अफवाह फैलाने में व्यक्तित्व की भूमिका

ज के दौर के सोशल मीडिया ने एक ओर जहां लोगों को जोड़ने का काम किया है, वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से भ्रामक खबरों को साझा करने के चलते ध्रुवीकरण, हिंसक उग्रवाद और नस्लवाद में भी काफी तेज़ी से वृद्धि हुई है। सवाल यह है कि वे कौन लोग हैं जो भ्रामक खबरों को साझा करते हैं? एक विश्लेषण के अनुसार रूढ़िवादी लोग काफी हद तक भ्रामक सूचनाओं के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार हैं।

इन भ्रामक सूचनाओं के संकट का समाधान खोजने के लिए एक ऐसे स्पष्ट आकलन की आवश्यकता है जिससे यह पता लगाया जा सके कि झूठ और षडयंत्र के सिद्धांतों को कौन फैला रहा है। इस विषय में ड्यूक युनिवर्सिटी के मैनेजमेंट एंड आर्गेनाइज़ेशन के शोध छात्र अशर लॉसन और इसी युनिवर्सिटी में फुकुआ स्कूल ऑफ बिज़नेस के असिस्टेंट प्रोफेसर हेमंत कक्कड़ ने लोगों के व्यक्तित्व को मुख्य निर्धारक के रूप में जांचने का काम किया।

व्यक्तित्व लक्षणों की पहचान और मापन के लिए उन्होंने प्रचलित फाइव-फैक्टर थ्योरी का इस्तेमाल किया जिसे बिग फाइव भी कहा जाता है। यह थ्योरी व्यक्तित्वों को 5 श्रेणियों में बांटती है: अनुभव के प्रति खुलापन, कर्तव्यनिष्ठा, बहिर्मुखता, सहमत होने की तैयारी और उन्माद। इस ढांचे के अंतर्गत कर्तव्यनिष्ठा पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया जिससे लोगों की सलीकापसंदगी, उत्तेजित होने पर आत्म-नियंत्रण, रूढ़िवादिता और विश्वसनीयता में अंतरों का पता चलता है।

शोधकर्ताओं का अनुमान था कि कम-कर्तव्यनिष्ठ रूढ़िवादी  लोग (एलसीसी) अन्य रूढ़िवादियों या कम-कर्तव्यनिष्ठ उदारवादियों की तुलना में अधिक भ्रामक समाचार साझा करते हैं। उन्होंने व्यक्तित्व, राजनीति और भ्रामक समाचारों को साझा करने के बीच सम्बंधों का पता लगाने के लिए 8 अध्ययन किए जिनमें 4642 प्रतिभागी शामिल थे।

सबसे पहले शोधकर्ताओं ने विभिन्न आकलनों के माध्यम से लोगों की राजनीतिक विचारधारा और कर्तव्यनिष्ठा को मापा जिसमें प्रतिभागियों से उनके मूल्यों और व्यवहारों के बारे में पूछा गया था। इसके बाद प्रतिभागियों को कोविड से सम्बंधित कुछ सत्य और भ्रामक समाचारों की शृंखला दिखाई गई और इन समाचारों की सटीकता के बारे में सवाल किए गए। यह भी पूछा गया कि वे इन समाचारों को साझा करेंगे या नहीं। उन्होंने पाया कि उदारवादी और रूढ़िवादी, दोनों ही प्रकार के लोग कभी-कभी भ्रामक समाचार को सही मान लेते हैं। शायद उन्होंने इन समाचारों को सटीक इसलिए माना क्योंकि ये उनके विश्वासों से मेल खाते थे।

यह भी देखा गया कि विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने भ्रामक समाचार साझा करने की बात कही लेकिन अन्य सभी प्रतिभागियों की तुलना में एलसीसी के बीच यह व्यवहार काफी अधिक देखा गया। हालांकि, उच्च स्तर के कर्तव्यनिष्ठ उदारवादियों और रूढ़िवादियों के बीच कोई अंतर देखने को नहीं मिला जबकि कम-कर्तव्यनिष्ठ उदारवादियों ने उच्च-कर्तव्यनिष्ठ उदारवादियों की तुलना भ्रामक समाचार ज़्यादा साझा नहीं किए।

दूसरे अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने इन परिणामों को स्पष्ट राजनीतिक रुझान वाले भ्रामक समाचारों के साथ दोहराया और पिछले अध्ययन से भी अधिक प्रभाव देखा। इस बार भी विभिन्न स्तर की कर्तव्यनिष्ठा वाले उदारवादी और उच्च कर्तव्यनिष्ठ रूढ़िवादी व्यापक स्तर पर भ्रामक जानकारी फैलाने में शामिल नहीं थे। भ्रामक समाचार फैलाने वालों में कम कर्तव्यनिष्ठ रूढ़िवादी (एलसीसी) आगे रहे।

सवाल यह था कि एलसीसी में भ्रामक समाचार को साझा करने की प्रवृत्ति क्यों होती है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसमें प्रतिभागियों की राजनीतिक विचारधारा और व्यक्तित्व के बारे में जानकारी के अलावा उनमें अराजकता की चाहत, सामाजिक और आर्थिक रूप से रूढ़िवादी मुद्दों के समर्थन, मुख्यधारा मीडिया पर भरोसे और सोशल मीडिया पर बिताए गए समय का आकलन किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार एलसीसी ने अराजकता की ज़रूरत ज़ाहिर की, और साथ ही वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक संस्थाओं को बाधित करने और नष्ट करने की इच्छा भी व्यक्त की। इनसे भ्रामक जानकारियों को फैलाने की उनकी प्रवृत्ति की व्याख्या हो जाती है। यह किसी अन्य विचारों और समूहों की तुलना में स्वयं को श्रेष्ठ मानने की इच्छा को भी दर्शाता है जो कम कर्तव्यनिष्ठ रूढ़िवादियों में अधिक देखने को मिलती है।         

दुर्भाग्य से, शोधकर्ताओं को यह भी पता चला कि समाचारों पर सटीकता का लेबल लगाने से भी भ्रामक जानकारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग अंजाम दिया जिसमें सोशल मीडिया पर साझा किए गए सही समाचार के लिए ‘पुष्ट’ और भ्रामक समाचार के लिए ‘विवादित’ टैग का उपयोग किया गया। उन्होंने पाया कि उदारवादियों और रूढ़िवादियों ने ‘पुष्ट’ टैग वाले समाचार को अधिक साझा किया। हालांकि, एलसीसी ने अभी भी जानकारी को गलत या भ्रामक जानते हुए भी साझा करना जारी रखा।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक और अध्ययन किया जिसमें प्रतिभागियों को स्पष्ट रूप से बताया गया कि जिस जानकारी को वे साझा करना चाहते हैं वह गलत है। इसके बाद उनको अपने निर्णय को बदलने का मौका भी दिया गया। इसके बाद भी एलसीसी द्वारा भ्रामक समाचार साझा करने की दर काफी उच्च रही और वे समाचार के गलत होने की चेतावनियों को भी अनदेखा करते रहे।

यह परिणाम काफी चिंताजनक है जिसमें एलसीसी भ्रामक समाचारों के प्रसार के प्राथमिक चालक नज़र आते हैं। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी का लेबल लगाने के बजाय कोई और समाधान खोजना होगा। एक अन्य विकल्प के रूप में सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे समाचारों को अपने प्लेटफॉर्म्स से हटाने के प्रयास करने चाहिए जो किसी व्यक्ति समुदाय को चोट पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। कुल मिलाकर मुद्दा सिर्फ इतना है कि जब तक सोशल मीडिया कंपनियां कोई ठोस तरीका खोज नहीं निकालती हैं तब तक यह समस्या बनी रहेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या प्राचीन भारत में पालतू घोड़े थे? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

