सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव

भाग – 2

डॉ. किशोर पंवार, डॉ. सुशील जोशी

लेख के पहले भाग में हमने जीव वैज्ञानिक शोध में मॉडल जीव सी. एलेगेन्स (C. elegans) के योगदान के कुछ पहलू देखे। दूसरे भाग में चर्चा कुछ और पहलुओं पर…

नींद

सी. एलेगेन्स संभवत: सबसे सरल (आदिम) जंतु है जिसमें नींद जैसी अवस्था (sleep-like state) देखी गई है। यह जंतु हर निर्मोचन (moulting) से पहले एक सुस्त हालत में जाता है। यह भी दर्शाया गया है कि सी. एलेगेन्स शारीरिक तनाव, गर्मी के आघात, पराबैंगनी विकिरण और बैक्टीरिया-जनित टॉक्सिन से संपर्क के बाद भी नींद में चला जाता है।

संवेदनाएं

इस कृमि के पास आंखें तो नहीं होतीं लेकिन यह प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। इसका कारण एक प्रकाश संवेदी प्रोटीन (LITE-1) की उपस्थिति है और यह प्रकाश संवेदी प्रोटीन जंतुओं में पाए जाने वाले अन्य प्रकाश-संवेदी रंजकों (ऑप्सिन तथा क्रिप्टोक्रोम) की तुलना में 10-100 गुना अधिक कुशलता से प्रकाश अवशोषित करता है।

सी. एलेगेन्स त्वरण को सहन करने में भी असाधारण है – यह 4,00,000 गुरुत्व के सेंट्रीफ्यूज (hypergravity) (40,000 घूर्णन प्रति मिनट) में रखकर घुमाने पर भी अप्रभावित रहता है।

सी. एलेगेन्स के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि भ्रूणावस्था के उपरांत कोशिकाओं का प्रवास बहुत कम होता है और जो प्रवास होता है वह पूर्वानुमान के योग्य (predictable cell migration) होता है। परिणाम यह होता है कि विभिन्न अलग-अलग कृमियों में कोई विशिष्ट कोशिका उसी स्थान पर पाई जाएगी और उन्हीं कोशिकाओं के साथ सीधे संपर्क में रहेगी।

यह तंत्रिका तंत्र का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। किसी वयस्क उभयलिंगी कृमि में 302 तंत्रिका कोशिकाएं (neurons) होती हैं और साथ में 56 ग्लियल कोशिकाएं (glial cells)। विभिन्न तकनीकों की मदद से सी. एलेगेन्स के पूरे तंत्रिका तंत्र का मानचित्रण किया जा चुका है। देखा गया है कि शरीर की भित्ती में मोटर (यानी काम को अंजाम देने वाली) तंत्रिकाएं होती हैं। मुंह पर रसायन-संवेदी तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। स्पर्श, प्रकाश, तापमान, नमक व अन्य संवेदनाओं के लिए अलग-अलग तंत्रिकाएं होती हैं। सभी संवेदी तंत्रिकाओं का जुड़ाव मोटर तंत्रिकाओं से होता है।

कुल मिलाकर सोचा गया था कि यह कृमि एक चलती-फिरती नलिका भर है जो मात्र बुनियादी क्रियाओं को पूरा करती होगी – भोजन-ग्रहण, अंडे देना और चलना-फिरना। लेकिन आगे अनुसंधान ने कृमि के व्यवहार (behavioral biology) के कई आयाम उजागर किए। इस संदर्भ में नोबेल विजेता मार्टिन चाफी का काम उल्लेखनीय है। कुछ जंतु एक ग्रीन फ्लोरेसेंट प्रोटीन (GFP – green fluorescent protein) का निर्माण करते हैं जो एक हरी रोशनी उत्सर्जित करता है। इसके निर्माण के लिए ज़िम्मेदार जीन को अन्य जीवों के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। अब GFP जैविक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण औज़ार बन गया है। मार्टिन चाफी ने सी. एलेगेन्स के जीनोम में इस जीन को जोड़ दिया और इस तरह से वे 6 अलग-अलग कोशिकाओं को रंगीन बनाने में सफल रहे। रंगीन हो जाने के कारण इन कोशिकाओं का निरंतर अध्ययन किया जा सकता था। इसकी मदद से वे तंत्रिका कोशिकाओं के विकास का अध्ययन कर पाए थे। इसके अलावा, उनके अनुसंधान ने GFP के सामान्य उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। आजकल सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र को मानव तंत्रिका रोगों (neurological disorders) तथा अन्य विकारों के मॉडल के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इसी के साथ सी. एलेगेन्स की ग्लियल कोशिकाओं के कार्य और कार्यिकी का अध्ययन भी इस दृष्टि से किया जा रहा है तथा तंत्रिकाओं और अन्य कोशिकाओं के बीच सम्बंधों की भी पड़ताल जारी है।

सूक्ष्म तथा हस्तक्षेपी आरएनए

सी. एलेगेन्स के जीवन चक्र में चार एकदम अलग-अलग लार्वा अवस्थाएं होती हैं। हर लार्वा अवस्था तथा वयस्क में बनने वाली क्यूटिकल की संरचना अलग-अलग होती हैं जिसके आधार पर इन्हें पहचाना जा सकता है। कई अलग-अलग ऐसे उत्परिवर्तित (developmental mutants) कृमि तैयार किए गए हैं जो विकास की इन अवस्थाओं के लिहाज़ से थोड़े अलग-अलग होते हैं। जैसे किसी में कोई विकास अवस्था छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं तो किसी में एक ही अवस्था बार-बार दोहराई जाती है। इनके अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त हुए हैं।

उदाहरण के लिए lin-4 नामक जीन में उत्परिवर्तन वाले कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था दोहराई गई जिससे पता चला कि lin-4 द्वारा बनाया गया प्रोटीन प्रथम लार्वा अवस्था से निकलकर द्वितीय लार्वा अवस्था में प्रवेश के लिए ज़रूरी है। दूसरी ओर, lin-14 जीन में उत्परिवर्तन का असर उल्टा हुआ – ऐसे कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था आई ही नहीं, सीधे द्वितीय लार्वा अवस्था आ गई। इससे तो लगता है कि प्रथम लार्वा अवस्था होने के लिए lin-14 द्वारा बनाया जाने वाला प्रोटीन ज़रूरी है। लेकिन… एक बड़ा लेकिन इंतज़ार कर रहा था।

जब इन दोनों जीन्स को क्लोन किया गया तो पता चला कि lin-4 जीन किसी प्रोटीन का कोड करने लायक ही नहीं था। दूसरी ओर lin-14 प्रोटीन का कोड था। दरअसल, lin-4 जीन एक सूक्ष्म आरएनए का कोड पाया गया – शुरू में यह सूक्ष्म आरएनए 70 न्यूक्लियोटाइड लंबा था और अंत में 22 न्यूक्लियोटाइड का रह गया। विश्लेषण से पता चला कि lin-4 द्वारा बनाए गए आरएनए में lin-14 द्वारा बनाए गए मेसेंजर आरएनए के उन हिस्सों के पूरक थे जो अनूदित नहीं किए जाते (यानी ये किसी प्रोटीन का निर्माण नहीं करते)। इस खोज से यह समझ उभरी कि शायद lin-4 एक माइक्रो-आरएनए (microRNA) बनाता है जो lin-14 के प्रतिलेखन को रोक देता है। lin-4 वह पहला जीन था जिसे एक माइक्रो-आरएनए बनाते देखा गया था। आगे चलकर इसी तरह के अन्य माइक्रो-आरएनए पहचाने गए जो किसी जीन के काम को ठप कर देते हैं। मनुष्य के जीनोम में लगभग 1800 ऐसे माइक्रो-आरएनए जीन्स पहचाने जा चुके हैं।

माइक्रो-आरएनए की खोज के साथ आरएनए-हस्तक्षेप (RNAi) को सी. एलेगेन्स में जीन अभिव्यक्ति को रोकने के लिए उपयोग किया गया। वैसे तो RNAi द्वारा जीन की अभिव्यक्ति को रोकने की प्रक्रिया पेटुनिया में देखी गई थी लेकिन इसकी क्रियाविधि को समझकर इसका उपयोग करने की बात सी. एलेगेन्स में ही हुई। एण्ड्र्यू फायर और क्रैग मेलो ने देखा कि सी. एलेगेन्स में डबल-स्ट्रैंडेड आरएनए (डीएसआरएनए) को इंजेक्ट करने से सम्बंधित मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) को नष्ट करके विशिष्ट जीन को शांत किया जा सकता है, जिससे प्रोटीन उत्पादन का दमन हो सकता है। 1998 में की गई इस खोज ने जीन नियमन की हमारी समझ में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया और इसके लिए उन्हें 2006 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

बीमारियों की तहकीकात

शुरुआत में तो माना गया था कि मानव रोगों के अनुसंधान में इस कृमि की भूमिका सीमित ही है। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि मानव जीन्स और जीन्स के विविध संस्करणों को सी. एलेगेन्स के जीनोम में जोड़कर अभिव्यक्त करवाया जा सकता है तो नए आयाम खुल गए। उदाहरण के लिए, kindlin-1 जीन को देखते हैं। सी. एलेगेन्स में इसके समजातीय जीन से जो प्रोटीन बनता है वह इन्टेग्रिन (integrin signaling) से अंतर्क्रिया करता है। इस खोज के बाद मनुष्यों में इसी प्रकार की रोग प्रक्रिया की खोज की गई। इंटेग्रिन कोशिका संवाद में अहम भूमिका निभाते हैं और इनमें गड़बड़ी कई रोगों का कारण बन सकती है।

इसी प्रकार से मनुष्यों में एक जीन होता है presenilin-1 जिसे अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease) से जुड़ा माना जाता है। जब इसे सी. एलेगेन्स में अभिव्यक्त करवाया गया तो पता चला कि इसकी वजह से तापमान संवेदी गति में बाधा आई।

हाल ही में शोधकर्ता ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम दिक्कत (autism spectrum disorder) को समझने के लिए सी. एलेगेन्स में समजातीय जीन्स पहचानने का प्रयास कर रहे हैं। सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र (neural circuits) को भलीभांति समझा जा चुका है। इसके अलावा इस कृमि में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़े कई समजातीय जीन्स भी हैं। हालाकि कृमि में ऑटिज़्म संपूर्ण रूप में तो प्रकट नहीं होता लेकिन कई खोजबीन इसकी मदद से संभव हैं। एक तो किसी जेनेटिक उत्परिवर्तन का असर इसकी तंत्रिकाओं के कामकाज और कृमि के व्यवहार पर देखा जा सकता है। इस तरह के अध्ययनों से ऑटिज़्म के मूल में उपस्थित क्रियाविधियों को समझने में मदद मिलती है।

