चींटियां संक्रमण से कैसे बचाव करती हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।

सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।

सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं। 

इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था। 

एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।

प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।

कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।

इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।  

बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पक्षियों की लंबी-लंबी यात्राएं और वापसी

ह चमत्कार ही लगता है कि कई पक्षी (Birds) हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, साल-दर-साल सही ठिकाने पर पहुंच जाते हैं और वापिस उड़कर अपने घर भी आ जाते हैं। और पक्षी ही नहीं समुद्री कछुए (Sea Turtels) तथा कई अन्य जानवर भी यह करतब करते हैं। सवाल यह उठता है कि ये प्राणी इस प्रवास (Migration) के दौरान अपना मार्ग कैसे ढूंढते हैं।

इसका जवाब खोजते-खोजते यह समझ में आया है कि ये जीव किसकी प्रकार से पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) को ताड़कर दिशा का अंदाज़ लगा लेते हैं।

चुंबकत्व आधारित दिशा-निर्धारण की क्षमता (Magnetoreception) कई जंतुओं में देखी गई है। जैसे पक्षी, कछुए, शार्क, और कुत्ते। कुछ शोधकर्ता तो मानते हैं कि मनुष्य में भी थोड़ी बची-खुची क्षमता है। खैर, यह काफी गरमागर्म बहस का विषय रहा है कि यह चुंबकीय ज्ञानेंद्री (Magnetic Sensory) कैसे काम करती है। एक परिकल्पना यह रही है कि जंतुओं के ऊतकों में मैग्नेटाइट नामक लवण के छोटे-छोटे रवे होते हैं। ये रवे एक तरह से चुंबकीय दिक्सूचक (Compass) का काम करते हैं।

एक ज़्यादा हालिया परिकल्पना आंखों के रेटिना पर केंद्रित है। इसमें माना जाता है कि रेटिना के प्रोटीन्स (क्रिप्टोक्रोम्स) (Chryptochromes) चुंबकीय क्षेत्र के प्रति संवेदी होते हैं। इसके अनुसार प्रवासी सॉन्ग बर्ड्स हल्के से धुंधलके में भी सही दिशा में उड़ते रह सकते हैं।

फिर पिछले साल होमिंग पिजन्स (घर लौटने वाले कबूतर) पर शोध करके एक और नवीन प्रक्रिया उजागर हुई है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि बदलते चुंबकीय क्षेत्र से इन कबूतरों के अंदरुनी कान में विद्युत धाराएं (Electric current) पैदा होती हैं। ये विद्युत धाराएं मस्तिष्क तक पहुंचने वाली तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती हैं।

मज़ेदार बात है कि इस अध्ययन की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के पक्षी वैज्ञानिक मार्टिन वाइकेल्स्की और बॉन विश्वविद्यालय के प्रतिरक्षा वैज्ञानिक क्रिस्टियन कर्ट्स के बीच बातचीत के दौरान वाइकेल्स्की ने जंतु प्रवास में चुंबकत्व की भूमिका का विवरण दिया। यह सुनकर कर्ट्स ने बताया कि उन्होंने चूहों और मनुष्य की तिल्ली (प्लीहा) से प्राप्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं (मैक्रोफेज) में बारीक चुंबकीय लौह कण देखे जो तब बनते हैं जब मैक्रोफेज (Macrophage) पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके उनके लौह परमाणु जज़्ब कर लेती हैं। क्या इसी तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होमिंग पिजन्स (Homing Piegons) को प्रवास के दौरान दिशा-निर्धारण में मदद कर सकती हैं?

