जलवायु परिवर्तन का जंगली फफूंद पर असर

क्रोएशिया के कुछ हिस्सों में ट्रफल (खाने योग्य फफूंद) काफी महत्वपूर्ण हैं। इनकी कीमत लगभग 4,00,000 रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है। ट्रफल उद्योग और इससे सम्बंधित पर्यटन रोज़गार प्रदान करता है, अतिरिक्त आय देता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।

तीस साल पहले इस्त्रिया में वर्ष भर में होने वाली बारिश का पूर्वानुमान किया जा सकता था। लेकिन अब, जलवायु बदल गई है और सूखा भी पड़ने लगा है। ट्रफल्स को बढ़ने के लिए एक विशिष्ट मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। और अपेक्षाकृत गर्म जाड़ों के कारण जंगली सूअरों की आबादी बढ़ गई है, जो मिट्टी को नुकसान पहुंचाते हैं और ट्रफल खा जाते हैं। जिस कारण ट्रफल्स मिलना मुश्किल होता जा रहा है।

फफूंद वैज्ञानिक ज़ेल्को ज़्ग्रेबिक काले ट्रफल्स के प्लांटेशन की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें वे उनके बीजाणुओं को पेड़ों पर रोपने के विभिन्न तरीकों को आज़मा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने इस फफूंद के जीवन चक्र, पारिस्थितिकी और पूरे क्रोएशिया में कवक के भौगोलिक वितरण सम्बंधी डैटा और नमूने एकत्रित किए।

उनके अनुसार ट्रफल प्लांटेशन प्राकृतिक आवासों पर दबाव को कम कर सकता है। इसमें, मिट्टी में पानी की मात्रा नियंत्रित की जा सकती है, उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि विधियों का उपयोग किया जा सकता है और सूअरों को बाहर रखा जा सकता है।

वे मिट्टी में कवक की पहचान करने के लिए डीएनए बारकोडिंग का उपयोग कर रहे हैं ताकि संरक्षित क्षेत्रों में उनके बीजाणुओं और कवक-तंतुओं (मायसेलियम) की मदद से कवक की पहचान की जा सके। ज़्ग्रेबिक का कहना है कि प्रजातियों की संख्या अनुमान से कहीं अधिक है।

इसके अलावा, ट्रफल वाले इलाकों और ट्रफल-रहित इलाकों की तुलना करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि वे कुछ क्षेत्रों में क्यों पनपते हैं। इस काम से ब्रिजुनी नेशनल पार्क के एड्रियाटिक द्वीप जैसे स्थानों में जैव विविधता का महत्व भी स्पष्ट हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बांध बाढ़ को बदतर बना सकते हैं

ई बांध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं लेकिन हाल ही में हुए अध्ययन में पाया गया है कि कुछ तरह की नदियों पर बने बांध अधिक प्रलयंकारी बाढ़ ला सकते हैं। अध्ययन सुझाता है कि नदी प्रबंधकों को गाद वाली और रेतीली नदियों पर अपनी बाढ़ नियंत्रण रणनीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

बांधों के अपने कई फायदे हैं। ये अपेक्षाकृत स्वच्छ बिजली उत्पन्न कर सकते हैं, पानी का भंडारण करते हैं जिसका उपयोग खेती और अन्य कार्यों में किया जा सकता है और ये बाढ़ को रोक सकते हैं।

लेकिन बांधों के खामियाज़े भी हैं; जैसे लोगों का विस्थापन, मछलियों के प्रवास में बाधा और कई अन्य पारिस्थितिक नुकसान। लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि बांध बाढ़ों को अधिक गंभीर बना सकते हैं।

बांध इंजीनियरों को उम्मीद थी कि पानी भंडारण के अलावा नदियों के बहाव को नियंत्रित करके बाढ़ के जोखिम को कम किया जा सकता है। चूंकि बांध गाद को रोक लेंगे और अपेक्षाकृत साफ पानी छोड़ेंगे जिससे नदी के तल में कटाव होगा और नदी गहरी हो जाएगी। इस कटाव से नदी अधिक पानी वहन कर सकेगी और बाढ़ का पानी नदी के किनारों पर फैलने से रुकेगा।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के भू-आकृति विज्ञानी हांगबो मा जानना चाहते थे कि बांध नदी की तलछटों को कैसे बदलते हैं – अध्ययन में आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए। बांध से छोड़ा गया पानी नदी के तल से महीन कणों को साथ बहा ले जाता है और बड़े कण नदी तल में छोड़ जाता है। इस तरह का क्षरण नदी तल में जलमग्न टीले बनाता है।

दरअसल मा और उनके साथी येलो नदी का अध्ययन कर रहे थे, जो तिब्बती पठार के पहाड़ों से शुरू होकर पूर्वी चीन सागर की ओर बहती है। जब वे नदी के एकदम निचले भाग के पेंदे का सोनार की मदद से स्कैन कर रहे थे तो वहां टीलों की अनुपस्थिति से काफी प्रभावित हुए। ऐसा नदी तल में गाद की उच्च मात्रा के कारण हुआ होगा। येलो नदी दुनिया की सबसे कीचड़ वाली नदी है जिसका नाम इसके प्रवाह में भारी मात्रा में गाद के कारण रखा गया है। महीन कण टीले नहीं बनने देते हैं।

लेकिन ज़ियाओलांगडी बांध के करीब नदी का पेंदा ऊबड़-खाबड़ मिला और वहां बड़े-बड़े टीले थे। इसने शोधकर्ताओं को आश्चर्य में डाल दिया कि एक ही नदी के पेंदे में इतना परिवर्तन कैसे हो सकता है।

सवाल था कि क्या उबड़-खाबड़ और टीले से भरा नदी का पेंदा बाढ़ के पानी के प्रवाह को बाधित करेगा, जिससे पानी ऊपर चढ़ेगा और नदी उफान पर आ जाएगी और बाढ़ का पानी मैदान में फैल जाएगा। इस विचार को जांचने के लिए उनके दल ने नदी चैनल के आकार और अन्य कारकों के आधार पर गणना की। नेचर कम्यूनिकेशंस में प्रकाशित परिणाम बताते हैं कि नदी चैनल 3.4 मीटर गहरी होने के बावजूद, 1999 में बांध बनने से पहले की तुलना में अब बड़ी बाढ़ लगभग दुगनी भयंकर हो गई हैं।

वर्ष 1980 से 2015 तक बाढ़ के रिकॉर्ड जांचने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि मध्यम और बड़ी बाढ़ों की भयावहता वास्तव में बढ़ गई थी। दूसरी ओर, इसी अवधि में आई छोटी बाढ़ों की भयावहता में कमी आई थी; संभवत: नदी की गहराई थोड़ी बढ़ने के कारण ऐसा हुआ होगा।

सौभाग्य से, बांध बनने के बाद से शायद ही कभी निचली येलो नदी में बड़ी बाढ़ आई हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जलवायु शुष्क हो गई है और जलाशय में अब भी अत्यधिक वर्षा से आने वाले प्रवाह को थामे रखने की पर्याप्त क्षमता है। लेकिन जलवायु मॉडल सुझाता है कि इस शताब्दी में येलो नदी बेसिन में वर्षा 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। और नदी जलाशय में तलछट जमा होना जारी है – और यह पहले से ही 75 प्रतिशत भरा है – बाढ़ के पानी को जमा करके रखने की बांध की क्षमता कम हो जाएगी।

टीम का अनुमान है कि नए बांध 80 प्रतिशत से अधिक निचली नदियों में आने वाली बड़ी बाढ़ की भयावहता बढ़ा देंगे। इसलिए हमें सोचना चाहिए कि न केवल येलो नदी के लिए बल्कि अन्य नदियों के लिए भी बाढ़ के जोखिम का आकलन कैसे किया जाए। (स्रोत फीचर्स)

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भीषण गर्मी की चपेट में उत्तरी भारत

मानव गतिविधियों की वजह से हो रहे ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो या अन्यथा, फिलहाल मुद्दा यह है कि उत्तरी भारत औसतन 45 डिग्री सेल्सियस के दैनिक तापमान के साथ भीषण गर्मी की चपेट में है।

ऐसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के वैश्विक पैटर्न में परिवर्तन आएगा और भारत को और अधिक भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार ग्रीष्म लहर (लू) उस स्थिति को कहते हैं जब किसी दिन का तापमान लंबे समय के औसत तापमान से 4.5 से 6.4 डिग्री अधिक होता है (या मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक और तटीय क्षेत्रों में 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो)।

उदाहरण के लिए, दिल्ली में 1981 से 2010 के दौरान मई का औसत उच्च तापमान 39.5 डिग्री सेल्सियस रहा करता था लेकिन वर्तमान में 28 अप्रैल से प्रतिदिन का तापमान 44 डिग्री सेल्सियस है (औसत अधिकतम तापमान से 4.5 डिग्री सेल्सियस अधिक)। ये महज आंकड़े नहीं हैं बल्कि इनका सम्बंध मानव शरीर, जन स्वास्थ्य और जलवायु संकट के इस दौर में शासन व्यवस्था से जुड़ा है।

इस संदर्भ में वेट-बल्ब तापमान महत्वपूर्ण है। वेट-बल्ब तापमान वह न्यूनतम तापमान है जो कोई वस्तु गर्म वातावरण में हासिल कर सकती है जब साथ-साथ उसे पानी के वाष्पन से ठंडा किया जा रहा हो। जब आसपास का वातावरण गर्म हो और वस्तु की सतह से पानी वाष्पित हो रहा हो तो उनके बीच एक साम्य स्थापित होता है और वस्तु के तापमान में कमी आती है। अपनी त्वचा का उदाहरण लीजिए। किसी गर्म दिन में जब आपकी त्वचा की सतह से पसीना वाष्पीकृत होता है तब आपकी त्वचा कम-से-कम जितने तापमान तक ठंडी हो सकती है उसे वेट-बल्ब तापमान कहा जाता है। यह तापमान सिर्फ साधारण तापमापी से नापा गया तापमान नहीं बल्कि वाष्पन की वजह से आई या आ सकने वाली गिरावट को दर्शाता है।

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है। किसी सतह से पानी का वाष्पन सिर्फ तापमान पर निर्भर नहीं करता बल्कि आसपास की हवा में मौजूद नमी की मात्रा पर भी निर्भर करता है। यदि आसपास की हवा बहुत अधिक नम है, तो सतह से पानी का वाष्पन कम होगा और उस वस्तु के तापमान में उतनी कमी नहीं आ पाएगी जितनी शुष्क हवा में आती।

मौसम का अध्ययन करने वाले एक संस्थान मेटियोलॉजिक्स के अनुसार 26 अप्रैल 2022 को सुबह साढ़े आठ बजे दक्षिण दिल्ली का वेट-बल्ब तापमान लगभग 19.5 डिग्री सेल्सियस था जो 29 अप्रैल को बढ़कर 22 डिग्री सेल्सियस हो गया। ये दोनों ही तापमान फिलहाल सुरक्षित सीमा में हैं। लेकिन 32 डिग्री सेल्सियस के वेट-बल्ब तापमान में थोड़ी देर भी बाहर रहना हानिकारक हो सकता है। वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो, तो पर्याप्त पानी पीने और कोई शारीरिक कार्य किए बगैर भी कुछ घंटे बाहर छाया में गुज़ारना तक जानलेवा हो सकता है।

एशिया के मौसम मानचित्र में दिखेगा कि वेट-बल्ब तापमान भूमध्य रेखा की ओर जाने पर काफी तेज़ी से बढ़ता है और साथ ही भारत के पश्चिमी तट की तुलना में पूर्वी तट पर अधिक होता है। यह मुख्य रूप से नमी के कारण होता है। वातावरण में जितनी अधिक नमी होगी, उतना ही कम पसीना वाष्पित हो पाएगा और शरीर भी उतना ही कम ठंडा हो पाएगा। इसलिए किसी क्षेत्र में मात्र हवा का तापमान जानना पर्याप्त नहीं होता बल्कि आर्द्रता और वेट-बल्ब की रीडिंग भी महत्वपूर्ण है।

2020 में कोलंबिया युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि पृथ्वी की सतह के कई हिस्सों में गर्मी और आर्द्रता के कारण स्थिति जानलेवा बन चुकी है जबकि पहले ऐसा माना जा रहा था कि यह स्थिति सदी के अंत में आएगी। शोधकर्ताओं द्वारा 1979 से 2017 तक एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार पूर्वी तटवर्ती और उत्तर-पश्चिमी भारत पर सबसे अधिक वेट-बल्ब तापमान होने की संभावना है।

