शायद भारत में सुपरनोवा का अवलोकन किया गया था – प्रदीप

बात 4 जुलाई 1054 की है जब चीन और जापान के शाही ज्योतिषियों ने रात्रि आकाश के एक कोने में वृषभ राशि के अंदर अचानक एक प्रकाशपुंज को उभरते हुए देखा था जबकि कुछ ही देर पहले वहां कुछ नहीं था। अचानक ही वहां तारे जैसा कुछ चमकने लगा। इसके बाद वह इस कदर चमकीला होता गया कि उसकी चमक शुक्र ग्रह की चमक से पांच गुना ज़्यादा हो गई। पूरे 23 दिनों तक वह तारा दिन के उजाले में भी चमकता रहा! ज्योतिषी इसे देखकर हैरान हो गए होंगे; उन्हें बिलकुल भी समझ में नहीं आया होगा कि आखिर वह चीज़ थी क्या और अचानक कहां से प्रकट हुई थी? चीनी ज्योतिषियों ने एकाएक प्रकट होने वाले इस तारे को ‘काई ज़िंग’ या ‘मेहमान तारा’ नाम दिया। वह मेहमान तारा तकरीबन दो साल बाद आकाश से ओझल हो गया!

वृषभ राशि के ठीक उसी स्थान पर युरोपीय खगोलविदों ने 700 वर्ष बाद सन 1731 में दूरबीन से एक तारा देखा। फिर 1758 में खगोलविद शार्ल मेसिए ने बताया कि वह कोई तारा नहीं है, बल्कि एक निहारिका (नेबुला) है। चीनियों द्वारा देखे गए ‘मेहमान तारे’ के विस्फोट के अवशेष कर्क निहारिका (क्रैब नेबुला) के रूप में आज भी मौजूद हैं। ऐसे ही विस्फोटित तारों को अब वैज्ञानिक नोवा या सुपरनोवा नाम देते हैं। जब कोई तारा बतौर सुपरनोवा विस्फोटित होता है तब उसकी चमक कुछ देर के लिए समूची मंदाकिनी को भी फीका कर देती है। यही नहीं, इस दौरान इतनी अधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है कि उतनी ऊर्जा हमारा सूर्य अपने पूरे जीवनकाल में नहीं उत्सर्जित कर सकता!

एक सहस्राब्दी में कोरी आंखों से चंद सुपरनोवा विस्फोट ही दिखाई देते हैं। इस लिहाज़ से सुपरनोवा का दिखाई देना एक दुर्लभ खगोलीय घटना है। क्रैब सुपरनोवा के बाद खगोलविद टायको ब्रााहे ने 1572 में और जोहांस केपलर ने 1604 में हमारी आकाशगंगा में  प्रकट हुए सुपरनोवा देखे थे।

खगोलविदों का मानना है कि 1054 के सुपरनोवा को चीन और जापान के अलावा दुनिया में और भी जगहों पर (मसलन भारत, यूरोप, मध्यपूर्व और अमेरिका) में भी लोगों ने देखा होगा। आश्चर्य की बात यह है इस अद्भुत खगोलीय घटना को भारत में देखे जाने का कोई भी उल्लेख या रिकॉर्ड अभी तक नहीं मिला था, जबकि उस समय भारत में सैद्धांतिक खगोल विज्ञान का स्वर्णयुग चल रहा था। यह युग पांचवी शताब्दी में आर्यभट से लेकर बारहवीं शताब्दी में भास्कर द्वितीय तक चला। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री जयंत नार्लीकर और संस्कृत और प्राकृत भाषा की विद्वान सरोजा भाटे ने उस काल में रचित साहित्य, अभिलेखों आदि की जांच-पड़ताल की जिस काल में क्रैब सुपरनोवा की घटना घटी थी, तो उन्हें भारतीयों द्वारा सुपरनोवा देखने का कोई भी साक्ष्य या उल्लेख नहीं मिला।

अब जवाहरलाल नेहरू प्लेनेटेरियम, बैंगलुरु की भूतपूर्व निदेशक डॉ. बी.एस. शैलजा ने इंडिया साइंस वायर में प्रकाशित एक फीचर आलेख में यह जानकारी दी है कि हाल में किए गए अध्ययनों में कुछ शिलालेखों में भारतीयों द्वारा उक्त सुपरनोवा को देखने के साक्ष्य मिले हैं। आगे डॉ. शैलजा को ही उद्धरित कर रहा हूं।

दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में पत्थरों पर लिखने की परंपरा रही है। इन शिलालेखों में प्रयुक्त भाषा संस्कृत थी, जिसका अभिप्राय समझना सरल था। इन शिलालेखों में ग्रहणों और ग्रहों की युतियों से सम्बंधित खगोलीय विवरण मिलते हैं।

कंबोडिया में एक ऐसा शिलालेख मिला है, जिसमें किसी साधु द्वारा शिवलिंग की स्थापना के समय शिव के लिए ‘शुक्रतारा प्रभावाय’ विशेषण प्रयुक्त हुआ है, अर्थात वह जो शुक्र जैसी तीव्र कांति उत्पन्न कर सकता है। शिलालेख शुक्र जैसे चमकीले किसी तारे के प्रेक्षण की ओर संकेत करता है और शायद वह सुपरनोवा देखने की घटना थी।

एक और ऐसा शिलालेख मिला है जो अजिला साम्राज्य के समय का है। इसमें कर्नाटक के वेनुरु नामक कस्बे में बाहुबली की विशाल प्रतिमा की स्थापना के बारे में लिखा है। एक समय में कर्नाटक जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। यद्यपि यह शिलालेख कन्नड़ लिपि में लिखा गया है, पर इसकी भाषा संस्कृत है। शिलालेख में उस समय की पूरी तारीख लिखी है; दिन, महीना और वर्ष सहित। इस शिलालेख में 1604 के सुपरनोवा का ज़िक्र है।

शिलालेख में इस स्तंभ को ‘क्षीरामबुधि में निशापति’ की संज्ञा दी गई है। निशापति चंद्रमा को कहते हैं। यह शब्द कपूर के लिए भी प्रयुक्त होता है। क्षीरामबुधि के दो अर्थ संभव हैं, कर्नाटक का बेलागोला (कन्नड़ में जिसका अर्थ सफेद झील है) कस्बा, और दूसरा आकाशगंगा। वर्ष 1604 का सुपरनोवा धनु राशि के क्षेत्र में देखा गया था, जो आकाशगंगा में स्थित है।

