पौधों और कीटों की जुगलबंदी

अपूर्वा आचार्य

ल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।

वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।

युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।

अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।

पेड़पौधों की वंशवृद्धि

वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।

दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?

परागण: कुदरती कूरियर सेवा 

फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।

परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।

देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है। 

चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।

हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।

जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।

फूलदार पौधे और कीटों का सहविकास

लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।

फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।

इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए। 

पौधों और कीटों के बदलाव

विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।

साजसज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।

मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।

चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।

कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।

परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है। 

गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।

यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।

जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।

क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।  

हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।

परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।

वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां

वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।

बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।

परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।

अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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झगड़े से बचना हो तो गले मिलें

किसी ने खुलकर गले लगाया हो, ज़ोरदार झप्पी दी हो, तो उसके बाद उस पर बरस पड़ना या उससे जमकर झगड़ना मुश्किल होता है। हमारा यह अनुभव रहा है कि सकारात्मक स्पर्श (positive touch) – हाथ थामना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन वगैरह आपसी रिश्तों को मज़बूत करते हैं।

और अब, ऐसा वानरों में भी देखा गया है। देखा गया है कि तनाव की स्थिति में रिश्ते बनाए रखने के लिए, तनाव टालने के लिए बोनोबो और चिम्पैंज़ी (bonobo & chimpanzee) गले मिलते हैं, हाथ पकड़ते हैं। इस बात का पता लगा है दो अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ी समूहों के अवलोकन से।

डरहम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और ज़ाम्बिया के अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ियों के पांच समूह का अध्ययन किया। शोधकर्ता वानरों के बाड़े की बागड़ पास जाकर समय-समय वानरों को पुकारते थे। वानर बाड़े के किनारे आ जाते थे और भोजन का इंतज़ार करते थे। कुछ समय बाद, शोधकर्ता मूंगफली (Peanuts) से भरा एक बर्तन बाड़े में रख देते थे, जिसमें अपर्याप्त मात्रा में मूंगफली होती थी। कम मात्रा में मूंगफली होने के कारण वानरों में उन्हें लेने के लिए होड़ (competition) मच जाती थी। ऐसा करते समय शोधकर्ताओं ने मूंगफली मिलने से पहले, मूंगफली लेते और खाते समय, और खाने के बाद वानरों के आपसी व्यवहार का अवलोकन किया।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो वानर मूंगफली मिलने से कुछ देर पहले एक-दूसरे को गर्मजोशी (हाथ पकड़ना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन आदि) से स्पर्श करते थे, वे आपस में मूंगफली के लिए लड़ने की बजाय उसे मिल-बांटकर (sharing) खाते थे। ऐसा स्वभाव अधिकतर शांतिप्रिय समूहों (peace-loving groups) में देखा गया। यह दर्शाता है कि दोस्ताना स्पर्श (friendly touch) सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करता है और होड़ कम करता है। और तो और, यह तक देखा गया कि कुछ नर चिम्पैंज़ी एक-दूसरे के मुंह में अपनी उंगलियां दे रहे थे। गौरतलब है कि वानर समूहों में मुंह में उंगली देना तनाव या झगड़े की स्थिति में खतरे से खाली नहीं होता – लड़ाई-झगड़े की स्थिति में वानर प्रतिद्वंद्वी की उंगली बुरी तरह काट कर उसे चोटिल कर सकते हैं। लेकिन अपर्याप्त भोजन होने की स्थिति में भी वानरों का मुंह में उंगली डालकर जोखिम उठाना उनके भरोसे और मज़बूत रिश्ते (trust & solid relations) का द्योतक था।

बोनोबो और चिंपैंज़ी हमारे करीबी रिश्तेदार हैं; इस साझा व्यवहार से लगता है कि गर्मजोशी (excitement) जताकर शांति बनाए रखने का व्यवहार हमारे साझा पूर्वजों की देन है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज़ेब्राफिश हमारी तरह सोती है

क हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।

हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।

यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।

सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।

गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।

इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।

हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।

(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या कॉकरोच का दूध प्रोटीन संकट का समाधान होगा?

डॉ. इरफाना बेगम (बिलन्दवी)

छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!

दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।

पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।

वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।

इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।

यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।

इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।

इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।

जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।

इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।

यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?

इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।

विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक चूहा जिसकी बस्ती में सिर्फ रानी के बच्चे होते हैं

डॉ. विजय दुआ

नैकेड मोल रैट (Heterocephalus glaber) को हिन्दी में नग्न तिल चूहा कहा जाता है। इसे सैंड पपी (sand puppy) भी कहते हैं। इसके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। ये पूर्वी अफ्रीका के सूखे इलाकों में ज़मीन के नीचे सुरंग बनाकर रहने वाले अनोखे जीव हैं। ये सामाजिक जीव हैं और इनकी बस्ती में सिर्फ एक मादा (रानी) ही प्रजनन कार्य करती है।

टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा की तंत्रिका वैज्ञानिक मेलिसा होम्स के अनुसार लंबे समय से यह एक पहेली रही है कि कैसे इनके समूह में केवल एक मादा (रानी) ही प्रजनन (reproduction) का कार्य करती है जबकि समूह की शेष सभी मादाएं (females) रानी की संतानों के पालन पोषण और भोजन जुटाने जैसे काम करती हैं। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़े हैं।

हाल ही में नग्न तिल चूहे के बारे में नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रानी एक प्रकार के रसायन का स्राव करती है, जिसकी गंध से समूह में उपस्थित अन्य मादाओं की प्रजनन क्रिया रोक दी जाती है! यह गंध अन्य मादा में हॉर्मोन (hormone) बनने की प्रक्रिया पर असर डालती है, और उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता दब जाती है। यह अध्ययन बर्लिन स्थित मैक्स डेलब्रुक सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक मोहम्मद खल्लाफ और उनके साथियों ने किया है। उन्होंने एक बस्ती में अलग-अलग सामाजिक श्रेणी के नग्न तिल चूहों के शरीर पर से फोहों में सोखकर रसायन प्राप्त किए। उन्होंने पाया कि एक रसायन है (आइसोप्रोपाइल मिरिस्टेट, आई.पी.एम.) जो रानी के शरीर पर तो प्रचुरता में उपस्थित था लेकिन बस्ती के अन्य सदस्यों पर नगण्य ही था। और तो और, रानी चूहे में भी इस रसायन की मात्रा प्रजनन चक्र के अनुसार बदलती है; विशेषकर अंडोत्सर्ग के समय सर्वाधिक रहती है। मस्तिष्क इमेजिंग (brain imaging) में भी देखा गया कि प्रजनन में अक्षम मादाएं ही आई.पी.एम. (IPM) की गंध के प्रति संवेदनशील होती हैं।

हालांकि मधुमक्खियों, चींटियों, दीमकों आदि कई अन्य सामाजिक (यूसोशल) जन्तुओं में भी सिर्फ रानी प्रजनन कार्य करती है, लेकिन उनमें बस्ती की बाकी मादा सदस्यों के प्रजनन अंग अविकसित रहते हैं और उनमें एक हॉर्मोन प्रोलैक्टिन (prolectin) का स्तर भी बढ़ा हुआ रहता है। परन्तु नग्न तिल चूहों में सभी मादाओं में प्रजनन क्षमता होते हुए भी वे यौवनारंभ (प्यूबर्टी) में ही अटकी रह जाती हैं, कभी संतानोत्पत्ति नहीं करतीं।

खल्लाफ की टीम ने इस रसायन की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रयोग और किया था। उन्होंने कुछ प्रजनन-अक्षम (unreproductive) चुहियाओं को बस्ती से अलग कर दिया और शेष मादाओं में एक औषधि की मदद से उनकी गंध संवेदना (smell senses) को अवरुद्ध कर दिया। दोनों ही मामलों में ऐसी मादाओं में प्रोलैक्टिन का स्तर घट गया और वे नरों के साथ समागम करने में समर्थ हो गईं। यह भी देखा गया कि रानी की अनुपस्थिति में भी सिर्फ आई.पी.एम. की उपस्थिति प्रजनन को रोकने के लिए पर्याप्त थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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साल वनों का संकट और एकीकृत कीट प्रबंधन

सुदर्शन सोलंकी

ध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।

प्रकोप के कारक

यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।

परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे

आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।

दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल  जाते हैं।

शुद्ध वन और जैवविविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।

वृक्षों पर प्रभाव

वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।

लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।

भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:

सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।

सबहिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।

वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।

क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?

पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।

एकीकृत कीट प्रबंधन

घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।

इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।

एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।

जैविक नियंत्रण  भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।

डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पेड़ों का काल: एक भृंग

दुनिया भर के शहरी और जंगली पेड़ों पर भारी आक्रमण हो चुका है। एक कीट विशालकाय पेड़ों को तेज़ी से तबाह करने पर तुला है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक एक छोटे से भृंग (बीटल) की आक्रामक प्रजाति दक्षिण अफ्रीका की ‘ओक सिटी’ (oak city)कहे जाने वाले स्टेलनबोश शहर के ऐतिहासिक और विशाल इंग्लिश ओक पेड़ों को तबाह करने के बाद अब कैलिफोर्निया, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के पेड़ों को अपना शिकार बना रही है। 

पोलीफेगस शॉट-होल बोरर (Euwallacea fornicatus) (polyphagous shot hole borer beetle) भृंग मात्र 2 मि.मी. लंबा (तिल बराबर) होता है। मूल रूप से पूर्वी एशिया (चीन, वियतनाम) में पाए जाने वाला यह कीट पिद्दा होने के कारण जाने-अनजाने लकड़ी के सामान, पैकेजिंग खोकों और पौधों के आयात-निर्यात के ज़रिए दुनिया भर में अपनी जड़ें जमा चुका है।

मादा भृंग पेड़ के तनों में बारीक सुराख करके अंडे देती है और साथ में एक सहजीवी कवक छोड़ देती है। इस कवक के फलकाय (fungal fruiting bodies) को नवजात भृंग भोजन के रूप में लेते हैं। लेकिन नवजात भृंगों (infant beetels) द्वारा बनाई गई संकरी सुरंगे और कवक की लगातार वृद्धि से पेड़ की जल प्रणाली पूरी तरह ठप हो जाती है, और धीरे-धीरे पेड़ का तना भुरभुरा होकर सूख जाता है।  

चिंताजनक बात यह है कि इस भृंग की केवल एक मादा ही संक्रमण फैलाने के लिए काफी होती है। क्योंकि मादा के अनिषेचित अंडों (unfertilized egg) से नर भृंग पैदा होते हैं, जो उसी मादा से प्रजनन कर सकते हैं। मादा कीट उड़कर अन्य स्वस्थ पेड़ों को संक्रमित कर सकती है, जबकि नर भृंग उड़ नहीं पाते और उसी पेड़ पर बने रहते हैं।

शॉट-होल बोरर जैसी कई प्रजातियां हैं, जिनके बीच अंतर करना लगभग नामुमकिन है। इसी कारण लगभग एक दशक तक यह कीट कैलिफोर्निया में मौजूद होने के बावजूद ओझल रहा। शुरुआती दौर में, भ्रमवश इसे ‘टी शॉट-होल बोरर’ (Euwallacea perbrevis) मान लिया गया था। अब शोधकर्ताओं ने डीएनए अनुक्रमण की मदद से दोनों प्रजातियों में अंतर स्पष्ट कर लिया है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि ये भृंग अपने मूल स्थानों से कम से कम छह बार दूसरे देशों तक पहुंच चुके हैं। यह भी अनुमान है कि भविष्य में ये भूमध्य सागर के इलाकों, दक्षिण-पूर्वी अमेरिका, मेडागास्कर, और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में तबाही मचा सकते हैं। वन कीटविज्ञानी नकामुराकारे इसे पेड़ों के लिए ‘उभरते भयानक तूफान’ के तौर पर देखते हैं।

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में 2021 में इसकी रोकथाम के लिए चार करोड़ डॉलर और पांच हज़ार संक्रमित पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है। फिर भी इस कीट का खात्मा नहीं हो पाया। वैसे इस कीट और कवक की जोड़ी देखने के बाद रोकथाम के नए उपाय मिलने की उम्मीद है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो यह कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के फलदार पेड़ों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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ऑक्टोपस ने त्रुटिरहित प्रोटीन निर्माण की राह दिखाई

क्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।

समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।

खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।

अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी . कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने . कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें  पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।

शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।

ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनस्पतियों का अदृश्य संवाद

सुदर्शन सोलंकी

बीसवीं सदी के अंत तक, पादप पारिस्थितिकी मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक चयन’ और प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा (Interspecific Competition) के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह स्थापित धारणा थी कि किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में वनस्पति केवल सूर्य के प्रकाश, जल और मृदा के पोषक तत्वों के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं। फिर, 1997 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की पादप विज्ञानी डॉ. सुज़ैन सिमार्ड द्वारा नेचर में प्रकाशित एक ऐतिहासिक शोध पत्र ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।

