भू-जल में रसायनों का घुलना चिंताजनक – अली खान

हाल में जारी केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 18 राज्यों के 249 ज़िलों का भूजल खारा है, जबकि 23 राज्यों के 370 ज़िलों में मानक से अधिक फ्लोराइड पाया गया है। 21 राज्यों के 154 ज़िलों में आर्सेनिक की शिकायत है। इसी तरह 24 ज़िलों के भूजल में कैडमियम, 94 ज़िलों में लेड, 341 ज़िलों में आयरन और 23 राज्यों के 423 ज़िलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा स्वीकार्य से अधिक मिली है। कृषि प्रधान राज्य उत्तर प्रदेश के 59, पंजाब के 19, हरियाणा के 21 और मध्य प्रदेश के 51 ज़िलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा अधिक पाई गई है।

बता दें कि इन ज़िलों में उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग और सिंचाई की अवैज्ञानिक तकनीक के चलते यह समस्या पैदा हो रही है। जल में बढ़ती नाइट्रेट की मात्रा पाचन क्रिया और सांस लेने की तकलीफ को बढ़ा रही है। संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में जल संसाधन मंत्रालय ने केंद्रीय भूजल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भूजल प्रदूषण का ब्यौरा दिया। इसके मुताबिक देश के चार सौ से अधिक ज़िलों के भूजल में घातक रसायन घुलने से पीने के स्वच्छ व शुद्ध जल का गंभीर संकट पैदा हो गया है। कई ज़िलों के भूजल में पहले से ही फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन और भारी धातुएं निर्धारित मानक से अधिक थीं, वहीं ज़्यादातर ज़िलों में नाइट्रेट और आयरन की मात्रा बढ़ रही है।

भूजल में नाइट्रेट बढ़ने के पीछे मानवजनित अतिक्रमण को ज़िम्मेदार बताया गया है। उल्लेखनीय है कि उन राज्यों के भूजल में नाइट्रेट ज़्यादा बढ़ रहा है जहां सघन खेती में उर्वरकों का बेतहाशा उपयोग हो रहा है। भारी धातुओं और अन्य घातक रसायनों के जल में घुलने से पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते प्रदूषण की रोकथाम न की गई तो पेयजल संकट खड़ा हो जाएगा।

मालूम हो, प्राकृतिक संसाधन सीमित होते हैं और इनके असीमित उपयोग से संकट खड़ा होना स्वाभाविक है। मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति के साम्राज्य का भयानक विनाश किया है। इसका परिणाम है कि पृथ्वी के लगभग तीन-चौथाई भाग पर जल होने के बावजूद राष्ट्र संघ की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि विश्व की आधी आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भारत में स्थिति और भी अधिक भयावह है। ऐसी विकट परिस्थितियों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा का बढ़ना चिंताजनक है।

लोक सभा में लिखित उत्तर में मंत्रालय ने बताया कि 24 सितंबर 2020 की एक अधिसूचना के मुताबिक भूजल ‌की गुणवत्ता के लिए कई सख्त प्रावधान किए गए हैं। जिनमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करना और जलाशयों व नदियों में गंदा पानी डालने के सारे स्रोतों को बंद करना शामिल है। इसी अधिसूचना के तहत केंद्र व राज्य सरकारें संयुक्त रूप से जल जीवन मिशन का संचालन कर रहीं हैं ताकि लोगों को उनके घर तक नल से सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति की जा सके। गौरतलब है कि इस मिशन की शुरुआत अगस्त 2019 में की गई थी। इसके तहत वर्ष 2024 तक देश के सभी ग्रामीण घरों को जलापूर्ति सुनिश्चित की जानी है।

स्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के मुताबिक लगभग 80 फीसदी रोगों का कारण जल है। इसी प्रकार, आयुर्वेद के अनुसार जल कई रोगों का शामक है।

जानकारी के लिए बता दें कि नाइट्रेट नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन के संयोग से बने हुए ऐसे यौगिक होते हैं जो कई खाद्य पदार्थों, विशेषतः सब्ज़ियों, मांस एवं मछलियों में पाए जाते हैं। वस्तुतः नाइट्रेट जैविक नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के अंतिम उत्पाद होते हैं। पानी में नाइट्रेट की अत्यधिक घुलनशीलता तथा मृदा कणों की कम धारण क्षमता के कारण अति सिंचाई या अति वर्षा से खेतों में से बहता पानी अपने साथ नाइट्रेट को भी बहाकर कुंओं, नालों एवं नहरों में ले जाता है। इस प्रकार मनुष्य और पशुओं के पीने का पानी नाइट्रेट प्रदूषित हो जाता है।

देश की जनसंख्या के लिए अनाज उत्पादन हेतु रासायनिक उर्वरकों का अधिकतम उपयोग हो रहा है। विगत वर्षों में देश में नाइट्रोजन उर्वरकों की खपत बहुत बढ़ी है। वैज्ञानिकों ने भूजल में बढ़ती हुई नाइट्रेट सांद्रता का प्रमुख कारण नाइट्रोजन उर्वरक को ही माना है। यह भी देखा गया है कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग की अपेक्षा मात्र नाइट्रोजन उर्वरक के उपयोग की वजह से ऐसी स्थिति पैदा होती है।

पेयजल में नाइट्रेट की अधिक सांद्रता मानव, मवेशी, जलीय जीव तथा औद्योगिक क्षेत्र को भी प्रभावित करती है। वस्तुतः नाइट्रेट स्वयं स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता है, परंतु इसके अपचयन से बने नाइट्राइट की वजह से इसकी अत्यल्प मात्रा भी घातक हो जाती है। नाइट्रेट जब जल या भोजन के माध्यम से शरीर मे प्रवेश करता है तो शरीर के जीवाणुओं द्वारा नाइट्राइट में परिवर्तित कर दिया जाता है जो एक सशक्त ऑक्सीकारक होता है। यह रक्त में हीमोग्लोबिन को मेट-हीमोग्लोबिन में बदल देता है, जिसके कारण हीमोग्लोबिन अपनी ऑक्सीजन परिवहन की क्षमता गंवा देता है। अत्यधिक रूपांतरण की स्थिति में आंतरिक श्वास-अवरोध हो सकता है जिसके लक्षण चमड़ी तथा म्यूकस झिल्ली के हरे-नीले रंग से पहचाने जा सकते हैं। इसे ब्ल्यू बेबी सिंड्रोम या साइनोसिस भी कहते हैं। छोटे बच्चों में यह रूपांतरण दुगनी गति से होता है। दूध पीते बच्चों की माताओं द्वारा उच्च नाइट्रेट युक्त जल पीने से दूध भी विषाक्त हो जाता है।

रूस के वैज्ञानिकों ने नाइट्रेट विषाक्तता के दुष्प्रभाव केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर भी देखे हैं। ये प्रभाव मात्र 105 से 182 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रेट सांद्रण पर ही दिखने लगते हैं। इसी प्रकार हृदय संवहनी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखे गए हैं।

नाइट्रेट के परिवर्तन से बना नाइट्राइट एन-नाइट्रोसो यौगिक बनाता है जो कैंसरकारी होते हैं। अनुसंधान से पता चला है कि उच्च नाइट्रेट युक्त जल तथा पाचन तंत्र के कैंसर में गहरा सम्बंध है। कुल मिलाकर, जल में नाइट्रेट की बढ़ती मात्रा विभिन्न रोगों को न्यौता देती है।

