क्या मौत की चेतावनी से दुर्घटनाएं टलती हैं?

पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने हाइवे के किनारे लगे इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर उस सड़क पर हुई सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या दर्शाना शुरू किया था ताकि लोग इन आकड़ों से सबक लेकर सुरक्षित तरीके से गाड़ी चलाएं और सड़क हादसे कम हों। लेकिन एक नया विश्लेषण बताता है कि हाइवे पर ऐसे संकेतों से दुर्घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ सकती हैं।

इसके पीछे सोच यह थी कि वाहन चालकों का ध्यान इन दुर्घटनाओं की तरफ आकर्षित होगा जो उन्हें जोखिम भरी ड्राइविंग न करने के लिए प्रेरित करेगा। टेक्सास प्रांत में 2012 से लगातार वर्ष भर में सड़क हादसों में हुई मौतों को दर्शाया जा रहा है। लेकिन इसके असर का कभी बारीकी से अध्ययन नहीं किया गया था।

इन चेतावनियों का असर जानने के लिए मिनेसोटा युनिवर्सिटी के बिहेवियरल इकॉनॉमिस्ट जोशुआ मैडसन और युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के परिवहन अर्थशास्त्री जोनाथन हॉल ने मिलकर अध्ययन किया।

हाइवे पर सड़क दुर्घटना में हुई मृत्यु के आंकड़े दर्शाने की प्रत्येक राज्य की नीति अलग है। कई राज्य दिन के केवल सुरक्षित समय ही ये आंकड़े दिखाते हैं, भीड़-भाड़ के समय नहीं जब अन्य ट्रैफिक संदेश दिखाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन टेक्सास पर केंद्रित किया, जहां राजमार्गों पर लगे 880 साइन बोर्ड्स पर हर महीने लगातार एक सप्ताह के लिए ये आंकड़ें प्रदर्शित किए जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 2010 से 2017 के बीच प्रभावित सड़कों पर हुई सभी सड़क दुर्घटनाओं का डैटा इकट्ठा किया। उन्होंने बोर्ड पर मृत्यु के आंकड़े दर्शाए जाने वाले हफ्ते में हुई दुर्घटनाओं की तुलना बाकी महीने में हुई दुर्घटनाओं की संख्या से की। तुलना करते समय उन्होंने ध्यान रखा हफ्ते के समान दिन (जैसे मंगलवार) और समान घंटे में होने वाली दुर्घटनाओं के बीच तुलना की जाए। उन्होंने तुलना में मौसम और छुट्टियों जैसे कारकों को भी नियंत्रित किया, जो अपने आप में दुर्घटनाओं की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं।

साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में 8,44,939 दुर्घटनाओं का विश्लेषण करने पर पता चला है कि जिस दौरान सड़क मौतों की संख्या प्रदर्शित की गई उस दौरान साइन बोर्ड से 10 किलोमीटर आगे तक के मार्ग पर होने वाली दुर्घटनाओं में 1.35 प्रतिशत की वृद्धि हुई। शोधकर्ताओं का मत है कि वाहन चलाते समय मौत के आंकड़े दिखने पर वाहन चालक का ध्यान बहुत अधिक विचलित होता है, नतीजतन दुर्घटना होती है।

अन्य शोधकर्ताओं को लगता है कि अधिक मृत्यु संख्या के प्रदर्शन के समय अधिक हादसों की बात ठीक नहीं लगती, क्योंकि वाहन चालक वास्तव में मौतों की संख्या के आधार पर अलग-अलग तरह से सोचते नहीं होंगे। सड़क हादसों में वृद्धि के कारण जानने के लिए और शोध की ज़रूरत है। बहरहाल, यह अध्ययन इतना तो बताता ही है कि चेतावनी संदेश सड़क हादसों में कमी लाने में कारगर नहीं हैं। यह पता लगाने की ज़रूरत है कि किस तरह के संदेश सुरक्षित ड्राइविंग को प्रेरित करेंगे, ताकि दुर्घटनाओं को रोका जा सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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3000 साल पुरानी पतलून इंजीनियरिंग का चमत्कार है

हाल ही में एक विशेषज्ञ बुनकर की मदद से पुरातत्वविदों ने दुनिया की सबसे पुरानी (लगभग तीन हज़ार साल पुरानी) पतलून की डिज़ाइन के रहस्यों को उजागर किया है। प्राचीन बुनकरों ने कई तकनीकों की मदद से घोड़े पर बैठकर लड़ने के लिए इस पतलून को तैयार किया था – पतलून इस तरह डिज़ाइन की गई थी कि यह कुछ जगहों पर लचीली थी और कुछ जगहों पर चुस्त/मज़बूत।

यह ऊनी पतलून पश्चिमी चीन में 1000 और 1200 ईसा पूर्व के बीच दफनाए गए एक व्यक्ति (जिसे अब टर्फन मैन कहते हैं) की थी, जो उसे दफनाते वक्त पहनाई गई थी। उसने ऊन की बुनी हुई पतलून के साथ पोंचों पहना था जिसे कमर के चारों ओर बेल्ट से बांध रखा था, टखने तक ऊंचे जूते पहने थे, और उसने सीपियों और कांसे की चकतियों से सजा एक ऊनी शिरस्त्राण पहना था।

पतलून का मूल डिज़ाइन आजकल के पतलून जैसा ही था। कब्र में व्यक्ति के साथ प्राप्त अन्य वस्तुओं से लगता है कि वह घुड़सवार योद्धा था।

दरअसल घुड़सवारों के लिए इस तरह की पतलून की ज़रूरत थी जो इतनी लचीली हो कि घोड़े पर बैठने के लिए पैर घुमाते वक्त कपड़ा न तो फटे और न ही तंग हो। साथ ही घुटनों पर अतिरिक्त मज़बूती की आवश्यकता थी। यह कुछ हद तक पदार्थ-विज्ञान की समस्या थी कि कपड़ा कहां लोचदार चाहिए और कहां मज़बूत और ऐसा कपड़ा कैसे बनाया जाए जो दोनों आवश्यकताओं को पूरा करे?

