जीवाश्म (fossils) वे अश्मीभूत अवशेष या निशान होते हैं जो किसी प्राचीन सजीव के मरने के बाद लाखों- करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि जीवाश्म हमेशा पूरे के पूरे जीव के रूप में मिलें, बल्कि इनके कुछ हिस्से अश्मीभूत रूप मिल सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत, खोल या कवच (सीप, घोंघे के), पत्ती या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारा के जीवों की)। एडिआकारा के जीवाश्म अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनमें अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (Geological Society of America) के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत बारीक विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, वह भी ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यत: संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता।
दरअसल, जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश (soft bodied organisms), वे जीव लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं मिल पाते। फिर, बलुआ-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिनमें पानी आसानी से रिस सकता है। ये चट्टानें आम तौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती हैं। ऐसे हालातों में नाज़ु़क जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले कुछ असाधारण हुआ। इसे एडिआकारन काल (Ediacaran period) कहा जाता है। इस दौरान समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता (exceptional fossilization) के साथ संरक्षित हो गए।
लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पूर्व से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास (geological time scale) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहली बार बड़े, जटिल और नग्न आंखों से देखे जा सकने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में अधिकांश जीवों के शरीर में न तो हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे, बस त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अत: एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग (Precambrian era) का अंतिम दौर था, जिसके बाद कैंब्रियन युग शुरू हुआ।
ये जीव कैंब्रियन जैविक विस्फोट (Cambrian explosion) से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध जंतु जीवन का तेज़ी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे विकसित प्रक्रिया (gradual evolution) का परिणाम मानते हैं।
येल विश्वविद्यालय (Yale University) की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन (Lydia Tarhan) इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ़्यूज़’ कहती हैं, जिसमें एडिआकारा जीव समूह के जानवर आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।
अश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया (fossilization process)
इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना विकासक्रम (evolutionary history) में उनके स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया एक अध्ययन, जो जियोलॉजी पत्रिका (Geology journal) के 15 दिसम्बर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है: Authigenic clays shaped Ediacara-style exceptional fossilization।
अध्ययन में शोधकर्ताओं (scientific study) ने एक नई रासायनिक तकनीक अपनाई। उन्होंने न्यूफाउंडलैंड और उत्तर-पश्चिमी कनाडा से मिले एडिआकारा जीवाश्मों में लीथियम समस्थानिकों का विश्लेषण किया। इनमें वे जीवाश्म भी शामिल थे जो रेतीले और कीचड़युक्त दोनों प्रकार के तलछट में सुरक्षित थे। इन समस्थानिकों से यह पता लगाने में मदद मिली कि क्या मिट्टी के खनिजों ने अश्मीभूत करने में भूमिका निभाई और क्या ये मिट्टियां ज़मीन से बहकर आई थीं (डिट्राइटल क्ले – detrital clay) या समुद्र तल के भीतर ही बनी थीं (ऑथिजेनिक क्ले)।
पता चला कि डिट्राइटल मिट्टी के कण पहले से ही उस तलछट में मौजूद थे, जिसने इन जीवों को ढंका था। इन्हीं कणों की सतह पर नई मिट्टियां समुद्र तल के भीतर ही बनने लगीं। सिलिका और लौह से भरपूर समुद्री जल तथा एडिआकारन काल के महासागरों की असामान्य रसायनिकी (ocean chemistry) ने इन ऑथिजेनिक मिट्टियों को बढ़ने में मदद की।
असल में, ये मिट्टियां प्राकृतिक सीमेंट (natural cementation) की तरह काम करने लगीं। इन्होंने रेत के कणों को आपस में बांध दिया और कोमल ऊतकों की महीन आकृतियों और छापों को रेत-पत्थर में स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। डॉ. टार्हन भविष्य में इसी लीथियम समस्थानिक तकनीक (geochemical analysis) को अन्य क्षेत्रों और कालों के जीवाश्मों पर लागू करने की योजना बना रही हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ऐसी ही प्रक्रियाएं कहीं और भी सक्रिय थीं। फिलहाल, यह अध्ययन हमें उस दौर की पृथ्वी की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर (ancient Earth history) देता है, जब जंतु जीवन के विकास में एक निर्णायक मोड़ आया था।
यह खोज उस पुरानी धारणा (scientific theory) को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारा बायोटा (Ediacara biota) इसलिए सुरक्षित रहे क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मज़बूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड (preservation conditions) में बच पाना असाधारण पर्यावरणीय परिस्थितियों का परिणाम था।
कहां मिलते हैं ये जीवाश्म
एडिआकारा बायोटा के जीवाश्म (global fossil sites) ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में मध्य प्रदेश (भीमबैठका) और राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) (India fossil sites) के प्राचीन तलछटों में इनके पाए जाने का दावा है।
वैज्ञानिकों के लिए अब भी यह पहेली है कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा (extinct life forms) थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी ‘आज़माइशी जीवन रूप’ (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फॉर्म्स – experimental life forms) भी कहा जाता है।
जो भी हो, हम आज जो जीवन देखते हैं, वह जीवाश्मों की डायरी (history of life on Earth) पढ़कर ही समझा गया है, वरना पृथ्वी का अतीत पूरी तरह रहस्य बना रहता!(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.springernature.com/full/springer-static/image/art%3A10.1038%2Fs41598-018-23442-y/MediaObjects/41598_2018_23442_Fig2_HTML.jpg?as=webp
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।
गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।
कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research) से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।
अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।
इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।
यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।
कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है।(स्रोत फीचर्स)
भौंरे (bumblebees) ज़बर्दस्त उड़ाके होते हैं। वे लगभग 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकते हैं। इतनी तेज़ उड़ान के दौरान उनकी मांसपेशियां फड़फड़ाकर काफी गर्मी पैदा करती हैं। तो उड़ते समय भौंरे का शरीर बहुत गर्म हो सकता है। जैसे कार का इंजन (engine overheating), जिसे ठंडा न किया जाए तो खूब गर्म हो सकता है। तो भौंरे उड़ान के दौरान गर्म होकर झुलस क्यों नहीं जाते?
नए शोध (scientific research) से पता चला है कि वे अपने पंखों की तेज़ फड़फड़ाहट से बहने वाली हवा के ज़रिए खुद को ठंडा रखते हैं: जब भौंरा हवा में एक जगह ठहरकर उड़ता है, तो उसके पंखों से नीचे की ओर बहती हवा उसके शरीर का तापमान (body temperature cooling) लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तक कम कर देती है। इतने छोटे कीट के लिए यह बहुत बड़ी राहत है।
उड़ान के दौरान भौंरों की मांसपेशियां (flight muscles) बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करती हैं। ठंड में तो यह गर्मी उड़ान के लिए वार्मअप (muscle warm-up) में काम आ जाती है। लेकिन गर्मियों में यह खतरनाक साबित होती है।
अतिरिक्त गर्मी (heat stress) से निपटने के उनके कुछ तरीके तो पहले से मालूम हैं। वे अपने वक्षस्थल (thorax) (जहां उड़ान की मांसपेशियां होती हैं) से गर्मी को शरीर के पिछले हिस्से तक एक खास द्रव के जरिए पहुंचा सकते हैं। वैज्ञानिक यह भी देखते रहे हैं कि धूप (solar heating) उन्हें कितना गर्म करती है और पसीने जैसी प्रक्रिया (वाष्पीकरण) से उन्हें कितनी ठंडक मिलती है। इन सबको मिलाकर वैज्ञानिक ‘ऊष्मा संतुलन मॉडल’ (heat balance model) कहते हैं। लेकिन अब तक एक बात स्पष्ट नहीं थी: क्या उनके पंखों से पैदा होने वाला वायु प्रवाह (airflow from wings) भी उन्हें ठंडा करने में मदद करता है।