जल में बढ़ती नाइट्रेट की मात्रा मवेशियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। एक अध्ययन में गाय, भैंस, बकरी जैसे दुधारू मवेशियों में नाइट्रेट विषाक्तता देखी गई है। जई, बाजरा, मक्का, गेहूं, जौ, सूडान ग्रास तथा राई ग्रास ऐसे पौधे हैं जिनमें नाइट्रेट की मात्रा अधिक होती है। यदि चारे को ऐसी भूमि में उगाया जाए जिसमें कार्बनिक तथा नाइट्रोजन तत्व अधिक हों और नाइट्रोजन उर्वरक अधिक मात्रा में प्रयोग किए गए हों तो ऐसी स्थिति में चारे में नाइट्रेट विषाक्तता अधिक हो जाती है। नाइट्रेट विषाक्तता पशुओं में जठर आंत्र शोथ उत्पन्न करती है। चारागाह में चरते पशुओं की अचानक मृत्यु भी देखी गई है। तेज़ दर्द, लार-गिरना, कभी-कभी पेट फूलना तथा बहुमूत्रता जैसे लक्षणों के साथ रोग का एकाएक प्रकोप होता है। श्वास का तेज़ी से चलना तथा श्वास में कष्ट होेना, तेज़ नाड़ी, लड़खड़ाना एवं तापमान का कम हो जाना भी इस रोग के अन्य लक्षण हैं। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज़्ज़तनगर (बरेली) के वैज्ञानिकों ने पाया है कि पैरा घास या अंगोला (ब्रैकिएरिया म्यूटिका) खाने से बछड़ों में अति तीव्र नाइट्रेट विषाक्तता और बकरियों में चिरकालिक नाइट्रेट विषाक्तता हो जाती है। देश के शुष्क क्षेत्रों में गर्मियों के दिनों में प्यासे पशु जब एक साथ अत्यधिक नाइट्रेट युक्त पानी पी लेते हैं तो उनमें नाइट्रेट विषाक्तता उत्पन्न हो जाती है जो कभी-कभी उनकी मृत्यु का कारण भी बन जाती है। कई दुधारू पशुओं में नाइट्रेट युक्त पानी पीने से दुग्धस्राव में कमी एवं गर्भपात भी देखे गए हैं।

सवाल यह है कि जल में बढ़ती नाइट्रेट की मात्रा को कैसे कम किया जाए? जल में नाइट्रेट की उपस्थिति पर सरकारें गंभीर क्यों नहीं हैं? गौरतलब है कि जल राज्य सूची का विषय है। राज्य सरकारें जल में बढ़ते प्रदूषक तत्वों के प्रति ढिलाई बरत रही हैं। केंद्र सरकार का रवैया उदासीन रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि पानी को समवर्ती सूची में शामिल किया जाए। ऐसा होने पर व्यापक कार्य योजना विकसित करने में मदद मिलेगी। केंद्र और राज्यों के बीच सहमति से भूजल सहित जल का बेहतर संरक्षण, विकास और प्रबंधन संभव होगा।

जल में नाइट्रेट के कहर को देखते हुए इसके अधिक सांद्रण को कम किया जाना चाहिए। जल में नाइट्रेट की अत्यधिक घुलनशीलता के कारण इसका जल से अपनयन दुष्कर कार्य होता है। कृषि प्रधान देशों में नाइट्रेट प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन चुका है। वर्तमान में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर हमारे देश के 16 राज्यों के भूजल में नाइट्रेट का सांद्रण 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है। इनमें कई राज्यों के भूजल में कुल घुलनशील ठोस का मान भी अधिक है। पेयजल आपूर्ति में नाइट्रेट मुक्त जल प्राप्त करने हेतु वैकल्पिक विधियां अपनाए जाने की दरकार है। ऐसे क्षेत्रों में जहां जल में नाइट्रेट स्तर अधिक हो वहां नलकूप खोदकर जलापूर्ति करना, सपाट कुओं को चौड़ा करना अथवा अधिक गहराई से जल प्राप्त करने की कोशिशें होनी चाहिए। साथ ही जल संसाधन मंत्रालय को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सहयोग से डार्क ब्लॉक्स में स्थित गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों को चिंहित करने के लिए कारगर तंत्र विकसित करना चाहिए। सतही जल और भूमिगत जल स्रोतों में औद्योगिक कचरे की डंपिंग को कम करने और नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने जिन उद्योगों को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किए हैं, उनकी नियमित निगरानी के लिए एक व्यवस्था कायम की जानी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रमाण पत्र में दर्ज शर्तों का पालन किया जा रहा है। सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडलों को उपयुक्त और प्रभावी निगरानी तंत्र गठित करना चाहिए। आज जल संरक्षण हमारा विशेष सरोकार होना चाहिए, जिससे इस समस्या को विकराल रूप धारण करने से रोका जा सके।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूकंप पेड़ों की वृद्धि में मदद भी करते हैं

यूं तो भूकंप को हमेशा तबाही से जोड़ा जाता है, लेकिन एक नवीन अध्ययन बताता है कि भूकंप, थोड़े समय के लिए ही सही, जंगल बसाने में योगदान भी देते हैं।

जर्नल ऑफ जियोफिज़िकल रिसर्च बायोजियोसाइन्सेज़ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार तीव्र भूकंप से पेड़ों की जड़ों के आसपास अधिक पानी बहकर आने लगता है जो पेड़-पौधों को बढ़ने में मदद करता है। यह अल्पकालिक वृद्धि पेड़ों की कोशिकाओं में अपने चिन्ह (प्रमाण) छोड़ जाती है, जिसकी मदद से पूर्व में आए भूकंपों और उनके समय के बारे में बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।

दरअसल, पॉट्सडैम विश्वविद्यालय के जलविज्ञानी क्रिश्चियन मोहर भूकंप और पेड़ों की वृद्धि के बीच सम्बंध पता लगाने नहीं गए थे। वे तो तटवर्ती चिली की नदी घाटियों में तलछट स्थानांतरण का अध्ययन कर रहे थे। उनके अध्ययन का रुख तब बदल गया जब वर्ष 2010 में चिली में 8.8 तीव्रता का भूकंप आया। भूकंप और साथ में आई सुनामी इतनी भीषण थी कि इसने नदी घाटियों को झकझोर दिया था। तटीय चिली के कुछ हिस्से तबाह हो गए, सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और लाखों लोग प्रभावित हुए।

जब भूकंप के बाद मोहर और उनका शोध दल एक नदी घाटी में वापस लौटा तो उन्होंने पाया कि वहां की जल धाराएं पहले से तेज़ बह रही हैं। उनका अनुमान था कि भूकंप के ज़ोरदार झटके के कारण मिट्टी ढीली पड़ गई थी, जिससे भूजल धाराओं का घाटी की ओर बहने का रास्ता आसान हो गया। अर्थात परोक्ष रूप से भूकंप की वजह से पहाड़ी के ऊपरी भाग में स्थित पेड़ों की कीमत पर घाटी के पेड़ों को बढ़ने में मदद मिल सकती है।

क्या वास्तव में ऐसा हुआ है, यह जांचने के लिए मोहर और उनके साथियों ने तटीय चिली के पास के घाटी तल और पहाड़ की चोटी पर लगे छह मॉन्टेरे पाइन वृक्षों से ड्रिल करके लकड़ी के दो दर्जन नमूने (प्लग) निकाले। ये प्लग पेंसिल से पतले लेकिन उससे दुगने लंबे थे। उन्होंने सूक्ष्मदर्शी से इन प्लग की पतली-पतली कटानों का अध्ययन किया और देखा कि अधिक पानी मिलने पर पेड़ के वलयों (रिंग) के भीतर कोशिकाओं के आकार में किस तरह के बदलाव हुए हैं।

