ऑक्टोपस ने त्रुटिरहित प्रोटीन निर्माण की राह दिखाई

क्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।

समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।

खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।

अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी . कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने . कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें  पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।

शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।

ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनस्पतियों का अदृश्य संवाद

सुदर्शन सोलंकी

बीसवीं सदी के अंत तक, पादप पारिस्थितिकी मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक चयन’ और प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा (Interspecific Competition) के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह स्थापित धारणा थी कि किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में वनस्पति केवल सूर्य के प्रकाश, जल और मृदा के पोषक तत्वों के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं। फिर, 1997 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की पादप विज्ञानी डॉ. सुज़ैन सिमार्ड द्वारा नेचर में प्रकाशित एक ऐतिहासिक शोध पत्र ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।

सिमार्ड और उनकी टीम ने कार्बन-14 (कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक) और कार्बन-13 (स्थिर समस्थानिक) का उपयोग करके यह प्रमाणित किया कि वनस्पतियां आपस में कवक-तंतुओं के माध्यम से रासायनिक रूप से जुड़ी हुई हैं। इस सहजीवी प्रणाली को माइकोराइज़ल नेटवर्क (mycorrhizal network) कहा गया, जो पादप विज्ञान में पारस्परिक सहयोग की एक नई धारणा के रूप में सामने आई। यह भूमिगत फफूंदों (कवक) और पौधों की जड़ों के बीच समन्वय होता है। एक मायने में यह पादप विज्ञान में पैराडाइम शिफ्ट था।

संरचना और सहजीवन

माइकोराइज़ल नेटवर्क  भूमिगत अंतःसंचार प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार के कवकों पर आधारित होती है। एक होते हैं एक्टोमाइकोराइज़ा (actomycorrhiza), जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण वनों के वृक्षों की जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरे होते हैं अर्बस्कुलर माइकोराइज़ा (arbuscular mycorrhiza), जो पादप जड़ों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश करके घनिष्ठ अंतःसम्बंध स्थापित करते हैं।

यह नेटवर्क एक परिष्कृत जैविक और पारस्परिक सहजीवी विनिमय से संचालित होता है। प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया से पादप कार्बन का स्थिरीकरण करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। वे उसका लगभग 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा इन कवक तंतुओं (मायसेलियम) (mycellium) को स्थानांतरित कर देते हैं। बदले में, ये कवक तंतु (जो अपनी सूक्ष्म संरचना के कारण मिट्टी के अत्यंत बारीक छिद्रों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं) पेड़-पौधों को पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त करने में मददगार होते हैं। यह जटिल नेटवर्क वनस्पति जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 1000 गुना तक विस्तृत कर देता है, जिससे पूरे वन क्षेत्र की पोषण क्षमता सुदृढ़ होती है।

संकेतन तंत्र

पादपों में जंतुओं की तरह कोई केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली नहीं होती, परंतु वे विशिष्ट जैव-रासायनिक और विद्युतीय संकेतों के माध्यम से इस कवक नेटवर्क (funal network) को एक ‘सिग्नलिंग चैनल’ (signaling channel) की तरह उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे कई तरह के संकेत (signals) प्रेषित कर पाते हैं। जैसे,

शाकाहारी आक्रमण: जब किसी वन क्षेत्र में शाकाहारी कीटों का हमला होता है, तो प्रभावित पादप तुरंत जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic acid) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्पादन करते हैं। इसे वे अपनी जड़ों के माध्यम से कवक जाल में पहुंचा देते हैं। यह रासायनिक संकेत पड़ोसी पादपों तक पहुंचता है। यह एक उद्दीपन होता है जिससे वे पादप अपनी पत्तियों में टैनिन और फिनोलिक्स जैसे विषाक्त रसायनों का संचय बढ़ा लेते हैं, जिससे पत्तियां कीटों के लिए अभोज्य हो जाती हैं।

जल तनाव: गंभीर जल तनाव या सूखे की स्थिति में पादपों द्वारा उत्सर्जित एब्सिसिक एसिड (ABA) इस नेटवर्क के माध्यम से अन्य वृक्षों को सचेत करता है, जिससे वे अपने पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) को आंशिक रूप से बंद कर वाष्पोत्सर्जन की दर घटा लेते हैं।

रोगजनक कवक का आक्रमण: प्रयोगशालाओं में देखे गए साक्ष्यों के अनुसार, रोगजनक कवक (disease causing fungi) के आक्रमण के समय सैलिसिलिक एसिड का प्रवाह पूरे नेटवर्क में सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेज़िस्टेंस (systemic accquired resistence) को सक्रिय करता है, जिससे स्वस्थ पादपों में मात्र 6 से 18 घंटे के भीतर रक्षात्मक एंज़ाइम क्रियाशील हो जाते हैं।