ज़्यादा व्यापक स्तर पर देखें तो मध्य अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका, मध्य-पूर्व, उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी भारत तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में अधिकतम वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक 2010 में ही पहुंच चुका है।     

ग्लोबल वार्मिंग से न सिर्फ तापमान में बढ़ोतरी हो रही है बल्कि समुद्र स्तर में भी वृद्धि हो रही है। इन दोनों समस्याओं के चलते भारत के कई क्षेत्र रहने योग्य नही रह जाएंगे। कब और कौन-से क्षेत्र निर्जन होंगे यह कई कारकों पर निर्भर करता है।   

गौरतलब है कि भारत के प्रभावित क्षेत्र में कई ऐसे राज्य शामिल हैं जहां जन स्वास्थ्य व्यवस्था कमज़ोर और अपर्याप्त है, तथा चिकित्सा कर्मियों की कमी है। इन राज्यों की आय भी बहुत कम है और अधिकांश निवासी बाहरी काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर हैं और बहुत कम सुविधाओं के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। इन गर्म हवाओं के दौरान बाहर काम करना उनके लिए काफी जोखिम भरा होगा। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जलवायु परिवर्तन में जिस समूह का समसे कम योगदान हैं उसे इसका सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।      

इस समस्या के समाधान के लिए ‘हीट एक्शन प्लान’ तैयार किया गया है जिसको सबसे पहले 2013 में अहमदाबाद में अपनाया गया था। तब से लेकर अब तक 30-40 शहर इस योजना को अपना चुके हैं जिसमें जागरूकता अभियान, चेतावनी प्रणाली और शीतलन व्यवस्था की स्थापना तथा कमज़ोर वर्गों में गर्मी के जोखिम को कम करने के प्रयास किए गए हैं। देखा जाए तो गर्मी के शहरी टापू जैसे प्रभाव के कारण शहरी क्षेत्रों की गर्म हवाएं और भी घातक हो गई हैं। ये प्रयास सराहनीय हैं लेकिन पर्याप्त नहीं हैं। गर्म हवाओं की बात करते हुए आर्द्रता को शामिल करना अनिवार्य है क्योंकि वह वेट-बल्ब तापमान में वृद्धि करती है।  

फिलहाल, आईपीसीसी के अनुसार भारत में वेट-बल्ब तापमान शायद ही 30 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा है लेकिन इसमें जल्द ही परिवर्तन की संभावना है। (स्रोत फीचर्स)

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ओज़ोन का ह्रास करने वाला रसायन बढ़ रहा है

हाल की एक रिपोर्ट में स्तब्ध कर देने वाले नतीजे सामने आए हैं। वर्ष 2012 से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले रसायन HCFC-141b के स्तर में वृद्धि देखी गई है जबकि इसका घोषित उत्पादन कम हुआ है।

ये नतीजे पूर्व में उपयोग किए गए इस तरह के रसायनों से छुटकारा पाने की चुनौतियों को रेखांकित करते हैं: भले ही इन रसायनों का उत्पादन थम गया हो लेकिन उपकरणों में ये दशकों तक टिके रह सकते हैं। नतीजे यह भी दर्शाते हैं कि कैसे विभिन्न महाद्वीपों में लगे सेंसर्स के असमान वितरण से उत्सर्जन के स्रोतों को पहचानने में कठिनाई होती है।

HCFC-141b का उपयोग मुख्यत: रेफ्रिजरेटर वगैरह में फोम इन्सुलेशन बनाने में किया जाता था। फ्लोरोकार्बन रसायन ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं। 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत इन रसायनों के उपयोग को धीरे-धीरे बंद करने के प्रयास शुरू किए गए थे। 2000 के दशक की शुरुआत से ओज़ोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों में लगातार कमी आई, और ध्रुवों के ऊपर बना ओज़ोन ‘छिद्र’ भरने लगा।

फिर 2018 में पता चला कि प्रतिबंधित रसायन CFC-11 का स्तर वर्ष 2012 से बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय पैनल का मत था कि यह वृद्धि संभवत: CFC-11 के अवैध उत्पादन के कारण है। अवैध उत्पादन का कारण शायद यह है कि तब CFC-11 के विकल्प HCFC-141b, जो  ओज़ोन को कम नुकसान पहुंचाता है, की आपूर्ति बहुत कम थी। 2019 में एक बार फिर CFC-11 का स्तर गिरने लगा।

चूंकि 2030 तक HCFC-141b के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध के प्रयास 2013 में शुरू हो गए थे, इसलिए अब तक HCFC-141b के उत्पादन में भी गिरावट दिखनी चाहिए थी। अब HCFC-141b की जगह ऐसे रसायनों का उपयोग किया जा रहा है जो ओज़ोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते।

लेकिन वायुमण्डल में तो HCFC-141b का स्तर बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह वृद्धि 2017 से 2021 के बीच हुई है। एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिज़िक्स में ऑनलाइन प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2020 तक HCFC-141b की मात्रा में कुल 3000 टन की वृद्धि हुई है।

नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रशन के स्टीफन मोंट्ज़्का का कहना है कि HCFC-141b में वृद्धि उत्तरी गोलार्ध में कहीं से हो रही है।

एक संभावना यह है कि HCFC-141b का अवैध उत्पादन न हो रहा हो और कबाड़ हो चुके उपकरणों के फोम के विघटन से HCFC-141b निकल रही हो।

दुनिया के विभिन्न इलाकों में वायु सेंसर्स के असमान वितरण के कारण उत्सर्जन का वास्तविक स्रोत पकड़ में नहीं आ रहा है। इस वजह से भारत, रूस, मध्य-पूर्व, अधिकांश अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की स्थिति को लेकर वैज्ञानिक अनभिज्ञ हैं। उम्मीद है कि आने वाले सालों में चीज़ें ज़्यादा स्पष्ट होंगी। CFC-11 में वृद्धि के बाद से युरोपीय संघ द्वारा वित्तपोषित पहल के तहत अधिक सेंसर लगाए जा रहे हैं और सेंसर के असमान वितरण को कम किया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स) 

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कम बीफ खाने से जंगल बच सकते हैं

हाल ही में हुए एक मॉडलिंग अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगले 30 वर्षों में सिर्फ 20 प्रतिशत बीफ की जगह मांस के विकल्प का उपयोग करने से वनों की कटाई और इससे जुड़े कार्बन उत्सर्जन को आधा किया जा सकता है। ये नतीजे नेचर पत्रिका प्रकाशित हुए हैं।

बीफ के लिए मवेशियों को पालना वनों की कटाई का प्रमुख कारण है। मवेशी मीथेन उत्सर्जन का भी प्रमुख स्रोत हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि बीफ के बदले मांस के विकल्प अपनाने से खाद्य उत्पादन के कारण होने वाला उत्सर्जन कुछ कम हो सकता है, लेकिन यह कोई रामबाण इलाज नहीं है।

पूर्व अध्ययनों में देखा गया था कि बीफ की जगह गैर-मांस विकल्प ‘मायकोप्रोटीन’ अपनाने से पर्यावरण पर लाभकारी प्रभाव पड़ सकते हैं। मायकोप्रोटीन मिट्टी में पाई जाने वाली फफूंद के किण्वन से बनाया जाता है। 1980 के दशक में यू.के. में यह क्वार्न ब्रांड नाम से बिकना शुरू हुआ और अब यह कई देशों में आसानी से उपलब्ध है।

यह अध्ययन बीफ की जगह मायकोप्रोटीन अपनाने से पर्यावरणीय प्रभावों का अनुमान लगाता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एक गणितीय मॉडल का इस्तेमाल किया, जिसमें 2020 से 2050 के बीच जनसंख्या वृद्धि, आय और मवेशियों की मांग में वृद्धि को शामिल किया गया। यदि सब कुछ आज जैसा ही चलता रहा, तो बीफ की खपत में वैश्विक वृद्धि से चराई के लिए चारागाह और मवेशियों के आहार उत्पादन के लिए कृषि भूमि में विस्तार की आवश्यकता होगी। इससे वनों की कटाई की वार्षिक दर दुगनी हो जाएगी। मीथेन उत्सर्जन और कृषि कार्यों के लिए जल उपयोग भी बढ़ जाएगा।

दूसरी ओर, यदि वर्ष 2050 तक 20 प्रतिशत बीफ की जगह मायकोप्रोटीन लें तो मीथेन उत्सर्जन में 11 प्रतिशत कमी आएगी और साल भर में होने वाली वनों की कटाई और उससे सम्बंधित उत्सर्जन आधा रह जाएगा। बीफ की खपत का आधा हिस्सा मायकोप्रोटीन से बदलने पर वनों की कटाई में 80 प्रतिशत की कमी और 80 प्रतिशत तक बदलने से 90 प्रतिशत तक की कमी आएगी।

वैसे बीफ की जगह मांस विकल्प अपनाने से जल उपयोग में मामूली बदलाव ही दिखेंगे क्योंकि जो पानी मवेशियों के आहार उगाने में लगता था अब अन्य फसल उगाने में लगेगा।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसे अध्ययन खाद्य उत्पादन के बेहतर तरीके पता करने में मददगार हो सकते हैं लेकिन यह भी हो सकता है कि मायकोप्रोटीन उत्पादन में अधिक बिजली लगे, इसलिए अतिरिक्त बिजली उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभावों पर भी विचार करना होगा। इसके अलावा बीफ की जगह मायकोप्रोटीन अपनाने का मतलब है कि पशुपालन से मिलने वाले सह-उत्पाद (चमड़ा और दूध) भी वैकल्पिक तरीकों से प्राप्त करना होंगे। ये वैकल्पिक तरीके भी पर्यावरण पर प्रभाव डालेंगे।

सुझाव है कि बीफ को मांस के अन्य विकल्प जैसे प्रयोगशाला में बनाए गए मांस या वनस्पति-आधारित विकल्प से बदलने पर पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को जांचना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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ऊर्जा क्षेत्र में कोयले की भूमिका और पर्यावरण – मारिया चिरायिल, अशोक श्रीनिवास, श्रीपाद धर्माधिकारी

कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाले गंभीर प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी चिंताओं के बावजूद, सरकार द्वारा अधिसूचित मानक काफी हद तक कागज़ों तक ही सीमित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत कभी सख्त उत्सर्जन नियंत्रण व्यवस्था के तहत काम कर पाएगा?

प्राचीन बिजली उत्पादन के लिए स्वच्छ ईंधन के बढ़ते उपयोग से भारतीय ऊर्जा क्षेत्र में कोयले की भूमिका पर बहस छिड़ गई है। हालिया वर्षों में आर्थिक और नीतिगत परिवर्तनों के चलते बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ी है। नतीजतन, कोयले की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटने की उम्मीद तो है लेकिन आने वाले कुछ समय तक कोयले के कुल उपयोग में वृद्धि होती रहेगी। इसके साथ ही ताप बिजली घरों से प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम भी बरकरार रहेंगे।

भारत के बिजली उत्पादक इलाकों में तो प्रदूषण स्तर में निरंतर वृद्धि होती रही है। यह देखा गया है कि कोरबा और सिंगरौली जैसे इलाकों में ताप बिजली घर ज़्यादा हैं, वहां प्रदूषण स्तर भी ज़्यादा है। ताप बिजली घरों के उत्सर्जन और सम्बंधित समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए उत्सर्जन मानकों का निर्धारण अनिवार्य है। यह ताप बिजली घरों (थर्मल पॉवर प्लांट, टीपीपी) के निकट रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने के लिए ज़रूरी है। 

वर्ष 2015 तक, टीपीपी के लिए उत्सर्जन मानक केवल कणीय पदार्थ यानी पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के उत्सर्जन तक ही सीमित थे। फिर 7 दिसंबर 2015 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा पर्यावरण संरक्षण (संशोधन) नियम, 2015 के तहत इसमें कुछ परिवर्तन किए गए। इस संशोधित नियमावली में ताप बिजली घरों में पीएम के लिए कड़े मानक निर्धारित करने के अलावा सल्फर डाईऑक्साइड (SO2), नाइट्रस ऑक्साइड्स (NOx), पारा (Hg) उत्सर्जन और पानी की खपत को लेकर भी नए मानक निर्धारित किए गए और 1 जनवरी 2017 के बाद स्थापित सभी टीपीपी के लिए शून्य अपशिष्ट जल निकासी भी अनिवार्य कर दी गई। भारतीय कोयले में आम तौर पर सल्फर की मात्रा कम होती है, इसलिए SO2 उत्सर्जन के मानकों की ज़रूरत पर कुछ मतभेद रहे। हालांकि, शोध से प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार SO2 से द्वितीयक पीएम का निर्माण होता है जो पीएम प्रदूषण में प्रमुख योगदान देता है। अत: SO2 उत्सर्जन पर अंकुश लगाना भी आवश्यक है। इन नियमों को सभी टीपीपी संयंत्रों पर दो साल के भीतर यानी दिसंबर 2017 तक लागू करना अनिवार्य किया गया था। इस अधिसूचना को जारी हुए 6 वर्ष बीत चुके हैं और अब इसकी ज़मीनी हकीकत की समीक्षा लाज़मी है।

पर्यावरणीय मानक ऊर्जा क्षेत्र को कैसे प्रभावित करते हैं?