हाल ही में फ्रांस की पॉल सेबेटियर युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा नेचर पत्रिका में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। इसके अनुसार, लुडोविक ऑर्लेन्डो और उनके समूह ने ऐसे क्षेत्रों से 2,000 से अधिक घोड़ों की हड्डियों और दांतों के प्राचीन नमूने एकत्रित किए है जहां पालतू घोड़ों की उत्पत्ति की संभावना है। पालतू घोड़ों की उत्पत्ति के संभावित क्षेत्र युरोप के दक्षिण-पश्चिमी कोने का आइबेरियन प्रायद्वीप, युरेशिया की सुदूर पश्चिमी सीमा, एनाटोलिया (आधुनिक समय का तुर्की), और पश्चिमी युरेशिया और मध्य एशिया के घास के मैदानों को माना जाता है। टोसिन थॉम्पसन ने नेचर पत्रिका के 28 अक्टूबर 2021 के अंक में एक टिप्पणी में लिखा है, डॉ. ऑर्लेन्डो के दल ने इन क्षेत्रों से प्राप्त लगभग 270 नमूनों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रम का विश्लेषण कर लिया है, और साथ में पुरातात्विक जानकारी भी एकत्र कर ली है। इसके अलावा उन्होंने रेडियोधर्मी कार्बन-14 की मदद से घोड़ों के इन नमूनों की उम्र निर्धारित कर ली है (रेडियोधर्मी कार्बन-14 एक निश्चित दर से विघटित होता है)। इन मिले-जुले आंकड़ों की मदद से वे यह तय कर पाए कि लगभग 4200 ईसा पूर्व तक कई अलग-अलग तरह के घोड़ों की आबादियां युरेशिया के अलग-अलग क्षेत्रों में निवास करती थी।

घोड़े के पदचिन्ह

इसी तरह के एक अन्य आनुवंशिक विश्लेषण में यह भी पाया गया है कि आधुनिक पालतू डीएनए प्रोफाइल वाले घोड़े पश्चिमी युरेशियन स्टेपीज़, विशेष रूप से वोल्गा-डॉन नदी क्षेत्र में रहते थे।

लगभग 2200-2000 ईसा पूर्व आते-आते ये घोड़े बोहेमिया (वर्तमान के चेक गणराज्य और युक्रेन), और मध्य एशिया (कजाकिस्तान, किर्जिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान, ईरान तथा अफगानिस्तान) और मंगोलिया में फैल गए थे। इन देशों के प्रजनक इन घोड़ों को उन देशों को बेचने के लिए तैयार करते थे जहां इनकी मांग थी। इन देशों में लगभग 3300 ईसा पूर्व तक घुड़सवारी लोकप्रिय हो गई थी, और सेनाओं का गठन इनके आधार पर किया जाने लगा था – जैसे, मेसोपोटामिया, ईरान, कुवैत और “फर्टाइल क्रिसेंट” या फिलिस्तीन की सेनाओं में। थॉम्पसन ध्यान दिलाते हैं कि पहला स्पोक युक्त पहिए वाला रथ 2000-1800 ईसा पूर्व के आसपास बना था।

भारतीय कहानी

अब सवाल है कि भारत में घोड़े कब आए, और वे देशी थे या विदेशी? क्या घोड़े भारत के मूल निवासी थे? इसका उत्तर तो ‘ना’ लगता है। “वर्ल्ड एटलस” के अनुसार, भारत के मूल निवासी जानवर सिर्फ एशियाई हाथी, हिम तेंदुआ, गैंडा, बंगाल टाइगर, रीछ, हिमालयी भेड़िया, गौर बाइसन, लाल पांडा, मगरमच्छ और मोर व राजहंस हैं। वेबसाइट थॉटको (ThoughtCo) ने अपने लेख एशिया में पैदा हुए 11 घरेलू जानवरों में मृग, नीलगिरि तहर, हाथी, लंगूर, मकाक बंदर, गैंडा, डॉल्फिन, गेरियल मगरमच्छ, तेंदुआ, भालू, बाघ, बस्टर्ड (उड़ने वाला सबसे भारी पक्षी), गिलहरी, कोबरा और मोर को सूचीबद्ध किया है। इस तरह इन स्रोतों से साफ झलकता है कि घोड़ा भारत का मूल निवासी नहीं है। यह भारत में देशों के बीच अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के माध्यम से आया होगा। भारतीयों ने अपने पड़ोसी देशों के साथ अपने हाथियों, बाघों, बंदरों, पक्षियों का व्यापार किया होगा और अपने उपयोग के लिए घोड़ों का आयात किया होगा।

तो, भारत को अपने घोड़े कब मिले? विकिपीडिया बताता है कि उत्तर हड़प्पा सभ्यता स्थलों (1900 से 1300 ईसा पूर्व) से घोड़ों से सम्बंधित अवशेष और वस्तुएं मिली हैं, और इनसे ऐसा नहीं लगता कि हड़प्पा सभ्यता में घोड़ों ने कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके थोड़े समय बाद वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में स्थिति अलग दिखती है। (घोड़े के लिए संस्कृत शब्द अश्व है, जिसका उल्लेख वेदों और हिंदू ग्रंथों में मिलता है)। ये मोटे तौर पर उत्तर-कांस्य युग के अंत के समय के है।

साहित्यिक बहस

इस संदर्भ में दो हालिया किताबें भी काफी उल्लेखनीय हैं – इनमें से एक पुस्तक टोनी जोसेफ की है जिसका शीर्षक है प्रारंभिक भारतीय : हमारे पूर्वजों की कहानी और हम कहां से आए (Early Indians: The Story of our Ancestors and Where We Came From) है, और दूसरी पुस्तक यशस्विनी चंद्रा की है जिसका शीर्षक है घोड़े की कहानी (The Tale of the Horse) है। दिसंबर 2018 में फर्स्टपोस्ट में प्रकाशित डॉ. जोसेफ का हालिया लेख भारत में “आर्यो” के प्रवास के प्रमाण की पड़ताल करता है। यह बताता है कि भारत में पाए जाने वाले घोड़े ऊपर बताए गए “स्तानों” से ही आए हैं। इसके अलावा, दी प्रिंट के 17 जनवरी 2021 के अंक में प्रकाशित डॉ. चंद्रा का लेख बताता है कि भारतीय मूल के घोड़े 8000 ईसा पूर्व तक लुप्त हो चुके थे।

बहस का सबसे स्पष्ट विश्लेषण आईआईटी गांधीनगर के इतिहासकार मिशेल डैनिनो के एक लेख में मिलता है। उन्होंने जर्नल ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर (सितंबर 2006) में दी हॉर्स एंड आर्यन डिबेट शीर्षक के अपने शोध पत्र में और पुस्तक हिस्ट्री ऑफ एंश्यंट इंडिया (2014) में लिखा है कि पुरावेत्ता सैंडोर बोकोनी ने घोड़ों के दांतों के नमूनों का अध्ययन किया था। ये नमूने हड़प्पा-पूर्व काल के बलूचिस्तान, इलाहाबाद (2265-1480 ईसा पूर्व)) और चंबल घाटी (2450-2000 ईसा पूर्व) से थे। इनके अलावा उन्होंने कालीबंगन से प्राप्त ऊपरी दाढ़ों का भी अध्ययन किया था। उनका निष्कर्ष था कि ये पालतू घोड़ों के अवशेष थे। प्रोफेसर डैनिनो के इन शोध पत्रों ने भारत में पालतू घोड़ों के लेकर किए जा रहे परस्पर विरोधी दावों को विराम दे दिया है और हमें उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। 

