वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा

आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों (mammals species) की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक (zoonotic pathogens) है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य-जीव व्यापार और तस्करी (illegal wildlife trafficking) बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।

यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।

अध्ययन स्तनधारी जीवों (wild mammals) पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब (genetic similarity) हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं (infection risk)। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।

अध्ययन में वन्य-जीव व्यापार के तरीकों (trade practices) को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क (direct exposure) संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार (legal wildlife trade) भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने (pathogen adaptation) का ज़्यादा मौका मिलता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम (wildlife regulations) बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी (pandemic prevention) के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।

फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों (exotic pet trade) के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियों का एक अनूठा सम्बंध

दिन-रात मेहनत करने वाली चींटियां (ants behavior) एकता और परस्पर ताल-मेल बनाकर अपने समूह के साथ वफादारी से काम करती हैं। उन्हें दूसरे समूह की दखलंदाज़ी बिल्कुल नहीं भाती — लगभग हर समय वे दूसरे समूह के प्रति आक्रामक बर्ताव ही करती हैं| हालांकि चींटियां माहू (पौधों का रस चूसने वाले कीट, जिसे तेला या चेपा भी कहते हैं) के साथ साझेदारी का सम्बंध रखती हैं, क्योंकि माहू चींटियों को शहद जैसा चिपचिपा अपशिष्ट पदार्थ ‘हनीड्यू’ (honeydew secretion) भोजन के रूप में देते हैं, वहीं बदले में चींटियां गुबरैला जैसे शिकारियों से उनकी रक्षा (symbiotic relationship) करती हैं और अन्य भोजन के स्थानों तक पहुंचाती हैं; कभी तो सर्दियों में आवास भी देती हैं|

लेकिन 2006 में एक कीट वैज्ञानिक ने एरिज़ोना के रेगिस्तान (Arizona desert ecosystem) में चींटियों का एकदम विपरीत बर्ताव देखा| कीट वैज्ञानिक मार्क मोफेट ने इसी अनुभव को इकॉलॉजी एण्ड इवोल्यूशन शोध पत्रिका में प्रकाशित कर यह सुझाया है कि शायद चींटियों में यह साफ-सफाई से जुड़ी साझेदारी का पहला उदाहरण होगा| उन्होंने अनुभव साझा किया कि दो अलग-अलग प्रजातियों की चींटियां एक-दूसरे के साथ शांति से पेश आ रहीं थीं। इनमें से एक थी लाल टींटी या रेड हार्वेस्टर चींटी (Pogonomyrmex barbatus), जो गहरे भूरे-लाल रंग की और 5-7 मि.मी. तक लंबी होती है। और दूसरी थीं कोन या पिरामिड चींटियां (जीनस – Dorymyrmex), जो पीले-भूरे रंग की होती हैं और इनकी लंबाई 3-3.5 मि.मी होती है (हार्वेस्टर चींटियों की एक-तिहाई)। मोफेट ने देखा कि छोटी चींटियां बड़ी चींटियों का शरीर साफ कर रहीं थी, यहां तक की बड़ी चींटियां अपने धारदार जबड़े खोलकर छोटी चींटियों से सफाई करवा रहीं थीं, मानो उन्हें मज़ा आ रहा हो| पांच दिन तक लगातार निरीक्षण के आधार पर कीट वैज्ञानिक का अनुमान है कि छोटी चींटियों को सफाई के दौरान भोजन मिलता होगा; जैसे वे कुछ परजीवियों को खा रही होंगी या हटा रही होंगी या फिर वे फायदेमंद सूक्ष्मजीवों का आदान-प्रदान कर रही होंगी|

चींटियों के अब तक ज्ञात व्यवहार के चलते यह बात अंचभा लग सकती है। लेकिन जीव जगत में ऐसी बहुत से सम्बंध और साझेदारियां देखने को मिलती हैं जिसमें दो भिन्न प्रजातियों के प्राणी परस्पर लाभांवित होते हैं। इन सम्बंधों को जीवविज्ञान में परस्परता (mutualism) कहा जाता है|    ऐसे सम्बंध में दोनों जीवों को फायदा मिलता है। प्रकृति में इसके असंख्य उदाहरणों में से कुछ की बात करते हैं:

पक्षी एवं शाकाहारी जंतु – पक्षियों (जैसे ऑक्सपेकर या बगुला) को जंतुओं के शरीर से किलनी वगैरह भोजन के रूप में मिलती है और बदले में जंतुओं (जैसे भैंस, गेंडे) को कीटों और परजीवियों से निजात (parasite control) मिलती है।

परागणकर्ता और फूल – मधुमक्खियों जैसे कीटों को फूलों से भोजन के रूप में मकरंद (pollination process) मिलता है और बदले में कीट उनके परागण में मदद करते हैं।

मगरमच्छ एवं प्लोवर पक्षी – जबड़ा खोलकर मगरमच्छ आराम से प्लोवर पक्षी से दांतों की सफाई (cleaning symbiosis example) करवाता है, और प्लोवर पक्षी के भोजन का इंतज़ाम हो जाता है। इस पक्षी को डेंटिस्ट भी कहते हैं।

जड़ एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण बैक्टीरिया – बैक्टीरिया पौधों को नाइट्रोजन (nitrogen fixation) उपलब्ध कराते हैं और बदले में पौधे आवास व भोजन देते हैं।

अर्थात सहजीविता (symbiosis) का रिश्ता भोजन, सुरक्षा और प्रजनन में सहयोग की दृष्टि से पारिस्थितिक संतुलन के लिए ज़रूरी है| ये तो हुआ फायदे का सम्बंध। कुछ सम्बंध ऐसे भी होते हैं जहां एक जीव को लाभ होता है, लेकिन दूसरे जीव को न तो लाभ होता है न हानि। इसे ‘सहभोजी सम्बंध’ (commensalism) कहते हैं। जैसे, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड (एपिफाइटिक ऑर्किड) सूर्य की रोशनी के लिए ऊंची शाखाओं पर केवल आश्रय लेते हैं, इससे पेड़ों को कोई नुकसान नहीं होता| वहीं, एक ऐसा भी सम्बंध है जहां एक जीव को लाभ होता है लेकिन दूसरे जीव को हानि होती है। इसे ‘परजीवी सम्बंध’ (parasitism) कहते हैं। जूं, जोंक, कृमि जैसे परजीवी पोषण और जीवनचक्र के लिए जंतुओं और मनुष्यों के शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। वनस्पतियों में, अमरबेल (Cuscuta reflexa),   स्ट्राइगा (Striga प्रजातियां) जैसे परजीवी पौधे अन्य पेड़-पौधों पर पोषण, आश्रय और प्रजनन के लिए निर्भर रहते हैं| 