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने भौंरों को एक खास प्रयोगशाला कक्ष (laboratory experiment) में रखा, जहां हवा की गति मापने वाले उपकरण (air velocity sensors) लगे थे। जब भौंरे नकली फूलों के ऊपर मंडरा रहे थे, तब शोधकर्ताओं ने देखा कि उनके आसपास हवा लगभग 0.25 से 2 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बह रही थी। धुंध जैसी हल्की फुहार का इस्तेमाल करके उन्होंने यह भी देखा कि हवा उनके शरीर के चारों ओर कैसे फैलती है।
यह जानने के लिए कि यह हवा उन्हें कितनी ठंडक देती है, वैज्ञानिकों ने और भी परीक्षण किए। उन्होंने भौंरों के शरीर में बहुत छोटे तापमापी (micro temperature sensors) लगाए और हवा की वही स्थिति बनाई। तापमान में बदलाव (thermal measurement) की तुलना करके उन्होंने पाया कि अगर पंखों से पैदा होने वाली यह ठंडक न मिले, तो भौंरा दो मिनट से भी कम समय में तपकर टपक सकता है।
यानी भौंरों के पंखों से पैदा होने वाला हवा का बहाव (natural cooling system) एक तरह का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम है। हालांकि वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि जब भौंरे उड़ते-उड़ते आगे बढ़ते हैं, तब यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।
यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि बढ़ते वैश्विक तापमान (global warming) का सीधा असर भौंरों के जीवित रहने और परागण की क्षमता पर पड़ सकता है। अगर हम समझ लें कि भौंरे अपने शरीर की गर्मी को कैसे नियंत्रित (thermoregulation in insects) करते हैं, तो शायद भौंरो के बचाव के कुछ कारगर कदम (bumblebee conservation) उठा सकेंगे।(स्रोत फीचर्स)
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छल-धोखा सिर्फ हमारे साथ नहीं होता। जीवजगत में भी कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां एक जीव अपने फायदे के लिए दूसरे जीव का इस्तेमाल (biological deception) करता है। जैसे, कुछ ऑर्किड के फूल (orchid flowers) मधुमक्खियों को छलते हैं। इन ऑर्किड के फूलों का रूप-रंग मादा मधुमक्खी की तरह होता है और वे उन्हीं की तरह महक बिखेरते हैं। मादा की तलाश कर रहीं नर मधुमक्खी इन फूलों पर चली जाती हैं। संभोग तो होता नहीं लेकिन संभोग की कोशिश में उनके शरीर पर ऑर्किड के परागकण (pollination process) चिपक जाते हैं। ऑर्किड का परागण हो जाता है, बदले में मधुमक्खी को कुछ नहीं मिलता।
वैज्ञानिकों को अब ऐसी ही एक और धोखाधड़ी के बारे में पता चला है। इसमें मधुमक्खियों को धोखा देते हैं भृंग यानी बीटल्स: ब्लिस्टर बीटल के लार्वा (blister beetle larvae) फूल जैसी महक बिखेरते हैं, जिससे मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती है। फिर, लार्वा मधुमक्खी से चिपक जाते हैं, चिपके-चिपके उनके छत्तों में पहुंच जाते हैं और उनके अंडे खा जाते हैं।
मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकॉलॉजी (Max Planck Institute for Chemical Ecology) के कार्बनिक रसायनज्ञ रयान आलम की बीटल्स के अध्ययन में दिलचस्पी थी। ब्लिस्टर बीटल आत्मरक्षा के लिए कैंथेरीडिन नामक विषैला रसायन छोड़ते हैं, जिससे त्वचा पर फफोले उभर आते हैं। जब आलम को पता चला कि ब्लिस्टर बीटल की कुछ प्रजातियां घास और पौधों के सिरे पर चढ़ जाती हैं (insect behavior)तो वे हैरान रह गए।
वे सोचने लगे कि कहीं इनके लार्वा कोई गंध तो नहीं छोड़ते। जांच के लिए वे जर्मनी के घास के मैदानों से 40 युरोपियन ब्लैक ऑयल बीटल (Meloe proscarabaeus) इकट्ठा करके प्रयोगशाला ले आए। यहां बीटल्स ने प्रजनन किया और हज़ारों अंडे दिए। अंडे से निकलने के बाद लार्वा प्रयोगशाला की घास पर चढ़ गए। कैंथेरीडिन रसायन से बनने वाले फफोलों से बचने के लिए दस्ताने पहनकर आलम ने लार्वा इकट्ठा किए और उन्हें मसल दिया। फिर उन्होंने इस लार्वा-चटनी की गैस क्रोमैटोग्राफी की और देखा (gas chromatography analysis) कि इसमें कौन-कौन-से रसायन मौजूद हैं।
उन्हें लार्वा में मोनोटर्पिनॉइड्स नामक कुछ अणु (monoterpenoid compounds) मिले। ये कीटों में तो कम मिलते हैं, लेकिन पौधों में आम तौर पर पाए जाते हैं। लार्वा में सबसे अधिक पाए गए आठ अणुओं में से कई प्राय: फूलों में पाए जाते हैं। जैसे लिनेलूल ऑक्साइड (linalool oxide) और लिलेक एल्डिहाइड (lilac aldehyde)। फूलों में ये रसायन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन फूलों में पाए जाने वाले रसायन किसी कीट में मिलना हैरानी की बात थी (chemical mimicry)।
तो सवाल था कि क्या वाकई कीट में मौजूद ये रसायन मधुमक्खियों को न्यौता देते हैं? इसे जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने एक Y-शेप का रास्ता (Y-maze experiment) बनाया, जिसका एक रास्ता बीटल-लार्वा से बिखेरी गई खुशबू की ओर जाता था और दूसरा रास्ता व्हीटग्रास की खुशबू की ओर। मधुमक्खी दोनों में से कोई एक खुशबू चुन सकती थीं। रेड मेसन मधुमक्खियों (Osmia bicornis) और बेयर-सैडल्ड सेलोफेन मधुमक्खियों (Colletes similis), दोनों ने व्हीटग्रास की बजाय लार्वा से निकलने वाली फूल-जैसी खुशबू का मार्ग चुना।
शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि बीटल लार्वा फूल जैसे रसायन कैसे बनाते हैं। पता चला कि उनमें इन रसायनों का निर्माण उन्हीं एंज़ाइम्स (biosynthesis enzymes) से होता है, जिनसे ये पौधे में बनते हैं।
मादा-सरीखी खुशबू फैलाने की बजाय फूल-जैसी खुशबू बिखेरने से फायदा यह है कि इस खुशबू से नर और मादा दोनों मधुमक्खियां आकर्षित होती है। और सिर्फ मादा मधुमक्खियां ही अपने छत्ते में वापस लौटती हैं, नर नहीं। तो क्यों न छत्ते तक पहुंचने के लिए नर को छोड़कर सीधे मादा से लिफ्ट ली जाए। लार्वा वसंत की शुरुआत में, असली फूल खिलने से पहले, घास के तनों पर चढ़ जाते हैं। और उन्हें फूल समझकर बेचारी मधुमक्खियां उनके पास खींची चली आती हैं और ठगी जाती (parasitic strategy) हैं।
हो सकता है इस तरह की महकती नकल जीवजगत में और भी आम हो, जिन पर लोगों का ध्यान न गया हो। ध्यान न जाने का कारण यह हो सकता है कि हम मनुष्य नाक से उतना काम नहीं लेते जितना आंखों से लेते हैं। तो, आंख-नाक-कान खुले रखकर निसर्ग को निहारें, सूंघें और सुनें बहुत कुछ रोचक हाथ लग सकता है (nature science discovery)।(स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zeydsqa/full/_20260122_on_beetle_larvae.jpg
जेलीफिश (jellyfish) एक समुद्री अकशेरुकी जीव है जो आम तौर पर अपने छतरी जैसी आकृति से पहचाना जाता है। यह निडेरिया फायलम में कैसियोपिडी कुल में आता है और कैसिओपी जीनस का सदस्य है जिसमें 12 प्रजातियां हैं। देखा जाए तो यह हायड्रा, सी-एनीमोन, कोरल जैसे अन्य जलचर जंतुओं का सम्बंधी है। यहां जिस जेलीफिश (Cassiopea andromeda) की बात हो रही है वह उल्टी छतरी जैसा दिखता है। यानी छत्ता ज़मीन पर और झालर ऊपर।
यह शैवालों के साथ सहजीवी सम्बंध (symbiotic relationship) में रहता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के ज़रिए भोजन का निर्माण करते हैं। ये शैवाल इसके छाते में बसते हैं और यही कारण है कि ये जेलीफिश छाते को उल्टा रखती हैं ताकि इन शैवालों को भोजन निर्माण के लिए प्रकाश मिलता रहे। जेलीफिश विभिन्न रंगों में मिलती है और यह रंग इन्हें शैवालों की बदौलत ही मिलता है।
अब वैज्ञानिकों ने नेचरकम्यूनिकेशन्स(Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया है कि जेलीफिश और स्टारलेट सी-एनीमोन (Nematostella vectensis) में नींद जैसे पैटर्न नज़र आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि नींद लेने के लिए दिमाग ज़रूरी है लेकिन उक्त अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है।
देखा जाए तो नींद (sleep behavior) एक जोखिम भरा व्यवहार है – उस दौरान जंतु शिकारियों के प्रति कमज़ोर हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि फिर भी नींद आती है, तो इसकी कुछ तो लाभदायक भूमिका होनी चाहिए। इस्राइल के शोधकर्ता उपरोक्त दो प्रजातियों में इसी की छानबीन कर रहे थे। ये दोनों जंतु उथले लैगून्स के पेंदों में अपने टेन्टेकल्स को लहराते पड़े रहते हैं। टेन्टेकल्स शिकार को पकड़ने का काम करते हैं (marine animal behavior)।