उदाहरण के लिए शोधकर्ताओं ने सायनेप्स (तंत्रिकाओं के बीच जुड़ाव) निर्माण व कामकाज के लिए ज़रूरी जीन्स का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश की है कि उनका ऑटिज़्म-सम्बंधी व्यवहार की असामान्यताओं से क्या सम्बंध है। वैसे तो सी. एलेगेन्स एक सरल जीव है लेकिन यह सामाजिक व्यवहार का प्रदर्शन करता है – जैसे भोजन के कारण झुंड बनाना। शोधकर्ता जेनेटिक उत्परिवर्तन और कृमि के इस व्यवहार में परिवर्तन के सम्बंध का अध्ययन करते हैं। चूंकि इस कृमि में ट्रांसजेनेसिस आसान है, इसलिए इस तरह के कई अध्ययन किए जा रहे हैं। 

औषधि अनुसंधान

छोटा जीनोम और छोटे जीवन चक्र की वजह से यह बहुकोशिकीय जीव जंतुओं में औषधियों और विषों की तेज़ी से छंटनी (drug screening) करने का उम्दा मॉडल है। सी. एलेगेन्स में मानव रोगों के समजातीय जीन देखे जाते हैं। इसलिए यह वर्तमान में स्वीकृत दवाइयों के नए उपयोग (drug repurposing) खोजने में मदद कर सकता है।

अंतरिक्ष में उड़ान

सी. एलेगेन्स तब सुर्खियों में आया था जब 2003 में कोलंबिया स्पेस शटल हादसे के बाद भी यह जीवित मिला था। बाद में 2009 में घोषणा हुई थी कि सी. एलेगेन्स अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (space station) पर दो सप्ताह बिता रहा था। इसे वहां भेजा गया था ताकि शून्य गुरुत्वाकर्षण (microgravity) का असर मांसपेशियों के विकास और अन्य शरीर क्रियाओं पर परखा जा सके। इस अनुसंधान का सम्बंध प्रमुख रूप से अंतरिक्ष उड़ान, बिस्तर पर पड़े रहने, बुढ़ापे और मधुमेह के कारण मांसपेशीय विकारों को समझना था। कोलंबिया शटल के मुसाफिर कृमियों के वंशजों को बाद में एंडेवर यान में भेजा गया था। ऐसे कई अंतरिक्ष प्रयोगों का निष्कर्ष था कि मांसपेशियों और हड्डियों के जुड़ावों को प्रभावित करने वाले जीन्स अंतरिक्ष में कम अभिव्यक्त होते हैं। अलबत्ता, यह पता नहीं चल पाया है कि इसका मांसपेशियों की ताकत पर क्या असर होता है। 

जेनेटिक्स

सी. एलेगेन्स के जीनोम में करीब 20,470 ऐसे जीन्स होते हैं जो किसी न किसी प्रोटीन का कोड (protein-coding genes) हैं। इनमें से 35 प्रतिशत जीन्स मानव होमोलॉग्स (human homologs) (समजातीय) हैं। समजातीय जीन विभिन्न प्रजातियों में पाए जाने वाले ऐसे जीन होते हैं जो एक सामान्य पूर्वज जीन से विकसित होते हैं। उनके डीएनए अनुक्रम में काफी हद तक समानता होती है और अक्सर उनके कार्य भी सम्बंधित होते हैं। और यह कई बार दर्शाया जा चुका है कि यदि मानव जीन्स को सी. एलेगेन्स में डाला जाए तो वे अपने समजातीय जीन्स का स्थान ले लेते हैं। इसके विपरीत सी. एलेगेन्स के कई जीन्स स्तनधारी जीन्स के समान कार्य कर सकते हैं।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि गोल कृमि सी. एलेगेन्स ने जीव विज्ञान की कई गुत्थियों को सुलझाने में मदद की है और पिक्चर अभी बाकी है। लेकिन एक बात पर कुछ कहना मुनासिब है। वह है सी. एलेगेन्स को तमाम जीव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए एक मॉडल बनाने के प्रयास।

सिडनी ब्रेनर से शुरू करके सी. एलेगेन्स पर काम करने वाले शोधकर्ताओं का एक समुदाय विकसित होता गया, जो स्वयं को कृमि-जन (worm-people) कहते हैं। इस समुदाय की एक विशेषता इसका सहयोगी रवैया और खुलापन रहा है। अपनी खोज को एक-दूसरे से साझा करना, नए शोधकर्ताओं को हर तरह से मदद करना (चाहे सामग्री उपलब्ध करवाकर या कामकाज में मदद देकर), समय-समय पर मिलकर विचार-विमर्श करना इस समुदाय के व्यवहार में शुमार रहा है।

1975 से ही यह समूह एक छमाही वर्म ब्रीडर्स गज़ट (Worm Breeders’ Gazette) प्रकाशित करता आ रहा है। सी. एलेगेन्स शोध समुदाय हर दो साल में अंतर्राष्ट्रीय कृमि सम्मेलन (International Worm Meeting) आयोजित करता है जहां शोध पत्रों वगैरह के अलावा कृमि सम्बंधी प्रहसन, नृत्य वगैरह प्रस्तुत किए जाते हैं।

एक वर्मबुक प्रकाशित की जाती है जिसमें वर्तमान शोध के विवरण, शोध सम्बंधी सामग्री की उपलब्धता तथा प्रोटोकॉल वगैरह शामिल होते हैं।

अर्थात यह गोलकृमि अनुसंधान की जो संभावनाएं प्रस्तुत करता है, उनको साकार रूप देने में एक कृमि समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार, डॉ. सुशील जोशी

ब वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार (nobel prize) मिलता है, तो वे अमूमन अपने परिवार, सहकर्मियों, अपने विश्वविद्यालय या शोध का वित्तपोषण करने वालों का शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन जब विक्टर एम्ब्रोस (Victor Ambros) और गैरी रुवकुन (Gary Ruvkun) को वर्ष 2024 के कार्यिकी या चिकित्सा विज्ञान नोबेल सम्मान से नवाज़ा गया, तो रुवकुन ने चंद मिनट अपने प्रयोग के जंतु को दिए। वह जंतु है एक नन्हा-सा कृमि सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स  (Caenorhabditis elegans)। इस जंतु को उन्होंने ‘बडास’ की संज्ञा दी, अमरीकी बोलचाल में जिसका मोटे तौर पर मतलब होगा सख्तजान। यह मॉडल जीवों के इतिहास में एक मील का पत्थर था। वैसे इस जंतु पर शोध कार्य के फलस्वरूप 4 नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। और रुवकुन ने ही नहीं, हर वैज्ञानिक ने अपने नोबेल व्याख्यान में इस नन्हे कृमि का शुक्रिया अदा किया है। जैसे 2002 में सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और रॉबर्ट होर्विट्ज़ को अंगों के विकास तथा पूर्व-निर्धारित कोशिका मृत्यु यानी एपोप्टोसिस सम्बंधी खोजों के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। अपने नोबेल व्याख्यान में सिडनी ब्रेनर ने कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार का चौथा विजेता सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स है।”

वेब ऑफ साइन्स (Web of Science) डैटा के अनुसार 1980 से 2023 के बीच सी. एलेगेन्स से सम्बंधित 24,496 पर्चे प्रकाशित हुए। इनमें से यदि समीक्षा पर्चों को हटा दिया जाए, तो भी यह संख्या 20,322 होती है।

कैसा है यह कृमि

यह गोलकृमि (roundworm) मिट्टी में रहने वाला एक सरल जंतु है जो सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ युक्त ज़मीन में पाया जाता है। ऐसी मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया ही इसका भोजन हैं। यह एक पारदर्शी जीव (transparent organism) है और यही इसकी एक खासियत है जो इसे एक मॉडल जीव बनाती है। 1900 में एमील मौपस ने इस प्रजाति को खोजा था और नाम रखा था रैबडायटिस एलेगेन्स। 1955 में एल्सवर्थ डोगर्टी ने इसे जीनस अर्थात वंश का दर्जा दिया और यह सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स (सी. एलेगेन्स) हो गया।

मात्र 1 मिलीमीटर लंबाई वाले इस कृमि के दो लैंगिक रूप होते हैं – उभयलिंगी और नर। उभयलिंगी के शरीर में कुल जमा 959 कायिक कोशिकाएं होती हैं जबकि नर में 1031 होती हैं। तुलना के लिए देखें कि मनुष्यों में अरबों कोशिकाएं होती हैं। इसका जीवन चक्र (life cycle) मात्र तीन दिन का है – यानी 3 दिन बाद एक नया कृमि पैदा हो जाता है। इसके शरीर में न तो हृदय होता है, न रक्त परिसंचरण तंत्र, और न ही श्वसन तंत्र। शरीर कुल मिलाकर एक मुंह, ग्रसनी (pharynx), और जननांगों से मिलकर बना होता है। ऊपर से पारदर्शी क्यूटिकल का आवरण होता है। इसे प्रयोगशाला में पनपाना-पालना आसान है। यही सरलता इसे जीव विज्ञान का एक बहुमूल्य मॉडल बनाती है।

हालांकि कृमि और मनुष्य कई प्रकार से अलग हैं, फिर भी दोनों प्रजातियों के जीन्स और आणविक मार्गों में काफी समानताएं हैं। यदि आप यह पता लगा लें कि कोई कोशिकीय क्रियाविधि कृमि के विकास के दौरान कैसे काम करती है तो 95 प्रतिशत मामलों में यह इंसानों में भी बिल्कुल उसी तरह काम करेगी। इसका मतलब है कि कृमि पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन से प्राप्त जानकारी, मनुष्यों में बीमारियों और विकास के बारे में समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

चूंकि यह कृमि पारदर्शी है, इसलिए इसमें नाभिकीय प्रवास (nuclear migration) सूक्ष्मदर्शी से जीवित जीव में ही देखा जा सकता है। भ्रूणावस्था में इसकी कोशिकाओं के तेज़ विकास तथा एक-एक कोशिका के अलग-अलग आसान अवलोकन की बदौलत प्रत्येक कोशिका की नियति का मार्ग देखा जा सकता है – इसे कोशिका नियति मानचित्र (cell fate map) कहा जाता है।

सी. एलेगेन्स का सर्वप्रथम अध्ययन तो विक्टर नाइगॉन और एल्सवर्थ डोगर्टी की प्रयोगशाला में 1940 के दशक में किया गया था लेकिन इसे एक मॉडल जंतु का दर्जा दिलवाने का काम 1963 में सिडनी ब्रेनर ने किया था जब उन्होंने इसे परिवर्धन के जीव विज्ञान और जेनेटिक्स के अध्ययन हेतु एक मॉडल के रूप में प्रस्तावित किया। 1974 में ब्रेनर ने जेनेटिक छंटनी के प्रारंभिक परिणाम प्रकाशित किए थे। उन्होंने शरीर रचना व कामकाज की दृष्टि से अलग-अलग सैकड़ों उत्परिवर्तित जंतुओं को पृथक किया था। 1980 के दशक में जॉन सल्स्टन तथा उनके सहकर्मियों ने वयस्क उभयलिंगी की समस्त 959 कायिक कोशिकाओं की कोशिका वंशावली का पूर्ण मानचित्रण किया। इसका अर्थ यह है कि इनमें से प्रत्येक कोशिका का, निषेचित अंडे से लेकर वयस्क तक का, संपूर्ण विकासात्मक इतिहास पता लगाया गया। इसी के साथ पहले-पहले जीन्स का क्लोनिंग किया गया और अंतत: 1998 में यह पहला बहुकोशिकीय जीव बना जिसके पूरे जीनोम का अनुक्रमण (genome sequencing) कर लिया गया था।