लगभग 3000 साल पहले चीन के बुनकरों ने सोचा कि पूरे कपड़े को एक ही तरह के ऊन/धागे से बुनते हुए विभिन्न बुनाई तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।

जर्मन आर्कियोलॉजिकल इंस्टीट्यूट की पुरातत्वविद मेयके वैगनर और उनके साथियों ने इस प्राचीन ऊनी पतलून का बारीकी से अध्ययन किया। बुनाई तकनीकों को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक आधुनिक बुनकर से प्राचीन पतलून की प्रतिकृति बनवाई गई।

उन्होंने पाया कि अधिकांश पतलून को ट्विल तकनीक से बुना गया था जो आजकल की जींस में देखा जा सकता है। इस तरीके से बुनने में कपड़े में उभरी हुई धारियां तिरछे में समानांतर चलती है, और कपड़ा अधिक गसा और खिंचने वाला बनता है। खिंचाव से कपड़ा फटने की गुंज़ाइश को और कम करने के लिए पतलून के कमर वाले हिस्से को बीच में थोड़ा चौड़ा बनाया गया था।

लेकिन सिर्फ लचीलापन ही नहीं चाहिए था। घुटनों वाले हिस्से में मज़बूती देने के लिए एक अलग बुनाई पद्धति (टेपेस्ट्री) का उपयोग किया गया था। इस तकनीक से कपड़ा कम लचीला लेकिन मोटा और मज़बूत बनता है। कमरबंद के लिए तीसरे तरह की बुनाई तकनीक उपयोग की गई थी ताकि घुड़सवारी के दौरान कोई वार्डरोब समस्या पैदा न हो।

और सबसे बड़ी बात तो यह है पतलून के ये सभी हिस्से एक साथ ही बुने गए थे, कपड़े में इनके बीच सिलाई या जोड़ का कोई निशान नहीं मिला।

टर्फन पतलून बेहद कामकाजी होने के साथ सुंदर भी बनाई गई थी। जांघ वाले हिस्से की बुनाई में बुनकरों ने सफेद रंग पर भूरे रंग की धारियां बनाने के लिए अलग-अलग रंगों के धागों का बारी-बारी उपयोग किया था। टखनों और पिण्डलियों वाले हिस्सों को ज़िगज़ैग धारियों से सजाया था। इस देखकर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि टर्फनमैन संस्कृति का मेसोपोटामिया के लोगों के साथ कुछ वास्ता रहा होगा।

पतलून के अन्य पहलू आधुनिक कज़ाकस्तान से लेकर पूर्वी एशिया तक के लोगों से संपर्क के संकेत देते हैं। घुटनों पर टेढ़े में बनीं इंटरलॉकिंग टी-आकृतियों का पैटर्न चीन में 3300 साल पुराने एक स्थल से मिले कांसे के पात्रों पर बनी डिज़ाइन और पश्चिमी साइबेरिया में 3800 से 3000 साल पुराने स्थल से मिले मिट्टी के बर्तनों पर बनी डिज़ाइन से मेल खाते हैं। पतलून और ये पात्र लगभग एक ही समय के हैं लेकिन ये एक जगह पर नहीं बल्कि एक-दूसरे से लगभग 3,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे।

पतलून के घुटनों को मज़बूती देने वाली टेपेस्ट्री बुनाई सबसे पहले दक्षिण-पश्चिमी एशिया में विकसित की गई थी। ट्विल तकनीक संभवतः उत्तर-पश्चिमी एशिया में विकसित हुई थी।

दूसरे शब्दों में, पतलून का आविष्कार में हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित संस्कृतियों की विभिन्न बुनाई तकनीकों का मेल है। भौगोलिक परिस्थितियों और खानाबदोशी के कारण यांगहाई, जहां टर्फनमैन को दफनाया गया था, के बुनकरों को इतनी दूर स्थित संस्कृतियों से संपर्क का अवसर मिला होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक मकबरे के रहस्य की गंध

दो प्राचीन मिस्रवासियों को दफनाने के 3400 से अधिक वर्षों के बाद, उनके साथ दफनाए गए भोजन भरे मर्तबानों से अब तक मीठी गंध आ रही थी। हाल ही में रसायनज्ञों और पुरातत्ववेत्ताओं के दल ने इन गंधों का विश्लेषण करके पता लगाने की कोशिश की है कि इनमें क्या रखा गया था। यह अध्ययन गंध के पुरातत्व के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है।

1906 में लक्सर के निकट दायर अल-मदीना कब्रिस्तान से खा और मेरिट के साबुत मकबरे खोदे गए थे। ‘मुकद्दम’ या वास्तुकार रहे खा और उनकी पत्नी मेरिट का मकबरा मिस्र का अब तक का सबसे पूर्ण गैर-शाही प्राचीन मकबरा है, जो बताता है कि मृत्यु के बाद उच्च वर्ग के लोगों के साथ क्या किया जाता था। इस मकबरे में अद्भुत चीज़ों का संग्रह है। यहां तक कि मकबरे में खा के लिनेन के अंत:वस्त्र भी हैं, जिन पर उसके नाम की कढ़ाई की गई है।

लेकिन खुदाई के समय मकबरे की खोज करने वाले पुरातत्वविदों ने ममियों को खोलने या उनके साथ दफन सीलबंद सुराही, मर्तबान और जग को खोलने से खुद को रोके रखा, यहां तक कि इन्हें इटली के मिस्री संग्रहालय में रखे जाने के बाद भी इनका अध्ययन नहीं किया। इनमें से कई पात्रों में क्या रखा था/है यह अब भी रहस्य है। हालांकि इनमें क्या होगा इसके कुछ संकेत मिलते हैं। एक मत है कि इनमें से कुछ पात्रों में फलों की महक थी।

महक के विश्लेषण के लिए युनिवर्सिटी ऑफ पीसा की रसायनज्ञ इलारिया डिगानो और उनके साथियों ने सीलबंद मर्तबान और प्राचीन भोजन के अवशेष लगी कड़छी सहित विभिन्न वस्तुओं को प्लास्टिक की थैलियों में बंद करके रखा ताकि इनमें से निकलने वाले वाष्पशील अणुओं को इकट्ठा किया जा सके। प्राप्त नमूनों का मास स्पेक्ट्रोमेट्री अध्ययन करने पर एल्डिहाइड और लंबी शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन मिले, जो इनमें मधुमक्खी के छत्ते का मोम होने का संकेत देते हैं; ट्राइमेथिलअमीन मिला जो सूखी मछली की उपस्थिति दर्शाता है; और फलों में आम तौर पर मौजूद अन्य एल्डिहाइड मिले। इन नतीजों को मकबरे से मिली सामग्रियों के पुन:विश्लेषण करने की एक बड़ी परियोजना में शामिल किया जाएगा, जिससे खा और मेरिट के काल में (तुतनखामुन के तख्तनशीं होने से लगभग 70 साल पहले) गैर-शाही लोगों को दफनाने के रीति-रिवाजों की एक अधिक व्यापक तस्वीर मिलेगी।

वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सुगंधित यौगिकों ने प्राचीन मिस्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। वर्ष 2014 में, शोधकर्ताओं ने 6300 और 5000 साल पुरानी लिनेन की पट्टियों से वाष्पशील अणु प्राप्त किए थे। इन पट्टियों का उपयोग मिस्र के कुछ सबसे प्राचीन ज्ञात कब्रिस्तानों के शवों को लपेटने के लिए किया गया था। इन अणुओं से जीवाणुरोधी गुणों वाले लेप की उपस्थिति की पुष्टि हुई थी, अर्थात मिस्र के लोग अनुमान से लगभग 1500 साल पहले से ममीकरण का प्रयोग कर रहे थे।

लेकिन अब भी पुरातत्व में गंध विश्लेषण पर इतना काम नहीं हो रहा है। पुरावेत्ताओं द्वारा वाष्पशील अणुओं/यौगिकों को यह मानकर नज़रअंदाज़ किया जाता है कि ये तो उड़ गए होंगे। लेकिन प्राचीन मिस्रवासियों को अच्छे से समझने के लिए गंध की दुनिया में उतरना होगा। उदाहरण के लिए, यही देखें कि सुगंधित रेज़िन (राल) से प्राप्त सुगंधित धूप/अगरबत्ती प्राचीन मिस्रवासियों के लिए अहम थी। उनके धार्मिक अनुष्ठानों और अंतिम संस्कार की कुछ रस्मों में धूप/अगरबत्ती अवश्य होती थी। चूंकि मिस्र में राल पैदा करने वाले पेड़ नहीं उगते थे, इसलिए सुंगधित राल प्राप्त करने के लिए वे लंबी दूरी तय करते होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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गुमशुदा मध्ययुगीन साहित्य की तलाश

हाल ही में युनिवर्सिटी ऑफ एंटवर्प के कंप्यूटेशनल टेक्स्ट शोधकर्ता माइक केस्टेमोंट और उनके सहयोगियों ने गुमशुदा मध्ययुगीन रचनाओं का पता लगाने का प्रयास किया। गौरतलब है कि युरोप के मध्ययुग, यानी छठी सदी की शुरुआत से लेकर 15वीं सदी के अंत, के दौरान काफी कथा साहित्य रचा गया था। साहित्याकरों ने राक्षसों से लड़ते शूरवीरों और उनकी विदेश यात्राओं की कहानियां लिखीं जो आजकल की एक्शन फिल्मों जैसी थीं। उदाहरण के लिए, नीदरलैंड में 13वीं सदी में मैडॉक नामक एक पात्र रचा गया था जो संभवतः एक कविता का शीर्षक था लेकिन किसी को उस कविता की विषयवस्तु के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 

गुमशुदा रचनाओं का पता ऐसे चलता है कि अन्य लेखक अपनी रचनाओं में उनका ज़िक्र करते हैं। कभी-कभी प्राचीन कैटलॉग पुस्तकों की उपस्थिति दर्शाते हैं। लेकिन इन रचनाओं में से एक अंश ही आज उपलब्ध है। गौरतलब है कि प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से किसी भी कृति की ढेर सारी प्रतियां नहीं होती थीं। ऐसे में यदि कोई विशेष रचना आग से नष्ट हो जाए या कीड़ों द्वारा खा ली जाए तो वह हमेशा के लिए खो जाएगी।

तो यह अनुमान लगाने के लिए कि वास्तव में कितनी रचनाएं रही होंेगी, इतिहासकार अपूर्ण प्राचीन पुस्तक कैटलॉग की तुलना वर्तमान ग्रंथों और उनके दायरे से करते हैं। इस संदर्भ में अतीत में मौजूद रहे साहित्य का बेहतर अनुमान लगाने के लिए केस्टेमोंट और उनके सहयोगियों ने “अनदेखी प्रजाति” मॉडल नामक तकनीक का उपयोग किया जिसका विकास किसी पारिस्थितिक तंत्र में अनदेखी प्रजातियों का पता लगाने के लिए किया गया था।

इसका विकास नेशनल त्सिंग हुआ युनिवर्सिटी की सांख्यिकीविद एनी चाओ द्वारा किया गया है। इसमें सांख्यिकी तकनीकों का उपयोग करते हुए वास्तविक मैदानी गणना के आंकड़ों के आधार पर उन प्रजातियों का अनुमान लगाया जाता है जो उपस्थित तो हैं लेकिन वैज्ञानिकों की नज़रों में नहीं आईं।

माइक केस्टेमोंट और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन के लिए 600 से 1450 के दौरान डच, फ्रेंच, आइसलैंडिक, आयरिश, अंग्रेज़ी और जर्मन में लिखी गई वर्तमान में उपलब्ध और संदिग्ध गुमशुदा मध्ययुगीन ग्रंथों की सूची को देखा। कुल रचनाओं की संख्या 3648 थी। साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अनदेखी प्रजाति मॉडल ने बताया कि मध्ययुगीन ग्रंथों के केवल 9 प्रतिशत ग्रंथ वर्तमान समय में उपलब्ध हैं। यह आंकड़ा 7 प्रतिशत के पारंपरिक अनुमानों के काफी करीब है। अलबत्ता, इस नए अध्ययन ने क्षेत्रीय वितरण उजागर किया। इस मॉडल के अनुसार अंग्रेज़ी के केवल 5 प्रतिशत जबकि आइसलैंडिक और आयरिश के क्रमशः 17 प्रतिशत और 19 प्रतिशत टेक्स्ट आज के समय में उपलब्ध हैं।

इस तकनीक के इस्तेमाल की काफी सराहना की जा रही है। आने वाले समय में इस तकनीक का उपयोग सामाजिक विज्ञान और मानविकी में भी किया जा सकता है।

बहरहाल, हारवर्ड युनिवर्सिटी में मध्ययुगीन सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन करने वाले डेनियल स्मेल का कहना है कि यह मॉडल सिद्धांतकारों और सांख्यिकीविदों का खेल है। स्मेल के अनुसार लेखकों ने मान लिया है कि सांस्कृतिक रचनाएं सजीव जगत के नियमों का पालन करती हैं। और तो और, इस अध्ययन से कोई अतिरिक्त जानकारी भी नहीं मिल रही है। (स्रोत फीचर्स)

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शिशु जानते हैं जूठा खा लेने वाला अपना है

जिनके साथ हमारे आत्मीय या अंतरंग सम्बंध होते हैं, आम तौर पर उनका जूठा खाने में हमें कोई हिचक नहीं होती। अब एक ताज़ा अध्ययन बताता है कि 8 महीने के शिशु भी इस बात को समझते हैं। जब शिशुओं को कठपुतली या कार्टून चरित्र को जूठा खिलाते दिखाया गया तो वे यह अनुमान लगाने में सक्षम थे कि इन चरित्रों के बीच करीबी नाता है।

