शिशु की ‘आंखों’ से सीखी भाषा

हाल ही में एक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) मॉडल ने एक शिशु की आंखों के ज़रिए ‘crib (पालना)’ और ‘ball (गेंद)’ जैसे शब्दों को पहचानना सीखा है। एआई के इस तरह सीखने से हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि मनुष्य कैसे सीखते हैं, खासकर बच्चे भाषा कैसे सीखते हैं।

शोधकर्ताओं ने एआई को शिशु की तरह सीखने का अनुभव कराने के लिए एक शिशु को सिर पर कैमरे से लैस एक हेलमेट पहनाया। जब शिशु को यह हेलमेट पहनाया गया तब वह छह महीने का था, और तब से लेकर लगभग दो साल की उम्र तक उसने हर हफ्ते दो बार लगभग एक-एक घंटे के लिए इस हेलमेट को पहना। इस तरह शिशु की खेल, पढ़ने, खाने जैसी गतिविधियों की 61 घंटे की रिकॉर्डिंग मिली।

फिर शोधकर्ताओं ने मॉडल को इस रिकॉर्डिंग और रिकॉर्डिंग के दौरान शिशु से कहे गए शब्दों से प्रशिक्षित किया। इस तरह मॉडल 2,50,000 शब्दों और उनसे जुड़ी छवियां से अवगत हुआ। मॉडल ने कांट्रास्टिव लर्निंग तकनीक से पता लगाया कि कौन सी तस्वीरें और शब्द परस्पर सम्बंधित हैं और कौन से नहीं। इस जानकारी के उपयोग से मॉडल यह भविष्यवाणी कर सका कि कतिपय शब्द (जैसे ‘बॉल’ और ‘बाउल’) किन छवियों से सम्बंधित हैं।

फिर शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि एआई ने कितनी अच्छी तरह भाषा सीख ली है। इसके लिए उन्होंने मॉडल को एक शब्द दिया और चार छवियां दिखाईं; मॉडल को उस शब्द से मेल खाने वाली तस्वीर चुननी थी। (बच्चों की भाषा समझ को इसी तरह आंका जाता है।) साइंस पत्रिका में शोधकर्ताओं ने बताया है कि मॉडल ने 62 प्रतिशत बार शब्द के लिए सही तस्वीर पहचानी। यह संयोगवश सही होने की संभावना (25 प्रतिशत) से कहीं अधिक है और ऐसे ही एक अन्य एआई मॉडल के लगभग बराबर है जिसे सीखने के लिए करीब 40 करोड़ तस्वीरों और शब्दों की जोड़ियों की मदद से प्रशिक्षित किया गया था।

मॉडल कुछ शब्दों जैसे ‘ऐप्पल’ और ‘डॉग’ के लिए अनदेखे चित्रों को भी (35 प्रतिशत दफा) सही पहचानने में सक्षम रहा। यह उन वस्तुओं की पहचान करने में भी बेहतर था जिनके हुलिए में थोड़ा-बहुत बदलाव किया गया था या उनका परिवेश बदल दिया गया था। लेकिन मॉडल को ऐसे शब्द सीखने में मुश्किल हुई जो कई तरह की चीज़ों के लिए जेनेरिक संज्ञा हो सकते हैं। जैसे ‘खिलौना’ विभिन्न चीज़ों को दर्शा सकता है।

हालांकि इस अध्ययन की अपनी सीमाएं हैं क्योंकि यह महज एक बच्चे के डैटा पर आधारित है, और हर बच्चे के अनुभव और वातावरण बहुत भिन्न होते हैं। लेकिन फिर भी इस अध्ययन से इतना तो समझ आया है कि शिशु के शुरुआती दिनों में केवल विभिन्न संवेदी स्रोतों के बीच सम्बंध बैठाकर बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

ये निष्कर्ष नोम चोम्स्की जैसे भाषाविदों के इस दावे को भी चुनौती देते हैं जो कहता है कि भाषा बहुत जटिल है और सामान्य शिक्षण प्रक्रियाओं के माध्यम से भाषा सीखने के लिए जानकारी का इनपुट बहुत कम होता है; इसलिए सीखने की सामान्य प्रक्रिया से भाषा सीखा मुश्किल है। अपने अध्ययन के आधार पर शोधकर्ता कहते हैं कि भाषा सीखने के लिए किसी ‘विशेष’ क्रियाविधि की आवश्यकता नहीं है जैसे कि कई भाषाविदों ने सुझाया है।

इसके अलावा एआई के पास बच्चे के द्वारा भाषा सीखने जैसा हू-ब-हू माहौल नहीं था। वास्तविक दुनिया में बच्चे द्वारा भाषा सीखने का अनुभव एआई की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध और विविध होता है। एआई के पास तस्वीरों और शब्दों के अलावा कुछ नहीं था, जबकि वास्तव में बच्चे के पास चीज़ें  छूने-पकड़ने, उपयोग करने जैसे मौके भी होते हैं। उदाहरण के लिए, एआई को ‘हाथ’ शब्द सीखने में संघर्ष करना पड़ा जो आम तौर पर शिशु जल्दी सीख जाते हैं क्योंकि उनके पास अपने हाथ होते हैं, और उन हाथों से मिलने वाले तमाम अनुभव होते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बैक्टीरिया की ‘याददाश्त’!

हा जाता है कि ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले’। लेकिन पिछली बातों को याद रखना कई मामलों में फायदेमंद होता है, जैसे यदि हम पहले कभी गर्म चीज़ से जले हैं तो हम इस स्मृति के आधार पर आगे सतर्क रहते हैं और अन्य को भी सावधान करते हैं। ये स्मृतियां हमारे जीवन को सुरक्षित बनाती हैं।

अब हाल ही में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बैक्टीरिया भी अपने पिछले अनुभवों को याद रखते हैं: एशरिशिया कोली (ई.कोली.) बैक्टीरिया अपने आसपास मौजूद पोषक तत्व का स्तर याद रखते हैं। साथ ही वे इन स्मृतियों को अपनी आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित भी करते हैं, जो संभवत: उनकी संतति को एंटीबायोटिक दवाओं से बचने में मदद करता है।

आम तौर पर हमें लगता है कि एक-कोशिकीय सूक्ष्मजीव अकेले-अकेले बस अपना-अपना काम करते रहते हैं। लेकिन बैक्टीरिया अक्सर मिल-जुल काम करते हैं जो उन्हें अधिक सुरक्षित रखता है। स्थायी ‘घर’ (बायोफिल्म) की तलाश में बैक्टीरिया के झुंड अक्सर घूमते हैं। झुंड में रहने से बैक्टीरिया को यह फायदा होता है कि वे एंटीबायोटिक के असर को बेहतर ढंग से झेल पाते हैं।

टेक्सास विश्वविद्यालय के सौविक भट्टाचार्य जब ई. कोली बैक्टीरिया में झुंड के व्यवहार का अध्ययन कर रहे थे, तब उन्होंने उनकी कॉलोनियों में ‘अजीब से पैटर्न’ देखे। फिर जब उन्होंने इन कालोनियों से एक-एक बैक्टीरिया को अलग करके देखा तो उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया अपने पिछले अनुभवों के आधार पर अलग-अलग व्यवहार कर रहे थे। कॉलोनी में जिन बैक्टीरिया ने पहले झुंड बनाए थे, उनके दोबारा झुंड में आने की संभावना उन बैक्टीरिया की तुलना में अधिक थी जिन्होंने पहले झुंड नहीं बनाए थे। और यह प्रवृत्ति कम से कम उनकी अगली चार पीढ़ियों (जो दो घंटे में अस्तित्व में आ गईं थी) ने भी दिखाई थी।

ई. कोली के जीनोम में फेर-बदल करने पर शोध दल ने पाया कि उनकी इस क्षमता के पीछे दो जीन्स हैं जो मिलकर लौह के ग्रहण और नियमन को नियंत्रित करते हैं। बैक्टीरिया के लिए लौह अहम पोषक तत्व है। लौह का स्तर कम होने पर बैक्टीरिया में अपने झुंड की जगह बदलने की प्रवृत्ति दिखी, जो उनमें सहज रूप से निहित थी। ऐसा अनुमान है कि लौह स्तर कम होने पर बैक्टीरिया का झुंड आदर्श लौह स्तर वाले नए स्थान की तलाश में था।

हालांकि यह मालूम था कि कुछ बैक्टीरिया अपने आसपास के भौतिक पर्यावरण (जैसे टिकाऊ सतह) को याद रखते हैं और यह जानकारी अपनी संतानों को दे सकते हैं लेकिन इस अध्ययन में यह नई बात मालूम चली कि बैक्टीरिया पोषक तत्वों की उपस्थिति को भी याद रखते हैं। टिकाऊ, सुरक्षित और उपयुक्त स्थान तलाशने के लिए बैक्टीरिया इन स्मृतियों का उपयोग करते हैं और बायोफिल्म बनाते हैं।

बहरहाल, यह देखने की ज़रूरत है कि क्या अन्य सूक्ष्मजीव भी लौह स्तर को याद रखते हैं? बैक्टीरिया लौह स्तर अनुपयुक्त पाने पर कैसे अपना व्यवहार बदलते हैं? शोधकर्ताओं का मानना है कि इस मामले में अधिक अध्ययन रोगजनक संक्रमणों से निपटने में मदद कर सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान: 2023 के टॉप टेन व्यक्ति – चक्रेश जैन

विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर ने साल 2023 के टॉप टेन व्यक्तियों की सूची जारी की है। इस सूची में वे लोग हैं जिन्होंने विदा हो चुके साल में अदभुत अनुसंधान किया है या अहम वैज्ञानिक मुद्दों की ओर ध्यान खींचा है। गौरतलब है कि टॉप टेन व्यक्तियों का चयन पुरस्कार देने के लिए नहीं किया गया है वरन इसका उद्देश्य बीते साल में विज्ञान से जुड़े उन चुनिंदा व्यक्तियों के विलक्षण योगदान को रेखांकित करना है, जिनका समाज के हितों से सरोकार रहा है या जिनका सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

इस साल नेचर ने पहली बार टॉप टेन लोगों के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का भी चयन किया है। तो मिलिए साल 2023 के टॉप टेन व्यक्तियों से।

कल्पना कलाहस्ती

टॉप टेन की सूची में भारतीय महिला वैज्ञानिक कल्पना कलाहस्ती प्रथम स्थान पर हैं। उन्होंने पिछले साल चंद्रयान-3 के चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सफलतापूर्वक अवतरण में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने चंद्रयान-3 में एसोसिएट प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में काम किया। कलाहस्ती के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, चंद्रयान-3 का कुल वज़न कम करना और दूसरी, उपलब्ध बजट में चंद्रयान-3 का निर्माण करना। चंद्रयान-2 की असफलता से सबक लेते हुए उन्होंने अपनी टीम के साथ पूरी लगन से चंद्रयान-3 का निर्माण किया। इसके बाद चंद्रयान-3 के कई परीक्षण एवं इसरो के एक दर्जन केंद्रों के साथ उसके परिणामों का समन्वय किया। यह काम ऐसा था मानो पांच-छह उपग्रहों का एक साथ निर्माण!

