हम इंसान हर दिन चलने वाले उजाले (दिन) और अंधेरे (रात) के चक्र से प्रभावित होते हैं। हमारे शरीर में लगभग 24 घंटे की (सर्केडियन घड़ी या जैविक घड़ी की) लय होती है जो हार्मोन स्राव जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं का रूप ले लेती है, और उनके माध्यम से हमारे क्रियाकलापों का संचालन करती है।
परिवेश के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए, और सही समय पर सही काम करने के लिए सूर्य की रोशनी हमारे लिए एक अलार्म घड़ी की तरह काम करती है। प्रकाश के साथ यह समन्वय (फोटोएनट्रेनमेंट) आंखों से आने वाले प्रकाश संकेतों द्वारा मस्तिष्क में होता है।
कई अन्य प्रजातियां भी अपनी दिनचर्या शुरू करने का संकेत पाने के लिए प्रकाश पर निर्भर होती हैं। जब ये प्रकाश पैटर्न बाधित होते हैं, तो उनकी प्राकृतिक लय (घड़ी) और व्यवहार गड़बड़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए, मालदीव में पर्यटन संचालक रात को पर्यटकों को नावों में भरकर सैर के लिए ले जाते हैं, और समुद्र की सतह पर तेज़ रोशनी (लगभग 4000 वॉट) डालते हैं। समुद्र के जीव इसे सुबह समझ बैठते हैं और सुबह जैसी गतिविधियां करने लगते हैं। नतीजतन पर्यटकों को व्हेल शार्क देखने को मिल जाती हैं।
हमें दिखाई देने में हमारे बाहरी रेटिना पर मौजूद प्रकाशग्राही कोशिकाएं, छड़ और शंकु, ज़िम्मेदार हैं। छड़ कोशिकाएं प्रकाश की उपस्थिति के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं लेकिन रंग के प्रति संवेदनशील नहीं होती हैं, और इसलिए ये मंद प्रकाश में सबसे उपयोगी होती हैं; दूसरी ओर शंकु कोशिकाएं उजले प्रकाश में सबसे अच्छा काम करती हैं, इनकी मदद से हम रंगों को देख पाते हैं। छड़ और शंकु कोशिकाएं प्रकाश फोटॉन्स को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करती हैं, जो रेटिना की गैंगलियन कोशिकाओं को भेजे जाते हैं। गैंगलियन कोशिकाएं रेटिना से प्राप्त सूचना को प्रोसेस करती हैं और इसे मस्तिष्क को भेज देती हैं।
प्रकाशसंवेदीकोशिकाएं
लगभग 20 साल पहले प्रकाश को महसूस कर सकने वाली कोशिकाओं का एक नया समूह आंतरिक रेटिना में खोजा गया था। इन्हें इंट्रिंसिकली फोटोसेंसिटिव रेटिनल गैंगलियन कोशिकाएं (ipRGC) कहा गया। इनके अन्य नाम हैं फोटोसेंसिटिव गैंगलियन कोशिकाएं और मेलेनॉप्सिन युक्त रेटिनल गैंगलियन कोशिकाएं। ipRGC कोशिकाओं में एक प्रकाश संवेदी रंजक, मेलानॉप्सिन, होता है जो इन कोशिकाओं को सीधे प्रकाश पर प्रतिक्रिया करने में सक्षम बनाता है। ये कोशिकाएं हमारे प्रकाश के साथ दृष्टि से इतर संपर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ipRGC से विद्युत संकेत मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में जाते हैं जो नींद, सतर्कता और मूड के नियमन में शामिल होते हैं। ये संकेत मस्तिष्क के उस क्षेत्र में भी जाते हैं जो आंखों की पुतलियों को नियंत्रित करते हैं, जिससे वे तेज़ रोशनी में सिकुड़ जाती हैं।
और इन सबसे भी महत्वपूर्ण, ये विद्युत संकेत हाइपोथैलेमस के उस हिस्से में भी जाते हैं जो सर्केडियन लय को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के इस हिस्से को लंबे समय से मास्टर घड़ी के रूप में जाना जाता है, जहां आपके शरीर की आंतरिक घड़ी बाहरी दुनिया के दिन-रात के चक्र के साथ तालमेल बिठाती है।
सुबहकेबाशिंदे
सुबह की दिनचर्या की प्राथमिकता उन लोगों की होती है जो जल्दी सोना पसंद करते हैं और जल्दी उठते हैं। यदि आप अपना अधिकतर काम सुबह जल्दी (और दिन के उजाले में) निपटा लेते हैं तो ऐसा करना मोटापे के जोखिम को तो कम करता ही है, साथ ही शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर करता है। कई अध्ययनों से यह भी पता चला है कि जल्दी सोना गंभीर अवसाद विकार के जोखिम को कम रखता है (साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 2021)। स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजी के प्रोफेसर एंड्रयू हुबरमैन ने अपने लोकप्रिय पॉडकास्ट में सर्केडियन घड़ी को रीसेट करने में सुबह-सुबह की धूप (जब सूरज क्षितिज के नज़दीक होता है) के लाभकारी प्रभावों के बारे में बताया है। ipRGC कोशिकाएं नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 480 नैनोमीटर) के प्रति सबसे अधिक प्रतिक्रिया देती हैं। सुबह की रोशनी में पीली की अपेक्षा नीली रोशनी का अनुपात कम होता है। यह बस इतना होता है कि हाइपोथैलेमस को संदेश मिल जाए कि एक और सर्केडियन चक्र की शुरुआत करे। इसके सोलह घंटे बाद आपका शरीर निद्रालु होगा। इसलिए बाहर निकलें और सुबह की रोशनी में नहाएं – चाहे खुली धूप हो या बादलों से छनकर आती धूप (सूरज को सीधे न देखें)। अपनी घड़ी को सूर्योदय के साथ लयबद्ध करने से आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://9253440.fs1.hubspotusercontent-na1.net/hubfs/9253440/woman%20walking%20outside%20in%20orange%20top%20with%20sunlight.jpg
ट्रेन में यात्रा करते समय, पटरियों की लयबद्ध “खट… खट” की ध्वनि एक सुपरिचित अनुभव से कहीं ज़्यादा चतुर इंजीनियरिंग का प्रमाण है। इस्पात से बनी ट्रेन की पटरियां तापमान बढ़ने पर फैलती हैं। करीब 550 मीटर की पटरी में, हर 5.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर एक इंच से अधिक की वृद्धि होती है। परंपरागत रूप से, इस फैलाव को समायोजित करने के लिए, पटरियां 12 से 15 मीटर के टुकड़ों में बिछाई जाती हैं और दो टुकड़ों के बीच छोटे-छोटे खाली स्थान छोड़े जाते हैं। ऐसे में जब भारी रेलगाड़ी पटरी पर से गुज़रती है तो हमको सुनाई देने वाली विशिष्ट आवाज़ (जबलपुरकेदो–दोपैसे या मराठी में कशासाठी, कुणासाठी) पटरियों के बीच इन छोटी जगहों के कारण होती है जिन्हें प्रसार को संभालने के लिए छोड़ा जाता है।
गर्मी बहुत अधिक हो तो पटरियों का प्रसार इन छोटी जगहों को भर देता है। ऐसे में पटरियां मुड़ सकती हैं और लहरदार हो सकती हैं; इसे ‘सन किंक’ कहा जाता है। ये सन किंक ट्रेन संचालन के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं। यदि रेलगाड़ियां ऐसी पटरियों पर चलती हैं तो वे बेपटरी हो सकती हैं, और गंभीर मामलों में सीधी पटरियां अचानक से खतरनाक रूप से मुड़ सकती हैं।
ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए, तापमान बढ़ने की स्थति में रेल सेवाएं ट्रेनों की गति धीमी कर देती हैं। कम गति का मतलब है पटरियों पर यांत्रिक तनाव कम होगा, जिससे बकलिंग की संभावना कम हो जाएगी। उदाहरण के लिए, जब पटरियों का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो अमेरिका में एमट्रैक अपनी ट्रेनों की गति को 128 किलोमीटर प्रति घंटे तक सीमित कर देता है। यह एहतियात हाल की ग्रीष्म लहर के दौरान एमट्रैक के नॉर्थईस्ट कॉरिडोर में हुई देरियों के लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार थी।
