शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।
इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।
इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।
शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।
यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।
इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)
आम तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।
हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।
पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।
क्या है ‘क्लिक केमिस्ट्री’?
दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।
भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)
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न्यूयॉर्क के बीच बहने वाली ईस्ट रिवर के बाल्टी भर पानी ने रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मार्क स्टोकेल को न्यूयॉर्क शहर के जीवन के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी है। नदी के पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों का अध्ययन करके उन्होंने उसमें पाई जाने मछलियों, शहर के जीवों, लोगों की सेहत और उनके खानपान की आदतों तक के बारे में संकेत पाए। अध्ययन दिखाता है कि पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) पर्यावरण को समझने का एक तेज़ और सस्ता तरीका बनता जा रहा है।
यह शोध प्लॉस वन में प्रकाशित हुआ है। स्टोकेल और साथियों ने एक साल तक हर हफ्ते ईस्ट रिवर से पानी के नमूने लिए। फिर उन्होंने उस पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों की जांच की, जो जीवों की त्वचा, बाल, गंदगी या दूसरे जैविक पदार्थों के ज़रिए पानी में पहुंचे थे।
अध्ययन में पता चला कि शहर के बीच बहने वाली यह नदी जीवों से भरपूर और लगातार बदलने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है। वैज्ञानिकों ने इसमें 71 मछली प्रजातियां पहचानीं, जिनमें कुछ ऐसी भी थीं जो पहले इस इलाके में बहुत कम दिखाई देती थीं, और अब अच्छी संख्या में दिखाई दे रही हैं। अध्ययन यह दिखाता है कि ईस्ट रिवर अब पहले की तुलना में काफी साफ हो चुकी है।
गौरतलब है कि पर्यावरणीय डीएनए तकनीक पानी, मिट्टी या हवा में मौजूद जीवों के छोड़े गए छोटे-छोटे डीएनए खंडों के विश्लेषण पर आधारित है। सभी जीव लगातार अपनी कोशिकाएं और गंदगी छोड़ते रहते हैं, इसलिए उनका डीएनए कुछ दिनों तक वातावरण में बना रह सकता है।
पारंपरिक तरीकों में नाव, जाल, ट्रैप या गोताखोरों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन eDNA तकनीक बहुत कम उपकरण और खर्च में बड़ी मात्रा में जानकारी दे सकती है। यह ऐसी मुश्किल जगहों में उपयोगी है, जहां तेज़ धाराएं और चट्टानी इलाका सामान्य जांच को कठिन बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे एक साल के इस अध्ययन का खर्च किसी रिसर्च बोट को सिर्फ एक दिन चलाने जितना था।
वैज्ञानिकों को नदी के पानी में सिर्फ मछलियों के ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रहने वाले जीवों के डीएनए भी मिले। वैज्ञानिकों को गिलहरी, रैकून, बीवर, गाय, सूअर, मुर्गियों और चूहों के डीएनए के संकेत मिले, जो शायद गंदे पानी और बारिश के बहाव के ज़रिए नदी तक पहुंचे थे। खासकर चूहों का डीएनए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में शहरों में चूहों की बढ़ती संख्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि पानी में मिले जीवों के डीएनए का अनुपात लोगों के मांस खाने के आंकड़ों से काफी मेल खाता था। इससे संकेत मिलता है कि eDNA तकनीक भविष्य में लोगों की खानपान की आदतों और स्वास्थ्य के रुझानों को समझने में मदद कर सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पहली बार गंदे पानी से मिले eDNA का इस्तेमाल लोगों की खानपान की आदतों को इतने विस्तार से समझने के लिए किया गया है।
