निएंडरथल पके खाने के शौकीन थे

गर आप सोचते हैं कि निएंडरथल मानव कच्चा मांस और फल-बेरियां ही खाते थे, तो हालिया अध्ययन आपको फिर से सोचने को मजबूर कर सकता है। उत्तरी इराक की एक गुफा में विश्व के सबसे प्राचीन पके हुए भोजन के जले हुए अवशेष मिले हैं, जिनके विश्लेषण से लगता है कि निएंडरथल मानव खाने के शौकीन थे।

लीवरपूल जॉन मूर्स युनिवर्सिटी के सांस्कृतिक जीवाश्म विज्ञानी क्रिस हंट का कहना है कि ये नतीजे निएंडरथल मानवों में खाना पकाने के जटिल कार्य और खाद्य संस्कृति का पहला ठोस संकेत हैं।

दरअसल शोधकर्ता बगदाद से आठ सौ किलोमीटर उत्तर में निएंडरथल खुदाई स्थल की एक गुफा शनिदार गुफा की खुदाई कर रहे थे। खुदाई में उन्हें गुफा में बने एक चूल्हे में जले हुए भोजन के अवशेष मिले, जो अब तक पाए गए पके भोजन के अवशेष में से सबसे प्राचीन (लगभग 70,000 साल पुराने) थे।

शोधकर्ताओं ने पास की गुफाओं से इकट्ठा किए गए बीजों से इन व्यंजनों में से एक व्यंजन को प्रयोगशाला में बनाने की कोशिश की। यह रोटी जैसी, पिज़्ज़ा के बेस सरीखी चपटी थी जो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट थी।

टीम ने दक्षिणी यूनान में फ्रैंचथी गुफा, जिनमें लगभग 12,000 साल पहले आधुनिक मनुष्य रहते थे, से मिले प्राचीन जले हुए भोजन के अवशेषों का भी स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से विश्लेषण किया।

दोनों जानकारियों को साथ में देखने से पता चलता है कि पाषाणयुगीन आहार में विविधता थी और प्रागैतिहासिक पाक कला काफी जटिल थी, जिसमें खाना पकाने के लिए कई चरण की तैयारियां शामिल होती थीं।

शोधकर्ताओं को पहली बार दोनों स्थलों पर निएंडरथल और शुरुआती आधुनिक मनुष्यों (होमो सेपिएन्स) द्वारा दाल भिगोने और दलहन दलने के साक्ष्य मिले हैं।

शोधकर्ताओं को भोजन में अलग-अलग तरह के बीजों को मिलाकर बनाने के प्रमाण भी मिले हैं। उनका कहना है कि ये लोग कुछ खास पौधों के ज़ायके को प्राथमिकता देते थे।

एंटीक्विटी में प्रकाशित यह शोध बताता है कि शुरुआती आधुनिक मनुष्य और निएंडरथल दोनों ही मांस के अलावा वनस्पतियां भी खाते थे। जंगली फलों और घास को अक्सर मसूर की दाल और जंगली सरसों के साथ पकाया जाता था। और चूंकि निएंडरथल लोगों के पास बर्तन नहीं थे इसलिए अनुमान है कि वे बीजों को किसी जानवर की खाल में बांधकर भिगोते होंगे।

हालांकि, ऐसा लगता है कि आधुनिक रसोइयों के विपरीत निएंडरथल बीजों का बाहरी आवरण नहीं हटाते थे। छिलका हटाने से कड़वापन खत्म हो जाता है। लगता है कि वे कड़वेपन को कम तो करना चाहते थे लेकिन दालों के प्राकृतिक स्वाद को खत्म भी नहीं करना चाहते थे।

अनुमान है कि वे स्थानीय पत्थरों की मदद से बीजों को कूटते या दलते होंगे इसलिए दालों में थोड़ी किरकिरी आ जाती होगी। और शायद इसलिए निएंडरथल मनुयों के दांत इतनी खराब स्थिति में थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन मनुष्यों से मिला प्रतिरक्षा का उपहार

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ब आधुनिक मनुष्य पहली बार अफ्रीका से निकलकर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के उष्णकटिबंधीय द्वीपों में गए तो उनका सामना नए लोगों और नए रोगजनकों से हुआ। लेकिन जब उन्होंने स्थानीय लोगों, डेनिसोवन्स, के साथ संतानोत्पत्ति की तो उनकी संतानों में कुछ प्रतिरक्षा जीन स्थानांतरित हुए जिन्होंने उन्हें स्थानीय बीमारियों से बचने में मदद की। अब एक नया अध्ययन बताता है कि इनमें से कुछ जीन्स आज भी पपुआ न्यू गिनी के निवासियों के जीनोम में मौजूद हैं।

वैज्ञानिक यह तो भली-भांति जानते थे कि पपुआ न्यू गिनी और मेलानेशिया में रहने वाले लोगों को 5 प्रतिशत तक डीएनए डेनिसोवन लोगों से विरासत में मिले हैं। डेनीसोवन लोग लगभग दो लाख साल पहले एशिया में आए थे और ये निएंडरथल मनुष्य के सम्बंधी थे। वैज्ञानिकों को लगता है कि इन जीन्स ने अतीत में आधुनिक मनुष्यों को स्थानीय बीमारियों से लड़ने में मदद करके फायदा पहुंचाया होगा। लेकिन सवाल था कि ये डीएनए अब भी कैसे मनुष्यों के डील-डौल, कार्यिकी वगैरह में बदलाव लाते हैं। और चूंकि पपुआ न्यू गिनी और मेलानेशिया के वर्तमान लोगों के डीएनए का विश्लेषण बहुत कम हुआ है इसलिए इस सवाल का जवाब मुश्किल था।

इस अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न की आइरीन गेलेगो रोमेरो और उनके साथियों ने एक अन्य अध्ययन का डैटा उपयोग करके इस मुश्किल को दूर किया है। उस अध्ययन में पपुआ न्यू गिनी के 56 लोगों के आनुवंशिक डैटा का विश्लेषण किया गया था। इन लोगों के जीनोम की तुलना डेनिसोवन और निएंडरथल डीएनए के साथ करने पर देखा गया कि डेनिसोवन लोगों से पपुआ लोगों को 82,000 ऐसे जीन संस्करण मिले थे जो जेनेटिक कोड में सिर्फ एक क्षार में बदलाव से पैदा होते हैं।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने आगे का अध्ययन प्रतिरक्षा से सम्बंधित जीन संस्करणों पर केंद्रित किया जो अपने निकट उपस्थित जीन के प्रोटीन का उत्पादन बढ़ा सकते थे, या इसका कार्य ठप या धीमा कर सकते थे। यह नियंत्रण विशिष्ट रोगजनकों के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली को अनुकूलित होने या ढलने में मदद कर सकता है।

