पांच करोड़ वर्ष पहले की जंगल गाथा              

डॉ. किशोर पंवार

न दिनों ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है और तरह-तरह के पर्यावरणीय खतरों की बातें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होती रहती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। जियोलॉजिकल इतिहास (geological history) को देखें तो पता चलता है कि ऐसा पूर्व में भी हो चुका है; इस धरा पर हमारे पदार्पण से करोड़ों वर्षों पहले। यह घटना लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व जिस काल खंड में घटी थी उसे पैलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम (पीईटीएम) (Paleocene-eocene thermal maximum- PETM) कहा गया है। पृथ्वी के इतिहास में 6.6 करोड़ से 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को पैलियोसीन युग और 5.6 करोड़ से 3.39 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को इयोसीन युग कहा जाता है।

हाल ही में अमेरिका में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने उस कालखंड के वनों के घनेपन (Forest density) के बारे में बहुत ही शानदार जानकारी उपलब्ध कराई है। यह आश्चर्यजनक है कि जब हम नहीं थे, उस अतीत के बारे में इतनी विस्तार पूर्वक जानकारी कैसे हासिल की गई। आइए देखते हैं।

यह महती काम सैमुअल ऑश्चिन ग्लोबल सेंटर फॉर आइस एज रिसर्च की रेगन डन, व्योमिंग विश्वविद्यालय में प्रोफसर एलेन कुरानो और उनकी टीम ने किया है। टीम ने व्योमिंग के हैना बेसिन से पीईटीएम से पहले और बाद के सैकड़ों नमूने एकत्र करके उन प्राचीन जंगलों के जीवाश्म प्रमाणों की खोज की। इस जीवाश्म रिकॉर्ड (fossil records) का उपयोग करते हुए उन्होंने उस काल की गाथा को पुनः रचा है। आज से लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व, पृथ्वी के वन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए थे। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव के सबसे तीव्र दौरों में से एक की शुरुआत में तो जंगल ज़्यादा घने और हरे-भरे हो गए थे। लेकिन फिर यह वृक्षावरण झीना होने लगा। वैश्विक तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि के कारण गर्मी और सूखे ने जंगलों पर दबाव डाला, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। जंगलों की ऊपरी छतरी खुल गई, जिससे ज़मीन पर अधिक सूर्य की रोशनी पड़ने लगी और भूभाग में पानी की गति में बदलाव आ गया।

वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन अमेरिका के एक राज्य दक्षिण व्योमिंग (south wyoming) में किया है जहां पर फॉसिल ब्यूट राष्ट्रीय स्मारक स्थित है। यहां पर पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व से लेकर तीन करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व के जंतुओं और पौधों के शानदार जीवाश्म मिलते हैं।

ऊपरी परत (चंदवा या कैनपी) जंगल की भू-सतह तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा, तापमान, जलीय आवास और वन द्वारा संग्रहित की जा सकने वाली कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करती है। इस तरह, यह कैनपी और इसका घनापन पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने के तरीके का सबसे स्पष्ट संकेतक बन जाते हैं। वर्तमान जंगलों के घनेपन के आकलन का सर्वोत्तम तरीका लीफ एरिया इंडेक्स (Leaf Area Index – LAI) का है।

लीफ एरिया इंडेक्स

यह पत्तियों के कुल क्षेत्रफल और पेड़ के नीचे की भूमि के क्षेत्रफल का अनुपात है – इसमें नापा जाता है कि पेड़ों का फैलाव कितनी भूमि पर है और उन पेड़ों की पत्तियों का कुल क्षेत्रफल कितना है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मापदंड है। यह तो जानी-मानी बात है कि किसी पेड़ पर सारी पत्तियां एक बराबर ऊंचाई पर नहीं लगी होतीं – वे अलग-अलग परतों में जमी होती हैं। इसके अध्ययन को फिलोमेट्री (phyllometry) कहा जाता है। सबसे ऊपर वाली पत्तियों पर भरपूर प्रकाश पड़ता है, निचली पत्तियों पर कम। अंतत: नीचे की ज़मीन जो प्रकाश पहुंचेगा वह इन सारी पत्तियों की रुकावट के बाद ही पहुंचेगा। वनों का घनापन छाया, तापमान, जल हानि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है।

लेकिन सवाल तो यह है कि साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में रहे जंगलों का लीफ एरिया इंडेक्स कैसे निकाला जाए।

पुरातन जंगल का लीफ एरिया इंडेक्स

डन, कुरानो और उनके साथियों ने इसी सवाल के जवाब में एक नया तरीका खोज निकाला है। यह देखा गया है कि पत्तियों की कोशिका का आकार (shape of leaf cells) उनके विकास के दौरान प्राप्त धूप की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, छाया में उगने वाली पत्तियां धूप की तलाश में फैलते समय लंबी और अधिक चौड़ी कोशिकाएं विकसित करती हैं। वहीं, अधिक धूप में उगने वाली पत्तियां छोटी और गोल कोशिकाएं विकसित करती हैं।

लेकिन इसका अध्ययन तो आजकल की पत्तियों में किया जा सकता है। साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व (5 crore yeras ago) जो पत्तियां गिरी होंगी वे तो पूरी तरह सड़-गल गई होंगी। यानी उनकी कोशिकाओं का अध्ययन तो हो नहीं सकता। यहां एक दूसरा सुराग काम आया। यह सुराग था पत्ती की क्यूटिकल के टुकड़े।

पत्ती की सबसे बाहरी जीवित परत (एपिडर्मिस) के ऊपर एक पतली सुरक्षा परत चढ़ी होती है जिसे क्यूटिकल कहते हैं। क्यूटिकल एक अघुलनशील पॉलीमर से बनी होती है। यह जल-अवरोधी गुण (water-resistent quality) प्रदान करती है। इसकी रचना, आकार-प्रकार एपिडर्मिस कोशिकाओं से मेल खाते हैं। अतः क्यूटिकल के अध्ययन से एपिडर्मिस कोशिकाओं की रचना के बारे में खास जानकारी मिलती है। रोचक बात है कि क्यूटिकल का अपघटन करोड़ों सालों तक नहीं होता। पौधों के जीवाश्म अवसादी (तलछटी) चट्टानों में पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन का सीमित संचय होता है। इनमें जीवाश्म का संरक्षण अच्छी तरह से हो जाता है। जीवाश्मों में पत्तियों के ये खंडित क्यूटिकल अवशेष संरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों ने क्यूटिकल और एपिडर्मिस कोशिकाओं के इस सम्बंध को प्राचीन जंगलों के पुनर्निर्माण के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। इसे सटीक रूप से समझने के लिए, पहले उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्तमान जंगलों से मिट्टी के नमूने लिए, जिनमें विभिन्न सघनता (varied plant density) वाले पेड़ों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। मिट्टी के प्रत्येक नमूने में कई अलग-अलग पेड़-पौधों द्वारा छोड़ी गई क्यूटिकल पाई जाती है।

क्यूटिकल और एपिडर्मिस (leaf cuticle & epidermis) कोशिकाओं की रचना (गोल बनाम लंबी) की तुलना करने पर स्पष्ट हो गया कि अधिक घनी कैनपी वाले नमूनों में अधिक लंबी कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जबकि विरल कैनपी नमूनों में अधिक गोलाकार कोशिकाएं पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने पेड़ के नीचे की भूमि पर कैमरे लगाए, जिनके मुंह ऊपर की ओर थे। इनमें कैद तस्वीरों से पता चल गया कि भूमि पर कितनी रोशनी पहुंच रही है जो जंगल के घनेपन का द्योतक है। फिर इसका सम्बंध उन्होंने क्यूटिकल की कोशिकाओं से जोड़ा।

क्यूटिकल के आधार पर हज़ारों एपिडर्मिस कोशिकाओं के आकार की तुलना शोधकर्ताओं ने उनके द्वारा वास्तव में आकलित लीफ एरिया इंडेक्स से की। देखा गया कि पत्ती की कोशिकाओं का आकार लीफ एरिया इंडेक्स से और इस प्रकार से जंगल के घनत्व से निकट से संम्बधित है। कोशिकाएं जितनी अधिक लंबी होती हैं, उनके ऊपर वन आवरण उतना ही घना होता है। इस रिश्ते ने लाखों साल पहले व्योमिंग के जंगलों की बनावट का पुनर्निर्माण करने और यह दिखाने में मदद की कि समय के साथ वे कैसे बदलते रहे। (LAI & forest density relation)