लेकिन सवाल था इस विचार की प्रायोगिक जांच का। कर्ट्स के दिमाग में एक आइडिया था और इस आइडिया को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक शोधकर्ता क्लिविया लिसोव्स्की को शामिल कर लिया। लिसोव्स्की की रुचि यह समझने में थी कि कोशिकाएं अपने पर्यावरण को कैसे भांपती हैं।

सबसे पहले तो लिसोव्स्की ने यह जांच की कि क्या कबूतरों की विभिन्न प्रजातियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (Immune Cells) में वैसे ही चुंबकीय कण पाए जाते हैं जैसे चूहों में देखे गए थे। लिसोव्स्की और उनकी टीम को उम्मीद थी कि ऐसी कोशिकाओं का जखीरा प्लीहा में मिलेगा क्योंकि वहीं पर तो मैक्रोफेज लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने का काम करते हैं। लेकिन अपेक्षा के विपरीत, एक बढ़िया चुंबकत्व-मापी (मैग्नेटोमीटर) ने दर्शाया कि सारे ऊतकों में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय संकेत लीवर (यकृत, जिगर) में मिल रहे थे। हालांकि संकेत क्षीण थे लेकिन वे मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) के हिसाब से काफी शक्तिशाली थे।

होमिंग पिजन्स के ऊतकों की पतली-पतली स्लाइस निकालकर अभिरंजित (Staining) करके यह पक्का हो गया कि लीवर के मैक्रोफेज में फेरिटिन (Ferritin) नामक लौह कण भरपूर मात्रा में थे लेकिन ये प्लीहा, मस्तिष्क और चोंच में नदारद थे। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) से अवलोकन से यह भी स्पष्ट हो गया कि कबूतरों के लीवर के मैक्रोफेज के आसपास थे। यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों और पक्षियों में प्लीहा (Spleen) की तंत्रिकाएं मैक्रोफेज से संवाद करती हैं और दोनों में ही ये तंत्रिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ती हैं।

अब एक उम्दा प्रयोग से इस बात की जांच की गई कि ये लौह-प्रचुर मैक्रोफेज चुंबकीय कम्पास की तरह कैसे काम करते होंगे। इस प्रयोग में एक औषधि क्लोड्रोनेट लिपोसोम की मदद से मैक्रोफेज को सुप्त कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने 34 होमिंग पिजन्स को प्रशिक्षित किया कि वे ठीक पूर्व दिशा में 19 किलोमीटर की उड़ान भरें।

दिन के समय तो कबूतर दिशा-निर्धारण के लिए सूर्य की स्थिति की मदद लेते हैं। लेकिन जब घने बादल छाए हों, तो दिशा के लिए वे चुंबकत्व के सहारे रहते हैं। एक झील (लेक कॉन्स्टेन्स) के नज़दीक शोधकर्ता दल ने 18 कबूतरों को क्लोड्रोनेट (Clodronate) का इंजेक्शन दिया और 24 घंटे बाद उन्हें एक-एक करके उस समय छोड़ा गया जब घने बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ओझल था। ज़ाहिर है, इन पक्षियों पर जीपीएस चस्पा किया गया था जिसकी मदद से शोधकर्ता इनकी उड़ान पर नज़र रख सकते थे।

बादल आच्छादित आकाश के समय तो कबूतरों को 19 किलोमीटर सही-सही उड़ने में उस स्थिति में कोई दिक्कत नहीं आई जब उनके मैक्रोफेज सही-सलामत थे। लेकिन जब क्लोड्रोनेट इंजेक्शन ने उनके लीवर मैक्रोफेज को ठप कर दिया, तब वे खुले धूप वाले आकाश में तो आसानी से उड़े लेकिन मेघाच्छादित आकाश (Cloudy sky) में उन कबूतरों को दिशा तलाशने में खासी परेशानी हुई जिनके लीवर मैक्रोफेज ठप कर दिए गए थे। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं दिशा निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।

इंजेक्शन-प्राप्त समस्त 18 पक्षी बहुत भटक गए थे और तभी घर लौट पाए जब आसमान साफ हो गया। दूसरी ओर, जिन 16 पक्षियों को नकली इंजेक्शन दिया गया था वे सीधे घर लौट आए।

यह देखने के लिए कि क्या औषधि कबूतरों को सामान्य रूप से दिग्भ्रमित कर देती है, शोधकर्ताओं ने औषधि-उपचारित पक्षियों को खुले आकाश की परिस्थिति में भी छोड़ा। सारे के सारे बगैर किसी परेशानी के वापिस लौट आए।

