डॉ. सुशील जोशी

मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।
कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।
फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।
हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।
हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।
आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।
कार्बन के बाद आए तत्व
सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।
दुर्लभ मृदा तत्व
दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।
उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।
अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।
सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।
और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।
दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता
पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।
वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।
तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।
अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।
दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।
दुर्लभ मृदाओं के गुण
आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।
बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।
चुंबकत्व
चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।
इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।
लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।
दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।
दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।
प्रकाश–उत्सर्जन
किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।
विद्युतीय गुण
दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।
धातुकर्म की दिक्कतें
दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।
दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।
इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।
एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।
भू–राजनीतिक समस्याएं
विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।
उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।
जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।
फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।
आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।
ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।
एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।
एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।
फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।
जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।
इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।
एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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