‘मदर ट्री’ (Mother tree) और सहोदरों की पहचान: इस नेटवर्क का सबसे विस्मयकारी वैज्ञानिक पहलू तब सामने आता है जब हम वन के सबसे वयोवृद्ध और विशाल वृक्षों का अध्ययन करते हैं। जिन्हें पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘मदर ट्री’ या ‘हब ट्री’ (hub tree) कहा जाता है। ये विशाल वृक्ष इस भूमिगत कवक जाल के मुख्य केंद्र या ‘राउटर’ (router) की तरह कार्य करते हैं, जहां से ऊर्जा और संसाधनों का प्रवाह नियंत्रित होता है। कभी-कभी वन के सघन चंदवे या छतरी के कारण छोटे नवजात पौधों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता और वे प्रकाश संश्लेषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसा होने पर ये मदर ट्री इस कवक नेटवर्क के माध्यम से अपने संचित कार्बन और नाइट्रोजन को उन कमज़ोर पौधों की ओर प्रवाहित करते हैं।

कनाडा के वनों में किए गए अध्ययनों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि ये वृद्ध वृक्ष सहोदर पहचान (किन्शिप रिकग्निशन) (kinship recognition) की क्षमता रखते हैं। वे रासायनिक संकेतों के माध्यम से यह पहचान लेते हैं कि कौन-सा अंकुरित पौधा उन्हीं के बीजों से विकसित हुआ है, और वे जानबूझकर अपनी प्रजाति के और विशेषकर अपने स्वयं के सहोदर पौधों को अन्य पौधों की तुलना में अधिक मात्रा में पोषण और सुरक्षात्मक रसायन स्थानांतरित करते हैं। और तो और, जब ये मदर ट्री मरणासन्न अवस्था में होते हैं, तो वे अपनी बची हुई अधिकांश कार्बनिक ऊर्जा और रक्षात्मक आनुवंशिक सूचनाएं इस नेटवर्क के ज़रिए युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं। यह वनस्पति जगत की एक अदभुत प्राकृतिक वसीयत है।

पारिस्थितिकीय संकट 

यह भूमिगत तंत्र हमें जितना सुदृढ़ दिखाई देता है, आधुनिक मानवीय हस्तक्षेपों के प्रति उतना ही संवेदनशील भी है। वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई और सघन एकफसली कृषि (moncropping) के कारण यह सदियों पुराना माइकोराइज़ल नेटवर्क खंडित हो रहा है, जिससे वनों की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की इस कवक संरचना को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे कृत्रिम रूप से उगाए गए पौधे इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो जाते हैं।

यद्यपि समकालीन पादप विज्ञान ने इस ‘अदृश्य संवाद’ की बुनियादी रूपरेखा को समझ लिया है, परंतु विभिन्न पादप प्रजातियों के मध्य होने वाले सूक्ष्म रासायनिक विनिमय के पूर्ण कोड को डिकोड करना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंततः, यह शोध हमें यह संदेश देता है कि वन केवल वृक्षों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि एक एकीकृत, परस्पर निर्भर और सचेत जैव-प्रणाली हैं, जिनका संरक्षण समग्र रूप में ही संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज़ेब्रा फिश: एक सुंदर और शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार

ज़ेब्रा फिश (zebra fish) उष्णकटिबंधीय मीठे पानी की एक छोटी-सी, सुंदर मछली है। यह भारत की नदियों और तालाबों में पाई जाती है। आजकल एक्वेरियम फिश की तरह इनका काफी उपयोग हो रहा है। इनका नाम ज़ेब्रा फिश इसलिए पड़ा क्योंकि इनके शरीर के दोनों तरफ ज़ेब्रा के समान खड़ी (यानी शरीर के समांतर) नीली धारियां पाई जाती हैं। ये बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें शोल (shoal) कहते हैं।  

इसका वैज्ञानिक नाम है डेनियो रेरियो (Danio rerio)। यह नाम बांग्ला भाषा से आया है। नाम का पहला अक्षर दानी (धान के खेत की) बताता है कि यह धान के खेतों जैसे उथले पानी में रहती है। नाम का दूसरा हिस्सा भी बांग्ला है जो इसका स्थानीय नाम है। यह पूरे दक्षिण एशिया के धान के खेतों की एक खास मछली है। इस मछली का विवरण सबसे पहले एक स्कॉटिश चिकित्सक फ्रांसिस हैमिल्टन ने 1822 में दिया था। उन्होंने इसे नाम दिया था सायप्रिनस रेरिओ (Cyprinus rerio)। शोध साहित्य में कभी-कभी इसे Brachydanio rerio नाम से भी संदर्भित किया गया। इसका वर्तमान नाम डेनियो रेरिओ 1981 में स्थापित हुआ था।

