भारत का पहला तरल दर्पण टेलीस्कोप

हाल ही में भारत में एक अनोखा टेलीस्कोप तैयार किया गया है जिसमें ठोस दर्पण के बजाय घूर्णन करता तरल पारा उपयोग किया गया है। हालांकि इस तरह के टेलीस्कोप पहले भी बनाए जा चुके हैं लेकिन खगोल विज्ञान को समर्पित 4-मीटर चौड़ा इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (आईएलएमटी) पहली बार तैयार किया गया है। इसे हिमालय में 2450-मीटर ऊंचाई पर नैनीताल के समीप स्थित देवस्थल वेधशाला में स्थापित किया गया है।

गौरतलब है कि लगभग 15 करोड़ रुपए की लागत का यह टेलीस्कोप बेल्जियम, कनाडा और भारत द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है। यह कांच वाले टेलीस्कोप की तुलना में बहुत सस्ता है। इसी टेलीस्कोप के नज़दीक बेल्जियम की एक कंपनी द्वारा 3.6 मीटर चौड़ा स्टीयरेबल देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीओटी) भी स्थापित किया गया है जिसकी लागत लगभग 140 करोड़ रुपए है। खगोलविदों के अनुसार तरल दर्पण चंद्रमा पर एक विशाल टेलीस्कोप स्थापित करने के लिए सबसे बेहतरीन तकनीक है जिससे दूरस्थ ब्रह्मांड को देखा जा सकेगा।        

इस प्रकार के टेलीस्कोप में एक कटोरे के आकार के उपकरण में पारे को घुमाया जाता है। इस प्रक्रिया में गुरुत्वाकर्षण और अपकेंद्री बल का मिला-जुला असर तरल को एक पारंपरिक टेलीस्कोप दर्पण के समान आदर्श परावलय आकार में परिवर्तित कर देता है। इसमें कांच का दर्पण बनाने, उसकी सतह को घिसकर परावलय आकार देने और एल्युमिनियम की परावर्तक परत बनाने का खर्च भी नहीं होता है।

आईएलएमटी की कल्पना 1990 के दशक के अंत में की गई थी। हालांकि भारत में इस टेलीस्कोप के पुर्जे 2012 में लाए गए थे लेकिन निर्माण में काफी विलंब हुआ। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि उनके पास पर्याप्त पारा भी नहीं है। फिर कोविड-19 महामारी ने यात्रा करना मुश्किल कर दिया। आखिरकार इस वर्ष अप्रैल में टीम ने 50 लीटर पारे को सेट करके 3.5 मि.मी. परावलय परत का निर्माण किया।

सीधे ऊपर की ओर देखने पर यह घूमता आईना लगभग चंद्रमा जितने चौड़े आकाश का दर्शन कराएगा और पृथ्वी के घूर्णन के चलते सुबह से शाम तक पूरे आकाश पर बारीकी से नज़र रखी जा सकेगी। इसके द्वारा बनाई गई छवियां लंबी धारियों के रूप में दिखाई देंगी जिनके अलग-अलग पिक्सेल को जोड़कर एक लंबे एक्सपोज़र से प्राप्त छवि का निर्माण किया जा सकेगा।

यह टेलीस्कोप रात-दर-रात आकाश की एक ही पट्टी को दिखाएगा, ऐसे में कई रातों के एक्सपोज़र को एक साथ जोड़कर धुंधली वस्तुओं की स्पष्ट छवियां प्राप्त की जा सकती हैं।

वैकल्पिक रूप से, रात-दर-रात हो रहे परिवर्तनों को भी देखा जा सकता है। इसमें सुपरनोवा, क्वाज़र और दूरस्थ निहारिकाओं में उपस्थित ब्लैक होल वगैरह पर भी नज़र रखी जा सकेगी। हालांकि खगोल शास्त्रियों की अधिक रुचि गुरुत्वाकर्षण लेंस की खोज करना है जिसमें गुरुत्वाकर्षण के कारण एक या अनेक निहारिका समूह प्रकाश को विकृत कर देते हैं। आईएलएमटी की मदद से किसी खगोलीय वस्तु की चमक के आधार पर निहारिका-लेंसों के द्रव्यमान और ब्रह्मांड के फैलाव की दर पता लगाई जा सकती है। एक अनुमान के अनुसार आईएलएमटी की आकाशीय पट्टी में 50 ऐसे गुरुत्व लेंस दिखाई दे सकते हैं।         

वैसे तो कई और पारंपरिक सर्वेक्षण टेलीस्कोप आकाश का अध्ययन कर रहे हैं लेकिन परिवर्तनों को देखने के लिए प्रत्येक रात एक ही पैच पर लौटना उनके लिए संभव नहीं है। ऐसे में डीओटी और आईएलएमटी की समन्वित शक्ति से किसी भी खगोलीय वस्तु की जांच करना अब मुश्किल नहीं है।

यदि आईएलएमटी तकनीक सफल होती है तो इसे और अधिक विकसित कर चंद्रमा पर स्थापित किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार चंद्रमा पर पृथ्वी की तुलना में गुरुत्वाकर्षण बल कम है और वहां वातावरण भी नहीं है इसलिए भविष्य के टेलीस्कोप स्थापित करने के लिए वह उचित स्थान है।

गौरतलब है कि पृथ्वी पर कोरियोलिस प्रभाव के कारण 8 मीटर से बड़े दर्पणों में पारे की गति प्रभावित हो सकती है जबकि चंद्रमा के घूर्णन की गति कम होती है जिससे अधिक बड़े दर्पणों को स्थापित करने में कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन इतना वज़न चंद्रमा पर ले जाना मुश्किल है। और वहां रात के समय पारा जम जाएगा और दिन में वाष्पित होता रहेगा। लेकिन हलके पिघले हुए लवण का हिमांक बिंदु कम होता है जो चंद्रमा के वातावरण में भी काम कर सकता है। इसे चांदी के वर्क की मदद से परावर्तक बनाया जा सकता है।    

2000 के दशक में नासा और कैनेडियन स्पेस एजेंसी ने लूनर तरल दर्पण का अध्ययन शुरू किया था जो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। लेकिन हाल ही में चंद्रमा में बढ़ती रुचि के चलते इस तकनीक पर फिर से अध्ययन किया जा सकता है। 2020 में 100-मीटर तरल दर्पण का प्रस्ताव रखा गया था जो चंद्रमा के किसी एक ध्रुव से आकाश के एक टुकड़े पर कई वर्षों तक नज़र रखेगा और निहारिकाओं के बारे में उपयोग जानकारी उपलब्ध कराएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गाजर घास के लाभकारी नवाचारी उपयोग – डॉ. खुशाल सिंह पुरोहित

पिछले दिनों इंदौर के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार पाटीदार ने गाजर घास से बायोप्लास्टिक बनाने में सफलता प्राप्त की है। 

इंदौर के महाराजा रणजीत सिंह कॉलेज ऑफ प्रोफेशनल साइंसेज़ के बायोसाइंस विभाग के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार पाटीदार ने जुलाई 2020 में गाजर घास से बायोप्लास्टिक बनाने की कार्ययोजना पर काम शुरू किया था। इस कार्य में उन्हें भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान इंदौर की प्राध्यापक अपूर्वा दास और शोधार्थी शाश्वत निगम का भी सहयोग मिला। गाजर घास के रेशों से बायोप्लास्टिक बनाया गया, जो सामान्य प्लास्टिक जैसा ही मज़बूत हैं। डॉ. पाटीदार के अनुसार पर्यावरण पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा और 45 दिनों में यह 80 प्रतिशत तक नष्ट भी हो जाएगा। बाज़ार में वर्तमान में उपलब्ध बायोप्लास्टिक से इसका मूल्य भी कम होगा।  

बरसात का मौसम शुरू होते ही गाजर जैसी पत्तियों वाली एक वनस्पति काफी तेज़ी से फैलने लगती है। सम्पूर्ण संसार में पांव पसारने वाला कम्पोज़िटी कुल का यह सदस्य वनस्पति विज्ञान में पार्थेनियम हिस्ट्रोफोरस के नाम से जाना जाता है और वास्तव में घास नहीं है। इसकी बीस प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं। यह वर्तमान में विश्व के सात सर्वाधिक हानिकारक पौधों में से एक है, जो मानव, कृषि एवं पालतू जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ सम्पूर्ण पर्यावरण के लिये अत्यधिक हानिकारक है।