प्रारंभिक अनुसंधान

सी. एलेगेन्स का प्रथम विवरण 1900 में एमील मौपस द्वारा दिया गया था। उन्होंने इसे अल्जीरिया में मिट्टी में से हासिल किया था। बहरहाल, शुरुआती शोध कार्य तो इस बात पर केंद्रित रहा था कि इस कृमि का शुद्ध कल्चर (pure culture) तैयार कर लिया जाए, यानी जिसमें किसी अन्य प्रजाति की मिलावट न हो।

ट्रांसजेनेसिस (जीन हस्तांतरण)

ट्रांसजेनेसिस (transgenesis) किसी जीव के जीनोम में पराई आनुवंशिक सामग्री (एक ट्रांसजीन) को शामिल करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप एक ट्रांसजेनिक जीव (transgenic organism) उत्पन्न होता है जो नए जीन को अभिव्यक्त करता है तथा एक संशोधित गुण या विशेषता प्रदर्शित करता है। यह किसी जीन की भूमिका को समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

सी. एलेगेन्स इस प्रक्रिया के लिए सर्वथा अनुकूल है। ट्रांसजेनिक कृमि तैयार करने का सबसे आम तरीका तो यह है कि बाहरी डीएनए को कृमि की एक सिंसिशियल जर्म लाइन में डाला जाए। सिंसिशियल जर्म लाइन वह होती है जिसमें जर्म कोशिकाएं (कोशिकाएं जो युग्मकों में विकसित हो सकती हैं) एक ही कोशिका द्रव्य साझा करती हैं, जिससे एक बहुकेंद्रकीय कोशिका बनती है। यह व्यवस्था विशेष रूप से युग्मक निर्माण की प्रक्रिया के दौरान देखी जाती है। दूसरा तरीका बायोलिस्टिक ट्रांसफॉर्मेशन (biolistic transformation) यानी मनचाहे डीएनए को सीधे लक्षित कोशिका में पहुंचाने का है।

सी. एलेगेन्स में इस प्रक्रिया का उपयोग करके कई महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई हैं।

कोशिका व जंतु की मृत्यु

कोशिकाओं की मृत्यु बहुकोशिकीय जंतु विकास का एक अहम व सामान्य हिस्सा है। ऊतकों को तराशना, अंगों की संरचना का निर्माण, अंगों की साइज़ का नियंत्रण वगैरह स्वाभाविक कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस – apoptosis) से तय होते हैं। जब स्वाभाविक कोशिका मृत्यु की प्रक्रिया गड़बड़ हो जाए, तो कई चीज़ें गड़बड़ा जाती है। मनुष्यों में कई बीमारियों में कोशिका मृत्यु सम्बंधी गड़बड़ियां शामिल होती हैं। इस दृष्टि से कोशिका मृत्यु (पूर्व निर्धारित या असमय) को समझना अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण विषय है।

सी. एलेगेन्स उन कोशिकीय व आणविक प्रक्रियाओं (molecular mechanisms) का खुलासा करने में प्रमुख रहा है जो क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस) का नियंत्रण करती हैं। हालांकि यह परिकल्पना तो बहुत पहले प्रस्तुत हो चुकी थी कि एपोप्टोसिस एक सुनियंत्रित प्रक्रिया है लेकिन कोशिका मृत्यु को नियंत्रित करने वाले कारकों का अध्ययन सर्वप्रथम सी. एलेगेन्स में ही किया गया था (2003)।

सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह था कि एक ही उम्र के कृमियों में कोशिकाओं की संख्या और स्थान लगभग एक जैसे रहते हैं। अर्थात इस जंतु में कोशिकाओं के वंश लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। इस प्रस्ताव में महत्वपूर्ण भूमिका इस बात की थी कि सी. एलेगेन्स की त्वचा का आवरण (क्यूटिकल) पारदर्शी होने की वजह से इसमें कोशिका विभाजन की प्रक्रिया का अध्ययन आसान है। इन प्रयासों की मदद से यह स्पष्ट हुआ कि सी. एलेगेन्स का उभयलिंगी व नर वयस्क तैयार होने के लिए सटीकता से 1090 और 1178 कायिक कोशिकाएं बन जाना ज़रूरी है। सी. एलेगेन्स के व्यवस्थित अध्ययन से एपोप्टोसिस, मृत कोशिका के मलबे को हटाने वगैरह की जटिल क्रियाविधि स्पष्ट हो पाई है। लेकिन हमने ऊपर देखा था कि वयस्क उभयलिंगी में मात्र 959 कोशिकाएं होती हैं। यहीं से एपोप्टोसिस का भान हुआ – एपोप्टोसिस के कारण 131 कोशिकाएं मृत हो जाती हैं, तो बची रहती हैं 959 (1090-131)। यह भी पता चला कि नर में एपोप्टोसिस में 147 कोशिकाएं मारी जाती हैं (1178-147=1031)। इस प्रक्रिया के विभिन्न लक्षण सी. एलेगेन्स में पहचाने गए और इनमें से कई लक्षण स्तनधारी कोशिकाओं में बने रहे हैं।

लेकिन कोशिका मृत्यु से अलग तंत्रगत ध्वंस वह प्रक्रिया है जो जंतु की मृत्यु का कारण बनती है। इस तरह की मृत्यु के कारक भी पहचाने गए हैं और यह भी देखा जा चुका है कि इन कारकों को बाधित करने से क्षय-जन्य मृत्यु को टाला जा सकता है।

प्रत्येक कोशिका के सटीक विकास मार्ग (कोशिका वंशावली) की जानकारी में से जो सबसे महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई, उसका सम्बंध एपोप्टोसिस से है। कोशिकाओं की मृत्यु का अवलोकन तो कई जीवों में किया जा चुका था लेकिन सी. एलेगेन्स की कोशिका वंशावली ने दर्शाया कि एपोप्टोसिस विशिष्ट कोशिकाओं में, विशिष्ट समय पर होता है और यह एक विशिष्ट जैव-रासायनिक प्रक्रिया से संपन्न होता है जो सख्त जेनेटिक नियंत्रण में होती है। और तो और, यह भी स्पष्ट हुआ कि एपोप्टोसिस के लिए ज़िम्मेदार जीन्स जैव-विकास के दौरान जंतुओं में संरक्षित रहे हैं। और एपोप्टोसिस क्रियापथ में गड़बड़ी इंसानों में कई रोगों का कारण बनती है – जैसे, कैंसर, आत्म-प्रतिरक्षा रोग (autoimmune disease) और तंत्रिका-विघटन से सम्बंधित रोग। एपोप्टोसिस क्रिया पथ को कई बार कीमोथेरपी या रेडिएशन के द्वारा सक्रिय किया जाता है। कोशिका वंशावली और एपोप्टोसिस और सी. एलेगेन्स को जेनेटिक विश्लेषण के लिए एक मॉडल जीव के रूप में विकसित करने के शोध कार्य के लिए सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और एच. रॉबर्ट होविट्ज़ को 2002 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

कोशिकाओं में संकेत लेनदेन

सिग्नल ट्रांसडक्शन (signal transduction) वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए कोई भी कोशिका बाह्य संकेत प्राप्त करती है, उसे प्रोसेस करती है और उस पर प्रतिक्रिया देती है। जंतुओं में लगभग सारे सिग्नल ट्रांसडक्शन मार्गों की खोज सी. एलेगेन्स (भ्रूण या उससे आगे की अवस्थाओं) के विभिन्न उत्परिवर्तियों पर अध्ययन के ज़रिए हुई है। मनुष्यों में अधिकांश कैंसर (cancer biology) में पाया गया है कि किसी न किसी सिग्नल ट्रांसडक्शन क्रियापथ में गड़बड़ी होती है। लिहाज़ा, इनकी समझ ने कैंसर जीव विज्ञान में भी काफी योगदान दिया है। हाल में, सी. एलेगेन्स में तंत्रिका संकेतों तथा इंसुलिन संकेतन के मार्गों का भी खुलासा हुआ है, जिसके चलते यह इस तरह के अध्ययनों के लिए आकर्षक मॉडल बन गया है।

बुढ़ाना

अंडा देने के बाद प्रयोगशाला की परिस्थितियों में कृमि का जीवनकाल (lifespan) करीब 14 से 21 दिन का होता है। ऐसे उत्परिवर्तित जंतु खोजे गए हैं जिनका जीवनकाल 50 से 100 प्रतिशत अधिक होता है। साथ ही कृमियों में जीवनकाल को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार कई जीन्स भी पहचाने गए हैं। इनमें से अधिकांश जीन्स विभिन्न जंतुओं में संरक्षित रहे हैं और कुछ जंतुओं के बढ़े हुए जीवनकाल से सम्बंधित भी हैं। मनुष्यों में बुढ़ाना (aging process) एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें लगभग सारे अंग-तंत्र प्रभावित होते हैं। इसलिए शुरू-शुरू में यह एक आश्चर्यजनक खोज थी कि विविध जंतुओं में बुढ़ाने की जैविक प्रक्रिया काफी एक समान है जबकि उनके जीवन काल में काफी अंतर होते हैं।

सी. एलेगेन्स बुढ़ाने की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। उदाहरण के लिए, देखा गया है कि इंसुलिन-नुमा वृद्धि कारक (आईजीएफ- IGF signaling) को बाधित कर दिया जाए तो वयस्क का जीवन तीन गुना तक बढ़ जाता है। दूसरी ओर, यदि ग्लूकोज़ खिलाया जाए तो उम्र आधी रह जाती है (जो ऑक्सीकारक तनाव की वजह से होता है)। इसी प्रकार से, यदि अधेड़ावस्था (कृमि की अधेड़ावस्था) में इंसुलिन/आईजीएफ का विघटन करवा दिया जाए तो जीवन में काफी वृद्धि हो जाती है। यह भी देखा गया है कि कृमि के लंबी उम्र वाले उत्परिवर्तित संस्करण ऑक्सीकारक तनाव (oxidative stress) और पराबैंगनी प्रकाश का प्रतिरोध दर्शाते हैं। ऐसे उत्परिवर्तियों में डीएनए की मरम्मत करने की क्षमता भी ज़्यादा थी। अर्थात डीएनए मरम्मत की क्षमता का सम्बंध लंबी उम्र से है जो उम्र के साथ कम होती जाती है।

एक मान्यता यह रही है कि डीएनए की ऑक्सीकारक क्षति बुढ़ाने की वजह होती है। सी. एलेगेन्स के अध्ययन से पता चला है कि सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज़ दिया जाए तो वह क्रियाशील ऑक्सीजन मूलकों को कम करता है और बुढ़ाने की प्रक्रिया को धीमा करता है।

यह देखा गया कि सी. एलेगेन्स को लीथियम क्लोराइड का उपचार देने पर भी उसकी जीवन अवधि बढ़ती है।

