वायरसों का सामाजिक जीवन – डॉ. सुशील जोशी

कोविड महामारी ने हम सबको वायरस के अस्तित्व और महत्व से दर्दनाक ढंग से परिचित करा दिया है। दरअसल, वायरसों की खोज 1800 के दशक के उत्तरार्ध में हुई थी। ये छोटी-से-छोटी कोशिकाओं से भी छोटे होते हैं। इनमें एक प्रोटीन कवच होता है और उस कवच के अंदर ज़्यादा कुछ नहीं, बस चंद जीन्स होते हैं। लेकिन इनकी दिक्कत यह है कि इनके पास वह व्यवस्था नहीं होती कि इन जीन्स की प्रतिलिपियां बना सकें। अपनी प्रतिलिपि बनाने के लिए ये किसी अन्य कोशिका के ताम-झाम पर निर्भर होते हैं। लिहाज़ा, खोज के साथ ही यह बहस शुरू हो गई कि ये वायरस कण सजीव माने जाएं या निर्जीव। ये तो अपनी प्रतिलिपि तभी बना पाते हैं जब ये किसी उपयुक्त कोशिका में प्रवेश कर पाएं।

लेकिन इनकी सरल संरचना ने जीव वैज्ञानिकों को बहुत लुभाया। कई लोग तो मानते हैं कि वायरसों के अध्ययन ने ही आधुनिक जीव विज्ञान (खासकर जेनेटिक्स, जेनेटिक इंजीनियरिंग, बायोटेक्नॉलॉजी वगैरह) को संभव बनाया है। कोशिकाओं की जटिलताओं से मुक्त वायरसों के अध्ययन से वे नियम उजागर हुए जिनसे जीन्स के कामकाज को समझा जा सका। लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि सरलता एक तरफ, वायरसों में कई जटिलताएं भी होती हैं।

हाल के दशकों में हुए अनुसंधान ने वायरसों के कई ऐसे गुणधर्म उजागर किए हैं जिनकी कल्पना तक नहीं गई थी। नए अनुसंधान ने सबसे महत्वपूर्ण बात यह उजागर की है कि वायरसों को एक-दूसरे से स्वतंत्र कण मानकर उनके सारे गुणों को नहीं समझा जा सकता। दरअसल नए अनुसंधान से वायरसों के सामाजिक संसार की बातें सामने आने लगी हैं। कई वायरस-विज्ञानी मानने लगे हैं कि वायरसों की वास्तविकता को तभी समझा जा सकता है जब आप उन्हें एक समुदाय का सदस्य मानें – इस अर्थ में कि वे एक-दूसरे से सहयोग करते हैं, एक-दूसरे को ठगते हैं और अन्य तरह से परस्पर क्रिया करते हैं।

पूरी सोच की शुरुआत 1940 के दशक में एक डैनिश वायरस विज्ञानी प्रेबेन फॉन मैग्नस के प्रयोगों से हुई थी। फॉन मैग्नस जब अपनी प्रयोगशाला में वायरस पनपा रहे थे, तब उन्होंने एक विचित्र बात पर गौर किया। वायरसों की वृद्धि के लिए वे मुर्गी के अंडे में वायरस स्टॉक का इंजेक्शन लगाते थे और फिर उन्हें संख्यावृद्धि करने देते थे। आम तौर पर बैक्टीरिया वगैरह को पनपने के लिए पोषक पदार्थों से परिपूर्ण माध्यम पर्याप्त होता है। लेकिन चूंकि वायरस के पास अपनी प्रतिलिपि बनाने के लिए आवश्यक जीन्स नहीं होते, इसलिए उन्हें किसी सजीव कोशिका में ही पनपाना होता है। फॉन मैग्नस के प्रयोग में जीवित कोशिका के रूप में मुर्गी के अंडे का उपयोग किया गया था। उन्होंने पाया कि एक अंडे में तैयार कई वायरस दूसरे अंडे में इंजेक्ट करने पर वृद्धि नहीं कर पाते थे। ऐसे तीन चक्र पूरा होने के बाद 10,000 में से मात्र एक वायरस ही संख्यावृद्धि कर पा रहा था। लेकिन इसके बाद के चक्रों में ‘दोषपूर्ण’ वायरसों की संख्या कम होती गई और संख्यावृद्धि योग्य वायरसों की संख्या बढ़ गई।

फॉन मैग्नस ने माना कि संख्यावृद्धि न कर पाने वाले वायरस पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए हैं और उन्हें ‘अपूर्ण’ घोषित कर दिया। आगे चलकर, अपूर्ण वायरसों के उतार-चढ़ाव की इस तरह की घटनाएं कई बारी देखी गईं और इसे नाम दे दिया गया ‘फॉन मैग्नस प्रभाव’। लेकिन वायरस वैज्ञानिकों के लिए यह मात्र एक समस्या थी जिसे हल करने की ज़रूरत थी क्योंकि यह प्रयोगों में अड़चन पैदा करती थी। वैसे भी किसी ने प्रयोगशाला से बाहर यानी प्राकृतिक परिस्थिति में अपूर्ण वायरस नहीं देखे थे, इसलिए माना गया कि यह प्रयोगशाला कल्चर तक सीमित मामला है।

बहरहाल, 1960 के दशक में शोधकर्ताओं ने देखा कि अपूर्ण वायरस के जीनोम सामान्य वायरसों के जीनोम से छोटे होते हैं। इस खोज के चलते वायरस विज्ञानियों का यह विश्वास और दृढ़ हो गया कि अपूर्ण वायरस इसलिए संख्या-वृद्धि नहीं कर पाते क्योंकि उनमें प्रतिलिपि बनाने के लिए ज़रूरी जीन नहीं होता। यानी ये दोषपूर्ण हैं। लेकिन 2010 के दशक में शक्तिशाली जीन अनुक्रमण टेक्नॉलॉजी की मदद से यह स्पष्ट हो गया कि तथाकथित अपूर्ण वायरस स्वयं हमारे शरीर में बहुतायत में पाए जाते हैं।

2013 में प्रकाशित एक अध्ययन में पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने विचित्र अवलोकन किया। उन्होंने फ्लू से पीड़ित व्यक्तियों की नाक व मुंह से फोहों पर नमूने (स्वाब) एकत्रित किए। इन नमूनों में से उन्होंने फ्लू के वायरसों का जेनेटिक पदार्थ अलग किया और देखा कि उनमें से चंद वायरसों में कुछ जीन्स नदारद हैं। ये ‘बौने’ वायरस तब बनते हैं जब संक्रमित मेज़बान कोशिका किसी कामकाजी वायरस के जीनोम की गलत नकल कर देती है, और कुछ जीन्स की नकल करना चूक जाती है। इस खोज की पुष्टि कई अन्य अध्ययनों से भी हुई। अन्य अध्ययनों से अपूर्ण वायरसों के बनने के कई अन्य रास्ते भी सामने आए।

जैसे कुछ वायरसों में जीनोम गड्ड-मड्ड हुए होते हैं। होता यह है कि संक्रमित कोशिका वायरस जीनोम की नकल करने लगती है और किसी वजह से बीच में रुककर उल्टी नकल कर डालती है और प्रारंभिक बिंदु तक फिर से नकल कर देती है। कुछ अन्य अपूर्ण वायरस तब बनते हैं जब कोई उत्परिवर्तन किसी जीन के अनुक्रम को तहस-नहस कर देता है और फिर वह जीन कोई काम का प्रोटीन नहीं बना पाता।

इन तमाम अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया कि फॉन मैग्नस के अपूर्ण वायरस मात्र प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वायरस जैविकी का कुदरती हिस्सा है। फिर हमारे अपने शरीरों में अपूर्ण वायरसों की खोज ने इनमें दिलचस्पी में इजाफा किया। और तो और, यह भी पता चला कि अपूर्ण वायरस मात्र फ्लू तक सीमित नहीं हैं बल्कि कई अन्य संक्रमणों (जैसे आरएसवी और खसरा) से बीमार व्यक्तियों के शरीर में पाए गए अधिकांश वायरस अपूर्ण होते हैं।

समस्या यह है कि अपूर्ण वायरस कोशिकाओं में बाकी वायरसों के समान ही घुस सकते हैं लेकिन घुसने के बाद वे अपनी प्रतिलिपि नहीं बना सकते। उनके पास वे जीन्स ही नहीं होते जो मेज़बान की प्रोटीन-निर्माण मशीनरी को अगवा करने के लिए ज़रूरी होते हैं। जैसे उनके पास जीन-प्रतिलिपिकरण का एंज़ाइम (पोलीमरेज़) बनाने के लिए ज़रूरी जीन होता ही नहीं। लेकिन वे अपनी प्रतिलिपि बनाते तो हैं। इसके लिए वे ठगी का सहारा लेते हैं। वे अपने हमसफर वायरसों का फायदा उठाते हैं।

ठगों के लिए अच्छी बात यह होती है कि अमूमन कोई भी कोशिका एक से अधिक वायरसों द्वारा संक्रमित की जाती है। यदि ऐसी संक्रमित कोशिका में कोई कामकाजी वायरस हो, तो वह पोलीमरेज़ बनाएगा। तब ठग वायरस इस पोलीमरेज़ का लाभ लेकर अपने जीन्स की प्रतिलिपि बनवा सकता है।

वास्तव में, ऐसी मेज़बान कोशिका में दोनों वायरस अपने-अपने जीनोम की प्रतिलिपि बनवाने की होड़ करते हैं। ठग वायरस इस होड़ में फायदे में रहता है: उसके पास प्रतिलिपिकरण के लिए कम सामग्री है। लिहाज़ा वही पोलीमरेज़ एक अपूर्ण जीनोम की प्रतिलिपियां जल्दी बना देता है। और जब ये पूर्ण व अपूर्ण वायरस संक्रमण को आगे बढ़ाते हैं (यानी एक से दूसरी कोशिका में जाते हैं) तो ठग को और फायदा मिलता है। यह फायदा संक्रमण बढ़ने के साथ बढ़ता जाता है।