एस्ट्रोलेब नामक प्राचीन खगोलीय यंत्र का उपयोग पुराने समय में समुद्री यात्राओं में दिशाज्ञान के लिए किया जाता था। एस्ट्रोलेब दरअसल तारों-नक्षत्रों की क्षितिज से ऊंचाई बताता है। एक इतिहासकार प्रोफेसर एस.आर. शर्मा ने जब विश्व भर के संग्रहालयों में विभिन्न एस्ट्रोलेब यंत्रों का अध्ययन किया तो उन्हें 25 दिसंबर 1605 का बना एक एस्ट्रोलेब मिला। इसमें धनुषाग्र और धनुकोटि नाम के दो तारे अंकित मिले। तारा धनुकोटि तो लगभग सभी एस्ट्रोलेब में मिलता है और उसका पाश्चात्य नाम है ‘अल्फा ओफियुकी’ या अरबी नाम ‘रासअलहाइग’ है पर तारा धनुषाग्र केवल इसी एस्ट्रोलेब में मिला और इसकी स्थिति वर्ष 1604 के सुपरनोवा के स्थान पर मिली। इस प्रकार हमें दो ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में इस सुपरनोवा का उल्लेख मिलता है।

इसी प्रकार, हमें 1572 के सुपरनोवा का उल्लेख संस्कृत व्याकरण की एक पुस्तक में मिलता है, जिसे संस्कृत के एक विद्वान अप्पया दीक्षित (1520-1593) ने लिखा था। उनकी रचना ‘कुवाल्यानंदा’ में लिखा है – “व्योमगंगा (आकाशगंगा) में यह क्या है? कमल जैसा है। चंद्रमा भी नहीं है। सूर्य भी नहीं, क्योंकि समय रात का है।” इन उल्लेखों को देखते हुए लगता है कि अन्य भारतीय भाषाओं में ऐसे संदर्भों में इन खगोलीय घटनाओं को खोजना उपयोगी हो सकता है।

उपरोक्त आधार पर हम कह सकते हैं कि शायद विद्वानों का यह मत सही नहीं है कि भारतीय लेखन में सुपरनोवा जैसी महत्वपूर्ण आकाशीय घटनाओं का उल्लेख नहीं मिलता। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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परमाणु विखंडन का एक दुर्लभ ढंग देखा गया

टली के एक पर्वत के अंदर बैठकर वैज्ञानिकों का एक दल डार्क मैटर की खोज में जुटा है। उन्हें अभी तक डार्क मैटर यानी अदृश्य पदार्थ के ‘दर्शन’ तो नहीं हुए हैं लेकिन एक दुर्लभ किस्म के परमाणु विखंडन की प्रक्रिया को देखने और अध्ययन करने का मौका ज़रूर मिल गया।

यह प्रयोग ज़ीनॉन सहयोग है। इसमें एक बड़-सी टंकी में 3200 किलोग्राम ज़ीनॉन गैस भरी है। ज़ीनॉन एक अक्रिय गैस है और विकिरण से सुरक्षित है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि यदि ब्राहृांड में कणों की कोई अत्यंत दुर्लभ अंतर्क्रिया हुई तो ज़ीनॉन की इस टंकी में उसे कैद करना और उसका अध्ययन करना सबसे बढ़िया ढंग से हो सकेगा।

अलबत्ता, ऐसी कोई अंतर्क्रिया तो देखी नहीं गई है जो अदृश्य पदार्थ का सुराग दे सके लेकिन ज़ीनॉन के परमाणु का विखंडन ज़रूर देख लिया गया है जो अपने-आप में एक दुर्लभ घटना है।  इस घटना की दुर्लभता को समझने के लिए यह आंकड़ा पर्याप्त होगा कि ज़ीनॉन-124 की अर्ध-आयु 1.8×1022 वर्ष है। यह ब्राहृांड की वर्तमान उम्र से लगभग 1 खरब गुना है। अर्ध-आयु का मतलब होता है कि किसी पदार्थ के जितने परमाणु हैं उनमें से आधे के विखंडन में लगने वाला समय।

ज़ीनॉन का परमाणु भार 124 है और इसके केंद्रक में 54 प्रोटॉन होते हैं। इसके परमाणु का विखंडन होता है तो एक अन्य तत्व टेलुरियम-124 बनता है। यह विखंडन सामान्य विखंडन नहीं है बल्कि थोड़ा असाधारण है। ज़ीनॉन-124 के विखंडन में होता यह है कि उसके केंद्रक के इर्द-गिर्द घूम रहे 54 इलेक्ट्रॉन में से 2 केंद्रक में प्रवेश कर जाते हैं। केंद्रक में पहुंचकर ये दोनों एक-एक प्रोटॉन से जुड़कर उन्हें न्यूट्रॉन में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया में न्यूट्रिनो नामक कण मुक्त होते हैं। न्यूट्रिनो एक रहस्यमय कण है जिस पर कोई आवेश नहीं होता और जिसका द्रव्यमान भी नगण्य होता है। इसलिए यह कण अन्य कणों से कोई अंतर्क्रिया करे तो भी पता नहीं चलता।

बहरहाल, विखंडन की इस प्रक्रिया में ऊर्जा मुक्त होती है जो एक्स-रे के रूप में निकलती है। ज़ीनॉन सहयोग के दल ने इसी एक्स-रे के आधार पर पता लगाया है कि ज़ीनॉन की टंकी में यह दुर्लभ विखंडन हुआ है। इसकी मदद से उन्होंने इस क्रिया के समय का मापन भी किया है। इसके आधार पर वे ज़ीनॉन-124 की अर्ध-आयु निकालने में सफल रहे हैं। यह प्रयोग द्वारा निकाली गई सबसे लंबी अर्ध-आयु है। वैसे इससे अधिक अर्ध-आयु टेलुरियम-128 की है किंतु उसे प्रयोग द्वारा नहीं निकाला गया है बल्कि उसकी गणना ही की गई है। (स्रोत फीचर्स)

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पृथ्वी धुरी पर क्यों घूमती है?