सी. एलेगेन्स के अध्ययन का एक विषय टीलोमेयर पर केंद्रित रहा है। टीलोमेयर (telomere) सूणसूत्रों के सिरों पर डीएनए की दोहराई जानी वाली शृंखला होती है। यह गुणसूत्र को क्षति से बचाती है और हर कोशिका विभाजन के बाद छोटी होती जाती है। इसकी लंबाई एक हद से कम हो जाने के बाद वह कोशिका आगे विभाजन नहीं कर पाती और झड़ जाती है।

लेकिन सी. एलेगेन्स के अध्ययन में एक विचित्र बात पता चली। ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर जैसे कई जंतुओं में टीलोमेयर की लंबाई को बनाए रखने की विधि में रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की भूमिका देखी गई है। रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स डीएनए के ऐसे खंड होते हैं जो एक जगह से दूसरी जगह फुदकते रहते हैं। लेकिन सी. एलेगेन्स में टीलोमेयर की सुरक्षा के लिए सामान्य तरीके के अलावा एक अलग तरीके का उपयोग देखा गया है, जिसे वैकल्पिक टीलोमेयर लेंदेनिंग (ALT) कहते हैं। सी. एलेगेन्स वह पहला यूकेरियोट जीव था जिसने सामान्य टीलोमेयर प्रक्रिया को ठप किए जाने के बाद ALT हासिल कर ली। इसी तरह ALT कई कैंसर में देखी गई है  जो कई परिस्थितियों में अपना टीलोमेयर लंबा करती रहती हैं। ऐसे कैंसर ज़्यादा घातक (aggressive cancer) साबित होते हैं। लिहाज़ा सी. एलेगेन्स ALT अध्ययन के लिए एक अहम मॉडल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सीपें: जलीय-दुनिया की गुपचुप नायिकाएं

कुमार सिद्धार्थ

दी की तलहटी में आधी गड़ी हुई, या समुद्र के किनारे चट्टानों से चिपकी हुई सीपों (oysters) में न तो कोई चमक-दमक है, न कोई तेज़ गति। फिर भी पूरी जलीय-दुनिया (aquatic ecosystem) बहुत हद तक इन्हीं पर टिकी हुई है।

सीपों को अगर एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है कि वे पानी की सफाईकर्मी (water filter species) हैं। बिना थके, बिना रुके सीप अपने शरीर में पानी खींचती है, उसमें से गंदगी, सूक्ष्म कण, बैक्टीरिया, शैवाल, रसायन और भारी धातु (heavy metals) तक को छानती है और अपेक्षाकृत साफ पानी बाहर छोड़ देती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि एक सामान्य आकार की सीप एक दिन में 20 से 40 लीटर तक पानी छान सकती है। अब ज़रा कल्पना कीजिए, अगर किसी नदी या तट पर हज़ारों या लाखों सीपें हों, तो वे कितनी बड़ी मात्रा में पानी को साफ रखती होंगी।

दुनिया भर में सीपों की लगभग 1200 से अधिक प्रजातियां (oyster species) पाई जाती हैं। इनमें से करीब 1000 प्रजातियां मीठे पानी (freshwater mussels) में और बाकी समुद्री जल में रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीठे पानी की सीपों की सबसे अधिक विविधता उत्तरी अमेरिका में पाई जाती है। वहां अकेले लगभग 300 प्रजातियां हैं। युरोप में करीब 16 प्रमुख प्रजातियां हैं, जबकि एशिया में भी बड़ी संख्या में मीठे पानी की और समुद्री सीपें मिलती हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सीपों की जैव विविधता और खेती, दोनों के लिए जाने जाते हैं।

सीपों की बनावट बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली होती है। दो मज़बूत खोलों के भीतर उनका कोमल शरीर सुरक्षित रहता है। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट (calcium carbonate shell) से बने होते हैं, जिसे सीपें पानी से धीरे-धीरे लेकर परत-दर-परत जमा करती हैं। यही कारण है कि उनका खोल जीवन भर बढ़ता रहता है। मोती बनने की प्रक्रिया (pearl formation) भी इसी से जुड़ी है। जब कोई बाहरी कण उनके शरीर के भीतर फंस जाता है, तो सीप उसे ढंकने के लिए कैल्शियम की परतें चढ़ाती जाती है और धीरे-धीरे मोती बन जाता है।

सीपों का जीवन चक्र (oyster life cycle) और भी रोचक है। समुद्री सीपें अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ती हैं। उनसे सूक्ष्म लार्वा बनते हैं, जो कुछ समय तक समुद्र में तैरते रहते हैं और फिर किसी सख्त सतह से चिपक जाते हैं।

मीठे पानी की कई सीपें तो और भी अनोखा तरीका अपनाती हैं। उनके लार्वा कुछ समय तक मछलियों के गलफड़ों या पंखों से चिपककर रहते हैं। इससे उन्हें सुरक्षित वातावरण (host fish dependency) मिलता है और वे दूर-दूर तक फैल पाती हैं। बाद में वे नदी की तलहटी में गिरकर स्वतंत्र जीवन शुरू करती हैं। यानी सीपें केवल पानी पर नहीं, मछलियों पर भी निर्भर करती हैं। मछलियां कम हों, तो सीपों का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है।

सीपों की सबसे बड़ी खासियत उनकी उम्र (longevity) है। समुद्री सीपें आम तौर पर 10 से 20 साल तक जीवित रहती हैं, जबकि मीठे पानी की कई सीपें 50 से 100 साल तक जी सकती हैं।

हाल के दशकों में यह देखा गया है कि मीठे पानी की सीपों की लगभग एक हज़ार प्रजातियों में से अधिकांश या तो संकटग्रस्त (endangered species) हैं या तेज़ी से घट रही हैं। पोलैंड, क्रोएशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में बड़े पैमाने पर सीपों की मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लंदन की टेम्स नदी में पिछले 60 वर्षों में मीठे पानी की लगभग सारी सीपें मर चुकी हैं।

उत्तरी अमेरिका में मीठे पानी की 70 प्रतिशत से अधिक सीप प्रजातियां संकटग्रस्त या विलुप्ति की कगार पर हैं। युरोप में 16 में से 12 प्रजातियां खतरे में हैं और 3 को अत्यंत संकटग्रस्त माना गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है जलवायु परिवर्तन। पानी का तापमान बढ़ रहा है, ग्रीष्म लहरें आ रही हैं। जब नदी या समुद्र का पानी अचानक बहुत गर्म हो जाता है, तो सीपें उसे सहन नहीं कर पातीं और बड़े पैमाने पर मर जाती हैं। इसके साथ ही प्रदूषण, रासायनिक अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक, नदियों का बहाव बदलना, बांध, खनन और शहरी गंदा पानी इस संकट को और विकट बना रहे हैं।

महासागरों में एक और बड़ी समस्या है समुद्र का अम्लीकरण। कार्बन डाईऑक्साइड समुद्र में घुलकर पानी को अम्लीय बना रही है। इससे सीपों के खोल बनने की प्रक्रिया कमज़ोर हो जाती है। उनका खोल पतला और भुरभरा हो जाता है। छोटी-छोटी शिशु सीपें तो खोल बना ही नहीं पातीं!

समुद्री सीपें तटीय इलाकों के लिए जीवन-रेखा जैसी हैं। वे पानी साफ रखती हैं, तटों को कटाव से बचाती हैं, छोटी मछलियों और केकड़ों को आश्रय देती हैं और मत्स्य उत्पादन को स्थिर बनाए रखती हैं। जहां-जहां सीपों की चट्टानें होती हैं, वहां जैव विविधता कई गुना बढ़ जाती है।

एशियाई देशों में भी सीपों की स्थिति चिंताजनक है। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता पर सीपों की गिरावट का सीधा असर पड़ रहा है। इन द्वीपों के आसपास के प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) तंत्र में सीपों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे पानी की स्वच्छता बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कोरल और मछलियों का जीवन संभव होता है। लेकिन समुद्र का बढ़ता तापमान, पर्यटन से उत्पन्न प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और तटीय विकास की गतिविधियां इन नाज़ुक तंत्रों को कमज़ोर कर रही हैं।

एशिया में सीपों की खेती किसी आधुनिक उद्योग से कम नहीं है, बल्कि यह समुद्र और इंसान के बीच बने एक पुराने रिश्ते का विस्तार है। चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों को ‘उगाया’ नहीं जाता, बल्कि उन्हें सही माहौल दिया जाता है, जहां वे अपने प्राकृतिक तरीके से पनप सकें। समुद्र के तट के पास बांस, लकड़ी या रस्सियों की कतारें लगाई जाती हैं। इन्हीं पर सीपों के लार्वा आकर चिपक जाते हैं। कुछ जगहों पर पुराने खोल, पत्थर या खास तरह की टाइलें भी डाली जाती हैं, ताकि छोटे-छोटे सीपों को पकड़ बनाने के लिए ठोस सतह मिल सके। फिर समुद्र अपना काम करता है। पानी के साथ आने वाला पोषण, शैवाल और खनिज तत्व सीपों के भोजन बनते हैं। इंसान को उन्हें खिलाना नहीं पड़ता, बस पानी को साफ और संतुलित बनाए रखना होता है। 

चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। दुनिया में पैदा होने वाली समुद्री सीपों का बड़ा हिस्सा अकेले चीन से आता है। वहां के तटीय प्रांतों में हज़ारों किलोमीटर तक समुद्र में सीपों की खेती फैली हुई है। सैकड़ों सालों से मछुआरा परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम से जुड़े हैं। सुबह-सुबह छोटी नावों में निकलकर वे सीपों की कतारों की देखभाल करते हैं, टूटे हुए ढांचे ठीक करते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा जमी सीपों को अलग करते हैं और परिपक्व सीपों को बाज़ार तक पहुंचाते हैं। यह खेती लाखों लोगों को रोज़गार देती है; नाविकों को, सफाई और पैकिंग करने वालों को, बाज़ार तक पहुंचाने वालों को और फिर होटल, रेस्तरां और निर्यात से जुड़े लोगों को भी।

जापान में सीपों की खेती तकनीकी रूप से काफी उन्नत है। वहां समुद्र की गहराई, पानी की गति और तापमान को ध्यान में रखकर खेती की जाती है। जापानी वैज्ञानिक सीपों की उन किस्मों पर काम कर रहे हैं जो ज़्यादा गर्म पानी में भी जीवित रह सकें। इससे जलवायु परिवर्तन के असर को कुछ हद तक संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। जापान में सीपें केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सूप, सुशी और कई पारंपरिक व्यंजनों में सीपों का इस्तेमाल होता है।

थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों की खेती छोटे-छोटे तटीय गांवों की रीढ़ है। वहां परिवार के परिवार इस काम से जुड़े हैं। महिलाएं और बुज़ुर्ग अक्सर सीपों को साफ करने, छांटने और बाज़ार के लिए तैयार करने का काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के खर्च तक, बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। इन देशों में सीपों की खेती गरीब समुदायों के लिए एक स्थिर आमदनी का साधन बन चुकी है।

सीपों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है। उनके खोलों का इस्तेमाल चूना बनाने में, खाद में कैल्शियम बढ़ाने में और निर्माण सामग्री में भी होता है। कुछ जगहों पर सीपों के खोलों से सड़क और तटीय बांध मजबूत किए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी सीपों के खोल का पावडर उपयोग में लाया जाता रहा है।