विशेषज्ञ eDNA को पर्यावरण और वन्यजीवों की निगरानी के लिए एक बहुत उपयोगी नई तकनीक मानते हैं। यह जीवों की सही-सही संख्या तो नहीं बता सकती, लेकिन यह ज़रूर दिखा सकती है कि कोई प्रजाति समय के साथ बढ़ रही है या घट रही है। इससे पर्यावरण में हो रहे बदलावों और बाहरी प्रजातियों के फैलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।
यह तकनीक अब दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल हो रही है। कनाडा में दुर्लभ वनबिलावों (लिंक्स) का पता लगाने से लेकर माउंट एवरेस्ट के आसपास पिघले बर्फ के पोखरों में तितलियों की प्रजातियों की पहचान तक, eDNA कई जगहों पर मदद कर रहा है।
हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि eDNA पारंपरिक पर्यावरणीय जांच तरीकों की पूरी जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह एक पूरक के तौर पर उन्हें और मज़बूत बना सकती है। हवा-पानी के नमूनों से पर्यावरण की विस्तृत जानकारी निकालकर यह तकनीक शहरों और प्रकृति की अदृश्य दुनिया को समझने का नया रास्ता खोल रही है, और यह जानने में मदद कर रही है कि प्राकृतिक दुनिया कैसे बदल रही है। (स्रोत फीचर्स)
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डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)
आज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।
इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।
मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-
“मालवा धरती धीर गंभीर
पग-पग रोटी, डग-डग नीर”
सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।
बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।
सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।
भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।
जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।
वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।
इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।
सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।
ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।
इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।
चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.tripadvisor.in/Attraction_Review-g2282389-d3913026-Reviews-Gandhi_Sagar_Dam-Neemuch_Neemuch_District_Madhya_Pradesh.html
मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।
कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।
फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।
हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।
हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।
आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।
कार्बन के बाद आए तत्व
सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।
दुर्लभ मृदा तत्व
दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।
उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।
अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।
सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।
और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।
दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता
पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।
वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।
तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।
अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।
दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।
दुर्लभ मृदाओं के गुण
आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।
बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।
चुंबकत्व
चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।
इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।
लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।
दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।
दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।
प्रकाश–उत्सर्जन
किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।
विद्युतीय गुण
दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।
दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।
धातुकर्म की दिक्कतें
दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।
दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।
इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।
एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।
भू–राजनीतिक समस्याएं
विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।
दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।
उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।
जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।
फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।
आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।
ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।
एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।
एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।
फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।
जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।
इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।
एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://hasetins.com/wp-content/uploads/2026/01/Rare-Earth-Pictures-845×684.png
वर्ष 2026 विज्ञान (Science in 2026) के लिए एक निर्णायक साल साबित हो सकता है। इस वर्ष कृत्रिम बुद्धि (AI – एआई), चिकित्सा, अंतरिक्ष अन्वेषण और भूविज्ञान में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यहां ऐसी ही कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं की चर्चा की जा रही है।
एआई का बढ़ता दायरा
अब एआई मात्र आंकड़ों का विश्लेषण करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह शोध में भागीदार भी बन रहा है। 2026 में प्रयोगशालाओं में ऐसे एआई ‘एजेंट’ (AI in laboratories) आम हो सकते हैं, जो प्रयोगों की योजना बनाएंगे, नतीजों का विश्लेषण करेंगे और सीमित मानवीय निगरानी में फैसले भी लेंगे। एआई की भूमिका वाली ऐसी पहली बड़ी खोज इस साल आ सकती है।
हालांकि, एआई पर बढ़ती निर्भरता के साथ खतरे (AI risks) भी हैं। ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां एआई ने आंकड़ों को गलत समझा या उनको विलोपित (data misinterpretation) कर दिया। लिहाज़ा, एआई की सफलताओं के साथ-साथ उसकी सीमाओं को समझना भी ज़रूरी है।
इस बीच, एक और अहम तब्दीली हो रही है। बड़े व महंगे एआई मॉडल्स की जगह अब छोटे, तेज़ और विशिष्ट कामों (task specific AI) के लिए एआई सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। ये इबारत पैदा करने की बजाय तार्किक व गणितीय समस्याएं हल करते हैं, और कुछ मामलों में बड़े सिस्टम से बेहतर हैं।
व्यक्ति–विशिष्ट जीन संपादन
जीन संपादन तकनीक अब एक नए और ज़्यादा व्यक्ति-विशिष्ट (खासकर दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों के) इलाज में दखल बना रही है। 2026 में बच्चों के लिए बनाए गए व्यक्ति-विशिष्ट जीन-उपचार (personalized gene editing) पर आधारित दो बड़े क्लीनिकल परीक्षण शुरू हो सकते हैं।
इनमें से एक परीक्षण उन बच्चों पर केंद्रित होगा जिन्हें कुछ जीन-विशेष (rare genetic disorders) में बदलाव के कारण चयापचय से जुड़ी दुर्लभ बीमारियां होती हैं, जबकि दूसरा परीक्षण जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र की बीमारियों पर केंद्रित होगा। अगर ये प्रयास सफल होते हैं तो इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है – एक-से इलाज की बजाय, मरीज़ के जीन के अनुसार उपचार मिल सकेगा।
सभी कैंसर के लिए एक परीक्षण