कहा जाता है कि अर्जेन्टीना, ब्राज़ील, मेक्सिको एवं अमरीका में बहुतायत से पाए जाने वाले इस पौधे का भारत में 1950 के पूर्व कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसा माना जाता है कि इस ‘घास’ के बीज 1950 में पी.एल.480 योजना के तहत अमरीकी संकर गेहूं के साथ भारत आए। आज यह ‘घास’ देश में लगभग सभी क्षेत्रों में फैलती जा रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, म.प्र. एवं महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्यों के विशाल क्षेत्र में यह ‘घास’ फैल चुकी है।

तीन से चार फुट तक लंबी इस गाजर घास का तना धारदार तथा पत्तियां बड़ी और कटावदार होती है। इस पर फूल जल्दी आ जाते हैं तथा 6 से 8 महीने तक रहते हैं। इसके छोटे-छोटे सफेद फूल होते हैं, जिनके अंदर काले रंग के वज़न में हल्के बीज होते हैं। इसकी पत्तियों के काले छोटे-छोटे रोमों में पाया जाने वाला रासायनिक पदार्थ पार्थेनिन मनुष्यों में एलर्जी का मुख्य कारण है। दमा, खांसी, बुखार व त्वचा के रोगों का कारण भी मुख्य रूप से यही पदार्थ है। गाजर घास के परागकण का सांस की बीमारी से भी सम्बंध हैं।

पशुओं के लिए भी यह घास अत्यन्त हानिकारक है। इसकी हरियाली के प्रति लालायित होकर खाने के लिए पशु इसके करीब तो आते हैं, लेकिन इसकी तीव्र गंध से निराश होकर लौट जाते हैं।

गाजर घास के पौधों में प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है। जब यह एक स्थान पर जम जाती है, तो अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को विकसित नहीं होने देती है। वनस्पति जगत में यह ‘घास’ एक शोषक के रूप में उभर रही है। गाजर घास के परागकण वायु को दूषित करते हैं तथा जड़ो से स्रावित रासायनिक पदार्थ इक्यूडेर मिट्टी को दूषित करता है। भूमि-प्रदूषण फैलाने वाला यह पौधा स्वयं तो मिट्टी को बांधता नहीं है, दूसरा इसकी उपस्थिति में अन्य प्रजाति के पौधे भी शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।

गाजर घास का उपयोग अनेक प्रकार के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और खरपतवार नाशक दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। इसकी लुगदी से विभिन्न प्रकार के कागज़ तैयार किए जाते हैं। बायोगैस उत्पादन में भी इसको गोबर के साथ मिलाया जाता है। पलवार के रूप में इसका ज़मीन पर आवरण बनाकर प्रयोग करने से दूसरे खरपतवार की वृद्धि में कमी आती है, साथ ही मिट्टी में अपरदन एवं पोषक तत्व खत्म होने को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जैव-रसायन  विभाग के डॉ. के. पांडे ने इस पर अध्ययन के बाद बताया कि गाजर घास में औषधीय गुण भी हैं। इससे बनी दवाइयां बैक्टीरिया और वायरस से होने वाले विभिन्न रोगों के इलाज में कारगर हो सकती हैं।

पिछले वर्षों में गाजर घास का एक अन्य उपयोग वैज्ञानिकों ने खोजा है जिससे अब गाजर घास का उपयोग खेती के लिए विशिष्ट कम्पोस्ट खाद निर्माण में किया जा रहा है। इससे एक ओर, गाजर घास का उपयोग हो सकेगा वहीं दूसरी ओर किसानों को प्राकृतिक

पोषक तत्व (प्रतिशत में)गाजर घास खादकेंचुआ खादगोबर खाद
नाइट्रोजन1.051.610.45
फॉस्फोरस10.840.680.30
पोटेशियम1.111.310.54
कैल्शियम0.900.650.59
मैग्नीशियम0.550.430.28

और सस्ती खाद उपलब्ध हो सकेगी। उदयपुर के सहायक प्राध्यापक डॉ. सतीश कुमार आमेटा ने गाजर घास से विशिष्ट कम्पोस्ट खाद का निर्माण किया है। इस तकनीक से बनी खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम की मात्रा साधारण खाद से तीन गुना अधिक होती है, जो कृषि के लिए एक वरदान है। मेवाड़ युनिवर्सिटी गंगरार चित्तौड़गढ़ में कार्यरत डॉ. आमेटा के अनुसार इस नवाचार से गाजर घास के उन्मूलन में सहायता मिलेगी और किसानों को जैविक खाद की प्राप्ति सुगम हो सकेगी।

जैविक खाद बनाने की इस तकनीक में व्यर्थ कार्बनिक पदार्थों, जैसे गोबर, सूखी पत्तियां, फसलों के अवशेष, राख, लकड़ी का बुरादा आदि का एक भाग एवं चार भाग गाजर घास को मिलाकर बड़ी टंकी या टांके में भरा जाता है। इसके चारों ओर छेद किए जाते हैं, ताकि हवा का प्रवाह समुचित बना रहे और गाजर घास का खाद के रूप में अपघटन शीघ्रता से हो सके। इसमें रॉक फॉस्फेट एवं ट्राइकोडर्मा कवक का उपयोग करके खाद में पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। निरंतर पानी का छिडकाव कर एवं मिश्रण को निश्चित अंतराल में पलट कर हवा उपलब्ध कराने पर मात्र 2 महीने में जैविक खाद का निर्माण किया जा सकता है।

गाजर घास से बनी कम्पोस्ट में मुख्य पोषक तत्वों की मात्रा गोबर खाद से दुगनी होती है। गाजर घास की खाद, केंचुआ खाद और गोबर खाद की तुलना तालिका में देखें। स्पष्ट है कि तत्वों की मात्रा गाजर घास से बने खाद में अधिक होती है। गाजर घास कम्पोस्ट एक ऐसी जैविक खाद है, जिसके उपयोग से फसलों, मनुष्यों व पशुओं पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आनुवंशिक रूप से परिवर्तित मच्छरों का परीक्षण

हाल ही जिनेटिक रूप से परिवर्तित (जिरूप) मच्छरों को खुले में छोड़ने के परिणाम प्रकाशित हुए हैं। उद्देश्य इन मच्छरों की मदद से वायरस-वाहक जंगली मच्छरों की आबादी को कम करना है। प्रारंभिक परिणाम तो सकारात्मक हैं लेकिन व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है।

प्रयोग फ्लोरिडा के दक्षिणी हिस्से के उष्णकटिबंधीय द्वीपों पर किया गया। इन मच्छरों को तैयार करने वाली कंपनी ऑक्सीटेक द्वारा सात महीनों के दौरान लगभग 50 लाख जिरूप एडीज़ एजिप्टी मच्छर इन स्थलों पर छोड़े गए और लगातार निगरानी की गई। ऑक्सीटेक ने 6 अप्रैल को आयोजित एक वेबिनार में ये परिणाम साझा किए हैं लेकिन अभी तक कोई डैटा प्रकाशित नहीं किया है।             

गौरतलब है कि जंगली एडीज़ एजिप्टी मच्छर चिकनगुनिया, डेंगू, ज़ीका और पीतज्वर जैसे वायरसों का वाहक है। इसलिए वैज्ञानिक उनकी आबादी को कम करने के तरीकों की तलाश में हैं। ऑक्सीटेक द्वारा तैयार किए गए नर मच्छरों में एक ऐसा जीन डाला गया है जो उनकी मादा संतानों के लिए घातक होता है। इन्हें खुले में छोड़ने पर ये आम मादा मच्छरों के साथ संभोग करेंगे और नतीजे में पैदा होने वाली मादा संतानें प्रजनन करने से पहले ही मर जाएंगी। नर संतानों में यह जीन रहेगा और वे आने वाली लगभग आधी पीढ़ी में इसे पहुंचा देंगे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह जीन मादा मच्छरों की जान लेता रहेगा। यह तो हुई सिद्धांत की बात।

इस सैद्धांतिक योजना की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने जिरूप मच्छरों के अंडों को कुछ बक्सों में रखा और उनके आसपास कुछ ट्रैप्स तैयार किए जो 400 मीटर से अधिक दायरे को कवर करते थे। कुछ ट्रैप्स मुख्य रूप से अंडे देने की जगह के रूप में काम करते थे और अन्य वयस्क मच्छरों को पकड़ने में मदद करते थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि बक्सों में पैदा होकर निकलने वाले नर मच्छर, जो काटते नहीं हैं, चारों ओर एक हैक्टर के क्षेत्र में फैल गए जो जंगली एडीज़ एजिप्टी की सामान्य सीमा है।

इसके बाद इन नर मच्छरों ने उस क्षेत्र की जंगली आबादी के साथ संभोग किया और मादा मच्छरों ने इन ट्रैप्स के अलावा गमलों, कूड़ेदानों और सॉफ्ट-ड्रिंक के कैन में भी अंडे दिए।         

