ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

लवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूकंप जोखिम का नया नक्शा आया और चला गया

माधव केलकर

पिछले साल यानी नवंबर 2025 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेडर्ड (बी.आई.एस.) ने भारत के लिए भूकंप जोखिम वाले इलाकों का नया नक्शा जारी किया था। इससे पहले सन 2016 में भी बी.आई.एस. (BIS) द्वारा एक नक्शा जारी किया गया था, उसको आधार मानकर ही भारत में इमारतें, भवन, सड़कें, पुल, हवाई अड्डे आदि का निर्माण निर्धारित भवन मानकों के अनुसार किया जा रहा था। लगभग 9 साल बाद आए इस नक्शे के बारे में बताया गया है कि भारत की टेक्टॉनिक गतिविधियों, सक्रिय फॉल्ट ज़ोन, उपग्रहों से प्राप्त जानकारी आदि आंकड़ों की रोशनी में यह भूकंप प्रवण क्षेत्रों (earthquake-prone area/ seismic zone) को दर्शाने वाला नक्शा बनाया गया है। इस नक्शे के बारे में एक और बात कही जाती है कि यह नक्शा भूगर्भीय तथ्यों के आधार पर बनाया गया है। इसलिए ज़मीन के ऊपर मौजूद कोई जगह प्रशासनिक, सामरिक या व्यापारिक दृष्टि से कितनी भी महत्वपूर्ण हो, उसे भूकंपीय खतरे के लिहाज़ से जिस ज़ोन में होना चाहिए, उसी ज़ोन में दिखाया गया है। जगह के महत्व के आधार पर ज़ोन की सीमा-रेखा के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई है।

बहरहाल, नए भूकंपीय जोखिम नक्शे को जारी करने के महज़ चार-पांच महीनों के बाद वापस ले लिया गया। एक बार फिर हम पुराने नक्शे पर लौट आए हैं। नया नक्शा वापस क्यों हुआ इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। बस, कुछ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। चलिए, पहले नए नक्शे की कुछ खास बातों को देखने से पहले पिछले कुछ पन्ने पलटते हैं।

सन 2025 से पहले के नक्शे

भारत को भौगोलिक रूप से तीन मुख्य टेक्टॉनिक क्षेत्रों (tectonic areas) में बांटा जा सकता है: उत्तर में हिमालय,  हिमालय से सटा गंगा-सिंधु का मैदान और दक्षिण में प्रायद्वीपीय भारत। भारत में इन तीनों भौगोलिक क्षेत्रों में भूकंप के खतरे और उससे जुड़े जोखिमों का स्तर अलग-अलग है। इसलिए, 1935 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत का पहला भूकंप संभावित इलाकों का नक्शा तैयार किया। इसमें ज़मीन के हिस्सों को भारी, मध्यम और हल्के से लेकर बिना नुकसान वाले क्षेत्रों में बांटा गया था। यह भारत के उपरोक्त  तीन भौगोलिक क्षेत्रों से काफी हद तक मेल खाता था।

पूरा हिमालय क्षेत्र तेज़ तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय प्लेट युरेशियन प्लेट की ओर लगातार लगभग 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से बढ़ रही है, जिससे धरातल के नीचे की चट्टानी परतों में तनाव पैदा होता है और फिर वह छूटता है।

पिछले सवा सौ साल में हिमालय क्षेत्र में चार बड़े भूकंपों का रिकॉर्ड है: शिलांग भूकंप (1897, तीव्रता 8.1), कांगड़ा भूकंप (1905, तीव्रता 7.9), बिहार-नेपाल भूकंप (1934, तीव्रता 8.3), और असम-तिब्बत भूकंप (1950, तीव्रता 8.6)।

इनमें से शिलांग भूकंप के अलावा बाकी भूकंप सीधे तौर पर हिमालयी प्लेट की सीमा से जुड़े हैं। इसके अलावा, हिमालय के कई हिस्सों की पहचान ‘सिस्मिक गैप’ (भूकंपीय अंतराल) के तौर पर की गई है, जहां भविष्य में कभी भी विनाशकारी भूकंप आने की आशंका है।

हिमालयी प्लेट-टकराव वाले इलाके से सटे घनी आबादी वाले सिंधु-गंगा के मैदान भी बड़े हिमालयी भूकंपों और तेज़ स्थानीय भूकंपों के प्रति बहुत संवेदनशील हैं, क्योंकि यहां की मोटी अवसादी परत ज़मीन की हलचल को बढ़ा देती है। साथ ही, प्रायद्वीपीय भारत के कुछ अलग-थलग हिस्सों में मध्यम तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं, जिनसे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।

1935 तक प्रायद्वीपीय भारत में कोई उल्लेखनीय भूकंप दर्ज नहीं हुआ था। इसलिए इस पूरे इलाके को तीव्र भूकंप संभावित ज़ोन से बाहर रखा गया था।

1960 के दशक में प्लेट टेक्टॉनिक्स (tectonic plates) के सिद्धांत को मान्यता मिलने के बाद भारत में भारतीय प्लेट, युरेशियन प्लेट के खिसकने की गति, हिमालय की ऊंचाई बढ़ने, हिमालय के इलाके में मौजूद भ्रंश रेखा वगैरह का अध्ययन किया जाने लगा। इसी समय नर्मदा-सोन-ताप्ती नदी घाटियों में मौजूद भ्रंश रेखा के बारे में भी जानकारियां जुटाने का सिलसिला शुरू हुआ। इन सब शोधकार्यों की वजह से 1970 में भारत को भूकंप प्रवणता वाले पांच क्षेत्रों (ज़ोन) में बांटा गया। ज़ोन 2 में भूकंप का खतरा बेहद कम था। जबकि ज़ोन 5 में भूकंप का सबसे ज़्यादा खतरा था। ज़ोन 5 में हर साल कम तीव्रता के दर्ज़न भर भूकंप दर्ज होते थे। लेकिन खतरनाक तीव्रता के भूकंप कुछेक सालों में एक बार आते थे। ज़ोन 3 और 4 में भूकंप का खतरा तो था लेकिन यहां भी बड़े भूकंप की आशंका कम आंकी गई थी।

भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहला भूकंपीय ज़ोन मानचित्र जारी किया था। 1970 में इसका संशोधित रूप ज़ारी किया गया। सन 2002 में जो भूकंपीय मानचित्र जारी किया गया उसमें ज़ोन 1 को खत्म कर उसे ज़ोन 2 में मिला दिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में भारत के कई शहरों में भूकंप मापी उपकरण (seismograph) लगाकर इनका एक नेटवर्क बनाया गया है। इसकी बदौलत ज़ोन 2, 3 व 4 में भी ज़मीन के भीतर की हलचलों पर करीबी नज़र रखना संभव हुआ है। साथ ही, हिमालय, तराई इलाके, कच्छ का रन, राजस्थान और उत्तर-पूर्व के राज्यों के नीचे की ज़मीनी हलचलों को बेहतर तरीके से परखा गया है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लेते हैं। इस प्रदेश में ऊपरी सतह जितनी स्थिर दिखती है सतह के कुछ किलोमीटर नीचे उतनी स्थिरता नहीं है। सोन-नर्मदा उत्तरी भ्रंश, सोन-नर्मदा दक्षिणी भ्रंश, बड़वानी-सुक्ता भ्रंश, ताप्ती उत्तरी भ्रंश, गोविलगढ़ भ्रंश जैसी कई टूट-फूट व दरारें हैं, और वहां की चट्टानी परतों में ढेर सारी ऊर्जा संचित है।

भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2016 में भी नक्शा जारी किया था।

सन 2025 का नक्शा

पिछले तीन-चार दशक के दौरान भारत और पड़ोसी देशों में आए प्रमुख भूकंपों में शामिल हैं: बिहार-नेपाल भूकंप (1988, तीव्रता 6.8), उत्तरकाशी भूकंप (1991, तीव्रता 6.8), किल्लारी-लातूर भूकंप (1993, तीव्रता 6.3), जबलपुर भूकंप (1997, तीव्रता 6.1), चमोली भूकंप (1999 तीव्रता 6.5), भुज भूकंप (2001, तीव्रता 7.7), हिंद महासागर सुनामी (2004, तीव्रता 9.3), कश्मीर भूकंप (2005, तीव्रता 7.6), सिक्किम भूकंप (2011, तीव्रता 6.9) और नेपाल भूकंप (2015, तीsव्रता 7.9)।

इन भूकंपों के बाद की गई जांच-पड़ताल से पता चला कि इनमें ज़्यादातर मौतें मुख्य रूप से उन इमारतों और ढांचों के ढहने से हुईं जो भूकंप-रोधी डिज़ाइन नियमों का पालन नहीं करते थे। दुनिया के कई अन्य हिस्सों में इतनी ही तीव्रता वाले भूकंपों से जान-माल का इतना भारी नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि वहां इमारतें और ढांचे भूकंप-रोधी खूबियों के साथ और सख्त तकनीकी-कानूनी नियमों के अंतर्गत  बनाए गए थे। इसलिए, यह समझदारी की बात है कि भारत में विकास की प्रक्रिया में भूकंप से होने वाले जोखिम को कम करने के उपायों को शामिल किया जाए। इसके लिए देश के भूकंप जोखिम ज़ोन्स (जो मात्रात्मक रूप से और अधिक वास्तविक डैटा पर आधारित हों) के आधार पर भूकंप-रोधी डिज़ाइन (earthquake resistant designs) वाली इमारतें और बुनियादी ढांचे बनाए जाने चाहिए।

अपने अनुभवों और युरोप, जापान वगैरह द्वारा अपनाए जा रहे मानकों की रोशनी में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2025 में नया भूकंपीय जोखिम का नक्शा जारी किया गया। सन 2025 में जारी किए गए नक्शे में पूर्ववर्ती नक्शों के मुकाबले एक नया ज़ोन यानी ज़ोन नंबर 6 जोड़ा गया है। पूर्ववर्ती बाकी ज़ोन के एरिया को भी बढ़ाया-घटाया गया है।

नए नक्शे में छत्तीसगढ़, मध्य भारत, दक्कन के पठार के कुछ इलाकों के अलावा दक्षिण भारत के राज्यों को ज़ोन 2 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की आशंका बेहद कम है।

मध्य भारत, नर्मदा घाटी, झारखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा के कुछ इलाकों को ज़ोन 3 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की मध्यम संभावना है।

ज़ोन 4 में उत्तरी मैदान, दिल्ली के कुछ इलाके शामिल हैं। नर्मदा-सोन घाटी के कुछ इलाके भी ज़ोन 4 में शामिल किए गए हैं। यह वह इलाका है जहां भूकंप का उच्च खतरा मौजूद है।

ज़ोन 5 में गुजरात और उत्तर पूर्वी राज्य और हिमालय के तराई वाले इलाके भी शामिल हैं। यहां तीव्र भूकंप का खतरा है।

ज़ोन 6 में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक का पूरा हिमालय क्षेत्र शामिल है, जहां तीव्रतम भूकंप का खतरा है।

इस नए नक्शे के मुताबिक भारत का काफी बड़ा इलाका ज़ोन 4, 5, 6 यानी तीव्र भूकंप प्रवण इलाके में आता है।

इस नक्शे में यदि कोई शहर निम्न जोखिम वाले ज़ोन में है लेकिन निम्न और उच्च जोखिम ज़ोन की सीमा पर है, तो उस शहर को उच्च ज़ोन में गिना जाएगा और उस पर वे सब मानक लागू होंगे जो ज़्यादा खतरे वाले ज़ोन पर लागू होते हैं।

नया नक्शा, नए पेंच

नया नक्शा प्रस्तावित करते ही यह समझ में आने लगा कि इस नक्शे के ज़ोन 5 और ज़ोन 6 में उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत, हिमालय की तराई और मध्य हिमालय के इलाके शामिल हैं। इसलिए भविष्य में प्रस्तावित परियोजनाओं, पुलों, सुरंगों, सड़कों, भवनों, अस्पतालों, बांधों, पर्यटन विस्तार कार्यक्रम सभी पर उस ज़ोन के भूकंप सुरक्षा मानक लागू होंगे और जो परियोजनाएं शुरू हो रही हैं उनकी लागत नए मानकों को लागू करने की वजह से बढ़ जाएगी।

इसी तरह ज़ोन 5 में पुरानी इमारतों का मज़बूतीकरण करना भी अनिवार्य हो जाएगा।

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और आपदा प्रबंधन टीमों को एक बड़े इलाके में राहत और बचाव का काम करने के लिए तैयार रहना होगा।

शायद, एक बेहतर तकनीक के सहारे भूवैज्ञानिकों ने भारत के भूकंप प्रवण इलाके का नक्शा तैयार किया है। जिसमें हिमालय, तराई, भुज-कच्छ जैसे भूकंप के पारंपरिक इलाकों के अलावा भारत के कई अन्य इलाकों की भूगर्भीय स्थितियों का आकलन करके खतरे के दायरे को बताया गया है। भारतीय मानक ब्यूरो ने इन खतरों को समझते हुए हर इलाके के लिए सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं के लिए मानक तैयार किए थे।

