तोंद की चर्बी का सम्बंध दिमाग से है

यह तो काफी समय से माना जाता रहा है कि आपकी तोंद में जमा चर्बी आपके हृदय के लिए बुरी होती है मगर अब पता चल रहा है कि यह दिमाग के लिए भी बुरी होती है। युनाइटेड किंगडम में किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि जो लोग मोटे होते हैं और जिनकी कमर और कूल्हों का अनुपात अधिक होता है उनके मस्तिष्क का आयतन कम होता है। कमर और कूल्हे का अनुपात तोंद की चर्बी का द्योतक माना जाता है। अध्ययन में खास तौर से यह पता चला है कि तोंद की चर्बी का सम्बंध मस्तिष्क के ग्रे मैटर के कमतर आयतन से है।

न्यूरोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता, लफबरो विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ स्पोर्ट्स, एक्सरसाइज़ एंड हेल्थ के मार्क हैमर का कहना है कि बड़ी संख्या में लोगों के अध्ययन के बाद पता चला है कि मोटापे का सम्बंध मस्तिष्क के सिकुड़ने से है। गौरतलब है कि मस्तिष्क के कम आयतन यानी मस्तिष्क के सिकुड़ने का सम्बंध याददाश्त में गिरावट और विस्मृति से देखा गया है। इस अध्ययन में यू.के. के 9600 लोगों के बॉडी मास इंडेक्स तथा कमर और कूल्हों का अनुपात नापा गया था और एमआरआई के द्वारा उनके मस्तिष्क का आयतन नापा गया था। अध्ययन में शामिल किए गए लोगों की औसत उम्र 55 वर्ष थी। शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन में भाग लेने को जो लोग तैयार हुए वे आम तौर पर स्वस्थ लोग थे। इसलिए इसके परिणामों को फिलहाल पूरी आबाद पर लागू करने में सावधानी की ज़रूरत है।

वैसे यह बात ध्यान देने की है कि उपरोक्त अध्ययन में मोटापे और मस्तिष्क के आयतन के बीच जो सह-सम्बंध देखा गया है वह कार्य-कारण सम्बंध नहीं है बल्कि मात्र इतना है कि ये दोनों चीज़ें साथ-साथ होती नज़र आती हैं। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि मोटापे से मस्तिष्क सिकुड़ता है। यह भी संभव है कि मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के सिकुड़ने से मोटापा बढ़ता हो।

वैसे तोंद में जमा चर्बी अन्य मामलों में भी हानिकारक है। पहले कुछ अध्ययनों से पता चल चुका है कि तोंद की चर्बी की बढ़ी हुई मात्रा का सम्बंध हृदय रोगों से है। इसके अलावा इसका सम्बंध टाइप 2 डायबिटीज़ तथा उच्च रक्तचाप से भी देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मानव शिशु चिम्पैंज़ी-शब्दकोश का उपयोग करते हैं – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

डीएनए आधारित आनुवंशिक विश्लेषण से इस बात की तो पुष्टि हो ही चुकी है कि मनुष्य वानरों के वंशज हैं। प्रजातियों की उत्पत्ति और उनके विकास के बारे में आज से लगभग 160 साल पहले चार्ल्स डार्विन ने बताया था। इस बात को आज सभी स्वीकार करते हैं, हालांकि धार्मिक आधार पर डार्विन को नकारने वालों का एक समूह मौजूद है। इस सिद्धांत को लेकर सन 1860 में एक बड़ी बहस चली थी जिसे ग्रेट ऑक्सफोर्ड बहसके नाम से याद किया जाता है। उस समय डारविन बीमार थे और डॉ. थॉमस हक्सले डार्विन के सिद्धांत का बचाव कर रहे थे। ऑक्सफोर्ड के बिशप विल्बरफोर्स ने हक्सले पर तंज कसते हुए पूछा था कि तुम वानर के वंशज होने का दावा दादा की ओर से जोड़कर कर रहे हो या दादी की ओर से? हक्सले ने शांतिपूर्वक इसका जवाब दिया था: किसी इंसान के लिए इस बात पर शर्म करने का कोई कारण नहीं है कि उसके दादा वानर थे। यदि मुझे अपने किसी पूर्वज को याद करके शर्मिंदगी महसूस होगी तो वह एक मनुष्य होगा जो विशाल और बहुमखी प्रतिभावान है, जो अपने काम के दायरे में सफलता से संतुष्ट नहीं है, और उन वैज्ञानिक सवालों में टांग अड़ाता है जिनके बारे में उसे कुछ पता नहीं है; उद्देश्य सिर्फ यह होता है कि लक्ष्यहीन लफ्फाज़ी से उन सवालों को दबा सके और अपने शब्दजाल और चतुराई से धार्मिक पूर्वाग्रहों का आव्हान करके श्रोताओं का ध्यान वास्तविक मुद्दे से भटका सके।

हक्सले द्वारा दिया गया यह जवाब यहां सिर्फ इसलिए नहीं दोहराया गया है क्योंकि यह हाजि़रजवाबी, बुद्धिमतापूर्ण, धैर्यपूर्वक अच्छे शब्दों में दिया गया था बल्कि इसलिए दोहराया गया है क्योंकि यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

