हिचकी से तुरंत राहत का उपाय

हिचकी आते ही है तमाम तरह की सलाह मिलने लगती है; कोई सांस रोकने को कहता है, कोई अचानक डराता है तो कोई पानी पीने कहता है। अब, वैज्ञानिकों ने हिचकी रोकने का एक बेहतर समाधान ढूंढ लिया है: पानी पीने की स्ट्रॉ।

जब हिचकी (या चिकित्सा की भाषा में सिंगल्टस) आती है तो सीने का मध्यपाट (डायफ्राम) और पसलियों के बीच की मांसपेशियां अचानक सिकुड़ती हैं और सीने में अंदर का आयतन बढ़ जाता है। बढ़े हुए आयतन की वजह से दबाव कम होता है और हवा अंदर आती है। इस तरह अचानक अंदर आई हवा के कारण स्वर यंत्र के बीच की जगह (ग्लॉटिस) बंद हो जाती है, नतीजतन ‘हिच्च’ की आवाज़ (हिचकी) आती है।

इसे रोकने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास हेल्थ साइंस सेंटर के डॉ. अली सैफी ने एक स्ट्रॉ बनाई है जिसे उन्होंने ‘फोर्स्ड इंस्पिरेटरी सक्शन एंड स्वॉलो टूल (FISST)’ कहा है जिसका ब्रांड नाम हिक्कअवे है। लगभग 1000 रुपए की कीमत वाली L-आकार की यह स्ट्रॉ सख्त प्लास्टिक से बनी है। इसके एक सिरे को मुंह में रखते हैं और इसके दूसरे सिरे पर छोटे से छेद के रूप में प्रेशर वाल्व और एडजस्टेबल कैप है, जिससे पानी की मात्रा को कम-ज़्यादा किया जा सकता है। हिचकी आने पर बस इससे पानी पीना है!

यंत्र के पीछे का विचार यह है कि पानी खींचने में मध्यपाट के संकुचन के लिए फ्रेनिक तंत्रिका सक्रिय होती है, और पानी गटकने में वेगस तंत्रिका सक्रिय होती है। और ये दोनों ही तंत्रिकाएं हिचकी के लिए भी ज़िम्मेदार हैं। इसलिए इन दोनों तंत्रिकाओं को पानी पीने में व्यस्त रखकर हिचकी से बचा जा सकता है।

यंत्र की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने 249 प्रतिभागियों की प्रतिक्रिया पूछी। अधिकांश प्रतिभागियों को महीने में कम से कम एक बार हिचकी आती थी। जामा नेटवर्क ओपन पत्रिका में प्रकाशित नतीजों के अनुसार इस स्ट्रॉ से पानी पीने से लगभग 92 प्रतिशत मामलों में हिचकी रुक गई। 90 प्रतिशत से अधिक प्रतिभागियों ने कहा कि अन्य घरेलू उपायों की तुलना में यह अधिक सुविधाजनक लगा, जबकि 183 ने कहा कि उन्हें इससे बेहतर परिणाम मिले। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह यंत्र तुरंत काम करता है और इसका प्रभाव कई घंटों तक रहता है।

अध्ययन की कुछ सीमाएं भी हैं। पहली, अध्ययन में कोई तुलनात्मक समूह नहीं रखा गया था और दूसरी, निष्कर्ष लोगों के बताए अनुभवों पर आधारित हैं।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि यह समाधान एक ऐसी समस्या के लिए तैयार किया गया है जिसकी कोई मांग नहीं थी। इसके अलावा, इस समस्या के प्रभावी और कम लागत वाले विकल्प मौजूद हैं – जैसे किसी सामान्य स्ट्रॉ से पानी पीते समय दोनों कान कसकर बंद कर लेना। जो कुछ भी छाती फुलाने और गटकने में मदद करेगा – ‘भों’ करके डराना या कुछ और – वह काम करेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डिमेंशिया को संभालने में संगीत की भूमिका – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

डिमेंशिया (मनोभ्रंश) लक्षणों का एक समूह है जो स्मृति और चिंतन को प्रभावित करता है और रोज़मर्रा के जीवन में बाधा डालता है। अल्ज़ाइमर रोग मनोभ्रंश का प्रमुख व सबसे बड़ा कारण है। मनोभ्रंश के लक्षणों को कम करने और उसे बढ़ने से रोकने के उपचार चिकित्सकीय हो सकते हैं या योग, श्वसन सम्बंधी व्यायाम, फुर्तीली सैर और मधुर संगीत सुनने जैसे उपाय हो सकते हैं। यह बीमारी वृद्धावस्था से सम्बंधित बीमारी है, जो दुनिया भर में 5.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 65 वर्ष से अधिक उम्र के साढ़े छह करोड़ वरिष्ठ नागरिकों में से 2.7 प्रतिशत मनोभ्रंश से प्रभावित हैं (राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल)।

मनोभ्रंश से जंग      

कैलिफोर्निया की एक वेबसाइट बेव्यू सीनियर असिस्टेड लिविंग (Bayview Senior Assisted Living) के एक लेख में मनोभ्रंश को नियंत्रित/कम करने के 13 तरीके सुझाए गए हैं। ये हैं: (1) सांस लेना और छोड़ना – पूरा ध्यान सिर्फ सांस बाहर निकलने पर लगाना, (2) किसी पसंदीदा शांत जगह के बारे में सोचना – यह आपकी शोर-मुक्त बैठक भी हो सकती है, (3) किसी पालतू जानवर की देखभाल करना, (4) मालिश – सप्ताह में एक या दो बार मालिश तनाव से राहत देती है, (5) योग – प्राणायाम मन को शांत करता है, (6) संगीत गाना-बजाना – जवानी के दिनों में जो अच्छा लगा था, (7) कलात्मक रचना और दस्तकारी – बुनाई, पेंटिंग वगैरह, (8) अपनी जगह की प्रतिदिन सफाई करना; यह आपके मस्तिष्क को सक्रिय रखता है और उपलब्धि का एहसास देता है, (9) बागवानी – भले ही सिर्फ फूलदान सवारें, (10) अखबार और किताबें पढ़ना न कि सिर्फ टीवी समाचार सुनना (और कौन बनेगा करोड़पति में पूछे गए सवालों के जवाब देने की कोशिश करना), (11) पहेलियां, वर्ग पहेली, सुडोकू और इसी तरह की पहेलियां सुलझाने के प्रयास करना, और एक नई भाषा सीखना, (12) सादा खाना बनाना (निसंदेह किसी की मदद से), और (13) सलीका बनाना (दराज़, अलमारियों का सामान व्यवस्थित करना), फालतू पुरानी फाइलों और पत्रों की छंटाई भी एक उपलब्धि है!