अब मामला आता है इन मानकों का पालन करवाने का। यहां आकर हम सिर्फ कयास ही लगा सकते है कि शायद आगे की परियोजनाओं और इन मानकों में ताल-मेल बिठाना कठिन लगने लगा हो। यह भी सोचा गया हो कि पुराने मानक अब भी उपयोगी हैं। इसलिए पुराने मानकों को लागू रखने पर लौट आए हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

ज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्र की गहराइयों में ऑक्सीजन कैसे आई

प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में 4000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की खोज की सबसे पहली खबर 2024 में नेचर जियोसाइन्स जर्नल (Nature Geoscience journal) में प्रकाशित हुई थी। यह खोज ए. स्वीटमैन की टीम ने की थी। इसके साथ ही वैज्ञानिकों के बीच गहमागहमी शुरू हो गई। कारण यह था कि इतनी गहराई पर ऑक्सीजन का पाया जाना एक रहस्य जैसा था क्योंकि वहां सूरज की रोशनी तो पहुंचती नहीं जो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis process) की क्रिया को ऊर्जा दे सके। गौरतलब है कि धरती पर ऑक्सीजन मूलत: पेड़-पौधों द्वारा सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में सम्पन्न प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से ही पैदा होती है। लिहाज़ा, यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी गहराई के अंधकार में कौन-सी प्रक्रिया ऑक्सीजन उत्पादन (oxygen production mystery) को अंजाम दे रही है।

अब वैज्ञानिक समुद्र की गहराई (deep ocean research) में और प्रयोगशाला में समुद्री गहराई की परिस्थितियां निर्मित करके इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए वैज्ञानिक एक शोध जहाज़ नौटिलस पर सवार होकर हवाई और मेक्सिको के बीच स्थित क्लेरियन-क्लिपरटन क्षेत्र (Clarion Clipperton Zone) में जाएंगे जहां पहली खोज की गई थी और समुद्र में कुछ खोजी यंत्र उतारकर नमूने एकत्रित करेंगे और वहां कई चीज़ों का मापन भी करेंगे।

ये खोजी यंत्र पानी की अम्लीयता (water acidity pH level) का मापन करेंगे। यदि अम्लीयता अधिक मिलती है तो कहा जा सकेगा कि वहां हाइड्रोजन की उपस्थिति बहुत ज़्यादा है अर्थात वहां पानी के अणु टूट रहे हैं।

मूल अध्ययन के दौरान ऑक्सीजन उस क्षेत्र में मिली थी जहां कई धातुओं (metal nodules) से बनी डल्लियां (जैसे बड़ी होती है) मिली थीं। इनमें मैंगनीज़ और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएं भी पाई गई थीं। ये डल्लियां वहां करोड़ों साल पहले बनी होंगी। वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर अनुमान लगाया था कि शायद यही धातुएं पानी के विघटन को उत्प्रेरित कर रही हैं – लगभग उसी तरह जैसे प्रयोगशाला में पानी के विद्युत विच्छेदन से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनती है। यह एक संभावना मात्र है। यह भी हो सकता है कि वहां मौजूद सूक्ष्मजीव (deep sea microbes) यह ऑक्सीजन बना रहे हों। मौजूदा खोजबीन इन दो संभावनाओं के बीच निर्णय करने का प्रयास है। इसके लिए कई कसौटियों पर आधारित मापन ज़रूरी है और खोजी यंत्रों पर तमाम किस्म के उपकरण (scientific instruments) लगाए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हिमालय में मिले प्राचीन समुद्री घटनाओं के प्रमाण

ऊंचाई पर स्थित तिब्बती पठार (Tibetan plateau) पर भूवैज्ञानिकों को लावा के अवशेष मुड़ी-तुड़ी, ऐंठी हुई खपच्चियों के रूप में मिले हैं। ये खपच्चियां ऐसे ज्वालामुखी के बड़े विस्फोटों (volcanic eruption) के अवशेष हैं जो समुद्र के पेंदे में करीब 20 करोड़ साल से भी पहले फूटे थे।

यह तो पता है कि ज्वालामुखियों के ऐसे महाविस्फोटों (जिनसे लाखों सालों तक लाखों घन किलोमीटर लावा निकलता रहता है) के कारण बड़े पैमाने पर सामूहिक जैव विलुप्तियां (mass extinction) हुईं हैं। ज़ाहिर है बड़े पैमाने पर निकले और दूर-दूर तक फैले लावा ने जीवों के आसपास के पर्यावरण को बदला होगा, कई जीव इसका सामना नहीं कर पाए होंगे और खत्म हो गए होंगे।

महाविस्फोट से निकले और दूर तक बिछे लावा से बने क्षेत्र को विशाल आग्नेय प्रांत (Large Igneous Province) कहा जाता है। इन्हें भूमि पर पहचानना आसान होता है क्योंकि इनसे निकले लावा के पठार (lava plateau) सदियों तक टिके रहते हैं। लेकिन समुद्र में हुए महाविस्फोट से बने आग्नेय प्रांत पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि समुद्र में भूपर्पटी (oceanic crust) अपेक्षाकृत तेज़ी से मेंटल में तब्दील होती जाती है। नतीजतन अधिकतर समुद्री महाविस्फोटों के प्रमाण मिट जाते हैं। हालिया अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने ज़मीन के बीच स्थित भूमि में लगभग मिट चुके दो समुद्री महाविस्फोटों (submarine volcanic eruptions) के सबूतों की पहचान की है। जियोलॉजी (Geology journal) में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि समुद्र में हुए इन महाविस्फोटों ने जीवन के इतिहास को एक से ज़्यादा बार आकार दिया है।

हाल ही में पहचाने गए इन महाविस्फोटों की कहानी लगभग 25 करोड़ साल पहले शुरू होती है, जब पैंजिया सुपर-महाद्वीप (Pangaea supercontinent) लगभग बन चुका था। चीज़ें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। हालांकि टेथिस महासागर के पेंदे की ज़्यादातर भूपर्पटी मेंटल में समा गई, लेकिन पेंदे के कुछ अवशेष उन चट्टानों में बचे/फंसे रह गए, जो आगे चलकर हिमालय बनीं (Himalaya formation)।

वैसे, हिमालय में टेथिस महासगर (Tethys Ocean) के कई स्रोतों के अवशेष हो सकते हैं, जैसे प्राचीन समुद्री पहाड़ों के या द्वीपों के, या बड़े आग्नेय प्रांत के। इन अवशेषों को पहचानने के लिए जिलिन युनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक जियान-जुन फैन और कर्टिन युनिवर्सिटी के भूविज्ञानी साइमन वाइल्ड की टीम ने मध्य तिब्बत में चट्टानों के बाहर झांकते आउटक्रॉप्स (rock outcrops) का विश्लेषण किया जो टेथिस महासागर के अवशेष होने की संभावना रखते थे। इन चट्टानों में समुद्री तलछट भी थी जो ठंडे लावा से बनी आग्नेय बेसाल्ट चट्टानों के ऊपर जमा हो गई थी।

