रोहित एम.

लौह अयस्क (iron ore mining) की लाल धूल से ढंकी हुई दल्ली राजहरा (Dalli Rajhara, Chhattisgarh) की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे समय कहीं ठहर सा गया हो। इस छोटे से शहर में रहने और सांस लेने के कुछ ही पलों बाद एक अजीब से विलगाव का एहसास होना तय है।
इसमें जब उस मज़दूर आंदोलन (labor movement history), जिसने लगभग आधी सदी से इस शहर को आकार दिया है, की कहानी जुड़ जाती है तो दंतकथा बनना तय है। इस इतिहास का जीता-जागता साक्षी है शहीद अस्पताल (Shaheed Hospital model)। यह अस्पताल, जिसे मज़दूरों ने मज़दूरों के लिए बनाया था, जिसकी एक-एक ईंट मज़दूरों के योगदान से आई थी, एक असाधारण दौर की याद दिलाता है।
अस्पताल की पुरानी इमारत के प्रवेश द्वार पर लगी शिला-स्मारिका (memorial plaque) – जो 3 जून, 1983 को शहीद अस्पताल के उद्घाटन की याद दिलाती है – पर दो नाम खुदे हुए हैं: लहर सिंह (खदान मज़दूर) और हलालखोर (किसान और अर्रेझर गांव के बड़े-बुज़ुर्ग)। ये वे लोग थे जिन्होंने इस अस्पताल का उद्घाटन किया था।
दल्ली और राजहरा, भिलाई स्टील प्लांट (Bhilai Steel Plant – बीएसपी) के स्वामित्व वाली दो लौह अयस्क खदान इकाइयां हैं, जिनके नाम पर इस शहर का नाम ‘दल्ली राजहरा’ पड़ा है। यह बालोद ज़िले में स्थित एक छोटा सा कस्बा है, जो भिलाई से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 44,000 है।
शहीद अस्पताल में 100 से 150 किलोमीटर दूर तक के कस्बों और गांवों से लोग इलाज के लिए आते हैं। मंगलवार को छोड़कर, सप्ताह के बाकी सभी दिन अस्पताल की ‘बाह्य-रोगी’ (OPD) इमारत और रिसेप्शन लॉबी में खूब आवक-जावक रहती है। शहर से सटी हुई लौह अयस्क की खदानें — जिनका इतिहास इस जगह से गहराई से जुड़ा हुआ है — मंगलवार को बंद रहती हैं। इसी वजह से, शहीद अस्पताल में भी मंगलवार को सीमित सेवाएं ही उपलब्ध रहती हैं।
एक आम दिन में शहीद अस्पताल की लॉबी राजनांदगांव, रायपुर, बालोद, कांकेर, चरामा और अन्य जगहों से आए मज़दूरों, किसानों और छोटे-मोटे दुकानदारों (working class patients) से खचाखच भरी रहती है, जो अपने रजिस्ट्रेशन का इंतज़ार कर रहे होते हैं।
बाहर से देखने पर, शहीद अस्पताल नई और पुरानी इमारतों का एक मिला-जुला रूप लगता है, जिसमें घुमावदार सीढ़ियां, एक विशाल प्रतीक्षालय और अलग-अलग हिस्सों की ओर जाने वाले गलियारे हैं। अस्पताल का स्टाफ पूरी लगन से विभिन्न वार्डों में घूमता रहता है और बीमारों की देखभाल करता है। बाहरी दिखावों से परे, अस्पताल का इतिहास मुख्यत: बातों के ज़रिए ही फैलता जाता है, जिनमें संघर्षों (workers struggle) की यादें गुंथी होती हैं।
कहानियां मुंह-ज़ुबानी एक से दूसरे इंसान तक पहुंचती हैं — जैसे, छत के बहुत जल्दी बन जाने की कहानी, जिसको बनाने में दस हज़ार खदान मज़दूरों (mine workers protest) ने अपना काम रोककर योगदान दिया था; या फिर वह कहानी जिसमें अस्पताल को बिजली देने से मना कर दिया गया था, जिसके बाद खदानों के हर क्षेत्र के मज़दूरों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन (workers protest movement) किया था। ये घटनाएं अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय समुदाय की यादों में हमेशा-हमेशा के लिए रच-बस गई हैं।
मज़दूरों के ऐतिहासिक संघर्षों (trade union history) से निकले कई मूल्य शहीद अस्पताल के रोज़मर्रा के कामकाज में साफ झलकते हैं। अस्पताल का संचालन समितियों और एक मज़बूत आंतरिक लोकतंत्र प्रणाली (internal democracy system) के ज़रिए किया जाता है। नर्सें, सफाईकर्मी, डॉक्टर और अन्य स्टाफ अलग-अलग प्रशासनिक मामलों पर फैसले लेने में बराबर की हिस्सेदारी निभाते हैं।
