चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।
सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।
सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं।
इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था।
एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।
प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।
कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।
इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।
बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)
यह चमत्कार ही लगता है कि कई पक्षी (Birds) हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, साल-दर-साल सही ठिकाने पर पहुंच जाते हैं और वापिस उड़कर अपने घर भी आ जाते हैं। और पक्षी ही नहीं समुद्री कछुए (Sea Turtels) तथा कई अन्य जानवर भी यह करतब करते हैं। सवाल यह उठता है कि ये प्राणी इस प्रवास (Migration) के दौरान अपना मार्ग कैसे ढूंढते हैं।
इसका जवाब खोजते-खोजते यह समझ में आया है कि ये जीव किसकी प्रकार से पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) को ताड़कर दिशा का अंदाज़ लगा लेते हैं।
चुंबकत्व आधारित दिशा-निर्धारण की क्षमता (Magnetoreception) कई जंतुओं में देखी गई है। जैसे पक्षी, कछुए, शार्क, और कुत्ते। कुछ शोधकर्ता तो मानते हैं कि मनुष्य में भी थोड़ी बची-खुची क्षमता है। खैर, यह काफी गरमागर्म बहस का विषय रहा है कि यह चुंबकीय ज्ञानेंद्री (Magnetic Sensory) कैसे काम करती है। एक परिकल्पना यह रही है कि जंतुओं के ऊतकों में मैग्नेटाइट नामक लवण के छोटे-छोटे रवे होते हैं। ये रवे एक तरह से चुंबकीय दिक्सूचक (Compass) का काम करते हैं।
एक ज़्यादा हालिया परिकल्पना आंखों के रेटिना पर केंद्रित है। इसमें माना जाता है कि रेटिना के प्रोटीन्स (क्रिप्टोक्रोम्स) (Chryptochromes) चुंबकीय क्षेत्र के प्रति संवेदी होते हैं। इसके अनुसार प्रवासी सॉन्ग बर्ड्स हल्के से धुंधलके में भी सही दिशा में उड़ते रह सकते हैं।
फिर पिछले साल होमिंग पिजन्स (घर लौटने वाले कबूतर) पर शोध करके एक और नवीन प्रक्रिया उजागर हुई है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि बदलते चुंबकीय क्षेत्र से इन कबूतरों के अंदरुनी कान में विद्युत धाराएं (Electric current) पैदा होती हैं। ये विद्युत धाराएं मस्तिष्क तक पहुंचने वाली तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती हैं।
मज़ेदार बात है कि इस अध्ययन की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के पक्षी वैज्ञानिक मार्टिन वाइकेल्स्की और बॉन विश्वविद्यालय के प्रतिरक्षा वैज्ञानिक क्रिस्टियन कर्ट्स के बीच बातचीत के दौरान वाइकेल्स्की ने जंतु प्रवास में चुंबकत्व की भूमिका का विवरण दिया। यह सुनकर कर्ट्स ने बताया कि उन्होंने चूहों और मनुष्य की तिल्ली (प्लीहा) से प्राप्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं (मैक्रोफेज) में बारीक चुंबकीय लौह कण देखे जो तब बनते हैं जब मैक्रोफेज (Macrophage) पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके उनके लौह परमाणु जज़्ब कर लेती हैं। क्या इसी तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होमिंग पिजन्स (Homing Piegons) को प्रवास के दौरान दिशा-निर्धारण में मदद कर सकती हैं?
लेकिन सवाल था इस विचार की प्रायोगिक जांच का। कर्ट्स के दिमाग में एक आइडिया था और इस आइडिया को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक शोधकर्ता क्लिविया लिसोव्स्की को शामिल कर लिया। लिसोव्स्की की रुचि यह समझने में थी कि कोशिकाएं अपने पर्यावरण को कैसे भांपती हैं।
सबसे पहले तो लिसोव्स्की ने यह जांच की कि क्या कबूतरों की विभिन्न प्रजातियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (Immune Cells) में वैसे ही चुंबकीय कण पाए जाते हैं जैसे चूहों में देखे गए थे। लिसोव्स्की और उनकी टीम को उम्मीद थी कि ऐसी कोशिकाओं का जखीरा प्लीहा में मिलेगा क्योंकि वहीं पर तो मैक्रोफेज लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने का काम करते हैं। लेकिन अपेक्षा के विपरीत, एक बढ़िया चुंबकत्व-मापी (मैग्नेटोमीटर) ने दर्शाया कि सारे ऊतकों में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय संकेत लीवर (यकृत, जिगर) में मिल रहे थे। हालांकि संकेत क्षीण थे लेकिन वे मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) के हिसाब से काफी शक्तिशाली थे।
होमिंग पिजन्स के ऊतकों की पतली-पतली स्लाइस निकालकर अभिरंजित (Staining) करके यह पक्का हो गया कि लीवर के मैक्रोफेज में फेरिटिन (Ferritin) नामक लौह कण भरपूर मात्रा में थे लेकिन ये प्लीहा, मस्तिष्क और चोंच में नदारद थे। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) से अवलोकन से यह भी स्पष्ट हो गया कि कबूतरों के लीवर के मैक्रोफेज के आसपास थे। यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों और पक्षियों में प्लीहा (Spleen) की तंत्रिकाएं मैक्रोफेज से संवाद करती हैं और दोनों में ही ये तंत्रिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ती हैं।
