पारदर्शी लकड़ी की मज़बूती

तीन दशक पूर्व एक जर्मन वनस्पतिशास्त्री सिगफ्राइड फिंक ने पौधों के प्राकृतिक स्वरूप को बाधित किए बिना उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली का निरीक्षण करने की एक सरल इच्छा के साथ काम शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने पौधों की कोशिकाओं के रंजक को ब्लीच करके पारदर्शी लकड़ी बनाई थी। अलबत्ता, उनकी यह खोज काफी समय तक अनदेखी रही। हाल ही में स्वीडन स्थित केटीएच रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के पदार्थ विज्ञानी लार्स बर्गलुंड इस अध्ययन को एक बार फिर चर्चा में लाए हैं।

फिंक के अध्ययन से प्रेरित बर्गलुंड ने वनस्पति शास्त्र के परे इसे पारदर्शी प्लास्टिक के एक अधिक मज़बूत विकल्प के रूप में देखा। वहीं, मैरीलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी काफी समय से लकड़ी की शक्ति का उपयोग अपरंपरागत उपयोगों के लिए करने का प्रयास करते रहे थे।

इन दोनों समूहों द्वारा कई वर्षों के प्रयोगों से अब कुछ रोमांचक संभावनाएं उत्पन्न हो रही हैं। और इसमें अत्यंत-मज़बूत स्मार्टफोन स्क्रीन से लेकर नरम, चमकदार प्रकाश उपकरण और रंग बदलने वाली खिड़कियां बनाने की संभावना दिख रही है।

पारदर्शी लकड़ी के निर्माण में काष्‍ठ अपद्रव्य को संशोधित किया जाता है। यह गोंदनुमा पदार्थ लकड़ी की कोशिकाओं को एक साथ जोड़े रखता है। इस पदार्थ को हटाने या ब्लीच करने से खोखली कोशिकाओं का एक दूधिया-सफेद ढांचा बना रहता है। इस परिणामी ढांचे की कोशिका दीवारों और खाली जगहों से हुए प्रकाश अपवर्तन में फर्क के कारण यह अपारदर्शी रहता है। इन खाली जगहों में एपॉक्सी रेज़िन जैसे पदार्थ डालने से लकड़ी पारदर्शी हो जाती है।

इससे प्राप्त एक मिलीमीटर से लेकर एक सेंटीमीटर से भी कम पतला उत्पाद मधुमक्खी के छत्ते जैसे एक मज़बूत ढांचे का निर्माण करता है। इसमें लकड़ी के छोटे फाइबर की मज़बूती सबसे बेहतरीन कार्बन फाइबर से भी अधिक होती है। इस पर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि रेज़िन के मिश्रण से पारदर्शी लकड़ी प्लास्टिक और कांच से बेहतर प्रदर्शन करती है। इसमें प्लेक्सीग्लास की तुलना में तीन गुना अधिक ताकत और कांच की तुलना में दस गुना अधिक कठोरता होती है।

अलबत्ता, मोटाई बढ़ने पर पारदर्शिता कम हो जाती है। इसकी पतली चादरें 80 से 90 प्रतिशत प्रकाश को पार जाने देती हैं जबकि लगभग एक सेंटीमीटर मोटी लकड़ी केवल 40 प्रतिशत प्रकाश को आर-पार जाने देती है।

गौरतलब है कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य पारदर्शी लकड़ी के वास्तुशिल्प अनुप्रयोगों पर केंद्रित है जो विशेष रूप से खिड़कियों के लिए उपयोगी माना जा रहा है। इसके साथ ही कांच की तुलना में यह बेहतर इन्सुलेशन दे सकता है। इसके अतिरिक्त, लकड़ी के ऐसे संस्करण कांच की तुलना में ऊष्मा के बेहतर कुचालक भी होते हैं।

हालांकि पारदर्शी लकड़ी की खिड़कियां मज़बूती और बेहतर तापमान नियंत्रण प्रदान करती हैं लेकिन घिसे हुए कांच की तुलना में काफी धुंधली होती हैं। फिर भी यह कम रोशनी चाहने वालों के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावा मोटी लकड़ी की वहन क्षमता को देखते हुए इसे आंशिक भार वहन करने वाले प्रकाश स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह कमरे में नैसर्गिक रोशनी प्रदान करने में काफी उपयोगी हो सकती है।

वर्तमान शोध में पारदर्शी लकड़ी की कार्यक्षमता को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, इस लकड़ी को स्मार्ट खिड़कियों में परिवर्तित किया जा सकता है जो विद्युत प्रवाह देने पर पारदर्शी से रंगीन हो सकती हैं।

पर्यावरण के दृष्टिकोण से यह नई खोज ज़हरीले रसायनों और जीवाश्म-आधारित पॉलीमर को सीमित कर सकती है। हालांकि इस नई खोज के बावजूद वर्तमान विश्लेषणों से संकेत मिलता है कि पारदर्शी लकड़ी की तुलना में कांच का पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है। फिलहाल एक टिकाऊ सामग्री के रूप में इसकी क्षमता को देखते हुए, पारदर्शी लकड़ी को बाज़ार में लाने के लिए हरित उत्पादन और बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कार्बन डाईऑक्साइड का पावडर बनाएं

लवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के वैज्ञानिकों की एक टीम ने कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) को एक सौम्य, पावडरी पदार्थ में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की है। माना जा रहा है कि इस नई खोज से पृथ्वी को कार्बन डाईऑक्साइड के प्रभावों से बचाने और जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।

इस प्रक्रिया में सबसे पहले कार्बन डाईऑक्साइड को एक उत्प्रेरक के संपर्क में लाया जाता है और फिर विद्युतअपघटन के माध्यम से इस गैस को सोडियम फॉर्मेट में परिवर्तित किया जाता है। यह एक सुरक्षित, पावडरनुमा ईंधन है जिसका कई दशकों तक भंडारण किया जा सकता है और इसे स्वच्छ बिजली में परिवर्तित करना भी संभव लगता है।

यह पावडरी उत्पाद सोडियम फॉर्मेट नामक एक लवण जैसा ही है जिसका उपयोग सड़कों और हवाई अड्डों पर बर्फ पिघलाने के लिए होता रहा है। इस पावडर ने असाधारण स्थिरता का प्रदर्शन किया और क्षरण हुए बिना इसे 2000 घंटे तक भंडारित किया जा सका। इसके अलावा, एमआईटी टीम ने इसका उपयोग करके रेफ्रिजरेटर बराबर एक ईंधन सेल का निर्माण किया, जिसने बिना किसी उत्सर्जन के घरेलू स्तर पर बिजली उत्पन्न करने की क्षमता का प्रदर्शन किया।

इस नवाचार की प्रमुख विशेषता अन्य वैकल्पिक ईंधनों की सीमाओं से परे है। विषाक्त मेथनॉल या रिसाव की समस्या से ग्रस्त हाइड्रोजन के विपरीत कार्बन डाईऑक्साइड से उत्पन्न ईंधन दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण का एक सुरक्षित और अधिक कुशल समाधान है।

सेल रिपोर्ट्स फिज़िकल साइंसेज़ में प्रकाशित यह नवाचार काफी आशाजनक प्रतीत होता है लेकिन इसका व्यावसायीकरण चुनौतियों से भरा है। वैज्ञानिकों को इस अभूतपूर्व समाधान को आगे बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय की सीमा से परे संसाधनों और बाहरी समर्थन की आवश्यकता है।

उम्मीद है कि जैसे-जैसे व्यावसायिक संस्थाओं के साथ बातचीत गति पकड़ेगी, वैसे-वैसे यह खोज हमारे ऊर्जा परिदृश्य को भी व्यापक रूप से बदल देगी। यह वैश्विक ऊर्जा मांगों को पूरा करते हुए जलवायु परिवर्तन को थामने का एक शक्तिशाली समाधान साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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2023: अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान जगत की घटनाएं – चक्रेश जैन

साल 2023 में कृत्रिम बुद्धि (एआई) का नया अवतार ‘चैटजीपीटी’ सबसे अधिक चर्चा में रहा। ओपन एआई रिसर्च संस्थान ने इसे 30 नवम्बर 2022 को रिसर्च प्रीव्यू के रूप में जारी किया था। चैटजीपीटी की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि शुरुआती पांच दिनों के भीतर ही इसने वैज्ञानिकों सहित 18 करोड़ लोगों को आकर्षित कर लिया था। इसका उपयोग वैज्ञानिक शोधपत्र लेखन से लेकर ई-मेल और कूटलेखन तक में किया गया है।

नेचर पत्रिका ने वर्ष 2023 की टॅापटेन की सूची में दस व्यक्तियों के साथ एआई को भी शामिल किया है। एआई विज्ञान अन्वेषणों को नई दिशा दे रहा है और अनुसंधान की रफ्तार बढ़ा रहा है। एआई का प्रोटीन संरचना की व्याख्या से लेकर मौसम पूर्वानुमान और बीमारियों के निदान से लेकर विज्ञान संचार में उपयोग हो रहा है। इसके उपयोगों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है।