बैठकों में वेतन, काम के घंटे, कार्यस्थल से जुड़े मुद्दे और अस्पताल के भावी कार्यों (organizational decisions) जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। “यहां कुछ ज़्यादा ही लोकतंत्र है”, ऐसी काना-फूसी अक्सर मैंने सुनी है; लोगों का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया बहुत ज़्यादा थकाऊ और लंबी-लंबी बहसों (democratic process challenges) वाली होती है। हालांकि, आंतरिक लोकतंत्र के प्रति शहीद अस्पताल की प्रतिबद्धता पूरी तरह से अडिग है।
जग्गू राम साहू – जिन्हें प्यार से ‘जग्गू दादा’ कहते हैं — 70 वर्षीय रिटायर्ड खदान मज़दूर (retired mine worker) हैं जो अक्सर अस्पताल में अपनी साधारण-सी गुलाबी शर्ट पहने हुए दिखते हैं और मरीज़ों व स्टाफ, दोनों का ही बड़े प्यार से अभिवादन करते हैं। अब वे पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (community health worker) के तौर पर काम करते हैं। एक बार मैंने उनसे अस्पताल के इतिहास के बारे में पूछा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया; वे कुर्सी की छोर पर बैठ गए और उन्होंने मुझे ‘लाल मैदान’ (Red Maidan protest) में हुई उस ऐतिहासिक बैठक के बारे में विस्तार से बताया।
खदानों में ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों (contract labor issues) में लंबे समय से जो अलगाव की भावना पनप रही थी, वह 1977 के ‘लाल मैदान’ विरोध प्रदर्शन (1977 labor protest) के रूप में सामने आई। इमर्जेंसी हटे अभी ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था, और हवा में संघर्ष करने तथा मज़दूरों के जायज़ अधिकारों को वापस दिलाने का जोश भरा हुआ था। जग्गू दादा याद करते हुए बताते हैं, “उन दिनों जो मज़दूर पक्की नौकरी पर नहीं थे उन्हें महीने के 70 रुपए मिलते थे, जबकि पक्की नौकरी वाले मज़दूरों की तनख्वाह 300 रुपए थी। दरअसल, दोनों तरह के मज़दूर एक ही तरह का काम कर रहे थे।”
जग्गू दादा जब लाल मैदान विरोध प्रदर्शन (labor union protest) के उन जोशीले दिनों के बारे में बात करते हैं, तो उनकी आंखों में एक चमक दिखाई देती है। उन्हें याद है कि हज़ारों ठेका मज़दूर कई दिनों तक वहीं जमे रहे; वे नाचते-गाते थे और आपस में संगठित होने तथा यूनियन बनाने के बारे में चर्चा करते थे। वे बोनस, साइट पर जबरन खाली बैठाने के बदले मुआवज़ा और बारिश के पहले अपनी कच्ची झोपड़ियों की मरम्मत (labor welfare demands) के लिए भत्ते की मांग कर रहे थे।
लाल मैदान का यह विरोध प्रदर्शन आगे चलकर ‘छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ’ (CMSS) में बदल गया। यह एक ऐसा मज़दूर संगठन था जिसने शंकर गुहा नियोगी को अपना नेता चुना, जो कि उस समय यूनियन संगठक और आंदोलनकर्ता के तौर पर जानी जाने वाली शख्सियत थे। जब मैंने जग्गू दादा से पूछा कि उन्हें शंकर गुहा नियोगी के बारे में कैसे पता चला और यह फैसला उन्होंने कैसे किया कि वही उनके नेता होंगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आपको नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela inspiration) के बारे में कैसे पता चला और आपने उनका सम्मान करने का फैसला कैसे किया? ठीक उसी तरह, हमें भी उस समय तक नियोगी जी के बारे में पता चल चुका था और हमने उन्हें अपना नेता चुन लिया।”
अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता और शिक्षाविद इलीना सेन, जो दल्ली राजहरा के ट्रेड यूनियन आंदोलन से काफी करीब से जुड़ी हुई थीं, अपनी संस्मरण किताब इनसाइड छत्तीसगढ़ – ए पॉलिटिकल मेमॉयर (Inside Chhattisgarh – A Political Memoir) में लिखती हैं: “1977 में जब नई यूनियन बनी, उसके कुछ ही समय बाद उसके नेताओं ने पास की दानीटोला खदानों का दौरा किया। वहां शंकर गुहा नियोगी अपने ससुराल में अपना स्वास्थ्य संभाल रहे थे। वे आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा – MISA Act India) जैसे सख्त और भयावह कानून के तहत हिरासत से रिहा हुए थे और वहां ठीक हो रहे थे।” यहीं पर यूनियन नेताओं ने, जो कि नियोगी के काम और विचारों से अच्छी तरह वाकिफ थे, उनसे मज़दूर आंदोलन के बौद्धिक और संगठनात्मक विकास (labor movement leadership) की बागडोर संभालने की गुज़ारिश की।
यह आंदोलन जग्गू दादा जैसे कई लोगों के लिए ज़िंदगी बदलने वाला अनुभव (social movement impact) साबित हुआ। लोगों की मदद करने की अपनी दिली चाहत की वजह से उनका झुकाव ‘स्वास्थ्य विभाग’ की ओर हुआ। स्वास्थ्य विभाग मज़दूर संगठन द्वारा बनाए गए 17 विभागों में से एक था। ‘शहीद अस्पताल’ इसी स्वास्थ्य विभाग की एक पहल थी। इस अस्पताल का नाम उन 11 खदान मज़दूरों की शहादत (martyrs memorial) की याद में रखा गया था, जो 1977 में हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। यह घटना ऐतिहासिक ‘लाल मैदान’ सभा के बाद हुई थी।
जग्गू दादा ने 1981 में एक ‘स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ (volunteer health worker) के तौर पर अपने काम की शुरुआत की थी। उस समय, ट्रेड यूनियन दफ़्तर के परिसर में बनी एक कच्ची झोपड़ी (गैराज) में ही एक अस्थायी क्लीनिक चलाया जाता था। 2012 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे दिन के समय खदानों में काम करते, और साथ ही एक स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर भी अपनी सेवाएं देते रहे — यह एक ऐसा काम था जिसके प्रति उनके मन में गहरा जुनून था। सेवानिवृत्ति के बाद, वे एक ‘पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ बन गए। उन्होंने शहीद अस्पताल की स्वास्थ्य टीमों के साथ मिलकर भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal gas tragedy relief) और 1993 के लातूर भूकंप (Latur earthquake relief) जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में हिस्सा लेने के लिए काम से लंबी-लंबी छुट्टियां भी लीं – इस कारण उनके वरिष्ठ अधिकारियों की त्यौरियां भी चढ़ गईं।
जग्गू दादा के लिए, सामाजिक सक्रियता (एक्टिविज़्म-activism) और स्वास्थ्य सेवा का काम आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। जब मैंने उनसे शंकर गुहा नियोगी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘संघर्ष और निर्माण’ (struggle and development concept) के बारे में पूछा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “हम अपने पेट की खातिर संघर्ष करते हैं, और समाज की सेवा के लिए अस्पताल में काम करते हैं।”
शहीद अस्पताल के वरिष्ठ सदस्यों से जग्गू दादा जैसी कहानियां अक्सर सुनने को मिलती रहती हैं।
कुलेश्वरी दीदी यानी कुलेश्वरी सोनवानी, जो इस समय अस्पताल की सबसे वरिष्ठ नर्स हैं, ने मुझे अपनी कहानी सुनाई, “शहीद अस्पताल के बिना मेरी अपनी कोई पहचान ही नहीं है।” वे उन चुनिंदा नर्सों में से हैं, जो उस शुरुआती दौर से ही अस्पताल के साथ जुड़ी रही हैं, जब यह ट्रेड यूनियन दफ्तर के गैराज में चलने वाला एक अस्थायी क्लीनिक हुआ करता था।