पृथ्वी के अस्तित्व में आने से लेकर अभी तक वह लगातार अपनी धुरी पर घूम रही है। इसके घूमने से ही हम रोज़ सूर्योदय और सूर्यास्त देखते हैं। और जब तक सूरज एक लाल दैत्य में परिवर्तित होकर पृथ्वी को निगल नहीं जाता तब तक ऐसे ही घूमती रहेगी।  लेकिन सवाल यह है कि पृथ्वी घूमती क्यों है?

पृथ्वी का निर्माण सूर्य के चारों ओर घूमने वाली गैस और धूल की एक डिस्क से हुआ। इस डिस्क में धूल और चट्टान के टुकड़े आपस में चिपक गए और पृथ्वी का निर्माण हुआ। जैसे-जैसे इसका आकार बढ़ता गया, अंतरिक्ष की चट्टानें इस नए-नवेले ग्रह से टकराती रहीं और इन टक्करों की शक्ति से पृथ्वी घूमने लगी। चूंकि प्रारंभिक सौर मंडल में सारा मलबा सूर्य के चारों ओर एक ही दिशा में घूम रहा था, टकराव ने पृथ्वी और सौर मंडल की सभी चीज़ों को उसी दिशा में घुमाना शुरू कर दिया।

लेकिन सवाल यह उठता है सौर मंडल क्यों घूम रहा था? धूल और गैस के बादल का अपने ही वज़न से सिकुड़ने के कारण सूर्य और सौर मंडल का निर्माण हुआ था। अधिकांश गैस संघनित होकर सूर्य में परिवर्तित हो गई, जबकि शेष पदार्थ ग्रह बनाने वाली तश्तरी के रूप में बना रहा। इसके संकुचन से पहले, गैस के अणु और धूल के कण हर दिशा में गति कर रहे थे किंतु किसी समय पर कुछ कण एक विशेष दिशा में गति करने लगे। जिससे इनका घूर्णन शुरू हो गया। जब गैस बादल पिचक गया तब बादल का घूमना और तेज़ हो गया। जैसे जब कोई स्केटर अपने हाथों को समेट लेता है तो उसकी घूमने की गति बढ़ जाती है। अब अंतरिक्ष में चीज़ों को धीमा करने के लिए तो कुछ है नहीं, इसलिए, एक बार जब कोई चीज़ घूमने लगती है, तो घूमती रहती है। ऐसा लगता है कि शैशवावस्था में सौर मंडल के सारे पिंड एक ही दिशा में घूर्णन कर रहे थे।

अलबत्ता, बाद में कुछ ग्रहों ने अपने स्वयं का घूर्णन को निर्धारित किया है। शुक्र पृथ्वी के विपरीत दिशा में घूमता है, और यूरेनस की घूर्णन धुरी 90 डिग्री झुकी हुई है। वैज्ञानिकों के पास इसका कोई ठोस उत्तर तो नहीं है किंतु कुछ अनुमान ज़रूर हैं। जैसे, हो सकता है कि किसी पिंड से टक्कर के कारण शुक्र उल्टी दिशा में घूमने लगा हो। या यह भी हो सकता है कि शुक्र के घने बादलों पर सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव और शुक्र के अपने कोर व मेंटल के बीच घर्षण की वजह से ऐसा हुआ हो। यूरेनस के मामले में वैज्ञानिकों ने सुझाया है कि या तो एक पिंड से ज़ोरदार टक्कर या दो पिंडों से टक्कर ने उसे पटखनी दी है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ ग्रह ही अपनी धुरी पर घूमते हैं। सौर मंडल में मौजूद सभी चीज़ें (क्षुद्रग्रह, तारे, और यहां तक कि आकाश गंगा भी) घूमती हैं।

चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी की गति में भी कमी आती है। 2016 में प्रोसिडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी के अनुसार एक सदी में पृथ्वी का एक चक्कर 1.78 मिलीसेकंड धीमा हो गया है। (स्रोत फीचर्स)

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ब्लैक होल की पहली तस्वीरें

गोलविदों के एक अंतर्राष्ट्रीय समूह ने हाल ही में ब्लैक होल का सबसे पहला प्रत्यक्ष चित्र प्राप्त किया है। यह उपलब्धि उनको चार महाद्वीपों पर स्थापित आठ रेडियो वेधशालाओं के समन्वय से हासिल हुई। इन वेधशालाओं ने मिलकर काम किया तो ये पृथ्वी के आकार की एक विशाल आभासी दूरबीन बन गर्इं।

एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल लेटर्स के विशेष अंक में प्रकाशित शोध पत्रों में टीम ने M87 निहारिका के केंद्र में स्थित एक विशाल ब्लैक होल की चार छवियां प्रस्तुत की हैं। M87 एक निहारिका है जो पृथ्वी से 550 लाख प्रकाश वर्ष दूर कन्या (virgo) निहारिका-समूह के भीतर स्थित है। चारों छवियों में केंद्र में एक अंधेरा दायरा है और उसके चारों ओर प्रकाश का एक छल्ला नज़र आ रहा है।

ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि इससे, कुछ और तो क्या, प्रकाश भी नहीं निकल सकता। लिहाज़ा, ब्लैक होल अदृश्य होते हैं। लेकिन अगर कोई ब्लैक होल प्रकाश-उत्सर्जक पदार्थ (जैसे प्लाज़्मा) से घिरा हो, तो वह पदार्थ ब्लैक होल या उसकी परिधि रेखा (आउटलाइन) की एक छाया का निर्माण करेगा। इस आउटलाइन को ब्लैक होल का इवेंट होराइज़न कहते हैं। इन चित्रों से टीम ने अनुमान लगाया है कि उक्त ब्लैक होल सूरज से लगभग 6.5 अरब गुना अधिक वज़नी है। इन चार चित्रों के बीच थोड़ा-थोड़ा अंतर इस बात का संकेत देता है कि यह पदार्थ लगभग प्रकाश की गति से ब्लैक होल के आसपास घूम रहा है।

चित्रों की एक विशेषता यह भी है कि प्रकाश का छल्ला चारों तरफ एक समान नहीं है। एक तरफ यह थोड़ा ज़्यादा चमकीला है। यह ठीक आइंस्टाइन की भविष्यवाणी के अनुरूप है।

