नील नदी कभी पिरामिडों के पास से गुज़रती थी

मिस्र के पिरामिड प्राचीन दुनिया के सात अजूबों में शुमार हैं, और पुरातत्वविदों के लिए पड़ताल का विषय रहे हैं। गौरतलब है कि ये पिरामिड गीज़ा से लेकर लिश्त तक के रेगिस्तानी इलाके में फैले हुए हैं। यहां से नील नदी कई किलोमीटर दूर बहती है। पुरातत्वविदों को इस सवाल ने हमेशा से परेशान किया है कि यदि प्राचीन समय में भी नील नदी इतनी दूर बह रही थी तो पिरामिडों को बनाने के लिए इतने भारी-भरकम पत्थरों को ढोना कितना मुश्किल रहा होगा। कैसे ढोया गया होगा इस सामग्री को? जबकि कुछ दस्तावेज़ कहते हैं कि पिरामिड को बनाने के लिए सामग्री नावों से लाई जाती थी, लेकिन यदि नदी इतनी दूर है तो ढुलाई कैसे होती होगी?
अलबत्ता, वैज्ञानिकों को काफी समय से यह भी संदेह था कि हो न हो, उस समय नील नदी इन स्थानों के नज़दीक से गुज़रती होगी, जिसने पत्थरों की ढुलाई में मदद की होगी। उनके इस संदेह का आधार था नील नदी के रास्ता बदलने की प्रवृत्ति; देखा गया है कि टेक्टोनिक प्लेटों में हुई बड़ी हलचल के कारण पिछली कुछ सदियों में नील नदी पूर्व की ओर कई किलोमीटर खिसक गई है। साथ ही, अध्ययनों में गीज़ा और लिश्त के बीच के स्थलों पर अतीत में कभी यहां बंदरगाह की उपस्थिति और ऐसे अन्य सुराग मिले थे जो कभी यहां नदी होने के संकेत देते थे। लेकिन इन अध्ययनों में नदी के सटीक मार्ग पता नहीं लगाया जा सका था।
ताज़ा अध्ययन में नॉर्थ कैरोलिना युनिवर्सिटी के भू-आकृति विज्ञानी एमान गोनीम की टीम को इन स्थलों पर एक सूखे हुए नदी मार्ग सरीखी रचना दिखी, जो लगभग 60 किलोमीटर लंबी थी, खेतों के बीच से गुज़र रही थी और करीब उतनी ही गहरी और चौड़ी थी जितनी आधुनिक नील नदी है।
अब बारी थी यह जांचने की कि क्या यह मार्ग किसी प्राचीन नदी का हिस्सा था? मार्ग से लिए गए तलछट के नमूनों की जांच में उन्हें अमूमन नदी के पेंदे में मिलने वाली बजरी और रेत की एक तह मिली। इस जानकारी को शोधकर्ताओं ने उपग्रह से ली गई तस्वीरों के साथ मिलाया और उनका विश्लेषण किया, जिससे वे नदी के बहने का रास्ता चित्रित कर पाए। पता लगा कि नील नदी की यह शाखा लगभग 2686 ईसा पूर्व से लेकर 1649 ईसा पूर्व के बीच बने 30 से अधिक पिरामिडों के पास से होकर बहती थी। शोधकर्ताओं ने इस नदी को अरबी नाम ‘अहरामत‘ दिया है, जिसका अर्थ है पिरामिड।
ऐसा लगता है कि सहारा रेगिस्तान से उड़कर आने वाली रेत और नील नदी के रास्ता बदलने के कारण अहरामत शाखा सूख गई और नौका परिवहन के लायक नहीं रह गई। फिलहाल कुछ जगहों पर कुछ झीलें और नाले ही बचे हैं।
कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित ये नतीजे उन दस्तावेज़ों के कथन से मेल खाते हैं जो बताते हैं कि पिरामिड निर्माण के लिए सामग्री नाव से लाई जाती थी। अर्थात मिस्रवासी हमारी सोच से कहीं अधिक व्यावहारिक थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलमग्न पर्वत शृंखला पर मिली व्यापक जैव विविधता

हरे समुद्र में स्थित चट्टानों पर आकर्षक बैंगनी, हरे और नारंगी रंग के स्पॉन्ज हैं। मैरून कांटों वाले समुद्री अर्चिन झुंड में है और खसखसी रंग के क्रस्टेशियंस उनके बीच विचर रहे हैं। पारदर्शी, भूतिया से दिखने वाले जीव अंधेरे में इधर-उधर फिर रहे हैं। ये नज़ारे हैं चिली तट से कुछ दूरी पर स्थित जलमग्न पहाड़ों के आसपास के, जिन्हें श्मिट ओशियन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने रोबोट पर कैमरा लगाकर कैद किया है।

वास्तव में उन्होंने समुद्र के भीतर फैली नाज़्का और सालास वाई गोमेज़ पर्वतमाला के पास 4500 मीटर की गहराई तक रिकॉर्डिंग की है। ये दो पर्वतमालाएं मिलकर लगभग 3000 किलोमीटर में फैली हैं। यहां उन्हें स्पॉन्ज, एम्फिपोड, समुद्री अर्चिन, क्रस्टेशियंस और मूंगा सहित कई जीवों की करीब 100 से अधिक नई प्रजातियां मिली हैं। उन्होंने चिली के नज़दीक समुद्र के नीचे चार समुद्री पर्वतों का मानचित्रण किया जिनके बारे में पहले पता नहीं था। इनमें से सबसे ऊंचा पर्वत समुद्र तल से 3530 मीटर ऊंचा है, जिसे शोधकर्ताओं ने सोलिटो नाम दिया है।

तस्वीरों के अलावा, रोबोट यहां से कुछ जीवों को लेकर भी आया है। इनकी मदद से उनकी प्रजातियों को पहचानने या उन्हें नई प्रजातियों में वर्गीकृत करने में मदद मिलेगी। इन नई प्रजातियों से वैज्ञानिकों को इस विशाल क्षेत्र की जटिल वंशावली बनाने और इन जीवों को अस्तित्व में लाने वाले वैकासिक पड़ावों के बारे में जानने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन समुद्री पर्वतों पर इतनी अधिक जैव विविधता पाए जाने और बचे रहने का श्रेय काफी हद तक इन जगहों के समुद्री पार्क के रूप में संरक्षण को जाता है। इस क्षेत्र का काफी बड़ा हिस्सा चिली द्वारा प्रशासित जुआन फर्नांडीज़ और नाज़्का-डेसवेंचुरडास समुद्री पार्कों के अंतर्गत संरक्षित है। (स्रोत फीचर्स)