अक्सर देखा गया है कि टीपीपी के लिए निर्धारित किए गए उत्सर्जन मानकों पर चर्चाओं में इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती कि इनके अनुपालन के लिए क्या ठोस कदम उठाने होंगे। पहली बात तो यह कि निर्धारित मानकों के अनुसार टीपीपी संयंत्रों को नए प्रदूषण नियंत्रण उपकरण (पीसीई) स्थापित करना होगा या पुराने उपकरणों में सुधार करने होंगे। इन उपकरणों का प्रकार संयंत्र के आकार, स्थान और आयु के साथ-साथ प्रयुक्त कोयले जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के उत्सर्जन के लिए अलग-अलग पीसीई तकनीक का उपयोग करना होता है। लेकिन जब भी पीसीई की बात आती है तो सभी मानकों और उनके अनुपालन की जांच को निकासी गैस के डीसल्फराइज़ेशन (एफजीडी) का पर्याय मान लिया जाता जाता है। एफजीडी सभी पीसीई में सबसे महंगा और जटिल उपकरण है।

इसके अलावा, पीसीई को पूरी क्षमता से संचालित होने में भी काफी समय लगता है। उदाहरण के लिए, एफडीजी उपकरण को स्थापित करने के लिए दो वर्ष से अधिक और संयंत्र से जोड़ने के लिए दो से तीन महीने के समय की आवश्यकता होती है। यदि इसमें नियोजन और समय-चक्र का ध्यान न रखा जाए तो कई टीपीपी एक ही समय पर बंद करने पड़ सकते हैं और बिजली आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

पीसीई के लिए पूंजीगत व्यय और संचालन लागत की आवश्यकता भी होती है जिसका असर उत्पादन लागत और शुल्क पर भी पड़ता है। ऐसे टीपीपी जिनके शुल्क ‘लागत-धन-मुनाफा’ के तहत निर्धारित किए गए हैं, उनके शुल्क में बदलाव की ज़िम्मेदारी सम्बंधित विद्युत नियामक आयोग (राज्य या केंद्र) पर आती है। दूसरी ओर, जिन टीपीपी के शुल्क प्रतियोगी बोली के माध्यम से निर्धारित किए गए हैं उनके शुल्क में बदलाव बिजली खरीद अनुबंध (पीपीए) की शर्तों के अनुसार किया जाता है। कानून में उक्त परिवर्तन बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 62 और धारा 63 के तहत शुल्क निर्धारण के बाद हुआ है, जिसके चलते पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन के लिए अतिरिक्त खर्च भी होते हैं। कानून में इस तरह के बदलाव के चलते शुल्क में होने वाली वृद्धि को उपभोगताओं पर डाला जा सकता है। उपभोक्ताओं और पूरे बिजली क्षेत्र पर प्रभाव के अंदेशे के बावजूद अभी तक अतिरिक्त व्यय और शुल्क को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।

इसके अलावा, संशोधित पर्यावरण मानकों का व्यापक स्तर पर सुचारु और समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए बिजली क्षेत्र के हितधारकों और संस्थानों द्वारा सही समय पर कार्रवाई करना भी ज़रूरी होता है। उदाहरण के लिए, बिजली मंत्रालय (एमओपी) को समय रहते कानूनी बदलाव की घोषणा कर देनी चाहिए थी, बिजली नियामकों को समय पर क्षेत्र-व्यापी ढांचा तैयार कर लेना चाहिए था और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) को भी आवश्यक बेंचमार्क अध्ययन पूरे कर लेने चाहिए थे। वैसे हाल में इनमें से कुछ मोर्चों पर कार्य होते नज़र आ रहे हैं लेकिन ये काफी सीमित हैं और बहुत विलम्ब से हुए हैं।

दरअसल, एमओपी ने संशोधित पर्यावरण मानकों को कानूनी मान्यता 2018 में (अनुपालन की समय सीमा खत्म होने एक वर्ष बाद) दी थी। नियामक दिशानिर्देशों की कमी के कारण मुकदमेबाज़ी चली और देरी होती रही। इसके अलावा क्षेत्र के कई किरदारों ने भी निष्क्रियता या प्रतिकूल कार्रवाई दर्शाई। इसके अतिरिक्त, कई पर्यावरणीय मानकों को कमज़ोर किया गया और अनुपालन की समय सीमा को कई बार आगे बढ़ाया गया।

अधिसूचना के छह साल बाद

2021 के संशोधन से पहले टीपीपी को परिचालन जारी रखने के लिए 2019 (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र स्थित संयंत्र) या 2022 (अन्यत्र स्थित संयंत्र) तक पर्यावरण मानकों का पालन करना अनिवार्य था। ये मानक संयंत्रों की उम्र के आधार पर तय किए गए थे – 2004 से पूर्व, 2004 से 2016 के बीच और 2016 के बाद स्थापित संयंत्रों के लिए अलग अलग मानक निर्धारित किए गए थे। पर्याप्त बिजली आपूर्ति और समय सीमा को ध्यान में रखते हुए सीईए द्वारा एक समय-विभेदित क्रियांवयन योजना प्रस्तुत की गई। पीसीई क्रियांवयन की प्रगति को लेकर सीईए एक रिपोर्ट भी प्रकाशित करता है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक चलता तो दिसंबर 2021 तक अधिकांश संयंत्रों में एफजीडी लग चुके होते। लेकिन, अफसोस, ऐसा नहीं हुआ।

सीईए देश की 209 गीगावॉट ताप क्षमता में से कुल 167 गीगावॉट क्षमता के संयंत्रों में एफजीडी की स्थिति की निगरानी करता है। अक्टूबर 2021 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग आधी इकाइयों में एफजीडी स्थापित करने की समय सीमा निकल चुकी थी। इनमें से 40 प्रतिशत इकाइयां फिलहाल स्वीकृति के चरण में हैं जबकि 38 प्रतिशत के लिए निविदा आमंत्रण के नोटिस जारी किए गए हैं। चूंकि अधिकांश इकाइयों में एफजीडी स्थापित करने की प्रक्रिया अभी भी निर्माण-पूर्व चरण में है, और एफजीडी स्थापित करने में 36 महीनों का समय और लग सकता है, इसलिए 2017 की समय सीमा को 5 वर्ष बढ़ाकर 2022 कर दिया गया था। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए 2022 तक भी एफजीडी स्थापना की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है।

निगरानीशुदा 118 गीगावॉट क्षमता में ऐसी इकाइयां भी शामिल हैं जहां 2021 दिसंबर तक एफजीडी स्थापित करने का लक्ष्य था। इनमें से केवल 2 प्रतिशत में ही एफजीडी स्थापित किए गए हैं जबकि 38 प्रतिशत में जनवरी 2020 के बाद से कोई प्रगति देखने को नहीं मिली है। यह 2017 से पहले स्थापित संयंत्रों की बात है। अपेक्षा थी कि 2017 के बाद स्थापित संयंत्रों में संचालन शुरू होने की तारीख से ही एफजीडी/पीसीई स्थापित हो जाएंगे। अलबत्ता, 2017 के बाद स्थापित ओडिशा स्थित डार्लीपल्ली टीपीपी, राजस्थान स्थित सूरतगढ़ टीपीपी और तेलंगाना स्थित भद्राद्री टीपीपी बिना किसी पीसीई के बिजली उत्पादन कर रहे हैं। यह मानकों का उल्लंघन माना जा सकता है।       

2021 के संशोधन के बाद वैसे तो इन समय सीमाओं का कोई महत्व नहीं रह गया है। अब टीपीपी को आसपास की आबादी और प्रदूषण के स्तर तथा संयंत्र की सेवानिवृत्ति की नियत तारीख के आधार पर तीन श्रेणियों – ए, बी और सी – में वर्गीकृत किया गया है। इस संशोधन में पर्यावरण क्षतिपूर्ति नामक एक दण्ड भी शामिल किया गया है जिसका भुगतान टीपीपी द्वारा किया जाएगा। यह दण्ड मानकों के उल्लंघन की अवधि के आधार पर 0.05 रुपए से 0.20 रुपए प्रति युनिट विद्युत होगा। केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) ने यह तो स्पष्ट किया है कि इस दण्ड की वसूली उपभोक्ताओं से नहीं की जा सकती लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह एक रोकथाम के उपाय के रूप में काम करेगा। उल्लंघन की स्थिति में भी उत्पादकों को स्थिर लागत तो मिलती ही रहेगी जिससे वे ब्याज अदायगी करते रहेंगे और इक्विटी पर लाभ प्राप्त करते रहेंगे। तकनीकी रूप से, टीपीपी जब तक जुर्माने का भुगतान करते रहेंगे तब तक वे बिना पीसीई के अपना काम करना जारी रख सकेंगे। आपूर्ति में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वितरण कंपनियां भी इनसे बिजली खरीद जारी रख सकती हैं। यदि बड़े पैमाने पर उल्लंघन की स्थिति आई, तो चिंता का विषय होगा क्योंकि ऐसी सभी इकाइयों को बंद करना तो संभव नहीं होगा।            

टीपीपी को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करने के लिए अप्रैल 2021 में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था जो बार-बार समय सीमाओं के उल्लंघन करती रही और अभी तक हमारे सामने टीपीपी की श्रेणी के बारे कोई अधिकारिक जानकारी नहीं है। लिहाज़ा टीपीपी को अनुपालन की समय-सीमा और दण्ड की जानकारी न होने का एक बहुत सुविधाजनक बहाना मिल गया है। देखा जाए तो वर्तमान स्थापित क्षमता का लगभग 23 गीगावॉट ए श्रेणी में आता है जिस पर सबसे अधिक दण्ड है। बी श्रेणी में भी लगभग 23 गीगावॉट है और शेष 163 गीगावॉट सी श्रेणी में है जिन पर सबसे कम दण्ड है। यानी अधिकांश पीसीई-रहित संयंत्र सबसे कम दण्ड की श्रेणी में आते हैं, इसलिए अधिकांश संयंत्रों के लिए जुर्माना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।    

जवाबदेह कौन?