इनमें नींद जैसी अवस्था देखी गई थी। यह देखा गया था कि दिन के कई घंटे ये ऊंघते रहते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन जंतुओं में मस्तिष्क तो छोड़िए, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) भी नहीं होता। इनकी तंत्रिकाएं पूरे शरीर में बिखरी होती हैं।
बार-इलान विश्वविद्यालय के लियोर एपलबॉम और उनके साथी देखना चाहते थे कि इनमें नींद का पैटर्न कैसा होता है और नींद की भूमिका क्या है। अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने एक एक्वेरियम में कई सारी जेलीफिश रखीं और कई दिनों तक उन्हें 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधकार में रखा (light dark cycle experiment), यह देखने के लिए कि जेलीफिश इन अवधियों में कितनी बार अपनी छतरी नुमा तोंद को ऊपर-नीचे करती हैं। यह फूलना-पिचकना इनके जागे होने का एक संकेत है।
प्रयोग में देखा गया कि रात में जेलीफिश कम सक्रिय रहती हैं और अपनी तोंद को प्रति मिनट लगभग पांच बार कम ऊपर-नीचे करती हैं। अब यह देखना था कि क्या इस क्रिया का सम्बंध निद्रावस्था से है। शोधकर्ताओं ने जेलीफिश पर रोशनी चमकाई और देखा कि वे कितनी जल्दी अपनी धड़कन से प्रतिक्रिया देती हैं। किसी ऊंघते मनुष्य के ही समान जेलीफिश ने अंधकार में रोशनी की प्रतिक्रिया देने में 20 सेकंड का टाइम लिया। जबकि दिन में चौकन्नी अवस्था में उन्हें मात्र 10 सेकंड लगते हैं।
सी-एनीमोन (sea anemone organism) का पैटर्न इससे उल्टा था। वे रात में सक्रिय रहते हैं और दिन में उनकी हरकतें धीमी रहीं और प्रतिक्रिया अवधि लंबी। अलबत्ता, दोनों ही जंतु दिन की एक-तिहाई अवधि तक सोते रहे। और तो और, सी-एनीमोन के सोने जागने का क्रम उनकी अंदरुनी घड़ी (सर्काडियन क्लॉक) से संचालित था। शोधकर्ताओं ने प्रकाश व अंधकार के क्रम को पलट दिया, तब भी सी-एनीमोन का सोने-जागने का क्रम बरकरार रहा। दूसरी ओर, जेलीफिश में यह क्रम प्रकाश से प्रभावित हुआ – अंधेरे में वे उनींदे रहे और रोशनी में सक्रिय (sleep deprivation effect)।
यह भी देखा गया कि इन जंतुओं को यदि एक रात की नींद ठीक से न मिले तो उन्हें बाद में ज़्यादा आराम की ज़रूरत होती है, ठीक इंसानों के समान। शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में पानी को 6 घंटे तक उस दौरान मथा जो जेलीफिश के सोने का समय था। इससे उनकी नींद कच्ची रही और बाद में वे सामान्य जेलीफिश की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक समय तक सोते रहे।
शोधकर्ताओं ने नींद के साथ छेड़छाड़ का एक तरीका और आज़माया। उन्होंने कुछ एक्वेरियम टंकियों में मेलेटोनिन (melatonin hormone) डाल दिया। मेलेटोनिन एक हॉरमोन है, मनुष्यों में मस्तिष्क जिसका स्राव रात में करता है और यह नींद प्रेरित करता है। मेलेटोनिन का ऐसा ही असर जेलीफिश तथा सी-एनीमोन पर भी हुआ और वे दिन की उस अवधि में ऊंघने लगे जब वे सामान्य तौर पर सक्रिय होते हैं (sleep regulation)।
ज़ाहिर है कि ये दो जंतु नींद का मज़ा लेते हैं। पूर्व में कई शोधकर्ता दर्शा चुके थे कि मक्खियों, चूहों और मनुष्यों सहित कई प्रजातियों में नींद डीएनए को हुई क्षति को कम (DNA damage repair) करता है। यह क्षति जाग्रत अवस्था में होती रहती है। एपलबॉम का विचार है कि शायद जेलीफिश और सी-एनीमोन में भी ऐसा ही होता है। अपने इस विचार की जांच के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने जेलीफिश को पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश के संपर्क (ultraviolet UV radiation) में रखा। यूवी प्रकाश डीएनए क्षति के लिए जाना जाता है। यूवी के संपर्क में रहने के बाद जेलीफिश सामान्य से ज़्यादा देर तक सोती रहीं जबकि उनमें मस्तिष्क नहीं होता।
इसी प्रकार से, सी-एनीमोन को ऐसी कीमोथेरपी औषधि (chemotherapy drug) दी गई जो डीएनए क्षति करती है। इस उपचार के बाद ये सी-एनीमोन 30 प्रतिशत ज़्यादा सोए (DNA repair mechanism)।
तो, सवाल उठता है कि नींद की झपकी के सारे आसन्न खतरों के बावजूद जंतु सोते क्यों हैं। एक गोल कृमि सीनेरोब्डाइटिसएलेगेंस (Caenorhabditis elegans worm) के नींद व्यवहार पर शोध करने वाली कैलिफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक चेरिल फान बर्सकिर्क का कहना है कि नींद तंत्रिकाओं के रख-रखाव का एक तरीका हो सकता है क्योंकि तंत्रिकाएं डीएनए क्षति का सबसे अधिक खतरा झेलती हैं। उनका तो कहना है कि नींद का उद्भव संभवत: पहली-पहली तंत्रिकाओं (early nervous system) के साथ ही हुआ होगा। यानी नींद तो मस्तिष्क के विकास से पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार कर चुकी थी। वे कहती हैं कि एपलबॉम की टीम द्वारा किए गए ये प्रयोग एक बार फिर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि नींद का विकास (evolution of sleep) जटिल मस्तिष्क को संभालने के लिए हुआ है।(स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://caltech-prod.resources.caltech.edu/main/images/LGoentoro_Jellyfish-Research-3782-NEWS-WEB.width-600.jpg
दक्षिण-पूर्वी ब्राज़ील के जंगल (Southeast Brazil rainforest) में नदी का किनारा है। हल्की बयार बह रही है। इस बयार में, पेड़ की शाखों से लटकी काई-युक्त लताएं/टहनियां लटकन की तरह डोल रही हैं। यदि नज़ारा आपको महज़ कुदरती सजावट लगे, तो जान लीजिए कि कुदरती शिकारियों की तरह आप भी धोखा खा गए हैं। आप यदि इस ‘सजावट’ पर ज़रा गौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि इन लटकनों से घोंसलों को सजाया गया है और घोंसलों में पक्षी के अंडे/चूज़े रखे हैं। निराश न हो, ये सजावट थी भी शिकारियों को चकमा देने (anti-predator strategy)।
बायोलॉजी लेटर्स के अध्ययन के अनुसार, ब्लू मैनाकिन (Chiroxiphia caudata) (Blue Manakin bird) नामक चिड़िया अपने अंडों और चूज़ों की सुरक्षा के लिए घोंसलों में लंबी-लंबी लटकनें लटका देती है ताकि टूकेन समेत अन्य शिकारियों को उनके घोंसले, घोंसले-जैसे न लगें और वे इनसे दूर ही रहें। ऐसा करने से इन शिकारियों द्वारा हमले की संभावना 10 गुना कम हो जाती है। हालांकि बड़े शिकारी-पक्षियों के आक्रमण की संभावना तो फिर भी बनी रहती है, वे घोंसले पहचान सकते हैं।
वैज्ञानिकों को काफी समय से यह पता था कि ब्लू मैनाकिन और अमेरिका की कई अन्य पक्षी प्रजातियां घोंसलों में लटकन लटकाती हैं। उनका अनुमान था कि ऐसा शायद वे छद्मावरण (camouflage behavior) देने के लिए करती होंगी। यानी ऐसा करने से घोंसले आसपास के परिवेश में घुल-मिलकर शिकारियों की नज़रों से ओझल रहते होंगे। लेकिन यह अनुमान पक्का नहीं था। एक विवाद यह था कि लटकनदार घोंसले तो ज़्यादा नुमाया हो सकते हैं और आसानी से पहचाने जा सकते हैं (nest recognition theory)।
इस विवाद को सुलझाने के लिए फेडरल युनिवर्सिटी के पक्षी विज्ञानी मर्सिवल रॉबर्टो फ्रांसिस्को के दल ने ब्लू मैनाकिन द्वारा परित्यक्त घोंसलों की निगरानी करने का सोचा। जब ब्लू मैनाकिन का प्रजनन काल खत्म हो गया, तब पक्षी विज्ञानी कैसियानो मार्टिंस जंगल से 50 खाली और परित्यक्त घोंसले और उनकी काई-युक्त लटकन ले आए। प्रयोगशाला में उन्होंने प्लास्टिसिन (मॉडलिंग क्ले) से असली जैसे अंडे बनाए और हर घोंसले में ऐसे दो नकली अंडे रख दिए। फिर, अगले दो प्रजनन मौसम में इन घोंसलों को जंगल में ऐसी जगहों पर रखा जहां कुदरती तौर पर काईदार लटकन बहुत कम पनपती है। शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों पर लटकन लगी रहने दी, और कुछ की लटकन हटा दी। और घोंसलों की इंफ्रारेड कैमरे से निगरानी (infrared camera monitoring) की।
लटकन होने का फर्क साफ दिखा। लटकन-विहीन 54 घोंसलों में से ग्यारह (20 प्रतिशत) घोंसलों से अंडे चोरी हुए थे, जबकि लटकन वाले 54 घोंसलों में से सिर्फ एक से अंडे चोरी (predation rate) हुआ था।
अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि लटकनदार घोंसले बनाने वाले पक्षी दरअसल अपने घोंसलों को न तो छुपाने की कोशिश करते हैं, न आसपास की किसी अन्य चीज़ जैसा दिखाने की। बस कोशिश यह होती है कि घोंसलों को ऐसे आकार दें कि वे घोंसले जैसे न दिखें ताकि शिकारियों को पता न चले (deceptive nest structure)। हालांकि यह तरीका स्तनधारी या उन शिकारियों के विरुद्ध काम नहीं करेगा जो शिकार खोजने के लिए गंध का सहारा लेते हैं।
बहरहाल, एक सवाल बना हुआ है: इन घोंसलों पर काईदार जगहों पर ज़्यादा हमले क्यों होते हैं क्योंकि यहां तो घोंसले अधिक ओझल होना चाहिए। शायद टूकेन पक्षी समझ गया हो कि ब्लू मैनाकिन अपने घोंसले काईदार जगह पर बनाता है।(स्रोत फीचर्स)
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जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के मेकेनिकल इंजीनियर डेविड हू जानना चाहते थे कि ये ब्लडवर्म इस कारस्तानी में इतने कुशल कैसे हैं? और ऐसा करते हुए उनकी मांसपेशियों को क्षति क्यों नहीं होती?