जिस मशीन को स्वयं मनुष्य ने तैयार किया, वही अब मनुष्य की बुद्धि को चुनौती दे रही है। वास्तव में यह चिन्ता और चुनौती दोनों का विषय है। इसी संदर्भ में नवम्बर में विश्व का पहला आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सुरक्षा शिखर सम्मेलन ब्रिटेन के बकिंघम में संपन्न हुआ। सम्मेलन में सरकारों के प्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों ने इसकी संहारक क्षमता से मानवता को बचाने के लिए बड़े निर्णय किए। सभी देशों ने एआई सुरक्षा पर एक साथ रिसर्च करने के लिए अपनी सहमति व्यक्त की।

इसी साल जून में खगोल भौतिकीविदों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अस्तित्व का पहला स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किया। इससे विशाल ब्लैक होल और ब्रह्मांड की आरंभिक उत्त्पति पर रोशनी डाली जा सकेगी।

वैज्ञानिकों ने पहली बार जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए मादा फ्रूट फ्लाय ड्रॉसोफिला मेलेनोगेस्टर के जीनोम में बदलाव किया, जिससे नर मक्खी के बिना ही प्रजनन का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस रिसर्च से वैज्ञानिकों को पार्थेनोजेनेसिस प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी। इसी वर्ष शोधकर्ताओं को ड्रॉसोफिला की आंत से एक नया कोशिकीय अंगाभ खोजने में सफलता मिली।

अनुसंधानकर्ताओं ने जीन संपादन तकनीक क्रिस्पर की सहायता से ऐसे वायरस का सृजन कर लिया है जिनकी मदद से भविष्य में हानिरहित वायरस पैदा किए जा सकेंगे। इसी साल वैज्ञानिकों ने हाइब्रिड बॉयो कंप्यूटर का निर्माण कर लिया, जिसमें मनुष्य के दिमाग की कोशिकाओं को प्रचलित परिपथ से जोड़ा गया। विदा हो चुके साल में पहली बार पूरी आंख का सफल प्रत्यारोपण डॉ. एडुआर्डो के नेतृत्व में किया गया। ब्रिटेन ने रक्त से सम्बंधित दो बीमारियों – सिकल सेल और थैलेसीमिया – की जीन संपादन चिकित्सा को मंज़ूरी प्रदान कर दी। ये दोनों ही आनुवंशिक बीमारियां हैं, जो हीमोग्लोबिन के जीन में त्रुटियों के कारण होती हैं।

विदा हो चुके साल 2023 में 7 सितंबर को होराइज़न युरोप रिसर्च प्रोग्राम में ब्रिटेन के फिर से शामिल होने पर वैज्ञानिकों ने जश्न मनाया। ब्रिटिश वैज्ञानिक ब्रेक्सिट मुद्दे पर मतभेदों को लेकर दो साल के लिए इस कार्यक्रम से बाहर हो गए थे।

गुज़रा साल पूरे विश्व में मोटे अनाज यानी मिलेट्स के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाया गया। मेलों और प्रदर्शनी के माध्यम से मोटे अनाजों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का कार्यक्रम जारी रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि मोटा अनाज सर्व हितकारी गुणों से भरपूर है और दुनिया को कुपोषण और भुखमरी से मुक्ति दिला सकता है।

इसी साल अगस्त में 47 साल बाद रूस ने चंद्र अभियान लूना-2 भेजा। जापान ने सितंबर में एक्स-रे टेलीस्कोप के साथ सफलतापूर्वक उपग्रह भेजा। यह उपग्रह ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति का अध्ययन करेगा। साल के अंत में उत्तर कोरिया ने अंतरिक्ष में निगरानी के लिए जासूसी उपग्रह मालिगयोंग-1 भेजा। वहीं 24 सितंबर को नासा का ओसिरिस-रेक्स अंतरिक्ष यान पहली बार बेन्नू नामक क्षुद्रग्रह से वहां की चट्टानों के नमूने लेकर सात साल बाद लौट आया। इन नमूनों से 4.5 अरब वर्ष पहले सौर मंडल की शुरुआत को बेहतर समझने में मदद मिलेगी।

नासा को पहली बार सौर मंडल के बाहर किसी ग्रह के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति के स्पष्ट सबूत मिले। वर्ष के उत्तरार्द्ध में खगोलविदों ने पृथ्वी से सौ प्रकाश वर्ष दूर तालबद्ध परिक्रमा करते छह ग्रहों का दुर्लभ परिवार खोजा। यह खोज ब्रह्मांड के रहस्यों की समझ बढ़ाने में सहायक होगी।

इसी वर्ष अफ्रीकी देशों में मारबर्ग वायरस चमगादड़ों के ज़रिए मनुष्य में फैला। मारबर्ग वायरस एबोला वायरस परिवार का सदस्य है। इस वायरस के संक्रमण में पहले बुखार आता है, फिर नाक से खून बहता है, और अंतत: मृत्यु तक हो सकती है।

अर्जेंटीना में जन्मे गणितज्ञ लुईस कैफरेली को साल 2023 का एबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसे गणित के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में स्थान प्राप्त है। रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान फ्रांसीसी-अमेरिकी वैज्ञानिक मौंगी बावेंडी, अमेरिकी वैज्ञानिक लुई ब्रूस और रूसी भौतिकशास्त्री एलेक्सी एकिमोव को दिया गया। तीनों वैज्ञानिकों ने ‘क्वांटम डाट्स’ की खोज में अहम योगदान दिया है। भौतिकी का नोबेल पुरस्कार पियरे अगस्टीनी (अमेरिका), फेरेन्क क्रॉस्ज (जर्मनी) और ऐनी एल हुइलियर (स्वीडन) को अल्ट्राफास्ट एटो सेकंड लेसर के निर्माण में असाधारण योगदान के लिए संयुक्त रूप से दिया गया है। ऐनी एल हुइलियर भौतिक में नोबेल से सम्मानित होने वाली पांचवी महिला वैज्ञानिक हैं। चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दो वैज्ञानिको कैटालिन कारिको एवं ड्रु वीसमेन को कोविड-19 महामारी के विरूद्ध एम-आरएनए वैक्सीन विकसित करने के लिए दिया गया है।

साल 2023 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। इस वर्ष 28 मई को चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता हेराल्ड ज्यूर हॉसेन का हीडनबर्ग में निधन हो गया। उन्होंने सरवाइकल कैंसर को रोकने के लिए वैक्सीन बनाने की आधारशिला रखी थी। 25 जून को नोबेल पुरस्कार विजेता जान गुडएनफ का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने लीथियम आयन बैटरी के विकास में विषेश योगदान दिया था। इसी साल आणविक जीव विज्ञानी डोनाल्ड डी. ब्राउन का 31 मई को निधन हो गया। उन्होंने पृथक किए गए जीन पर शोधकार्य किया, जिससे रिकाम्बिनेन्ट डीएनए और जीन संपादन युग का मार्ग प्रशस्त हुआ। 30 जुलाई को ब्रिटिश कृषि पारिस्थितिकी वैज्ञानिक और टिकाऊ विकास के पुरज़ोर समर्थक प्रो. सर गॉर्डन कॉनवे नहीं रहे। उन्होंने ‘डबली ग्रीन रिवाल्यून नामक किताब लिखी थी। उन्हें 2005 में नाइटहुड सम्मान से विभूषित किया गया था। 31 जुलाई को भूभौतिकीविद और प्लेट टेक्टोनिक्स के खोजकर्ता विलियम जेसन मॉर्गन का देहांत हो गया। उनका प्लेट टेक्टोनिक्स के शोध में विशेष योगदान था। ब्रिटिश जीव वैज्ञानिक सर इयान विल्मट का 10 सितंबर को 79 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उन्होंने पहली बार एक प्रौढ़ कोशिका से केंद्रक निकाल कर डॉली भेड़ का सृजन किया था।

वर्ष 2023 जहां एक ओर  उपलब्धियों भरा रहा, वहीं हताशाओं भरा भी रहा। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर वैज्ञानिक परियोजनाओं और कार्यक्रमों पर भी पड़ा।

इस वर्ष नवंबर में अर्जेंटीना में हुए राष्ट्रपति चुनाव में जेवियर माइली निर्वाचित हुए। अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए पहचान बना चुके जेवियर माइली विज्ञान विरोधी नेता हैं। उन्होंने जनता से वादा किया था कि विजयी होने पर वे देश में बढ़ती मुद्रास्फीति और चरमराती अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक परियोजनाओं और कार्यक्रमों को बंद करेंगे। वर्ष 2023 में युनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में कार्यरत भौतिकी के शोधार्थी रंगा डायस ने शोधकार्य की चोरी और आंकड़ों की हेरा-फेरी के ज़रिए नए अतिचालक पदार्थ बनाने का दावा किया। अलबत्ता, भौतिकीविद जेम्स जे. हेमलिन ने पुख्ता प्रमाणों के आधार पर जालसाज़ी का भंडाफोड़ कर दिया।