अंत में, इतना ही कहा जा सकता है कि प्रकृति (nature observation) में ऐसी कई व्यवस्थाएं और सम्बंध हैं जो अभी तक मनुष्यों की नज़र और समझ से ओझल हैं। ज़रूरत है सिर्फ थोड़ा ध्यानपूर्वक अवलोकन (scientific observation) और निरीक्षण करने की। हमारे आस-पास ही दुर्लभ प्राकृतिक अजूबे मौजूद है, उनके बारे में हमें पता चल सकता है, ज़रूरत है तो बस थोड़े धैर्य और एकाग्रता की। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ये पक्षी सचमुच ‘चूसते’ हैं

तितलियां फूलों से मकरंद चूसती (nectar feeding) हैं। वालरस और अधिकतर मछलियां अपने भोजन का भक्षण चूस कर करती हैं। हम मनुष्य भी कितनी ही चीज़ें चूसकर निगलते हैं। लेकिन पक्षी? वैज्ञानिकों ने अब तक पक्षियों में चूसने की क्रिया नहीं देखी थी। लेकिन करंट बायोलॉजी (Current Biology journal) में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि सनबर्ड मकरंदपान चूसकर ही करते हैं। यह खोज और भी रोमांचक इसलिए है कि हम मनुष्य या अन्य कशेरुकी जब चूसकर किसी चीज़ का पान करते हैं तो मुंह थोड़ा सिकोड़ते हैं। लेकिन सनबर्ड में यह पहला मामला देखने को मिला है जब कोई कशेरूकी बिना अपने मुंह का आकार बदले, सिर्फ अपनी जीभ से पैदा किए गए सक्शन (खिंचाव) (tongue suction mechanism) के ज़रिए कुछ पान करता है।

सनबर्ड और हमिंगबर्ड (hummingbird comparison) की चोंच पतली व लंबी होती है, जो अभिसारी विकास का उदाहरण है। अभिसारी विकास यानी कई अलग-अलग असम्बंधित प्रजातियों में एक से पर्यावरणीय दवाब के कारण एक जैसे अंगों का विकास। जीवविज्ञानी डेविड क्यूबन (David Hu research) की इनमें दिलचस्पी जगी। ये दोनों तरह के पक्षी आम तौर पर अपनी चोंच की मदद से घंटीनुमा फूलों के अंदर मौजूद मकरंद को पी लेते हैं। हमिंगबर्ड के मकरंद पीने का तरीका ऐसा है कि वे अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालते हैं, जिससे जीभ की नोक पर मकरंद चिपक जाता है। फिर वे जीभ को चोंच के अंदर ले जाते हैं और चोंच को कसकर बंद करके जीभ को निचोड़ते (capillary action feeding) हैं जिससे मकरंद उनके मुंह में आ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तौलिए को निचोड़ने से पानी निकलता है।

वाशिंगटन युनिवर्सिटी (University of Washington study) के क्यूबन जानना चाहते थे कि क्या सनबर्ड भी ऐसा ही करती हैं या उनके रसपान का तरीका अलग है। यह पता करने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया में सनबर्ड की सात प्रजातियों का हाई-स्पीड कैमरे (high speed camera analysis) की मदद से मकरंदपान का वीडियो बनाया। इसके लिए उन्होंने थ्री-डी प्रिंटर की मदद से नकली फूल बनाए। इन फूल के निचले हिस्से को एक स्क्रीन के नीचे रखा, ताकि वे पक्षियों को परेशान किए बिना उनकी जीभ की हरकत को फिल्मा सकें। चूंकि सनबर्ड की जीभ पारभासी होती है, इसलिए वे जीभ से बहते हुए मकरंद को देख सकते थे। आप भी इस प्रक्रिया का आनंद इन वेबसाइट्स पर ले सकते हैं:

https://news.berkeley.edu/2026/04/13/sunbirds-suck-scientists-find-hummingbirds-dont

वीडियो ध्यान से देखने पर पता चला कि हमिंगबर्ड के विपरीत, सनबर्ड ने अपनी जीभ को फूल के अंदर सिर्फ एक बार डाला। उन्होंने जीभ को वहीं रखा जब तक कि पूरा मकरंद नहीं पी लिया और तब तक अपनी चोंच भी बंद नहीं की। देखा गया कि सनबर्ड मकरंदपान (feeding pattern) करते समय अपनी जीभ को बस थोड़ा सा ही अंदर खींचते थे। और कभी-कभी चोंच के अंदर जीभ को ऊपर-नीचे भी करते थे।

क्यूबन और उनके साथियों (scientific findings) का कहना है कि जीभ की ऐसी हरकत सनबर्ड की जीभ की बनावट के साथ मिलकर, एक खिंचाव (suction) पैदा करती है। इन पक्षियों की जीभ के ऊपरी हिस्से पर एक V-आकार की नाली होती है। जब वे अपनी जीभ को चोंच के ऊपरी हिस्से से दबाते हैं, तो वह चपटी हो जाती है और नाली सिकुड़ जाती है। जीभ को नीचे की ओर खींचने से चोंच के ऊपरी हिस्से और नाली के बीच जगह बन जाती है, जिससे एक खिंचाव (fluid dynamics mechanism) पैदा होता है जो फूलों से रस को अंदर खींच लेता है। टीम ने तरल पदार्थों की गतिशीलता की कंप्यूटर मॉडलिंग की और इससे उन्हें समझ आया कि रस को अंदर खींचने के संभावित अन्य कारणों, जैसे केशिका क्रिया (capillary action), इस मामले में काम नहीं करते। यह जानना कि सनबर्ड अपनी जीभ का इस्तेमाल खाने के लिए कैसे करते हैं, इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि फूलों के साथ उनका विकास एक साथ कैसे हुआ और हमिंगबर्ड की तुलना में उनके खाने का तरीका अलग क्यों है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कुत्ते कब पालतू बने?