2026 में कैंसर से जुड़ी एक बहुत बड़ी उम्मीद ब्रिटेन में पूरी हो सकती है। वहां एक ऐसा रक्त परीक्षण जारी है, जो लक्षण उभरने से पूर्व ही लगभग 50 तरह के कैंसर की पहचान (early cancer detection) कर सकता है। यह परीक्षण खून में मौजूद कैंसर कोशिकाओं से निकले बेहद छोटे डीएनए टुकड़ों के आधार पर बताता है कि कैंसर शरीर के किस हिस्से में है। इस परीक्षण में 1.4 लाख से ज़्यादा लोग शामिल हैं। नतीजे अच्छे रहे तो कैंसर की शीघ्र पहचान आसान हो सकेगी और हज़ारों जानें बच सकेंगी।
साथ ही, दवा के परीक्षण से जुड़े नियमों में भी बदलाव हो रहे हैं। ब्रिटेन में प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाया जाएगा, जिसमें नैतिक और नियामक मंज़ूरी (fast track drug approval) एक ही आवेदन से ली जा सकेगी। पहले इन मंज़ूरियों के लिए दो पृथक आवेदन करने होते थे। वहीं, नई दवाओं के परीक्षण चरण के लिए एफडीए द्वारा प्रस्तावित तब्दीली – दो क्लीनिकल परीक्षण की जगह एक परीक्षण – पर चर्चा जारी रहेगी।
चंद्रमा पर बढ़ती भीड़
2026 में चंद्रमा पर हलचल तेज़ हो सकती है (moon mission)। नासा का आर्टेमिस-II मिशन 1970 के दशक के बाद पहली बार अब इंसानों को चंद्रमा के चारों ओर घुमाएगा। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री होंगे। भले ही वे चंद्रमा पर उतरेंगे नहीं लेकिन यह भविष्य में मानव अवतरण की दिशा में एक अहम कदम होगा।
वहीं चीन चांग-ए-7 मिशन (Chang’e-7 mission) की तैयारी कर रहा है, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाएगा। यह इलाका बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन यहां हमेशा छाया में रहने वाले गड्ढों में बर्फ छिपी होने की संभावना है। भारत के सफल चंद्रयान-3 से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (lunar south pole) को लेकर वैश्विक वैज्ञानिक रुचि और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ गई हैं।
मंगल के चंद्रमाओं की ओर
चंद्रमा से आगे अब वैज्ञानिकों का ध्यान मंगल ग्रह और उससे भी दूर की दुनिया पर है। जापान अपने MMX मिशन (Mars exploration) के ज़रिए मंगल के दो चंद्रमाओं – फोबोस और डाइमोस – का अध्ययन करने जा रहा है। इस मिशन की खास बात यह होगी कि फोबोस से नमूने पहली बार पृथ्वी पर आएंगे।
युरोपियन स्पेस एजेंसी 26 कैमरों से लैस PLATO नाम का एक शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन मिशन तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य पास के तारों के आसपास पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज करना है।
इसी दौरान भारत का आदित्य-L1 मिशन (solar observation, Aditya-L1 mission) सूर्य की गतिविधियों पर नज़र बनाए रखेगा। इससे वैज्ञानिक सूर्य से उठने वाले तूफानों को बेहतर समझ सकेंगे।
पृथ्वी में छिपे रहस्यों की खोज
पृथ्वी के रहस्यों को समझने के लिए चीन का उन्नत समुद्री ड्रिलिंग (deep sea drilling) जहाज़ मेंग शियांग अपना पहला अभियान शुरू करेगा। यह जहाज़ समुद्र के पेंदे के नीचे गहराई तक ड्रिल कर पृथ्वी की अंदरूनी परतों तक पहुंचने की कोशिश करेगा। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि टेक्टोनिक प्लेटें (tectonic plates research) कैसे खिसकती हैं और पृथ्वी का अंदरूनी ढांचा उसकी सतह को कैसे आकार देता है।
कुल मिलाकर, 2026 विज्ञान के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण वर्ष होगा। (स्रोत फीचर्स)
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एक हालिया वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी में नेतृत्व (global science leadership) का संतुलन तेज़ी से बदला है। ऑस्ट्रेलियाई संस्थान ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक फॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) का दावा है कि चीन अब दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में शोध के मामले में सबसे आगे (technology dominance) है। यह स्थिति शुरुआती 2000 के दशक से बिल्कुल उलट है, जब इन क्षेत्रों में अमेरिका का दबदबा था।