जब मैंने उनसे पूछा कि आज जो भव्य शहीद अस्पताल हमारे सामने खड़ा है, उसकी नींव कैसे रखी गई, तो उन्होंने मुझे कुसुम बाई (maternal death case) की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया, “कुसुम बाई मज़दूर नेताओं में से एक थीं। मेडिकल सुविधाओं की कमी के चलते प्रसव के दौरान उनकी मौत हो गई। दल्ली राजहरा में बीएसपी के स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके पास हेल्थ कार्ड (health access issue) नहीं था। कुसुम बाई की शोक सभा में मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपने और ऐसी ही मुश्किलों का सामना कर रहे अपने जैसे अन्य लोगों के लिए एक अस्पताल बनाएंगे।”
जब तक शहीद अस्पताल नहीं बना था, तब तक दल्ली राजहरा में ठेके पर काम करने वाले खदान मज़दूरों (contract workers healthcare) के लिए स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर थीं। उन्हें नियमित मज़दूरों की तरह कोई सुविधाएं या अधिकार नहीं मिलते थे। मज़दूरों के अपने अस्पताल बनाने के पक्के इरादे को कई युवा डॉक्टरों का साथ मिला – जैसे, बिनायक सेन (Binayak Sen), आशीष कुंडू, पवित्र गुहा, सैबल जाना, पुण्यब्रत गुन वगैरह। इन डॉक्टरों ने मज़दूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके इस सामूहिक सपने को पूरा करने में मदद की।
69 साल की अनुभवी कार्यकर्ता कुलेश्वरी दीदी को अपनी ज़िंदगी के सफर में कई निजी मुश्किलों (domestic violence) का सामना करना पड़ा। उनके पति बिल्कुल नहीं चाहते थे कि वे शहीद अस्पताल में काम करें। उन्होंने मुझे बताया कि उस ज़माने में जो औरतें काम के लिए घर से बाहर निकलती थीं उन्हें ‘चरित्रहीन’ (women stigma) कहा जाता था। अपने पति के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “उन्हें शराब की बहुत बुरी लत थी। वे देर रात घर लौटते थे और मुझे मारते-पीटते थे।” शक की वज़ह से कभी-कभी वे कुलेश्वरी दीदी की रात की ड्यूटी के वक्त अस्पताल में ही सोते थे। कई बार उन्होंने अपने घर के हिंसक माहौल से भागकर अस्पताल में ही पनाह ली। उनके पति शराब पर ही सारा पैसा उड़ा देते थे। उनके पति द्वारा नशे में की गई हिंसा आज भी उनकी यादों में ताज़ा है। वे बताती हैं, “उन दिनों के बारे में सोचते ही मैं सिहर उठती हूं।”
उस मुश्किल दौर में जब उनके परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया था और कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं था, तब अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने ही हर तरह से उनकी मदद (support system) की थी। “मुझे नहीं लगता कि इस अस्पताल के बिना मैं इतने लंबे समय तक ज़िंदा रह पाती।” यह कहते हुए उनकी आंखे भर आईं थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके एक बेटे ने आत्महत्या कर ली थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया और कुलेश्वरी दीदी के बच्चे बड़े होते गए, घर में उनकी स्थिति और मज़बूत होती गई।
मिट्टी की एक छोटी-सी झोपड़ी में शुरू हुआ छोटा-सा दवाखाना (small clinic beginning) चार दशकों का सफर तय कर आज एक विशाल और शानदार अस्पताल (modern hospital setup) बन चुका है। हालांकि, शहीद अस्पताल के शुरुआती साल चुनौतियों से भरे थे। सुजाता दीदी, वे भी अनुभवी नर्स हैं और हाल ही में रिटायर हुई हैं, ने अस्पताल के शुरुआती दिनों की बहुत ही छोटी-छोटी बातें बताईं।
उस समय, पेशेवर स्टाफ को रखने के लिए बहुत कम पैसे (low funding healthcare) थे। स्वास्थ्य कार्यों में रुचि रखने वाले लोगों को अस्पताल चलाने के लिए स्वयंसेवक के तौर पर भर्ती किया गया। अपने संस्मरण में इलीना सेन लिखती हैं कि कैसे डेविड वर्नर (David Werner book) की किताब ‘जहां डॉक्टर न हो (व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टर – Where There Is No Doctor) स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए एक बुनियादी किताब बन गई थी। चूंकि कई कार्यकर्ताओं की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, इसलिए जानकारी देने के लिए चर्चाओं और चित्रों का इस्तेमाल किया जाता था, साथ ही डॉक्टरों के साथ सैद्धांतिक और प्रैक्टिकल कक्षाएं भी होती थीं।