मनुष्य विविध तरह के रिश्ते बनाते हैं। जीवित रहने और पलने-बढ़ने के लिए शिशुओं को इन रिश्तों में से ‘सबसे प्रगाढ़’ रिश्ते को पहचानने की ज़रूरत होती है – ऐसे रिश्ते जो खुद से बढ़कर उनके पालन-पोषण और सुरक्षा पर ध्यान दें। लंबे समय से वैज्ञानिक इस बात को लेकर हैरत में हैं कि बच्चे कब यह समझ विकसित कर लेते हैं।

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी की मनोवैज्ञानिक एशले थॉमस ने सोचा कि इसका पता शायद नृविज्ञान अनुसंधान में मिले। दुनिया भर की संस्कृतियों के अध्ययन में देखा गया है कि सबसे अंतरंग सम्बंध वाले लोगों को एक-दूसरे की लार (जूठा खाने, चुंबन वगैरह के माध्यम से) और अन्य शारीरिक तरल से हिचक नहीं लगती। उन्हें यकीन था कि छोटे बच्चे भी इस बात को समझते होंगे। इसके लिए उनके दल ने कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म पर लगभग 400 बच्चों के साथ कुछ अध्ययन किए।

पहले अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 5 से 7 साल के बच्चों को कुछ कार्टून दृश्य दिखाए। एक तरह के दृश्य में मैदान में खड़ी एक बच्ची या तो स्ट्रॉ से जूस पी रही थी या आइसक्रीम खा रही थी; दूसरे में, वह कूदने की रस्सी या कोई खिलौना पकड़े हुए थी। अगले दृश्य में कोई परिजन और एक शिक्षक या मित्र शामिल हो जाता है। ये तस्वीरें दिखाने के बाद बच्चों से पूछा गया कि कार्टून चरित्र को किसके साथ अपनी जूठी आइसक्रीम या जूस साझा करना चाहिए तो बच्चों ने 74 प्रतिशत मामलों में रिश्तेदार को चुना; गैर-जूठी चीज़ों के मामले में रिश्तेदार और अन्य को बराबर तरजीह दी। ये निष्कर्ष साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

दूसरे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने और भी छोटे बच्चों (8-19 माह) को शामिल किया। बच्चों को एक वीडियो दिखाया गया जिसमें एक गुड़िया किसी व्यक्ति के साथ संतरे की एक फांक बांट कर खा रही थी और दूसरे व्यक्ति के साथ गेंद खेल रही थी। फिर गुड़िया अचानक परेशानी भरे स्वर में चीख उठती है। गुड़िया के चीखने पर लगभग 80 प्रतिशत शिशुओं ने उस व्यक्ति की ओर देखा जिसके साथ गुड़िया ने जूठा साझा किया था – संभवतः इस उम्मीद में कि वह व्यक्ति उसे मुसीबत से बचाएगा। यही प्रतिक्रिया लार साझा करने के अन्य मामलों में भी दिखी, जैसे जब व्यक्ति ने गुड़िया के मुंह में अपनी उंगली डाली।

युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के एलन फिस्क का कहना है कि यह अध्ययन यह समझने की ओर एक कदम है कि शिशु बोलना शुरू करने से पहले सामाजिकता के बारे में क्या-क्या जानते हैं। हालांकि, जूठा खाने के अलावा अन्य व्यवहारों से भी शिशुओं को गाढ़े रिश्तों का अनुमान मिल सकता है। जैसे एक ही बिस्तर पर सोना, गले लगाना और अंतरंग स्पर्श। (स्रोत फीचर्स)

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मस्तिष्क बड़ा होने में मांसाहार की भूमिका

ब मांसाहार की बात आती है, तो हमारे सबसे करीबी सम्बंधी चिम्पैंज़ी हमारी तुलना में बहुत ही कम मांस खाते हैं।

पुरातात्विक स्थलों पर पाए गए बूचड़खानों के निशानों की संख्या के आधार पर लंबे समय से कहा जाता रहा है कि हमारी मांस खाने की उत्कट इच्छा लगभग 20 लाख साल पहले बढ़ना शुरू हुई थी। मांस से मिलने वाली अधिक कैलोरी ने हमारे एक पूर्वज – होमो इरेक्टस – में बड़ा शरीर और मस्तिष्क विकसित करने की शुरुआत की थी।

लेकिन एक ताज़ा अध्ययन का तर्क है कि इस परिकल्पना के प्रमाण सांख्यिकीय रूप से कमज़ोर हैं क्योंकि शोधकर्ताओं ने बाद के समय के खुदाई स्थलों पर अधिक ध्यान दिया है। इसलिए यह जानना असंभव है कि मानव विकास में मांसाहार की भूमिका कितनी अहम है।

नए अध्ययन में जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के जीवाश्म विज्ञानी डब्ल्यू. एंड्र्यू बार और उनके साथियों ने बूचड़खानों पर पूर्व में किए गए अध्ययनों के डैटा की समीक्षा की। ये डैटा 26 लाख से 12 लाख साल पूर्व के कालखंड के पूर्वी अफ्रीका में प्रारंभिक मानव गतिविधि वाले नौ पुरातात्विक स्थलों से थे। जैसी कि उम्मीद थी जानवरों की हड्डियों पर वध के निशान वाले साक्ष्य मिलने में वृद्धि लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व से दिखना शुरू हुई। लेकिन, शोधकर्ताओं ने पाया कि पुरातत्वविदों को पशु वध के साक्ष्य उन स्थलों पर अधिक मिले जहां अधिक शोध किया गया था। दूसरे शब्दों में, जिस स्थल पर जितना अधिक ध्यान दिया गया, वहां मांसाहार के साक्ष्य मिलने की संभावना उतनी अधिक रही।

प्रत्येक पुरातात्विक स्थल में तलछट की कई परतें होती हैं; जितनी परत नीचे जाते जाएंगे उनमें उतनी अधिक प्राचीन वस्तुएं मिलेंगी। साफ है कि 25 लाख से 20 लाख साल पुरानी परतों को उतना नहीं खोदा गया है या उनमें दफन चीज़ों को बाहर नहीं निकाला गया है जितना कि उनके बाद वाली परतों को खोदा गया है, और इसी कारण प्राचीनतर परतों का अध्ययन कम किया गया है। पुरातत्वविद किसी खुदाई स्थल पर जितना अधिक समय और ऊर्जा लगाते हैं, वहां से उतनी ही अधिक वस्तुएं मिलती हैं। तो विभिन्न स्थलों से मिले साक्ष्यों – जैसे हड्डियों पर वध के निशान – की तुलना एक पेचीदा सांख्यिकीय मसला बन जाता है।