अब एक उम्दा प्रयोग से इस बात की जांच की गई कि ये लौह-प्रचुर मैक्रोफेज चुंबकीय कम्पास की तरह कैसे काम करते होंगे। इस प्रयोग में एक औषधि क्लोड्रोनेट लिपोसोम की मदद से मैक्रोफेज को सुप्त कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने 34 होमिंग पिजन्स को प्रशिक्षित किया कि वे ठीक पूर्व दिशा में 19 किलोमीटर की उड़ान भरें।
दिन के समय तो कबूतर दिशा-निर्धारण के लिए सूर्य की स्थिति की मदद लेते हैं। लेकिन जब घने बादल छाए हों, तो दिशा के लिए वे चुंबकत्व के सहारे रहते हैं। एक झील (लेक कॉन्स्टेन्स) के नज़दीक शोधकर्ता दल ने 18 कबूतरों को क्लोड्रोनेट (Clodronate) का इंजेक्शन दिया और 24 घंटे बाद उन्हें एक-एक करके उस समय छोड़ा गया जब घने बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ओझल था। ज़ाहिर है, इन पक्षियों पर जीपीएस चस्पा किया गया था जिसकी मदद से शोधकर्ता इनकी उड़ान पर नज़र रख सकते थे।
बादल आच्छादित आकाश के समय तो कबूतरों को 19 किलोमीटर सही-सही उड़ने में उस स्थिति में कोई दिक्कत नहीं आई जब उनके मैक्रोफेज सही-सलामत थे। लेकिन जब क्लोड्रोनेट इंजेक्शन ने उनके लीवर मैक्रोफेज को ठप कर दिया, तब वे खुले धूप वाले आकाश में तो आसानी से उड़े लेकिन मेघाच्छादित आकाश (Cloudy sky) में उन कबूतरों को दिशा तलाशने में खासी परेशानी हुई जिनके लीवर मैक्रोफेज ठप कर दिए गए थे। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं दिशा निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।
इंजेक्शन-प्राप्त समस्त 18 पक्षी बहुत भटक गए थे और तभी घर लौट पाए जब आसमान साफ हो गया। दूसरी ओर, जिन 16 पक्षियों को नकली इंजेक्शन दिया गया था वे सीधे घर लौट आए।
यह देखने के लिए कि क्या औषधि कबूतरों को सामान्य रूप से दिग्भ्रमित कर देती है, शोधकर्ताओं ने औषधि-उपचारित पक्षियों को खुले आकाश की परिस्थिति में भी छोड़ा। सारे के सारे बगैर किसी परेशानी के वापिस लौट आए।
कई वैज्ञानिकों ने इस खोज को रोमांचक बताया है लेकिन आगे और छानबीन का सुझाव दिया है। जैसे बोलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के वर्नर बिंगमैन का सुझाव है कि लीवर के मैक्रोफेज को ठप करने की बजाय लीवर की चुंबकीय सूचना के साथ छेड़चाड़ करके देखा जाए। इस तरह का एक प्रयोग 1970 के दशक में किया गया था। उस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने होमिंग पिजन्स को चुंबकीय कुंडली (Magnetic coil) पहना दी थी जो उनके सिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करती थी। देखा गया था कि ये कबूतर उल्टी दिशा में उड़ चले थे।
बहरहाल, वाइकेल्सकी का कहना है कि यदि सही साबित हुआ, तो शायद यह प्रक्रिया मधुमक्खियों से लेकर चमगादड़ों, शार्क और व्हेल्स तक के लिए एक समान हो। (स्रोत फीचर्स)
ऐसा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।
जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।
मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।
पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।
सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।
देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।
अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।
शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)
कोलोसल बायोसाइन्स नाम की एक कंपनी ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो विलुप्त पक्षियों (Extinct Birds) को वापिस अस्तित्व में ला सकेगी और जोखिमग्रस्त पक्षियों को बचा सकेगी। हालांकि यह तकनीक और इसकी बारीकियों को कहीं प्रकाशित नहीं किया गया है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
तकनीक क्या है?
मुर्गी द्वारा अंडा देने के 24-48 घंटे के अंदर उस अंडे में मौजूद सारी सामग्री (निषेचित भ्रूण सहित, लेकिन बाहरी खोल नहीं) एक कृत्रिम अंडे (Artificial Egg) में डाल दी जाती है। इसके बाद का सारा विकास कृत्रिम अंडे के अंदर होता है।
कृत्रिम अंडा 3-डी प्रिंटिंग विधि (3-D Printing Method) से बनाई गई एक षट्कोण फ्रेम (Hexagonal Frame) होती है, जिसमें अंदर सिलिकॉन की झिल्ली (Silicon Membrane) का अस्तर होता है। असली अंडे की खोल के समान यह नमी को बनाए रखती है, ऑक्सीजन को अंदर जाने देती है और बैक्टीरिया को अंदर नहीं जाने देती। भ्रूण के लिए पोषण की व्यवस्था मूल अंडे की सामग्री से होती है। इस जुगाड़ का उपयोग करके लगभग 2 दर्ज़न चूज़ों को विकसित किया जा चुका है। अब कोलोसल को उम्मीद है कि वह इसकी मदद से दक्षिणी द्वीप पर कभी पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी मोआ (Dinornis robustus) को पुनर्जीवन देगी। न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 3 मीटर ऊंचा यह पक्षी पंद्रहवीं शताब्दी में विलुप्त हो गया था। इसके अंडे लगभग फुटबॉल के आकार के होते थे।
प्रेस विज्ञप्ति को देखकर वैज्ञानिकों को लगता है कि कोलोसल का यह आविष्कार शायद एक बड़ा कदम साबित होगा। वैसे इस तरह से कृत्रिम परिवेश में भ्रूण को विकसित करके चूज़े पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं।