ये चित्र इवेंट होराइज़न टेलीस्कोप (ई.एच.टी) द्वारा लिए गए हैं जिसमें आठ रेडियो टेलिस्कोप हैं। ये टेलीस्कोप एक दूसरे से दूर-दूर ऊंचाई वाले स्थानों पर स्थापित हैं। ये रेडियो तरंगों का उत्सर्जन करने वाली खगोलीय वस्तुओं का निरीक्षण करते हैं। ब्लैक होल आकाश में किसी भी अन्य रेडियो रुाोत की तुलना में अत्यंत छोटा और काला होता है। इसे देखने के लिए बहुत कम तरंग दैर्ध्य का उपयोग करना होता है।

ब्लैक होल का चित्र बनाने के लिए उच्च कोणीय विभेदन की आवश्यकता होती है। टेलीस्कोप का कोणीय विभेदन उसकी डिश के आकार के साथ बढ़ता है। दिक्कत यह है कि पृथ्वी का सबसे बड़ा टेलीस्कोप भी इतना बड़ा नहीं है जिससे ब्लैक होल को देखा जा सके। लेकिन जब एक-दूसरे से काफी दूरी पर स्थित बहुत सारे टेलीस्कोप को एक साथ तालमेल बनाकर एक ही पिंड पर केंद्रित किया जाए तो वे एक बहुत बड़े रेडियो डिश के रूप में काम कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उम्दा चित्र प्राप्त किए जा सकते हैं।

वैसे तो ब्लैक होल को चित्रित करने के प्रयास काफी समय से किए जा रहे हैं लेकिन वर्ष 2007 में डोलमैन की टीम ने परीक्षण के लिए ई.एच.टी. का इस्तेमाल किया। आज ई.एच.टी. 11 वेधशालाओं की एक शृंखला है। उम्मीद है कि ई.एच.टी. से ब्लैक होल का अवलोकन खगोल भौतिकी के एक नए युग की शुरुआत करेगा। (स्रोत फीचर्स)

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एक खोजी की अनोखी यात्रा – डॉ. अरविंद गुप्ते

7 जुलाई 2003 को एक खोजी 50 करोड़ किलोमीटर लम्बी यात्रा पर 20 हज़ार किलोमीटर प्रति घंटा की गति से चल पड़ा। यह यात्री कोई मनुष्य नहीं, अमेरिका द्वारा मंगल ग्रह की ओर भेजा गया यान अपॉर्चुनिटी (संक्षेप में ऑपी) था। साढ़े पांच महीनों की लम्बी यात्रा के दौरान ऑपी सोता रहा और जनवरी 2004 को वह अपने लक्ष्य के पास पहुंचा। फिर उसे भेजने वाले वैज्ञानिकों ने उसकी गति छह मिनटों में शून्य कर दी। इसके बाद वह तेज़ी से मंगल ग्रह पर गिरने लगा। किंतु इसके पहले कि वह लाल ग्रह से टकराता, उसके पैराशूट और झटकों से बचाने वाले एअर बैग खुल गए और वह मंगल की सतह पर आराम से उतर गया।

मंगल ग्रह पर उल्का पिंड टकराते रहते हैं और छोटे-बड़े गड्ढे बनते रहते हैं। ऐसे ही एक गड्ढे में उतरने के चार घंटे बाद ऑपी को नींद से जगाया गया। जब ऑपी ने अपनी आंखें खोली तब उसकी आंखों से दिख रहे दृश्य को देख वैज्ञानिक हैरान रह गए। उस गड्ढे की दीवार तलछटी चट्टानों से बनी थी। तलछटी चट्टानें केवल समुद्र जैसे बड़े जलाशयों में ही बनती हैं। पानी में निलंबित गाद पेंदे में बैठ जाती है और धीरे-धीरे चट्टानों में बदल जाती है। ऐसा नज़ारा पृथ्वी को छोड़ कहीं और नहीं देखा गया था। ऑपी ने उतरते ही सिक्सर लगा दिया था। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह तलछट किसी खारे पानी के समुद्र के सूखने से बनी थी। किसी भी ग्रह-उपग्रह पर जीवन लायक परिस्थितियों की खोज इस बात पर निर्भर करती है कि क्या उस ग्रह पर पानी है या कभी था।

ऑपी को कुछ लक्ष्य दिए गए थे:

1. चट्टानों और मिट्टियों का परीक्षण करके यह पता लगाना कि क्या मंगल पर कभी पानी था?

2. उतरने के स्थान के आसपास की भूमि पर उपस्थित खनिजों, चट्टानों और मिट्टी का परीक्षण करके उनके संघटन का निर्धारण करना।

3. यह निर्धारित करना कि किन भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने ग्रह की सतह को आकृति दी है और उसकी रासायनिक बनावट को प्रभावित किया है। इन प्रक्रियाओं में पानी या हवा से अपरदन, तलछटीकरण, ज्वालामुखीय गतिविधि आदि शामिल हैं।

4. मंगल ग्रह का चक्कर लगाने वाले उपग्रहों द्वारा किए गए अवलोकनों का सत्यापन करना।

5. लौह-युक्त खनिजों की खोज करना और ऐसे विशिष्ट खनिजों की पहचान करके उनकी मात्रा का निर्धारण करना जिनमें पानी हो सकता है या जो पानी में बने थे, जैसे लौह के कार्बन-युक्त यौगिक।

6. चट्टानों और मिट्टियों का परीक्षण करके यह पता करना कि उनका निर्माण किन प्रक्रियाओं से हुआ था।

7. उन भूगर्भिक संकेतों को खोजना जिनसे यह पता चले कि जब मंगल ग्रह पर पानी था तब पर्यावरणीय परिस्थितियां कैसी थीं और यह मूल्यांकन करना कि क्या वे परिस्थितियां जीवन के लिए अनुकूल थीं।

ऑपी से 20 दिन पहले अमेरिका का दूसरा खोजी यान (स्पिरिट) मंगल ग्रह की दूसरी बाजू पर उतर चुका था, किंतु यहां हम केवल ऑपी की ही चर्चा करेंगे। उपरोक्त भारी-भरकम कार्य के लिए ऑपी को केवल 90 सोल यानी पृथ्वी के लगभग 3 माह का समय दिया गया था। (मंगल ग्रह का एक दिन पृथ्वी के 24 घंटे और 40 मिनिट के बराबर होता है और इसे सोल कहते हैं।)