इससे निपटने के लिए, बार और उनकी टीम ने इन स्थलों के आंकड़ों को समायोजित किया और पाया कि वास्तव में 26 लाख वर्ष पूर्व से 12 लाख वर्ष पूर्व तक मांस खाने के साक्ष्य की संख्या स्थिर ही रही। ये नतीजे प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं। बार का तर्क है कि मांसाहार में वृद्धि पर ध्यान देने के बजाय अन्य परिकल्पनाओं पर ध्यान देना चाहिए। जैसे खाना पकाने की शुरुआत, जिससे भोजन का पाचन आसान हुआ होगा और अधिक कैलोरी मिलने लगी होगी, और मस्तिष्क बड़ा होने लगा होगा। सामाजिक विकास ने भी मदद की होगी। (स्रोत फीचर्स)

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मनुष्यों में खट्टा स्वाद क्यों विकसित हुआ

ट्टा पांच मुख्य स्वाद में से एक है। अन्य चार मीठा, कड़वा, नमकीन और उमामी हैं। खट्टा खाएं तो मज़ा तो आता है लेकिन वैज्ञानिकों को इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी कि हममें खट्टे (अम्लीय) स्वाद की अनुभूति कैसे विकसित हुई।

इस सवाल के जवाब की तलाश में नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के पारिस्थितिकीविद रॉब डन और उनके साथियों ने वैज्ञानिक साहित्य खंगाला और इस अध्ययन के नतीज़े प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित किए गए हैं। साइंस पत्रिका ने उनके साथ इस विषय पर बातचीत की। वह साक्षात्कार यहां प्रस्तुत है।

प्रश्न: क्या जानवरों को भी खट्टा खाना पसंद है?

जवाब: विकासक्रम में जानवरों ने बाकी अन्य स्वादों को लगभग खो दिया है। जैसे डॉल्फिन में नमकीन के अलावा कोई स्वाद ग्राही नहीं होते। और बिल्लियों में मीठे स्वाद के ग्राही नहीं होते। लेकिन उम्मीद के विपरीत जितनी भी प्रजातियों (लगभग 60) के साथ परीक्षण किया गया है वे सभी भोजन में अम्लीयता की पहचान करने में सक्षम हैं। सूअर और प्राइमेट प्राणि तो वास्तव में अम्लीय (खट्टे) खाद्य पदार्थ पसंद करते हैं। जंगली सूअर को खमीरी मकई और गोरिल्ला को अदरक कुल के अम्लीय फल भाते हैं।

प्रश्न: मीठे पदार्थ हमें ऊर्जा देते हैं, और कड़वा स्वाद हमें विषैलेपन के प्रति चेताता है। तो खट्टा स्वाद हममें क्यों विकसित हुआ होगा?

जवाब: खट्टे की पहचान संभवत: प्राचीन मछलियों में मौजूद थी। मछलियों में खट्टे स्वाद की अनुभूति की उत्पत्ति संभवतः भोजन का स्वाद लेने के लिए नहीं हुई थी, बल्कि समुद्र में अम्लीयता के स्तर को भांपने के लिए हुई थी। यानी वे अपने शरीर की सतह से खट्टा ‘चखती’ थीं। पानी में कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर में बदलाव से पानी की अम्लीयता में भी उतार-चढ़ाव होता है, जो मछली के लिए खतरनाक हो सकती है। इसलिए अम्लीयता को महसूस या पहचान करने में सक्षम होना महत्वपूर्ण है।

प्रश्न: तो खान-पान में खट्टे की पहचान कैसे विकसित हुई?

जवाब: असल में हमने विटामिन सी (एस्कॉर्बिक एसिड) का निर्माण करने की क्षमता खो दी है। तो एक मत यह है कि अम्लीय खाद्य पदार्थ विटामिन सी लेने का एक तरीका हो सकता है। एक अन्य तर्क यह दिया जाता है कि प्राचीन प्राइमेट हमारे अनुमान से कहीं अधिक किण्वित खाद्य पदार्थ खाते थे। ऐसा माना जा सकता है कि सड़ रहे फल यदि खट्टे हैं तो सुरक्षित हैं क्योंकि उन्हें लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया और एसिटिक एसिड बैक्टीरिया खट्टा बनाते हैं और ये अम्ल हानिकारक बैक्टीरिया को मारते हैं। इसलिए ऐसे फल खाना लगभग सुरक्षित होगा।

प्रश्न: किण्वन से अल्कोहल भी बनता है, तो प्राणि इन फलों को अम्लीयता के लिए खाते थे या नशे के लिए?

जवाब: ऐसा है कि 70 लाख से 2.1 करोड़ वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों में अल्कोहल डिहाइड्रोजिनेज़ नामक एंज़ाइम का एक शक्तिशाली संस्करण विकसित हुआ जो अल्कोहल का चयापचय करता है। मनुष्य में इसका तेज़ संस्करण पाया जाता है जो अल्कोहल से ऊर्जा प्राप्त करना 40 गुना आसान बनाता है। वहीं, लगभग इसी दौरान विकसित जीन्स के नए संस्करण लैक्टिक एसिड को पहचानने में भूमिका निभाते हैं।

हमारे पूर्वजों में ये दो बुनियादी वैकासिक परिवर्तन दिखाई देते हैं जो अम्लीयता और अल्कोहल दोनों से सम्बंधित हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर संभावना है कि पहले खट्टा स्वाद लेने की क्षमता आई, लेकिन पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न: शराब की बात करें तो कुछ लोगों को खट्टी बीयर पसंद होती है जबकि अन्य लोग इस विचार पर हंस पड़ते हैं। वैज्ञानिक इस अंतर को कैसे देखते हैं?

जवाब: इस बात के कई सारे शुरुआती प्रमाण हैं कि ‘खट्टा स्वाद पहचानने’ वालों के अलग-अलग समूह हैं। यहां गंध भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और गंध की पहचान काफी हद तक सीखी जाती है। मेरे विचार में जब कोई खट्टी बीयर पसंद करना सीख रहा होता है तब असल में उसकी महक आनंद दे रही होती है और स्वाद उस आनंद से जुड़ जाता है। लेकिन अभी स्पष्ट नहीं है कि ये अंतर जीन से कैसे सम्बंधित हैं।

प्रश्न: क्या यह संभव है कि खट्टे स्वाद से सम्बंध मात्र एक संयोग है?