अवसाद कम करने और अल्ज़ाइमर को टालने वाले अन्य महत्वपूर्ण कारक क्या हैं? क्या सिर्फ एक भाषा से परिचित होने की तुलना में द्विभाषिता (दो भाषाओं में आसानी से संवाद की क्षमता) या बहुभाषिता मनोभ्रंश कम करने में अधिक फायदेमंद होती है? हैदराबाद के डॉ. सुभाष कौल और डॉ. सुवर्णा अल्लादी ने इसी पहलू पर अध्ययन किया है। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि मनोभ्रंश से पीड़ित द्विभाषी लोगों में यह विकार एकभाषी लोगों की तुलना में चार साल देर से प्रकट हुआ था।

जैसा कि पता है, भारत के कई हिस्सों में लोग वास्तव में द्विभाषी हैं (वे कम से कम दो भाषाएं बोलते हैं, भले ही पढ़ न पाते हों)। दरअसल, शहरों में काम करने वाले ज़्यादातर लोग ठीक से दो भाषाएं बोल लेते हैं; उनके काम – घरेलू बाइयां, दुकानदार और इसी तरह के अन्य काम – के कारण द्विभाषिता की ज़रूरत पड़ती है। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च की प्रो. विजयलक्ष्मी रवींद्रनाथ ने इस पहलू पर बेंगलुरु के आसपास के लोगों के सर्वेक्षण के साथ-साथ फंक्शनल एमआरआई (FMRI) की मदद से अध्ययन शुरू किया है। बेशक, एकभाषी वरिष्ठ नागरिकों के लिए दूसरी भाषा सीखना शुरू करना फायदेमंद होगा।

संगीत की भूमिका

एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है संगीत। सिर्फ संगीत सुनना भी उपचारात्मक हो सकता है। सेलिया मोरेनो-मोराल्स और उनके साथियों द्वारा फ्रंटियर्स इन मेडिसिन (लौसाने) में एक पेपर प्रकाशित किया गया है। विषय है मनोभ्रंश के उपचार में संगीत की भूमिका। पूर्व में हुए आठ अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर उनका निष्कर्ष है कि संगीत मनोभ्रंश के लिए एक शक्तिशाली उपचार रणनीति हो सकती है – अकेले भी और अन्य औषधियों के साथ मिलाकर भी (जो मनोभ्रंश की प्रकृति पर निर्भर करेगा)।

संगीत स्मृति

इसी तरह का एक पेपर एम. एच. थॉट और उनके साथियों द्वारा अल्ज़ाइमर डिसीज़ एंड एसोसिएटेड डिसऑर्डर्स पत्रिका में प्रकाशित किया गया है, जिसका शीर्षक है: संज्ञानात्मक विकार से पीड़ित वृद्धजनों में दीर्घकालिक संगीत स्मृति का तंत्रिका आधार। इसमें उन्होंने हल्की संज्ञानात्मक क्षति से ग्रसित 17 लोगों के मस्तिष्क क्षेत्रों का FMRI की मदद से स्कैन किया। इस दौरान वे या तो वे अतीत में उनकी पसंद का संगीत सुन रहे थे या नया रचा गया संगीत सुन रहे थे। निष्कर्ष था कि लंबे समय से परिचित संगीत मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों को सक्रिय करता है। और यह भी पता चला कि संज्ञानात्मक रूप से अक्षम वृद्धजनों में पुरानी स्मृतियां क्यों सलामत रहती हैं। दूसरे शब्दों में, वे इसे पहचानते हैं और इसका आनंद लेते हैं!

भारत में इसी तरह के प्रयोग हरियाणा के मानेसर स्थित नेशनल सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च की प्रो. नंदिनी चटर्जी सिंह की टीम द्वारा किए गए हैं। उन्होंने शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीतकारों का एक समूह बनाया। और जब ये कलाकार गायन-वादन कर रहे थे, तब शोधकर्ताओं ने कलाकारों और श्रोताओं का निरीक्षण किया। इस प्रयोग के बारे में आप https://indscicomm.blog वेबसाइट के पॉडकास्ट अनुभाग में या Emotions in Hindustani Music-Part-2. Podcast पर सुनकर लुत्फ उठा सकते हैं।

लय और ताल

यह सिर्फ धुन का नहीं बल्कि लय, समय और हरकत का भी कमाल है। हममें से जो लोग पुराने फिल्मी गाने सुनते हैं, वे संगीत के सुर-ताल में गलतियों को तुरंत पकड़ लेते हैं। ओंटारियो, कनाडा की प्रोफेसर जेसिका ग्राहन का कहना है कि संगीत पर थिरकना एक नैसर्गिक, अक्सर अनैच्छिक, क्रिया होती है जिसका अनुभव सभी संस्कृतियों के लोग करते हैं। जब मनुष्य संगीत पर मानसिक तौर पर थिरकता है, संगीत और लय की प्रतिक्रिया में मस्तिष्क के गति-सम्बंधी केंद्र सक्रिय हो उठते हैं, तब भी जब हमने एक भी मांसपेशी नहीं हिलाई होती या ज़रा भी शरीरिक हरकत नहीं की होती। वे लोग जिन्हें ताल पर थिरकने में परेशानी होती है क्या वे भी मजबूर महसूस करते हैं? यदि ऐसा है तो डिमेंशिया जैसे तंत्रिका विघटन सम्बंधी विकार से पीड़ित लोगों के लिए संगीत हस्तक्षेप की उत्साहजनक संभावना हो सकती है। तो संगीत को बजने दो! (स्रोत फीचर्स)

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भारत ने ‘जनसंख्या बम’ को निष्क्रिय किया

1960 के दशक में भारत ने जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि का सामना किया था। उस समय प्रजनन दर लगभग छह बच्चे प्रति महिला थी। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को विस्तार दिया जिसमें पुरुषों और महिलाओं दोनों को नसबंदी के लिए नकद प्रोत्साहन की पेशकश की गई।

अगले 60 वर्षों तक भारत ने नसबंदी के साथ-साथ गर्भ-निरोधकों और बालिका-शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। अब स्वास्थ्य अधिकारियों का दावा है कि भारत ने अंतत: जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि देश की प्रजनन दर पहली बार 2.1 संतान प्रति महिला के ‘प्रतिस्थापन स्तर’ से नीचे आ गई है। पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की निदेशक पूनम मुतरेजा के अनुसार भारत की महिलाएं अब कम बच्चे पैदा करने को उचित मान रही हैं।

हालांकि, जनसंख्या फिलहाल बढ़ती रहेगी क्योंकि पूर्व की उच्च प्रजनन दर के कारण भारत की दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और एक बड़ा समूह बच्चे पैदा करने की उम्र में पहुंच रहा है। लिहाज़ा, प्रतिस्थापन-दर पर भी जनसंख्या में वृद्धि जारी रहेगी और शायद अगले साल ही भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

फिर भी भारत की जनसंख्या लगभग 3 दशकों में घटने की संभावना है जिससे भारत बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे कई अन्य विकासशील देशों के रास्ते पर चल पड़ेगा। लेकिन प्रजनन दर में गिरावट के मामले में भारत चीन (1.7 बच्चे प्रति महिला) से काफी पीछे है।

विशेषज्ञों का मत है कि जन्म दर में गिरावट के संदर्भ में सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रमुख कारक रहा है। एनएफएचएस सर्वेक्षण के अनुसार 55 प्रतिशत दंपति आधुनिक गर्भ-निरोधकों का उपयोग करते हैं। इनमें से बीस प्रतिशत कंडोम और दस प्रतिशत गोलियों का उपयोग करते हैं। अलबत्ता, सभी गर्भनिरोधकों में से कम से कम दो-तिहाई तो महिला नसबंदी है।