पीईटीएम के दौरान वन संरचना में आए बदलावों (forest development changes) को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने से पौधों की वृद्धि, बायोमास और उत्पादकता कैसे प्रभावित होती है। अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड वनों के लिए हानिकारक है क्योंकि इसके साथ होने वाली गर्मी और सूखा पेड़ों पर दबाव डालते हैं और इससे कई पेड़ों की मृत्यु हो जाती है।

इस शोध से पता चलता है कि पीईटीएम के दौरान, वनों की ऊपरी परत अधिक खुली (open canopy) हो गई थी, बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई थी, और इस बदलाव ने जलवायु, पोषक तत्वों के चक्रण, अपक्षय और निश्चित रूप से, वनों में रहने वाले जानवरों को प्रभावित किया।

जंगल: हद कर दी आपने

एक बात यह पता चली कि तीव्र वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से ठीक पहले, वनों का घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जो संभवतः वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का परिणाम था क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड पेड़-पौधों को प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बोहायड्रेट व अन्य सामग्री के निर्माण में मददगार होती है। लिहाज़ा, वातावरण में अधिक कार्बन डाईऑक्साइड हो, तो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) ज़्यादा होगा और उनकी वृद्धि भी ज़्यादा होगी।   

लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड का एक अन्य असर भी होता है – ग्रीनहाउस प्रभाव (green house effect), जिसके कारण तापमान बढ़ता है। तो वह शुरुआती हरा-भरा जंगल ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। तापमान बढ़ने के साथ-साथ, गर्मी और सूखे के चलते पेड़ों के मरने से जंगल की ऊपरी परत तेज़ी से झीनी होती गई।

लेकिन 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व के प्राचीन जंगलों की कहानी उनके पतन के साथ समाप्त नहीं होती है। समय के साथ, गर्म जलवायु में चट्टानों के विघटन (जिसे अपक्षय कहा जाता है) (rock weathering) की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे हवा से कार्बन को खींचकर समुद्री तलछट में जमा कर दिया। इससे एक बार फिर वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी आई, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु ठंडी हुई और पानी अधिक आसानी से उपलब्ध हो गया। वन आवरण फिर से विकसित हो गए और अंततः वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से पहले की तुलना में और भी अधिक घने हो गए। वनों के विस्तार के साथ, संभवतः मिट्टी को स्थिर करने, जल-चक्र को नियंत्रित करने और वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने की उनकी क्षमता बहाल हो गई। जब पेड़-पौधे फिर से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखने लगे तो ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने और ग्रह के दीर्घकालिक पुनरुद्धार को बढ़ावा देने में मदद मिली। लेकिन इसमें एक लाख वर्षों से भी अधिक समय लगा।

वर्तमान परिदृश्य

इस घटनाक्रम में आज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक छिपा है। दुनिया में इस समय कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन केवल तभी जब तापमान और पानी पेड़ों की सहनशीलता की सीमा (saturation limit) के भीतर रहें। एक हद से ज़्यादा गर्मी, सूखा, कीड़े, रोगजनक और जंगल की आग कार्बन डाईऑक्साइड के किसी भी वृद्धिकारक प्रभाव को खत्म कर सकते हैं।

विश्व भर में, तापमान में वृद्धि (temperature increase) के साथ-साथ लकड़ी, फसलों और चारागाहों के लिए वनों की कटाई से जंगलों की सहनशीलता और भी कम हो रही है, जिसके कारण कई जंगलों में पहले से ही कम होने के संकेत दिखने  लगे हैं।

आज, मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि उस काल की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रही है। जीवाश्म रिकॉर्ड यह तो बताते हैं कि वन पुनर्जीवित (forest restoration) हो सकते हैं, बशर्ते मनुष्य उन्हें उन सीमाओं से आगे न धकेलें, जिनसे उबरने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डन आगे कहती हैं, “पेड़ अद्भुत हैं। जंगल हर दिन करोड़ों टन कार्बन सोखते हैं, लेकिन जब जंगल कम होने लगते हैं, तो कार्बन सोखने वाले सोख्ते भी कम होने लगते हैं। पीईटीएम हमें याद दिलाता है कि जब जंगल कम होते हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे जलवायु तंत्र पर पड़ते हैं। मानव जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व गति को कम करने में वनों की क्षमता को देखते हुए, इनकी रक्षा और पुनर्स्थापन (forest re-establishment & conservation) करना ही बुद्धिमानी होगी।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नेपाल जलवायु परिवर्तन से हुई बर्बादी का मुआवज़ा चाहता है  

प्रमोद भार्गव

दुनिया जलवायु परिवर्तन (climate change) के चलते आज भीषण सूखे, बाढ़, बारिश, अत्यधिक ठंड एवं गर्मी से जूझ रही है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते नेपाल के भोटकेशी और त्रिशूली में विनाशकारी बाढ़ से जो तबाही हुई है, उसकी आपूर्ति के लिए नेपाल ने मानवीय मदद और दान लेने की बजाय अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ‘जलवायु मुआवजा’ (climate compensation) और न्याय देने की मांग उठाना शुरू कर दी है। नेपाल की यह मांग न्यायसंगत है क्योंकि कुल वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड (जलवायु परिवर्तन का प्रमुख उत्तरदायी) उत्सर्जन में नेपाल की भागीदारी मात्र 0.05 प्रतिशत है। यदि सभी प्रकार की ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को जोड़ लिया जाए, तब भी यह हिस्सेदारी केवल 0.08 प्रतिशत की होती है। अतएव नेपाल का कहना है कि विकसित या विकासशील देशों द्वारा तात्कालिक राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं है, इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक देशों को आर्थिक मुआवज़ा देना होगा। साफ है नेपाल अब जलवायु न्याय और कानूनी मुआवज़े की मांग को प्राथमिकता दे रहा है। 

नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन (global carbon emission) में उसकी भागीदारी न्यूनतम है, लेकिन उसे हिमखंड पिघलने के सबसे गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (loss and damage fund) से 5 अरब डॉलर की तत्काल जलवायु राहत देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के इस कोश से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति का प्रावधान है। यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव का संकेत है। नेपाल ने विश्व समुदाय के सामने बेबाकी से यह बात कही है। इस मांग को रखते हुए नेपाल ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि औद्योगिक कार्बन उत्सर्जक देशों में चीन, अमेरिका और भारत इस त्रासदी के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हीं के उद्योगों से जो कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उसके प्रभाव से हिमालय के हिमखंड (himalyan glaciers) दुनिया के बाकी हिमखंडों की तुलना में तीन गुना तेज़ी से पिघल रहे हैं।

नेपाल ने चीन से इस बात पर भी नाराज़गी जताई है कि उसने 26 अगस्त को तिब्बत में हिमखंड टूटने (glacier break) की जानकारी समय रहते नहीं दी। इस कारण नेपाल को अपने लोगों को बचाने का समय नहीं मिल पाया।      

धरती पर रहने वाले जीवन पर करीब तीन दशक से जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य में होने वाले संकटों की तलवार लटकी हुई है। इस संकट से निपटने के उपाय तलाशने की दृष्टि से प्रतिवर्ष जलवायु सम्मेलन (climate summit) होता है। परिचर्चाओं और वाद-विवाद से निकले निष्कर्ष चेताते रहे हैं कि कोयला, तेल और गैस अर्थात जीवाश्म ईंधन इस संकट के दोषी हैं। अतएव इनका उपयोग धीरे-धीरे खत्म करना होगा। लेकिन सहमति बनती नहीं है। विकासशील देश इस बात को लेकर असहमत रहते हैं कि समझौते में जो शर्तें दर्ज रहती हैं, एक तो वे पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, दूसरे उन्हें अमीर देशों की आर्थिक मदद के बिना पूरा करना आसान नहीं होता। इस सम्मेलन का एक ही प्रमुख लक्ष्य था कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक विश्व के पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके। 100 से ज़्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाकर तीन गुना करने पर सहमत भी हैं। इसके अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सूर्य, पवन और पानी से बिजली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। इस सिलसिले में प्रेरणा के रूप में ऊरुग्वे जैसे देश का उदाहरण दिया जाता है, जो अपनी ज़रूरत की 98 फीसदी ऊर्जा इन्हीं स्रोतों से प्राप्त करता है। लेकिन यह एक अपवाद है; हकीकत यह है कि यूक्रेन और रूस तथा इस्राइल और हमास और अमेरिका व ईरान के बीच चलते भीषण युद्ध के कारण कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है और बिजली उत्पादन के जिन कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया गया था, उनका उपयोग फिर से शुरू हो गया है।