जवाब: खट्टे स्वाद ग्राहियों से सम्बंधित एकमात्र जीन है OTOP1 जो आंतरिक कान के कार्यों से भी जुड़ा हुआ है। यह जीन शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, और इस जीन में उत्परिवर्तन संतुलन सम्बंधी विकारों को जन्म देते हैं। खट्टे स्वाद से जुड़ा जीन इन अन्य कामों में भी भूमिका निभाता है, और यह संभव है कि इसे खो देने के अन्य परिणाम भी होंगे। देखा जाए तो खट्टे स्वाद की अनुभूति अब भी रहस्य ही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वृद्धावस्था में देखभाल का संकट और विकल्प – ज़ुबैर सिद्दिकी

विश्वभर में वृद्ध लोगों की बढ़ती आबादी के लिए वित्तीय सहायता और देखभाल का विषय राजनैतिक रूप से काफी पेचीदा है। इस संदर्भ में विभिन्न देशों ने अलग-अलग प्रयास किए हैं।

यू.के. में 2017 में और उसके बाद 2021 में सरकार द्वारा सोशल-केयर नीति लागू की गई थी। इसमें सामाजिक सुरक्षा हेतु धन जुटाने के मकसद से राष्ट्रीय बीमा की दरें बढ़ा दी गई थीं। यह एक प्रकार का सामाजिक सुरक्षा टैक्स है जो सारे कमाऊ वयस्क और उनके नियोक्ता भरते हैं।

कोविड-19 के दौरान वृद्धाश्रमों में मरने वाले लोगों की बड़ी संख्या ने इस मॉडल पर सवाल खड़े दिए। तो सवाल यह है कि बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में किस तरह के पुनर्गठन की ज़रूरत है।

लगभग सभी उन्नत और बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएं इस चुनौती का सामना कर रही हैं। जैसे 2050 तक यूके की 25 प्रतिशत जनसंख्या 65 वर्ष से अधिक आयु की होगी जो वर्तमान में 20 प्रतिशत है। इसी तरह अमेरिका में वर्ष 2018 में 65 वर्ष से अधिक आयु के 5.2 करोड़ लोग थे जो 2060 तक 9.5 करोड़ हो जाएंगे। इस मामले में जापान का ‘अतिवृद्ध’ समाज अन्य देशों के लिए विश्लेषण का आधार प्रदान करता है। 2015 से 2065 के बीच जापान की आबादी 12.7 करोड़ से घटकर 8.8 करोड़ होने की संभावना है जिसमें 2036 तक एक तिहाई आबादी 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की होगी।      

हालांकि भारत, जो विश्व का दूसरा सबसे अधिक वाली आबादी वाला देश है, की वर्तमान स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन अनुमान है कि 2050 तक 32 करोड़ भारतीयों की उम्र 60 वर्ष से अधिक होगी।

मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज़ के प्रमुख कुरियाथ जेम्स बताते हैं कि भारत में बुज़ुर्गों की देखभाल मुख्य रूप से परिवारों के अंदर ही की जाती है। वृद्धाश्रम अभी भी बहुत कम हैं। भारत में संयुक्त परिवार आम तौर पर पास-पास ही रहते हैं जिससे घर के वृद्ध लोगों की देखभाल करना आसान हो जाता है। लेकिन इस व्यवस्था को अब जनांकिक रुझान चुनौती दे रहे हैं।

गौरतलब है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों का सबसे बड़ा स्रोत है। 1990 के दशक की शुरुआत से लेकर अब तक विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की संख्या दुगनी से अधिक होकर 2015 तक 1.56 करोड़ हो गई थी। इसके अलावा कई भारतीय काम के सिलसिले में देश के ही दूसरे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार 30 प्रतिशत आबादी अपने जन्म स्थान पर नहीं रह रही थी। यह संख्या 2011 में बढ़कर 37 प्रतिशत हो गई थी। जेम्स के अनुसार इस प्रवास में आम तौर पर व्यस्क युवा होते हैं जो अपने माता-पिता को छोड़कर दूसरे शहर चले जाते हैं। नतीजतन घर पर ही वृद्ध लोगों की देखभाल और कठिन हो जाती है।       

2020 में लॉन्गीट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के 26 प्रतिशत लोग या तो अकेले या सिर्फ अपने जीवनसाथी (पति-पत्नी) के साथ रहते हैं। फिलहाल भारत में पारिवारिक जीवन अभी भी अपेक्षाकृत रूप से आम बात है जिसमें 60 से अधिक उम्र के 41 प्रतिशत लोग अपने जीवनसाथी और व्यस्क बच्चों दोनों के साथ रहते हैं जबकि 28 प्रतिशत लोग अपने व्यस्क बच्चों के साथ रहते हैं और उनका कोई जीवनसाथी नहीं है। 

वैसे, घर पर देखभाल की कुछ समस्याएं हैं। देखभाल का काम मुख्य रूप से महिलाओं के ज़िम्मे होता है और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है क्योंकि वे घर से बाहर काम करने नहीं जा पाती हैं।

यदि प्रवासन में उपरोक्त वृद्धि जारी रही तो जल्दी ही देश की बुज़ुर्ग आबादी के पास कोई परिवार नहीं होगा और उनको देखभाल के लिए वृद्धाश्रम की आवश्यकता होगी। ऐसे में खर्चा बढ़ेगा और इन खर्चों को पूरा करने के लिए अधिक महिलाओं को काम की तलाश करना होगी।  

भारत के वृद्ध लोग अपने संयुक्त परिवारों के साथ रहना अधिक पसंद करते हैं। ऐसे परिवारों में रहने वाले ज़्यादा बुज़ुर्ग (80 प्रतिशत) अपने रहने की व्यवस्था से संतुष्ट हैं बनिस्बत अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों (53 प्रतिशत) के। नर्सिंग-होम जैसी संस्थाओं में संतुष्टि के संदर्भ में कोई डैटा तो नहीं है लेकिन परिवार द्वारा देखभाल को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि यह समाज की अपेक्षा भी है। फिर भी देश के अंदर और विदेशों की ओर प्रवास की प्रवृत्ति और कोविड-19 के दीर्घकालिक प्रभाव को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि व्यवस्था में बदलाव की दरकार है।