हड़प्पा के अवशेष

इस पृष्ठभूमि को देखते हुए यह जांचना दिलचस्प होगा कि क्या हड़प्पा स्थलों में घोड़ों के कोई अवशेष, हड्डियां, दांत या खोपड़ियां हैं जिनका डीएनए अनुक्रमण किया जा सके, जैसा कि ऑरलैंडो के समूह ने युरेशियन नमूनों के लिए किया। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भाषा में रंगों के नाम परिवेश से तय होते हैं

रंगों का इंद्रधनुष होता है – एक सिरे पर लाल तो दूसरे सिरे पर बैंगनी और बीच में हरा, फ़िरोज़ी और नीला। हर भाषा इन रंगों को अपनी ज़रूरत के हिसाब से नाम देती है: कुछ भाषाओं में ‘हरा’ और ‘नीला’ रंग के लिए अलग-अलग शब्द होते हैं, तो कुछ भाषाओं में दोनों रंगों के लिए एक ही नाम मिलता है। कुछ में तो रंगों के लिए नाम ही नहीं होते।

लेकिन ऐसा क्यों हैं? वैकासिक भाषाविद डैन डिडियू और मनोविज्ञानी आसिफा मज़ीद ने इसी सवाल का जवाब पता लगाया है। अध्ययन में उन्होंने पाया है कि जिन इलाकों में सूर्य की भरपूर रोशनी होती है उन इलाकों की भाषा में इस बात की संभावना अधिक रहती है कि उनमें नीले और हरे रंग के लिए एक ही नाम हो। और ऐसा संभवत: ताउम्र अधिक प्रकाश के संपर्क में रहने के कारण होता है: तेज़ धूप के कारण आंखो में “लेंस ब्रुनेसेन्स” नामक स्थिति बनती है जिसके कारण दो रंगों को अलग-अलग पहचानने में मुश्किल होती है।

एक अन्य परिकल्पना के अनुसार, जो लोग पानी के बड़े स्रोत – जैसे समुद्र या झील – के आसपास रहते हैं उनकी भाषा में ‘नीले’ रंग के लिए नाम होने की अधिक संभावना होती है। इसके अलावा, अगर कोई समुदाय नीले रंग में कपड़े रंगना शुरू करता है, तो यह भी उनकी भाषा में ‘नीले’ रंग के लिए नए नाम मिलने की संभावना को बढ़ाता है।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इन सभी मुख्य सिद्धांतों को एक साथ खंगालने का सोचा। इसके लिए उन्होंने अंटार्कटिका को छोड़कर बाकी सभी महाद्वीपों के 142 आबादी समूहों से भाषा सम्बंधी डैटा इकट्ठा किया। इनमें कोरियाई और अरबी जैसी बड़े पैमाने पर बोली जाने वाली भाषाओं से लेकर ऑस्ट्रेलिया और अमेज़ॉन में केवल कुछ सैकड़ा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं शामिल थी। शोधकर्ताओं ने देखा कि प्रत्येक आबादी की मुख्य भाषा रंगों के लिए किन नामों का उपयोग करती है, और फिर इन नामों को प्रभावित कर सकने वाले कारकों का डैटा इकट्ठा किया – जैसे सूर्य के प्रकाश से संपर्क, या झील के नज़दीक होना।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स में शोधकर्ता बताते हैं कि कोई भाषा हरे रंग और नीले रंग में अंतर करती है या नहीं इसमें प्रकाश से संपर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भूमध्य रेखा के करीब वाले या वर्ष भर लगभग खुले आसमान वाले इलाकों (जैसे मध्य अमेरिका और पूर्वी अफ्रीका) की भाषाओं में ’हरे’  और ’नीले’  रंग के बीच फर्क काफी कम था। इससे पता चलता है कि ताउम्र तेज़ प्रकाश का संपर्क इन समुदाय में नीले-हरे रंग के भेद को मिटाता है। शोधकर्ताओं को अन्य दो सिद्धांतों के लिए भी समर्थन दिखा: झील के पास रहने से ’नीले’ रंग के लिए एक अलग नाम की संभावना बढ़ गई। और ऐसा ही उन्हें बड़े समुदायों के लिए भी दिखा। जिसका मतलब है कि किसी भाषा में अलग-अलग रंगों को नाम देने में दृष्टि, संस्कृति और पर्यावरण, ये सभी कारक भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ रही है जुड़वा बच्चों की संख्या

क नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या बढ़ रही है। 1980 के दशक से शुरू करें तो जुड़वा बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी है। जहां 1980 से 1985 के बीच 1000 प्रसवों में जुड़वा प्रसव 9 होते थे वहीं 2010 से 2015 के बीच की अवधि में हर 1000 प्रसवों में 12 जुड़वा प्रसव थे।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि सिर्फ प्रतिशत ही नहीं, जुड़वा प्रसवों की कुल संख्या भी बढ़ी है। 1980 के दशक के प्रारंभ में 11 लाख जुड़वा प्रसव हुए थे और 2010 के दशक की शुरुआत में ये बढ़कर 16 लाख हो गए – यानी जुड़वा प्रसवों में 42 प्रतिशत का इजाफा हुआ।

इसके कारणों पर विचार करते हुए अध्ययन में इसका प्रमुख कारण चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रजनन को बताया गया है। इसके अंतर्गत इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (जिसे बोलचाल में टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं) भी शामिल है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब निषेचन शरीर से बाहर करवाया जाता है और भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचाया जाता है तो एक से अधिक भ्रूण पहुंचने की संभावना अधिक होती है। हालांकि अब शायद इसमें कमी आने लगेगी क्योंकि चिकित्सक अब एकाधिक भ्रूण प्रत्यारोपित करने से बचने लगे हैं।

जुड़वा प्रसव की संख्या में वृद्धि का एक कारण शायद यह भी है कि अब महिलाएं अधिक उम्र में बच्चे पैदा करने लगी हैं और बढ़ती उम्र के साथ जुड़वा गर्भ की संभावना बढ़ती है। इस अध्ययन के एक शोधकर्ता ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी क्रिस्टियान मोंडेन का कहना है कि इस समय दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या शायद पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। उनके मुताबिक यह तथ्य इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि जुड़वा प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु की संभावना ज़्यादा होती है और मां के लिए प्रसव में पेचीदगियां पैदा होने की संभावना भी एकल प्रसव की अपेक्षा अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

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दूध पीकर घुड़सवार चरवाहे युरोप पहुंचे

पांच हज़ार से अधिक वर्ष पहले आज यमनाया के रूप में पहचाने जाने वाले खानाबदोश वर्तमान रूस और यूक्रेन के घास के मैदानों से भारी बैल गाड़ियों में बाहर निकल पड़े थे। कुछ ही शताब्दियों में वे पूरे युरेशिया में फैल गए, और मंगोलिया से लेकर हंगरी तक की आबादी में अपने आनुवंशिक हस्ताक्षर छोड़ दिए। अब, 50 से अधिक कांस्य युगीन कंकालों के दांतों पर अश्मीभूत प्लाक बताता है कि संभवत: उनका विस्तार दूध के दम पर संभव हुआ था।