जैसे 1998 में ऐसा पहला सफल प्रयास हुआ था। जापान के युताका तहारा, कात्सुया ओबारा और मासामिची कामिहिरा के दल ने एक कुदरती तौर पर निषेचित अंडे को पहले दो दिन तक कुदरती रूप से इन्क्यूबेशन (Incubation) बाद उसके अंदर की सामग्री को कांच के मर्तबान में रख दिया गया था। साथ में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) डाला गया था जो खोल निर्माण के लिए ज़रूरी होता है। इसी तरह के अगले प्रयास में पारदर्शी प्लास्टिक प्यालों का उपयोग किया गया था। इसमें मुर्गी द्वारा अंडा देने के तुरंत बाद भ्रूण (Fetus) को कृत्रिम अंडे में रख दिया गया था। गौरतलब है कि तहारा एक हाई स्कूल शिक्षक हैं और वे अपने छात्रों के साथ यह प्रयोग करते रहते हैं।
दरअसल, कोलोसल के कृत्रिम अंडे की एक खासियत है वह झिल्ली जो उसने विकसित की है। इसके चलते भ्रूण का विकास ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा पर होता है जबकि तहारा और साथियों ने जो कृत्रिम अंडा बनाया था उसमें ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह से ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। कोलोसल द्वारा विकसित कृत्रिम अंडे की एक विशेषता यह है कि उसमें ऊपर एक पारदर्शी झरोखा है जिसके ज़रिए भ्रूण के विकास (Fetus Development) पर नज़र रखी जा सकती है।
विकसित होते अंडे का सतत निरीक्षण इसलिए भी ज़रूरी होगा कि विलुप्त पक्षियों के जीन्स में संशोधन किए जाएंगे और उनके असर पर नज़र रखनी होगी।
कुल मिलाकर माना जा रहा है कि भ्रूण विकास में कृत्रिम अंडों के निर्माण में हम आगे तो बढ़े हैं, लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। (स्रोत फीचर्स)
सात साल की मुन्नी स्कूल से घर आती है। उसके जूते धूल से सने हुए और चोटियां ढीली पड़कर खुल-सी गई हैं। आते ही सबसे पहले उसकी नज़रें अपनी मां को ढूंढती हैं। लेकिन उसकी दादी उसके हाथ से बस्ता लेकर उसे हाथ-मुंह धोने को कहती हैं। अंदर कमरे में सन्नाटा और घुप अंधेरा पसरा है। वह देखती है कि उसकी मां औंधे मुंह लेटी हुई है – एक आंख सूजी हुई और काली है, गालों पर चोट/नील के निशान हैं। मुन्नी पीछे से अपनी मां को आगोश में भर लेती हैं, लेकिन उसी समय अचानक मुन्नी को पेट में तेज़ दर्द का एहसास होता है।
घर सुनसान-सा है। दादी उसे खाना खाने को बोलती हैं। फिर उसके पिता घर आते हैं और खाना खाकर दादी के कमरे में सो जाते हैं। ये सब देख कर मुन्नी के मन में सवालों का गुबार-सा उठता है, लेकिन कुछ तो है जो उसे सवाल करने से रोकता है।
अगली सुबह वह अपनी मां को पड़ोसन से बात करते हुए सुनती है। “रात को मैंने कुछ आवाज़ें सुनी। ऐसा लगा कल तुम्हारी बारी थी।” और दोनों हंसने लगीं। मुन्नी कुछ समझी नहीं, लेकिन उसे पेट में फिर वही दर्द होने लगा। चिल्ला-चोट, दर्द भरी आवाज़ें, गहरी चोट के निशान, और फिर हंसी की आवाज़ – ये सब उसे सामान्य लगने लगे थे। मुन्नी मानने लगी थी कि शायद ऐसा ही होता है। कोई नाराज नहीं होता, कोई रोकता नहीं। ये मारपीट-चिल्लाना मानों रोज़मर्रा में शामिल हो गया था, जैसे गर्मी में लू का चलना, या जैसे किसी दिन नल नहीं आना।
मुन्नी चींटियों को अपने से दुगना बड़ा टुकड़ा ढोते देखती है। मुन्नी सोचती है कि “अगर हर किसी की बारी आती है, तो क्या एक दिन उसकी भी बारी आएगी?”
चुप्पी (Silence), सफाई (Justification) और हंसी-मज़ाक (Humor) की आड़ के ज़रिए मुन्नी अनकहा सबक सीख लेती है, स्वीकार कर लेती है कि घरेलू हिंसा सामान्य है। इतना सब देखकर वह सीखती है कि विरोध और संघर्ष (Resistance) की बजाय सहन करना (Endurance) ज़्यादा आसान और सुरक्षित है। घर का वह सर्द, नीरस माहौल उसके मन में उठे सवालों को दबा देता है। और सबसे अहम सबक सिखाता है कि जब परिवार और आम समाज के लोग हिंसा (Domestic Voilence) को सामान्य मान लेते हैं तो वे लोग भी हिंसा को नज़रंदाज़ करने लगते हैं जो रोज़ाना इसके शिकार हो रहे होते हैं।
परामर्श कक्ष (Consulting room) में हिंसा से पीड़ित महिला शायद ही कभी सीधे अपनी आपबीती बताए। लेकिन इसे समझा जा सकता है। जैसे इससे पीड़ित कोई बार-बार चोटें दिखाने के लिए आता/ती है, वहीं अन्य लोगों की शिकायत सिरदर्द, नींद न आना या पेट की खराबी जैसी समस्याओं की होती है। जब तक डॉक्टर और नर्स इन चोटों के पीछे के गैर-ज़ाहिर कारण समझने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते, यह हिंसा दबी-छुपी ही रहेगी। डॉक्टर/नर्स और मरीज़ के बीच होने वाली चंद बातों में ही वह मौका है जब परामर्शदाता सुरक्षित और सार्थक तरीके से हस्तक्षेप कर पाए, या पीड़िता अपनी आपबीती बता पाए।
महिला सुरक्षा: वैश्विक समस्या
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लैंगिक आधार पर महिलाओं को किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक, या यौन नुकसान पहुंचाना या पहुंचाने की कोशिश करना महिला के खिलाफ हिंसा माना जाएगा। दुनिया भर में महिलाओं के प्रति इस दुर्व्यवहार को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन (Violation of Human Rights) और जन-स्वास्थ्य के लिए संकट (Public Health Concern) माना गया है।
डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि हर तीन में से एक महिला अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी न कभी शारीरिक या यौन शोषण से जूझती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। ये बताते हैं कि 18 से 49 वर्ष की लगभग 29 प्रतिशत महिलाओं ने 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी शारीरिक शोषण (Physical Violence) और 6 प्रतिशत महिलाओं ने यौन शोषण का सामना किया है।