भारत में नसबंदी कार्यक्रम का इतिहास काफी उबड़-खाबड़ रहा है। 1970 के दशक के मध्य में राज्यों को अनिवार्य नसबंदी शिविर संचालित करने के आदेश दिए गए थे। इस दौरान लगभग 1.9 करोड़ लोगों की नसबंदी की गई जिनमें से दो-तिहाई पुरुष थे। वर्तमान में सरकारी नसबंदी क्लीनिकों का ध्यान मुख्य रूप से महिला नसबंदी पर केंद्रित है। कुल गर्भ निरोधकों में से मात्र 0.5 प्रतिशत हिस्सा पुरुष नसबंदी का होता है। आम तौर पर महिलाओं की नसबंदी औसतन 25 की उम्र के आसपास की जाती है जिनके पहले से बच्चे हैं। नसबंदी के लिए नकद प्रोत्साहन के अलावा जबरन नसबंदी की शिकायतें भी मिलती रहती हैं।                        

वैसे तो भारत में शहरी महिलाओं की तुलना में ग्रामीण महिलाएं अधिक बच्चे पैदा करती हैं लेकिन दोनों ही समूहों की प्रजनन दर में लगातार कमी आई है। इसके साथ ही 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर घटकर 34 (प्रति 1000 जीवित जन्म) रह गई है जो 1960 में 241 थी। बच्चों के लंबी उम्र तक जीवित रह पाने के आश्वासन के चलते महिलाएं परिवार नियोजन को ज़्यादा स्वीकार करने लगी हैं।

छोटा परिवार रखने के लिए प्रोत्साहित करने में शिक्षा की भी बड़ी भूमिका रही है। 1960 के दशक में महिलाओं में निरक्षरता दर लगभग 90 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 35 प्रतिशत रह गई। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पापुलेशन साइंस की शोधकर्ता मिलन दास के विश्लेषण के अनुसार 2005 के बाद के दशक में बेहतर शिक्षा के कारण प्रजनन दर में 47 प्रतिशत की कमी आई है। मुतरेजा के अनुसार भारत की महिलाओं की आकांक्षाओं में भी बदलाव आया है। वे अब शादी और बच्चे पैदा करने की बजाय बेहतर नौकरी के अवसरों की तलाश कर रही हैं।     

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रजनन दर भी शिक्षा की भूमिका को दर्शाती है। केरल की साक्षरता दर सबसे अधिक है। केरल ने 1988 में ही प्रतिस्थापन प्रजनन दर हासिल कर ली थी। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुसार बिहार जैसे सबसे कम साक्षर राज्य में 2039 तक प्रतिस्थापन प्रजनन दर प्राप्त करना मुश्किल होगा।

कुछ भारतीय राजनेता अभी भी जनसंख्या विस्फोट पर चर्चा कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश में तो दो से अधिक बच्चे वाले परिवारों को सरकारी नौकरी या राज्य की कल्याण योजनाओं से वंचित रखने का प्रस्ताव है। आलोचकों के अनुसार इस तरह के बयान अक्सर देश के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए दिए जाते हैं। लेकिन 2015-16 के एनएफएचएस सर्वेक्षण के अनुसार हिंदू महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं के औसतन 0.5 प्रतिशत अधिक बच्चे हैं। स्पष्ट है कि प्रजनन सम्बंधी फैसलों में धर्म एक छोटा कारक है।

लेकिन भारत की प्रजनन दर कितनी कम हो सकती है? विशेषज्ञों के अनुसार कम प्रजनन दर वाले राज्यों की दर 1.6 से 1.9 बच्चे प्रति महिला पर स्थिर है। यदि देश में महिला सशक्तिकरण की नीतियों को जारी रखा जाए तो यह दर 1.4 या उससे नीचे जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र के 2019 के जनसंख्या अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 2050 तक 1.64 अरब तक पहुंच कर इस सदी के अंत तक 1.45 अरब रह जाएगी। एक चिंता यह भी व्यक्त की गई है कि यदि प्रजनन दर में तेज़ी से गिरावट आती है तो अर्थव्यवस्था को नुकसान भी हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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कोविड का आंख और कान पर प्रभाव

हामारी की शुरुआत से ही स्वाद और गंध संवेदना के ह्रास कोविड-19 के लक्षणों की तरह पहचाने जाने लगे थे। पता चला है कि दृष्टि और श्रवण संवेदनाएं भी प्रभावित हुई हैं। 10 प्रतिशत से अधिक मरीज़ों में आंख और कान सम्बंधी समस्याएं विकसित हुई हैं जो लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

बीमारी के चेतावनी संकेतों में बुखार, खांसी या स्वाद एवं गंध में बदलाव के साथ आंख में जलन, सुनने में दिक्कत या असंतुलन सम्बंधी समस्याओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि इस संक्रमण के चलते कई अनपेक्षित तंत्रिका सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।

युनिवर्सिटी ऑफ ऊटा के भूपेंद्र पटेल के अनुसार नेत्र रोग विशेषज्ञ ली वेनलियांग को यह संक्रमण संभवत: एक अलक्षणी ग्लूकोमा रोगी से मिला था। महामारी की शुरुआती रिपोर्टों में कोविड के लक्षणों में आंखों का लाल होना भी शामिल था।

2003 के सार्स प्रकोप के दौरान भी सिंगापुर के शोधकर्ताओं ने संक्रमितों के आंसुओं में वायरस पाया था। टोरंटो में उन स्वास्थ्य कर्मियों में संक्रमण का जोखिम अधिक पाया गया जो आंखों के लिए सुरक्षा उपकरण का उपयोग नहीं करते थे।

महामारी के दौरान अधिकांश नेत्र चिकित्सकों ने अपने क्लीनिक बंद रखे थे। इसलिए शुरुआत में आंख सम्बंधी लक्षणों की अनदेखी हुई। कई अध्ययनों के अनुसार महामारी के पहले डेढ़ वर्ष में एकत्रित डैटा से पता चलता है कि कोविड से पीड़ित 11 प्रतिशत लोगों ने नेत्र सम्बंधी समस्याओं की शिकायत की है। इसमें आंख आना और आंखों की झिल्ली में सूजन सबसे आम लक्षण रहे। अन्य लक्षणों में आंखों का सूखना, लाल होना, खुजली, धुंधला दिखना, चुंधियाना और आंख में कुछ गिरने जैसी अनुभूति होना शामिल हैं।

अध्ययन से प्राप्त जानकारी के अनुसार कोविड से ग्रसित व्यक्ति आंसुओं के माध्यम से भी वायरस प्रसारित कर सकता है। वुहान से इटली आई एक 65 वर्षीय महिला में खांसी, गले में खराश और दोनों आंखों में नेत्र-शोथ के लक्षण पाए गए। हालांकि, अस्पताल में भर्ती होने के 20 दिन बाद नेत्र-शोथ की समस्या ठीक हो गई थी लेकिन 27वें दिन लिए गए आंखों के फोहे में वायरल आरएनए पाए गए थे। इटली में 2020 के वसंत में अस्पताल में भर्ती 91 में से 52 रोगियों में श्वसन फोहे के नेगेटिव परिणाम के बाद भी आंखों की सतह पर सार्स-कोव-2 पाए गए थे। बंदरों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि वायरस आंखों के माध्यम से भी शरीर में प्रवेश कर सकता है।