शोधकर्ताओं द्वारा इन ट्रैप्स से 22,000 से अधिक अंडे एकत्रित किए गए और उनसे निकलने वाली संतानों का अध्ययन किया गया। वे सभी मादा मच्छर वयस्क होने से पहले ही मर गई जिनमें घातक जीन था। इसके अलावा, यह घातक जीन जंगली आबादी में दो से तीन महीने यानी मच्छरों की लगभग तीन पीढ़ियों तक बने रहने के बाद स्वत: गायब हो गया। टीम ने यह भी पाया कि मच्छरों को छोड़ने के स्थान से 400 मीटर से अधिक दूर घातक जीन युक्त कोई मच्छर नहीं मिला।

फिलहाल ऑक्सीटेक कंपनी इस अध्ययन को और अधिक विस्तृत करने की योजना बना रही है। इसके लिए राज्य नियामकों से अनुमोदन की आवश्यकता होगी। कैलिफोर्निया के विसालिया क्षेत्र में भी इस तरह का अध्ययन करने की योजना बनाई जा रही है।    

ये अध्ययन इस बात का आकलन नहीं कर पाएंगे कि यह विधि एडीज़ एजिप्टी द्वारा संचारित वायरस को किस हद तक कम करती है। जन स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का भी आकलन नहीं हो सकेगा क्योंकि जिस क्षेत्र में अध्ययन किया गया है वहां एडीज़-संचारित वायरल संक्रमण काफी कम है। इसके लिए कंपनी को किसी दूसरे क्षेत्र में नियंत्रित परीक्षण करना होगा। वैसे ज़रूरी नहीं कि एडीज़ एजिप्टी की आबादी को कम करके बीमारी के प्रकोप को रोका जा सकेगा। फ्लोरिडा के इस क्षेत्र में एडीज़ एजिप्टी की आबादी मच्छरों की आबादी का मात्र 4 प्रतिशत है जबकि 80 प्रतिशत ऐसी प्रजातियां हैं जो रोग वाहक तो नहीं हैं लेकिन अधिक परेशान करती हैं।

गौरतलब है कि 2017 में भी एडीज़ एजिप्टी मच्छरों की आबादी को कम करने के लिए नर मच्छरों को एक बैक्टीरिया से संक्रमित किया गया था। प्रयोगशाला में तैयार किए गए इन नर मच्छरों से संभोग करने पर मादा मच्छरों के अंडों से लार्वा नहीं निकलते। ऑक्सीटेक ने इसी काम के लिए जिनेटिक परिवर्तन का सहारा लिया है। प्रयोग के वास्तविक असर तो काफी अध्ययनों के बाद ही स्पष्ट होंगे। (स्रोत फीचर्स) 

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विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवन

जुरासिक पार्क फिल्म में दर्शाया गया था कि करोड़ों वर्ष पूर्व विलुप्त हो चुके डायनासौर के जीवाश्म से प्राप्त डीएनए की मदद से पूरे जीव को पुनर्जीवित कर लिया गया था। संभावना रोमांचक है किंतु सवाल है कि क्या ऐसा वाकई संभव है।

हाल के वर्षों में कई वैज्ञानिकों ने विलुप्त प्रजातियों को फिर से अस्तित्व में लाने (प्रति-विलुप्तिकरण) पर हाथ आज़माए हैं और लगता है कि ऐसा करना शायद संभव न हो। कम से कम आज तो यह संभव नहीं हुआ है। लेकिन वैज्ञानिक आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, एक कंपनी कोलोसल लेबोरेटरीज़ एंड बायोसाइन्सेज़ का लक्ष्य है कि आजकल के हाथियों को मैमथ में तबदील कर दिया जाए या कम से कम मैमथनुमा प्राणि तो बना ही लिया जाए।

किसी विलुप्त प्रजाति को वापिस अस्तित्व में लाने के कदम क्या होंगे? सबसे पहले तो उस विलुप्त प्रजाति के जीवाश्म का जीनोम प्राप्त करके उसमें क्षारों के क्रम का अनुक्रमण करना होगा। फिर किसी मिलती-जुलती वर्तमान प्रजाति के डीएनए में इस तरह संसोधन करने होंगे कि वह विलुप्त प्रजाति के डीएनए से मेल खाने लगे। अगला कदम यह होगा संशोधित डीएनए से भ्रूण तैयार किए जाएं और उन्हें वर्तमान प्रजाति की किसी मादा के गर्भाशय में विकसित करके जंतु पैदा किए जाएं।

पहले कदम को देखें तो आज तक वैज्ञानिकों ने मात्र 20 विलुप्त प्रजातियों के जीनोम्स का अनुक्रमण किया है। इनमें एक भालू, एक कबूतर और कुछ किस्म के मैमथ तथा मोआ शामिल हैं। लेकिन अब तक किसी जीवित सम्बंधी में विलुप्त जीनोम का पुनर्निर्माण नहीं किया है।

हाल ही में कोपनहेगन विश्वविद्यालय के टॉम गिलबर्ट, शांताऊ विश्वविद्यालय के जियांग-किंग लिन और उनके साथियों ने मैमथ जैसे विशाल प्राणि का मोह छोड़कर एक छोटे प्राणि पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया – ऑस्ट्रेलिया से करीब 1200 कि.मी. दूर स्थित क्रिसमस द्वीप पर 1908 में विलुप्त हुआ एक चूहा रैटस मैकलीरी (Rattus macleari)। यह चूहा एक अन्य चूहे नॉर्वे चूहे (वर्तमान में जीवित) का निकट सम्बंधी है।

गिलबर्ट और लिन की टीम ने क्रिसमस द्वीप के चूहे के संरक्षित नमूनों की त्वचा में से जीनोम का यथासंभव अधिक से अधिक हिस्सा प्राप्त करके इसकी प्रतिलिपियां बनाईं। इसमें एक दिक्कत यह आती है कि प्राचीन डीएनए टुकड़ों में संरक्षित रहता है। इससे निपटने के लिए टीम ने नॉर्वे चूहे के जीनोम से तुलना के आधार पर विलुप्त चूहे का अधिक से अधिक जीनोम तैयार कर लिया। करंट बायोलॉजी में बताया गया है कि इन दो जीनोम की तुलना करने पर पता चला कि क्रिसमस द्वीप के विलुप्त चूहे के जीनोम का लगभग 5 प्रतिशत गुम है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि गुमशुदा हिस्से में चूहे के अनुमानित 34,000 में 2500 जीन शामिल हैं। जैसे, प्रतिरक्षा तंत्र और गंध संवेदना से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण जीन्स नदारद पाए गए।

कुल मिलाकर इस प्रयास ने प्रति-विलुप्तिकरण के काम की मुश्किलों को रेखांकित कर दिया। 5 प्रतिशत का फर्क बहुत कम लग सकता है लेकिन लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम की विक्टोरिया हेरिज का कहना है कि कई सारे गुमशुदा जीन्स वे होंगे जो किसी प्रजाति को अनूठा बनाते हैं। उदाहरण के लिए मनुष्यों और चिम्पैंज़ी या बोनोबो के बीच अंतर तो मात्र 1 प्रतिशत का है।

यह भी देखा गया है कि वर्तमान जीवित प्रजाति और विलुप्त प्रजाति के बीच जेनेटिक अंतर समय पर भी निर्भर करता है। अतीत में जितने पहले ये दो जीव विकास की अलग-अलग राह पर चल पड़े थे, उतना ही अधिक अंतर मिलने की उम्मीद की जा सकती है। मसलन, क्रिसमस चूहा और नॉर्वे चूहा एक-दूसरे से करीब 26 लाख साल पहले अलग-अलग हुए थे। और तो और, एशियाई हाथी और मैमथ को जुदा हुए तो पूरे 60 लाख साल बीत चुके हैं।

तो सवाल उठता है कि इन प्रयासों का तुक क्या है। क्रिसमस चूहा तो लौटेगा नहीं। गिलबर्ट अब मानने लगे हैं कि पैसेंजर कबूतर या मैमथ को पुनर्जीवित करना तो शायद असंभव ही हो लेकिन इसका मकसद ऐसी संकर प्रजाति का निर्माण करना हो सकता है जो पारिस्थितिक तंत्र में वही भूमिका निभा सके जो विलुप्त प्रजाति निभाती थी। इसी क्रम में मेलबोर्न विश्वविद्यालय के एंड्र्यू पास्क थायलेसीन नामक एक विलुप्त मार्सुपियल चूहे को इस तकनीक से बहाल करने का प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा, जीनोम अनुक्रमण का काम निरंतर बेहतर होता जा रहा है। हो सकता है, कुछ वर्षों बाद हमें 100 प्रतिशत जीनोम मिल जाएं।