इन आंकड़ों के बावजूद केवल 14 प्रतिशत महिलाएं ही इसके खिलाफ आवाज़ उठा पाई हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेस (2021) के आंकड़े बताते है कि भारत में अपने जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा (Intimate Partner Violence) समाज के हर वर्ग और हर जगह फैली है। शोषण और हिंसा के स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक) परिणाम इतने गंभीर और दीर्घकालिक होते हैं कि एक मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही इसकी शुरुआती पहचान और रोकथाम करने में सहायक साबित होगी।
महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार सिर्फ कानून और व्यवस्था (Law & Order) की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक ‘हेल्थ इमरजेंसी’ (Health Emergency) है जो हौले-हौले अस्पतालों, डिलीवरी वार्डों, आपात कक्षों और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में नज़र आएगी। गौरतलब है कि स्वास्थ्यकर्मी (Healthcare Providers) ही वे पहले या कभी-कभी एकमात्र व्यक्ति होते है, जिनके सामने पीड़ित महिलाएं खुलकर अपना दर्द बयां कर पाती हैं। ऐसे मुश्किल समय में एक डॉक्टर की भूमिका या तो केवल मूक दर्शक की हो सकती है या एक सच्चे मददगार की।
मानसिक आघात और बीमारियों का सीधा सम्बंध
भारतीय महिलाओं में होने वाली हिंसा का सीधा सम्बंध मानसिक तौर पर बढ़ते अवसाद (Depression), दुश्चिंता (Anxiety) और गहरे मानसिक सदमे (Mental Trauma ) से है। हिंसा से पीड़ित महिलाएं लगातार एक मानसिक तनाव (Mental Stress) में जीती हैं।
भले ही शारीरिक हिंसा न हो, लेकिन बदसलूकी और ‘दबाकर रखना’ जैसे व्यवहार (Non-physical forms of Violence) समय के साथ मानसिक तकलीफ को और बढ़ा देते हैं। यह इस ओर इशारा करता है कि मार-पीट के इतर हिंसा का मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा झेल रही लगभग सभी महिलाओं में मानसिक सदमे के लक्षण दिखते हैं। इन लक्षणों में रात में नींद न आना, चिड़चिड़ापन और अतीत के बुरे हादसे बार-बार याद आना शामिल हैं।
बात-बात में ताने देना, पाबंदियों से भरी ज़िंदगी, और मानसिक प्रताड़ना जैसे दुर्व्यवहार और मानसिक दबाव धीरे-धीरे शारीरिक समस्या (Physical Consequences) में तब्दील हो जाते हैं; जैसे हमेशा शरीर में दर्द या भारीपन महसूस होना। यह भावनात्मक आघात (Psychological abuse) और शारीरिक लक्षणों के आपसी सम्बंध को दर्शाता है। इसके साथ ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के बच्चों में भी आगे चलकर अवसाद और दुश्चिंता जैसी मानसिक बीमारियों की संभावना बढ़ती है। इससे ज़ाहिर होता है कि मानसिक असुरक्षा और आघात एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच सकते हैं (Intergenerational transmission of violence)।
पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवसादरोधी (Antidepressent) दवाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि वे शरीर की जीर्ण और आत्म-प्रतिरक्षा (शरीर प्रतिरक्षा क्षमता का खुद को नुकसान पहुंचाना) बीमारियों Chronic Illness & Auto-immune diseases) से जूझ रही हैं। यहां तक कि आजकल मल्टीपल स्क्लेरोसिस (Multiple Sclerosis) (केंद्रीय तंत्रिका की एक जीर्ण बीमारी) से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा ग्रस्त होती हैं। पहले यह पुरुषों और महिलाओं में लगभग बराबर देखी जाती थी।
मशहूर लेखक और डॉक्टर, डॉ. गैबोर माटे तर्क देते हैं कि इंसानों का स्वास्थ्य उनके रिश्तों और आसपास के माहौल पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक तनाव (Chronic Emotional stress) हमारे तंत्रिका, हॉर्मोनल, और प्रतिरक्षा तंत्र को इस हद तक असंतुलित कर देता है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र खुद शरीर का दुश्मन बन बैठता है और जीर्ण समस्याएं पैदा होने लगती हैं।
अपनी किताब, व्हेन दी बॉडी सेस नो (जब शरीर ना कहे) (When The Body Says No) में वे लिखते हैं कि सदमा और लंबे समय तक तनाव शरीर की तनाव-प्रतिरोधी क्षमता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं, और कई शारीरिक समस्याएं पैदा करते हैं। वे आगे लिखते हैं कि हमारे पुरुष-प्रधान समाज (Male dominated society) के मानदंड महिलाओं को ‘शॉक-एब्ज़ॉर्बर’ (Shock Absorber) की तरह प्रस्तुत करते हैं। अर्थात पुरुष-प्रधान समाज महिलाओं से उम्मीद रखता है कि वे खुद की ज़रूरतों, इच्छाओं, भावनाओं और मन की शांति को दरकिनार करके मात्र घर-परिवार की सुख-शांति को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझें। समाज द्वारा थोपी गई इसी स्व-उपेक्षा (Self-supression) का नतीजा महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है।
स्वास्थ्य में व्यवस्थागत और सांस्कृतिक सीमाएं
यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि चिकित्सक घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं की मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन ढांचागत और सांस्कृतिक सीमाएं उन्हें रोकती हैं। मेडिकल की पढ़ाई (Traditional Medical Education) के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों को जो अनुभव दिए जाते हैं उसमें और ज़मीनी हकीकत में बड़ा अंतर होता है।