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गुमशुदा जलमग्न महाद्वीप का मानचित्र

क हालिया खोज में, शोधकर्ताओं ने दक्षिण प्रशांत महासागर में जलमग्न महाद्वीप ज़ीलैंडिया के रहस्यों का खुलासा किया है। यह खोज पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती है और न्यूज़ीलैंड को देखने के हमारे तरीके को बदलने के साथ पृथ्वी के भूवैज्ञानिक अतीत की नई समझ प्रदान करती है। वैज्ञानिकों ने यह खुलासा चट्टानों के नमूनों, और चुंबकीय मानचित्रण से जुड़ी एक जटिल प्रक्रिया के माध्यम से किया है।

ज़ीलैंडिया या स्थानीय माओरी भाषा में ते रिउ-ए-माउई नामक इस भूखंड को सात वर्ष पूर्व एक भूविज्ञानी निक मॉर्टिमर द्वारा प्रकाश में लाया गया था। हाल ही में टेक्टोनिक्स जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में, मॉर्टिमर और उनकी टीम ने इस जलमग्न महाद्वीप के करीब 50 लाख वर्ग किलोमीटर का मानचित्रण कर लिया है। वर्तमान में कुछ द्वीपों के समूह के रूप में न्यूज़ीलैंड की आम धारणा के विपरीत, ज़ीलैंडिया एक विशाल महाद्वीप के रूप में उभरता है, जो ऑस्ट्रेलिया के आकार का लगभग आधा है और समुद्र में डूबा हुआ है। इस खोज से भूवैज्ञानिक इतिहास और पृथ्वी के महाद्वीपीय विकास की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

इस अध्ययन के लिए 2016 में मॉर्टिमर ने ज़ीलैंडिया के उत्तरी क्षेत्र से ग्रेनाइट चट्टानें और तलछटी नमूने लिए थे। ग्रेनाइट के इन टुकड़ों का विश्लेषण कई चरणों में किया गया: उन्हें कूटकर छाना गया और टुकड़ों को भारी द्रव में डाला गया। कुछ टुकड़े तैरने लगे जबकि अन्य डूब गए। डूबी सामग्री से चुंबकीय खनिजों को अलग करने के लिए चुंबकीय पृथक्करण किया गया। इसके बाद, वैज्ञानिकों ने बची हुई सामग्री का सूक्ष्मदर्शी से सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया और ज़रकॉन रवों को अलग किया।

इन एक-तिहाई मिलीमीटर के ज़रकॉन ने ज़ीलैंडिया के भूवैज्ञानिक इतिहास को जानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ज्वालामुखी मैग्मा के ठंडा होने के दौरान बने इन क्रिस्टलों में रेडियोधर्मी तत्व युरेनियम होता है जो समय के साथ क्षय होते हुए सीसे में परिवर्तित होता है। वैज्ञानिक उनकी उम्र का पता लगाने के लिए ज़रकॉन में इन तत्वों के अनुपात को मापते हैं। जीलैंडिया के ग्रेनाइट में मैग्मा की डेटिंग से पता चलता है कि यह लगभग 10 करोड़ वर्ष पुराना है जो पूर्ववर्ती सुपरमहाद्वीप के टूटने के समय से मेल खाता है।

ये जानकारियां केवल आंशिक समझ प्रदान कर रही थीं। इसको अधिक गहराई से समझने के लिए टीम ने चुंबकीय क्षेत्र की विसंगतियों का पता लगाने का निर्णय लिया और जहाज़ों, अंतरिक्ष में और ज़मीन पर लगे सेंसरों के माध्यम से चुंबकीय मानचित्रण किया। पता चला कि अधिकतर चट्टानें अतीत की ज्वालामुखी गतिविधि से निर्मित बेसाल्ट के बनी थीं। इस तरह बने चुंबकीय मानचित्रों से ज़ीलैंडिया की संरचना का पता चला।

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि पूर्व में पाए गए ज्वालामुखीय क्षेत्रों में ये चुंबकीय चट्टानें बेतरतीब बिखरी नहीं थी बल्कि समुद्र में डूबी पर्पटी के दरार क्षेत्र के समांतर या लंबवत थीं जहां से ये महाद्वीप अलग-अलग हुए थे। मॉर्टिमर के अनुसार ऐसा लगता है कि ये क्षेत्र ज़ीलैंडिया और अंटर्कटिका के अलग होने से ठीक पहले सुपरमहाद्वीप गोंडवाना में तनाव से सम्बंधित हैं।

गौरतलब है कि पृथ्वी की महाद्वीपीय परत चक्रीय विकास से गुज़रती है: सबसे पहले एक सुपरमहाद्वीप के रूप में विशाल भूखंड होता है, फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़ होते हैं और अंतत: ये फिर से जुड़ जाते हैं। लगभग 30 से 25 करोड़ वर्ष पूर्व सुपरमहाद्वीप पैंजिया के दक्षिण में गोंडवाना और उत्तर में लॉरेशिया शामिल थे, जो अंतत: अलग हो गए थे।

इस अलगाव के दौरान, महाद्वीपीय पर्पटी के खिंचने से नई प्लेट सीमाओं का निर्माण हुआ। लगभग 10 करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना के भीतर एक दरार ने ज्वालामुखीय गतिविधि को जन्म दिया, जिससे लगभग 6 करोड़ वर्ष पहले तक यह परत पिज़्ज़ा के आटे की तरह खिंचती गई। इसके बाद जैसे-जैसे यह क्षेत्र ठंडा हुआ, ज़ीलैंडिया घना होता गया और लगभग 2.5 करोड़ वर्ष पहले पूरा का पूरा समुद्र में डूब चुका था। आज, ज़ीलैंडिया का केवल पांच प्रतिशत हिस्सा पानी के ऊपर उभरा हुआ है जिसे हम न्यूज़ीलैंड, न्यू कैलेडोनिया और कुछ ऑस्ट्रेलियाई द्वीपों के रूप में देख सकते हैं।