देखा जाए तो जैव विकास के पायदान पर ज़ेब्रा फिश हम स्तनधारियों (Mammals) से बहुत पीछे है। फिर भी कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे और इस मछली के 70 प्रतिशत जीन्स (Genes) एक समान हैं। इसके अलावा, हमारी तरह इनमें आंखें, कान, नाक, रीढ़ की हड्डी, हृदय, मुंह और पाचन तंत्र पाए जाते हैं। शरीर के इन अंगों के विकास के लिए तमाम ज़रूरी जीन्स और प्रक्रियाएं मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में पाई जाती हैं और ‘संरक्षित’ हैं, यानी करोड़ों सालों में इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यही कारण है कि मनुष्य में इन शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाने वाली किसी बीमारी का अध्ययन सैद्धांतिक रूप से ज़ेब्रा फिश में किया जा सकता है। आज ज़ेब्रा फिश चूहों और गिलहरियों की तुलना में एक बेहतर मॉडल जीव (modal organism) बन चुकी है।

इस मछली पर शोध की शुरुआत 1960 के दशक में आणविक जीव विज्ञानी (molecular biologist) जॉर्ज स्ट्राइसिंगर ने की थी। उनके प्रयोगों ने इसमें आनुवंशिक हेरफेर किए जाने की क्षमता को पहचाना। 1980 तक ज़ेब्रा फिश मनुष्य व अन्य रीढ़धारी जीवों (vertebrates) के विकास के अध्ययन का एक अमूल्य मॉडल बन चुकी थी।

ज़ेब्रा फिश – एक मॉडल जीव

2001 में ज़ेब्रा फिश के जीनोम के अनुक्रमण से पता चला कि मानव जीनोम से इसकी समानता 70 प्रतिशत है। फिर, क्रिस्पर-कास-9 (CRISPER CAS-9) जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की प्रगति के साथ मानव रोगों की मॉडलिंग और दवा की खोज में ज़ेब्रा फिश एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में स्थापित हो गई। इसके श्रेष्ठ प्रायोगिक मॉडल होने में निम्नलिखित लक्षणों का बड़ा योगदान है:

– आकार में बहुत छोटी है, बड़े समूहों में रहना पसंद करती हैं। अतः चूहों की तुलना में इन्हें पालने में कम जगह लगती है और रख-रखाव भी सस्ता है।

– लगभग हर 10 दिन में प्रजनन करती है। एक बार में 50 से 300 तक अंडे देती है। वैज्ञानिक प्रयोगों में परिणामों की सटीकता जांचने के लिए उन्हें कई बार दोहराया जाता है। इसलिए ऐसा जीव जो बार-बार बड़ी संख्या में संतान पैदा कर सके, प्रयोगों के लिए उपयोगी होता है।

– ज़ेब्रा फिश में बाह्य निषेचन (Outer fertilization) होता है, भ्रूण भी बाहर विकसित होते हैं। इनमें इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन अर्थात शरीर से बाहर परखनली में निषेचन कराया जा सकता है।

– एक कोशिका अवस्था वाले निषेचित अंडों में डीएनए या आरएनए आसानी से डाले जा सकते हैं। इस तरह नॉक-आउट या ट्रांसजेनिक/नॉक-इन (Knock out/ transgenic knock-in) ज़ेब्रा फिश किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।

– ज़ेब्रा फिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इसके चलते निषेचित अंडे से पूर्ण विकसित शिशु मछली बनते समय आंतरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। चूहे व अन्य बड़े जंतुओं में यह संभव नहीं होता।

– भ्रूण के पारदर्शी होने के कारण उन्हें फ्लोरेसेंट (florescent) रूप से चिन्हित कर उनके ऊतकों को भी देखा जा सकता है।

एक खास बात यह है कि एक मॉडल जंतु के रूप में ज़ेब्रा फिश का उपयोग मुख्यत: जीन्स के कार्यों और विकास सम्बंधी रोगों के संदर्भ में किया गया है। इसके अलावा, इसका उपयोग कैंसर विज्ञान, विकास सम्बंधी विकारों के अध्ययन और औषधि विकास सम्बंधी अनुसंधान में भी हुआ है। इसकी एक खूबी यह है कि इसे कोई दवा देना आसान है – गलफड़ों में पानी के ज़रिए।