इन सावधानियों से यह समझने में मदद मिलती है कि ग्रीष्म लहरें अक्सर ट्रेन की देरी का कारण क्यों बनती हैं। यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और रेलवे के बुनियादी ढांचे को टूट-फूट से बचाने के लिए यह एक आवश्यक कदम है। चूंकि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्रीष्म लहरों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रहे हैं, इसलिए रेल सेवाओं को बढ़ते तापमान से निपटने के लिए और भी कड़े उपाय अपनाने की आवश्यकता होगी।
बहरहाल पटरियों की खट-खट ध्वनि कुछ लोगों के लिए मनमोहक हो सकती है, लेकिन यह भीषण गर्मी के दौरान रेल यात्रा को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक परिष्कृत इंजीनियरिंग की शानदार मिसाल भी है। अगली बार जब आप गर्मियों में ट्रेन में देरी का अनुभव करें, तो याद रखें कि यह आपको सुरक्षित रखने के लिए है। (स्रोत फीचर्स)
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फायब्रोडिसप्लेसिया ओसिफिकेन्स प्रोग्रेसिवा या संक्षेप में FOP का नाम आपने शायद ही सुना हो। सुनेंगे भी कैसे। यह बीमारी दुनिया भर में महज 8000 लोगों को पीड़ित करती है। लेकिन जिन्हें भी डसती है, बहुत तकलीफ पहुंचाती है और अंतत: जान ले लेती है।
FOP नामक इस दुर्लभ बीमारी में शरीर में हड्डियां कहीं भी उग आती हैं, जहां उन्हें नहीं होना चाहिए। जैसे स्नायु में, कंडराओं में और यहां तक कंकाल की मांसपेशियों में भी। दरअसल, होता यह है कि कंकाल की मांसपेशियों और मुलायम संयोजी ऊतकों में कायांतरण होने लगता है और वे हड्डियों में परिवर्तित होने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि हड्डियों के जोड़ सख्त हो जाते हैं और कोई भी हरकत नामुमकिन हो जाती है।
FOP के मरीज़ों में जन्मजात बड़े पंजे होते हैं और बाकी की विकृतियां धीरे-धीरे सामने आती हैं। इसके चलते उनके लिए गर्दन, कंधों, कोहनी, कूल्हों, घुटनों, कलाइयों और जबड़ों की गति असंभव हो जाती है।
यह एक जेनेटिक रोग है जिसमें अस्थि निर्माण में शामिल एक जीन (ACVR1 जिसे ALK2 भी कहते हैं) के नए संस्करण बन जाते हैं। यह जीन एक प्रोटीन (BMP) बनाता है जो भ्रूण में कंकाल के निर्माण तथा जन्म के उपरांत कंकाल की मरम्मत में भूमिका निभाता है।
ज़ाहिर है इतनी दुर्लभ बीमारी का इलाज खोजने में किसी की दिलचस्पी नहीं होगी क्योंकि इस इलाज के ग्राहक ही नहीं होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि कम से कम 13 कंपनियां इस काम में लगी हुई हैं। और उनके प्रयास रंग लाने लगे हैं। पिछले वर्ष यूएस खाद्य व औषधि प्रशासन ने FOP के लिए पहली दवा – पैलोवैरोटीन – को मंज़ूरी दी थी। चार अन्य दवाइयां परीक्षण से गुज़र रही हैं।
लेकिन…एक लेकिन और है। आशंका है कि ये दवाइयां निहायत महंगी होंगी। जैसे पैलोवैरोटीन की सालाना लागत छ: लाख चौबीस हज़ार डॉलर है। एक संभावना यह है कि यह औषधि बीमारी को आगे बढ़ने से रोक देगी और सर्जन यहां-वहां उगी हड्डियों को हटा देंगे।
इस बीमारी पर अध्ययन अनुसंधान का एक कारण तो यही है कि यह इतनी क्रूर बीमारी है। साथ ही शोधकर्ताओं को लगता है कि इसके गहन अध्ययन से हड्डियों के विकास सम्बंधी अन्य विकारों को भी समझ पाएंगे। जैसे पहले तो यह भी पता नहीं था कि यह रोग जेनेटिक है। फिर 2006 में वह जीन पहचाना गया जिसमें उत्परिवर्तन की वजह से यह रोग पैदा होता है: ALK2 नामक प्रोटीन के जीन में उत्परिवर्तन। यह प्रोटीन कई कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। यह पता चल चुका है कि असामान्य ALK2 अति-सक्रिय हो जाता है और इसके द्वारा भेजे गए संदेश से मांसपेशियों की स्टेम कोशिकाएं हड्डियों में बदलने लगती हैं।
बहरहाल, शोधकर्ताओं ने सीधे-सीधे ALK2 पर निशाना न साधते हुए उस अणु को सक्रिय करने का मार्ग चुना जो उपास्थि के निर्माण को रोकता है। उपास्थि हड्डी के निर्माण में पूर्ववर्ती होती है। अंतत: पैलोवैरोटीन हाथ लगी। परीक्षण के दौरान पैलोवैरोटीन लेने वाले मरीज़ों में नई हड्डियों का निर्माण 60 प्रतिशत कम देखा गया। अलबत्ता, इसकी कीमत के अलावा कुछ अन्य समस्याएं भी हैं। एक तो यही है कि पैलोवैरोटीन बीमारी को रोकती नहीं – सिर्फ टालती है। दूसरी समस्या यह है कि यह दवा बच्चों को देने में परेशानी होगी क्योंकि शायद यह उनमें सामान्य हड्डी निर्माण को भी बाधित कर देगी।
रीजेनेरॉन नामक कंपनी ने एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (गैरेटोस्मैब) तैयार की है। इसके परीक्षण के नतीजे तो ठीक-ठाक रहे हैं लेकिन परीक्षण के दौरान 5 मरीज़ों की मृत्यु हो गई थी। जापान के एक समूह ने भी पाया था कि ALK2 जीन का दोषपूर्ण संस्करण एक्टिविन-ए नामक प्रोटीन के असर से अति-सक्रिय हो जाता है। दरअसल, गैरेटोस्मैब एक्टिविन-ए को निष्क्रिय कर देता है। कुछ शोध समूह सीधे-सीधे ALK2 जीन को लक्षित कर रहे हैं। अन्य विकल्पों पर काम चल रहा है लेकिन उनकी अपनी-अपनी दिक्कतें हैं। (स्रोत फीचर्स)
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प्रयोगशाला में विकसित मांस काफी समय से चर्चा में है। लेकिन पर्यावरण और नैतिक लाभों के बावजूद यह मांस पारंपरिक बीफ जैसा स्वाद हासिल करने के लिए जूझता रहा है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने संवर्धित मांस में कुछ परिवर्तन किए हैं जिससे इस मांस को उच्च तापमान पर पकाए जाने पर पारंपरिक बीफ का स्वाद मिलता है। इस सफलता से प्रयोगशाला में विकसित मांस की मांग में वृद्धि की संभावना है।
नेचरकम्युनिकेशंस में प्रकाशित इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने मैलार्ड अभिक्रिया से उत्पन्न यौगिकों का उपयोग किया है – मैलार्ड अभिक्रिया अमीनो अम्लों और अवकारक शर्कराओं के बीच होती है और इससे मेलेनॉइडिन नामक यौगिक बनते हैं। ये पदार्थ गहरा रंग व जायका पैदा करते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में विकसित पशु कोशिकाओं को इन यौगिकों से समृद्ध किया। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप प्रयोगशाला निर्मित मांस में सही रंग और महक पैदा हुए।
गौरतलब है कि पारंपरिक मांस उत्पादन की तुलना में प्रयोगशाला में निर्मित मांस के कई लाभ हैं। यह जीव हत्या को रोकता है और पशुपालन से होने वाले कार्बन पदचिह्न को कम कर सकता है।
पिछले शोध में मांस उत्पादों की बनावट को दोहराने पर ध्यान केंद्रित किया जाता था, लेकिन वर्तमान अध्ययन में यह देखा गया कि पारंपरिक मांस उच्च तापमान पर मैलार्ड अभिक्रिया से गुज़रता है, जिससे परिचित स्वाद और सुगंध पैदा होती है।
इसके मद्देनज़र, सिओल विश्वविद्यालय के मिले ली की टीम ने फरफ्यूरिल मर्कैप्टन युक्त एक यौगिक विकसित किया, जो एक मैलार्ड अभिक्रिया उत्पाद है और पसंदीदा जायके के लिए जाना जाता है। उन्होंने इस यौगिक को मांस के साथ उपयोग करने और 150 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होने तक स्थिर रहने के लिए विकसित किया है। यह जायका तभी मुक्त होता है जब संवर्धित मांस को 150 डिग्री सेल्सियस पर तपाया जाता है।