गुज़रे साल वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण तीन जुलाई सबसे गर्म दिन रहा। इसका कारण ‘अल नीनो’ असर बताया जा रहा है। साल के अंत में 28वां संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (कॉप-28) आयोजित किया गया। संयुक्त अरब अमीरात की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रफ्तार बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए विकासशील देशों के लिए वित्त पोषण का आव्हान किया गया। सम्मेलन में ग्लोबल स्टॉकटेक पर भी मंथन हुआ।

साल के अंत में ओमिक्रॅान वायरस से जुड़े नए संस्करण ‘जेएन1’ ने कुछ देशों को अपनी चपेट में ले लिया। WHO ने इसे ‘वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट’ के रूप में वर्गीकृत किया है।

साइंस पत्रिका ने साल 2023 की दस शीर्ष सफलताओं की सूची जारी की है। ब्रेकथ्रू ऑफ दी ईयर का खिताब ‘जीएलपी थैरेपीज़’ को दिया है। जीएलपी-1 (ग्लूकागोन लाइक पेप्टाइड-1) मूलतः वज़न घटानेवाली औषधि है, लेकिन यह औषधि कई अन्य बीमारियों में कारगर सिद्ध हुई है। इस औषधि के अनुसंधान में जैवरसायन विज्ञानी स्वेतलाना मोजसोव की विशेष भूमिका रही है। नेचर पत्रिका ने स्वेतलाना मोजसोव को टॉप टेन व्यक्तियों की सूची में सम्मिलित किया है। (स्रोत फीचर्स)

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भारतीय विज्ञान: अंतरिक्ष में कामयाबियों का साल – चक्रेश जैन

साल 2023 विदा हो चुका है। पीछे मुड़ कर देखें तो पता चलता है बीता वर्ष भारतीय विज्ञान जगत, विशेष रूप से अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सफलताओं का रहा। 23 अगस्त को चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक उतरा। इसरो ने चंद्रमा पर जीवन की संभावना तलाशने और रहस्यों को समझने के उद्देश्य से 14 जुलाई को चंद्रयान-3 भेजा था।

इसी वर्ष भारत ने सूर्य का अध्ययन करने की दिशा में बड़ी छलांग लगाई। 2 सितंबर को पहली सौर मिशन वेधशाला आदित्य-L1 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। आदित्य-L1 चार महीने का सफर पूरा कर अपनी मंज़िल लैगरांजे बिन्दु पर पहुंच चुका है। यह वेधशाला पांच वर्षों तक सूर्य की विभिन्न गतिविधियों, जैसे सौर तूफानों, सौर लहरों और गर्म हवाओं का अध्ययन करेगी।

फरवरी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्मॉल सैटेलाइट लॉन्चिंग व्हीकल (एसएसएलवी डी-2) प्रक्षेपण यान के ज़रिए तीन उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया। इसके साथ ही भारत ने छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण बाज़ार में प्रवेश कर लिया। 30 जुलाई को इसरो ने सिंगापुर के सात उपग्रहों को एक साथ सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। 21 अक्टूबर को मानव अंतरिक्ष उड़ान की ओर पहला कदम बढ़ाया गया और गगनयान मिशन के तहत पहला परीक्षण सफल रहा।

जनवरी के प्रथम सप्ताह में 108वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का सालाना अधिवेशन राष्ट्रसंत तुकादोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ। सम्मेलन का मुख्य विषय था ‘महिला सशक्तिकरण के साथ सतत विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी’। पहली बार जनजातीय विज्ञान कांग्रेस हुई, जिसमें जनजातीय मुद्दों पर विचार मंथन किया गया।

21-24 जनवरी के दौरान आठवां अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव भोपाल में आयोजित किया गया। यह महोत्सव विलक्षण था, जिसमें वैज्ञानिकों से लेकर स्कूली बच्चों, जन सामान्य से लेकर विशिष्टजनों और नीति निर्माता से लेकर कारीगरों और किसानों तक ने भाग लिया।

भारत सहित विश्व भर में साल 2023 ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ के रूप में मनाया गया। इसका उद्देश्य आम लोगों में मोटे अनाज के महत्व को उजागर करना था। मोटा अनाज पोषक तत्वों से भरपूर होता है। वैसे भारत हर साल 170 लाख टन मोटे अनाज का उत्पादन करता है – 12 में से 10 प्रकार के मोटे अनाज भारत में उगाए जाते हैं। अहम बात यह कि इसकी खेती आसान और जलवायु अनुकूल है व इसके लिए कम पानी की ज़रूरत होती है।

साल 2023 के पूर्वार्द्ध में सीएसआईआर ने ‘वन वीक-वन लैब’ कैम्पैन शुरू किया। इस कैम्पैन का उद्देश्य आम लोगों और विद्यार्थियों को देश की प्रगति और विकास में सीएसआईआर की राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के योगदान और उपलब्धियों से परिचित कराना था।

इसी वर्ष फरवरी में जम्मू-काश्मीर के रियासी ज़िले में वैष्णो देवी पहाड़ियों की तलहटी और राजस्थान में डेगाना स्थित रेंवत पहाड़ियों में लीथियम खनिज के प्रचुर भंडार का पता चला। लीथियम धातु का उपयोग मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहनों आदि में हो रहा है।

वर्ष 2023 में विज्ञान मंत्रालय के वार्षिक बजट में दो हज़ार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी की गई। बजट में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में रिसर्च के लिए नए केंद्र स्थापित करने का प्रावधान किया गया। इस वर्ष केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय क्वांटम मिशन को मंज़ूरी प्रदान कर दी। इसके अंतर्गत आगामी छह वर्षों तक क्वांटम प्रौद्योगिकी पर आधारित रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 जनवरी को 19,744 करोड़ रुपए के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंज़ूरी दे दी। इस मिशन का उद्देश्य भारत में ग्रीन हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करना है। 25 सितम्बर को नई दिल्ली में देश की पहली हरित हाइड्रोजन ईंधन सेल चालित बस को रवाना किया गया। देश में नैरो गेज के धरोहर मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की तैयारी जारी रही।

बीते साल भारत ने जी-20 की अध्यक्षता की, जिसके झण्डे तले साइंस-20 की बैठक हुई। अब जी-20 आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ ही समाज से जुड़े वैज्ञानिक मुद्दों के विचार मंथन का मंच भी बन गया है।

इसी साल मध्यप्रदेश के शहडोल ज़िले से राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन का शुभारंभ हुआ। यह एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाएं हंसिए का आकार ग्रहण कर लेती हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक देश से इस बीमारी को विदा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर 5800 करोड़ रुपए की वैज्ञानिक परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित की गईं। इनमें लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेवीटेशनल वेव ऑब्ज़रवेटरी शामिल है। इसे महाराष्ट्र स्थित हिंगोली में स्थापित किया जाएगा।

सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोच्चि के वैज्ञानिकों की टीम ने इंडियन ऑइल सार्डीन मछली (Sardinella longiceps) के संपूर्ण जीनोम को डीकोड करने में सफलता प्राप्त की। इस शोध से मछली के पारिस्थितिकी तंत्र और विकास की व्याख्या में मदद मिलेगी और आगे चलकर संरक्षण के लिए प्रबंधन रणनीति बनाना संभव हो सकेगा।

इसी साल 7 अगस्त को लोकसभा ने राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान विधेयक पारित कर दिया। विधेयक में गणित, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और भूविज्ञान के क्षेत्र में शोध, नवाचार और उद्यमिता के लिए उच्च स्तरीय मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना का प्रावधान है। इसी वर्ष संसद द्वारा जैव विविधता संशोधन विधेयक पारित किया गया। यह विधेयक 2002 के जैविक विविधता अधिनियम को संशोधित करता है। इस विधेयक में किए गए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देते हैं।

14 सितंबर को भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कारों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। विज्ञान रत्न पुरस्कार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में की गई जीवन भर की उपलब्धियों के लिए दिया जाएगा। विज्ञानश्री पुरस्कार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिया दिया जाएगा। विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार 45 वर्ष की आयु तक के उन युवा वैज्ञानिकों को प्रदान किया जाएगा जिन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान किया है। साइंस टीम पुरस्कार तीन अथवा उससे अधिक वैज्ञानिकों की उस टीम को संयुक्त रूप से दिया जाएगा जिसने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। इन चार श्रेणियों में 56 पुरस्कार दिए जाएंगे, जिनमें नकद धनराशि का प्रावधान नहीं किया गया है।

दिसम्बर के उत्तरार्द्ध में अहमदाबाद स्थित साइंस सिटी परिसर में भारतीय विज्ञान सम्मेलन आयोजित किया गया। इस बार सम्मेलन का मुख्य विषय ‘भारत का विकास, भारतीय मूल्यों और नवप्रवर्तन के साथ’ चुना गया था। बीते वर्ष नई दिल्ली में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर वैश्विक साझेदारी शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें इस बात पर विचार मंथन किया गया कि दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर क्या सोच रही है और भारत इसमें क्या योगदान कर रहा है।