कलाहस्ती को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट एवं सिस्टम्स इंजीनियर का व्यापक तर्जुबा है। उन्होंने इसके पहले कई पृथ्वी-प्रेक्षण उपग्रहों के विकास में नेतृत्व की भूमिका निभाई है।

मरीना सिल्वा: अमेज़ॉन संरक्षक

ब्राज़ील की पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री मरीना सिल्वा ने अमेज़ॉन वनों के विनाश को रोकने में अहम और पुरज़ोर भूमिका निभाई है। उन्होंने 3 अगस्त को अपने संबोधन में बताया था कि वन विनाश सम्बंधी चेतावनियों में 43 फीसदी कमी आई है। ये चेतावनियां उपग्रह चित्रों के आधार पर चेतावनी जारी की जाती है।

कात्सुहिको हयाशी: दो पिता की संतान का जनन

कात्सुहिको हयाशी ओसाका युनिवर्सिटी में डेवलपमेंट बायोलॉजिस्ट हैं, जिन्हें पहली बार बिना मादा के दो नर चूहों से एक चुहिया पैदा करने में कामयाबी मिली है। आम तौर पर किसी भी जीव में प्रजनन के लिए नर और मादा दोनों की ज़रूरत होती है।

इस कामयाबी से भविष्य में विलुप्तप्राय प्रजातियों को बचाना संभव हो सकेगा। हालांकि कात्सुहिको हयाशी की इस अभिनव सफलता से यह सवाल भी उठा है कि क्या लैंगिक प्रजनन विज्ञान के नियमों को फिर से परिभाषित करना पड़ेगा।

अपने अध्ययन के लिए हयाशी ने नर चूहे की पूंछ से कोशिकाएं निकालीं, जिनमें ‘एक्स’ और ‘वाय’ सेक्स गुणसूत्र मौजूद थे। फिर इन कोशिकाओं को स्टेम कोशिकाओं में बदल दिया। इस प्रक्रिया में तीन फीसदी कोशिकाओं में स्वत: ही ‘वाय’ गुणसूत्र नष्ट हो गया। ‘वाय’ गुणसूत्र रहित कोशिकाओं को पृथक कर एक ऐसे रसायन से उपचारित किया, जो कोशिका विभाजन के दौरान त्रुटियां पैदा करता है। कुछ त्रुटियां ऐसी हुई थीं जिनके कारण ऐसी कोशिकाओं का निर्माण हुआ, जिनमें दो ‘एक्स’ गुणसूत्र थे यानी एक मायने में वे मादा कोशिकाएं बन चुकी थीं। अनुसंधान टीम ने इन कोशिकाओं को अंडों में परिवर्तित किया और अंडों को निषेचित करके भ्रूण को मादा चुहिया के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया। 630 प्रत्यारोपित भ्रूणों में से 7 ही विकसित होकर चूहे बने।

एनी क्रिचर: नाभिकीय संलयन

साल 2023 में नाभिकीय साइंस की अध्येता एनी क्रिचर ने नाभिकीय संलयन के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की। क्रिचर का अपने शोध दल के साथ पहली बार कैलिर्फोनिया स्थित लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी में हाइड्रोजन के भारी आइसोटोप्स के नाभिकीय संलयन का प्रयोग सफल रहा। इसमें जितनी ऊर्जा दी गई थी उससे अधिक ऊर्जा पैदा की गई। उनका यह प्रयोग साफ-सुथरी ऊर्जा उत्पादन की दिशा में गेमचेंजर की तरह देखा जा रहा है।

एलेनी मायरिविली: ऊष्मा अधिकारी

एलेनी मायरिविली राष्ट्र संघ की प्रथम ऊष्मा अधिकारी हैं, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना करने के लिए पुरज़ोर पहल करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्हें जुलाई 2021 में एथेंस सरकार द्वारा मुख्य ग्रीष्म लहर अधिकारी नियुक्त किया गया था। उनका विचार है कि ग्रीष्म लहर या लू को गंभीरता से लेने के साथ ही लोगों को संवेदनशील और जागरूक बनाने की ज़रूरत है। उन्होंने इस पद पर रहते हुए एक ऐसी कार्य योजना बनाई जिसमें स्वास्थ्य, बीमारी और मृत्यु दर के डैटा और मौसम सम्बंधी डैटा को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। उनका मानना है कि लू से बचाव के लिए छायादार सार्वजनिक स्थानों के निर्माण की ज़रूरत है। उन्होंने भीषण गर्मी की चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजिटल समाधान अपनाने का सुझाव भी दिया है।

मायरिविली ने अपने करियर की शुरुआत सांस्कृतिक मानव विज्ञानी के रूप में की थी। उन्होंने अपना पूरा ध्यान ग्रीष्म लहर के अध्ययन पर केंद्रित किया। साल 2007 में उनके जीवन में नया मोड़ आया। उन्होंने ग्रीष्म लहरों के बारे में सूचनाओं के अभाव से नाराज़ और असंतुष्ट होने के बाद राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। उन्हें दिसंबर 2023 में दुबई में आयोजित कॉप-28 में भाग लेने के लिए न्यौता केवल इसलिए दिया गया था, क्योंकि उन्होंने वैश्विक तापमान बढ़ोतरी में एयर कंडीशनिंग को दोषी मानते हुए इस उपकरण का बहिष्कार किया।

इल्या सटस्केवर: चैट-जीपीटी के प्रथम अन्वेषक

वैज्ञानिक और ओपन एआई कंपनी के सह-संस्थापक इल्या सटस्केवर ने चैट-जीपीटी सहित संवाद करने वाली कृत्रिम बुद्धि प्रणालियों के विकास में मुख्य भूमिका निभाई है। वर्ष 2022 में इल्या सटस्केवर द्वारा सृजित चैट-जीपीटी एक साल के भीतर ही लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गया था। इल्या सटस्केवर डीप लर्निंग और लार्ज लैंग्वेज मॉडल अनुसंधान में अग्रणी रहे हैं।

1986 में सोवियत संघ में पैदा हुए सटस्केवर ने इस्रायल में विश्वविद्यालय स्तर पर कोडिंग विषय पढ़ाया है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धि के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने इस प्रौद्योगिकी के खतरों और भविष्य को लेकर भी बड़ी चिंता जताई है। उन्होंने 2022 में यह घोषणा कर दी थी कि कृत्रिम बुद्धि में ‘मामूली चेतना’ आ चुकी है। सटस्केवर ने अल्फागो के विकास में भी मदद की है। उन्हें 2018 में जीपीटी के प्रथम अवतार के बाद जनरेटिव प्री-ट्रेन्ड ट्रांसफॉर्मर (जीपीटी) के विकास और संवारने में अत्यधिक योगदान का श्रेय जाता है।

जेम्स हेमलिन: अतिचालकता शोध में फर्ज़ीवाड़े का भंडाफोड़

भौतिक शास्त्री जेम्स हेमलिन ने साल 2023 में अतिचालकता सम्बंधी एक शोध पत्र में धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। जेम्स हेमलिन भौतिकी के प्राध्यापक हैं तथा उच्च दाब प्रयोग करते हैं और अतिचालकता के विशेषज्ञ हैं।

दरअसल, मार्च 2023 में नेचर में रोचेस्टर युनिवर्सिटी के शोधकर्ता रंगा डायस की रिपोर्ट छपी थी, जिसमें उन्होंने कमरे के तापमान पर अतिचालकता हासिल करने का दावा किया था। हेमलिन ने नेचर पत्रिका के संपादकीय विभाग से संपर्क किया और इस शोध पत्र में फर्ज़ीवाड़े की आशंका जताई। नवंबर में इस शोध पत्र को हटा दिया गया था।

स्वेतलाना मोजसोव: गुमनाम औषधि अन्वेषक

नेचर ने मधुमेह और वज़न घटाने वाली औषधियों की अनुसंधानकर्ता स्वेतलाना मोजसोव को टॉप टेन में शामिल किया है, जबकि साइंस ने वर्ष 2023 की उपलब्धियों में प्रथम स्थान पर रखा है। उन्होंने ग्लूकॉन-लाइक पेप्टाइड-1 (जीएलपी-1) हारमोन की खोज में योगदान दिया है। यह हारमोन भूख का दमन करता है। यही हारमोन ओज़ेम्पिक और वीगोवी जैसी वज़न घटाने वाली औषधियों का प्रमुख घटक है। दरअसल, स्वेतलाना मोजसोव उन गुमनाम व्यक्तियों में शामिल हैं, जिन्हें नई औषधि खोजने के बावजूद लंबे समय तक यथोचित मान्यता और शोहरत नहीं मिली। 