मानकों के उल्लंघन पर की जाने वाली आवश्यक कार्रवाई और पर्यावरणीय मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी को एक से दूसरे किरदार के बीच उछाला जाता रहा है। मानकों को अधिसूचित करने (या न करने) से ऐसा लगता है कि इन्हें लागू करने के लिए ज़िम्मेदार बिलकुल भी गंभीर नहीं हैं। 

जैसे, एमओपी और सीईए ने खुद होकर कार्रवाई करने से अक्सर कन्नी काटी है। लागत और प्रौद्योगिकी की बेंचमार्किंग, मानकों का जल्दी अनुपालन करने वाली इकाइयों की समस्याओं और तालमेल के लिए आवश्यक संयंत्र-बंदी जैसे मुद्दों को सही समय पर संबोधित नहीं किया गया। फरवरी 2019 में सीईए ने मोटे तौर पर एफजीडी की मोटी-मोटी लागत के बेंचमार्किंग का काम किया और फरवरी 2020 में जाकर केवल एफजीडी के लिए प्रौद्योगिकी चयन की जानकारी प्रस्तुत की। यहां तक कि एमओपी द्वारा सीईआरसी को पीसीई से सम्बंधित लागतों को पारित करने की अनुमति मई 2018, यानी दिसंबर 2017 की प्रारंभिक समय सीमा समाप्त होने के बाद दी गई। और तो और, 2021 का संशोधन और समय सीमा आगे बढ़ाने का मामला जनवरी 2021 में संयंत्र के स्थान विशिष्ट उत्सर्जन मानकों पर सीईए के पेपर से प्रभावित था। सीईए ने सल्फर डाईऑक्साइड उत्सर्जन मानकों की समीक्षा जून 2021 में की और इन मानकों का अनुपालन करने के लिए 10 से 15 वर्ष की समय-सीमा पर अड़ा रहा। तर्क यह दिया गया कि SO2 के निम्न स्तर वाले क्षेत्रों के संयंत्रों के लिए सख्त समय सीमा निर्धारित करने की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, इस स्पष्टीकरण में यह ध्यान नहीं रखा गया कि सल्फर डाईऑक्साइड उत्सर्जन द्वितीयक पीएम का निर्माण करता है। सीईए का यह मत और साथ में विलम्ब से लिए जाने वाले निर्णय और मानकों में ढील देने का आग्रह एजेंसियों की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।       

अनुपालन में उत्पादकों ने काफी देरी की है। जब दिसंबर 2017 की प्रारंभिक समय सीमा प्रभावी थी तब उत्पादक सम्बंधित एसआरसी के साथ एफजीडी स्थापना के शुरुआती कार्यों को टालते रहे। उदाहरण के लिए, ललितपुर पॉवर जनरेशन कंपनी और नाभा पॉवर ने अपने एसईआरसी के समक्ष याचिकाएं नवंबर 2017 और जनवरी 2018 में जाकर दायर कीं। दूसरी समय सीमा के मामले में भी यही तरीका जारी रहा और समय सीमाएं गुज़रती रहीं। दरअसल संशोधित समय सीमा के अनुसार दिसंबर 2019 तक 16 गीगावॉट में एफजीडी स्थापित हो जाना चाहिए थे जो केवल 1 गीगावॉट में ही हो पाया है। इसके अलावा नवनिर्मित टीपीपी को शुरुआत से ही पीसीई के साथ संचालित होना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ और 2016 के बाद स्थापित संयंत्र बिना पीसीई के चलते रहे।         

हालांकि आपूर्ति में कमी और लागत में अस्पष्टता जैसे कारकों से इन मानकों पर अमल थोड़ा मुश्किल रहा होगा लेकिन नियामकों के ढुलमुल रवैये ने भी हालात बिगाड़े। हालांकि मानकों का सम्बंध पर्यावरण से है लेकिन बिजली क्षेत्र पर भी इनका काफी प्रभाव पड़ता है। केंद्रीय और राज्य नियामकों को चाहिए था कि वे शट-डाउन के दौरान राजस्व की हानि, क्रियांवयन के पूंजीगत और परिचालन खर्च, और उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति और शुल्क पर प्रभाव जैसी चुनौतियों का पूर्वानुमान करके उन्हें संबोधित करते। हालांकि, 2015 के संशोधन को 2018 में जाकर कानूनी मान्यता दी गई लेकिन इसमें समुचित नियामक ढांचे के साथ स्पष्ट दिशानिर्देश शामिल नहीं थे। नियामक अनिश्चितता के चलते 2015 का संशोधन मुकदमेबाज़ी और अन्य समस्याओं में उलझा रहा और इस कारण देरी होती रही। यहां तक कि प्रारंभिक सिद्धांतत: मंज़ूरियां भी 2019 में सीईआरसी टैरिफ नियमों के साथ ही दी गईं। केंद्रीय स्तर पर स्पष्टता के कुछ प्रयास किए गए। इनमें 2019 में किया गया संशोधन और टैरिफ नियमों में बदलाव, और अतिरिक्त लागतों के टैरिफ प्रभावों और क्षतिपूर्ति को संबोधित करने वाला आदेश हैं। ये बदलाव सकारात्मक हैं लेकिन 2015 के संशोधन के पूरे पांच वर्ष बाद देखने को मिले। इनमें अभी भी जल्दी अनुपालन करने वालों को कोई प्रोत्साहन नहीं हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि पीसीई लागत की वसूली की अनुमति पीसीई की स्थापना के बाद ही दे दी जाए या फिर पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने के बाद दी जाए। अभी तो यह भी स्पष्ट नहीं है कि 2021 संशोधन का कोई नियामिकीय प्रभाव पड़ेगा या नहीं।          

एमओईएफसीसी द्वारा 2015 का संशोधन सही दिशा में एक कदम था जो कई अध्ययनों, विशेषज्ञों और सार्वजनिक परामर्शों पर आधारित था। यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ भी मेल खाता था। लेकिन इसके बाद से ही कई हितधारकों ने इसको कमज़ोर करने और विलम्ब से लागू करने का प्रस्ताव दिया जिसे एमओएफसीसी ने चुपचाप स्वीकार भी कर लिया। एमओएफसीसी ने सर्वोच्च्य न्यायालय में अपने हलफनामे में बिजली मंत्रालय की अलग-अलग समय पर क्रियांवयन योजना प्रस्तुत की और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए 2019 तथा बाकी राज्यों के लिए 2022 की नई समय सीमा को स्वीकार कर लिया। इसके बावजूद, 2021 में नए संशोधन और नई समय सीमा का निर्धारण किया गया। यह सर्वोच्च्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हलफनामे का उल्लंघन था। जहां तक नियमों के अनुपालन की बात है, राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करवाने के लिए ज़िम्मेदार हैं जो इसे निभाने में ढील बरतते रहे। उदाहरण के तौर पर, 1 जनवरी 2017 के बाद शुरू किए गए संयंत्रों को नए मानदंडों का पालन करना था लेकिन उन्होंने आज तक पीसीई स्थापित नहीं किए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स द्वारा एकत्रित उत्सर्जन सम्बंधी डैटा अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इससे यह पता लगाना भी मुश्किल हो गया है कौन-से संयंत्र मानकों का पालन कर रहे हैं।

पर्यावरणीय मानकों के प्रति अस्पष्टता और सम्बंधित लोगों की लापरवाही 2021 के संशोधन में भी देखी जा सकती है। ऐसे में नई समय सीमा के उल्लंघन की भी काफी संभावना है। 

भावी चुनौतियां

पर्यावरण संरक्षण (संशोधन) नियम, 2015 के छह वर्ष बाद संस्थागत प्रक्रियाओं और वास्तविक क्रियांवयन दोनों में बहुत कम प्रगति हुई है। सीमित कार्रवाइयां, 2021 के संशोधन में नज़र आ रहा पुन:निर्धारण, मानकों को और अधिक कमज़ोर करने और समय सीमा को एक दशक पीछे धकेलने के प्रयासों को देखते हुए लगता है कि इन मानकों के क्रियांवयन और टीपीपी के आसपास गंभीर प्रदूषण की समस्या को संबोधित करने के प्रति गंभीरता नहीं है। नियामकों द्वारा पीसीई की स्थापना पर ध्यान न देना संदेह को और बढ़ाता है। दरअसल, उत्सर्जन नियंत्रण मात्र उपकरण स्थापित करने से नहीं होगा बल्कि तभी संभव है जब प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उचित उपयोग किया जाए। 

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कोयला संयंत्रों को लेकर गंभीर प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी चिंताओं के बावजूद क्या भारत सख्त उत्सर्जन नियंत्रण व्यवस्था को अपना पाएगा? (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.adanipower.com/-/media/Project/Power/OperationalPowerPlants/mundra/Bannner/mundra_banner1.jpg?la=en&hash=BB05EB99B343E9C097B8891087F053BD

नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन के लिए कुछ सुझाव – ज़ुबैर सिद्दिकी

गनचुम्बी इमारतों, बांधों, पुलों तथा गाड़ियों के निर्माण में सीमेंट और स्टील बहुत ही आवश्यक घटक हैं। लेकिन ये दोनों उद्योग पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। सीमेंट के उत्पादन में प्रति वर्ष 2.3 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है जबकि लोहा और स्टील उत्पादन प्रति वर्ष 2.6 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। ये वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन का क्रमश: 6.5 प्रतिशत और 7.0 प्रतिशत हैं।

इसका एक कारण तो यह है कि हम इन पदार्थों का उपयोग भारी मात्रा में करते हैं। देखा जाए तो स्वच्छ पानी के बाद कांक्रीट सबसे अधिक उपयोग होने वाला पदार्थ है। इसके अलावा, इनके उत्पादन की विधियां भी कार्बन आधारित हैं। इनमें जिन रासायनिक अभिक्रियाओं का उपयोग होता है उनमें कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है। और तो और, निर्माण प्रक्रिया के लिए ज़रूरी उच्च तापमान हासिल करने के लिए जीवाश्म ईंधनों का दहन कार्बन डाईऑक्साइड का एक बड़ा स्रोत होता है।

 ऐसे में सीमेंट और स्टील के उत्पादन एवं उपयोग के स्वच्छ तरीके खोजने की तत्काल आवश्यकता है। औद्योगिक मांग और ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के बावजूद हमारे लिए 2050 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करना बहुत ज़रूरी है। यदि कम उत्सर्जन वाले भारी उद्योगों को फलते-फूलते देखना है तो इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नॉलॉजी का हस्तांतरण और वित्तीय जोखिम कम करने के उपाय ज़रूरी होंगे।

नेचर के मार्च 2022 के अंक में प्रकाशित एक पर्चे में इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के पौल फेनेल और जस्टिन ड्राइवर, साइमन फ्रेसर विश्वविद्यालय, कनाडा के क्रिस्टोफर बेटैल और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, यूएसए के स्टीवन डेविस ने इस संदर्भ में कई सुझाव प्रस्तुत किए हैं जो स्टील को कार्बन उदासीन और सीमेंट को कार्बन सोख्ता बनाने में भूमिका निभा सकते हैं। प्रस्तुत है उनके पर्चे का सार।  

1. नवीनतम तकनीकें

सभी उत्पादन संयंत्रों को सर्वोत्तम उपलब्ध तकनीक से सुसज्जित करना आवश्यक है। औद्योगिक संयंत्रों के तापरोधन में सुधार से 26 प्रतिशत ऊर्जा बचाई जा सकती है। बेहतर बॉयलर का उपयोग करके ऊर्जा खपत 10 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। इसके साथ ही ऊष्मा विनिमय का उपयोग करने से शोधन प्रक्रिया की बिजली खपत को 25 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। अलबत्ता, एक समय के बाद किसी भी संयंत्र में सुधार करके ऊर्जा बचत की संभावना कम होती जाती है। वर्तमान के सबसे कुशल सीमेंट संयंत्र उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाकर मात्र 0.04 प्रतिशत ऊर्जा की बचत कर पाएंगे। यानी कुछ और करने की ज़रूरत है।

2. कम उपयोग

एक ही काम के लिए कम मात्रा में स्टील और सीमेंट का उपयोग किया जा सकता है। फिलहाल दुनिया में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 530 किलोग्राम सीमेंट और 240 किलोग्राम स्टील का उत्पादन हो रहा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईए) के अनुसार यदि भवन निर्माण संहिता और आर्किटेक्ट्स, इंजीनियर्स तथा ठेकेदारों के प्रशिक्षण में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए जाएं, तो सीमेंट की मांग को 26 प्रतिशत और स्टील की मांग को 24 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। कई भवन निर्माण संहिताएं सुरक्षा के लिए ज़रूरत से ज़्यादा डिज़ाइन का सहारा लेती हैं। यदि आधुनिक सामग्रियों और बढ़िया कंप्यूटर मॉडलिंग का उपयोग करके डिज़ाइन तैयार की जाए तो कम से कम संसाधनों से काम चल सकता है। इसके अलावा, कम कार्बन पदचिन्ह वाली वैकल्पिक सामग्री का भी उपयोग किया जा सकता है। जैसे वाहनों में स्टील के स्थान पर एल्युमीनियम। इसके लिए काम करने के पुराने तरीकों को बदलना होगा।

3. तकनीकी नवाचार

पारंपरिक स्टील उत्पादन में कार्बन की महत्वपूर्ण भूमिका है। ब्लास्ट फर्नेस (वात भट्टी) में ईंधन के रूप में कोक (एक किस्म का कोयला) का उपयोग किया जाता है जिसमें लौह खनिज को 2300 डिग्री सेल्सियस तापमान पर धात्विक लोहे में परिवर्तित किया जाता है। कोक के जलने पर कार्बन मोनोऑक्साइड बनती है जो अयस्क को लोहे और कार्बन डाईऑक्साइड में बदल देती है। इसके बाद लोहे को कोयला-भट्टी या कभी-कभी विदुयत भट्टी में परिष्कृत कर स्टील प्राप्त किया जाता है। इस प्रक्रिया में प्रति टन स्टील 1800 किलोग्राम से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है।