चाहे गांव हो या शहर, ऐसा कोई गली-मोहल्ला नहीं होगा जहां कुत्ते (street dogs) दिखाई न दें। जहां-जहां मनुष्यों की आबादी है, कुत्ते वहां-वहां दिख ही जाते हैं। आजकल तो ऐसी खबरें भी सुनने को मिलती हैं कि गली में घूमते कुत्ते कुछ ज़्यादा ही आक्रामक (dog aggression) हो गए हैं, और लोग गली के कुत्तों से थोड़ा कतराने लगे हैं। लेकिन कभी कुत्ते मनुष्यों के लिए बहुत खास हुआ करते थे। सुरक्षा से लेकर रास्तों की पहचान तक में वे काम आते थे। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आज कुत्तों का कोई महत्व नहीं रहा। लोग प्रेमवश उन्हें पालते हैं; पुलिस नशीले पदार्थों को ढूंढने में, लोगों की पहचान करने में, ढूंढने में कुत्तों की मदद लेती है; लोगों के सहायकों (service dogs) के रूप में भी वे काम आते हैं।

लेकिन सवाल है कि कुत्ते (dog domestication) ठीक कब से मनुष्यों के साथ हैं। और भेड़ियों से कुत्ते में कब विकसित होना शुरू हुए? वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि कुत्ते भूरे भेड़ियों (gray wolves) के वंशज हैं, लेकिन उनके लिए यह सवाल हमेशा सवाल ही रहा कि यह विकास प्रक्रिया ठीक-ठीक कब, कहां, कैसे चली।

अब तक, सबसे प्राचीन कुत्ते के जो पुख्ता जीवाश्म प्रमाण (fossil evidence) मिले हैं वे लगभग 11,000 साल पुराने हैं, जो उत्तर-पश्चिमी रूस के एक खुदाई स्थल से मिले थे। हालांकि इसके बाद और इसके पहले पुरातत्वविदों को खुदाई स्थल से इससे भी कहीं ज़्यादा प्राचीन हड्डियां मिली थीं, जिनकी कद-काठी देखने में भेड़ियों की बजाय कुत्तों जैसी थी – जैसे खोपड़ियां छोटी और चौड़ी थीं। यह इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि ये बदलाव भेड़ियों के पालतू बनने की प्रक्रिया (domestication process) के दौरान उनमें आए थे। लेकिन पक्के तौर पर कुछ कहने के लिए इनके बारे में ज़रूरी विस्तृत जेनेटिक जानकारी (genetic data) उपलब्ध नहीं थी। तो मामला वहीं अटका रहा।

अब हालिया अध्ययन इस बारे में थोड़ा प्रकाश डालता है। दरअसल वर्ष 2004 में, मध्य तुर्की के पुनारबश नामक एक शिकारी-संग्राहक काल के खुदाई स्थल (Pinarbasi Turkey site) से वैज्ञानिकों को एक मानव कब्र के ठीक पास की कब्र में तीन पिल्लों की हड्डियां मिली थीं। हड्डियां इतनी छोटी थीं कि यह बताना मुश्किल था कि वे भेड़िए के पिल्लों की थीं या कुत्तों के पिल्लों की। मानव कब्र के इतने पास मिलने से ऐसा लगता था कि वे कुत्तों के पिल्लों की ही होंगी। लेकिन जब यह पता किया गया कि वे कितनी पुरानी हैं तो पता चला कि वे करीब 15,800 साल पुरानी हैं। यानी कुत्ते के अब तक मिले पक्के प्रमाणों (ancient dog fossils) से भी 5000 साल पुरानी!

फिर क्या था, शोधकर्ताओं ने उनमें से एक पिल्ले का डीएनए अनुक्रमण किया। इसके साथ ही, उन्होंने दक्षिणी इंग्लैंड की गॉग गुफाओं (Gough’s Cave England) (14,300 साल प्राचीन) और उत्तरी स्विट्ज़रलैंड की केसलरलॉक गुफाओं (Kesslerloch Cave Switzerland) (14,200 साल प्राचीन) से मिले कुत्ते सरीखे जानवरों का भी डीएनए अनुक्रमण किया। विश्लेषण में पता चला कि पुनारबश से मिले अवषेश पूर्णत: कुत्ते के थे, और उसमें भेड़िए जैसे कोई अंश नहीं थे। इसके अलावा अन्य दो गुफाओं से मिले अवशेष भी कुत्तों के ही निकले।

और तो और तुर्की, इंग्लैंड और स्विट्ज़रलैंड के खुदाई स्थलों के बीच भले ही भौगोलिक दूरी और सांस्कृतिक अंतर बहुत ज़्यादा है लेकिन इन तीनों स्थलों से मिले कुत्तों के जीनोम (genome similarity) एक-दूसरे के काफी समान थे। मसलन गॉग गुफाओं के रहवासी मैडेलेनियन संस्कृति का हिस्सा थे और वे बेहतरीन गुफा-चित्रकारी और इंसानी खोपड़ियों से प्याले बनाने के लिए जाने जाते हैं। वहीं, पुनारबश में एंटोलियन शिकारी-संग्रहकर्ता (Anatolian hunter gatherers) लोग रहते थे। जिनके वंशजों ने बाद में युरोप में खेती-बाड़ी की शुरुआत की। शोधकर्ता कहते हैं कि इन अलग-अलग संस्कृतियों के इंसानों के डीएनए में अंतर था, लेकिन कुत्तों के डीएनए में ऐसा कोई अंतर नहीं दिखा। इससे अंदाज़ा मिलता है कि ये सभी कुत्ते एक ही मूल आबादी से विकसित हुए थे। यानी ये कुत्ते युरोप के आदि-कुत्ते थे – कुत्तों की एक ऐसी प्राचीन नस्ल, जो उस समय तक किसी खास काम के लिए विशेष रूप से विकसित नहीं हुई थी। बाद में कुत्तों को कई तरह के काम करने के लिए पाला गया, जैसे शिकार (hunting dogs) में मदद करने के लिए, रखवाले के तौर पर।