अलबत्ता, कई वैज्ञानिकों का मत है विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के चलते काफी सारे संसाधन जीवित प्राणियों के संरक्षण से दूर जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक एक विलुप्त प्रजाति को पुनर्जीवित करने में जितना धन लगता है, उतने में 6 जीवित प्रजातियों को बचाया जा सकता है। इस गणित के बावजूद, यह जानने का रोमांच कम नहीं हो जाएगा कि विलुप्त पक्षी डोडो कैसा दिखता होगा, क्या करता होगा। (स्रोत फीचर्स)

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सेंटीपीड से प्रेरित रोबोट्स

सेंटीपीड एक रेंगने वाला जीव है। कुछ मिलीमीटर से लेकर 30 सेंटीमीटर लंबे और अनेक टांगों वाले ये जीव विभिन्न परिवेशों में पाए जाते हैं। यह अकशेरुकी जीव रेत, मिट्टी, चट्टानों और यहां तक कि पानी पर भी दौड़ सकता है। जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के जीव विज्ञानी डेनियल गोल्डमैन और उनके सहयोगी सेंटीपीड की इस विशेषता का अध्ययन कर रहे थे। हाल ही में टीम ने सोसाइटी ऑफ इंटीग्रेटिव एंड कम्पेरेटिव बायोलॉजी की बैठक के दौरान बताया कि उन्होंने एक ऐसा सेंटीपीड रोबोट तैयार किया है जो खेतों से खरपतवार निकालने में काफी उपयोगी साबित होगा।

दरअसल, सेंटीपीड का लचीलापन ही उसे विभिन्न प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करने में सक्षम बनाता है। वैसे नाम के अनुरूप सेंटीपीड के 100 पैर तो नहीं होते लेकिन हर खंड में एक जोड़ी टांगें होती हैं। यह संरचना उन्हें तेज़ रफ्तार और दक्षता से तरह-तरह से चलने-फिरने की गुंजाइश देती है हालांकि सेंटीपीड की चाल को समझना लगभग असंभव रहा है।

गोल्डमैन के एक छात्र इलेक्ट्रिकल इंजीनियर और रोबोटिक्स वैज्ञानिक यासेमिन ओज़कान-आयडिन ने जब यह पता किया कि कई खंड और टांगें होने का क्या महत्व है तो अध्ययन का तरीका सूझा। इसके लिए ओज़कान-आयडिन ने चार पैर वाले दो-तीन रोबोट्स को एक साथ जोड़ दिया। साइंस रोबोटिक्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह संयुक्त मशीन चौड़ी दरारों और बड़ी-बड़ी बाधाओं को पार करने के सक्षम थी। इसके अलावा युनिवर्सिटी की एक अन्य छात्र एवा एरिकसन ने अन्य जीवों की तुलना में सेंटीपीड की चाल को और गहराई से समझने का प्रयास किया। गौरतलब है कि घोड़े और मनुष्य अपनी रफ्तार बढ़ाने के लिए अपने पैरों अलग-अलग ढंग से चलाते हैं। वीडियो ट्रैकिंग प्रोग्राम का उपयोग करते हुए एरिकसन ने बताया कि सेंटीपीड अपनी चाल में परिवर्तन उबड़-खाबड मार्ग की चुनौतियों के अनुसार करता है।

आम तौर पर सेंटीपीड के पैर एक तरंग के रूप में चलते हैं। लेकिन कई बार इस तरंग की दिशा में परिवर्तन आता है। समतल सतहों पर इस लहर की शुरुआत पिछले पैर से होते हुए सिर की ओर जाती है लेकिन कठिन रास्तों पर इस लहर की दिशा बदल जाती है और कदम जमाने के लिए सबसे पहले आगे का पैर हरकत में आता है। और तो और, प्रत्येक पैर ठीक उसी स्थान पर पड़ता है जहां पिछला कदम पड़ा था।

सेंटीपीड खुद को बचाने के लिए पानी पर तैरने में भी काफी सक्षम होते हैं। तैरने के लिए भी वे अपनी चाल में परिवर्तन करते हैं। लिथोबियस फॉरफिकैटस प्रजाति का सेंटीपीड अपने पैरों को पटकता है और फिर अपने शरीर को एक ओर से दूसरी ओर लहराते हुए आगे बढ़ता है। यहां दो तरंगें पैदा होती हैं – एक पैरों की गति की तथा दूसरी शरीर के लहराने की। इन दो तरंगों के बीच समन्वय को समझने के लिए एक अन्य छात्र ने गणितीय मॉडल का उपयोग किया। इस मॉडल में पैरों और शरीर की तरंगों के विभिन्न संयोजन तैयार किए गए। पता चला कि दो तरंगों के एक साथ चलने की बजाय इनके बीच थोड़ा अंतराल होने पर रोबोट अधिक तेज़ी से आगे बढ़ता है। इसी तरह से कुछ संयोजनों से रोबोट को पीछे जाने में भी मदद मिलती है। गोल्डमैन और टीम ने इसको आगे बढ़ाते हुए बताया कि यदि रोबोट के पैरों में जोड़ हों और शरीर के खंडों में लोच हो तो रोबोट ज़्यादा बेहतर काम कर सकता है। गोल्डमैन द्वारा तैयार किए गए वर्तमान रोबोट काफी लचीले हैं और वे किसी भी स्थान के कोने-कोने तक पहुंच सकते हैं। आगे वे इन्हें प्रशिक्षित करना चाहते हैं ताकि वे खरपतवार को पहचान सकें और निंदाई का काम कर सकें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान अनुसंधान: 2022 से अपेक्षाएं – संकलन: ज़ुबैर सिद्दिकी

र्ष 2021 विज्ञान जगत के लिए चुनौतियों भरा रहा है। इस दौरान मंगल मिशन, अल्ज़ाइमर की दवा, क्रिस्पर तकनीक, जलवायु सम्मेलन जैसे विषय सुर्खियों में रहे लेकिन परिदृश्य पर कोविड-19 छाया रहा। विश्वभर में जागरूकता और टीकाकरण अभियान चलाए गए। 2022 में भी कोविड-19 हावी रहेगा। अलबत्ता इसके अलावा भी कई अन्य क्षेत्र सुर्खियों में रहने की उम्मीद हैं।

कोविड-19 से संघर्ष

2022 में भी कोरोनावायरस चर्चा का प्रमुख मुद्दा बना रहेगा। शोधकर्ता ऑमिक्रॉन जैसे संस्करणों के प्रभावों को समझने और निपटने का निरंतर प्रयास करेंगे। संक्रमितों की विशाल संख्या को देखते हुए 2022 में भी इसके काफी फैलने की संभावना है। वैश्विक आबादी के एक बड़े हिस्से ने टीकों या संक्रमण से एक स्तर की प्रतिरक्षा विकसित की है, और वैज्ञानिकों की अधिक रुचि ऐसे संस्करणों की ओर है जो मानव प्रतिरक्षा को चकमा देने में सक्षम हैं। फिलहाल यह भी स्पष्ट नहीं है कि टीके नए संस्करणों के लिए मुफीद हैं भी या नहीं। वैज्ञानिक टीकों की एक नई पीढ़ी विकसित करने में जुटे हैं जो व्यापक प्रतिरक्षा दे सकें या फिर श्वसन मार्ग की श्लेष्मा झिल्ली में मज़बूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित कर सकें। 2022 में हम सार्स-कोव-2 के विरुद्ध ओरल एंटीवायरल दवाओं की भी उम्मीद कर सकते हैं।

इस वर्ष शोधकर्ताओं का प्रयास दीर्घ कोविड के रहस्यों को समझना-सुलझाना भी रहेगा जिसने संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों को काफी परेशान किया है। इसके अतिरिक्त गरीब देशों तक टीके की पहुंच सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती रहेगी।

नाभिकीय भौतिकी

मिशिगन स्टेट युनिवर्सिटी में 73 करोड़ डॉलर के फैसिलिटी फॉर रेयर आइसोटॉप बीम्स (एफआरआईबी) के शुरू होने के बाद से पहली बार अल्पजीवी परमाणु नाभिक पृथ्वी पर उत्पन्न किए जाएंगे जो आम तौर पर तारकीय विस्फोटों में उत्पन्न होते हैं। एफआरआईबी एक शक्तिशाली आयन स्रोत है जो हाइड्रोजन से लेकर युरेनियम परमाणु नाभिकों तक को निशाना बनाकर अल्पजीवी नाभिकों में बदल सकता है। उद्देश्य सैद्धांतिक रूप से संभव 80 प्रतिशत समस्थानिकों का निर्माण करना है। एफआरआईबी की मदद से भौतिक विज्ञानी नाभिक-संरचना की अपनी समझ को मज़बूत करने के अलावा, तारकीय विस्फोटों में भारी तत्वों के निर्माण की प्रक्रिया और प्रकृति में नए बलों का पता लगाने की उम्मीद करते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी

वर्ष 2022 में संभवत: चीन दुनिया के दो सबसे तेज़ और शक्तिशाली कंप्यूटरों का प्रदर्शन करेगा। खबर है कि ये कंप्यूटर प्रदर्शन के वांछित मानकों को पछाड़ चुके हैं। एक्सास्केल नामक यह सुपर कंप्यूटर प्रति सेकंड 1 महाशंख (1018) से अधिक गणनाएं करने में सक्षम है। दूसरी ओर, अमेरिका स्थित ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी में यूएस के पहले एक्सास्केल कंप्यूटर, फ्रंटियर के 2022 में शुरू होने की उम्मीद है।

एक्सास्केल कंप्यूटरों की मदद से विशाल डैटा सेट के साथ कृत्रिम बुद्धि का संयोजन काफी उपयोगी हो सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति-विशिष्ट दवाइयों, नए पदार्थों की खोज, जलवायु परिवर्तन मॉडल आदि क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन हो सकता है।

अंतरिक्ष: चंद्रमा की ओर

पचास साल पहले मनुष्य ने चंद्रमा पर पहली बार कदम रखा था। अब रोबोटिक चांद मिशन पूरे जोशो-खरोश से लौट आए हैं और एक बार फिर मानव के वहां पहुंचने की तैयारी है। चीन द्वारा भेजे गए रोवर की सफल लैंडिंग के बाद कुछ छोटे स्टार्ट-अप्स द्वारा विकसित और नासा द्वारा वित्तपोषित तीन रोबोटिक लैंडर 2022 में चांद पर भेजे जाएंगे। इस दौड़ में रूस, जापान और भारत के भी शामिल होने की संभावना है। इस परियोजना के पीछे नासा के दो उद्देश्य हैं: चांद पर पानी की उपलब्धता एवं फैलाव का अध्ययन करना और चांद की धूल भरी सतह पर पेलोड पहुंचाकर मानव अन्वेषण के लिए मार्ग तैयार करना। इस वर्ष नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम और स्पेसएक्स स्टारशिप भी प्रक्षेपित किए जाएंगे जो अंतरिक्ष यात्रियों और भारी उपकरणों को चंद्रमा या उससे आगे ले जाने में सक्षम होंगे।

प्रदूषण पर यूएन पैनल

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा फरवरी 2022 में रासायनिक प्रदूषण और कचरे से होने वाले जोखिमों का अध्ययन करने के लिए एक वैज्ञानिक सलाहकार संस्था बनाने के प्रस्ताव पर मतदान की तैयारी कर रही है। संयुक्त राष्ट्र ने पहले भी कई प्रकार के प्रदूषण (जैसे पारा और कार्बनिक रसायन) पर संधियां की हैं। नए प्रस्ताव का समर्थन करने वालों के अनुसार वर्तमान में नीति निर्माताओं को उभरती समस्याओं और शोध आवश्यकताओं की पहचान करने के लिए व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता है। इसके लिए 1800 से अधिक वैज्ञानिक पैनल के समर्थन में हस्ताक्षर कर चुके हैं।

खगोलशास्त्र: ब्लैक होल 

हाल के वर्षों में गुरुत्वाकर्षण तरंग सूचकों की मदद से तारों की साइज़ के ब्लैक होल्स की टक्करों की जानकारी प्राप्त हुई है। और अधिक जानकारी प्राप्त करने के प्रयास जारी हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि 2022 में उनके पास सूरज से कई गुना भारी ब्लैक होल्स के एक-दूसरे की ओर खिंचने से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगों को समझने हेतु पर्याप्त डैटा होगा। ऐसे जोड़ों का पता लगाने के लिए कई रेडियो दूरबीनों को पल्सर्स की ओर उन्मुख किया गया है। पल्सर वास्तव में ढह चुके तारे हैं जो नियमित रेडियो तरंगें छोड़ते हैं। तरंगों में सूक्ष्म बदलाव गुरुत्वाकर्षण तरंगों का संकेत देते हैं।

जैव विविधता समझौते को मज़बूती

यदि वर्ष 2050 तक सभी राष्ट्र मिलकर जैव विविधता संधि का नया ढांचा अपनाते हैं तो कई लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के उपायों को बढ़ावा मिल सकता है। वार्ताकारों द्वारा विकसित एक योजना के तहत 2022 में चीन में 196 देशों की एक बैठक आयोजित करने की संभावना है। इस बैठक में पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा और स्थिरता पर ज़ोर देने के साथ आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों के समतामूलक बंटवारे पर भी ध्यान दिया जाएगा। इन प्रयासों के लिए 2030 तक कम से कम 70 करोड़ डॉलर की निधि जुटाने का भी लक्ष्य है। उद्देश्यों में भूमि और समुद्र के 30 प्रतिशत हिस्से का संरक्षण, घुसपैठी प्रजातियों के प्रसार को कम करना, कीटनाशकों के उपयोग में दो-तिहाई की कमी और प्लास्टिक कचरे को खत्म करते हुए वैश्विक प्रदूषण को आधा करना और शहरवासियों के लिए “हरे और नीले” स्थानों तक पहुंच बढ़ाना शामिल है। नई तरीकों में प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण में प्रगति की निगरानी और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय निवासियों जैसे हितधारकों को शामिल करना प्रमुख है।

चीन: जीएम फसलों को अनुमति

चीन अनुवांशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) मकई और सोयाबीन के पहले व्यवसायिक रोपण को 2022 के अंत तक अनुमति दे सकता है। वर्तमान में, पपीता एकमात्र खाद्य जीएम पौधा है जिसको चीन में स्वीकृति दी गई है। जीएम कपास की खेती व्यापक रूप से की जाती है और जीएम चिनार भी काफी उपलब्ध है। गौरतलब है कि चीन में पिछले 10 वर्षों से जीएम मकई और सोयाबीन पर अनुसंधान चल रहे हैं लेकिन जनता के विरोध और सावधानी के चलते इसे प्रयोगशाला तक ही सीमित रखा गया है। चीन में प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों और पशु आहार के लिए बड़ी मात्रा में जीएम मकई और सोयाबीन आयात किए जाते हैं। इसके मद्देनज़र अधिकारियों ने घरेलू स्तर पर जीएम फसलों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने का आह्वान किया है। चीन अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है इसलिए जीएम चावल को अनुमति मिलने की संभावना फिलहाल कम है।

ग्लोबल वार्मिंग: मीथेन उत्सर्जन

नवंबर 2021 के जलवायु शिखर सम्मलेन में विश्व नेताओं ने 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत तक कटौती करने का संकल्प लिया है। इन संकल्पों पर कार्रवाई की निगरानी के लिए ज़रूरी उन्नत उपग्रहों को 2022 तक कक्षा में पहुंचाने का लक्ष्य है। एक गैर-मुनाफा संस्था एनवायरनमेंट डिफेंस फंड द्वारा विकसित मीथेनसैट को अक्टूबर में लॉन्च करने की उम्मीद है। यह धान व रिसती पाइपलाइन जैसे स्रोतों से उत्सर्जित मीथेन का पता लगाने की क्षमता से लैस होगा। कार्बन मैपर द्वारा विकसित दो अन्य उपग्रह न सिर्फ मीथेन बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की भी निगरानी करेंगे।

मलेरिया का टीका           

अभी भी अफ्रीका में प्रति वर्ष 5 वर्ष से कम उम्र के ढाई लाख से ज़्यादा बच्चे मलेरिया से मारे जाते हैं। उम्मीद है कि 2022 में अफ्रीका के सभी देश मलेरिया के टीके से अनमोल जीवन को बचा सकेंगे। तीन दशकों के शोध के बाद आरटीएस,एस टीके को आखिरकार पिछले वर्ष अक्टूबर में मंज़ूरी मिल गई है। वैक्सीन एलायंस ने टीके खरीदकर लोगों तक पहुंचाने के लिए 2025 तक 15.5 करोड़ डॉलर खर्च करने का निर्णय लिया है। वैसे यह टीका अपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है और गंभीर मलेरिया के कारण अस्पताल में भर्ती होने की दर को लगभग 30 प्रतिशत तक कम करता है। यह विशेष रूप से तब अधिक प्रभावी होता है जब इसे उच्च जोखिम वाले बरसात के मौसम में रोगनिरोधी रूप से दी जाने वाली मलेरिया-रोधी दवा के साथ दिया जाए।