कई वैज्ञानिकों ने इस खोज को रोमांचक बताया है लेकिन आगे और छानबीन का सुझाव दिया है। जैसे बोलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के वर्नर बिंगमैन का सुझाव है कि लीवर के मैक्रोफेज को ठप करने की बजाय लीवर की चुंबकीय सूचना के साथ छेड़चाड़ करके देखा जाए। इस तरह का एक प्रयोग 1970 के दशक में किया गया था। उस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने होमिंग पिजन्स को चुंबकीय कुंडली (Magnetic coil) पहना दी थी जो उनके सिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करती थी। देखा गया था कि ये कबूतर उल्टी दिशा में उड़ चले थे।

बहरहाल, वाइकेल्सकी का कहना है कि यदि सही साबित हुआ, तो शायद यह प्रक्रिया मधुमक्खियों से लेकर चमगादड़ों, शार्क और व्हेल्स तक के लिए एक समान हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हाथी और गुबरैले का एक अनोखा नाता

विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?

हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।

छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।

दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।

ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।

इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।

इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई। 

वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।

दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा। 

वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

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अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वन्यजीवों से कोरोनावायरस फैलने की अधिक संभावना

कोविड महामारी के स्रोत का पता लगाने के प्रयास लगातार जारी हैं। हाल ही में सीएनएन द्वारा प्रसारित साक्षात्कार में एक प्रमुख वैज्ञानिक सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के पूर्व निदेशक और वायरोलॉजिस्ट रॉबर्ट रेडफील्ड ने बिना किसी प्रमाण के दावा किया कि सार्स-कोव-2 वुहान की प्रयोगशाला से निकला है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह मात्र एक निजी राय है। इसके दो दिन बाद कुछ अन्य लोगों (डबल्यूएचओ और चीन सरकार की टीम) ने वायरस के वन्यजीवों से फैलने की बात कही जिसकी शुरुआत चमगादड़ों से हुई है। इसमें भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि वुहान की प्रयोगशाला में किसी को भी ऐसा कोरोनावायरस नहीं मिला है जिसे बदलकर ज़्यादा फैलने वाला बनाया गया हो और फिर उसने बदलते-बदलते सार्स-कोव-2 जैसा रूप लेकर वहां किसी कर्मचारी को संक्रमित कर दिया हो। इसी तरह किसी को जंगली जीवों में कोरोनावायरस के प्रमाण भी नहीं मिले हैं जो एक से दूसरे जंतु में आगे बढ़ते-बढ़ते उत्परिवर्तित होकर सार्स-कोव-2 के समान हो गया हो और फिर मनुष्यों में प्रवेश कर गया हो।

अभी तक ये दोनों ही विचार प्रमाण-विहीन हैं और दोनों ही संभव हैं।

फिर भी इन दोनों विचारों के सही होने की संभावना बराबर नहीं है। देखा जाए तो प्रयोगशाला से वायरस के निकलने की कोई एक या शायद कुछ मुट्ठी भर घटनाएं हो सकती हैं जबकि वन्यजीवों से वायरस के फैलने के अनेकों अवसर होंगे।

रेडफील्ड की अटकल है कि किसी भी वायरस के लिए इतने कम समय में जीवों से मनुष्यों में प्रवेश करने की कुशलता हासिल करना बिना प्रयोगशाला के संभव नहीं है। लेकिन एक बार में इतनी बड़ी छलांग बहुत बड़ी बात होगी। स्वयं रेडफील्ड ने कहा है कि यह वायरस हमारी जानकारी में आने के कई महीनों पहले से प्रसारित हो रहा था। यानी मनुष्यों तक पहुंचने से पहले एक लंबी अवधि रही होगी जो इस वायरस के वन्यजीवों से फैलने का संकेत देती है।