स्वेतलाना मोजसोव ने दशकों तक रॉकफेलर युनिवर्सिटी में संश्लेषित पेप्टाइड्स और प्रोटीनों पर काम किया है। उन्होंने बोस्टन स्थित मेसाचूसेट्स जनरल हॉस्पिटल में संश्लेषित प्रोटीनों पर अनुसंधानकर्ताओं का मार्गदर्शन करने के साथ उन्हें रिसर्च टूल्स भी उपलब्ध करवाए थे। मोजसोव ने चूहों पर प्रयोग किए थे और जीएलपी-1 की जैविक सक्रियता को उजागर किया था।

मोजसोव ने लंबे अंतराल के बाद साल 2023 में अपनी उपेक्षा को देखते हुए मुखर होने का मार्ग चुना और जीएलपी-1 हारमोन पर अपना शोध पत्र सेल और नेचर पत्रिका को भेजा। ये शोध पत्र इन दोनों पत्रिकाओं के अलावा साइंस में भी प्रकाशित हुए।

हलीदू टिन्टो: मलेरिया योद्धा

मलेरिया योद्धा के रूप में पहचान स्थापित कर चुके हलीदू टिन्टो ने लंबे शोध प्रयासों के बाद मलेरिया से लड़ने के लिए टीका बनाने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब मलेरिया रोग से लड़ने के लिए दो टीके उपलब्ध हैं। एक ‘आरटीएस,एस’ है, जिसे ग्लैैक्सोस्मिथक्लाइन ने विकसित किया है। दूसरा ‘आर-21’ बुर्किना फासो स्थित क्लीनिकल रिसर्च युनिट ऑफ नैनोरो ने विकसित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मलेरिया से लड़ने में दोनों ही टीके कारगर साबित हुए हैं। हलीदू टिन्टो ने टीके बनाकर अफ्रीका महाद्वीप में लाखों लोगों का जीवन बचाने में असाधारण भूमिका निभाई है। टिन्टो के अनुसार अफ्रीका के विकास में अनुसंधान की भूमिका को समझने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। इन दिनों टिन्टो आर-21 टीके पर और अधिक अनुसंधान कार्य में जुटे हुए हैं। उम्मीद की जा रही है कि यह टीका 2024 के मध्य तक पूरे अफ्रीका महाद्वीप में उपलब्ध हो जाएगा।

थॉमस पॉवेल्स: कैंसर अध्येता

चिकित्सा वैज्ञानिक थॉमस पॉवेल्स ने घातक ब्लैडर कैंसर की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वस्तुत: उन्होंने आने वाले दिनों में इस रोग पर विजय पाने के लिए इम्युनोथैराप्युटिक ड्रग्ज़ का मार्ग प्रशस्त किया है।

प्रोफेसर थॉमस पॉवेल्स आरंभ में हृदय रोग चिकित्सक थे। उन्होंने बाद में ब्लैडर कैंसर की चपेट में आ चुके लोगों के क्लीनिकल परीक्षणों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने दो नई दवाओं के मिश्रण से एक नई दवा तैयार की और इसका क्लीनिकल परीक्षण किया। इस दवा के इस्तेमाल से पीड़ित व्यक्तियों का जीवनकाल सोलह माह से लेकर ढाई वर्ष तक बढ़ गया। इस परीक्षण को लगभग चार दशकों के बाद घातक ब्लैडर कैंसर के इलाज में बड़ी सफलता के रूप देखा गया है।

थॉमस पॉवेल्स के अनुसंधान से प्रेरणा लेकर युवा अनुसंधानकर्ताओं ने आगे कदम बढ़ाए और एंटीबॉडी ड्रग कांजुगेट्स (एडीसी) उपचार विकसित कर लिया। दरअसल एडीसी में कैंसर-रोधी औषधि होती है, जिसे एंटीबॉडी से जोड़ा गया होता है। एंटीबॉडी औषधि को सही लक्ष्य पर पहुंचने में मदद करती है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने साल 2023 के आरंभ में ही इस ड्रग को मंज़ूरी दे दी थी।

टॉप टेन में चैट-जीपीटी क्यों?

नेचर ने पहली बार टॉप टेन की लिस्ट में चैट-जीपीटी को भी शामिल किया है। बीते वर्ष 2023 में चैटजीपीटी का विज्ञान और समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। यह वैज्ञानिक शोध पत्र लिख सकता है, व्याख्यानों के प्रस्तुतीकरण की रूपरेखा बना सकता है, अनुदान हेतु प्रस्ताव तैयार कर सकता है। चैटजीपीटी एक विशाल भाषा मॉडल (लार्ज लैंग्वेज मॉडल) है, जिसे जटिल जिज्ञासाओं का उत्तर देने में सक्षम बनाया गया है। इसके ज़रिए गणित के सूत्रों को समझा जा सकता है, राजनीतिक टीका-टिप्पणी की जा सकती है। यह मनोरंजन कर सकता है। चिकित्सा सम्बंधी अनुमान लगा सकता है। इसके उपयोगों की सूची दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है। (स्रोत फीचर्स)

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वर्ष 2024 में विज्ञान से अपेक्षाएं – ज़ुबैर सिद्दिकी

वर्ष 2024 विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास देखने के लिए तैयार है। उन्नत एआई, चंद्रमा मिशन और अल्ट्राफास्ट सुपर कंप्यूटर इस वर्ष के अनुसंधान को एक नया आकार देने वाले प्रमुख अनुसंधान होंगे। इस वर्ष अपेक्षित प्रमुख घटनाओं की एक झलक…

कृत्रिम बुद्धि (एआई)

वर्ष 2023 में चैटजीपीटी के विकास का विज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ा है। ओपनएआई द्वारा निर्मित इस एआई चैटबॉट का सबसे उन्नत मॉडल वर्तमान में जीपीटी-4 है और इस वर्ष के अंत तक अधिक उन्नत जीपीटी-5 जारी होने की उम्मीद है। इसके अलावा, जीपीटी-4 के गूगल द्वारा विकसित प्रतिस्पर्धी जेमिनी के रोल-आउट की भी उम्मीद है। यह विशाल भाषा मॉडल टेक्स्ट, कंप्यूटर कोड, चित्र, ऑडियो और वीडियो सहित कई प्रकार के इनपुट को संसाधित करने में सक्षम है।

इसी वर्ष गूगल डीपमाइंड के एआई टूल अल्फाफोल्ड का एक नया संस्करण भी जारी होने की अपेक्षा है; अल्फाफोल्ड का उपयोग शोधकर्ता प्रोटीन के 3डी आकार का अनुमान लगाने के लिए कर चुके हैं। यह एआई तकनीक परमाणु स्तर पर प्रोटीन, न्यूक्लिक एसिड और अन्य अणुओं के बीच परस्पर सम्बंध का मॉडलिंग करने में सक्षम होगा। हालांकि, इसमें एक बड़ा सवाल नियामक चिंताओं से जुड़ा है। कृत्रिम बुद्धि पर संयुक्त राष्ट्र की उच्च-स्तरीय सलाहकार संस्था 2024 के मध्य में अपनी अंतिम रिपोर्ट साझा करेगी, जिसमें एआई के अंतर्राष्ट्रीय विनियमन के लिए दिशानिर्देश दिए जाएंगे।

ब्रह्मांड पर नज़र

ब्रह्मांड की खोज जारी रखते हुए चिली स्थित वेरा सी. रुबिन वेधशाला 2024 के अंत तक संचालन शुरू करने के लिए तैयार है। 8.4 मीटर की दूरबीन और 3200 मेगापिक्सल के शक्तिशाली कैमरे से लैस होकर वैज्ञानिक दक्षिणी गोलार्ध के आकाश का अपना नियोजित दस-वर्षीय सर्वेक्षण समय से पूर्व शुरू कर पाएंगे। उन्हें नई क्षणिक घटनाओं को उजागर करने और पृथ्वी के निकट क्षुद्रग्रहों की पहचान करने की उम्मीद है।

इसके साथ ही, 2024 के मध्य में चिली के अटाकामा रेगिस्तान स्थित साइमंस वेधशाला के पूरा होने की भी संभावना है। इसका उद्देश्य ब्रह्मांडीय माइक्रोवेव पृष्ठभूमि में बिग बैंग के अवशेषों यानी आदिम गुरुत्वाकर्षण तरंगों की उपस्थिति का पता लगाना है। 50,000 प्रकाश-संग्राहक डिटेक्टरों से सुसज्जित और मौजूदा परियोजनाओं से दस गुना अधिक उन्नत यह वेधशाला ब्रह्मांड के शुरुआती क्षणों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने में सक्षम है।

अलबत्ता, खगोलविद कृत्रिम चमकदार उपग्रहों की बढ़ती भीड़ से चिंतित हैं जो रात के आकाश में प्रकाश प्रदूषण फैलाकर ज़मीन-आधारित टेलीस्कोप डैटा को अनुपयोगी बना सकते हैं।

हथियारबंद मच्छर

विश्व मच्छर कार्यक्रम इस वर्ष ब्राज़ील स्थित एक फैक्टरी में रोग से लड़ने वाले मच्छरों का उत्पादन शुरू करेगा। इन मच्छरों को एक ऐसे बैक्टीरिया स्ट्रेन से संक्रमित किया जाएगा जो उन्हें रोगजनक वायरसों को फैलाने से रोकता है। उम्मीद है कि इस तकनीक से 7 करोड़ लोगों को डेंगू और ज़ीका जैसी बीमारियों से बचाया सकेगा। यह गैर-मुनाफा संगठन अगले कुछ दशकों मे प्रति वर्ष पांच अरब बैक्टीरिया-संक्रमित मच्छरों का उत्पादन करेगा।

