एक छोटे से पौधे के साथ जीव विज्ञान में चहलकदमी 

डॉ. किशोर पंवार, डॉ. सुशील जोशी

रेबिडॉप्सिस थेलियाना को वनस्पति विज्ञान में वही स्थान हासिल है जो जंतु विज्ञान में ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर (फल मक्खी) और सेनोरेब्डाइटिस एलेगेंस (गोल कृमि) को दिया गया है। तीनों ही प्रमुख मॉडल जीव हैं; जीव विज्ञान अनुसंधान के सेलिब्रिटी हैं। एरेबिडॉप्सिस थेलियाना एक द्विबीजपत्री पौधा है जिसे थेल क्रेस (thale cress) और माउस ईयर क्रेस (mouse ear cress) भी कहते हैं। सरसों कुल (ब्रेसीकेसी) का यह पौधा यूरेशिया और अफ्रीका का मूल निवासी है। भारत में यह उत्तर भारत में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। आप जब नर्सरी से पौधे खरीद कर लाते हैं तो साथ में यह भी चला आता है। यहां हम इसी पौधे के बहाने जीव विज्ञान के विभिन्न पड़ावों की सैर करेंगे।

रूपरंग और आकार

एरेबिडॉप्सिस थेलियाना एक छोटा शाकीय वार्षिक पौधा है जो आम तौर पर 15 से 30 सेंटीमीटर लंबा हो सकता है। पौधे के आधार पर पत्तियां एक गुच्छे (रोज़ेट) के रूप में जमी होती हैं, जबकि ऊपरी तने पर थोड़ी संख्या में होती हैं।

जीव विज्ञान अनुसंधान में इस पौधे के महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन 1964 में ही एरेबिडॉप्सिस सूचना सेवा नामक एक समाचार पत्र शुरू किया जा चुका था। एक और बात – जिन शोध पत्रों के शीर्षक, एब्स्ट्रेक्ट या प्रमुख शब्दों की सूची में एरेबिडॉप्सिस थैलियाना का नाम आता है उनकी संख्या 54,000 से ज़्यादा है। और यह साल 1975 से 2015 का आंकड़ा है। यानी प्रति वर्ष इस पौधे पर लगभग 1000 शोध पत्र प्रकाशित होते रहे हैं। तो अब तक कुल शोध पत्रों की संख्या 65,000 पार कर गई होगी।

कुछ खास बातें

इसका जीनोम छोटे आकार का है और द्विगुणित होने के कारण यह आनुवंशिक मैपिंग और जीनों के अनुक्रमण को जानने समझने के लिए उपयोगी है। द्विगुणित (डिप्लॉइड) का मतलब है कि इसमें प्रत्येक गुणसूत्र जोड़ों में पाया जाता है। (अधिकांश पौधों में गुणसूत्रों की कई प्रतियां होती हैं।) एरेबिडॉप्सिस में केवल पांच गुणसूत्र (डिप्लॉइड संख्या 10) और लगभग 13.5 करोड़ क्षार जोड़ियां पाई जाती हैं। लंबे समय तक इसके जीनोम को सबसे छोटा जीनोम माना गया था परंतु अब एक मांसाहारी पौधे जेनेलिया ट्यूबरोसिया (जीनोम में लगभग 6.1 करोड़ क्षार जोड़ियां) ने इसका स्थान ले लिया है। सन 2000 में यह वह पहला पौधा बन गया जिसके पूरे जीनोम (27,407 जीनों) का अनुक्रमण किया गया था। अंतरिक्ष यात्रा करने वाला भी यह पहला पौधा था – 1982 में सोवियत सेल्यूट-7 अंतरिक्ष स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्रियों ने इसे उगाया था और बीज प्राप्त किए थे। इस तरह से यह शून्य गुरुत्व की परिस्थिति में फलने-फूलने वाला पौधा बन गया था। और तो और, पादप विज्ञान का यह मॉडल पौधा 2019 में चांग ई-4 लैंडर के साथ चांद की सैर भी कर चुका है।

एरेबिडॉप्सिस को सबसे पहले 1943 में एक जर्मन वैज्ञानिक फ्रेडरिक लायबैक (Friedrich Laibach) ने आनुवंशिकी अध्ययन के लिए एक मॉडल जीव के रूप में प्रस्तावित किया था। अलबत्ता, मॉडल जीव के रूप में इसके उपयोग को पूर्णत: स्थापित करने का काम मिसौरी विश्वविद्यालय के जॉर्ज रिडे (George Rédei) के शोध की बदौलत हुआ। 1965 में एरेबिडॉप्सिस को लेकर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जर्मनी के गॉटिंजेन मे आयोजित हुआ था लेकिन इसे एक मॉडल जीव के रूप में मान्यता 1980 के दशक में मिली। यह पौधा विकास और शारीरिकी की जटिलताओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ है।

छोटा जीवनचक्र

एरेबिडॉप्सिस का जीवनचक्र बहुत ही छोटा है – बीज अंकुरण से लेकर फिर से बीज बनने तक लगभग 6 सप्ताह में इसका जीवनचक्र पूरा हो जाता है। प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में इसे उगाना आसान है, इसके लिए बहुत ज़्यादा जगह या संसाधनों की ज़रूरत नहीं पड़ती। प्रत्येक पौधे में हज़ारों बीज बनते हैं। इसके कई उत्परिवर्ती संस्करण (म्यूटैन्ट) ज्ञात हैं और क्रिस्पर कास-9 जैसी उन्नत विधियों की उपलब्धता के चलते जीन्स के कार्य और परस्पर क्रिया का अध्ययन करने के लिए यह एक आदर्श पौधा है। चूंकि यह एक स्व-परागित पौधा है; अतः आनुवंशिक स्थिरता को बनाए रखने और प्रकट लक्षणों को देखने में भी यह मददगार होता है।

एरेबिडॉप्सिस के अध्ययन से पादप विकास में भ्रूण जनन, पत्तियों और फूलों के विकास तथा जड़ संरचना के बारे में कई नई जानकारियां उपलब्ध हुई है। आइए कुछ महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को देखें।

परिवर्धन

वैसे तो पादप परिवर्धन का अध्ययन सदियों से होता आया है लेकिन आज हम कोशिकाओं के विभेदन, पैटर्न निर्माण, कोशिका विभाजन के नियंत्रण तथा पर्यावरण व पौधों के परिवर्धन के सम्बंध में जो कुछ जानते हैं, वह एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों की बदौलत है। इसकी मदद से पादप विकास के नए-नए मार्ग और कारक पहचाने गए हैं। उदाहरण के लिए, लघु-आरएनए और उनके लक्षित जीन्स के बीच सम्बंधों के आधार पर यह पहचाना गया कि सूक्ष्म-आरएनए (mi-RNA) परिवर्धन के कई स्थान सम्बंधी (spatial) तथा समयगत (temporal) पहलुओं का नियमन करते हैं।