खाने के रूप में सीपें प्रोटीन, ज़िंक, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती हैं। यही कारण है कि एशियाई देशों में इन्हें ‘समुद्र का पौष्टिक उपहार’ कहा जाता है। गरीब परिवारों के लिए यह सस्ता और पौष्टिक भोजन है, जबकि बड़े शहरों में यही सीपें महंगे रेस्तरां में विशेष व्यंजन के रूप में परोसी जाती हैं।

लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम में भी सीपों की खेती और प्राकृतिक आबादी पर संकट गहराता जा रहा है। वहां सीपें न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तूफानों की तीव्रता, समुद्र स्तर में वृद्धि और जल-तापमान में बदलाव इन क्षेत्रों में सीपों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। खेती भी जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से खतरे में पड़ रही है।

अगर सीपें सचमुच कम हो गईं, तो क्या होगा? सबसे पहले तो पानी की गुणवत्ता गिरेगी। नदियां और समुद्र अधिक गंदले होंगे। पीने योग्य पानी तैयार करना और महंगा हो जाएगा। फिर शैवाल विस्फोट बढ़ेंगे, जिससे मछलियां मरेंगी और दुर्गंध फैलेगी। और धीरे-धीरे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होने लगेगा। मत्स्य उद्योग को भी झटका लगेगा। तटीय समुदायों की आजीविका भी खतरे में पड़ेगी।

फिर भी आशा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वॉशिंगटन डीसी से होकर बहने वाली एनाकोस्टिया नदी को साफ किया जा रहा है सिर्फ सीपों के लिए नहीं, बल्कि सीपों की मदद से। पुनर्प्रवेश कार्यक्रम का उद्देश्य सीवेज, ई.कोली और माइक्रोप्लास्टिक्स सहित अन्य प्रदूषकों को कम करना है।

एनाकोस्टिया नदी की तरह  कई लोग एक अलग रणनीति अपना रहे हैं। वे सीपों के संरक्षण के लिए धन जुटाने की बजाय, यह विचार सामने रख रहे हैं कि सीपों का उपयोग पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए किया जा सकता है।

पोलैंड की नीदा नदी में 1980 के दशक में सीपें पूरी तरह समाप्त हो गई थीं, लेकिन जब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स ने प्रदूषण को काफी हद तक कम कर दिया, तब मोटे खोल वाली नदी-सीप को सफलतापूर्वक फिर से बसाया गया।

इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि अगर हम पानी को साफ करें, तो सीपें लौट सकती हैं। सीपों में एक और अद्भुत क्षमता है अनुकूलन की। हर सामूहिक मृत्यु के बाद कुछ सीपें बच जाती हैं। वही आगे चलकर नई पीढ़ी (adaptation ability)  बनाती हैं। यही विकास की प्रक्रिया है। यही उम्मीद है।

अगर हमने इन खामोश सफाईकर्मियों (ecosystem engineers) को बचा लिया, तो हम न केवल एक जीव-समूह को, बल्कि अपनी नदियों, अपने समुद्रों और अपने भविष्य (sustainable future) को बचा लेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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अच्छा खाएं, पृथ्वी की सीमा में खाएं

अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (ultra processed food) मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह – पृथ्वी – की सेहत (planetary health) को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौजूं है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं (planetary boundaries)का उल्लंघन कर लिया है। यहां उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।

म अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत (earth system health) का मामला है। कैसे?

यदि आप इस पहलू को थोड़ा खंगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं उसके उत्पादन (food production) में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए।

मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं

पहला, गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।)

दूसरा, प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागानों से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेंहूं, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियां पकाना वगैरह।

तीसरा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।

मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (global greenhouse gas emissions) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है। और, दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण (nutrient pollution) और जैव विविधता के नुकसान (biodiversity loss) का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)

वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन (unhealthy diet) के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया Reserved: पृथ्वी की सीमा-रेखाएं
2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने नौ सीमाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़) की पहचान की थी, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने का मतलब है हम सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएं हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।
की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहां लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं (safe operating space) के अंदर पूरी हो रही हैं।

ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है। लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियां, गिरियां, फलियां और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।

अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियां, फल, फलियां और गिरियां नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (processed food consumption) पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा (added sugar), संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।

कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों (food systems) के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार (sustainable diet) दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।

नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने (food waste reduction) और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव (policy interventions) करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई (deforestation) में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।

सरकारों को ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है – रेड मीट का उत्पादन (meat production) लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन (plant based food production) लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।

लेकिन यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालांकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) (economic benefits) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।

यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव (market influence) में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएं; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश (dietary guidelines) तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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बिन पीए नशा

राब पीए बिना नशे जैसे लक्षण दिखने लगें – लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना, चक्कर आना, भ्रम, एकाग्रता में कमी, थकान, सिरदर्द, मतली, पेट फूलना, त्वचा का लाल होना, और बदमिज़ाजी –  तो समझ लीजिए वह व्यक्ति एक तकलीफ से पीड़ित है जिसे तकनीकी भाषा में ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम (एबीएस – Auto Brewery Syndrome) कहते हैं। वैसे तो चिकित्सा साहित्य (medical literature) में ऐसे व्यक्तियों के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं लेकिन कई चिकित्सकों का मानना है कि यह सिंड्रोम काफी आम है। तो बगैर एक घूंट भी हलक में उतारे यह नशा होता क्यों है?

इस समस्या पर अनुसंधान उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था और आम मान्यता यह बनी थी कि इसकी वजह व्यक्ति के पेट में खमीर (फफूंद- yeast overgrowth) की अधिकता होती है। जैसा कि सभी जानते हैं हमारी आंतों में फफूंद, बैक्टीरिया के साथ-साथ कई सूक्ष्मजीव निवास करते हैं और प्राय: मददगार होते हैं। यदा-कदा ये हमें बीमार भी करते हैं। तो एबीएस का प्रमुख कारण खमीर (एक किस्म की फफूंद) को माना गया था और यह मत बना था कि जब ये खमीर अत्यधिक मात्रा में आंतों में पलते हैं तो व्यक्ति जो भी शर्करा या अन्य कार्बोहायड्रेट (carbohydrate fermentation) खाता है, उसका किण्वन करके ये अल्कोहल (एथेनॉल) पैदा करते हैं। और अल्कोहल से नशा हो जाता है।

अलबत्ता, हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल (Nature Microbiology) में प्रकाशित शोध पत्र ने एबीएस पर नई रोशनी डाली है। एबीएस पीड़ितों के बड़े समूह का अध्ययन करके शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस तकलीफ का कारण खमीर नहीं बल्कि आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलन (gut bacteria imbalance) है। इससे पहले 2019 में बेजिंग स्थित कैपिटल इंस्टीट्यूट ऑफ पीडियाट्रिक्स (Capital Institute of Pediatrics) के जिंग युआन ने अपने सीमित अनुसंधान के आधार पर यह संभावना व्यक्त की थी। अब इसकी पुष्टि हुई है।

ताज़ा अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (University of California San Diego) (सैन डिएगो) के बर्न्ड स्क्नेबल के नेतृत्व में किया गया है। दरअसल यह गड़बड़ी आम तौर पर मान्य नहीं की जाती, यहां तक कि चिकित्सक भी व्यक्ति पर यकीन नहीं कर पाते कि उसने वास्तव में शराब नहीं पी है। अंतत: कई परीक्षण करके जब इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इलाज पूर्व धारणा के आधार पर ही किया जाता है जिसमें फफूंद-रोधी दवाइयां (antifungal drugs) दी जाती हैं। साथ में कुछ एंटीबायोटिक्स देते हैं और व्यक्ति को कम कार्बोहायड्रेट वाली खुराक लेने को कहा जाता है जो अल्कोहल-उत्पादक सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों में लक्षण बार-बार प्रकट होते रहते हैं।

2019 में किए गए अध्ययन में एबीएस के उभरने के लिए एक बैक्टीरिया क्लेबसिएला न्यूमोनिए (Klebsiella pneumoniae) को ज़िम्मेदार पाया गया था। अध्ययन में एबीएस की स्थिति में फैटी लीवर रोग (fatty liver disease) को भी सहायक बताया गया था।

युआन की टीम ने गंभीर एबीएस से पीड़ित कुछ व्यक्तियों से प्राप्त क्लेबसिएला का प्रत्यारोपण चूहों में किया था। उन्होंने कुछ अन्य व्यक्तियों को भी पहचाना जिनमें क्लेबसिएला के आधिक्य ने एबीएस लक्षणों में उभार उत्पन्न किया।

2019 के अध्ययन के बाद युआन की टीम को काफी लोगों ने संपर्क करके एबीएस जांच करवाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्होंने एबीएस मरीज़ों का अध्ययन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्क्नेबल की मदद ली।

स्क्नेबल ने ऐसे 22 मरीज़ों की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इनके साथ उन्होंने परिवार के सदस्यों को शामिल किया था ताकि वे इस संभावना को निरस्त कर सकें कि यह दिक्कत एक जैसे भोजन या पर्यावरणीय कारणों से हो रही है।

अपेक्षा के अनुरूप, एबीएस मरीज़ों की विष्ठा के कल्चर में अल्कोहल (alcohol production in gut) बना जबकि परिवार के अन्य लोगों की विष्ठा के कल्चर में नहीं। स्क्नेबल का कहना है कि स्वस्थ लोगों की आंतों में भी थोड़ा अल्कोहल बनाता है लेकिन शरीर उसे आसानी से पचा डालता है। एबीएस मरीज़ों में ऐसे एंज़ाइम्स की सांद्रता भी अधिक थी जिससे पता चलता है कि लीवर को क्षति हुई है। एक मरीज़ में तो लीवर सिरोसिस (liver cirrhosis) की स्थिति भी पाई गई।

अपने परिजनों की तुलना में एबीएस मरीज़ों में क्लेबसिएला कहीं अधिक मात्रा में था। उनकी आंतों में एशरीशिया कोली (. कोली) नामक बैक्टीरिया भी अधिक संख्या में थे, जो अल्कोहल पैदा करते हैं। हालांकि, अब तक इसे रोग का प्रमुख कारण नहीं माना गया था। यह भी देखा गया कि लक्षणों में उछाल के दौरान मरीज़ों की आंतों में ई. कोली बैक्टीरिया की संख्या अधिक थी और इनकी संख्या लगभग लक्षणों की गंभीरता को झलकाती थी।

शोधकर्ताओं को एबीएस मरीज़ों तथा अन्य लोगों के बीच खमीर या अन्य फफूंद के स्तर में कोई खास अंतर नहीं मिला। स्क्नेबल के मुताबिक इसका कारण यह हो सकता है कि कुछ मरीज़ों को पहले ही फफूंद-रोधी उपचार मिल चुका था।

एक मरीज़ का सफल उपचार विष्ठा के सूक्ष्मजीव प्रत्यारोपण (फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट, FMT) द्वारा किया गया। इसके लिए उसे एक स्वस्थ दानदाता की विष्ठा कैप्सूल (FMT capsule) में भरकर खिलाई गई थी। स्क्नेबल अब इस पर आगे काम कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि ज़्यादा लक्षित उपचार (targeted therapy) मिल सके।

अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि फिलहाल यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि हमें पूरा जवाब मिल गया है। आगे खोजबीन जारी रखने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हिमालय में मिले प्राचीन समुद्री घटनाओं के प्रमाण

ऊंचाई पर स्थित तिब्बती पठार (Tibetan plateau) पर भूवैज्ञानिकों को लावा के अवशेष मुड़ी-तुड़ी, ऐंठी हुई खपच्चियों के रूप में मिले हैं। ये खपच्चियां ऐसे ज्वालामुखी के बड़े विस्फोटों (volcanic eruption) के अवशेष हैं जो समुद्र के पेंदे में करीब 20 करोड़ साल से भी पहले फूटे थे।

यह तो पता है कि ज्वालामुखियों के ऐसे महाविस्फोटों (जिनसे लाखों सालों तक लाखों घन किलोमीटर लावा निकलता रहता है) के कारण बड़े पैमाने पर सामूहिक जैव विलुप्तियां (mass extinction) हुईं हैं। ज़ाहिर है बड़े पैमाने पर निकले और दूर-दूर तक फैले लावा ने जीवों के आसपास के पर्यावरण को बदला होगा, कई जीव इसका सामना नहीं कर पाए होंगे और खत्म हो गए होंगे।

महाविस्फोट से निकले और दूर तक बिछे लावा से बने क्षेत्र को विशाल आग्नेय प्रांत (Large Igneous Province) कहा जाता है। इन्हें भूमि पर पहचानना आसान होता है क्योंकि इनसे निकले लावा के पठार (lava plateau) सदियों तक टिके रहते हैं। लेकिन समुद्र में हुए महाविस्फोट से बने आग्नेय प्रांत पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि समुद्र में भूपर्पटी (oceanic crust) अपेक्षाकृत तेज़ी से मेंटल में तब्दील होती जाती है। नतीजतन अधिकतर समुद्री महाविस्फोटों के प्रमाण मिट जाते हैं। हालिया अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने ज़मीन के बीच स्थित भूमि में लगभग मिट चुके दो समुद्री महाविस्फोटों (submarine volcanic eruptions) के सबूतों की पहचान की है। जियोलॉजी (Geology journal) में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि समुद्र में हुए इन महाविस्फोटों ने जीवन के इतिहास को एक से ज़्यादा बार आकार दिया है।

हाल ही में पहचाने गए इन महाविस्फोटों की कहानी लगभग 25 करोड़ साल पहले शुरू होती है, जब पैंजिया सुपर-महाद्वीप (Pangaea supercontinent) लगभग बन चुका था। चीज़ें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। हालांकि टेथिस महासागर के पेंदे की ज़्यादातर भूपर्पटी मेंटल में समा गई, लेकिन पेंदे के कुछ अवशेष उन चट्टानों में बचे/फंसे रह गए, जो आगे चलकर हिमालय बनीं (Himalaya formation)।

वैसे, हिमालय में टेथिस महासगर (Tethys Ocean) के कई स्रोतों के अवशेष हो सकते हैं, जैसे प्राचीन समुद्री पहाड़ों के या द्वीपों के, या बड़े आग्नेय प्रांत के। इन अवशेषों को पहचानने के लिए जिलिन युनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक जियान-जुन फैन और कर्टिन युनिवर्सिटी के भूविज्ञानी साइमन वाइल्ड की टीम ने मध्य तिब्बत में चट्टानों के बाहर झांकते आउटक्रॉप्स (rock outcrops) का विश्लेषण किया जो टेथिस महासागर के अवशेष होने की संभावना रखते थे। इन चट्टानों में समुद्री तलछट भी थी जो ठंडे लावा से बनी आग्नेय बेसाल्ट चट्टानों के ऊपर जमा हो गई थी।

कुछ चट्टानों में मिले संकेतों से पता चला कि वे ऐसे महाविस्फोट के अवशेष हैं जिनके बारे में पहले पता नहीं था। रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण (radiometric dating) से पता चला कि वे लगभग एक ही समय में बने थे, जिससे पता चलता है कि वे एक ही घटना से बने थे। समस्थानिक विश्लेषण (isotopic analysis) से पता चलता है कि बेसाल्ट चट्टानों को बनाने वाला मैग्मा गर्म मेंटल प्रवाह (mantle plume) से निकला था।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये चट्टानें दो ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic events) के बारे में बताती हैं, जिनके बारे में पहले पता नहीं था। एक विस्फोट लगभग 23.2 करोड़ साल पहले हुआ था, दूसरा विस्फोट लगभग 21 करोड़ साल पहले। अन्य क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि लगभग 24.9 करोड़ साल पहले प्राक्-प्रशांत महासागर में तीसरा बड़ा विस्फोट हुआ था।

इन विस्फोटों ने समुद्र के भीतर के जीवन पर कहर बरपाया होगा। पिघली हुई चट्टान के आने से पोषक तत्वों की अधिकता ने शैवाल और अन्य सूक्ष्मजीव जीवन को बढ़ावा दिया होगा, पानी में ऑक्सीजन कम हो गई होगी और बड़े पैमाने पर मौतें हुई होंगी। इन विस्फोटों ने कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में भी छोड़ा होगा, जिससे अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन (climate change) हुआ होगा।

अन्य भूवैज्ञानिक और जीवाश्म रिकॉर्ड खंगालने पर शोधकर्ताओं ने प्रत्येक विस्फोट को महासागरों में ऑक्सीजन की कमी (ocean anoxia) और समुद्री जीवन की विलुप्ति से जुड़ा पाया। समयावधि का अनुमान लगाएं, तो लगता है कि पिछले 50 करोड़ सालों में महाविस्फोटों से 160 विलुप्ति की घटनाएं हुई होंगी। हालांकि यह मात्र अनुमान है। विस्फोटों ने वास्तव में कितना लावा उगला होगा, इसका सटीक अनुमान लगाने के लिए और अधिक काम करने की ज़रूरत है, तभी वास्तविक पैमाने का पता चल सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बास्केट बॉल: गेंद बास्केट से लौट क्यों आती है?

छिछोरे फिल्म का एक रोमांचक दृश्य सबको याद होगा। जीत-हार को तय करने वाले क्षण में हीरो गेंद को बास्केट में डालने का प्रयास करता है, गेंद बास्केट के किनारे को छूती है, पिछले हिस्से से टकराती है, अगली रिम को छूती है और टकराकर वापिस लौट आती है। यह घटना बास्केट बॉल के खेल (basketball physics) में तो होती ही है, गोल्फ (golf ball dynamics) के मैदान में भी अक्सर देखी जाती है। गोल्फ में कई बार गेंद छेद के रिम पर चक्कर लगाकर लौट आती है। यहां तक कि कई बार तो गेंद रिम के नीचे भी चली जाती है लेकिन वहां से अंदर जाने की बजाय ऊपर निकल जाती है। गोल्फ में इसे ‘लिप आउट’ कहते हैं। खिलाड़ियों के साथ-साथ लिप आउट भौतिक शास्त्रियों (physics problem) के लिए भी एक पहेली रहा है।

अब लगता है कि भौतिकविदों ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस (Royal Society Open Science) में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय (University of Bristol) के जॉन होगन और सेचेनी इस्तवान विश्वविद्यालय के मेट अन्ताली द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र में इस पर रोशनी डाली गई है। उन्होंने देखा कि लिप आउट कई कारणों से हो सकता है। ऐसी एक करामात को बैलिस्टिक लिप आउट (ballistic lip out) कहते हैं। गेंद छेद के केंद्र की ओर जाती है, लेकिन उसकी रफ्तार इतनी अधिक होती है कि वह छेद के सामने वाली सतह से टकराती है और उछलकर बाहर आ जाती है। इसी प्रकार छेद की रिम से होने वाली लिप आउट में गेंद छेद पर तिरछी दिशा में पहुंचती है, रिम का चक्कर काटती है और अंदर जाने की बजाय बाहर छिटक जाती है।

लेकिन सबसे नाटकीय स्थिति छेद से होने वाला लिप आउट होती है। इसमें होता यह है कि रिम का चक्कर काटते हुए गेंद छेद में गिरने तो लगती है लेकिन फिर गुरुत्वाकर्षण को मात देते हुए वापिस ऊपर चढ़कर बाहर निकल जाती है।

बैलिस्टिक और रिम लिप आउट (rim lip out)  तो समझ में आते हैं और ये सीधी-सादी उछाल (bounce mechanics) की वजह से होते हैं लेकिन गिरते-गिरते आधे रास्ते से लौट आना समझना मुश्किल रहा है।

इस पूरे मामले को न्यूटन द्वारा प्रतिपादित यांत्रिकी के नियमों (Newtonian mechanics) से समझने के प्रयास होते रहे हैं। लेकिन यथार्थ में इन नियमों को लागू करना गणित के लिहाज़ से काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि यहां गति के तीन अलग-अलग अक्ष पर ध्यान देना होता है। पहला है जिसमें मैदान क्षैतिज है और आसमान ऊपर की दिशा में। दूसरा है लुढ़कती गेंद के घूर्णन का अक्ष और तीसरा है मैदान या छेद और गेंद का संपर्क बिंदु।

विश्लेषण के लिहाज़ से ये सारी गतियां थोड़ी दिक्कत तो पैदा करती हैं लेकिन जब गेंद सपाट मैदान पर लुढ़क रही हो तो इन्हें संभाला जा सकता है। होगन के मुताबिक दिक्कतें तब उभरती हैं जब गेंद रिम से छेद की ओर बढ़ती है। उनके अनुसार इस पड़ाव पर गेंद की दो गतियां एक साथ चलती हैं – गेंद का लुढ़कना और गेंद का घूमना। इस पड़ाव पर गुरुत्व बल इन दोनों गतियों के अक्ष के लंबवत नहीं लगता है। इसकी बजाय गुरुत्व बल गेंद को उस सतह (यानी छेद की दीवार) से सटाकर खींचता है जिस पर वह लुढ़क रही है। इसलिए सपाट मैदान पर गेंद के लुढ़कने और छेद की अंदरुनी दीवार पर उसके लुढ़कने को अलग-अलग ढंग से समझने के प्रयास किए गए हैं। और इन दोनों की अंतर्क्रिया (force interaction) को समझना गणित के लिहाज़ से खासा मुश्किल हो जाता है।

लिहाज़ा होगन और अन्ताली ने इस समस्या पर बिलकुल अलग ढंग से विचार किया है। उन्होंने विश्लेषण के लिए दो अक्षों (axis of motion) को ध्यान में लिया – एक वह जो गेंद के लुढ़कने की दिशा से निर्धारित होता है और दूसरा वह जो सतह से संपर्क और उसके केंद्र बिंदु को जोड़ने वाली रेखा से। होगन के मुताबिक जब गेंद छेद में जाती है तो ये अक्ष उसके साथ ही चलते हैं।

इस विश्लेषण के द्वारा रिम और छेद से लिप आउट की घटनाओं की व्याख्या एक जैसे परिवर्तियों की मदद से की जा सकी। देखें कैसे।