शोधकर्ताओं ने इस यौगिक को हाइड्रोजेल में डाला, जो स्टेम कोशिकाओं को मांसपेशियों के ऊतकों में विकसित करने के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करता है। एक इलेक्ट्रॉनिक नाक की मदद से टीम ने पाया कि कमरे के तापमान पर मांस का स्वाद थोड़ा कम था लेकिन इसे 150 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने पर मांस की सुगंध पैदा हुई।
आगे के अध्ययनों से पता चला है कि तीन अलग-अलग मैलार्ड उत्पाद मिलाने से स्वाद पारंपरिक बीफ के और भी करीब पहुंच गया। फिलहाल टीम अन्य स्वाद मिश्रणों का पता लगाने और प्रक्रिया की धीमी गति और श्रम-गहनता को कम करने का प्रयास कर रही है।
गोमांस के अलावा अन्य तरह के मांस में स्वाद यौगिकों की जांच भी की जाएगी। इससे संवर्धित मांस की विविधता बढ़ सकती है और उपभोक्ताओं के लिए इसे अधिक आकर्षक बनाया जा सकता है। इससे अधिक टिकाऊ खाद्य उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है। (स्रोत फीचर्स)
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गर्माती दुनिया का एक असर है हिमनदों और बर्फ की चादरों का पिघलना और इसके चलते समुद्र का जलस्तर बढ़ना। एक हालिया अध्ययन का निष्कर्ष है कि विशाल वायरस बर्फ पिघलने की गति को धीमा कर सकते हैं।
दरअसल, विशाल वायरस (न्यूक्लियोसाइटोप्लाज़्मिक लार्ज डीएनए वायरस) पूरी दुनिया की मिट्टी, नदियों और महासागरों में पाए जाते हैं। लेकिन आरहुस विश्वविद्यालय की लॉरा पेरिनी यह जानना चाहती थीं कि क्या विशाल वायरस बर्फीले ग्रीनलैंड में भी पाए जाते हैं। उन्होंने वहां की बर्फ के नमूने लेकर उनका जेनेटिक विश्लेषण किया। पता चला कि ये वायरस सैकड़ों सालों से यहां मौजूद हैं और यहां उगने वाली रंगीन शैवाल को संक्रमित कर रहे हैं। संभव है कि विशाल वायरस इन रंगीन शैवाल के फलने-फूलने और वृद्धि को सीमित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि ये वायरस ग्रीनलैंड में रंगीन शैवाल को फैलने से रोकते हैं तो इससे बढ़ रहे समुद्र स्तर को धीमा करने में मदद मिल सकती है क्योंकि कुछ अध्ययन बताते हैं कि बर्फ पर पनपने वाली शैवाल का गहरा-काला रंग बर्फ के पिघलने को बढ़ाता है; उजली बर्फ पर शैवाल का गहरा रंग अधिक ऊष्मा सोखता है, नतीजतन बर्फ तेज़ी से पिघलती है।
ऐसे में विशाल वायरस द्वारा शैवाल को संक्रमित करने और इनकी वृद्धि सीमित करने से बर्फ पर फैले गहरे रंग में कमी आएगी, जिसके नतीजे में बर्फ के पिघलने की रफ्तार धीमी होगी।
लेकिन ऐसे उपायों की कुछ दिक्कतें भी दिखती हैं। एक तो यही ठीक से नहीं पता है कि ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलाने में शैवाल वास्तव में कितना योगदान देती है, इसलिए शैवाल को फैलने से रोककर समुद्र स्तर बढ़ने में वाकई कितनी कमी लाई जा सकेगी इसका पक्का अंदाज़ा नहीं है। बर्फ को तेज़ी से पिघलाने में अन्य कारक भी ज़िम्मेदार हो सकते हैं; जैसे गर्माती जलवायु के कारण बर्फ के पिघलने से (गहरे रंग के) पानी के डबरे बन सकते हैं। ये डबरे भी अधिक ऊष्मा सोख सकते हैं और बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ा सकते हैं।
दूसरा, यह ज़रूरी नहीं कि शैवाल-नियंत्रण के इरादे से विशाल वायरस को फैलाना एक अच्छा विचार साबित हो क्योंकि शैवाल के अन्य कार्य भी हैं, जैसे कार्बन भंडारण। कार्बन भंडारण कर शैवाल जलवायु परिवर्तन के एक प्रमुख कारक से तो निजात दिलाते ही हैं।
तीसरा, जलवायु परिवर्तन के नुमाया लक्षणों को दबाने या थामने के उपाय वास्तविक समस्या को हल करने से ध्यान हटाते हैं। मर्ज़ को ठीक न कर उसके लक्षणों से निपटने के प्रयास समस्या को इतना भयावह कर सकते हैं कि हो सकता है मर्ज़ काबू से बाहर निकल जाए। (स्रोत फीचर्स)
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सिनेमा और पॉपकॉर्न का रिश्ता तो जाना-माना है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि पॉपकॉर्न की खोज कैसे और कब हुई?
वैसे तो भोजन से जुड़े इन रहस्यों को सुलझाना बड़ा मुश्किल होता है। क्योंकि पुरातत्ववेत्ताओं के लिए अतीत में झांकने की एकमात्र खिड़की अतीत में छूटे हुए अवशेष होते हैं, खासकर उन मामलों में जब लोगों ने चीज़ें लिखकर दर्ज नहीं की हों।
प्राचीन लोग प्राय: लकड़ी, जानवरों के अंगों से बनी सामग्री या कपड़े इस्तेमाल करते थे जो बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं और ये सब खुदाई में मिलना दुर्लभ है; सबूत के तौर पर खुदाई में अक्सर मिट्टी के बर्तन या पत्थर के औज़ार जैसी कठोर चीज़ें ही मिलती हैं। लेकिन नरम चीज़ें – जैसे भोजन के बचे हुए हिस्से – मिलना बहुत मुश्किल है। बिरले ही, कुछ शुष्क जगहों पर कोई नरम चीज़ संरक्षित मिल जाती है। या फिर किसी जली हुई चीज़ के अवशेष सलामत मिलने की संभावना रहती है।
सौभाग्य से, मक्के में कुछ कठोर भाग होते हैं जैसे कर्नेल खोल (भुट्टा या पॉपकॉर्न खाते वक्त जो आपके दांतों में फंस जाता है वह हिस्सा)। फिर, खाने के पहले हम इसे भूनते या सेंकते हैं इसलिए कभी-कभी यह जल भी जाता है। और इसका जलना पुरातत्वविदों को प्रमाण के रूप में मिलकर फायदा पहुंचा जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि मक्के सहित कुछ पौधों में छोटे, सख्त हिस्से होते हैं जिन्हें फायटोलिथ कहा जाता है, जो हज़ारों सालों तक सलामत रह सकते हैं।
अब, यह तो हम जानते हैं कि मक्का पिछले 9000 साल से हमारी खेती का हिस्सा है। इसकी खेती सबसे पहले वर्तमान के मेक्सिको में शुरू हुई थी। तब के किसानों ने एक तरह की घास, टेओसिन्टे, को मक्का में विकसित किया था। खेती से पहले लोग जंगली टेओसिन्टे इकट्ठा करते थे और उसके बीज खाते थे, जिसमें बहुत सारा स्टार्च होता था। खेती के लिए उन्होंने हमेशा सबसे बड़े बीजों वाले टेओसिन्टे चुने और उगाए। इस चयन से समय के साथ टेओसिन्टे से मक्का प्राप्त हुआ।
मक्के की भी कई किस्में हैं। इनमें से ज़्यादातर किस्में गर्म करने पर पॉप हो जाती हैं या फूट जाती हैं। लेकिन इसकी एक किस्म, जिसे वास्तव में ‘पॉपकॉर्न’ कहा जाता है, सबसे अच्छे से पॉपकॉर्न बनाती है। पेरू से 6700 साल प्राचीन पॉप होने वाले मक्के के फायटोलिथ और जले हुए दानों के अवशेष मिले हैं।
ऐसा अनुमान है कि पॉपिंग मक्के की खोज दुर्घटनावश हुई होगी। खाना पकाते समय कुछ दाने आग में गिर गए होंगे, और खाना बनाने वाले ने नए व्यंजन बनाने के इस तरीके पर गौर कर लिया होगा। और फिर, नए व्यंजन के अलावा पॉपकॉर्न बना कर रखना मक्के को लंबे समय तक सहेजने में आसानी देता होगा।
दरअसल, आग में तपाकर दाने से पानी सुखाने से इसे जल्दी खराब होने से बचाया जा सकता है। गर्म करके सुखाते वक्त दाने का पानी भाप बनकर निकलता है, यही पॉपकॉर्न को पॉप करता है। तो हो सकता है कि सिनेमा हॉल का यह साथी अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कोशिश का परिणाम है। (स्रोत फीचर्स)
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कई बार डॉक्टरों को किसी घायल मरीज़ की जान बचाने के लिए नागंवार फैसला करना पड़ता है – मरीज़ की भुजा या कोई अंग काटकर अलग करना। इसे अंग-विच्छेद या एम्प्यूटेशन कहते हैं। क्या अन्य जंतु भी ऐसा करते हैं?