इसी तरह, एक ट्रेड-यूनियन बैठक के बाद सुजाता दीदी को क्लीनिक-डिस्पेंसरी में काम शुरू करने के लिए बुलाया गया। ‘वह एक ऐसा समय था जब हमें एक साथ कई काम (multi tasking healthcare) करने पड़ते थे। नर्सिंग के कामों के अलावा, हम बहुत दूर से पानी लाते थे, कपड़े धोते थे, खाना बनाते थे और क्लीनिक को संभालते थे।’ वे याद करते हुए बताती हैं कि अस्पताल की पुरानी मिट्टी की दीवारों (rural setup hospital) पर गोबर और मिट्टी से छबाई भी किया करते थे।
शुरुआती दिनों में, डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं सहित पूरा स्टाफ बहुत ही घनिष्ठ समुदाय की तरह रहता था। वे एक साथ रहते थे और अपना खाना आपस में बांटकर खाते थे। यहां तक कि डॉक्टर और नर्स भी अस्पताल की चादरें धोने जैसे कामों में हाथ बंटाते थे। उन्होंने याद करते हुए बताया, “हम शायद ही कभी अस्पताल से बाहर जाते थे। हमने कई-कई घंटों काम किया, सुबह 11 बजे से रात 12 बजे तक। और शुरू में, हमें कोई वेतन (unpaid work) नहीं मिलता था। हम तो बस अपने लोगों की मदद कर रहे थे।”
अब, 150 बिस्तरों वाला यह अस्पताल – जिसमें सर्जरी, जनरल मेडिसिन और प्रसूति एवं स्त्री रोग के लिए वार्ड हैं – इस क्षेत्र की नर्सों, सफाई कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट डॉक्टरों, मज़दूरों और किसानों (people powered healthcare) के कंधों पर खड़ा हुआ है। इसकी फीस बहुत कम है, ताकि यहां के लोगों की आमदनी के हिसाब से उनकी जेब पर भारी न पड़े। इसका प्रशासन मुख्य रूप से ट्रेड यूनियन के नेताओं और अस्पताल के कर्मचारियों (collective management) द्वारा किया जाता है। शहीद अस्पताल के बाह्य-रोगी विभाग (OPD) में रोज़ाना तकरीबन 200 मरीज़ आते हैं।
इस शानदार काम की मज़बूत रीढ़ हैं 70 वर्षीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सैबल जाना (Dr Saibal Jana), जिन्हें प्यार से ‘जाना सर’ कहते हैं। वे ऊर्जा के एक ऐसे स्रोत हैं जो शहीद अस्पताल के कामकाज को सुचारू रूप से चलाए रखता है।
पिछले 40 वर्षों से, डॉ. जाना ने अस्पताल को एकजुट रखा है, और खुद को मज़दूरों के संघर्षों (egalitarian values) से जुड़े समानतावादी मूल्यों के प्रति समर्पित कर दिया है। मज़बूत कद-काठी वाले, दिल खोलकर हंसने वाले और असीम ऊर्जा से भरे इस सज्जन को अक्सर क्लीनिकल राउंड के दौरान एक सादे सूती कुर्ते या शर्ट में देखा जा सकता है। चपटे फ्रेम वाले चश्मे के पीछे उनकी आंखें हर मरीज़ को पूरे ध्यान से देखती हैं। जैसा कि एक डॉक्टर ने मुझे बताया, “जाना सर मरीज़ों के चेहरों को बहुत ध्यान से देखने (clinical observation) पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार, कई मामलों में, सिर्फ चेहरा देखकर ही बीमारी का एक मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाया जा सकता है।”
लगातार खुद सीखते रहने की बदौलत वे एक ऐसे डॉक्टर बन गए जो इस क्षेत्र के लोगों की सभी चिकित्सकीय और सर्जिकल ज़रूरतों का इलाज करने में सक्षम हैं। शहीद अस्पताल के नेता के तौर पर, उन्होंने ‘जन स्वास्थ्य आंदोलन’ (public health movement) की अगुवाई की, जिसने इस क्षेत्र के मज़दूरों को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में अभियान चलाया।