शोधकर्ताओं का काफी समय से यह अंदाज़ा था कि बग्घियों, डेयरी और घुड़सवारी के मेल ने यमनाया लोगों के लिए अधिक घुमक्कड़ जीवन संभव बनाया था। लेकिन शोधकर्ताओं के इस विचार का समर्थन करने वाले कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं थे, सिवाय कुछ दफन बग्घियों और मिट्टी के बर्तनों के।

यमनाया के फैलाव की सफलता का कारण जानने के लिए यूएसए, युरोप और रूस के शोधकर्ताओं ने दांतों के प्लाक में फंसकर सुरक्षित रह गए दूध प्रोटीन की जांच की। प्लाक के ये नमूने वर्तमान रूस के घास के मैदानों में 4600 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक रहे लोगों के थे। शोधकर्ताओं ने कैस्पियन सागर के उत्तरी क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक खुदाई स्थलों से प्राप्त 56 कंकालों की जांच की। संरक्षित प्रोटीन को प्लाक से अलग किया और फिर मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से हरेक प्रोटीन की पहचान की।

3300 ईसा पूर्व से पहले, वोल्गा और डॉन नदियों के किनारे रहने वाले लोगों के दांतों के प्लाक में दूध के कोई प्रोटीन नहीं थे। पूर्व अध्ययनों में देखा गया है कि इसकी बजाय ये यमनाया-पूर्व समूह मीठे पानी की मछली, जंगली शिकार, और कभी-कभार पालतू गाय, भेड़, या बकरी का मांस खाते थे।

फिर, लगभग 3300 ईसा पूर्व के बाद के प्लाक नमूनों में गाय, भेड़ और बकरी के दूध के प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिले। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इस समय के ये लोग डेयरी उत्पादों का सेवन करते थे। कुछेक नमूनों में घोड़े के दूध की भी बहुत थोड़ी मात्रा मिली। ज्यूरिख इंस्टीट्यूट ऑफ इवॉल्यूशनरी मेडिसिन के जैव-आणविक पुरातत्वविद शेवन विल्किन कहते हैं कि कभी-कभी इन जानवरों को खाने की बजाय इन जानवरों को सदैव दोहना, यह एक सांस्कृतिक बदलाव है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार ये प्रोटीन संकेत देते हैं कि शिकारी-संग्रहकर्ताओं के तेज़ी से खानाबदोश चरवाहों में बदलने और महज़ 300 सालों में पूरे युरेशिया में फैल जाने में मुख्य भूमिका डेयरी और पशुपालन अपनाने की है। देखा जाए तो घोड़ों, मवेशियों और बकरियों ने घास को रोटी, कपड़ा और मकान में बदल दिया।

लेकिन यह सिर्फ डेयरी के कारण संभव नहीं हुआ; लगभग इसी समय बग्घियों की शुरुआत ने पानी लाना और जानवरों को दूर के चारागहों में चराने के लिए ले जाना संभव बनाया। पालतू घोड़ों ने नए यमनाया खानाबदोशों को जानवरों के बड़े-बड़े झुंडों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाया होगा।

बहरहाल, एक रहस्य अब भी बना हुआ है। प्राचीन डीएनए के विश्लेषण बताते हैं कि यमनाया लोग लैक्टोज़ पचा नहीं पाते थे। यह संभव है कि आधुनिक मंगोलियाई लोगों की तरह यमनाया लोग भी किण्वित डेयरी उत्पाद जैसे दही या चीज़ का सेवन करते हों, जिनमें कोई लैक्टोज़ नहीं होता है। चाहे वे किसी भी रूप में वे डेयरी उत्पादों के सेवन करते हों लेकिन इतना साफ है कि इसके बगैर वे इतनी तेज़ी से, इतनी दूर तक नहीं फैल सकते थे। (स्रोत फीचर्स)

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प्राचीन मानव और आधुनिक मानव साथ-साथ रहे थे

एक दशक पहले साइबेरिया की डेनिसोवा गुफा में मानव विज्ञानियों को एक मानव (अब विलुप्त, उस समय अज्ञात प्रजाति) का जीवाश्म मिला था। यह उसकी सबसे छोटी उंगली की हड्डी का था। जहां यह जीवाश्म मिला था उस जगह के नाम पर इन्हें ‘डेनिसोवन’ नाम दिया गया। अब, इस गुफा की मिट्टी से प्राप्त डीएनए के विश्लेषण से पता चलता है कि इस गुफा ने आधुनिक मनुष्यों की भी मेज़बानी की थी, और संभवत: इस गुफा में कुछ समय के लिए आधुनिक मनुष्य, डेनिसोवन्स और निएंडरथल साथ-साथ रहे थे।

यह तो पहले से पता था कि डेनिसोवा गुफा में निएंडरथल और डेनिसोवन्स सहित मनुष्य कम से कम तीन लाख साल तक रहे थे। खुदाई में मिले आठ जीवाश्मों में एक छोटी उंगली की हड्डी का जीवाश्म, तीन निएंडरथल मनुष्यों की हड्डियों के जीवाश्म, और एक ऐसे बच्चे का जीवाश्म था जिसकी माता निएंडरथल व पिता डेनिसोवन था। गुफा के अपेक्षाकृत बाद के प्रस्तरों में पत्थर के परिष्कृत औज़ार और थोड़े आधुनिक समय के आभूषण भी थे। लेकिन यहां आधुनिक मनुष्य का कोई जीवाश्म नहीं मिला था। खुदाई में मिली वस्तुओं और हड्डियों से प्राप्त डीएनए का विस्तृत अध्ययन, और पूर्व में मिट्टी से प्राप्त डीएनए के अध्ययन ने मानव विकास को समझने में इस गुफा का महत्व और भी पुख्ता किया है।

लेकिन इसे समझने के लिए सिर्फ आठ जीवाश्म का अध्ययन काफी नहीं था। इसलिए मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर इवॉल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी की इलेना ज़वाला और उनके साथियों ने तीन कक्ष वाली इस गुफा की मिट्टी में डीएनए की पड़ताल की। वैसे तो 40 से अधिक वर्षों से मिट्टी से डीएनए हासिल कर अध्ययन किया जा रहा है लेकिन विगत चार साल में ही प्राचीन समय की मिट्टी से विलुप्त मनुष्यों के डीएनए हासिल किए जा सके हैं।

गुफा से प्राप्त विभिन्न काल की मिट्टी के 728 नमूनों का अनुक्रमण करने पर 175 में मानव डीएनए मिले। नेचर पत्रिका में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार विभिन्न समयों पर गुफा में विभिन्न मानव समूह आए और गए। गुफा में सबसे पहले (लगभग तीन लाख साल पहले) डेनिसोवन मनुष्य आए थे, जो आज से लगभग 1,30,000 साल पहले गुफा से चले गए थे। इसके लगभग 30,000 साल बाद डेनिसोवन्स का एक भिन्न समूह गुफा में आया जिन्होंने पत्थर के औज़ार बनाए। निएंडरथल मानव लगभग 1,70,000 साल पहले इस गुफा में आए, और इसके बाद विभिन्न कालखंड में इनके विभिन्न समूह इस गुफा रहे। निएंडरथल किसी समय पर डेनिसोवन्स के साथ रहे होंगे।

सबसे अंत में, लगभग 45,000 साल पहले, आधुनिक मनुष्य इस गुफा में आए। कुछ प्रस्तर ऐसे भी हैं जिनकी मिट्टी में तीनों समूहों के डीएनए के नमूने मिले हैं। लेकिन यह प्रस्तर इतने बड़े कालखंड का है कि पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि तीनों मानव समूह किसी समय में साथ रहे थे या नहीं। बाद के समय की मिट्टी में मिले आभूषण और परिष्कृत वस्तुएं देख कर शोधकर्ताओं का विचार तो था कि वहां आधुनिक मनुष्य रहा करते थे। लेकिन यह अंदाज़ा नहीं था वे 45,000 साल पहले ही वहां पहुंच गए थे।