अलग-अलग जगहों पर मिले कुत्तों और इंसानों के डीएनए के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि लगभग 21,000 से 12,000 साल पहले तक पूरे दक्षिणी और पूर्वी युरोप में रहने वाले एपिग्रेवेटियन लोग (Epigravettian culture) शायद पूरे महाद्वीप में कुत्तों को फैलाने में मददगार रहे होंगे।

एक अन्य अध्ययन भी ऐसा ही कुछ इशारा करता है। जब शुरुआती किसान युरोप में आकर बसे और अपने साथ कुत्ते लाए तब नवागंतुक मनुष्यों ने तो लगभग पूरी तरह से पहले से मौजूद युरोपीय लोगों की जगह ले ली। लेकिन कुत्तों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। नवागंतुक कुत्तों के साथ-साथ पहले से मौजूद कुत्ते भी बने रहे। लगभग 9000 से 7000 साल पहले (युरोप में कृषि आगमन से पहले और बाद का समय) के कुत्तों के अवशेषों का विश्लेषण (ancient DNA analysis) करके पता चला है कि युरोपीय कुत्तों के डीएनए का केवल लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ही पूर्वी कुत्तों के डीएनए से प्रतिस्थापित हुआ था। इससे पता चलता है कि प्रवासी किसानों को युरोपीय कुत्ते विशेष रूप से उपयोगी लगे होंगे और उन्होंने इन कुत्तों को अपने साथ शामिल किया, न कि उन्हें अपने कुत्तों से बदलने की कोशिश की। लेकिन उत्तरी अमेरिका में इसका ठीक उल्टा हुआ, जहां उपनिवेश बनाने वाले युरोपीय लोगों (European colonization) ने मूल कुत्तों को लगभग पूरी तरह से विलुप्त कर दिया। ऐसा शायद नवागंतुक कुत्तों का उपयोगिता या खूबी के कारण हुआ होगा।

नेचर में प्रकाशित (Nature journal study) उपरोक्त दोनों ही अध्ययन कुत्ते के विकास और फैलाव पर थोड़ी रोशनी तो डालते हैं लेकिन फिर भी इस सवाल का जवाब अभी पूरा नहीं देते हैं कि अंतत: कुत्ते कहां से आए। उम्मीद है कि आगे ऐसी ही और खोजें और तफ्तीश (future research) इस सवाल को सुलझाने में मददगार होंगी। (स्रोत फीचर्स)

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पृथ्वी पर ‘आज़माइशी’ जीवन की खोज 

डॉ. इरफ़ान ह्यूमन

जीवाश्म (fossils) वे अश्मीभूत अवशेष या निशान होते हैं जो किसी प्राचीन सजीव के मरने के बाद लाखों- करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि जीवाश्म हमेशा पूरे के पूरे जीव के रूप में मिलें, बल्कि इनके कुछ हिस्से अश्मीभूत रूप मिल सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत, खोल या कवच (सीप, घोंघे के), पत्ती या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारा के जीवों की)। एडिआकारा के जीवाश्म अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनमें अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (Geological Society of America) के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत बारीक विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, वह भी ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यत: संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता।

दरअसल, जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश (soft bodied organisms), वे जीव लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं मिल पाते। फिर, बलुआ-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिनमें पानी आसानी से रिस सकता है। ये चट्टानें आम तौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती हैं। ऐसे हालातों में नाज़ु़क जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले कुछ असाधारण हुआ। इसे एडिआकारन काल (Ediacaran period) कहा जाता है। इस दौरान समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता (exceptional fossilization) के साथ संरक्षित हो गए।

लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पूर्व से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास (geological time scale) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहली बार बड़े, जटिल और नग्न आंखों से देखे जा सकने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में अधिकांश जीवों के शरीर में न तो हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे, बस त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अत: एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग (Precambrian era) का अंतिम दौर था, जिसके बाद कैंब्रियन युग शुरू हुआ।

ये जीव कैंब्रियन जैविक विस्फोट (Cambrian explosion) से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध जंतु जीवन का तेज़ी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे विकसित प्रक्रिया (gradual evolution) का परिणाम मानते हैं।

येल विश्वविद्यालय (Yale University) की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन (Lydia Tarhan) इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ़्यूज़’ कहती हैं, जिसमें एडिआकारा जीव समूह के जानवर  आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।

अश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया (fossilization process)

इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना विकासक्रम (evolutionary history) में उनके स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया एक अध्ययन, जो जियोलॉजी पत्रिका (Geology journal) के 15 दिसम्बर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है: Authigenic clays shaped Ediacara-style exceptional fossilization।

अध्ययन में शोधकर्ताओं (scientific study) ने एक नई रासायनिक तकनीक अपनाई। उन्होंने न्यूफाउंडलैंड और उत्तर-पश्चिमी कनाडा से मिले एडिआकारा जीवाश्मों में लीथियम समस्थानिकों का विश्लेषण किया। इनमें वे जीवाश्म भी शामिल थे जो रेतीले और कीचड़युक्त दोनों प्रकार के तलछट में सुरक्षित थे। इन समस्थानिकों से यह पता लगाने में मदद मिली कि क्या मिट्टी के खनिजों ने अश्मीभूत करने में भूमिका निभाई और क्या ये मिट्टियां ज़मीन से बहकर आई थीं (डिट्राइटल क्ले – detrital clay) या समुद्र तल के भीतर ही बनी थीं (ऑथिजेनिक क्ले)।

पता चला कि डिट्राइटल मिट्टी के कण पहले से ही उस तलछट में मौजूद थे, जिसने इन जीवों को ढंका था। इन्हीं कणों की सतह पर नई मिट्टियां समुद्र तल के भीतर ही बनने लगीं। सिलिका और लौह से भरपूर समुद्री जल तथा एडिआकारन काल के महासागरों की असामान्य रसायनिकी (ocean chemistry) ने इन ऑथिजेनिक मिट्टियों को बढ़ने में मदद की।