इसके अलावा, उन्होंने इन कोशिकाओं में भारी और हल्के कार्बन समस्थानिकों के अनुपात में बदलाव का भी अध्ययन किया। प्रकाश संश्लेषण के दौरान पेड़ कार्बन-13 की तुलना में कार्बन-12 अधिक ग्रहण करते हैं। इसलिए कोशिकाओं में कार्बन के इन दो समस्थानिकों के अनुपात में बदलाव से प्रकाश संश्लेषण में वृद्धि पता चल सकती है।

अध्ययन में उन्हें घाटी तल के पास के पेड़ों में भूकंप के बाद वृद्धि में थोड़ी बढ़त दिखी, जो कुछ हफ्तों से लेकर महीनों तक जारी रही – यह वृद्धि भारी बारिश के कारण होने वाली वृद्धि जितनी ही थी। दूसरी ओर, जैसा कि अनुमान था, भूकंप के बाद चोटी पर लगे पेड़ों की वृद्धि धीमी पड़ गई थी।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक की मदद से भूकंप और उन अन्य घटनाओं को पहचाना जा सकता है जो पेड़ों की अल्पकालिक वृद्धि का कारण बनते हैं। इस तरह की वृद्धि केवल पेड़ों के वलयों की मोटाई के अध्ययन में पकड़ में नहीं आ पाती। चूंकि पेड़ के वलय प्रत्येक वर्ष में पेड़ की औसत वृद्धि दर्शाते हैं, इसलिए सिर्फ इनके अध्ययन से भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और सुनामी जैसी घटनाओं के घटने का समय एक वर्ष की सटीकता तक ही पहचाना जा सकता है। लेकिन, कार्बन समस्थानिक डैटा और कोशिका के माप सम्बंधी डैटा को एक साथ रखने पर शोधकर्ता चिली में आए भूकंप के समय को एक महीने की सटीकता के साथ निर्धारित कर पाए।

यह तकनीक विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों और जलवायु पर लागू होती है या नहीं, यह जानने के लिए इसे विभिन्न जगहों पर दोहराना चाहिए। वैसे मोहर का अनुमान है कि यह विधि तुलनात्मक रूप से शुष्क क्षेत्रों में सबसे अच्छी तरह काम करेगी, जहां अतिरिक्त पानी के कारण वृद्धि अधिक होती है। वे कैलिफोर्निया की नापा घाटी में अध्ययन को दोहराने की योजना बना रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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बर्फ के पिघलने से सरकते महाद्वीप

हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि बर्फ पिघलकर बह जाने से जैसे-जैसे महाद्वीपों पर जमी हुई बर्फ का भार कम होता है, ज़मीन विकृत होती है – न केवल उस स्थान पर जहां की बर्फ पिघली है बल्कि इसका असर दूर-दराज़ हिस्सों तक पड़ता है; असर बर्फ पिघलने के स्थान से 1000 किलोमीटर दूर तक देखा गया है।

बर्फ पिघलने से पृथ्वी के महाद्वीपों पर भार में अत्यधिक कमी आती है, और इस तरह बर्फ के भार से मुक्त हुई ज़मीन हल्की होकर ऊपर उठती है। ज़मीन में होने वाले इस ऊध्र्वाधर बदलाव पर तो काफी अध्ययन हुए हैं, लेकिन हारवर्ड विश्वविद्यालय की सोफी कूल्सन और उनके साथी जानना चाहते थे कि क्या ज़मीन अपने स्थान से खिसकती भी है?

यह जानने के लिए उन्होंने ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका, पर्वतीय ग्लेशियरों और आइस केप्स (बर्फ की टोपियों) से पिघलने वाली बर्फ का उपग्रह डैटा एकत्रित किया। फिर इस डैटा को एक ऐसे मॉडल में जोड़ा जो बताता है कि पृथ्वी की भूपर्पटी पर पड़ने वाले भार में बदलाव होने पर वह किस तरह प्रतिक्रिया देती है या खिसकती है।

उन्होंने पाया कि 2003 से 2018 के बीच ग्रीनलैंड और आर्कटिक ग्लेशियरों की बर्फ के पिघलने से ज़मीन उत्तरी गोलार्ध की तरफ काफी खिसक गई है। और कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश हिस्सों में ज़मीन प्रति वर्ष 0.3 मिलीमीटर तक खिसक रही है, कुछ क्षेत्र जो बर्फ पिघलने वाले स्थान से काफी दूर हैं वहां पर भी ज़मीन के खिसकने की गति ऊपर उठने की गति से अधिक है।(स्रोत फीचर्स)

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पृथ्वी के भीतर मिले चंद्रमा निर्माण के अवशेष

वैज्ञानिक मानते आए हैं कि चंद्रमा का निर्माण एक प्रोटोप्लेनेट थिया के पृथ्वी से टकराने से हुआ था। यह टक्कर की पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था में (लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व) हुई थी। अब वैज्ञानिकों के एक समूह को पृथ्वी के मेंटल में दफन दो महाद्वीपों के आकार की चट्टानें मिली हैं जो संभवत: उक्त प्रोटोप्लेनेट थिया के अवशेष हैं।

कई दशकों से भूकंप विज्ञानी पश्चिमी अफ्रीका और प्रशांत महासागर के नीचे हैडफोन नुमा 2 पिंडों की उपस्थिति से काफी हैरान रहे हैं। एरिज़ोना स्टेट युनिवर्सिटी (एएसयू) के पीएचडी छात्र कियान युआन के अनुसार 1000 किलोमीटर ऊंची और इससे कई गुना चौड़ी ये चट्टानें मेंटल में पाई जाने वाली सबसे विशाल वस्तुएं हैं। यहां तक कि भूकंप के दौरान इन परतों से गुज़रने वाली भूकंपीय तरंगें भी अचानक धीमी पड़ जाती हैं। इससे लगता है कि ये काफी घनी और आसपास की चट्टानों से रासायनिक रूप से अलग हैं।

भूकंप विज्ञानी इन्हें अपरूपण भूकंप तरंगों के अल्प वेग वाले क्षेत्र (एलएलएसवीपी) कहते हैं। ये या तो पृथ्वी के आदिम विशाल मैग्मा समुद्रों में से क्रिस्टलीकरण के चलते निर्मित हुए हैं या फिर प्राचीन मेंटल चट्टानों के घने पोखर हैं जो विशाल टक्कर के दौरान आघात से बच गए होंगे। नए समस्थानिक साक्ष्य और मॉडलिंग के आधार पर युआन ने लूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कांफ्रेंस में इन क्षेत्रों को थिया का एक हिस्सा बताया है। वैसे यह परिकल्पना काफी समय से चर्चा का विषय रही है लेकिन पहली बार किसी ने इसके समर्थन में कुछ साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं।

जैसे आइसलैंड और समोआ से प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि ये एलएलएसवीपी चंद्रमा के निर्माण वाली टक्कर के समय से ही अस्तित्व में हैं। अध्ययनों से पता चला है कि इन द्वीपों पर मौजूद लावा में रेडियोधर्मी तत्वों के ऐसे समस्थानिकों का रिकॉर्ड है जो पृथ्वी के इतिहास के शुरुआती 10 करोड़ वर्ष के दौरान ही निर्मित हुए थे।