इशारों की विरासत

मनुष्यों को वानरों (गोरिल्ला, ओरांगुटान, चिम्पैंज़ी, बोनोबो) से विरासत में ना सिर्फ आनुवंशिक और जैव-रासायनिक गुण मिले हैं बल्कि संवाद के शारीरिक संकेत (इशारे) भी मिले हैं। यह बात एक हालिया शोध पत्र में प्रस्तुत हुई है। वी. क्रसकेन और साथियों का यह शोध पत्र एनिमल कॉग्नीशन नामक पत्रिका के सितम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित हुआ है (यह नेट पर मुफ्त में उपलब्ध है, लिंक देखे https://doi.org/10.1007/&10071-08-1213) इस शोध पत्र में लेखक बताते हैं कि मानव और गैर-मानव वानरों की सभी प्रजातियों के पूर्वज संवाद के लिए अलग-अलग तरह के संकेतों का उपयोग करते थे: जैसे उच्चारण, शारीरिक संकेत, चेहरे के भाव, शरीर की हरकतें और यहां तक कि चेहरे की रंगत (गुलाबी होना, लाल-पीला होना) या गंध भी आपस में संदेश पहुंचाने का काम करते थे। अलबत्ता, मनुष्यों की भाषा (मौखिक या सांकेतिक) संवाद का एक सर्वथा जुदा तंत्र लगती है।इसके विपरीत हमारे वानर पूर्वजों के पास मौखिक भाषा नहीं थी, मगर आपस में संवाद के लिए संकेतों के रूप में उनके पास 60 से भी ज़्यादा इशारे थे, जिनका उपयोग वे रोज़मर्रा के लक्ष्य हासिल करने हेतु करते थे। इनमें काफी लचीलापन और सोद्देश्यता दिखाई पड़ती है। और तो और, विभिन्न वानर प्रजातियों में संवाद के इशारे एक जैसे पाए गए हैं। इस बात से यह निष्कर्ष निकलता है कि ये 60 से भी अधिक सांकेतिक चेष्टाएं, जिनका उपयोग पूर्वज वानर आपस में संवाद के लिए करते थे, संवाद की गैर-मानव प्रणाली है। ऐसा भी कहा जाता है कि इंसानों की भाषा इशारों के इसी खज़ाने से विकसित हुई है। इस संदर्भ में दी मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ इवॉल्यूशनरी एन्थ्रोपोलॉजी के प्रोफेसर माइकल टॉमसेलो की एक किताब प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक है ओरिजिन ऑफ ह्यूमन कम्यूनिकेशन । डॉ. ह्यूवेस और उनके साथियों ने 1973 में करंट एंथ्रोपोलॉजी में एक पेपर प्रकाशित किया था: प्राइमेट कम्यूनिकेशन एंड दी जेश्चरल ओरिजिन ऑफ लेन्गवेज (प्रायमेट संप्रेषण और भाषा की शारीरिक संकेत-आधारित उत्पत्ति)। और ज़्यादा हाल में होबैटर और बायर्न ने करंट बायोलॉजी में चिम्पैंज़ियों के हाव-भाव-इशारों का एक शब्दकोश प्रकाशित किया है।

मानव शिशु

अब मानव शिशुओं की बात करते हैं। हमारे शिशुओं को बोलना सीखने में वक्त लगता है। औसत मानव शिशु एक या दो वर्ष की उम्र तक वयस्कों के साथ और आपस में संप्रेषण के लिए विभिन्न हाव-भाव (शारीरिक संकेतों) का उपयोग करते हैं। डॉ. कैथरीन होबैटर के नेतृत्व में स्कॉटलैंड, युगांडा, जर्मनी और स्वीटज़रलैंड के एक समूह द्वारा किए गए एक तुलनात्मक अध्ययन में यह देखने की कोशिश की गई कि इस दौरान (बोलना सीखने से पहले) शिशु ऐसे कितने और कौन-से शारीरिक संकेतों का उपयोग करता है और इनमें से कितने हमारे पूर्वजों से मेल खाते हैं। यह अध्ययन एनिमल कॉग्नीशन पत्रिका  के एक विशेष अंक में प्रकाशित हुआ था जिसका विषय था इवॉल्विंग दी स्टडी ऑफ जेश्चर

शोधकर्ताओं ने युगांडा के 315 से 421 दिन उम्र के 7 शिशुओं और जर्मनी के 343 से 642 दिन उम्र के 6 शिशुओं के शारीरिक संकेतों को रिकॉर्ड किया। सारे शिशु उनके सामान्य परिवेश में ही रखे गए थे। देखा यह गया कि शिशु बात करने के लिए कितने शारीरिक इशारों का उपयोग करते हैं। उन्होंने पाया कि मानव शिशु 52 अलग-अलग इशारों का उपयोग करते हैं। इसके बाद उन्होंने 12 महीने से लेकर 51 वर्ष उम्र के चिम्पैंज़ियों के शारीरिक इशारों से इनकी तुलना की। तुलना में उन्होंने पाया कि मानव शिशु द्वारा उपयोग किए जाने वाले 52 इशारों में से 46 चिम्पैंज़ी इशारा-कोश के भी हिस्से थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक, चिम्पैंज़ी की तरह मानव शिशु भी इन इशारों का उपयोग अलग-अलग भी करते हैं और एक क्रम के रूप में भी। और प्रत्येक संकेत का उपयोग लचीले ढंग से विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

चिम्पैंज़ी और मानव शिशुओं के कौन-से इशारे एक जैसे हैं? हाथ उठाना, हाथ लहराना, दूसरे के शरीर को पकड़ना, किसी दूसरे को मारना, किसी दूसरे की हथेली तक पहुंचना, पैर पटककर चलना और लयबद्ध ढंग से पैर पटकना, किसी चीज़ को फेंकना, किसी दूसरे के हाथ या उंगली को छूना, वगैरह। ये सब बेतरतीब ढंग से नहीं किए गए थे, इनमें से हरेक क्रिया कोई संदेश और मतलब लिए हुए थी। हालांकि कुछ इशारे सिर्फ मानव शिशु में देखे गए हैं, हमारे पूर्वजों में नहीं। जैसे किसी के स्वागत में या किसी को विदा कहने के लिए हाथ हिलाना। यह भी देखा गया कि मानव शिशु ने चिम्पैंज़ी से ज़्यादा बार चीज़ों की ओर इंगित किया। किंतु फिर भी मानव शिशु और चिम्पैंज़ियों में 89 प्रतिशत हावभाव या इशारे एक समान होना उनके साझा वैकासिक इतिहास का गवाह है।