महामारी से आगे

कोविड-19 संकट के बाद से अमेरिकी सरकार तीन उन्नत टीकों के परीक्षणों में निवेश कर रही है। इनमें से दो श्वसन मार्ग आधारित टीके हैं जिनका उद्देश्य श्वसन मार्ग के ऊतकों में प्रतिरक्षा उत्पन्न करके संक्रमण को रोकना है, जबकि तीसरा एमआरएनए वैक्सीन है जो एंटीबॉडी और टी-सेल प्रतिक्रियाओं को बढ़ाते हुए संभवत: सार्स-कोव-2 वेरिएंट की एक विस्तृत शृंखला के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करेगा।

इसके साथ ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) मई में 77वीं विश्व स्वास्थ्य सभा के दौरान एक महामारी संधि के अंतिम मसौदे का खुलासा करने जा रहा है। इस संधि का उद्देश्य भविष्य में महामारी की रोकथाम और प्रबंधन के लिए वैश्विक स्तर पर सरकारों को बेहतर ढंग से तैयार करना है। डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों द्वारा इस समझौते की शर्तों को निर्धारित किया जाएगा जिसमें इस बात पर भी चर्चा होगी कि क्या इसका कोई प्रावधान कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा। इस बातचीत में टीके, डैटा और विशेषज्ञता सहित आवश्यक उपकरणों तक उचित पहुंच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जो भविष्य की महामारी को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।

चंद्रमा मिशन

इस वर्ष नासा एक महत्वपूर्ण मानव युक्त चंद्र मिशन, आर्टेमिस-II पर काम कर रहा है। 1970 के दशक के बाद यह नासा का पहला चंद्र मिशन है जिसमें चालक दल भेजा जाएगा। तीन पुरुषों और एक महिला चालक दल वाले इस दस-दिवसीय मिशन को नवंबर में लॉन्च करने की उम्मीद है। यह एक फ्लायबाय मिशन होगा यानी यह चांद का चक्कर लगाकर लौट आएगा। यह आर्टेमिस-III के लिए आधार तैयार करेगा। गौरतलब है कि आर्टेमिस-III का लक्ष्य चांद की सतह पर पहली महिला और उसके बाद दूसरे पुरुष को उतारना है। इसी दौरान, चीन चांग’ई-6 चंद्र मिशन के लिए तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य चंद्रमा के दूरस्थ हिस्से से नमूने एकत्र करना है।

इसके अलावा बाहरी सौर मंडल के चंद्रमाओं की खोजबीन के भी आसार हैं। इसमें नासा का क्लिपर क्राफ्ट अक्टूबर में बृहस्पति के चंद्रमा युरोपा के लिए एक मिशन की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य युरोपा के भूमिगत समंदर में जीवन की संभावना की तलाश करना है। इसके अलावा, 2024 के लिए प्रस्तावित जापान का मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन (एमएमएक्स) मिशन, मंगल के चंद्रमाओं फोबोस और डेमोस की पड़ताल करेगा। मिशन की योजना फोबोस की सतह के नमूने एकत्र करके 2029 तक पृथ्वी पर वापस लौटना है।

डार्क मैटर का रहस्य

उम्मीद है कि इस वर्ष सूर्य द्वारा उत्सर्जित रहस्यमयी डार्क-मैटर कण, एक्सियॉन का पता लगाने के उद्देश्य से किए गए प्रयोग के परिणाम सामने आ सकते हैं। डार्क मैटर को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण एक्सियॉन का निरीक्षण अब तक उसके छोटे आकार तथा संवेदनशील उपकरणों और एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र के अभाव के चलते नहीं हो पाया है। इसके लिए हैम्बर्ग स्थित जर्मन इलेक्ट्रॉन सिंक्रोट्रॉन में प्रतिदिन 12 घंटे तक सूर्य के केंद्र को ट्रैक करने के लिए एक सौर दूरबीन में 10 मीटर लंबे चुंबक और अति-संवेदनशील, शोर-मुक्त एक्स-रे डिटेक्टरों का उपयोग किया जाता है ताकि एक्सियॉन के फोटॉन में रूपांतरण को देखा जा सके।

इसके अतिरिक्त, 2024 में कण भौतिकी के स्टैण्डर्ड मॉडल में सबसे रहस्यमय कण न्यूट्रिनो का द्रव्यमान ज्ञात करने में सफलता मिल सकती है। 2022 में कार्लस्रुहे ट्रिटियम न्यूट्रिनो प्रयोग से न्यूट्रिनो का द्रव्यमान अधिकतम 0.8 इलेक्ट्रॉन वोल्ट आंका गया था। शोधकर्ताओं की अपेक्षा है कि 2024 में डैटा संग्रह का कार्य पूरा करके न्यूट्रिनो के द्रव्यमान के एक निश्चित मान का निर्धारण किया जा सकेगा।

चेतना की बहस: दूसरा दौर

इस वर्ष चेतना की तंत्रिका उत्पत्ति पर नई जानकारी मिलने की उम्मीद है। उम्मीद है कि कुछ परस्पर विपरीत प्रयोगों के माध्यम से चेतना के दो सिद्धांतों (दर्शन बनाम तंत्रिका विज्ञान) का परीक्षण करने वाली एक परियोजना के दूसरे चरण के परिणाम 2024 के अंत तक सामने आ सकते हैं। प्रथम दौर में दोनों सिद्धांत पूरी तरह से मस्तिष्क-इमेजिंग डैटा की व्याख्या करने में विफल रहे थे। इसके चलते, इन दो सिद्धांतों के बीच 25 वर्ष पुरानी एक शर्त दर्शनशास्त्र के पक्ष में झुक गई थी। हो सकता है कि दूसरा दौर तंत्रिका विज्ञान को व्यक्तिपरक अनुभव के रहस्यों को उजागर करने के करीब ले आए।

ग्रह संरक्षण

इस वर्ष उत्तरार्ध में हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जलवायु परिवर्तन सम्बंधी राष्ट्रों के कानूनी दायित्वों पर अपनी राय दे सकता है और जलवायु को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए परिणामों पर भी फैसला दे सकता है। हालांकि, यह फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होगा, लेकिन अदालत की साख देशों को अपने जलवायु सम्बंधी लक्ष्यों को सुदृढ़ करने का दबाव बना सकती है और घरेलू स्तर पर कानूनी कार्रवाई में इसका हवाला दिया सकेगा।

प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समझौते के लिए संयुक्त राष्ट्र प्लास्टिक संधि की बातचीत इस वर्ष पूरी होने की उम्मीद है। शोधकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं कि पिछले साल शुरू हुई संयुक्त राष्ट्र की ये वार्ताएं बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि पूरा विश्व 7 अरब टन से अधिक प्लास्टिक कचरे से जूझ रहा है जिसके कारण महासागरों और वन्यजीवों को काफी नुकसान हो रहा है।

सुपरफास्ट सुपरकंप्यूटर्स

इस वर्ष की शुरुआत में शोधकर्ता युरोप के पहले एक्सास्केल सुपरकंप्यूटर जूपिटर का उपयोग शुरू कर सकते हैं। यह विशाल मशीन प्रत्येक सेकंड एक क्विंटिलियन (एक अरब अरब) गणनाएं करने में सक्षम है। इसका उपयोग चिकित्सा उद्देश्यों के लिए मानव हृदय और मस्तिष्क के डिजिटल जुड़वां मॉडल बनाने और पृथ्वी की जलवायु की उच्च-विभेदन अनुकृतियों चलाने के लिए किया जाएगा।

यूएस के शोधकर्ता भी दो एक्सास्केल मशीनें स्थापित करेंगे: ऑरोरा, और एल कैपिटन। ऑरोरा का उपयोग मस्तिष्क के तंत्रिका सर्किट के मानचित्रण के लिए किया जाएगा जबकि एल कैपिटन का उपयोग परमाणु हथियार विस्फोटों के प्रभावों की अनुकृति तैयार करने के लिए किया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पारदर्शी लकड़ी की मज़बूती

तीन दशक पूर्व एक जर्मन वनस्पतिशास्त्री सिगफ्राइड फिंक ने पौधों के प्राकृतिक स्वरूप को बाधित किए बिना उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली का निरीक्षण करने की एक सरल इच्छा के साथ काम शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने पौधों की कोशिकाओं के रंजक को ब्लीच करके पारदर्शी लकड़ी बनाई थी। अलबत्ता, उनकी यह खोज काफी समय तक अनदेखी रही। हाल ही में स्वीडन स्थित केटीएच रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के पदार्थ विज्ञानी लार्स बर्गलुंड इस अध्ययन को एक बार फिर चर्चा में लाए हैं।

फिंक के अध्ययन से प्रेरित बर्गलुंड ने वनस्पति शास्त्र के परे इसे पारदर्शी प्लास्टिक के एक अधिक मज़बूत विकल्प के रूप में देखा। वहीं, मैरीलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी काफी समय से लकड़ी की शक्ति का उपयोग अपरंपरागत उपयोगों के लिए करने का प्रयास करते रहे थे।

इन दोनों समूहों द्वारा कई वर्षों के प्रयोगों से अब कुछ रोमांचक संभावनाएं उत्पन्न हो रही हैं। और इसमें अत्यंत-मज़बूत स्मार्टफोन स्क्रीन से लेकर नरम, चमकदार प्रकाश उपकरण और रंग बदलने वाली खिड़कियां बनाने की संभावना दिख रही है।

पारदर्शी लकड़ी के निर्माण में काष्‍ठ अपद्रव्य को संशोधित किया जाता है। यह गोंदनुमा पदार्थ लकड़ी की कोशिकाओं को एक साथ जोड़े रखता है। इस पदार्थ को हटाने या ब्लीच करने से खोखली कोशिकाओं का एक दूधिया-सफेद ढांचा बना रहता है। इस परिणामी ढांचे की कोशिका दीवारों और खाली जगहों से हुए प्रकाश अपवर्तन में फर्क के कारण यह अपारदर्शी रहता है। इन खाली जगहों में एपॉक्सी रेज़िन जैसे पदार्थ डालने से लकड़ी पारदर्शी हो जाती है।