वन्यजीवों से वायरस के फैलने का विचार इस बात पर टिका है कि चीन में करोड़ों चमगादड़ हैं और उनका मनुष्यों समेत अन्य जीवों से खूब संपर्क होता है। अत:, वायरस के मनुष्यों में प्रवेश करने के कई मौके हो सकते हैं। मूल रूप में तो यह वायरस मनुष्यों में खुद की प्रतिलिपि तैयार करने में अक्षम होता है। लेकिन मनुष्यों को संक्रमित करने के पहले इसे विकसित होने के लाखों मौके मिले होंगे। गौरतलब है कि चमगादड़ अक्सर कई जीवों जैसे पैंगोलिन, बैजर, सूअर, एवं अन्य के संपर्क में आते हैं जिससे ये मौकापरस्त वायरस इन प्रजातियों को आसानी से संक्रमित कर देते हैं। चमगादड़ कॉलोनियों में रहते हैं इसलिए विभिन्न प्रकार के कोरोनावायरस के मिश्रण की संभावना होती है और उन्हें अपने जींस को पुनर्मिश्रित करने का पूरा मौका मिलता है। यहां तक कि एक अकेले चमगादड़ में भी विभिन्न कोरोनावायरस देखे गए हैं।

इन वायरसों को मेज़बानों के बीच छलांग लगाने के लिए कई महीनों का समय मिलता है। इसी दौरान वे उत्परिवर्तित भी होते रहते हैं। एक बार मनुष्यों में प्रवेश करने पर उन वायरस संस्करणों को वरीयता मिलती है जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करके अपनी प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता रखते हैं। जल्द ही वे कोशिकाओं को इस स्तर तक संक्रमित कर देते हैं कि लोग बीमार होने लगते हैं। तब जाकर एक नई बीमारी प्रकट होती है। यह वही अवधि होती है जिसे रेडफील्ड ने माना है कि वायरस प्रसारित होता रहा है।

वास्तव में हम कोरोनावायरस के विकास में यह घटनाक्रम देख भी रहे हैं। इसमें काफी तेज़ी से उत्परिवर्तन हो रहे हैं (E484K और 501Y जैसे) जो वायरस को और अधिक संक्रामक बनाते हैं। युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वायरोलॉजिस्ट एडम लौरिंग के अनुसार ये परिवर्तन प्राकृतिक रूप से हो रहे हैं। जिसका कारण यह है कि वायरस को लाखों संक्रमित व्यक्तियों में उत्परिवर्तन के लाखों अवसर मिल रहे हैं।

तो किसे सही माना जाए? रेडफील्ड की प्रयोगशाला से रिसाव की परिकल्पना को जो मात्र एक संयोग पर निर्भर है? या फिर वन्यजीवों से प्रसारित होने की परिकल्पना को जिसे लाखों अवसर मिल रहे हैं? हालांकि दोनों ही संभव हैं लेकिन एक की संभावना अधिक मालूम होती है। इसीलिए, अधिकांश वैज्ञानिकों को वन्यजीवों के माध्यम से इस वायरस के फैलने के आशंका अधिक विश्वसनीय लगती है।

वायरस की उत्पत्ति का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी महामारी के शुरू होने की जानकारी मिल सकती है ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों को रोका जा सके। आज भी कई रोग पैदा करने वाले वायरस हमारे बीच मौजूद हैं जो महामारी का रूप ले सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नर चीतों के भी अड्डे होते हैं

हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि अफ्रीका में पाए जाने वाले नर चीते कुछ खास पेड़ों या बड़ी चट्टानों को अपना ‘अड्डा’ बना लेते हैं। इन अड्डों की मदद से वे अपने लिए साथी तलाशते हैं और अन्य नर चीतों को संकेत देते हैं। इस तरह ये अड्डे उनके संचार केंद्र बन जाते हैं। शोधकर्ताओं को लगता है कि चीतों के संचार केंद्र के बारे में जानकारी चीतों को नाराज़ किसानों के हमले से बचा सकती है।

1980 के दशक में युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के व्यवहार पारिस्थितिकी विज्ञानी टिम कैरो ने पाया था कि चीतों का सामाजिक ढांचा अनोखा होता है: मादा चीता का अधिकार क्षेत्र बहुत विशाल होता है, और यह क्षेत्र कई नर चीतों के छोटे-छोटे अधिकार क्षेत्रों पर फैला होता है। अधिकार क्षेत्र के लिए नर चीतों में भयानक प्रतिस्पर्धा रहती है, अपने अधिकार क्षेत्र की रक्षा के लिए वे एक-दो असम्बंधित नर चीतों के साथ सांठ-गांठ भी बना लेते हैं। और बिना क्षेत्र वाले ‘बेघर’ नर चीते (फ्लोटर्स) अन्य नर चीतों के क्षेत्र पर कब्ज़ा जमाने की फिराक में घूमते रहते हैं।