जैसा कि नेचर वर्ल्ड न्यूज़ नामक अपने कॉलम में नेइया कार्लोस ने लिखा है, शोधकर्ताओं ने इसके बाद एक बड़े समूह के साथ अध्ययन करने का सुझाव दिया है, जिसमें बोनोबो जैसी प्रजातियों को शामिल किया जाए जिनके बारे में माना जाता है कि वे मानव के और भी अधिक करीब हैं। ऐसा लगता है कि हमारे हाव-भाव और भाषा हमें हमारे पूर्वजों से मिली है, और शायद डीएनए का प्रभाव क्षेत्र मात्र शरीर की रासायनिक क्रियाओं के विकास से आगे संप्रेषण व भाषा के विकास तक फैला हुआ है। (स्रोत फीचर्स)

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चावल की भूसी से लकड़ी

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे चावल की भूसी से लकड़ी बनाई जा सकती है। इससे अब लकड़ी के लिए पेड़ काटना ज़रूरी नहीं होगा। साथ ही किसानों को धान के साथ भूसी के भी दाम मिलेंगे। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, रुड़की के निदेशक एन. गोपाल कृष्णन के अनुसार उनके संस्थान ने धान की भूसी तथा देवदार के कांटों से लकड़ी बनाने की तकनीक विकसित की है। इससे किसानों को भी काफी फायदा होगा तथा लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई भी कम हो सकेगी। देवदार के कांटे जंगल में गिरकर यूं ही पड़े रहते हैं। इनसे जंगल में आग लगने की आशंका रहती है। इनसे लकड़ी तैयार करने से पेड़ बचाने के साथ जंगल में आग लगने की समस्या भी कम की जा सकेगी। भूसी को लकड़ी में बदलने के लिए पहले से बने खांचे में उच्च दाब की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक से बनी लकड़ी को बढ़ई आम लकड़ी की तरह हर प्रकार का आकार दे सकते हैं। और इनसे चौखट, तख्ते, बेंच आदि बनाए जा सकते हैं और फ्लोरिंग के लिए इनका उपयोग किया जा सकता है। यह लकड़ी नेशनल बिल्डिंग कोड के सभी मानकों पर खरी उतरी है। इसके अलावा यह दीमक प्रतिरोधी भी है। (स्रोत फीचर्स)

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सेल्फी एलर्ट ऐप देगा जानलेवा सेल्फी की चेतावनी

सेल्फी लेना अब संक्रामक बीमारी बनती जा रही है। सेल्फी के कारण काफी मौतें हो रही हैं। इससे बचाव के लिए अमेरिका व भारत के वैज्ञानिक एक सेल्फी एलर्ट ऐप तैयार कर रहे हैं, जो खतरनाक पोज़ देने वालों को चेतावनी देगा कि इससे मौत हो सकती है। पेनसिल्वेनिया, अमेरिका के पिट्सबर्ग में कारनेगी मेलन विश्वविद्यालय में शोध कर रहे हेमनाक लांबा यह ऐप बना रहे हैं। वहीं दिल्ली के इंद्रप्रस्थ सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रोफेसर पोन्नुरंगम कुमारगुरू भी कुछ इसी तरह के ऐप पर काम कर रहे हैं। सेल्फी के दौरान अब तक सबसे अधिक मौतें भारत में ही हुई हैं और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।

हेमनाक लांबा बताते हैं कि उनकी टीम ने इसके लिए एक एल्गोरिदम विकसित की है, जो आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर लोगों को यह बता सकेगी कि कौन-सा स्थान खतरनाक है? इस ऐप के माध्यम से खतरनाक स्थानों पर सेल्फी के लिए पहुंचने वालों के मोबाइल फोन से घंटी बज जाएगी, जिससे यह पता चल जाएगा कि जहां वे पहुंचने वाले हैं वह स्थान खतरनाक है। टीम का दावा है कि देश, समय और परिस्थिति के आधार पर खतरनाक सेल्फी की पहचान और एलर्ट से सम्बंधित शोधों में 70 प्रतिशत से अधिक सफलता मिली है और शीघ्र ही वे इस ऐप को लॉन्च कर सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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प्राकृतिक तटरक्षक: मैंग्रोव वन – डॉ. दीपक कोहली

मैंग्रोव सामान्यत: ऐसे पेड़-पौधे होते हैं, जो तटीय क्षेत्रों में खारे पानी में पाए जाते हैं। ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनस्पतियों को तटीय वनस्पतियां अथवा कच्छीय वनस्पतियां भी कहा जाता है। ये वनस्पतियां समुद्र तटों पर, नदियों के मुहानों व ज्वार प्रभावित क्षेत्रों में पाई जाती हैं। विषुवत रेखा के आसपास के क्षेत्रों में जहां जलवायु गर्म तथा नम होती है, वहां मैंग्रोव वन की लगभग सभी प्रजातियां पाई जाती हैं।

पृथ्वी पर इस प्रकार के मैंग्रोव वनों का विस्तार एक लाख वर्ग किलोमीटर में है। मैंग्रोव वन मुख्य रूप से ब्राज़ील (25,000 वर्ग किलोमीटर), इंडोनेशिया (21,000 वर्ग किलोमीटर) और ऑस्ट्रेलिया (11,000 वर्ग किलोमीटर) में है। भारत में 6,740 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर इस प्रकार के वन फैले हुए हैं। यह विश्व भर में विद्यमान मैंग्रोव वनों का 7 प्रतिशत है। इन वनों में 50 से भी अधिक जातियों के मैंग्रोव वृक्ष पाए जाते हैं। मैंग्रोव वनों का 82 प्रतिशत देश के पश्चिमी भागों में पाया जाता है।

मैंग्रोव वृक्षों के बीजों का अंकुरण एवं विकास पेड़ पर लगे-लगे ही होता है। जब समुद्र में ज्वार आता है और पानी ज़मीन की ओर फैलता है, तब कुछ अंकुरित बीज पानी के बहाव से टूटकर गिर जाते हैं और पानी के साथ बहने लगते हैं। ज्वार के उतरने पर ये जमीन पर यहां-वहां जम जाते हैं और आगे विकसित होते हैं। इसी कारण इन्हें जरायुज (या पिंडज) कहते हैं, यानी सीधे संतान उत्पन्न करने वाले।