जब गेंद छेद में गिरती है और दीवार पर लुढ़कती है तो वह अपने केंद्र और दीवार से संपर्क बिंदु को जोड़ने वाली अक्ष पर थोड़ा घूर्णन करने लगती है। लगभग इसी समय जड़त्व (inertia)  का प्रभाव भी हावी हो जाता है। यदि इस समय तक गेंद छेद के पेंदे में न पहुंच गई हो, तो वह घूर्णन धीमा पड़ जाता है और गेंद दीवार पर चढ़ने लगती है।

यह कहना थोड़ा कठिन होता है कि गेंद वास्तव में छेद से बाहर निकल आएगी या नहीं। दरअसल, पूर्व शोध बताते हैं कि किसी भी शॉट का परिणाम छोटी-छोटी उथल-पुथल से निर्धारित होता है। छेद में गिरना और वापिस निकल आना, इन दोनों की संभावना बराबर होती है। और किसी छोटी सी गड़बड़ (जैसे रेत का एक कण) से गेंद इनमें से कोई भी रास्ता अपना सकती है।

सवाल यह है कि क्या इस विश्लेषण से गोल्फ या बास्केट बॉल के खिलाड़ियों (sports players) को कोई मदद मिलेगी? शोधकर्ताओं का कहना है कि शायद नहीं क्योंकि अंतिम बिंदु पर बलों का संतुलन (force balance) इतनी सूक्ष्मता से होता है कि शॉट मारते वक्त नियंत्रण नामुमकिन नहीं, तो बहुत मुश्किल अवश्य है। (स्रोत फीचर्स)

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उड़ान के लिए तैयार आर्टेमिस-2

डॉ. इरफान ह्यूमन

नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस-SLS) रॉकेट और ओरायन अंतरिक्ष यान 17 जनवरी, 2026 को आर्टेमिस-2 मिशन (Artemis 2 mission) के लिए लॉन्च पैड पर पहुंच गया है। हालांकि, इस मिशन के लॉन्च की तारीख अभी भी अनिश्चित है। यह रोलआउट आर्टेमिस-2 की अंतिम तैयारी का शुरुआती चरण है। यह पहला क्रूड एसएलएस/ओरायन मिशन है और दिसंबर 1972 के बाद पहली बार मनुष्य को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट – Low earth orbit) से आगे ले जाने वाली अंतरिक्ष उड़ान बनने को तैयार है। चार अंतरिक्ष यात्री, रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैंसेन, इस दस दिवसीय मिशन पर चंद्रमा के चारों ओर घूमेंगे।

पहले होंगे पूर्वाभ्यास

लॉन्च पैड पर पहुंचने के बाद, यात्री वाहन की तकनीकी जांच और परीक्षण किए जा रहे हैं, जिसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी इंटरफरेंस टेस्ट (radio frequency interference test) शामिल हैं, जो वीएबी के अंदर नहीं किए जा सकते। वीएबी यानी व्हीकल असेंबली बिल्डिंग (Vehicle Assembly Building) नासा का वह विशाल भवन है जहां रॉकेट और अंतरिक्ष यान असेंबल किए जाते हैं। आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्री पैड पर इमरजेंसी एस्केप प्रक्रियाओं का पूर्वाभ्यास भी करेंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होगा वेट ड्रेस रिहर्सल, जिसमें एसएलएस को लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन जैसे ईंधन से भरा जाएगा और एक प्रैक्टिस उल्टी गिनती की जाएगी, जो टी-माइनस 29 सेकंड पर रुक जाएगा। रिहर्सल में सब कुछ असली प्रक्षेपण जैसा ही होगा, लेकिन उड़ान नहीं होगी।

नासा ने 2022 में आर्टेमिस-1 (Artemis 1) के लॉन्च से पहले तीन वेट ड्रेस रिहर्सल (wet dress rehearsal) किए थे और हाइड्रोजन लीक (hydrogen leak) जैसी समस्याओं के कारण दो लॉन्च प्रयास रद्द कर दिए थे। आर्टेमिस-1 से मिले सबक आर्टेमिस-2 की सफलता की संभावना बढ़ाएंगे।

प्रक्षेपण तिथि

वेट ड्रेस रिहर्सल लॉन्च की तारीख तय करने में मुख्य कारक होगी। हालांकि नासा 6 से 11 फरवरी को लक्ष्य बना रहा है, लेकिन एजेंसी ने औपचारिक प्रक्षेपण तारीख घोषित नहीं की है। अगर प्रक्षेपण 11 फरवरी तक नहीं हुआ, तो अगला मौका मार्च की शुरुआत में ही बनेगा।

जटिल कारक

प्रक्षेपण में एक रोड़ा है नासा का क्रू-12 लॉन्च (Crew-12 mission), जो फिलहाल 15 फरवरी से पहले नहीं होगा। क्रू-11 की 15 जनवरी को स्टेशन से जल्द वापसी ने एजेंसी को तैयारी तेज़ करने को प्रेरित किया।

हालांकि नासा प्रशासक जेरेड इसाकमैन का कहना है कि आर्टेमिस-2 और क्रू-12 स्वतंत्र अभियान हैं, लेकिन अधिकारियों ने संभावित टकराव स्वीकार किया है। दोनों के ट्रैकिंग एंड डैटा रिले सैटेलाइट नेटवर्क (Tracking and Data Relay Satellite System – TDRSS) तक पहुंच और लॉन्च साइट्स के संसाधन साझा हैं। दोनों को एक साथ लॉन्च करना समझदारी नहीं है। लेकिन नासा दोनों की तैयारी जारी रखेगा। जिसमें भी कोई समस्या आएगी वो टलेगा या प्रक्षेपण के लिए दोनों में से एक को चुनना पड़ेगा।

आर्टेमिस-1 से एक बदलाव यह है कि नासा ने मोबाइल प्रक्षेपण प्लेटफॉर्म (mobile launch platform)  पर कामकाजी प्लेटफॉर्म जोड़े हैं ताकि सिस्टम हार्डवेयर का पुन:परीक्षण पैड पर ही हो सके। अर्थात यदि पहला प्रक्षेपण सफल नहीं होता, तो यान को वीएबी में वापस रोल न करना पड़े, यह अगले प्रक्षेपण तक वहीं बना रहे।

अधिकारी यह भी कहते हैं कि वे बाहरी दबावों से सतर्क हैं जो ‘लॉन्च फीवर’ पैदा कर सकते हैं, जिसमें जनता और राजनीतिक स्वार्थ और दबाव शामिल हैं। कार्यकारी सहायक प्रशासक लकीशा हॉकिंस ने बताया कि राजनीतिक दबाव उनके मन में मिशन के प्रति रुचि और उत्साह का एक स्रोत है। दूसरी ओर, एजेंसी का ध्यान इस बात पर है कि प्रक्षेपण क्रू के लिए सही और सुरक्षित रहे।

आर्टेमिस-2 के उपकरण

आर्टेमिस-2 में कई वैज्ञानिक उपकरण और प्रयोग शामिल हैं जो अंतरिक्ष पर्यावरण, विकिरण, और मानव स्वास्थ्य (space radiation, human health in space) पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे। चूंकि अंतरिक्ष यान में जगह सीमित है, इसलिए इसमें बड़े वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि रेडिएशन सेंसर, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे कॉम्पैक्ट डिवाइस हैं। कुछ मुख्य उपकरणों की चर्चा यहां की जा रही है।

विकिरण मॉनिटरिंग उपकरण

अंतरिक्ष में विकिरण (space radiation exposure) एक बड़ी चुनौती है, इसलिए आर्टेमिस-2 में कई सेंसर लगाए गए हैं जो विकिरण स्तर को मापेंगे। ये उपकरण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य के मिशनों के लिए डैटा इकट्ठा करने में मदद करेंगे।

1. हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन असेसर्स (एचईआरए-HERA): ओरायन कैप्सूल के अंदर विभिन्न स्थानों पर छह सक्रिय विकिरण सेंसर लगाए गए हैं। ये सूर्य से उत्पन्न अंतरिक्ष मौसमी घटनाओं (जैसे सोलर फ्लेयर्स) से उत्पन्न खतरनाक विकिरण का पता लगाते हैं और चेतावनी देते हैं। अगर विकिरण अधिक हो, तो मिशन कंट्रोल अंतरिक्ष यात्रियों को शेल्टर बनाने की सलाह दे सकता है। यह आर्टेमिस-1 से सीखे गए सबकों पर आधारित है।

2. क्रू एक्टिव डोसिमीटर (crew dosimeter): प्रत्येक अंतरिक्ष यात्री को एक छोटा-सा डिवाइस दिया जाएगा, जिसे वे अपनी जेब में रखेंगे। यह व्यक्तिगत विकिरण एक्सपोज़र को मापता है। आर्टेमिस-1 में मैनेक्विन पर इसका उपयोग किया गया था, लेकिन अब पहली बार क्रू के साथ लो अर्थ ऑर्बिट से बाहर इस्तेमाल होगा।

3. एम-42 ईएक्सटी (M-42 EXT): जर्मन स्पेस एजेंसी (डीएलआर) के साथ साझेदारी में विकसित, यह एक अपडेटेड विकिरण सेंसर है जो ओरायन में लगाया जाएगा। यह आर्टेमिस-1 के एम-42 का उन्नत संस्करण है और विकिरण के प्रभाव को और बेहतर तरीके से माप सकेगा।

4. आर्चर प्रणाली (ARCHER system): आर्चर एक व्यापक प्रणाली है जो विकिरण स्तर को मॉनिटर करती है और क्रू की स्वास्थ्य स्थिति पर इसके प्रभाव का अध्ययन करती है। यह आंतरिक और बाहरी विकिरण को ट्रैक करेगी।

ऑर्गनऑनचिप

एवेटार (ए वर्चुअल एस्ट्रोनॉट टिशू एनालॉग रेस्पॉन्स) एक क्रांतिकारी प्रयोग है जिसमें यूएसबी ड्राइव जितने छोटे ‘ऑर्गन-ऑन-ए-चिप’ उपकरण का उपयोग किया जाएगा। ये उपकरण मानव ऊतकों की नकल करते हैं और विकिरण तथा माइक्रोग्रैविटी (microgravity) के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। मसलन, ये गुर्दे या फेफड़ों पर बढ़ते विकिरण का असर देखेंगे। यह पहली बार है जब ऐसी तकनीक वैन एलन बेल्ट (Van Allen belts) से बाहर इस्तेमाल होगी। अंतरिक्ष यात्री इन उपकरणों से रीयल-टाइम डैटा इकट्ठा करेंगे, जो अलगाव और सीमित स्थान के प्रभाव को भी मापेंगे।

ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम

ओरायन आर्टेमिस-2 ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (optical communication system – ओ2ओ) एक लेज़र-आधारित संचार प्रणाली (laser communication) है जो पृथ्वी से उच्च गति डैटा ट्रांसफर करेगी। इसमें एक 4-इंची टेलीस्कोप, दो गिंबल्स, मॉडेम और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। यह पारंपरिक रेडियो संचार से तेज़ है और भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