कैरो ने यह भी पाया था कि चीतों के अपने कुछ खास स्थान होते हैं (जैसे कोई पेड़ या बड़ी चट्टान) जहां वे नियमित रूप से वे अपनी गंध छोड़कर जाते हैं। लीबनिज़ इंस्टीट्यूट फॉर ज़ू एंड वाइल्डलाइफ रिसर्च के स्थानिक पारिस्थितिकी विज्ञानी जोर्ग मेलज़ाइमर को लगा कि ये अड्डे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए उनकी टीम ने 2007 से 2018 के बीच 106 वयस्क चीतों पर रेडियो कॉलर लगाए। ये चीते सेंट्रल नामीबिया में लगभग 11,000 वर्ग किलोमीटर में फैले मवेशियों के फार्म के पास रहते थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिकार क्षेत्र से लैस चीते अपना आधा वक्त ‘अड्डों’ पर बिताते हैं, और पेशाब करके अपनी पहचान (गंध) वहां छोड़ देते हैं। फ्लोटर चीते भी नियमित आते-जाते हैं, लेकिन वे वहां सूंघने मात्र के लिए ही रुकते हैं। इन जगहों पर कभी-कभी मादा भी आती है और कामोन्माद के दौरान वहां अपनी पहचान छोड़ जाती है। ये अड्डे आम तौर पर नर चीते के अधिकार क्षेत्र के केंद्र में होते हैं और किसी चाय-पान की मशहूर दुकान की तरह काम करते हैं, जहां चीते अपने लिए बेहतर साथी की तलाश करते हैं। जो स्थान अड्डा बन चुके हैं वे स्थान हमेशा अड्डे बने रहते हैं। अधिकार क्षेत्र पर नए चीते का अधिकार हो जाए, तब भी अड्डों में बदलाव नहीं होता।

चीतों के अड्डों की जानकारी संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है। कई जानवरों की तरह चीते भी जोखिम में हैं। उनके सिकुड़ते आवास स्थल, शिकार की घटती आबादी और मनुष्यों के साथ उनके बढ़ते संघर्ष के कारण आज चीतों की आबादी महज़ 7000 रह गई है।

हालांकि चीते बड़े मवेशियों का शिकार नहीं करते लेकिन हिरण, चिंकारा वगैरह ना मिलने पर वे बछड़ों का शिकार करते पाए गए हैं। नामीबिया और अन्य जगहों पर किसान अपने पशुओं की रक्षा या प्रतिशोध में चीतों को मार देते हैं। इस तरह की हत्याएं चीतों के लिए मुख्य खतरा मानी जा रही हैं।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उन 35 किसानों से संपर्क किया जिनके मवेशी चीते के शिकार बने थे। इनमें से छह किसानों की ज़मीन पर चीतों का अड्डा था, और उन्होंने मवेशियों पर हमला भी किया था। इसलिए शोधकर्ताओं ने किसानों को सुझाव दिया कि अगर वे अपने मवेशियों और बछड़ों को इन अड्डों से दूर ले जाएं तो चीते इन्हें नहीं मारेंगे। किसानों द्वारा सलाह मानने पर पाया गया कि चीतों के द्वारा बछड़ों के शिकार में 86 प्रतिशत की कमी आई। ये नतीजे प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं।

शोधकर्ता बताते हैं कि वास्तव में समस्या चीतों के कारण नहीं बल्कि स्थान के कारण थी। वहीं यह अध्ययन सीधे तौर पर तो सभी बिल्ली प्रजातियों पर लागू नहीं होता क्योंकि उनकी सामाजिक संरचना और अड्डे अलग तरह के होते हैं, लेकिन यह अध्ययन वन्य जीव और मनुष्य के बीच के संघर्ष के बारे में सोचने का एक नया दृष्टिकोण ज़रूर देता है। शोधकर्ताओं की सलाह को उन क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है जहां चीतों, कृषि और पशुओं के बीच संघर्ष दिखता है। साथ ही अध्ययन हमें संरक्षण प्रबंधन की नीतियां बनाने के पहले जंगली जानवरों के व्यवहार को समझने का महत्व भी बताता है।(स्रोत फीचर्स)