फूलों का विकास

एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण योगदान फूलों के विकास के एबीसी (ABC) मॉडल को समझने में रहा है। एबीसी मॉडल को 1990 के दशक में जॉन बोमैन, डेविड स्माइथ और एलियट मेयरोविट्ज़ (John Bowman, David Smyth, Elliot Meyerowitz) ने प्रस्तावित किया था। इसके अनुसार तीन वर्गों के जीन्स (ए, बी और सी) फूलों के विभिन्न अंगों (अंखुड़ियां, पंखुड़ियां, पुंकेसर और बीजांड कोश) के निर्माण का नियंत्रण करते हैं। इनमें से ‘ए’ वर्ग के जीन्स का कार्य केवल अंखुड़ियों का निर्माण करना है, जबकि ‘ए’ और ‘बी’ वर्ग के जीन्स मिलकर पंखुड़ियां बनाते हैं। ‘बी’ और ‘सी’ वर्ग के जीन मिलकर पुंकेसर को पहचान देते हैं तथा ‘सी’ वर्ग का कार्य स्त्रीकेसर (जिसमें अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र होते हैं) का निर्माण करना है।

शोधकर्ताओं ने एरेबिडॉप्सिस में अलग-अलग जीन वर्गों को निष्क्रिय करके असर देखे। फूलों के विकास का ‘एबीसी’ मॉडल एरेबिडॉप्सिस तथा एंटीराइनम मैजस (Antirrhinum majus) में एबीसी जीन के क्लोनिंग का परिणाम है। इसकी मदद से यह स्पष्ट हुआ कि अंगों में विभेदन का नियंत्रण ट्रांसक्रिप्शन (डीएनए से प्रोटीन संश्लेषण का एक चरण जिसमें डीएनए से आरएनए बनता है) के ज़रिए होता है और ऐसे ही कई कारकों के मिले-जुले प्रभाव से कोशिकीय विभेदन होता है। जैसे 2013 में एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से यह पता चला था कि पंखुड़ियों की शुरुआत ऑक्सिन की वजह से होती है।

प्रकाशग्राहियों की खोज

एरेबिडॉप्सिस पर किए गए अनुसंधान से क्रिप्टोक्रोम्स की खोज हुई। क्रिप्टोक्रोम्स, दरअसल, नीले प्रकाश के ग्राही होते हैं और पौधों की वृद्धि तथा विकास को नियंत्रित करते हैं। मार्गरेट अहमद (Margaret Ahmad) और एंथनी कैशमोर (Anthony R. Cashmore)ने एरेबिडॉप्सिस में क्रिप्टोक्रोम-1 (CRY1) को पहचाना था जिससे हमें प्रकाश-निर्भर वृद्धि की प्रक्रिया को समझने में मदद मिली। यह प्रकाशग्राही बीजों के अंकुरण व पुष्पन में अहम भूमिका निभाता है।

हालांकि पौधों में फूल आने के लिए दिन की उपयुक्त लंबाई का संकेत देने वाला प्रकाशग्राही (R/FR संवेदी फायटोक्रोम) अन्य पौधों में खोज लिया गया था लेकिन इसके जीन की संरचना का खुलासा तो एरेबिडॉप्सिस की मदद से हुआ था।

जेनेटिक अनुसंधान

1980 के दशक में आणविक जीव विज्ञान का उदय हुआ और इसके साथ ही एक मॉडल जीव के रूप में एरेबिडॉप्सिस की प्रतिष्ठा और बढ़ी। इसका जीनोम छोटा-सा है (महज़ 13.5 करोड़ क्षार जोड़ियां) और इसमें फालतू जोड़ियां बहुत कम होती हैं। 1996 में एरेबिडॉप्सिस जीनोम इनिशिएटिव की स्थापना के बाद सन 2000 तक इसके पूरे जीनोम का अनुक्रमण कर लिया गया था। इसके बाद तो यह और भी महत्वपूर्ण हो गया। इस पौधे का उपयोग जीन्स के कामकाज, जीनोम के संगठन, पौधों में उनके नियमन और विभिन्न प्रजातियों के बीच वैकासिक सम्बंध खोजने में होने लगा। अनुसंधान ने हमें पादप विकास, कार्यिकी और पर्यावरण के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद दी। इस संदर्भ में लघु आरएनए और सूक्ष्म आरएनए की चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

एपिजेनेटिक्स

एपिजेनेटिक्स का मतलब होता है कि जेनेटिक कारकों का मात्र जीन्स की रचना से इतर नियंत्रण। एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान से विकास की कई प्रक्रियाओं में क्रोमेटिन नियामक प्रोटीन्स की भूमिका सामने आई है। जैसे विकास की अवस्था का परिवर्तन, कोशिका की पहचान में परिवर्तन और तनाव के प्रति प्रतिक्रिया का शुरू होना। इन प्रयोगों से एक समझ यह उभरी है कि क्रोमेटिन नियामकों के परस्पर विपरीत रूप होते हैं – एक जो डीएनए के किसी हिस्से तक पहुंच को बाधित करते हैं और दूसरे वे जो उसी हिस्से तक पहुंच को सुगम बनाते हैं। इनकी क्रिया का परिणाम होता है कि उचित प्रोटीन्स, उचित समय पर, उचित कोशिकाओं में सही परिवेश में बनते हैं। इसका एक उदाहरण फूल बनने की प्रक्रिया में देखा जा सकता है।

एपिजेनेटिक नियंत्रण का एक मार्ग डीएनए मिथाइलेशन का है। डीएनए मिथाइलेशन में डीएनए के एक विशिष्ट भाग में मिथाइल समूह जुड़ जाता है, जिससे जीन की अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। यह प्रक्रिया डीएनए के अनुक्रम में बिना किसी बदलाव के जीन के चालू या बंद होने को नियंत्रित कर सकती है। एरेबिडॉप्सिस इसे समझने का एक प्रमुख मॉडल रहा है। डीएनए मिथाइलेशन के चार एंज़ाइम इसी मॉडल में पहचाने गए।