इससे प्राप्त एक मिलीमीटर से लेकर एक सेंटीमीटर से भी कम पतला उत्पाद मधुमक्खी के छत्ते जैसे एक मज़बूत ढांचे का निर्माण करता है। इसमें लकड़ी के छोटे फाइबर की मज़बूती सबसे बेहतरीन कार्बन फाइबर से भी अधिक होती है। इस पर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि रेज़िन के मिश्रण से पारदर्शी लकड़ी प्लास्टिक और कांच से बेहतर प्रदर्शन करती है। इसमें प्लेक्सीग्लास की तुलना में तीन गुना अधिक ताकत और कांच की तुलना में दस गुना अधिक कठोरता होती है।

अलबत्ता, मोटाई बढ़ने पर पारदर्शिता कम हो जाती है। इसकी पतली चादरें 80 से 90 प्रतिशत प्रकाश को पार जाने देती हैं जबकि लगभग एक सेंटीमीटर मोटी लकड़ी केवल 40 प्रतिशत प्रकाश को आर-पार जाने देती है।

गौरतलब है कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य पारदर्शी लकड़ी के वास्तुशिल्प अनुप्रयोगों पर केंद्रित है जो विशेष रूप से खिड़कियों के लिए उपयोगी माना जा रहा है। इसके साथ ही कांच की तुलना में यह बेहतर इन्सुलेशन दे सकता है। इसके अतिरिक्त, लकड़ी के ऐसे संस्करण कांच की तुलना में ऊष्मा के बेहतर कुचालक भी होते हैं।

हालांकि पारदर्शी लकड़ी की खिड़कियां मज़बूती और बेहतर तापमान नियंत्रण प्रदान करती हैं लेकिन घिसे हुए कांच की तुलना में काफी धुंधली होती हैं। फिर भी यह कम रोशनी चाहने वालों के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावा मोटी लकड़ी की वहन क्षमता को देखते हुए इसे आंशिक भार वहन करने वाले प्रकाश स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह कमरे में नैसर्गिक रोशनी प्रदान करने में काफी उपयोगी हो सकती है।

वर्तमान शोध में पारदर्शी लकड़ी की कार्यक्षमता को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, इस लकड़ी को स्मार्ट खिड़कियों में परिवर्तित किया जा सकता है जो विद्युत प्रवाह देने पर पारदर्शी से रंगीन हो सकती हैं।

पर्यावरण के दृष्टिकोण से यह नई खोज ज़हरीले रसायनों और जीवाश्म-आधारित पॉलीमर को सीमित कर सकती है। हालांकि इस नई खोज के बावजूद वर्तमान विश्लेषणों से संकेत मिलता है कि पारदर्शी लकड़ी की तुलना में कांच का पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है। फिलहाल एक टिकाऊ सामग्री के रूप में इसकी क्षमता को देखते हुए, पारदर्शी लकड़ी को बाज़ार में लाने के लिए हरित उत्पादन और बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कार्बन डाईऑक्साइड का पावडर बनाएं

लवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के वैज्ञानिकों की एक टीम ने कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) को एक सौम्य, पावडरी पदार्थ में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की है। माना जा रहा है कि इस नई खोज से पृथ्वी को कार्बन डाईऑक्साइड के प्रभावों से बचाने और जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।

इस प्रक्रिया में सबसे पहले कार्बन डाईऑक्साइड को एक उत्प्रेरक के संपर्क में लाया जाता है और फिर विद्युतअपघटन के माध्यम से इस गैस को सोडियम फॉर्मेट में परिवर्तित किया जाता है। यह एक सुरक्षित, पावडरनुमा ईंधन है जिसका कई दशकों तक भंडारण किया जा सकता है और इसे स्वच्छ बिजली में परिवर्तित करना भी संभव लगता है।

यह पावडरी उत्पाद सोडियम फॉर्मेट नामक एक लवण जैसा ही है जिसका उपयोग सड़कों और हवाई अड्डों पर बर्फ पिघलाने के लिए होता रहा है। इस पावडर ने असाधारण स्थिरता का प्रदर्शन किया और क्षरण हुए बिना इसे 2000 घंटे तक भंडारित किया जा सका। इसके अलावा, एमआईटी टीम ने इसका उपयोग करके रेफ्रिजरेटर बराबर एक ईंधन सेल का निर्माण किया, जिसने बिना किसी उत्सर्जन के घरेलू स्तर पर बिजली उत्पन्न करने की क्षमता का प्रदर्शन किया।

इस नवाचार की प्रमुख विशेषता अन्य वैकल्पिक ईंधनों की सीमाओं से परे है। विषाक्त मेथनॉल या रिसाव की समस्या से ग्रस्त हाइड्रोजन के विपरीत कार्बन डाईऑक्साइड से उत्पन्न ईंधन दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण का एक सुरक्षित और अधिक कुशल समाधान है।

सेल रिपोर्ट्स फिज़िकल साइंसेज़ में प्रकाशित यह नवाचार काफी आशाजनक प्रतीत होता है लेकिन इसका व्यावसायीकरण चुनौतियों से भरा है। वैज्ञानिकों को इस अभूतपूर्व समाधान को आगे बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय की सीमा से परे संसाधनों और बाहरी समर्थन की आवश्यकता है।

उम्मीद है कि जैसे-जैसे व्यावसायिक संस्थाओं के साथ बातचीत गति पकड़ेगी, वैसे-वैसे यह खोज हमारे ऊर्जा परिदृश्य को भी व्यापक रूप से बदल देगी। यह वैश्विक ऊर्जा मांगों को पूरा करते हुए जलवायु परिवर्तन को थामने का एक शक्तिशाली समाधान साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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2023: अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान जगत की घटनाएं – चक्रेश जैन

साल 2023 में कृत्रिम बुद्धि (एआई) का नया अवतार ‘चैटजीपीटी’ सबसे अधिक चर्चा में रहा। ओपन एआई रिसर्च संस्थान ने इसे 30 नवम्बर 2022 को रिसर्च प्रीव्यू के रूप में जारी किया था। चैटजीपीटी की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि शुरुआती पांच दिनों के भीतर ही इसने वैज्ञानिकों सहित 18 करोड़ लोगों को आकर्षित कर लिया था। इसका उपयोग वैज्ञानिक शोधपत्र लेखन से लेकर ई-मेल और कूटलेखन तक में किया गया है।

नेचर पत्रिका ने वर्ष 2023 की टॅापटेन की सूची में दस व्यक्तियों के साथ एआई को भी शामिल किया है। एआई विज्ञान अन्वेषणों को नई दिशा दे रहा है और अनुसंधान की रफ्तार बढ़ा रहा है। एआई का प्रोटीन संरचना की व्याख्या से लेकर मौसम पूर्वानुमान और बीमारियों के निदान से लेकर विज्ञान संचार में उपयोग हो रहा है। इसके उपयोगों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है।

जिस मशीन को स्वयं मनुष्य ने तैयार किया, वही अब मनुष्य की बुद्धि को चुनौती दे रही है। वास्तव में यह चिन्ता और चुनौती दोनों का विषय है। इसी संदर्भ में नवम्बर में विश्व का पहला आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सुरक्षा शिखर सम्मेलन ब्रिटेन के बकिंघम में संपन्न हुआ। सम्मेलन में सरकारों के प्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों ने इसकी संहारक क्षमता से मानवता को बचाने के लिए बड़े निर्णय किए। सभी देशों ने एआई सुरक्षा पर एक साथ रिसर्च करने के लिए अपनी सहमति व्यक्त की।

इसी साल जून में खगोल भौतिकीविदों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अस्तित्व का पहला स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किया। इससे विशाल ब्लैक होल और ब्रह्मांड की आरंभिक उत्त्पति पर रोशनी डाली जा सकेगी।

वैज्ञानिकों ने पहली बार जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए मादा फ्रूट फ्लाय ड्रॉसोफिला मेलेनोगेस्टर के जीनोम में बदलाव किया, जिससे नर मक्खी के बिना ही प्रजनन का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस रिसर्च से वैज्ञानिकों को पार्थेनोजेनेसिस प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी। इसी वर्ष शोधकर्ताओं को ड्रॉसोफिला की आंत से एक नया कोशिकीय अंगाभ खोजने में सफलता मिली।

अनुसंधानकर्ताओं ने जीन संपादन तकनीक क्रिस्पर की सहायता से ऐसे वायरस का सृजन कर लिया है जिनकी मदद से भविष्य में हानिरहित वायरस पैदा किए जा सकेंगे। इसी साल वैज्ञानिकों ने हाइब्रिड बॉयो कंप्यूटर का निर्माण कर लिया, जिसमें मनुष्य के दिमाग की कोशिकाओं को प्रचलित परिपथ से जोड़ा गया। विदा हो चुके साल में पहली बार पूरी आंख का सफल प्रत्यारोपण डॉ. एडुआर्डो के नेतृत्व में किया गया। ब्रिटेन ने रक्त से सम्बंधित दो बीमारियों – सिकल सेल और थैलेसीमिया – की जीन संपादन चिकित्सा को मंज़ूरी प्रदान कर दी। ये दोनों ही आनुवंशिक बीमारियां हैं, जो हीमोग्लोबिन के जीन में त्रुटियों के कारण होती हैं।

विदा हो चुके साल 2023 में 7 सितंबर को होराइज़न युरोप रिसर्च प्रोग्राम में ब्रिटेन के फिर से शामिल होने पर वैज्ञानिकों ने जश्न मनाया। ब्रिटिश वैज्ञानिक ब्रेक्सिट मुद्दे पर मतभेदों को लेकर दो साल के लिए इस कार्यक्रम से बाहर हो गए थे।