चंद्रमा को बनाने वाली टक्कर के नए मॉडल से पता चलता है कि इसने घनी चट्टानों को पृथ्वी की गहराइयों में भी पहुंचाया था। देखा जाए तो 1970 के दशक में इम्पैक्ट थ्योरी का विकास इस बात की व्याख्या के लिए किया गया था कि क्यों चंद्रमा शुष्क है और वहां लौह युक्त केंद्रीय कोर का अभाव है। इस सिद्धांत के अनुसार इस भयानक टक्कर से पानी जैसे वाष्पशील पदार्थ तो भाप बनकर उड़ गए और टकराव की वजह से उछली कम घनी चट्टानें अंतत: चंद्रमा में संघनित हो गर्इं। इस सिद्धांत में थिया का आकार मंगल ग्रह या उससे छोटा बताया गया था जबकि युआन के अनुसार इसका आकार पृथ्वी के बराबर रहा होगा। 

युआन के सह-लेखक और खगोल-भौतिकविद स्टीवन डेश की टीम ने अपोलो से प्राप्त चंद्रमा की चट्टानों में हाइड्रोजन और ड्यूटेरियम का अनुपात मापा। ये दोनों हाइड्रोजन के ही समस्थानिक हैं और ड्यूटेरियम भारी होता है। पृथ्वी की चट्टानों की तुलना में चंद्रमा से प्राप्त नमूनों में हाइड्रोजन की मात्रा काफी अधिक मिली। तो हल्के वाले समस्थानिक को अपनी गिरफ्त में रखने के लिए  थिया आकार में काफी बड़ा रहा होगा। इससे यह भी पता चलता है कि थिया काफी शुष्क रहा होगा। पानी के उपस्थित होने से ड्यूटेरियम स्तर भी काफी अधिक होता क्योंकि अंतरिक्ष में शुरुआती पानी में ड्यूटेरियम ज़्यादा था। इस तरह का शुष्क और विशाल प्रोटोप्लेनेट अपर्याप्त लोहे से बने कोर और लोहे से समृद्ध मेंटल की अलग-अलग परतों में बना होगा जो वर्तमान पृथ्वी से 2 से 3.5 प्रतिशत तक अधिक घना होगा।

हालांकि डेश के अनुमानों के पहले ही युआन ने थिया का मॉडल तैयार किया है। युआन का अनुमान है कि टकराव के बाद थिया की कोर तुरंत ही पृथ्वी के साथ विलीन हो गई होगी। उन्होंने मॉडल में थिया के आकार और घनत्व को भी कम-ज़्यादा करके देखा कि किन हालात में सामग्री मेंटल में घुल-मिल जाने की बजाय साबुत बनी रहकर तली में बैठ गई होगी। इस मॉडल के आधार पर पता चलता है कि इसका घनत्व वर्तमान पृथ्वी से 1.5-3.5 प्रतिशत अधिक होने पर ही यह पदार्थ कोर के नज़दीक जमा होता गया। यह परिणाम डेश द्वारा दिए गए ड्यूटेरियम साक्ष्य से मेल खाते हैं।  

हालांकि इस परिकल्पना में काफी अगर-मगर भी हैं। जैसे एलएलएसवीपी की रचना को लेकर अस्पष्टता है क्योंकि इनका आकार भूकंपीय तरंगों के अध्ययन से तैयार किया गया है जिसमें काफी घट-बढ़ की गुंजाइश है। हो सकता है इसकी ऊंचाई 1000 किलोमीटर के बजाय केवल कुछ 100 किलोमीटर ही हो। घनत्व को लेकर भी मतभेद हैं। छोटे आकार के एलएलएसवीपी थिया के आकार के विचार पर काफी सवाल खड़े कर सकते हैं। ऐसे में डेश की टीम द्वीपों पर मिले लावा और चंद्रमा के मेंटल की चट्टानों के बीच भू-रासायनिक समानताओं का अध्ययन करने पर विचार कर रही है। हालांकि एक विचार यह भी है कि मेंटल में थिया के अवशेषों के अलावा कई अन्य टक्करों के अवशेष भी हो सकते हैं। भूकंप वैज्ञानिकों को मेंटल की गहराइयों में कुछ अत्यंत घने क्षेत्रों के प्रमाण मिले हैं। ये विशेष रूप से एलएलएसवीपी के किनारों के पास पाए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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अतीत में पृथ्वी एक जलीय ग्रह था

पृथ्वी के समुद्रों का स्तर तापमान के अनुसार हमेशा घटता-बढ़ता रहा है लेकिन इसकी सतह पर पानी की कुल मात्रा हमेशा से ही स्थिर मानी जाती रही है। लेकिन हालिया साक्ष्यों से पता चला है कि लगभग 3 से 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी के समुद्रों में आज की तुलना में दोगुना पानी था। यानी पृथ्वी पर इतना पानी था कि सारे महाद्वीप माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई तक जलमग्न हो जाएं। इस व्यापक बाढ़ ने टेक्टोनिक प्लेट्स की गतिविधि को बढ़ा दिया होगा जिससे ज़मीन पर जीवन की शुरुआत अधिक मुश्किल हो गई होगी।

ऐसा माना जाता है कि भूपर्पटी के नीचे मेंटल की चट्टानों में एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें काफी मात्रा में पानी है। यह पानी तरल रूप में नहीं है बल्कि खनिजों में पाया जाता है। लेकिन पृथ्वी के इतिहास की शुरुआत में रेडियोधर्मिता के कारण मेंटल आज की तुलना में चार गुना अधिक गर्म था। हाइड्रोलिक प्रेस की मदद से किए गए हालिया अध्ययन से पता चला है कि इतने अधिक तापमान और दबाव पर कई खनिज इतनी मात्रा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को जमा रखने में सक्षम नहीं रहे होंगे। एजीयू एडवांसेज़ में प्रकाशित हारवर्ड युनिवर्सिटी के मिनरल फिज़िक्स के छात्र जुंजी डोंग के शोध पत्र के अनुसार काफी संभावना है कि यह पानी सतह पर रहा होगा।

मेंटल की गहराई में पाए जाने वाले दो खनिजों, वाडस्लेआइट और रिंगवुडाइट, में काफी मात्रा में पानी भंडारित पाया गया है। इन खनिजों से बनी चट्टानें ग्रह के कुल द्रव्यमान का 7 प्रतिशत हैं। हालांकि इनमें पानी का वज़न केवल 2 प्रतिशत है, लेकिन नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के प्रायोगिक खनिज विज्ञानी स्टीवन जैकबसेन के अनुसार बूंद-बूंद से घट भरे की तर्ज़ पर यह 2 प्रतिशत भी काफी है।

जैकबसेन और उनके साथियों ने चट्टानों के चूरे पर उच्च दबाव और तापमान आरोपित करके इन खनिजों का निर्माण किया। डोंग की टीम ने विभिन्न प्रयोगों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर बताया कि वाडस्लेआइट और रिंगवुडाइट उच्च तापमान पर काफी कम मात्रा में पानी सहेज पाते हैं। जैसे-जैसे मेंटल ठंडा होता गया, ये खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाने लगे जिससे पृथ्वी की आयु बढ़ने के साथ-साथ उनकी पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ती रही।

इसके अलावा कुछ अन्य साक्ष्य भी हैं जो पृथ्वी के जल-प्लावित होने के संकेत देते हैं। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के 4 अरब वर्ष पुराने ज़िरकॉन क्रिस्टल में टाइटेनियम सांद्रता से पता चलता है कि ये पानी में निर्मित हुए हैं। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और ग्रीनलैंड में पाई गई पृथ्वी की सबसे पुरानी (3 अरब वर्ष पुरानी) बैसाल्ट, बलबस चट्टानें तभी बनती हैं जब मैग्मा पानी के संपर्क में आकर ठंडा होता है।