वैसे अगले वर्ष यूएस के दो नीतिगत निर्णय भी वैज्ञानिक शोध को प्रभावित करेंगे। इनमें से एक का सम्बंध सरकारी वित्तपोषित शोध में चीन की भागीदारी से है तथा दूसरे का सम्बंध स्पष्ट रूप से समाजोपयोगी कहे जाने वाले शोध को बढ़ावा देने के लिए नई परियोजनाओं से है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान अनुसंधान: 2021 में हुई कुछ महत्वपूर्ण खोजें – मनीष श्रीवास्तव

र साल विज्ञान की दुनिया में नई—नई खोजें मानव सभ्यता को उत्कृष्ट बनाती हैं। साल 2021 भी इससे कुछ अलग नहीं रहा है। यहां 2021 में हुई कुछ ऐसे ही वैज्ञानिक खोजों की झलकियां प्रस्तुत की जा रही हैं, जो स्वास्थ्य, अंतरिक्ष, खगोलविज्ञान जैसे विषयों से जुड़ी हुई हैं।

अंतरिक्ष में नई दूरबीन

हाल ही में नासा से जुड़े वैज्ञानिकों ने कनाडा तथा युरोपीय संघ की मदद से एक अत्यंत शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन लॉन्च की है। नाम है जेम्स वेब। उम्मीद जताई जा रही है अपने 5-10 साल के जीवन में यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य उजागर करने में मददगार होगी ।

पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर स्थापित जेम्स वेब दूरबीन कई मामलों में खास है। यह अंतरिक्ष से आने वाली इंफ्रारेड तरंगों को पकड़ेगी, जिन्हें अन्य दूरबीनें नहीं पकड़ पाती थीं जिसके चलते अंतरिक्ष में छिपे पिंडों को भी देखा जा सकेगा।

इसके अलावा यह गैस के बादलों के पार भी देख सकती है।

नए आई ड्रॉप से दूर होगी चश्मे की समस्या

हाल ही में अमेरिका में ऐसे आई ड्राप – ‘वुइटी’ – पर शोध किया गया है जो ऐसे लोगों के लिए बेहद मददगार होने वाला है, जिन्हें आंखों से धुंधला दिखाई देता है। उपयोग करने पर यह कुछ समय के लिए आंखों में धुंधलेपन की समस्या को दूर कर देती है। इसे यूएस के खाद्य व औषधि प्रसासन (एफडीए) की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है। इसके निर्माताओं का दावा है कि इसका असर 6—10 घंटों तक रहता है। इसके एक महीने के डोज़ का खर्च करीब 6 हज़ार रुपए होगा।

प्रयोगशाला में बनाया स्क्वेलीन

युनेस्को के अनुसार सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों, दवाइयों और कोविड वैक्सीन बनाने में इस्तेमाल होने वाले स्क्वेलीन के लिए हर साल 12—13 लाख शार्क के लीवर से 100—150 मिलीलीटर स्क्वेलिन प्राप्त किया जाता है। आईआईटी जोधपुर के वैज्ञानिक प्रो. राकेश शर्मा ने जंगली वनस्पतियों और राज्स्थानी मिट्टी की प्रोसेसिंग से स्क्वेलिन तैयार करने में सफलता पाई है। इस रिसर्च को हाल ही में पेटेंट भी मिल गया है। अब इसके उत्पादन की तैयारी चल रही है।

स्क्वेलीन का इस्तेमाल टीकों में सहायक के रूप में भी होता है। शार्क से मिलने वाले स्क्वेलीन की कीमत 10 लाख रुपए किलो है, जबकि प्रयोगशाला में तैयार स्क्वेलीन की लागत बहुत कम है। प्रयोगशाला में तैयार करने के लिए इसमें धतूरा, आक, रतनज्योत और खेजड़ी के बीजों का इस्तेमाल किया गया है। इन्हें राजस्थानी मिट्टी के साथ प्रोसेस कर स्क्वेलीन बनाने का काम किया जा रहा है।

तंत्रिका रोगों का नया इलाज

हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह संकेत मिले हैं कि एक एथलीट के शरीर का प्रोटीन दूसरे शख्स के तंत्रिका रोगों के इलाज में कारगर साबित हो सकता है। शोधकर्ताओं द्वारा एक्सरसाइज़ व्हील पर कई मील दौड़ लगाने वाले चूहों का खून निष्क्रिय चूहा में डालने पर काफी हैरतअंगेज़ नतीज़े सामने आए। नेचर में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि कसरती चूहे का खून इंजेक्ट किए जाने के बाद निष्क्रिय चूहे में अल्ज़ाइमर और अन्य तंत्रिका बीमारियों के कारण होने वाली मस्तिष्क की सूजन कम हो गई। मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल एंड हावर्ड मेडिकल स्कूल के न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर रुडोल्फ तान का कहना है कि कसरत के दौरान बनने वाले प्रोटीन से मस्तिष्क की सेहत में सुधार से जुड़े शोध हो रहे हैं। वे खुद वर्ष 2018 में इस विषय पर एक शोध कर चुके हैं, जिसमें देखा गया था कि अल्ज़ाइमर वाले चूहों के मस्तिष्क की सेहत में कसरत से सुधार हुआ है।

बिना तारे वाले ग्रह

ब्रह्मांड में अभी तक जितने भी ग्रह खोजे जा सके हैं, उन्हें उनके अपने सूर्य की चमक में होने वाली कमी के आधार पर खोजा जा सका है। ऐसे में बिना तारों वाले ग्रहों की खोज करना तो असंभव सा ही प्रतीत होता था, लेकिन वैज्ञानिकों ने हाल ही में 100 से भी ज़्यादा ऐसे ग्रहों की खोज की है जिनका अपना कोई सूर्य या तारा नहीं है। पहली बार एक साथ इतनी बड़ी संख्या में ऐसे ग्रहों की खोज हुई है।

खगोलविदों का कहना है कि इन ग्रहों का निर्माण ग्रहों के तंत्र में हुआ होगा और बाद में ये स्वतंत्र विचरण करने लगे होंगे। इन पिंडों की पड़ताल के लिए शोधकर्ताओं ने युवा ‘अपर स्कॉर्पियस’ तारामंडल का अध्ययन किया। यह हमारे सूर्य के सबसे पास तारों का निर्माण करने वाला क्षेत्र है।

खगोलविदों का कहना है कि ब्रह्मांड में मुक्त ग्रहों की खोज आगे के अध्ययनों में बेहद उपयोगी होगी। अब जेम्स वेब स्पेस दूरबीन जैसे उन्नत उपकरण इनके बारे में विस्तृत खोजबीन कर सकते हैं।  

चुंबक खत्म करेगा विद्युत संकट

एक निहायत शक्तिशाली चुंबक बनाया गया है, इतना शक्तिशाली कि पूरे विमान को अपनी तरफ खींच सकता है। इसे फ्रांस के इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (ITER) में असेंबल करके रखा गया है। यह 18 मीटर ऊंचा और 4.3 मीटर चौड़ा है। ITER के वैज्ञानिक नाभिकीय संलयन के ज़रिए ऊर्जा उत्पादन की तलाश कर रहे हैं। इसी संदर्भ में इस विशाल चुंबक का निर्माण किया गया है ताकि परमाणु रिएक्टर में विखंडित होने वाले नाभिकों का संलयन इसकी मदद से करवाया जाए और इससे असीमित ऊर्जा प्राप्त की जाए। अगर वैज्ञानिक कामयाब रहे तो विद्युत संकट का एक समाधान उभर आएगा।

एड्स उपचार में प्रगति

एक नए अध्ययन में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने एचआईवी संक्रमित प्रतिरक्षा कोशिकाओं में वायरस की वृद्धि दर कम करने एवं उसे रोकने में हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) गैस की भूमिका का पता लगाया है। उनका कहना है कि यह खोज एचआईवी के विरुद्ध अधिक व्यापक एंटीरेट्रोवायरल उपचार विकसित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। देखा जाए, तो वर्तमान एंटीरेट्रोवायरल उपचार एड्स का इलाज नहीं है। यह केवल वायरस को दबाकर रखता है, जिसके चलते बीमारी सुप्त रहती है। आईआईएससी में एसोसिएट प्रोफेसर अमित सिंह के अनुसार, “इससे एचआईवी संक्रमित लाखों लोगों के जीवन में सुधार हो सकता है।”

यह थी गत वर्ष हुईं महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें। इनके अलावा भी कई सारी अन्य उपयोगी खोजें हुई हैं। उम्मीद है 2022 विज्ञान के लिए बेहतर साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

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प्रजनन करते रोबोट!