असल में, ये मिट्टियां प्राकृतिक सीमेंट (natural cementation) की तरह काम करने लगीं। इन्होंने रेत के कणों को आपस में बांध दिया और कोमल ऊतकों की महीन आकृतियों और छापों को रेत-पत्थर में स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। डॉ. टार्हन भविष्य में इसी लीथियम समस्थानिक तकनीक (geochemical analysis) को अन्य क्षेत्रों और कालों के जीवाश्मों पर लागू करने की योजना बना रही हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ऐसी ही प्रक्रियाएं कहीं और भी सक्रिय थीं। फिलहाल, यह अध्ययन हमें उस दौर की पृथ्वी की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर (ancient Earth history) देता है, जब जंतु जीवन के विकास में एक निर्णायक मोड़ आया था।

यह खोज उस पुरानी धारणा (scientific theory) को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारा बायोटा (Ediacara biota) इसलिए सुरक्षित रहे क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मज़बूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड (preservation conditions) में बच पाना असाधारण पर्यावरणीय परिस्थितियों का परिणाम था।

कहां मिलते हैं ये जीवाश्म

एडिआकारा बायोटा के जीवाश्म (global fossil sites) ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में मध्य प्रदेश (भीमबैठका) और राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) (India fossil sites) के प्राचीन तलछटों में इनके पाए जाने का दावा है।

वैज्ञानिकों के लिए अब भी यह पहेली है कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा (extinct life forms) थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी ‘आज़माइशी जीवन रूप’ (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फॉर्म्स – experimental life forms) भी कहा जाता है।

जो भी हो, हम आज जो जीवन देखते हैं, वह जीवाश्मों की डायरी (history of life on Earth) पढ़कर ही समझा गया है, वरना पृथ्वी का अतीत पूरी तरह रहस्य बना रहता! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ती गर्मी से कीटों पर बढ़ता संकट

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।

गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।

कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research)  से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।

अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।

इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।

यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।

कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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उड़ते समय भौंरे खुद को ठंडा कैसे रखते हैं?

भौंरे (bumblebees) ज़बर्दस्त उड़ाके होते हैं। वे लगभग 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकते हैं। इतनी तेज़ उड़ान के दौरान उनकी मांसपेशियां फड़फड़ाकर काफी गर्मी पैदा करती हैं। तो उड़ते समय भौंरे का शरीर बहुत गर्म हो सकता है। जैसे कार का इंजन (engine overheating), जिसे ठंडा न किया जाए तो खूब गर्म हो सकता है। तो भौंरे उड़ान के दौरान गर्म होकर झुलस क्यों नहीं जाते?

नए शोध (scientific research) से पता चला है कि वे अपने पंखों की तेज़ फड़फड़ाहट से बहने वाली हवा के ज़रिए खुद को ठंडा रखते हैं: जब भौंरा हवा में एक जगह ठहरकर उड़ता है, तो उसके पंखों से नीचे की ओर बहती हवा उसके शरीर का तापमान (body temperature cooling) लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तक कम कर देती है। इतने छोटे कीट के लिए यह बहुत बड़ी राहत है।

उड़ान के दौरान भौंरों की मांसपेशियां (flight muscles) बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करती हैं। ठंड में तो यह गर्मी उड़ान के लिए वार्मअप (muscle warm-up) में काम आ जाती है। लेकिन गर्मियों में यह खतरनाक साबित होती है।

अतिरिक्त गर्मी (heat stress) से निपटने के उनके कुछ तरीके तो पहले से मालूम हैं। वे अपने वक्षस्थल (thorax) (जहां उड़ान की मांसपेशियां होती हैं) से गर्मी को शरीर के पिछले हिस्से तक एक खास द्रव के जरिए पहुंचा सकते हैं। वैज्ञानिक यह भी देखते रहे हैं कि धूप (solar heating) उन्हें कितना गर्म करती है और पसीने जैसी प्रक्रिया (वाष्पीकरण) से उन्हें कितनी ठंडक मिलती है। इन सबको मिलाकर वैज्ञानिक ‘ऊष्मा संतुलन मॉडल’ (heat balance model) कहते हैं। लेकिन अब तक एक बात स्पष्ट नहीं थी: क्या उनके पंखों से पैदा होने वाला वायु प्रवाह (airflow from wings) भी उन्हें ठंडा करने में मदद करता है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने भौंरों को एक खास प्रयोगशाला कक्ष (laboratory experiment) में रखा, जहां हवा की गति मापने वाले उपकरण (air velocity sensors) लगे थे। जब भौंरे नकली फूलों के ऊपर मंडरा रहे थे, तब शोधकर्ताओं ने देखा कि उनके आसपास हवा लगभग 0.25 से 2 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बह रही थी। धुंध जैसी हल्की फुहार का इस्तेमाल करके उन्होंने यह भी देखा कि हवा उनके शरीर के चारों ओर कैसे फैलती है।

यह जानने के लिए कि यह हवा उन्हें कितनी ठंडक देती है, वैज्ञानिकों ने और भी परीक्षण किए। उन्होंने भौंरों के शरीर में बहुत छोटे तापमापी (micro temperature sensors) लगाए और हवा की वही स्थिति बनाई। तापमान में बदलाव (thermal measurement) की तुलना करके उन्होंने पाया कि अगर पंखों से पैदा होने वाली यह ठंडक न मिले, तो भौंरा दो मिनट से भी कम समय में तपकर टपक सकता है।

यानी भौंरों के पंखों से पैदा होने वाला हवा का बहाव (natural cooling system) एक तरह का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम है। हालांकि वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि जब भौंरे उड़ते-उड़ते आगे बढ़ते हैं, तब यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।

यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि बढ़ते वैश्विक तापमान (global warming) का सीधा असर भौंरों के जीवित रहने और परागण की क्षमता पर पड़ सकता है। अगर हम समझ लें कि भौंरे अपने शरीर की गर्मी को कैसे नियंत्रित (thermoregulation in insects) करते हैं, तो शायद भौंरो के बचाव के कुछ कारगर कदम (bumblebee conservation) उठा सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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खुशबू से ठगने वाले बीटल्स