वैसे, अयस्क से लोहा प्राप्त करने के लिए अन्य पदार्थों का उपयोग भी किया जा सकता है। गौरतलब है कि विश्व का लगभग 5 प्रतिशत स्टील डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (डीआरआई) प्रक्रियाओं से बनाया जाता है जिनमें कोक की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिए आम तौर पर हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (मीथेन अथवा कोयले से प्राप्त) का उपयोग किया जाता है। इसके साथ-साथ यदि विद्युत भट्टी के लिए नवीकरणीय बिजली का उपयोग किया जाए तो ऐसे स्टील संयंत्र कोक आधारित संयंत्र की तुलना में 61 प्रतिशत कम कार्बन डाईऑक्साइड पैदा करते हैं।

और तो और, डीआरआई के लिए केवल हाइड्रोजन का उपयोग किया जाए तो उत्सर्जन को 50 किलोग्राम प्रति टन स्टील या उससे कम किया जा सकता है। कुछ कंपनियां इस तरह के संयंत्र आज़मा रही हैं।

इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लिए भारी मात्रा में हाइड्रोजन की आवश्यकता होती है। समस्त स्टील का उत्पादन इस तरीके से करने के लिए वैश्विक हाइड्रोजन उत्पादन को वर्तमान 6 करोड़ टन से बढ़ाकर से 13.5 करोड़ टन प्रति वर्ष करना होगा। वर्तमान में सबसे सस्ती हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस से प्राप्त होती है जिससे कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसका एक हरित विकल्प विद्युत-अपघटन की मदद से पानी से हाइड्रोजन प्राप्त करने का है लेकिन वह 2.5 गुना महंगा है। संयंत्रों की संख्या बढ़ेगी तो लागत कम हो सकती है।

अन्य विकल्प भी आज़माए जा सकते हैं। वर्ष 2004 में 15 युरोपीय देशों की 48 कंपनियों और संगठनों के एक संघ ने विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन किया। टाटा स्टील ने 2010 में नीदरलैंड में एक उन्नत स्टील उत्पादन प्रक्रिया वाला पायलट संयंत्र तैयार किया था, जो है तो कोयला आधारित लेकिन इसमें कार्बन को आसानी से थामा जा सकता है। फिलहाल हरित हाइड्रोजन की गिरती कीमत से टाटा हाइड्रोजन आधारित डीआरआई को अपनाने पर विचार कर रहा है। हाइड्रोजन का एक अच्छा विकल्प विद्युत-विच्छेदन के माध्यम से लोहा प्राप्त करने का है और इस पर काम चल रहा है।

4. नए प्रकार का सीमेंट

साधारण पोर्टलैंड सीमेंट का उत्पादन चूना पत्थर के कैल्सीनेशन से शुरू होता है। इस प्रकिया में चूना पत्थर को 850 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर गर्म करने पर वह चूना और कार्बन डाईऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। चूने को रेत और मिट्टी के साथ मिलाकर 1450 डिग्री सेल्सियस तक भट्टी में पकाने पर क्लिंकर बनता है। जिसमें कुछ अन्य पदार्थ मिलाकर सीमेंट बनाया जाता हैं। लगभग 60 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन कैल्सीनेशन के दौरान होता है। शेष उत्सर्जन ईंधन के दहन से होता है। कुल मिलाकर, एक औसत संयंत्र में प्रति टन सीमेंट 800 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। उन्नत संयंत्र में यह मात्र 600 किलोग्राम होता है।

गौरतलब है कि चूना पत्थर के बिना भी सीमेंट बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए मैग्नीशियम ऑक्सीक्लोराइड सीमेंट (सॉरेल) 1867 से मौजूद रहा है लेकिन पानी के प्रति कम सहनशीलता के कारण इसका व्यावसायीकरण नहीं हो पाया है। फिलहाल सीमेंट के कई प्रकारों को परखा जा रहा है। निर्माण में इनका उपयोग करने के लिए भवन निर्माण कोड, डिज़ाइन और तौर तरीकों को बदलना होगा, जिसमें समय लगेगा।

एक विकल्प क्लिंकर के स्थान पर कोई अन्य टिकाऊ सामग्री हो सकती है। यह सामग्री वात भट्टी का अपशिष्ट (स्लैग) और कोयला बिजलीघरों की राख हो सकती है। लेकिन जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीकों से खत्म करने पर इन सामग्रियों की प्राप्ति मुश्किल हो जाएगी। फिलहाल, शोधकर्ता अन्य विकल्प खोजने के प्रयास कर रहे हैं जिनमें लोहे और स्टील के रीसायकल संयंत्रों का स्लैग शामिल है।

एक और उदाहरण लाइमस्टोन कैलसाइन्ड क्ले सीमेंट (एलसी3) है। इसका जल्द ही व्यावसायीकरण संभव है। एक विकल्प यह है कि क्लिंकर की जगह अन्य सस्टेनेबल पदार्थों का उपयोग किया जाए। कई कंपनियों ने अपनी नेट-ज़ीरो रणनीतियों में एलसी3 को शामिल किया है।

5. ईंधन में बदलाव 

यह विचार लुभावना लगता है कि स्टील के लिए, कोयले और कोक की जगह लकड़ी के कोयले या अन्य जैव-पदार्थों का उपयोग किया जाए। लेकिन इसमें कई चुनौतियां हैं। ऊर्जा के लिए जैव-पदार्थों में वृद्धि का कृषि भूमि की ज़रूरत के साथ टकराव होगा और सारे जैव-पदार्थ का उत्पादन निर्वहनीय नहीं होता। कोक की तुलना में लकड़ी का कोयला वात भट्टी के लिए उपयुक्त नहीं होता है। लिहाज़ा स्टील प्रसंस्करण के ‘तकनीकी नवाचार’ शीर्षक में दिए गए सुझावों पर अमल ही शायद बेहतर होगा।  

वैसे सीमेंट के लिए नगर पालिका का ठोस अपशिष्ट वैकल्पिक ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। भट्टी का ऊंचा तापमान ज़हरीले पदार्थों को नष्ट कर सकता है और राख को क्लिंकर में शामिल किया जा सकता है। युनाइटेड किंगडम स्थित मेक्सिकन कंपनी सीमेक्स एनर्जी के सीमेंट संयंत्रों की 57 प्रतिशत ऊर्जा इन वैकल्पिक ईंधनों से प्राप्त होती है जबकि यूके आधारित कंपनी हैनसन 52 प्रतिशत वैकल्पिक ईंधन की खपत करता है। इस रणनीति को उपयुक्त नियम-कानून बनाकर राष्ट्र स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

6. कार्बन कैप्चर 

सीसीएस तकनीक यानी कार्बन डाईऑक्साइड को कैद करके भंडारित करने की तकनीक सीमेंट और स्टील संयंत्रों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अनिवार्य होगी। सीसीएस का उपयोग कई देशों में किया जा रहा है। नॉर्वे की सरकारी कंपनी एक्विनार 1990 के दशक से सीसीएस परियोजना के तहत प्रति वर्ष 10 लाख टन कार्बन डाईऑक्साइड को धरती में दफन कर रही है। लेकिन इस तकनीक का पर्याप्त उपयोग नहीं किया गया है। अब तक वैश्विक उत्सर्जन का केवल 0.1 प्रतिशत ही कैप्चर करके भूमिगत किया गया है। कुछेक चुनिंदा संयंत्र सीसीएस का परीक्षण कर रहे हैं। फिलहाल आबू धाबी में एक आधुनिक डीआरआई स्टील संयंत्र 2016 से सीसीएस का उपयोग कर रहा है। सीसीएस को बढ़ाने की ज़रूरत है।

इसमें गैस को संपीड़ित और संग्रहित करने की लागत को कम करने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड 99.9 प्रतिशत से अधिक शुद्ध होना अनिवार्य है। एक सामान्य स्टील और सीमेंट संयंत्र की चिमनी से 30 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड और बाकी नाइट्रोजन और भाप निकलती है। एक विकल्प है कि ईंधन को ऑक्सीजन और रीसायकल गैसों के मिश्रण में जलाया जाए ताकि अपेक्षाकृत शुद्ध कार्बन डाईऑक्साइड प्राप्त हो। यह काफी मुश्किल है क्योंकि इसके लिए घूमती-तपती भट्टी को सील करना ज़रूरी होता है।      

कैल्सिनेशन प्रक्रिया से कार्बन डाईऑक्साइड को अलग करने का एक अन्य तरीका चूना पत्थर को परोक्ष ढंग से गर्म करना है (जैसे दीवार के ज़रिए) ताकि चूना पत्थर से निकलने वाली गैस और ईंधन दहन का उत्सर्जन अलग-अलग रहें। चूना पत्थर से निकलने वाला उत्सर्जन काफी शुद्ध होता है जिससे सीसीएस की लागत में कमी आती है। बेल्जियम और जर्मनी में LEILAC1 और 2 परियोजनाएं इसका परीक्षण कर रही हैं। LEILAC2 20 प्रतिशत (लगभग एक लाख टन प्रति वर्ष) उत्सर्जन को कैप्चर कर रही है। 

इसके अलावा भारी उद्योगों को समूहों में बनाने से हाइड्रोजन उत्पादन के लिए ऊष्मा, सामग्री और बुनियादी ढांचे और कार्बन डाईऑक्साइड का संग्रहण और निपटान साझा हो सकता है। ऐसे क्लस्टर यूके, डेनमार्क, नीदरलैंड और नॉर्वे में तैयार हो रहे हैं। 

7. कॉन्क्रीट में कार्बन संग्रहण 

कॉन्क्रीट तैयार करने के लिए सीमेंट में पानी के साथ रेत और गिट्टी मिलाई जाती हैं। इसमें पानी कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करता है जो सामग्री को सख्त बना देती हैं, जोड़ देती हैं। इसमें कार्बन डाईऑक्साइड मिलाने से सीमेंट की मज़बूती बढ़ती है। वज़न के हिसाब से 1.3 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड कठोरता को लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ा देती है। ऐसा करने से निर्माण के लिए सीमेंट की ज़रूरत कम हो जाती है और कुल उत्सर्जन में 5 प्रतिशत तक की कमी आती है।

कॉन्क्रीट में कार्बन कैप्चर अनुसंधान का सक्रिय क्षेत्र है। कनाडा स्थित कार्बनक्योर जैसी कंपनियां बड़े पैमाने पर कार्बन डाईऑक्साइड को कॉन्क्रीट में इंजेक्ट कर रही हैं। उन्होंने अब तक दो लाख टन कार्बनक्योर कॉन्क्रीट बेचा किया है जिससे डाईऑक्साइड उत्सर्जन में 1,32,000 टन की कमी आई है।

सीमेंट और कॉन्क्रीट दोनों हवा से कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करते हैं जो कैल्शियम आधारित पदार्थों को वापिस चूना पत्थर में परिवर्तित कर देती है। सिद्धांतत: इस प्रक्रिया से सीमेंट निर्माण के दौरान उत्सर्जित कार्बन डाईऑक्साइड का लगभग आधा हिस्सा फिर से अवशोषित किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए कॉन्क्रीट के कणों को पीसकर महीन बनाना होगा ताकि कार्बन डाईऑक्साइड अच्छे से फैल सके। यह प्रक्रिया काफी महंगी है और इसके लिए ऊर्जा की भी ज़रूरत होती है। वैसे इसमें कितनी कार्बन डाईऑक्साइड सोखी जाएगी यह काफी अनिश्चित होता है और इसलिए इसे यूएन जलवायु परिवर्तन कार्यों की सूची में स्थान नहीं मिला है।

8. स्टील का पुनर्चक्रण 

इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (ईएएफ) का उपयोग करके स्टील का पुनर्चक्रण किया जा सकता है। वर्तमान में स्टील उत्पादन का एक चौथाई भाग पुनर्चक्रित स्क्रैप से प्राप्त होता है। वैश्विक स्तर पर 2050 तक पुनर्चक्रित स्टील का उत्पादन दुगना होने की संभावना है। इससे कार्बन उत्सर्जन आज की तुलना में 20-25 प्रतिशत तक कम किया जा सकेगा। 

स्टील का लगातार पुनर्चक्रण वर्तमान में संभव नहीं है। ऐसा करने से उसमें अवांछनीय यौगिक, विशेषकर तांबा, इकट्ठा होने लगते हैं। स्क्रैप की बेहतर छंटाई करके और उत्पादों को नया रूप देकर इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है।