ठगों की अन्य रणनीतियां भी होती हैं। जैसे कुछ अपूर्ण वायरसों में पोलीमरेज़ का जीन तो होता है लेकिन उनके पास वह प्रोटीन कवच बनाने का जीन नहीं होता जिसके अंदर वे अपनी जेनेटिक सामग्री को सहेज सकें। ऐसे ठग प्रतिलिपिकरण करके इंतज़ार करते रहते हैं कि कोई पूर्ण कामकाजी वायरस उस मेज़बान कोशिका में प्रवेश करके कवच बनाए। वे चुपचाप उस कवच में घुस जाते हैं। अनुसंधान से पता चला है कि कवच में घुसने के मामले में ठग का जीनोम कहीं फुर्तीला होता है, छोटा जो है।

एशर लीक येल विश्वविद्यालय में एक पोस्ट-डॉक छात्र के रूप में ऐसे वायरसों पर शोध करते रहे हैं जिनके लिए ज़रूरी होता है कि वे एक ही कोशिका में एक साथ उपस्थित हों, तभी वे प्रतिलिपियां बना सकते हैं। इन्हें मल्टीपार्टाइट वायरस कहते हैं। उनके अनुसार, लगता तो है कि ये वायरस परस्पर सहयोग कर रहे हैं लेकिन शायद यह व्यवहार ठगी से ही उपजा है। बहरहाल, अपूर्ण वायरस जो भी रणनीति अपनाएं, एक बात स्पष्ट है – वे इसकी कीमत नहीं चुकाते।

लेकिन एक समस्या पर विचार करना ज़रूरी है। ठग खुद तो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकता, लेकिन किसी अन्य (पूर्ण) वायरस की उपस्थिति में उसका प्रदर्शन पूर्ण वायरस की अपेक्षा बेहतर रहता है। समस्या यह है कि यदि इस तरह से बहुत सारे ठग इकट्ठे हो गए तो वे ठगेंगे किसे? दूसरे शब्दों में कहें, तो ठग की बेइन्तहा सफलता का परिणाम होना चाहिए कि वायरसों का सफाया हो जाए, वे विलुप्त हो जाएं। क्योंकि हर पीढ़ी के बाद अपूर्ण वायरसों की संख्या बढ़ती जाएगी और वे हावी हो जाएंगे। अब यदि उनका अनुपात बहुत बढ़ गया तो उनके अपने प्रतिलिपिकरण में मददगार वायरस बहुत कम बचेंगे और वायरस का नामोनिशान मिटने की कगार पर होगा।

ज़ाहिर है, ऐसा होता नहीं। फ्लू के वायरस इस तरह के विलुप्तिकरण के शिकार नहीं हुए हैं। यानी इस ठगी-चालित मृत्यु के चक्र में कुछ और पहलू भी हैं जो वायरसों की रक्षा करते हैं। वॉशिंगटन विश्वविद्यालय की कैरोलिना लोपेज़ का मत है कि ठगी में लिप्त वायरस संभवत: कोई अन्य भूमिका भी निभाते होंगे। शायद वे अपने हमसफर वायरसों को लूटने की बजाय उन्हें पनपने में सहयोग करते हैं। लेकिन कैसे?

लोपेज़ सैन्डाई वायरस का अध्ययन करती हैं। यह वायरस चूहों को संक्रमित करता है। अध्ययनों से पता चल चुका था कि इस वायरस की दो किस्में (स्ट्रेन्स) अलग-अलग ढंग से व्यवहार करती हैं। इनमें से एक को SeV-52 कहते हैं और यह प्रतिरक्षा तंत्र से ओझल रहता है। इसके चलते SeV-52 ज़ोरदार संक्रमण पैदा कर पाता है। लेकिन एक अन्य किस्म (SeV-Cantell) के खिलाफ त्वरित व शक्तिशाली प्रतिरक्षा उत्पन्न होती है जिसके चलते इसके संक्रमण के परिणाम ज़्यादा घातक नहीं होते। लोपेज़ की टीम ने पाया कि इस अंतर की वजह यह है कि SeV-Cantell बड़ी संख्या में अपूर्ण वायरस उत्पन्न करता है।

तो सवाल यह उठा कि ये अपूर्ण वायरस चूहों में इतनी शक्तिशाली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया क्यों उत्पन्न करते हैं। काफी अनुसंधान के बाद लोपेज़ की टीम यह दर्शाने में सफल रही कि अपूर्ण वायरस संक्रमित कोशिका के चेतावनी तंत्र को सक्रिय कर देते हैं। इसके चलते कोशिका इंटरफेरॉन नामक एक संदेशवाहक अणु बनाने लगती है जो आसपास की कोशिकाओं को चेता देता है कि कोई घुसपैठिया आया है। इस चेतावनी का परिणाम यह होता है कि वे कोशिकाएं वायरस के खिलाफ तैयारी कर लेती हैं और वायरस का त्वरित प्रसार थम जाता है।

 लोपेज़ ने परिकल्पना बनाई कि किसी कोशिका के अंदर अपूर्ण वायरस कामकाजी वायरसों से ठगी करता होगा लेकिन कुल मिलाकर असर यह होता है कि संक्रमण के प्रसार पर अंकुश लग जाता और यह पूरे वायरस समुदाय के लिए लाभदायक होता है। और तो और, लोपेज़ के दल ने पाया कि यह स्थिति सिर्फ सेन्डाई वायरस के साथ नहीं होती। जब उन्होंने RSV पर ध्यान दिया तो पाया कि उसमें भी संक्रमण के दौरान अपूर्ण वायरस शक्तिशाली प्रतिरक्षा उत्पन्न करता है।

स्थिति बहुत ही दिलचस्प है। क्योंकि यदि अपूर्ण वायरस ठग हैं तो उनके लिए यह तो कदापि लाभदायक नहीं होगा कि वे संक्रमण को जल्दी खत्म करवा दें। यदि प्रतिरक्षा तंत्र ने सारे कामकाजी वायरसों को नष्ट कर दिया तो ठग किसे ठगेंगे?

उपरोक्त परिणामों को एक ही ढंग से देखने पर कोई अर्थ निकलता है। लोपेज़ ने अपूर्ण वायरसों को ठग के तौर पर देखने की बजाय यह विचार करना शुरू किया कि शायद अपूर्ण वायरस और कामकाजी वायरस मिल-जुलकर काम कर रहे हैं। और इस सहयोग का अंतिम लक्ष्य है समुदाय का लंबे समय तक जी पाना। लोपेज़ ने विचार किया कि यदि कामकाजी वायरस अनियंत्रित ढंग से नए-नए वायरस बनाते रहे तो वे अपने मेज़बान पर हावी होकर उसकी जान ले लेंगे, इससे पहले कि वे किसी नए मेज़बान तक पहुंच सकें। यह तो आत्मघाती होगा। लोपेज़ कहती हैं कि एक स्तर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया ज़रूरी है तभी मेज़बान कम से कम इतने समय जीवित रहेगा कि वायरस नए मेज़बान में पहुंच सके।

इसी मुकाम पर अपूर्ण वायरस प्रकट होते हैं। वे संक्रमण पर लगाम लगाते हैं ताकि अगले मेज़बान तक पहुंचा जा सके। इस तरह से देखें तो शायद अपूर्ण और कामकाजी वायरस परस्पर सहयोग कर रहे हैं। हाल के वर्षों में लोपेज़ की टीम ने पता किया है कि अपूर्ण वायरस कई तरीकों से संक्रमण पर लगाम लगा सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे कोशिका में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं कि जैसे वह गर्मी या ठंड के कारण तनाव में है। ऐसी स्थिति में कोशिका की एक प्रतिक्रिया यह होती है कि वह अपनी प्रोटीन-निर्माण मशीनरी को बंद कर देती है। ऐसा होने पर वायरसों का बनना स्वत: कम हो जाएगा।

हाल ही में इलिनॉय विश्वविद्यालय के क्रिस्टोफर ब्रुक ने बताया है कि संक्रमित कोशिका सैकड़ों विचित्र प्रोटीन बनाने लगती है जो अपूर्ण वायरस जीनोम के जीन्स के ज़रिए बनते हैं। वे भी इस बात से सहमत हैं कि वायरस अकेले-अकेले नहीं बल्कि समुदाय के रूप में रहते हैं। ब्रुक अब इसी तरह के प्रमाण फ्लू वायरस के संदर्भ में खोजने की जुगाड़ में हैं। गौरतलब है कि एक संपूर्ण फ्लू वायरस में 8 जीन खंड होते हैं जो आम तौर पर 12 या अधिक प्रोटीन बनाते हैं। लेकिन जब संक्रमित कोशिकाएं अपूर्ण वायरस पैदा करती हैं, तब किसी जीन का मध्य भाग छोड़ दिया जाता है और शेष भागों को आपस में जोड़ दिया जाता है। इतनी उथल-पुथल के बावजूद ये परिवर्तित जीन्स प्रोटीन बनाते रहते हैं। अलबत्ता, इन प्रोटीन्स के काम सर्वथा भिन्न हो सकते हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में ब्रुक ने बताया है कि फ्लू संक्रमित कोशिकाओं में उन्हें ऐसे सैकड़ों नए प्रोटीन्स मिले हैं। ये विज्ञान के लिए एकदम नए हैं। शोधकर्ता पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि ये प्रोटीन करते क्या हैं।

ऐसे एक प्रोटीन पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि यह जाकर संपूर्ण वायरस द्वारा बनाए गए पोलीमरेज़ से चिपक जाता है और उसे नए वायरस जीनोम बनाने से रोक देता है। लेकिन फिलहाल वैज्ञानिक नहीं जानते कि अपूर्ण वायरस द्वारा बनाए गए इतने सारे प्रोटीन करते क्या हैं।

लेकिन ये दो परिकल्पनाएं महत्वपूर्ण हैं – ठगी और सहयोग। इनके बीच फैसला कर पाना मुश्किल है।

इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण नैनोवायरसों का है। ये वायरस पार्सले और फेवा बीन्स जैसे पौधों को संक्रमित करते हैं। इनका प्रतिलिपिकरण का तरीका बहुत अजीब होता है। इनमें कुल मिलाकर 8 जीन्स होते हैं लेकिन दिलचस्प बात यह है कि प्रत्येक वायरस कण में इन 8 में से एक ही जीन पाया जाता है। तो होता यह है कि जब ऐसे सारे 8 अलग-अलग जीनधारी वायरस कण एक साथ एक ही कोशिका में उपस्थित हों, तभी वे अपनी प्रतिलिपि बना सकते हैं। पौधे की कोशिका सभी 8 जीन्स के प्रोटीन बनाती है और उनके जीन्स की प्रतिलिपि भी बनाती है जो नए कवचों में पैक हो जाते हैं।