कुछ वर्ष पहले युनिवर्सिटी ऑफ वर्मान्ट, टफ्ट्स युनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकली इंस्पायर्ड इंजीनियरिंग और हारवर्ड युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अफ्रीकी नाखूनी मेंढक (ज़ेनोपस लाविस) की स्टेम कोशिकाओं से एक मिलीमीटर का रोबोट तैयार किया था। इसे ज़ेनोबॉट नाम दिया गया। प्रयोगों से पता चला कि ये छोटे-छोटे पिंड चल-फिर सकते हैं, समूहों में काम कर सकते हैं और अपने घाव स्वयं ठीक भी कर सकते हैं।

अब वैज्ञानिकों ने इन ज़ेनोबॉट में प्रजनन का एक नया रूप खोजा है जो जंतुओं या पौधों के प्रजनन से बिल्कुल अलग है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मेंढकों में प्रजनन करने का एक तरीका होता है जिसका वे सामान्य रूप से उपयोग करते हैं। लेकिन जब भ्रूण से कोशिकाओं को अलग कर दिया जाता है तब वे कोशिकाएं नए वातावरण में जीना सीख जाती हैं और प्रजनन का नया तरीका खोज लेती हैं। मूल ज़ेनोबोट मुक्त स्टेम कोशिकाओं के ढेर बना लेते हैं जो पूरा मेंढक बना सकते हैं।

दरअसल, स्टेम कोशिकाएं ऐसी अविभेदित कोशिकाएं होती हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता होती है। ज़ेनोबॉट्स बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने मेंढक के भ्रूण से जीवित स्टेम कोशिकाओं को अलग करके इनक्यूबेट किया। आम तौर पर माना जाता है कि रोबोट धातु या सिरेमिक से बने होते हैं। लेकिन वास्तव में रोबोट का मतलब यह नहीं होता कि वह किस चीज़ से बना है बल्कि रोबोट वह है जो मनुष्यों की ओर से स्वयं काम कर दे।

अध्ययन में शामिल शोधकर्ता जोश बोंगार्ड के अनुसार यह एक तरह से तो रोबोट है लेकिन यह एक जीव भी है जो मेंढक की कोशिकाओं से बना है। बोंगार्ड बताते हैं कि ज़ेनोबॉट्स शुरुआत में गोलाकार थे और लगभग 3000 कोशिकाओं से बने थे और खुद की प्रतियां बनाने में सक्षम थे। लेकिन यह प्रक्रिया कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही हुई। ज़ेनोबॉट्स वास्तव में ‘काइनेटिक रेप्लिकेशन’ का उपयोग करते हैं जो आणविक स्तर देखा गया है लेकिन पूरी कोशिका या जीव के स्तर पर पहले नहीं देखा गया।             

इसके बाद शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धि (एआई) की मदद से विविध आकारों का अध्ययन किया ताकि ऐसे ज़ेनोबॉट्स बनाए जा सकें जो अपनी प्रतिलिपि बनाने में अधिक प्रभावी हों। सुपरकंप्यूटर ने C-आकार का सुझाव दिया। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह C-आकार पेट्री डिश में छोटी-छोटी स्टेम कोशिकाओं को खोजकर उन्हें अपने मुंह के अंदर एकत्रित कर लेता था। कुछ ही दिनों में कोशिकाओं का ढेर नए ज़ेनोबॉट्स में परिवर्तित हो गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार (PNAS जर्नल) आणविक जीवविज्ञान और कृत्रिम बुद्धि के इस संयोजन का उपयोग कई कार्यों में किया जा सकता है। इसमें महासागरों से सूक्ष्म-प्लास्टिक को एकत्रित करना, जड़ तंत्रों का निरीक्षण और पुनर्जनन चिकित्सा जैसे कार्य शामिल हैं।

इस तरह स्वयं की प्रतिलिपि निर्माण का शोध चिंता का विषय हो सकता है लेकिन शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ये जीवित मशीनें प्रयोगशाला तक सीमित हैं और इन्हें आसानी से नष्ट किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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गर्मी के झटके और शीत संवेदना – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन


प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है।   ऐसा न होने पर कई विकार उत्पन्न होते हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह प्रोटीन्स को सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन प्रोटीन कहते हैं।

डीएनए न्यूक्लियोटाइड्स की एक सीधी शृंखला है, जिसके कुछ हिस्सों का सटीक अनुलेखन संदेशवाहक आरएनए (mRNA) में किया जाता है। फिर आरएनए में निहित संदेश अमीनो अम्लों की एक शृंखला यानी प्रोटीन में बदले जाते हैं। प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है। और अक्सर इस आकार में ढलने के लिए प्रोटीन में तहें अपने आप नहीं बनती हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह इन्हें सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन (सहचर) प्रोटीन कहते हैं।

जीव विज्ञान में शेपरॉन

वैसे शेपरॉन का विचार विचित्र और पुरातनपंथी लग सकता है, लेकिन जैविक कार्यों में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नई प्रोटीन शृंखला को सही आकार देने के बाद शेपरॉन वहां से हट जाते हैं। या फिर नई शृंखला हटा दी जाती है। शेपरॉन के बिना नव-संश्लेषित प्रोटीन्स जल्द ही अघुलनशील उलझे गुच्छे बन जाते हैं, जो कोशिकीय प्रक्रियाओं में बाधा डालते हैं।

कई शेपरॉन ‘हीट शॉक’ प्रोटीन (या ऊष्मा-प्रघात प्रोटीन) की श्रेणी में आते हैं। जब भी किसी जीव को उच्च तापमान का झटका (हीट शॉक) लगता है तो उसके प्रोटीन अपना मूल आकार खोने लगते हैं। व्यवस्था को बहाल करने के लिए बड़ी संख्या में शेपरॉन बनते हैं।

शरीर में सामान्य कोशिकीय क्रियाओं के संचालन लिए भी शेपरॉन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन का गलत जगह या गलत तरीके से मुड़ना कई रोगों का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए तंत्रिकाओं में अल्फा-सायन्यूक्लीन प्रोटीन पाया जाता है। यह गलत तह किया गया हो तो पार्किंसन रोग होता है। अल्ज़ाइमर के रोगियों के मस्तिष्क में एमिलॉयड बीटा-पेप्टाइड के गुच्छों से बने प्लाक होते हैं। एमिलॉयड तंतुओं का यह जमाव विषैला होता है जो व्यापक पैमाने पर तंत्रिकाओं का नाश करता है – यह एक ‘तंत्रिका-विघटन’ विकार है। आंख के लेंस के प्रोटीन (क्रिस्टेलिन) के गलत ढंग से तह हो जाने के कारण मोतियाबिंद होता है। आंखों के लेंस में अल्फा-क्रिस्टेलिन नामक प्रोटीन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जो स्वयं शेपरॉन के रूप में कार्य करते हैं – मानव अल्फा क्रिस्टेलिन में एक अकेला उत्परिवर्तन कतिपय जन्मजात मोतियाबिंद के लिए ज़िम्मेदार होता है।

आणविक तापमापी

मनुष्यों में प्रमुख शेपरॉन में HSP70, HSC70 और HSP90 शामिल हैं। इन नामों में जो संख्याएं हैं वे प्रोटीन की साइज़ (किलोडाल्टन में) दर्शाती हैं। सामान्य कोशिकाओं में पाए जाने वाले प्रोटीन्स में से 1-2 प्रतिशत प्रोटीन हीट शॉक प्रोटीन होते हैं। तनाव की स्थिति में इनकी संख्या तीन गुना तक बढ़ जाती है।

HSP70 तो ऊष्मा का संपर्क होने पर बनता है जबकि HSC70 हमेशा सामान्य कोशिकाओं में काफी मात्रा में मौजूद होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि HSC70 एक आणविक तापमापी की तरह काम करता है, जिसमें ठंडे (कम तापमान) को महसूस करने की क्षमता है। यह बात कुछ पेचीदा विकारों के अध्ययन से पता चली है। ऐसे विकारों का एक उदाहरण दुर्लभ फैमिलियल कोल्ड ऑटोइन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम यानी खानदानी शीत आत्म-प्रतिरक्षा विकार (FCAS) है। इस समूह के विकारों के लक्षणों में त्वचा पर चकत्ते, जोड़ों में दर्द और बुखार शामिल हैं। ये लक्षण कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक बने रह सकते हैं। इनकी शुरुआत कम उम्र में हो जाती है, और ये ठंड के कारण या थकान जैसे तनाव के कारण शुरू होते हैं। इस विकार के भ्रामक लक्षणों के कारण इसका निदान मुश्किल होता है – पहली बार प्रकट होने के बाद पक्का निदान करने में दस-दस साल लग जाते हैं।