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परोपकारी जीव मीरकेट

जैव विकास के सिद्धांत के अनुसार जानवर सिर्फ अपने जेनेटिक सम्बंधियों की ही मदद करते हैं। लेकिन रेगिस्तान में रहने वाले स्तनधारी जानवरों पर हुआ एक हालिया अध्ययन कहता है कि मीरकेट स्तनधारी अपने समूह के सभी सदस्यों की शिद्दत से मदद करते हैं।

मीरकेट नेवले के कुल के स्तनधारी प्राणी हैं जो दक्षिण अफ्रीका के कालाहारी रेगिस्तान में समूहों में रहते हैं। एक-एक समूह में तकरीबन 20 सदस्य होते हैं लेकिन कुछ समूह में सदस्यों की संख्या 50 तक होती है।

जैव विकास सिद्धांत के अनुसार सिर्फ परिजनों की मदद करना ही हितकर है क्योंकि मदद देने और मदद लेने वाले के बीच एक आनुवंशिक सम्बंध होता है। इस तरह की गई सहायता अधिक संतान होना सुनिश्चित करती है, जो मदद करने वाले के लिए अगली पीढ़ी में अपने जीन्स पहुंचाने की संभावना बढ़ाती है। लेकिन समूह में रहने वाले जानवरों में यह पता करना मुश्किल होता है कि किन सदस्यों के बीच करीबी या आनुवंशिक सम्बंध है।

जीवों के मददगार स्वभाव के बारे में जानने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के क्रिस डनकैन और उनके साथियों ने लगभग 1347 मीरकेट के पिछले 25 सालों के डैटा का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे अपने समूह के अन्य सदस्यों की सहायता करते वक्त यह नहीं सोचते कि जिसकी वे मदद कर रहे हैं वह जेनेटिक रूप से उनका कितना करीबी है। मीरकेट अपने समूह के सभी सदस्यों के बच्चों की देखभाल करते हैं, उन्हें भोजन खिलाते हैं, समूह की सुरक्षा के लिए बारी-बारी पहरेदारी करते हैं, सामूहिक मांद खोदते हैं।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि कारण यह हो सकता है कि मीरकेट समूह के सभी सदस्य एक-दूसरे के करीबी होते हैं। इसलिए वे बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे की मदद करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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डायनासौर की एक नई नन्ही प्रजाति

वैज्ञानिकों हाल ही में मिले डायनासौर के जीवाश्म इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कंगारू के आकार के फुर्तीले डायनासौर ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका के बीच की प्राचीन भ्रंश घाटी में रहते थे।

ऑस्ट्रेलिया में साढ़े बारह करोड़ वर्ष पुरानी चट्टानों की खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को कंगारू जितने बड़े डायनासौर के जीवाश्म मिले हैं। ये जीवाश्म डायनासौर के जबड़ों के हैं। इन जबड़ों की बनावट उल्टे गैलियन जहाज़ों के ढांचे जैसी है। जबड़ों की गैलियन नुमा बनावट और जीवाश्म विज्ञानी डोरिस सीगेट्स-डीविलियर्स के नाम पर इस डायनासौर को गैलिनोसौरस डोरिसी नाम दिया है।

गैलिनोसौरस डोरिसी की हड्डियों का विश्लेषण करने पर पता चला कि ये डायनासौर ऑर्निथोपॉड थे यानि इनके पैर पक्षियों के पैरों की तरह थे। ये अपने पिछले मज़बूत पैरों के सहारे चलते और दौड़ते थे और शाकाहारी थे। 