महामारी के दौरान कई देशों के केयर-होम्स वायरस संक्रमण के भंडार रहे हैं। भारत के संदर्भ में पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लंदन आधारित इंटरनेशनल लॉन्ग टर्म केयर पालिसी नेटवर्क ने हाल ही में एक समीक्षा में बताया है कि परिवार के वृद्ध जन के कोविड-19 संक्रमित होने पर परिवार को अतिरिक्त तनाव झेलना पड़ा था। इस महामारी ने एक ऐसी व्यवस्था की सीमाओं को उजागर किया है जो वृद्ध लोगों की देखभाल के लिए मुख्यत: परिवारों पर निर्भर है।      

घर पर देखभाल के लिए देश के आधे कामगारों (महिलाओं) की उपेक्षा करना अर्थव्यवस्था पर एक गंभीर बोझ है।

इसी कारण जापान ने अपने वृद्ध लोगों की देखभाल करने के तरीके में बदलाव किए हैं। भारत की तुलना में जापान में आंतरिक प्रवास की दर कम है – वहां केवल 20 प्रतिशत लोग उस प्रांत में नहीं रहते हैं जहां वे पैदा हुए थे। लेकिन वहां भी औपचारिक अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कम उपस्थिति एक बड़ा मुद्दा है। वर्ष 2000 में, 25 से 54 वर्ष की आयु के बीच की 67 प्रतिशत महिलाएं अधिकारिक तौर पर नौकरियों में थी जो अमेरिका से 10 प्रतिशत कम था। वैसे भी जापान सामान्य रूप से घटते कार्यबल का सामना कर रहा है।   

इस सहस्राब्दी की शुरुआत में जापान ने लॉन्ग-टर्म केयर इंश्योरेंस (एलटीसीआई) योजना की शुरुआत की थी जिसका उद्देश्य देखभाल को परिवार-आधारित व्यवस्था से दूर करके बीमा पर आधारित करना है। एलटीसीआई के तहत, 65 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोग जिन्हें किसी भी कारण देखभाल की आवश्यकता है, उन्हें सहायता प्रदान की जाती है। इसके लिए कोई विशेष विकलांगता की शर्त नहीं है। इसकी पात्रता एक सर्वेक्षण द्वारा निर्धारित की जाती है। इसके बाद चिकित्सक के इनपुट के आधार पर लॉन्ग-टर्म केयर अप्रूवल बोर्ड द्वारा निर्णय लिया जाता है। इसके बाद दावेदार को उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार देखभाल प्रदान की जाती है जो नर्सिंग-होम में निवास से लेकर उनके दैनिक कार्यों में मदद के लिए सेवाएं प्रदान करने तक हो सकती हैं।

एलटीसीआई के वित्तपोषण का 50 प्रतिशत हिस्सा कर से प्राप्त राजस्व से और बाकी का हिस्सा 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर अनिवार्य बीमा प्रीमियम आरोपित करके किया जाता है। यह आयु सीमा इसलिए निर्धारित की गई है क्योंकि 40 वर्ष की आयु तक पहुंचने पर व्यक्ति के बुज़ुर्ग रिश्तेदारों को देखभाल की आवश्यकता होगी, ऐसे में वह व्यक्ति इस व्यवस्था का लाभ देख पाएगा। हितग्राही को कुल खर्च के 10 प्रतिशत का भुगतान भी करना होता है।

यदि अप्रूवल बोर्ड दीर्घकालिक देखभाल की आवश्यकता नहीं देखता तो उन्हें ‘रोकथाम देखभाल’ की पेशकश की जा सकती है। इन सेवाओं में पुनर्वास और फिज़ियोथेरेपी शामिल हैं। रोकथाम सेवा इसलिए भी आवश्यक हो गई क्योंकि एलटीसीआई योजना की सफलता के चलते नामांकन की संख्या में काफी तेज़ी से वृद्धि हुई। वर्ष 2000 में जापान सरकार ने एलटीसीआई भुगतानों पर लगभग 2.36 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे जो 2017 में बढ़कर 7.02 लाख करोड़ हो गए। अनुमान है कि 2025 यह आंकड़ा 9.84 लाख करोड़ रुपए हो सकता है। खर्च कम करने के लिए सरकार ने 2005 में कुछ लाभों को कम कर दिया। 2015 में सक्षम लोगों के लिए 20 प्रतिशत भुगतान भी शामिल किया गया। सरकार ने प्रीमियम योगदान की उम्र घटाने की भी कोशिश की जिसका काफी विरोध हुआ।

कुल मिलाकर सबक यह है कि इतनी व्यापक योजना का आकार समय के साथ बढ़ती ही जाएगा। एलटीसीआई के लिए उच्च स्तर का उत्साह पैदा करना आसान नहीं था। लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना पड़ा क्योंकि घर पर वृद्ध रिश्तेदारों की देखभाल न करना एक शर्म की बात माना जाता था। हालांकि, जापान ने जो समस्याएं एलटीसीआई की मदद से दूर करने की कोशिश की थी उनमें से कई समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।

एक रोचक तथ्य यह है कि जहां 2000 से 2018 के बीच जापान की कामकाजी उम्र की आबादी में 1.1 करोड़ से अधिक लोगों की कमी आई है वहीं कार्यबल में 6 लाख की वृद्धि हुई है। इस वृद्धि का श्रेय महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दिया जाता है क्योंकि एलटीसीआई ने पारिवारिक देखभाल की चिंताओं को कम किया जिससे महिलाओं को काम करने के अवसर मिले।  

हालांकि, अभी भी जापान में बढ़ती उम्र की समस्या बनी हुई है और इसी कारण उसका श्रम-बाज़ार का संकट खत्म भी नहीं हुआ है। अधिक महिलाओं को रोज़गार देने के बाद भी देश के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय का अनुमान है कि 2040 तक कार्यबल घटकर 5.3 करोड़ रह जाएगा जो 2017 से 20 प्रतिशत कम होगा। साथ ही वृद्ध लोगों की संख्या बढ़ने के साथ एलटीसीआई के लिए पात्र लोगों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में भविष्य में योजना को वित्तपोषित करना एक बड़ी चुनौती होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जेनेटिक अध्ययनों में ‘नस्ल’ शब्द के उपयोग में कमी

हाल के एक समीक्षा अध्ययन से पता चला है कि मानव जेनेटिक्स से सम्बंधित शोध पत्रों में ‘नस्ल’ (रेस) शब्द का उपयोग बहुत कम होने लगा है। खास तौर से मानव आबादियों या समूहों का विवरण देते समय उन्हें नस्ल कहने का चलन कम हुआ है। और इसका कारण यह लगता है कि जीव वैज्ञानिकों में आम तौर पर यह समझ विकसित हुई है कि नस्ल वास्तव में जीव वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक सामाजिक रूप से निर्मित श्रेणी है।