यह तो सहयोग का शास्त्रोक्त मामला लगता है। देखा जाए तो इन आठों वायरस कणों को मिल-जुलकर काम करना पड़ेगा, तभी प्रतिलिपि बन पाएगी। लेकिन लीक्स और उनके साथियों ने दर्शाया है कि नैनोवायरस (जिन्हें मल्टीपार्टाइट वायरस भी कहते हैं) में यह सहयोग बारास्ता ठगी भी विकसित हो सकता है।

मान लीजिए कि शुरुआत में नैनोवायरसों में सारे जीन्स एक ही जीनोम में मौजूद थे। यह संभव है कि इस वायरस ने गलती से कोई अपूर्ण वायरस उत्पन्न कर दिया जिसमें एक ही जीन है। यह अपूर्ण ठग वायरस तभी जी सकता है जब कोई पूर्ण वायरस इसके जीन की प्रतिलिपि बनवा दे। इसी प्रकार से किसी दूसरे जीन से युक्त कोई अन्य अपूर्ण ठग बन सकता है और उसे भी किसी पूर्ण वायरस को लूटकर ऐसा ही लाभ मिल जाएगा। लीक्स के दल ने इस तरह की क्रियाविधि का गणितीय मॉडल बनाया तो समझ में आया कि वायरस काफी तेज़ी से ठगों का रूप ले सकते हैं। यानी लगेगा सहयोग, लेकिन शुरुआत होगी ठगी से। इनके बीच फैसला करने के लिए बहुत अनुसंधान की ज़रूरत होगी, लेकिन वैज्ञानिकों के बीच एक उम्मीद भी जगी है।

सामाजिक वायरस विज्ञानी यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वायरसों में उपस्थित ठगी और सहयोग की घटना का उपयोग वायरस से लड़ने में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए सिंगापुर एजेंसी फॉर साइन्सेज़ के मार्को विग्नुज़ी की टीम ने इस विचार की जांच ज़िका वायरस के संदर्भ में की है। उन्होंने जेनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक से ऐसे अपूर्ण ज़िका वायरस तैयार किए जो कामकाजी वायरसों का भरपूर शोषण कर सकते थे। जब उन्होंने ऐसे ठगों को संक्रमित चूहों में प्रविष्ट किया तो उनमें कामकाजी वायरसों की संख्या में तेज़ी से कमी आई। अब इसे एक उपचार विधि के रूप में विकसित करने पर काम चल रहा है। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में शोधकर्ता बेन टेनोवर की टीम फ्लू वायरस के ठग वायरस विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे वायरस के ही एक लक्षण का फायदा उठाने की फिराक में हैं। ऐसा देखा गया है कि कभी-कभार एक ही कोशिका को एक ही समय पर संक्रमित करने वाले दो अलग-अलग वायरसों की जेनेटिक सामग्रियां एक ही कवच में पैक हो जाती हैं और एक नया वायरस प्रकट हो जाता है। टेनोवर का दल ऐसे अपूर्ण वायरस विकसित करना चाहता है जो फ्लू वायरस के जीनोम में घुसपैठ कर सकें।

इस दिशा में टेनोवर की टीम ने ठग वायरस से एक नेज़ल स्प्रे तैयार किया है। यह स्प्रे चूहों की नाक में छिड़क दिया जाए तो वे फ्लू के संक्रमण को झेल जाते हैं। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की इस टीम ने फ्लू संक्रमित कोशिकाओं से अपूर्ण वायरस हासिल किए हैं। इनमें से उन्होंने कुछ महा-ठग पहचाने हैं जो अपने जीन्स को कामकाजी फ्लू वायरस में पहुंचाने में कामयाब रहते हैं। इसके बाद जो वायरस बनता है वह संख्या-वृद्धि करने में कमज़ोर रहता है। जब कुछ चूहों को जानलेवा फ्लू से संक्रमित करने के बाद इस महा-ठग के संपर्क में लाया गया तो उनका संक्रमण काफी नियंत्रण में आ गया। यही प्रयोग उन्होंने गंधबिलावों पर भी करके अच्छे परिणाम हासिल किए।

अचरज की बात तो यह रही कि संक्रमित गंधबिलावों ने अन्य को जो वायरस हस्तांतरित किए उनमें काफी सारे महा-ठग भी थे। अर्थात यह संभव है कि ये महा-ठग वायरस के प्रसार पर भी अंकुश लगा सकते हैं।

अलबत्ता, कई शोधकर्ताओं ने चेताया है कि हम इस विषय में अभी बहुत कुछ नहीं जानते हैं। इसलिए इन ठगों के चिकित्सकीय उपयोग से पहले काफी अध्ययन की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सबसे प्राचीन त्वचा

ह तो हम जानते हैं कि त्वचा से शरीर को तमाम फायदे होते हैं और सुरक्षा मिलती है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि मृत्यु के बाद त्वचा लंबे समय तक टिकी नहीं रह पाती है और सड़-गल कर नष्ट हो जाती है। इसलिए यह पता कर पाना बड़ा कठिन है कि प्राचीन प्राणियों में त्वचा कैसे विकसित होती गई। खासकर यह सवाल अनसुलझा ही रहा है कि पेलियोज़ोइक एरा में यानी जब जीवों ने पानी से निकलकर भूमि पर रहना शुरू किया तो इस परिवर्तन के लिए उनकी त्वचा में किस तरह के बदलाव आए?

अब, ओक्लाहोमा स्थित रिचर्ड स्पर की चूना पत्थर की गुफाओं में शोधकर्ताओं को एक सरीसृप की त्वचा का एक बारीक टुकड़ा अश्मीभूत अवस्था में मिला है, जो पेलियोज़ोइक युग के अंत के समय का है। इसके विश्लेषण से लगता है कि सरीसृपों की शल्कदार जटिल संरचना वाली त्वचा एक बार विकसित होने के बाद से लगभग वैसी ही है।

यह जीवाश्म इगुआना जितने बड़े और छिपकली सरीखे सरीसृप जीव कैप्टोराइनस एगुटी का है, जो करीब 30 करोड़ वर्ष पुराना है। वैसे तो इन गुफाओं से सी. एगुटी के कई जीवाश्म मिले हैं, किंतु इनमें से अधिकतर जीवाश्म कंकाल रूप में ही हैं। लेकिन एक जीवाश्म में सी. एगुटी की थोड़ी सी बाह्यत्वचा (एपिडर्मिस) भी सलामत रह गई थी। त्वचा के सलामत बचने का कारण महीन अवसादी चट्टान और वहां का कम ऑक्सीजन वाला वातावरण था। यही कारण है कि रिचर्ड्स स्पर की इन गुफाओं में पैलियोज़ोइक युग के तरह-तरह के और अच्छी तरह से संरक्षित जीवाश्म मिलते हैं।

जब युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के एथान मूनी इन जीवाश्मों का अध्ययन कर रहे थे तो उन्हें एक जीवाश्म पर नाखून से भी छोटी और बाल से भी पतली, नाज़ुक सी बहुत सारी कण जैसी संरचनाएं दिखीं। पहले तो लगा कि ये हड्डी के ही हिस्से हैं। लेकिन सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करने पर पता चला कि वास्तव में यह जीवाश्म तो किसी जीव की त्वचा का है, जिसमें बाह्यत्वचा और उसके नीचे वाली परत सुरक्षित है। त्वचा की बनावट कुछ-कुछ बबल वाली पॉलीथीन की तरह थी – त्वचा दूर-दूर स्थित मुड़े हुए शल्कों जैसी संरचना से बनी थी जिनके बीच में लचीले कब्जे थे, जो वृद्धि और हिलना-डुलना-मुड़ना संभव बनाते हैं।

शोध पत्रिका करंट बायोलॉजी में प्रकाशित त्वचा की संरचना वगैरह के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह त्वचा सी. एगुटी सरीसृप की है। हालांकि अभी वे इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं क्योंकि यह त्वचा कंकाल से चिपकी नहीं थी। लेकिन इसकी झुर्रीदार, बबल-पॉलीथीननुमा संरचना को देखकर इतना तो तय है कि यह त्वचा किसी सरीसृप की है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रोकेरियोट्स ने कैसे युकेरियोट्स को जन्म दिया – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

पृथ्वी के जीवों को मोटे तौर पर दो समूहों में बांटा गया है – प्रोकेरियोट्स (केंद्रक-पूर्व या केंद्रकविहीन) और युकेरियोट्स (सुकेंद्रकीय या केंद्रकयुक्त)। प्रोकेरियोट्स एककोशिकीय जीव होते हैं; इनमें माइटोकॉन्ड्रिया जैसे कोई कोशिकांग भी नहीं होते, और इनमें डीएनए केंद्रक के अंदर बंद नहीं होता। युकेरियोट्स में माइटोकॉन्ड्रिया जैसे कोशिकांग होते हैं और इनका डीएनए केंद्रक के अंदर बंद होता है। अधिकांश युकेरियोट्स जटिल और बहुकोशिकीय जीव होते हैं।

लगभग 50 साल पहले यह दर्शाया गया था कि एककोशिकीय जीवों के एक उपसमूह, आर्किया, का वंशानुक्रम बैक्टीरिया से अलग है। ये दोनों कोशिका भित्ति की संरचना और कुछ जीनों के अनुक्रम की दृष्टि से अलग-अलग हैं। इस समूह के लिए आर्किया शब्द, जो प्राचीन होने का एहसास देता है, का उपयोग इसलिए किया गया था क्योंकि इस समूह के सबसे पहले खोजे गए सदस्य बहुत उच्च तापमान या बहुत अधिक खारी जगह वाली बहुत ही विषम परिस्थितियों में पाए गए थे।