बहरहाल, यह अध्ययन जीवाश्म और मिट्टी के नमूनों, दोनों के जीनोमिक डैटा का समन्वय है जो वास्तव में नई दिशा देता है। (स्रोत फीचर्स)

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तालाबंदी की सामाजिक कीमत – सोमेश केलकर

म तौर पर कीमत को हम मुद्रा से जोड़कर देखते हैं। लेकिन यहां हम सामाजिक कीमत की बात करेंगे। सामाजिक कीमत वह है जिसे किसी उद्देश्य पूर्ति के लिए समाज सामूहिक रूप से वहन करता है। भारत के संदर्भ में यह पिछले साल मार्च और फिर इस साल अप्रैल-मई में की गई तालाबंदी के कारण समाज द्वारा झेली गई पीड़ा और क्षति है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे आनन-फानन तालाबंदी ने लोगों का जीवन प्रभावित किया और किस तरह तालाबंदी की सामाजिक कीमत कम की जा सकती थी।

तालाबंदी के कारण मौतें

भारत में मई 2021 तक मरने वालों की अधिकारिक संख्या 2,95,525 थी जिसका कारण सिर्फ महामारी नहीं थी। समाचार वेबसाइट theprint.in के अनुसार सिर्फ केरल में अप्रैल 2020 तक तालाबंदी के दौरान भूख, पुलिस की बर्बरता, चिकित्सा सहायता में देरी, आय के स्रोत चले जाने, भोजन व आश्रय न मिलने, सड़क दुर्घटनाओं, शराब की तलब, अकेलेपन या बाहर निकलने पर पाबंदी और तालाबंदी से जुड़े अपराध (गैर-सांप्रदायिक) के कारण 186 लोगों की जान चली गई थी।

अनौपचारिक क्षेत्र

देशव्यापी तालाबंदी के दौरान भारत के अधिकांश हिस्सों में कोविड-19 से लड़ने के लिए आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति की कोशिश हो रही थी। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम लागत पर वितरण की मांग को पूरा करने के लिए श्रमिकों को क्या कीमत चुकानी पड़ी? ये ऐसे सवाल हैं जिनमें संक्रमण काल से परे दीर्घकालिक मानवीय चिंता झलकती है।

असंगठित और प्रवासी श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग (39 करोड़) है, जो सबसे कमज़ोर है और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के दायरे से या तो बाहर है या उसकी परिधि पर है। तालाबंदी की सामाजिक कीमत सबसे अधिक इसी मज़दूर वर्ग ने चुकाई है। और इसी वजह से यह तबका शोषण और मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों का आसानी से शिकार बन जाता है।

प्रवासी मज़दूरों के लिए अपने गांव वापस जाना भी आसान नहीं था। कई राज्यों में श्रमिकों को अपने गांव पहुंचने से पहले और बाद में अभाव और भूख का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने दैनिक निर्वाह के लिए महंगा कर्ज़ लेने को मजबूर होना पड़ा। इसने बच्चों को अपने माता-पिता द्वारा लिया कर्ज चुकाने के लिए बंधुआ मज़दूरी और भुगतान-रहित मज़दूरी करने की ओर धकेल दिया।

2020 के उत्तरार्ध में तालाबंदी के बाद जब चीज़ें सामान्य होने लगीं और कारखाने पूरी क्षमता के साथ शुरू हो गए तो कारखाना मालिकों ने अपने नुकसान की भरपाई के लिए श्रमिकों को कम पैसों पर रखना शुरू किया। ज़रूरतमंद, कमज़ोर और असंगठित श्रमिक पर्याप्त मज़दूरी या अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की स्थिति में न होने के कारण कम मज़दूरी पर काम करने लगे। कई राज्य सरकारों ने अर्थ व्यवस्था दुरुस्त करने की आड़ में श्रमिक कानूनों में ढील देकर श्रमिकों की मुसीबत और बढ़ा दी।

काम पर रखे गए नए मज़दूरों में बड़ी संख्या में बच्चे थे, परिवार की मदद करने के कारण उनका स्कूल छूट गया। कारखानों में मज़दूरी के लिए हज़ारों बच्चों की तस्करी भी हुई, जहां उन्हें अत्यंत कम मज़दूरी पर काम करना पड़ा और संभवत: शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ा।

केंद्र और राज्य सरकारों को इन चुनौतियों से निपटने के लिए वृहद योजना बनाने की ज़रूरत है। खासकर असुरक्षित/हाशिएकृत बच्चों की सुरक्षा के लिए। यहां कुछ ऐसे तरीकों का उल्लेख किया जा रहा है जिन्हें अपनाकर दोनों तालाबंदी का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता था –

1. कानूनी ढांचे का आकलन और समीक्षा: केंद्र सरकार को मानव तस्करी के मौजूदा आपराधिक कानून, इसकी अपराध रोकने की क्षमता और पीड़ितों की ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता का आकलन करके लंबित मानव तस्करी विरोधी विधेयक को संशोधित करके संसद में पारित करवाना चाहिए।

2. कारखानों और विनिर्माण इकाइयों का निरीक्षण: छोटे और मध्यम व्यवसायी कारखानों को गैर-कानूनी ढंग से न चला पाएं, इसके लिए उनका निरीक्षण करना और उन्हें जवाबदेह बनाना चाहिए। बाल श्रम कानूनों के अनुपालन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही बाल श्रम रोकने के लिए कम से कम अगले दो वर्षों तक पंजीकृत कारखानों और अन्य निर्माण इकाइयों का गहन निरीक्षण किया जाना चाहिए।

3. कानून के अमल और पीड़ितों के पुनर्वास हेतु बजट आवंटन में वृद्धि: विमुक्त बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए 2016 में केंद्र सरकार ने अपनी योजना के तहत पीड़ितों को तीन लाख रुपए तक के मुआवज़े का प्रावधान रखा था। लेकिन बजट में योजना के लिए कुल आवंटन महज़ 100 करोड़ रुपए है जबकि योजना को बनाए रखने का न्यूनतम खर्च ही 100.2 करोड़ रुपए है। इसमें तत्काल वृद्धि आवश्यक है।

4. ऋण प्रणाली का विनियमन: ग्रामीण भारत में स्थानीय साहूकारों द्वारा तालाबंदी से प्रभावित लोगों का शोषण रोकने के लिए विनियमन की आवश्यकता है। इसमें उधार देने के लिए लायसेंस और ब्याज दर की उच्चतम सीमा निर्धारित करने के अलावा, सरकारी बैंकों द्वारा उचित शर्तों पर दीर्घावधि कर्ज़ देना व उदार वसूली प्रक्रियाएं शामिल हों। बंधुआ मज़दूरी को समाप्त करने में राज्य सरकारों की सक्रिय भूमिका हो।

महिलाएं

तालाबंदी की सामाजिक कीमत महिलाओं और बच्चों को भी चुकानी पड़ी है। आर्थिक के अलावा मनोवैज्ञानिक असर भी देखे जा रहे हैं। लोग पहले ही गंदगी और बदतर स्थितियों में रहने को मजबूर थे और अनियोजित तालाबंदी के कारण लिंग-आधारित हिंसा, बाल-दुर्व्यवहार, सुरक्षा में कमी, धन और स्वास्थ्य जैसी सामाजिक असमानताएं बढ़ी हैं। महिलाएं वैसे ही अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करती हैं। ऊपर से लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य – मासिक स्राव सम्बंधी स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और पोषण – की और उपेक्षा हुई है और सीमित हुए संसाधनों ने स्थिति को और भी बदतर बनाया है।