शोधकर्ताओं को पपुआ न्यू गिनी के लोगों में कई ऐसे डेनिसोवन जीन संस्करण मिले जो उन जीन्स के पास स्थित थे जो फ्लू और चिकनगुनिया जैसे रोगजनकों के प्रति मानव प्रतिरक्षा को प्रभावित करते हैं। इसके बाद उन्होंने विशेष रूप से दो जीन्स, OAS2 और OAS3, द्वारा उत्पादित प्रोटीन की अभिव्यक्ति से जुड़े आठ डेनिसोवन जीन संस्करण के कार्य का परीक्षण किया।

देखा गया कि इनमें से दो डेनिसोवन जीन संस्करण ने प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा साइटोकाइन्स का उत्पादन कम कर दिया था जिससे शोथ (सूजन) कम हो गई थी। इस तरह शोथ प्रतिक्रिया को शांत करने से पपुआ लोगों को इस क्षेत्र के नए संक्रमणों से निपटने में मदद मिली होगी।

प्लॉस जेनेटिक्स पत्रिका में शोधकर्ता बताते हैं कि इन प्रयोगों से पता चलता है कि डेनिसोवन जीन संस्करण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव कर इसे पर्यावरण के प्रति अनुकूलित बना सकते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि उष्णकटिबंधीय इलाकों में, जहां संक्रमण का अधिक खतरा होता है, वहां प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को पूरी तरह हटाना तो उचित नहीं होगा लेकिन उसकी उग्रता को कम करना कारगर हो सकता है।

ये नतीजे वर्तमान युरोपीय लोगों में निएंडरथल जीन संस्करण की भूमिका पर हुए एक अन्य अध्ययन के नतीजों से मेल खाते हैं। दोनों ही अध्ययन दर्शाते हैं कि कैसे किसी क्षेत्र में नए आने वाले मनुष्यों का प्राचीन मनुष्यों के साथ मेल-मिलाप उनमें लाभकारी जीन प्राप्त होने का एक त्वरित तरीका प्रदान करता है। अध्ययन बताता है कि इस तरह जीन का लेन-देन मनुष्यों को प्रतिरक्षा चुनौतियों के प्रति अनुकूलित होने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया था।

उम्मीद है कि आगे के अध्ययनों में यह पता चल सकेगा कि क्या डेनिसोवन जीन संस्करण पपुआ लोगों को किसी विशिष्ट रोग से बचने या उबरने में बेहतर मदद करते हैं?

सार रूप में, हज़ारों सालों पहले दो अलग तरह के मनुष्यों का मेल-मिलाप अब भी वर्तमान मनुष्यों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पहला निएंडरथल कुनबा खोजा गया

हाल ही में शोधकर्ताओं को दक्षिण साइबेरिया की चारजिस्काया गुफा में निएंडरथल परिवार के साक्ष्य मिले हैं। इस परिवार में एक पिता, उसकी किशोर बेटी और दो अन्य दूर के सम्बंधियों की पहचान की गई है। इसके साथ ही गुफा से 7 अन्य व्यक्तियों की भी पहचान की गई है जो एक अन्य कबीले के बताए गए हैं। इनमें से भी दो शायद कज़िन्स हैं। गौरतलब है कि निएंडरथल (होमो निएडरथलेंसिस) पुरामानव थे जो लगभग 40 हज़ार वर्ष पूर्व तक धरती पर विद्यमान थे। गुफा के नज़दीक के एक अन्य स्थल से दो और परिवारों की पहचान के साथ यह निएंडरथल प्रजाति का अब तक का सबसे बड़ा जीनोम भंडार है।

अल्ताई पहाड़ों की तलहट और चार्याश नदी के तट पर स्थित चारजिस्काया गुफा मशहूर डेनिसोवा गुफा से 100 किलोमीटर पश्चिम में है। वास्तव में डेनिसोवा गुफा एक पुरातात्विक खज़ाना है जिसमें मनुष्य, निएंडरथल और डेनिसोवा और कम से कम एक निएंडरथल-डेनिसोवा संकर के लोग 3 लाख वर्षों के अंतराल में अलग-अलग समय में साथ रहे हैं। अलबत्ता, चारजिस्काया में अब तक मात्र निएंडरथल अवशेष ही मिले हैं।

गौरतलब है कि 2020 में चारजिस्काया की एक निएंडरथल स्त्री के जीनोम अनुक्रम से पता चला था कि वह डेनिसोवा गुफा में रहने वाली आबादी से काफी अलग थी। गुफा में रहने वाले लोगों का अधिक गहराई से अध्ययन करने के लिए मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक लौरिट्स स्कोव और बेंजामिन पीटर के नेतृत्व में एक टीम ने चारजिस्काया और इसके नज़दीक ओक्लाडनिकोव गुफा से 17 अन्य पुरा-मानव अवशेषों से डीएनए प्राप्त किए।

इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का मत है कि चारजिस्काया के निवासी उनसे हज़ारों साल पहले डेनिसोवा गुफा में रहने वालों की अपेक्षा युरोप में रहने वाले निएंडरथल से ज़्यादा निकटता से सम्बंधित थे।

चारजिस्काया अवशेषों से प्राप्त जीनोम की तुलना करने पर स्कोव को काफी आश्चर्य हुआ। उन्होंने पाया कि एक वयस्क पुरुष और एक किशोरी का डीएनए 50 प्रतिशत एक-सा है। यह स्थिति तभी संभव है जब उनका सम्बंध भाई-बहन का हो या फिर पिता-पुत्री का। इस सम्बंध को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए की जांच की। माइटोकॉण्ड्रिया का डीएनए व्यक्ति को अपनी मां से मिलता है। इसका मतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया का डीएनए भाई-भाई, भाई-बहन, मां-बेटी में तो एक समान होगा लेकिन पिता और उसकी संतान में नहीं। इस तुलना से समझ में आया कि ये दोनों पिता-पुत्री थे।