साल 2023 के लिए गणतंत्र दिवस पर घोषित पद्म पुरस्कारों के लिए चुने गए वैज्ञानिकों में विख्यात चिकित्सक डॉ. दिलीप महालनोबिस को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया। उनका जीवन रक्षक ओआरएस घोल की खोज में विशेष योगदान रहा है। इसी साल जाने-माने सांख्यिकीविद सी. आर. राव को इंटरनेशनल प्राइज़ इन स्टैटिस्टिक्स से सम्मानित किया गया। उन्हें यह अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 75 वर्ष पहले सांख्यिकी विज्ञान में विशेष योगदान के लिए दिया गया है।

विज्ञान जगत की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर ने दिसंबर में वर्ष 2023 के टॉपटेन वैज्ञानिकों की सूची में भारत की अंतरिक्ष वैज्ञानिक कल्पना कलाहेस्टी को शामिल किया है। उन्हें यह विशिष्ट सम्मान चन्द्रयान-3 के प्रक्षेपण में एसोसिएट परियोजना निदेशक के रूप में अहम भूमिका निभाने के लिए दिया गया है।

इसी वर्ष लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका साइंस रिपोर्टर के संपादक हसन जावेद खान ने 18 वर्षों तक संपादन का दायित्व संभालने के बाद विदाई ले ली।

इसी साल एनसीईआरटी ने नौवीं और दसवीं कक्षाओं के विज्ञान पाठ्यक्रम से डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत और मेंडेलीव की आवर्त सारणी को हटा दिया। देश के 1800 वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने इसका विरोध करते हुए एक खुला पत्र लिखकर सरकार के इस निर्णय की आलोचना की।

यह वही साल था, जब सरकार ने विज्ञान संचार की स्वायत्त संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ को बंद करने का निर्णय लिया। इस संस्था की स्थापना 11 अक्टूबर 1989 को की गई थी। इसी साल अगस्त से लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका ड्रीम-2047 का प्रकाशन बंद हो गया। इसका पहला अंक अक्टूबर 1998 में छपा था। दरअसल, इस पत्रिका को ‘ड्रीम-2047’ नाम इसलिए दिया गया था, ताकि स्वतंत्रता के सौ साल पूरे होने का उत्सव मनाने के पहले हम अपने सपनों को साकार करने की रूपरेखा बना लें।

वर्ष 2023 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। 28 सितंबर को प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के प्रणेता एम. एस. स्वामीनाथन का 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने कृषि क्षेत्र की नीतियां बनाने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। 22 अगस्त को विख्यात वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद सी. आर. राव का 102 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 17 जुलाई को प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. मंगला जे. नार्लीकर का 80 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उन्होंने मूलभूत गणित में विशेष योगदान के साथ विद्यार्थियों और आम लोगों में गणित को लोकप्रिय बनाने के क्षेत्र में भी योगदान किया था।

उम्मीद है हमारे देश के वैज्ञानिक साल 2023 की भांति 2024 को भी उपलब्धियों भरा बनाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मौसम पूर्वानुमान में उपयोगी कृत्रिम बुद्धि

मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में धीरे-धीरे क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। इन दिनों कृत्रिम बुद्धि (एआई) आधारित मौसम पूर्वानुमान सटीक और बेहतर होते जा रहे हैं।

गौरतलब है कि कई दशकों से मौसम पूर्वानुमान सुपर कंप्यूटरों पर निर्भर रहे हैं। अत्यधिक ऊर्जा खपत वाले सुपरकंप्यूटरों से पूर्वानुमान लगाने के लिए इन्हें निरंतर चालू रखना होता है। लेकिन एआई के उद्भव ने इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। विश्व की सबसे बड़ी मौसम पूर्वानुमान संस्था युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) ने हाल ही में एआई को अपनाया है और प्रायोगिक स्तर पर पूर्वानुमान करना शुरू किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार डेस्कटॉप पर मिनटों में तैयार किए गए एआई-जनित पूर्वानुमान सटीकता में पारंपरिक मॉडल के बराबर और कई मामलों में उससे भी बेहतर हैं।

एआई की इस क्षमता को देखते हुए गूगल डीप माइंड और हुवाई जैसी कंपनियां अधिक सटीक एआई मौसम मॉडल तैयार करने का प्रयास कर रही हैं। गूगल के ग्राफकास्ट और हुवाई के पंगु-वेदर ने दस दिनों का पूर्वानुमान तैयार करने में अभूतपूर्व क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।

कंप्यूटेशन आधारित पारंपरिक मौसम मॉडल के विपरीत एआई मॉडल डीप लर्निंग पर आधारित हैं। ECMWF के 40 वर्षों के मौसम अवलोकनों और अल्पकालिक पूर्वानुमानों के व्यापक डैटासेट पर प्रशिक्षित ये एआई मॉडल वायुमंडल में हो रहे परिवर्तन के जटिल पैटर्न को समझते हैं। ग्राफकास्ट पेपर के मुख्य लेखक रेमी लैम ने मॉडल की दक्षता को पारंपरिक पूर्वानुमानों का एक तेज़, सटीक और व्यावहारिक विकल्प बताया है।

इन एआई मॉडलों पर काम कर रहे ECMWF शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सीमित अवलोकन डैटा के साथ भी हुवाई का पंगु मॉडल प्रचलित मॉडल की दक्षता से मेल खाता है। इस तेज़ी से परिवर्तन के पीछे गूगल द्वारा तैयार किया गया वेदरबेंच है जो डैटा तक पहुंच को सरल बनाता है। इसके अलावा, रयान केसलर के व्यक्तिगत योगदान से उपजा मॉडल सरल लेकिन अत्यधिक प्रभावी 6-दिनी पूर्वानुमान प्रदान करने में सक्षम हैं।

एआई मौसम मॉडलिंग के लिए अगला कदम मौसम के एकाधिक पूर्वानुमान में है जिनके बीच से चयन किया जा सके। इसमें चक्रवात जैसी चरम मौसमी घटनाओं के लिए पूर्वानुमान की सटीकता को बढ़ाया सकता है। ये मॉडल मौसम का पूर्वानुमान और एक्सास्केल कंप्यूटरों पर काम करने वाले उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले जलवायु मॉडल पर निर्भर हैं। ये शीघ्र परिणाम देंगे और जलवायु भविष्यवाणी में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

बहरहाल मौसम के पूर्वानुमान का भविष्य अंतत: उपयोगकर्ता की प्राथमिकताओं पर निर्भर होगा। इसमें एआई-आधारित पूर्वानुमानों की सटीकता और एल्गोरिद्म-आधारित पूर्वानुमानों की समझ के बीच चयन करना होगा। फिलहाल उम्मीद है कि ये मॉडल उपयोगकर्ताओं को मौसम की घटनाओं को समझने में मदद करेंगे और पूर्वानुमान में सटीकता, दक्षता और विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व मिश्रण प्रदान करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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मतदान में प्रयुक्त अमिट स्याही का विज्ञान – चक्रेश जैन

र्ज़ी मतदान रोकने में ‘अमिट स्याही’ की अहम भूमिका रही है। अमिट स्याही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मिटाया अथवा धोया नहीं जा सकता। बैंगनी रंग की यह स्याही आम चुनाव का प्रतीक बन गई है। अभी तक कोई भी विकल्प अमिट स्याही की जगह नहीं ले पाया है।

मतदान में प्रयुक्त अमिट स्याही को बनाने में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (एनपीएल) के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसे अमिट स्याही की जन्म स्थली कहा जाता है। प्रयोगशाला की स्थापना के तुरन्त बाद रसायन विज्ञान प्रभाग के अंतर्गत स्याही विकास इकाई का गठन किया गया था। एनपीएल ने 1950-51 में अमिट स्याही तैयार कर ली थी, जिसका उपयोग प्रथम आम चुनाव में किया गया था। दूसरे आम चुनाव (1957) में एनपीएल ने ही अमिट स्याही की 3,16,707 शीशियां उपलब्ध कराई थीं।

बहरहाल, अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अमिट स्याही उत्पादन के काम को आगे जारी नहीं रखा जा सका था। ऐसी स्थिति में सरकारी-निजी प्रतिष्ठान को इसके उत्पादन का लायसेंस देने की ज़रूरत दिखाई दी। काफी विचार-विमर्श के बाद कर्नाटक की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मैसूर पेंट्स का चुनाव किया गया। इस कंपनी की स्थापना 1937 में मैसूर के महाराजा कृष्णराजा वाडियार ने की थी। वर्ष 1947 में इस कंपनी का अधिग्रहण पूर्व मैसूर राज्य ने कर लिया था और आगे चलकर इसका नाम बदल कर मैसूर लैक एंड पेंट वर्क्स लिमिटेड कर दिया गया। फिर 1989 में नाम बदलकर मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड  कर दिया गया। वर्तमान में इसी को निर्वाचन आयोग से अमिट स्याही खरीदी के आदेश प्राप्त हो रहे हैं। और तो और, यह कंपनी दो दर्ज़न अन्य देशों को भी अमिट स्याही का निर्यात कर रही है।