वर्तमान में जलमग्न ज़ीलैंडिया महाद्वीप का उत्तरी भाग तो ऑस्ट्रेलिया से जुड़ा हुआ है, जबकि दक्षिणी भाग अंटार्कटिका से सटा है।

आगे की खोज में 2019 में प्राप्त 50 से अधिक नमूनों को शामिल किया जाएगा जो ज़ीलैंडिया के भूगर्भीय इतिहास को जानने के लिए आवश्यक है। बहरहाल इस खुलासे के बाद भी शोधकर्ता ज़ीलैंडिया की वर्तमान समझ को एक धुंधली तस्वीर के रूप में देखते हैं और अतिरिक्त नमूनों और विश्लेषण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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प्राचीन सौर तूफान से तबाही के चिंह

गभग 14,300 साल पहले फ्रांस स्थित चीड़ के जंगल में एक असाधारण घटना घटी थी जिसके निशान हाल ही में उजागर हुए हैं। ‘मियाके इवेंट’ नामक इस घटना में सौर कणों की इतनी शक्तिशाली बमबारी हुई थी कि ऐसी घटना यदि आज हुई होती तो इससे संचार उपग्रह तो नष्ट होते ही, साथ में दुनिया भर की बिजली ग्रिड को भी गंभीर नुकसान हुआ होता। यह दिलचस्प जानकारी पेरिस स्थित कॉलेज डी फ्रांस के जलवायु विज्ञानी एडुआर्ड बार्ड के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन से मिली है। उन्होंने फ्रांस के आल्प्स जंगलों में नदी के किनारे दबे पेड़ों के वलयों की जांच करके यह जानकारी दी है।

ऐसा माना जाता है कि मियाके घटनाएं सूर्य द्वारा उत्सर्जित उच्च-ऊर्जा प्रोटॉन्स के परिणामस्वरूप होती हैं। क्योंकि आधुनिक समय में अभी तक ऐसी कोई भी घटना नहीं देखी गई है इसलिए वैज्ञानिक इस रहस्य को जानने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि सूरज से ऊर्जावान कणों के बौछार की घटनाएं देखी गई हैं लेकिन मियाके घटना अब तक ज्ञात दस सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। इसका ऊर्जा स्तर 1859 की सौर चुंबकीय कैरिंगटन घटना से भी अधिक था।

गौरतलब है कि सूरज से ऊर्जित कणों से सम्बंधित घटनाओं के सबूत पेड़ की वलयों और बर्फ के केंद्रीय भाग में दर्ज हो जाते हैं, जिसमें आवेशित सौर कण वायुमंडल के अणुओं से संपर्क में आने पर कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक, कार्बन-14 में वृद्धि करते हैं। कार्बन-14 समय के साथ क्षय होता रहता है और इसके क्षय की स्थिर दर इसे कार्बनिक पदार्थों की डेटिंग के लिए उपयोगी बनाती है। पेड़ की वलयों में कार्बन-14 की बढ़ी हुई मात्रा मियाके घटना की ओर इशारा करती है।

विशेषज्ञों के अनुसार आखिरी ग्लेशियल मैक्सिमम के अंत में बर्फ की चादरों के पिघलने से नदियों का बहाव तेज़ हो गया। बहाव के साथ आने वाली तलछट के नीचे ऑक्सीजन विहीन पर्यावरण में पेड़ों के तने संरक्षित रहे। ये पेड़ आज भी सीधे खड़े हैं। 172 पेड़ों से लिए गए कार्बन-14 नमूनों का अध्ययन करने पर 14,300 साल पहले कार्बन-14 की अतिरिक्त मात्रा का पता चला।

समय की सही गणना के लिए शोधकर्ताओं ने सौर गतिविधि के एक अन्य संकेतक – बर्फीली कोर में बेरीलियम-10 – अध्ययन किया और पाया कि कार्बन-14 और बेरीलियम-10 दोनों में वृद्धि एक ही समय दर्ज हुई हैं, जो अभूतपूर्व सौर गतिविधि का संकेत है।

फिलॉसॉफिकल ट्रांज़ेक्शन्स ऑफ रॉयल सोसायटी-ए में प्रकाशित यह खोज इसलिए दिलचस्प मानी जा रही है कि यह घटना अपेक्षाकृत शांत सौर हलचल के दौरान हुई। अनुमान है कि सूर्य की सतह के नीचे चुंबकीय क्षेत्र बनकर सौर तूफान के रूप में फूट गया होगा।

वैज्ञानिक सौर तूफानों की आवृत्ति और उसके नतीजों को बेहतर समझने का प्रयास कर रहे हैं। आज प्रौद्योगिकी पर हमारी अत्यधिक निर्भरता के कारण इनके परिणाम घातक हो सकते हैं। संचार, पॉवर ग्रिड और जीपीएस पर निर्भर वित्तीय बाज़ार अधिक प्रभावित होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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भूमिगत हाइड्रोजन भंडारों की खोज

मेरिका की एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी-एनर्जी (एआरपीए-ई) भूमिगत स्वच्छ हाइड्रोजन का पता लगाने के लिए 2 करोड़ डॉलर का निवेश कर रही है। यह निवेश स्वच्छ उर्जा उत्पादन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। एआरपीए-ई उन्नत ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान एवं विकास को वित्तीय सहायता प्रदान करने वाला एक सरकारी संस्थान है।

ऐसा माना जा रहा है कि हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन का एक विकल्प हो सकती है। लेकिन कम ऊर्जा घनत्व, उत्पादन के पर्यावरण प्रतिकूल तौर-तरीकों और बड़ी मात्रा में जगह घेरने के कारण हाइड्रोजन के उपयोग की कई चुनौतियां भी हैं। वर्तमान में हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक स्तर पर भाप और मीथेन की क्रिया से किया जाता है जिसमें कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है। इससे निपटने के लिए दुनिया भर में ब्लू हाइड्रोजन (जिसमें उत्पादन के दौरान उत्पन्न कार्बन डाईऑक्साइड को कैद कर लिया जाता है) और ग्रीन हाइड्रोजन (पानी के विघटन) जैसे तरीकों से स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन के प्रयास चल रहे हैं।