मेडिकल की पढ़ाई में पूरा ध्यान बीमारियों, अंगों, पैथालॉजी जांच पर केंद्रित रहता है; उसमें मरीज़ की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति के लिए कोई जगह नहीं होती। नतीजतन, बाधाएं बरकरार रहती हैं। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को कोई खास प्रशिक्षण (Special Training) नहीं दिया जाता। साथ ही, कम समय में कई मरीज़ों को देखना (परामर्श का सीमित समय), निजी जीवन में दखलंदाजी का डर, कानूनी फसाद का डर, समस्या को उचित व्यक्ति/संस्था/जगह तक पहुंचाने सम्बंधी अपर्याप्त जानकारी, और खुलकर ऐसे गंभीर विषयों पर चर्चा करने में थोड़ी झिझक भी होती है।
इन कमियों को दूर करने के लिए संस्थाओं की प्रतिबद्धता (Institutional Commitment), कार्यबल के प्रशिक्षण (Workforce Education) और समग्र नीति निर्माण (Integrated Policy Development) ज़रूरी है। हालांकि कागज़ी कार्रवाइयां और समस्या को उचित जगह पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन साथ में चिकित्सा पाठ्यक्रमों और रोज़मर्रा के चिकित्सा अभ्यास में ‘ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड केयर’ (सदमा समझकर देखभाल) को शामिल करना भी उतना ही आवश्यक है। वैसे तो भारतीय स्वास्थ्य शिक्षा में विद्यार्थियों को आपातकालीन स्थितियों को संभालने, उनसे निपटने और उस समय शांत, सक्षम और निष्पक्ष बने रहने की पूरी तैयारी करवाई जाती है, लेकिन हिंसा जैसी गंभीर स्थितियों में डॉक्टरों का काम मरीज़ों को केवल दवाई देना, टांके लगाना या मेडिकल टेस्ट कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
डॉक्टर के लिए मरीज़ के इलाज के दौरान व्यावहारिक दूरी बनाने (Clinical Detachement) और पत्थर दिल (Apathy) होने के बीच एक बारीक लकीर होती है। और इस लकीर पर दृढ़ता और करुणा (Steadiness & Compassion) के साथ टिके रहना सीखना शायद ही औपचारिक शिक्षा का हिस्सा होता है। विद्यार्थियों को मरीज़ों के साथ भावनात्मक दूरी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि वे अपने सामने मौजूद मानवीय ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किए बिना ऐसा कैसे करें। मेडिकल पाठ्यक्रम में सदमों पर विचार और चर्चाओं की जगह होने से हमारे स्वास्थ्यकर्मी काबिल होने के साथ-साथ संवेदनशील और नरम दिल भी बनेंगे।
कुछ अहम बदलाव
चिकित्सकों को सदमा सम्बंधी देखभाल में प्रशिक्षित होना चाहिए। यह पाया गया है कि डॉक्टरों का मरीज़ों और पीड़ितों के साथ शांत और सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव मानसिक तनाव कम करता है और पीड़ितों द्वारा आगे सहायता लेने की संभावना बढ़ती है (चंद मिनटों की ही सही)। स्वास्थ्यकर्मी की नपी-तुली सजग उपस्थिति मात्र उपचार में मददगार नहीं होती बल्कि उपचार का हिस्सा होती है। स्वास्थ्य पेशेवरों के सहज संकेतों में शामिल हैं चेहरे के हावभाव, शांत लहज़ा, सम्मानपूर्वक बातचीच, साहस देने वाली प्रक्रिया/चर्चा, और सजग और ध्यान से समस्या सुनना। स्वास्थ्य कर्मी अपनी नियमित दिनचर्या में छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मौके बना सकते हैं।
पीड़िता की पहचान: ज़रूरी नहीं कि हर पीड़िता चोट के निशान के साथ ही डॉक्टर के सामने आए। कभी-कभी लक्षण मनो-शारीरिक होते हैं। डॉक्टरों के लिए यह ज़रूरी है वे मनो-शारीरिक लक्षणों (Psycosomatic Symptoms)और हिंसा की संभावना को सक्रिय रूप से पहचानें इसके लिए शांत और खुले मन से बातचीत करने का मौका दें। यह लक्षणों को समझने में मददगार हो सकता है।
हिंसा के आयाम को समझना: कुछ परिस्थितियों में पीड़िता हिंसा वाले माहौल या हिंसा करने वालों से दूरी नहीं बना पाती। कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो पीड़िता को उसी परिस्थिति में थामे रखती हैं; जैसे डर, अकेलेपन की आशंका, आर्थिक-भावनात्मक निर्भरता (Financial-Emotion Dependency) , परिवर्तन की उम्मीदें, या प्यार। किसी को पूरी तरह छोड़ देने की प्रक्रिया काफी लंबी और दर्द भरी होती है। शोध बताते हैं कि पीड़िता किसी बुरे रिश्ते से पूरी तरह निकलने से पहले उसके पास कई बार वापिस लौटती और निकलती है।
यहां मुख्य बात यह है कि डॉक्टर को यह समझना चाहिए कि अगर उनका मरीज़ दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के पास वापस जाने का फैसला करता है, तो उनका यह फैसला डॉक्टर की देखभाल या उनकी अहमियत पर कोई सवाल नहीं उठाता।
कोई मरीज़ अपने उत्पीड़क के पास वापस चला चला जाए, वह भी जब स्वास्थ्य-कर्मी के पास लौटे, तो करुणा और सहारे का हकदार होता है, न कि निराशा का। ऐसी स्थिति में डॉक्टर को यह सोचने की बजाय कि “मैं नाकाम रहा, क्योंकि वे वापस चले गए,” यह सोचना चाहिए कि “जब भी वे तैयार होंगे तब मैं उनकी मदद कर सकता हूं।”
समाधान की बजाय मदद करना: ऐसी परिस्थिति में किसी पीड़िता पर यह दबाव नहीं बना सकते कि वह सब कुछ पूरी तरह छोड़ दे; इसकी बजाय उन्हें लगातार सहायता, संबल और ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। भारतीय समाज में ज़्यादातर महिलाएं घर या रिश्ता छोड़ नहीं पाती या छोड़ना नहीं चाहती। स्वास्थ्य कर्मियों को इस वास्तविकता के लिए तैयार रहना चाहिए और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो उनके नियंत्रण में हैं। ऐसी स्थिति में भी पीड़िता को सुरक्षित महसूस कराना, चिकित्सकीय देखभाल देना, उन्हें समझना और उनका मनोबल बढ़ाना जैसी सहयता (Mental Health Support) तो की ही जा सकती है।