9. सब्सिडी

उपरोक्त आठ बिंदुओं का प्रभाव काफी विशाल हो सकता है। लेकिन कम कार्बन उत्सर्जन वाले भारी उद्योगों को बड़े पैमाने पर शामिल करने के लिए आर्थिक बाधाओं का सामना करना होगा। स्टील के लिए हाइड्रोजन आधारित डीआरआई संयंत्रों और सीमेंट के लिए सीसीएस सुविधाएं पायलट से लेकर शुरुआती व्यावसायिक चरणों तक मौजूद हैं। इनको बढ़ाना काफी महंगा और जोखिम भरा है। कम कार्बन वाले उत्पादों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान होता है। अधिकांश निर्माण कार्य विकासशील देशों में हो रहा है। अत: उनके साथ टेक्नॉलॉजी साझा करने और वित्तीय जोखिमों को कम करने की प्रणालियां लागू करने की आवश्यकता है। जीवाश्म ईंधन को जैव-पदार्थों या हाइड्रोजन से बदलने या सीसीएस के लिए युरोपीन युनियन एमिशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) के तहत कदम उठाना एक अच्छा विचार है। लेकिन शायद सरकार की ओर से सब्सिडी ज़्यादा प्रभावी हो सकती है। सीसीएस के साथ पूर्ण कार्बन-मुक्ति से पोर्टलैंड सीमेंट की लागत दुगनी होने की उम्मीद है। शून्य-उत्सर्जन स्टील की लागत सामान्य स्टील की तुलना में 20-40 प्रतिशत अधिक होने की संभावना है। इस सबकी क्षतिपूर्ति के लिए सब्सिडी ज़रूरी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भयावह है वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव – सुदर्शन सोलंकी

93 प्रतिशत भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां वायु प्रदूषण का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों से अधिक है। यह निष्कर्ष अमेरिका के हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट द्वारा जारी वार्षिक स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट में शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इसके परिणामस्वरूप भारत में औसत आयु लगभग 1.5 वर्ष कम हो गई है।

ऐटमॉस्फेरिक एन्वॉयरमेंट में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि ब्लैक कार्बन की वजह से समय से पहले मृत्यु हो सकती है। यही नहीं, ब्लैक कार्बन का इंसान के स्वास्थ्य पर अनुमान से कहीं ज़्यादा बुरा असर पड़ता है।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार, एचएसबीसी बैंक के स्वामित्व व हिस्सेदारी वाली कंपनियों द्वारा निर्मित और नियोजित नए कोयला संयंत्रों से होने वाले वायु प्रदूषण से प्रति वर्ष अनुमानित 18,700 मौतें होंगी। अर्थात इन संयंत्रों से प्रतिदिन 51 लोगों की मौत होने की संभावना होगी। इन कोयला संयंत्रों के कारण प्रति वर्ष भारत में अनुमानित 8300, चीन में 4200, बांग्लादेश में 1200, इंडोनेशिया में 1100, वियतनाम में 580 और पाकिस्तान में 450 मौंतें हो सकती हैं।

एक मनुष्य दिन भर में औसतन 20 हज़ार बार सांस लेता है और इस दौरान औसतन 8000 लीटर वायु अंदर-बाहर करता है। यदि वायु अशुद्ध है या उसमें प्रदूषक तत्वों का समावेश है तो वह सांस के साथ शरीर में पहुंचकर विभिन्न प्रकार से शरीर को प्रभावित करती है और अनेक भयंकर रोगों का कारण बन जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल 70 लाख लोगों की मृत्यु प्रदूषित हवा के कारण होती है। हेल्‍थ इफेक्‍ट इंस्टीट्यूट के मुताबिक 2015 में भारत में 10 लाख से ज़्यादा असामयिक मौतों का कारण वायु प्रदूषण था। 2019 में वायु प्रदूषण के चलते 18 फीसद मृत्‍यु हुई। इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में वायु-प्रदूषण की वजह से भारत में 16.7 लाख मौतें हुई हैं। अब भी भारत के कई राज्यों में प्रदूषण की समस्या साल भर बनी रहती है।

कणीय पदार्थों (पार्टिकुलेट मैटर, पीएम) से होने वाला वायु-प्रदूषण मुख्यतः जीवाश्म ईंधन के जलने का परिणाम होता है। इसे दुनिया भर में वायु प्रदूषण का सबसे घातक रूप माना जाता है, जो सिगरेट पीने से भी ज़्यादा खतरनाक है।

इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण का वनस्पति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे अम्लीय वर्षा, धूम-कोहरा, ओज़ोन, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड इत्यादि पेड़-पौधों को प्रभावित करते हैं। वायु प्रदूषण के कारण पौधों को प्रकाश कम मिलता है जिसके कारण उनकी प्रकाश संश्लेषण क्रिया प्रभावित होती है। अधिक वायु प्रदूषण के क्षेत्र में पौधे परिपक्व नहीं हो पाते, कलियां मुरझा जाती हैं तथा फल भी पूर्ण विकसित नहीं हो पाते।

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के टॉप 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के हैं। डब्ल्यूएचओ ने अपनी इस रिपोर्ट में कहा है कि इन शहरों में 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण (पीएम 2.5) की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल सूक्ष्म तत्व हैं जिन्हें मानव शरीर के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। आइक्‍यू एयर की रिपार्ट के अनुसार वर्ष 2020 में पूरे विश्‍व में सबसे खराब वायु गुणवत्‍ता वाले देशों की सूची में भारत तीसरे नंबर पर था। वहीं हाल में दिल्ली में प्रदूषक पीएम 2.5 का सूचकांक 462 था, जो 50 से भी कम होना चाहिए। ब्रिटेन की राजधानी लंदन में पीएम 2.5 का स्तर 17, बर्लिन में 20, न्यूयार्क में 38  और बीजिंग में 59 है।

डालबर्ग एडवाइज़र के साथ क्लीन एयर फंड और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने मिलकर काम किया और बताया कि वायु प्रदूषण पर तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि इसकी वजह से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी प्रभाव पड़ रहा है और स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। डालबर्ग का अनुमान है कि भारत के दिहाड़ी मज़दूर वायु प्रदूषण की वजह से सेहत खराब होने के कारण जो अवकाश लेते हैं उसकी वजह से राजस्‍व में 6 अरब अमरीकी डॉलर का नुकसान होता है। वायु प्रदूषण की वजह से दिहाड़ी मज़दूरों के कार्य करने की क्षमता के साथ उनकी सोचने-समझने की शक्ति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण उनकी श्रम शक्ति भी कम होती है जिससे राजस्‍व 24 अरब डॉलर तक कम हो रहा है।

वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए केन्द्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वायु प्रदूषण सम्बंधी विभिन्न अधिनियम, नियम और अधिसूचनाएं जारी की गई हैं, किंतु विभिन्न शोधों से पता चलता है कि इन सबके बावजूद भी वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में सफलता नहीं मिल पा रही है। प्रदूषण के स्तर में स्थायी कमी लाने के लिए पराली जलाने पर नियंत्रण के साथ ही वाहनों, उद्योग, बिजली संयंत्रों इत्यादि से होने वाले प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कार्य योजना बनाने और उनके सही से क्रियान्वयन की आवश्यकता है अन्यथा इसके परिणाम भयावह होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नदियों में बढ़ता प्रदूषण – सुदर्शन सोलंकी

विश्व के अधिकांश भागों में पीने का पानी और घरेलू उपयोग के लिए पानी नदियों से मिलता है। एशिया में गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, कावेरी, नर्मदा, सिंघु, यांगत्सी नदियां, अफ्रीका में नील, नाइजर, कांगो, जम्बेजी नदियां, उत्तरी अमेरिका में हडसन, मिसिसिपी, डेलावेयर, मैकेंज़ी नदियां, दक्षिणी अमेरिका में अमेज़न नदी, युरोप में वोल्गा, टेम्स एवं ऑस्ट्रेलिया में मरे व डार्लिंग विश्व की प्रमुख नदियां हैं।

नदियां न केवल लोगों की प्यास बुझाती हैं, बल्कि आजीविका का उत्तम साधन भी होती हैं। उद्योगों और सिंचाई हेतु जल प्रमुख रूप से नदियों से लिया जाता है। नदियां न सिर्फ जल की पूर्ति करती हैं बल्कि घरेलू एवं औद्योगिक गंदे व अवशिष्ट पानी को भी अपने साथ बहाकर ले जाती हैं। नदियों पर बांध बनाकर बिजली प्राप्त की जाती है। नदियों से मत्स्य पालन जैसे कई लाभ हो रहे हैं। नदियों से पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलता है। नदियां धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक के अलावा स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार, पर्यटन, शिक्षा, चिकित्सा, पर्यावरण जैसे कई क्षेत्रों से सम्बंध रखती है। पारिस्थितिक तंत्र और भूजल स्तर को बनाए रखने में भी नदियां अहम योगदान देती हैं।

हमारे देश में आज शायद ही ऐसी कोई नदी हो जो प्रदूषण से मुक्त हो। नदियों में प्रदूषण के कारण जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। नदियों पर न केवल प्रदूषण का बल्कि इसके मार्ग में बदलाव, बालू खनन, खत्म होती जैव विविधता और जलग्रहण क्षेत्र के खत्म होने का भी असर हो रहा है। नदियों के अलावा अन्य खुले जलाशय जैसे झील, तालाब आदि में अतिक्रमण हुआ है। कई नदियां और सतही जल स्रोत सीवेज और कूड़े का डंपिंग ग्राउंड बन गए हैं।

हाल ही में नदियों में विभिन्न प्रकार की दवाइयों का प्रदूषण पाया गया है। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दवा उद्योग विश्व की लगभग हर नदी के पानी को प्रदूषित कर रहा है। भारत में यमुना व कृष्णा सहित देश की विभिन्न नदियों में इस तरह का प्रदूषण पाया गया है। विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के बाद भी गंगा व अन्य नदियों में प्रदूषण को लेकर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिला है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्यों की प्रदूषण निगरानी एजेंसियों के एक विश्लेषण से पता चला है कि हमारे प्रमुख सतही जल स्रोतों का 90 प्रतिशत हिस्सा अब उपयोग के लायक नहीं बचा है। सीपीसीबी की एक रिपोर्ट के अनुसार “देश की 323 नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं।” 17 प्रतिशत जल राशियां गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। उत्तराखंड से गंगा सागर तक करीब 2500 किलोमीटर की यात्रा तय करने वाली गंगा 50 स्थानों पर प्रदूषित है।

सीपीसीबी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 36 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में से 31 में नदियों का प्रवाह प्रदूषित है। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 53 प्रदूषित प्रवाह हैं। इसके बाद असम, मध्यप्रदेश, केरल, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, मिज़ोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, मेघालय, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, तमिलनाडु, नगालैंड, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, सिक्किम, पंजाब, राजस्थान, पुडुचेरी, हरियाणा और दिल्ली हैं।

सीपीसीबी की एक रिपोर्ट में प्रदूषण के लिए घरेलू सीवरेज, साफ-सफाई की अपर्याप्त सुविधाएं, खराब सेप्टेज प्रबंधन और गंदा पानी तथा साफ-सफाई के लिए नीतियों की गैर-मौजूदगी को ज़िम्मेदार माना गया है। (स्रोत फीचर्स)

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ग्लासगो जलवायु सम्मेलन पर एक दृष्टि – सोमेश केलकर

ग्रीनहाउस ऐसी इमारत को कहते हैं जिसका उपयोग पौधे उगाने के लिए किया जाता है। आम तौर पर ग्रीनहाउस कांच का बना होता है जिससे सूरज की किरणों की गर्मी अंदर ही कैद हो जाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सर्द मौसम में भी इस इमारत में पौधों को वृद्धि के लिए ठीक-ठाक तापमान मिल जाता है।

देखा जाए तो ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी पर भी इसी तरह काम करता है। कांच के बजाय कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, ओज़ोन, नाइट्रस ऑक्साइड, जल वाष्प और क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी गैसें वायुमंडल में उपस्थित हैं। ये गैसें ग्रीनहाउस की पारंपरिक कांच की दीवारों की तरह काम करती हैं। ये सूरज के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने देती हैं लेकिन जब धरती से ऊष्मा निकलती है तो उसे अंतरिक्ष में वापस जाने से रोक लेती हैं। इसलिए इन्हें ग्रीनहाउस गैसें कहा जाता है और ये जीवन के लिए इष्टतम तापमान बनाए रखती हैं।