तालाबंदी के दौरान बाल विवाह की संख्या में भी वृद्धि देखी गई है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2020 की तालाबंदी के दौरान, बाल विवाह से सम्बंधित लगभग 5584 फोन आए थे।

स्कूल बंद होने के कारण परिवारों और युवा लड़कियों तक पहुंच पाना और बाल-विवाह के मुद्दे पर बात करना मुश्किल हो गया है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार बाल विवाह के चलते लड़कियों का स्कूल छूट जाता है। और यदि हालात बिगड़ते हैं तो उन्हें गुलामी और घरेलू हिंसा भी झेलनी पड़ती है।

तालाबंदी में नौकरी गंवाने और आय न होने के चलते प्रवासी कामगार और मज़दूर भुखमरी और कर्ज़ की ओर धकेले गए। इस स्थिति में उन्हें बेटियों का शीघ्र विवाह करना ही उनकी सुरक्षा और जीवन के लिए उचित लगा।

शिक्षा

शिक्षा पर तालाबंदी का प्रभाव विनाशकारी रहा। मार्च 2020 में सख्त तालाबंदी लगते ही स्कूल भी बंद कर दिए गए। और बंद पड़े स्कूल अब तक सबसे उपेक्षित मुद्दा रहा है। विश्व बैंक ने अपनी 2020 की रिपोर्ट बीटन ऑर ब्रोकन: इनफॉर्मेलिटी एंड कोविड-19 इन साउथ एशिया में पर्याप्त डैटा के साथ इस पर एक व्यापक विश्लेषण प्रकाशित किया है कि कैसे महामारी ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र को प्रभावित किया।

इस रिपोर्ट का एक दिलचस्प बिंदु है अर्थव्यवस्था पर स्कूल बंदी का प्रभाव। तालाबंदी की घोषणा के बाद से ही दक्षिण एशिया में स्कूल बंद हैं। भारत में भी मार्च 2020 से स्कूल बंद कर दिए गए थे। अधिकतर शहरी निजी स्कूलों ने ऑनलाइन शैली में कक्षाएं शुरू कर दी थीं। लेकिन सरकारी स्कूल अब भी कक्षाएं संचालित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि सुदूर और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच नहीं है या उसका खर्च वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। यह एक गंभीर मुद्दा है।

विश्व बैंक ने शायद पहली बार अपनी रिपोर्ट में स्कूल बंदी के प्रभावों के मौद्रिक आकलन की कोशिश की है। रिपोर्ट के नतीजे चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशियाई क्षेत्र में 39.1 करोड़ बच्चे स्कूलों से वंचित हुए जिसके कारण सीखने का गंभीर संकट पैदा हो गया है। महामारी के कारण 55 लाख बच्चे पढ़ाई छोड़ भी सकते हैं। इसके अलावा, स्कूल बंदी से स्कूली शिक्षा के 6 महीनों के समय का नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट कहती है कि स्कूल बंद होने से न केवल सीखने पर अस्थायी रोक लगती है, बल्कि छात्रों द्वारा पूर्व में सीखी गई चीज़ों को भूलने का भी खतरा होता है। इसका आर्थिक असर भी चौंकाने वाला है। स्कूल बंदी के परिणामस्वरूप दक्षिण एशियाई क्षेत्र को 622 अरब डॉलर से 880 अरब डॉलर तक का नुकसान होने का अंदेशा है।

रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में एक औसत बच्चे के वयस्क होने के बाद उसकी जीवन भर की कमाई में कुल 4400 डॉलर की कमी आएगी जो उसकी संभावित आमदनी का 5 प्रतिशत है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्तमान तालाबंदी से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान, वर्तमान में शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च से काफी अधिक है।

सामाजिक पतन

भारत और अन्य देशों में कई तरह के नस्लवाद ने लोगों को बांट दिया है। धर्म-आधारित घृणा, जाति आधारित भेदभाव और उत्तर-पूर्वी लोगों को कलंकित करना किसी भी अन्य भेदभाव के समान ही घातक है। अनभिज्ञ और पक्षपाती मीडिया और लोगों ने देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है और कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई को सामाजिक रूप से बहुत प्रभावित किया है। सार्स-कोव-2 वायरस को उसकी उत्पत्ति के चलते चीनी वायरस कहकर चीन के लोगों के साथ भेदभाव का माहौल बना। यह संवेदनशीलता के गिरते स्तर का द्योतक है। समाज ने तालाबंदी की यह एक और कीमत चुकाई है।

यदि उचित उपाय नहीं किए गए तो जातिवाद के विचार स्वाभाविक रूप से लोगों की मानसिकता में बने रहेंगे जो समाज की शांति और स्थिरता के लिए खतरा होगा। नस्लवाद के इस अदृश्य घातक वायरस से लड़ने के लिए व्यक्तिगत, सामुदायिक और सरकारी स्तर पर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के स्तर पर दीर्घकालिक नियोजन और सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। भारत में नेताओं को भाषा और मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। उन्हें समस्या के समाधान निकालने के प्रयास करने चाहिए न कि समाधान में अड़ंगा लगाना चाहिए।

निष्कर्ष

यहां हमने तालाबंदी की समाज द्वारा चुकाई गई कुछ कीमतों पर ध्यान दिया। लेकिन हमारे आसपास कई और भी मुद्दे हैं जो दिखते तो हैं लेकिन उपेक्षित रह जाते हैं। जैसे किराए की दुकान में अपना व्यवसाय करने वाले छोटे व्यवसाय, तालाबंदी में दुकान बंद रखने के कारण उनकी आय तो रुक गई लेकिन दुकान का किराया तो देना ही पड़ा होगा।

भले ही आकलन करना कठिन हो, लेकिन स्पष्ट है कि 2020 और 2021 दोनों में भारत के लॉकडाउन की सामाजिक कीमत काफी अधिक रही है। तालाबंदी जैसे कठोर उपायों को लागू करने से पहले व्यवस्थित योजना तालाबंदी की सामाजिक कीमत कम करने और लोगों का नुकसान कम करने व कम से कम असुविधा सुनिश्चित कर सकती है। यह सभी के लिए हितकर होगा कि हम अपनी गलतियों से सीखें, स्वास्थ्य व स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने पर अधिक ध्यान दें, चिकित्सा अध्ययन को प्रोत्साहित करने के तरीके खोजें, और यह सुनिश्चित करें कि हमारे डॉक्टर देश छोड़कर न जाएं।

तालाबंदी अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा की भरपाई का अंतिम उपाय है, महामारी का समाधान नहीं। ज़रूरत है कि समाज के कमज़ोर वर्गों को होने वाले नुकसान को कम से कम करने के लिए उचित योजना बनाई जाए, और स्वास्थ्य सेवा में भारी निवेश किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर से उत्पन्न होने पर हमें स्वास्थ्य के कमज़ोर ढांचे की वजह से तालाबंदी न करनी पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सूक्ष्मजीवों की मेहरबानी है चॉकलेटी स्वाद

च्चे ही नहीं हर उम्र के लोग चॉकलेट के शौकीन होते हैं। लेकिन शायद ही इसके शौकीनों को यह मालूम होता है कि चॉकलेट में यह स्वाद किण्वन के कारण आता है, जिसे सूक्ष्मजीव अंजाम देते हैं।