ASPI ने मौजूदा और उभरती 74 तकनीकों पर प्रभावशाली शोध का अध्ययन किया। ये तकनीकें इसलिए अहम हैं क्योंकि ये किसी देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को मज़बूत भी कर सकती हैं और खतरे में भी डाल सकती हैं। नतीजों के मुताबिक चीन 74 में से 66 तकनीकों में अव्वल है – जैसे परमाणु ऊर्जा, संश्लेषण जीवविज्ञान, उन्नत सामग्री और छोटे उपग्रह (nuclear energy, synthetic biology, advanced materials, small satellites)। जबकि अमेरिका कुछ ही क्षेत्रों, जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग और जियोइंजीनियरिंग, में आगे है।
यह बदलाव ऐतिहासिक माना जा रहा है। सदी की शुरुआत में जिन तकनीकों का अध्ययन किया गया था, उनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा में अमेरिका आगे था, जबकि चीन की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम थी। लेकिन पिछले बीस वर्षों में चीन ने विज्ञान और तकनीक में बहुत तेज़ प्रगति (science power shift) की है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण शोध, शिक्षा और नवाचार में चीन का भारी निवेश है।
चीन की पकड़ खासकर नई और तेज़ी से बढ़ती तकनीकों में मज़बूत है, जिसमें उसने सोच-समझकर संसाधन लगाए हैं। हालांकि, उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स जैसे कुछ पुराने और स्थापित क्षेत्रों में चीन अभी भी अग्रणी नहीं है और इन क्षेत्रों में अन्य देशों को बढ़त हासिल है।
इन रैंकिंग्स को तय करने के लिए ASPI की टीम ने दुनिया भर में प्रकाशित 90 लाख से ज़्यादा वैज्ञानिक शोध पत्रों का अध्ययन किया (scientific publications)। हर तकनीक के लिए 2020 से 2024 के बीच छपे सबसे ज़्यादा उद्धृत 10 प्रतिशत शोध पत्र चुने गए और देखा गया कि उनमें किस देश की कितनी भागीदारी है। किसी शोध पत्र का अन्य शोध पत्रों में जितना ज़्यादा हवाला (research impact analysis) दिया जाता है, उसे उतना ही प्रभावशाली और उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह रहा कि क्लाउड और एज कंप्यूटिंग (cloud and edge computing) जैसे क्षेत्रों में चीन सबसे आगे है। ये क्षेत्र एआई के लिए बेहद अहम हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अमेरिका की वैज्ञानिक ताकत अचानक खत्म हो गई है। अमेरिका आज भी प्रभावशाली शोध कर रहा है। लेकिन, यदि वह अहम वैज्ञानिक क्षेत्रों में सोच-समझकर निवेश नहीं करता तो महत्व खो सकता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://scontent.fbho2-1.fna.fbcdn.net/v/t39.30808-6/600320639_1304015798433128_7532952445703306667_n.jpg?stp=dst-jpg_s640x640_tt6&_nc_cat=110&ccb=1-7&_nc_sid=127cfc&_nc_ohc=WgSuOG0UxAUQ7kNvwGXK0Ya&_nc_oc=AdlDeyRXEMCx0p-mBq_VIeT3lKLERYA3Q2q5VARXzgqUZktHZq97_dpLNBER2qWp3pg&_nc_zt=23&_nc_ht=scontent.fbho2-1.fna&_nc_gid=Ii-k2tkT8eCxFSwPVyYorg&oh=00_Afp5uEiua6-gdqjFnerjibLrVFSACmSvJrSv8NN2vHEmKA&oe=696E8D1D
विज़ुअल टेलीफोन नामक एक खेल होता है जिसमें दो लोग एक-दूसरे की ओर पीठ करके बैठते हैं। एक व्यक्ति कोई चित्र बनाता जाता है और दूसरे को उसका शाब्दिक विवरण देता जाता है। दूसरा सिर्फ विवरण के आधार पर वही चित्र बनाने की कोशिश करता है। अमूमन होता यह है कि दोनों के चित्र एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग-अलग होते हैं।
अब, शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल्स को भी यही खेल (विज़ुअल टेलीफोन) खिलाया और देखा कि वे क्या बनाते हैं। पैटर्न्स जर्नल में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि वर्तमान एआई मॉडल्स (AI models) को चाहे कितने भी सटीक और विविध विवरण दिए जाएं, ले-देके वे वही 12 युरोपियन चीज़ें डालकर तस्वीर (AI image generation) बनाते हैं।
दरअसल, आजकल एआई मॉडल्स का खूब उपयोग हो रहा है। मनुष्यों के दखल के बिना एआई से भी खूब काम करवाया जा रहा है। वे खुद से कुछ लिख सकते हैं, मल्टीमीडिया बना सकते हैं, इन्हें बदल सकते हैं या इनकी समीक्षा कर सकते हैं। और इसके पीछे विशाल लैंग्वेज मॉडल्स (large language models) काम करते हैं। अंत में चैटजीपीटी से पूछे गए सवाल का एक जवाब मिल जाता है। लेकिन, एक सवाल कई सारे एआई मॉडल्स को सक्रिय कर सकता है, क्योंकि एआई प्रणाली किसी सवाल का जवाब देने के लिए वह सवाल कई दूसरे एआई मॉडल्स को सौंप देती है।