आंखों की समस्याओं के अलावा सुनने और संतुलन बनाने में मुश्किल भी सार्स-कोव-2 संक्रमण का संकेत हो सकता है। युनिवर्सिटी ऑफ लेथब्रिज की ऑडियोलॉजिस्ट और संज्ञान तंत्रिका विज्ञानी ज़हरा जाफरी और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन में 12 प्रतिशत कोविड रोगियों में चक्कर आने, 4.5 प्रतिशत रोगियों में कान बजने और 3 प्रतिशत में श्रवण संवेदना में क्षति पाई है।

कुल मिलाकर लगता है कि दृष्टि व श्रवण सम्बंधी लक्षणों को चेतावनी संकेतों में शामिल किया जाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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ओमिक्रॉन से सम्बंधित चिंताजनक डैटा

मिक्रॉन संस्करण के उभार ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि ओमिक्रॉन ऐसे लोगों को संक्रमित करने की क्षमता रखता है जो पूर्व में वायरस के प्रभाव से उबर चुके हैं। अर्थात यह नया संस्करण प्रतिरक्षा तंत्र के कुछ हिस्सों को चकमा देने में सक्षम है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह संस्करण टीका-प्रेरित प्रतिरक्षा से भी बच सकता है।

दक्षिण अफ्रीका बड़े पैमाने पर कोविड-19 की तीन लहरों – मूल वायरस, बीटा संस्करण और डेल्टा संस्करण – का सामना कर चुका है। अध्ययनों से पता चलता है कि पूर्व-संक्रमण ने बीटा और डेल्टा के विरुद्ध अपूर्ण लेकिन महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान की थी और उम्मीद थी कि दक्षिण अफ्रीका ने झुंड-प्रतिरक्षा विकसित कर ली होगी। लेकिन वैज्ञानिकों को डर है कि ओमिक्रॉन में ऐसे कई उत्परिवर्तन हैं जो प्रतिरक्षा को भेदने में सक्षम हैं।

हाल ही में किए गए एक अध्ययन में 28 लाख पॉज़िटिव मामलों में से 35,670 पुन: संक्रमण के मामले थे। हालांकि, इस अध्ययन में न तो यह बताया गया है कि ओमिक्रॉन किस हद तक लोगों को बीमार करता है और न ही इसमें टीकाकृत लोगों की स्थिति पर कोई चर्चा की गई है। संभावना है कि पूर्व संक्रमण या टीकाकरण गंभीर बीमारी से कुछ हद तक बचा सकेगा।

दक्षिण अफ्रीका की महामारीविद जूलियट पुलियम और उनके सहयोगियों ने पाया कि प्रयोगशाला में बीटा संस्करण पूर्व में संक्रमित लोगों की प्रतिरक्षा से बच निकलने में सक्षम है। वे इस व्यवहार को वास्तविक परिस्थिति में समझना चाहते थे।

शोधकर्ताओं ने व्यापक डैटा का उपयोग करते हुए पुन:संक्रमण की संख्या का विश्लेषण किया। पुन:संक्रमण को प्रारंभिक संक्रमण के 90 दिनों से अधिक समय बाद पॉज़िटिव परीक्षण के रूप में परिभाषित किया गया। उन्होंने पाया कि पूर्व-संक्रमणों ने बीटा और डेल्टा लहरों के दौरान लोगों के संक्रमित होने के जोखिम को कम किया है। इस वर्ष अक्टूबर में जब संक्रमण दर काफी कम थी तब पुलियम ने कुछ विचित्र डैटा देखा। उन्होंने पाया कि पहली बार संक्रमण का जोखिम तो कम हो रहा है (संभवतः टीकाकरण में वृद्धि के कारण) लेकिन पुन: संक्रमण का जोखिम तेज़ी से बढ़ रहा है। ओमिक्रॉन की खोज ने कुछ हद तक इस गुत्थी को सुलझा दिया।

हालांकि इस बारे में काफी अनिश्चितताएं हैं लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व-संक्रमण डेल्टा की तुलना में ओमिक्रॉन के विरुद्ध सिर्फ आधी सुरक्षा देता है।

फिलहाल तो सभी की निगाहें दक्षिण अफ्रीका के अस्पतालों पर टिकी हैं जो एक बार फिर कोविड-19 रोगियों से भरने लगे हैं। इन्हीं स्थानों पर शोधकर्ताओं को कुछ सुराग मिलने की उम्मीद है जिससे यह पता चल सकेगा कि पूर्व के संक्रमण या टीकाकरण किस हद तक पुन:संक्रमण की संभावना व गंभीरता को कम करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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गर्मी के झटके और शीत संवेदना – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन


प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है।   ऐसा न होने पर कई विकार उत्पन्न होते हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह प्रोटीन्स को सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन प्रोटीन कहते हैं।

डीएनए न्यूक्लियोटाइड्स की एक सीधी शृंखला है, जिसके कुछ हिस्सों का सटीक अनुलेखन संदेशवाहक आरएनए (mRNA) में किया जाता है। फिर आरएनए में निहित संदेश अमीनो अम्लों की एक शृंखला यानी प्रोटीन में बदले जाते हैं। प्रोटीन कामकाजी इकाई बन जाएं इसके लिए उन्हें एक सटीक त्रि-आयामी आकार में ढलना पड़ता है। और अक्सर इस आकार में ढलने के लिए प्रोटीन में तहें अपने आप नहीं बनती हैं। प्रोटीन का एक विशेष समूह इन्हें सही ढंग से तह करने में मदद करता है। इन्हें शेपरॉन (सहचर) प्रोटीन कहते हैं।

जीव विज्ञान में शेपरॉन

वैसे शेपरॉन का विचार विचित्र और पुरातनपंथी लग सकता है, लेकिन जैविक कार्यों में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नई प्रोटीन शृंखला को सही आकार देने के बाद शेपरॉन वहां से हट जाते हैं। या फिर नई शृंखला हटा दी जाती है। शेपरॉन के बिना नव-संश्लेषित प्रोटीन्स जल्द ही अघुलनशील उलझे गुच्छे बन जाते हैं, जो कोशिकीय प्रक्रियाओं में बाधा डालते हैं।

कई शेपरॉन ‘हीट शॉक’ प्रोटीन (या ऊष्मा-प्रघात प्रोटीन) की श्रेणी में आते हैं। जब भी किसी जीव को उच्च तापमान का झटका (हीट शॉक) लगता है तो उसके प्रोटीन अपना मूल आकार खोने लगते हैं। व्यवस्था को बहाल करने के लिए बड़ी संख्या में शेपरॉन बनते हैं।