पेरू से लेकर बेल्जियम तक दुनिया भर की तमाम चॉकलेट प्रयोगशालाओं के स्व-घोषित चॉकलेट विज्ञानी यह समझने की कोशिश में हैं कि किण्वन चॉकलेट के स्वाद को कैसे बदलता है। इसके लिए कभी वे प्रयोगशाला में कृत्रिम किण्वन करते हैं, तो कभी प्रकृति में किण्वित ककाओ बीन के नमूनों का अध्ययन करते हैं। और प्रयोगशाला में चॉकलेट के कई नमूने तैयार कर वालंटियर्स से उनका स्वाद पूछते हैं।

इस तरह कई दशकों के अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने ककाओ के किण्वन के बारे में बारीकी से जानकारी हासिल की है, और इस किण्वन में शामिल और चॉकलेट का स्वाद और गुणवत्ता बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों के बारे में पता लगाया है।

चॉकलेट जिन बीजों से बनकर तैयार होती है उसके रग्बी फुटबॉल नुमा फल थियोब्राोमा ककाओ (Theobroma cacao) नामक पेड़ के तने पर लगते हैं। पेड़ों से तोड़कर इन चमकीले रंग के फलों को खोलकर अंदर से उनका गूदा और बीज निकाल कर अलग कर लिए जाते हैं। बीजों को बीन्स कहते हैं। इसके बाद उपचार के चरण में बीन्स को तीन से 10 दिन तक किण्वन के लिए छोड़ा जाता है। किण्वन होने के बाद इन्हें धूप में सुखाया जाता है और सूखे हुए बीन्स को भुना जाता है। इन्हें चीनी और कभी-कभी सूखे दूध के साथ इतना महीन होने तक पीसा जाता है कि मुंह में रखने पर दोनों के कण अलग-अलग महसूस न हों। इस रूप में आने के बाद यह मिश्रण चॉकलेट बार, चॉकलेट चिप्स या अन्य किसी भी रूप में चॉकलेट के उत्पाद बनाने के लिए तैयार होता है।

उपचार के चरण में बीन्स में कुदरती रूप से किण्वन होता है। वास्तव में चॉकलेट के स्वाद के लिए सैकड़ों तरह के यौगिक ज़िम्मेदार होते हैं, इनमें से कई यौगिक किण्वन की प्रक्रिया के दौरान ही बनते हैं और बेस्वाद बीन्स को चॉकलेटी स्वाद देते हैं।

ककाओ का किण्वन कई चरणों में होता है। किण्वन के लिए खमीर का उपयोग किया जाता है, इसमें कई बार बीयर और वाइन के किण्वन के लिए उपयोग किए जाने वाले खमीर का भी उपयोग किया जाता है। ककाओ के किण्वन के दौरान खमीर बीन्स से चिपके शर्करा पल्प को पचाकर एल्कोहल का निर्माण करते हैं। नतीजतन स्वाद प्रदान करने वाले एस्टर और फूल की खुशबू वाले एल्कोहल बनते हैं, जो ककाओ बीन्स द्वारा सोख लिए जाते हैं और अंत तक चॉकलेट में मौजूद रहते हैं।

जब बीन्स से चिपका गूदा विघटित होने लगता है तो उसमें ऑक्सीजन प्रवेश करती है। ऑक्सीजन के प्रवेश करने पर वहां ऑक्सीजन-प्रेमी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने लगती है और खमीर की आबादी में कमी आने लगती है। इन ऑक्सीजन-प्रेमी बैक्टीरिया को एसिटिक एसिड बैक्टीरिया के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये खमीर द्वारा बनाए गए एल्कोहल को एसिटिक एसिड में परिवर्तित करते हैं।

बैक्टीरिया द्वारा बनाया गया यह एसिड भी बीन्स द्वारा सोख लिया जाता है, जो बीजों में जैव-रासायनिक परिवर्तन लाता है। इसकी वजह से वसा एकत्रित होने लगती है। कुछ एंज़ाइम प्रोटीन को छोटे-छोटे पेप्टाइड्स में तोड़ देते हैं, जो भुनने के दौरान ‘चॉकलेटी’ महक देते हैं। कुछ अन्य एंज़ाइम ऑक्सीकरण-रोधी पोलीफेनॉल, जिसके लिए चॉकलेट प्रसिद्ध है, को तोड़ देते हैं। नतीजतन, इसकी खासियत के विपरीत, अधिकांश चॉकलेट में बहुत कम पोलीफेनॉल्स होते हैं, किसी-किसी चॉकलेट में तो पोलीफेनॉल्स होते ही नहीं।

एसिटिक एसिड बैक्टीरिया द्वारा रोक दी गई प्रक्रियाओं के कारण चॉकलेट के स्वाद पर बड़ा असर पड़ता है। इन एसिड के कारण ही अत्यंत कड़वे, गहरे बैंगनी रंग के पोलीफेनॉल अणु मद्धम स्वाद वाले, भूरे रंग के ओ-क्विनोन रसायन में बदलते हैं। और इसी जगह आकर ककाओ बीन्स कड़वे स्वाद से एक समृद्ध और चॉकलेटी स्वाद में आ जाते हैं। स्वाद के साथ-साथ रंग में भी परिवर्तन आता है और लाल-बैंगनी रंग के बीन्स भूरे रंग के हो जाते हैं, यानी चॉकलेट यहां अपना रंग पाती है। अंत में, एसिड धीरे-धीरे वाष्पित हो जाते हैं और शर्करा उपयोग हो जाती है। फिर अन्य सूक्ष्मजीव जैसे कवक और बेसिलस बैक्टीरिया अपना काम शुरू करते हैं।

चॉकलेट बनने में सूक्ष्मजीव जितने अहम होते हैं, कभी-कभी वे चॉकलेट का उतना ही नाश भी कर डालते हैं। बेसिलस बैक्टीरिया की संख्या में अत्यधिक वृद्धि चॉकलेट को बासा और बेकार स्वाद देती है।

ककाओ के किण्वन के लिए किसान प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों पर निर्भर होते हैं ताकि चॉकलेट को अपना अनूठा और स्थानीय स्वाद मिले। इसे ‘टेरोइर’ कहा जाता है: यानी किसी स्थान के कारण आने वाली विशेषता या स्वाद। ठीक अंगूर के किण्वन की तरह, ककाओ के मामले में भी स्थानीय सूक्ष्मजीव किसान के अपने अनूठे तरीके के साथ मिलकर चॉकलेट को स्थानीय विशेषता और भिन्न स्वाद प्रदान करते हैं।

यदि आप चॉकलेट के इतने अलग-अलग स्वादों से महरूम हैं तो कभी इनका भी आंनद लीजिए और सूक्ष्मजीवों की इस मेहनत को भी दाद दीजिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टीके से जुड़े झूठे प्रचार को रोकने की पहल

हाल ही में ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ऐसे अकाउंट्स को निलंबित या बंद कर दिया है जो नियमित रूप से कोविड-19 टीकों से जुड़ी भ्रामक जानकारी फैला रहे थे। इसी तरह की एक पहल के तहत अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोविड-19 टीके के बारे में भ्रामक जानकारियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।

कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है भ्रामक खबरों के परिणामस्वरूप अमेरिका की 20 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या टीकाकरण के विरोध में है। शोधकर्ता सोशल मीडिया पर टीके से सम्बंधित गलत सूचनाओं को ट्रैक करने और भ्रामक सूचनाओं, राजनैतिक बयानबाज़ी और जन नीतियों से टीकाकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का डैटा एकत्र कर रहे हैं। इन भ्रामक सूचनाओं में षड्यंत्र सिद्धांत काफी प्रचलित है जिसके अनुसार महामारी को समाज पर नियंत्रण या अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने के लिए बनाया-फैलाया गया है। यहां तक कहा जा रहा है कि टीका लगवाना जोखिम से भरा और अनावश्यक है।