ल-धोखा सिर्फ हमारे साथ नहीं होता। जीवजगत में भी कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां एक जीव अपने फायदे के लिए दूसरे जीव का इस्तेमाल (biological deception) करता है। जैसे, कुछ ऑर्किड के फूल (orchid flowers) मधुमक्खियों को छलते हैं। इन ऑर्किड के फूलों का रूप-रंग मादा मधुमक्खी की तरह होता है और वे उन्हीं की तरह महक बिखेरते हैं। मादा की तलाश कर रहीं नर मधुमक्खी इन फूलों पर चली जाती हैं। संभोग तो होता नहीं लेकिन संभोग की कोशिश में उनके शरीर पर ऑर्किड के परागकण (pollination process) चिपक जाते हैं। ऑर्किड का परागण हो जाता है, बदले में मधुमक्खी को कुछ नहीं मिलता।

वैज्ञानिकों को अब ऐसी ही एक और धोखाधड़ी के बारे में पता चला है। इसमें मधुमक्खियों को धोखा देते हैं भृंग यानी बीटल्स: ब्लिस्टर बीटल के लार्वा (blister beetle larvae) फूल जैसी महक बिखेरते हैं, जिससे मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती है। फिर, लार्वा मधुमक्खी से चिपक जाते हैं, चिपके-चिपके उनके छत्तों में पहुंच जाते हैं और उनके अंडे खा जाते हैं।

मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकॉलॉजी (Max Planck Institute for Chemical Ecology) के कार्बनिक रसायनज्ञ रयान आलम की बीटल्स के अध्ययन में दिलचस्पी थी। ब्लिस्टर बीटल आत्मरक्षा के लिए कैंथेरीडिन नामक विषैला रसायन छोड़ते हैं, जिससे त्वचा पर फफोले उभर आते हैं। जब आलम को पता चला कि ब्लिस्टर बीटल की कुछ प्रजातियां घास और पौधों के सिरे पर चढ़ जाती हैं (insect behavior)  तो वे हैरान रह गए।

वे सोचने लगे कि कहीं इनके लार्वा कोई गंध तो नहीं छोड़ते। जांच के लिए वे जर्मनी के घास के मैदानों से 40 युरोपियन ब्लैक ऑयल बीटल (Meloe proscarabaeus) इकट्ठा करके प्रयोगशाला ले आए। यहां बीटल्स ने प्रजनन किया और हज़ारों अंडे दिए। अंडे से निकलने के बाद लार्वा प्रयोगशाला की घास पर चढ़ गए। कैंथेरीडिन रसायन से बनने वाले फफोलों से बचने के लिए दस्ताने पहनकर आलम ने लार्वा इकट्ठा किए और उन्हें मसल दिया। फिर उन्होंने इस लार्वा-चटनी की गैस क्रोमैटोग्राफी की और देखा (gas chromatography analysis) कि इसमें कौन-कौन-से रसायन मौजूद हैं।

उन्हें लार्वा में मोनोटर्पिनॉइड्स नामक कुछ अणु (monoterpenoid compounds) मिले। ये कीटों में तो कम मिलते हैं, लेकिन पौधों में आम तौर पर पाए जाते हैं। लार्वा में सबसे अधिक पाए गए आठ अणुओं में से कई प्राय: फूलों में पाए जाते हैं। जैसे लिनेलूल ऑक्साइड (linalool oxide) और लिलेक एल्डिहाइड (lilac aldehyde)। फूलों में ये रसायन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन फूलों में पाए जाने वाले रसायन किसी कीट में मिलना हैरानी की बात थी (chemical mimicry)।

तो सवाल था कि क्या वाकई कीट में मौजूद ये रसायन मधुमक्खियों को न्यौता देते हैं? इसे जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने एक Y-शेप का रास्ता (Y-maze experiment) बनाया, जिसका एक रास्ता बीटल-लार्वा से बिखेरी गई खुशबू की ओर जाता था और दूसरा रास्ता व्हीटग्रास की खुशबू की ओर। मधुमक्खी दोनों में से कोई एक खुशबू चुन सकती थीं। रेड मेसन मधुमक्खियों (Osmia bicornis) और बेयर-सैडल्ड सेलोफेन मधुमक्खियों (Colletes similis), दोनों ने व्हीटग्रास की बजाय लार्वा से निकलने वाली फूल-जैसी खुशबू का मार्ग चुना।

शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि बीटल लार्वा फूल जैसे रसायन कैसे बनाते हैं। पता चला कि उनमें इन रसायनों का निर्माण उन्हीं एंज़ाइम्स (biosynthesis enzymes) से होता है, जिनसे ये पौधे में बनते हैं।

मादा-सरीखी खुशबू फैलाने की बजाय फूल-जैसी खुशबू बिखेरने से फायदा यह है कि इस खुशबू से नर और मादा दोनों मधुमक्खियां आकर्षित होती है। और सिर्फ मादा मधुमक्खियां ही अपने छत्ते में वापस लौटती हैं, नर नहीं। तो क्यों न छत्ते तक पहुंचने के लिए नर को छोड़कर सीधे मादा से लिफ्ट ली जाए। लार्वा वसंत की शुरुआत में, असली फूल खिलने से पहले, घास के तनों पर चढ़ जाते हैं। और उन्हें फूल समझकर बेचारी मधुमक्खियां उनके पास खींची चली आती हैं और ठगी जाती (parasitic strategy) हैं।

हो सकता है इस तरह की महकती नकल जीवजगत में और भी आम हो, जिन पर लोगों का ध्यान न गया हो। ध्यान न जाने का कारण यह हो सकता है कि हम मनुष्य नाक से उतना काम नहीं लेते जितना आंखों से लेते हैं। तो, आंख-नाक-कान खुले रखकर निसर्ग को निहारें, सूंघें और सुनें बहुत कुछ रोचक हाथ लग सकता है (nature science discovery)। (स्रोत फीचर्स)

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जेलीफिश मनुष्यों के समान सोती है

जेलीफिश (jellyfish) एक समुद्री अकशेरुकी जीव है जो आम तौर पर अपने छतरी जैसी आकृति से पहचाना जाता है। यह निडेरिया फायलम में कैसियोपिडी कुल में आता है और कैसिओपी जीनस का सदस्य है जिसमें 12 प्रजातियां हैं। देखा जाए तो यह हायड्रा, सी-एनीमोन, कोरल जैसे अन्य जलचर जंतुओं का सम्बंधी है। यहां जिस जेलीफिश (Cassiopea andromeda) की बात हो रही है वह उल्टी छतरी जैसा दिखता है। यानी छत्ता ज़मीन पर और झालर ऊपर।