हाल ही में जर्मनी के वुर्ज़बर्ग विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एरिक फ्रैंक ने ऐसा ही एक चौंकाने वाला अवलोकन रिपोर्ट किया है। वे और उनके सहयोगी फ्लोरिडा कारपेंटर चींटियों (Camponotus floridanus) को अपनी प्रयोगशाला में लाए। वे देखना चाहते थे कि चोट लगने पर ये चींटियां क्या करती हैं।
देखा गया है कि अधिकांश प्रजातियों की चीटियां अपने घायल साथी की चोटग्रस्त या कटी हुई भुजा पर सूक्ष्मजीव-रोधी लेप लगा देती हैं। अधिकांश प्रजातियों में कुछ ग्रंथियां सूक्ष्मजीव-रोधी पदार्थों का स्राव करती हैं और ये पदार्थ बैक्टीरिया व फफूंद संक्रमण से बचाव करते हैं।
लेकिन कारपेंटर चींटियां अलग तरीका अपनाती हैं। वे तो शेष बची भुजा को चबा डालती हैं। कहा जा सकता है कि वे उस भुजा का एम्प्यूटेशन कर देती हैं। मनुष्य के अलावा यह पहला जंतु देखा गया है जो इस तकनीक का सहारा लेता है। इन चींटियों में उद्विकास के दौरान किसी वजह से उक्त ग्रंथियां नदारद हो गईं। तो फिर ये अपना बचाव कैसे करती होंगी?
इसी सवाल का जवाब पाने की दृष्टि से फ्रेंक के दल ने चींटियों की टांग को फीमर नामक हड्डी के निकट से काट दिया और घाव को मिट्टी में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया स्यूडोमोनासएरुजिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) के संपर्क में रखा। इसके बाद कुछ चींटियों को अलग-थलग रहने दिया गया जबकि कुछ को उनकी बांबी में छोड़ दिया गया।
जिन चींटियों को बांबी में छोड़ा गया था, जल्दी ही उनके पास एक-दो साथी चींटियां पहुंच गईं। उन्होंने टांग के फीमर के ऊपर वाले हिस्से को कुतर डाला और पूरी टांग को अलग कर दिया। जिन चींटियों को यह ‘शल्य क्रिया’ मिली थी उनमें से 90 प्रतिशत जी गईं जबकि अलग-थलग रखी गई चींटियों में से मात्र 40 प्रतिशत ही बच पाईं।
कुछ मामलों में शोधकर्ताओं ने टांग को थोड़ा नीचे (टिबिया के पास) क्षतिग्रस्त किया। ऐसा करने पर उनकी साथी चींटियों ने टांग को काटकर अलग नहीं किया बल्कि सिर्फ घाव को चाटा ताकि अपनी जीभ से बैक्टीरिया वगैरह को साफ कर सकें। इस मामले में भी अलग-थलग पड़ी घायल चींटियों में से मात्र 10 प्रतिशत जीवित रहीं जबकि बांबियों में रखी गईं 75 प्रतिशत जीवित रहीं।
शोधकर्ताओं ने यह भी समझने की कोशिश की कि कारपेंटर चींटियां ये अलग-अलग रणनीतियां क्यों अपनाती हैं। उन्होंने पाया कि इसका सम्बंध चीटिंयों की शरीर क्रिया से है। फ्लोरिडा कारपेंटर चींटी की फीमर हड्डी से जुड़ी कई मांसपेशियां होती हैं जो हीमोलिंफ (हमारे रक्त जैसा) के बहाव को रोकती हैं, और प्रवाह बाधित होने पर बैक्टीरिया शरीर में अंदर प्रवेश नहीं कर पाते। हो सकता है कि इसी वजह से फीमर की चोट के मामले में एम्प्यूटेशन का सहारा लिया जाता है क्योंकि उन्हें इतना समय मिल जाता है। दूसरी ओर, टिबिया के इर्द-गिर्द इतनी मांसपेशियां नहीं होतीं जो हिमोलिंफ के प्रवाह को रोक सकें। अर्थात टिबिया चोट का उपचार तुरंत करना ज़रूरी होता है। वास्तव में शोधकर्ताओं ने जांच की तो पाया कि फीमर चोट के बाद एम्प्यूटेशन से बैक्टीरिया संक्रमण सचमुच रुक जाता है जबकि टिबिया चोट के संदर्भ में नहीं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/content/article/ants-may-be-only-animal-performs-surgical-amputations
एक हालिया और दिलचस्प अध्ययन से पता चला है कि संभवत: कन्फ्यूशियसॉर्निस वंश के प्राचीन पक्षी आधुनिक चिड़ियाओं के सामान पंख छोड़ते थे। पक्षियों में उड़ान दक्षता बनाए रखने के लिए पंखों का निर्मोचन (यानी पुराने पंख झड़कर नए पंख आना) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो बायोलॉजीलेटर्समें प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इन प्राचीन पक्षियों में मौजूद थी।
पंखों की उत्पत्ति संभवत: डायनासौर और टेरोसौर के साझा पूर्वजों में लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले ट्राएसिक काल में हुई थी। इन पक्षियों के शुरुआती पंख हल्के रोएं से अधिक कुछ नहीं होते थे। समय के साथ, शिकारी पक्षियों (रैप्टर्स) और पक्षियों की पूर्ववर्ती प्रजातियों (जैसे मांसाहारी डायनासौर) में केरेटिन से बने जटिल पंख विकसित हुए। केरेटीन वही प्रोटीन है जिससे मनुष्यों में बाल और नाखून का निर्माण होता है। लेकिन नाखूनों के विपरीत पंख अपने आधार से निरंतर नहीं बढ़ते। परिपक्व होने के बाद ये मृत संरचना ही होते हैं। इसलिए पक्षियों को अपने पुराने पंखों को छोड़ना पड़ता है। विभिन्न पक्षियों में इसके तरीके अलग-अलग होते हैं।
उड़ने में असमर्थ पेंगुइन जैसे पक्षी एक बार में बहुत सारे पंख गिराते हैं, जबकि उड़ने वाले पक्षी अपनी उड़ने की क्षमता बनाए रखने के लिए एक बार में कुछ ही पंख गिराते हैं। इसे क्रमिक निर्मोचन कहते हैं। इस तरीके में उनके डैनों पर छोटी-छोटी रिक्तियां रह जाती हैं, जहां नए पंख उगते हैं।
इस अध्ययन के लिए फील्ड म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के जीव विज्ञानी योसेफ किआट और उनकी टीम ने चीन के एक म्यूज़ियम के 600 से अधिक पक्षी जीवाश्मों का अध्ययन किया। ये पक्षी शुरुआती क्रेटेशियस काल (लगभग 12.5 करोड़ साल पूर्व) के दौरान वर्तमान के पूर्वी चीन में रहते थे। इनमें कन्फ्यूशियसॉर्निस सबसे आम पक्षी था। कौवे की साइज़ के इस पक्षी की खोपड़ी सरीसृपों के समान, पंजे मुड़े हुए, घने पंख और दांत-विहीन चोंच होती थी। यह संरचना डायनासौर और पक्षी दोनों से मिलती-जुलती थी। टीम को कन्फ्यूशियसॉर्निस के दो ऐसे जीवाश्म भी मिले जो निर्मोचन प्रक्रिया के दौरान ही अश्मीभूत हुए थे। उनके परिपक्व पंखों के बीच रिक्तियों में काले, बढ़ते पंख दिखाई दे रहे थे। ये नए पंख दोनों डैनों में सममित रूप से मौजूद थे। यह आधुनिक सॉन्गबर्ड में देखी जाने वाली क्रमिक निर्मोचन प्रक्रिया के समान ही है। टीम के अनुसार ये जीवाश्म पक्षियों में निर्मोचन के सबसे पुराने ज्ञात साक्ष्य हैं। अनुमान है कि पंख निर्मोचन की यह प्रक्रिया साल में एक बार न होते हुए उनके शारीरिक विकास में उछाल के अनुरूप होती होगी।
ये साक्ष्य 12 करोड़ वर्ष पहले पाए जाने वाले चार डैनों वाले डायनासौर माइक्रोरैप्टर में क्रमिक निर्मोचन के साक्ष्यों से भी मेल खाते हैं और इस विचार का समर्थन करते हैं कि माइक्रोरैप्टर उड़ सकता था, क्योंकि क्रमिक निर्मोचन अक्सर उड़ने वाली प्रजातियों में देखा जाता है।
यह अध्ययन कई डायनासौर में निर्मोचन की संभावना जताता है और उड़ान के विकास में इस प्रक्रिया का महत्व बताता है। (स्रोत फीचर्स)