पादप प्रतिरक्षा तंत्र

जब कोई रोगजनक शरीर में घुसे तो उसे पहचानने के लिए ज़रूरी होता है कि उस रोगजनक द्वारा बनाए गए किसी अणु को पहचाना जाए। एरेबिडॉप्सिस पर हुए अनुसंधान से पादप प्रतिरक्षा तंत्र को समझने में बहुत मदद मिली है। इसके अलावा, इसी अनुसंधान ने यह भी स्पष्ट किया है कि पौधे चबाने/कुतरने वाले जंतुओं पर किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं। एरेबिडॉप्सिस पर प्रयोगों से पता चला है कि चबाने-कुतरने वाले जंतुओं से रक्षा के लिए पौधे विविध रणनीतियां अख्तियार करते हैं। इनमें विषैले पदार्थ बनाना, अपनी कोशिका भित्तियों को मज़बूत करना या पत्तियों पर रोम (ट्राइकोम्स) उत्पन्न करना, कुतरने वाले जंतु के कुदरती शत्रुओं को आमंत्रित करना, कुतरने वाले जीव द्वारा पैदा कंपनों को पहचानकर अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को तेज़ करना वगैरह शामिल हैं।

पहले तो पादप-रोगजनक अंतर्क्रिया के अध्ययन के इस तरह के प्रस्तावों को शंका की नज़र से देखा जाता था क्योंकि माना जाता था कि इसका सम्बंध फसली पौधों से होने की संभावना बहुत कम है। लेकिन इस मामले में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि तब सामने आई जब एरेबिडॉप्सिस में से पहला इंट्रासेल्यूलर (यानी कोशिका के अंदर पाया जाने वाला) ग्राही खोजा गया और उसे पृथक कर लिया गया। इससे पता चला कि संक्रमण को थामने की क्रिया में कई परस्पर सम्बंधित प्रोटीन्स की मध्यस्थ भूमिका होती है। अब इन्हें एनएलआर (NLR) यानी न्यूक्लियोटाइड बाइंडिंग डोमैन ल्यूसीन-रिच रिपीट रिसेप्टर प्रोटीन्स कहा जाता है। आगे चलकर यह भी पता चला कि इन प्रोटीन्स के जीन्स डीएनए के उन्हीं बिंदुओं पर होते हैं जो सदियों से रोग-प्रतिरोधी पौध प्रजातियों के विकास के केंद्र में रहे हैं। फिर एरेबिडॉप्सिस में से फ्लेजेलिन ग्राही प्राप्त किया गया और बात आगे बढ़ी। फ्लेजेलिन ग्राही एक प्रोटीन है जो बैक्टीरिया के चाबुकनुमा उपांग फ्लेजेला के एक प्रमुख घटक फ्लेजेलिन से जुड़ जाता है। इससे जंतुओं और पौधों दोनों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सक्रिय होती है। यह भी पता चला कि कुछ रोगजनक ऐसे अणु पौधे में डाल देते हैं जो उनकी प्रतिरक्षा को तहस-नहस करते हैं। आज पादप प्रतिरक्षा तंत्र को परखने की सबसे उम्दा कसौटी एरेबिडॉप्सिस ही है।

कोशिकाओं में संवाद व हारमोन

कोशिकाओं के बीच संवाद भी शोध का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। आज हम जानते हैं कि ऐसा संवाद मात्र पुराने पादप हारमोन के दम पर नहीं बल्कि नए-नए खोजे गए हारमोन्स की मध्यस्थता से भी होता है। इस संदर्भ में दो हारमोन ब्रासिनोस्टेरॉइड्स (Brassinosteroids) एवं स्ट्रिगोलैक्टोन्स (Strigolactones) के नाम बताए जा सकते हैं। संकेतक अणुओं की विविधता, उनके परिवहन के तरीके और एक-दूसरे पर उनके प्रभाव स्पष्ट करने में एरेबिडॉप्सिस पर हुए प्रयोगों की अहम भूमिका रही है।

उदाहरण के लिए, एरेबिडॉप्सिस की जड़ों में कोशिकाओं की नियति और पैटर्न निर्माण के अध्ययन से हम लघु नियमनकर्ता आरएनए और गतिशील ट्रांसक्रिप्शन कारकों को पहचान पाए हैं जिनकी गति तथा परस्पर क्रियाएं ऊतकों के पैटर्न को निर्धारित करती हैं।

पादप हारमोन की खोज व अध्ययन में एरेबिडॉप्सिस की प्रमुख भूमिका रही है। पादप हारमोन ऐसी विविध संरचना वाले छोटे अणु होते हैं जो जीव में काफी दूर स्थित जगहों पर वृद्धि, परिवर्धन और पर्यावरण के प्रति संवेदना को प्रभावित करते हैं। बीसवीं सदी में न सिर्फ कई पादप हारमोन्स की खोज की गई बल्कि कई हारमोन्स की रासायनिक रचना तथा उनके जैविक संश्लेषण के मार्ग भी पता किए गए। इस सबमें एरेबिडॉप्सिस ने काफी मदद की। इसमें प्रमुख योगदान इस बात का रहा कि एरेबिडॉप्सिस के अनगिनत उत्परिवर्तित संस्करण उपलब्ध हैं।

पादप हारमोन्स के बारे में प्रारंभिक विचारों पर जंतु मॉडल्स हावी थे। जंतुओं में कोशिका की प्लाज़्मा झिल्ली पर कुछ ग्राही होते हैं जो कोशिका द्रव्य के कतिपय प्रोटीन्स के ज़रिए केंद्रक में ट्रांसक्रिप्शन कारकों तक संकेत पहुंचाते हैं। लेकिन पता चला कि यह मॉडल सिर्फ ब्रासिनोस्टेरॉइड नामक हारमोन पर लागू होता है। ब्रासिनोस्टेरॉइड के क्रियामार्ग के प्रमुख घटक एरेबिडॉप्सिस में ही पहचाने गए थे। दरअसल, जंतुओं में स्टीरॉइड्स मूलत: घुलनशील केंद्रकीय हारमोन-ग्राहियों के ज़रिए काम करते हैं, जिसका पौधों में कोई समकक्ष नहीं पाया जाता। लिहाज़ा, एरेबिडॉप्सिस ने पौधों में स्टीरॉइड की क्रिया का एक वैकल्पिक मार्ग सुझाया है।

हारमोन संकेतन का एक अन्य मार्ग शायद क्लोरोप्लास्ट के जीनोम से उभरा है। एथायलीन और सायटोकाइनिन्स दोनों को ही एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम पर स्थित ग्राहियों द्वारा भांपा जाता है और ये बैक्टीरिया में पाए जाने वाले ग्राहियों के समकक्ष हैं। इन ग्राहियों तथा क्रियामार्ग के अन्य घटकों का पता लगाने के लिए एरेबिडॉप्सिस शोधकर्ताओं ने दो प्रमुख कार्यिकीय प्रतिक्रियाओं की मदद ली। पहली है इटियोलेटेड (कमज़ोर व पीले पड़ चुके) नवजात पौधों में एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम द्वारा नियंत्रित प्रतिक्रिया और दूसरी है कैलस ऊतक (सख्त ऊतक) का सायटोकाइनिन के प्रभाव से हरा हो जाना। जहां सायटोकाइनिन संकेतन की क्रियाविधि बैक्टीरिया जैसी लगती है, वहीं एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम नियंत्रित क्रिया एकदम नवीन है। एरेबिडॉप्सिस पर किए अनुसंधान से न सिर्फ एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम आधारित क्रियामार्ग के घटक स्पष्ट हुए, बल्कि इसी के दम पर इस क्रियाविधि के चरणों को क्रमबद्ध किया जा सका।