चूंकि ये पौधे लवणीय पानी में रहते हैं, इसलिए उनके लिए यह आवश्यक होता है कि इस पानी में मौजूद लवण उनके शरीर में एकत्र न होने लगें। इन वृक्षों की जड़ों एवं पत्तियों पर खास तरह की लवण ग्रंथियां होती हैं, जिनसे लवण निरंतर घुलित रूप में निकलता रहता है। वर्षा का पानी इस लवण को बहा ले जाता है। इन पेड़ों की एक अन्य विशेषता उनकी श्वसन जड़ें हैं। पानी में ऑक्सीजन की कमी के कारण इन पेड़ों की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। इस समस्या से निपटने के लिए उनमें विशेष प्रकार की जड़ें होती हैं, जो सामान्य जड़ों के विपरीत ज़मीन से ऊपर निकल आती हैं। इनमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनकी सहायता से ये हवा ग्रहण करके उसे नीचे की जड़ों को पहुंचाती हैं। इन जड़ों को श्वसन मूल कहा जाता है।

इन श्वसन मूलों का दूसरा कार्य दलदली भूमि में इन वृक्षों को स्थिरता प्रदान करना भी है। मैंग्रोव पौधों के तनों के केन्द्र में कठोर लकड़ी नहीं पाई जाती है। इसके स्थान पर पतली नलिकाएं होती हैं जो पूरे तने में फैली रहती हैं। इस कारण मैंग्रोव पौधे बाहरी छाल तथा तने को होने वाली क्षति को सहन नहीं कर सकते हैं। इन पौधों में पाई जाने वाली वायवीय जड़ें कई रूप ले सकती हैं। ऐविसेनिया जैसी प्रजाति के पौधों में ये जड़ें छोटी तथा तार जैसी होती हैं जो तने से निकलकर चारों ओर फैली होती हैं। ये जड़ें भूमि तक पहुंचकर पौधों को सहारा देती हैं।

मैंग्रोव वृक्षों में जल संरक्षण की क्षमता भी पाई जाती है। वाष्पोत्सर्जन द्वारा पानी के उत्सर्जन को रोकने के लिए इन पौधों में मोटी चिकनी पत्तियां होती हैं। पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले रोम पत्ती के चारों ओर वायु की एक परत को बनाए रखते हैं। ये पौधे रसदार पत्तियों में पानी संचित कर सकते हैं। ये सभी विशेषताएं इन्हें प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने योग्य बनाती हैं।

विश्व में चार मुख्य प्रकार के मैंग्रोव वृक्ष पाए जाते हैं – लाल मैंग्रोव, काले मैंग्रोव, सफेद मैंग्रोव और बटनवुड मैंग्रोव। लाल मैंग्रोव वनस्पति की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जो बहुत अधिक खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखते हैं तथा समुद्र के नज़दीक उगते हैं। राइज़ोफोरा प्रजाति के वृक्ष इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

काली मैंग्रोव वनस्पति की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जिनकी खारे पानी को सहने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। ब्रुगेरिया प्रजाति के वृक्ष इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

सफेद मैंग्रोव वनस्पति का नाम इनकी चिकनी सफेद छाल के कारण पड़ा है। इन पौधों को इनकी जड़ों तथा पत्तियों की विशेष प्रकार की बनावट के कारण अलग से पहचाना जा सकता है। ऐविसेनिया प्रजाति के पौधे इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

बटनवुड मैंग्रोव पौधे झाड़ी के आकार के होते हैं तथा इनका यह नाम इनके लाल-भूरे रंग के तिकोने फलों के कारण है। कोनोकार्पस प्रजाति के पौधे इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

भारत में मैंग्रोव वनों का 59 प्रतिशत पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी), 23 प्रतिशत पश्चिमी तट (अरब सागर) तथा 18 प्रतिशत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है। भारतीय मैंग्रोव वनस्पतियां मुख्यत: तीन प्रकार के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती है – डेल्टा, बैकवॉटर व नदी मुहाने तथा द्वीपीय क्षेत्र। डेल्टा क्षेत्र में उगने वाले मैंग्रोव  मुख्यत: पूर्वी तट पर (बंगाल की खाड़ी में) पाए जाते हैं जहां गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसी बड़ी नदियां विशाल डेल्टा क्षेत्रों का निर्माण करती हैं। नदी मुहानों पर उगने वाली मैंग्रोव वनस्पति मुख्यत: पश्चिमी तट पर पाई जाती हैं जहां सिन्धु, नर्मदा, ताप्ती जैसी प्रमुख नदियां कीप के आकार के मुहानों का निर्माण करती हैं। द्वीपीय मैंग्रोव द्वीपों में पाए जाते हैं जहां छोटी नदियों, ज्वारीय क्षेत्रों तथा खारे पानी की झीलों में उगने के लिए आदर्श परिस्थितियां उपस्थित होती हैं।

भारत में विश्व के कुछ प्रसिद्ध मैंग्रोव क्षेत्र पाए जाते हैं। सुन्दरवन विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है। इसका कुछ भाग भारत में तथा कुछ बांग्लादेश में है। सुन्दरवन का भारत में आने वाला क्षेत्र गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के डेल्टा क्षेत्रों के पश्चिमी भाग में है। इन नदियों द्वारा ताज़े पानी की लगातार आपूर्ति के कारण वन क्षेत्र में तथा समुद्र के नज़दीक पानी में खारापन समुद्र की अपेक्षा सदैव कम रहता है। उड़ीसा तट पर स्थित महानदी डेल्टा का निर्माण महानदी, ब्रह्मणी तथा वैतरणी नदियों द्वारा होता है। ताज़े पानी की आपूर्ति के कारण यहां भी जैव विविधता तथा पौधों का घनत्व सुन्दरवन जैसा ही है। गोदावरी मैंग्रोव क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) गोदावरी नदी के डेल्टा में स्थित है। कृष्णा डेल्टा में भी मैंग्रोव वनस्पतियां पाई जाती हैं। तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा में पिचावरम और मुथुपेट मैंग्रोव वन स्थित हैं।