शरीर में सामान्य कोशिकीय क्रियाओं के संचालन लिए भी शेपरॉन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन का गलत जगह या गलत तरीके से मुड़ना कई रोगों का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए तंत्रिकाओं में अल्फा-सायन्यूक्लीन प्रोटीन पाया जाता है। यह गलत तह किया गया हो तो पार्किंसन रोग होता है। अल्ज़ाइमर के रोगियों के मस्तिष्क में एमिलॉयड बीटा-पेप्टाइड के गुच्छों से बने प्लाक होते हैं। एमिलॉयड तंतुओं का यह जमाव विषैला होता है जो व्यापक पैमाने पर तंत्रिकाओं का नाश करता है – यह एक ‘तंत्रिका-विघटन’ विकार है। आंख के लेंस के प्रोटीन (क्रिस्टेलिन) के गलत ढंग से तह हो जाने के कारण मोतियाबिंद होता है। आंखों के लेंस में अल्फा-क्रिस्टेलिन नामक प्रोटीन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जो स्वयं शेपरॉन के रूप में कार्य करते हैं – मानव अल्फा क्रिस्टेलिन में एक अकेला उत्परिवर्तन कतिपय जन्मजात मोतियाबिंद के लिए ज़िम्मेदार होता है।

आणविक तापमापी

मनुष्यों में प्रमुख शेपरॉन में HSP70, HSC70 और HSP90 शामिल हैं। इन नामों में जो संख्याएं हैं वे प्रोटीन की साइज़ (किलोडाल्टन में) दर्शाती हैं। सामान्य कोशिकाओं में पाए जाने वाले प्रोटीन्स में से 1-2 प्रतिशत प्रोटीन हीट शॉक प्रोटीन होते हैं। तनाव की स्थिति में इनकी संख्या तीन गुना तक बढ़ जाती है।

HSP70 तो ऊष्मा का संपर्क होने पर बनता है जबकि HSC70 हमेशा सामान्य कोशिकाओं में काफी मात्रा में मौजूद होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि HSC70 एक आणविक तापमापी की तरह काम करता है, जिसमें ठंडे (कम तापमान) को महसूस करने की क्षमता है। यह बात कुछ पेचीदा विकारों के अध्ययन से पता चली है। ऐसे विकारों का एक उदाहरण दुर्लभ फैमिलियल कोल्ड ऑटोइन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम यानी खानदानी शीत आत्म-प्रतिरक्षा विकार (FCAS) है। इस समूह के विकारों के लक्षणों में त्वचा पर चकत्ते, जोड़ों में दर्द और बुखार शामिल हैं। ये लक्षण कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक बने रह सकते हैं। इनकी शुरुआत कम उम्र में हो जाती है, और ये ठंड के कारण या थकान जैसे तनाव के कारण शुरू होते हैं। इस विकार के भ्रामक लक्षणों के कारण इसका निदान मुश्किल होता है – पहली बार प्रकट होने के बाद पक्का निदान करने में दस-दस साल लग जाते हैं।

भारत में FCAS ग्रस्त पहला परिवार इस साल अगस्त में पहचाना गया था। बेंगलुरु स्थित एस्टर सीएमआई अस्पताल के सागर भट्टड़ और उनके सहयोगियों ने चार साल के एक लड़के, जिसे अक्सर जाड़ों में चकत्ते पड़ जाते थे, में FCAS के आनुवंशिक आधार का पता लगाया। पता चला है कि उसके दादा सहित परिवार के कई सदस्यों में यही दिक्कतें थी (इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स, अगस्त 2021)।

ठंडा महसूस करने में HSC70 की भूमिका को लेकर सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के घनश्याम स्वरूप और उनके समूह ने आत्म-प्रतिरक्षा जनित शोथ (ऑटोइन्फ्लेमेशन) की स्थिति शुरू होने की एक रूपरेखा तैयार की है (FEBS जर्नल, सितंबर 2021)।

शीत संवेदना से सम्बंधित विकार उन प्रोटीन्स में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं जो शोथ को नियंत्रित करते हैं। शरीर के सामान्य तापमान पर तो HSC70 इन उत्परिवर्तित प्रोटीनों को भी सही ढंग से तह होने के लिए तैयार कर लेता है, और इस तरह ये उत्परिवर्तित प्रोटीन भी सामान्य ढंग से कार्य करते रहते हैं। ठंड की स्थिति में, HSC70 अणु का आकार खुद थोड़ा बदल जाता है और शोथ के लिए ज़िम्मेदार उत्परिवर्तित अणुओं के साथ यह उतनी मुस्तैदी से निपट नहीं पाता। इस कारण दो घंटे के भीतर ही ठंड लगना, जोड़ों में दर्द और त्वचा पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

कैंसर कोशिकाएं अंधाधुंध तरह से विभाजित होती हैं। कैंसर की ऐसी तनावपूर्ण स्थिति को बनाए रखने में हीट शॉक प्रोटीन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कैंसर कोशिकाओं में हीट शॉक प्रोटीन की अधिकता रोग के बिगड़ने का संकेत होता है। कैंसर कोशिकाओं में ऐसे प्रोटीन्स, जो सामान्य रूप से ट्यूमर का दमन करते हैं, में उत्परिवर्तन इकट्ठे होते चले जाते हैं। इस मामले में HSP70 और HSP90 खलनायक की भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे उत्परिवर्तित प्रोटीन को तह करना जारी रखते हैं और ट्यूमर को बढ़ने का मौका देते हैं। प्रयोगशाला में, HSP90 के अवरोधकों ने कैंसर विरोधी एजेंटों के रूप में आशाजनक परिणाम दिए हैं। अलबत्ता, मनुष्यों पर उपयोग के लिए अब तक किसी भी अवरोधक को मंज़ूरी नहीं मिली है, क्योंकि प्रभावी होने के लिए इन रसायनों की जितनी अधिक मात्रा की ज़रूरत होती है वह मानव शरीर के हानिकारक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मच्छर वाहित रोगों से लड़ाई – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

च्छर वाहित बीमारियां हज़ारों वर्षों से अभिशाप रही हैं, इनकी वजह से कई सेनाएं परास्त हुईं और अर्थव्यवस्थाएं डगमगाई हैं। ऐसे में मलेरिया के लिए एक प्रभावी टीका आने की रिपोर्ट हमें राहत देती है। इस टीके के क्लीनिकल परीक्षण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और अन्य ने बुर्किना फासो में किए हैं।

पश्चिम अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में मानसून के बाद लंबे समय तक गर्मी पड़ती है, और तब ही मच्छर बड़े झुंडों में निकलते हैं। R21 नामक टीके ने 77 प्रतिशत प्रभाविता दर्शाई है। यह टीका मलेरिया परजीवी, प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम, के सर्कमस्पोरोज़ाइट प्रोटीन (CSP) को लक्षित करता है। इस परजीवी की स्पोरोज़ाइट अवस्था CSP स्रावित करती है। मच्छर के काटने से CSP और स्पोरोज़ाइट्स मानव रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। CSP परजीवी को यकृत (लीवर) में ले जाता है जहां यह यकृत कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है, परिपक्व होता है और संख्या वृद्धि करता है। फिर, परिपक्व मेरोज़ाइट्स मुक्त होते हैं और मलेरिया के लक्षण दिखाई देने शुरू हो जाते हैं।