युनिवर्सिटी ऑफ कोलेरेडो के जिओबायोलॉजिस्ट जॉनसन और बोसवेल विंग ने इस विषय में अधिक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। ऑस्ट्रेलिया से पाए गए 3.2 अरब साल पुरानी महासागरीय पर्पटी के नमूनों में भारी ऑक्सीजन आइसोटोप की मात्रा वर्तमान महासागरों की तुलना में काफी अधिक पाई गई। जब बारिश का पानी महाद्वीपीय पर्पटी के साथ प्रतिक्रिया करके कीचड़ में परिवर्तित होता है तब भारी ऑक्सीजन मुक्त होती है। प्राचीन महासागरों में इसकी प्रचुरता से पता चलता है कि तब शायद ही महाद्वीप उभरे होंगे। इन परिणामों से यह तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि महासागर विशाल थे लेकिन बड़े सागरों में जलमग्न महाद्वीप होना आसान है।

हालांकि विशाल महासागरों से महाद्वीपों का उभर पाना मुश्किल रहा होगा लेकिन इससे इस बात की व्याख्या हो जाती है कि क्यों महाद्वीप काफी पहले से चलायमान हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार विशाल महासागरों के कारण दरारों में जल के घुसने से पर्पटी कमज़ोर पड़ गई और टेक्टोनिक प्लेट्स गतिशील होने लगीं। इस प्रक्रिया से धसान क्षेत्रों का निर्माण हुआ जिसमें एक चट्टानी परत दूसरे के नीचे फिसलती गई होगी। जब एक बार चट्टान धंसना शुरू हुई तो मज़बूत मेंटल ने चट्टान को झुकाए रखा होगा, जिससे चट्टान का धंसना जारी रहा।

विशाल महासागरों के साक्ष्य इस बात को चुनौती देते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसकी शुरुआत महासागरों में मौजूद पोषक तत्वों से समृद्ध हाइड्रोथर्मल वेंट के अंदर हुई जबकि कुछ मानते हैं कि शुरुआत शुष्क भूमि पर उथले तालाबों में हुई जहां रसायनों की सांद्रता बढ़ जाती थी। जलमग्न पृथ्वी का विचार इन दोनों परिकल्पनाओं पर सवाल खड़े कर देता है और कुछ वैज्ञानिक एक तीसरे विकल्प पर विचार कर रहे हैं।

यह प्राचीन पानी इस बात की भी याद दिलाता है कि पृथ्वी का विकास कितना परिस्थितियों के अधीन है। जन्म के समय पृथ्वी सूखी थी जब तक कि पानी से लबालब क्षुद्रग्रह इससे टकराए नहीं। यदि इन क्षुद्रग्रहों ने आज की तुलना में दोगुना पानी जमा कर दिया होता या फिर मेंटल में कम पानी सोखने की क्षमता होती तो ग्रह के जीवन और जलवायु के लिए आवश्यक महाद्वीप कभी उभरे ही नहीं होते। बहुत अधिक जल या बहुत कम जल, दोनों ही से काम बन पाना संभव नहीं था। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उत्तराखंड आपदा पर वाटर कॉनफ्लिक्ट फोरम का वक्तव्य

वॉटर कॉनफ्लिकट फोरम देश में पानी के मुद्दों से सरोकार रखने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए संवाद मंच है। पिछले लगभग 20 वर्षों से यह विभिन्न मुद्दों पर काम करता रहा है। उत्तराखंड की हाल की घटनाओं पर फोरम ने एक वक्तव्य जारी किया है और कई लोगों ने इस पर हस्ताक्षर करके अनुमोदन किया है ।

विगत 7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के ऋषि गंगा और धौली गंगा की घटनाओं ने एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र बहुत दबाव में है और रोज़-ब-रोज़ दुर्बल होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन और उसके असर अब बहस का विषय नहीं हैं। वर्तमान में इन परिवर्तनों ने हिमालय जैसी नवोदित और बेचैन पर्वत शृंखला को और भी कमज़ोर बना दिया है। हिमालय के अंतर्गत भी हिमनद, हिमनद झीलों, खड़ी घाटियों और विरल वनस्पतियों जैसे स्थान अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संवेदनशील हैं। ये इलाके मामूली से मानव हस्तक्षेप से बड़ी आपदा का रूप ले सकते हैं।

निर्मित, निर्माणाधीन या नियोजित बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं, बराजों, सुरंगों, चौड़ी सड़कों और यहां तक कि रेल मार्ग जैसे मानव हस्तक्षेप पूरे हिमालय क्षेत्र में फैले हुए हैं। अब तक वर्ष 2012, 2013, 2016 और 2021 की हालियां घटनाएं हमें निरंतर चेतावनी दे रही हैं। इस परिस्थिति में हिमालय क्षेत्र में पहले से हो चुके नुकसान की भरपाई करने के लिए अविलंब निवारक व निर्णायक कदम उठाने होंगे।

7 फरवरी की घटनाओं की सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध जानकारी संकेत देती है कि नदी के मार्ग में निर्मित पनबिजली परियोजनाओं जैसे अवरोधों के चलते ऋषि गंगा घाटी में एक हानिरहित प्राकृतिक घटना ने विनाशकारी रूप ले लिया जिसके चलते जान-माल का काफी नुकसान हुआ। इस दौरान बाढ़ चेतावनी प्रणाली भी विफल रही।

इस घटना के मद्देनज़र, वॉटर कॉनफ्लिक्ट फोरम देश के राजनीतिक और कार्यकारी प्रतिष्ठान से निम्नलिखित मांगें करता है:

1. जान-माल के नुकसान के लिए ज़िम्मेदारों की विभिन्न स्तरों पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जाए; दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए और ऐसे प्रोटोकॉल व प्रक्रियाएं स्थापित की जाएं ताकि भविष्य में ऐसी प्राकृतिक घटनाएं आपदा में न बदलें।

2. दो क्षतिग्रस्त जलविद्युत परियोजनाओं, ऋषि गंगा और तपोवन, को तत्काल रद्द किया जाए और नदी के रास्ते से मलबे को साफ किया जाए।

3. 2014 की उत्तराखंड आपदा के कारणों का विश्लेषण कर चुकी रवि चोपड़ा समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द कार्यान्वित किया जाए और प्राथमिकता के आधार पर उत्तराखंड राज्य में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को रद्द किया जाए। यह ध्यान देने वाली बात है कि इस विषय में उच्च स्तरीय न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं यानी सर्वोच्च न्यायलय और पीएमओ ने इस दिशा में कदम उठाए थे लेकिन अभी तक इन्हें लागू नहीं किया गया है।

4. भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि हिमालय क्षेत्र के सभी राज्यों में मौजूदा बांधों की आपदा संभावना की स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा की जाए।

5. हिमालय एक नवीन पर्वत शृंखला है और यदि इसकी भूगर्भीय दुर्बलता और भूकंपीय संवेदनशीलता को अनदेखा किया जाता है तो जलवायु परिवर्तन की घटनाएं इसे नए परिवर्तनों के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देंगी। इसलिए पश्चिमी घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल की तर्ज़ पर हिमालय क्षेत्र में वर्तमान विकास कार्यक्रमों और परियोजनाओं की व्यापक समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र बहु-विषयी विशेषज्ञ समूह का गठन किया जाना चाहिए जो समयबद्ध तरीके से काम करे। यह समीक्षा परियोजना-आधारित समीक्षा न होकर एक व्यापक, संचयी, क्षेत्रीय समीक्षा होनी चाहिए जो सभी परियोजनाओं (जिसमें सड़क, रेलवे, बांध, सुरंग, पर्यटन केंद्र, कॉलोनी, टाउनशिप और तथाकथित वनरोपण शामिल हों) के संयुक्त प्रभावों के साथ जलवायु परिवर्तन और भूकंपीयता के मौजूदा खतरों को भी ध्यान में रखे।