गुज़रा साल पूरे विश्व में मोटे अनाज यानी मिलेट्स के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाया गया। मेलों और प्रदर्शनी के माध्यम से मोटे अनाजों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का कार्यक्रम जारी रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि मोटा अनाज सर्व हितकारी गुणों से भरपूर है और दुनिया को कुपोषण और भुखमरी से मुक्ति दिला सकता है।

इसी साल अगस्त में 47 साल बाद रूस ने चंद्र अभियान लूना-2 भेजा। जापान ने सितंबर में एक्स-रे टेलीस्कोप के साथ सफलतापूर्वक उपग्रह भेजा। यह उपग्रह ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति का अध्ययन करेगा। साल के अंत में उत्तर कोरिया ने अंतरिक्ष में निगरानी के लिए जासूसी उपग्रह मालिगयोंग-1 भेजा। वहीं 24 सितंबर को नासा का ओसिरिस-रेक्स अंतरिक्ष यान पहली बार बेन्नू नामक क्षुद्रग्रह से वहां की चट्टानों के नमूने लेकर सात साल बाद लौट आया। इन नमूनों से 4.5 अरब वर्ष पहले सौर मंडल की शुरुआत को बेहतर समझने में मदद मिलेगी।

नासा को पहली बार सौर मंडल के बाहर किसी ग्रह के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति के स्पष्ट सबूत मिले। वर्ष के उत्तरार्द्ध में खगोलविदों ने पृथ्वी से सौ प्रकाश वर्ष दूर तालबद्ध परिक्रमा करते छह ग्रहों का दुर्लभ परिवार खोजा। यह खोज ब्रह्मांड के रहस्यों की समझ बढ़ाने में सहायक होगी।

इसी वर्ष अफ्रीकी देशों में मारबर्ग वायरस चमगादड़ों के ज़रिए मनुष्य में फैला। मारबर्ग वायरस एबोला वायरस परिवार का सदस्य है। इस वायरस के संक्रमण में पहले बुखार आता है, फिर नाक से खून बहता है, और अंतत: मृत्यु तक हो सकती है।

अर्जेंटीना में जन्मे गणितज्ञ लुईस कैफरेली को साल 2023 का एबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसे गणित के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में स्थान प्राप्त है। रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान फ्रांसीसी-अमेरिकी वैज्ञानिक मौंगी बावेंडी, अमेरिकी वैज्ञानिक लुई ब्रूस और रूसी भौतिकशास्त्री एलेक्सी एकिमोव को दिया गया। तीनों वैज्ञानिकों ने ‘क्वांटम डाट्स’ की खोज में अहम योगदान दिया है। भौतिकी का नोबेल पुरस्कार पियरे अगस्टीनी (अमेरिका), फेरेन्क क्रॉस्ज (जर्मनी) और ऐनी एल हुइलियर (स्वीडन) को अल्ट्राफास्ट एटो सेकंड लेसर के निर्माण में असाधारण योगदान के लिए संयुक्त रूप से दिया गया है। ऐनी एल हुइलियर भौतिक में नोबेल से सम्मानित होने वाली पांचवी महिला वैज्ञानिक हैं। चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दो वैज्ञानिको कैटालिन कारिको एवं ड्रु वीसमेन को कोविड-19 महामारी के विरूद्ध एम-आरएनए वैक्सीन विकसित करने के लिए दिया गया है।

साल 2023 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। इस वर्ष 28 मई को चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता हेराल्ड ज्यूर हॉसेन का हीडनबर्ग में निधन हो गया। उन्होंने सरवाइकल कैंसर को रोकने के लिए वैक्सीन बनाने की आधारशिला रखी थी। 25 जून को नोबेल पुरस्कार विजेता जान गुडएनफ का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने लीथियम आयन बैटरी के विकास में विषेश योगदान दिया था। इसी साल आणविक जीव विज्ञानी डोनाल्ड डी. ब्राउन का 31 मई को निधन हो गया। उन्होंने पृथक किए गए जीन पर शोधकार्य किया, जिससे रिकाम्बिनेन्ट डीएनए और जीन संपादन युग का मार्ग प्रशस्त हुआ। 30 जुलाई को ब्रिटिश कृषि पारिस्थितिकी वैज्ञानिक और टिकाऊ विकास के पुरज़ोर समर्थक प्रो. सर गॉर्डन कॉनवे नहीं रहे। उन्होंने ‘डबली ग्रीन रिवाल्यून नामक किताब लिखी थी। उन्हें 2005 में नाइटहुड सम्मान से विभूषित किया गया था। 31 जुलाई को भूभौतिकीविद और प्लेट टेक्टोनिक्स के खोजकर्ता विलियम जेसन मॉर्गन का देहांत हो गया। उनका प्लेट टेक्टोनिक्स के शोध में विशेष योगदान था। ब्रिटिश जीव वैज्ञानिक सर इयान विल्मट का 10 सितंबर को 79 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उन्होंने पहली बार एक प्रौढ़ कोशिका से केंद्रक निकाल कर डॉली भेड़ का सृजन किया था।

वर्ष 2023 जहां एक ओर  उपलब्धियों भरा रहा, वहीं हताशाओं भरा भी रहा। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर वैज्ञानिक परियोजनाओं और कार्यक्रमों पर भी पड़ा।

इस वर्ष नवंबर में अर्जेंटीना में हुए राष्ट्रपति चुनाव में जेवियर माइली निर्वाचित हुए। अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए पहचान बना चुके जेवियर माइली विज्ञान विरोधी नेता हैं। उन्होंने जनता से वादा किया था कि विजयी होने पर वे देश में बढ़ती मुद्रास्फीति और चरमराती अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक परियोजनाओं और कार्यक्रमों को बंद करेंगे। वर्ष 2023 में युनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में कार्यरत भौतिकी के शोधार्थी रंगा डायस ने शोधकार्य की चोरी और आंकड़ों की हेरा-फेरी के ज़रिए नए अतिचालक पदार्थ बनाने का दावा किया। अलबत्ता, भौतिकीविद जेम्स जे. हेमलिन ने पुख्ता प्रमाणों के आधार पर जालसाज़ी का भंडाफोड़ कर दिया।

गुज़रे साल वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण तीन जुलाई सबसे गर्म दिन रहा। इसका कारण ‘अल नीनो’ असर बताया जा रहा है। साल के अंत में 28वां संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (कॉप-28) आयोजित किया गया। संयुक्त अरब अमीरात की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रफ्तार बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए विकासशील देशों के लिए वित्त पोषण का आव्हान किया गया। सम्मेलन में ग्लोबल स्टॉकटेक पर भी मंथन हुआ।

साल के अंत में ओमिक्रॅान वायरस से जुड़े नए संस्करण ‘जेएन1’ ने कुछ देशों को अपनी चपेट में ले लिया। WHO ने इसे ‘वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट’ के रूप में वर्गीकृत किया है।

साइंस पत्रिका ने साल 2023 की दस शीर्ष सफलताओं की सूची जारी की है। ब्रेकथ्रू ऑफ दी ईयर का खिताब ‘जीएलपी थैरेपीज़’ को दिया है। जीएलपी-1 (ग्लूकागोन लाइक पेप्टाइड-1) मूलतः वज़न घटानेवाली औषधि है, लेकिन यह औषधि कई अन्य बीमारियों में कारगर सिद्ध हुई है। इस औषधि के अनुसंधान में जैवरसायन विज्ञानी स्वेतलाना मोजसोव की विशेष भूमिका रही है। नेचर पत्रिका ने स्वेतलाना मोजसोव को टॉप टेन व्यक्तियों की सूची में सम्मिलित किया है। (स्रोत फीचर्स)

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भारतीय विज्ञान: अंतरिक्ष में कामयाबियों का साल – चक्रेश जैन

साल 2023 विदा हो चुका है। पीछे मुड़ कर देखें तो पता चलता है बीता वर्ष भारतीय विज्ञान जगत, विशेष रूप से अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सफलताओं का रहा। 23 अगस्त को चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक उतरा। इसरो ने चंद्रमा पर जीवन की संभावना तलाशने और रहस्यों को समझने के उद्देश्य से 14 जुलाई को चंद्रयान-3 भेजा था।

इसी वर्ष भारत ने सूर्य का अध्ययन करने की दिशा में बड़ी छलांग लगाई। 2 सितंबर को पहली सौर मिशन वेधशाला आदित्य-L1 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। आदित्य-L1 चार महीने का सफर पूरा कर अपनी मंज़िल लैगरांजे बिन्दु पर पहुंच चुका है। यह वेधशाला पांच वर्षों तक सूर्य की विभिन्न गतिविधियों, जैसे सौर तूफानों, सौर लहरों और गर्म हवाओं का अध्ययन करेगी।

फरवरी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्मॉल सैटेलाइट लॉन्चिंग व्हीकल (एसएसएलवी डी-2) प्रक्षेपण यान के ज़रिए तीन उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया। इसके साथ ही भारत ने छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण बाज़ार में प्रवेश कर लिया। 30 जुलाई को इसरो ने सिंगापुर के सात उपग्रहों को एक साथ सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। 21 अक्टूबर को मानव अंतरिक्ष उड़ान की ओर पहला कदम बढ़ाया गया और गगनयान मिशन के तहत पहला परीक्षण सफल रहा।

जनवरी के प्रथम सप्ताह में 108वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का सालाना अधिवेशन राष्ट्रसंत तुकादोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ। सम्मेलन का मुख्य विषय था ‘महिला सशक्तिकरण के साथ सतत विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी’। पहली बार जनजातीय विज्ञान कांग्रेस हुई, जिसमें जनजातीय मुद्दों पर विचार मंथन किया गया।