दुनिया में चीन सबसे ज़्यादा (30-33 प्रतिशत) कार्बन उत्सर्जित करता है। इसके बाद अमेरिका की भागीदारी करीब 11 से 14 प्रतिशत और भारत की हिस्सेदारी 7 से 8 फीसदी है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते (Paris agreement) को तब बड़ा झटका लगा था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया था। तब ये आशंकाएं उठी थीं कि वैश्विक समस्याओं पर अब आगे कोई सहमति शायद नहीं बन पाएगी। फिलहाल तो यह कहना भी मुश्किल है कि नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से 5 अरब डॉलर की जो मांग की है वह उसे मिल ही जाएगी।

अपने औद्योगिक हितों (industrial profits) की चिंता और अमेरिका प्रथम की अवधारणा वाले डोनाल्ड ट्रंप और उनका अमेरिका मानने लगा है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान एक खोखली शंका है। वहां देश की जीडीपी दर और आर्थिक संपन्नता घटने की बात भी कही जा रही है। साफ है कि अमेरिका के लिए स्वहित सर्वोपरि है। लेकिन अमेरिका आगे आकर निजी और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर नेपाल की मदद हेतु कोई पहल करे, तभी अन्य देश नेपाल की मदद के लिए आगे आएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बदलते मौसम के साथ क्या ततैया खो रही हैं अपनी लय?

कुमार सिद्धार्थ

प्रकृति में ततैया (wasp) की भूमिका केवल डंक मारने वाले कीट की नहीं है। वह परागण में योगदान देने के साथ-साथ प्राकृतिक शिकारी के रूप में कई दूसरे कीटों की संख्या नियंत्रित करने वाले कीट के रूप में भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला कि वर्ष 2025 में ततैयों की संख्या असामान्य रूप से अधिक रही थी, जबकि 2026 की गर्मियों में कई इलाकों में वे बहुत कम दिखाई दीं। वैज्ञानिकों की चिंता है कि मौसम में बढ़ती अनिश्चितताएं इस प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को और तेज़ तथा अप्रत्याशित बना सकती हैं।

सवाल यह है कि अगर बदलते मौसम के कारण ततैयों की संख्या और उनके जीवन-चक्र में बदलाव आ रहा है, तो क्‍या इसका असर केवल ततैयों पर पड़ेगा या पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर?

अपने देश में ततैयों की विविधता काफी बड़ी (diverse) है। वर्ष 2020 में प्रकाशित भारत में Vespidae परिवार की विस्तृत सूची के अनुसार देश में ततैया परिवार की 288 प्रजातियां, 60 वंश और पांच उपकुल दर्ज किए गए थे। ये प्रजातियां देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

ततैयों की वास्तविक विविधता इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में इन पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। वर्ष 2023 में भारतीय उपमहाद्वीप की ततैयों पर प्रकाशित एक समीक्षा में ततैयों की कम से कम 104 प्रजातियां दर्ज की गई थीं। शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि इनकी जैविकी और पारिस्थितिकी के बारे में उपलब्ध जानकारी अभी सीमित (limited knowledge) है।

मौसम से जुड़ा जीवनचक्र

सामाजिक ततैयों (social wasps) की कॉलोनी की शुरुआत आम तौर पर एक रानी से होती है। मौसम अनुकूल होने पर रानी सुरक्षित जगह तलाशती है, घोंसला बनाती है और शुरुआती कामगारों को जन्म देती है। इसके बाद कामगारों की संख्या बढ़ती जाती है और कॉलोनी विकसित होती है।

मौसम में बदलाव का असर शुरुआती चरण पर पड़ सकता है। तापमान, बारिश, नमी और भोजन की उपलब्धता जैसी परिस्थितियां यह तय कर सकती हैं कि कितनी रानियां सफलतापूर्वक कॉलोनी स्थापित (colony establishment) कर पाएंगी।

वसंत, गर्मी और मानसून का चक्र कई क्षेत्रों में अलग-अलग है। हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और शुष्क पश्चिमी भारत में ततैयों के लिए परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण शोध प्रश्न जरूर निकलता है क्या भारत में भी मौसम की बढ़ती अनिश्चितता ततैयों के प्राकृतिक जीवन चक्र (natural life cycle) को प्रभावित कर रही है या करेगी?

पूर्वोत्तर से पश्चिमी घाट तक

हाल के शोध इस बात का संकेत देते हैं कि ततैयों की विविधता और उनका पर्यावरण (diversity & environment relation) से सम्बंध कितना व्यापक है। वर्ष 2026 में प्रकाशित तवांग, अरुणाचल प्रदेश के एक अध्ययन में 19 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसी अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में Vespidae की 73 प्रजातियों और 27 वंशों की सूची तैयार की गई।

पश्चिमी घाट के गोवा क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में वर्ष 2019 के दौरान 231 ततैया नमूनों की पहचान की गई, जो 19 प्रजातियों, 12 वंशों और Vespidae के चार उपपरिवारों से संबंधित थे। वन क्षेत्र में 19 प्रजातियां मिलीं, जबकि कृषि क्षेत्र में 13 प्रजातियां दर्ज हुईं।

असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर में वर्ष 2022-23 के दौरान किए गए अध्ययन में ततैया और मधुमक्खियों की 23 प्रजातियां दर्ज की गईं। यहां ततैयों की संख्या में मौसमी बदलाव (weather influence) देखा गया और मानसून के महीनों में उनकी उपस्थिति सर्वाधिक रही।

ये आंकड़े बताते हैं कि ततैयों की आबादी मौसम और आवास के साथ बदलती है और अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों (ecosystem areas) में इनका अध्ययन ज़रूरी है।

ततैया हमारी दुश्मन नहीं

ततैया को आम तौर पर मधुमक्खी के मुकाबले कम पसंद किया जाता है। मधुमक्खी से शहद मिलता है, वह परागण (pollination) करती है और कृषि के लिए उपयोगी मानी जाती है। ततैया को अक्सर केवल उसके डंक और उसके घोंसले से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।

कई ततैया प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं। वे मक्खियों, इल्लियों (कैटरपिलर्स) और दूसरे छोटे कीटों को पकड़कर अपनी संतानों को खिलाती हैं। इस तरह वे प्राकृतिक कीट नियंत्रण (biological insect control) में अहम भूमिका निभाती हैं।

कुछ ततैया परागण में भी योगदान देती हैं। हाल के वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि गैर-मधुमक्खी परागणकर्ताओं को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया है।

मधुमक्खी से अलग है ततैया

ततैया को अक्सर मधुमक्खी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। मधुमक्खियां मुख्यतः फूलों के रस और पराग पर निर्भर रहती हैं और परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके विपरीत, ततैयों की कई प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं (parasitoids)। मधुमक्खियों का शरीर अपेक्षाकृत रोएंदार होता है, जबकि ततैयों का शरीर चिकना और पतला दिखाई देता है। कई ततैया बार-बार डंक मार सकती हैं, जबकि कामगार शहद मधुमक्खी आमतौर पर डंक मारने के बाद मर जाती है।

कीट नियंत्रण

ततैयों की भूमिका को केवल जैव विविधता के नज़रिए से देखना उपयुक्त नहीं है। कृषि में प्राकृतिक कीट नियंत्रण का महत्व तेज़ी से बढ़ रहा है।

अगर कुछ ततैया प्रजातियां खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करती हैं, तो उनकी मौजूदगी किसानों के लिए एक प्राकृतिक (इकॉलॉजिकल) सेवा है। दूसरी ओर, अत्यधिक कीटनाशक इस्तेमाल, आवास का नुकसान और बदलता मौसम इनकी संख्या को प्रभावित कर  सकते हैं।

इसलिए कीट नियंत्रण की ऐसी रणनीति ज़रूरी है जिसमें ‘हानिकारक कीट’ और ‘उपयोगी शिकारी कीट’ के बीच अंतर किया जाए। हर ततैया को नष्ट कर देना कीट नियंत्रण नहीं है। कई बार यह प्राकृतिक नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण कड़ी (chains of natural control) को खत्म करना भी साबित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन: असली खतरा

जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल औसत तापमान का बढ़ना नहीं है। मौसम के समय और तीव्रता में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुत गर्म दिन, अचानक बारिश, लंबे सूखे, असामान्य ठंड या मानसून के आने-जाने में बदलाव ये सभी उन कीटों के जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकते हैं जिनकी गतिविधियां मौसम से गहराई से जुड़ी हैं (weather dependent life-cycle)।

ततैयों के मामले में शुरुआती मौसम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर रानियां (queen wasp) ऐसे समय में बाहर निकलती हैं जब भोजन उपलब्ध नहीं है या अत्यधिक गर्मी और बारिश के कारण घोंसला बनाना मुश्किल है, तो उस वर्ष कॉलोनियों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर, अनुकूल मौसम बड़े पैमाने पर कॉलोनियों के विकास को बढ़ावा दे सकता है।

शोध की कमी चिंता का विषय

भारत में ततैयों की प्रजातियों की सूची तैयार करने का काम हुआ है, लेकिन उनकी आबादी में दीर्घकालीन बदलावों (long term changes) को दर्ज करने वाले व्यवस्थित अध्ययन बहुत कम हैं। इसलिए ततैयों की निगरानी को जैव विविधता की व्यापक निगरानी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

स्कूलों, विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों और विज्ञान कार्यक्रमों के माध्यम से भी ऐसे आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। लोग अपने आसपास दिखाई देने वाली ततैयों की प्रजातियों, संख्या, मौसम और स्थान की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। इस तरह कई वर्षों में तैयार हुआ आंकड़ा (data) महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

सवाल सिर्फ ततैयों का नहीं जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रकृति के संकेत (nature’s calamatous signals) अक्सर बहुत सूक्ष्म होते हैं। किसी पक्षी का समय से पहले लौटना, किसी पेड़ का असमय फूलना, तितलियों की संख्या में बदलाव या किसी कीट का अचानक कम दिखाई देना, ये सभी बड़े बदलावों की शुरुआती सूचनाएं हो सकते हैं। ततैया भी ऐसा ही एक संकेत हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दुनिया में कितनी कीट प्रजातियां हैं

जीव वैज्ञानिकों ने पिछली तीन सदियों के प्रयासों से अब तक करीब 10 लाख कीट प्रजातियां पहचानकर उनका वर्णन किया है। कीट पृथ्वी पर जीवों का सबसे अधिक विविधतापूर्ण समूह (diverse group) है। इनमें आधे मीटर साइज़ की ततैया से लेकर अनाज के दाने के बराबर कीट भी हैं, और पानी में रहने वाले कीटों से लेकर ज़मीन में बिल बनाकर रहने वाले और हवा में उड़ने वाले कीट भी हैं।

अब प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (यूएस) में प्रकाशित एक नया अध्ययन बताता है कि वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए कीट शायद वास्तविक संख्या (exact insect population) का एक छोटा-सा अंश ही हैं। इस अध्ययन में सांख्यिकी की विधियों का उपयोग करके यह अद्भुत आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है कि पृथ्वी पर कीट प्रजातियों की संख्या संभवत: 2 करोड़ तक हो सकती है। यह पूर्व अनुमानों (60 लाख प्रजातियां) से 3 गुना से भी अधिक है।

एक बेहतर अनुमान लगाने के लिए कनेक्टिकट विश्वविद्यालय के कीट वैज्ञानिक रॉबर्ट कोलवेल और उनके साथियों ने कोस्टा रिका गुआनाकास्टे राष्ट्रीय उद्यान में पिछले कई वर्षों में किए गए कीट सर्वेक्षणों (insect survey) से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन किया और फिर इन आंकड़ों पर रोग-प्रसार विज्ञान में प्रयुक्त की जाने वाली सांख्यिकीय विधियों को लागू किया।

शुरुआत में उन्होंने पैरासिटॉइड ततैयों (parasitoid wasps) के एक उपकुल (माइक्रोगैस्ट्रीने) पर गौर किया। पैरासिटॉइड (parasitoid) उन कीटों को कहते हैं जो अपने जीवन चक्र की अपरिपक्व अवस्था में किसी अन्य पर परजीवी होते हैं। इन ततैयों का काफी विस्तृत व बारीकी से अध्ययन किया गया है। वैज्ञानिकों ने कोस्टा रिका (costa rica) में पाई जाने वाली ऐसी 3000 प्रजातियों का वर्णन किया है। तो कोलवेल की टीम ने यह जांच करने की ठानी कि उद्यान में किए गए कीट सर्वेक्षण इन ततैयों की विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं या नहीं।

पिछले कई वर्षों में उद्यान में उड़ने वाले कीटों का सर्वेक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने जो ट्रैप (शिकंजे) लगाए थे उनमें से मुख्य सेट में माइक्रोगैस्ट्रिने (microgastrinae) की 388 प्रजातियों का ब्यौरा दिया गया। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त शिकंजों में 578 प्रजातियों को पहचाना गया। जब वैज्ञानिकों ने उन इल्लियों (कैटरपिलर) पर गौर किया जो परजीवी प्रकोप का शिकार हुई थीं, तो उन्हें 889 ततैया प्रजातियों का पता चला।

रोचक बात यह रही कि जब कोलवेल की टीम ने इन दो समूहों को एक साथ देखा, तो पाया कि शिकंजों में कैद हुई प्रजातियां और कैटरपिलर की जांच से दिखी प्रजातियां एकदम अलग-अलग थीं – यानी इन दो समूहों के बीच ओव्हरलैप (अतिव्याप्ति) (species overlap) बहुत कम था। इसका एक ही मतलब हो सकता है कि ये दोनों विधियां उद्यान में उपस्थित माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के एक-एक अंश को ही देख पा रही थीं। यदि दोनों तरीकों को जोड़कर सांख्यिकीय विधियां लागू की जाए, तो पता चलता है कि उद्यान में पूरी-पूरी 2394 माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियां मौजूद हैं।

यदि यह सही है, तो इसका मतलब है कि सर्वेक्षणों ने उद्यान के केंद्रीय भाग की माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के मात्र छठे भाग (लगभग 16 प्रतिशत) को उजागर किया है। यदि इस प्रतिशत को पूरे उद्यान (53,945 ज्ञात प्रजातियां) पर लागू किया जाए, गुआनाकास्टे उद्यान (guanacaste park) में 3,32,846 प्रजातियां मौजूद हैं जिनमें से अधिकांश का अवलोकन ही नहीं किया गया है।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने इन गणनाओं को एक अन्य समूह (वृक्षों) पर लागू करके देखा। पूरी पृथ्वी पर वृक्षों की 73,000 प्रजातियां पाई जाती हैं और गुआनाकास्टे उद्यान में 1200 से 1500 प्रजातियां। अर्थात उद्यान में कुल वैश्विक वृक्ष प्रजातियों (global tree species) का लगभग 1.6 से 2.1 प्रतिशत पाया जाता है। यदि यही प्रतिशत कीटों पर भी लागू होता हो, तो पृथ्वी पर 1.33 करोड़ से 2.47 करोड़ कीट प्रजातियां होनी चाहिए। औसत के आधार पर यह माना जा सकता है कि पृथ्वी पर 2.03 करोड़ कीट प्रजातियां (insect species) होंगी।

अध्ययन दल का कहना है कि उनका अनुमान थोड़ा कम ही बैठेगा। अलबत्ता संरक्षण के लिहाज़ से यह एक अच्छा आंकड़ा हो सकता है। और इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि जैव विविधता (biodiversity) का विस्तार कितना व्यापक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिरक्षा ‘रीसेट’ करने वाली इम्यून थेरपी

क ताज़ा शोध के क्लीनिकल ट्रायल (Clinical trial) में चिकित्सा जगत को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। शोधकर्ताओं ने शरीर के भीतर ही बीमारी से लड़ने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को तैयार करने के लिए एक संशोधित वायरस का सफल परीक्षण किया है। नेचर में प्रकाशित अध्ययन के शुरुआती नतीजे दर्शाते हैं कि इस खास तकनीक के जरिए भविष्य में गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियों (autoimmune diseases) का इलाज आज के मुकाबले अधिक सटीक, किफायती और त्वरित हो सकता है।

ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) खुद अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) जैसी स्थिति में शरीर की विकृत बी-कोशिकाएं ऐसी ऑटो-एंटीबॉडी बनाती हैं जो मस्तिष्क, मेरु-दंड और तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं।

इस अध्ययन में एमएस, तंत्रिका को नुकसान पहुंचाने वाली और शोथ बढ़ाने वाली ऑटोइम्यून बीमारियों के 16 मरीज़ों को शामिल किया गया। मरीज़ों को चीन की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी द्वारा विकसित ‘लेंटीवायरस’ (एक सुरक्षित और आनुवंशिक रूप से संशोधित वायरस) (lentivirus) की एक खुराक दी गई। शरीर में प्रवेश करते ही इस वायरस ने टी-कोशिकाओं को आनुवंशिक निर्देश दिए, जिससे वे CAR-T कोशिकाओं (Chimaeric Antigen Receptor – T cells) में बदल गई। नतीजतन, नई CAR-T कोशिकाओं ने विकृत बी-कोशिकाओं को नष्ट कर दिया। इसके बाद शरीर में नई स्वस्थ बी-कोशिकाएं बनीं और उन्होंने ऑटो-एंटीबॉडी बनाना बंद कर दिया। शोधकर्ताओं ने इसे ‘इम्यून रीसेट’ (immune reset) नाम  दिया है।

छह महीने की निगरानी के दौरान एमएस के मरीज़ों में शारीरिक गतिशीलता, सोचने-समझने की क्षमता में सुधार देखा गया और लगातार थकान में भी कमी आई। इसके अलावा, अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों के मरीज़ों में शोथ (inflammation) की कमी और शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पारंपरिक CAR-T थेरपी (फिलहाल ब्लड कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही है) में मरीज़ का खून निकालकर टी-कोशिकाओं को अलग किया जाता है। उसके बाद प्रयोगशाला में कोशिकाओं को (शरीर से बाहर) संशोधित करके शरीर में डाला जाता है। लिहाज़ा, शरीर के भीतर कोशिकाएं तैयार करने की यह तकनीक (इन-विवो) पारंपरिक थेरपी (conventional therapy) के मुकाबले सस्ती और तेज़ होगी। (साल 2025 में लेंटीवायरस आधारित CAR-T थेरपी से ब्लड कैंसर का सफल इलाज किया जा चुका है।)

परीक्षण के दौरान दुष्प्रभाव बेहद मामूली रहे – जैसे थोड़े समय के लिए हल्का बुखार, सूजन या श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या में अस्थायी कमी। वैसे, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह थेरपी शरीर के भीतर ही डीएनए में बदलाव करती है, इसलिए भविष्य में ट्यूमर या कैंसर (tumor) बनने का जोखिम हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्यूमर और दीर्घकालिक जोखिमों को खारिज करने और सुरक्षा के प्रमाण हेतु मरीज़ों की कम से कम 10 वर्ष तक निगरानी ज़रूरी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मरीज़ों की निगरानी जारी है और जल्द ही बड़े पैमाने पर ट्रायल (large scale trials) शुरू किए जाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जीवाश्म ने खोला एक मीटर लंबे बिच्छू का रहस्य

विपुल कीर्ति शर्मा

क्या आप ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां न पेड़ हों, न जंगल, न पक्षियों का कलरव, न डायनासौर और न ही इंसान? चारों ओर चट्टानें, उथले समुद्र, कीचड़ भरे तटीय मैदान, आकाश में बार-बार कड़कड़ाती बिजली और जब-तब फूटते हुए ज्वालामुखी और जीवन की बस शुरुआती आहट। लेकिन इस वीरान-सी लगने वाली दुनिया में एक ऐसा शिकारी घूम रहा था, जिसे देखकर आज के जांबाज़ भी शायद पीछे हट जाएं। यह कोई काल्पनिक राक्षस नहीं, बल्कि करीब एक मीटर लंबा बिच्छू (1 meter scorpion) था।

हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस प्राचीन जी व के बारे में नई जानकारियां दी हैं। ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर  क्षेत्र में एक जीवाश्म 1870 में मिला था और उस समय इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को पता चला था कि यह विशाल बिच्छू (giant scorpion) लगभग 43 करोड़ वर्ष पहले, यानी सिल्यूरियन काल में पृथ्वी पर विचरण करता था। इसे नाम दिया गया था प्रेआरक्टुरस गिगास (Praearcturus gigas) यह वह समय था जब धरती पर घने जंगलों का अस्तित्व नहीं था और भूमि पर जीवन अपने शुरुआती चरण में था। यह खोज केवल एक बड़े बिच्छू की कहानी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन के विकास को लेकर वैज्ञानिकों की कई पुरानी धारणाओं को चुनौती भी देती है।

करोड़ों वर्षों की समययात्रा

43 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी का स्वरूप बिल्कुल भिन्न था। अधिकांश जीवन समुद्रों में बसता था। भूमि पर कुछ छोटे-छोटे आदिम पौधे उगने लगे थे, लेकिन आज जैसे विशाल वृक्षों और घने जंगलों का विकास अभी नहीं हुआ था। इसी काल में शरीर पर कठोर कवच और जोड़ वाली टागों वाले आर्थ्रोपोड (संधिपाद प्राणि) (Arthropod) धीरे-धीरे समुद्र से निकलकर ज़मीन की ओर बढ़ रहे थे। आर्थ्रोपोड समूह में ही मकड़ियां, बिच्छू, केकड़े, झींगे और कीट शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विशाल बिच्छू इसी संक्रमण काल का एक महत्वपूर्ण जीव था, जो संभवतः पानी और ज़मीन दोनों परिवेशों में रहने का अभ्यस्त था।

आखिर मिला क्या था?

ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर में मिले जीवाश्म पहले भी वैज्ञानिकों के पास थे, लेकिन आधुनिक त्रि-आयामी इमेजिंग (3-D imaging) तकनीक और सूक्ष्म विश्लेषण से अब इनके बारे में कहीं अधिक जानकारी मिल सकी है। जीवाश्म से पता चलता है कि इस जीव के पंजे अत्यंत शक्तिशाली थे। उसका शरीर लंबा था और मज़बूत बाहरी कवच (बाह्य कंकाल) से ढंका हुआ था। अनुमान है कि उसकी कुल लंबाई लगभग एक मीटर रही होगी। तुलना करें तो आज अधिकांश बिच्छू 5 से 15 सेंटीमीटर लंबे यानी उससे करीब 10 गुना छोटे होते हैं और बहुत कम प्रजातियां 20 सेंटीमीटर तक पहुंचती हैं। अर्थात यह प्राचीन बिच्छू (ancient scorpion) अपने आधुनिक रिश्तेदारों से कई गुना बड़ा था।

जीवाश्म आखिर होते क्या हैं?

जब कोई जीव मर जाता है तो सामान्यतः उसका शरीर समय के साथ नष्ट हो जाता है। लेकिन यदि वह विशेष परिस्थितियों में मिट्टी, रेत या तलछट के नीचे दब जाए तो लाखों-करोड़ों वर्षों में उसके अवशेष चट्टानों का हिस्सा बन सकते हैं। इन्हीं संरक्षित अवशेषों को जीवाश्म (fossil) कहते है। इनमें कभी हड्डियां बचती हैं, कभी दांत, कभी पंजे, तो कभी केवल शरीर की छाप। कई बार मूल जैविक पदार्थ पूरी तरह नष्ट हो जाता है और उसकी जगह खनिज भर जाते हैं। वैज्ञानिक इन्हीं जीवाश्मों के अध्ययन से पृथ्वी के अतीत की कहानी समझने की कोशिश करते हैं।

यह वाकई ज़मीन पर रहता था?

यही सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। आज के बिच्छू पूरी तरह स्थलीय जीव हैं, लेकिन इस प्राचीन जीव के शरीर की बनावट बताती है कि वह संभवत: पूरी तरह ज़मीन पर नहीं रहता था। वैज्ञानिकों के अनुसार उसका जीवन उथले समुद्रों, ज्वारीय मैदानों, दलदली तटों और पानी से लगे क्षेत्रों में बीतता होगा। संभव है कि वह पानी में शिकार करता हो और समय-समय पर ज़मीन पर भी निकल आता हो। यही कारण है कि इसे समुद्री जीवन से स्थलीय जीवन की ओर बढ़ते आर्थ्रोपोडों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि (ancient representative) माना जा रहा है।

क्या इसमें विष वाला डंक था?