मनुष्य द्वारा मैंग्रोव वनों का प्रयोग कई तरह से किया जाता है। स्थानीय निवासियों द्वारा इनका उपयोग भोजन, औषधि, टैनिन, ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिए किया जाता रहा है। तटीय इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जीवनयापन का साधन इन वनों से प्राप्त होता है तथा ये उनकी पारम्परिक संस्कृति को जीवित रखते हैं। मैंग्रोव वन धरती व समुद्र के बीच एक अवरोधक बफर की तरह कार्य करते हैं तथा समुद्री प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा करते हैं। ये तटीय क्षेत्रों में तलछट के कारण होने वाले जान-माल के नुकसान को रोकते हैं।

मैंग्रोव उस क्षेत्र में पाई जाने वाली कई जंतु प्रजातियों को शरण उपलब्ध कराते हैं। अनेक प्रकार के शैवालों तथा मछलियों द्वारा जड़ों का उपयोग आश्रय के लिए होता है। मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र मत्स्य उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण है। मछली तथा शंखमीन (शेल फिश) की बहुत सी प्रजातियों के लिए मैंग्रोव प्रजनन स्थल तथा संवर्धन ग्रह की तरह कार्य करते हैं। मछलियों के अतिरिक्त मैंग्रोव वनों में अन्य जीव-जंतु भी पाए जाते हैं। जैसे, बाघ (बंगाल टाइगर), मगरमच्छ, हिरन, फिशिंग कैट तथा पक्षी। डॉल्फिन, मैंग्रोव-बंदर, ऊदबिलाव आदि मैंग्रोव से सम्बद्ध अन्य जीव हैं।                                                      

बंदर, केकड़े तथा अन्य जीव जंतु मैंग्रोव की पत्तियां खाते हैं। उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थों को जीवाणुओं द्वारा उपयोगी तत्वों में अपघटित कर दिया जाता है।

मैंग्रोव वृक्ष पानी से कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों तथा मिट्टी के कणों को अलग कर देते हैं जिससे पानी साफ होता है तथा उसमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है। यह अन्य सम्बद्ध इकोसिस्टम्स के लिए लाभप्रद है। मैंग्रोव क्षेत्रों में प्रवाल भित्तियां, समुद्री शैवाल तथा समुद्री घास अच्छी तरह पनपती हैं।

मैंग्रोव पौधों में सूर्य की तीव्र किरणों तथा पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव की क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, ऐविसीनिया प्रजाति के मैंग्रोव पौधे गर्म तथा शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में उगते हैं जहां पर सूर्य की प्रखर किरणें प्रचुर मात्रा में पहुंचती हैं। यह प्रजाति शुष्क जलवायु के लिए भलीभांति अनुकूलित है। राइज़ोफोरा प्रजाति के पौधे अन्य मैंग्रोव पौधों की अपेक्षा अधिक पराबैंगनी-बी किरणों को सहन कर सकते हैं। मैंग्रोव पौधों की पत्तियों में फ्लेवोनाइड होता है जो पराबैंगनी किरणों को रोकने का कार्य करता है।

मैंग्रोव वृक्षों की जड़ें ज्वार तथा तेज़ जल-धाराओं द्वारा होने वाले मिट्टी के कटाव को कम करती हैं। मैंग्रोव वृक्ष धीरे-धीरे मिट्टी को भेदकर तथा उसमें हवा पहुंचाकर उसे पुनर्जीवित करते हैं। जैसे-जैसे दलदली मिट्टी की दशा सुधरती है, उसमें दूसरे पौधे भी उगने लगते हैं जिससे तूफान तथा चक्रवात के समय क्षति कम होती है। चक्रवात तटीय क्षेत्रों पर बहुत तीव्र गति से टकराते हैं और तट जलमग्न हो जाते हैं जिससे तटों पर रहने वाले जीव-जंतुओं की भारी हानि होती है। राइज़ोफोरा जैसी कुछ मैंग्रोव प्रजातियां इन प्राकृतिक आपदाओं के विरूद्ध ढाल का काम करती हैं।

मैंग्रोव वनों की सुरक्षात्मक भूमिका का सबसे अच्छा उदाहरण 1999 में उड़ीसा तट पर आए चक्रवात के समय देखने को मिला था। इस चक्रवात ने मैंग्रोव रहित क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी जबकि उन क्षेत्रों में नुकसान नगण्य था जहां मैंग्रोव वृक्षों की संख्या अधिक थी। सदियों से समुद्री तूफानों और तेज़ हवाओं का सामना करते आ रहे मैंग्रोव वन आज मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण खतरे में हैं। लेकिन हाल के वर्षों की घटनाओं ने मनुष्य को मैंग्रोव वनों के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचने पर विवश किया है।

सन 2004 में तटीय क्षेत्रों में सुनामी से हुई भयंकर तबाही से वे क्षेत्र बच गए जहां मैंग्रोव वन इन लहरों के सामने एक ढाल की तरह खड़े थे। उस समय इन वनों ने हज़ारों लोगों की रक्षा की। इस घटना के बाद तटीय क्षेत्र के गांवों में रहने वाले लोगों ने मैंग्रोव वनों को संरक्षण देने का निश्चय किया।

मैंग्रोव वनों का औषधीय उपयोग भी है। मैंग्रोव पौधों की प्रजातियों का उपयोग सर्पदंश, चर्मरोग, पेचिश तथा मूत्र सम्बंधी रोगों के उपचार के लिए तथा रक्त शोधक के रूप में किया जाता है। स्थानीय मछुआरे ऐविसीनिया ऑफिसिनेलिस की पत्तियों को उबालकर उनके रस का उपयोग पेट तथा मूत्र सम्बंधी रोगों के उपचार के लिए करते हैं।