नॉकआउट, नॉकइन

अक्सर किसी बीमारी का कारण जानने के लिए मरीज़ के डीएनए का अनुक्रमण (DNA Sequencing) किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जीन में हुए उत्परिवर्तन अर्थात म्यूटेशन (Mutation) संभावित रूप से उस रोग का कारण हो सकते हैं। इस तरह के विश्लेषण से यह पता चलता है कि क्या किसी जीन के कामकाज में बदलाव आया है जो लक्षणों का कारण हो सकता है। फिर, ज़ेब्रा फिश में उसी जीन में उत्परिवर्तन करवाया जाता है या उसे निष्क्रिय कर दिया जाता है। और इन परिवर्तित मछलियों में वैसे ही लक्षणों की जांच की जाती है।

जब ज़ेब्रा फिश में किसी समकक्ष जीन में उत्परिवर्तन के ज़रिए उसे ठप कर दिया जाता है, तो कहते हैं कि उस जीन को नॉक-आउट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि रोगी को मांसपेशियों से सम्बंधित बीमारी है तो ज़ेब्रा फिश में जीन में परिवर्तन (नॉक-आउट) के बाद मांसपेशियों के तंतुओं की संरचना में आई असामान्यता की जांच आसानी से सूक्ष्मदर्शी से की जा सकती है।

इसी प्रकार से यदि रोग के लक्षण गर्भाशय में विकास के दौरान शुरू हुए हों तो नाक-इन या नाक-आउट ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों में जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन के असर की जांच आसानी से की जा सकती है। नॉक-इन तब कहते हैं जब ज़ेब्रा फिश में किसी जीन को जोड़ा जाए और यह देखा जाए कि इसका क्या असर होता है।

कुछ मानव रोगों के उदाहरण 

मांसपेशीय विकार

ड्यूशेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) मांसपेशियों का एक रोग है जो अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें मांसपेशियों की कमज़ोरी बचपन में ही प्रकट होने लगती है और क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है।

ऐसा अंदाज़ा था कि डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) नामक जीन में उत्परिवर्तन ही डीएमडी के लिए ज़िम्मेदार है। डिस्ट्रॉफिन जीन की पहचान 1986 में लू कुन्केल ने की थी। उन्होंने बताया था कि यह एक्स गुणसूत्र पर स्थित होता है और डीएमडी में इसकी भूमिका है। 1987 में इस जीन के द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन (डिस्ट्रॉफिन) की पहचान हुई। डिस्ट्रॉफिन प्रोटीन मांसपेशियों की रक्षा करता है, यदि यह प्रोटीन न हो तो मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनका स्थान वसा और सख्त ऊतक लेने लगते हैं।

ज़ेब्रा फिश में डिस्ट्रॉफिन जीन के नॉक-आउट प्रयोगों से पता चला कि इसके असर मानव रोग डीएमडी से काफी मिलते-जुलते हैं। डीएमडी से पीड़ित रोगियों में डिस्ट्रॉफिन में उत्परिवर्तन पाए गए हैं। मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में, डिस्ट्रॉफिन की कमी से धीरे-धीरे मांसपेशियों के तंतु नष्ट हो जाते हैं।

उम्मीद है कि ज़ेब्रा फिश पर हो रहे अनुसंधान मांसपेशियों के विकार, खास तौर से डीएमडी के लिए विभिन्न औषधियों की जांच-पड़ताल में मददगार होंगे।

कैंसर व मेलेनोमा

मेलेनोमा त्वचा कैंसर का एक प्रकार है। वैसे तो यह एक तिल के रूप में शुरू होता है लेकिन समय से सर्जरी करके न हटाया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह मुख्य रूप से त्वचा की मेलेनोसाइट (melenocyte) कोशिकाओं को प्रभावित करता है और यूवी प्रकाश या टैनिंग बेड के उपयोग से शुरू होता है।

ज़ेब्रा फिश को मानव मेलेनोमा का सफल मॉडल भी बनाया गया है। मानव मेलेनोमा में सबसे आम तौर पर पहचाना जाने वाला उत्परिवर्तन जीन BRAF में एक एकल अमीनो एसिड परिवर्तन (V600E) है। BRAF V600E उत्परिवर्तन एक अर्जित उत्परिवर्तन है। इस उत्परिवर्तित जीन द्वारा बनाए गए BRAF प्रोटीन में पोज़ीशन 600 पर वैलीन नामक अमीनो एसिड का स्थान ग्लूटेमिक एसिड ले लेता है। इस परिवर्तन की वजह से यह प्रोटीन निरंतर सक्रिय रहता है और कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर ट्यूमर तथा कैंसर का कारण बन जाती हैं।