21-24 जनवरी के दौरान आठवां अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव भोपाल में आयोजित किया गया। यह महोत्सव विलक्षण था, जिसमें वैज्ञानिकों से लेकर स्कूली बच्चों, जन सामान्य से लेकर विशिष्टजनों और नीति निर्माता से लेकर कारीगरों और किसानों तक ने भाग लिया।

भारत सहित विश्व भर में साल 2023 ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ के रूप में मनाया गया। इसका उद्देश्य आम लोगों में मोटे अनाज के महत्व को उजागर करना था। मोटा अनाज पोषक तत्वों से भरपूर होता है। वैसे भारत हर साल 170 लाख टन मोटे अनाज का उत्पादन करता है – 12 में से 10 प्रकार के मोटे अनाज भारत में उगाए जाते हैं। अहम बात यह कि इसकी खेती आसान और जलवायु अनुकूल है व इसके लिए कम पानी की ज़रूरत होती है।

साल 2023 के पूर्वार्द्ध में सीएसआईआर ने ‘वन वीक-वन लैब’ कैम्पैन शुरू किया। इस कैम्पैन का उद्देश्य आम लोगों और विद्यार्थियों को देश की प्रगति और विकास में सीएसआईआर की राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के योगदान और उपलब्धियों से परिचित कराना था।

इसी वर्ष फरवरी में जम्मू-काश्मीर के रियासी ज़िले में वैष्णो देवी पहाड़ियों की तलहटी और राजस्थान में डेगाना स्थित रेंवत पहाड़ियों में लीथियम खनिज के प्रचुर भंडार का पता चला। लीथियम धातु का उपयोग मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहनों आदि में हो रहा है।

वर्ष 2023 में विज्ञान मंत्रालय के वार्षिक बजट में दो हज़ार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी की गई। बजट में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में रिसर्च के लिए नए केंद्र स्थापित करने का प्रावधान किया गया। इस वर्ष केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय क्वांटम मिशन को मंज़ूरी प्रदान कर दी। इसके अंतर्गत आगामी छह वर्षों तक क्वांटम प्रौद्योगिकी पर आधारित रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 जनवरी को 19,744 करोड़ रुपए के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंज़ूरी दे दी। इस मिशन का उद्देश्य भारत में ग्रीन हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करना है। 25 सितम्बर को नई दिल्ली में देश की पहली हरित हाइड्रोजन ईंधन सेल चालित बस को रवाना किया गया। देश में नैरो गेज के धरोहर मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की तैयारी जारी रही।

बीते साल भारत ने जी-20 की अध्यक्षता की, जिसके झण्डे तले साइंस-20 की बैठक हुई। अब जी-20 आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ ही समाज से जुड़े वैज्ञानिक मुद्दों के विचार मंथन का मंच भी बन गया है।

इसी साल मध्यप्रदेश के शहडोल ज़िले से राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन का शुभारंभ हुआ। यह एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाएं हंसिए का आकार ग्रहण कर लेती हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक देश से इस बीमारी को विदा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर 5800 करोड़ रुपए की वैज्ञानिक परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित की गईं। इनमें लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेवीटेशनल वेव ऑब्ज़रवेटरी शामिल है। इसे महाराष्ट्र स्थित हिंगोली में स्थापित किया जाएगा।

सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोच्चि के वैज्ञानिकों की टीम ने इंडियन ऑइल सार्डीन मछली (Sardinella longiceps) के संपूर्ण जीनोम को डीकोड करने में सफलता प्राप्त की। इस शोध से मछली के पारिस्थितिकी तंत्र और विकास की व्याख्या में मदद मिलेगी और आगे चलकर संरक्षण के लिए प्रबंधन रणनीति बनाना संभव हो सकेगा।

इसी साल 7 अगस्त को लोकसभा ने राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान विधेयक पारित कर दिया। विधेयक में गणित, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और भूविज्ञान के क्षेत्र में शोध, नवाचार और उद्यमिता के लिए उच्च स्तरीय मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना का प्रावधान है। इसी वर्ष संसद द्वारा जैव विविधता संशोधन विधेयक पारित किया गया। यह विधेयक 2002 के जैविक विविधता अधिनियम को संशोधित करता है। इस विधेयक में किए गए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देते हैं।

14 सितंबर को भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कारों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। विज्ञान रत्न पुरस्कार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में की गई जीवन भर की उपलब्धियों के लिए दिया जाएगा। विज्ञानश्री पुरस्कार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिया दिया जाएगा। विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार 45 वर्ष की आयु तक के उन युवा वैज्ञानिकों को प्रदान किया जाएगा जिन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान किया है। साइंस टीम पुरस्कार तीन अथवा उससे अधिक वैज्ञानिकों की उस टीम को संयुक्त रूप से दिया जाएगा जिसने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। इन चार श्रेणियों में 56 पुरस्कार दिए जाएंगे, जिनमें नकद धनराशि का प्रावधान नहीं किया गया है।

दिसम्बर के उत्तरार्द्ध में अहमदाबाद स्थित साइंस सिटी परिसर में भारतीय विज्ञान सम्मेलन आयोजित किया गया। इस बार सम्मेलन का मुख्य विषय ‘भारत का विकास, भारतीय मूल्यों और नवप्रवर्तन के साथ’ चुना गया था। बीते वर्ष नई दिल्ली में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर वैश्विक साझेदारी शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें इस बात पर विचार मंथन किया गया कि दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर क्या सोच रही है और भारत इसमें क्या योगदान कर रहा है।

साल 2023 के लिए गणतंत्र दिवस पर घोषित पद्म पुरस्कारों के लिए चुने गए वैज्ञानिकों में विख्यात चिकित्सक डॉ. दिलीप महालनोबिस को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया। उनका जीवन रक्षक ओआरएस घोल की खोज में विशेष योगदान रहा है। इसी साल जाने-माने सांख्यिकीविद सी. आर. राव को इंटरनेशनल प्राइज़ इन स्टैटिस्टिक्स से सम्मानित किया गया। उन्हें यह अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 75 वर्ष पहले सांख्यिकी विज्ञान में विशेष योगदान के लिए दिया गया है।

विज्ञान जगत की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर ने दिसंबर में वर्ष 2023 के टॉपटेन वैज्ञानिकों की सूची में भारत की अंतरिक्ष वैज्ञानिक कल्पना कलाहेस्टी को शामिल किया है। उन्हें यह विशिष्ट सम्मान चन्द्रयान-3 के प्रक्षेपण में एसोसिएट परियोजना निदेशक के रूप में अहम भूमिका निभाने के लिए दिया गया है।

इसी वर्ष लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका साइंस रिपोर्टर के संपादक हसन जावेद खान ने 18 वर्षों तक संपादन का दायित्व संभालने के बाद विदाई ले ली।

इसी साल एनसीईआरटी ने नौवीं और दसवीं कक्षाओं के विज्ञान पाठ्यक्रम से डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत और मेंडेलीव की आवर्त सारणी को हटा दिया। देश के 1800 वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने इसका विरोध करते हुए एक खुला पत्र लिखकर सरकार के इस निर्णय की आलोचना की।

यह वही साल था, जब सरकार ने विज्ञान संचार की स्वायत्त संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ को बंद करने का निर्णय लिया। इस संस्था की स्थापना 11 अक्टूबर 1989 को की गई थी। इसी साल अगस्त से लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका ड्रीम-2047 का प्रकाशन बंद हो गया। इसका पहला अंक अक्टूबर 1998 में छपा था। दरअसल, इस पत्रिका को ‘ड्रीम-2047’ नाम इसलिए दिया गया था, ताकि स्वतंत्रता के सौ साल पूरे होने का उत्सव मनाने के पहले हम अपने सपनों को साकार करने की रूपरेखा बना लें।

वर्ष 2023 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। 28 सितंबर को प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के प्रणेता एम. एस. स्वामीनाथन का 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने कृषि क्षेत्र की नीतियां बनाने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। 22 अगस्त को विख्यात वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद सी. आर. राव का 102 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 17 जुलाई को प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. मंगला जे. नार्लीकर का 80 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उन्होंने मूलभूत गणित में विशेष योगदान के साथ विद्यार्थियों और आम लोगों में गणित को लोकप्रिय बनाने के क्षेत्र में भी योगदान किया था।

उम्मीद है हमारे देश के वैज्ञानिक साल 2023 की भांति 2024 को भी उपलब्धियों भरा बनाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मौसम पूर्वानुमान में उपयोगी कृत्रिम बुद्धि

मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में धीरे-धीरे क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। इन दिनों कृत्रिम बुद्धि (एआई) आधारित मौसम पूर्वानुमान सटीक और बेहतर होते जा रहे हैं।

गौरतलब है कि कई दशकों से मौसम पूर्वानुमान सुपर कंप्यूटरों पर निर्भर रहे हैं। अत्यधिक ऊर्जा खपत वाले सुपरकंप्यूटरों से पूर्वानुमान लगाने के लिए इन्हें निरंतर चालू रखना होता है। लेकिन एआई के उद्भव ने इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। विश्व की सबसे बड़ी मौसम पूर्वानुमान संस्था युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) ने हाल ही में एआई को अपनाया है और प्रायोगिक स्तर पर पूर्वानुमान करना शुरू किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार डेस्कटॉप पर मिनटों में तैयार किए गए एआई-जनित पूर्वानुमान सटीकता में पारंपरिक मॉडल के बराबर और कई मामलों में उससे भी बेहतर हैं।

एआई की इस क्षमता को देखते हुए गूगल डीप माइंड और हुवाई जैसी कंपनियां अधिक सटीक एआई मौसम मॉडल तैयार करने का प्रयास कर रही हैं। गूगल के ग्राफकास्ट और हुवाई के पंगु-वेदर ने दस दिनों का पूर्वानुमान तैयार करने में अभूतपूर्व क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।