सिमार्ड और उनकी टीम ने कार्बन-14 (कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक) और कार्बन-13 (स्थिर समस्थानिक) का उपयोग करके यह प्रमाणित किया कि वनस्पतियां आपस में कवक-तंतुओं के माध्यम से रासायनिक रूप से जुड़ी हुई हैं। इस सहजीवी प्रणाली को माइकोराइज़ल नेटवर्क (mycorrhizal network) कहा गया, जो पादप विज्ञान में पारस्परिक सहयोग की एक नई धारणा के रूप में सामने आई। यह भूमिगत फफूंदों (कवक) और पौधों की जड़ों के बीच समन्वय होता है। एक मायने में यह पादप विज्ञान में पैराडाइम शिफ्ट था।

संरचना और सहजीवन

माइकोराइज़ल नेटवर्क  भूमिगत अंतःसंचार प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार के कवकों पर आधारित होती है। एक होते हैं एक्टोमाइकोराइज़ा (actomycorrhiza), जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण वनों के वृक्षों की जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरे होते हैं अर्बस्कुलर माइकोराइज़ा (arbuscular mycorrhiza), जो पादप जड़ों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश करके घनिष्ठ अंतःसम्बंध स्थापित करते हैं।

यह नेटवर्क एक परिष्कृत जैविक और पारस्परिक सहजीवी विनिमय से संचालित होता है। प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया से पादप कार्बन का स्थिरीकरण करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। वे उसका लगभग 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा इन कवक तंतुओं (मायसेलियम) (mycellium) को स्थानांतरित कर देते हैं। बदले में, ये कवक तंतु (जो अपनी सूक्ष्म संरचना के कारण मिट्टी के अत्यंत बारीक छिद्रों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं) पेड़-पौधों को पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त करने में मददगार होते हैं। यह जटिल नेटवर्क वनस्पति जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 1000 गुना तक विस्तृत कर देता है, जिससे पूरे वन क्षेत्र की पोषण क्षमता सुदृढ़ होती है।

संकेतन तंत्र

पादपों में जंतुओं की तरह कोई केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली नहीं होती, परंतु वे विशिष्ट जैव-रासायनिक और विद्युतीय संकेतों के माध्यम से इस कवक नेटवर्क (funal network) को एक ‘सिग्नलिंग चैनल’ (signaling channel) की तरह उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे कई तरह के संकेत (signals) प्रेषित कर पाते हैं। जैसे,

शाकाहारी आक्रमण: जब किसी वन क्षेत्र में शाकाहारी कीटों का हमला होता है, तो प्रभावित पादप तुरंत जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic acid) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्पादन करते हैं। इसे वे अपनी जड़ों के माध्यम से कवक जाल में पहुंचा देते हैं। यह रासायनिक संकेत पड़ोसी पादपों तक पहुंचता है। यह एक उद्दीपन होता है जिससे वे पादप अपनी पत्तियों में टैनिन और फिनोलिक्स जैसे विषाक्त रसायनों का संचय बढ़ा लेते हैं, जिससे पत्तियां कीटों के लिए अभोज्य हो जाती हैं।

जल तनाव: गंभीर जल तनाव या सूखे की स्थिति में पादपों द्वारा उत्सर्जित एब्सिसिक एसिड (ABA) इस नेटवर्क के माध्यम से अन्य वृक्षों को सचेत करता है, जिससे वे अपने पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) को आंशिक रूप से बंद कर वाष्पोत्सर्जन की दर घटा लेते हैं।

रोगजनक कवक का आक्रमण: प्रयोगशालाओं में देखे गए साक्ष्यों के अनुसार, रोगजनक कवक (disease causing fungi) के आक्रमण के समय सैलिसिलिक एसिड का प्रवाह पूरे नेटवर्क में सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेज़िस्टेंस (systemic accquired resistence) को सक्रिय करता है, जिससे स्वस्थ पादपों में मात्र 6 से 18 घंटे के भीतर रक्षात्मक एंज़ाइम क्रियाशील हो जाते हैं।

‘मदर ट्री’ (Mother tree) और सहोदरों की पहचान: इस नेटवर्क का सबसे विस्मयकारी वैज्ञानिक पहलू तब सामने आता है जब हम वन के सबसे वयोवृद्ध और विशाल वृक्षों का अध्ययन करते हैं। जिन्हें पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘मदर ट्री’ या ‘हब ट्री’ (hub tree) कहा जाता है। ये विशाल वृक्ष इस भूमिगत कवक जाल के मुख्य केंद्र या ‘राउटर’ (router) की तरह कार्य करते हैं, जहां से ऊर्जा और संसाधनों का प्रवाह नियंत्रित होता है। कभी-कभी वन के सघन चंदवे या छतरी के कारण छोटे नवजात पौधों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता और वे प्रकाश संश्लेषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसा होने पर ये मदर ट्री इस कवक नेटवर्क के माध्यम से अपने संचित कार्बन और नाइट्रोजन को उन कमज़ोर पौधों की ओर प्रवाहित करते हैं।