बचपन के बुरे अनुभवों के बारे में जानना, सामाजिक तनावों के बारे में जानना और भावनात्मक पीड़ा को समझना जैसे छोटे-छोटे बदलाव भी मरीज़ पर अच्छा असर डाल सकते हैं।
सुरक्षित माहौल, न कि झटपट निर्णय: इन हालातों में आम तौर पर महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘काउन्सलर या मनेचिकित्सक’ (Counselor or Psychiatrist) के पास नहीं जा पातीं या जाने से कतराती हैं। इसलिए हिंसा से पीड़ित ज़्यादातर महिलाओं के पास डॉक्टर ही एकमात्र सहारा होता है। ऐसे में उनके लिए डॉक्टर के पास सहानुभूतिपूर्ण और एक ऐसी जगह की ज़रूरत होती है जहां कोई ठप्पा नहीं लगाया जाएगा। बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के देखभाल को प्राथमिकता देना, जांच से पहले सहमति लेना, और डॉक्टर के कक्ष में उनकी सीमाओं का सम्मान करना – ये सभी बातें उन्हें एक ऐसा सुरक्षित माहौल (Safe space) देती हैं, जो उन्हें अपने पारिवारिक परिवेश में नहीं मिल पाता।
हमेशा उपलब्ध रहना, बिना किसी पूर्वाग्रह के पेश आना और ज़ोर-ज़बर्दस्ती न करना – ये बातें किसी पीड़िता को दोबारा मदद लेने को तैयार कर सकती हैं। और कभी-कभी, किसी पीड़िता के लिए सबसे मददगार साबित होता है कि कोई उसकी कहानी पर विश्वास करे।
भावुक नहीं, संवेदनशील बने: दूसरों (पीड़िता) की परेशानी समझने के समय डॉक्टर खुद की मनदुरुस्ती का भी ख्याल रखें, और यह समझें कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। निराशा, उदासी या क्रोध को समझने के लिए चिंतनशील अभ्यास, पर्यवेक्षण या सहकर्मियों की सहायता महत्वपूर्ण है। मन को शांत और संवेदना के साथ-साथ ज़्यादा भावुक होने से बचाना भी ज़रूरी है। चुनौतीपूर्ण मामलों के बाद डायरी लिखना या दूसरे साथियों से चर्चा करना मददगार हो सकता है।
यह काम मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देने वाला (Mentally & Emotionally Intensive) है। इसलिए डॉक्टरों को यह भी समझना होगा की ऐसी परिस्थितियों में पीड़ितों के फैसले उनकी देखभाल की काबिलियत नहीं दर्शाते। संयमित चिकित्सक के रूप में संयमित चिकित्सकीय स्थान बनाते समय अपने बारे में सोचना तनाव से बचाता है।
महिलाओं का सम्मान: चुप्पी तोड़ें, हिंसा अस्वीकार्य करें
ज़्यादातर भारतीय घरों में हिंसा केवल इसी वजह से होती आई है क्योंकि समाज और महिलाएं चुप्पी साध लेते हैं। नारी को पूजने वाले देश में जब महिलाओं के प्रति अत्याचार-दुर्व्यवहार होते हैं तो वही समाज आंखें फेर लेता है, जबकि ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह विरोधाभास (Social Contradiction) परेशान करने वाला है।
महिलाओं के प्रति हिंसा को एक निजी मामला या नियति मानना स्वीकार्य नहीं है। हमें सिखाया जाता है कि घर की ‘इज्जत’ हर हाल, हर कीमत पर बनी रहनी चाहिए। लेकिन अत्याचारों को छुपाना और चुपचाप सहते रहना कोई सम्मानजनक बात नहीं है।
सांस्कृतिक बदलाव तब शुरू होगा जब हम महिलाओं को सिर्फ इज़्ज़त का समंदर, त्याग की मूर्ति, या महज़ पीड़ित के तौर पर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इंसान के तौर पर देखेंगे – जिनकी सुरक्षा और गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस बदलाव की शुरुआत घर-स्कूलों की आम चर्चाओं से, और नई पीढ़ी को जागरूक करने से होती है। यह सिखाने से होती है कि प्यार का मतलब चुप्पी, डर और सहन करना नहीं है।
जब तक यह बड़ा सामाजिक बदलाव (Cultural Shift) होता है तब तक स्वास्थ्य, केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मियों से ही उम्मीद की जा सकती है कि वे इन महिलाओं के लिए सुरक्षा के ठिकाने बनें और मेडिकल पाठ्यक्रम में ‘सदमा को समझकर देखभाल’ (Trauma Informed Care) सिखाने को प्राथमिकता दी जाए। (स्रोत फीचर्स)
मई 2026 के अंतिम सप्ताह में अमेरिका के लास वेगास में ओलंपिक खेलों की तर्ज पर ‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ (Enhanced olympic) का आयोजन हुआ। इस आयोजन की खास बात थी कि इसमें खिलाड़ियों को प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग (Drugs) लेकर खेलने पर कोई पाबंदी नहीं थी। खेलों में तैराकी, दौड़ और भारोत्तोलन जैसे खेल शामिल थे। यह खेल आयोजन ओलंपिक जितने बड़े स्तर का तो नहीं था; फिर भी इसमें लगभग 50 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।
हालांकि इस पर विशेषज्ञों और खेल संगठनों ने कई नैतिक और स्वास्थ्य सम्बंधी सवाल उठाए और इसकी तीखी आलोचना की थी। खेल फेडरेशन (Sports Federation) ने तो यहां तक कहा था कि एन्हांस्ड ओलंपिक में बनने वाला कोई भी वर्ल्ड रिकॉर्ड (World record) मान्य नहीं होगा। और अब इसके नतीजे भी कुछ खास अंतर नहीं झलकाते हैं। दरअसल खेल संगठकों और विशेषज्ञों की चिंता डोपिंग (Doping) को लेकर है। यदि मुकाबला करने वाले कुछ या शायद सभी लोग बेहतर प्रदर्शन (Better Performance) के लिए ड्रग्स लेंगे, तो इसके स्वास्थ्य सम्बंधी नुकसान भले ही तुरंत न दिखें लेकिन लंबे समय में दिखेंगे। यह खिलाड़ियों की सेहत के साथ खिलवाड़ होगा।