कुछ चट्टानों में मिले संकेतों से पता चला कि वे ऐसे महाविस्फोट के अवशेष हैं जिनके बारे में पहले पता नहीं था। रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण (radiometric dating) से पता चला कि वे लगभग एक ही समय में बने थे, जिससे पता चलता है कि वे एक ही घटना से बने थे। समस्थानिक विश्लेषण (isotopic analysis) से पता चलता है कि बेसाल्ट चट्टानों को बनाने वाला मैग्मा गर्म मेंटल प्रवाह (mantle plume) से निकला था।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये चट्टानें दो ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic events) के बारे में बताती हैं, जिनके बारे में पहले पता नहीं था। एक विस्फोट लगभग 23.2 करोड़ साल पहले हुआ था, दूसरा विस्फोट लगभग 21 करोड़ साल पहले। अन्य क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि लगभग 24.9 करोड़ साल पहले प्राक्-प्रशांत महासागर में तीसरा बड़ा विस्फोट हुआ था।

इन विस्फोटों ने समुद्र के भीतर के जीवन पर कहर बरपाया होगा। पिघली हुई चट्टान के आने से पोषक तत्वों की अधिकता ने शैवाल और अन्य सूक्ष्मजीव जीवन को बढ़ावा दिया होगा, पानी में ऑक्सीजन कम हो गई होगी और बड़े पैमाने पर मौतें हुई होंगी। इन विस्फोटों ने कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में भी छोड़ा होगा, जिससे अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन (climate change) हुआ होगा।

अन्य भूवैज्ञानिक और जीवाश्म रिकॉर्ड खंगालने पर शोधकर्ताओं ने प्रत्येक विस्फोट को महासागरों में ऑक्सीजन की कमी (ocean anoxia) और समुद्री जीवन की विलुप्ति से जुड़ा पाया। समयावधि का अनुमान लगाएं, तो लगता है कि पिछले 50 करोड़ सालों में महाविस्फोटों से 160 विलुप्ति की घटनाएं हुई होंगी। हालांकि यह मात्र अनुमान है। विस्फोटों ने वास्तव में कितना लावा उगला होगा, इसका सटीक अनुमान लगाने के लिए और अधिक काम करने की ज़रूरत है, तभी वास्तविक पैमाने का पता चल सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन धरती की रफ्तार को धीमा कर रहा है

डॉ. सुशील जोशी व डॉ. भास बापट

नेचर पत्रिका (Nature Journal research)  में प्रकाशित एक विश्लेषण का निष्कर्ष है कि आइस कैप्स से पिघलती बर्फ धरती के घूर्णन को धीमा (Earth rotation slowdown) कर रही है। स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशिएनोग्राफी के भू-भौतिकविद डन्कन एग्न्यू का मत है कि घूर्णन की रफ्तार में इस गिरावट के कारण शायद लीप सेकंड (leap second timing) जोड़ने की ज़रूरत टल जाएगी।

दरअसल, हम समय का मापन पृथ्वी की गतियों (Earth rotation time) के आधार पर ही करते आए हैं। जैसे एक वर्ष तब पूरा होता है जब पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर ले। इसी प्रकार एक दिन का मतलब होता है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर एक पूरा चक्कर लगा ले। इसी के अनुसार 1 सेकंड को इस दिन की अवधि के एक अंश के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन पृथ्वी की गतियां बहुत स्थिर (planetary motion changes) नहीं हैं। इन पर कई चीज़ों का असर पड़ता है।

फिर 1967 में परमाणु घड़ियों (atomic clocks timekeeping) का उपयोग शुरू हुआ था। परमाणु घड़ियां किसी परमाणु द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की आवृत्ति या फ्रिक्वेंसी के आधार पर चलती हैं। फिलहाल दुनिया भर में लगभग साढ़े चार सौ परमाणु घड़ियां समय का हिसाब रखती हैं। इसे को-ऑर्डिनेटेड युनिवर्सल टाइम (UTC time standard) कहते हैं। आजकल के उपकरणों को चलाने के लिए इनके द्वारा दर्शाया गया समय ही इस्तेमाल किया जाता है। इनके समयमान और पृथ्वी के प्राकृतिक दिन पर आधारित समयमान में थोड़ा अंतर होता है और इनके बीच तालमेल रखना होता है।

समय मापन से जुड़े कई वैज्ञानिकों (मेट्रोलॉजिस्ट) का मत था कि लाखों वर्षों में पृथ्वी का घूर्णन धीमा हो रहा है और कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि पृथ्वी-घूर्णन के सेकंड और यूटीसी के सेकंड के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए लीप सेकंड जोड़ना पड़े। लीप सेकंड जोड़ने की प्रथा 1972 में शुरू की गई थी और तब से 27 बार लीप सेकंड जोड़ने की ज़रूरत पड़ी है। आखरी लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था।

दरअसल, पृथ्वी की घूर्णन गति में दीर्घावधि गिरावट मुख्य रूप से चंद्रमा के कारण (lunar tidal effect) होती है। चंद्रमा समंदरों पर आकर्षण बल लगाता है जिसकी वजह से घर्षण पैदा होता है और धरती अपने अक्ष पर थोड़ा धीमे घूमने लगती है। इस मंदन के कई रोचक परिणाम होते हैं। जैसे 2000 साल पहले ग्रहण आज की घूर्णन गति के आधार पर की गई गणना से थोड़ा अलग समय पर दिखते थे। और तो और, प्राचीन तलछटों के विश्लेषण से लगता है कि करीब 1.4 अरब वर्ष पूर्व दिन शायद आजकल के सिर्फ 19 घंटों (shorter day in past) के बराबर हुआ करता था।

पृथ्वी की घूर्णन गति में बदलाव का एक कारण और है। छोटी अवधि में पृथ्वी की घूर्णन गति में उतार-चढ़ाव कई भू-भौतिकीय घटनाओं के कारण होते रहते हैं। इस वक्त पृथ्वी के घूर्णन पर असर पड़ रहा है केंद्रीय भाग में स्थित तरल में चल रही धाराओं (Earth core circulation) का। इन धाराओं की वजह के बाहरी पर्पटी की घूर्णन रफ्तार बढ़ी है।

एग्न्यू का विश्लेषण बताता है कि यदि रफ्तार बढ़ने की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अगला लीप सेकंड शायद 2026 में नहीं बल्कि 2035 में जोड़ना पड़गा। और तो और, शायद आगे चलकर लीप सेकंड घटाने की बात भी उभर सकती है।