इसके बाद और अधिक आनुवंशिक सामग्री की जांच करने पर शोधकर्ताओं को परिवार के अधिक सदस्यों का पता चला। उनको पिता में दो प्रकार के माइटोकॉण्ड्रिया डीएनए प्राप्त हुए। इस विशेषता को हेटरोप्लाज़्मी कहा जाता है। यह विशेषता गुफा के दो अन्य व्यस्क पुरुषों में भी देखने को मिली जो संकेत देता है कि ये सब एक ही मातृ वंश से थे। गौरतलब है कि हेटरोप्लाज़्मी कुछ पीढ़ियों बाद गायब हो जाती है इसलिए यह कहना उचित होगा कि ये तीनों एक ही समय में उपस्थित रहे होंगे। टीम ने निएंडरथल परिवार के अन्य सदस्यों में एक पुरुष और एक महिला की भी पहचान की और लगता है कि ये संभवत: कज़िन्स थे।       

इतनी अधिक मात्रा में निएंडरथल जीनोम से शोधकर्ताओं को निएंडरथल जीवन के कई पहलुओं को देखने का मौका मिला। चारजिस्काया से प्राप्त निएंडरथल के जीनोम में डीएनए की मातृ और पितृ प्रतियों में विविधता काफी कम थी। इससे संकेत मिलता है कि प्रजनन में संलग्न वयस्कों की आबादी काफी छोटी थी। शोधकर्ताओं ने इसी तरह का पैटर्न पहाड़ी गोरिल्ला और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों में भी देखा है जो आम तौर पर छोटे समूहों में रहते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि Y-गुणसूत्र (जो नर से मिलता है) की तुलना में माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए (जो मादा से मिलता है) में विविधता बहुत अधिक थी। इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि विभिन्न निएंडरथल समुदायों से महिलाओं का निरंतर आना-जाना रहा था। टीम के मॉडल से पता चलता है कि आनुवंशिक विविधता का पैटर्न दर्शाता है कि समुदाय की आधे से ज़्यादा महिलाओं का जन्म कहीं और हुआ होगा।

स्पेन स्थित नेचुरल साइंस म्यूज़ियम के निर्देशक चार्ल्स लालुएज़ा फॉक्स का विचार है कि यह सामाजिक संरचना विभिन्न निएंडरथल आबादियों में आम रही होगी। एक दशक पूर्व उनकी टीम ने स्पेन की एक गुफा में 12 निएंडरथल के विश्लेषण में पाया था कि महिलाओं के माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए में पुरुषों की अपेक्षा अधिक विविधता थी जो दर्शाता है कि महिलाएं अक्सर अपने समुदायों को छोड़ दिया करती थीं।

चारजिस्काया गुफा में निएंडरथल अवशेषों के अलावा बाइसन और घोड़े के अवशेष भी मिले हैं। स्कोव के अनुसार यह स्थल इन जानवरों के मौसमी प्रवास के दौरान शिकार कैंप के रूप में काम करती थी। इस दौरान समुदायों को मेल-मिलाप के अवसर मिला करते होंगे।

अचरज की बात यह है कि जीवाश्म अवशेषों में मिले डीएनए के विश्लेषण से इतने गहरे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। और अभी इस गुफा का केवल एक-चौथाई से भी कम हिस्सा टटोला गया है। उम्मीद है कि भविष्य के अध्ययन हमारी समझ में और इजाफा करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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नींद के महत्व की उपेक्षा

नींद हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। नींद ठीक से न हो तो दिन भर सुस्ती रहती है। लेकिन नींद और इससे जुड़े विकार चिकित्सा अध्ययनों में सबसे उपेक्षित रहे हैं। स्नातक स्तर की पढ़ाई में इस विषय पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है, नींद अनुसंधान के क्षेत्र में वित्त या अनुदान की भी कमी है। इस उपेक्षा का कारण नींद सम्बंधी विकारों की विविधता  है – जैसे स्लीप एप्निया (जो कान, नाक व गला विशेषज्ञ या हृदय रोग विशेषज्ञ के दायरे में आते हैं), या रेस्टलेस लेग सिंड्रोम (न्यूरोलॉजिस्ट या प्राथमिक चिकित्सक)। इसके कारणों की समझ में कमी और उपचार का अभाव भी इस समस्या को उपेक्षित बनाए रखते हैं।

हालांकि, अब परिस्थितियां बदलने लगी हैं। और इस बदलाव में कुछ योगदान दैनिक शारीरिक लय के आनुवंशिक आधार पर काम करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेताओं माइकल रॉसबैश, जेफरी हॉल और माइकल यंग का रहा है। उनके काम की बदौलत आज हम यह जानते हैं कि मनुष्यों में एक आंतरिक आणविक घड़ी होती है – यह समय का हिसाब रखने वाले जीन और सम्बंधित प्रोटीन के एक नेटवर्क के रूप में होती है। ये जीन बाइपोलर डिसऑर्डर, अवसाद (डिप्रेशन) और अन्य मूड डिसऑर्डर से भी सम्बंधित हैं। कुछ निद्रा विकार पार्किंसंस रोग, लेवी बॉडी डिमेंशिया और मल्टीपल सिस्टम एट्रोफी के संकेतक के रूप में पाए गए हैं। इसके अलावा, पोर्टेबल निगरानी उपकरणों के विकास ने चिकित्सकों को सहज माहौल में, यहां तक कि घर में भी, नींद का निरीक्षण करने में सक्षम बनाया है। और, नार्कोलेप्सी की कार्यिकीय व्याख्या ने अनिद्रा की समस्या के लिए नई दवाओं का विकास संभव किया है। नार्कोलेप्सी उन न्यूरॉन्स की क्षति के कारण होती है जो जागृत अवस्था को उकसाने वाले ऑरेक्सिन नामक न्यूरोपैप्टाइड का स्राव करते हैं।

इसी कड़ी में, दी लैंसेट और दी लैंसेट न्यूरोलॉजी में चार शोध समीक्षाएं प्रकाशित हुई हैं जो विभिन्न निद्रा विकारों और नींद के मानवविज्ञान की व्यवस्थित तरीके से पड़ताल करती हैं। ये चार समीक्षाएं नींद के बारे में चार मुख्य बातें बताती हैं।

पहली, कि नींद सम्बंधी विकार एक आम स्वास्थ्य समस्या होने के बावजूद इन्हें बहुत कम तरजीह मिली है। नींद सम्बंधी विकार पीड़ित और उसके साथ सोने वालों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनते हैं, और जन-स्वास्थ्य और आर्थिक खुशहाली पर दूरगामी प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक तिहाई वयस्क अनिद्रा की समस्या के शिकार होते हैं। दिन के अधिकतर समय उनींदापन उत्पादकता और कार्यस्थल पर सुरक्षा में कमी ला सकता है। इसके चलते बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और एक तिहाई तक सड़क हादसे नींद की कमी के कारण होते हैं।