इस प्रकार देखें तो मैंग्रोव कई प्रकार से उपयोगी हैं। सौभाग्य से पिछले कुछ समय में मैंग्रोव वनों में लोगों की रुचि जाग्रत हुई है। मानव सभ्यता के तथाकथित विकास के कारण अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों की तरह मैंग्रोव क्षेत्रों के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया है। तटीय इलाकों में बढ़ते औद्योगीकरण तथा घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों को समुद्र में छोड़े जाने से इन क्षेत्रों में प्रदूषण फैल रहा है। मैंग्रोव वनों के संरक्षण के लिए आवश्यक है इन पारिस्थितिकी तंत्रों का बारीकी से अध्ययन किया जाए।

तटवर्ती क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों के विकास के कई कार्यक्रम आरम्भ किए गए हैं। भारत में भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। तमिलनाडु के पिचावरम क्षेत्र में मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिए इन्हें हरित-पट्टिका के रूप में लगाने का वृहत अभियान चलाया गया जिससे क्षेत्र में मैंग्रोव वनों की सघनता बढ़ी है। मैंग्रोव वनों का उचित प्रकार से संरक्षण एवं संवर्धन समय की मांग है। तभी तो हम आने वाली पीढि़यों को समृद्ध मैंग्रोव वन विरासत में दे पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

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क्या युवा खून पार्किंसन रोग से निपट सकता है?

चूहों पर किए गए अध्ययनों से पता चल चुका है कि यदि बूढ़े चूहों को युवा चूहों का खून दिया जाए, तो उनके मस्तिष्क में नई कोशिकाएं बनने लगती हैं और उनकी याददाश्त बेहतर हो जाती है। वे संज्ञान सम्बंधी कार्यों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। स्टेनफोर्ड के टोनी वाइस-कोरे द्वारा किए गए परीक्षणों से यह भी पता चल चुका है कि युवा खून का एक ही हिस्सा इस संदर्भ में प्रभावी होता है। खून के इस हिस्से को प्लाज़्मा कहते हैं।

उपरोक्त परिणामों के मद्दे नज़र वाइस-कोरे अब मनुष्यों में युवा खून के असर का परीक्षण कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि खून के प्लाज़्मा नामक अंश में तकरीबन 1000 प्रोटीन्स पाए जाते हैं और वाइस-कोरे यह पता करना चाहते हैं कि इनमें से कौन-सा प्रोटीन प्रभावी है। सामान्य संज्ञान क्षमता के अलावा वाइस-कोरे की टीम यह भी देखना चाहती है कि क्या पार्किंसन रोग में इस तकनीक से कोई लाभ मिल सकता है।

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले परिवर्तनों में से कई का सम्बंध रक्त से है। उम्र के साथ खून में लाल रक्त कोशिकाओं और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या घटने लगती है। सफेद रक्त कोशिकाएं हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग हैं। अस्थि मज्जा कम लाल रक्त कोशिकाएं बनाने लगती है। अबतक किए गए प्रयोगों से लगता है कि युवा खून इन परिवर्तनों को धीमा कर सकता है।

वाइस-कोरे जो परीक्षण करने जा रहे हैं उसमें प्लाज़्मा के प्रोटीन्स को अलग-अलग करके एक-एक का प्रभाव आंकना होगा। यह काफी श्रमसाध्य होगा। एक प्रमुख दिक्कत यह है कि इतनी मात्रा में युवा खून मिलने में समस्या है। उनकी टीम ने 90 पार्किंसन मरीज़ों को शामिल कर लिया है और पहले मरीज़ को युवा खून का इंजेक्शन दे भी दिया गया है। उम्मीद है कि वे खून के प्रभावी अंश को पहचानने में सफल होंगे। इसके बाद कोशिश होगी कि इस अंश को प्रयोगशाला में संश्लेषित करके उसके परीक्षण किए जाएं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चीनी यान चांद के दूरस्थ हिस्से पर उतरा

ह एक रोचक तथ्य है कि चांद का एक ही हिस्सा हमेशा पृथ्वी की ओर रहता है। दूसरे वाले हिस्से पर आज तक कोई अंतरिक्ष यान नहीं उतरा है। इसे हम सिर्फ चांद की परिक्रमा करते उपग्रहों के ज़रिए ही देख पाए हैं मगर अब चीनी राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (सीएनएसए) का यान चांग-4 चांद के उस हिस्से पर उतर चुका है।

7 दिसंबर को प्रक्षेपित चांग-4 यान के साथ-साथ एक और यान छोड़ा गया था जो चांद की परिक्रमा करता रहेगा। पृथ्वी से चांग-4 का संपर्क इसी परिक्रमा करते यान के ज़रिए होगा क्योंकि चांद का वह हिस्सा कभी पृथ्वी से मुखातिब नहीं होता। वास्तव में चांग-4 को चांद की धरती पर अवतरण स्वचालित ढंग से करना पड़ा था क्योंकि वहां उसे निर्देशित करने के लिए पृथ्वी से संदेश भेजना असंभव था। बहरहाल, चांग-4 ने 3 जनवरी के दिन चांद के एक विशाल गड्ढे में सफलतापूर्वक लैंडिंग किया। इस गड्ढे का नाम साउथ पोल-ऐटकिन घाटी है।

यह गड्ढा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि चांद के निर्माण के शुरुआती वर्षों में यहां एक विशाल उल्का टकराई थी। संभावना यह है कि उस टक्कर के कारण चांद की गहराई में से कुछ चट्टानें सतह पर उभर आई होंगी। चांग-4 इन चट्टानों का अध्ययन कर सकेगा जिसकी मदद से चांद के अतीत का खुलासा करने में मदद मिलेगी।