कैमरा और इमेजिंग उपकरण

हाई-एंड हैसलब्लाड और निकॉन डिजिटल कैमरे (Hasselblad camera, Nikon space camera) चंद्रमा की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेंगे, जो पहले के मिशनों से बेहतर होंगी।

जैविक प्रयोग

आर्टेमिस-2 में कुछ जैविक नमूने ले जाए जा सकते हैं। खमीर, हरी शैवाल, कवक और बीजों पर विकिरण के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। ये प्रयोग डीएनए पर अंतरिक्ष यात्रा के असर को समझने (DNA damage in space) में मदद करेंगे।

अंतरिक्ष यात्री विशेष कागज़ पर लार एकत्र करेंगे, क्योंकि रेफ्रिजरेशन उपलब्ध नहीं होगा। यह स्वास्थ्य और तनाव से जुड़े बायोमार्कर्स (biomarkers) का अध्ययन करेगा। साथ ही, नींद, तनाव और अलगाव के प्रभाव के अध्ययन लिए शारीरिक और व्यवहारगत डैटा भी इकट्ठा किया जाएगा। ये उपकरण मंगल जैसे लंबे मिशनों के लिए महत्वपूर्ण डैटा देंगे।

आर्टेमिस-2 दशकों बाद पहला ऐसा मिशन है जहां इंसान चंद्रमा के करीब (human return to the Moon) पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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कमल के फूलों में छिपा प्राकृतिक हीटर

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

र्मोजेनेसिस (thermogenesis) यानी जीवों में अपने शरीर में ऊष्मा/गर्मी पैदा करने की प्रणाली। हालांकि हम आम तौर पर सिर्फ पक्षियों और स्तनधारियों को ही गर्म खून (endotherm) वाला मानते हैं, लेकिन सभी जटिल जीव कुछ गर्मी तो पैदा करते ही हैं। कोशिकाओं में मौजूद छोटे पॉवर प्लांट, जिन्हें माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) कहते हैं, भोजन को एक जैविक ईंधन, एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) में बदलते हैं। लेकिन, भोजन की ऊर्जा का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा ही वास्तव में ATP बनता है; बाकी हिस्सा ऊष्मा के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।

कभी-कभी, माइटोकॉन्ड्रिया शर्करा में मौजूद सारी ऊर्जा को ऊष्मा में बदल सकते हैं। पौधों में भी एक एंज़ाइम यही काम कर सकता है जिसका नाम है आल्टरनेटिव ऑक्सीडेज़ (alternative oxidase)। अलबत्ता, चंद पौधे ही विशिष्ट कामों के लिए गर्मी पैदा करते हैं (plant thermogenesis)।

कमल का पौधा (Nelumbo nucifera) उत्तरी और मध्य भारत मूल का है। और यह तालाबों, झीलों और धीमे बहाव वाले जलाशयों में उगता है। गर्मियों की शुरुआत में, कम तापमान पर फूल खिलना शुरू होते हैं। इसके सुंदर फूल तीन से चार दिनों तक खिले रहते हैं। इस अवधि में फूल का अंदरूनी तापमान लगभग 30-35 डिग्री सेल्सियस रहता है, जबकि आसपास का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है (flower temperature regulation)।

कमल में ऊष्माजनन तब शुरू होता है जब कली की सभी पंखुड़ियों के सिरे गुलाबी हो जाते हैं। इसकी अगली अलसुबह, खिलता हुआ फूल गर्मी छोड़ता है, जो फूल को एक आकर्षक खुशबू छोड़ने (pollination mechanism) में भी मदद करता है। कमल के फूल के केंद्र में शंकु आकार का एक समतल पुष्पासन होता है जिसके ऊपरी सपाट हिस्से पर 10-30 मादा जननांग होते हैं। अन्य ऊष्माजनक पौधों की तरह, कमल में भी मादा अंग पहले परिपक्व होते हैं। खुशबू परागणकर्ता़ कीटों – मधुमक्खियों और भृंगों – को स्त्रीकेसर की ओर आकर्षित (pollinator attraction) करती है। दोपहर तक पंखुड़ियां बंद हो जाती हैं, जिससे एक आरामदायक, इंसुलेटेड कक्ष बन जाता है जिसमें रात बिताने के लिए कीट शरण लेते हैं।

अगले दिन सुबह फूल खिलने से पहले, फूल के नर जननांग (पुंकेसर) परिपक्व हो जाते हैं। और पराग से लदे परागपोषी कीट फूल से उड़ जाते हैं और दूसरे महकते फूलों पर चले जाते हैं। यह प्रणाली पर-परागण (cross pollination) सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन हुई है। पर-परागण से संतति को कई फायदे मिलते हैं। जैसे, अधिक जेनेटिक विविधता (genetic diversity) और कीट प्रतिरोधक क्षमता। प्रत्येक स्त्रीकेसर एक-एक बीज में तब्दील हो जाता है और पुष्पासन फव्वारे जैसे आकार की फली में परिपक्व हो जाता है।

स्त्रीकेसर जिस हिस्से पर होते हैं, वह हिस्सा फूल के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाता है। वर्ष 2025 में प्लांट फिजियॉलॉज़ी (Plant Physiology journal) में प्रकाशित नतीजों के मुताबिक कैल्शियम आयन गर्मी बढ़ाने के ‘ऑन’ स्विच का काम करते हैं। जब गर्म होने का समय होता है, तो इस हिस्से की कोशिकाओं में कैल्शियम का स्तर चार गुना बढ़ जाता है। कैल्शियम माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है और उन्हें तेज़ी से काम करने के संकेत देता है। ऊष्मा पैदा करने के लिए, बड़ी मात्रा में जमा स्टार्च और वसा का उपयोग किया जाता है (energy metabolism in plants)।

एरम कुल के कुछ पौधे कीटों को आकर्षित करने के लिए और अन्य विचित्र कामों के लिए भी ऊष्माजनन का इस्तेमाल करते हैं (thermogenic plants)। ईस्टर्न स्कंक कैबेज (eastern skunk cabbage) नामक पौधा उत्तरी अमेरिका के ठंडे इलाकों में उगता है। हालांकि इसका पत्तागोभी (कैबेज) से कोई सम्बंध नहीं है, लेकिन इसका नाम पत्तागोभी जैसी गंध के कारण पड़ा है, जो थोड़ी सरसों जैसी भी होती है। इस पौधे का फूल वाला तना वसंत के आरंभ में ऊष्मा पैदा करके मिट्टी पर जमी बर्फ को पिघलाकर बाहर निकलता है (snow melting plant)। भृंगों को इस फूल में मकरंद के साथ-साथ गर्म जगह मिलती है। यहां तक कि मकड़ियां भी कीटों की आवाजाही देखते हुए फूल के नज़दीक ही अपने जाले बुनती हैं।

सार्डीनिया में पाए जाने वाले डेड हॉर्स एरम लिली (dead horse arum lily) के फूलों से सड़ांध की गंध आती है। यह पौधा गर्मी का इस्तेमाल डाईमिथाइल डाईसल्फाइड (dimethyl disulfide) जैसे यौगिकों को तेज़ी से प्रसारित करने के लिए करता है, जिसकी गंध गैस सिलेंडर से रिसती गैस और थोड़ी लहसुन जैसी होती है। सड़ा हुआ मांस ढूंढने वाली मक्खियों को यह गंध बहुत पसंद आती है और वे बड़ी संख्या में इसके पास आ जाती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/zci6f9/article70532199.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/Sacred_lotus_Nelumbo_nucifera.jpg

कीटनाशकों का उपयोग मछलियों की उम्र घटा रहा है

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित हालिया शोध पत्र से पता चला है कि फसलों में इस्तेमाल होने वाला क्लोरपायरीफॉस नामक कीटनाशक (chlorpyrifos pesticide) मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा बना रहा है। इससे समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

गौरतलब है कि क्लोरपायरीफॉस मनुष्यों, खासकर बच्चों, के तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस कारण युरोपियन यूनियन और यूएस के कई राज्यों में यह प्रतिबंधित (European Union ban)  है, जबकि कई देशों में इसका अब भी इस्तेमाल जारी है। आम तौर पर इसका उपयोग सेब, संतरा और गेहूं जैसी फसलों पर किया जाता है। बारिश के बाद यह रसायन बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।

इसके दीर्घावधि असर को समझने के लिए वैज्ञानिक चुनशेंग लियू की टीम ने मीठे पानी की मछली (freshwater fish study) पर अध्ययन किया। चार वर्षों तक उन्होंने चीन के हुबेई प्रांत की तीन बड़ी झीलों से 24 हज़ार से अधिक मछलियां इकट्ठा कीं। इनमें से दो झीलों में सालों से खेती से प्रदूषित पानी आ रहा था, जबकि एक झील अपेक्षाकृत साफ थी।

उन्होंने पाया कि प्रदूषित झीलों में बड़ी और उम्रदराज मछलियां की संख्या काफी कम थी। तीन साल से अधिक उम्र की मछलियों की संख्या लगभग 96 प्रतिशत तक घट चुकी थी। यह भी दिखा कि जिन वर्षों में मछलियों के शरीर में क्लोरपायरीफॉस की मात्रा अधिक थी, उन वर्षों में बूढ़ी मछलियां सबसे कम मिलीं (fish population decline)।

जांच करने पर वैज्ञानिकों को प्रदूषित झीलों की मछलियों की कोशिकाओं में भारी मात्रा में लिपोफुसिन (lipofuscin accumulation) नाम का अपशिष्ट मिला, जो आम तौर पर उम्र बढ़ाने का काम करता है। इससे भी अधिक चिंता की बात टेलोमेयर में आए बदलाव (telomere shortening) थे। टेलोमेयर डीएनए के सिरों पर मौजूद सुरक्षा कवच होते हैं, जो उम्र के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं। जिन मछलियों पर क्लोरपायरीफॉस का असर पड़ा था, उनके टेलोमेयर सामान्य से कहीं ज़्यादा छोटे पाए गए। इनके छोटे हो जाने का मतलब है बीमारी और जल्दी मौत का खतरा। इससे साफ संकेत मिला कि यह कीटनाशक मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा कर रहा है।

पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में भी परीक्षण (laboratory experiment) किया गया। मछलियों को बहुत ही कम मात्रा में क्लोरपायरीफॉस दिया गया – उतना ही जितना झीलों के पानी में था। चार महीने बाद साफ पानी में रखी सभी मछलियां ज़िंदा रहीं, लेकिन जिन टैंकों में कीटनाशक था, वहां बूढ़ी मछलियों में से लगभग आधी मर गईं और उनके टेलोमेयर लगभग एक-तिहाई तक छोटे हो चुके थे।

अध्ययन से स्पष्ट है कि रासायनिक प्रदूषण (chemical pollution) न केवल ज़हरीला होता है बल्कि जीवों को जल्दी बूढ़ा भी करता है। हालांकि अभी इंसानों पर इसके सीधे असर (human health impact) को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं कि ऐसी ही जैविक प्रक्रियाएं इंसानों में भी होती हैं।

यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल ऐसे ही चलता रहा, तो रसायन चुपचाप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem damage) को बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z7q96j3/full/_20260115_on_pesticides.jpg