निर्णय लिया गया है कि 1962 के बाद के सभी चुनावों में मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड ही अमिट स्याही का उत्पादन और निर्यात करेगी। नेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने अमिट स्याही के नुस्खे का पेटेंट करा लिया है, ताकि अन्य कंपनियां इसका उत्पादन न कर सकें।

अमिट स्याही के विकास का इतिहास लगभग सात दशकों का है। सात दशकों की इस छोटी-सी अवधि में कई महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हैं। 1940 के दशक में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर ने रसायन विज्ञानी डॉ. सलीमुज्जमान सिद्दीकी से अमिट स्याही तैयार करने के लिए कहा था। उन्होंने सिद्दीकी को सिल्वर क्लोराइड युक्त एक नमूना भेजा, जिसे लगाने के बहुत देर बाद त्वचा पर निशान पड़ता था। रसायनविद डॉ. सिद्दीकी ने इसमें सिल्वर ब्रोमाइड मिलाया, जिससे तत्काल निशान पड़ गया। डॉ. सिद्दीकी शुरुआत से ही एनपीएल में स्याही विकास इकाई से जुड़े थे। आगे चलकर डॉ. एम. एल. गोयल के नेतृत्व में अमिट स्याही का नुस्खा तैयार किया गया। उनके सहयोगी प्रतिष्ठित और समर्पित युवा रसायन विज्ञानी डॉ. जी. बी. माथुर, डॉ. वी. डी. पुरी आदि थे।

‘अमिट स्याही’ का मुख्य घटक सिल्वर नाइट्रेट है। यही रसायन स्याही के निशान को उभारता है। इसकी सांद्रता दस से लेकर पच्चीस प्रतिशत के बीच होती है। सिल्वर नाइट्रेट और त्वचा के प्रोटीन की अभिक्रिया से त्वचा पर गहरा निशान बन जाता है, जो कुछ दिनों तक नहीं छूटता। सिल्वर नाइट्रेट से त्वचा को जरा भी हानि नहीं होती। यह निशान तभी हटता है, जब नई कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं की जगह ले लेती हैं। स्याही चालीस सेकंड से कम समय में सूख जाती है। अमिट स्याही में कुछ रंजक भी होते हैं। यह स्याही रोशनी के प्रति संवेदनशील होती है, अत: इसे रंगीन शीशियों में रखा जाता है।

निर्वाचन आयोग को सौंपने के पहले अमिट स्याही का कई बार परीक्षण किया जाता है। निर्वाचन आयोग चुनाव प्रक्रिया के दौरान ‘रेंडम सेम्पल’ लेकर परीक्षण के लिए एनपीएल के पास भेजता है जो प्रत्येक परीक्षण के बाद निर्वाचन आयोग को नियमित रिपोर्ट भेजती है।

बैंगनी रंग की अमिट स्याही को मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी पर लगाया जाता है। मतदान की अवधि में स्याही सूखने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इसे साबुन, तेल, डिटरजेंट अथवा रसायनों से मिटाया नहीं जा सकता। कुछ दिनों बाद यह अपने आप मिट जाती है।

एक बात और। एनपीएल को आज भी अमिट स्याही की रॉयल्टी मिलती है।

वर्ष 1962 में विकसित अमिट स्याही का मूल नुस्खा छह दशकों बाद भी नहीं बदला है। साल 2001 में एनपीएल के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण लाल ने अमिट स्याही के नुस्खे को बेहतर बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य मूल स्याही से पानी को हटाना था, ताकि यह जल्दी सूख सके। सूखने की प्रक्रिया को बेहतर करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने बिना पानी का एक ऐसा मिश्रण तैयार किया, जो पहले मिश्रण की तुलना में जल्दी सूख तो जाता था, लेकिन रंग बहुत समय तक बना रहता था।

पिछले वर्षों में अमिट स्याही के उपयोग का विस्तार हुआ है। 2016 में इसका उपयोग नोटबंदी के संदर्भ में हुआ था।

तर्जनी उंगली पर अमिट स्याही का निशान लगाना संवैधानिक ज़रूरत है। सवाल यह है कि निशान कहां पर लगाया जाए? इस बारे में परिवर्तन हुए हैं। शुरुआत में अमिट स्याही का निशान तर्जनी के मूल में बिंदु के रूप में लगाया जाता था। वर्ष 1962 में यह निशान नाखून की जड़ के ऊपर लगाया जाता था। साल 2006 से इस निशान को बड़ा करके नाखून के ऊपर के सिरे से तर्जनी अंगुली के जोड़ के नीचे तक लगाया जाता है। इसने अब एक छोटी-सी लकीर का रूप ले लिया है।

स्वतंत्रता के पहले अमिट स्याही के मामले में देश निर्यात पर निर्भर था। लेकिन आज हम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो चुके हैं। यही नहीं भारत 25 देशों को अमिट स्याही का निर्यात भी कर रहा है। अमिट स्याही का उपयोग लोकसभा, विधानसभा चुनावों से लेकर स्थानीय निकायों के चुनावों में हो रहा है। सारांश में कहा जा सकता है कि अमिट स्याही का नुस्खा अपने ही देश में बनाना और उत्पादन करना लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के साथ ही हमारे देश के वैज्ञानिकों की ऐतिहासिक भूमिका और प्रतिभा को आम मतदाताओं के सामने प्रदर्शित करता है। (स्रोत फीचर्स)

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गंध से याददाश्त में सुधार

हम दैनिक जीवन में गंध का बहुत इस्तेमाल करते हैं, लेकिन फिर भी उसे इतनी तवज्जो नहीं देते। गलती से गैस खुली छूट जाए या गैस पर दूध चढ़ा कर भूल जाएं, तो गैस की या जलने की बू हमें हमारी भूल का एहसास करा देती है। अब, एक अध्ययन में गंध से हमारी याददाश्त में सुधार की संभावना दिख रही है।
सूंघने की शक्ति क्षीण पड़ने का सम्बंध कई स्वास्थ्य समस्याओं से देखा गया है; जैसे अवसाद, संज्ञान क्षमता में कमी वगैरह। इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि नियमित रूप से तीक्ष्ण गंध सूंघने से इस तरह की दिक्कतों से बचाव संभव है। और अब, युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के माइकल लियोन के दल ने नींद के दौरान लोगों को गंध सुंघाकर उनका संज्ञान प्रदर्शन बेहतर करने में सफलता प्राप्त की है।
अध्ययन के लिए 60 वर्ष से अधिक उम्र के सामान्यत: स्वस्थ 20 प्रतिभागियों को चुना गया। उन्हें लगातार छह महीने तक रोज़ रात को एक गंध सुंघाई गई – गुलाब, संतरा, नीलगिरी, नींबू, पेपरमिंट, गुलमेंहदी और लैवेंडर; यानी सप्ताह की हर रात अलग गंध। फ्रंटियर्स इन न्यूरोसाइंस में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि नियंत्रण समूह (जिसे गंध नहीं सुंघाई गई थी) की तुलना में गंध उपचािरत समूह के सदस्यों ने अधिक शब्द याद रखे थे।
हालांकि शोधकर्ता अभी यह पुख्ता तौर पर नहीं जानते कि गंध ने यह कमाल कैसे दिखाया, लेकिन उनका अनुमान है कि गंध संवेदना में शामिल तंत्रिकाओं का मस्तिष्क के स्मृति और भावना से जुड़े क्षेत्र से सीधा सम्बंध होता है। उनके इस अनुमान का आधार एमआरआई की रिपोर्ट है, जिसमें उन्हें गंध उपचारित प्रतिभागियों के मस्तिष्क की उस संरचना में परिवर्तन दिखा है जो स्मृति और भावनात्मक केंद्रों को जोड़ती है – यह कड़ी अक्सर बढ़ती उम्र में, खासकर अल्ज़ाइमर से ग्रस्त लोगों में कमज़ोर पड़ जाती है।
हालांकि ये परिणाम प्रारंभिक हैं और एक छोटे समूह में दिखे हैं लेकिन यदि यह उपचार बड़े परीक्षणों में सफल साबित होता है तो यह इस तरह की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए मददगार हो सकता है।
बड़े पैमाने का अध्ययन कई अनसुलझे सवालों के जवाब ढूंढने में भी मददगार होगा। जैसे इस अध्ययन में सात खुशनुमा गंधों का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी तरह की गंध (तीखी, बुरी गंध) भी इसी तरह के परिणाम दे सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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विचित्र खोजों के लिए इगनोबल पुरस्कार