पौधों में हारमोन संकेतन की तीसरी व सबसे प्रमुख क्रियाविधि में घुलनशील सायटोप्लाज़्मिक ग्राही शामिल होते हैं। ये प्रोटीन-प्रोटीन अंतर्क्रियाओं को संभालते हैं। इस क्रियाविधि के बारे में पहले से पता तो था किंतु इसे एक सामान्य संकेतन प्रक्रिया के रूप में एरेबिडॉप्सिस में ही स्थापित किया गया। यह वनस्पतिनुमा क्रियाविधि ऑक्सिन, जैस्मोनेट, गिबरलिक एसिड, स्ट्रिगोलैक्टोन्स, सेलिसिलिक एसिड और एबीए (एब्सिसिक एसिड) की संवेदना में देखी जाती है।

सिगनल ट्रांसडक्शन

सिग्नल ट्रांसडक्शन (Signal Transduction) को सेल सिग्नलिंग भी कहा जाता है। यह किसी बाहरी संकेत को कोशिका के अंदर तक ले जाने की प्रक्रिया है, जिससे कोशिका की प्रतिक्रिया होती है। दूसरे शब्दों में, यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिकाएं अपने पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों को भांपती हैं और अन्य कोशिकाओं के साथ संवाद करती हैं। एरेबिडॉप्सिस मॉडल पर शोध की मदद से पौधों के हारमोनल सिग्नलिंग (विशेष रूप से ऑक्सिन, गिबरलिन और एथिलीन) को समझने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। इन क्रियापथों में प्रमुख जीन और रिसेप्टर की पहचान से यह स्पष्ट हुआ है कि पौधे विकास और पर्यावरणीय उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रियाओं को कैसे नियंत्रित करते हैं।

अजैविक पर्यावरण के प्रति प्रतिक्रिया

अपने पर्यावरण के प्रति पौधों के रिस्पॉन्स को समझने में भी एरेबिडॉप्सिस ने काफी योगदान किया है। पौधे एक जगह स्थिर रहते हैं, और उन्हें अपने विकास को पर्यावरण के अनुसार ढालना होता है। पौधे की साइज़, शाखा बनना, वृद्धि की रफ्तार तथा फूलने के समय को अजैविक कारकों के अनुसार ढाला जाता है। अन्य प्रजातियों के अलावा एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से पौधों में पुष्पन के समय की गणना की क्रियाविधि स्पष्ट हो पाई है। इसमें वर्नेलाइज़ेशन जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। यह भी स्पष्ट हो पाया है कि पौधों में दिन की लंबाई के मापन की क्रियाविधि क्या है, क्योंकि कई पेड़-पौधों में फूल आने की घटना का सम्बंध दिन की लंबाई से होता है।

ठंड पड़ती है तो पौधे रजाई तो ओढ़ नहीं सकते। उनमें ठंड से तालमेल बनाने के लिए आंतरिक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों को समझने में यह जानना महत्वपूर्ण होता है किसी परिस्थिति में कोशिका में कौन-कौन से आरएनए मौजूद हैं। इसे ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण कहते हैं और एरेबिडॉप्सिस में इसे भली-भांति विकसित किया गया है। एक उदाहरण तो यह है कि शीत-समायोजन की प्रक्रिया में सीबीएफ रेगुलॉन जीन्स की पहचान हो पाई। सीबीएफ रेगुलॉन जीन्स का एक समूह है जो सक्रिय होने पर पौधों में हिमीकरण सहनशीलता को बढ़ाने में योगदान देते हैं। सीबीएफ रेग्युलॉन शीत अनुकूलन प्रक्रिया का एक प्रमुख घटक है, जहां पौधे स्वयं को शून्य से नीचे के तापमान को झेलने के लिए तैयार करते हैं। उम्मीद है कि अन्य पर्यावरणीय तनावों के संदर्भ में भी ऐसे विश्लेषण किए जा सकेंगे। इस संदर्भ में बारबरा मैक्लिंक्टॉक ने सुझाव दिया था कि एपिजीनोम का नियमन तनाव के अधीन होता है। इस परिकल्पना की जांच एरेबिडॉप्सिस पर ही की गई है।

कुछ अन्य अजैविक तनावों पर बात करते हैं। पानी के अभाव में पौधों में एब्सेसिक एसिड और सूखा-प्रतिक्रिया प्रारंभ हो जाती है। लेकिन एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से यह भी पता चला है कि कोशिका झिल्ली के प्रोटीन कुछ अकार्बनिक पदार्थों को पहचानकर उनका परिवहन भी करते हैं। दूसरी ओर, अभी भी हम सोडियम आयन या भारी धातुओं के विषैले आयन के ग्राहियों का पता नहीं लगा पाए हैं।

जड़ों का विकास

जड़ें कब लंबाई में वृद्धि करती हैं, कब उनकी कोशिकाएं विभेदित होने लगती हैं, कब मुख्य जड़ से पार्श्व जड़ें निकलने लगती है, कब मूल रोम विकसित होने लगते हैं – इस बारे में तीन व्याख्याएं प्रस्तुत हुई हैं। पहली है, साइज़र (आकार-आधारित) परिकल्पना जिसके अनुसार जड़ों के अग्र भाग (एपिकल मेरिस्टेम) की कोशिकाएं एक न्यूनतम साइज़ हासिल करने के बाद विभाजित/विभेदित होती हैं। दूसरी है, टाइमर (समय-आधारित) परिकल्पना, जिसके अनुसार कोशिकाएं विभाजन से पूर्व एक समय बिताती हैं और वह समय पूरा होने के बाद विभाजन करती हैं। तीसरी है, रूलर परिकल्पना जो कहती है कि कोशिकाएं अग्र भाग की लंबाई की तुलना में एक निश्चित लंबाई प्राप्त करने के बाद विभाजित होती हैं। एरेबिडॉप्सिस के मूल रोमों के अध्ययन ने इस मामले में काफी समझ बनाई है।

एरेबिडॉप्सिस पर किए गए आणविक जेनेटिक प्रयोगों से जड़ों के विकास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई हैं। जड़ के विकास में शामिल कई नियामक जीन्स की पहचान हुई है।