यह शैवालों के साथ सहजीवी सम्बंध (symbiotic relationship) में रहता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के ज़रिए भोजन का निर्माण करते हैं। ये शैवाल इसके छाते में बसते हैं और यही कारण है कि ये जेलीफिश छाते को उल्टा रखती हैं ताकि इन शैवालों को भोजन निर्माण के लिए प्रकाश मिलता रहे। जेलीफिश विभिन्न रंगों में मिलती है और यह रंग इन्हें शैवालों की बदौलत ही मिलता है।

अब वैज्ञानिकों ने नेचर कम्यूनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया है कि जेलीफिश और स्टारलेट सी-एनीमोन (Nematostella vectensis) में नींद जैसे पैटर्न नज़र आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि नींद लेने के लिए दिमाग ज़रूरी है लेकिन उक्त अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है।

देखा जाए तो नींद (sleep behavior) एक जोखिम भरा व्यवहार है – उस दौरान जंतु शिकारियों के प्रति कमज़ोर हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि फिर भी नींद आती है, तो इसकी कुछ तो लाभदायक भूमिका होनी चाहिए। इस्राइल के शोधकर्ता उपरोक्त दो प्रजातियों में इसी की छानबीन कर रहे थे। ये दोनों जंतु उथले लैगून्स के पेंदों में अपने टेन्टेकल्स को लहराते पड़े रहते हैं। टेन्टेकल्स शिकार को पकड़ने का काम करते हैं (marine animal behavior)।

इनमें नींद जैसी अवस्था देखी गई थी। यह देखा गया था कि दिन के कई घंटे ये ऊंघते रहते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन जंतुओं में मस्तिष्क तो छोड़िए, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) भी नहीं होता। इनकी तंत्रिकाएं पूरे शरीर में बिखरी होती हैं।

बार-इलान विश्वविद्यालय के लियोर एपलबॉम और उनके साथी देखना चाहते थे कि इनमें नींद का पैटर्न कैसा होता है और नींद की भूमिका क्या है। अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने एक एक्वेरियम में कई सारी जेलीफिश रखीं और कई दिनों तक उन्हें 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधकार में रखा (light dark cycle experiment), यह देखने के लिए कि जेलीफिश इन अवधियों में कितनी बार अपनी छतरी नुमा तोंद को ऊपर-नीचे करती हैं। यह फूलना-पिचकना इनके जागे होने का एक संकेत है।

प्रयोग में देखा गया कि रात में जेलीफिश कम सक्रिय रहती हैं और अपनी तोंद को प्रति मिनट लगभग पांच बार कम ऊपर-नीचे करती हैं। अब यह देखना था कि क्या इस क्रिया का सम्बंध निद्रावस्था से है। शोधकर्ताओं ने जेलीफिश पर रोशनी चमकाई और देखा कि वे कितनी जल्दी अपनी धड़कन से प्रतिक्रिया देती हैं। किसी ऊंघते मनुष्य के ही समान जेलीफिश ने अंधकार में रोशनी की प्रतिक्रिया देने में 20 सेकंड का टाइम लिया। जबकि दिन में चौकन्नी अवस्था में उन्हें मात्र 10 सेकंड लगते हैं।

सी-एनीमोन (sea anemone organism) का पैटर्न इससे उल्टा था। वे रात में सक्रिय रहते हैं और दिन में उनकी हरकतें धीमी रहीं और प्रतिक्रिया अवधि लंबी। अलबत्ता, दोनों ही जंतु दिन की एक-तिहाई अवधि तक सोते रहे। और तो और, सी-एनीमोन के सोने जागने का क्रम उनकी अंदरुनी घड़ी (सर्काडियन क्लॉक) से संचालित था। शोधकर्ताओं ने प्रकाश व अंधकार के क्रम को पलट दिया, तब भी सी-एनीमोन का सोने-जागने का क्रम बरकरार रहा। दूसरी ओर, जेलीफिश में यह क्रम प्रकाश से प्रभावित हुआ – अंधेरे में वे उनींदे रहे और रोशनी में सक्रिय (sleep deprivation effect)।

यह भी देखा गया कि इन जंतुओं को यदि एक रात की नींद ठीक से न मिले तो उन्हें बाद में ज़्यादा आराम की ज़रूरत होती है, ठीक इंसानों के समान। शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में पानी को 6 घंटे तक उस दौरान मथा जो जेलीफिश के सोने का समय था। इससे उनकी नींद कच्ची रही और बाद में वे सामान्य जेलीफिश की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक समय तक सोते रहे।

शोधकर्ताओं ने नींद के साथ छेड़छाड़ का एक तरीका और आज़माया। उन्होंने कुछ एक्वेरियम टंकियों में मेलेटोनिन (melatonin hormone) डाल दिया। मेलेटोनिन एक हॉरमोन है, मनुष्यों में मस्तिष्क जिसका स्राव रात में करता है और यह नींद प्रेरित करता है। मेलेटोनिन का ऐसा ही असर जेलीफिश तथा सी-एनीमोन पर भी हुआ और वे दिन की उस अवधि में ऊंघने लगे जब वे सामान्य तौर पर सक्रिय होते हैं (sleep regulation)।

ज़ाहिर है कि ये दो जंतु नींद का मज़ा लेते हैं। पूर्व में कई शोधकर्ता दर्शा चुके थे कि मक्खियों, चूहों और मनुष्यों सहित कई प्रजातियों में नींद डीएनए को हुई क्षति को कम (DNA damage repair) करता है। यह क्षति जाग्रत अवस्था में होती रहती है। एपलबॉम का विचार है कि शायद जेलीफिश और सी-एनीमोन में भी ऐसा ही होता है। अपने इस विचार की जांच के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने जेलीफिश को पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश के संपर्क (ultraviolet UV radiation) में रखा। यूवी प्रकाश डीएनए क्षति के लिए जाना जाता है। यूवी के संपर्क में रहने के बाद जेलीफिश सामान्य से ज़्यादा देर तक सोती रहीं जबकि उनमें मस्तिष्क नहीं होता।