इस संदर्भ में वायरेलिटी प्रोजेक्ट नामक समूह ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफार्म द्वारा टीकों से जुड़ी गलत जानकारियों से निपटने के प्रयासों में तथा जन स्वास्थ्य एजेंसियों और सोशल-मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन करने वालों की पहचान करने में मदद कर रहा है।

स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी की अनुसंधान प्रबंधक रिनी डीरेस्टा के अनुसार शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के संदर्भ में भ्रामक प्रचार के चलते सार्वजनिक नुकसान की आशंका के कारण इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियां सभी मामलों में तो सच-झूठ की पहरेदार नहीं बन सकती लेकिन नुकसान की संभावना को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन अनिवार्य है।

फरवरी में ट्विटर, फेसबुक (इंस्टाग्राम समेत) ने झूठे दावों को हटाने के प्रयासों को विस्तार दिया है। दोनों ही कंपनियों ने घोषणा की है कि झूठी खबरें फैलाने वाली पोस्ट और ट्वीट को हटाया जाएगा और बार-बार नीतियों का उल्लंघन करने वालों के अकाउंट्स बंद भी कर दिए जाएंगे।

यह देखा गया है कि वेब पर गलत जानकारी अपेक्षाकृत थोड़े-से लोगों (सुपरस्प्रेडर्स) द्वारा फैलाई जाती है। इनमें अक्सर पक्षपाती मीडिया, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल होती हैं।  

गौरतलब है कि कोविड-19 के बारे में लोगों की सोच का अनुमान लगाने के लिए बोस्टन स्थित नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी, मेसाचुसेट्स के राजनीति वैज्ञानिक डेविड लेज़र के नेतृत्व में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में प्रति माह 25,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और साथ ही ट्विटर का उपयोग करने वाले 16 लाख लोगों की जानकारी भी एकत्रित की जा रही है। 

फरवरी में लगभग 21 प्रतिशत लोगों ने टीकाकरण करवाने से इनकार किया। स्वास्थ्य कर्मियों में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत था। देखा गया कि इस फैसले के पीछे शिक्षा का स्तर एक मुख्य कारक रहा। टीम यह समझने का प्रयास कर रही है कि स्वास्थ्य सम्बंधी गलत जानकारी का सामना करने में कौन-सी चीज़ें प्रभावी हो सकती हैं। लगता है कि डॉक्टर और वैज्ञानिकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है जबकि पक्षपातपूर्ण राजनीतिक नेताओं के संदेशों पर विश्वास की संभावना कम होती है। ऐसे में डॉक्टर की सकारात्मक सलाह लोगों की पसंद को प्रभावित कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मध्यकालीन प्रसव-पट्टे के उपयोग के प्रमाण

ध्ययुग में प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मृत्यु होना काफी आम बात थी। इस समय के ग्रंथों में सुरक्षित गर्भावस्था और प्रसव के लिए अभिमंत्रित कमरबंद का उल्लेख काफी मिलता है। लेकिन वास्तव में ऐसी बातों पर अमल किया जाता था या नहीं यह जानकारी नहीं थी। हाल ही में शोधकर्ताओं ने इंग्लैंड में मिले 15वीं शताब्दी के एक कमरबंद का विश्लेषण करके इस बात की पुष्टि की है कि मध्य काल में महिलाएं गर्भावस्था में अपनी और अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए इस तरह के कमरबंद सचमुच पहना करती थीं। और तो और, वे प्रसव के दौरान भी इसे बांधे रखती थीं।

प्राप्त कमरबंद (जिसे नाम दिया गया है पांडुलिपि-632) भेड़ की खाल से बना लगभग 332 सेंटीमीटर लंबा और 10 सेंटीमीटर चौड़ा चर्मपत्र था। इस पर धार्मिक प्रतीक और मंत्र अंकित थे। इसकी लंबाई-चौड़ाई देखकर लगता है कि इसे शरीर पर लपेटा जाता होगा। प्रसव से सम्बंधित संतों और पैगंबरों के नामों के अलावा इस कमरबंद पर अंकित था: ‘यदि कोई महिला प्रसव या गर्भवास्था के दौरान कमरबंद पहनेगी तो यह उसके गर्भ की रक्षा करेगा और बिना किसी परेशानी के सुरक्षित प्रसव कराएगा।’

यह जानने के लिए कि क्या चिकित्सा ग्रंथों में उल्लेखित प्रसव प्रथाएं वाकई में अमल में लाई जाती थीं, युनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज की सारा फिडीमेंट ने कमरबंद पर पड़े धब्बों का विश्लेषण किया। उन्होंने इरेज़र की मदद से नाज़ुक कमरबंद पर संरक्षित धब्बों को इस तरह हल्के-हल्के रगड़ कर छुड़ाया कि कमरबंद को कोई क्षति न पहुंचे। फिर इन नमूनों में विभिन्न तरह के प्रोटीन की पहचान की। प्राप्त परिणामों की तुलना उन्होंने एक नए चर्मपत्र और 18वीं शताब्दी के चर्मपत्र के नमूनों के साथ की। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस में शोधकर्ता बताते हैं कमरबंद पर शहद, दूध, अंडे, अनाज, फलियां और विभिन्न मानव प्रोटीन के निशान मिले। और इनमें से कई मानव प्रोटीन ग्रीवा-योनि द्रव के प्रोटीन थे, जिससे लगता है कि महिलाएं प्रसव के दौरान इसे पहने रखती थीं।

इसके अलावा ग्रंथों में गर्भवती महिला के लिए जिस तरह के खान-पान का उल्लेख मिलता है, कमरबंद पर उसी तरह के खाद्यों के प्रोटीन की पहचान हुई है। ये इस बात का संकेत देते हैं कि ग्रंथों में उल्लेखित प्रथाओं को गंभीरता से अमल में लाया जाता था।

इस संदर्भ में अन्य शोधकर्ता बताते हैं कि महिलाओं के प्रसव के प्रति सजगता यूं ही नहीं बढ़ी होगी। दरअसल 1300 के दशक में युरोप में प्लेग फैलने के बाद वहां की आबादी में कमी आई थी, इसलिए सुरक्षित प्रसव के तरीके पहचानना और उन्हें अमल में लाना महत्पूर्ण रहा होगा।

वैसे यह अध्ययन मध्यकालीन प्रसव प्रथाओं के बारे में कोई नई जानकारी नहीं देता लेकिन यह बताता है कि प्राचीन पांडुलिपियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके उनके उपयोग के बारे में पुष्टि की जा सकती है। इंग्लैंड और फ्रांस से इस तरह के लगभग एक दर्जन चर्मपत्र मिले हैं, जिसमें से कुछ प्रसव के दौरान उपयोग किए जाते होंगे जबकि कुछ का उपयोग सर्वार्थ सिद्धि तावीज़ या रक्षा कवच की तरह किया जाता होगा। जैसे युद्ध में जाने वाले पुरुषों की रक्षा के लिए। इन चर्मपत्रों पर मौजूद प्रोटीन या चिकित्सा पांडुलिपियों पर पड़े धब्बों के प्रोटीन की पहचान करके यह भी पता किया जा सकता है कि क्या ऑपरेशन टेबल पर शल्य क्रिया के दौरान उन्हें खोलकर रखा जाता था। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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