कंप्यूटेशन आधारित पारंपरिक मौसम मॉडल के विपरीत एआई मॉडल डीप लर्निंग पर आधारित हैं। ECMWF के 40 वर्षों के मौसम अवलोकनों और अल्पकालिक पूर्वानुमानों के व्यापक डैटासेट पर प्रशिक्षित ये एआई मॉडल वायुमंडल में हो रहे परिवर्तन के जटिल पैटर्न को समझते हैं। ग्राफकास्ट पेपर के मुख्य लेखक रेमी लैम ने मॉडल की दक्षता को पारंपरिक पूर्वानुमानों का एक तेज़, सटीक और व्यावहारिक विकल्प बताया है।

इन एआई मॉडलों पर काम कर रहे ECMWF शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सीमित अवलोकन डैटा के साथ भी हुवाई का पंगु मॉडल प्रचलित मॉडल की दक्षता से मेल खाता है। इस तेज़ी से परिवर्तन के पीछे गूगल द्वारा तैयार किया गया वेदरबेंच है जो डैटा तक पहुंच को सरल बनाता है। इसके अलावा, रयान केसलर के व्यक्तिगत योगदान से उपजा मॉडल सरल लेकिन अत्यधिक प्रभावी 6-दिनी पूर्वानुमान प्रदान करने में सक्षम हैं।

एआई मौसम मॉडलिंग के लिए अगला कदम मौसम के एकाधिक पूर्वानुमान में है जिनके बीच से चयन किया जा सके। इसमें चक्रवात जैसी चरम मौसमी घटनाओं के लिए पूर्वानुमान की सटीकता को बढ़ाया सकता है। ये मॉडल मौसम का पूर्वानुमान और एक्सास्केल कंप्यूटरों पर काम करने वाले उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले जलवायु मॉडल पर निर्भर हैं। ये शीघ्र परिणाम देंगे और जलवायु भविष्यवाणी में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

बहरहाल मौसम के पूर्वानुमान का भविष्य अंतत: उपयोगकर्ता की प्राथमिकताओं पर निर्भर होगा। इसमें एआई-आधारित पूर्वानुमानों की सटीकता और एल्गोरिद्म-आधारित पूर्वानुमानों की समझ के बीच चयन करना होगा। फिलहाल उम्मीद है कि ये मॉडल उपयोगकर्ताओं को मौसम की घटनाओं को समझने में मदद करेंगे और पूर्वानुमान में सटीकता, दक्षता और विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व मिश्रण प्रदान करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मतदान में प्रयुक्त अमिट स्याही का विज्ञान – चक्रेश जैन

र्ज़ी मतदान रोकने में ‘अमिट स्याही’ की अहम भूमिका रही है। अमिट स्याही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मिटाया अथवा धोया नहीं जा सकता। बैंगनी रंग की यह स्याही आम चुनाव का प्रतीक बन गई है। अभी तक कोई भी विकल्प अमिट स्याही की जगह नहीं ले पाया है।

मतदान में प्रयुक्त अमिट स्याही को बनाने में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (एनपीएल) के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसे अमिट स्याही की जन्म स्थली कहा जाता है। प्रयोगशाला की स्थापना के तुरन्त बाद रसायन विज्ञान प्रभाग के अंतर्गत स्याही विकास इकाई का गठन किया गया था। एनपीएल ने 1950-51 में अमिट स्याही तैयार कर ली थी, जिसका उपयोग प्रथम आम चुनाव में किया गया था। दूसरे आम चुनाव (1957) में एनपीएल ने ही अमिट स्याही की 3,16,707 शीशियां उपलब्ध कराई थीं।

बहरहाल, अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अमिट स्याही उत्पादन के काम को आगे जारी नहीं रखा जा सका था। ऐसी स्थिति में सरकारी-निजी प्रतिष्ठान को इसके उत्पादन का लायसेंस देने की ज़रूरत दिखाई दी। काफी विचार-विमर्श के बाद कर्नाटक की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मैसूर पेंट्स का चुनाव किया गया। इस कंपनी की स्थापना 1937 में मैसूर के महाराजा कृष्णराजा वाडियार ने की थी। वर्ष 1947 में इस कंपनी का अधिग्रहण पूर्व मैसूर राज्य ने कर लिया था और आगे चलकर इसका नाम बदल कर मैसूर लैक एंड पेंट वर्क्स लिमिटेड कर दिया गया। फिर 1989 में नाम बदलकर मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड  कर दिया गया। वर्तमान में इसी को निर्वाचन आयोग से अमिट स्याही खरीदी के आदेश प्राप्त हो रहे हैं। और तो और, यह कंपनी दो दर्ज़न अन्य देशों को भी अमिट स्याही का निर्यात कर रही है।

निर्णय लिया गया है कि 1962 के बाद के सभी चुनावों में मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड ही अमिट स्याही का उत्पादन और निर्यात करेगी। नेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने अमिट स्याही के नुस्खे का पेटेंट करा लिया है, ताकि अन्य कंपनियां इसका उत्पादन न कर सकें।

अमिट स्याही के विकास का इतिहास लगभग सात दशकों का है। सात दशकों की इस छोटी-सी अवधि में कई महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हैं। 1940 के दशक में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर ने रसायन विज्ञानी डॉ. सलीमुज्जमान सिद्दीकी से अमिट स्याही तैयार करने के लिए कहा था। उन्होंने सिद्दीकी को सिल्वर क्लोराइड युक्त एक नमूना भेजा, जिसे लगाने के बहुत देर बाद त्वचा पर निशान पड़ता था। रसायनविद डॉ. सिद्दीकी ने इसमें सिल्वर ब्रोमाइड मिलाया, जिससे तत्काल निशान पड़ गया। डॉ. सिद्दीकी शुरुआत से ही एनपीएल में स्याही विकास इकाई से जुड़े थे। आगे चलकर डॉ. एम. एल. गोयल के नेतृत्व में अमिट स्याही का नुस्खा तैयार किया गया। उनके सहयोगी प्रतिष्ठित और समर्पित युवा रसायन विज्ञानी डॉ. जी. बी. माथुर, डॉ. वी. डी. पुरी आदि थे।

‘अमिट स्याही’ का मुख्य घटक सिल्वर नाइट्रेट है। यही रसायन स्याही के निशान को उभारता है। इसकी सांद्रता दस से लेकर पच्चीस प्रतिशत के बीच होती है। सिल्वर नाइट्रेट और त्वचा के प्रोटीन की अभिक्रिया से त्वचा पर गहरा निशान बन जाता है, जो कुछ दिनों तक नहीं छूटता। सिल्वर नाइट्रेट से त्वचा को जरा भी हानि नहीं होती। यह निशान तभी हटता है, जब नई कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं की जगह ले लेती हैं। स्याही चालीस सेकंड से कम समय में सूख जाती है। अमिट स्याही में कुछ रंजक भी होते हैं। यह स्याही रोशनी के प्रति संवेदनशील होती है, अत: इसे रंगीन शीशियों में रखा जाता है।

निर्वाचन आयोग को सौंपने के पहले अमिट स्याही का कई बार परीक्षण किया जाता है। निर्वाचन आयोग चुनाव प्रक्रिया के दौरान ‘रेंडम सेम्पल’ लेकर परीक्षण के लिए एनपीएल के पास भेजता है जो प्रत्येक परीक्षण के बाद निर्वाचन आयोग को नियमित रिपोर्ट भेजती है।

बैंगनी रंग की अमिट स्याही को मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी पर लगाया जाता है। मतदान की अवधि में स्याही सूखने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इसे साबुन, तेल, डिटरजेंट अथवा रसायनों से मिटाया नहीं जा सकता। कुछ दिनों बाद यह अपने आप मिट जाती है।

एक बात और। एनपीएल को आज भी अमिट स्याही की रॉयल्टी मिलती है।

वर्ष 1962 में विकसित अमिट स्याही का मूल नुस्खा छह दशकों बाद भी नहीं बदला है। साल 2001 में एनपीएल के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण लाल ने अमिट स्याही के नुस्खे को बेहतर बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य मूल स्याही से पानी को हटाना था, ताकि यह जल्दी सूख सके। सूखने की प्रक्रिया को बेहतर करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने बिना पानी का एक ऐसा मिश्रण तैयार किया, जो पहले मिश्रण की तुलना में जल्दी सूख तो जाता था, लेकिन रंग बहुत समय तक बना रहता था।

पिछले वर्षों में अमिट स्याही के उपयोग का विस्तार हुआ है। 2016 में इसका उपयोग नोटबंदी के संदर्भ में हुआ था।

तर्जनी उंगली पर अमिट स्याही का निशान लगाना संवैधानिक ज़रूरत है। सवाल यह है कि निशान कहां पर लगाया जाए? इस बारे में परिवर्तन हुए हैं। शुरुआत में अमिट स्याही का निशान तर्जनी के मूल में बिंदु के रूप में लगाया जाता था। वर्ष 1962 में यह निशान नाखून की जड़ के ऊपर लगाया जाता था। साल 2006 से इस निशान को बड़ा करके नाखून के ऊपर के सिरे से तर्जनी अंगुली के जोड़ के नीचे तक लगाया जाता है। इसने अब एक छोटी-सी लकीर का रूप ले लिया है।

स्वतंत्रता के पहले अमिट स्याही के मामले में देश निर्यात पर निर्भर था। लेकिन आज हम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो चुके हैं। यही नहीं भारत 25 देशों को अमिट स्याही का निर्यात भी कर रहा है। अमिट स्याही का उपयोग लोकसभा, विधानसभा चुनावों से लेकर स्थानीय निकायों के चुनावों में हो रहा है। सारांश में कहा जा सकता है कि अमिट स्याही का नुस्खा अपने ही देश में बनाना और उत्पादन करना लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के साथ ही हमारे देश के वैज्ञानिकों की ऐतिहासिक भूमिका और प्रतिभा को आम मतदाताओं के सामने प्रदर्शित करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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