कनाडा के वनों में किए गए अध्ययनों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि ये वृद्ध वृक्ष सहोदर पहचान (किन्शिप रिकग्निशन) (kinship recognition) की क्षमता रखते हैं। वे रासायनिक संकेतों के माध्यम से यह पहचान लेते हैं कि कौन-सा अंकुरित पौधा उन्हीं के बीजों से विकसित हुआ है, और वे जानबूझकर अपनी प्रजाति के और विशेषकर अपने स्वयं के सहोदर पौधों को अन्य पौधों की तुलना में अधिक मात्रा में पोषण और सुरक्षात्मक रसायन स्थानांतरित करते हैं। और तो और, जब ये मदर ट्री मरणासन्न अवस्था में होते हैं, तो वे अपनी बची हुई अधिकांश कार्बनिक ऊर्जा और रक्षात्मक आनुवंशिक सूचनाएं इस नेटवर्क के ज़रिए युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं। यह वनस्पति जगत की एक अदभुत प्राकृतिक वसीयत है।

पारिस्थितिकीय संकट 

यह भूमिगत तंत्र हमें जितना सुदृढ़ दिखाई देता है, आधुनिक मानवीय हस्तक्षेपों के प्रति उतना ही संवेदनशील भी है। वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई और सघन एकफसली कृषि (moncropping) के कारण यह सदियों पुराना माइकोराइज़ल नेटवर्क खंडित हो रहा है, जिससे वनों की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की इस कवक संरचना को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे कृत्रिम रूप से उगाए गए पौधे इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो जाते हैं।

यद्यपि समकालीन पादप विज्ञान ने इस ‘अदृश्य संवाद’ की बुनियादी रूपरेखा को समझ लिया है, परंतु विभिन्न पादप प्रजातियों के मध्य होने वाले सूक्ष्म रासायनिक विनिमय के पूर्ण कोड को डिकोड करना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंततः, यह शोध हमें यह संदेश देता है कि वन केवल वृक्षों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि एक एकीकृत, परस्पर निर्भर और सचेत जैव-प्रणाली हैं, जिनका संरक्षण समग्र रूप में ही संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सूखे से मात नहीं खाते ये गगनचुंबी पेड़!

ह मानना स्वाभाविक लगता है कि ऊंचे पेड़, छोटे पेड़ों की तुलना में सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। क्योंकि सूखे के हालात में लंबे पेड़ जड़ों से एक हद से ऊपर पानी पहुंचाने में नाकामयाब रहेंगे और जल्दी दम तोड़ देंगे। लेकिन हाल के एक अध्ययन ने इस सोच को बदल दिया है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन मलेशिया के बोर्नियो द्वीप (borneo island) स्थित काबिली सेपिलोक फॉरेस्ट रिज़र्व में कार्डिफ युनिवर्सिटी के वन पारिस्थितिकीविद पाउलो बिटनकोर्ट और उनकी टीम ने डिप्टेरोकार्प जीनस (वंश) के पेड़ों पर किया। डिप्टेरोकार्प (Dypterocarp) दुनिया के सबसे ऊंचे और विशाल पेड़ों में शुमार है, जिनकी ऊंचाई लगभग 45 मीटर से 100 मीटर तक होती है। ये दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical rainforests) में ऊंचाई वाले इलाकों में पाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने डिप्टेरोकार्प की पांच प्रजातियों के 38 अलग-अलग पेड़ों (ऊंचाई 7.1 मीटर से लेकर 71 मीटर) की शाखाओं और तने के भीतरी हिस्से (ट्रंक कोर) (trunk core) के नमूने लिए। अलग-अलग ऊंचाई वाले पेड़ों से लिए गए नमूनों का अध्ययन करके आसानी से पता लगाया जा सका कि ऊंचाई बढ़ने से पेड़ों की जल-प्रणाली (vascular system) पर क्या असर पड़ता है और बदलते पर्यावरण के प्रति ये ऊंचे पेड़ कैसे अनुकूलन करते हैं। 