चूंकि कैंसर कई जेनेटिक परिवर्तनों के संयोजन से होते हैं, इसलिए इस नॉक-इन ज़ेब्रा फिश लाइन का उपयोग अन्य संभावित कैंसर पैदा करने वाले उत्परिवर्तनों की जांच के लिए किया गया था। जब BRAF नॉक-इन ज़ेब्रा फिश में SETDB1 नामक एक अन्य सामान्य रूप से देखे जाने वाले मेलेनोमा उत्परिवर्तन को जोड़ा गया, तो तेज़ी से मेलेनोमा विकसित हुआ।

हृदय रोग

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी ज़ेब्रा फिश मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। ज़ेब्रा फिश का हृदय हमारे समान चार प्रकोष्ठ वाला नहीं बल्कि दो प्रकोष्ठ का होता है। लेकिन हृदय का शुरुआती विकास लगभग वैसा ही होता है जैसा अन्य एम्नियॉटिक जंतुओं में (एम्नियोटिक जंतु उन्हें कहते हैं जिनमें भ्रूण के विकास के दौरान उसके आसपास एक विशेष झिल्ली (एम्नियॉन) बनती है। इस झिल्ली से बनी एम्नियोटिक थैली (amniotic sac) की बदौलत ही इन जंतुओं के भ्रूण का विकास पानी से बाहर शुष्क वातावरण में भी हो पाता है।चूहों के विपरीत, ज़ेब्रा फिश को भ्रूण अवस्था में जीवित रहने के लिए एक कार्यात्मक हृदय प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती है। कारण यह है कि इतने छोटे जंतु को ज़रूरी ऑक्सीजन सीधे विसरण के ज़रिए मिल जाती है। इसलिए, शोधकर्ता गंभीर हृदय विकृतियों वाली ज़ेब्रा फिश में ऐसे शारीरिक अंतरों का अवलोकन कर पाते हैं जिनका अध्ययन चूहों में नहीं किया जा सकता है। 

वैसे कशेरुकी जंतुओं में मायोसाइट एनहांसर फैक्टर (हृदय कोशिकाओं को उन्नत बनाने वाले कारक) के चार रूप पाए जाते हैं Mef2A, Mef2B, Mef2C और Mef2D। जहां इनसे बनाए जाने वाले प्रोटीन्स हृदय के विकास में भूमिका निभाते हैं, वहीं यह भी देखा गया है कि इनमें से Mef2C प्रमुख है।

अब बात आती है ज़ेब्रा फिश की। एक तो हम देख चुके हैं कि ज़ेब्रा फिश कई दिनों तक हृदय के बगैर भी जी पाती हैं। दूसरा, पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में जैव-विकास के किसी चरण में Mef2C जीन दो भागों में बंट गया था – Mef2ca और Mef2cb।

2012 के एक शोध से पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में Mef2ca और Mef2cb पहले और दूसरे हृदय क्षेत्र दोनों की कोशिकाओं के विभेदन के लिए आवश्यक हैं। Mef2ca और Mef2cb कोशिकीय विभेदन के महत्वपूर्ण नियामक हैं। इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि जब ज़ेब्रा फिश भ्रूण में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीनों की हानि हो जाए तो क्या होता है। पाया गया कि जिन भ्रूणों में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीन की कमी होती है, उनमें हृदय में मांसपेशीय कोशिका विभेदन में दोष होते हैं। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, Mef2ca या Mef2cb जीन में से किसी एक की कमी हृदय के कार्य को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि Mef2 गतिविधि सभी हृदय कोशिका विभेदन के लिए आवश्यक है।

विष विज्ञान

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेन्यूब नदी के पानी के विभिन्न नमूनों में ज़ेब्रा फिश रखीं और भ्रूण की असामान्यताओं के विकास का अवलोकन किया। पता चला कि सभी 22 नमूने कुछ हद तक मृत्यु का कारण बन सकते थे। चूंकि शोधकर्ता ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के विकास का अवलोकन कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इन भ्रूणों में आंखों की विकृतियां, असामान्य रंजक और बहुत कम या न के बराबर रक्त संचार देखा। ज़ेब्रा फिश की मदद से शोधकर्ताओं ने पानी में मौजूद विषैले पदार्थों की पहचान भी की। ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों को कृत्रिम रूप से तैयार किए गए एक मिश्रण में डाला गया। कुल मिलाकर उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या ज़ेब्रा फिश का उपयोग पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन करने में किया जा सकता है।