हाइड्रोजन उत्पादन की इस दौड़ में अब ‘भूमिगत’ या ‘प्राकृतिक’ हाइड्रोजन को खोजने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल साबित हो सकता है। हाल ही में पश्चिमी अफ्रीका स्थित माली के नीचे विशाल हाइड्रोजन क्षेत्र की खोज और पुराने बोरहोल में शुद्ध हाइड्रोजन की रहस्यमयी उपस्थिति ने इस क्षेत्र में पुन: रुचि उत्पन्न की है। फिलहाल हाइड्रोजन खोजी लोग महाद्वीपों के प्राचीन, क्रिस्टलीय कोर का अध्ययन कर रहे हैं। इन स्थानों पर लौह-समृद्ध चट्टानों में खोज चल रही है जो सर्पेन्टिनाइज़ेशन नामक प्रक्रिया से हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा दे सकते हैं।

गौरतलब है कि एआरपीए-ई कार्यक्रम मौजूदा भंडारों का पता लगाने पर नहीं बल्कि कृत्रिम ढंग से सर्पेन्टिनाइज़शन के माध्यम से हाइड्रोजन उत्पादन में तेज़ी लाने के तरीके खोजने पर केंद्रित है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि हाइड्रोजन उत्पादन दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से एआरपीए-ई फंडिंग का अधिकांश हिस्सा मॉडलिंग और प्रयोगशाला-आधारित अनुसंधान के लिए होगा। इसके अतिरिक्त, इन अभिक्रियाओं को समझने तथा भूपर्पटी में पदार्थों को इंजेक्ट करने से जुड़े जोखिमों का आकलन करने के लिए भी फंड निधारित किया गया है।

पिछले कुछ समय से प्राकृतिक हाइड्रोजन की खोज ने कई स्टार्टअप कंपनियों को जन्म दिया है। ये कंपनियां कम ताप और दाब पर हाइड्रोजन उत्पादन के तरीकों की खोज कर रही हैं जिनकी मदद से ओमान जैसे स्थानों में सतह के पास पाए जाने वाले लौह-समृद्ध भंडार से हाइड्रोजन उत्पन्न की जा सकेगी।

इस क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए कई प्रमुख तेल कंपनियां भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं। निवेश के उत्साह को देखते हुए पृथ्वी में छिपे हुए हाइड्रोजन भंडार की खोज में तेज़ी आएगी और हम भविष्य में एक स्वच्छ और लंबे समय तक प्राप्य ऊर्जा स्रोत की उम्मीद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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महाद्वीपों के अलग होने से फूटते हीरों के फव्वारे

प्राकृतिक हीरे पृथ्वी की सतह से लगभग 150 किलोमीटर नीचे अत्यधिक दाब और ताप वाली परिस्थिति में बनते हैं। ये हीरे किम्बरलाइट के रूप में पृथ्वी की सतह पर आ जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी प्रकार की कुछ शक्तिशाली घटनाओं ने माउंट वेसुवियस जैसे ज्वालामुखी विस्फोटों को जन्म दिया होगा।

साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय में पृथ्वी और जलवायु विज्ञान के प्रोफेसर थॉमस गर्नोन ने इन विस्फोटों और पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की गतिशीलता के बीच एक जुड़ाव पाया है। उनके अनुसार किम्बरलाइट अक्सर तब निकलते हैं जब टेक्टोनिक प्लेट्स पुनर्व्यवस्थित हो रही होती हैं, जैसे पैंजिया महाद्वीप के टूटने के दौरान। लेकिन दिलचस्प बात है कि ये विस्फोट टूटती टेक्टोनिक प्लेटों के किनारों पर नहीं बल्कि महाद्वीपों के मध्य में होते हैं जहां पृथ्वी की परत अधिक मज़बूत होती है और जिसे तोड़ना कठिन होता है।

यह एक बड़ा सवाल है कि इन टेक्टोनिक प्लेट टूटने या इधर-उधर होने के दौरान ऐसा क्या होता है जिससे ऐसी शानदार प्राकृतिक आतिशबाज़ी होती है?

इसे समझने के लिए गर्नोन की टीम ने पृथ्वी के इतिहास के लगभग 50 करोड़ वर्षों के पैटर्न की जांच की। उन्होंने पाया कि टेक्टोनिक प्लेटों के टूटकर अलग होने के लगभग 2.2 से 3 करोड़ वर्ष बाद किम्बरलाइट्स का विस्फोट चरम पर होता है।

उदाहरण के लिए, लगभग 18 करोड़ वर्ष पहले गोंडवाना महाद्वीप से टूटकर अलग हुए वर्तमान अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में अलगाव के लगभग 2.5 करोड़ वर्ष बाद किम्बरलाइट विस्फोटों में वृद्धि देखी गई थी। इसी तरह लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले पैंजिया अलग हुआ और उसके बाद उत्तरी अमेरिका में अधिक किम्बरलाइट विस्फोट देखे गए। खास बात यह है कि विस्फोट अलगाव के किनारों से शुरू होकर केंद्र की ओर बढ़ते हैं।

शोधकर्ताओं के लिए अगला काम इस पैटर्न को समझना था। इसके लिए पृथ्वी की पर्पटी के गहरे हिस्से और मेंटल के ऊपरी भाग का कंप्यूटर मॉडल तैयार किया गया। उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर होती हैं महाद्वीपीय पर्पटी का निचला भाग पतला होता जाता है। इस दौरान गर्म चट्टानें ऊपर उठती हैं और इस विभाजन सीमा के संपर्क में आने के बाद ठंडी होकर फिर से डूब जाती हैं। इस प्रक्रिया में परिसंचरण के स्थानीय क्षेत्र बनते हैं।

ये अस्थिर क्षेत्र आसपास के क्षेत्रों में भी अस्थिरता पैदा कर सकते हैं और धीरे-धीरे हज़ारों किलोमीटर दूर महाद्वीप के केंद्र की ओर खिसक सकते हैं। नेचर जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह निष्कर्ष किम्बरलाइट विस्फोटों के वास्तविक पैटर्न, छोर से शुरू होकर केंद्र की ओर, से मेल खाते हैं।