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सिकल सेल रोग से दुनिया भर के लाखों लोग प्रभावित हैं। एक अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष लगभग पौने चार लाख लोग इसकी वजह से जान गंवाते हैं और लाखों लोग दर्दनाक तकलीफें झेलते हैं। यू.एस. खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने पिछले वर्ष इसके उपचार के लिए दो जीन थेरेपी प्रक्रियाओं को मंज़ूरी दी थी। लेकिन ये उपचार काफी महंगे हैं – इनका खर्च प्रति व्यक्ति करीब 17 करोड़ रुपए बैठता है। साथ ही इनमें जोखिमभरी कीमोथेरेपी शामिल होती है।
हाल ही में औषधि शोधकर्ताओं ने मुंह से दी जाने वाली एक दवा की खोज की है। इस औषधि ने सिकल सेल रोग से ग्रसित जंतुओं में स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को पुनर्स्थापित किया है। देखा जाए तो जीन थेरेपी एक बार करनी होती है और वह लंबे समय तक लाभ प्रदान कर सकती है। इसके विपरीत इस नई दवा को समय-समय पर जीवन भर लेने की आवश्यकता हो सकती है।
यह दवा मनुष्यों में अभी सुरक्षा परीक्षण से नहीं गुज़री लेकिन साइंसजर्नल में वर्णित इस प्रायोगिक दवा ने व्यापक रूप से सुलभ और किफायती उपचार की एक उम्मीद जगाई है।
गौरतलब है कि सिकल सेल रोग वयस्क हीमोग्लोबीन के उत्पादन के लिए ज़िम्मेदार जीन में उत्परिवर्तन के कारण होता है। यह उत्परिवर्तन लाल रक्त कोशिकाओं को हंसिए (सिकल) आकार का बना देता है, जिससे रक्त कोशिकाएं आपस में चिपक जाती हैं। इसके चलते रक्त वाहिकाएं अवरुद्ध होती हैं, और तेज़ दर्द के साथ ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं।
रोचक तथ्य यह है कि इस जीन में उत्परिवर्तन से पीड़ित व्यक्तियों में भी भ्रूणावस्था में सामान्य लाल रक्त कोशिकाएं बनती हैं। उपचारों में कोशिश यह की जाती है कि वयस्क व्यक्ति में वयस्क जीन को बाधित करके भ्रूण के लाल रक्त कोशिका जीन को सक्रिय कर दिया जाए ताकि सामान्य लाल रक्त कोशिकाएं बनने लगें।
सिकल सेल रोग उस जीन में उत्परिवर्तन के कारण होता है जो वयस्क में हीमोग्लोबीन बनाने के लिए ज़िम्मेदार होता है। वर्तमान में स्वीकृत एक जीन थेरेपी में किया यह जाता है कि एक वायरस की मदद से वयस्क हीमोग्लोबीन का संशोधित जीन व्यक्ति की स्टेम कोशिकाओं में प्रविष्ट करा दिया जाता है। फिर इन संशोधित कोशिकाओं को वापिस उस व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है। लेकिन उससे पहले उसके शरीर में पहले से मौजूद रक्त स्टेम कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।
दूसरी जीन थेरेपी में भी मरीज़ की रक्त स्टेम कोशिकाओं में संशोधन किया जाता है लेकिन इसके लिए क्रिस्पर नामक तकनीक की मदद ली जाती है। क्रिस्पर की मदद से BCL11A नामक एक प्रोटीन को बाधित कर दिया जाता है। यह वह प्रोटीन है जो वयस्कों में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन रोक देता है। तो जब BCL11A जीन को ठप कर दिया जाता है तो रक्त स्टेम कोशिकाओं में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन फिर बनने लगता है और मरीज़ को मदद मिलती है।
लेकिन जीन थेरेपी के भारी खर्च और जटिलता के चलते हर व्यक्ति तक इसकी पहुंच सीमित हो जाती है, खासकर अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में जहां सिकल सेल रोगी अधिक पाए जाते हैं।
अलबत्ता, वयस्कों में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन जीन को सक्रिय करने वाली औषधियां विकसित करने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं लेकिन उतने कारगर नहीं रहे हैं।
जैसे नोवार्टिस की पामेला टिंग और जे ब्रैडनर एक ऐसा यौगिक खोज रहे थे जो BCL11A द्वारा बनाए गए प्रोटीन से जुड़ सके और उसे कोशिका की प्रोटीन विध्वंस मशीनरी में पहुंचा सके ताकि वह भ्रूणीय हीमोग्लोबीन के जीन को शांत न कर सके। टीम ने एक यौगिक (dWIZ-1) की पहचान की है जो कोशिका में डाले जाने पर भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन बढ़ा देता है। लेकिन यह BCL11A को लक्षित नहीं करता।
इस यौगिक में संशोधन कर dWIZ-2 का निर्माण किया गया, जिसने लाल रक्त कोशिकाओं में भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का स्तर 17-45 प्रतिशत तक बढ़ा दिया। यह स्तर मनुष्यों में लाल रक्त कोशिकाओं के कार्यात्मक उत्पादन करने के लिए पर्याप्त है।
dWIZ-2 ने चूहों और तीन में से दो साइनोमोल्गस बंदरों में प्रभावशीलता दिखाई है और कोई दुष्प्रभाव भी नज़र नहीं आए हैं। यह ऐसा पहला छोटा अणु है जो स्टेम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना भ्रूणीय हीमोग्लोबीन का उत्पादन बढ़ाता देता है।
दिक्कत यह है कि dWIZ प्रोटीन कई कोशिकाओं में बनता है और यह कई जीनों को नियंत्रित करता है। यानी इसकी नियामक भूमिका काफी व्यापक हो सकती है और इसका दमन करना शायद सुरक्षित न हो। बहरहाल, ब्रैडनर का मत है कि भ्रूणीय हीमोग्लोबन को बढ़ाने की dWIZ-2 की क्षमता बहुत अधिक है और यह आगे के विकास का रास्ता तो खोलता ही है। (स्रोत फीचर्स)
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यह सही है कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन और अतीत में किया गया उत्सर्जन दोनों वैश्विक औसत से काफी कम हैं, लेकिन फिर भी भारत जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाली ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। इसके जवाब में, भारत ने अपने जीएचजी उत्सर्जन को सीमित करने के लिए कई सक्रिय कदम उठाए हैं। जैसे, औद्योगिक ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (पीएटी) योजना शुरू की गई है और साथ ही नवीकरणीय खरीद अनिवार्यता (आरपीओ) भी लागू की गई है। प्रस्तावित कार्बन बाज़ार भी इसी तरह का एक उपाय है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने घरेलू कोटा-अनुपालन कार्बन बाज़ार की स्थापना के लिए रूपरेखा तैयार की है। इसके अंतर्गत ऊर्जा संरक्षण अधिनियम में संशोधन और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) की अधिसूचना शामिल हैं। उम्मीद है कि प्रस्तावित योजना के बारे में और अधिक विवरण जल्द ही पेश किए जाएंगे और संभवत: प्रारंभ में चार क्षेत्रों – लोहा और इस्पात, सीमेंट, पेट्रोकेमिकल्स और पल्प एंड पेपर – पर केंद्रित होंगे। इस लेख में, हम भारत के लिए प्रस्तावित कार्बन बाज़ार योजना का विश्लेषण करेंगे। साथ ही, हम उन चुनौतियों पर भी चर्चा करेंगे जिन्हें संबोधित करना ज़रूरी है ताकि कार्बन बाज़ार भारत के कार्बन-मुक्तिकरण में लागतक्षम ढंग से असरदार हो सकें।
वैश्विककार्बनबाज़ार