पौधों में द्वितीयक वृद्धि

पौधों में दो तरह की वृद्धियां देखी जाती है। पहला प्रकार प्राथमिक वृद्धि कहलाती है जो धनिया, पालक, मेथी, सरसों आदि शाकीय पौधों में होती है जिसमें मुख्य रूप से उनकी लंबाई बढ़ती है। वृद्धि का दूसरा प्रकार द्वितीयक वृद्धि कहलाता है जो झाड़ियों और पेड़ों में लंबाई के साथ-साथ तनों और जड़ों की मोटाई में होने वाली वृद्धि है। इसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं। गौरतलब है कि एरेबिडॉप्सिस एक शाकीय पौधा है जिसमें सामान्यत: द्वितीयक वृद्धि नहीं होती लेकिन आश्चर्यजनक रूप से द्वितीयक वृद्धि के बारे में कुछ खास बातें इसी मॉडल जीव के अध्ययन से प्राप्त हुई हैं। जे-ह्यूंग को (Jae-Heung Ko), क्यूंग-ह्वान हान (Kyung-Hwan Han), सुलचुंग पार्क (Sunchung Park) तथा जेमो यांग (Jaemo Yang) ने एक प्रयोग में देखा कि इस पौधे के तने के शीर्ष पर कुछ भार आरोपित करके इस शाकीय पौधे में भी द्वितीयक वृद्धि प्रेरित की जा सकती है। इस प्रकार के प्रयोग से पता चला कि तने द्वारा वहन किया जाने वाला भार तने में एक ऐसे विकास कार्यक्रम को सक्रिय करता है जिससे द्वितीयक वृद्धि होती है और उसमें काष्ठ का निर्माण होता है। अर्थात तने की कुल लंबाई (यानी वज़न) द्वितीयक वृद्धि का नियंत्रण करती है।

वैसे शोधकर्ताओं ने पहले किए गए प्रयोगों में यह भी देखा था कि यदि एरेबिडॉप्सिस में फूल न लगने दिए जाएं, तो उसकी लंबाई बढ़ती रहती है और उसमें द्वितीयक वृद्धि होने लगती है। इससे पता चलता है कि प्राथमिक और द्वितीयक वृद्धि की प्रक्रियाएं काफी निकटता से एक दूसरे से सम्बंधित है जबकि पूर्व में ऐसा सोचा गया था कि ये दोनों अलग-अलग हैं। काष्ठीय पौधों में द्वितीयक वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार जीन्स की पहचान में भी इस मॉडल जीव ने काफी मदद की है।

गुरुत्वचालित गति

एरेबिडॉप्सिस के छोटे-छोटे बीज अंकुरण के बाद नन्ही पौध पैदा करते हैं जिन्हें काफी नियंत्रित परिस्थितियों में पनपने दिया जा सकता है। यानी एक-एक पौध को अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियां प्रदान की जा सकती हैं।

इसी खूबी के चलते यह संभव हुआ कि विभिन्न उत्परिवर्तित पौधों में गुरुत्व-चालित गति का अध्ययन किया जा सके। जैसे एक मामले में अगर (agar) के खड़े माध्यम में एरेबिडॉप्सिस के अंकुरों को कुछ दिन तक पनपाया गया। फिर इन नन्हे अंकुरों को गुरुत्व उद्दीपन दिया गया। इसके लिए उन्हें एक तश्तरी में रखकर 90 अंश के कोण पर घुमाकर रख दिया गया। इस परिस्थिति में वन्य पौधों ने तो 12 घंटे के अंदर अपने अंगों की वृद्धि को समायोजित कर लिया यानी उनकी जड़ें सीधे नीचे की ओर तथा तने सीधे ऊपर की ओर बढ़ने लगे। लेकिन गुरुत्व के लिहाज़ से उत्परिवर्तित पौधे ऐसा समायोजन नहीं कर पाए।

यही हालत तब भी रही जब प्रयोग को पुष्पक्रम के साथ दोहराया गया था। रोचक बात यह रही कि शुरुआत में ही उन जेनेटिक उत्परिवर्तनों को पहचान लिया गया था जो तीनों अंगों (जड़, तना व पुष्पक्रम) की गुरुत्व संवेदना को प्रभावित करते हैं और कुछ जीन ऐसे भी थे जो इनमें से किसी एक या दो अंगों पर असर डालते थे।

बीजों की वृद्धि

एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि यह पौधा बड़ी चतुराई से अपने सिर्फ उन्हीं बीजांडों तक पोषण पहुंचने देता है जो निषेचित हो चुके होते हैं गैर-निषेचित बीजांड तक पोषण पहुंचने से रोकता है, जिससे पोषण का सदुपयोग होता है और बीज बड़ा बनता है। प्रयोगों के द्वारा इस प्रक्रिया की जेनेटिक व आणविक क्रियाविधि भी स्पष्ट हुई है और लगता है कि इसे अन्य फसली पौधों पर आज़माया जा सकता है।

कोशिका भित्ती, स्टार्च और लिपिड्स

मनुष्य पौधों से जो कुछ प्राप्त करते हैं वह अधिकांशत: कोशिका भित्तियां, स्टार्च, शर्करा तथा लिपिड्स होते हैं। और एरेबिडॉप्सिस इन चीज़ों के संश्लेषण व रूप-परिवर्तन में शामिल एंज़ाइम्स की पहचान करने का एक प्रमुख मॉडल बनकर सामने आया है।

एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान से यह भी स्पष्ट हुआ है कि सीमित संसाधन वाले पौधों में स्टार्च विघटन की दर रात की लंबाई के अनुरूप होती है, जिसके चलते वे रात के अंत में कार्बन के अभाव से बच जाते हैं। यह पता चला है कि पौधों में स्टार्च का विघटन जैविक घड़ी के नियंत्रण में होता है जो एक अधिकतम दर निर्धारित करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सुबह होने तक सारा स्टार्च खत्म न हो जाए। इस समझ के आधार पर पादप वृद्धि के नवीन मॉडल बन सकेंगे। हालांकि इस समझ को सीधे-सीधे फसली पौधों पर लागू नहीं किया जा सकेगा लेकिन यह भावी शोध को दिशा ज़रूर देगी।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह छोटा-सा पौधा एक बड़ा महत्वपूर्ण मॉडल साबित हुआ है। इसे जीव विज्ञान अनुसंधान की सेलिब्रिटी कहना गलत न होगा। भविष्य में भी इसकी महत्ता बनी रहेगी और यह मॉडल जीव हमें जीव विज्ञान के नए-नए रास्ते सुझाता रहेगा।

भावी अनुसंधान

एरेबिडॉप्सिस विटामिन चयापचय का खुलासा करने में महत्वपूर्ण होता जा रहा है। जैसे पैंटोथेनेट (विटामिन बी-5) का संश्लेषण एरेबिडॉप्सिस में होता है और तीन जीन्स पहचाने गए हैं। इन पर आगे अध्ययन जारी है।