6. एक सहभागी प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए हिमालयी नदियों और स्थानीय लोगों के पारिस्थितिकी तंत्र एवं आजीविका की सुरक्षा के लिए एक वैकल्पिक विकास नीति/रणनीति विकसित की जानी चाहिए। हिमालय क्षेत्र में बेलगाम विकास पर रोक लगानी चाहिए; इसकी बजाय हिमालय क्षेत्र में न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के साथ उसे एक प्राकृतिक विरासत के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही जैविक और जैव-विविधता आधारित कृषि, टिकाऊ पशुपालन, विकेंद्रीकृत जल प्रणाली, स्थानीय वन और जैव-र्इंधन आधारित विनिर्माण, शिल्प और समुदाय द्वारा संचालित पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए। इसमें पारिस्थितिक रूप से हानिकारक कृषि, जन पर्यटन आदि जैसे कार्यों को हतोत्साहित करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फेरबदल प्राचीन वृक्ष में कैद

न्यूज़ीलैंड में 42,000 साल पुराने एक कौरी वृक्ष के तने ने पृथ्वी के चुंबकीय इतिहास की चुगली कर दी है। दरअसल, कुछ साल पहले बिजली संयंत्र के लिए खुदाई के दौरान प्राचीन समय के कौरी पेड़ का 60 टन वज़नी तना मिला था। यह न्यूज़ीलैंड में पाई जाने वाली पेड़ों की सबसे बड़ी प्रजाति का था। 42,000 साल पहले उगा यह पेड़ दलदल में परिरक्षित हो गया था। हालिया अध्ययन में इसकी वार्षिक वलयों ने 1700 साल का इतिहास बताया है – उस समय पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव पलट गए थे।

साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार कौरी पेड़ के तने और अन्य लकड़ियों में रेडियोकार्बन का स्तर बताता है कि उन वर्षों में पृथ्वी का सुरक्षात्मक चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर होने और चुंबकीय ध्रुवों की स्थिति पलटने के कारण अंतरिक्ष से पृथ्वी पर पहुंचने वाले विकिरण में अचानक बढ़ोतरी हुई थी। वायुमंडल पर इस विकिरण के प्रभाव की मॉडलिंग करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि इस प्रभाव के चलते पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन का सामना करना पड़ा था, जो संभवत: ऑस्ट्रेलिया के बड़े स्तनधारी जीवों और युरोप के निएंडरथल मनुष्यों के विलुप्त होने का कारण बना।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के बाहरी कोर में पिघले हुए लोहे के प्रवाह से बनता है। इस प्रवाह में बेतरतीब बदलाव पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को कमज़ोर कर सकता है और उसके ध्रुवों की स्थिति को बदल सकता है; कभी-कभी तो स्थिति पूरी तरह पलट भी सकती है।

चट्टानों में उपस्थित खनिज में ध्रुवों में लंबे समय के लिए हुई उथल-पुथल तो दर्ज हो जाती है लेकिन वे कम अवधि के लिए हुए परिवर्तनों को बारीकी से दर्ज नहीं कर पाते। जैसे कि इस अध्ययन में 42,000 साल पुराने कौरी वृक्ष के तने में देखे गए हैं।

रेडियोधर्मी कार्बन-14 की मदद से इन सूक्ष्म परिवर्तनों को पहचाना जा सकता है। जब ब्रह्मण्डीय किरणें ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र को भेदती हुई उसके वायुमंडल में प्रवेश करती हैं तो कार्बन के इस समस्थानिक का निर्माण होता है। इसे सजीव ग्रहण कर लेते हैं। इस समस्थानिक की अर्ध-आयु निश्चित है। यानी यह तय है कि कितने समय में कुल कार्बन-14 का आधा हिस्सा अन्य परमाणुओं में बदल जाएगा। अत: कार्बन-14 के मापन से किसी वस्तु की उम्र निर्धारित की जा सकती है। शोधकर्ताओं ने रेडियोकार्बन डेटिंग की मदद से कौरी तने का काल निर्धारण किया, और इसकी तुलना उन्होंने चीन की गुफा से प्राप्त सटीक रेडियोकार्बन जानकारी के साथ की। तने की अलग-अलग वलयों में कार्बन-14 के अंतर के आधार पर उन्होंने गणना की कि कैसे 40-40 वर्ष की अवधि में चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता कम-ज़्यादा होती रही।

रेडियोकार्बन की मात्रा में वृद्धियां दर्शाती हैं कि वर्तमान की तुलना में 41,500 साल पहले चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति में छह प्रतिशत की कमी आई थी। फिर पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव पलट गए थे और चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता कुछ हद तक बहाल हो गई थी। 500 साल बाद ध्रुव एक बार फिर पलटे थे।

शोधकर्ता बताते हैं कि न सिर्फ पृथ्वी का चुंबकीय रक्षा कवच कमज़ोर पड़ा था बल्कि सूर्य में भी परिवर्तन हुए थे। हिम खण्ड से प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि इसी समय के आसपास, सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों में कमी आई थी। परिणामस्वरूप आने वाली ब्रह्मण्डीय किरणों ने पृथ्वी के वातावरण को इतना आयनित कर दिया होगा कि वह आजकल की बिजली लाइनों को ध्वस्त कर देता।

इस संभावना की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने एक जलवायु मॉडल बनाया, जिसने यह संभावना जताई कि ब्रह्मण्डीय किरणों की बौछार ने ओज़ोन परत को क्षति पहुंचाई होगी, जिससे पराबैंगनी किरणों की ऊष्मा अवशोषित करने की क्षमता कम हो गई होगी। परिणामस्वरूप ऊंचे स्थान ठंडे होने लगे होंगे, और हवाओं के बहने की दिशा बदल गई होगी। इस कारण पृथ्वी की जलवायु में कई बड़े परिवर्तन हुए होंगे; इनमें से एक परिवर्तन था कि उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत ठंडा हुआ और युरोप गर्म।

इन व्यापक निष्कर्षों पर अन्य वैज्ञानिक संदेह जताते हैं। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के पिछले 1,00,000 वर्ष पुराने हिम खण्डों से प्राप्त जानकारी बताती है कि प्रत्येक कुछ हज़ार वर्षों के अंतराल पर तापमान में बदलाव होता था। लेकिन इनमें 42,000 साल पूर्व कोई बदलाव पता नहीं चला है।

अध्ययन के शोधकर्ताओं का कहना कि उनके अध्ययन से लगता है कि 42,000 साल पहले जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित कई घटनाएं हुई होंगी। जैसे उस समय ऑस्ट्रेलिया से बड़े स्तनधारी जीव विलुप्त हो गए, निएंडरथल युरोप से गायब हो गए, और युरोप और एशिया में बड़े स्तर पर गुफा चित्र दिखाई देने लगे। बहरहाल अन्य शोधकर्ता मानते हैं कि उपरोक्त अध्ययन के आंकड़ों को बहुत खींचा जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

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पृथ्वी के नए भूगोल के अनुमान