इस प्रक्रिया को देखकर डालार्ना युनिवर्सिटी के एरेंड हिंट्ज़ और टॉवसन युनिवर्सिटी की जेबा रिज़वाना के मन में सवाल आया कि क्या हो यदि इस पूरी प्रकिया में मनुष्य का कोई दखल न हो और एआई को खुद से कुछ रचने-गढ़ने और उसकी समालोचना करने के लिए खुला छोड़ दिया जाए?
तो शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल्स को विज़ुअल टेलीफोन खेल खिलाया। इस खेल की शुरुआत के लिए उन्होंने 100 इबारती उकसावे (टेक्स्ट प्रॉम्प्ट – text prompt) बनाए। इन उकसावों को बनाते हुए उन्होंने इस बात का खास ख्याल रखा कि हर उकसावा एक-दूसरे से बहुत अलग हो, उनमें विविधता हो।
फिर, हर उकसावे को SDXL नामक इमेज जनरेटर में डाला गया जो इबारती विवरण के आधार पर तस्वीर बनाता है। SDXL द्वारा बनाई तस्वीरों को एक इमेज-डिस्क्राइबिंग मॉडल (image describing model) में भेजा गया, जो तस्वीर के आधार पर उसका विवरण तैयार करता था। फिर, इस विवरण को वापस SDXL में डाला गया। यह चक्र 100 दौर तक दोहराया गया।
बहुत जल्द ही हर उकसावे के मूल विचार गायब होने लगे और तस्वीरों में युरोपियन पुट (European bias) देखने को मिलने लगा। मसलन प्रधानमंत्री वाले उकसावे में, कुछेक राउंड के बाद शांति समझौता वाला गंभीर माहौल झाड़-फानूस से सजे एक भव्य बैठक व्यवस्था वाले बड़े से कमरे में तब्दील हो गया था। बाकी उकसावों की तस्वीरों में भी गोथिक कैथेड्रल, पेरिस की बारिश वाली रात, युरोपीय गांव के नज़ारे दिखने लगे। शोधकर्ताओं ने अन्य एआई मॉडल के साथ भी यह खेल खेला, लेकिन तब भी यही रुझान बने रहे।
इस पूरी प्रक्रिया के बाद एआई द्वारा बनाई गई तस्वीरों में मुख्यत: 12 आकृतियां दिखाई दीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये तस्वीरें ‘पिक्चर पर्फेक्ट’ (आदर्श) तस्वीरों की तरह थीं – आकर्षक, स्वीकार्य और आपत्तिजनक सामग्री से मुक्त। दोहरावों की संख्या 100 से बढ़ाकर 1000 करने पर भी यही नतीजे मिले। बस एक मामले को अपवाद माना जा सकता है, जिसमें 100 चक्र के बाद बर्फ से ढंका घर बदलकर मैदान में गाय के दृश्य की ओर और फिर विलक्षण शहर की ओर मुड़ गया।
तस्वीरों में यह पैटर्न दिखाई देना कुछ हद तक विज़ुअल मॉडल्स (visual models) को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किए गए डैटा सेट को प्रतिबिंबित करता है। जो जानकारी और चीज़ें मॉडल्स के पास थीं, उन्होंने वही समझा, वही बनाया। इन नतीजों से एक जो चिंता उभरती है वह यह कि यदि एआई से मनुष्य का दखल पूरी तरह हट जाएगा तो यह रचनात्मक विविधता को घटा सकता है। बेलगाम एआई प्रणालियां मौजूदा पूर्वाग्रहों को बढ़ा सकती हैं, मज़बूत कर सकती हैं। जैसे तस्वीरों में एक ही तरह की संस्कृति दिखना और बाकियों का गायब रहना (cultural bias in AI) उनकी महत्ता को ओझल करता है।
देखा जाए तो हर सभ्यता का (या मनुष्यों का भी) कुछ जानी-पहचानी चीज़ों की ओर झुकाव होता है। जैसे कुछ तरह की कलाकृतियां या कुछ तरह की कहानियां हर संस्कृति में मिलेंगी। लेकिन मनुष्यों के बीच हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो कुछ नया और कुछ अलग रचते (creative innovation) रहते हैं, उसे तरजीह देते हैं। और ऐसे लोग एकरूपता को तोड़कर विविधता बनाए रखते हैं।
वैसे जिस तरह से मॉडल्स अपडेट हो रहे हैं, हो सकता है कि जल्द ही एआई मॉडल्स की ये खामियां भी दूर हो जाएं। लेकिन सवाल रचनात्मकता का है। मनुष्य के लिए खुद को समझने (human creativity) और अर्थ देने के लिए रचनात्मक होना ज़रूरी है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zfglxgr/full/_20251218_on_ai_convergences_lede.jpg
सोचिए, कैसा हो कि आप गूगल (Google) से बिना कुछ बोले मौसम की जानकारी ले सकें या फिर कोई रिमाइंडर सेट कर सकें। हाल ही में AlterEgo नामक एक नए पहनने योग्य डिवाइस (wearable device) ने कुछ ऐसा ही दावा किया है। इसमें आप मन में ‘बोलते’ हैं और एआई (AI) उसे समझ लेता है।