इसी प्रकार के प्रयोग कई अन्य नदियों/तालाबों में किए गए हैं। जैसे मुंबई महानगर की मीठी नदी के पानी का ज़ेब्रा फिश भ्रूणों पर असर 2023 में एन्वायर्मेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन के लिए मीठी नदी से 10 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए थे। इन सभी नमूनों में ज़ेब्रा फिश भ्रूण विषाक्तता परीक्षण किया गया। प्रयोग में पता चला कि सामान्य पानी में रखे गए भ्रूणों और विभिन्न स्थलों के पानी में रखे गए भ्रूणों के बीच मृत्यु दर, अंडे में कोग्यूलेशन, पेरिकार्डियल एडीमा (pericardial edima), योक थैली के एडीमा, पूंछ की ऐंठन और कंकाल (skeleton) सम्बंधी विकारों की दृष्टि से काफी अंतर रहा। एक तो इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ की मीठी नदी का पानी जलीय जीवों के लिए घातक है। साथ ही पानी की गुणवत्ता को परखने के लिए ज़ेब्रा फिश की उपयोगिता भी प्रमाणित हुई।

टॉक्सिकोलॉजी साइंसेस में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में विष वैज्ञानिक अध्ययनों में ज़ेब्रा फिश के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका उपयोग आणविक स्तर से लेकर पूरे जीव की सेहत और व्यवहार पर असर के अध्ययन तक में किया जा रहा है। दरअसल, समीक्षा पर्चे में कहा गया है कि ज़ेब्रा फिश कांच के उपकरणों (in-vitro) में किए जाने वाले अध्ययनों और उच्चतर जीवों पर असर के बीच एक सेतु बन गया है।

विकास/परिवर्धन की विकृतियां

ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक उत्परिवर्ती (हेडलेस) में T-cell factor-3 में उत्परिवर्तन हुआ था जिसके चलते उसके सिर के विकास में गड़बड़ियां पैदा हुईं। इन प्रयोगों से यह स्थापित हुआ कि हेडलेस उत्परिवर्ती Wnt संकेतन मार्ग से नियंत्रित जीन्स का दमन करता है। ये जीन्स कोशिकाओं की संख्यावृद्धि, उनके विभेदन और स्टेम कोशिका (stem cells) अवस्था बनाए रखने का नियंत्रण करते हैं।

इसी प्रकार से ज़ेब्रा फिश ने तंत्रिकाओं की पहचान करने और मस्तिष्क की बनावट (आर्किटेक्चर) को समझने में भी योगदान दिया है। इसमें शुरुआती तंत्रिका प्लेट अवस्था में तंत्रिकाओं के निर्माण से लेकर वयस्क मस्तिष्क के विकास तक की अवस्थाओं को देखा जा सका है।

मानसिक विकार

ज़ेब्रा फिश अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में रहते हैं। लिहाज़ा, इनका उपयोग मानसिक विकारों के व्यवहारगत परीक्षणों में संभव है। चिओल-ही किम व उनके साथियों ने ज़ेब्रा फिश में मानसिक विकारों से सम्बंधित एक जीन समूह की खोज की है। इस जीन परिवार को सैमडोरी (सैम) नाम दिया गया है। पांच जीन्स के इस समूह में से sam2 मस्तिष्क के हैबेन्यूलर न्यूक्लिआई में अभिव्यक्त होता है। इसका सम्बंध बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से देखा गया है।        sam2 नॉक-आउट से चूहों व ज़ेब्रा फिश दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया (जैसे डर और दुश्चिंता) में गड़बड़ी देखी गई जो दुश्चिंता सम्बंधी विकारों और ऑटिज़्म में भी दिखती है।

वायरस संक्रमणों का अध्ययन

हाल के वर्षों में ज़ेब्रा फिश वायरस संक्रमणों की तहकीकात के लिए भी एक मॉडल बनकर उभरा है। ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से वायरस की रोगजनन क्रियाविधि, मेज़बान की प्रतिक्रिया तथा संभावित उपचारों की दिशा में मदद मिली है। खास तौर से ज़ेब्रा फिश मॉडल्स से वायरस संख्यावृद्धि, टिशू ट्रॉपिज़्म (tissue tropism) (यानी कोई वायरस किन ऊतकों को संक्रमित करेगा), और प्रतिक्षा तंत्र को चकमा देने की विभिन्न वायरसों की रणनीतियों को उजागर करने में मदद मिली है। इनमें चिकनगुनिया वायरस, डेंगू वायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस टाइप-1 और इंफ्लुएंज़ा-ए वायरस शामिल हैं।