आर्किया के एक समूह में ऐसे प्रोटीन पाए गए थे जो युकेरियोटिक प्रोटीन के काफी समान थे। ये जीव ऐसी भू-गर्भीय संरचनाओं में पाए जाते हैं जहां गर्म पानी एक दरार से बाहर निकलता है। ये संरचनाएं समुद्र में 2400 मीटर की गहराई पर हैं और यहां भूगर्भीय गर्मी से गरम होकर पानी के सोते फूटते रहते हैं। आगे चलकर इसी तरह के कई अन्य जीव कुछ असामान्य पारिस्थितिक तंत्रों में पाए गए, और उनके समूह को एसगार्ड कहा जाने लगा। एसगार्ड नॉर्स पौराणिक कथाओं में देवताओं के घर को कहा जाता है।

युकेरियोटिक कोशिकाओं का ऊर्जा बनाने वाला अंग (माइटोकॉन्ड्रिया) और पौधों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण के लिए पाया जाने वाला अंग (क्लोरोप्लास्ट), दोनों ही मुक्त-जीवी बैक्टीरिया से विकसित हुए हैं। जैव विकास के किन चरणों में इन दो कोशिकाओं के बीच यह सहजीवी सम्बंध अस्तित्व में आया? माइटोकॉन्ड्रिया का पूर्वज कोई प्रोटियोबैक्टीरियम था जिसे किसी एसगार्ड आर्किया जीव ने निगल लिया था। इस अंत:सहजीवी संयोजन के वंशजों ने जंतुओं, कवकों और पौधों को जन्म दिया। पौधों में, एसगार्ड-माइटोकॉन्ड्रियल मेल के बाद प्रकाश संश्लेषण करने वाले सायनोबैक्टीरिया आए, जो क्लोरोप्लास्ट बन गए।

कुछ साल पहले हम भारतीयों ने कुछ सरकारी बैंकों का जटिल विलय देखा था, जो उनके संचालन को सुधारने/बेहतर करने के लिए किया गया था। इसी तरह, दो स्वतंत्र तरह के जीवों के बीच एक व्यावहारिक सहजीवी सम्बंध के निर्माण में कई चुनौतियां होती हैं। नए जीव में जीन के दो पूरे सेट बरकरार रखने की कोई ज़रूरत नहीं थी, इसलिए चयन किया गया; सूचना संचालन के लिए आर्किया के जीन बरकरार रखे गए और रखरखाव व कार्यों का निष्पादन करने (यानी प्रोटीन संश्लेषण) के लिए, बैक्टीरिया के जीन के चुने गए। समय के साथ, कोशिकांगों के अधिकांश जीन केंद्रक में पहुंच गए, जो संभवत: अधिक कुशल व्यवस्था थी।

पौधों का अलग तरीका

हैदराबाद के कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के राजन शंकरनारायणन के दल ने इन अंत:सहजीवी सम्बंधों में कोशिकीय प्रक्रियाओं के पुर्नगठन पर विस्तृत अध्ययन किया है। प्रोटीन संश्लेषण के महत्वपूर्ण कोशिकीय कार्य को केंद्र में रखकर उन्होंने जंतुओं और कवक की तुलना पादपों से की है। पादपों में यह और भी जटिल है क्योंकि इनके विकास में जीन के तीन सेट (आर्किया, प्रोटियोबैक्टीरियम और सायनोबैक्टीरियम) शामिल थे। पीएनएएस में प्रकाशित अपने हालिया अध्ययन में वे बताते हैं कि पादपों ने वाकई जानवरों और कवकों से अलग ही रणनीति अपनाई है।

प्रोटीन अमीनो एसिड से बने होते हैं। प्रकृति केवल वामहस्ती अमीनो एसिड का उपयोग करती है; दक्षिणहस्ती विषैले हो सकते हैं। एसगार्ड और बैक्टीरिया का ‘अच्छे-बुरे’ के बीच भेद करने का तंत्र अलग होता है। शोध पत्र बताता है कि जंतु और कवक माइटोकॉन्ड्रिया को बदल-बदलकर इस विसंगति को दूर करते हैं। पौधे इन दो व्यवस्थाओं को अलग-अलग कर देते हैं – कोशिकाद्रव्य और माइटोकॉन्ड्रिया में। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दर्पण में कौन है? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

बंदरों को जब पहली बार दर्पण दिखाया जाता है तो वे उसमें दिख रहे प्रतिबिंब को देखकर ऐसी मुद्रा बनाते हैं जैसे किसी के प्रति शत्रुता दिखा रहे हों – वे अपने दांत दिखाते हैं और लड़ने जैसी मुद्रा बना लेते हैं। हम मनुष्य दर्पण में अपने प्रतिबंब को इस रूप में पहचानते हैं कि यह तो ‘मैं’ ही हूं। वैसे, यह क्षमता सिर्फ मनुष्यों का विशिष्ट गुण नहीं है। चिम्पैंज़ी, डॉल्फिन, हाथी, कुछ पक्षी और यहां तक कि कुछ मछलियां भी ‘मिरर टेस्ट’ (दर्पण परीक्षण) में उत्तीर्ण रही हैं।

छवि (या प्रतिबिंब) को स्वयं के रूप में पहचानने का परीक्षण काफी सरल है। चुपके से व्यक्ति (या जंतु) के चेहरे पर किसी ऐसी जगह एक चिन्ह (मसलन, एक बड़ा लाल बिंदु) बना दिया जाता है कि वह चिन्ह उसे दिखाई न दे। जब किसी शिशु या छोटे बच्चे के माथे पर लाल बिंदी बनाई जाती है तो दर्पण में यह बच्चे का ध्यान खींचती ही है। लगभग 18 महीने तक की उम्र तक बच्चे आईने के प्रतिबिंब में इस अपरिचित बिंदी को दर्पण में छूने की कोशिश करते हैं। 18 महीने की उम्र के बाद बच्चों की दर्पण प्रतिबिंब पर प्रतिक्रिया यह होती है कि वे खुद अपने माथे पर उस बिंदी को छूने की कोशिश करते हैं। लगता है कि जैसे वे खुद से पूछ रहे हों, “यह बिंदी मेरे चेहरे पर कैसे आ गई?”

बड़े बच्चों की हरकत यकीनन स्वयं को पहचानने का संकेत है। लेकिन क्या यह आत्म-भान होने का भी संकेत है? आखिरकार, वयस्क लोग तक दर्पण के प्रति तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देते हैं। कुछ लोग दर्पण दिखने पर उसके सामने ठहरे बिना मानते नहीं, और कुछ लोग उस पर ध्यान दिए बिना सामने से गुज़र जाते हैं।

आत्म-पहचान

हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में जापानी शोधकर्ताओं ने दर्पण में स्वयं को पहचानने को लेकर कुछ नए निष्कर्ष प्रकाशित किए हैं। उन्होंने ये नतीजे ब्लूस्ट्रीक क्लीनर रासे मछली पर अध्ययन कर निकाले हैं; यह दर्पण में स्वयं को पहचानने के लिए जानी जाती है। उष्णकटिबंधीय महासागरों में इस छोटी मछली का बड़ी मछलियों से एक परस्पर सम्बंध होता है। इनका भोजन बड़ी मछली के शरीर पर चिपके परजीवी होते हैं। क्लीनर मछलियां नियत स्थानों पर बड़ी मछलियों का इंतज़ार करती हैं, और परजीवी-ग्रस्त मछलियां परजीवियों को हटवाने के लिए उनके पास जाती हैं। यहां तक कि परजीवी-ग्रस्त मछलियां अपने शरीर की अजीब-अजीब मुद्राएं बनाती हैं ताकि क्लीनर मछलियां परजीवियों तक पहुंच सकें। यह कुछ वैसे ही दिखता है जैसे किसी हज्जाम की दुकान पर दाढ़ी या बगलों की हजामत करवाने बैठा व्यक्ति ठोढ़ी या बांह ऊपर करके बैठा होता है ताकि हज्जाम अपना काम कर सके।

अध्ययन में एक्वैरियम में, एक बार में एक क्लीनर मछली के साथ प्रयोग किए गए। पहले पानी में एक दर्पण रखा गया, या स्क्रीन पर मछली की तस्वीर दिखाई गई। शुरुआती कुछ दफा जब मछली ने दर्पण में अपनी छवि या तस्वीर देखी तो उनकी प्रतिक्रिया आक्रामक रही। लेकिन समय के साथ उनमें स्वयं की छवि की पहचान आ गई, और इन मछलियों ने दर्पण-टेस्ट पास कर लिया। अब वे केवल अजनबी की छवियों के प्रति आक्रामक थीं। और तो और, वे अपने शरीर पर बनाए गए चमकीले निशानों को भी पहचानने लगीं और पास की किसी भी सतह पर रगड़कर उन्हें मिटाने की कोशिश करने लगीं।

और जब तस्वीर में फेरबदल करके, उनका चेहरा किसी अन्य मछली के शरीर पर लगाकर, तस्वीर दिखाई गई तो भी मछलियों ने आक्रामक व्यवहार नहीं दर्शाया। लेकिन जब मछली के स्वयं के शरीर पर किसी अजनबी मछली के चेहरे वाली तस्वीर दिखाई गई तो उन्होंने शत्रुता का व्यवहार दर्शाया। इससे ऐसा लगता है कि क्लीनर मछली अपने चेहरे की याद रखती है।

मनुष्यों के बच्चों की बात पर वापिस आते हैं, हमने देखा है कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े होने लगते हैं उनमें आत्म-भान आने लगता है। दर्पण में प्रतिबिंब को देखकर पूरी तरह से ये ‘मैं’ हूं की समझ 18 महीने की उम्र में आती है। यह वह उम्र भी है जिस पर बच्चे अपने बारे में बात करना शुरू करते हैं, और पिछली घटनाओं को याद करते हैं, जैसे “मैंने इसे खा लिया”)। क्या इसे आत्म-भान कहा जा सकता है? (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दवा कारखाने के रूप में पालतू बकरी – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारत और कई विकासशील देशों के गांवों में पालतू बकरी (कैपरा हिर्कस) मिलना आम है। पालतू बनाए जाने के समय (लगभग 10,000 साल पहले) से ही बकरियों ने मानव समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाई है। यह भी कहा गया है कि मनुष्यों का शिकारी-संग्राहक जीवन शैली से कृषि आधारित बस्तियों में बसने में बकरियों का पालतूकरण एक महत्वपूर्ण कदम था।

खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का अनुमान है कि दुनिया में लगभग 1000 नस्लों की 83 करोड़ बकरियां हैं। भारत में 20 से अधिक प्रमुख नस्लों की 15 करोड़ बकरियां हैं। राजस्थान में बकरियों की संख्या सबसे अधिक है – यहां पाई जाने वाली मारवाड़ी बकरी सख्तजान है और रेगिस्तानी जलवायु के अनुकूल है। एक और सख्तजान नस्ल है उस्मानाबादी जो महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।

उत्तरी केरल की मलाबारी बकरी (जिसे टेलिचेरी भी कहा जाता है) एक ऐसी नस्ल है जिसके मांस में वसा कम होती है और वह खूब संतानें पैदा करती है। ऐसे ही गुण पंजाब की बीटल बकरी में भी होते हैं। पूर्वी भारतीय ब्लैक बंगाल बकरी बांग्लादेश के ग्रामीण गरीबों की आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान देती है। ये 2 करोड़ वर्ग फुट से अधिक चमड़ा प्रदान करती हैं जिसका उपयोग अग्निशामकों के लिए दस्ताने बनाने से लेकर फैशनेबल हैंडबैग और चमड़े के अन्य सामान बनाने में होता है। चूंकि कई किसानों के पास मवेशी पालने के लिए जगह या धन की कमी है, इसलिए बकरियों को ‘गरीब आदमी की गाय’ उचित ही कहा जाता है।

भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली बकरियों की बहुत कम आबादी है, जिनसे पालतू बकरियां या भेड़ें विकसित हुई हैं। इनमें मार्खोर और हिमालयी और नीलगिरी ताहर शामिल हैं।

समुद्री यात्राओं के स्वर्ण युग में इन यात्राओं के ज़रिए भारतीय बकरियों के जीन दुनिया के सभी इलाकों में फैले। भारत से युरोप जाने वाले जहाजों पर लदी बकरियां महीने भर लंबी यात्रा के दौरान लोगों के लिए दूध और मांस उपलब्ध कराती थीं। उत्तर प्रदेश की जमुनापारी बकरियों को पसंद किया गया क्योंकि वे आठ महीने के स्तनपान काल के दौरान 300 किलोग्राम दूध देती हैं। इंग्लैंड में कभी, उच्च वसा वाला दूध देने वाली बकरियों की नस्ल, एंग्लो-न्युबियन, विकसित करने के लिए जमुनापारी बकरियों का वहां की स्थानीय नस्ल के साथ संकरण कराया गया था।

औषधि का निर्माण

बकरियां लगभग दो साल में प्रजनन शुरू कर देती हैं और भरपूर दूध देती हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि बकरियों ने चिकित्सकीय प्रोटीन उत्पादन के लिए जैव प्रोद्योगिकी कंपनियों का ध्यान आकर्षित किया है।

इसमें पहली सफलता एट्रीन (ATryn) के साथ मिली है – यह बकरी से उत्पादित एंटीथ्रॉम्बिन-III अणु का व्यावसायिक नाम है। एंटीथ्रॉम्बिन रक्त को थक्का बनने से मुक्त रखता है, और इस प्रोटीन की कमी (जो आम तौर पर वंशानुगत होती है) से पल्मोनरी एम्बोलिज़्म जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इससे पीड़ित व्यक्तियों को सप्ताह में दो बार एंटीथ्रॉम्बिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है, जो आम तौर पर दान किए गए रक्त से निकाला जाता है।

ट्रांसजेनिक बकरियों, जिनमें मानव एंटीथ्रॉम्बिन जीन की एक प्रति रोपी जाती है, की स्तन ग्रंथियों की कोशिकाएं दूध में यह प्रोटीन स्रावित करती हैं। ऐसा दावा है कि एक बकरी उतना एंटीथ्रॉम्बिन बना सकती है जितना 90,000 युनिट मानव रक्त से प्राप्त होता है।

हाल ही में एफडीए द्वारा अनुमोदित सेटुक्सिमैब नामक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी औषधि का निर्माण क्लोन बकरियों में किया गया है। इसे बड़ी मात्रा में (प्रति लीटर दूध से 10 ग्राम) बनाया जा सकता है। फिलहाल यह मालूम नहीं है कि यह ‘औषधि’ सुरक्षा और प्रभावकारिता सम्बंधी नियामक बाधाओं को पार कर पाएगी या नहीं। अब देखना यह है कि क्या अन्य मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के अधिक मात्रा में उत्पादन के लिए बकरियों का इस्तेमाल दवा कारखानों के रूप में किया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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क्या खब्बू होना विरासत में मिलता है – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

यदि किसी व्यक्ति की मां खब्बू यानी बाएं हाथ से काम करने वाली हो, तो ज़्यादा संभावना होती है कि वह भी खब्बू हो।

म इन्सान दो पैरों पर चलते हैं यानी दोपाए हैं और अपने दो हाथों का उपयोग करते हैं। दोपाएपन का विकास हमारे पूर्वजों – प्रायमेट्स –  में लगभग 40 लाख पहले शुरू हो गया था। प्रायमेट जीवों ने न सिर्फ हमें हमारे रक्त समूह की सौगात दी, बल्कि दो पैर और दो हाथ भी दिए हैं। प्रायमेट्स में कई ऐसे लक्षण पाए जाते हैं जो उन्हें कम विकसित स्तनधारियों से अलग करते हैं। जैसे पेड़ों पर रहने (जैसा कि बंदर करते हैं) के लिए हुए अनुकूलन, बड़े मस्तिष्क, बेहतर दृष्टि संवेदना, उंगलियों के सामने आ जाने वाला (सम्मुख) अंगूठा जिसके चलते चीज़ों पर पकड़ बेहतर बनती है, और कंधों की ज़्यादा लचीली गतियां।

चार हाथों से दो तक

जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के डॉ. तेत्सुरो मात्सुज़ावा लिखते हैं कि प्रायमेट्स के साझा पूर्वज पेड़ों पर चढ़े और उन्होंने अपने ज़मीनी पूर्वजों के चार पैरों से चार हाथ विकसित किए। यह वृक्ष-आधारित जीवन के लिए एक अनुकूलन था। इससे उन्हें पेड़ के तने और शाखाओं पर बढ़िया पकड़ बनाने में मदद मिलती थी। इसके बाद किसी समय प्रारंभिक मानव पूर्वज पेड़ों से उतरे और ज़मीन पर दो पैरों से लंबी-लंबी दूरियां तय करने लगे। इस तरह हमने अपने प्रायमेट पूर्वजों से विकास के दौरान चार हाथों से दो पैर और दो हाथ बना लिए।

यूएस के मिसौरी विश्वविद्यालय के मानव वैज्ञानिक कैरोल वार्ड बताते हैं कि कैसे हम मनुष्य इस दुनिया में जिस ढंग से विचरते हैं, वह किसी भी अन्य प्राणि से भिन्न है। हम ज़मीन पर दो पैरों पर सीधे खड़े होकर चलते हैं लेकिन एकदम अनोखे ढंग से: पहले एक पैर, फिर दूसरा पैर, अपने शरीर को एकदम सीधा रखकर गतियों के एक विशिष्ट क्रम में। लिहाज़ा, यह समझना एक बड़ी बात है कि हम इसी तरह क्यों चलते हैं और हमारा वंश (होमो) अपने वानर-सदृश पूर्वजों से इतना दूर कैसे निकल गया।

मानव मस्तिष्क हमारे सबसे निकट सम्बंधी – चिम्पैंज़ी – से लगभग तीन गुना बड़ा है। इसके अलावा हमारे मस्तिष्क के सेरेब्रल कॉर्टेक्स नामक हिस्से में चिम्पैंज़ी के उसी हिस्से के मुकाबले कोशिकाओं की संख्या दुगनी है। गौरतलब है कि सेरेब्रल कॉर्टेक्स याददाश्त, एकाग्रता और सोच-विचार में प्रमुख भूमिका निभाता है। यानी हम वनमानुषों से ज़्यादा स्मार्ट हैं।

तो क्या यह जीन्स में है

अब सवाल आता है हाथों के इस्तेमाल में वरीयता यानी हैंडेडनेस का। लगभग 10 प्रतिशत लोग वामहस्त (खब्बू) हैं। यह कैसे हुआ? यह आज भी गर्मागरम बहस का मुद्दा है। हो सकता है कि इसमें कुछ जेनेटिक अंश हो: आपके खब्बू होने की संभावना आपकी मां के खब्बू होने से ज़्यादा जुड़ी होती है बनिस्बत आपके पिता की स्थिति से। यदि आपके माता-पिता दोनों खब्बू हों तो आपके खब्बू होने की संभावना 50 प्रतिशत हो जाती है। पाकिस्तान के सरगोधा विश्वविद्यालय के एक दल ने जरनल ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ एप्लाइड सायकोलॉजी (JIAAP) में बताया है कि खब्बू सहभागी दाहिने हाथ वाले (दक्षिणहस्त) सहभागियों की तुलना में अधिक बुद्धिमान होते हैं।

लंदन विश्वविद्यालय के डॉ. क्रिस मैकमेनस ने 2019 में एक विद्वत्तापूर्ण लेख प्रकाशित किया था: ‘हाफ ए सेंचुरी ऑफ हैंडेडनेस रिसर्च: मिथ्स, ट्रुथ्स, फिक्शन्स, फैक्ट्स; बैकवर्ड्स बट मोस्टली फॉरवर्ड्स’। यह लेख ब्रेन एंड न्यूरोसाइंस एडवांसेज़ नामक जरनल में प्रकाशित हुआ था। उन्हें उम्मीद है कि जीन अनुक्रमण और मस्तिष्क स्कैनिंग तकनीकों में हर तरक्की के साथ हम आने वाले वर्षों में हैंडेडनेस के बारे में और अधिक जान पाएंगे।