मलेरिया के टीके

हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने एक टीके, मॉस्क्यूरिक्स, को मंज़ूरी दी है। यह टीका यूके के ग्लैक्सो स्मिथ क्लाइन (जीएसके) ने लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के सहयोग से तैयार किया है। इस टीके का परीक्षण केन्या, मलावी और घाना के 8 लाख से अधिक बच्चों पर किया गया है। टीका लेने के पहले साल में इसकी प्रभाविता 50 प्रतिशत से अधिक देखी गई है, लेकिन वक्त बीतने के साथ प्रभाविता कम होती गई। ग्लोबल वैक्सीन एलायंस (जीएवीआई) उन देशों के लिए टीके खरीदने की योजना बना रहा है जिन्होंने इसकी मांग की है।

हैदराबाद की भारत बायोटेक ने भारत में इस टीके को विकसित करने के लिए जीएसके के साथ अनुबंध किया है, जिसके लिए भुवनेश्वर में विशेष व्यवस्था होगी।

डेंगू से जंग

एक और तेज़ी से फैलने वाली बीमारी है डेंगू। यह एडीज़ एजिप्टी मच्छरों से फैलती है, जो ठहरे हुए पानी में पनपते हैं, जैसे टायर वगैरह में भरा पानी। डेंगू वायरस के चार सीरोटाइप पाए जाते हैं। सीरोटाइप टीका निर्माण को मुश्किल बनाते हैं, क्योंकि प्रत्येक सीरोटाइप के लिए अलग टीके की आवश्यकता होती है। सेनोफी पाश्चर द्वारा डेंगू के खिलाफ तैयार किया गया टीका, डेंगवैक्सिया, कई देशों में स्वीकृत है और वायरस के चारों सीरोटाइप के खिलाफ 42 प्रतिशत से 78 प्रतिशत तक कारगर है।

भारत में ज़ायडस कैडिला डेंगू के खिलाफ डीएनए आधारित एक टीका विकसित कर रही है। तिरुवनंतपुरम स्थित राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नॉलॉजी के डॉ. ईश्वरन श्रीकुमार ने चारों सीरोटाइप का एक साझा संस्करण तैयार किया है जो ज़ायडस कैडिला के डीएनए आधारित टीके की बुनियाद है। इस कार्य में कोविड-19 टीका विकसित करने के अनुभव का लाभ मिल रहा है।

डेंगू से लड़ने के अन्य नए तरीकों पर भी काम चल रहा है। इनमें से एक दिलचस्प तरीके में एक बैक्टीरिया, वॉल्बेचिया पाइपिएंटिस, का उपयोग किया जाता है। वॉल्बेचिया पाइपिएंटिस एक-कोशिकीय परजीवी है। यह परजीवी सामान्यत: कई कीटों में पाया जाता है, लेकिन यह डेंगू फैलाने वाले मच्छरों में नहीं होता। जब इस परजीवी को डेंगू फैलाने वाले मच्छरों की कोशिकाओं में प्रवेश कराया जाता है तो यह डेंगू, चिकनगुनिया, पीत ज्वर और ज़ीका का कारण बनने वाले अन्य परजीवियों से सफल प्रतिस्पर्धा करता है।

प्रयोगशाला में वॉल्बेचिया से ग्रस्त किए गए एडीज़ मच्छर उन इलाकों में छोड़े जाते हैं जहां यह बीमारी अधिक होती है। ये मच्छर फौरन ही स्थानीय एडीज़ मच्छरों में इस बैक्टीरिया को फैला देते हैं, और डेंगू के नए मामले कम होने लगते हैं। गादजाह मादा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जकार्ता में किए गए एक नियंत्रित अध्ययन में दिसंबर 2017 में शहर के 12 इलाकों में वॉल्बेचिया से संक्रमित एडीज़ मच्छर के अंडे रखे (9 अन्य इलाकों में नियंत्रण के तौर पर वॉल्बेचिया-रहित अंडे रखे गए)। मार्च 2020 में कोविड महामारी के कारण अध्ययन थम जाने तक नियंत्रण वाले 9 इलाकों की तुलना में 12 प्रायोगिक इलाकों में डेंगू के 77 प्रतिशत कम मामले दर्ज हुए थे। डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में 86 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी और बुखार की तीव्रता भी कम हुई थी।

रोकथाम

मच्छर वाहित बीमारियों का इलाज करने की बजाय उनसे बचाव का एक और तरीका यह है इनके अगले प्रकोप की सटीक भविष्यवाणी कर ली जाए। और उसके मुताबिक अपने स्वास्थ्य तंत्र और मच्छर नियंत्रण प्रणालियों का उपयोग किया जाए।

मच्छर और प्लास्मोडियम परजीवी दोनों को पनपने के लिए गर्म और नम मौसम की आवश्यकता होती है। NOAA-19 जैसे पर्यावरण उपग्रहों द्वारा लगातार एकत्रित किए गए डैटा का उपयोग करते हुए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च के वैज्ञानिकों ने ऐसे मॉडल तैयार किए हैं जो मासिक वर्षा डैटा और डेंगू और मलेरिया के वार्षिक राज्य-वार प्रकोप के डैटा को अल-नीनो-सदर्न ऑसीलेशन के साथ जोड़ता है। अल-नीनो-सदर्न ऑसीलेशन वैश्विक वायुमंडलीय प्रवाह को प्रभावित करता है। इस तरह, यह एक पूर्व-चेतावनी उपकरण है जो प्रकोप के शुरू होने, उसके फैलने और संभावित मामलों की संख्या का पूर्वानुमान लगाता है। इस तरह स्वास्थ्य अधिकारी प्रकोप के प्रभाव को कम करने के लिए कई हफ्तों पहले से ही एहतियाती उपाय शुरू कर सकते हैं। भारत में वर्तमान में यह जानकारी राज्य स्तर के लिए उपलब्ध है। अगला कदम ज़िला स्तर पर जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रोटीन का आकार छोटा-बड़ा हो सकता है

श्चर्य की बात है कि लोगों के एक ही प्रोटीन की साइज़ में अंतर हो सकता है – कुछ में छोटा तो कुछ में बड़ा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन प्रोटीन को कोड करने वाले जीन में डीएनए शृंखला के कुछ खंडों का कई बार दोहराव हो जाता है। इस दोहराव की संख्या हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है। डीएनए खंड का प्रत्येक दोहराव प्रोटीन में अमीनो अम्ल की एक अतिरिक्त शृंखला जोड़ देता है। जीन में दोहराव जितनी अधिक बार होगा प्रोटीन का आकार उतना ही बड़ा होगा।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जीन के छोटे संस्करण द्वारा निर्मित प्रोटीन में 1000 अमीनो अम्ल और जीन के लंबे संस्करण द्वारा निर्मित प्रोटीन में 2000 अमीनो अम्ल तक हो सकते हैं। जीन में यह दोहराव वेरियेबल नंबर ऑफ टेंडम रिपीट (वीएनटीआर) कहलाता है।