लेकिन अब घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक तीसरा कारण महत्वपूर्ण हो चला है – जलवायु परिवर्तन (climate change impact) और धरती का गर्माना। 1990 के दशक की शुरुआत से ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका की बर्फ पिघलकर भूमध्य रेखा की ओर बही (polar ice melt redistribution) है। इसकी वजह से पृथ्वी का भूमध्य वाला हिस्सा थोड़ा मोटा हुआ है यानी पृथ्वी पहले की तुलना में थोड़ी पिचक गई है। इसकी वजह से घूर्णन की गति धीमी पड़ी है।

यानी कुछ कारणों से पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ रही है जबकि बर्फ के पिघलकर बहने से घूर्णन गति कम हो रही है। हम देख ही चुके हैं कि घूर्णन गति कम हो तो पृथ्वी का प्राकृतिक दिन लंबा (longer day due to rotation change) हो जाता है। इसलिए यूटीसी में हमें लीप सेकंड जोड़कर तालमेल बनाना पड़ता है। लेकिन यदि नेट गति उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती जितनी अपेक्षा है तो लीप सेकंड की ज़रूरत देर से पड़ेगी।

एग्न्यू के मुताबिक यदि बर्फ पिघलने का असर न हो तो ऋणात्मक लीप सेकंड वर्तमान अपेक्षा से काफी पहले ज़रूरी हो जाएगा (negative leap second event)। मानवीय गतिविधियां जलवायु परिवर्तन को गहराई से प्रभावित करती हैं। लीप सेकंड का टलना ऐसा ही एक प्रभाव है। वैसे समय मापन से सम्बंधित लोगों के लिए तो यह अच्छी खबर होगी क्योंकि हर थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जोड़े गए लीप सेकंड कंप्यूटिंग में काफी दिक्कतें पैदा करते हैं। और यदि लीप सेकंड घटाना पड़ा तो समस्या और विकट होगी क्योंकि वर्तमान कंप्यूटर कोड्स में इसे संभालने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

फ्रैंकफर्ट (जर्मनी) स्थित इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन एंड रेफरेंस सिस्टम्स सर्विस (Earth Rotation Monitoring) के क्रिश्चियन बिज़ुआर्ड का कहना है कि भविष्य में पृथ्वी के घूर्णन के सारे कयास आंतरिक कोर के व्यवहार पर निर्भर हैं और इसे समझना आसान नहीं है। सारी अनिश्चितता के बावजूद, एग्न्यू को लगता है कि जलवायु परिवर्तन (global warming impact on time) की वजह से पिघलते बर्फ का जैसा असर समय मापन पर हो रहा है, वह शायद लोगों को नींद से जगाकर जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ करने को उकसाएगा, और वैसा हुआ तो सबका भला होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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धरती की सीमाएं: लांघना नहीं था, हमने लांघ दिया

सीमा मुंडोली

में सुरक्षित क्या महसूस कराता है? भरोसेमंद दोस्तों और परिवार का साथ। एक ऐसा जाना-पहचाना माहौल (safe environment) जो हमें निश्चिंत रखता है और जहां हमारे द्वारा तय की गई सीमा रेखाओं/हदों का सम्मान (personal boundaries) होता है।

आखिरी बात हमारे एकमात्र घर (planet Earth) धरती के लिए भी सच है।

धरती पर जीवन लगभग 3.7 अरब साल पहले एक-कोशिकीय जीव के रूप में शुरू हुआ था। लेकिन हमें – होमो सेपियंस को – पृथ्वी पर अस्तित्व में आने में बहुत ज़्यादा समय लगा। हम महज़ 3,00,000 साल पहले ही अफ्रीका में विकसित हुए। उसके बाद मनुष्य अफ्रीका से निकलकर तमाम महाद्वीपों में फैल गए। हिमयुग के बाद, पिछले 12,000 साल – होलोसीन काल (Holocene epoch)– वह समय था जब खेती की शुरुआत, शहरों के बसने और तेज़ी से आबादी बढ़ने के साथ बड़े-बड़े बदलाव हुए। होलोसीन के दौरान स्थिर मौसम (stable climate) ने मनुष्य के जीवन और नैसर्गिक प्रणाली को फलने-फूलने में मदद की।

फिर औद्योगिक क्रांति आई, जिसमें जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल (industrial pollution) बढ़ा और प्रदूषण जैसे बुरे पर्यावरणीय असर भी हुए। एक बार जब हम औद्योगिकीकरण के रास्ते पर चल पड़े तो हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1970 के दशक तक, यह स्पष्ट होता गया था कि सालों की औद्योगिक गतिविधियों ने प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान (environmental degradation) पहुंचाया है – नदियां प्रदूषित हुई हैं, हवा ज़हरीली हुई है, जंगल कट गए हैं और समंदरों की हालत खराब हो गई है।

किंतु सवाल बना रहा: कितना नुकसान हद से ज़्यादा है?

2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा। उन्होंने नौ सीमा रेखाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़- environmental thresholds) की पहचान की, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने से यह सुनिश्चित होगा कि हम एक सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएं हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।

इनमें से हर सीमा के लिए वैज्ञानिकों ने एक या दो मात्रात्मक परिवर्ती मानक तय किए, जिनके आधार पर हम यह जांच सकते हैं कि पृथ्वी की वह प्रणाली क्या सुरक्षित सीमा के अंदर है। मसलन, जलवायु परिवर्तन की सीमा में परिवर्ती कारकों में से एक है कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता (CO2 concentration), जिसे पार्ट्स पर मिलियन (ppm) में मापा जाता है। इसकी सांद्रता की सीमा 350ppm तय की गई है। और कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता इससे अधिक होने या सीमा पार करने का मतलब है कि ग्रह की प्रणाली पर खतरा बहुत तेज़ी से बढ़ेगा।

जब 2009 में यह फ्रेमवर्क पहली बार पेश किया गया था, तब ग्रह की तीन हदों – जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल समग्रता और भू-जैवरसायन चक्र – का उल्लंघन हो भी चुका था। यह एक चेतावनी थी कि ग्रह स्तर पर हम मुश्किल में थे। 2015 तक, भू-प्रणाली बदलाव का उल्लंघन हो चुका था। 2023 में दो और सीमाएं उल्लंघन की सूची में जुड़ गई थीं – नए कारक और मीठा पानी परिवर्तन (freshwater change)। और अब, सितंबर 2025 में हमने एक और सीमा को लांघ दिया है – समुद्र अम्लीकरण (तालिका देखें) (ocean acidification) ये सीमाएं 15 साल पूर्व पहली बार इस उम्मीद के साथ प्रस्तावित की गई थीं कि हमें यह समझने में मदद मिले कि मनुष्य की गतिविधियों का पृथ्वी पर क्या असर पड़ रहा है, और हमें तुरंत सुधार के लिए कदम उठाने का तकाज़ा मिले। तब से हम नौ में से सात सीमाओं का उल्लंघन कर चुके हैं।