दूसरी, कि प्रभावी उपचारों की कमी है। अनिद्रा के लिए तो आसानी से दवाएं लिख दी जाती हैं जैसे बेंजोडायज़ेपाइन्स और तथाकथित ज़ेड-औषधियां यानी ज़ोपिक्लोन, एस्ज़ोपिक्लोन और ज़ेलेप्लॉन। हालांकि अनिद्रा के उपचार के लिए गैर-औषधीय तरीकों, जैसे संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी प्रथम उपचार माने जाते हैं, लेकिन ये उपचार हर जगह उपलब्ध नहीं होते हैं। और, बातचीत आधारित उपचार से दवा पर आश्रित होने का खतरा भी नहीं होता – लंबे समय तक नींद की दवाएं लेने से इनकी लत लगना आम बात है। स्लीप हाइजीन (यानी समयानुसार सोना-जागना, शांत-अंधेरी जगह पर सोना, सोते समय मोबाइल वगैरह दूर रखना आदि) इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।

तीसरी, अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों को उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग जैसी चिकित्सा में नींद की जीर्ण समस्या के प्रभाव पता होना चाहिए। अपर्याप्त और अत्यधिक नींद दोनों ही स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं, ये अस्वस्थता और मृत्यु दर को बढ़ाती हैं। इसलिए किसी भी बीमारी का उपचार करते समय चिकित्सक को व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता के बारे में भी पूछ लेना चाहिए।

और चौथी, अपर्याप्त नींद और नींद सम्बंधी विकारों की संख्या बढ़ने की अत्यधिक संभावना है। उदाहरण के लिए, मानवशास्त्रीय अध्ययनों से पता चला है कि अनिद्रा पूरी तरह से आधुनिक जीवन से जुड़ी हुई समस्या है (औद्योगिक समाज में 10-30 प्रतिशत लोग अनिद्रा का शिकार होते हैं, जबकि नामीबिया और बोलीविया में रहने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता समुदाय की महज़ दो प्रतिशत आबादी अनिद्रा की शिकार है)। मनोसामाजिक तनाव, मदिरापान, धूम्रपान और व्यायाम में कमी नींद में बाधा डालते हैं। इसके अलावा, सोने के समय शयनकक्ष में तकनीकी उपकरणों का उपयोग या उनकी मौजूदगी, खास कर युवा वर्ग में स्मार्ट फोन का बढ़ता उपयोग नीली रोशनी से संपर्क बढ़ाता है जो, सोने और जागने की लय सम्बंधी विकारों के संभावित कारणों में से एक माना जाता है।

नींद हमारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा है लेकिन चिकित्सकों, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों और नीति निर्माताओं द्वारा इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। उक्त शृंखला अच्छी नींद के महत्व को भलीभांति उजागर करती हैं। (स्रोत फीचर्स) 

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मनुष्य को सूंघने में मच्छर की महारत – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

ई भोज्य पदार्थों को हम बंद आंखों से सूंघ कर भी पहचान जाते हैं। हमारे शरीर से भी लगातार नाना प्रकार की गंध निकलती हैं। जब मादा मच्छर किसी मनुष्य की तलाश में होती है तो वह मनुष्य के शरीर से निकलने वाली गंध के एक अनोखे मिश्रण को सूंघती हैं। गंध मच्छरों के स्पर्शक (एंटीना) में उपस्थित ग्राहियों को उत्तेजित करती है और मच्छर हमें अंधेरे में भी खोज लेते हैं। यदि मच्छरों में गंध के ग्राही ही न रहें तो क्या मच्छर इंसानों की गंध को नहीं सूंघ पाएंगे? तब क्या हमें मच्छरों और उनसे होने वाले रोगों से निजात मिल पाएगी?

हाल ही में वैज्ञानिकों ने मच्छरों पर ऐसे ही कुछ प्रयोग किए। उन्होंने मच्छरों के जीनोम (डीएनए) में से गंध संवेदी ग्राहियों के लिए ज़िम्मेदार पूरे जीन समूह को ही निकाल दिया। किंतु अनुमान के विपरीत पाया गया कि गंध संवेदी ग्राहियों के अभाव के बावजूद मच्छर हमें ढूंढकर काटने का तरीका ढूंढ लेते हैं। मानव शरीर की गर्मी भी उन्हें आकर्षित करती है।

अधिकांश जंतुओं के घ्राण (गंध संवेदना) तंत्र की एक तंत्रिका कोशिका केवल एक प्रकार की गंध का पता लगा सकती हैं। लेकिन एडीज एजिप्टी मच्छरों की केवल एक तंत्रिका कोशिका भी अनेक गंधों का पता लगा सकती है। इसका मतलब है कि यदि मच्छर की कोई तंत्रिका कोशिका मनुष्य-गंध का पता लगाने की क्षमता खो देती है, तब भी मच्छर मानव की अन्य गंधों को पहचानने की क्षमता से उन्हें खोज सकते हैं। हाल ही में शोधकर्ताओं के एक दल ने 18 अगस्त को सेल नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि यदि मच्छर में मानव गंध का पता लगाने वाले कुछ जीन काम करना बंद भी कर दें तो भी मच्छर हमें सूंघ सकते हैं। अतः ज़रूरत हमें किसी ऐसी गंध की है जिसे मच्छर सूंघना पसंद नहीं करते हैं।

प्रभावी विकर्षक (रेपलेंट) मच्छरों को डेंगू और ज़ीका जैसे रोग पैदा करने वाले विषाणुओं को प्रसारित करने से रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। किसी भी अन्य जंतु की तुलना में मच्छर इंसानी मौतों के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेदार हैं। जितना बेहतर हम मच्छरों को समझेंगे  उतना ही बेहतर उनसे बचने के उपाय खोज सकेंगे।

मच्छर जैसे कीट अपने स्पर्शक और मुखांगों से सूंघते हैं। वे अपनी घ्राण तंत्रिका की कोशिकाओं में स्थित तीन प्रकार के सेंसर का उपयोग करके सांस से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड तथा अन्य रसायनों से मनुष्य का पता लगा लेते हैं।

पूर्व के शोधकर्ताओं ने सोचा था कि मच्छर के गंध ग्राही को अवरुद्ध करने से उनके मस्तिष्क को भेजे जाने वाले गंध संदेश बाधित हो जाएंगे और मच्छर मानव को गंध से नहीं खोज पाएंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ग्राही से वंचित मच्छर फिर भी लोगों को सूंघ सकते हैं और काटते हैं।