पहले लगभग दो महीनों तक (56 सोल) ऑपी उतरने की जगह के आसपास ही घूमता रहा। उसने अपने कई कैमरों से लगातार फोटो लिए, एक बरमे से ज़मीन में छेद किए, एक पहिए को ज़मीन पर रगड़ कर नाली खोद डाली और विभिन्न खनिजों के वर्णक्रमों का मापन किया।

57वें सोल पर ऑपी अपने गड्ढे से बाहर निकला और एक किलोमीटर दूर दूसरे, अधिक गहरे गड्ढे की ओर चल पड़ा। बड़े गड्ढे में उतरने के बाद उसने और खोजबीन की। इसके बाद ऑपी को निर्देश दिया गया कि वह उस गड्ढे की खोजबीन करे जो स्वयं उसके उष्णतारोधी आवरण के गिरने की वजह से बना था। इस आवरण ने उसे मंगल पर उतरते समय जल जाने से बचाया था। रास्ते में उसे एक उल्कापिंड मिल गया जो निश्चित रूप से किसी अन्य ग्रह से आ कर या अंतरिक्ष में अकेले भटकते हुए मंगल से टकरा गया था। फिर ऑपी ने मंगल के कई चंद्रमाओं में से एक (फोबोस) का फोटो खींचा।

सोल 946 पर ऑपी विक्टोरिया नामक विशाल गड्ढे के पास पहुंचा। ऑपी को इस यात्रा में कई संकटों का सामना करना पड़ा। एक बार वह रेत में फंस गया। कई सोल बाद वह मुश्किल से निकल पाया। फिर उसे मोड़ने वाली मोटरों में से एक खराब हो गई। उसके हाथ के जोड़ ने काम करना बंद कर दिया। फिर विक्टोरिया गड्ढे में उसे भयंकर तूफान का सामना करना पड़ा जिसके चलते उसके सौर पैनल मिट्टी से ढंक गए और पृथ्वी तथा सूर्य से उसका सम्पर्क कट गया। किंतु फिर एक ऐसा तूफान आया जिसने पैनलों पर जमी मिट्टी को उड़ा दिया। अब ऑपी को सौर ऊर्जा मिलने लगी और वह फिर चल पड़ा। आगे जाने पर ऑपी को एक घाटी दिखाई दी जिसके तल की ओर उतरते समय एक और तूफान आया और ऑपी के सौर पैनल फिर मिट्टी से ढंक गए और उसका पृथ्वी और सूर्य से सम्पर्क टूट गया। इस बार वैज्ञानिकों की लाख कोशिशों के बावजूद पैनलों से मिट्टी हटाई नहीं जा सकी और 12 फरवरी 2019 को अंतत: ऑपी को मृत घोषित कर दिया गया।

इस प्रकार, वैज्ञानिकों द्वारा जीवन की अवधि केवल 90 सोल माने जाने के बावजूद यह बहादुर यंत्र 5111 सोल (पंद्रह वर्ष से अधिक) तक जीवित रहा और मंगल ग्रह की और आगे होने वाली खोजों के लिए मज़बूत नींव रखकर हमेशा के लिए सो गया। (स्रोत फीचर्स)

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क्षुद्रग्रह रीयूगू पर विस्फोटक गिराया

पिछले वर्ष, अंतरिक्ष खोजी यान हयाबुसा-2 ने क्षुद्रग्रह रीयूगू पर गोली से हमला करने जैसे कई अतिरंजित जांच की हैं। लेकिन हाल ही में अब तक की सबसे साहसी आतिशबाज़ी का प्रदर्शन किया गया है। इस खोजी यान ने क्षुद्रग्रह की सतह पर एक छोटा गड्ढा बनाने के लिए विस्फोटक गिराया है।

मिशन से जुड़ी टीम ने अभी तक विस्फोट की पुष्टि नहीं की है। यदि यह कामयाब रहा तो यह क्षुद्रग्रह की कुछ अंदरुनी परतों को उजागर करेगा जिसको खोजी यान उतरने के बाद एकत्रित करेगा। यह कार्यवाही 5 अप्रैल, 2019 को अंजाम दी गई। खोजी यान ने क्षुद्रग्रह की सतह से 500 मीटर ऊपर पहुंचकर एक विस्फोटक गिराया गया। फिर थोड़ा ऊपर जाने के बाद एक उपकरण की मदद से कैमरा भी गिराया गया।

सगामिहारा स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एंड एस्ट्रोनॉटिकल साइंस (आईएसएएस) के इंजीनियर ओसामु मोरी के अनुसार विस्फोटक गिराने वाला प्रयोग थोड़ा अलग था। रीयूगू के कमज़ोर गुरुत्वाकर्षण के कारण बम को सतह तक पहुंचने में लगभग 40 मिनट लगे। इसी बीच अंतरिक्ष यान क्षुद्रग्रह के पीछे एक सुरक्षित क्षेत्र में पहुंच गया। इस तरह विस्फोट के कारण यान को नुकसान नहीं पहुंचा। एक कैमरा अभी भी लक्षित जगह के ऊपर स्थित है जो तस्वीरें मुख्य यान को भेजेगा जिनसे पुष्टि की जा सकेगी कि विस्फोट से कितना बड़ा गड्ढा बना है। इस प्रयोग से खगोलविदों को क्षुद्रग्रह की सतह के नीचे की सामग्री का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा जिससे सौर मंडल के शुरुआती समय की जानकारी मिल सकती है।

आने वाले हफ्तों में खोजी यान थोड़ी ऊंचाई से गड्ढे की तस्वीरें लेगा। इसके बाद यान को आगे की जांच के लिए गड्ढे में उतारकर नमूना एकत्र किया जाएगा। यह रियूगू से एकत्र किया गया दूसरा नमूना होगा। इससे पहले यान ने एक गोली से हमला करके थोड़ा मलबा एकत्रित किया था।