यह प्रश्न स्वाभाविक है। जीवाश्मों से यह तो स्पष्ट होता है कि इसकी शारीरिक बनावट आधुनिक बिच्छुओं से मिलती-जुलती थी। संभव है कि इसकी पूंछ के अंतिम भाग में डंक भी रहा हो। लेकिन जीवाश्मों में विष संरक्षित नहीं रहता, इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनमें विष भी था या नहीं। यदि विष (venom) था तो वह कितना शक्तिशाली था या क्या वह आज के बिच्छुओं जैसा ही था। वैसे उसके विशाल पंजे ही इतने मज़बूत रहे होंगे कि छोटे जीवों के लिए उससे बच पाना आसान नहीं रहा होगा।

उम्र कैसे पता की?

जब कोई कहता है कि कोई जीव 43 करोड़ वर्ष पुराना है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतनी सटीक उम्र कैसे पता चलती है? वैज्ञानिक सबसे पहले उस चट्टान की परत का अध्ययन करते हैं जिसमें जीवाश्म मिला है। पृथ्वी की चट्टानों की परतें समय के क्रम में बनती हैं। प्रत्येक परत में मिलने वाले जीवाश्म और आसपास की भूवैज्ञानिक संरचनाएं उसकी आयु का संकेत देती हैं। यदि आसपास ज्वालामुखीय चट्टानें हों तो उनमें मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय की दर के आधार पर और भी सटीक आयु निर्धारित की जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया को रेडियोमेट्रिक डेटिंग (radiometric dating) कहते हैं।

बिच्छू इतना विशाल कैसे हुआ?

यही वह जिज्ञासा है जिसने वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित किया है। काफी समय तक यह माना जाता रहा कि प्राचीन काल में विशाल कीटों और आर्थ्रोपोडों का विकास वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने के कारण हुआ था। कार्बोनिफेरस काल (करीब 35.8 करोड़ से 29.8 करोड़ वर्ष पूर्व) (carboniferous period) में ड्रैगनफ्लाई जैसे कई विशाल कीट पाए जाते थे, जिनके पंख लगभग 70 सेंटीमीटर तक फैलते थे। लेकिन यह नया जीव तो उनसे भी पहले का है। उस समय वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बाद के युगों जितना अधिक नहीं था। इसका अर्थ है कि विशाल आकार का श्रेय केवल ऑक्सीजन को नहीं दिया जा सकता। संभव है कि उस समय बड़े शिकारी कम रहे हों, भोजन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहा हो या फिर उस समय की पारिस्थितिकी बड़े शरीर के लिए लाभकारी रही हो। यह भी संभव है कि समुद्र और ज़मीन के बीच रहने वाली जीवनशैली ने उसके विशाल आकार के विकास में भूमिका निभाई हो।

आज के बिच्छू इतने बड़े होंगे?

इसका उत्तर लगभग ‘नहीं’ है। क्योंकि, आज पृथ्वी का वातावरण, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बदल चुका है। जंगल विकसित हो चुके हैं, असंख्य शिकारी जीव मौजूद हैं और प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक है। बड़े शरीर को बनाए रखने के लिए बहुत अधिक भोजन और ऊर्जा की ज़रूरत होती है। बदलते पर्यावरण में छोटे आकार वाले बिच्छू अधिक सफल साबित हुए होंगे। प्राकृतिक चयन (natural selection) ने धीरे-धीरे ऐसी शारीरिक संरचना को बढ़ावा दिया होगा जो कम संसाधनों में भी जीवित रह सके। यही कारण है कि आज हमें विशालकाय बिच्छू नहीं दिखाई देते।

पृथ्वी की अधूरी कहानी

हर जीवाश्म समय की बंद किताब का खुला हुआ एक पन्ना होता है। जितने नए जीवाश्म मिलते हैं, पृथ्वी के इतिहास (earth history) की तस्वीर उतनी ही स्पष्ट होती जाती है। एक समय था जब वैज्ञानिक मानते थे कि विशाल आर्थ्रोपोड केवल बाद के युगों में विकसित हुए। अब यह नई खोज बताती है कि प्रकृति ने अपने प्रयोग बहुत पहले ही शुरू कर दिए थे। संभव है कि आने वाले वर्षों में ऐसे और जीवाश्म सामने आएं, जो यह साबित कर दें कि जीवन का विकास हमारी कल्पना से कहीं अधिक विविध, कहीं अधिक जटिल और आश्चर्यजनक रहा है।

जब अगली बार आप किसी छोटे-से बिच्छू को देखें, तो एक पल के लिए 43 करोड़ वर्ष पीछे की पृथ्वी की कल्पना करें। उसी वीरान दुनिया में एक मीटर का बिच्छू आत्मविश्वास के साथ  निडर विचरण कर रहा था। यही विज्ञान की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह हमें बताता है कि पृथ्वी का अतीत किसी रहस्यमयी (planet’s secrets) कथा से कम रोमांचक नहीं था, और उसकी कहानी अभी भी पूरी तरह लिखी जानी बाकी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शहरों में हरियाली के लिए पेड़ सोच-समझकर चुनें

म सबने मनुष्य की सहूलियत के लिए बड़े से लेकर छोटे शहरों को तेज़ी से क्रॉन्कीट के जंगलों (concrete forests) में तब्दील होते देखा है। पहले तो शहरों के और फिर शहरों के आसपास के खेतों और जंगलों में नैसर्गिक रूप से लगे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई हुई और उनकी जगह इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर ने ले ली।

जब गर्माती दुनिया और बदलती जलवायु की समस्या ने पैर पसारे तो वनीकरण, वृक्षारोपण और शहरी हरितीकरण (green cities) के प्रयास शुरू हुए। शहरों को हरा-भरा करने के एक प्रयास में शहरों में सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों में लगाने के लिए ऐसे पेड़-पौधे चुन लिए जाते हैं जो तेज़ी से बड़े हो सकें; इससे शहर में जल्द हरियाली दिखने लगती है। लेकिन इस तरह के पेड़ों के चुनाव के अपने जोखिम हैं। वनीकरण और हरितीकरण के लिए कुछ पेड़-पौधों को चुनने से जैव-विविधता में कमी का जोखिम तो है ही, लेकिन एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये पेड़-पौधे वायु प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

पेड़ की वायु प्रदूषण में भूमिका, यह बात सुनकर हैरत हो सकती है। लेकिन कुछ पेड़ों से प्रकाश संश्लेषण के समय उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) (Volatile organic compounds) और वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड्स की अभिक्रिया से ओज़ोन बनती है। वायुमंडल की निचली परतों में ओज़ोन  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इससे श्वास नली में सूजन, दमा और फेफड़ों सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।

यहां गौरतलब बात यह है कि पेड़ों से उत्सर्जित VOC खुद वायु प्रदूषण (air pollution) में योगदान नहीं देते हैं, बल्कि जब ये मनुष्य की गतिविधियों के चलते उत्सर्जित होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) से अभिक्रिया करते हैं, तब वे हानिकारक ओज़ोन बनाते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि VOCs महज़ वनस्पतियों द्वारा उत्सर्जित नहीं होते, मनुष्य द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तमाम खुशबूदार चीज़ों, जीवाश्म ईंधनों, रसायन उद्योग वगैरह भी VOC उत्सर्जन का कारण हैं।

चीन की जिनान युनिवर्सिटी के वायुमंडल रसायन विज्ञानी बिन युआन ओज़ोन प्रदूषण (ozone pollution) पर मानवीय गतिविधियों के असर समझने की कोशिश रहे थे, तभी कुछ आंकड़ों ने उन्हें चौंकाया – उन्होंने पाया कि शहरी पेड़-पौधे ओज़ोन उत्सर्जन में पूर्व-अनुमानित स्तर से कहीं ज़्यादा योगदान दे रहे थे। इन आंकड़ों ने उन्हें आगे अध्ययन को उकसाया।