इस मिशन का एक उद्देश्य भविष्य की चांद-यात्राओं के लिए धरातल तैयार करना भी है। शोधकर्ताओं की योजना है कि चांद की दूरस्थ सतह पर रेडियो दूरबीन स्थापित की जाए। इसका फाय़दा यह होगा कि उस दूरबीन को पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले रेडियो तरंग प्रदूषण का सामना नहीं करना पड़ेगा।

चांग-4 पर एक जैव-मंडल भी सवार है। इसमें आलू के बीज, पत्ता गोभी सरीखा एक पौधा और रेशम के कीड़े की इल्लियां शामिल हैं। शोधकर्ता यह देखना चाहते हैं कि क्या ये जीव चांद पर एक सीलबंद डिब्बे में जीवित रह पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंग प्रत्यारोपण के साथ एलर्जी भी मिली

दि आप जानते हैं कि आपको किसी तरह के खाने से कोई परेशानी या एलर्जी नहीं है तो आप बेफिक्र होकर वह चीज़ खाते हैं। ऐसा सोचकर ही एक महिला ने हमेशा की तरह पीनट-बटर-जैम सैंडविच खाया। मगर इस बार उसे भयानक एलर्जी हो गई। ट्रासंप्लांटेशन प्रोसिडिंग्स पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक यह एलर्जी महिला को जिस व्यक्ति का अंग प्रत्यारोपित किया गया, उससे मिली है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के फेफड़ा और क्रिटिकल केयर मेडिसिन के फेलो मज़ेन ओडिश के मुताबिक 68 वर्षीय महिला एंफेसिमा से पीड़ित थी। (एंफेसिमा में फेफड़ो के वायुकोश क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और सांस लेने में कठिनाई होती है।) इसी के इलाज में, एक अन्य व्यक्ति का एक फेफड़ा महिला के शरीर में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया था। लेकिन अचानक एक दिन महिला को सीने में जकड़न महसूस होने लगी और उन्हें सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। महिला के अनुसार उन्हें यह दिक्कत पीनट-बटर-जैम सैंडविंच खाने के बाद शुरू हुई। लेकिन महिला में फूड एलर्जी के अन्य कोई लक्षण (रेशेस या पेटदर्द) दिखाई नहीं दे रहे थे। चूंकि महिला को पहले कभी यह समस्या नहीं हुई थी इसलिए डॉक्टर ने जिस व्यक्ति का फेफड़ा महिला के शरीर में लगाया था, उसकी एलर्जी के बारे में जानकारी ली। पता चला कि उस व्यक्ति को मूंगफली से एलर्जी है। ओडिश का कहना है कि फेफड़े के साथ-साथ एलर्जी भी महिला को मिल गई थी।

हालांकि यह बहुत कम होता है कि अंग के साथ-साथ अंग दान करने वाले की एलर्जी भी अंग प्राप्तकर्ता में हस्तांतरित हो जाए। मगर लिवर, किडनी, फेफड़े, अस्थि मज्जा, ह्रदय के प्रत्यारोपण के मामलों में ऐसा देखा गया है कि अंगदान करने वाले की फूड एलर्जी अंग प्राप्तकर्ता में हस्तांतरित हुई है।

एक अन्य शोध के मुताबिक अंग प्रत्यारोपण के दौरान फूड एलर्जी उन मामलों में हस्तांतरित होती है जिनमें अंग प्राप्तकर्ता को टैक्रोलिमस नामक औषधि दी गई हो। दरअसल शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली किसी भी बाहरी चीज़ को नष्ट कर देती है। अंग प्रत्यारोपण के बाद प्रतिरक्षा प्रणाली प्रत्यारोपित अंग को बाहरी समझ कर उसे नष्ट न कर दे, इसके लिए टैक्रोलिमस औषधि दी जाती है। इस महिला को भी टेक्रोलिमस औषधि दी गई थी।

आगे की जांच में इस बात की पुष्टि भी हुई कि महिला को मूंगफली के अलावा काजू-बादाम, अखरोट और नारियल से भी एलर्जी भी हो गई है। ओडिश का कहना है कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि प्रत्यारोपण के साथ आने वाली एलर्जी ताउम्र रहती है या नहीं। किसी-किसी मामले में समय के साथ एलर्जी खत्म भी हो सकती है। फिलहाल डॉक्टर, महिला की मूंगफली और अन्य गिरियों की एलर्जी की लगातार जांच करेंगे और देखेंगे कि क्या वक्त के साथ स्थिति में कोई बदलाव आता है। (स्रोत फीचर्स)

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जैव-विद्युत संदेश और अंगों का पुनर्जनन

ई जीवों में अपने खोए हुए अंगों को पुन: विकसित करने की क्षमता होती है। कुछ जीव ऐसा अपने जीवन के किसी नियत समय में ही करते हैं। इस विषय पर हुए अब तक के अध्ययन बताते हैं कि ज़ीनोपस मेंढक और अन्य उभयचर जीवों में अंग पुनर्जनन में, अंग-विच्छेदन की जगह पर उत्पन्न जैव-विद्युत संदेशों की भूमिका होती है। लेकिन हालिया अध्ययन दर्शाते हैं कि अंग पुनर्जनन में ये जैव-विद्युत संदेश अंग-विच्छेद के स्थान से काफी दूर-दूर तक पहुंचते हैं।

इस बात की पुष्टि करने के लिए शोधकर्ताओं ने मेंढक के टेडपोल का अध्ययन किया। उन्होने टेडपोल को फ्लोरोसेंट रंग में भीगोकर रखा ताकि शरीर में जैव-विद्युत संदेशों पर नज़र रखी जा सके। इसके बाद उन्होंने टेडपोल को बेहोश किया और उसका दायां पिछला पंजा काटकर अलग कर दिया। जैसे ही पंजा शरीर से अलग किया गया वैसे ही विपरीत पैर के पंजे से भी घाव होने के संदेश उत्पन्न हुए। जब सिर्फ पंजा अलग किया गया तो दूसरे पैर के पंजे में संदेश मिले। जब पूरा पैर अलग किया गया तो दूसरे पैर के ऊपरी भाग में संदेश पैदा हुए। लेविन का कहना है कि इन संदेशों को देखकर यह बताया जा सकता है कि कौन-सा अंग काटा गया है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के आणविक जीव विज्ञानी एन्ड्रयू हैमिल्टन का कहना है कि यह अध्ययन काफी अच्छा है। इसके अगले चरण में, मेंढकों की तंत्रिकाओं को अवरुद्ध करके यह पता करने की कोशिश की जा सकती है कि ये संकेत कैसे फैलते हैं।