तीत में कोलंबिया, रोडिनिया, पैंजिया जैसे सुपर-महाद्वीप पृथ्वी पर बने और बिखर गए। हाल ही में हुआ एक अध्ययन बताता है कि सुपर-महाद्वीप बनने का एक नियमित चक्र चलता रहता है, जो 60 करोड़ वर्ष में पूरा होता है। पृथ्वी के मेंटल में गर्म पिघली चट्टानों के प्रवाह के आधार पर यह अनुमान भी लगाया गया है कि पृथ्वी पर अगला सुपर-महाद्वीप कब और कहां बनेगा।

हमारे महाद्वीप टेक्टॉनिक प्लेटों पर स्थित हैं, और ये टेक्टॉनिक प्लेटें पृथ्वी के मेंटल पर तैरती रहती हैं। मेंटल पानी उबालने वाले बर्तन की तरह कार्य करता है: पृथ्वी का गर्म पिघला कोर मेंटल के निचले हिस्से में मौजूद चट्टानों को गर्म करता है, जिससे वे धीरे-धीरे ऊपर उठने लगती हैं। इसी दौरान, धंसान क्षेत्र में पृथ्वी की भूपर्पटी के निचले हिस्से में मौजूद ठंडी चट्टानें मेंटल के निचले हिस्से की ओर जाने लगती हैं। चट्टानों के इस चक्रीय प्रवाह को मेंटल संवहन कहते हैं।

मेंटल संवहन महाद्वीपीय प्लेटों के प्रवाह को गति और दिशा देता है, जिससे लाखों-करोड़ों वर्षों में उनका स्थान बदलता रहता है। इस दौरान कभी-कभी ये महाद्वीप आपस में जुड़कर सुपर-महाद्वीप बनाते हैं।

सुपर-महाद्वीप चक्र के बारे में अधिक जानने के लिए चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के भूवैज्ञानिक रॉस मिशेल और उनके साथियों ने ‘मेगा-महाद्वीपों’ पर ध्यान केंद्रित किया। मेगा-महाद्वीप सुपर-महाद्वीप से छोटे होते हैं और कभी उनका हिस्सा रहे होते हैं। जैसे गोंडवाना मेगा-महाद्वीप जो लगभग 52 करोड़ साल पहले बना था, और इसके 20 करोड़ वर्ष बाद इसी से पैंजिया सुपर-महाद्वीप बनने की शुरुआत हुई थी।

गोंडवाना से पैंजिया कैसे बना, यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों और विभिन्न काल के उपलब्ध अन्य प्रमाणों के आधार पर विभिन्न काल में महाद्वीपीय प्लेटों की स्थिति को चित्रित किया, और पता लगाया कि महाद्वीपों की स्थितियां मेंटल प्रवाह के विभिन्न मॉडल्स से किस तरह मेल खाती हैं।

पाया गया कि महाद्वीप का प्रवाह धंसान क्षेत्र की ओर बहाव की दिशा में था – इस क्षेत्र में मेंटल के ऊपरी हिस्से में मौजूद चट्टानें ठंडी होकर नीचे की ओर खिसकती हैं। लेकिन यहां मिशेल इस क्षेत्र को ‘धंसान घेरा’ कहते हैं क्योंकि महाद्वीपीय प्लेटें बहुत मोटी होती हैं जो नीचे नहीं जा पातीं और इसलिए इस क्षेत्र में जाकर ‘अटक’ जाती है। वे केवल इस घेरे की परिधि से लगकर घूम सकती हैं और इस प्रक्रिया में अन्य महाद्वीपों से जुड़ सकती हैं। इस तरह गोंडवाना से पैंजिया बना।

शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि अब आगे क्या होगा। जियोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित उनके निष्कर्षों के अनुसार जब पैंजिया लगभग 17.5 करोड़ साल पहले टूटा तो प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों के पास इसने रिंग ऑफ फायर नामक धंसान क्षेत्र का निर्माण किया, जहां ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंप जैसी घटनाएं होती रहती हैं। वर्तमान मेगा-महाद्वीप – युरेशिया – को बनाने वाले कई महाद्वीप पहले ही जुड़ चुके हैं। और युरेशिया रिंग ऑफ फायर के विपरीत दिशा में जा रहा है। इस तरह बहते-बहते 5-20 करोड़ वर्ष बाद युरेशिया अमेरिका से टकराएगा, जो एक नए सुपर-महाद्वीप को जन्म देगा। भूवैज्ञानिकों ने इस अगले सुपर-महाद्वीप को ‘अमेशिया’ नाम दिया है। इस बात पर बहस जारी है कि अमेशिया कहां जाकर रुकेगा, लेकिन मिशेल के मॉडल के अनुसार संभवत: यह वर्तमान के आर्कटिक महासागर के केंद्र में होगा। (स्रोत फीचर्स)

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मैडागास्कर के विशालकाय जीव कैसे खत्म हो गए

क समय मैडागास्कर में एलीफैंट बर्ड, विशाल कछुए और यहां तक कि विशालकाय लीमर रहा करते थे। लेकिन आज इस क्षेत्र में सिर्फ छोटे जीव ही पाए जाते हैं। शोधकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर काफी बहस होती रही है कि दोष मनुष्यों का है या जलवायु परिवर्तन का। लेकिन हाल ही में हिंद महासागर के एक द्वीप की गुफाओं से प्राप्त तलछट से इसके जवाब के संकेत मिले हैं: सूखे की परिस्थितियों ने विशालकाय जीवों के लिए जीवन काफी कठिन ज़रूर बना दिया था लेकिन एलीफैंट बर्ड के ताबूत में आखरी कील तो मनुष्यों ने ही ठोंकी है।    

अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट से 425 किलोमीटर दूर मैडागास्कर मनुष्यों द्वारा बसाया गया सबसे आखिरी स्थान माना जाता था। लेकिन दो वर्ष पहले शोधकर्ताओं को 10,500 वर्ष पुरानी हाथियों की हड्डियां मिलीं हैं जिनकी हत्या की गई थी। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य और विशालकाय जीव हज़ारों वर्षों साथ-साथ रहे थे लेकिन ये विशाल जीव लगभग 1500 वर्ष पहले विलुप्त हो गए।

इस क्षेत्र की जलवायु का इतिहास समझने के लिए शियान जियाटोंग युनिवर्सिटी के भू-वैज्ञानिक हई चेंग और उनके स्नातक छात्र हांग्लिंग ली ने मैडागास्कर से 1600 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटे टापू रॉड्रिग्स पर गुफाओं का रुख किया। यह टापू काफी दूर और अलग-थलग स्थित है, जिसकी वजह से यह प्राचीन जलवायु की जानकारी एकत्रित करने के लिए बढ़िया स्थान था। मानव गतिविधियां न होने से अभी भी यहां स्टैलैक्टाइट तथा स्टैलैग्माइट सलामत थे।

सबसे पहले शोधकर्ताओं ने तलछट के खंडों का काल निर्धारण किया। कई जगहों पर तो वे पिछले 8000 वर्षों के लिए दशक-दशक तक की परिशुद्धता से काल निर्धारण कर पाए। इसके बाद उन्होंने परत-दर-परत ऑक्सीजन और कार्बन के भारी समस्थानिकों तथा सूक्ष्म मात्रा में पाए गए तत्वों का विश्लेषण किया जिससे अतीत में जलवायु में नमी के स्तर का पता लगाया जा सके। साइंस एडवांसेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर ने इस दौरान चार बड़े सूखों का सामना किया था। इनमें से सूखे की एक घटना 1500 वर्ष पूर्व बड़े स्तर पर विलुप्तिकरण की घटना के साथ भी मेल खाती है। चेंग का मानना है कि इसके पूर्व में होने वाली सूखे की घटनाओं से भी ये जीव बच निकले थे। इससे ऐसा लगता है कि मनुष्यों द्वारा अत्यधिक शिकार और आवास स्थल नष्ट करना निर्णायक रहा।