आप ज़रूर पूछेंगे कि जब ग्रीनहाउस गैसें जीवन के लिए इतनी आवश्यक हैं तो इन गैसों के उत्सर्जन से इतनी परेशानी क्यों? क्या अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उपस्थित होना हमारे लिए बेहतर नहीं होगा? वास्तव में औद्योगीकरण की शुरुआत से ही मानव जाति ऐसी गतिविधियों में लिप्त रही है जिससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का निरंतर उत्सर्जन होता रहा है। चूंकि ग्रीनहाउस गैसों की प्रचुरता के कारण वातावरण में पहले की तुलना में और अधिक ऊष्मा रुकने लगी इसलिए पृथ्वी के तापमान में और अधिक वृद्धि होने लगी।

वनों की कटाई, जीवाश्म ईंधन के दहन जैसी गतिविधियों और जनसंख्या वृद्धि से ग्रीनहाउस के प्रभाव में काफी तेज़ी होने लगी। उदाहरण के लिए, पेड़ भोजन तैयार करने में कार्बन डाईऑक्साइड का उपयोग करते हैं। वनों की कटाई से पेड़ों की संख्या कम होती है जो अन्यथा वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित कर धरती के तापमान को नियंत्रण में रख सकते थे। इसी तरह, कोयला, पेट्रोल-डीज़ल जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने से वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

ग्रीनहाउस गैसों से ग्रह के तापमान में हो रही वृद्धि को ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, यह धरती के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रभावित करना शुरू कर देती है जो अब तक संतुलन की स्थिति में रहे हैं। जैसे, महासागर वायुममंडल से कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करते हैं जो पानी के नीचे उगने वाले पौधों को प्रकाश संश्लेषण में काम आ जाती है। जब वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक होती है तब समुद्र भी बहुत अधिक मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करने लगते हैं। इस अवशोषण की प्रक्रिया से समुद्र के पानी की अम्लीयता में परिवर्तन होता है जिसे महासागरीय अम्लीकरण कहा जाता है। महासागरों का अम्लीकरण नाज़ुक लेकिन जटिल पारिस्थितिकी तंत्र और उनमें रहने वाले जीवों को प्रभावित करता है।

ग्लासगो सम्मेलन

31 अक्टूबर से 13 नवंबर 2021 तक ग्लासगो में 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-26) का आयोजन किया गया।

साल दर साल विश्व भर के राजनेता अपने देशों की ज़मीनी हकीकत से दूर इन सम्मेलनों में शामिल होते हैं। इन सम्मेलनों में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और शोरगुल थम जाता है – अगले वर्ष इन्हीं वादों को दोहराने के लिए।

कई बार जलवायु सम्मेलन असफल भी हो जाते हैं। 2009 के कोपनहेगन शिखर सम्मेलन की विफलता का सबसे बड़ा कारण रहा देशों की खुदगर्ज़ी। युरोपीय राष्ट्र कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन की सीमा को कम नहीं करना चाहते थे। अमेरिका ऐसे समझौते नहीं करना चाहता था जिसे वह निभा न सके। अफ्रीका जैसे गरीब देश यह स्पष्ट किए बगैर अधिक धनराशि की मांग कर रहे थे कि उसे खर्च कहां किया जाएगा। चीन की इच्छा केवल द्विपक्षीय समझौते करने की रही। सबसे अधिक आबादी और सबसे बड़ा निर्माता होने के बाद भी वह अपनी लालची, विस्तारवादी और अलगाववादी प्रवृत्ति से बाज़ नहीं आया। कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन की विफलता में शक्तिशाली कॉर्पोरेट जगत का भी बड़ा योगदान रहा जो अपने मुनाफे के सामने पर्यावरण और जलवायु की परवाह नहीं करता। आखिर में इसमें कुछ ऐसे देश भी थे जो ग्लोबल वार्मिंग को एक प्राकृतिक घटना बताते रहे, जिसमें इंसानी क्रियाकलापों की कोई भूमिका नहीं है। सौभाग्य से, ग्लासगो जलवायु वार्ता को किसी भी पक्ष ने अपने स्वयं के एजेंडे के लिए अगवा नहीं किया। ग्लासगो सम्मेलन के बाद हमारी सबसे बड़ी चुनौती ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और उसमें कटौती है।

1990 में जब पहली बार जलवायु वार्ता की शुरुआत हुई थी, तब वायुमंडल में प्रति वर्ष लगभग 35 अरब टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया जा रहा था। अब आप यह सोच रहे होंगे कि पिछले तीन दशकों से चली आ रही इन वार्ताओं के नतीजे में उत्सर्जन कम न सही, स्थिर तो ज़रूर हुआ होगा। लेकिन आपका यह विचार बिलकुल गलत है। आज वैश्विक स्तर पर वायुमंडल में 50 अरब टन प्रति वर्ष से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया जा रहा है।

यदि सारी योजनाओं और वादों का पालन किया गया तो उत्सर्जन को कम करके 46 अरब टन तक सीमित जा सकता है। वैसे, विज्ञान का मत साफ है – ग्रह को बचाने के लिए उत्सर्जन को 25 अरब टन यानी आधे से भी कम करना ज़रूरी है। और तो और, पिछले तीन दशकों का रुझान देखते हुए उत्सर्जन को 46 अरब टन तक सीमित करना भी अवास्तविक प्रतीत होता है।  

सम्मेलन का सार

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट (एआर6) ने वैश्विक तापमान में वृद्धि और इससे जुड़े जोखिमों के बारे में सभी देशों के कान खड़े कर दिए। इस रिपोर्ट के अनुसार सूखा, बाढ़, अत्यधिक वर्षा, समुद्र का बढ़ता स्तर और ग्रीष्म लहरों का बारंबार आना मानवीय गतिविधियों के परिणाम हैं। इससे यह तो स्पष्ट है पिछली जलवायु वार्ताओं में पारित संकल्प जलवायु संकट को कम करने में अपर्याप्त साबित हुए हैं। 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने हाल ही में उत्सर्जन गैप रिपोर्ट, 2021 जारी की है। इस रिपोर्ट में देशों द्वारा 2030 तक उत्सर्जन में कमी के वादों और तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री से 2 डिग्री सेल्सियस के बीच रखने के लिए आवश्यक प्रयासों में एक बड़े अंतर को उजागर किया गया है। इस रिपोर्ट के अंत में चेतावनी के तौर बताया गया है कि हमारे पास कार्रवाई करने के रास्ते काफी तेज़ी से कम होते जा रहे हैं।       

सम्मेलन शुरू होने से पहले चार लक्ष्य निर्धारित किए गए थे:

1.   इस सदी के मध्य तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना।

2.   जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील क्षेत्रों के समुदायों के साथ-साथ प्राकृतवासों की भी रक्षा करना। 

3.   तय किए गए लक्ष्यों के लिए धन जुटाना। 

4.   सभी देशों को एक साथ काम करने को तैयार करना ताकि नियमों को विस्तार से सूचीबद्ध करके पेरिस समझौते को पूरा करने में मदद मिल सके।    

महत्वपूर्ण घोषणाएं 

1. निर्वनीकरण पर रोक लगाना

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी घोषणा 2030 तक वनों की कटाई पर पूरी तरह से रोक लगाना है। ग्लोबल फारेस्ट वॉच के अनुसार वर्ष 2020 में हमने 2,58,000 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र नष्ट किया है।

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निपटने के लिए 100 से अधिक देशों ने इस दशक के अंत तक निर्वनीकरण और भूमि क्षरण को रोकने का संकल्प लिया है। इन देशों में ब्राज़ील भी शामिल है जहां अमेज़न वर्षा वनों के विशाल भाग को पहले ही नष्ट किया जा चुका है।  

100 से अधिक देशों द्वारा लिए गए इस संकल्प में लगभग 19.2 अरब डॉलर की निधि भी शामिल है। वन क्षेत्रों के संरक्षण और नवीकरण के लिए, सार्वजनिक और निजी, दोनों स्रोतों से निधि जुटाई जाएगी। इस निधि का कुछ हिस्सा विकासशील देशों में क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली, दावानलों से निपटने और आवश्यक होने पर देशज जनजातियों की सहायता के लिए दिया जाएगा। वैसे, इस कार्य के लिए 19.2 अरब डॉलर बहुत छोटी राशि है। ग्लासगो सम्मेलन में 28 ऐसे देश भी शामिल थे जिन्होंने वैश्विक खाद्य व्यापार से निर्वनीकरण को हटाने का संकल्प लिया है। इनमें पशुपालन और ताड़ का तेल, सोया तथा कोको जैसे अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। ये उद्योग पशुओं को चराने या फसल उगाने के लिए पेड़ों को काटने और निर्वनीकरण को बढ़ावा देते हैं। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि इन संकल्पों पर कितना अमल किया जाता है। 2014 की संधि में निर्वनीकरण की गति को कम करने का संकल्प तो पूरी तरह विफल रहा है।     

2. मीथेन उत्सर्जन में कमी

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के प्रयासों का मुख्य केंद्र कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को कम करना रहा है, लेकिन विशेषज्ञों ने अल्पकालिक ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए मीथेन उत्सर्जन में कटौती को अधिक प्रभावी बताया है। हालांकि, कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा वातावरण में अधिक है और यह काफी समय के लिए मौजूद भी रहती है, लेकिन इसकी तुलना में मीथेन अणुओं का वातावरण पर वार्मिंग प्रभाव अधिक शक्तिशाली होता है।

हाल ही में अमेरिका और युरोपीय संघ ने 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में कटौती के लिए वैश्विक साझेदारी की घोषणा की है। इसके तहत 2020 के स्तर की तुलना में 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में 30% कटौती का संकल्प लिया गया है। वर्तमान में लगभग 90 देशों ने अमेरिका और युरोपीय संघ के इन प्रयासों को समर्थन देने का संकल्प लिया है। इस प्रयास को वैश्विक मीथेन संकल्प कहा गया है जिसकी घोषणा पिछले वर्ष सितम्बर में की गई। मीथेन गैस के सबसे बड़े उत्सर्जक ब्राज़ील ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन चीन, भारत और रूस जैसे तीन बड़े उत्सर्जक इस समझौते में शामिल नहीं हैं।        

विफलताएं

हालांकि, COP-26 सम्मेलन में वैश्विक जलवायु में सुधार और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी की दिशा में कई प्रस्ताव, समझौते और संकल्प लिए गए हैं लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि कितने देश इन वादों पर खरे उतरते हैं। पिछले संकल्पों, समझौतों और घोषणाओं का रिकॉर्ड देखते हुए अभी भी संशय की स्थिति बनी हुई है।

यह तो स्पष्ट है कि ग्लासगो सम्मेलन में नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का जो लक्ष्य रखा गया है वह काफी दूर का है – 2050। यह 2030 के लिए निर्धारित कई महत्वपूर्ण लक्ष्यों से ध्यान हटा सकता है जिन पर सम्मेलन में ध्यान केंद्रित किया गया था।     

नेट-ज़ीरो लक्ष्य युनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) के मूलभूत सिद्धांतों का विरोधाभासी भी प्रतीत होता है जो ‘समान परन्तु विभेदित उत्तरदायित्वों’ (सीबीडीआर) पर आधारित है। यूएनएफसीसी का तर्क है कि सभी देशों के पास नेट-ज़ीरो के लिए एक सामान्य लक्ष्य वर्ष के बजाय अलग-अलग लक्ष्य होना चाहिए। क्योंकि विकसित देश तो अपना लक्ष्य जल्दी हासिल कर सकते हैं लेकिन विकासशील देशों को इसमें थोड़ा अधिक समय लगेगा। यूएनएफसीसी ने विकसित देशों द्वारा अतीत में किए गए अत्यधिक उत्सर्जनों को देखते हुए जलवायु सम्बंधी कार्रवाई की अधिक ज़िम्मेदारी उठाने का आह्वान किया है। विकासशील देशों को भी विकसित देशों से प्राप्त तकनीकी और वित्तीय सहायता प्राप्त करते हुए दिशा में भरसक प्रयास करना चाहिए । यह तर्क ग्लासगो सम्मेलन में सभी देशों के लिए प्रस्तावित 2030 और 2050 के एक-समान लक्ष्यों के विपरीत प्रतीत होता है।              

भारत की भूमिका

भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है। यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारत की भागीदारी की गणना की जाए तो यह 7% से कुछ ही कम होगा। वैसे भारत विश्व के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में से एक तो है लेकिन इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत से बहुत कम है। यह देश में आर्थिक असमानता की स्थिति का संकेत देता है।