इसी प्रकार से एरेबिडॉप्सिस पादप जीनोम व उसकी अभिव्यक्ति के व्यवस्थित अध्ययन के लिए एक मॉडल तंत्र बनकर उभरा है। पिछले कुछ वर्षों में इस पादप मॉडल में अभिव्यक्त प्रोटीन्स के अलावा, पूरे अंग या ऊतकों में प्रोटीन समुच्चय (प्रोटियोम) के अध्ययन शुरू हुए हैं। क्लोरोप्लास्ट, माइटोकॉण्ड्रिया, परॉक्सिसोम, और केंद्रक जैसे कोशिका के अंदर पाए जाने वाले उपांगों के प्रोटियोम का अध्ययन भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। इन अध्ययनों ने यह समझने में मदद की है कि किसी अजैविक तनाव, रोगजनक के आक्रमण या उत्परिवर्तन के तनाव के संदर्भ में पौधों के प्रोटीन प्रोफाइल पर कैसे असर होते हैं।

जिस अकेले पौधे पर 60-70 हज़ार शोध पत्र छप चुके हों, उसका सांगोपांग वर्णन तो एक-दो किताबों में भी मुश्किल होगा। संक्षेप में कहें, तो इस पौधे पर अनुसंधान के द्वारा हमें जीव विज्ञान की कई गुत्थियां सुलझाने में मदद मिली है। इनमें जीन्स की अभिव्यक्ति का नियंत्रण, कोशिकाओं के प्रकारों के विकास में विभिन्न कारकों की भूमिका, संश्लेषण जीव विज्ञान वगैरह जैसे विविध क्षेत्र शामिल हैं।

यहां यह बता देना मुनासिब है कि एरेबिडॉप्सिस सम्बंधी अनुसंधान में इस बात से बहुत मदद मिली है कि इसके बारे में उपलब्ध सूचनाएं विभिन्न डैटाबेस में संग्रहित व उपलब्ध हैं। इसलिए इस पर अनुसंधान करने के लिए हर बार ‘क-ख-ग’ से शुरू नहीं करना पड़ता।

ऐसे अनुसंधान को लेकर एक मल्टीनेशनल एरेबिडॉप्सिस स्टेरिंग कमिटी (MASC) गठित हुई है जो निरंतर हो रही प्रगति का प्रकाशन करती है। इस कमिटी ने शोधकर्ताओं से सुझाव लिए हैं कि आने वाले दशक में एरेबिडॉप्सिस की मदद से किस तरह की खोजें होने की उम्मीद है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन और पौधों का जल्दी फूलना

दुनिया भर में कई पौधों में अब पहले की तुलना में जल्दी फूल खिलने लगे हैं। पूरा ध्यान बढ़ते तापमान (global warming) पर जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार केवल गर्मी बढ़ना ही इसका कारण नहीं है। जैसे, ग्रीनहाउसों (greenhouse experiments) में सिर्फ ज़्यादा तापमान देने से फूल समय से पहले नहीं खिले। एक नए अध्ययन से पता चला है कि पत्तियों पर जमा होने वाली ओस की बूंदें (dew droplets on leaves) इस जल्दबाज़ी की वजह हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब पानी की बहुत सूक्ष्म बूंदें (micro water droplets) पत्तियों पर जमती हैं, तो वे कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करवाती हैं। ये अभिक्रियाएं पौधे को संकेत देती हैं कि अब फूल बनाने का समय आ गया है। तो लगता है कि केवल बढ़ता तापमान नहीं, बढ़ती नमी के कारण बनने वाली ओस भी पौधों के व्यवहार (plant behavior) को प्रभावित कर सकती है।

पहले किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट था कि थोक पानी (bulk water) की तुलना में पानी की बहुत छोटी बूंदें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। जब ऐसी सूक्ष्म बूंदें किसी ठोस अजैविक सतह पर बनती हैं, तो उनमें खास रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। देखा गया था कि इन अभिक्रियाओं के कारण वहां मूलक (free radicals)  बनते हैं जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) होते हैं। इस अवलोकन से यह सवाल पैदा हुआ कि यदि ऐसी ही बूंदें किसी सजीव सतह (जैसे पत्ती) पर जमें तो क्या परिणाम होगा।

इसको समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक छोटे फूलदार पौधे एरेबिडॉप्सिस थैलियाना (Arabidopsis thaliana plant)पर प्रयोग किए। यह ब्रेसिकेसी कुल (Brassicaceae family) का पौधा है।

विस्तृत प्रयोगों में पाया गया कि इस पौधे की पत्तियों पर ओस जमने पर, वहां होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (hydrogen peroxide)  और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide molecule)  बनते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड पौधों और जंतुओं में एक जाना-माना महत्वपूर्ण संकेतक अणु है। यह बूंद से पौधे की कोशिकाओं में पहुंचकर ऐसी जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू करवाता है, जो अंतत: पुष्पन की प्रक्रिया (flowering process) को सक्रिय कर देती हैं।

पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों में जुटाए गए ब्रेसिकेसी कुल के लगभग 1.2 करोड़ पौधों के पुष्पन रिकॉर्ड (plant flowering data) का विश्लेषण किया। उन्होंने फूल खिलने के समय की तुलना 11 अलग-अलग मौसम सम्बंधी कारकों से की। फूल खिलने के समय का सम्बंध तापमान (temperature change) और दिन की लंबाई के अलावा ओस बिंदु से भी देखा गया। ओस बिंदु हवा में उपस्थित नमी (air humidity) और हवा के तापमान से जुड़ा है।

हालांकि सभी वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं लेकिन यदि ये निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो वैज्ञानिकों की यह समझ बदल सकती है कि गर्माती जलवायु (climate change) में पौधे कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यदि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा की नमी में छोटे बदलाव भी फूल आने के समय को प्रभावित कर सकते हैं, तो इस शोध का व्यावहारिक उपयोग (agricultural application) भी हो सकता है। भविष्य में किसान नियंत्रित फुहार या हल्की नमी देकर फूलने का समय बदल सकते हैं और फसल उत्पादन (crop yield improvement) बढ़ा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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बांस के गुणों पर फिर एक नज़र

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

बांस (तमिल में ‘मूंगली’) (bamboo plant)  एक प्राचीन पौधा है जो नम मिट्टी और कड़ी धूप में तेज़ी से बढ़ता है। बांस एशिया और लैटिन अमेरिका में काफी लोकप्रिय है; यहां लोग बांस का उपयोग कई तरह के कामों में करते हैं। खाद्य वैज्ञानिक और इतिहासकार के. टी. अचया ने अपनी किताब हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि भारत में प्राचीन समय से ही जैन भिक्षु और वनवासी भोजन में बांस के तने और पत्तियों को पकाते (bamboo as food) रहे हैं।