यह जानने के लिए रॉकफेलर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एडीज़ इजिप्टी नामक मच्छर की तंत्रिका कोशिकाओं में फ्लोरोसेंट लेबल जोड़े ताकि गंध को पहचानने की क्रियाविधि को समझा जा सके। हैरान करने वाली बात यह थी कि एक-एक घ्राण तंत्रिका कोशिका में कई प्रकार के सेंसर होते हैं और वे संवेदी केंद्रों के समान कार्य कर रहे थे।

वैज्ञानिकों ने मनुष्यों में पाए जाने वाले तथा मच्छरों को आकर्षित करने वाले विभिन्न रसायनों (ऑक्टेनॉल, ट्राइथाइल अमीन) के उपयोग से तंत्रिका कोशिका में विद्युत संकेत उत्पन्न किए जो एक-दूसरे से भिन्न थे।

यह स्पष्ट नहीं है कि लोगों की गंध का पता लगाने के लिए क्यों मच्छर अतिरिक्त तरीकों का उपयोग करते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति की गंध दूसरे से अलग होती है। शायद इसलिए मानव की गंध को भांपने के लिए मच्छरों में यह तरीका विकसित हुआ है। (स्रोत फीचर्स)

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प्राचीन कांसा उत्पादन के नुस्खे की नई व्याख्या

1976 में की गई खुदाई में शांग राजवंश के एक चीनी सेनापति फू हाओ के तीन हज़ार साल पुराने मकबरे से 1.5 टन से अधिक कांसा निकला था। खुदाई में प्राप्त वस्तुओं की तादाद से पता चलता है कि तत्कालीन चीन में कांस्य उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। और दिलचस्प बात यह रही है कि कांसे की कई पुरातात्विक वस्तुओं में काफी मात्रा में सीसा (लेड) पाया गया है। यह एक रहस्य रहा है कि कांसे में इतना सीसा क्यों है।

हाल ही में शोधकर्ताओं ने 2300 साल पुराने एक ग्रंथ में वर्णित कांस्य वस्तुएं बनाने के नुस्खे को नए ढंग से समझने की कोशिश की है। उनका निष्कर्ष है कि चीन के प्राचीन ढलाईघरों में कांसे की वस्तुएं बनाने के लिए पहले से तैयार मिश्र धातुओं का उपयोग किया जाता था। इससे पता चलता है कि – चीन का कांस्य उद्योग अनुमान से अधिक जटिल था।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद और अध्ययन के लेखक मार्क पोलार्ड बताते हैं कि किसी समय चीन प्रति वर्ष सैकड़ों टन कांसे का उत्पादन करता था।

वैसे दशकों से पुरातत्वविद काओगोंग जी नामक प्राचीन ग्रंथ को समझने की कोशिश करते आए हैं। काओगोंग जी 2500 साल पुराना एक तकनीकी विश्वकोश सरीखा ग्रंथ है। इसमें गाड़ी बनाने, वाद्ययंत्र बनाने से लेकर शहर बनाने तक के निर्देश-नियम दिए गए हैं। इसमें कांसे की वस्तुओं जैसे कुल्हाड़ी, तलवार और अनुष्ठानों में उपयोग होने वाले पात्रों को ढालने की भी छह विधियां बताई गई हैं। ये तरीके दो प्रमुख पदार्थों पर आधारित हैं: शिन और शाय। पूर्व विश्लेषणों में वैज्ञानिकों ने बताया था कि शिन और शाय कांसे के घटक (तांबा और टिन) हैं। लेकिन फिर भारी मात्रा में सीसा कहां से आया?

तो वास्तव में शिन और शाय क्या होंगे, इसे बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने प्राचीन कांस्य सिक्कों के रासायनिक विश्लेषणों को फिर से देखा। उनके अनुसार इनमें से अधिकांश सिक्के संभवत: दो खास मिश्र धातुओं को मिलाकर बनाए गए थे – पहली तांबा, टिन व सीसा की मिश्र धातु, और दूसरी तांबा व सीसा की मिश्र धातु।

एंटीक्विटी में प्रकाशित में नतीजों के अनुसार शिन और शाय तांबा और टिन नहीं इन दो मिश्र धातुओं के द्योतक हैं। ऐसा लगता है कि मिश्र धातुओं की सिल्लियां किसी अन्य जगह तैयार होती थीं, फिर इन्हें ढलाईघर पहुंचाया जाता था। इन सिल्लियों का उपयोग प्राचीन चीन में धातुओं के उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति के जटिल नेटवर्क का अंदाज़ा देता है। संभवत: यह नेटवर्क अनुमान से कहीं बड़ा था।

कुछ वैज्ञानिकों को लगता है कि इस बात के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं कि शिन और शाय शुद्ध तांबा और टिन नहीं बल्कि पहले से तैयार मिश्र धातु हैं। हो सकता है कि काओगोंग जी वास्तविक निर्माताओं द्वारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लिखा गया था। तो हो सकता है कि उन्होंने प्रमुख सामग्री – तांबा और टिन – का ही उल्लेख किया हो, अन्य का नहीं।

बहरहाल कांस्य वस्तुओं के निर्माण की तकनीक से उनसे जुड़ी सभ्यताओं को समझने में मदद मिलती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चबा-चबाकर खाइए और कैलोरी जलाइए

ब कैलोरी बर्न करने की बात आती है तो लोगों का ध्यान सरपट सैर, साइकिल चलाना या ऐसे ही व्यायामों की ओर जाता है, चबाने का तो विचार तक नहीं आता। अब, एक नवीन अध्ययन बताता है कि दिन भर में हमारे द्वारा खर्च की जाने वाली कुल ऊर्जा में से लगभग 3 प्रतिशत ऊर्जा तो चबाने की क्रिया में खर्च होती है। कुछ सख्त या रेशेदार चीज़ चबाएं तो थोड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च होगी। हालांकि यह ऊर्जा चलने या पाचन में खर्च होने वाली ऊर्जा से बहुत कम है, लेकिन अनुमान है कि इसकी भूमिका हमारे पूर्वजों के चेहरे को नया आकार देने में रही।