ये निष्कर्ष हीरे के अज्ञात भंडारों की खोज में उपयोगी हो सकते हैं तथा इनसे ज्वालामुखी विस्फोटों को समझने में भी मदद मिल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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हिंद महासागर में विशाल ‘गुरुत्वाकर्षण छिद्र’

हाल ही में शोधकर्ताओं ने हिंद महासागर में एक विशाल ‘छिद्र’ होने का दावा किया है। डरिए मत, यह कोई ऐसा छेद नहीं है जो महासागरों का सारा पानी बहा दे। यह तो बस एक शब्द है जिसका उपयोग भूवैज्ञानिक उस स्थान का वर्णन करने के लिए करते हैं जहां पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण औसत से कम होता है। इस नए अध्ययन के अनुसार इस स्थान की उत्पत्ति किसी प्राचीन महासागर तल के डूबते अवशेषों के छोर पर अफ्रीकी महाद्वीप के नीचे से उठने वाली पिघली हुई चट्टानों के गुबारों के कारण हुई है।

आम तौर पर पृथ्वी को गेंद की तरह गोल माना जाता है जिसकी सतह के प्रत्येक बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण एक समान होना चाहिए। लेकिन वास्तव में पृथ्वी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर थोड़ी पिचकी हुई है और भूमध्य रेखा के पास थोड़ी फूली हुई है। इसके अतिरिक्त, अलग-अलग क्षेत्रों में भूपर्पटी, मेंटल और कोर के द्रव्यमान के आधार पर वहां अलग-अलग गुरुत्वाकर्षण बल हो सकता है।

पृथ्वी पर स्थापित सेंसरों और उपग्रहों की मदद से विभिन्न स्थानों के गुरुत्वाकर्षण के मापन के आधार पर यह देखा गया कि अलग-अलग गुरुत्वाकर्षण खिंचावों के कारण समुद्र की सतह कैसी नज़र आएगी। इससे उच्च और निम्न गुरुत्वाकर्षण वाले स्थानों के मॉडल तैयार किए गए हैं जिन्हें ग्लोबल जीयॉइड कहा जाता है। इसके सबसे प्रसिद्ध मॉडलों में से एक ‘पॉट्सडैम ग्रेविटी पोटैटो’ के नाम से जाना जाता है।

इस मॉडल से हिंद महासागर के नीचे खोजे गए इंडियन ओशियन जियॉइड लो (आईओजीएल) पर पृथ्वी की सबसे प्रमुख गुरुत्वाकर्षण विसंगति पाई गई है। यह भारत के दक्षिणी छोर से लगभग 1200 किलोमीटर दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में 30 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है। इस स्थान पर पेंदे के गुरुत्वाकर्षण के कम खिंचाव और आसपास के क्षेत्र के उच्च गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के परिणामस्वरूप इस छिद्र के ऊपर हिंद महासागर का स्तर वैश्विक औसत से 106 मीटर नीचे है।

आईओजीएल की खोज 1948 में डच भूभौतिकीविद फेलिक्स एंड्रीज़ वेनिंग मीनेज़ द्वारा जहाज़-आधारित गुरुत्वाकर्षण सर्वेक्षण के दौरान की गई थी। अभी तक इसके कारणों की जानकारी नहीं थी। इसके लिए आईआईएससी, बैंगलुरु के देबंजन पाल और उनके सहयोगियों ने एक दर्जन से अधिक कंप्यूटर मॉडलों की मदद से पिछले 14 करोड़ वर्षों में पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने का अध्ययन किया और यह पता लगाया कि इस क्षेत्र का निर्माण कैसे हुआ है। हरेक मॉडल में पिघले हुए पदार्थ के प्रवाह के अलग-अलग आंकड़ों का उपयोग किया गया था। जियोफिजि़कल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार आईओजीएल की उत्पत्ति एक विशिष्ट मेंटल संरचना के कारण है। इसमें कुछ योगदान अफ्रीका के नीचे इससे सटी हुई हलचल का भी है जिसे लार्ज लो शीयर वेलोसिटी प्रॉविन्स (एलएलएसवीपी) या ‘अफ्रीकन ब्लॉब’ भी कहा जाता है। अफ्रीका के नीचे एलएलएसवीपी से आने वाली गर्म, कम घनत्व वाली सामग्री हिंद महासागर के नीचे बैठती गई है जिसने इस निम्न जियॉइड को जन्म दिया है।

आईओजीएल का निर्माण संभवत: मेंटल की गहराई में ‘टेथियन स्लैब’ द्वारा हुआ है। भूवैज्ञानिकों का अनुमान है कि ये स्लैब टेथिस महासागर के समुद्र तल के प्राचीन अवशेष हैं जो 20 करोड़ वर्ष से भी पहले लॉरेशिया और गोंडवाना महाद्वीपों के बीच स्थित था। उस समय अफ्रीका और भारत दोनों गोंडवाना का हिस्सा थे लेकिन वर्तमान भारत लगभग 12 करोड़ वर्ष पहले उत्तर में टेथिस महासागर की ओर बढ़ने लगा जिससे हिंद महासागर का निर्माण हुआ। शोधकर्ताओं का मानना है कि पिघली हुई चट्टान का गुबार तब उठा होगा जब पुराने टेथिस महासागर का स्लैब मेंटल के अंदर डूबकर कोर-मेंटल सीमा तक पहुंच गया।

संभावना है कि यह लगभग 2 करोड़ वर्ष पूर्व वजूद में आया होगा जब पिघली हुई चट्टानें ऊपरी मेंटल के भीतर फैलने लगी थीं। यह तब तक जारी रहा जब तक अफ्रीकी ब्लॉब से मेंटल सामग्री बहती रही। लेकिन जब यह प्रवाह बंद हुआ तब यह स्थान भी स्थिर हो गया। (स्रोत फीचर्स)

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भूजल दोहन से पृथ्वी के झुकाव में परिवर्तन!