शोधकर्ताओं ने जब ब्लडवर्म (Glycera dibranchiata) की इस हरकत को रिकॉर्ड करके बारीकी से अध्ययन किया तो लगा कि ऐसा सूंड पर हर ओर मौजूद अत्यधिक झुर्रियों/सिलवटों की बदौलत संभव है। बहुत ही ज़्यादा झुर्रियां/सिलवटें होने से जब शुण्ड को बाहर की ओर उलटा जाता है, तो अंदर की त्वचा सामान्य से तीन गुना ज़्यादा फैल जाती हैं और मांसपेशियों को कोई क्षति भी नहीं होती। यह कुछ-कुछ हाथी की सूंड पर मौजूद झुर्रियों की तरह काम करता है(flexible biological structure)।
ब्लडवर्म अपनी शुण्ड को 2 सेकंड से भी कम समय में पूरा पलटकर बाहर कर लेते हैं। वहीं इसे वापिस अंदर करने में लगभग 8 सेकंड लगते हैं और इसके लिए ज़्यादा जटिल हरकतें भी करनी पड़ती हैं।
ब्लडवर्म की यह बनावट ऐसे उलटने-पलटने वाले और लचीले रोबोट बनाने में सहायक हो सकती है। ऐसे लचीले रोबोट(soft robotics) मरीज़ों की मदद कर सकते हैं; ये रोबोट बिस्तर पर पड़े मरीज़ों के नीचे जाकर फैल और फूल सकते हैं, जिससे नर्सें उन्हें धीरे से इधर-उधर खिसका कर उनकी चादरें आसानी से बदल सकेंगी।(स्रोत फीचर्स)
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यह तो सब जानते हैं कि चींटियां सामाजिक कीट (social insects) हैं और कॉलोनी बनाकर रहती हैं। कॉलोनी में जहां बहुत सारी श्रमिक चींटियां बिल बनाने, भोजन भंडारण, देखरेख, सुरक्षा जैसे काम करती हैं, वहीं रानी चींटी का मुख्य काम प्रजनन और फेरोमोन्स (pheromones) स्राव के ज़रिए कॉलोनी की गतिविधियों का नियंत्रण होता है। एक तरह से कॉलोनी में सत्ता रानी चींटी की होती है।
सामान्य तौर पर कॉलोनी में सत्ता परिवर्तन (power shift in ant colony) तब होता है जब रानी चींटी, बहुत बीमार पड़ जाती है या मर जाती है। श्रमिक चींटियों को रानी द्वारा स्रावित फेरोमोन मिलना बंद हो जाते हैं, जो उन्हें नियंत्रित रखते थे और उनकी प्रजनन क्षमता दबाए रखते थे। अब श्रमिक चींटियों में से कोई रानी चींटी बन जाती है। या फिर, सत्ता परिवर्तन तब भी होता है जब कोई घुसपैठिया चींटी कॉलोनी (invasive ant species) में घुस जाती है और कॉलोनी की रानी चींटी को मारकर या खदेड़कर श्रमिक चींटियों पर अपना नियंत्रण जमा लेती है। ऐसा अमूमन नए सिरे से कॉलोनी बसाने की मशक्कत से बचने के लिए किया जाता है। कीटों में इस तरह की रणनीतियों देखने को मिलती हैं और इसे परजीविता (parasitism in insects) कहते हैं। इसमें कई प्रजातियां पराए संसाधनों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाती हैं। जैसे, कुछ चींटी प्रजातियां अपने बच्चों का पालन-पोषण दूसरी प्रजातियों की चींटियों से करवाती हैं, जबकि कुछ अपनी कॉलोनियों का कार्यबल बढ़ाने के लिए दूसरी प्रजातियों के बच्चे चुरा लाती हैं।
अब, हाल ही में पता चला है कि कुछ घुसपैठिया/परजीवी चींटियां (parasitic ants) किसी कॉलोनी पर काबिज़ होने के लिए सीधा हमला करने की बजाय चालाकी का सहारा लेती हैं: कॉलोनी की श्रमिक चींटियों को उनकी अपनी ही रानी (जो जैविक रूप में उनकी मां/जननी भी होती है) के खिलाफ भड़काती हैं, और उनसे रानी की हत्या (queen killing behavior) करवाती हैं।
दरअसल, कुछ समय पहले क्यूशू विश्वविद्यालय के व्यवहार पारिस्थितिकीविद केइज़ो ताकासुका ने एक वीडियो में देखा था कि लैसियसओरिएंटलिस(Lasius orientalis) प्रजाति की रानी चींटियां कैसे अपनी निकट सम्बंधी प्रजाति लैसियसफ्लेवस(Lasius flavus) की कॉलोनी पर कब्ज़ा कर लेती हैं। वीडियो में एल. ओरिएंटलिस प्रजाति की रानी चींटी को एल. फ्लेवस प्रजाति की चींटियों की कॉलोनी में रखकर उनके व्यवहार को रिकॉर्ड किया गया था। वीडियो में कुछ चौंकाने वाली चीज़ें दिखीं: श्रमिक चींटियां अपनी ही रानी को मार रही थीं।
ताकासुका ने उत्सुकतावश ऐसा ही अध्ययन एक अन्य परजीवी चींटी प्रजाति एल. अमब्रैटस(Lasius umbratus) पर किया, जो एल. जेपोनिकस(Lasius japonicus) कॉलोनी को अपना मेज़बान बनाती हैं। पता चला कि वे भी नियंत्रण के लिए ऐसा ही तरीका अपनाती हैं। हमलावर रानी चींटी पहले मेज़बान श्रमिक चींटियों के साथ घुलती-मिलती है ताकि वह शक की निगाहों से बची रहे; इसके लिए वह कॉलोनी की विशिष्ट गंध अपने शरीर पर पोत लेती है। और फिर, मेज़बान प्रजाति की रानी को ढूंढती है। मेज़बान रानी मिलते ही उसके ऊपर अपने पेट से निकला बदबूदार द्रव (संभवत: फॉर्मिक एसिड) छिड़क देती है और खुद वहां से रफूचक्कर हो जाती है। यह रानी की अपनी नैसर्गिक गंध को दबा देता है और उसे दुश्मन-सी पहचान दे देता है – इस तरह उस कॉलोनी की रानी चींटी ‘मां’ से ‘दुश्मन’ बन जाती है।
मेज़बान श्रमिक चींटियां अपनी रानी को दुश्मन समझ उस पर हमला करती हैं और उसे मार डालती हैं। रानी के खात्मे के बाद परजीवी चींटी कॉलोनी में पुन: प्रवेश करती है, अपने अंडे देती है और श्रमिकों पर हुकूमत (colony takeover) करने लगती है।
सवाल है कि परजीवी मेज़बान रानी को सीधे मारने के बजाय चालाकी से क्यों मरवाती है? शायद इसलिए कि सीधे हमला करने से कड़ी सुरक्षा कर रहीं श्रमिक चींटियां उस पर हमला कर सकती हैं। इसलिए खुद के बचाव के लिए उसी की संतान श्रमिकों को भड़काकर ‘उनसे ही हमला करवाना’ सुरक्षित है (evolutionary strategy) ।
विशेषज्ञ कहते हैं कि जननी-हत्या (matricide in animals) का व्यवहार – जीवों द्वारा अपनी ‘जननी’ को मारना या खाना – जीव-जंतुओं के बीच दुर्लभ है। इस मामले में, इस व्यवहार से एकमात्र फायदा परजीवी रानी का दिखता है, जो नए सिरे से अपनी कॉलोनी बसाने की मेहनत और जोखिमों से बचना चाहती है, बसी-बसाई कॉलोनी हथिया लेती है।(स्रोतफीचर्स)
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जब वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार (nobel prize) मिलता है, तो वे अमूमन अपने परिवार, सहकर्मियों, अपने विश्वविद्यालय या शोध का वित्तपोषण करने वालों का शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन जब विक्टर एम्ब्रोस (Victor Ambros) और गैरी रुवकुन (Gary Ruvkun) को वर्ष 2024 के कार्यिकी या चिकित्सा विज्ञान नोबेल सम्मान से नवाज़ा गया, तो रुवकुन ने चंद मिनट अपने प्रयोग के जंतु को दिए। वह जंतु है एक नन्हा-सा कृमि सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स (Caenorhabditis elegans)। इस जंतु को उन्होंने ‘बडास’ की संज्ञा दी, अमरीकी बोलचाल में जिसका मोटे तौर पर मतलब होगा सख्तजान। यह मॉडल जीवों के इतिहास में एक मील का पत्थर था। वैसे इस जंतु पर शोध कार्य के फलस्वरूप 4 नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। और रुवकुन ने ही नहीं, हर वैज्ञानिक ने अपने नोबेल व्याख्यान में इस नन्हे कृमि का शुक्रिया अदा किया है। जैसे 2002 में सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और रॉबर्ट होर्विट्ज़ को अंगों के विकास तथा पूर्व-निर्धारित कोशिका मृत्यु यानी एपोप्टोसिस सम्बंधी खोजों के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। अपने नोबेल व्याख्यान में सिडनी ब्रेनर ने कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार का चौथा विजेता सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स है।”