इसका क्या मतलब है? सीधे शब्दों में: हमारी पृथ्वी अब स्वस्थ नहीं रही (planetary health)

फिलहाल वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता 423ppm है, जो 350ppm की सुरक्षित सीमा से बहुत अधिक है। नतीजतन पृथ्वी तेज़ी से गर्म हो रही है, बर्फ की चादरें पिघल रही हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटवर्ती इलाके खतरे में हैं।

जैवमंडल समग्रता (biosphere integrity) सीमा भी बहुत ज़्यादा खतरे में है। सजीवों के विलुप्त होने की दर पहले से दस गुना अधिक है, और दुनिया भर के कई पारिस्थितिकी तंत्र बहुत ज़्यादा खतरे में हैं। संभव है कि हमारे द्वारा खोजे जाने से पहले ही कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएं। अकेले 2024 में, पक्षियों की कई प्रजातियां (जैसे स्लेंडर-बिल्ड कर्ल्यू और ओउ), मछलियों की प्रजातियां (जैसे थ्रेसियन शैड और चीम व्हाइटफिश), और अकशेरुकी जीव (जैसे कैप्टन कुक्स बीन स्नेल) विलुप्त घोषित कर दिए गए। 2024 की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 सालों में जंगली जानवरों की आबादी में 73 प्रतिशत की भारी गिरावट (biodiversity loss) आई है – इस मामले में समुद्री, थलीय और मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र समान रूप से प्रभावित हैं। दुखद तथ्य यह है कि विलुप्ति निश्चित है और इसे पलटा नहीं जा सकता। विलुप्त होने से जेनेटिक विविधता खत्म हो जाती है और पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यात्मक क्षमता कम हो जाती है। कितना दुखद है कि हम उन प्रजातियों को फिर कभी नहीं देख पाएंगे जो कभी इस ग्रह पर हमारे साथ रहती थी।

हाल ही में समुद्र के अम्लीकरण की सीमा का उल्लंघन खास चिंता की बात है। समुद्र हमारे ग्रह के 70 प्रतिशत हिस्से पर मौजूद हैं, और कुल कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग एक चौथाई हिस्सा सोख (carbon sink) लेते हैं। वे लंबे समय से हमारे लिए उत्सर्जन के सोख्ता की तरह काम करते रहे हैं। साथ ही ये अपने अंदर बहुत अधिक जैव विविधता को बनाए हुए हैं और लाखों लोगों को भोजन देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे समुद्र ज़्यादा कार्बन डाईऑक्साइड सोखते हैं, वे अधिक अम्लीय होते जाते हैं। इससे कोरल का क्षरण (कोरल ब्लीचिंग) होता है – अनगिनत समुद्री प्रजातियों का प्राकृतवास खत्म (marine ecosystem decline) हो जाता है। और समुद्री जीवों के खोल और कंकाल कमज़ोर हो जाते हैं, जिससे उन्हें ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ हो जाता है। समुद्र के अम्लीकरण की सीमा पार करने का मतलब है बड़े-बड़े बदलाव। ऐसी घटनाएं शुरू हो गई हैं जिनके असर का हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

हर लांघी गई सीमा अन्य स्थितियों/सीमाओं को और बदतर करती है, जिससे एक दुष्चक्र (vicious cycle) बनता है जो पृथ्वी को अस्थिरता के और करीब ले जाता है। हमें यह भी याद रखना होगा कि ग्रह की सीमा रेखाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जैसे भू-प्रणाली में परिवर्तन, जिसमें खेती या जानवर पालने के लिए जंगल कटाई से जैवविविधता की क्षति होगी और कार्बन का अवशोषण कम होगा, जिससे जलवायु परिवर्तन और तेज़ होगा (deforestation impact)। पानी में बढ़े हुए नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के साथ बदले हुए भू-जैव-रासायनिक मृत क्षेत्र बनते हैं जो बदले में ताज़े पानी की उपलब्धता और जैवविविधता पर असर डालते हैं। हर सीमा दूसरी सीमा से जुड़ी है जिससे खतरा बढ़ जाता है।

ग्रहों की सीमा रेखाओं के उल्लंघन की विशिष्ट जवाबदेही तय नहीं हो पाई है, खासकर इसलिए क्योंकि पश्चिम के कुछ अमीर देशों के उपभोग ने ऐतिहासिक रूप से सीमाओं के उल्लंघन में अधिक योगदान दिया है – और यह जारी है। लेकिन ग्रह-स्तरीय सीमा की अवधारणा ने हमें पृथ्वी पर मनुष्य की गतिविधियों (human impact) के असर का वैज्ञानिक और मात्रात्मक तरीके से आकलन करने के लिए एक फ्रेमवर्क ज़रूर दिया है। हमें 2009 में ही सावधान हो जाना चाहिए था, जब सिर्फ तीन सीमाएं पार हुई थीं, और समझ जाना चाहिए था कि धरती पर मनुष्यों के क्रियाकलापों के कैसे-कैसे बुरे प्रभाव पड़ेंगे।

लेकिन तब हमने अनसुना-अनदेखा कर दिया। अधिकांश दुनिया वैसे ही काम करती रही, बीच-बीच में कुछ मामूली सुधार होते रहे। अब, 2025 में जब नौ में से सात सीमा रेखाएं पार हो चुकी हैं, तो हम सुरक्षित नहीं हैं (climate emergency)।

लेकिन सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, अगर हम याद रखें कि हम इस मुश्किल में एक साथ हैं। उस तरह, जिस तरह हम लांघी गई एक सीमा रेखा – ओज़ोन परत के क्षरण (ozone depletion) – को पलटने के लिए एकजुट हुए थे। 1985 में वैज्ञानिकों ने बताया था कि रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर वगैरह में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की वजह से ओज़ोन परत में छेद हो गया था। ओज़ोन परत में छेद का मतलब था कि अब हमारे पास सूरज की पराबैंगनी किरणों से कोई सुरक्षा नहीं थी, जिससे हम त्वचा कैंसर के शिकार हो सकते थे और कई पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ सकते थे। तब सरकारें मॉन्ट्रियल संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए साथ आईं (global cooperation), जिसमें ओज़ोन में छेद करने वाले रसायनों का इस्तेमाल धीरे-धीरे खत्म करने का वादा किया गया था। प्रयास सफल रहे।