इमारत के निर्माण से लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण तक, अस्पताल के विकास के हर चरण में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। हर्निया का ऑपरेशन करते समय ऑपरेशन टेबल पर अरबपतियों के बारे में बात करने से लेकर, नियमित राउंड के दौरान स्वास्थ्य और इलाज जैसे विषयों पर बड़ी दवा कंपनियों (pharma industry critique) के नैरेटिव को सक्रिय रूप से चुनौती देने तक, डॉ. जाना शहीद अस्पताल के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक की तरह हैं।
क्लीनिकल राउंड लेते समय, एक बार उन्होंने ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी की ‘अर्ध-मशीनीकरण’ (semi mechanization concept) की अवधारणा को दोहराते हुए कहा था, “अगर मशीनें गलती करें, तो शायद हमें कभी पता ही न चले। लेकिन अगर इंसान गलती करते हैं, तो उसे सुधारने की गुंजाइश हमेशा रहती है।” ‘अर्ध-मशीनीकरण’ आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI debate) और तकनीकी क्रांतियों के दौर के लिए एक महत्वपूर्ण विचार है, जिसे फिर से सामने लाने की ज़रूरत है। यह CMSS के उस अभियान से विकसित हुआ था जो पूर्ण-मशीनीकरण के खिलाफ था, क्योंकि पूर्ण-मशीनीकरण से खदानों में कई नौकरियां खत्म हो जातीं।
उस समय, नियोगी ने तर्क दिया था कि भारत जैसे श्रम-अधिशेष (जहां श्रमिकों की बहुतायत हो – labor surplus economy) वाले देश के लिए पूर्ण-मशीनीकरण वांछनीय तकनीकी विकल्प नहीं है, और भविष्य में दल्ली राजहरा खदानों के लिए एक बेहतर रणनीति अर्ध-मशीनीकरण ही होगी।’ CMSS ने खनन में अर्ध-मशीनीकरण पर एक अध्ययन भी करवाया था, जिसमें दिल्ली के अर्थशास्त्रियों की एक शोध टीम शामिल थी। इलीना सेन अपने संस्मरणों में उनकी रिपोर्ट के बारे में लिखती हैं, “उनकी रिपोर्ट ने इस विकल्प की सराहना की और दिखाया कि लागत के लिहाज़ से अर्ध-मशीनीकरण सस्ता था, और साथ ही यह श्रमिकों के लिए भी अनुकूल था।”
इसी भावना के साथ, डॉ. जाना मशीनों से हासिल निष्कर्षों (human vs machine) के मुकाबले मानवीय अवलोकन को ज़्यादा महत्व देते हैं। अत्यधिक टेस्ट करवाने की बजाय बारीकी से शारीरिक जांच अपनाने से मरीज़ों को अनावश्यक स्वास्थ्य खर्चों से बचने में मदद मिल सकती है। एक अन्य अवसर पर, डॉ. जाना ने कहा था, ‘हमें उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी चेतना (human intelligence) का उपयोग करने की ज़रूरत है। जो लोग मशीनों को बढ़ावा देना चाहते हैं, वे ही मानवीय मूल्यों के ऊपर मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। मशीन के पुर्ज़ों को समय-समय पर बदलना पड़ता है, और यह अपने आप में खर्चीली प्रक्रिया है।’
उन्होंने कहा था, “अंततः, निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए मानवीय चेतना ही सबसे महत्वपूर्ण है।” यह पूंजी-प्रधान तकनीक (capital intensive technology) की बजाय लोगों के विज्ञान को सशक्त बनाने (people’s science centric approach) की दिशा में एक कदम है। कई मायनों में, डॉ. जाना के शब्द शहीद अस्पताल के मूल मूल्यों को पूरी तरह से समेटे हुए हैं।
शहीद अस्पताल में फुसफुहाटें (collective voice) बयार बन जाती हैं। एक डाल से दूसरी डाल तक और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक, मशीनी खदानों की भूलभुलैया जैसी गुफाओं से एक गूंज उठती है और पहुंच जाती है अस्पताल के उस प्रांगण तक जहां शिशु जन्म लेते हैं। यह गूंज वास्तव में लामबंद होने, व्यवस्था को बदलने, उठ खड़े होने, विद्रोह करने और स्वयं को मुक्त कराने (people’s movement) की एक ज़ोरदार हुंकार है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://nivarana.org/vital-signs/healthcare-as-a-peoples-movement-the-story-of-shaheed-hospital