ऐसा माना जाता रहा है कि हमारे जबड़ों की साइज़ और दांतों का आकार चबाने को अधिक कुशल बनाने के लिए विकसित हुआ था। जैसे-जैसे हमारे होमिनिड पूर्वज आसानी से चबाने वाले भोजन का सेवन करने लगे और भोजन को काटने-पीसने और पकाने लगे तो जबड़ों और दांतों का आकार भी छोटा होता गया। लेकिन यह जाने बिना कि हम दिनभर में चबाने में कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, यह बता पाना मुश्किल है कि क्या वाकई ऊर्जा की बचत ने इन परिवर्तनों में भूमिका निभाई थी।

यह जानने के लिए मैनचेस्टर विश्वविद्यालय की जैविक मानव विज्ञानी एडम वैन केस्टरेन और उनके दल ने 21 प्रतिभागियों द्वारा खर्च की गई ऑक्सीजन और उत्पन्न कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा का मापन किया। इसके लिए प्रतिभागियों को एक हेलमेट जैसा यंत्र पहनाया गया था। फिर उन्हें 15 मिनट तक चबाने के लिए चुइंगम दी। यह चुइंगम स्वादहीन, गंधहीन और कैलोरी-रहित थी। ऐसा करना ज़रूरी था अन्यथा पाचन तंत्र सक्रिय होकर  ऊर्जा की खपत करने लगता।

चबाते समय प्रतिभागियों द्वारा प्रश्वासित वायु में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। यह दर्शाता है कि चबाने पर शरीर ने अधिक कार्य किया। जब चुइंगम नर्म थी तब प्रतिभागियों का चयापचय औसतन 10 प्रतिशत बढ़ा। सख्त चुइंगम के साथ चयापचय में 15 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई। यह प्रतिभागियों द्वारा दिन भर में खर्च की गई कुल ऊर्जा का 1 प्रतिशत से भी कम है लेकिन मापन-योग्य है। ये नतीजे साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक इससे पता चलता है कि खाना पकाना और औज़ारों का इस्तेमाल शुरू होने से पहले आदिम मनुष्य चबाने में बहुत अधिक समय बिताते होंगे। यदि प्राचीन मनुष्य दिन भर में वर्तमान गोरिल्ला और ओरांगुटान जितना भी चबाते होंगे तो शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वे दिन भर में खर्च हुई कुल ऊर्जा का कम से कम 2.5 प्रतिशत चबाने में खर्च करते होंगे।

ये नतीजे इस विचार का समर्थन करते हैं कि चबाने में सुगमता आने से वैकासिक लाभ मिला। चबाने में लगने वाली ऊर्जा की बचत का उपयोग आराम, मरम्मत और वृद्धि जैसी अन्य चीज़ों पर हुआ होगा।

चबाने में मनुष्यों द्वारा खर्च होने वाली ऊर्जा गणना से अन्य होमिनिड्स के विकास के बारे में भी एक झलक मिल सकती है। मसलन 20 लाख से 40 लाख साल पूर्व रहने वाले ऑस्ट्रेलोपिथेकस के दांत आधुनिक मनुष्यों की तुलना में चार गुना बड़े थे और उनके जबड़े विशाल थे। वे चबाने में अधिक ऊर्जा लगाते होंगे।

अन्य शोधकर्ता इस बात से सहमत नहीं है कि सिर्फ ऊर्जा की बचत ने जबड़ों और दांत के विकास का रुख बदला। इसमें अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अन्य कारकों की हो सकती है, जैसे ऐसे आकार के जबड़े विकसित होना जो दांतों के टूटने या घिसने की संभावना कम करते हों। प्राकृतिक चयन में संभवत: ऊर्जा दक्षता की तुलना में दांतों की सलामती को अधिक तरजीह मिली होगी, क्योंकि दांतों के बिना भोजन खाना मुश्किल है, और ऊर्जा मिलना भी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आधुनिक मनुष्य की आंत में घटते सूक्ष्मजीव

Chimpanzees eat their lunch at the Lwiro Primate Rehabilitation Center, 45 km from the city of Bukavu, February 14, 2022. – Alone or in groups, great apes jump from one branch to another, females carrying young on their backs make their way through the verdant reserve of the Lwiro Primate Rehabilitation Center (CRPL), in the east of the Democratic Republic of Congo. (Photo by Guerchom NDEBO / AFP) (Photo by GUERCHOM NDEBO/AFP via Getty Images)

मारी आंतों में उपस्थित असंख्य अच्छे बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव भोजन को पचाने में मदद करते हैं। इतना ही नहीं, ये हमारी प्रतिरक्षा, चयापचय क्रियाओं और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर हमारे शरीर को स्वस्थ भी रखते हैं। इनमें से कई सूक्ष्मजीव तो मनुष्यों के अस्तित्व में आने से पहले से मौजूद थे। इनमें से कई सूक्ष्मजीव लगभग सारे प्रायमेट प्राणियों में पाए जाते हैं जिससे संकेत मिलता है कि इन्होंने बहुत पहले इन सबके किसी साझा पूर्वज के शरीर में घर बनाया था।

लेकिन हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि मनुष्यों में इन सूक्ष्मजीवों की विविधता घट रही है और जैसे-जैसे मनुष्य शहरों की ओर बढ़ रहे हैं उनकी आंतों में विभिन्न सूक्ष्मजीवों कि संख्या में और गिरावट आ रही है। इसका मनुष्यों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

हमारी आंतों में पाए जाने विभिन्न प्रजातियों के सूक्ष्मजीवों के समूचे समूह को माइक्रोबायोम यानी सूक्ष्मजीव संसार कहा जाता है। इस माइक्रोबायोम में बैक्टीरिया, फफूंद, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव शामिल हैं जो किसी जीव (व्यक्ति या पौधे) में पाए जाते हैं। मनुष्यों और कई अन्य प्रजातियों में सबसे अधिक बैक्टीरिया आंतों में पाए जाते हैं। ये बैक्टीरिया रोगजनकों और एलर्जी के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया को तो प्रभावित करते ही हैं, मस्तिष्क के साथ अंतर्क्रिया के ज़रिए हमारे मूड को भी प्रभावित करते हैं।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी एंड्रयू मोएलर ने सबसे पहले बताया था कि आंत के सूक्ष्मजीवों और मनुष्यों के बीच सम्बंध लंबे समय में विकसित हुए हैं। उनके दल ने बताया था कि मनुष्य और प्रायमेट प्राणियों की आंत के सूक्ष्मजीवों के बीच समानताएं हैं जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इनकी उपस्थिति मनुष्यों की उत्पत्ति से भी पहले की है।