खब्बू फायदे में

खेलकूद में हम देख ही सकते हैं कि खब्बू खिलाड़ी दाहिने हाथ वालों पर हावी हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में लगभग 20 प्रतिशत उच्च स्तरीय बल्लेबाज़ खब्बू हैं। और ओपन-एरा विंबलडन प्रतियोगिता में 23 प्रतिशत बढ़िया खिलाड़ी खब्बू हैं। क्रिकेट में गौतम गंभीर और सौरभ गांगुली, टेनिस में राफेल नडाल और मार्टिना नवरातिलोवा, फुटबॉल में लियोनल मेसी। कहना न होगा कि महात्मा गांधी दोनों हाथों में निपुण (एम्बीडेक्स्ट्रस) थे, और आइज़ेक न्यूटन भी। इस फेहरिस्त में आप भी कई नाम जोड़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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वर्ष 2023 के ब्रेकथ्रू पुरस्कारों की घोषणा

हाल ही में ब्रेकथ्रू प्राइज़ फाउंडेशन ने 2023 के ब्रेकथ्रू पुरस्कारों की घोषणा की है। यह पुरस्कार हर वर्ष मूलभूत भौतिकी, गणित और जीव विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र के विजेताओं को 30 लाख डॉलर की पुरस्कार राशि प्रदान की जाती है।

इस वर्ष जीव विज्ञान में तीन ब्रेकथ्रू पुरस्कार दिए गए हैं। एक पुरस्कार अल्फाफोल्ड-2 के लिए डेमिस हैसाबिस और जॉन जम्पर को दिया गया है। अल्फाफोल्ड-2 एक कृत्रिम बुद्धि (एआई) आधारित सिस्टम है जिसने लंबे समय से चल रही प्रोटीन संरचना की समस्या को हल किया है। प्रोटीन्स सूक्ष्म मशीनें हैं जो कोशिकाओं को उचित ढंग से चलाने का काम करते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखला होते हैं लेकिन उनके कामकाज के लिए उनका सही ढंग से तह होकर एक त्रि-आयामी रचना अख्तियार करना ज़रूरी होता है। प्रोटीन की इस त्रि-आयामी रचना को समझना उनके कामकाज को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। और यह काफी मुश्किल काम रहा है।

डीपमाइंड नामक कंपनी में अपनी टीम के साथ काम करते हुए हैसाबिस और जम्पर ने एक डीप-लर्निंग सिस्टम तैयार किया जो बड़ी ही सटीकता और तेज़ी से मात्र अमीनो अम्लों के क्रम के आधार पर प्रोटीन के त्रि-आयामी मॉडल का निर्माण करने में सक्षम है। इस वर्ष डीपमाइंड द्वारा अब तक 20 करोड़ प्रोटीन संरचनाओं को डैटाबेस में जोड़ा जा चुका है। इसकी मदद से प्रोटीन संरचना का निर्धारण करने में लगने वाला समय – कुछ घंटों से लेकर महीनों और वर्षों तक का – बच सकेगा। भविष्य में दवाइयां तैयार करने से लेकर सिंथेटिक बायोलॉजी, नैनोमटेरियल्स और कोशिकीय प्रक्रियाओं की बुनयादी समझ विकसित करने में इस डैटाबेस से काफी मदद मिलेगी।       

जीव विज्ञान में एक पुरस्कार एक नई कोशिकीय प्रक्रिया की खोज को मिला है। कोशिकीय प्रक्रिया के बारे में अभी तक हमारी समझ यह थी कि कोशिका का अधिकांश कार्य झिल्ली से घिरे उपांगों यानी ऑर्गेनेल में सम्पन्न होता है। एंथनी हायमन और क्लिफोर्ड ब्रैंगवाइन ने इस संदर्भ में एक सिद्धांत प्रस्तुत किया है। यह सिद्धांत झिल्ली की अनुपस्थिति में प्रोटीन और अन्य जैव-अणुओं के बीच कोशिकीय अंतर्क्रियाओं के संकेंद्रण पर टिका है। शोधकर्ताओं ने ऐसी तरल बूंदों के निर्माण की बात की है जो प्रावस्थाओं के पृथक्करण से बनती हैं। यह एक तरह से पानी में बनने वाली तेल की बूंदों के समान है। ये बूंदें अस्थायी संरचनाओं के समान होती हैं जो अपने अंदर के पदार्थ को कोशिका के जलीय वातावरण की आणविक उथल-पुथल से अलग-थलग रखती हैं। इस खोज के बाद इन दोनों वैज्ञानिकों व अन्य शोधकर्ताओं ने यह दर्शाया है कि ये झिल्ली रहित तरल संघनित क्षेत्र कई कोशिकीय प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसे, संकेतों का आदान-प्रदान, कोशिका विभाजन, कोशिका के नाभिक में केंद्रिका की स्थिर संरचना और डीएनए का नियमन। इस खोज से भविष्य में एएलएस जैसे कई तंत्रिका-विघटन रोगों की चिकित्सा में काफी मदद मिलने की संभावना है।

जीव विज्ञान में तीसरा ब्रेकथ्रू पुरस्कार नारकोलेप्सी नामक तंत्रिका-विघटन रोग पर नए विचार प्रस्तुत करने के लिए इमैनुएल मिग्नॉट और मसाशी यानागिसावा को दिया गया है। नार्कोलेप्सी एक तंत्रिका-विघटन से जुड़ा निद्रा रोग है जिसमें पूरे दिन व्यक्ति उनींदा-सा रहता है और बीच-बीच में अचानक नींद के झोंके आते हैं।

दोनों वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से काम करते हुए बताया है कि नार्कोलेप्सी रोग का मुख्य कारण ऑरेक्सिन (या हाइपोक्रेटिन) नामक प्रोटीन है। यह प्रोटीन आम तौर पर जागृत अवस्था का नियमन करता है। जहां कुछ जीवों में नार्कोलेप्सी उत्परिवर्तन के कारण होता है जो उन तंत्रिका ग्राहियों को प्रभावित करता है जो ऑरेक्सिन से जुड़ते हैं वहीं मनुष्यों में यह स्वयं की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा ऑरेक्सिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करने की वजह से होता है।

इस खोज ने नार्कोलेप्सी के लक्षणों को दूर करने के साथ-साथ नींद की दवाइयों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

गणित का ब्रेकथ्रू पुरस्कार डेनियल ए. स्पीलमन को मिला है जिन्होंने न केवल गणित बल्कि कंप्यूटिंग, सिग्नल प्रोसेसिंग, इंजीनियरिंग और यहां तक कि क्लीनिकल परीक्षणों के डिज़ाइन जैसी अत्यधिक व्यवहारिक समस्याओं पर एल्गोरिदम और समझ विकसित करने में बहुमूल्य योगदान दिया है। स्पीलमन और उनके साथियों ने कैडीसन-सिंगर समस्या का समाधान प्रस्तुत किया। यह समस्या क्वांटम मेकेनिक्स में उत्पन्न हुई थी लेकिन आगे चलकर कई गणितीय क्षेत्रों, जैसे रैखीय बीजगणित, उच्चतर-आयाम ज्यामिति, यथेष्ट मार्ग का निर्धारण और सिग्नल प्रोसेसिंग जैसी प्रमुख अनसुलझी समस्याओं जैसी साबित हुई।

मूलभूत भौतिकी का ब्रेकथ्रू पुरस्कार क्वांटम सूचना के क्षेत्र में काम कर रहे चार अग्रिम-अन्वेषकों को मिला है।

अपने बीबी84 प्रोटोकॉल के आधार पर चार्ल्स एच. बेनेट और गाइल्स ब्रासार्ड ने क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की नींव रखी। इसके लिए उन्होंने उन उपयोगकर्ताओं के बीच गुप्त संदेश भेजने का एक व्यावहारिक तरीका तैयार किया जो शुरू में कोई गुप्त जानकारी साझा नहीं करते थे। ई-कॉमर्स में आम तौर पर उपयोग की जाने वाली विधियों के विपरीत इस जानकारी को असीमित कंप्यूटिंग शक्ति वाले भेदिए भी प्राप्त नहीं कर सकते। पूर्व में उन्होंने क्वांटम टेलीपोर्टेशन की खोज के साथ क्वांटम इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग के नए विज्ञान को भी जन्म दिया।

डेविड डॉच ने क्वांटम कम्प्यूटेशन की नींव रखी। उन्होंने ट्यूरिंग मशीन के क्वांटम संस्करण को परिभाषित किया। यह एक असीम क्वांटम कंप्यूटर है जो क्वांटम मेकेनिक्स के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए किसी भी भौतिक प्रणाली की सटीक अनुकृति तैयार कर सकता है। डॉच के अनुसार इस प्रकार का कंप्यूटर कुछ क्वांटम गेट्स के नेटवर्क के समान है। यह एक तरह के लॉजिक गेट्स हैं जो कई क्वांटम स्थितियों को एक साथ समायोजित करने में सक्षम हैं। उन्होंने ऐसा पहला क्वांटम एल्गोरिदम तैयार किया जिसने सभी समकक्ष पारंपरिक एल्गोरिदम्स को पीछे छोड़ दिया।     

पीटर शोर ने सबसे पहला उपयोगी कंप्यूटर एल्गोरिदम तैयार किया। उनका एल्गोरिदम किसी भी पारंपरिक एल्गोरिदम से कहीं अधिक तेज़ी से बड़ी संख्याओं के गुणनखंड पता लगाने में सक्षम था। उन्होंने क्वांटम कंप्यूटरों में त्रुटि-सुधार की तकनीकें डिज़ाइन कीं जो पारंपरिक कंप्यूटरों की अपेक्षा बहुत मुश्किल काम है। इन विचारों ने न केवल वर्तमान में तेज़ी से विकसित हो रहे क्वांटम कंप्यूटरों के लिए रास्ता खोला बल्कि उन्होंने मूलभूत भौतिकी के क्षेत्र में भी अग्रणि भूमिका निभाई। (स्रोत फीचर्स)

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क्या सपनों को रिकॉर्ड कर सकते हैं? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

पिछली एक सदी में मानव जीव विज्ञान पर हमारी समझ काफी बढ़ी है। अलबत्ता, सपनों को समझने में प्रगति काफी धीमी रही है। सपनों की जैविक प्रणाली हमारे लिए अस्पष्ट सी है; एकमात्र निश्चित बात यह है कि अधिकांश मनुष्य सपने देखते हैं।

नींद की जो अवस्था यादगार सपने देखने से जुड़ी है, उसे रैपिड आई मूवमेंट (REM) नींद कहा जाता है। इस चरण में व्यक्ति की आंखें तेज़ी से हरकत करती रहती हैं। नींद के इस चरण में जाग जाएं, तो लोग अक्सर बताते हैं कि वे इस वक्त सपना देख रहे थे। शोधकर्ताओं के लिए REM एक पहेली है क्योंकि इसे मापना मुश्किल है।

साइंस में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट इस महत्वपूर्ण सवाल को संबोधित करती है: सपने में जो कुछ घटता है क्या REM का उससे कुछ सम्बंध है? क्या आंखों की गति में सपने के बारे में कोई जानकारी होती है जिसका विश्लेषण करके अर्थ निकाला जा सके?