हयाबुसा-2 वर्ष 2014 के अंत में पृथ्वी से रवाना होकर जून 2018 में रियूगू पहुंचा। सितंबर और अक्टूबर में दो अलग-अलग चरणों में, इसने सतह पर तीन छोटी-छोटी जांच कीं। हयाबुसा का 2019 के अंत से पहले पृथ्वी पर वापस लौटना निर्धारित है। एक साल बाद, फिर से एक प्रवेश कैप्सूल प्रयोगशाला में अध्ययन हेतु नमूने लेगा।

अंतरिक्ष एजेंसियां पहले भी ऐसे प्रयोग कर चुकी हैं। 2005 में, नासा के डीप इम्पैक्ट मिशन ने टेम्पल 1 नामक धूमकेतु पर उच्च गति पर एक टक्कर करवाई थी। चांद की सतह पर टक्कर करवाई गई हैं और उनके प्रभावों का अध्ययन किया गया है। (स्रोत फीचर्स)

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ब्लैक होल की मदद से अंतरिक्ष यात्रा

किसी कल्पित एलियन सभ्यता द्वारा यात्रा करने के तरीके क्या होंगे? कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक खगोल विज्ञानी ने कुछ अटकल लगाई है। उनके अनुसार एलियन इसके लिए बायनरी ब्लैक होल पर लेज़र से गोलीबारी करके ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। गौरतलब है कि बायनरी ब्लैक होल एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं। दरअसल, यह नासा द्वारा दशकों से इस्तेमाल की जा रही तकनीक का ही उन्नत रूप है।

फिलहाल अंतरिक्ष यान सौर मंडल में ग्रेविटी वेल का उपयोग गुलेल के रूप में करके यात्रा करते हैं। पहले तो अंतरिक्ष यान ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और अपनी गति बढ़ाने के लिए ग्रह के करीब जाते हैं। जब गति पर्याप्त बढ़ जाती है तो इस ऊर्जा का उपयोग वे अगले गंतव्य तक पहुंचने के लिए करते हैं। ऐसा करने में वे ग्रह के संवेग को थोड़ा कम कर देते हैं, लेकिन यह प्रभाव नगण्य होता है।

यही सिद्धांत ब्लैक होल के आसपास भी लगाया जा सकता है। ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक होता है। लेकिन यदि कोई फोटॉन ब्लैक होल के नज़दीक एक विशेष क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो वह ब्लैक होल के चारों ओर एक आंशिक चक्कर पूरा करके उसी दिशा में लौट जाता है। भौतिक विज्ञानी ऐसे क्षेत्रों को ‘गुरुत्व दर्पण’ और ऐसे लौटते फोटॉन को ‘बूमरैंग फोटॉन’  कहते हैं।

बूमरैंग फोटॉन पहले से ही प्रकाश की गति से चल रहे होते हैं, इसलिए  ब्लैक होल के पास पहुंचकर उनकी गति नहीं बढ़ती बल्कि उन्हें ऊर्जा प्राप्त हो जाती है। फोटॉन जिस ऊर्जा के साथ गुरुत्व दर्पण में प्रवेश लेते हैं, उससे अधिक उर्जा उनमें आ जाती है। इससे ब्लैक होल के संवेग में ज़रूर थोड़ी कमी आती है।

कोलंबिया के खगोलविद डेविड किपिंग ने आर्काइव्स प्रीप्रिंट जर्नल में प्रकाशित एक पेपर में बताया है कि यह संभव है कि कोई अंतरिक्ष यान किसी बायनरी ब्लैक होल सिस्टम पर लेज़र से फोटॉन की बौछार करे और जब ये फोटॉन ऊर्जा प्राप्त कर लौटें तो इनको अवशोषित कर अतिरिक्त ऊर्जा को गति में परिवर्तित कर दे। पारंपरिक लाइटसेल की तुलना में यह तकनीक अधिक लाभदायक होगी क्योंकि इसमें ईंधन की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन इस तकनीक की भी सीमाएं हैं। एक निश्चित बिंदु पर अंतरिक्ष यान ब्लैक होल से इतनी तेज़ी से दूर जा रहा होगा कि वह अतिरिक्त गति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित नहीं कर पाएगा। अंतरिक्ष यान से पास के किसी ग्रह पर लेज़र को स्थानांतरित करके इस समस्या को हल करना संभव है: लेज़र को इस तरह सटीक रूप से निशाना लगाया जाए कि यह ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण से निकल कर अंतरिक्ष यान से टकराए।

किपिंग के अनुसार हो सकता है आकाशगंगा में कोई ऐसी सभ्यता हो जो यात्रा के लिए इस तरह की प्रणाली का उपयोग कर रही हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शुक्र पृथ्वी का सबसे नज़दीकी ग्रह नहीं है!

ब हम पृथ्वी के सबसे करीबी ग्रह की बात करते हैं तो हमारा जवाब शुक्र ग्रह होता है। लेकिन इसका सही जवाब है बुध। इसमें कोई शक नहीं कि शुक्र अपनी कक्षा में परिक्रमा करते हुए पृथ्वी के सबसे करीब आ जाता है लेकिन फिज़िक्स टुडे पत्रिका की एक टिप्पणी के अनुसार, बुध सबसे लंबे समय तक पृथ्वी के सबसे नज़दीक रहता है।

अलाबामा विश्वविद्यालय के पीएच.डी. छात्र टॉम स्टॉकमैन, अमेरिकी सेना के इंजीनियरिंग शोध संस्थान के गैब्रियल मनरो और नासा के सैमुअल गॉर्डनर के अनुसार कुछ लापरवाही, अस्पष्टता या समूह के विचारों से प्रभावित होकर विज्ञान संचारकों ने ग्रहों के बीच की औसत दूरी के बारे में एक त्रुटिपूर्ण धारणा के आधार पर यह प्रसारित कर दिया कि शुक्र हमारा सबसे नज़दीकी ग्रह है। दो ग्रहों के बीच की दूरी की गणना करते समय आम तौर पर सूर्य से उन दो ग्रहों की औसत दूरियों को घटाया जाता है। दिक्कत यहीं है। इस तरीके से दो ग्रहों के बीच की दूरी की गणना उसी स्थिति में की जाती है जब वे एक दूसरे के सबसे करीब होते हैं। लेकिन शुक्र और पृथ्वी कभी-कभी सूर्य से विपरीत दिशाओं में होते हैं क्योंकि दोनों ग्रह अलग-अलग गति से चलते हैं। इस स्थिति में उनकी दूरी औसत दूरी से बहुत अधिक होती है।