इस अध्ययन से अन्य शोधकर्ताओं को मैडागास्कर और आसपास के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त हुई है। लेकिन अध्ययन मात्र एक छोटे टापू पर किया गया है जबकि यह क्षेत्र काफी विशाल है और यहां अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों के अलावा अलग-अलग मानव सभ्यताएं भी मौजूद रही होंगी। ऐसे में विभिन्न स्थानों में विलुप्त होने की परिस्थितियां भी काफी अलग-अलग हो सकती हैं।(स्रोत फीचर्स)

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मछली के जीवाश्म से दुर्लभ मृदा तत्वों का खनन

श्चिमी प्रशांत महासागर और जापान के पूर्वी क्षेत्र में मिनामि-तोरी-शिमा नाम का एक छोटा-सा टापू है। यह तिकोना टापू केवल सवा तीन वर्ग कि.मी. में फैला है और आसपास एक अजीब दीवार के कारण इसका अधिकांश भाग समुद्र तल से भी नीचे है। और तो और, यह निकटतम भूमि से भी हज़ार किलोमीटर दूर है। लेकिन यह महत्वपूर्ण हो चला है क्योंकि यहां दुर्लभ मृदा तत्वों यानी रेयर अर्थ एलीमेंट्स का भंडार है।

यह भी उतना ही मज़ेदार है कि उक्त भंडार कहां स्थित है। दुर्लभ मृदा तत्व न तो इस टापू पर हैं और न ही टापू के अंदर दफन हैं। दरअसल यह टापू एक जलमग्न पर्वत पर स्थित है और यह भंडार उस पर्वत के दक्षिण में मछलियों के दांतों, शल्कों और हड्डियों के टुकड़ों पर जमा है। वास्तव में मछलियों के जीवाश्म दुर्लभ मृदा तत्वों को फांसने वाले ‘जाल’ हैं। जापानी वैज्ञानिकों के अनुसार ये ‘जाल’ इतने सक्षम हैं कि इस टापू के दक्षिण में 2500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की मिट्टी दुर्लभ मृदा तत्वों का इतना बड़ा भंडार है कि उससे सैकड़ों वर्षों तक दुनिया की ज़रूरतों की आपूर्ति हो सकती है।

तो यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये कौन से दुर्लभ मृदा तत्व हैं और इनकी हमें क्यों आवश्यकता है?             

आज के प्रौद्योगिकी युग में ये दुर्लभ मृदा तत्व कई मशीनों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इन तत्वों का नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन, टीवी, स्मार्टफोन, एलईडी, आधुनिक दौर के विद्युत-र्इंधन संकर वाहनों, चिकित्सकीय और सैन्य तकनीकों में व्यापक उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में इनकी खपत काफी बढ़ गई है। संयोग से इन तत्वों की अधिकांश खदानें चीन में हैं। देखा जाए, तो ये तत्व मात्रा के लिहाज़ से दुर्लभ नहीं हैं लेकिन इन तत्वों के खनन योग्य भंडार काफी दुर्लभ हैं।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार जापानी वैज्ञानिक फिलहाल मिनामि-तोरी-शिमा और दक्षिण प्रशांत में इसी तरह के एक स्थल मनिहिकी पठार के दक्षिण पूर्व में मत्स्य जीवाश्मों का अध्ययन कर रहे थे ताकि यह पता किया जा सके कि ये कितने पुराने हैं। साथ ही ऐसे जीवाश्मों के अन्य स्थलों की भी तलाश कर रहे थे। पता चला कि ये जीवाश्म लगभग 3.4 करोड़ वर्ष पुराने हैं और मिनामि-तोरी-शिमा पर इनकी उपस्थिति हिमयुग के दौरान निर्मित अंटार्कटिक बर्फीली चादर का परिणाम है।

अंटार्कटिक के नीचे वाला पानी ठंडा रहा और इसी वजह से अधिक सघन रहा। यह गर्म तथा कम सघन वाले पानी के नीचे-नीचे उत्तर की ओर बहने लगा। यह निचला पानी अपेक्षाकृत सुस्त दक्षिणी समुद्र में हज़ारों वर्षों तक पोषक तत्वों को संग्रहित करता रहा था और काफी लंबे समय के बाद उभरकर ऊपर आया। ऊपर से धूप मिली तो जीवन फलने-फूलने लगा। यह प्रक्रिया लगभग एक लाख वर्ष तक चलती रही जब तक कि अंटार्कटिका के आसपास संग्रहित पोषक तत्व खत्म नहीं हो गए। अंतत: जो बचा वे थे दांत, हड्डियों के टुकड़े और शल्क जो पेंदे में जमा हो गए।

हड्डियां कैल्शियम और फॉस्फेट से बनी होती हैं, और लगता है जीवाश्मित फॉस्फेट दुर्लभ मृदा तत्वों को काफी अच्छे से बांध पाता है। इस अध्ययन के सह-लेखक जुनिचिरो ओह्टा के अनुसार पिछले 3.4 करोड़ वर्षों में जीवाश्म ने धीरे-धीरे मिट्टी में फंसे तरल पदार्थ से यिट्रियम, युरोपियम, टर्बीयम और डिस्प्रोसियम को अच्छे से जमा किया है। हड्डियों के टुकड़े हो जाने की वजह से सतह के बढ़े हुए क्षेत्रफल ने इस क्षमता को और बढ़ाया है। इसके परिणामस्वरूप यहां की मिट्टी में 20,000 पीपीएम तक दुर्लभ मृद्दा तत्व उपस्थित हैं। यही कारण है कि मिनामि-तोरी-शिमा इतना खास है।

जापानी वैज्ञानिकों की टीम के अनुसार मिनामि-तोरी-शिमा के दक्षिण में 1.6 करोड़ टन के दुर्लभ मृदा ऑक्साइड्स मौजूद हैं जो वर्तमान उपभोग की दर के हिसाब से 420 से 780 वर्षों तक की आपूर्ति के लिए पर्याप्त हैं। और सिर्फ मिनामि-तोरी-शिमा और मानिहिकी पठार ही नहीं बल्कि प्रशांत महासागर में ऐसे सैकड़ों टापू हैं जहां दुर्लभ मृदा तत्वों के मिलने की संभावना है।                   

ऐसा अनुमान है कि विभिन्न दुर्लभ मृदा तत्वों की आपूर्ति में वृद्धि होने से ऐसे उपकरणों का निर्माण किया जा सकेगा जो जीवाश्म र्इंधन से छुटकारा दिला सकते हैं। इन्हें आसानी से प्राप्त भी किया जा सकता है। कीचड़ में पाए जाने के कारण इनमें युरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का स्तर भी कम होगा। लेकिन एक समस्या भी है – जीवाश्म तीन मील से अधिक गहराई पर मौजूद हैं, जहां अब तक का कोई भी व्यावसायिक खनन कार्य लाभदायक नहीं हो पाया है। महासागरों में गहराई पर खनन से पर्यावरण को काफी क्षति की भी आशंका है।     

ट्रेंड्स इन इकोलॉजी एंड इवॉल्यूशन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरणीय असंतुलन को कम आंका जा रहा है। इसके जवाब में कहा जा रहा है कि यह क्षेत्र बहुत छोटा है, और खनन से मिलने वाले फायदे पर्यावरणीय लागत से कहीं अधिक हैं। कुल मिलाकर, चाहे धरती पर हो या समुद्रों में, खनन को लेकर विवेकपूर्ण निर्णयों की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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