लेकिन इसके बाद किए गए अध्ययनों से पता चला है कि मानव आंत के माइक्रोबायोम में विविधता वर्तमान प्रायमेट्स की तुलना में काफी कम हो गई है। एक अध्ययन के अनुसार जंगली वानरों की आंतों में बैक्टेरॉइड्स और बाइफिडोबैक्टीरियम जैसे 85 सूक्ष्मजीव वंश उपस्थित हैं जबकि अमेरिकी शहरियों में यह संख्या केवल 55 है। कम विकसित देशों के लोगों में सूक्ष्मजीव समूहों की संख्या 60 से 65 के बीच है। ऐसे में यह अध्ययन शहरीकरण और सूक्ष्मजीव विविधता में कमी का सम्बंध दर्शाता है।      

युनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन की सूक्ष्मजीव विज्ञानी रेशमी उपरेती के अनुसार शहरों में प्रवास के साथ शिकार-संग्रह आधारित आहार में बदलाव, एंटीबायोटिक का उपयोग, तनावपूर्ण जीवन और बेहतर स्वच्छता के कारण मनुष्यों के आंतों के सूक्ष्मजीवों में काफी कमी आई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आंत के माइक्रोबायोम में कमी के कारण दमा जैसी बीमारियां बढ़ सकती हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से उन सूक्ष्मजीवों को खोजने का प्रयास किया है जो मनुष्यों की आंतों से गायब हो चुके हैं। उन्होंने अफ्रीकी चिम्पैंज़ी और बोनोबोस के कई समूहों के मल का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने मल के नमूनों से सूक्ष्मजीव डीएनए को अलग करके अनुक्रमित किया। इस अध्ययन के दौरान अन्य शोधकर्ताओं द्वारा पूर्व में एकत्रित गोरिल्ला और अन्य प्रायमेट्स के आंत के सूक्ष्मजीवों के डीएनए डैटा का भी उपयोग किया गया। इस तरह से कुल 22 मानवेतर प्रायमेट्स के डैटा का अध्ययन किया गया। कंप्यूटर की मदद से सूक्ष्मजीवों के पूरे जीनोम में डीएनए के टुकड़ों को अनुक्रमित किया गया। मनुष्यों के 49 समूहों से आंत के माइक्रोबायोम डैटा और मनुष्यों के जीवाश्मित मल से लिए गए डीएनए को प्रायमेट्स के साथ तुलना करने पर मोएलर विभिन्न सूक्ष्मजीव समूहों के बीच बदलते सम्बंधों को समझने में कामयाब हुए।

उन्होंने दर्शाया कि विकास के दौरान कुछ माइक्रोबायोम में विविधता आई जबकि कई अन्य गायब हो गए थे। इन सूक्ष्मजीवों में मनुष्य 100 में से 57 सूक्ष्मजीव गंवा चुके हैं जो वर्तमान में चिम्पैंज़ी या बोनोबोस में पाए जाते हैं। मोएलर ने यह भी अनुमान लगाने का प्रयास किया है कि ये सूक्ष्मजीव मनुष्य की आंतों से कब गायब हुए। इनमें से कई सूक्ष्मजीव तो कई हज़ारों वर्ष पहले गायब हो चुके थे जबकि कुछ हाल ही में गायब हुए हैं जिसमें से शहर में रहने वालों ने अधिक संख्या में इन सूक्ष्मजीवों को गंवाया है।

यह पता लगाना एक चुनौती है कि कोई सूक्ष्मजीव किसी मेज़बान की आंत से गायब हो चुका है। कई सूक्ष्मजीव इतनी कम संख्या में होते हैं कि शायद वे मल में प्रकट न हों। इस विषय में अध्ययन जारी है और शहर से दूर रहने वालों के माइक्रोबायोम को एकत्रित कर संरक्षित किया जा रहा है। वैसे कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि यह कोई बड़ी क्षति नहीं है। शायद अब मनुष्यों को उन सूक्ष्मजीवों की ज़रूरत ही नहीं है। अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार आवश्यक सूक्ष्मजीवों को दोबारा से हासिल करने के लिए उनकी पहचान करना सबसे ज़रूरी है। हो सकता है कि इन सूक्ष्मजीवों को प्रोबायोटिक्स की मदद से बहाल किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)

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महिला वैज्ञानिकों को उचित श्रेय नहीं मिलता

वैज्ञानिक शोध कार्य टीम द्वारा मिलकर किए जाते हैं। लेकिन हमेशा टीम के सभी लोगों को काम का बराबरी से या यथोचित श्रेय नहीं मिलता। हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि करियर के समकक्ष पायदान पर खड़े वैज्ञानिकों में से महिलाओं को उनके समूह के शोधकार्य के लेखक होने का श्रेय मिलने की संभावना पुरुषों की तुलना में कम होती है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिलाओं के प्रति इस तरह की असमानताओं का असर वरिष्ठ महिला वैज्ञानिकों को करियर में बनाए रखने और युवा महिला वैज्ञानिकों को आकर्षित करने की दृष्टि से सकारात्मक नहीं होगा।

पूर्व अध्ययनों में पाया गया है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के कई क्षेत्रों में महिलाएं अपनी मौजूदगी की अपेक्षा कम शोध पत्र लिखती हैं। लेकिन ऐसा क्यों है, अब तक यह पता लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है – क्योंकि यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल था कि लेखकों की सूची में शामिल करने योग्य किन व्यक्तियों को छोड़ दिया जाता है। नए अध्ययन ने यूएस-स्थित लगभग 10,000 वैज्ञानिक अनुसंधान टीमों के विशिष्ट विस्तृत डैटा तैयार कर इस चुनौती को दूर कर दिया है। अध्ययन में वर्ष 2013 से 2016 तक इन 10,000 टीमों में शामिल रहे 1,28,859 शोधकर्ताओं और उनके द्वारा विभिन्न पत्रिकाओं में लिखे गए 39,426 शोध पत्रों से सम्बंधित डैटा इकट्ठा किया गया। इन आंकड़ों से शोधकर्ता यह पता करने में सक्षम रहे कि किन व्यक्तियों ने साथ काम किया और अंततः श्रेय किन्हें मिला। (अध्ययन में नामों के आधार पर लिंग का अनुमान लगाया गया है, इससे अध्ययन में आंकड़े थोड़ा ऊपर-नीचे होने की संभावना हो सकती है और इस तरीके से गैर-बाइनरी शोधकर्ताओं की पहचान करना मुश्किल है।)