यह तो मालूम था कि कई वनस्पति प्रजातियां VOCs उत्सर्जित करती हैं, और कुछ प्रजातियां अन्य की तुलना में ज़्यादा VOCs उत्सर्जित करती हैं। इन प्रजातियों में वीपिंग विलो (Salix babylonica) और पॉपलर (Populus वंश) के पेड़ शामिल हैं। ये पेड़ आजकल शहरों को जल्दी हरा-भरा बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, खासकर चीन के शहरों में। भारत के शहरी बगीचों और सड़कों के किनारे भी आजकल वीपिंग विलो (weeping willow) काफी दिखाई देते हैं, और पॉपलर के पेड़ व्यावसायिक दृष्टि से शहरों के बाहर काफी लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में आइसोप्रीन (isoprene) नामक यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो एक प्रकार का VOC है और प्रकाश संश्लेषण के उप-उत्पाद के रूप में बनता है।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन चीन के बीज़िंग शहर पर केंद्रित किया। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बीजिंग शहर की हवा के नमूने लिए, साथ ही शहर के आसपास के निगरानी केंद्रों से ओज़ोन सम्बंधी डैटा लिया। उन्होंने पाया कि मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच बीजिंग में कुल VOC उत्सर्जन में पेड़-पौधों का योगदान लगभग 10 प्रतिशत था, बाकी हिस्सा मानवीय गतिविधियों (Human practices) से आया था।

उन्होंने 24 अन्य बड़े शहरों में लगाए गए पेड़ों की प्रजातियों का भी अध्ययन किया ताकि उनके द्वारा होने वाले संभावित आइसोप्रीन उत्सर्जन (emissions) का अंदाज़ मिल सके। पाया गया कि बीजिंग में लगभग 35 प्रतिशत पेड़ ऐसे हैं जो आइसोप्रीन उत्सर्जन करते हैं। और तो और सिडनी, मेलबर्न समेत ज़्यादातर शहरों में आइसोप्रीन का उत्सर्जन बीजिंग से भी ज़्यादा है। मसलन सिडनी में लगभग 65 प्रतिशत पेड़ आइसोप्रीन उत्सर्जन करने वाले हैं।

चूंकि VOC सीधे ओज़ोन नहीं बनाते हैं, इसलिए शहर के ओज़ोन प्रदूषण में पेड़-पौधों के योगदान का आकलन करने के लिए उन्होंने एक तरीका अपनाया। उन्होंने देखा कि वातावरण में VOCs कितनी तेज़ी से हाइड्रॉक्सिल मूलकों के साथ अभिक्रिया करते हैं। दरअसल, हाइड्रॉक्सिल VOCs के साथ अभिक्रिया करके पेरोक्सी रेडिकल (peroxy radicle) बनाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके ऐसे यौगिक बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश में ओज़ोन में बदल जाते हैं। पाया गया कि ओज़ोन बनाने वाले रसायन में 52 प्रतिशत हिस्सा पेड़-पौधों का था, आइसोप्रीन मुख्य योगदानकर्ता था।

हालांकि मानवीय गतिविधियों से होने वाला कुल VOC उत्सर्जन पेड़-पौधों से होने वाले उत्सर्जन से ज़्यादा था, लेकिन ओज़ोन बनने में उनका योगदान पेड़-पौधों की तुलना में कम था।

यह तो जानी-मानी बात है कि तापमान बढ़ने के साथ VOCs और ओज़ोन का उत्पादन बढ़ता है। पाया गया कि 35 डिग्री सेल्सियस पर VOCs के साथ हाइड्रॉक्सिल की अभिक्रिया दर 20 डिग्री सेल्सियस की तुलना में सात गुना ज़्यादा थी।

शोधकर्ताओं ने बीजिंग के शहरी गर्म टापू प्रभाव (शहरी इलाकों का आसपास के इलाकों की तुलना में ज़्यादा गर्म होना) पर भी विचार किया। अनुमान है कि गर्मियों में दिन के समय, जब अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस होता है, तब शहर में 0.8 डिग्री सेल्सियस की अधिकता आइसोप्रीन उत्सर्जन को 12 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यानी गर्माती पृथ्वी (global warming) शहरी पेड़-पौधों से होने वाले VOC उत्सर्जन को और भी बढ़ा सकती है।

यहां सचेत रहने वाली कुछ बातें हैं। एक यह कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में VOC उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है, जिसे थामने की ज़रूरत है। साथ ही साथ NOx उत्सर्जन को कम करने की भी ज़रूरत है क्योंकि VOC और इनकी आपसी अभिक्रिया से ही ओज़ोन बनती है – NOx के बिना VOCs ओज़ोन प्रदूषण में योगदान नहीं दे सकते।

दूसरा यह कि साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित अध्ययन के इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हमें पेड़ नहीं लगाने चाहिए। पेड़ों के कई फायदे हैं, जिन्हें यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं लगती। ज़रूरत है कि शहरों का हरितीकरण करते समय शहरों और जलवायु के अनुकूल (climate adaptive trees) पेड़-पौधे चुने जाएं।

वैसे भारत के संदर्भ में भी VOC उत्सर्जक पेड़ों के असर को मापना दिलचस्प होगा क्योंकि यहां के शहरों में भी वीपिंग विलो अब काफी देखने को मिलते हैं, और पॉपलर के पेड़ों को उनके व्यवसायिक उपयोग के लिए शहरों के बाहर लगाया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

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जंतु संग्रहालयों के मददगार मांसभक्षी कृमि

जंतु संग्रहालयों के प्रबंधकों के सामने एक बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें प्रदर्शन के लिए मिले कंकालों की सफाई करना होती है क्योंकि इन कंकालों पर मांस चिपका होता है। फिलहाल कई संग्रहालयों (museums) में कंकालों पर से मांस साफ करने के लिए विभिन्न रसायनों या एंज़ाइमों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके महंगे होने के अलावा पर्यावरण के लिए हानिकारक भी हो सकते हैं, और कई बार कंकाल को क्षति पहुंचाते हैं।

कुछ संग्रहालयों में इस काम के लिए डर्मेस्टिड भृंग (dermestid beetle) छोड़ दिए जाते हैं ताकि वे कंकालों पर चिपका मांस चट कर जाएं। लेकिन इन भृंगों के समूहों को कैद करके रखना होता है क्योंकि इनमें जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं के कीट होते हैं। यदि वयस्क कीट कंकाल पर अपने अंडे छोड़ दें या खुद कैद से निकल भागें तो वे अन्य नमूनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

अब इस मामले में कृमि उनकी मदद करने वाले हैं। स्टुटगार्ड के स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निलूफर अलाई कहकी विचार कर रही थीं कि ऐसे कौन-से अन्य कीट हो सकते हैं जो इस काम में मदद कर सकें। उनकी टीम के दिमाग में सुपरकृमियों (superworms) का विचार कौंधा।

सुपरकृमि वास्तव में कीट नहीं हैं बल्कि भृंग (Zophobas atratus) की इल्लियां हैं। ये आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि इनका उपयोग पालतू सरिसृपों, उभयचरों, मछलियों और पक्षियों के भोजन के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि जब ये बड़े-बड़े समूहों में होते हैं तो प्यूपा में परिवर्तित नहीं होते। अर्थात इनमें से वयस्क कीट नहीं बनते यानी इनके भाग निकलने की संभावना भी नहीं होती। शोधकर्ताओं ने इस विचार को परखा।

उन्होंने अलग-अलग साइज़ और प्रजातियों के विभिन्न मृत जानवरों (dead animals) पर इन्हें छुट्टा छोड़ दिया। पहले तो उन्होंने प्रत्येक मृत जानवर की चमड़ी हटाई और उसके सारे अंग निकल दिए। बड़े जानवरों के ऊतकों को मुलायम करने के लिए उन्हें उबाला गया। इसके बाद इन शवों को एक डिब्बे में रखकर सैकड़ों इल्लियां (सुपरकृमि) डाल दिए गए।

इल्लियों के झुंड ने छोटे जानवरों का मांस तो घंटों में साफ कर दिया, पर बड़े जानवरों के लिए उन्हें एक-दो दिन लगे। और तो और, बड़े जानवरों  की सफाई (skeleton cleaning) के लिए हर आठ घंटे में नई और भूखी इल्लियां डालनी पड़ी। यदि इल्लियों की संख्या बहुत ज़्यादा रही तो उन्होंने छोटे जानवरों की हड्डियां भी चबा डालीं। हां, बड़े जानवरों की हड्डियां सलामत रहीं। कई सारे प्रयोगों के बाद टीम का निष्कर्ष है कि जानवर के प्रति ग्राम शव के लिए 10-15 ग्राम इल्लियां उपयुक्त होती हैं।

वैसे कई संग्रहालय प्रबंधकों का कहना है कि सुपरकृमियों को पालना भोजन वगैरह की दृष्टि से थोड़ा मुश्किल होगा। इसके अलावा इनके नए कीट तैयार करने के लिए (worm rearing) इल्लियों को झुंड से अलग करके रखना होगा। दूसरी ओर, कहकी का मत है कि इन्हें साधारण परिस्थितियों में रखा जा सकता है जबकि डर्मेस्टिड कीटों के लिए संग्रहालय में एक अलग प्रयोगशाला ही बनानी पड़ती है। तो अब कई संग्रहालयों में इनके उपयोग को परखने की बारी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कई टांगों वाले समुद्री कीट!