न्यू इंगलैंड युनिवर्सिटी के मैथ्यू हर्न और उनकी टीम ऑस्ट्रेलिया के गोंडवाना महाद्वीप के सरकने के दौरान ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका के बीच डायनासौर के स्थानांतरण का मानचित्रण कर रहे हैं। पिछले साल भी हर्न की टीम ने इसी जगह एक ऑर्नीथोपॉड डायनासौर की पहचान की थी। इसे डिलुविकरसौर पिकरिंगी नाम दिया गया था जो गैलिनोसौरस डायनासौर का करीबी रिश्तेदार है। लेकिन गैलिनोसौरस डायनासौर डिलुविकरसौर से लगभग सवा करोड़ साल पहले के थे। टीम का मत है कि गैलिनोसौरस उत्तरी अमेरिका और चीन की बजाय पैटागोनिया में रहने वाली डायनासौर प्रजातियों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं।

गैलिनोसौरस के जीवाश्म जिन चट्टानों में मिले हैं वे ज्वालामुखी से निकली चट्टानें हैं। क्रिटेशियस युग के दौरान, जब ये डायनासौर रहा करते थे, तब पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में सक्रिय ज्वालामुखी का लावा नदियों के साथ बहकर इस घाटी में आया होगा। नदियों द्वारा बहाकर लाई गई गाद घाटी में जमा होने से मैदान बने। इन मैदानों में डायनासौर और अन्य जानवर रहने लगे।

इस अध्ययन से लगता है कि क्रिटेशियस युग के दौरान अंटार्कटिका से होकर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच सेतु मौजूद रहा होगा जिसके कारण इन महाद्वीपों के डायनासौर के बीच करीबी आनुवंशिक सम्बंध दिखते हैं।

गैलिनोसौरस इस क्षेत्र में पांचवा ऑर्निथोपॉड प्रजाति का डायनासौर मिला है जिससे यह पता चलता है कि छोटे कद-काठी वाले डायनासौर काफी विविध स्थानों पर फैले हुए थे जो ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका के बीच की घाटी में पनपे थे जहां से ये महाद्वीप अलग-अलग हुए थे। (स्रोत फीचर्स)

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कितने समय से पांडा सिर्फ बांस खाकर ज़िन्दा है

रीर पर बड़े-काले धब्बे वाले पांडा (Ailuropoda melanoleuca) चीन के बांस के जंगलों में रहते हैं और उनका भोजन सिर्फ बांस है। लेकिन सवाल यह है कि कब से पांडा ने सिर्फ बांस को अपना भोजन बना लिया। हमेशा से बांस पांडा का भोजन नहीं रहा है और ना ही पूर्व में उनका आवास स्थान बांस के जंगल था, उनमें काफी विविधता थी। पूर्व में हुए शोध के आधार पर वैज्ञानिकों का मानना था कि पांडा ने लाखों साल पहले ही बांस को अपना भोजन बना लिया था। लेकिन हाल का एक अध्ययन बताता है कि ऐसा नहीं है। करंट बायोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार पांडा ने लाखों साल पहले नहीं बल्कि कुछ हज़ार साल (5-7 हज़ार साल) पहले ही बांस को अपना एकमेव भोजन बनाया है।

पांडा के भोजन और आवास में परिवर्तन कब आए, यह जानने के लिए चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंस के संरक्षण जीव विज्ञानी फुवेन वेई और उनके साथियों ने प्राचीन और आधुनिक पांडा की हड्डियों और दांतों में मौजूद स्थिर समस्थानिकों (तत्वों के ऐसे समस्थानिक जो समय के साथ क्षय नहीं होते) के अनुपात की तुलना की।

कोई भी जीव जो भोजन खाता है, उस भोजन की रासायनिक पहचान उसके शरीर में आ जाती है। वैज्ञानिक शरीर के अलग-अलग ऊतकों की जांच करके यह पता कर सकते हैं कि किसी जीव के जीवन काल के अलग-अलग समय पर उसका भोजन कैसा रहा होगा। हड्डियों में मौजूद समस्थानिकों की मदद से पता किया जा सकता है कि जीवन के अंतिम कुछ सालों में किसी जीव का भोजन कैसा रहा होगा। दांतों के नमूने से यह पता किया जा सकता है कि किसी जीव के शुरुआती जीवन में उसका भोजन कैसा रहा होगा।