लेकिन उस सवाल में जाने से पहले सपनों के अर्थ निर्धारण पर कुछ बात कर ली जाए। बीसवीं सदी की शुरुआत में सिग्मंड फ्रॉयड के सिद्धांत हावी थे, जो सपनों में दिखने वाली छवियों के प्रतीकात्मक अर्थ निकालने पर केंद्रित थे। 1952 में REM नींद की खोज हुई और इसने सपनों को मनोविश्लेषण से अलग दिशा में आगे बढ़ाया।

REM नींद में मस्तिष्क उतना ही सक्रिय पाया गया जितना कि पूरी तरह से जागृत अवस्था में होता है। लेकिन शरीर निष्क्रिय था, सो रहा था। REM नींद सभी स्तनधारियों और पक्षियों में देखी गई है। मिशेल जौवे ने दर्शाया है कि बिल्ली के ब्रेन स्टेम में क्षति पहुंचाने से वह स्वप्नावस्था की शारीरिक गतिहीनता से मुक्त हो जाती है। सपने में तो वह बिल्ली अन्य बिल्लियों के साथ आवाज़ें निकालते हुए लड़ती-भिड़ती है, लेकिन जागने पर लड़ना बंद कर देती है।

मस्तिष्क तरंगों की रिकॉर्डिंग (ईईजी) से इस बारे में नई समझ मिली है। इन रिकॉर्डिंग ने बताया है कि REM नींद और जागृत अवस्था के बीच बहुत कम अंतर है। एक दिलचस्प प्रयोग में तंत्रिका वैज्ञानिक मैथ्यू विल्सन ने भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढते हुए एक जागृत चूहे के मस्तिष्क की गतिविधि को रिकॉर्ड किया। कुछ ही समय बाद जब चूहा REM नींद में था तब उन्हें उसके मस्तिष्क में उसी तरह की मस्तिष्क तंरगें दिखीं – तो क्या वह सपने में भी भूलभुलैया से निकलने का रास्ता खोज रहा था?

सपनों का डैटाबेस

सपनों का अध्ययन करने का एक अन्य तरीका रहा सपनों का वृहत डैटाबेस संकलित करना। सपनों के संग्राहक केल्विन हॉल ने 50,000 सपनों के विश्लेषण से निष्कर्ष निकाला था कि अधिकांश सपने सरिएलिस्ट (असंगत-यथार्थवादी) पेंटिंग जैसे नहीं होते, और उनका काफी हद तक पूर्वानुमान किया जा सकता है। हो सकता है कि सपने देखते समय बच्चे मुस्कराएं क्योंकि बच्चों के सपनों में जानवरों को देखने की अधिक संभावना होती है, लेकिन वयस्कों के सपने बहुत सुखद नहीं होते और अक्सर उनमें चिंता के क्षण होते हैं।

हम महत्वपूर्ण चीज़ों के बारे में चिंतित होते हैं; ऐसी चीज़ें जिन्हें सुलझाना है। फ्रांसिस क्रिक और ग्रेम मिचिसन द्वारा प्रस्तावित एक सिद्धांत के अनुसार सपने देखना घर की साफ-सफाई-व्यवस्थित करने जैसा काम है – दिन भर की घटनाओं की छंटाई। छंटाई करते समय कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं (चिंता के संभावित स्रोत) को यादों के रूप में सहेजा जाता है, और बाकी को रद्दी मानकर छोड़ दिया जाता है।

क्या चलते हुए सपनों से कुछ आउटपुट मिल सकता है जिसे रिकॉर्ड किया जा सके? जवाब परस्पर विरोधी हैं। कुछ अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि आंखों की गति या दिशा या आवृत्ति सपने में दोहराई गई मानसिक प्रक्रिया से मेल खाती है। इलेक्ट्रोऑक्युलोग्राफ की मदद से सोते हुए प्रतिभागियों की आंखों की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया गया, जिसमें यह दर्ज किया गया कि आंखों की गति मुख्य रूप से या तो खड़ी (ऊपर-नीचे) या आड़ी (दाएं-बाएं) होती है। जिन प्रतिभागियों ने बताया कि वे अपने सपने में ऊपर की ओर देख रहे थे उनकी आंखों की गति ऊपर-नीचे वाली देखी गई। दूसरी ओर, अन्य अध्ययनों ने REM का श्रेय मस्तिष्क की बेतरतीब गतिविधियों को दिया है।

अभ्यास रणनीतियां

जागते समय आंखों की गति आवश्यक है। खुले मैदान में चूहा अक्सर अपनी आंखों को ऊपर की ओर घुमाता है, और आसमान से शिकारी पक्षियों के खतरे को भांपता है। पैदल चलने वाले लोग आने-जाने वाली गाड़ियों को देखने के लिए दाएं-बाएं देखते हैं। इन दोनों स्थितियों में आंखें उसी दिशा में घूमती हैं जिसमें सिर घूमता है। मस्तिष्क निगरानी रखता है कि आपका सिर किस दिशा की ओर है। इसके लिए वह हेड डायरेक्शन (HD) तंत्रिका कोशिकाओं का उपयोग करता है। चूहों की हेड डायरेक्शन कोशिका में इलेक्ट्रोड लगाकर यह दर्शाया गया है कि जब सिर गति कर रहा होता है तो ये कोशिकाएं सक्रिय होती हैं।

मैसिमो स्कैनज़िएनी ने सोते हुए चूहों में REM और HD कोशिका गतिविधि दोनों को रिकॉर्ड किया। उल्लेखनीय रूप से, उन्होंने दिखाया कि REM नींद में चूहों की आंखों की गति दिन में आसमान पर नज़र रखने के समान ऊपर-नीचे थी। HD कोशिकाओं ने भी इसी गति के संकेत दिए, हालांकि सोते समय सिर नहीं हिल रहे थे। ऐसा लगता है कि सपना किसी शिकारी पक्षी से बचने के बारे में था। क्या इन अध्ययनों का उपयोग मनुष्यों के लाभ के लिए किया जा सकता है? जिन लोगों ने अचानक, तीव्र आघात का अनुभव किया हो वे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित होते हैं। कोई सैनिक जो अपने पीछे हथगोला फटने से दहल गया हो, भले ही उस विस्फोट से वह चोटिल न हुआ हो, उसे बार-बार ऐसे ही बुरे सपने आ सकते हैं और वर्षों तक चिंता सता सकती है। वह हर रात सपने में क्या ‘देखता’ है, इसकी बेहतर समझ उसे इससे उबारने की बेहतर रणनीतियां दे सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नई लार ग्रंथियों की खोज – स्निग्धा दास

भी-कभी ऐसा होता है कि हम करने कुछ जाते हैं और करके कुछ और आते हैं। हाल ही में ऐसा ही कुछ नीदरलैंड्स के डॉक्टरों के साथ हुआ। प्रोस्टेट कैंसर में रेडिएशन द्वारा उपचार के दुष्प्रभाव का अध्ययन करने वाले इन डॉक्टरों ने एक नया अंग खोज निकाला है।

नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टिट्यूट के रेडियो ऑन्कोलॉजी संकाय के डॉक्टरों ने हाल ही में एक जोड़ी नई लार ग्रंथियों की खोज का दावा किया है। चिकित्सा क्षेत्र में स्कैन सम्बंधी तकनीकों में लगातार उन्नति के चलते यह खोज संभव हुई। रेडियोलॉजिस्ट वूटर वी. वोगल एवं सर्जन मैथियास एस. वेलस्टर और उनके साथियों ने लार ग्रंथियों के इस नए जोड़े को नाक एवं गले के बीच नासाग्रसनी के पास स्थित पाया है। इन्हें ट्यूबेरियल लार ग्रंथि नाम दिया गया है।

सिर एवं गले के कैंसर में रेडिएशन उपचार के लार ग्रंथियों पर प्रभाव के अध्ययन के दौरान इन ग्रंथियों की उपस्थिति की पुष्टि की गई। इस खोज का विवरण जर्नल ऑफ रेडियोथेरेपी में प्रकाशित हुआ है। इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि हमारे शरीर के अंदर कई और अंग होंगे जिनकी जानकारी हमें नहीं है।

लगभग चार सेंटीमीटर लंबी इन लार ग्रंथियों से म्यूकस का स्राव होता है। नासाग्रसनी व उसके आसपास के हिस्से का चिकनापन बनाए रखने, निगलने व खाने में इन ग्रंथियों की भूमिका है। यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि इससे कैंसर के मरीज़ों के जीवन की गुणवत्ताा बढ़ाई जा सकती है।

हमारे मुंह में तीन जोड़ी बड़ी एवं हज़ारों छोटी लार ग्रंथियां हैं। लार में लगभग 98 प्रतिशत पानी, कुछ एंज़ाइम्स, इलेक्ट्रोलाइट आदि पाए जाते हैं। किसी व्यक्ति की लार ग्रंथियों के रेडिएशन से क्षतिग्रस्त होने पर मुंह में लार बनने की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है। अत: मुंह सूख-सा जाता है। स्वाद अनुभव करने, पाचन, निगलने एवं बोलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है एवं मुंह में संक्रमण की संभावना भी बढ़ जाती है।