अध्ययन की लेखक पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर ब्रिटा ग्लेनॉन बताती हैं कि अक्सर लेखकों की सूची में महिलाओं का नाम छोड़े जाने के किस्से सुनने को मिलते थे। “मैं कई महिला वैज्ञानिकों को जानती हूं जिन्होंने यह अनुभव किया है लेकिन मुझे इसका वास्तविक पैमाना नहीं पता था। वैसे हर कोई इसके बारे में जानता था लेकिन वे मानते थे कि ऐसा करने वाले वे नहीं, कोई और होंगे।”

ग्लेनॉन स्वीकार करती हैं कि यह अध्ययन हर उस कारक को नियंत्रित नहीं कर सका है जो यह निर्धारित करता है कि कौन लेखक का श्रेय पाने के योग्य है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि शोध टीमों में काम करने वाले कुछ पुरुषों ने आधिकारिक तौर पर संस्था में रिपोर्ट किए गए कामों के घंटों की तुलना में अधिक घंटे काम किया हो या समूह के काम में उनका बौद्धिक योगदान अधिक रहा हो।

हालांकि, वे यह भी ध्यान दिलाती हैं कि महिलाएं बताती हैं कि उन्हें जितना श्रेय मिलना चाहिए उससे कम मिलता है। नए अध्ययन के हिस्से के रूप में 2446 वैज्ञानिकों के साथ किए गए एक सर्वेक्षण में देखा गया कि पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने कहा कि उन्हें लेखक होने के श्रेय से बाहर रखा गया और उनके साथियों ने शोध में उनके योगदान को कम आंका था। और पिछले साल प्रकाशित 5575 शोधकर्ताओं पर हुए एक अध्ययन में बताया गया था कि पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाओं ने लेखक होने का श्रेय देने के फैसले को अनुचित माना।

ग्लेनॉन कहती हैं हर प्रयोगशाला में प्रमुख अन्वेषक स्वयं अपने नियम गढ़ता है और वही तय करता है कि लेखक का श्रेय किन्हें मिलेगा। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों और प्रयोगशालाओं में एकरूपता नहीं दिखती। यह पूर्वाग्रहों को मज़बूत कर सकता है। जैसे, किसी ऐसे व्यक्ति को श्रेय मिल सकता है जो प्रयोगशाला में अधिक दिखाई देते हों। अत: फंडिंग एजेंसियों या संस्थानों को लेखक-सूची में शामिल करने के लिए स्पष्ट नियम निर्धारित करने चाहिए। लेखक का फैसला सिर्फ मुखिया पर नहीं छोड़ा जा सकता। (स्रोत फीचर्स)

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क्या मौत की चेतावनी से दुर्घटनाएं टलती हैं?

पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने हाइवे के किनारे लगे इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर उस सड़क पर हुई सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या दर्शाना शुरू किया था ताकि लोग इन आकड़ों से सबक लेकर सुरक्षित तरीके से गाड़ी चलाएं और सड़क हादसे कम हों। लेकिन एक नया विश्लेषण बताता है कि हाइवे पर ऐसे संकेतों से दुर्घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ सकती हैं।

इसके पीछे सोच यह थी कि वाहन चालकों का ध्यान इन दुर्घटनाओं की तरफ आकर्षित होगा जो उन्हें जोखिम भरी ड्राइविंग न करने के लिए प्रेरित करेगा। टेक्सास प्रांत में 2012 से लगातार वर्ष भर में सड़क हादसों में हुई मौतों को दर्शाया जा रहा है। लेकिन इसके असर का कभी बारीकी से अध्ययन नहीं किया गया था।

इन चेतावनियों का असर जानने के लिए मिनेसोटा युनिवर्सिटी के बिहेवियरल इकॉनॉमिस्ट जोशुआ मैडसन और युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के परिवहन अर्थशास्त्री जोनाथन हॉल ने मिलकर अध्ययन किया।

हाइवे पर सड़क दुर्घटना में हुई मृत्यु के आंकड़े दर्शाने की प्रत्येक राज्य की नीति अलग है। कई राज्य दिन के केवल सुरक्षित समय ही ये आंकड़े दिखाते हैं, भीड़-भाड़ के समय नहीं जब अन्य ट्रैफिक संदेश दिखाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन टेक्सास पर केंद्रित किया, जहां राजमार्गों पर लगे 880 साइन बोर्ड्स पर हर महीने लगातार एक सप्ताह के लिए ये आंकड़ें प्रदर्शित किए जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 2010 से 2017 के बीच प्रभावित सड़कों पर हुई सभी सड़क दुर्घटनाओं का डैटा इकट्ठा किया। उन्होंने बोर्ड पर मृत्यु के आंकड़े दर्शाए जाने वाले हफ्ते में हुई दुर्घटनाओं की तुलना बाकी महीने में हुई दुर्घटनाओं की संख्या से की। तुलना करते समय उन्होंने ध्यान रखा हफ्ते के समान दिन (जैसे मंगलवार) और समान घंटे में होने वाली दुर्घटनाओं के बीच तुलना की जाए। उन्होंने तुलना में मौसम और छुट्टियों जैसे कारकों को भी नियंत्रित किया, जो अपने आप में दुर्घटनाओं की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं।

साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में 8,44,939 दुर्घटनाओं का विश्लेषण करने पर पता चला है कि जिस दौरान सड़क मौतों की संख्या प्रदर्शित की गई उस दौरान साइन बोर्ड से 10 किलोमीटर आगे तक के मार्ग पर होने वाली दुर्घटनाओं में 1.35 प्रतिशत की वृद्धि हुई। शोधकर्ताओं का मत है कि वाहन चलाते समय मौत के आंकड़े दिखने पर वाहन चालक का ध्यान बहुत अधिक विचलित होता है, नतीजतन दुर्घटना होती है।

अन्य शोधकर्ताओं को लगता है कि अधिक मृत्यु संख्या के प्रदर्शन के समय अधिक हादसों की बात ठीक नहीं लगती, क्योंकि वाहन चालक वास्तव में मौतों की संख्या के आधार पर अलग-अलग तरह से सोचते नहीं होंगे। सड़क हादसों में वृद्धि के कारण जानने के लिए और शोध की ज़रूरत है। बहरहाल, यह अध्ययन इतना तो बताता ही है कि चेतावनी संदेश सड़क हादसों में कमी लाने में कारगर नहीं हैं। यह पता लगाने की ज़रूरत है कि किस तरह के संदेश सुरक्षित ड्राइविंग को प्रेरित करेंगे, ताकि दुर्घटनाओं को रोका जा सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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