भारत में FCAS ग्रस्त पहला परिवार इस साल अगस्त में पहचाना गया था। बेंगलुरु स्थित एस्टर सीएमआई अस्पताल के सागर भट्टड़ और उनके सहयोगियों ने चार साल के एक लड़के, जिसे अक्सर जाड़ों में चकत्ते पड़ जाते थे, में FCAS के आनुवंशिक आधार का पता लगाया। पता चला है कि उसके दादा सहित परिवार के कई सदस्यों में यही दिक्कतें थी (इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स, अगस्त 2021)।

ठंडा महसूस करने में HSC70 की भूमिका को लेकर सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के घनश्याम स्वरूप और उनके समूह ने आत्म-प्रतिरक्षा जनित शोथ (ऑटोइन्फ्लेमेशन) की स्थिति शुरू होने की एक रूपरेखा तैयार की है (FEBS जर्नल, सितंबर 2021)।

शीत संवेदना से सम्बंधित विकार उन प्रोटीन्स में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं जो शोथ को नियंत्रित करते हैं। शरीर के सामान्य तापमान पर तो HSC70 इन उत्परिवर्तित प्रोटीनों को भी सही ढंग से तह होने के लिए तैयार कर लेता है, और इस तरह ये उत्परिवर्तित प्रोटीन भी सामान्य ढंग से कार्य करते रहते हैं। ठंड की स्थिति में, HSC70 अणु का आकार खुद थोड़ा बदल जाता है और शोथ के लिए ज़िम्मेदार उत्परिवर्तित अणुओं के साथ यह उतनी मुस्तैदी से निपट नहीं पाता। इस कारण दो घंटे के भीतर ही ठंड लगना, जोड़ों में दर्द और त्वचा पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

कैंसर कोशिकाएं अंधाधुंध तरह से विभाजित होती हैं। कैंसर की ऐसी तनावपूर्ण स्थिति को बनाए रखने में हीट शॉक प्रोटीन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कैंसर कोशिकाओं में हीट शॉक प्रोटीन की अधिकता रोग के बिगड़ने का संकेत होता है। कैंसर कोशिकाओं में ऐसे प्रोटीन्स, जो सामान्य रूप से ट्यूमर का दमन करते हैं, में उत्परिवर्तन इकट्ठे होते चले जाते हैं। इस मामले में HSP70 और HSP90 खलनायक की भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे उत्परिवर्तित प्रोटीन को तह करना जारी रखते हैं और ट्यूमर को बढ़ने का मौका देते हैं। प्रयोगशाला में, HSP90 के अवरोधकों ने कैंसर विरोधी एजेंटों के रूप में आशाजनक परिणाम दिए हैं। अलबत्ता, मनुष्यों पर उपयोग के लिए अब तक किसी भी अवरोधक को मंज़ूरी नहीं मिली है, क्योंकि प्रभावी होने के लिए इन रसायनों की जितनी अधिक मात्रा की ज़रूरत होती है वह मानव शरीर के हानिकारक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नई पैनल करेगी महामारी के स्रोत का अध्ययन

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति की जांच के लिए एक नई पैनल गठित की है। साइंटिफिक एडवायज़री ग्रुप ऑन दी ओरिजिंस ऑफ नावेल पैथोजेंस (एसएजीओ) नामक इस टीम को भविष्य के प्रकोपों और महामारियों की उत्पत्ति तथा उभरते रोगजनकों के अध्ययन के लिए सुझाव देने का भी काम सौंपा गया है।

एसएजीओ में 26 देशों के 26 शोधकर्ताओं को शामिल किया गया है। 6 सदस्य पूर्व अंतर्राष्ट्रीय टीम का भी हिस्सा रहे हैं जिसने सार्स-कोव-2 की प्राकृतिक उत्पत्ति का समर्थन किया था। गौरतलब है कि डबल्यूएचओ ने 700 से अधिक आवेदनों में से इन सदस्यों का चयन किया है और औपचारिक घोषणा 2 सप्ताह बाद की जाएगी।

वैश्विक स्वास्थ्य की विशेषज्ञ और जॉर्जटाउन युनिवर्सिटी की वकील एलेक्ज़ेंड्रा फेलन इस टीम को एक प्रभावशाली समूह के रूप में देखती हैं लेकिन मानती हैं कि महिलाओं की भागीदारी अधिक होनी चाहिए थी। साथ ही उनका मत है कि पैनल में नैतिकता और समाज शास्त्र के विशेषज्ञों का भी अभाव है।

उत्पत्ति सम्बंधी डबल्यूएचओ का पूर्व अध्ययन राजनीति, हितों के टकराव और अपुष्ट सिद्धांतों के चलते भंवर में उलझा था। ऐसी ही दिक्कतें पिछले प्रकोपों की जांच के दौरान भी उत्पन्न हुई थीं। डबल्यूएचओ को उम्मीद है कि एक स्थायी पैनल गठित करने से कोविड-19 के स्रोत पर चल रही तनाव की स्थिति में कमी आएगी और भविष्य के रोगजनकों की जांच अधिक सलीके से हो सकेगी। संगठन का उद्देश्य इसे राजनीतिक बहस से दूर रखते हुए वैज्ञानिक बहस की ओर ले जाना है।

मोटे तौर पर एसएजीओ का ध्यान इस बात पर होगा कि खतरनाक रोगजनक जीव कब, कहां और कैसे मनुष्यों को संक्रमित करते हैं, कैसे इनके प्रसार को कम किया जा सकता है और प्रकोप का रूप लेने से रोका जा सकता है। एसएजीओ के विचारार्थ मुद्दों में वर्तमान महामारी की उत्पत्ति के बारे में उपलब्ध सबूतों का स्वतंत्र मूल्यांकन और आगे के अध्ययन के लिए सलाह देना शामिल है।       

इसके चलते तनाव की स्थिति भी बन सकती है। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन का निष्कर्ष था कि नए कोरोनावायरस की प्रयोगशाला में उत्पत्ति संभव नहीं है और इस विषय में आगे जांच न करने की भी बात कही गई थी। लेकिन डबल्यूएचओ के निदेशक टेड्रोस ने इस निष्कर्ष को “जल्दबाज़ी” बताया था। यानी पैनल को प्रयोगशाला उत्पत्ति पर विचार करना होगा। इससे टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। चीन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि भविष्य में वह ऐसी किसी जांच में सहयोग नहीं करेगा।

बहरहाल, एसएजीओ को उत्पत्ति सम्बंधी अध्ययन को वापस उचित दिशा देने का मौका है। यदि इसकी संभावना नहीं होती तो एसएजीओ की स्थापना ही क्यों की जाती। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन से जुड़े कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह काफी महत्वपूर्ण है कि एसएजीओ की स्थापना से ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले स्वतंत्र समूहों के काम में बाधा नहीं आनी चाहिए जो किसी प्रकोप के उभरने के बाद तुरंत जांच में लग जाते हैं। संभावना है कि पैनल कई अलग-अलग समूहों को भी अपने साथ शामिल कर सकती है जो अलग-अलग परिकल्पनाओं की छानबीन तथा पहली समिति द्वारा सुझाए गए अध्ययनों को आगे बढ़ा सकते हैं।  

एसएजीओ के पास कई रास्ते हैं – वुहान और उसके आसपास के बाज़ारों में बेचे जाने वाले वन्यजीवों और चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के चमगादड़ों में सार्स वायरस का अध्ययन; चीन में दिसंबर 2019 से पहले पाए गए मामलों की जांच; और वुहान और आसपास के क्षेत्रों के ब्लड बैंकों में 2019 से संग्रहित रक्त नमूनों का विश्लेषण और मौतों का विस्तृत अध्ययन।

डबल्यूएचओ की प्रथम समिति ने वुहान के ब्लड बैंकों में संग्रहित 2 लाख नमूनों की जांच का सुझाव दिया था। इनमें से कुछ नमूने तो दिसंबर 2019 के भी पहले के हैं। चीन ने वायदा किया है कि वह उन नमूनों के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को साझा करेगा लेकिन कुछ कानूनी कारणों से नमूनों की संग्रह तिथि के 2 वर्ष बाद तक जांच नहीं की जा सकती। संभावना है कि 2 वर्ष की अवधि पूरे होते ही जांच शुरू कर दी जाएगी।

एक बात तो स्पष्ट है कि एसएजीओ को काम करने के लिए राष्ट्रों, मीडिया और आम जनता का सहयोग ज़रूरी है। यह हमारे पार वायरस की उत्पत्ति को जानने का शायद आखिरी मौका हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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