वेब ऑफ साइन्स (Web of Science) डैटा के अनुसार 1980 से 2023 के बीच सी. एलेगेन्स से सम्बंधित 24,496 पर्चे प्रकाशित हुए। इनमें से यदि समीक्षा पर्चों को हटा दिया जाए, तो भी यह संख्या 20,322 होती है।
कैसा है यह कृमि
यह गोलकृमि (roundworm) मिट्टी में रहने वाला एक सरल जंतु है जो सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ युक्त ज़मीन में पाया जाता है। ऐसी मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया ही इसका भोजन हैं। यह एक पारदर्शी जीव (transparent organism) है और यही इसकी एक खासियत है जो इसे एक मॉडल जीव बनाती है। 1900 में एमील मौपस ने इस प्रजाति को खोजा था और नाम रखा था रैबडायटिस एलेगेन्स। 1955 में एल्सवर्थ डोगर्टी ने इसे जीनस अर्थात वंश का दर्जा दिया और यह सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स (सी. एलेगेन्स) हो गया।
मात्र 1 मिलीमीटर लंबाई वाले इस कृमि के दो लैंगिक रूप होते हैं – उभयलिंगी और नर। उभयलिंगी के शरीर में कुल जमा 959 कायिक कोशिकाएं होती हैं जबकि नर में 1031 होती हैं। तुलना के लिए देखें कि मनुष्यों में अरबों कोशिकाएं होती हैं। इसका जीवन चक्र (life cycle) मात्र तीन दिन का है – यानी 3 दिन बाद एक नया कृमि पैदा हो जाता है। इसके शरीर में न तो हृदय होता है, न रक्त परिसंचरण तंत्र, और न ही श्वसन तंत्र। शरीर कुल मिलाकर एक मुंह, ग्रसनी (pharynx), और जननांगों से मिलकर बना होता है। ऊपर से पारदर्शी क्यूटिकल का आवरण होता है। इसे प्रयोगशाला में पनपाना-पालना आसान है। यही सरलता इसे जीव विज्ञान का एक बहुमूल्य मॉडल बनाती है।
हालांकि कृमि और मनुष्य कई प्रकार से अलग हैं, फिर भी दोनों प्रजातियों के जीन्स और आणविक मार्गों में काफी समानताएं हैं। यदि आप यह पता लगा लें कि कोई कोशिकीय क्रियाविधि कृमि के विकास के दौरान कैसे काम करती है तो 95 प्रतिशत मामलों में यह इंसानों में भी बिल्कुल उसी तरह काम करेगी। इसका मतलब है कि कृमि पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन से प्राप्त जानकारी, मनुष्यों में बीमारियों और विकास के बारे में समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
चूंकि यह कृमि पारदर्शी है, इसलिए इसमें नाभिकीय प्रवास (nuclear migration) सूक्ष्मदर्शी से जीवित जीव में ही देखा जा सकता है। भ्रूणावस्था में इसकी कोशिकाओं के तेज़ विकास तथा एक-एक कोशिका के अलग-अलग आसान अवलोकन की बदौलत प्रत्येक कोशिका की नियति का मार्ग देखा जा सकता है – इसे कोशिका नियति मानचित्र (cell fate map) कहा जाता है।
सी. एलेगेन्स का सर्वप्रथम अध्ययन तो विक्टर नाइगॉन और एल्सवर्थ डोगर्टी की प्रयोगशाला में 1940 के दशक में किया गया था लेकिन इसे एक मॉडल जंतु का दर्जा दिलवाने का काम 1963 में सिडनी ब्रेनर ने किया था जब उन्होंने इसे परिवर्धन के जीव विज्ञान और जेनेटिक्स के अध्ययन हेतु एक मॉडल के रूप में प्रस्तावित किया। 1974 में ब्रेनर ने जेनेटिक छंटनी के प्रारंभिक परिणाम प्रकाशित किए थे। उन्होंने शरीर रचना व कामकाज की दृष्टि से अलग-अलग सैकड़ों उत्परिवर्तित जंतुओं को पृथक किया था। 1980 के दशक में जॉन सल्स्टन तथा उनके सहकर्मियों ने वयस्क उभयलिंगी की समस्त 959 कायिक कोशिकाओं की कोशिका वंशावली का पूर्ण मानचित्रण किया। इसका अर्थ यह है कि इनमें से प्रत्येक कोशिका का, निषेचित अंडे से लेकर वयस्क तक का, संपूर्ण विकासात्मक इतिहास पता लगाया गया। इसी के साथ पहले-पहले जीन्स का क्लोनिंग किया गया और अंतत: 1998 में यह पहला बहुकोशिकीय जीव बना जिसके पूरे जीनोम का अनुक्रमण (genome sequencing) कर लिया गया था।
प्रारंभिक अनुसंधान
सी. एलेगेन्स का प्रथम विवरण 1900 में एमील मौपस द्वारा दिया गया था। उन्होंने इसे अल्जीरिया में मिट्टी में से हासिल किया था। बहरहाल, शुरुआती शोध कार्य तो इस बात पर केंद्रित रहा था कि इस कृमि का शुद्ध कल्चर (pure culture) तैयार कर लिया जाए, यानी जिसमें किसी अन्य प्रजाति की मिलावट न हो।
ट्रांसजेनेसिस (जीन हस्तांतरण)
ट्रांसजेनेसिस (transgenesis) किसी जीव के जीनोम में पराई आनुवंशिक सामग्री (एक ट्रांसजीन) को शामिल करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप एक ट्रांसजेनिक जीव (transgenic organism) उत्पन्न होता है जो नए जीन को अभिव्यक्त करता है तथा एक संशोधित गुण या विशेषता प्रदर्शित करता है। यह किसी जीन की भूमिका को समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।
सी. एलेगेन्स इस प्रक्रिया के लिए सर्वथा अनुकूल है। ट्रांसजेनिक कृमि तैयार करने का सबसे आम तरीका तो यह है कि बाहरी डीएनए को कृमि की एक सिंसिशियल जर्म लाइन में डाला जाए। सिंसिशियल जर्म लाइन वह होती है जिसमें जर्म कोशिकाएं (कोशिकाएं जो युग्मकों में विकसित हो सकती हैं) एक ही कोशिका द्रव्य साझा करती हैं, जिससे एक बहुकेंद्रकीय कोशिका बनती है। यह व्यवस्था विशेष रूप से युग्मक निर्माण की प्रक्रिया के दौरान देखी जाती है। दूसरा तरीका बायोलिस्टिक ट्रांसफॉर्मेशन (biolistic transformation) यानी मनचाहे डीएनए को सीधे लक्षित कोशिका में पहुंचाने का है।
सी. एलेगेन्स में इस प्रक्रिया का उपयोग करके कई महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई हैं।
कोशिका व जंतु की मृत्यु
कोशिकाओं की मृत्यु बहुकोशिकीय जंतु विकास का एक अहम व सामान्य हिस्सा है। ऊतकों को तराशना, अंगों की संरचना का निर्माण, अंगों की साइज़ का नियंत्रण वगैरह स्वाभाविक कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस – apoptosis) से तय होते हैं। जब स्वाभाविक कोशिका मृत्यु की प्रक्रिया गड़बड़ हो जाए, तो कई चीज़ें गड़बड़ा जाती है। मनुष्यों में कई बीमारियों में कोशिका मृत्यु सम्बंधी गड़बड़ियां शामिल होती हैं। इस दृष्टि से कोशिका मृत्यु (पूर्व निर्धारित या असमय) को समझना अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण विषय है।
सी. एलेगेन्स उन कोशिकीय व आणविक प्रक्रियाओं (molecular mechanisms) का खुलासा करने में प्रमुख रहा है जो क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस) का नियंत्रण करती हैं। हालांकि यह परिकल्पना तो बहुत पहले प्रस्तुत हो चुकी थी कि एपोप्टोसिस एक सुनियंत्रित प्रक्रिया है लेकिन कोशिका मृत्यु को नियंत्रित करने वाले कारकों का अध्ययन सर्वप्रथम सी. एलेगेन्स में ही किया गया था (2003)।
सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह था कि एक ही उम्र के कृमियों में कोशिकाओं की संख्या और स्थान लगभग एक जैसे रहते हैं। अर्थात इस जंतु में कोशिकाओं के वंश लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। इस प्रस्ताव में महत्वपूर्ण भूमिका इस बात की थी कि सी. एलेगेन्स की त्वचा का आवरण (क्यूटिकल) पारदर्शी होने की वजह से इसमें कोशिका विभाजन की प्रक्रिया का अध्ययन आसान है। इन प्रयासों की मदद से यह स्पष्ट हुआ कि सी. एलेगेन्स का उभयलिंगी व नर वयस्क तैयार होने के लिए सटीकता से 1090 और 1178 कायिक कोशिकाएं बन जाना ज़रूरी है। सी. एलेगेन्स के व्यवस्थित अध्ययन से एपोप्टोसिस, मृत कोशिका के मलबे को हटाने वगैरह की जटिल क्रियाविधि स्पष्ट हो पाई है। लेकिन हमने ऊपर देखा था कि वयस्क उभयलिंगी में मात्र 959 कोशिकाएं होती हैं। यहीं से एपोप्टोसिस का भान हुआ – एपोप्टोसिस के कारण 131 कोशिकाएं मृत हो जाती हैं, तो बची रहती हैं 959 (1090-131)। यह भी पता चला कि नर में एपोप्टोसिस में 147 कोशिकाएं मारी जाती हैं (1178-147=1031)। इस प्रक्रिया के विभिन्न लक्षण सी. एलेगेन्स में पहचाने गए और इनमें से कई लक्षण स्तनधारी कोशिकाओं में बने रहे हैं।
लेकिन कोशिका मृत्यु से अलग तंत्रगत ध्वंस वह प्रक्रिया है जो जंतु की मृत्यु का कारण बनती है। इस तरह की मृत्यु के कारक भी पहचाने गए हैं और यह भी देखा जा चुका है कि इन कारकों को बाधित करने से क्षय-जन्य मृत्यु को टाला जा सकता है।
प्रत्येक कोशिका के सटीक विकास मार्ग (कोशिका वंशावली) की जानकारी में से जो सबसे महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई, उसका सम्बंध एपोप्टोसिस से है। कोशिकाओं की मृत्यु का अवलोकन तो कई जीवों में किया जा चुका था लेकिन सी. एलेगेन्स की कोशिका वंशावली ने दर्शाया कि एपोप्टोसिस विशिष्ट कोशिकाओं में, विशिष्ट समय पर होता है और यह एक विशिष्ट जैव-रासायनिक प्रक्रिया से संपन्न होता है जो सख्त जेनेटिक नियंत्रण में होती है। और तो और, यह भी स्पष्ट हुआ कि एपोप्टोसिस के लिए ज़िम्मेदार जीन्स जैव-विकास के दौरान जंतुओं में संरक्षित रहे हैं। और एपोप्टोसिस क्रियापथ में गड़बड़ी इंसानों में कई रोगों का कारण बनती है – जैसे, कैंसर, आत्म-प्रतिरक्षा रोग (autoimmune disease) और तंत्रिका-विघटन से सम्बंधित रोग। एपोप्टोसिस क्रिया पथ को कई बार कीमोथेरपी या रेडिएशन के द्वारा सक्रिय किया जाता है। कोशिका वंशावली और एपोप्टोसिस और सी. एलेगेन्स को जेनेटिक विश्लेषण के लिए एक मॉडल जीव के रूप में विकसित करने के शोध कार्य के लिए सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और एच. रॉबर्ट होविट्ज़ को 2002 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
कोशिकाओं में संकेत लेन–देन
सिग्नल ट्रांसडक्शन (signal transduction) वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए कोई भी कोशिका बाह्य संकेत प्राप्त करती है, उसे प्रोसेस करती है और उस पर प्रतिक्रिया देती है। जंतुओं में लगभग सारे सिग्नल ट्रांसडक्शन मार्गों की खोज सी. एलेगेन्स (भ्रूण या उससे आगे की अवस्थाओं) के विभिन्न उत्परिवर्तियों पर अध्ययन के ज़रिए हुई है। मनुष्यों में अधिकांश कैंसर (cancer biology) में पाया गया है कि किसी न किसी सिग्नल ट्रांसडक्शन क्रियापथ में गड़बड़ी होती है। लिहाज़ा, इनकी समझ ने कैंसर जीव विज्ञान में भी काफी योगदान दिया है। हाल में, सी. एलेगेन्स में तंत्रिका संकेतों तथा इंसुलिन संकेतन के मार्गों का भी खुलासा हुआ है, जिसके चलते यह इस तरह के अध्ययनों के लिए आकर्षक मॉडल बन गया है।
बुढ़ाना
अंडा देने के बाद प्रयोगशाला की परिस्थितियों में कृमि का जीवनकाल (lifespan) करीब 14 से 21 दिन का होता है। ऐसे उत्परिवर्तित जंतु खोजे गए हैं जिनका जीवनकाल 50 से 100 प्रतिशत अधिक होता है। साथ ही कृमियों में जीवनकाल को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार कई जीन्स भी पहचाने गए हैं। इनमें से अधिकांश जीन्स विभिन्न जंतुओं में संरक्षित रहे हैं और कुछ जंतुओं के बढ़े हुए जीवनकाल से सम्बंधित भी हैं। मनुष्यों में बुढ़ाना (aging process) एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें लगभग सारे अंग-तंत्र प्रभावित होते हैं। इसलिए शुरू-शुरू में यह एक आश्चर्यजनक खोज थी कि विविध जंतुओं में बुढ़ाने की जैविक प्रक्रिया काफी एक समान है जबकि उनके जीवन काल में काफी अंतर होते हैं।
सी. एलेगेन्स बुढ़ाने की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। उदाहरण के लिए, देखा गया है कि इंसुलिन-नुमा वृद्धि कारक (आईजीएफ- IGF signaling) को बाधित कर दिया जाए तो वयस्क का जीवन तीन गुना तक बढ़ जाता है। दूसरी ओर, यदि ग्लूकोज़ खिलाया जाए तो उम्र आधी रह जाती है (जो ऑक्सीकारक तनाव की वजह से होता है)। इसी प्रकार से, यदि अधेड़ावस्था (कृमि की अधेड़ावस्था) में इंसुलिन/आईजीएफ का विघटन करवा दिया जाए तो जीवन में काफी वृद्धि हो जाती है। यह भी देखा गया है कि कृमि के लंबी उम्र वाले उत्परिवर्तित संस्करण ऑक्सीकारक तनाव (oxidative stress) और पराबैंगनी प्रकाश का प्रतिरोध दर्शाते हैं। ऐसे उत्परिवर्तियों में डीएनए की मरम्मत करने की क्षमता भी ज़्यादा थी। अर्थात डीएनए मरम्मत की क्षमता का सम्बंध लंबी उम्र से है जो उम्र के साथ कम होती जाती है।
एक मान्यता यह रही है कि डीएनए की ऑक्सीकारक क्षति बुढ़ाने की वजह होती है। सी. एलेगेन्स के अध्ययन से पता चला है कि सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज़ दिया जाए तो वह क्रियाशील ऑक्सीजन मूलकों को कम करता है और बुढ़ाने की प्रक्रिया को धीमा करता है।
यह देखा गया कि सी. एलेगेन्स को लीथियम क्लोराइड का उपचार देने पर भी उसकी जीवन अवधि बढ़ती है।
सी. एलेगेन्स के अध्ययन का एक विषय टीलोमेयर पर केंद्रित रहा है। टीलोमेयर (telomere) सूणसूत्रों के सिरों पर डीएनए की दोहराई जानी वाली शृंखला होती है। यह गुणसूत्र को क्षति से बचाती है और हर कोशिका विभाजन के बाद छोटी होती जाती है। इसकी लंबाई एक हद से कम हो जाने के बाद वह कोशिका आगे विभाजन नहीं कर पाती और झड़ जाती है।
लेकिन सी. एलेगेन्स के अध्ययन में एक विचित्र बात पता चली। ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर जैसे कई जंतुओं में टीलोमेयर की लंबाई को बनाए रखने की विधि में रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की भूमिका देखी गई है। रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स डीएनए के ऐसे खंड होते हैं जो एक जगह से दूसरी जगह फुदकते रहते हैं। लेकिन सी. एलेगेन्स में टीलोमेयर की सुरक्षा के लिए सामान्य तरीके के अलावा एक अलग तरीके का उपयोग देखा गया है, जिसे वैकल्पिक टीलोमेयर लेंदेनिंग (ALT) कहते हैं। सी. एलेगेन्स वह पहला यूकेरियोट जीव था जिसने सामान्य टीलोमेयर प्रक्रिया को ठप किए जाने के बाद ALT हासिल कर ली। इसी तरह ALT कई कैंसर में देखी गई है जो कई परिस्थितियों में अपना टीलोमेयर लंबा करती रहती हैं। ऐसे कैंसर ज़्यादा घातक (aggressive cancer) साबित होते हैं। लिहाज़ा सी. एलेगेन्स ALT अध्ययन के लिए एक अहम मॉडल है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/c/cc/Adult_Caenorhabditis_elegans.jpg