इसके अलावा कई वायरसों जैसे, सार्स-सीओवी-2, ज़िका वायरस और डेंगू वायरस के खिलाफ विकसित एंटी-वायरल (anti-viral) पदार्थों तथा प्राकृतिक एजेंट्स की प्रभाविता की जांच करने में भी मदद मिली है।

खास तौर से ज़ेब्रा फिश भ्रूणों की पारदर्शिता तथा जेनेटिक तहकीकात की सरलता के चलते वायरस के प्रसार और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करना सुगम हुआ है।

ज़ेब्रा फिश की सीमाएं

ज़ेब्रा फिश को एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ सीमाएं भी है। जैसे ज़ेब्रा फिश में ऐसी इंसानी बीमारियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता जो ऐसे जीन्स की वजह से होती हैं जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते। जैसे ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के पैंक्रियास की रचना तो एक सी है लेकिन उनके बीच जेनेटिक अंतर हैं। इस वजह से मोटापे जैसे कई चयापचय रोगों (metabolic diseases) का अध्ययन नहीं हो पाता। इसके अलावा, ज़ेब्रा फिश की मदद से उन अंगों से सम्बंधित अध्ययन भी नहीं किए जा सकते जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते – जैसे प्रोस्टेट ग्रंथि (prostrate gland), स्तन ग्रंथियां या फेफड़े।

ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि जहां मनुष्य व अन्य स्तनधारी समतापी होते हैं वहीं ज़ेब्रा फिश (अन्य मछलियों व सरिसृपों के समान) विषमतापी होते हैं यानी इनके शरीर का तापमान आसपास के वातावरण के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश को कृत्रिम रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रखा जाता है। इसलिए इन पर किए गए प्रयोगों के परिणाम शायद मनुष्यों पर लागू न हो पाएं।

ज़ेब्रा फिश सांस लेने का काम गलफड़ों (gills) से करती है जबकि मनुष्य इसके लिए फेफड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके चलते ज़ेब्रा फिश में हृदय और गलफड़ों के बीच परिवहन तंत्र नहीं पाया जाता। इसी वजह से कई बीमारियों का अध्ययन ज़ेब्रा फिश मॉडल में नहीं किया जा सकता – जैसे श्वसन रोग, हार्ट अटैक।

कृन्तकों (rodents) के विपरीत ज़ेब्रा फिश और अन्य मछलियां, अंतःप्रजनन (inbreeding) को सहन नहीं कर पातीं और अंतःप्रजनन से तेज़ी से प्रजनन क्षमता खो देती हैं। अंत:प्रजनन इसलिए करवाया जाता है ताकि जेनेटिक संरचना कई पीढ़ियों तक बनी रहे।

ज़ेब्रा फिश पानी में रहती हैं। इनके भ्रूणों के थ्री-डी विश्लेषण (3-D analysis) के दौरान प्रकाश के अपवर्तन की वजह से छवियां ठीक से नहीं बन पातीं। दूसरी दिक्कत यह आती है कि ये भ्रूण हिलते-डुलते रहते हैं।

आम तौर पर किसी दवा का असर जांचने के लिए वह दवा पानी में घोल दी जाती है और भ्रूण उसे गलफड़ों के ज़रिए ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन पानी में अघुलनशील दवाइयां इस तरह से देना कठिन होता है।

प्रतिरक्षा के संदर्भ में भी ज़ेब्रा फिश में कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखते हैं।

हालांकि ज़ेब्रा फिश कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, फिर भी उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च-थ्रूपुट तकनीक ने रसायनों और दवाओं की जांच में विषाक्तता परीक्षणों में ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के उपयोग की संभावना को बढ़ा दिया है।

प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश उन अनुसंधान क्षेत्रों की पूर्ति कर सकती हैं जिनमें चूहे के मॉडल असफल हुए हैं। शायद अगले कुछ वर्षों में, विज्ञान की अगली बड़ी खोज का श्रेय ज़ेब्रा फिश को दिया जाएगा (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियां संक्रमण से कैसे बचाव करती हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।

सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।

सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं। 

इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था। 

एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।

प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।

कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।

इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।  

बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कृत्रिम रोशनी मच्छरों को देर तक सक्रिय रखती हैं

सा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।

जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।

मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए  मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।

पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है  और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।

सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।

देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।

अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।

शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)

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कृत्रिम अंडा और विलुप्त पक्षियों को पुनर्जीवन

कोलोसल बायोसाइन्स नाम की एक कंपनी ने दावा किया है कि उसने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो विलुप्त पक्षियों (Extinct Birds) को वापिस अस्तित्व में ला सकेगी और जोखिमग्रस्त पक्षियों को बचा सकेगी। हालांकि यह तकनीक और इसकी बारीकियों को कहीं प्रकाशित नहीं किया गया है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

तकनीक क्या है?