र वर्ष की तरह इगनोबल पुरस्कार विचित्र खोजों के लिए दिए गए हैं। पिछले 33 वर्षों से इगनोबल पुरस्कार ऐसे सवालों के जवाब खोजने के लिए दिए जाते रहे हैं जो पहली नज़र में तो हास्यास्पद लगते हैं लेकिन हमें सोचने को मजबूर कर देते हैं।

पहला पुरस्कार इस सवाल का जवाब खोजने के लिए दिया गया: भूगर्भ वैज्ञानिक चट्टानों को क्यों चाटते हैं? लाइसेस्टर विश्वविद्यालय के भूगर्भ वैज्ञानिक यान ज़लासिविक्ज़ के मुताबिक इस सवाल का जवाब बहुत आसान है – चट्टानों में उपस्थित खनिज कण सूखी चट्टान की अपेक्षा गीली सतह पर बेहतर नज़र आते हैं। लिहाज़ा, गीला करने पर मैदानी परिस्थिति में चट्टानों की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।

और तो और, ज़लासिविक्ज़ याद करते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भूगर्भ वैज्ञानिक चट्टानों को सिर्फ चाटते नहीं थे बल्कि वे उन्हें पकाते थे और कभी-कभी तो उन्हें खा भी लेते थे। इस संदर्भ में उन्होंने 2017 में पैलिऑन्टोलॉजिल एसोसिएशन के न्यूज़लेटर में लिखा भी था, “हमने चखकर चट्टानों को पहचानने की कला गंवा दी है।”

इसी सिलसिले में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मूत्र विशेषज्ञ (यूरोलॉजिस्ट) सेउंगमिन पार्क को एक ‘स्मार्ट लैटरीन’ के आविष्कार के लिए पुरस्कृत किया गया है। पार्क इसे स्टैनफोर्ड टॉयलेट कहते हैं और इसकी विशेषता है कि यह व्यक्ति के मल व मूत्र की जांच करके उसकी सेहत का विश्लेषण कर सकती है। जिस तरह से आप जो कुछ खाते-पीते हैं, उसकी तहकीकात कर सकते हैं, उसी तरह से आप अपने उत्सर्जित पदार्थों की भी निगरानी कर सकते हैं। पेशाब में एक डिपस्टिक परीक्षण संक्रमण, मधुमेह या अन्य रोगों का संकेत दे देगा। इस लैट्रीन में एक कंप्यूटर दृष्टि तंत्र लगा है जो पेशाब की मात्रा और उसके त्याग की रफ्तार का हिसाब रखेगा; और एक सेंसर व्यक्ति के गुदा द्वार के विशिष्ट गुणधर्मों के आधार पर उसकी पहचान करता है। यह लगभग फिंगरप्रिंट की तरह काम करता है।

साहित्य के क्षेत्र में इस वर्ष का इगनोबल पुरस्कार उन शोधकर्ताओं के मिला है जिन्होंने एक अजीबोगरीब परिघटना की तहकीकात की है। यह परिघटना सामान्य देजावु (जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वर्तमान में वह जो देख-सुन रहा है, वह पहले भी हो चुका है) के विपरीत है – जमाइ वु। इसमें व्यक्ति को जानी-पहचानी चीज़ें भी अपरिचित लगने लगती हैं। इसके शोधकर्ता दल के अकीरा ओकोनोर ने बताया है कि इस स्थिति को प्रयोगशाला में निर्मित किया जा सकता है – व्यक्तियों को एक ही शब्द बार-बार, बार-बार, इतनी बार दोहराने को कहा जाए कि वह शब्द अनजाना सा लगने लगे।

अब कुछ मज़ेदार अनुसंधान पर गौर फरमाइए। उदाहरण के लिए चिकित्सा में जिस टीम को इगनोबल पुरस्कार मिला उसने मानव शवों की नाक में ताक-झांक करके यह देखने की कोशिश की है कि क्या दोनों नथुनों में बालों की संख्या बराबर होती है। इस टीम का नेतृत्व कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इर्विन की त्वचा विशेषज्ञ नताशा मेसिंकोव्स्का ने किया। उन्होंने बताया है कि उक्त जानकारी शारीरिकी की पाठ्य पुस्तकों में उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उन्हें यह काम हाथ में लेना पड़ा।

यह अध्ययन बाल गंवा रहे लोगों (एलोपेशिया से पीड़ित लोगों) के उपचार में मदद करेगा। मेसिंकोव्स्का का मत है कि एलोपेशिया से पीड़ित लोगों में प्राय: नथुने के बाल झड़ जाते हैं और वे एलर्जी और संक्रमण के प्रति दुर्बल हो जाते हैं। यह अध्ययन थोड़ा असामान्य लग सकता है लेकिन इसकी ज़रूरत का मूल यह समझने में था कि ये बाल श्वसन तंत्र की प्रथम रक्षा पंक्ति के तौर पर क्या भूमिका निभाते हैं।

एक और पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया है जिसमें मृत मकड़ियों को पुनर्जीवित करने (ज़ॉम्बी मकड़ियों के निर्माण) का प्रयास किया गया था। मंशा यह थी कि इन मृत मकड़ियों का उपयोग चीज़ों को पकड़ने के औज़ार के रूप में किया जा सके। शोध के इस क्षेत्र को ‘नेक्रोबोटिक्स’ कहते हैं और इसमें जीवित सामग्री (या सही शब्दों में पूर्व-जीवित सामग्री) का उपयोग रोबोट बनाने में किया जाता है।

एक अन्य पुरस्कृत अध्ययन इस बाबत था कि मानव मस्तिष्क कैसे शब्दों का निर्माण करने वाली विभिन्न ध्वनियों को पहचानना सीखता है। इसे समझने के लिए टीम ने उन लोगों की मस्तिष्क गतिविधियों का अध्ययन किया जो उल्टा बोल सकते हैं – जैसे ‘कमल का फूल’ को ‘लफू का लमक’।

मज़ेदार बात यह रही कि सारे विजेताओं को 10 खरब ज़िम्बाब्वे मुद्रा का एक नकली नोट दिया गया और 6 पन्ने का एक पीडीएफ चित्र भेंट किया गया। इस तस्वीर का प्रिंटआउट लेकर फोल्ड करके ट्रॉफी बनाई जा सकती है। गौरतलब है कि यह पुरस्कार वैज्ञानिक हास्य पत्रिका एनल्स ऑफ इम्प्रॉबेबल रिसर्च द्वारा प्रदान किया जाता है। (स्रोत फीचर्स)

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रसायन शास्त्र का नोबेल: दिलचस्प और उपयोगी खोज

र्ष 2023 का रसायन नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को दिया गया है – एलेक्साई एकिमोव (पूर्व सोवियत संघ), लुई ब्रुस (यूएस) और मौंगी बावेंडी (यूएस)। इन तीनों ने मिलकर एक ऐसे प्रभाव की खोज की है जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स व संचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। लोग इसके उपयोग से तो परिचित हैं लेकिन इसके चौंकाने वाले वैज्ञानिक धरातल से अपरिचित हैं।

इस वर्ष के रसायन नोबेल का कथानक क्वांटम यांत्रिकी से जुड़ा है। जहां एकिमोव और ब्रुस ने इस प्रभाव का अवलोकन करके इसे पहचाना, वहीं बावेंडी का प्रमुख योगदान इसे उत्पन्न करने की विधियों पर केंद्रित रहा।

यह प्रभाव साइज़ के अनुसार पदार्थों के बदलते गुणधर्मों को दर्शाता है। खास तौर से नैनो साइज़ पर यह प्रभाव बढ़-चढ़कर नज़र आने लगता है। तीनों शोधकर्ताओं ने इस बात की खोज की है कि जब हम मिलीमीटर के लाखवें-करोड़वें साइज़ के कणों के साथ काम करते हैं तो विचित्र घटनाएं होने लगती है। ऐसे कणों को क्वांटम बिंदु कहते हैं।

दरअसल, इस तरह के विचित्र प्रभाव की भविष्यवाणी काफी पहले 1930 के दशक में हरबर्ट फ्रोलिश नामक भौतिक शास्त्री कर चुके थे। फ्रोलिश ने क्वांटम यांत्रिकी की मशहूर श्रॉडिंजर समीकरण के सैद्धांतिक निहितार्थ की पड़ताल करते हुए दर्शाया था कि जब कण अत्यंत छोटे हो जाएंगे तो उनमें इलेक्ट्रॉन के लिए कम जगह रह जाएगी। परिणाम यह होगा कि इलेक्ट्रॉन (जो क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार कण भी होते हैं और तरंगें भी) पास-पास ठस जाएंगे। फ्रोलिश का मत था कि इसका पदार्थ के गुणधर्मों पर बहुत ज़्यादा असर होगा। इसे क्वांटम प्रभाव कहते हैं जो बहुत कम साइज़ों पर नज़र आता है।

