधिक पाई गई।

इन अनुभवों को देखते हुए जीएम खााद्यों को हम कितना सुरक्षित मानेंगे यह विचारणीय विषय है। इनके बारे में सामान्य नागरिक को सावधान रहना चाहिए व उपभोक्ता संगठनों को नवीनतम जानकारी नागरिकों तक पहुंचानी चाहिए। पर सबसे ज़रूरी कदम तो यह उठाना चाहिए कि जीएम फसलों के प्रसार पर कड़ी रोक लगा देनी चाहिए।

इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए रेखांकित करना ज़रूरी है कि जीएम खाद्यों पर जो विज्ञान आधारित प्रतिबंध भारत में लगा हुआ है उसे जारी रहना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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