यह सफलता हमें याद दिलाती है: अगर एक सीमा रेखा (planetary boundary) के उल्लंघन को पलट सकते हैं, तो हम ऐसा फिर से कर सकते हैं। हमारा – और पृथ्वी पर जीवित हर प्राणी का – भविष्य इस पर निर्भर करता है। (स्रोत फीचर्स)  

तालिका: ग्रह की नौ सीमा रेखाएं और उनकी स्थिति

सीमाव्याख्यास्थिति
जलवायु परिवर्तनजीवाश्म ईंधन जलाने से ग्रीनहाउस गैसों और एरोसोल का उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु गर्माती है। नतीजतन बर्फ की चादरें पिघलती हैं, समुद्र का स्तर बढ़ता है।उल्लंघन हो चुका
जैवमण्डल की समग्रता में परिवर्तनप्राकृतिक संसाधनों का दोहन, आक्रामक प्रजातियों का आना और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव। इससे जेनेटिक विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत में गिरावट आती है।उल्लंघन हो चुका
भू-प्रणाली में परिवर्तनशहरीकरण, पशुपालन और खेती के लिए जंगल काटकर ज़मीन बनाना। इससे कार्बन सोखने की क्षमता और अन्य पारिस्थिकीय कार्यों में कमी आती है।उल्लंघन हो चुका
मीठे पानी में परिवर्तनखेती, उद्योगों और घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी की बढ़ती खपत। ब्लू वॉटर (जैसे नदियां और झीलें) और ग्रीन वॉटर (मिट्टी की नमी) का खराब होना, कार्बन भंडारण और जैव विविधता पर असर डालता है।उल्लंघन हो चुका
भू-जैव-रसायन में परिवर्तनफॉस्फोरस व नाइट्रोजन वाले औद्योंगिक उर्वरकों के ज़्यादा इस्तेमाल से समुद्री और मीठे पानी तंत्र में मृत क्षेत्र बनते हैं।उल्लंघन हो चुका
समुद्र अम्लीकरणजीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जिसे समुद्र सोख लेता है और अम्लीय हो जाता है। समुद्री जीवों के खोल को नुकसान होता है और पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाता है।उल्लंघन हो चुका
नए कारकउद्योगों, खेती और उपभोक्ता सामान से निकलने वाले कृत्रिम रसायन प्राकृतिक चक्र को बाधित करते हैं। और मनुष्य और जैव विविधता को हमेशा की क्षति का खतरा पैदा करते हैं।उल्लंघन हो चुका
वायुमण्डलीय एरोसोल में बढ़ोतरीजीवाश्म ईंधन के जलने और औद्योगिक गतिविधियों से हवा में मौजूद कणीय पदार्थ बढ़ते हैं, जिससे मौसम के पैटर्न में बदलाव आता है, खासकर तापमान और बारिश में।सुरक्षित सीमा में
ओज़ोन में क्षरणसिंथेटिक क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और नाइट्रस ऑक्साइड के उत्पादन और उत्सर्जन से ओज़ोन परत पतली होती है और नुकसानदायक पराबैंगनी किरणें धरती तक पहुंचती हैं।सुरक्षित सीमा में

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ईरान में गहराता जल संकट

रान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट (Iran water crisis) से गुज़र रहा है। हालात निरंतर खराब हो रहे हैं। तेहरान शहर की जल आपूर्ति वाले बांध लगभग खाली हो चुके हैं (water shortage) और सरकार देश के लिए पीने का पानी जुटाने के लिए जूझ रही है। लंबे सूखे, तेज़ गर्मी, कुप्रबंधन, बढ़ती आबादी, आर्थिक मुश्किलों, पुरानी कृषि प्रणालियों और जलवायु परिवर्तन (climate change) के मिले-जुले कारणों से देश बेहद कठिन स्थिति में पहुंच गया है।

गौरतलब है कि करीब 1 करोड़ आबादी वाले तेहरान की जल आपूर्ति पांच बड़े बांधों से होती है, लेकिन इन बांधों में अब अपनी सामान्य क्षमता से सिर्फ 10 प्रतिशत (dam depletion) पानी है। देश में 19 बांध सूखने की कगार पर हैं। करज जैसे भरोसेमंद जलाशय भी इतनी तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं कि लोग यहां चहल-कदमी कर रहे हैं।

राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई, तो तेहरान में सख्त पानी राशन (water rationing) या सबसे बुरी स्थिति में कुछ इलाकों को खाली कराने तक की नौबत आ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरा शहर खाली होना मुश्किल है, लेकिन यह चेतावनी हालात की गंभीरता दिखाती है।

ईरान पिछले छह वर्षों से लगातार सूखे (drought conditions) का सामना कर रहा है। पिछले साल गर्मियों का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया था जिससे पानी तेज़ी से वाष्पित हुआ और पहले से कमज़ोर जल–प्रणालियों पर दबाव और बढ़ गया। पिछला जल-वर्ष सबसे सूखे वर्षों में से एक रिकॉर्ड किया गया था, और इस साल की स्थिति उससे भी खराब है। नवंबर की शुरुआत तक ईरान में सिर्फ 2.3 मि.मी.बारिश हुई – जो सामान्य औसत से 81 प्रतिशत कम है। बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से बांध, नदियां और जलाशय तेज़ी से सिमट़ गए हैं।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी इस संकट को और गंभीर बना रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस स्थिति के लिए दशकों का खराब प्रबंधन (water mismanagement) भी उतना ही ज़िम्मेदार है। ईरान ने कृषि और उद्योग को बढ़ाने की कोशिश तो की, लेकिन पानी की सीमाओं को ध्यान में नहीं रखा। सरकार लगातार नए बांध बनाती रही, गहरे कुएं खोदती रही और दूर-दराज़ के इलाकों से पानी खींचती रही – जैसे पानी की आपूर्ति कभी खत्म ही नहीं होगी।

यू.एन. विश्वविद्यालय के कावेह मदानी कहते हैं कि ईरान ने दशकों तक ऐसे व्यवहार किया जैसे उसके पास पानी अनंत मात्रा (unlimited water myth) में हो। आज पानी ही नहीं, बल्कि ऊर्जा और गैस प्रणालियां भी दबाव में हैं, जो संसाधन प्रबंधन की व्यापक विफलता दिखाता है।

सरकार ने चेतावनी दी है कि जल्द ही रात में पानी की सप्लाई बंद की जा सकती है, या पूरे देश में पानी की सख्त राशनिंग हो सकती (national water cuts) है। कई लोगों ने गर्मियों में अचानक पानी बंद होने का सामना किया था, जिससे जनता की नाराज़गी बढ़ी है।