भारत ने मीथेन संकल्प पर हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि हम विश्व के सबसे बड़े बीफ और अन्य प्रकार के मांस के निर्यातक हैं और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने का मतलब मीथेन उत्सर्जन में कटौती है जिसका प्रतिकूल असर मांस व्यापार पर होगा।

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 1.8 टन है जो 2015 के पेरिस समझौते के दायित्वों के अनुसार 2030 में 2.4 टन होने की संभावना है। भारत के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के क्षेत्रवार विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें सबसे अधिक हिस्सा बिजली और ऊष्मा का है और इसके बाद क्रमशः कृषि, विनिर्माण एवं परिवहन, उद्योग तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन और वानिकी क्षेत्र हैं।

आने वाले वर्षों में भारत के प्रति व्यक्ति जीडीपी में वृद्धि होने की संभावना है जिसके नतीजे में कार्बन उत्सर्जन में भी वृद्धि होगी। चूंकि भारत ऊर्जा उत्पादन के लिए कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर अधिक निर्भर है इसलिए उत्सर्जन में मुख्य भागीदारी ऊर्जा क्षेत्र की रहेगी।

भारत के जीडीपी में सेवाओं का बड़ा हिस्सा संकेत देता है कि आने वाले समय में विकास कम कार्बन उत्सर्जन आधारित रहेगा।

हालांकि, भारत की जनसंख्या वृद्धि भले ही धीमी हो रही है लेकिन जनसंख्या के बदलते चाल-ढाल के परिणामस्वरूप आने वाले वर्षों में कार्बन उत्सर्जन पर दबाव पड़ सकता है।     

भारत का प्रदर्शन

भारत ने 2005 की तुलना में 2030 तक अपनी उत्सर्जन तीव्रता में 33% से 35% तक कमी करने का संकल्प लिया है। (उत्सर्जन तीव्रता का अर्थ होता है प्रति इकाई जीडीपी के लिए ऊर्जा की खपत) और कहा है कि वह अब तक 24% कमी हासिल कर चुका है। भारत ने सम्मेलन में घोषणा की है कि वह 2030 के अंत तक अपने नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को 450 गीगावाट तक बढ़ा देगा। यह लक्ष्य पेरिस जलवायु समझौते के तहत भारत द्वारा व्यक्त 40% ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से के लक्ष्य से अलग है। भारत ने 2.5 से 3 अरब टन कार्बन सिंक (अवशोषक) बनाने के लिए वन क्षेत्र बढ़ाने की घोषणा भी की है।

भारत ने हाल ही में हरित विधियों के माध्यम से हाइड्रोजन उत्पादन के लिए राष्ट्रीय हाइड्रोजन नीति की भी घोषणा की है। हाइड्रोजन को औद्योगिक और परिवहन के क्षेत्र में इस्तेमाल करना है। इससे भारत को अपने ऊर्जा क्षेत्र को कार्बन मुक्त करने में मदद मिलेगी। फरवरी 2022 में इंदौर ऐसा पहला भारतीय शहर बन गया है जहां गोबर गैस प्लांट शहर के सभी सरकारी सार्वजनिक वाहनों को ऊर्जा प्रदान करेंगे।   

भावी चुनौतियां

2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने का मतलब होगा कि 2040 तक उत्सर्जन सर्वोच्च स्तर तक पहुंचकर कम होने लगे। अब तक के अध्ययन से पता चलता है कि 2070 तक नेट-ज़ीरो हासिल करने के लिए भारत को उत्सर्जन की तीव्रता (यानी उत्सर्जन प्रति इकाई जीडीपी) में 85% की कमी करना होगी। तुलना के लिए देखें कि भारत 2005 से लेकर अब तक उत्सर्जन में केवल 24% की कमी कर पाया है।   

इस प्रकार की भारी कमी को संभव बनाने के लिए पनबिजली से इतर नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी को वर्तमान 11% से बढ़ाकर 65% करना होगा और इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी को 2040 तक 0.1% से 75% तक ले जाना होगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार द्वारा नागरिकों को सौर पैनल जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। सब्सिडी प्रदान कर सौर पैनल सस्ते भी किए जा सकते हैं। विकल्प के रूप में सरकारों को घरों में उत्पादित अधिशेष सौर ऊर्जा को खरीदना चाहिए जिससे नागरिकों को सौर पैनल में निवेश करने का प्रोत्साहन भी मिलेगा।

देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या को बढ़ाने के लिए राज्य को सरकार द्वारा संचालित सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों में परिवर्तित करना चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए दिए जाने वाले ऋण पर कर में राहत प्रदान करना चाहिए, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी बदलने की प्रक्रिया आसान रहे। ऐसी व्यवस्था भी ज़रूरी है कि पेट्रोल पंप चार्जिंग स्टेशन भी स्थापित कर सकें।     

इस अवधि में जीवाश्म ऊर्जा का हिस्सा 73% से घटाकर 40% करना होगा। भारत के वर्तमान वित्तीय और तकनीकी संसाधनों को देखते हुए इस लक्ष्य को पूरा कर पाना काफी कठिन लगता है।                

विकास पर प्रभाव

काउंसिल फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) का अध्ययन बताता है कि भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए कोयले का उपयोग 2040 तक चरम पर पहुंचने के बाद 2040 से 2060 के बीच 99% तक कम करना होगा। ऐसा होने की संभावना कम ही है क्योंकि इससे भारत की विकास संभावनाओं को नुकसान पहुंचेगा और संभव है कि भारत विकास की कीमत पर पर्यावरण को तरजीह नहीं देगा।       

धन की कमी

भारतीय अर्थव्यवस्था को कार्बन-मुक्त करने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ने के लिए पूंजी की आवश्यकता होगी। अभी तक भारत के पास इतनी पूंजी तो नहीं है इसलिए इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे बाहरी फंडिंग पर निर्भर रहना पड़ेगा। विकसित देशों ने जलवायु कोश में 2020 से प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की व्यवस्था करने का वादा किया था जिसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है।      

आगे का रास्ता

COP-26 के मद्देनज़र भारत भविष्य में निम्नलिखित कार्य कर सकता है;

1.  नेतृत्व की भूमिका निभाना और पहल करना

यह तो स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है। इससे निपटने के लिए भारत को वैश्विक प्रयासों में भाग लेना चाहिए और 1.5 डिग्री के लक्ष्य के प्रति गंभीरता प्रदर्शित करने के लिए तकनीकी, सामाजिक-आर्थिक और वित्तीय नीतियों एवं शर्तों का प्रस्ताव देने में पहल करना चाहिए भले वे जोखिम भरे क्यों न हों।    

2. सशर्त लक्ष्य

कुछ विशेषज्ञों ने भारत द्वारा 2070 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनके मुताबिक यह सही है कि भारत के लिए नेट-ज़ीरो वर्ष की घोषणा करने के दबाव की अवहेलना करना संभव नहीं था लेकिन भारत को यह स्पष्ट कर देना चाहिए था कि वह 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा तभी करेगा जब विकसित देश 2050 से पहले नेट-ज़ीरो तक पहुंचने और भारत जैसे विकासशील देशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे। भारत ने सशर्त लक्ष्य निर्धारित न करके गलती की है।

जलवायु सम्मेलन में अनुकूलन के उपायों पर भी ज़ोर देना चाहिए था। इसके साथ ही भारत को वैश्विक कार्बन बजट के पर्याप्त हिस्से पर अपना दावा पेश करना था और विश्व के बड़े उत्सर्जकों के विशिष्ट वैश्विक कार्बन बजट के आधार पर संचयी उत्सर्जन पर प्रतिबंध लगाने का आह्वान करना चाहिए था। भारत विकसित देशों द्वारा अतीत में किए गए उत्सर्जन की भरपाई की मांग भी कर सकता है।        

3. हरित विकास पथ पर चलना

इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्सर्जन का पूरे विश्व पर प्रभाव होगा, लेकिन यह प्रभाव सभी देशों पर समान नहीं होगा। भारत एक जलवायु-संवेदनशील राष्ट्र है और सरकार को हरित विकास के रास्तों को अपनाना चाहिए। अर्थव्यवस्था को ऐसे तरीकों से विकसित करना चाहिए जो न केवल विकास को सुनिश्चित करें बल्कि लम्बे समय तक संधारणीय भी रहे। 

हरित विकास पथ का एक उदाहरण नवीकरणीय ऊर्जा को व्यापक रूप से अपनाने के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करना हो सकता है। इसके लिए भारत एक बहु-क्षेत्रीय योजना पर काम कर सकता है। आज देश में पेट्रोल और डीज़ल आधारित वाहन बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक हैं; सरकार वाहन निर्माताओं और ईंधन पर अप्रत्यक्ष टैक्स लगा सकती है और इससे मिलने वाले फंड का उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन को सब्सिडी देने में कर सकती है।           

एक मिथक यह फैलाया गया है कि विश्व में अधिकांश प्रदूषण के लिए आम नागरिक ज़िम्मेदार हैं। इसके विपरीत, सच तो यह कि यदि विश्व भर के परिवार अपने जीवनयापन के लिए पर्यावरण अनुकूल तरीकों को अपना लें तो भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मात्र 22% की ही कमी होगी। इसका मतलब यह है कि अधिकांश उत्सर्जन उद्योगों के कारण होता है; सरकार पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाली कंपनियों पर कर लगा सकती है और उत्पादन के लिए पर्यावरण अनुकूल तथा संधारणीय तरीकों को अपनाने वाली कंपनियों को कर मुक्त कर सकती हैं। इससे निजी क्षेत्र की कंपनियों को ऊर्जा सम्बंधी परिवर्तन के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

4. नेटज़ीरो की दिशा में

यदि भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करना है तो स्वच्छ ऊर्जा नवाचार और प्रौद्योगिकियों के लिए व्यापक समर्थन तथा निवेश के साथ वर्तमान में उपलब्ध हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाने की आवश्यकता होगी। निम्नलिखित हस्तक्षेप भारत को नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं:

क. एक कानूनी ढांचा बनाया जाना चाहिए जिसके तहत सभी गतिविधियों के जलवायु प्रभाव का मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके। हाल ही में पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रोटोकॉल के कमज़ोर होने के साथ ही हम विपरीत दिशा में जा रहे हैं।

ख. ऐसी ऊर्जा कुशल वस्तुओं के लिए कानूनी आदेश जारी किया जाना चाहिए जिनका जीवन लम्बा है। बाज़ार में कई तरह की विकृतियां नज़र आती हैं – उत्पादों को ऐसे बनाना जो जल्दी कंडम हो जाएं, मालिकाना मानकों का अनावश्यक उपयोग, स्पेयर पार्ट्स का उत्पादन न करना, स्पेयर पार्ट्स बाज़ार पर एकाधिकार रखना और जानबूझकर मरम्मत के लिए कठिन उत्पाद बनाना। ऐसे कदाचरण को कानून के माध्यम से हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

ग. एक समर्पित हरित कोश बनाना और विभिन्न पर्यावरण संरक्षण योजनाओं के वित्तपोषण के लिए इसका उपयोग करना।

घ. ऐसे जंगल लगाना जो कार्बन सिंक का काम करें।       

च. केंद्रीकृत और विकेंद्रीकृत बिजली उत्पादन दोनों पर समान रूप से ज़ोर देते हुए नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि करना।

छ. कार्बन आधारित ईंधन के एक उत्कृष्ट विकल्प, ग्रीन हाइड्रोजन, को मुख्यधारा में लाकर बिजली, औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों के उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है।           

ज. मीथेन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन।

झ. पैदल चलने और साइकिल चलाने को बढ़ावा देने के साथ-साथ शहर भर में साइक्लिंग मार्ग का निर्माण कर साइकिल चालन के बुनियादी ढांचे में निवेश करना और इन मार्गों में गाड़ियों की पार्किंग या कोई अन्य दुरूपयोग करने वालों पर जुर्माना।     

निष्कर्ष

पर्यावरण और विकास हमेशा से ही एक सिक्के के दो पहलू रहे हैं। एक अच्छा नीति निर्माता हमेशा ऐसी नीतियां तैयार करता है जिससे विकास और निर्वहनीयता के बीच एक अच्छा संतुलन बना रहे। आज की परिस्थितियों में लगता है कि नीतिकारों की दिलचस्पी विकास में अधिक है। यदि संतुलन बिगड़ा तो सबसे कमज़ोर और पिछड़े वर्ग को इन गलतियों और असफलताओं का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)   

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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