शोधकर्ता फिलहाल अंग के पुनर्जनन में क्षति के जैव-विद्युतीय प्रतिबिंब निर्माण की भूमिका को समझना चाहते हैं। इसके लिए वे एक पैर काटेंगे और दूसरे पैर में वोल्टेज में बदलाव करेंगे, और इस बात पर नज़र रखेंगे कि अंग पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में कोई बदलाव होता है या नहीं। (स्रोत फीचर्स)

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नए वर्ष में धरती की रक्षा से जुड़ें – भारत डोगरा

ए वर्ष का समय मित्रों व प्रियजनों को शुभकामनाएं देने का समय है। इसके साथ यह जीवन में अधिक सार्थकता के लिए सोचते-समझने का भी समय है क्योंकि एक नया वर्ष अपनी तमाम संभावनाओं के साथ हमारे सामने है।

इस सार्थकता की खोज करें तो स्पष्ट है कि धरती की गंभीर व बड़ी समस्याओं के समाधान से जुड़ने में ही सबसे बड़ी सार्थकता है। इस समय समस्याएं तो बहुत हैं, पर संभवत: सबसे बड़ी व गंभीर समस्या यह है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में है।

वर्ष 1992 में विश्व के 1575 वैज्ञानिकों (जिनमें उस समय जीवित नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) ने एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की ज़रूरत है अन्यथा दुख-दर्द बहुत बढ़ेंगे और हम सबका घर – यह पृथ्वी – इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा।”

इन वैज्ञानिकों ने आगे कहा था कि तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों, सभी पर पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं। मनुष्य की वर्तमान जीवन पद्धति शैली के कई तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही कठिन हो जाए।

इस चेतावनी के 25 वर्ष पूरा होने पर अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में फिर एक नई चेतावनी जारी की। इस चेतावनी पर कहीं अधिक वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया है कि वर्ष 1992 में जो चिंता के बिंदु गिनाए गए थे उनमें से अधिकांश पर अभी तक समुचित कार्रवाई नहीं हुई है व कई मामलों में स्थितियां पहले से और बिगड़ गई हैं।

इससे पहले एमआईटी द्वारा प्रकाशित चर्चित अध्ययन ‘इम्पेरिल्ड प्लैनेट’(संकटग्रस्त ग्रह) में एडवर्ड गोल्डस्मिथ व उनके साथी पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा था कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता सदा ऐसी ही बनी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस रिपोर्ट में बताया गया सबसे बड़ा खतरा यही है कि हम उन प्रक्रियाओं को ही अस्त-व्यस्त कर रहे हैं जिनसे धरती की जीवनदायिनी क्षमता बनती है।

स्टॉकहोम रेसिलिएंस सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसंधान ने हाल के समय में धरती के सबसे बड़े संकटों की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है। यह अनुसंधान बहुत चर्चित रहा है। इस अनुसंधान में धरती पर जीवन की सुरक्षा के लिए नौ विशिष्ट सीमा-रेखाओं की पहचान की गई है जिनका अतिक्रमण मनुष्य को नहीं करना चाहिए। गहरी चिंता की बात है कि इन नौ में से तीन सीमाओं का अतिक्रमण आरंभ हो चुका है। ये तीन सीमाएं है – जलवायु बदलाव, जैव-विविधता का ह्यास व भूमंडलीय नाइट्रोजन चक्र में बदलाव।

इसके अतिरिक्त चार अन्य सीमाएं ऐसी हैं जिनका अतिक्रमण होने की संभावना निकट भविष्य में है। ये चार क्षेत्र हैं – भूमंडलीय फॉस्फोरस चक्र, भूमंडलीय जल उपयोग, समुद्रों का अम्लीकरण व भूमंडलीय स्तर पर भूमि उपयोग में बदलाव।

इस अनुसंधान में सामने आ रहा है कि इन अति संवेदनशील क्षेत्रों में कोई सीमा-रेखा एक ‘टिपिंग पॉइंट’ (यानी डगमगाने के बिंदु) के आगे पहुंच गई तो अचानक बड़े पर्यावरणीय बदलाव हो सकते हैं। ये बदलाव ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें सीमा-रेखा पार होने के बाद रोका न जा सकेगा या पहले की जीवन पनपाने वाली स्थिति में लौटाया न जा सकेगा। वैज्ञानिकों की तकनीकी भाषा में, ये बदलाव शायद रिवर्सिबल यानी उत्क्रमणीय न हो।

इन चिंताजनक स्थितियों को देखते हुए बहुत ज़रूरी है कि अधिक से अधिक लोग इन समस्याओं के समाधान से जुड़ें। इसके लिए इन समस्याओं की सही जानकारी लोगों तक ले जाना बहुत ज़रूरी है। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों व विज्ञान की अच्छी जानकारी रखने वाले नागरिकों की भूमिका व विज्ञान मीडिया की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। जन साधारण को इन गंभीर समस्याओं के समाधान से जोड़ने के लिए पहला ज़रूरी कदम यह है कि उन तक इन गंभीर समस्याओं व उनके समाधानों की सही जानकारी पंहुचे।

नए वर्ष के आगमन का समय इन बड़ी चुनौतियों को ध्यान में रखने, इन पर सोचने-विचारने का समय भी है ताकि नए वर्ष में इन गंभीर समस्याओं के समाधान से जुड़कर अपने जीवन में अधिक सार्थकता ला सकें। (स्रोत फीचर्स)

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