पनी धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी एक लट्टू की तरह डोलती भी है। पृथ्वी के केंद्र में मौजूद पिघला लोहा, पिघलती बर्फ, समुद्री धाराएं और यहां तक कि बड़े-बड़े तूफान भी इस धुरी को भटकाने का कारण बनते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने पाया है कि ध्रुवों के विचलन में एक इन्सानी गतिविधि – भूजल का दोहन – की भी उल्लेखनीय भूमिका है।

कल्पना कीजिए कि आप अपनी उंगली पर बास्केटबॉल को घुमा रहे हैं। यह अपनी धुरी पर सीधी घूमती रहेगी। लेकिन एक तरफ भी थोड़ी हल्की या भारी हो जाए तो यह असंतुलित होकर डोलने लगेगी और धुरी की दिशा बदल जाएगी। ठीक इसी तरह पृथ्वी की धुरी भी डोलती है जिसके कारण हर साल उत्तरी ध्रुव लगभग 10 मीटर के एक वृत्त पर भटकता रहता है। और इस वृत्त का केंद्र भी सरकता रहता है। हाल ही में पता चला है कि यह केंद्र आइसलैंड की दिशा में प्रति वर्ष लगभग 9 सेंटीमीटर सरक रहा है।

ऑस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय के भूविज्ञानी क्लार्क आर. विल्सन इसका एक कारण हर वर्ष सैकड़ों टन भूजल के दोहन को मानते हैं। इसके प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने नए बांधों और बर्फ पिघलने के कारण जलाशयों के भरने जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए ध्रुवों के भटकने का एक मॉडल बनाया। उनका उद्देश्य 1993 से 2010 के बीच देखे गए ध्रुवीय विचलन को समझना था।

इस मॉडल की मदद से उन्होंने पाया कि बांध और बर्फ में हुए परिवर्तन ध्रुवीय विचलन की व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं थे। लेकिन जब उन्होंने इसी दौरान पंप किए गए 2150 गीगाटन भूजल को इस मॉडल में डाला तो ध्रुवीय गति वैज्ञानिकों के अनुमानों के काफी निकट पाई गई।

शोधकर्ताओं के अनुसार महासागरों में पानी के भार के पुनर्वितरण के कारण पृथ्वी की धुरी इस अवधि में लगभग 80 सेंटीमीटर खिसक गई है। जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स की रिपोर्ट के अनुसार ग्रीनलैंड या अंटार्कटिका में बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पहुंचने वाले पानी की तुलना में भूजल दोहन ने ध्रुवों को खिसकाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

इसका अधिक प्रभाव इसलिए भी देखने को मिला क्योंकि अधिकांश पानी उत्तरी मध्य अक्षांशों से निकाला गया था। मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत और पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका वे इलाके हैं जहां भूजल का ह्रास सर्वाधिक हुआ है। यदि भूजल को भूमध्य रेखा या ध्रुवों के करीब से निकला जाता तो यह प्रभाव कम होता।

शोधकर्ताओं का कहना है कि धुरी में यह बदलाव इतना नहीं है कि मौसमों पर असर पड़े लेकिन इससे अन्य परिघटनाओं के मापन में मदद मिलेगी। इस अध्ययन से यह जांचने में भी मदद मिलेगी कि भूजल निकासी की वजह से समुद्र स्तर में कितनी वृद्धि हुई है। इस नए अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि भूजल निकासी की वजह से 1993 से 2010 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 6 मिलीमीटर की वृद्धि हुई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान समाचार संकलन: मई-जून 2023

अमेरिका में नमभूमियों की सुरक्षा में ढील

मेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले ने क्लीन वॉटर एक्ट के अंतर्गत शामिल दलदली क्षेत्रों की परिभाषा को संकीर्ण कर दिया है। इस फैसले से नमभूमियों को प्राप्त संघीय सुरक्षा कम हो गई है। बहुमत द्वारा दिया गया यह फैसला कहता है कि क्लीन वॉटर एक्ट सिर्फ उन नमभूमियों पर लागू होगा जिनका आसपास के विनियमित जल के साथ निरंतर सतही जुड़ाव है जबकि फिलहाल एंजेंसियों का दृष्टिकोण रहा है कि नमभूमि की परिभाषा में वे क्षेत्र भी शामिल हैं जिनका किसी तरह का जुड़ाव आसपास के सतही पानी से है। इस निर्णय से मतभेद रखने वाले न्यायाधीशों का मानना है कि यह नया कानून जलमार्गों के आसपास की नमभूमियों की सुरक्षा को कम करेगा और साथ ही प्रदूषण तथा प्राकृतवासों के विनाश को रोकने के प्रयासों को भी कमज़ोर करेगा। वर्तमान मानकों के पक्ष में जो याचिका दायर की गई थी उसके समर्थकों ने कहा है कि इस फैसले से 180 करोड़ हैक्टर नमभूमि यानी पहले से संरक्षित क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से से संघीय नियंत्रण समाप्त हो जाएगा। कई वैज्ञानिकों ने फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि इस फैसले में नमभूमि जल विज्ञान की जटिलता को नज़रअंदाज़ किया गया है। (स्रोत फीचर्स)

दीर्घ-कोविड को परिभाषित करने के प्रयास

कोविड-19 से पीड़ित कई लोगों में लंबे समय तक विभिन्न तकलीफें जारी रही हैं। इसे दीर्घ-कोविड कहा गया है। इसने लाखों लोगों को कोविड-19 से उबरने के बाद भी लंबे समय तक बीमार या अक्षम रखा। अब वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने दीर्घ-कोविड के प्रमुख लक्षणों की पहचान कर ली है। दीर्घ-कोविड से पीड़ित लगभग 2000 और पूर्व में कोरोना-संक्रमित 7000 से अधिक लोगों की रिपोर्ट का विश्लेषण कर शोधकर्ताओं ने 12 प्रमुख लक्षणों की पहचान की है। इनमें ब्रेन फॉग (भ्रम, भूलना, एकाग्रता की कमी वगैरह), व्यायाम के बाद थकान, सीने में दर्द और चक्कर आने जैसे लक्षण शामिल हैं। अन्य अध्ययनों ने भी इसी तरह के लक्षण पहचाने हैं। दी जर्नल ऑफ दी अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित इस अध्ययन का उद्देश्य एक मानकीकृत परिभाषा और दस पॉइन्ट का एक पैमाना विकसित करना है जिसकी मदद से इस सिंड्रोम का सटीक निदान किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)