एन्हांस्ड खेलों के आयोजकों का कहना था कि इन खेलों में यूं ही कोई भी ड्रग्स नहीं लिया जाएगा, सिर्फ यूएस संघीय औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा मंज़ूर ड्रग्स लेने की ही इजाज़त होगी, वह भी मेडिकल पेशेवरों की देखरेख में, ताकि जोखिम कम किया जा सके। साथ ही एथलीटों (Atheletes) को यूएस फेडरल और नेवादा राज्य के कानूनों का पालन करना होगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यूएस एफडीए द्वारा जिन ड्रग्स को मंज़ूरी मिली है वे चिकित्सकीय उपयोग के लिए है, न कि एथलेटिक प्रदर्शन-वृद्धि के लिए। जैसे, एनाबॉलिक स्टेरॉयड (Anabolic Steroids) को मंज़ूरी यौवनारंभ में विलंब की समस्या के इलाज के लिए मिली है, जिसमें वृषण में हार्मोन बहुत ही कम या बिलकुल नहीं बनते।
और तो और, खेल के पहले इस बारे में कोई जानकारी स्पष्ट रूप से साझा नहीं थी कि कौन से ड्रग्स और कितनी मात्रा में लिए जा सकेंगे, और संभावित जोखिम को कम करने की आयोजकों और मेडिकल पेशेवरों की क्या योजना होगी। जैसे डोपिंग करने वाले एथलीट्स की खेल के बाद देखभाल कैसे होगी? ड्रग्स लेकर जीतने की बात जितनी सरल लगती है, उसके बाद उन्हें छोड़ने की राह उतनी ही मुश्किल होती है। इस बात को स्पष्टता से उजागर न करना ऐसा आभास दे सकता है कि प्रदर्शनवर्धक दवाओं (Performace enhancing drugs) का इस्तेमाल करना और उन्हें बंद करना बहुत आसान है, जबकि ऐसा है नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल देख-रेख तात्कालिक जोखिम कम कर सकती है, लेकिन इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि डोपिंग से जुड़े कई परिणाम (मानसिक परेशानियां, अनुर्वरता, मांसेपशियों व अस्थि-तंत्र की चोटें) लंबे समय तक असर करते हैं।
एन्हांस्ड ओलंपिक में एथलीट्स ने संभवत: टेस्टोस्टेरॉन, ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन, पेप्टाइड्स और स्टिमुलेंट्स लिए थे। टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) समान्यत: स्रावित होने वाला यौन हार्मोन है। यह शरीर में मांसपेशियां और उनकी ताकत (Muscle power) बढ़ाता है। लेकिन इससे हृदय सम्बंधी एवं हॉर्मोन सम्बंधी शारीरिक परेशानियां, और उग्र व्यवहार, मूड में उतार-चढ़ाव एवं अवसाद जैसी मानसिक परेशानियां होने का जोखिम होता है। इसी तरह, एरिथ्रोपोइटिन (EPO) शरीर में स्रावित होने वाला एक नैसर्गिक हार्मोन है जो लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ाता है, नतीजतन शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता बढ़ती है। बाहर से अतिरिक्त rEPO लेने से ऑक्सीजन उपलब्धता बढ़ती है जो धावकों या साइकिल रेसर्स के लिए मददगार हो सकती है। लेकिन इससे खून गाढ़ा होने का खतरा रहता है, नतीजतन एथलीट्स को हृदय रोग हो सकते हैं।
और फिर, वैसे ही एथलीट्स कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों से घिरे होते हैं। अक्सर खिलाड़ियों को मांसपेशीय व अस्थि तंत्र की चोटों का खतरा होता है। रग्बी (Rugby) और अमेरिकन फुटबॉल (American football) जैसे खेलों में बार-बार सिर पर चोट लगने से तंत्रिका क्षति सम्बंधी बीमारियां (Neurological diseases) होने का खतरा होता है, जिन्हें ठीक होने में अरसा लगता है। फिर प्रतिस्पर्धाएं एथलीट्स के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती हैं। जिमनास्ट सिमोन बाइल्स, टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका और धावक नोआ लाइल्स ने अवसाद और दुश्चिंता (Depression & Anxiety) के बारे में सबके सामने बात रखी है। ऐसे में ड्रग्स आग में घी का काम करेंगे।
ऐसा नहीं है कि खिलाड़ियों को अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं है। कुछ खिलाड़ियों ने इस प्रतिस्पर्धा (Competition) का विरोध किया है। लेकिन कई खिलाड़ी, जिनके पास अपने को साबित करने के लिए जीवन के मात्र कुछ साल होते हैं, उनके पास यदि ड्रग्स लेकर जीतने की संभावना रहेगी तो वे इनमें दिलचस्पी दिखाएंगे। वैसे भी तवज्जो, शोहरत और पैसा उसे ही मिलता है जो खेल जीतता है। खेल की दुनिया में ऐसा दिखता है कि खिलाड़ी, खासकर ओलंपिक स्तर के खिलाड़ी, बहुत सम्पन्न घरों से नहीं होते हैं, और वे कोई न कोई काम करते हुए ही साथ-साथ प्रशिक्षण लेते हैं और खेलते हैं। जीत उन्हें आर्थिक सम्पन्नता हासिल करने में मदद कर सकती है। और यदि ड्रग्स जीतने की संभावना बढ़ाएंगे तो वे शायद न हिचकें।
लेकिन ऐसे आयोजन अक्सर खेल भावना और खेल कौशल (Sportsmanship & Proficiency) को कम करते हैं और उन्हें व्यावसायिक बनाते हैं। भारत में क्रिकेट के लिए शुरू हुए आईपीएल खेलों (IPL Games) से क्रिकेटरों को पैसा और शोहरत तो मिली लेकिन क्रिकेट एक बिज़नेस हो गया; सट्टेबाज़ी (Gambling) भी शुरू हो गई। और फिर, डोपिंग का संदेश क्या है? यही कि कोई भी खेल डोपिंग के बूते जीता जा सकता है? यकीनन, ये कुछ हद तक शरीर की ताकत और क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन असली सफलता के पीछे खिलाड़ी और प्रशिक्षक की सालों की मेहनत, अनुभव, प्रशिक्षण और कौशल काम आता है। एन्हांस्ड खेलों के नतीजे देखें तो यह बात और पुख्ता होती है। इन खेलों में डोपिंग वाले प्रतिभागियों में से मात्र एक प्रतिभागी जीता है, बाकी तीन वे प्रतिभागी जीते हैं जो बिना डोपिंग के खेल में शामिल हुए थे। प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग्स की इजाज़त देकर एन्हांस्ड खेलों ने अनुशासन, तकनीकी दक्षता, मानसिक संयम और नियमों पर सामूहिक भरोसे को नज़रअंदाज़ किया है। (स्रोत फीचर्स)