लेख के पहले भाग में हमने जीव वैज्ञानिक शोध में मॉडल जीव सी. एलेगेन्स (C. elegans) के योगदान के कुछ पहलू देखे। दूसरे भाग में चर्चा कुछ और पहलुओं पर…
नींद
सी. एलेगेन्स संभवत: सबसे सरल (आदिम) जंतु है जिसमें नींद जैसी अवस्था (sleep-like state) देखी गई है। यह जंतु हर निर्मोचन (moulting) से पहले एक सुस्त हालत में जाता है। यह भी दर्शाया गया है कि सी. एलेगेन्स शारीरिक तनाव, गर्मी के आघात, पराबैंगनी विकिरण और बैक्टीरिया-जनित टॉक्सिन से संपर्क के बाद भी नींद में चला जाता है।
संवेदनाएं
इस कृमि के पास आंखें तो नहीं होतीं लेकिन यह प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। इसका कारण एक प्रकाश संवेदी प्रोटीन (LITE-1) की उपस्थिति है और यह प्रकाश संवेदी प्रोटीन जंतुओं में पाए जाने वाले अन्य प्रकाश-संवेदी रंजकों (ऑप्सिन तथा क्रिप्टोक्रोम) की तुलना में 10-100 गुना अधिक कुशलता से प्रकाश अवशोषित करता है।
सी. एलेगेन्स त्वरण को सहन करने में भी असाधारण है – यह 4,00,000 गुरुत्व के सेंट्रीफ्यूज (hypergravity) (40,000 घूर्णन प्रति मिनट) में रखकर घुमाने पर भी अप्रभावित रहता है।
सी. एलेगेन्स के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि भ्रूणावस्था के उपरांत कोशिकाओं का प्रवास बहुत कम होता है और जो प्रवास होता है वह पूर्वानुमान के योग्य (predictable cell migration) होता है। परिणाम यह होता है कि विभिन्न अलग-अलग कृमियों में कोई विशिष्ट कोशिका उसी स्थान पर पाई जाएगी और उन्हीं कोशिकाओं के साथ सीधे संपर्क में रहेगी।
यह तंत्रिका तंत्र का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। किसी वयस्क उभयलिंगी कृमि में 302 तंत्रिका कोशिकाएं (neurons) होती हैं और साथ में 56 ग्लियल कोशिकाएं (glial cells)। विभिन्न तकनीकों की मदद से सी. एलेगेन्स के पूरे तंत्रिका तंत्र का मानचित्रण किया जा चुका है। देखा गया है कि शरीर की भित्ती में मोटर (यानी काम को अंजाम देने वाली) तंत्रिकाएं होती हैं। मुंह पर रसायन-संवेदी तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। स्पर्श, प्रकाश, तापमान, नमक व अन्य संवेदनाओं के लिए अलग-अलग तंत्रिकाएं होती हैं। सभी संवेदी तंत्रिकाओं का जुड़ाव मोटर तंत्रिकाओं से होता है।
कुल मिलाकर सोचा गया था कि यह कृमि एक चलती-फिरती नलिका भर है जो मात्र बुनियादी क्रियाओं को पूरा करती होगी – भोजन-ग्रहण, अंडे देना और चलना-फिरना। लेकिन आगे अनुसंधान ने कृमि के व्यवहार (behavioral biology) के कई आयाम उजागर किए। इस संदर्भ में नोबेल विजेता मार्टिन चाफी का काम उल्लेखनीय है। कुछ जंतु एक ग्रीन फ्लोरेसेंट प्रोटीन (GFP – green fluorescent protein) का निर्माण करते हैं जो एक हरी रोशनी उत्सर्जित करता है। इसके निर्माण के लिए ज़िम्मेदार जीन को अन्य जीवों के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। अब GFP जैविक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण औज़ार बन गया है। मार्टिन चाफी ने सी. एलेगेन्स के जीनोम में इस जीन को जोड़ दिया और इस तरह से वे 6 अलग-अलग कोशिकाओं को रंगीन बनाने में सफल रहे। रंगीन हो जाने के कारण इन कोशिकाओं का निरंतर अध्ययन किया जा सकता था। इसकी मदद से वे तंत्रिका कोशिकाओं के विकास का अध्ययन कर पाए थे। इसके अलावा, उनके अनुसंधान ने GFP के सामान्य उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। आजकल सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र को मानव तंत्रिका रोगों (neurological disorders) तथा अन्य विकारों के मॉडल के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इसी के साथ सी. एलेगेन्स की ग्लियल कोशिकाओं के कार्य और कार्यिकी का अध्ययन भी इस दृष्टि से किया जा रहा है तथा तंत्रिकाओं और अन्य कोशिकाओं के बीच सम्बंधों की भी पड़ताल जारी है।
सूक्ष्म तथा हस्तक्षेपी आरएनए
सी. एलेगेन्स के जीवन चक्र में चार एकदम अलग-अलग लार्वा अवस्थाएं होती हैं। हर लार्वा अवस्था तथा वयस्क में बनने वाली क्यूटिकल की संरचना अलग-अलग होती हैं जिसके आधार पर इन्हें पहचाना जा सकता है। कई अलग-अलग ऐसे उत्परिवर्तित (developmental mutants) कृमि तैयार किए गए हैं जो विकास की इन अवस्थाओं के लिहाज़ से थोड़े अलग-अलग होते हैं। जैसे किसी में कोई विकास अवस्था छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं तो किसी में एक ही अवस्था बार-बार दोहराई जाती है। इनके अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त हुए हैं।
उदाहरण के लिए lin-4 नामक जीन में उत्परिवर्तन वाले कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था दोहराई गई जिससे पता चला कि lin-4 द्वारा बनाया गया प्रोटीन प्रथम लार्वा अवस्था से निकलकर द्वितीय लार्वा अवस्था में प्रवेश के लिए ज़रूरी है। दूसरी ओर, lin-14 जीन में उत्परिवर्तन का असर उल्टा हुआ – ऐसे कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था आई ही नहीं, सीधे द्वितीय लार्वा अवस्था आ गई। इससे तो लगता है कि प्रथम लार्वा अवस्था होने के लिए lin-14 द्वारा बनाया जाने वाला प्रोटीन ज़रूरी है। लेकिन… एक बड़ा लेकिन इंतज़ार कर रहा था।
जब इन दोनों जीन्स को क्लोन किया गया तो पता चला कि lin-4 जीन किसी प्रोटीन का कोड करने लायक ही नहीं था। दूसरी ओर lin-14 प्रोटीन का कोड था। दरअसल, lin-4 जीन एक सूक्ष्म आरएनए का कोड पाया गया – शुरू में यह सूक्ष्म आरएनए 70 न्यूक्लियोटाइड लंबा था और अंत में 22 न्यूक्लियोटाइड का रह गया। विश्लेषण से पता चला कि lin-4 द्वारा बनाए गए आरएनए में lin-14 द्वारा बनाए गए मेसेंजर आरएनए के उन हिस्सों के पूरक थे जो अनूदित नहीं किए जाते (यानी ये किसी प्रोटीन का निर्माण नहीं करते)। इस खोज से यह समझ उभरी कि शायद lin-4 एक माइक्रो-आरएनए (microRNA) बनाता है जो lin-14 के प्रतिलेखन को रोक देता है। lin-4 वह पहला जीन था जिसे एक माइक्रो-आरएनए बनाते देखा गया था। आगे चलकर इसी तरह के अन्य माइक्रो-आरएनए पहचाने गए जो किसी जीन के काम को ठप कर देते हैं। मनुष्य के जीनोम में लगभग 1800 ऐसे माइक्रो-आरएनए जीन्स पहचाने जा चुके हैं।