निजी चंद्र-अभियान खराब सॉफ्टवेयर से विफल हुआ

त 25 अप्रैल को जापानी चंद्र-लैंडर की दुर्घटना के लिए सॉफ्टवेयर गड़बड़ी को दोषी बताया जा रहा है। सॉफ्टवेयर द्वारा यान की चंद्रमा की धरती से ऊंचाई का गलत अनुमान लगाया गया और यान ने अपना ईंधन खर्च कर दिया। तब वह चंद्रमा की सतह से लगभग 5 किलोमीटर ऊंचाई से नीचे टपक गया। यदि सफल रहता तो हकोतो-आर मिशन-1 चंद्रमा पर उतरने वाला पहला निजी व्यावसायिक यान होता। कंपनी अब 2024 व 2025 के अभियानों की तैयारी कर रही है, जिनमें इस समस्या के समाधान पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

यूएई द्वारा क्षुद्रग्रह पर उतरने योजना

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की स्पेस एजेंसी मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित सात क्षुद्रग्रहों के अध्ययन के लिए एक अंतरिक्ष यान का निर्माण करने की योजना बना रही है। 2028 में प्रक्षेपित किया जाने वाला यान यूएई का दूसरा खगोलीय मिशन होगा। इससे पहले होप अंतरिक्ष यान लॉन्च किया गया था जो वर्तमान में मंगल ग्रह की कक्षा में है। इस नए यान को दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के नाम पर एमबीआर एक्सप्लोरर नाम दिया जाएगा।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यान 2034 में जस्टिशिया नामक लाल रंग के क्षुद्रग्रह पर एक छोटे से लैंडर को उतारेगा। इस क्षुद्रग्रह पर कार्बनिक पदार्थों के उपस्थित होने की संभावना है।

एमबीआर एक्सप्लोरर का निर्माण संयुक्त अरब अमीरात द्वारा युनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो बोल्डर के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

डब्ल्यूएचओ द्वारा फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन का आग्रह

त 29 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक प्रस्ताव पारित करके सदस्य देशों से खाद्य पदार्थों में फोलिक एसिड मिलाने का आग्रह किया है। यह प्रस्ताव स्पाइना बाईफिडा जैसी दिक्कतों की रोकथाम के लिए दिया गया है जो गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में एक प्रमुख विटामिन की कमी से होती हैं। फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन के प्रमाणित लाभों को देखते हुए इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से अपनाया गया। वर्तमान में डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में से केवल 69 देशों में फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन अनिवार्य किया गया है जिसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूएसए और कोलंबिया शामिल हैं। इस प्रस्ताव में खाद्य पदार्थों को आयोडीन, जस्ता, कैल्शियम, लौह और विटामिन ए और डी से साथ फोर्टिफाई करने का भी आह्वान किया गया है ताकि एनीमिया, अंधत्व और रिकेट्स जैसी तकलीफों की रोकथाम की जा सके। (स्रोत फीचर्स)

एक्स-रे द्वारा एकल परमाणुओं की जांच की गई

क्स-रे अवशोषण की मदद से पदार्थों का अध्ययन तो वैज्ञानिक करते आए हैं। लेकिन हाल ही में अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी को एकल परमाणुओं पर आज़माया गया है। नेचर में प्रकाशित इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने लोहे और टर्बियम परमाणुओं वाले कार्बनिक अणुओं के ऊपर धातु की नोक रखी। यह नोक कुछ परमाणुओं जितनी चौड़ी थी और कार्बनिक पदार्थ से मात्र चंद नैनोमीटर ऊपर थी। फिर इस सैम्पल को एक्स-रे से नहला दिया गया जिससे धातुओं के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हुए। जब नोक सीधे धातु के परमाणु पर मंडरा रही थी तब उत्तेजित इलेक्ट्रॉन परमाणु से नोक की ओर बढ़े जबकि नीचे लगे सोने के वर्क से परमाणु उनकी जगह लेने को प्रवाहित हुए। एक्स-रे की ऊर्जा के साथ इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में परिवर्तन को ट्रैक करके धातु के परमाणुओं के आयनीकरण की अवस्था को निर्धारित करने के अलावा यह पता लगाया गया कि ये परमाणु अणु के अन्य परमाणुओं से कैसे जुड़े थे। (स्रोत फीचर्स)

कोविड-19 अध्ययन संदेहों के घेरे में

कोविड-19 महामारी के दौरान विवादास्पद फ्रांसीसी सूक्ष्मजीव विज्ञानी डिडिएर राउल्ट ने कोविड  रोगियों पर मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एंटीबायोटिक एज़िथ्रोमाइसिन के प्रभावों का अध्ययन किया था। 28 मई को ले मॉन्ड में प्रकाशित एक खुले पत्र में 16 फ्रांसीसी चिकित्सा समूहों और अनुसंधान संगठनों ने इस अध्ययन की आलोचना करते हुए कहा है कि यह अब तक का सबसे बड़ा ज्ञात अनाधिकृत क्लीनिकल परीक्षण था। उन्होंने कार्रवाई की गुहार लगाई है। खुले पत्र के अनुसार उक्त दवाओं के अप्रभावी साबित होने के लंबे समय बाद भी 30,000 रोगियों को ये दी जाती रहीं और क्लीनिकल परीक्षण सम्बंधी नियमों का पालन नहीं किया गया। फ्रांसीसी अधिकारियों के अनुसार इस क्लीनिकल परीक्षण को युनिवर्सिटी हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट मेडिटेरेनी इंफेक्शन (जहां राउल्ट निदेशक रहे हैं) द्वारा की जा रही तहकीकात में शामिल किया जाएगा। राउल्ट का कहना है कि अध्ययन में न तो नियमों का उल्लंघन हुआ और न ही यह कोई क्लीनिकल परीक्षण था। यह तो रोगियों के पूर्व डैटा का विश्लेषण था। (स्रोत फीचर्स)