दिमाग का सफाई तंत्र उसकी तीन स्तरीय झिल्ली (मेनिन्जेस) (Maninges) में बसा होता है। यह तंत्र भौतिक क्षति से उसे महफूज़ रखने के अलावा रोगजनकों से भी सुरक्षा करता है। इस त्रि-स्तरीय झिल्ली की सबसे बाहरी परत में बड़ी-बड़ी रक्त शिराओं (वीनस साइनस) का एक जाल फैला होता है। पहले माना जाता था कि ये शिराएं मात्र रक्त प्रवाह का काम करती हैं। लेकिन नेचर में हाल में प्रकाशित एक शोध पत्र में इनकी विविध भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
शोध पत्र में बताया गया है कि ये शिराएं मस्तिष्क और खोपड़ी में तरल (Cerbrospinal fluid) की निकासी का काम करती हैं। अध्ययन में चूहों और मनुष्यों में वीनस साइनसों को खून तथा सेरेब्रोस्पाइनल द्रव को पम्प करके बाहर निकालते देखा गया। यह भी देखा गया कि ये शिराएं अपनी कोशिकाओं को इधर-उधर करके गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह भी बनाती रहती हैं।
अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि मस्तिष्क की सरहदें अत्यंत बारीकी से संचालित इंटरफेस हैं, न कि मात्र भौतिक आवरण। शोध पत्र के एक लेखक डोरियन मैकगैवर्न का कहना है कि दरअसल, वीनस साइनसों (Venous sinus) की गतिशील प्रकृति केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की रक्षा के लिए अहम है क्योंकि शोथ तथा खोपड़ी में तरल पदार्थ का जमावड़ा और दबाव मस्तिष्क को क्षति पहुंचा सकता है और साइनस ऐसे तनाव होने पर मस्तिष्क के कार्य को जारी रखने में मदद करते हैं।
प्रयोग में शोधकर्ताओं ने जीवित, निश्चेतित चूहों में वीनस साइनसों की गतिविधियों का अवलोकन किया। इसके लिए उन्होंने खोपड़ी के एक वर्ग मिलीमीटर क्षेत्र को खुरचकर इतना पतला कर दिया था उसमें से लेज़र पुंज आसानी से गुज़र सके। यह लेज़र पुंज प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रकाशित करेगा जिन्हें एक फ्लोरेसेंट प्रोटीन (Fluorescent proteins) से चिंहित कर दिया गया था। इस तकनीक को इंट्रावायटल इमेजिंग कहते हैं। इसकी मदद से शोधकर्ता खोपड़ी के अंदर स्थित, अरेखित (चिकनी) मांसपेशियों में लिपटी बड़ी शिराओं की धड़कन का अवलोकन कर पाए जब वे तरल की निकासी के लिए सिकुड़ और फैल रही थीं।
शोधकर्ता शिराओं की दीवारें निर्मित करने वाली एंडोथीलियल कोशिकाओं (Endothelial cells) का वीडियो बना पाए और देख पाए कि उनमें 1 माइक्रोमीटर व्यास तक के बारीक सुराख हैं। इन सुराखों को फेनेस्ट्रेशन (Fenestration) कहते हैं और ये तरल पदार्थ, अणुओं तथा सूक्ष्मजीवों को आर-पार जाने देते हैं। यह भी देखा गया कि शिराएं गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह बनाने के लिए अपने आवरण को पुनर्व्यवस्थित भी कर पा रही थीं। शोधकर्ताओं ने इस विचित्र व्यवहार को रफ्लिंग (Ruffling) नाम दिया है।
मैकगैवर्न कहते हैं कि उन्होंने शिराओं को ऐसा करते पहली बार देखा है। उनके सुराख लगातार खुलते-बंद होते रहते हैं और इसका नियमन मुख्य रूप से प्रतिरक्षा कोशिकाएं करती हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं लगातार साइनस की दीवारों की सतत निगरानी करती हैं और इससे पता चलता है कि साइनसों की एंडोथीलियल कोशिकाओं में इतना लचीलापन (Flexibility) होता है।(स्रोत फीचर्स)
लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।
इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।
इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।
अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।
इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।
यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।
स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।
इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।
शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।
फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)
विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?
हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।
छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।
दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।
ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।
इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।
इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई।
वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।
दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा।
वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)
वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।
हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।
इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।
बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।
पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।
एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)