अध्ययन में पाया गया कि ऊंचे पेड़ों में सूखे के दौरान पानी की आपूर्ति के लिए कुछ अंदरूनी बदलाव हुए थे। लंबे पेड़ों के तनों के निचले हिस्से वाली जल वाहिकाएं (ज़ायलम) (xylem) छोटे पेड़ों की तुलना में दुगनी चौड़ी थीं – चौड़ी वाहिकाएं होने से घर्षण कम हुआ और पानी के ऊपर पहुंचने में रुकावट भी कम हुई।

आम तौर पर सूखे की स्थिति में पेड़ों की जल वाहिकाओं में हवा के बुलबुले (air space) बन जाते हैं, जिससे पानी के स्थानांतरण में रुकावट पैदा होती है। इस प्रक्रिया को ‘एम्बोलिज़्म’ (embolism) कहते हैं। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने नमूनों वाले ऊतकों में एम्बोलिज़्म के लक्षण कृत्रिम रूप से पैदा करके उनके निर्जलीकरण (dessication) की सीमा का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि छोटे और ऊंचे पेड़ों के ऊतक एम्बोलिज़्म के प्रति एक जैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे थे। जिससे यह साबित हुआ कि पेड़ की ऊंचाई और एम्बोलिज़्म जैसी परिस्थिति का इनके सूखे के प्रति संवेदनशीलता से कोई सीधा सम्बंध नहीं हैं। अलबत्ता, छोटे पेड़ों की तरह ही ये बड़े पेड़ भी एम्बोलिज़्म से खुद-ब-खुद निपट रहे थे।

इसके साथ ही यह भी देखा गया कि इन विशाल पेड़ों के ऊपरी भाग की पत्तियां, निचले भाग की पत्तियों के मुकाबले सूखा सहन करने में ज़्यादा सक्षम थीं। ये पत्तियां पानी की भारी कमी होने पर भी मुरझाने की बजाय प्रकाश संश्लेषण (photosyntesis) की प्रक्रिया कर पा रही थीं।

इस निष्कर्ष को और भी गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एल नीनो (el nino) से प्रभावित हुए 42 अन्य डिप्टेरोकार्प पेड़ों को जांचा। परिणाम चौंकाने वाले थे। सूखे से निपटने के लिए ऊंचे और छोटे पेड़ों की वृद्धि समान रूप से धीमी हुई थी। ऐसे ही एक अन्य अध्ययन में यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के पारिस्थितिकीविद एड्रियन दास ने पाया था कि सूखे के हालात में पेड़ों की ऊंचाई की बजाय कीट या बीमारियों के प्रकोप जैसे अन्य बाहरी कारणों का असर ज़्यादा होता है।

पेड़ों में पानी के पहुंचने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और अनोखी है, जिसका सटीक अंदाज़ा सिर्फ पेड़ की ऊंचाई से नहीं लगाया जा सकता। यह प्रक्रिया विशेष ऊतकों (जिन्हें ज़ाइलम कहा जाता है) के माध्यम से होती है। इस प्रक्रिया में एक से अधिक तंत्र शामिल होते हैं, जैसे – परासरण (osmosis) के द्वारा जड़ों द्वारा पानी सोखा जाना, पत्तियों के पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) (stomata) से होने वाले वाष्पोत्सर्जन की वजह से उत्पन्न खिंचाव (ट्रांसपिरेशनल पुल), जड़ों द्वारा आरोपित दाब (रूट प्रेशर), और केशिका क्रिया (केपिलरी एक्शन)। ये सब मिलकर पानी को गुरुत्वाकर्षण (gravitational force) के विरुद्ध पेड़ के ऊपरी भाग तक पहुंचाते हैं।

अब तक वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के चलते विशाल पेड़ों को सूखे के प्रति कमज़ोर मानते आ रहे थे। लेकिन इस अध्ययन ने वैज्ञानिकों को चेताया है कि केवल पेड़ की लंबाई नापकर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह सूखा झेल सकेगा या नहीं। साथ ही, यह भी फिलहाल स्पष्ट नहीं है कि अन्य वंशों के पेड़ भी सूखे से निपटने के लिए ऐसे ही बदलाव अपनाते हैं या नहीं। इसलिए वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर वन संरक्षण के मॉडल (forest conservation models) तैयार करते समय नए तरीके अपनाने होंगे। बहरहाल, सूखे में इन विशाल पेड़ों का इस मज़बूती से टिके रहना एक सकारात्मक संकेत है। आखिरकार, ये विशाल पेड़ जंगलों के फेफड़े और रीढ़ हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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