इस टिप्पणी में शोधकर्ताओं ने ग्रहों के बीच की दूरी मापने के लिए एक नई गणितीय तकनीक तैयार की है जिसे पॉइंट-सर्किल मेथड कहते हैं। इस विधि में प्रत्येक ग्रह की कक्षा पर कुछ बिंदुओं के बीच की दूरी का औसत पता की जाती है। इसका फायदा यह होता है कि विभिन्न समयों पर दूरी का भी ध्यान रखा जाता है।

इस विधि से गणना करने पर बुध अधिकतर समय पृथ्वी के सबसे करीब पाया गया। इतना ही नहीं बुध ग्रह, शनि एवं नेप्च्यून और अन्य सभी ग्रहों के भी सबसे निकटतम ग्रह था। शोधकर्ताओं ने पिछले 10,000 सालों के लिए हर 24 घंटे में ग्रहों की कक्षाओं में स्थिति के आधार पर गणना की है।

हालांकि सभी लोग ‘निकटतम’ ग्रह की इस नई परिभाषा से सहमत नहीं हैं। यह ‘निकटतम’ को परिभाषित करने का एक दिलचस्प तरीका ज़रूर है, मगर कई लोगों का कहना है कि इसमें दम नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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90 दिनों का अंतरिक्ष अभियान जो 15 वर्षों तक चला – प्रदीप

मारे सौरमंडल में मंगल ही इकलौता ऐसा ग्रह है जो कई मायनों में पृथ्वी जैसा है और भविष्य में पृथ्वी से बाहर मानव बस्ती बसाने के लिए भी सबसे उपयुक्त पात्र यही ग्रह नज़र आता है। इसके बारे में हमारे ज्ञान में वृद्धि के साथ-साथ वैज्ञानिकों और जनसाधारण की इसके प्रति रुचि में भी निरंतर वृद्धि हुई है। अंतरिक्ष खोजी अभियानों के लिहाज़ से भी अन्य ग्रहों-उपग्रहों और तारों की तुलना में मंगल सर्वाधिक उपयोगी और उपयुक्त ग्रह है। इसलिए पिछली सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुए ज़्यादातर अंतरिक्ष के खोजी अभियानों का लक्ष्य मंगल ही रहा है। इस सदी की शुरुआत में मंगल अन्वेषण के मामले में जिस खोजी अभियान ने सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोरीं और जिसने वैज्ञानिकों और जनसाधारण को सबसे ज्यादा आकर्षित किया, वह निश्चित रूप से नासा का ‘अपॉर्चुनिटी रोवर मिशन’ था।

13 फरवरी 2019 को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपॉर्चुनिटी रोवर मिशन की समाप्ति की घोषणा की। हालांकि इसका निर्धारित जीवनकाल केवल 90 दिनों का था, फिर भी इसने लगभग 15 वर्षों तक अपनी भूमिका कुशलतापूर्वक निभाई। अपनी अनुमानित उम्र को 60 गुना से अधिक करने के अलावा, रोवर ने मंगल की धरती पर 45 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की, जबकि योजना अनुसार इसे मंगल पर एक किलोमीटर ही चलना था।

अपॉर्चुनिटी रोवर को फ्लोरिडा के केप कैनावेरल एयरफोर्स स्टेशन से 7 जुलाई 2003 को प्रक्षेपित किया गया था। इसके लगभग सात महीने बाद 24 जनवरी, 2004 को अपॉर्चुनिटी रोवर  मंगल ग्रह के मेरिडियानी प्लायम नामक क्षेत्र में उतरा था। अपॉर्चुनिटी का जुड़वां स्पिरिट रोवर उससे 20 दिन पहले ही मंगल की सतह पर उतरा था और मई 2011 में अपने मिशन को पूरा करने से पहले स्पिरिट ने लगभग 8 किलोमीटर की दूरी तय की। इन दोनों रोबोटों ने इन्हें बनाने वालों की उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया।

अंतरिक्ष के खोजी अभियानों की विशेषज्ञ और दी प्लेनेटरी सोसाइटी की सीनियर एडिटर एमिली लकड़ावाला के मुताबिक अपॉर्चुनिटी रोवर से आम लोगों के लिए बड़ा बदलाव यह आया है कि मंगल अब एक सक्रिय ग्रह बन गया है, एक ऐसी जगह जिसे आप हर रोज़ खोज सकते हैं। अपॉर्चुनिटी ने मंगल की सतह पर उतरने के बाद अपनी आधी ज़िंदगी वहां घूमते हुए बिताई। चपटी सतह पर घूमते-घूमते यह एक बार रेत के टीले में कई हफ्तों तक फंसा रहा। वहीं पर भूगर्भीय उपकरणों की मदद से इसने मंगल ग्रह पर कभी तरल रूप में पानी होने की पुष्टि की। इससे वहां सूक्ष्मजीवों के पनपने की संभावना को बल मिला। मंगल पर अपने जीवन के दूसरे चरण में अपॉर्चुनिटी एंडेवर क्रेटर की कगारों पर चढ़ गया और इसने वहां से शानदार तस्वीरें खींचीं।  इसके साथ ही इसने जिप्सम की भी खोज कर डाली जिससे मंगल पर कभी तरल रूप में पानी की मौजूदगी की बात को और मज़बूती मिली।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय में रोवर्स साइंस पेलोड के मुख्य अन्वेषक स्टीव स्क्विरेस के मुताबिक यदि अपॉर्चुनिटी और स्पिरिट दोनों की खोजों को जोड़कर देखें तो पता चलता है कि आज निर्जन, वीरान और ठंडा दिखाई देने वाला यह ग्रह, जिसका पर्यावरण जीवन के अनुकूल नहीं है, सुदूर अतीत में कितना अलग था। अपॉर्चुनिटी ने 15 साल के अपने जीवन में मंगल की सतह की 2,17,000 से अधिक विहंगम तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं। 