शोधकर्ताओं की टीम ने तकरीबन 5000 साल पूर्व के पांडा जीवाश्म और आधुनिक मृत पांडा के दांतों और हड्डियों के समस्थानिकों की मात्रा तुलना की। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि पांडा के पूर्वजों का भोजन आधुनिक पांडा से बहुत अलग था और वे ऊष्ण कटिबंधीय जंगलों में रहते थे। हालांकि विश्लेषण में इस बात का पता नहीं चला है कि पांडा के पूर्वजों का भोजन क्या था।

पांडा के पूर्वज असल में खाते क्या थे, यह जानने के लिए यह पता करना होगा कि पांडा के पूर्वजों के पेट में क्या पहुंचता था। लेकिन यह पता करना आसान नहीं है। जीवाश्मों में उनका भोजन मिलना मुश्किल है। मगर इस तरह के अध्ययनों से इस बात के संकेत तो मिल ही सकते हैं कि क्यों पांडा सिर्फ बांस को ही अपना भोजन बनाने को मजबूर हुए, और उनका आवास स्थान इतना सीमित कैसे हो गया। यदि इन कारणों का पता लग जाए तो हम वर्तमान में बचे हुए पांडा का संरक्षण कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मकड़ी का रेशम स्टील से 5 गुना मज़बूत

क्सर मकड़ी का जाला देखकर या उससे टकराने पर भी हमें उसकी ताकत का अंदाज़ा नहीं लगता। लेकिन मकड़ी का जाला मानव के बराबर हो तो वह एक हवाई जहाज़ को जकड़ने की क्षमता रखता है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने इन रेशमी तारों की मज़बूती का कारण पता लगाया है।

मकड़ी के रेशम की स्टील से भी अधिक मज़बूती का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने परमाणु बल सूक्ष्मदर्शी की मदद से विषैली ब्राउन मकड़ियों के रेशम का विश्लेषण किया। इस रेशम का उपयोग वे ज़मीन पर अपना जाला बनाने और अपने अंडों को संभाल कर रखने के लिए करती हैं। एसीएस मैक्रो लेटर्स में प्रकाशित रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बताया है कि जाले का प्रत्येक तार मानव बाल से 1000 गुना पतला है और हज़ारों नैनो तंतुओं से मिलकर बना है। और प्रत्येक तार का व्यास मिलीमीटर के 2 करोड़वें भाग के बराबर है। एक छोटे से केबल की तरह, प्रत्येक रेशम फाइबर पूरी तरह से समांतर नैनो तंतुओं से बना होता है। इस फाइबर की लंबाई करीब 1 माइक्रॉन होती है। यह बहुत लंबा मालूम नहीं होता लेकिन नैनोस्केल पर देखा जाए तो यह फाइबर के व्यास का कम से कम 50 गुना है। शोधकर्ताओं का ऐसा मानना है कि वे इसे और अधिक खींच सकते हैं।

वैसे पहले भी यह मत आए थे कि मकड़ी का रेशम नैनोफाइबर से बना है, लेकिन अब तक इस बात का कोई सबूत नहीं था। टीम का मुख्य औज़ार था ब्राउन रीक्ल्यूस स्पाइडर का अनूठा रेशम जिसके रेशे बेलनाकार न होकर चपटे रिबन आकार के होते हैं। इस आकार के कारण इसे शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी लेंस के नीचे जांचना काफी आसान हो जाता है।

यह नई खोज पिछले साल की एक खोज पर आधारित है जिसमें यह बताया गया था कि किस प्रकार ब्राउन रीक्ल्यूस स्पाइडर छल्ले बनाने की एक विशेष तकनीक से रेशम तंतुओं को मज़बूत करती है। एक छोटीसी सिलाई मशीन की बदौलत यह मकड़ी रेशम के प्रत्येक मिलीमीटर में लगभग 20 छल्ले बनाती है, जो उनके चिपचिपे स्पूल को अधिक मज़बूती देती है और इसे पिचकने से रोकती है।

शोधकर्ताओं का मत है कि भले चपटे रिबन और छल्ला तकनीक सभी मकड़ियों में नहीं पाई जाती, किंतु रीक्ल्यूस रेशम का अध्ययन अन्य प्रजातियों के रेशों पर शोध का एक रास्ता हो सकता है। ऐसे अध्ययन से मेडिसिन और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नई सामग्री बनाने के रास्ते बनाए जा सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)

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