अब पानी की कमी कई जगह तनाव और विरोध (water protest) का कारण बन रही है, खासकर गरीब इलाकों में। लंबे समय से चल रहे प्रतिबंधों, बेरोज़गारी, महंगाई और आर्थिक संकट ने लोगों की हालत पहले ही कमज़ोर कर दी है, इसलिए वे नए मुश्किल हालात झेल नहीं पा रहे।

सरकार ने लोगों से पानी कम इस्तेमाल करने और घरों में पानी स्टोरेज टैंक लगाने की अपील की है। लेकिन इस उपाय में एक बड़ी समस्या है – घरेलू उपभोग कुल पानी का सिर्फ 8 प्रतिशत है, जबकि 90 प्रतिशत से ज़्यादा पानी कृषि (agriculture water use) में जाता है। इसलिए अगर हर घर 20 प्रतिशत पानी कम भी इस्तेमाल करे, तो भी कुल मिलाकर इसका असर बहुत कम होगा।

ईरान के कानून के अनुसार, देश का 85 प्रतिशत भोजन घरेलू स्तर पर ही उगाया (food security policy) जाना चाहिए। इसका उद्देश्य तो खाद्य सुरक्षा है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे जल सुरक्षा पर भारी असर पड़ा है। ईरान के पास इतना पानी और उपजाऊ ज़मीन ही नहीं है कि वह इतनी बड़ी मात्रा में खेती जारी रख सके। उधर, भूजल को इतनी तेज़ी से उलीचा जा रहा है कि इस्फहान जैसे मध्य क्षेत्रों में जमीन धंसने (land subsidence) लगी है। सिस्तान और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में तो पूरे के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र ध्वस्त होने की कगार पर हैं।

ईरान में सुधार की राह में एक बड़ा रोड़ा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध (international sanctions) हैं। इन प्रतिबंधों की वजह से विदेशी निवेश देश में नहीं आ पाता। असर यह है कि न तो आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली विकसित हो पाती है, न खेती की उन्नत तकनीकें अपनाई जा सकती हैं, और न ही असरदार पानी-रीसाइक्लिंग तकनीकें लगाई जा सकती हैं।

ग्रामीण इलाकों में ज़्यादातर लोग खेती पर निर्भर (rural agriculture dependence) हैं। प्रतिबंधों के चलते नए रोज़गार निर्मित करना मुश्किल है। इसी कारण सरकार कृषि क्षेत्र को पानी देती है। इससे लंबे समय में जल संकट बढ़ सकता है लेकिन सामाजिक अशांति और विरोध से बचने के लिए सरकार इसे अपना रही है।

विशेषज्ञों का मत है कि पानी के संकट से उबरने के लिए बड़े और लंबे समय के सुधार करने होंगे, जैसे:

  • भूजल का पुनर्भरण;
  • भूजल भंडार की मरम्मत;
  • पानी से जुड़ा स्पष्ट और पारदर्शी डैटा (water data transparency);
  • पानी, ऊर्जा व कृषि पर बराबर ध्यान देकर योजना बनाना;
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी;
  • लंबी अवधि वाली पर्यावरणीय नीतियां;
  • आधुनिक, कम पानी-खर्ची कृषि तकनीकें;
  • क्षेत्रों के बीच पानी के न्यायपूर्ण बंटवारे को प्राथमिकता।

यदि ये सुधार नहीं किए गए, तो पानी की कमी देश में सामाजिक व आर्थिक असमानता (water inequality) को और बढ़ा सकती है और अस्थिरता पैदा हो सकती है। असली सुधारों के लिए नीति-निर्माताओं को कठिन फैसले लेने की हिम्मत दिखाना होगा।

फिलहाल निगाहें सर्दियों की बारिश पर टिकी हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि चाहे बारिश अच्छी भी हो जाए, जब तक गंभीर सुधार नहीं किए जाते, ईरान को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा (water scarcity future)। (स्रोत फीचर्स)

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पंजों के जीवाश्म से जैव विकास पर नई रोशनी

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में मिले प्राचीन पंजों (Australia fossil discovery) के निशानों ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। इन निशानों से पता चलता है कि सरीसृप (जैसे छिपकली) (ancient reptile footprints) और उनके निकट सम्बंधी शायद हमारे अनुमान से करोड़ों साल पहले ही धरती पर आ गए थे। नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ये निशान एम्नीओट्स (early amniotes) प्राणियों ने बनाए होंगे। इस समूह में सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी आते हैं।

एम्नीओट्स की खास बात यह है कि ये ज़मीन पर अंडे (land egg-laying animals) देते हैं या भ्रूण को गर्भ में पालते हैं। इन अंडों के चारों ओर एक झिल्ली (amniotic egg evolution) होती है जो उसे सूखने से बचाती है। इन जीवों का अब तक का सबसे प्राचीन जीवाश्म कनाडा से मिला था, जो करीब 31.9 करोड़ साल पुराना था। लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया में मिले इन निशानों से पता चलता है कि ये प्राणी इससे भी कम से कम 3.5 करोड़ साल पहले (Carboniferous period) से, यानी 35.5 करोड़ साल पहले से मौजूद थे। यह वही समय है जब कार्बोनिफेरस युग (उभयचर जीवों और सरीसृपों के उद्भव के दौर) की शुरुआत हुई थी।

ये निशान ऑस्ट्रेलिया स्थित विक्टोरिया (paleontology site Victoria) इलाके में ब्रोकन नदी (broken river fossil) के किनारे बलुआ पत्थर की एक चट्टान में मिले हैं। वहां के स्थानीय ताउंगुरंग आदिवासी इस जगह को ‘बेरेपिट’ (Indigenous heritage site) कहते हैं। उसी चट्टान में कुछ पुराने जलीय जीवों के अवशेष भी मिले हैं, जो बताते हैं कि ये निशान वाकई उस दौर के हो सकते हैं।

इस प्रकार के नुकीले और मुड़े हुए पंजे सिर्फ सरीसृपों (distinct claw fossil) में पाए जाते हैं, जबकि उभयचरों (जैसे मेंढकों) के ऐसे पंजे नहीं होते हैं। साथ ही पेट या पूंछ घसीटने के कोई निशान नहीं मिले, जिससे लगता है कि ये जानवर चलने (reptilian locomotion) में अपने शरीर को ऊपर उठा सकते थे। हालांकि, कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि शायद ये जीव उथले पानी (shallow water) में चलते होंगे, न कि पूरी तरह सूखी ज़मीन पर।

बहरहाल, यह खोज जीवन के कालक्रम की समझ को बदलती है और बताती है कि ज़मीन पर अंडे देने वाले प्राणी (land animals origin) हमारी सोच से कहीं पहले अस्तित्व में आ चुके थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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