मंगल पर पिछले साल जून में रेतीला तूफान आया था। इससे अपॉर्चुनिटी के ट्रांसमिशन पर बुरा प्रभाव पड़ा। इस तूफान के कारण सौर ऊर्जा संचालित रोवर से हमारा संपर्क टूट गया और करीब आठ महीने तक इससे कोई संपर्क नहीं हो पाया। रोवर ने आखिरी बार 10 जून 2018 को पृथ्वी के साथ संपर्क किया था। अभियान की टीम के अनुसार, संभावना यह है कि अपॉर्चुनिटी रोवर ने ऊर्जा की कमी के कारण काम करना बंद कर दिया। हालांकि टीम के सदस्यों ने रोवर से तकरीबन 800 बार संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता न मिलने पर इसे मृत घोषित करने का फैसला किया गया। अपॉर्चुनिटी के प्रोजेक्ट मैनेजर जॉन कल्लास ने कहा, “अलविदा कहना कठिन है, लेकिन समय आ गया है। इसने इतने सालों में शानदार प्रदर्शन किया है जिसकी बदौलत एक दिन आएगा, जब हमारे अंतरिक्ष यात्री मंगल की सतह पर चल सकेंगे।”

बहरहाल, मंगल की खोज निरंतर जारी है। नासा का इनसाइट लैंडर मंगल पर सफलतापूर्वक लैंडिंग कर चुका है और जल्दी ही लाल ग्रह की वैज्ञानिक जांच-पड़ताल शुरू करने जा रहा है। क्यूरियॉसिटी रोवर छह साल से अधिक समय से गेल क्रेटर की खोजबीन कर रहा है। और नासा का मार्स 2020 रोवर और युरोपियन स्पेस एजेंसी का एक्समर्स रोवर दोनों जुलाई 2020 में लॉन्च होंगे, और इस तरह यह पहला रोवर मिशन बन जाएगा, जिसे मुख्य रूप से लाल ग्रह पर अतीत के सूक्ष्मजीवी जीवन के संकेतों की तलाश के लिए बनाया गया होगा। अलविदा अपॉर्चुनिटी! (स्रोत फीचर्स)

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परमाणु की एक पुरानी गुत्थी सुलझी

भौतिकी की एक गुत्थी रही है जिसे भौतिक शास्त्री 1983 से जानते हैं। यह तो जानी-मानी बात है कि परमाणु में एक केंद्रक होता है जिसके अंदर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन नामक कण होते हैं और इलेक्ट्रॉन केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हैं। गुत्थी यह रही है कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का व्यवहार केंद्रक के अंदर और बाहर बहुत अलग-अलग होता है।

यह थोड़ी विचित्र बात है क्योंकि चाहे केंद्रक के अंदर हों या बाहर प्रोटॉन और न्य़ूट्रॉन तो वही रहते हैं। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन क्वार्क्स नामक कणों से बने होते हैं और इन कणों को साथ-साथ रखने का काम स्ट्रॉन्ग बल करते हैं। अवलोकन यह है कि जैसे ही क्वार्क्स केंद्रक के अंदर पहुंचते हैं, उनकी गति बहुत धीमी पड़ जाती है। क्वार्क्स की गति का निर्धारण मुख्य रूप से स्ट्रॉन्ग बल द्वारा होता है। दूसरी ओर, केंद्रक में न्यूट्रॉन व प्रोटॉन को साथ रखने का काम करने वाला बल अत्यंत दुर्बल होता है। तीसरा कोई बल होता नहीं जो क्वार्क्स को धीमा करे, लेकिन तथ्य यही है कि केंद्रक के अंदर क्वार्क्स की गति धीमी पड़ जाती है। भौतिकी समुदाय इसे ईएमसी प्रभाव कहता है। यह नाम उस समूह के नाम पर रखा गया है जिसने इसकी खोज की थी – युरोपियन म्युऑन कोलेबोरेशन। तो सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है।

केंद्रक में उपस्थित किन्हीं भी दो कणों को बांधकर रखने वाला बल करीब 80 लाख इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर होता है। दूसरी ओर न्यूट्रॉन या प्रोटॉन के अंदर क्वार्क्स को आपस में जोड़े रखने वाला बल 10,000 लाख इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर होता है। तो ऐसा तो नहीं हो सकता कि क्वार्क्स को आपस में बांधे रखने वाले इतने सशक्त बल को केंद्रक का हल्का-सा बल प्रभावित कर दे।

सापेक्षता का सिद्धांत कहता है कि किसी भी वस्तु के साइज़ पर उसकी गति का असर पड़ता है। यह असर कम गति से हलचल कर रही स्थूल वस्तुओं के संदर्भ में इतना कम होता है कि पता ही नहीं चलता। मगर क्वार्क्स के पैमाने पर यह काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसे सोने के केंद्रक को देखें तो उसके अंदर उपस्थिति प्रोटॉन व न्यूट्रॉन स्वतंत्र प्रोटॉन व न्यूट्रॉन की अपेक्षा 20 प्रतिशत तक छोटे होते हैं।

इस ईएमसी प्रभाव की व्याख्या के लिए भौतिक शास्त्रियों ने तमाम मॉडल विकसित किए हैं मगर आज तक कोई भी मॉडल इस विसंगति की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर सका है। अब एमआईटी के भौतिक शास्त्री ओर हेन और उनकी टीम ने इसकी एक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनका कहना है कि अधिकांश परिस्थितियों में केंद्रक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन एक दूसरे पर व्याप्त नहीं होते। किंतु कभी-कभी वे एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। शोधकर्ताओें का कहना है कि किसी भी क्षण केंद्रक के 20 प्रतिशत प्रोटॉन/न्यूट्रॉन इस अवस्था में रहते हैं। ऐसा होने पर क्वार्क्स के बीच ऊर्जा का विशाल प्रवाह होता है और यह प्रवाह उनकी संरचना और व्यवहार को बदल देता है। यही ईएमसी प्रभाव का कारण है। टीम ने कुछ प्रयोग भी किए और उनके परिणाम उपरोक्त व्याख्या के अनुरूप ही मिले हैं। कुल मिलाकर हेन की टीम का मत है कि ईएमसी प्रभाव कुछ न्यूट्रॉन/प्रोटॉन की इस विशेष अवस्था का परिणाम है। (स्रोत फीचर्स)

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