शोधकर्ताओं ने सिर एवं गले के कैंसर के 723 मरीज़ों में रेडिएशन के प्रभावों का अध्ययन करने पर पाया कि ट्यूबेरियल लार ग्रंथियां क्षतिग्रस्त होने से मरीज़ों में मुंह सूख जाना, भोजन निगलने व बात करने में दिक्कत होना जैसे ही दुष्प्रभाव नज़र आते हैं। 100 मरीज़ों के स्कैन एवं दो शवों के विच्छेदन से इन अंगों की उपस्थिति की पुष्टि की गई है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बहु-कोशिकीय जीवों का एक-कोशिकीय पूर्वज – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती रूप की चर्चा करते हुए अमेरिका का स्मिथसोनियन संस्थान बताता है कि ऑक्सीजन रहित और मीथेन की अधिकता वाला वातावरण जंतुओं के जीवन के लिए उपयुक्त नहीं था। फिर भी इस वातावरण में ऐसे सूक्ष्मजीव रह सकते थे जो सूर्य के प्रकाश का सामना कर, इसकी मदद से जीवित रहने के लिए ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम थे।

पृथ्वी पर ऐसा वातावरण आज से लगभग 3.4 अरब साल पहले और पृथ्वी के अस्तित्व में आने के लगभग एक अरब साल बाद था। अपने भोजन बनाने की प्रक्रिया में सूक्ष्मजीवों ने ऑक्सीजन नामक गैसीय गौण उत्पाद बनाया। इस ‘महान ऑक्सीकरण घटना’ की बदौलत इसके लगभग 2 अरब साल बाद ऑक्सीजन पृथ्वी की सतह का एक महत्वपूर्ण घटक बन गई और पृथ्वी जीवों के जीवन के अनुकूल हो गई।

इस ऑक्सीजन का बाहरी ऊर्जा के रूप में उपयोग करके जंतु कोशिकाएं अपने शारीरिक विकास और संख्या वृद्धि के लिए भोजन बना सकती हैं। लेकिन इसके लिए उनकी शारीरिक रचना और जीव विज्ञान में तबदीली की ज़रूरत थी (बहु-कोशिकता के उद्भव और उसकी ज़रूरत पर एक उत्कृष्ट सारांश टी. केवेलियर-स्मिथ द्वारा रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित किया गया है, इसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं: https://doi.org/10.1098/rstb.2015.0476)। वे यह भी बताते है कि क्यों एक एक-कोशिकीय जीव (कोएनोफ्लैजिलेट) का उपयोग मनुष्य जैसे बहु-कोशिकीय जीवों के जैव विकास और विविधीकरण का अध्ययन करने के लिए एक मॉडल के रूप में किया जा सकता है। कोएनोफ्लैजिलेट जंतुओं के ऐसे सबसे करीबी जीवित रिश्तेदार हैं जो लगभग एक अरब साल पहले अस्तित्व में आए थे। कोएनोफ्लैजिलेट जंतुओं के सबसे करीबी रिश्तेदार माने जाते हैं। इनके अंडाकार शरीर पर एक चाबुक जैसा उपांग (कशाभ) होता है जिसके आधार पर एक कीप जैसी कॉलर होती है। इसलिए इन्हें कीप-कशाभिक भी कहते हैं। ये अकेले भी रहते हैं और कॉलोनियों में भी।

पिछले कुछ समय में हुए जीनोम अनुक्रमण के प्रयासों की बदौलत यह पता चला है कि कोएनोफ्लैजिलेट में भी कुछ ऐसी प्रक्रियाएं होती हैं जिनके बारे में अब तक ऐसा लगता था कि ये सिर्फ बहुकोशिकीय जीवों में ही होती हैं। इनमें कोशिकाओं के बीच संदेशों का आदान-प्रदान, कोशिका से कोशिका के चिपकने की प्रवृत्ति वगैरह शामिल हैं।

त्रुटिसुधार

समय के साथ जंतु कोशिकाएं क्रियाशील ऑक्सीजन मूलक (आरओएस) नामक अणु अधिक मात्रा में बनाने के लिए विकसित हुर्इं, ये अणु कई आवश्यक कोशिकीय गतिविधियों के लिए ज़रूरी होते हैं लेकिन इनका उच्च स्तर विषाक्तता पैदा करता है। आरओएस प्रतिरक्षा, तनाव प्रतिक्रिया और परिवर्धन जैसी प्रक्रियाओं में संकेतक अणु की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा अधिक जटिलता के लिए ज़रूरी होता है कि जंतु के जीनोम के आकार में भी पर्याप्त वृद्धि हो। इसके साथ कोशिका में सभी कार्यों में भी वृद्धि होती है, जैसे डीएनए (विभिन्न अंगों की कोशिकाओं में मौजूद आनुवंशिक सामग्री), उसको संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में लिप्यांतरित करना, और फिर tRNA की मदद से इन्हें कोशिकाओं में विशिष्ट प्रोटीन बनाने वाले अमीनो एसिड अनुक्रम में बदलना। tRNA की इस बढ़ी हुई संख्या (किसी सामान्य सूक्ष्मजीव में लगभग 50 से लेकर जंतुओं में सैकड़ों) का मतलब यह हुआ इन्हें कम से कम गलतियों के साथ सावधानीपूर्वक चुना जाना ज़रूरी है।

यदि प्रोटीन के स्तर पर आनुवंशिक कोड की गलत व्याख्या हो जाए तो यह गलती कार्यात्मक विकार और रोगों को जन्म देगी। (उदाहरण के लिए, सही अमीनो एसिड के स्थान पर, एक ‘गलत’ अमीनो एसिड आ जाने से प्रोटीन की आकृति, आकार या घुलनशीलता बदल सकती है जिसके कारण लायनस पौलिंग के शब्दों में ‘आणविक रोग’ हो सकते हैं। यदि हीमोग्लोबिन में एक एमिनो एसिड बदल जाए तो एनीमिया हो सकता है। और यदि आंख के लेंस के प्रोटीन में एक गलत एमीनो एसिड आ जाए तो मोतियाबिंद हो सकता है।) गलत अमीनो एसिड वाला प्रोटीन बनने से रोकने के लिए कोशिकाओं में ऐसे एंज़ाइम होते हैं जो गलत अमीनो एसिड को हटाने में मदद करते हैं। हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के राजन शंकरनारायणन और उनके साथियों का हालिया शोध, जंतु कोशिकाओं में एंज़ाइम की मदद से प्रूफ-रीडिंग के इसी पहलू पर केंद्रित है। यह शोध ईलाइफ पत्रिका के 28 मई, 2020 के अंक में प्रकाशित हुआ है। (जीनोमिक नवाचार ATD जीव जगत में बहुकोशिकता में होने वाले गलत रूपांतरणों को कम करता है, DOI: https: // doi. org / 10.7554 / eLife.58118)।

इस शोध के दिलचस्प शीर्षक ने मुझे डॉ. शंकरनारायणन से बात करने को उकसाया। उन्होंने मुझे जो समझाया वही यहां बता रहा हूं। उनके समूह को ATD नामक एक ऐसा जंतु विशिष्ट प्रूफ-रीडिंग एंज़ाइम मिला था जो थ्रेओनिन (T) नामक एमिनो एसिड के वाहक tRNA से (गलत) एमिनो एसिड एलेनिन (A) को हटा देता है। इस तरह सही प्रोटीन संश्लेषण बहाल होता है और कोशिका सामान्य तरीके से कार्य करती रहती है। वे आगे बताते हैं कि जंतु कोशिकाओं में ThrRS नामक एक अन्य एंज़ाइम भी होता है जो ATD की तरह ही कार्य करता है, लेकिन कोशिकाओं में उच्च आरओएस स्तर होने पर यह एंजाइम अपनी क्षमता खो देता है। जबकि ATD एंज़ाइम कोशिकाओं में आरओएस का उच्च स्तर होने पर भी सक्रिय बना रहता है।

शोधकर्ताओं द्वारा प्रयोगशाला में, मानव गुर्दे की कोशिकाओं और चूहों के भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं पर इन परिणामों की पुष्टि की गई थी। नई जीनोम एडिटिंग तकनीक, CRISPR-Cas9, का उपयोग करके कोशिकाओं से यह जीन हटाया गया, जिससे समूचा प्रोटीन गलत संश्लेषित हुआ और परिणामस्वरूप कोशिका की मृत्यु हो गई। और खास बात यह रही कि वे उपरोक्त परिघटना के पीछे के आणविक कारण को भी पहचान सके।

वे बताते हैं कि वास्तव में कि ATD रहित कोशिकाओं में थ्रेओनिन के स्थान पर कई जगह एलेनिन रख कर प्रोटीन बनाने की गलती हुई थी। शोधकर्ता अब आरओएस के उच्च स्तर वाले ऊतकों, जैसे वृषण और अंडाशय में ATD की विशिष्ट भूमिका की जांच करना चाहते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि जंतुओं में प्रोटीन के गलत संश्लेषण की समस्या के लिए ज़िम्मेदार tRNA के विशेष समूह की बढ़ी हुई संख्या से एक संभावना यह बनती है कि इनमें प्रोटीन संश्लेषण के अलावा अन्य कोई कार्य करने क्षमता भी विकसित हो सकती है। जैसे एपिजेनेटिक्स, प्रोग्राम्ड सेल डेथ (एपोप्टोसिस) और प्रजनन क्षमता भी। इनका विस्तार से परीक्षण करना उपयोगी हो सकता है।

विकास को आकार देना

अंत में एक सवाल यह उठता है कि क्या कोएनोफ्लैजिलेट जंतु मॉडल में प्रूफ-रीडर ATD मौजूद होता है और क्या यह इसी तरह काम करता है? इसका जवाब हां है, जैसा कि कुंचा और उनके साथी लिखते हैं: ‘एटीडी एक ऐसा एंज़ाइम है जो केवल जंतुओं में पाया जाता है। … आगे के अध्ययन में यह पता चला है कि ATD की उत्पत्ति लगभग 90 करोड़ साल पहले, कोएनोफ्लैजिलेट्स और जंतुओं के विकास के अलग-अलग दिशा में आगे बढ़ने के पहले, हुई थी। इससे लगता है कि इस एंज़ाइम ने जंतुओं के विकास को आकार देने में मदद की होगी।’ दूसरे शब्दों में कहें तो, ये स्पंज सरीखे एक-कोशिकीय जीव पृथ्वी के सभी जंतुओं के पूर्वज हैं, जिनमें हम मनुष्य भी शामिल हैं। कितना सादगीभरा विचार है!

तो पेड़-पौधों के बारे में क्या कहेंगे? वह एक अलग कहानी है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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