भविष्यवाणी दिलचस्प थी और वैज्ञानिक गण इसे यथार्थ में साकार करने के प्रयासों में जुट गए हालांकि बहुत कम वैज्ञानिकों को लगता था कि इस क्वांटम प्रभाव का कोई व्यावहारिक उपयोग होगा।

खैर, 1970 के दशक में शोधकर्ता इस तरह की नैनो-संरचना बनाने में कामयाब हो गए। उन्होंने एक आणविक पुंज का उपयोग करते हुए एक मोटी सतह के ऊपर एक अत्यंत महीन (नैनो मोटी) परत बना दी। और इसके ज़रिए वे यह दिखा पाए कि इस महीन परत के प्रकाशीय गुणधर्म इसकी मोटाई के अनुसार बदलते हैं – यह प्रयोग क्वांटम यांत्रिकी की भविष्यवाणी से मेल खाता था। प्रायोगिक तौर पर क्वांटम प्रभाव को दर्शाना एक बड़ी बात थी लेकिन इस व्यवस्था को बनाने के लिए लगभग परम शून्य तापमान और अत्यंत गहन निर्वात की ज़रूरत थी।

इस प्रभाव को ज़्यादा साधारण अवस्था में देखने में मदद एक अनपेक्षित दिशा से मिली। रंगीन कांच बनाने की कला ने इस क्वांटम असर के अध्ययन में बहुत मदद की। प्राचीन समय से ही कारीगर लोग विभिन्न रंगों के कांच बनाते आए थे। वे कांच बनाते समय उसमें चांदी, सोना, कैडमियम जैसे पदार्थ मिलाते थे और फिर उसे अलग-अलग तापमान पर तपाकर विभिन्न रंग पैदा कर लेते थे।

भौतिक शास्त्रियों के लिए रंगीन कांच महत्वपूर्ण साधन साबित हुए थे। इनकी मदद से वे प्रकाश में से कुछ रंगों को (यानी कुछ तरंग दैर्घ्यों को) छानकर अलग कर सकते थे। इसके चलते शोधकर्ता खुद रंगीन कांच बनाने लगे। ऐसा करते हुए उन्होंने देखा कि एक ही पदार्थ मिलाने पर कांच में कई अलग-अलग रंग पैदा किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, कैडमियम सेलेनाइड और कैडमियम सल्फाइड का मिश्रण कांच में मिलाया जाए, तो वह पीला बन सकता है या लाल भी बन सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पिघले कांच को कितना तपाया गया था और किस तरह ठंडा किया गया था। है ना आश्चर्य की बात? शोधकर्ता यह भी दर्शा पाए कि कांच में रंग उसके अंदर बनने वाले कणों से पैदा होता है और कणों की साइज़ पर निर्भर करता है।

इस वर्ष के एक नोबल विजेता, एलेक्साई एकिमोव, ने इसी बात को आगे बढ़ाया। उन्हें यह बात थोड़ी बेतुकी लगी कि एक ही पदार्थ कांच में अलग-अलग रंग पैदा कर सकता है। लेकिन खुशकिस्मती से एकिमोव प्रकाशीय अध्ययनों से वाकिफ थे। लिहाज़ा, 1970 दशक में उन्होंने इनकी मदद से रंगीन कांचों की तहकीकात शुरू कर दी। उन्होंने व्यवस्थित रूप से कॉपर क्लोराइड से रंजित कांचों का निर्माण किया और पिघले हुए कांच को 500 से 700 डिग्री सेल्सियस पर अलग-अलग अवधियों (1 से लेकर 96 घंटे) तक तपाया। एक्सरे विश्लेषण से पता चला कि निर्माण की प्रक्रिया का असर कॉपर क्लोराइड के कणों की साइज़ पर हुआ था – कुछ नमूनों में ये कण मात्र 2 नैनोमीटर के थे जबकि कुछ नमूनों में इनकी साइज़ 30 नैनोमीटर तक थी।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इन कणों की साइज़ का असर कांच द्वारा सोखे गए प्रकाश पर पड़ रहा था – बड़े कण तो प्रकाश को उसी तरह सोख रहे थे जैसे कॉपर क्लोराइड सामान्यत: सोखता है लेकिन कण की साइज़ जितनी कम होती थी, वे उतना ही अधिक नीला प्रकाश सोखते थे।

भौतिक शास्त्री होने के नाते एकिमोव क्वांटम यांत्रिकी के नियमों से परिचित थे और फौरन समझ गए कि वे जिस चीज़ का अवलोकन कर रहे हैं, वह साइज़-आधारित क्वांटम प्रभाव है। यह पहली बार था कि किसी ने जानबूझकर क्वांटम बिंदु निर्मित किए थे। क्वांटम बिंदु यानी ऐसे नैनो-कण जो साइज़-आधारित प्रभाव उत्पन्न करें।

दिक्कत यह हुई कि एकिमोव ने अपनी खोज के परिणाम एक सोवियत शोध पत्रिका में प्रकाशित किए। शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ से बाहर इस शोध पत्र पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।

सो, इस वर्ष के दूसरे नोबेल विजेता लुई ब्रुस ने 1983 में यह खोज दोबारा की। दरअसल, ब्रुस तो कोशिश कर रहे थे कि सौर ऊर्जा की मदद से रासायनिक क्रियाओं को गति दे सकें। उन्होंने कैडमियम सल्फाइड के अत्यंत छोटे कण एक घोल में बनाए। छोटे कण बनाने का मकसद था कि उनकी सतह का क्षेत्रफल अधिकतम रहे। लेकिन ऐसा करते हुए ब्रुस ने एक अजीब-सा अवलोकन किया – जब वे इन कणों को प्रयोगशाला की बेंच पर कुछ समय के लिए छोड़ देते थे, तो उनके गुणधर्म बदल जाते थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि शायद ऐसा इसलिए हो रहा होगा क्योंकि रखे-रखे वे कण बड़े हो जाते होंगे। अपने अनुमान की पुष्टि के लिए उन्होंने कैडमियम सल्फाइड के लगभग 4.5 नैनोमीटर के कण बनाए और इनके प्रकाशीय गुणधर्मों की तुलना 12.5 नैनोमीटर के कणों से की। निष्कर्ष यह निकला कि बड़े कण तो उसी तरंग दैर्घ्य का प्रकाश अवशोषित करते हैं जो कैडमियम सल्फाइड सामान्य रूप से करता है लेकिन छोटे कणों के मामले में अवशोषण थोड़ा नीले रंग की ओर सरक जाता है। ब्रुस भी समझ गए कि उन्होंने साइज़-आधारित क्वांटम प्रभाव का अवलोकन किया है। 1983 में अपने परिणाम प्रकाशित करने के बाद उन्होंने कई पदार्थों के साथ प्रयोग करके पाया कि जितने छोटे कण होते हैं, अवशोषण नीली तरंग दैर्घ्यों की ओर खिसकता जाता है।

अब सवाल उठता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है। जवाब है कि यदि एक ही पदार्थ के कणों की साइज़ बदलने से उसका प्रकाश अवशोषण बदल जाता है, तो इसका मतलब हुआ कि उसमें कुछ तो बुनियादी रूप से बदल गया है। किसी भी पदार्थ के प्रकाशीय गुण उसके इलेक्ट्रॉन पर निर्भर करते हैं और उसके रासायनिक गुण भी। यानी किसी पदार्थ के रासायनिक गुण सिर्फ इलेक्ट्रॉन कक्षकों की संख्या और सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या से तय नहीं होते बल्कि नैनो पैमाने पर साइज़ पर भी निर्भर करते हैं।

धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया कि क्वांटम बिंदु के कई व्यावहारिक उपयोग हैं। ये आज क्वांटम बिंदु नैनो-टेक्नॉलॉजी का एक महत्वपूर्ण औज़ार हैं और तमाम उत्पादों में नज़र आते हैं। इनका सबसे अधिक उपयोग रंगीन प्रकाश पैदा करने में किया गया है। यदि क्वांटम बिंदुओं पर नीला प्रकाश डाला जाए तो ये उसे सोख लेते हैं और किसी अन्य रंग का प्रकाश छोड़ते हैं। उत्सर्जित प्रकाश का रंग क्वांटम बिंदु की साइज़ पर निर्भर करता है। इस तरह नीले प्रकाश को अलग-अलग रंगों में बदलकर तीन प्राथमिक रंग (नीला, लाल और हरा) बनाए जा सकते हैं। इनकी मदद से एलईडी लैम्प के प्रकाश का रंग व तीव्रता भी नियंत्रित किए जा सकते हैं।

क्वांटम बिंदुओं का उपयोग जैव-रसायन और चिकित्सा में भी किया जा सकता है। जैसे क्वांटम बिंदुओं को जैविक अणुओं से जोड़कर कोशिकाओं तथा अंगों का अध्ययन किया जा सकता है। और तो और, शरीर में ट्यूमर ऊतकों पर नज़र रखने में भी क्वांटम बिंदुओं के उपयोग पर काम शुरू हुआ है। माना जा रहा है कि भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में ये निहायत उपयोगी साबित होने जा रहे हैं।