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में कई आनुवंशिकीविदों की यह धारणा थी कि मानव नस्लें वास्तव में होती हैं – जैसे नीग्रो या कॉकेशियन – और ये जीव वैज्ञानिक समूह की द्योतक हैं। इस आधार पर विभिन्न जनसमूहों के बारे में धारणाएं बना ली जाती थीं। अलबत्ता, अब वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नस्ल जैसी धारणा का कोई जीव वैज्ञानिक आधार नहीं है।

इस संदर्भ में समाज वैज्ञानिक वेंस बॉनहैम देखना चाहते थे कि क्या इस बदलती समझ का असर शोध पत्रों में नज़र आता है। इसे समझने के लिए उन्होंने अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्युमैन जेनेटिक्स (AJHG) में प्रकाशित शोध पत्रों को खंगाला। यह जर्नल जेनेटिक्स विषय का सबसे पुराना जर्नल है और 1949 से लगातार प्रकाशित हो रहा है। बॉनहैम और उनके साथियों ने 1949 से 2018 के बीच AJHG में प्रकाशित 11,635 शोध पत्रों को देखा। उन्होंने पाया कि जहां इस अवधि के पहले दशक में 22 प्रतिशत शोध पत्रों में नस्ल शब्द का उपयोग किया गया था वहीं पिछले दशक में मात्र 5 प्रतिशत शोध पत्रों में ही यह शब्द प्रकट हुआ।

इसके अलावा, अध्ययन में यह भी देखा गया कि प्रथम दशक में नस्लीय समूहों से सम्बंधित शब्दों – नीग्रो और कॉकेशियन – का इस्तेमाल क्रमश: 21 और 12 प्रतिशत शोध पत्रों में हुआ था। 1970 के दशक के बाद से इसमें गिरावट आई और आखिरी दशक में तो ऐसे शब्दों का उपयोग एक प्रतिशत से भी कम शोध पत्रों में किया गया।

आजकल जब शोध पत्रों में नस्ल शब्द का उपयोग किया जाता है तो उसके साथ ‘एथ्निसिटी’ या ‘एंसेस्ट्री’ शब्दों को जोड़ा जाता है। अन्य विशेषज्ञों का मत है कि इसकी एक वजह यह हो सकती है कि जेनेटिक्स विज्ञानी अभी भी किसी परिभाषा पर एकमत नहीं हो पाए हैं। इस संदर्भ में यूएस की नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्स, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन विचार-विमर्श कर रही है। अलबत्ता, एक बात साफ है कि शोधकर्ता अब मानते हैं कि नस्ल कोई जीव वैज्ञानिक धारणा नहीं बल्कि एक सामाजिक धारणा है जिसके जैविक असर होते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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इस वर्ष चीन की जनसंख्या घटना शुरू हो सकती है

चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार चीन की जनसंख्या दशकों तक बढ़ने के बाद इस वर्ष घटना शुरू हो सकती है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2021 में, चीन की जन्म दर में लगातार पांचवें वर्ष गिरावट आई है, जो घटकर 7.52 प्रति 1000 व्यक्ति हो गई है। इन आंकड़ों के आधार पर जनसांख्यिकीविदों का अनुमान है कि देश की कुल प्रजनन दर प्रति व्यक्ति लगभग 1.15 है, जो प्रतिस्थापन दर (2.1) से काफी कम है। इस दर के साथ चीन विश्व का सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर वाला देश बन गया है।

युनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के जनसांख्यिकीविद योंग काय का कहना है कि अधिक बच्चे पैदा करने के लिए की जा रही सारी पहल और प्रचार के बावजूद युवा जोड़े अधिक बच्चे न पैदा करने का निर्णय ले रहे हैं। अनुमान है कि चीन की जनसंख्या में तेज़ी से गिरावट आएगी।

बढ़ती से घटती जनसंख्या की दिशा में यह बदलाव बहुत तेज़ गति से हुआ है। कुछ साल पहले अनुमान था कि चीन की आबादी लगभग 2027 तक बढ़ेगी। 2020 की जनगणना में भी कुल प्रजनन दर 1.3 आंकी गई थी।

चीन की सरकार ने लंबे समय तक सख्त जनसंख्या नियंत्रण अपनाया। लेकिन यह देखते हुए कि घटती युवा आबादी और बढ़ती वृद्ध आबादी पेंशन प्रणाली और सामाजिक सेवाओं पर बोझ बढ़ाएंगी, और आर्थिक और भू-राजनैतिक गिरावट का कारण बनेंगी, चीन ने 2016 में अपनी एक-संतान नीति को समाप्त कर दिया था। मई 2021 में यह सीमा बढ़ाकर तीन बच्चे तक कर दी गई। कुछ स्थानीय सरकारों ने दूसरा और तीसरा बच्चा करने पर जोड़ों को मासिक नकद सब्सिडी देना भी शुरू किया।

लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद युवा अधिक बच्चे नहीं चाहते। विशेषज्ञों के अनुसार सब्सिडी बहुत कम है। युवाओं पर पहले ही बहुत अधिक काम का बोझ है और वेतन बहुत कम, ऊपर से बच्चों की देखभाल के लिए सामाजिक मदद बहुत कम है। इन कारणों के चलते बहुत कम जोड़े ही परिवार शुरू करना या दूसरा बच्चा चाहते हैं।

सांख्यिकी ब्यूरो ने यह भी बताया है कि चीन अब और अधिक शहरीकृत हो रहा है। वर्ष 2020 से अब शहरी आबादी में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, इस तरह चीन की लगभग 65 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रह रही है। शहरों में आकर बसने वाले लोग आम तौर पर प्रजनन उम्र में भी होते हैं। और शहरों की तंग और भीड़-भाड़ वाली जगहों में आवास, महंगा जीवन यापन और महंगी शिक्षा होने के कारण लोग दूसरा बच्चा ही नहीं चाहते, तो तीसरा बच्चा तो दूर की बात है।

कुछ जनसांख्यिकीविद कहते हैं कि जनसंख्या कमी के संकट को अधिक तूल दिया जा रहा है। निश्चित ही चीन बूढ़ा हो रहा है। लेकिन चीन की आबादी स्वस्थ, बेहतर शिक्षित और हुनर से लैस होती जा रही है, और नई तकनीकों के अनुकूल हो रही है। अधिक बच्चे पैदा करने को बढ़ावा देने की बजाय जीविका प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करने से, उत्पादकता में सुधार लाने से और वृद्धों के स्वास्थ्य को बेहतर करने से भी स्थिति संभल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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