बांस ऐसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और आर्द्र इलाकों में अच्छे से वृद्धि करते हैं, जहां धूप अच्छी पड़ती हो और मिट्टी जैविक पदार्थ से भरपूर हो। भारत में असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों में बांस खूब होते हैं (bamboo cultivation in India)। चंद्रमोहन सिंह और उनके साथियों ने ट्रीस, फॉरेस्ट्स एंड पीपुल जर्नल में एक पेपर प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है ‘जंगल से भविष्य तक: जैव विविधता, स्वदेशी ज्ञान, पारिस्थितिक लचीलापन और पूर्वोत्तर भारत में वर्तमान स्थिति के साथ बांस के सम्बंध पर एक टिकाऊ नज़रिया (From Forest to future: A sustainable perspective on bamboo’s nexus with biodiversity, indigenous knowledge, ecological resilience, and current status in Northeast India)’। इस पेपर में बताया गया है कि बांस-आधारित उद्योगों को, स्थानीय ज्ञान का इस्तेमाल करके, वैज्ञानिक तरीकों  और नीतियों के ज़रिए मज़बूत किया जा सकता है। इसके लिए बांस शोध संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं ताकि स्थानीय ज्ञान को बेहतर किया जा सके।

धीरे-धीरे बांस के नए उपयोग हो रहे हैं, जैसे डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक (plastic alternatives) के बर्तनों की जगह बांस के बर्तन। असम के नुमालीगढ़ में, प्रधानमंत्री ने पिछले साल एक बायो-रिफाइनरी (bamboo bio-refinery) का उद्घाटन किया था जिसका उद्देश्य बांस से 50,000 मीट्रिक टन इथेनॉल का उत्पादन था। इसकी वेबसाइट पर भारत में बांस से बने कई उत्पादों का ज़िक्र है, जिनमें कपड़े, टोकरियां, चटाई, कुर्सियां, मेज़, अलमारियां, छत और फर्श, वाद्ययंत्र (बांसुरी और ढोल), तथा अगरबत्ती शामिल हैं। कुछ राज्यों ने बांस से बने उत्पादों को विकसित करने के लिए बांस अनुसंधान संस्थान (bamboo research institutes) भी स्थापित किए हैं।

बांस सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन 2025 (National Bamboo Mission 2025) शुरू किया है, जिसके तहत बांस की खेती को बढ़ाना, उद्योग से कड़ियों को मज़बूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। इस पहल का उद्देश्य गैर-वन भूमि पर (जैसे खेतों, घरों, सामुदायिक भूमि और सिंचाई नहरों के किनारों पर) बांस के बागान बढ़ाना है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और उद्योगों के लिए कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, बांस और इसके उत्पादों (जैसे बड़े दर्पण, सूती वस्त्र और बांस के आभूषण) का अमेरिका, डेनमार्क और नाइजीरिया को निर्यात किया जाता है। विश्व स्तर पर, भारत बांस और उसके उत्पादों के शीर्ष तीन निर्यातकों में है (अन्य दो शीर्ष देश हैं चीन और वियतनाम)। इस निर्यात (bamboo exports from India) से लाखों-करोड़ों की आमदनी होती है। महाराष्ट्र, केरल और असम सहित कई राज्यों ने बांस शोध एवं तकनीकी संस्थान भी स्थापित किए हैं। ये बांस से बने टेक्सटाइल, इमारत सम्बंधी और खाद्य उत्पाद बेचते हैं।

पोषक मूल्य

नवंबर 2025 में, एडवांसेज़ इन बैम्बू साइंस नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र में बताया गया है कि बांस एक ज़ोरदार सुपरफूड (bamboo superfood) है। एंग्लिया रस्किन युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में आहार में बैम्बू शूट (bamboo shoots nutrition), पत्तियों और बीजों के सेवन के पोषण सम्बंधी फायदों के बारे में बताया है और बताया है कि बांस की इन चीज़ों को खाने से ज़रूरी अमीनो एसिड, विटामिन A, B6 व E मिल सकते हैं। और रक्त शर्करा और लिपिड स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है। बांस मधुमेह और ह्रदय सम्बंधी बीमारियों (diabetes and heart health) के लिए अच्छे हैं। वैज्ञानिकों ने बांस के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य परिणामों का एक व्यवस्थित बहु-देशीय विश्लेषण भी किया, जिससे पता चला है कि बांस से बने खाने में एंटीऑक्सीडेंट भी ज़्यादा होते हैं और प्रोबायोटिक फायदे भी मिलते हैं।

ग्रामीण लोगों के भोजन में तो बांस शामिल है ही, हम शहरी लोग कैसे लाभ ले सकते हैं? कूरियर सर्विस और कई ऑनलाइन वेंडर्स (online bamboo food products) और डिस्ट्रीब्यूटर्स बांस से बने खाद्य और उत्पाद बेचते हैं, और हम उनसे से खरीदकर खा सकते हैं। (स्रोते फीचर्स)

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कमल के फूलों में छिपा प्राकृतिक हीटर

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

र्मोजेनेसिस (thermogenesis) यानी जीवों में अपने शरीर में ऊष्मा/गर्मी पैदा करने की प्रणाली। हालांकि हम आम तौर पर सिर्फ पक्षियों और स्तनधारियों को ही गर्म खून (endotherm) वाला मानते हैं, लेकिन सभी जटिल जीव कुछ गर्मी तो पैदा करते ही हैं। कोशिकाओं में मौजूद छोटे पॉवर प्लांट, जिन्हें माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) कहते हैं, भोजन को एक जैविक ईंधन, एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) में बदलते हैं। लेकिन, भोजन की ऊर्जा का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा ही वास्तव में ATP बनता है; बाकी हिस्सा ऊष्मा के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।

कभी-कभी, माइटोकॉन्ड्रिया शर्करा में मौजूद सारी ऊर्जा को ऊष्मा में बदल सकते हैं। पौधों में भी एक एंज़ाइम यही काम कर सकता है जिसका नाम है आल्टरनेटिव ऑक्सीडेज़ (alternative oxidase)। अलबत्ता, चंद पौधे ही विशिष्ट कामों के लिए गर्मी पैदा करते हैं (plant thermogenesis)।

कमल का पौधा (Nelumbo nucifera) उत्तरी और मध्य भारत मूल का है। और यह तालाबों, झीलों और धीमे बहाव वाले जलाशयों में उगता है। गर्मियों की शुरुआत में, कम तापमान पर फूल खिलना शुरू होते हैं। इसके सुंदर फूल तीन से चार दिनों तक खिले रहते हैं। इस अवधि में फूल का अंदरूनी तापमान लगभग 30-35 डिग्री सेल्सियस रहता है, जबकि आसपास का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है (flower temperature regulation)।