माइक्रो-आरएनए की खोज के साथ आरएनए-हस्तक्षेप (RNAi) को सी. एलेगेन्स में जीन अभिव्यक्ति को रोकने के लिए उपयोग किया गया। वैसे तो RNAi द्वारा जीन की अभिव्यक्ति को रोकने की प्रक्रिया पेटुनिया में देखी गई थी लेकिन इसकी क्रियाविधि को समझकर इसका उपयोग करने की बात सी. एलेगेन्स में ही हुई। एण्ड्र्यू फायर और क्रैग मेलो ने देखा कि सी. एलेगेन्स में डबल-स्ट्रैंडेड आरएनए (डीएसआरएनए) को इंजेक्ट करने से सम्बंधित मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) को नष्ट करके विशिष्ट जीन को शांत किया जा सकता है, जिससे प्रोटीन उत्पादन का दमन हो सकता है। 1998 में की गई इस खोज ने जीन नियमन की हमारी समझ में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया और इसके लिए उन्हें 2006 में नोबेल से नवाज़ा गया था।
बीमारियों की तहकीकात
शुरुआत में तो माना गया था कि मानव रोगों के अनुसंधान में इस कृमि की भूमिका सीमित ही है। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि मानव जीन्स और जीन्स के विविध संस्करणों को सी. एलेगेन्स के जीनोम में जोड़कर अभिव्यक्त करवाया जा सकता है तो नए आयाम खुल गए। उदाहरण के लिए, kindlin-1 जीन को देखते हैं। सी. एलेगेन्स में इसके समजातीय जीन से जो प्रोटीन बनता है वह इन्टेग्रिन (integrin signaling) से अंतर्क्रिया करता है। इस खोज के बाद मनुष्यों में इसी प्रकार की रोग प्रक्रिया की खोज की गई। इंटेग्रिन कोशिका संवाद में अहम भूमिका निभाते हैं और इनमें गड़बड़ी कई रोगों का कारण बन सकती है।
इसी प्रकार से मनुष्यों में एक जीन होता है presenilin-1 जिसे अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease) से जुड़ा माना जाता है। जब इसे सी. एलेगेन्स में अभिव्यक्त करवाया गया तो पता चला कि इसकी वजह से तापमान संवेदी गति में बाधा आई।
हाल ही में शोधकर्ता ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम दिक्कत (autism spectrum disorder) को समझने के लिए सी. एलेगेन्स में समजातीय जीन्स पहचानने का प्रयास कर रहे हैं। सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र (neural circuits) को भलीभांति समझा जा चुका है। इसके अलावा इस कृमि में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़े कई समजातीय जीन्स भी हैं। हालाकि कृमि में ऑटिज़्म संपूर्ण रूप में तो प्रकट नहीं होता लेकिन कई खोजबीन इसकी मदद से संभव हैं। एक तो किसी जेनेटिक उत्परिवर्तन का असर इसकी तंत्रिकाओं के कामकाज और कृमि के व्यवहार पर देखा जा सकता है। इस तरह के अध्ययनों से ऑटिज़्म के मूल में उपस्थित क्रियाविधियों को समझने में मदद मिलती है।
उदाहरण के लिए शोधकर्ताओं ने सायनेप्स (तंत्रिकाओं के बीच जुड़ाव) निर्माण व कामकाज के लिए ज़रूरी जीन्स का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश की है कि उनका ऑटिज़्म-सम्बंधी व्यवहार की असामान्यताओं से क्या सम्बंध है। वैसे तो सी. एलेगेन्स एक सरल जीव है लेकिन यह सामाजिक व्यवहार का प्रदर्शन करता है – जैसे भोजन के कारण झुंड बनाना। शोधकर्ता जेनेटिक उत्परिवर्तन और कृमि के इस व्यवहार में परिवर्तन के सम्बंध का अध्ययन करते हैं। चूंकि इस कृमि में ट्रांसजेनेसिस आसान है, इसलिए इस तरह के कई अध्ययन किए जा रहे हैं।
औषधि अनुसंधान
छोटा जीनोम और छोटे जीवन चक्र की वजह से यह बहुकोशिकीय जीव जंतुओं में औषधियों और विषों की तेज़ी से छंटनी (drug screening) करने का उम्दा मॉडल है। सी. एलेगेन्स में मानव रोगों के समजातीय जीन देखे जाते हैं। इसलिए यह वर्तमान में स्वीकृत दवाइयों के नए उपयोग (drug repurposing) खोजने में मदद कर सकता है।
अंतरिक्ष में उड़ान
सी. एलेगेन्स तब सुर्खियों में आया था जब 2003 में कोलंबिया स्पेस शटल हादसे के बाद भी यह जीवित मिला था। बाद में 2009 में घोषणा हुई थी कि सी. एलेगेन्स अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (space station) पर दो सप्ताह बिता रहा था। इसे वहां भेजा गया था ताकि शून्य गुरुत्वाकर्षण (microgravity) का असर मांसपेशियों के विकास और अन्य शरीर क्रियाओं पर परखा जा सके। इस अनुसंधान का सम्बंध प्रमुख रूप से अंतरिक्ष उड़ान, बिस्तर पर पड़े रहने, बुढ़ापे और मधुमेह के कारण मांसपेशीय विकारों को समझना था। कोलंबिया शटल के मुसाफिर कृमियों के वंशजों को बाद में एंडेवर यान में भेजा गया था। ऐसे कई अंतरिक्ष प्रयोगों का निष्कर्ष था कि मांसपेशियों और हड्डियों के जुड़ावों को प्रभावित करने वाले जीन्स अंतरिक्ष में कम अभिव्यक्त होते हैं। अलबत्ता, यह पता नहीं चल पाया है कि इसका मांसपेशियों की ताकत पर क्या असर होता है।
जेनेटिक्स
सी. एलेगेन्स के जीनोम में करीब 20,470 ऐसे जीन्स होते हैं जो किसी न किसी प्रोटीन का कोड (protein-coding genes) हैं। इनमें से 35 प्रतिशत जीन्स मानव होमोलॉग्स (human homologs) (समजातीय) हैं। समजातीय जीन विभिन्न प्रजातियों में पाए जाने वाले ऐसे जीन होते हैं जो एक सामान्य पूर्वज जीन से विकसित होते हैं। उनके डीएनए अनुक्रम में काफी हद तक समानता होती है और अक्सर उनके कार्य भी सम्बंधित होते हैं। और यह कई बार दर्शाया जा चुका है कि यदि मानव जीन्स को सी. एलेगेन्स में डाला जाए तो वे अपने समजातीय जीन्स का स्थान ले लेते हैं। इसके विपरीत सी. एलेगेन्स के कई जीन्स स्तनधारी जीन्स के समान कार्य कर सकते हैं।
उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि गोल कृमि सी. एलेगेन्स ने जीव विज्ञान की कई गुत्थियों को सुलझाने में मदद की है और पिक्चर अभी बाकी है। लेकिन एक बात पर कुछ कहना मुनासिब है। वह है सी. एलेगेन्स को तमाम जीव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए एक मॉडल बनाने के प्रयास।
सिडनी ब्रेनर से शुरू करके सी. एलेगेन्स पर काम करने वाले शोधकर्ताओं का एक समुदाय विकसित होता गया, जो स्वयं को कृमि-जन (worm-people) कहते हैं। इस समुदाय की एक विशेषता इसका सहयोगी रवैया और खुलापन रहा है। अपनी खोज को एक-दूसरे से साझा करना, नए शोधकर्ताओं को हर तरह से मदद करना (चाहे सामग्री उपलब्ध करवाकर या कामकाज में मदद देकर), समय-समय पर मिलकर विचार-विमर्श करना इस समुदाय के व्यवहार में शुमार रहा है।
1975 से ही यह समूह एक छमाही वर्म ब्रीडर्स गज़ट (Worm Breeders’ Gazette) प्रकाशित करता आ रहा है। सी. एलेगेन्स शोध समुदाय हर दो साल में अंतर्राष्ट्रीय कृमि सम्मेलन (International Worm Meeting) आयोजित करता है जहां शोध पत्रों वगैरह के अलावा कृमि सम्बंधी प्रहसन, नृत्य वगैरह प्रस्तुत किए जाते हैं।
एक वर्मबुक प्रकाशित की जाती है जिसमें वर्तमान शोध के विवरण, शोध सम्बंधी सामग्री की उपलब्धता तथा प्रोटोकॉल वगैरह शामिल होते हैं।
अर्थात यह गोलकृमि अनुसंधान की जो संभावनाएं प्रस्तुत करता है, उनको साकार रूप देने में एक कृमि समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।