इसी प्रकार से, सी-एनीमोन को ऐसी कीमोथेरपी औषधि (chemotherapy drug) दी गई जो डीएनए क्षति करती है। इस उपचार के बाद ये सी-एनीमोन 30 प्रतिशत ज़्यादा सोए (DNA repair mechanism)।

तो, सवाल उठता है कि नींद की झपकी के सारे आसन्न खतरों के बावजूद जंतु सोते क्यों हैं। एक गोल कृमि सीनेरोब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabditis elegans worm) के नींद व्यवहार पर शोध करने वाली कैलिफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक चेरिल फान बर्सकिर्क का कहना है कि नींद तंत्रिकाओं के रख-रखाव का एक तरीका हो सकता है क्योंकि तंत्रिकाएं डीएनए क्षति का सबसे अधिक खतरा झेलती हैं। उनका तो कहना है कि नींद का उद्भव संभवत: पहली-पहली तंत्रिकाओं (early nervous system) के साथ ही हुआ होगा। यानी नींद तो मस्तिष्क के विकास से पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार कर चुकी थी। वे कहती हैं कि एपलबॉम की टीम द्वारा किए गए ये प्रयोग एक बार फिर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि नींद का विकास (evolution of sleep) जटिल मस्तिष्क  को संभालने के लिए हुआ है। (स्रोत फीचर्स)

जेलीफिश की सोनजागने की प्रक्रिया का वीडियो देखें: https://youtu.be/UPtSlvU6nh8

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घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है

क्षिण-पूर्वी ब्राज़ील के जंगल (Southeast Brazil rainforest) में नदी का किनारा है। हल्की बयार बह रही है। इस बयार में, पेड़ की शाखों से लटकी काई-युक्त लताएं/टहनियां लटकन की तरह डोल रही हैं। यदि नज़ारा आपको महज़ कुदरती सजावट लगे, तो जान लीजिए कि कुदरती शिकारियों की तरह आप भी धोखा खा गए हैं। आप यदि इस ‘सजावट’ पर ज़रा गौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि इन लटकनों से घोंसलों को सजाया गया है और घोंसलों में पक्षी के अंडे/चूज़े रखे हैं। निराश न हो, ये सजावट थी भी शिकारियों को चकमा देने (anti-predator strategy)।

बायोलॉजी लेटर्स के अध्ययन के अनुसार, ब्लू मैनाकिन (Chiroxiphia caudata) (Blue Manakin bird) नामक चिड़िया अपने अंडों और चूज़ों की सुरक्षा के लिए घोंसलों में लंबी-लंबी लटकनें लटका देती है ताकि टूकेन समेत अन्य शिकारियों को उनके घोंसले, घोंसले-जैसे न लगें और वे इनसे दूर ही रहें। ऐसा करने से इन शिकारियों द्वारा हमले की संभावना 10 गुना कम हो जाती है। हालांकि बड़े शिकारी-पक्षियों के आक्रमण की संभावना तो फिर भी बनी रहती है, वे घोंसले पहचान सकते हैं।

वैज्ञानिकों को काफी समय से यह पता था कि ब्लू मैनाकिन और अमेरिका की कई अन्य पक्षी प्रजातियां घोंसलों में लटकन लटकाती हैं। उनका अनुमान था कि ऐसा शायद वे छद्मावरण (camouflage behavior) देने के लिए करती होंगी। यानी ऐसा करने से घोंसले आसपास के परिवेश में घुल-मिलकर शिकारियों की नज़रों से ओझल रहते होंगे। लेकिन यह अनुमान पक्का नहीं था। एक विवाद यह था कि लटकनदार घोंसले तो ज़्यादा नुमाया हो सकते हैं और आसानी से पहचाने जा सकते हैं (nest recognition theory)।

इस विवाद को सुलझाने के लिए फेडरल युनिवर्सिटी के पक्षी विज्ञानी मर्सिवल रॉबर्टो फ्रांसिस्को के दल ने ब्लू मैनाकिन द्वारा परित्यक्त घोंसलों की निगरानी करने का सोचा। जब ब्लू मैनाकिन का प्रजनन काल खत्म हो गया, तब पक्षी विज्ञानी कैसियानो मार्टिंस जंगल से 50 खाली और परित्यक्त घोंसले और उनकी काई-युक्त लटकन ले आए। प्रयोगशाला में उन्होंने प्लास्टिसिन (मॉडलिंग क्ले) से असली जैसे अंडे बनाए और हर घोंसले में ऐसे दो नकली अंडे रख दिए। फिर, अगले दो प्रजनन मौसम में इन घोंसलों को जंगल में ऐसी जगहों पर रखा जहां कुदरती तौर पर काईदार लटकन बहुत कम पनपती है। शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों पर लटकन लगी रहने दी, और कुछ की लटकन हटा दी। और घोंसलों की इंफ्रारेड कैमरे से निगरानी (infrared camera monitoring) की।

लटकन होने का फर्क साफ दिखा। लटकन-विहीन 54 घोंसलों में से ग्यारह (20 प्रतिशत) घोंसलों से अंडे चोरी हुए थे, जबकि लटकन वाले 54 घोंसलों में से सिर्फ एक से अंडे चोरी (predation rate) हुआ था।

अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि लटकनदार घोंसले बनाने वाले पक्षी दरअसल अपने घोंसलों को न तो छुपाने की कोशिश करते हैं, न आसपास की किसी अन्य चीज़ जैसा दिखाने की। बस कोशिश यह होती है कि घोंसलों को ऐसे आकार दें कि वे घोंसले जैसे न दिखें ताकि शिकारियों को पता न चले (deceptive nest structure)। हालांकि यह तरीका स्तनधारी या उन शिकारियों के विरुद्ध काम नहीं करेगा जो शिकार खोजने के लिए गंध का सहारा लेते हैं।

बहरहाल, एक सवाल बना हुआ है: इन घोंसलों पर काईदार जगहों पर ज़्यादा हमले क्यों होते हैं क्योंकि यहां तो घोंसले अधिक ओझल होना चाहिए। शायद टूकेन पक्षी समझ गया हो कि ब्लू मैनाकिन अपने घोंसले काईदार जगह पर बनाता है। (स्रोत फीचर्स)

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