कार्बन बाज़ार काफी समय से अस्तित्व में हैं। कार्बन बाज़ार दो प्रकार के होते हैं: स्वैच्छिक और अनिवार्य। स्वैच्छिक कार्बन बाज़ार या ऑफसेट बाज़ार में परियोजना चलाने वाले ऐसे तरीके अपनाते हैं जिससे उत्सर्जन कम हो सके। ऊर्जा दक्षता बढ़ाकर, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके या ईंधन परिवर्तन के माध्यम से कम किए गए कार्बन उत्सर्जन को ऑफसेट कहते हैं। इसके अलावा कार्बन कैप्चर, युटिलाइज़ेशन एंड स्टोरेज (सीसीयूएस) परियोजनाओं या वनीकरण परियोजनाओं के ज़रिए वायुमंडल से कार्बन हटाकर भी ऑफसेट उत्पन्न किए जा सकते हैं। इन ऑफसेट को स्वतंत्र एजेंसियां विभिन्न वैश्विक मानकों के आधार पर सत्यापित करती हैं। कई कंपनियां ये ऑफसेट खरीदकर अपने स्वयं के कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य पूरा करती हैं। इस खरीद के लिए कई रजिस्ट्रियां व व्यापार मंच हैं।
अनिवार्य कार्बन बाज़ार एक निर्धारित नियम कैप-एंड-ट्रेड प्रणाली के तहत काम करता है। इन्हें एमिशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) भी कहा जाता है। इन बाज़ारों में सरकारों या अन्य प्राधिकरणों द्वारा कंपनियों को एक निश्चित सीमा तक ही कार्बन उत्सर्जित करने की अनुमति मिलती है। जो कंपनियां अपनी निर्धारित सीमा से कम कार्बन उत्सर्जित करती हैं, वे अपने बचे हुए कार्बन क्रेडिट उन कंपनियों को बेच सकती हैं जो अपने लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन करती हैं। इसका उद्देश्य कंपनियों को यह अनुमति देना है कि या तो वे कार्बन क्रेडिट खरीदें या अपनी तकनीक में सुधार करके कार्बन उत्सर्जन को कम करें। कुछ अनिवार्य बाज़ार, एक निश्चित प्रतिशत को स्वैच्छिक बाज़ार से पूरा करने की भी अनुमति देते हैं।
इस समय दुनिया भर में लगभग 37 उत्सर्जन ट्रेडिंग योजनाएं (ईटीएस) लागू हैं – 1 क्षेत्रीय स्तर पर, 13 राष्ट्रीय स्तर पर और बाकी उप-राष्ट्रीय स्तर पर हैं। लगभग 24 अन्य योजनाएं विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन या विकासाधीन हैं। तीन सबसे बड़े ईटीएस युरोपीय संघ (ईयू), कैलिफोर्निया और चीन में हैं। इन योजनाओं के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जानने योग्य हैं।
पहली, इन तीनों योजनाओं को स्थिर होने में काफी समय लगा है। युरोपीय संघ ईटीएस को 2005 में शुरू किया गया था और तब से लेकर अब तक इसमें चार चरणों में कई सुधार हुए हैं। कैलिफोर्निया की कैप एंड ट्रेड (CaT) योजना 2013 में शुरू हुई थी और इसके बाद से इसमें भी कई सुधार हुए हैं। चीन का ईटीएस लगभग 9 साल के उप-राष्ट्रीय पायलट कार्यक्रमों के बाद शुरू हुआ था।
दूसरी, युरोपीय संघ ईटीएस और कैलिफोर्निया CaT के लक्ष्य पूर्ण उत्सर्जन (absolute emissions) पर आधारित हैं जबकि चीन का ईटीएस उत्सर्जन तीव्रता (emission intensity) पर आधारित है। युरोपीय संघ ईटीएस का लक्ष्य निर्धारित सेक्टर्स में उत्सर्जन को 2005 की तुलना में 2030 तक 62 प्रतिशत कम करना है। यह लक्ष्य 2030 तक उत्सर्जन में 55 प्रतिशत की कमी के युरोपीय संघ के समग्र लक्ष्य के साथ मेल खाता है। इस योजना में, हर साल निर्धारित क्षेत्रों के लिए उत्सर्जन की कुल मात्रा एक निश्चित दर से लगभग 5.1 प्रतिशत, से घटाई जाती है। इसी प्रकार, कैलिफोर्निया की योजना में भी 2030 तक हर साल उत्सर्जन की कुल मात्रा लगभग 4 प्रतिशत घटाई जाएगी ताकि 1990 की तुलना में 2030 तक 40 प्रतिशत कमी का लक्ष्य पूरा हो सके। दूसरी ओर, चीन की योजना उत्सर्जन तीव्रता (यानी प्रति इकाई उत्पादन पर प्रति टन उत्सर्जित कार्बन) के लक्ष्यों पर आधारित है, जिसमें कुल उत्सर्जन पर कोई सीमा नहीं है। इसकी हर दो साल में समीक्षा की जाती है।
तीसरी, समय के साथ और तीनों ईटीएस के कार्बन की कीमत में काफी भिन्नता रही है। कार्बन क्रेडिट की कीमत निर्धारित करने में लक्ष्य की महत्वाकांक्षा के स्तर, दीर्घकालिक निश्चितता और प्रवर्तन तंत्र की प्रभावशीलता के साथ-साथ देश-विशिष्ट के तकनीकी और आर्थिक कारकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
भारतकीस्थिति
ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) ने अक्टूबर 2022 में भारतीय कार्बन बाज़ार (आईसीएम) पर एक मसौदा नीति पत्र जारी किया था। इसके बाद, दिसंबर 2022 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में संशोधन करके बीईई को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) लागू करने का अधिकार दिया गया। इस योजना को जून 2023 में अधिसूचित किया गया और अक्टूबर 2023 में बीईई ने अनिवार्य प्रणाली और कार्बन सत्यापन एजेंसियों की मान्यता की पात्रता और प्रक्रिया के ड्राफ्ट विवरण जारी किए। इसके बाद दिसंबर 2023 में, CCTS में एक संशोधन किया गया ताकि स्वैच्छिक ऑफसेट बाज़ार की अनुमति दी जा सके।
ड्राफ्ट नीति पत्र ने भारतीय कार्बन बाज़ार के लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण का प्रस्ताव दिया, जिसमें पायलट चरण को 1 जनवरी, 2023 तक लागू करने की योजना थी। हाल ही में बीईई ने सूचित किया है कि इस योजना का पहला चरण 2024 में चार प्रमुख क्षेत्रों के लिए शुरू किया जाएगा। यहां भारत में प्रस्तावित CCTS की मुख्य बातें साझा कर रहे हैं।
CCTS का कानूनी आधार पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (ईपीए), 1986 और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (ईसीए), 2001 (2022 में संशोधित) से आता है। इस योजना के नोडल मंत्रालय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) तथा विद्युत मंत्रालय (MoP) होंगे, और इसका प्रबंधन बीईई द्वारा किया जाएगा। आईसीएम का संचालन एक राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा किया जाएगा। भारत का ग्रिड नियंत्रक कार्बन क्रेडिट का पंजीयक होगा और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ट्रेडिंग गतिविधियों का नियमन करेगा। वर्तमान में मौजूद तीन पॉवर एक्सचेंज कार्बन क्रेडिट के लिए खरीद-फरोख्त प्लेटफॉर्म होंगे। आईसीएम की संस्थागत संरचना मौजूदा परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (पीएटी) योजना के समान रहेगी जिसका विलय अंतत: CCTS में कर दिया जाएगा।
जून 2023 में अधिसूचित CCTS में केवल उन्हीं संस्थाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जिन्हें उत्सर्जन के लक्ष्य दे दिए जाएंगे। इस तरह से यह एक अनिवार्यता बाज़ार था। लेकिन, दिसंबर 2023 की अधिसूचना ने आईसीएम के दायरे को स्वैच्छिक ऑफसेट कार्बन बाज़ार तक बढ़ा दिया, जिसकी रूपरेखा और कार्यप्रणाली जल्द ही जारी होगी।
यहां हम प्रस्तावित योजना के तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो इसकी प्रभाविता के लिए महत्वपूर्ण होंगे: CCTS की निगरानी के लिए संस्थागत तंत्र, लक्ष्य निर्धारण की प्रक्रिया और योजना की प्रवर्तन सम्बंधी प्रक्रिया।
संस्थानऔरसंचालन