हाल ही में हुए वीएनटीआर के एक व्यापक विश्लेषण में पाया गया है कि ये दोहराव व्यक्ति के कद और गंजेपन जैसे लक्षणों को काफी प्रभावित करते हैं। साइंस पत्रिका में प्रकाशित नतीजों के अनुसार वीएनटीआर की मदद से ओझल आनुवंशिकता को समझने में मदद मिलेगी: देखा गया है कि ज्ञात आनुवंशिक संस्करण मनुष्यों में बीमारियों, व्यवहार और अन्य शारीरिक लक्षणों (यानी फीनोटाइप) की व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं होते।

वैसे तो आनुवंशिकीविद काफी समय से वीएनटीआर के संभावित प्रभावों के बारे में जानते हैं लेकिन इनका अध्ययन करना तकनीकी कारणों से मुश्किल है। इसलिए ब्रॉड इंस्टीट्यूट के आनुवंशिकीविद रोनेन मुकामेल और उनके साथियों ने उपलब्ध डीएनए अनुक्रमण डैटा और सांख्यिकीय तकनीक की मदद से वीएनटीआर के आकार का अनुमान लगाया।

शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक प्रोजेक्ट के चार लाख से अधिक प्रतिभागियों के 118 प्रोटीन को कोड करने वाले जीन्स में वीएनटीआर के प्रभाव का विश्लेषण किया। उन्होंने इन वीएनटीआर की लंबाई और 786 विभिन्न फीनोटाइप के बीच सम्बंध देखा। यूके बायोबैंक में बड़े पैमाने पर लोगों की विस्तृत आनुवंशिक और स्वास्थ्य जानकारी है।

शोधकर्ताओं को विश्लेषण में प्रोटीन के आकार और मनुष्यों के फीनोटाइप के बीच मज़बूत सम्बंध दिखा। और कई मामलों में वीएनटीआर का प्रभाव किसी अन्य ज्ञात आनुवंशिक परिवर्तन से अधिक मिला। कुल 19 फीनोटाइप और पांच विभिन्न वीएनटीआर के बीच मज़बूत सम्बंध दिखा। वीएनटीआर के स्वास्थ्य सम्बंधी प्रभावों में लिपोप्रोटीन(ए) का उच्च स्तर (जो हृदय धमनी रोग का प्रमुख कारक है) और किडनी कार्यों से जुड़े कई लक्षण शामिल हैं। यह कद से भी स्पष्ट रूप से जुड़ा दिखा। एग्रेकेन प्रोटीन को कोड करने वाले ACAN जीन की भिन्न-भिन्न वीएनटीआर लंबाई के कारण लोगों की ऊंचाई में औसतन 3.2 सेमी अंतर दिखा।

इस तरह की खोजें किसी व्यक्ति में रोग विकसित होने की संभावना के बारे में पता करने के आनुवंशिक परीक्षण के नए तरीके देती है। यह रोग निदान का एक नया तरीका हो सकता है जो लक्षण प्रकट होने से पूर्व संकेत दे सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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नई पैनल करेगी महामारी के स्रोत का अध्ययन

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति की जांच के लिए एक नई पैनल गठित की है। साइंटिफिक एडवायज़री ग्रुप ऑन दी ओरिजिंस ऑफ नावेल पैथोजेंस (एसएजीओ) नामक इस टीम को भविष्य के प्रकोपों और महामारियों की उत्पत्ति तथा उभरते रोगजनकों के अध्ययन के लिए सुझाव देने का भी काम सौंपा गया है।

एसएजीओ में 26 देशों के 26 शोधकर्ताओं को शामिल किया गया है। 6 सदस्य पूर्व अंतर्राष्ट्रीय टीम का भी हिस्सा रहे हैं जिसने सार्स-कोव-2 की प्राकृतिक उत्पत्ति का समर्थन किया था। गौरतलब है कि डबल्यूएचओ ने 700 से अधिक आवेदनों में से इन सदस्यों का चयन किया है और औपचारिक घोषणा 2 सप्ताह बाद की जाएगी।

वैश्विक स्वास्थ्य की विशेषज्ञ और जॉर्जटाउन युनिवर्सिटी की वकील एलेक्ज़ेंड्रा फेलन इस टीम को एक प्रभावशाली समूह के रूप में देखती हैं लेकिन मानती हैं कि महिलाओं की भागीदारी अधिक होनी चाहिए थी। साथ ही उनका मत है कि पैनल में नैतिकता और समाज शास्त्र के विशेषज्ञों का भी अभाव है।

उत्पत्ति सम्बंधी डबल्यूएचओ का पूर्व अध्ययन राजनीति, हितों के टकराव और अपुष्ट सिद्धांतों के चलते भंवर में उलझा था। ऐसी ही दिक्कतें पिछले प्रकोपों की जांच के दौरान भी उत्पन्न हुई थीं। डबल्यूएचओ को उम्मीद है कि एक स्थायी पैनल गठित करने से कोविड-19 के स्रोत पर चल रही तनाव की स्थिति में कमी आएगी और भविष्य के रोगजनकों की जांच अधिक सलीके से हो सकेगी। संगठन का उद्देश्य इसे राजनीतिक बहस से दूर रखते हुए वैज्ञानिक बहस की ओर ले जाना है।

मोटे तौर पर एसएजीओ का ध्यान इस बात पर होगा कि खतरनाक रोगजनक जीव कब, कहां और कैसे मनुष्यों को संक्रमित करते हैं, कैसे इनके प्रसार को कम किया जा सकता है और प्रकोप का रूप लेने से रोका जा सकता है। एसएजीओ के विचारार्थ मुद्दों में वर्तमान महामारी की उत्पत्ति के बारे में उपलब्ध सबूतों का स्वतंत्र मूल्यांकन और आगे के अध्ययन के लिए सलाह देना शामिल है।       

इसके चलते तनाव की स्थिति भी बन सकती है। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन का निष्कर्ष था कि नए कोरोनावायरस की प्रयोगशाला में उत्पत्ति संभव नहीं है और इस विषय में आगे जांच न करने की भी बात कही गई थी। लेकिन डबल्यूएचओ के निदेशक टेड्रोस ने इस निष्कर्ष को “जल्दबाज़ी” बताया था। यानी पैनल को प्रयोगशाला उत्पत्ति पर विचार करना होगा। इससे टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। चीन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि भविष्य में वह ऐसी किसी जांच में सहयोग नहीं करेगा।

बहरहाल, एसएजीओ को उत्पत्ति सम्बंधी अध्ययन को वापस उचित दिशा देने का मौका है। यदि इसकी संभावना नहीं होती तो एसएजीओ की स्थापना ही क्यों की जाती। डबल्यूएचओ के प्रारंभिक मिशन से जुड़े कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह काफी महत्वपूर्ण है कि एसएजीओ की स्थापना से ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले स्वतंत्र समूहों के काम में बाधा नहीं आनी चाहिए जो किसी प्रकोप के उभरने के बाद तुरंत जांच में लग जाते हैं। संभावना है कि पैनल कई अलग-अलग समूहों को भी अपने साथ शामिल कर सकती है जो अलग-अलग परिकल्पनाओं की छानबीन तथा पहली समिति द्वारा सुझाए गए अध्ययनों को आगे बढ़ा सकते हैं।  