मुर्गी द्वारा अंडा देने के 24-48 घंटे के अंदर उस अंडे में मौजूद सारी सामग्री (निषेचित भ्रूण सहित, लेकिन बाहरी खोल नहीं) एक कृत्रिम अंडे (Artificial Egg) में डाल दी जाती है। इसके बाद का सारा विकास कृत्रिम अंडे के अंदर होता है।

कृत्रिम अंडा 3-डी प्रिंटिंग विधि (3-D Printing Method) से बनाई गई एक षट्कोण फ्रेम (Hexagonal Frame) होती है, जिसमें अंदर सिलिकॉन की झिल्ली (Silicon Membrane) का अस्तर होता है। असली अंडे की खोल के समान यह नमी को बनाए रखती है, ऑक्सीजन को अंदर जाने देती है और बैक्टीरिया को अंदर नहीं जाने देती। भ्रूण के लिए पोषण की व्यवस्था मूल अंडे की सामग्री से होती है। इस जुगाड़ का उपयोग करके लगभग 2 दर्ज़न चूज़ों को विकसित किया जा चुका है। अब कोलोसल को उम्मीद है कि वह इसकी मदद से दक्षिणी द्वीप पर कभी पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी मोआ (Dinornis robustus) को पुनर्जीवन देगी। न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 3 मीटर ऊंचा यह पक्षी पंद्रहवीं शताब्दी में विलुप्त हो गया था। इसके अंडे लगभग फुटबॉल के आकार के होते थे।

प्रेस विज्ञप्ति को देखकर वैज्ञानिकों को लगता है कि कोलोसल का यह आविष्कार शायद एक बड़ा कदम साबित होगा। वैसे इस तरह से कृत्रिम परिवेश में भ्रूण को विकसित करके चूज़े पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं।

जैसे 1998 में ऐसा पहला सफल प्रयास हुआ था। जापान के युताका तहारा, कात्सुया ओबारा और मासामिची कामिहिरा के दल ने एक कुदरती तौर पर निषेचित अंडे को पहले दो दिन तक कुदरती रूप से इन्क्यूबेशन (Incubation) बाद उसके अंदर की सामग्री को कांच के मर्तबान में रख दिया गया था। साथ में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) डाला गया था जो खोल निर्माण के लिए ज़रूरी होता है। इसी तरह के अगले प्रयास में पारदर्शी प्लास्टिक प्यालों का उपयोग किया गया था। इसमें मुर्गी द्वारा अंडा देने के तुरंत बाद भ्रूण (Fetus) को कृत्रिम अंडे में रख दिया गया था। गौरतलब है कि तहारा एक हाई स्कूल शिक्षक हैं और वे अपने छात्रों के साथ यह प्रयोग करते रहते हैं।

दरअसल, कोलोसल के कृत्रिम अंडे की एक खासियत है वह झिल्ली जो उसने विकसित की है। इसके चलते भ्रूण का विकास ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा पर होता है जबकि तहारा और साथियों ने जो कृत्रिम अंडा बनाया था उसमें ऑक्सीजन की उच्च मात्रा का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह से ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। कोलोसल द्वारा विकसित कृत्रिम अंडे की एक विशेषता यह है कि उसमें ऊपर एक पारदर्शी झरोखा है जिसके ज़रिए भ्रूण के विकास (Fetus Development) पर नज़र रखी जा सकती है।

विकसित होते अंडे का सतत निरीक्षण इसलिए भी ज़रूरी होगा कि विलुप्त पक्षियों के जीन्स में संशोधन किए जाएंगे और उनके असर पर नज़र रखनी होगी।

कुल मिलाकर माना जा रहा है कि भ्रूण विकास में कृत्रिम अंडों के निर्माण में हम आगे तो बढ़े हैं, लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। (स्रोत फीचर्स)

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फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक

लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।

इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।

अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।

इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।

यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।

स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।

इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।

शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।

फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)

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हाथी और गुबरैले का एक अनोखा नाता

विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?

हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।

छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।

दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।

ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।

इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।

इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई। 

वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।

दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा। 

वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

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