AlterEgo के निर्माता और प्रमुख अर्नव कपूर ने बताया कि इसे कान (ear) पर आराम से लगाया जा सकता है। यह एलन मस्क के Neuralink के समान मस्तिष्कीय संकेतों को नहीं पकड़ता बल्कि चेहरे और गले की मांसपेशियों (facial muscles) में बोलते समय (या बिना आवाज़ निकाले होंठ हिलाने पर) बनने वाले छोटे-छोटे विद्युत संकेतों को पकड़ता है। एआई इन संकेतों को शब्दों में बदल देता है और जवाब बोन कंडक्शन हेडफोन (bone conduction headphones) के ज़रिए पहनने वाले को सुनाई देता है।
कपूर के अनुसार यह आपको टेलीपैथी (telepathy) की ताकत देता है, लेकिन सिर्फ उन्हीं विचारों के लिए जिन्हें आप साझा करना चाहते हैं।
इस उपकरण की विशेष बात यह है कि इसे लगाने के लिए किसी ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं होती। यह बिल्कुल सुरक्षित है जो सिर्फ चेहरे और गले की नसों (nerves) से प्राप्त वाले संकेतों का इस्तेमाल करता है। इसी कारण इसे अपनाना बहुत आसान है।
यह सिस्टम 2018 में एमआईटी मीडिया लैब (MIT Media Lab) में एक भारी-भरकम प्रोटोटाइप (prototype) के रूप में शुरू हुआ था। क्योंकि उस समय एआई की स्पीच पहचान (speech recognition) तकनीक सीमित थी, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ साधारण कामों जैसे वेब सर्च करना या खाना ऑर्डर करने तक सीमित था। लेकिन अब एआई में हुई प्रगति से यह उपकरण एक आधुनिक और बाज़ार में उतरने लायक उत्पाद बन गया है।
सुविधा से परे, AlterEgo का असल फायदा स्वास्थ्य (healthcare) क्षेत्र में है। इसे ऐसे मरीज़ों पर आज़माया जा रहा है जिन्हें मोटर न्यूरॉन डिसीज़ (motor neuron disease) या मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियां हैं, जिनमें समय के साथ बोलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मरीज़ जो पूरी तरह से ‘लॉक-इन’ नहीं हैं लेकिन बोलने में संघर्ष करते हैं, उनके लिए यह उपकरण परिवार, डॉक्टर और देखभाल करने वाले के साथ संवाद का एक अहम साधन बन सकता है।
बहरहाल, विशेषज्ञ अभी सतर्क हैं। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी (Washington University) के इंजीनियर हावर्ड चिज़ेक का मानना है कि यह तकनीक बहुत स्मार्ट (smart technology) है और प्राइवेसी के लिए अमेज़न एलेक्सा (Amazon Alexa) जैसे उपकरणों से भी सुरक्षित है जो हमेशा सुनते रहते हैं। लेकिन एक मुख्य सवाल आम लोगों तक इसकी पहुंच का है क्योंकि इसका इस्तेमाल काफी हद तक चेहरे की मांसपेशियों पर उपयोगकर्ता के नियंत्रण (user control) पर निर्भर करता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://iol-prod.appspot.com/image/8490944adaedd3bd06ef4a179f36ab35e7bdcfd2=w700
भारतीय रेल्वे (Indian Railways) ने हाल ही में घोषणा की है कि हाइड्रोजन से चलने वाली एक ट्रेन (Hydrogen Train India) ने सभी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं; यह ट्रेन चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्टरी में विकसित की गई है। यह कदम राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen Mission) की प्रगति का एक अच्छा संकेत है। इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में प्रति वर्ष कम से कम पचास लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करना है, जो 2070 तक देश में शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net Zero Emission) के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
यह ट्रेन जल्द ही हरियाणा में जींद और सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर लंबे मार्ग दौड़ेगी। यह ट्रेन जींद में स्थित 1 मेगावाट के पॉलीमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइज़र (PEM Electrolyzer) द्वारा उत्पादित हाइड्रोजन पर निर्भर है, जहां प्रतिदिन 430 किलोग्राम हाइड्रोजन का उत्पादन होता है। ट्रेन के ईंधन टैंक में हाइड्रोजन भरी जाएगी, ईंधन सेल (Fuel Cell Technology) हाइड्रोजन को बिजली में बदलेगा जिससे ट्रेन की इलेक्ट्रिक मोटरें चलेंगी।