बीईई भारतीय कार्बन बाज़ार के लिए CCTS का प्रबंधन करेगा जबकि देख-रेख एवं निगरानी का काम राष्ट्रीय संचालन समिति (एनएससी) द्वारा किया जाएगा। एनएससी में विभिन्न मंत्रालयों (बिजली मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, इस्पात मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय आदि) के संयुक्त सचिव और पांच बाहरी विशेषज्ञ शामिल होंगे। एनएससी का काम CCTS के लक्ष्य निर्धारित करना (बीईई की सिफारिशों के आधार पर) और प्रक्रियाएं बनाना होगा। वह विशिष्ट विशेषज्ञता वाले तकनीकी विशेषज्ञों के समूह भी बना सकता है। हर तीन माह में एक बैठक का आयोजन किया जाएगा। लेकिन एनएससी में नियुक्त उच्च अधिकारियों की व्यस्तता को देखते हुए, यह संभव है कि एनएससी मात्र एक औपचारिक निकाय रहे और सिर्फ बीईई या कामकाजी समूहों की सिफारिशों को मान ले। इससे एनएससी द्वारा बीईई की निगरानी करने का उद्देश्य कमज़ोर हो सकता है। इसके अलावा, बीईई विद्युत मंत्रालय के अधीन है, जो बिजली उत्पादन के लिए ज़िम्मेदार है और बिजली उत्पादन उत्सर्जन के बड़े स्रोतों में से एक है। बेहतर होता कि यह किसी ‘तटस्थ’ एजेंसी के अधीन होता।
हालांकि, बीईई के पास ऊर्जा दक्षता और संरक्षण तथा पीएटी स्कीम के प्रबंधन का लंबा अनुभव है, लेकिन कार्बन बाज़ार की देख-रेख अलग तरह की चुनौती है। चूंकि उत्सर्जन कई स्रोतों से हो सकता है और इसकी निगरानी ऊर्जा दक्षता की निगरानी से अलग है, इसलिए बीईई को इस नई ज़िम्मेदारी के लिए अधिक तैयारी करना होगी। अर्थ व्यवस्था पर इसके व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए CCTS के प्रबंधन के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन कोई एजेंसी अधिक उपयुक्त होगी। अन्य देशों में, इस तरह के कार्य पर्यावरण एजेंसियों द्वारा किए जाते हैं।
इस योजना की देख-रेख दो बड़े मंत्रालयों – पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन (MoEFCC) और बिजली मंत्रालय MoP – द्वारा की जाने से प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाती है। इसके अलावा उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारण की प्रक्रिया बहुत लंबी है और कई चरणों में बंटी हुई है। इसमें तकनीकी समिति से शुरू होकर, बीईई, एनएससी, MoP और अंत में MoEFCC की सिफारिशें शामिल होंगी। इसके चलते यह प्रक्रिया बहुत जटिल और धीमी होने की आशंका है। अभी तो यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि एक एजेंसी की सिफारिशें अगली एजेंसी को पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हुईं तो क्या होगा। इसे सरल और पारदर्शी बनाना चाहिए, ताकि इसमें शामिल सभी एजेंसियों की भूमिकाएं और ज़िम्मेदारियां स्पष्ट रहें।
उत्सर्जनलक्ष्योंकानिर्धारण
CCTS को प्रभावी बनाने के लिए बाज़ार के प्रतिभागियों के लिए उत्सर्जन कोटा तय करना सबसे महत्वपूर्ण है। इसी कोटे पर निर्भर करेगा कि कोई प्रतिभागी नई तकनीक में निवेश करे या क्रेडिट खरीदने का निर्णय करे।
यदि इन लक्ष्यों को बहुत ढीला रखा जाता है यानी उत्सर्जन कोटा बहुत अधिक है तो इसके दो परिणाम होंगे। पहला, यह डीकार्बोनाइज़ेशन के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाएगा तथा प्रतिभागियों के पास उत्सर्जन को कम करने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं होगा। दूसरा, चूंकि प्रतिभागियों के लिए निर्धारित कोटा हासिल करना आसान होगा, बाज़ार में कार्बन क्रेडिट की अधिकता हो जाएगी। इस स्थिति में कार्बन क्रेडिट की कीमतें भी नीचे आ जाएंगी।
दूसरी ओर, अगर लक्ष्यों को बहुत सख्त रखा जाता है यानी उत्सर्जन कोटा बहुत कम है तो लक्ष्य को पूरा करने के लिए निवेश की आवश्यकता अधिक होगी। इससे बाज़ार में क्रेडिट की कमी हो जाएगी और कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाएंगी, उन्हें खरीदना मुश्किल हो जाएगा। इससे भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कमज़ोर हो सकते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव उन उद्योगों पर होगा जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं। नतीजतन वस्तुओं की कीमतें बढ़ भी सकती हैं। इसलिए, उत्सर्जन कोटा या लक्ष्य सही स्तर पर निर्धारित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बीईई द्वारा संचालित पीएटी योजना ने उद्योगों की ऊर्जा दक्षता सुधारने के लिए ऊर्जा तीव्रता लक्ष्य दिए थे। प्रस्तावित CCTS भी मुख्य रूप से पीएटी योजना पर आधारित है, जिसमें उद्योगों को उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य देने का प्रस्ताव है। पीएटी योजना के अनुभव से पता चलता है कि इसके लक्ष्य शिथिल थे, जिससे बाज़ार में एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट (ESCerts) की अधिकता हुई और उनकी कीमतें काफी कम हो गईं। इसके अलावा, उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि इन शिथिल लक्ष्यों को भी ठीक से लागू नहीं किया गया यानी उन सभी भागीदारों ने ESCerts नहीं खरीदे, जो ऐसा करने के लिए बाध्य थे। इस अनुभव और अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं के आधार पर हम भारत में उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य विकसित करते समय ध्यान देने योग्य कुछ मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
लक्ष्यतयकरनेकीपद्धति: उत्सर्जन लक्ष्य तय करने के लिए एक पारदर्शी और स्पष्ट पद्धति होना चाहिए, जो विभिन्न सेक्टर्स के अनुसार निर्धारित की जा सके। इससे बाज़ार के प्रतिभागी अधिक स्पष्टता और विश्वास के साथ योजनाएं बना सकेंगे।
लक्ष्योंकीस्पष्टता: कंपनियों को योजना में सही तरीके से भाग लेने के लिए दीर्घकालिक और स्पष्ट लक्ष्य चाहिए। इससे उन्हें अपनी निवेश योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। पीएटी योजना में केवल 3 साल के लक्ष्य होते हैं, जो निवेश की योजना के लिए बहुत कम समय है। इसकी बजाय, ईयू में 2030 तक के वार्षिक लक्ष्य तय किए गए हैं। भारतीय CCTS में भी 2030 तक के लक्ष्य रखे जा सकते हैं और 2026 या 2027 में 2035 तक के लक्ष्य घोषित किए जा सकते हैं।
सेक्टर–आधारितलक्ष्य: पीएटी योजना में हर कंपनी को अलग-अलग ऊर्जा लक्ष्य दिए जाते थे, जिससे योजना काफी जटिल हो जाती है क्योंकि लक्ष्य निर्धारित करने का प्रमुख आधार बेसलाइन होता है। इससे मौजूदा अक्षमताओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है और उन लोगों को प्रोत्साहन नहीं मिलता जिन्होंने पहले ही सुधार कर लिए हैं। इसलिए, पूरे सेक्टर के लिए एक ही उत्सर्जन लक्ष्य रखना बेहतर होगा, जैसे पूरे लोहा और इस्पात क्षेत्र के लिए एक ही लक्ष्य निर्धारित करना अधिक बेहतर विकल्प है। ईयू ईटीएस और CaT में यही होता है। यह लक्ष्य क्षेत्र के सर्वोत्तम प्रदर्शनकर्ताओं के आधार पर हो सकता है। यदि छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) को विशेष मदद की ज़रूरत है, तो बड़े उद्योगों और SMEs के लिए अलग-अलग लक्ष्य रखे जा सकते हैं।