अलबत्ता सही मनचाही साइज़ के क्वांटम बिंदु बनाना टेढ़ी खीर थी। जब तक उम्दा गुणवत्ता के क्वांटम बिंदु बनाने का कोई आसान तरीका सामने नहीं आता तब तक इनका उपयोग करना असंभव था। और यहीं तीसरे नोबेल विजेता मौंगी बावेंडी के योगदान को सम्मान दिया गया है। उन्होंने वह टेक्नॉलॉजी विकसित जिसकी मदद से नियंत्रित ढंग से क्वांटम बिंदुओं का निर्माण करना संभव हुआ। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आदित्य मिशन से लेकर इगनोबल तक – चक्रेश जैन

सरो द्वारा प्रक्षेपित सूर्य मिशन आदित्य एल-1 ने सेल्फी ली और पृथ्वी तथा चंद्रमा की तस्वीरें भेजीं। चार महीनों बाद अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला आदित्य एल-1 मौसम की उत्त्पति के कारणों का अध्ययन करेगा। उसने सम्बंधित आंकड़े जुटाना शुरू कर दिया है। इसमें एक विशेष दूरबीन लगाई गई है, जिससे सूर्य पर होने वाले परिवर्तनों की जानकारी मिल सकेगी। इससे ओज़ोन परत पर पराबैंगनी किरणों के असर के बारे में भी नई जानकारियां उपलब्ध हो सकेंगी।

इसरो प्रमुख द्वारा आदित्य एल-1 को यात्रा पर विदा करने के पहले पूजा-अर्चना करने पर इस बार भी कुछ टेलीविज़न चैनलों पर यह मुद्दा उठा कि विज्ञान जगत में तर्क और तथ्यों का स्थान है। अतः वैज्ञानिकों को सफलताओं के लिए मंदिरों अथवा धार्मिक स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। पीछे मुड़कर देखें तो इसके प्रथम निदेशक विक्रम साराभाई और द्वितीय निदेशक सतीश धवन ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया था।

चंद्रयान-1 से मिले डैटा का विश्लेषण कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि पृथ्वी के उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन चंद्रमा पर पानी बना रहे हैं। चंद्रमा पर पानी की सांद्रता को जानना, इसके बनने और विकास को समझने के लिए अहम है और मानव सहित मिशन्स के लिए पानी उपलब्ध कराने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

नए विज्ञान पुरस्कार

भारत सरकार ने 14 सितंबर को पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। इसके साथ ही विभिन्न विज्ञान विभागों द्वारा दिए जा रहे लगभग 300 पुरस्कारों को रद्द कर दिया गया है। राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कारों को चार श्रेणियों में रखा गया है। 1) विज्ञान रत्न पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जीवन पर्यन्त उपलब्धियों के लिए। 2) विज्ञानश्री पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए। 3) विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए 45 वर्ष की आयु तक के युवा वैज्ञानिकों को। और 4) विज्ञान टीम पुरस्कार – विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक टीम के रूप असाधारण योगदान देने वाली तीन या अधिक की टीम को।

शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार

भारत का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार की घोषणा हर साल 26 सितंबर को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर की जाती है। लेकिन इस बार कुछ दिनों पहले ही 12 वैज्ञानिकों के नामों की घोषणा कर दी गई। चिंताजनक बात यह है कि इस सूची में एक भी महिला वैज्ञानिक नहीं है। आज तक सम्मानित 600 वैज्ञानिकों  में सिर्फ 19 महिला वैज्ञानिक हैं।

संसद में अंतरिक्ष विज्ञान

संसद के विशेष सत्र में सांसदों ने अंतरिक्ष विज्ञान की ताज़ा उपलब्धियों पर वैज्ञानिकों को बधाई दी। राज्य सभा में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने बताया कि 2020 में श्रीहरिकोटा के द्वार आम जनता के लिए खोल दिए गए। उन्होंने बताया कि 2023-24 में अंतरिक्ष विभाग का बजट बढ़ाकर बारह हज़ार करोड़ रुपए किया गया है।

निपाह वायरस

केरल में चौथी बार निपाह वायरस का संक्रमण फैला और लगभग 1500 लोग इसकी चपेट में आ गए। यह रोग जानवरों (इस मामले में चमगादड़ों) से मनुष्य में फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे कोविड की तुलना में अधिक खतरनाक बताया है। इसके लक्षणों में सिरदर्द, खांसी, बुखार, सांस लेने में कठिनाई, चक्कर, मस्तिष्क में सूजन आदि शामिल हैं। अभी तक इसके लिए कोई वैक्सीन नहीं है।

नदी जोड़ो योजना जल संकट बढ़ा सकती है

मुंबई के आईआईटी, पुणे के आईआईटीएम व कई संस्थानों द्वारा किए गए एक अध्ययन (विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित) के अनुसार सूखे और बाढ़ का स्थायी हल खोजने के लिए प्रस्तावित ‘नदी जोड़ो योजना’ जल संकट बढ़ा सकती है। और तो और, इससे देश में बारिश का रुझान भी बदल सकता है।

जी-20 में विज्ञान

जी-20 अपनी स्थापना के बाद आर्थिक सहयोग के एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है। भारत की अध्यक्षता में साइंस-20 की बैठकें पुडुचेरी, अगरतला, बेंगलूरू और भोपाल में हो चुकी हैं जहां स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धि, क्वाटंम कम्प्यूटिंग, मशीन लर्निंग से जुड़े मुद्दों पर विचार किया गया।

जी-20 के झण्डे तले साइंस-20 एंगेजमेंट ग्रुप की स्थापना 2017 में की गई थी। इस वर्ष भारत की अध्यक्षता में हुई साइंस-20 बैठक की थीम चुनी गई थी- ‘डिसरप्टिव साइंस फॉर इनोवेटिव एंड सस्टेनेएबल डेवलपमेंट गोल्स’।

इगनोबल पुरस्कार 2023

14 सितंबर को 33वें इगनोबल पुरस्कारों की घोषणा की गई, जिसमें दस उपलब्धियों के लिए विजेताओं को सम्मानित किया गया। दरअसल यह बिलकुल भिन्न प्रकार का पुरस्कार है, जो पहले हंसाता है और बाद में विचार मंथन के लिए प्रेरित करता है।

मृत मकड़ियों को ग्रिपिंग औज़ारों के रूप में इस्तेमाल करने, चट्टानों को चाटने (सूखी सतह के बजाय गीली सतह पर खनिज बेहतर दिखते हैं, इसलिए खनिज पहचान करने में मदद मिलती है),‘स्मार्ट’ शौचालय का निर्माण (जो व्यक्तियों के मल-मूत्र की निगरानी और विश्लेषण कर उनके स्वास्थ्य के बारे में बताता है), नासिका में बालों की संख्या गिनने (एलोपेशिया से ग्रसित लोगों के लिए उपचार तलाशना), साहित्य में ‘देजा वु’ के विपरीत ‘जमाइ वु’ ( जिसमें कोई परिचित चीज़ (या शब्द) बार-बार दोहराने से अपरिचित लगने लगते हैं) पर शोध के लिए दिए गए।


रैफ्लेसिया पुष्प खतरे में

प्लांट्स पीपुल प्लेनेट जर्नल में प्रकाशित ताज़ा जानकारी के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े पुष्प रैफ्लेसिया का अस्तित्व खतरे में है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी 42 प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें से साठ प्रतिशत पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। रैफ्लेसिया पुष्प का वजन 6.8 किलोग्राम तक होता है और यह तीन फुट तक का हो सकता है।


नोबेल पुरस्कार राशि में वृद्धि

नोबेल पुरस्कार फाउंडेशन ने पुरस्कार राशि बढ़ाने का फैसला किया है। पुरस्कार राशि एक करोड़ क्रोनर (9,00,000 अमेरिकी डॉलर) से बढ़ाकर 1 करोड़ 10 लाख क्रोनर (9,86,270 अमेरिकी डॉलर) कर दी गई है।

दसवां भोपाल विज्ञान मेला

इस महीने भोपाल में दसवां भोपाल विज्ञान मेला आयोजित किया गया, लेकिन बारिश ने मज़ा फीका कर दिया। मेले में नवाचारी विद्यार्थियों ने अपने नवाचारी मॉडल प्रदर्शित किए। आम लोगों तक विज्ञान की बातें पहुंचाने के लिए विज्ञान मेलों की ज़रूरत है लेकिन देखा गया है कि ऐसे आयोजनों में वैज्ञानिक सोच का मुद्दा हाशिए पर ही चला जाता है।


.प्र. का प्रथम बायोटेक पार्क

मध्यप्रदेश का प्रथम बायोटेक पार्क नीमच ज़िले की जावद तहसील में 39 हैक्टर भूमि पर 50 करोड़ की लागत से स्थापित किया जाएगा। यह देश का दसवां और मध्यप्रदेश का प्रथम बायोटेक पार्क है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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