ह टांगें, दो एंटीना और तीन खंडों में बंटा शरीर – यह किसी भी कीट (insect) की बुनियादी पहचान मानी जाती है। लेकिन क्या धरती पर प्रकट हुए शुरुआती कीट भी बिलकुल ऐसे ही थे?

जैव विकास के सिद्धांतों के मुताबिक, पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत समुद्र से हुई और धीरे-धीरे जीव ज़मीन पर आ बसे। माना जाता है कि कीटों के पूर्वज  समुद्री जीव क्रस्टेशियन (जैसे झींगा और क्रिल) (crustacean) थे, लेकिन वे समुद्र से निकलकर ज़मीनी जीव कैसे बने यह सवाल अनसुलझा ही था। अब नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने कीटों की उत्पत्ति के राज़ उजागर किए हैं।  

लगभग पांच वर्ष पहले, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जीवाश्म वैज्ञानिक एरिक टिहेल्का का ध्यान 32.4 करोड़ साल पुराने एक जीवा श्म के रेखाचित्र (fossil sketch) पर गया। यह 1985 में टेक्सास के टेसनस फॉर्मेशन से मिले एक जीवाश्म का रेखाचित्र था। उस समय वैज्ञानिकों ने इसे किसी क्रस्टेशियन (झींगा प्रजाति) का शिशु माना था और सैन डिएगो नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में रख दिया था।

लेकिन जब टिहेल्का की टीम ने ध्रुवीकृत प्रकाश (polarized light) तकनीक से इसका पुनरावलोकन किया, तो कई अनदेखे तथ्य उभरे। उन्होंने पाया कि इस जीव में कीट और क्रस्टेशियन दोनों के गुण थे।

बारीकी से निरीक्षण में उन्होंने पाया कि जीव के बीच वाले हिस्से में कीटों की तरह छह टांगें, सिर पर दो एंटीना, शरीर के पिछले भाग में 11 खंडों वाला पिछला भाग था और तंतुनुमा पूंछ तथा अंडे देने की नली थी। इसके अलावा पिछले भाग पर क्रस्टेशियन जीवों की तरह ढेरों चप्पू जैसी टांगें भी थीं। शोधकर्ताओं ने इस नए जीव का नाम चोशा प्रेकर्सर (Chosha praecursor) रखा है।

वैज्ञानिकों की यह राय रही है कि कीटों के पूर्वज समुद्री क्रस्टेशियन थे। यह नया जीवाश्म स्पष्ट संकेत देता है कि ये जीव अचानक ज़मीन पर आने के बजाय जल-थल दोनों जगह (semi-aquatic) विचरते होंगे। अनुमान है कि चप्पूनुमा टांगें इसे पानी में तैरने या गलफड़ों की तरह सांस लेने में मदद करती होंगी।

इसके बाद टिहेल्का की टीम ने स्कॉटलैंड और इलिनॉय से मिले ऐसे ही तीन रहस्यमयी जीवाश्मों का भी अध्ययन किया। इनमें से स्कॉटलैंड का जीवाश्म करीब 40.5 करोड़ साल पुराना था (जिसे कनखजूरा या गोजर का रिश्तेदार माना जाता था) (millipede), जबकि इलिनॉय के दो जीवाश्म करीब 30 करोड़ साल पुराने थे, जिनके उदर पर भी टांगों जैसी संरचनाएं थी। इन चारों जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि शुरुआती पंखहीन कीटों (wingless insects) के शरीर की बनावट और टांगों की संख्या में काफी विविधता थी। 

गौरतलब, विकासक्रम में कई टांगों वाले ये शुरुआती जीव विलुप्त (extinct) होते गए। लेकिन इनकी एक शाखा में केवल छह टांगें बची रहीं और उसी से आधुनिक भृंग, मधुमक्खियों, तितलियों का विकास हुआ।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन कीटों की उत्पत्ति और उनके क्रमिक विकास (insect evolution) की हमारी पुरानी समझ को बदल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंतरिक्ष यात्री कमज़ोर क्यों हो जाते हैं?

ह तो देखा गया है कि जब अंतरिक्ष यात्री लंबी अंतरिक्ष यात्रा (space travel) के बाद धरती पर लौटते हैं तो उनके शरीर में कमज़ोरी के लक्षण दिखाई देते हैं। अब शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि इसकी वजह यह है कि अंतरिक्ष के कम गुरुत्वाकर्षण (gravity) के असर से माइटोकॉण्ड्रिया के कामकाज में क्षीणता आती है। माइटोकॉण्ड्रिया समस्त जीवों की कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जो उन्हें ऊर्जा मुहैया कराता है। वैसे यह बात तो पूर्व में अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में भेजे गए कई चूहों और कोशिकाओं के अध्ययन से पता थी कि अल्प गुरुत्व की परिस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इस क्षति की क्रियाविधि क्या है। अब जापान के नेशनल साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (राइकेन) के आणविक जीव वैज्ञानिक शिनतारो इवासाकी की टीम ने इसका और बारीकी से अध्ययन किया है। इसमें उन्होंने राइबोसोम पर ध्यान दिया।

कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण तीन चरणों में होता है। सबसे पहले आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) के आधार पर एक अन्य अणु आरएनए बनाया जाता है। आरएनए कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम (ribosome) से जुड़ जाता है। फिर राइबोसोम से आरएनए के खंड कोशिका द्रव्य में से उपयुक्त अमीनो अम्लों को लाकर राइबोसोम पर सही क्रम में जमाते हैं और इन अमीनो अम्लों को जोड़कर प्रोटीन बनता है। इवासाकी देखना चाहते थे कि कम या शून्य गुरुत्व (zero gravity) का राइबोसोम के कामकाज पर क्या असर होता है।

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर कुछ कोशिकाएं 24 या 48 घंटों तक संवर्धित कीं और उन्हें फ्रीज़ कर दिया। साथ ही साथ, कुछ कोशिकाओं को सेंट्रीफ्यूज में रखकर संवर्धित किया। सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) लगभग धरती जैसी गुरुत्व परिस्थिति बनाता है।

जब सारे नमूनों का धरती पर लाकर विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन कोशिकाओं को अल्प-गुरुत्व में रखा गया था उनमें सेंट्रीफ्यूज में रखी कोशिकाओं की अपेक्षा माइटोकॉण्ड्रियल एम-आरएनए (mitochondrial m-RNA) कण कम थे और उनके माइटोकॉण्ड्रिया के राइबोसोम ने कम प्रोटीन बनाए थे।

इसी प्रकार के असर एक कृमि सी. एलेगेन्स पर देखे गए। ऐसे कुछ कृमियों को अंतरिक्ष स्टेशन के अल्प गुरुत्व में चार दिन रखा गया था जबकि कुछ को सेंट्रीफ्यूज में पाला गया था।

इवासाकी की टीम ने ऐसे ही कुछ प्रयोग धरती की एक प्रयोगशाला में किए थे। इसके लिए उन्होंने क्लिनोस्टेट नाम के उपकरण का इस्तेमाल किया था, जो अल्प-गुरुत्व की परिस्थिति पैदा करता है। जब मानव कोशिकाओं को 24 घंटे क्लिनोस्टेट (clinostat) में रखा गया तो उनमें 13 प्रोटीन का उत्पादन कम हुआ। 48 घंटे और 72 घंटे रखने पर तो माइटोकॉण्ड्रियल प्रोटीन्स का उत्पादन और भी कम हुआ।

इस असर की एक क्रियाविधि भी सुझाई गई है कि गुरुत्वाकर्षण के चलते कोशिकाएं के आपस में चिपकने के ज़रिए माइटोकॉण्ड्रिया पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण शून्य कर दिया जाए, तो यह असर भी क्षीण हो जाता है और प्रोटीन (protein) उत्पादन कम हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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