लक्ष्यकास्तर: उत्सर्जन लक्ष्यों को सही स्तर पर रखना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि डीकार्बोनाइज़ेशन में मदद मिले और उद्योग प्रतिस्पर्धी बने रहें। भारत के पास पहले से ही कई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हैं। जैसे, राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान कि उत्सर्जन को 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत कम किया जाएगा और सभी बिजली उपभोक्ताओं के लिए नवीकरणीय ऊर्जा खरीदना अनिवार्य किया जाएगा। नए लक्ष्य इन्हीं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित करने चाहिए। हालिया रुझानों से पता चलता है कि 2005 और 2019 के बीच भारत अपनी उत्सर्जन तीव्रता में 33 प्रतिशत की कमी कर चुका है।
अन्यबाजारोंकेसाथसम्बंध: CCTS कार्बन क्रेडिट्स का एकमात्र बाज़ार नहीं है। अन्य प्रस्तावों में स्वैच्छिक ऑफसेट बाज़ार और ‘ग्रीन क्रेडिट्स’ योजना को शामिल किया गया है। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि ये बाज़ार कैसे एक साथ काम करेंगे। अलग-अलग बाज़ारों में कार्बन क्रेडिट्स की कीमत अलग-अलग हो सकती है। बीईई के पास वनीकरण जैसी गतिविधियों से कार्बन क्रेडिट्स का मूल्यांकन करने की विशेषज्ञता नहीं है। इसलिए शुरुआत में, अनिवार्य कार्बन बाज़ार को अलग रखना बेहतर होगा। बाद में, जैसे-जैसे बाज़ार मज़बूत होंगे, कुछ अनिवार्य बाज़ार को ऑफसेट बाज़ार के माध्यम से पूरा करने की अनुमति दी जा सकती है।
लक्ष्योंकोलागूकरवाना
कंपनियों के लिए उचित लक्ष्य निर्धारित करना महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाने वाली कंपनियों को कार्बन क्रेडिट खरीदवाने की सामर्थ्य कितनी है। यदि वे ऐसा नहीं करतीं, तो उन पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो उद्योगों के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने का कोई प्रोत्साहन/कारण नहीं रह जाएगा।
प्रस्तावित CCTS की मॉडल योजना – पीएटी – ने इसके पर्याप्त साक्ष्य प्रदान किए हैं। पीएट के पहले चरण में केवल 8 प्रतिशत गैर-अनुपालन देखा गया यानी आवश्यक ESCerts में से 92 प्रतिशत ही खरीदे गए। शायद इसलिए कि इस गैर-अनुपालन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। और तो और, पीएटी के दूसरे चरण में कई बार समय सीमा बढ़ाने के बाद भी अनुपालन दर 50 प्रतिशत तक गिर गई।
पीएटी के तहत दोषी कंपनियों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाने का कोई सार्वजनिक डैटा उपलब्ध नहीं हैं। वास्तव में, पीएटी में दोषी कंपनियों पर दंड लगाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। इसमें बीईई को सम्बंधित राज्य की प्राधिकृत एजेंसी को सूचित करना पड़ता है। प्राधिकृत एजेंसी इस बात का सत्यापन करती है कि सम्बंधित कंपनी ने लक्ष्य पूरा नहीं किया है और उसके बाद राज्य विद्युत नियामक आयोग (SERC) के समक्ष याचिका दायर करना पड़ती है जो ज़ुर्माना लगाने का काम करता है। यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इसे सफलतापूर्वक लागू करना मुश्किल हो जाता है, खास तौर से तब जब अधिकांश प्राधिकृत एजेंसियों की क्षमताएं सीमित हैं।
प्रस्तावित कार्बन बाज़ार के तहत दंड के प्रावधान में एक कानूनी अनिश्चितता भी है। इस योजना की उत्पत्ति ईपीए और ईसीए दोनों में हो सकती है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि किस कानून के तहत दंड लगाया जाएगा और उसकी प्रक्रिया क्या होगी। इस संदर्भ में स्पष्टता आवश्यक है ताकि एक सरल, सीधी प्रक्रिया बनाई जा सके और दंडात्मक कार्रवाई का एक विश्वसनीय संकेत दिया जा सके। संभव है कि CCTS की परिभाषा स्पष्ट कर सकती है कि क्या बीईई सीधे दोषी इकाई पर दंड लगा सकती है।
स्वाभाविक रूप से, किसी भी प्रमाणपत्र का उपयोग उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य को पूरा करने के बाद तुरंत समाप्त कर दिया जाना चाहिए और वह आगे खरीद-फरोख्त के लिए उपलब्ध नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, दोषी फर्मों के लेखा परीक्षकों द्वारा इसे एक कानूनी उल्लंघन के रूप में चिन्हित किया जाना चाहिए, ताकि इसे शेयरधारकों के ध्यान में लाया जा सके।
इसके अतिरिक्त, बीईई को बाज़ार निगरानी और दंड रिपोर्ट नियमित रूप से प्रकाशित करनी चाहिए ताकि इस बात पर विश्वास बने कि बाज़ार ठीक ढंग से काम कर रहा है। इसमें तमाम जानकारी शामिल हो; जैसे कितनी इकाइयों ने उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य हासिल किए, कितने कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र जारी किए गए, कितनी इकाइयों ने लक्ष्य हासिल नहीं किए, कितने कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र खरीदने थे, और वास्तव में कितने खरीदे गए, लगाए गए दंड, वसूले गए दंड और दोषी इकाइयों के नाम वगैरह। अन्य जानकारी जैसे खरीद-फरोख्त किए गए प्रमाणपत्रों की मात्रा, कीमतें, और निरस्त किए गए प्रमाणपत्रों की संख्या इत्यादि भी प्रकाशित की जानी चाहिए ताकि भारतीय कार्बन बाज़ारों की स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक तौर पर मिल सके।
निष्कर्ष
भारत अपने निरंकुश उद्योगों के डीकार्बोनाइज़ेशन के लिए एक कार्बन बाज़ार की महत्वपूर्ण योजना बना रहा है। इसे हासिल करने के लिए CCTS को सावधानी से डिज़ाइन करने और उसके कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं की आवश्यकता है। संस्थागत संरचना को सुगम और मज़बूत बनाने के लिए उसे पर्याप्त संसाधनों के माध्यम से संभालने की आवश्यकता है। इसे एक सरल, प्रभावी और पारदर्शी प्रवर्तन प्रणाली का समर्थन मिलना चाहिए जो कंपनियों को योजना में भाग लेने और अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करे। उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित करने में भी सतर्कता की ज़रूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ये न तो बहुत ही ढीले हों और न ही बहुत ही कठोर, तथा कंपनियों को डीकार्बोनाइज़ेशन प्रौद्योगिकियों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने में भूमिका निभाएं। इसके बिना, संभावना है कि भारत के पास एक कार्बन मार्केट तो होगा, लेकिन यह न तो भारतीय उद्योगों के प्रभावी डीकार्बोनाइज़ेशन में मदद करेगा, और न ही भारतीय उद्योग उत्सर्जन कम करने के वैश्विक दबावों के चलते वैश्विक उद्योगों से मुकाबला कर पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)
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