बढ़ता समुद्री खनन और जैव विविधता

पूर्वी प्रशांत महासागर में एक गहरा समुद्र क्षेत्र है जिसे क्लेरियन-क्लिपर्टन ज़ोन कहा जाता है। यह आकार में अर्जेंटीना से दुगना बड़ा है। वर्तमान में इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर वाणिज्यिक खनन जारी है जो इस क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों के लिए खतरा है।

इस क्षेत्र में पेंदे पर रहने वाली (बेन्थिक) 5000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से मात्र 436 को पूरी तरह से वर्णित किया गया है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में शोध यात्राओं के दौरान एकत्र किए गए लगभग 1,00,000 नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने ये आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। बेनाम प्रजातियों में बड़ी संख्या क्रस्टेशियन्स (झींगे, केंकड़े आदि) और समुद्री कृमियों की है।

यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले बहु-धातुई पिंडों से भरा पड़ा है जिनमें निकल, कोबाल्ट और ऐसे तत्व मौजूद हैं जिनकी विद्युत वाहनों के लिए उच्च मांग है। इन्हीं के खनन के चलते पारिस्थितिक संकट पैदा हो रहा है। इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी ने इस क्षेत्र में 17 खनन अनुबंधों को मंज़ूरी दी है और उम्मीद की जा रही है कि अथॉरिटी जल्द ही गहरे समुद्र में खनन के लिए नियम जारी कर देगी। (स्रोत फीचर्स)

जीन-संपादित फसलें निगरानी के दायरे में

मेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी की हालिया घोषणा के अनुसार अब कंपनियों को बाज़ार में उतारने से पहले उन फसलों का भी डैटा जमा करना आवश्यक होगा जिन्हें कीटों से सुरक्षा हेतु जेनेटिक रूप से संपादित किया गया है। पूर्व में यह शर्त केवल ट्रांसजेनिक फसलों पर लागू होती थी। ट्रांसजेनिक फसल का मतलब उन फसलों से है जिनमें अन्य जीवों के जीन जोड़े जाते हैं। अलबत्ता, जेनेटिक रूप से संपादित उन फसलों को इस नियम से छूट रहेगी जिनमें किए गए जेनेटिक परिवर्तन पारंपरिक प्रजनन के माध्यम से भी किए जा सकते हों। लेकिन अमेरिकन सीड ट्रेड एसोसिएशन का मानना है कि इस छूट के बावजूद कागज़ी कार्रवाई तो बढ़ेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वायुमंडल में ज़मीनी विस्फोटों पर निगरानी

हाल ही में वैज्ञानिकों ने वायुमंडल में 100 किलोमीटर ऊपर स्थित आयनमंडल में भूमि पर होने वाले हल्के धमाके महसूस भी कर लिए हैं। इससे लगता है कि अब रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से हल्की विस्फोटक (प्राकृतिक हों या मानवजनित) घटनाओं पर भी नज़र रखी जा सकेगी।

वायुमंडल का आयनमंडल औरोरा (मेरुज्योति) का गढ़ है। यह तब बनता है जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण परमाणुओं से टकराते हैं और उन्हें आलोकित करते हैं। लेकिन भूमि पर होने वाले विस्फोट भी आयनमंडल में खलल डाल सकते हैं। 2022 में, दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित हुंगा टोंगा-हुंगा हाआपाई ज्वालामुखी विस्फोट ने आयनमंडल में हिलोरें पैदा कर दी थीं। 1979 में, आयनमंडल में पैदा हुई हलचल इस्राइली-दक्षिण अफ्रीकी परमाणु परीक्षण से जुड़ी हुई पाई गई थी।

दोनों धमाकों से इन्फ्रासाउंड तरंगें निकली थीं, जो काफी दूर तक जाती हैं और आयनमंडल में कंपन पैदा कर सकती हैं। आयनमंडल के आवेशित कणों से टकराकर वापिस लौटने वाली तरंगों की मदद से इन विस्फोटों को रिकॉर्ड किया गया था। लेकिन इस तकनीक से एक किलोटन टीएनटी से अधिक शक्तिशाली विस्फोट ही पहचाने जा सकते थे, इससे हल्के विस्फोट नहीं। (हिरोशिमा पर गिराया गया परमाणु बम 15 किलोटन का था।)

अर्थ एंड साइंस पत्रिका में प्रकाशित हालिया शोध में शोधकर्ताओं ने 1 टन टीएनटी के प्रायोगिक विस्फोटों का सफलतापूर्वक पता लगा लिया है। इसके लिए वायु सेना अनुसंधान प्रयोगशाला के केनेथ ओबेनबर्गर और उनके साथियों ने 2022 में 1-1 टन के दो विस्फोटों के प्रभावों का निरीक्षण करने के लिए राडार डिटेक्टरों को आयनमंडल में हलचल के कारण पैदा होने वाली तरंगों को मापने के लिए डिज़ाइन किया। इस डिज़ाइन से उन्हें विस्फोट होने के 6 मिनट के भीतर विस्फोट के संकेत मिल गए थे।

उम्मीद है कि इसकी मदद से छोटे मानव जनित विस्फोटों या प्रशांत महासागर के सुदूर क्षेत्र में स्थित ज्वालामुखी विस्फोटों की निगरानी की जा सकेगी, जो अन्यथा मुश्किल होता है। इसके अलावा, इसकी मदद से भूकंपों का पता भी लगा सकते हैं जिनके कारण सुनामी, भूस्खलन और अन्य आपदाएं हो सकती हैं।

इसका एक अन्य संभावित उपयोग ग्रह विज्ञान में हो सकता है। शुक्र जैसे ग्रह, जहां घने बादलों के कारण सतह को स्पष्ट देखना मुश्किल है, की कक्षा में आयनमंडल राडार स्थापित कर विस्फोटों और भूकंपों का पता लगाया जा सकता है।

फिलहाल, ओबेनबर्गर शोध को पृथ्वी आधारित ही रखना चाहते हैं। वे विभिन्न मौसमों में इस तकनीक के परीक्षण की योजना बना रहे हैं, क्योंकि साल भर में आयनमंडल बदलता रहता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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