एसएजीओ के पास कई रास्ते हैं – वुहान और उसके आसपास के बाज़ारों में बेचे जाने वाले वन्यजीवों और चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के चमगादड़ों में सार्स वायरस का अध्ययन; चीन में दिसंबर 2019 से पहले पाए गए मामलों की जांच; और वुहान और आसपास के क्षेत्रों के ब्लड बैंकों में 2019 से संग्रहित रक्त नमूनों का विश्लेषण और मौतों का विस्तृत अध्ययन।

डबल्यूएचओ की प्रथम समिति ने वुहान के ब्लड बैंकों में संग्रहित 2 लाख नमूनों की जांच का सुझाव दिया था। इनमें से कुछ नमूने तो दिसंबर 2019 के भी पहले के हैं। चीन ने वायदा किया है कि वह उन नमूनों के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को साझा करेगा लेकिन कुछ कानूनी कारणों से नमूनों की संग्रह तिथि के 2 वर्ष बाद तक जांच नहीं की जा सकती। संभावना है कि 2 वर्ष की अवधि पूरे होते ही जांच शुरू कर दी जाएगी।

एक बात तो स्पष्ट है कि एसएजीओ को काम करने के लिए राष्ट्रों, मीडिया और आम जनता का सहयोग ज़रूरी है। यह हमारे पार वायरस की उत्पत्ति को जानने का शायद आखिरी मौका हो। (स्रोत फीचर्स)

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कोविड वायरस का निकटतम सम्बंधी मिला

हाल ही में वैज्ञानिकों को लाओस में चमगादड़ों में तीन ऐसे वायरस मिले हैं जो किसी ज्ञात वायरस की तुलना में सार्स-कोव-2 से अधिक मेल खाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इस वायरस के जेनेटिक कोड के कुछ हिस्सों का अध्ययन करने से पता चला है कि सार्स-कोव-2 वायरस प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुआ है। साथ ही इस खोज से यह खतरा भी सामने आया है कि मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता वाले कई अन्य कोरोनावायरस मौजूद हैं।

वैसे प्रीप्रिंट सर्वर रिसर्च स्क्वेयर में प्रकाशित इस अध्ययन की समकक्ष समीक्षा फिलहाल नहीं हुई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस वायरस में पाए जाने वाले रिसेप्टर बंधन डोमेन लगभग सार्स-कोव-2 के समान होते हैं जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करने में सक्षम होते हैं। रिसेप्टर बंधन डोमेन सार्स-कोव-2 को मानव कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ACE-2 नामक ग्राही से जुड़कर उनके भीतर प्रवेश करने की अनुमति देते हैं।

पेरिस स्थित पाश्चर इंस्टीट्यूट के वायरोलॉजिस्ट मार्क एलियट और फ्रांस तथा लाओस में उनके सहयोगियों ने उत्तरी लाओस की गुफाओं से 645 चमगादड़ों की लार, मल और मूत्र के नमूने प्राप्त किए। चमगादड़ों की तीन हॉर्सशू (राइनोलोफस) प्रजातियों से प्राप्त वायरस सार्स-कोव-2 से 95 प्रतिशत तक मेल खाते हैं। इन वायरसों को BANAL-52, BANAL-103 और BANAL-236 नाम दिया गया है।   

युनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के वायरोलॉजिस्ट एडवर्ड होम्स के अनुसार जब सार्स-कोव-2 को पहली बार अनुक्रमित किया गया था तब रिसेप्टर बंधन डोमेन के बारे में हमारे पास पहले से कोई जानकारी नहीं थी। इस आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि इस वायरस को प्रयोगशाला में विकसित किया गया है। लेकिन लाओस से प्राप्त कोरोनावायरस पुष्टि करते हैं कि सार्स-कोव-2 में ये डोमन प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहे हैं। देखा जाए तो थाईलैंड, कम्बोडिया और दक्षिण चीन स्थित युनान में पाए गए सार्स-कोव-2 के निकटतम सम्बंधित वायरसों पर किए गए अध्ययन इस बात के संकेत देते हैं कि दक्षिणपूर्वी एशिया सार्स-कोव-2 सम्बंधित विविध वायरसों का हॉटस्पॉट है।

इस अध्ययन में एक कदम आगे जाते हुए एलियट और उनकी टीम ने प्रयोगों के माध्यम से यह बताया कि इन वायरसों के रिसेप्टर बंधन डोमेन मानव कोशिकाओं पर उपस्थित ACE-2 रिसेप्टर से उतनी ही कुशलता से जुड़ सकते हैं जितनी कुशलता से सार्स-कोव-2 के शुरुआती संस्करण जुड़ते थे। शोधकर्ताओं ने BANAL-236 को कोशिकाओं में कल्चर किया है जिसका उपयोग वे जीवों में वायरस के प्रभाव को समझने के लिए करेंगे।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष शोधकर्ताओं ने सार्स-कोव-2 के एक निकटतम सम्बंधी RaTG13 का भी पता लगाया था जो युनान के चमगादड़ों में पाया गया था। यह वायरस सार्स-कोव-2 से 96.1 प्रतिशत तक मेल खाता है जिससे यह कहा जा सकता है कि 40 से 70 वर्ष पूर्व इन दोनों वायरसों का एक साझा पूर्वज रहा होगा।

एलियट के अनुसार BANAL-52 वायरस सार्स-कोव-2 से 96.8 प्रतिशत तक मेल खाता है। एलियट के अनुसार खोज किए गए तीन वायरसों में अलग-अलग वर्ग हैं जो अन्य वायरसों की तुलना में सार्स-कोव-2 के कुछ भागों से अधिक मेल खाते हैं। गौरतलब है कि वायरस एक दूसरे के साथ RNA के टुकड़ों की अदला-बदली करते रहते हैं।    

हालांकि, इस अध्ययन से महामारी के स्रोत के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हुई है लेकिन इसमें कुछ कड़ियां अभी भी अनुपस्थित हैं। जैसे कि लाओस वायरस के स्पाइक प्रोटीन पर तथाकथित फ्यूरिन क्लीवेज साइट नहीं है जो मानव कोशिकाओं में सार्स-कोव-2 या अन्य कोरोनावायरसों को प्रवेश करने में सहायता करती हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वायरस वुहान तक कैसे पहुंचे जहां कोविड-19 के पहले ज्ञात मामले की जानकारी मिली थी। क्या यह वायरस किसी मध्यवर्ती जीव के माध्यम से वहां पहुंचा था? इसका जवाब तो दक्षिण-पूर्वी एशिया में चमगादड़ों व अन्य वन्यजीवों के नमूनों के विश्लेषण से ही मिल सकता है जिस पर कई शोध समूह कार्य कर रहे हैं। प्रीप्रिंट में एक और अध्ययन प्रकाशित हुआ है जो पूर्व में चीन में किया गया था। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2016 और 2021 के बीच 13,000 से अधिक चमगादड़ों के नमूनों पर अध्ययन किया था जिनमें से सार्स-कोव-2 वायरस के किसी भी निकट सम्बंधी की जानकारी प्राप्त नहीं हुई थी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि इस वायरस के वाहक चमगादड़ों की संख्या चीन में काफी कम है। इस पर भी कई अन्य शोधकर्ताओं ने असहमति जताई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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