हाइड्रोजन बनाने का सिद्धांत (Hydrogen Production Process) काफी सरल है। विद्युत-अपघटक पानी के अणु को ऑक्सीजन, हाइड्रोजन आयन और इलेक्ट्रॉन में तोड़ता है। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया में ऋणात्मक इलेक्ट्रोड (एनोड – (Anode)) पर आणविक ऑक्सीजन मुक्त होती है, और मुक्त इलेक्ट्रॉन एक बाहरी परिपथ के माध्यम से धनात्मक इलेक्ट्रोड (कैथोड- (Cathode)) तक पहुंचते हैं। कैथोड और एनोड के बीच छन्ने के रूप में एक बहुलक विद्युत अपघटक झिल्ली होती है, जो केवल हाइड्रोजन आयन को कैथोड तक जाने देती है, जहां वे इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलकर हाइड्रोजन अणु बनाते हैं। ये अणु गैस के रूप में ऊपर आते हैं। फिर इस गैस को संपीड़ित करके संग्रहित कर लिया जाता है। छन्ने के तौर पर इस्तेमाल झिल्ली आम तौर पर एक फ्लोरोपॉलीमर, जैसे नैफिऑन (टेफ्लॉन से सम्बंधित) (Nafion Membrane), से बनी होती है। यह झिल्ली विद्युत की उम्दा कुचालक होती है, जो अपने में से इलेक्ट्रॉन्स को गुज़रने नहीं देती। उत्पादित हाइड्रोजन और ऑक्सीजन एकदम अलग-अलग जगह बनते हैं।
हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों (Hydrogen Vehicles) में हाइड्रोजन ईंधन सेल में उपरोक्त अभिक्रिया विपरीत दिशा में होती है। हाइड्रोजन को एनोड तक लाया जाता है, जहां उत्प्रेरक (Catalyst) की उपस्थिति में प्रत्येक हाइड्रोजन अणु टूटकर दो हाइड्रोजन आयन और दो इलेक्ट्रॉन बनाता है। हाइड्रोजन आयन झिल्ली से होकर कैथोड तक जाते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन इस झिल्ली को पार नहीं कर पाते और एक बाहरी परिपथ (External Circuit) के ज़रिए कैथोड तक पहुंचते हैं। कैथोड पर हाइड्रोजन आयन का संपर्क हवा में मौजूद ऑक्सीजन और एनोड तक बाहरी परिपथ के माध्यम से लाए गए इलेक्ट्रॉनों से होता है। इस प्रकार पानी बनता है। बाहरी परिपथ से प्रवाहित इलेक्ट्रॉन विद्युत धारा पैदा करते हैं जो वाहन को शक्ति प्रदान करती है।
ईंधन सेल (Hydrogen Fuel Cell) और विद्युत अपघटक में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक अभिक्रिया स्वतःस्फूर्त होती है। दूसरी ओर, पानी अपने आप इन दो तत्वों में नहीं टूटता। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया को ऊर्जा देने के लिए विद्युत आपूर्ति आवश्यक होती है।
और, हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen Production) बनाने के लिए विद्युत-अपघटक को बिजली नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों से मिलनी चाहिए; जैसे, सौर (Solar Energy) या पवन ऊर्जा (Wind Energy)। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के नए स्रोतों की ज़रूरत होगी। सूक्ष्मजीवों की इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाओं (Microbial Electrolysis Cell) में हाइड्रोजन का उत्पादन करने के रोमांचक प्रयास भी चल रहे हैं। इसमें विद्युत-रासायनिक रूप से सक्रिय सूक्ष्मजीव एनोड पर फलते-फूलते हैं और कृषि अवशेषों, अपशिष्ट जल जैसे कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण करते हैं, और इस प्रक्रिया में उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को एनोड तक पहुंचाया जाता है।
उत्प्रेरक (Hydrogen Catalyst) के तौर पर इसमें प्लैटिनम, इरिडियम जैसे महंगे पदार्थ चाहिए होते हैं। वर्तमान शोध का उद्देश्य महंगे तत्वों को निकल, कोबाल्ट, या लोहे जैसे सस्ते तत्वों से प्रतिस्थापित करना है। सस्ते हाइड्रोजन उत्पादन (Low-cost Hydrogen) के शुरुआती कार्य में जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (J.N.C.A.S.R.) के सी.एन.आर. राव के समूह ने प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के बराबर जल-अपघटन क्षमता वाले निकल-निकल हाइड्रॉक्साइड-ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड डिज़ाइन किए हैं। ऐसे शोध कार्यों को सौर ऊर्जा (Solar Hydrogen) और सूक्ष्मजीव-चालित प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर एक ऐसा ईंधन तैयार किया जा सकता है जो पर्यावरण के अनुकूल भी हो और सस्ता भी। (स्रोतफीचर्स)
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