कमल में ऊष्माजनन तब शुरू होता है जब कली की सभी पंखुड़ियों के सिरे गुलाबी हो जाते हैं। इसकी अगली अलसुबह, खिलता हुआ फूल गर्मी छोड़ता है, जो फूल को एक आकर्षक खुशबू छोड़ने (pollination mechanism) में भी मदद करता है। कमल के फूल के केंद्र में शंकु आकार का एक समतल पुष्पासन होता है जिसके ऊपरी सपाट हिस्से पर 10-30 मादा जननांग होते हैं। अन्य ऊष्माजनक पौधों की तरह, कमल में भी मादा अंग पहले परिपक्व होते हैं। खुशबू परागणकर्ता़ कीटों – मधुमक्खियों और भृंगों – को स्त्रीकेसर की ओर आकर्षित (pollinator attraction) करती है। दोपहर तक पंखुड़ियां बंद हो जाती हैं, जिससे एक आरामदायक, इंसुलेटेड कक्ष बन जाता है जिसमें रात बिताने के लिए कीट शरण लेते हैं।

अगले दिन सुबह फूल खिलने से पहले, फूल के नर जननांग (पुंकेसर) परिपक्व हो जाते हैं। और पराग से लदे परागपोषी कीट फूल से उड़ जाते हैं और दूसरे महकते फूलों पर चले जाते हैं। यह प्रणाली पर-परागण (cross pollination) सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन हुई है। पर-परागण से संतति को कई फायदे मिलते हैं। जैसे, अधिक जेनेटिक विविधता (genetic diversity) और कीट प्रतिरोधक क्षमता। प्रत्येक स्त्रीकेसर एक-एक बीज में तब्दील हो जाता है और पुष्पासन फव्वारे जैसे आकार की फली में परिपक्व हो जाता है।

स्त्रीकेसर जिस हिस्से पर होते हैं, वह हिस्सा फूल के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाता है। वर्ष 2025 में प्लांट फिजियॉलॉज़ी (Plant Physiology journal) में प्रकाशित नतीजों के मुताबिक कैल्शियम आयन गर्मी बढ़ाने के ‘ऑन’ स्विच का काम करते हैं। जब गर्म होने का समय होता है, तो इस हिस्से की कोशिकाओं में कैल्शियम का स्तर चार गुना बढ़ जाता है। कैल्शियम माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है और उन्हें तेज़ी से काम करने के संकेत देता है। ऊष्मा पैदा करने के लिए, बड़ी मात्रा में जमा स्टार्च और वसा का उपयोग किया जाता है (energy metabolism in plants)।

एरम कुल के कुछ पौधे कीटों को आकर्षित करने के लिए और अन्य विचित्र कामों के लिए भी ऊष्माजनन का इस्तेमाल करते हैं (thermogenic plants)। ईस्टर्न स्कंक कैबेज (eastern skunk cabbage) नामक पौधा उत्तरी अमेरिका के ठंडे इलाकों में उगता है। हालांकि इसका पत्तागोभी (कैबेज) से कोई सम्बंध नहीं है, लेकिन इसका नाम पत्तागोभी जैसी गंध के कारण पड़ा है, जो थोड़ी सरसों जैसी भी होती है। इस पौधे का फूल वाला तना वसंत के आरंभ में ऊष्मा पैदा करके मिट्टी पर जमी बर्फ को पिघलाकर बाहर निकलता है (snow melting plant)। भृंगों को इस फूल में मकरंद के साथ-साथ गर्म जगह मिलती है। यहां तक कि मकड़ियां भी कीटों की आवाजाही देखते हुए फूल के नज़दीक ही अपने जाले बुनती हैं।

सार्डीनिया में पाए जाने वाले डेड हॉर्स एरम लिली (dead horse arum lily) के फूलों से सड़ांध की गंध आती है। यह पौधा गर्मी का इस्तेमाल डाईमिथाइल डाईसल्फाइड (dimethyl disulfide) जैसे यौगिकों को तेज़ी से प्रसारित करने के लिए करता है, जिसकी गंध गैस सिलेंडर से रिसती गैस और थोड़ी लहसुन जैसी होती है। सड़ा हुआ मांस ढूंढने वाली मक्खियों को यह गंध बहुत पसंद आती है और वे बड़ी संख्या में इसके पास आ जाती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं? सुनकर क्या करते हैं? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

क्या आप अपने पौधों को संगीत (music for plants) सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद (plant perception) कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भांप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ (herbivore vibration) सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों (plant defense response) का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति (frequency discrimination) एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं।

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण (seed germination) पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियां पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियां, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति (gene expression) और हॉरमोन नियंत्रण (plant hormone) को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान (Plant acoustics)

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि (crop yield, sustainable agriculture) आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि (plant growth) पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर (music effect on plants) का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जांचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा (sound frequency, plant development)।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया (classical music, meditation music)। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स (psychoacoustics, plant response to sound) के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएं, पौधे अच्छे से लहलहाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

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खुद का भोजन बनाने वाले पौधे शिकारी कैसे बन गए?

डॉ. किशोर पंवार

लाखों-करोड़ों पौधों की दुनिया में कुछ पौधे ऐसे भी हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते बल्कि जंतुओं की तरह शिकार करते हैं। इन्हें हम मांसाहारी पौधों (carnivorous plants) के नाम से जानते हैं। चार्ल्स डार्विन ने 1875 में जब अपनी किताब इन्सेक्टीवोरस प्लांट (कीटभक्षी पौधे) (Darwin Insectivorous Plants) प्रकाशित की थी तब तहलका मच गया था कि ऐसे भी पौधे होते हैं। तभी से ये विचित्र शिकारी पौधे आश्चर्य और कौतूहल का विषय रहे हैं। इन पौधों को लेकर तमाम भ्रम फैले या फैलाए गए। खासकर कुछ फिल्मों ने यह दर्शाया कि ऐसे पौधे भी होते हैं जो मनुष्यों को पकड़कर खा जाते हैं जबकि सच्चाई यह है कि ये पौधे छोटे-मोटे कीटों को दबोच (insect eating plants) पाते हैं।

दरअसल, डारविन ने 16 साल तक व्यवस्थित प्रयोगों के बाद दर्शाया था कि कुछ पौधों की पत्तियां इस तरह ढल गई हैं कि वे न सिर्फ छोटे-मोटे जंतुओं को कैद कर लेती हैं, बल्कि उन्हें पचा भी लेती हैं और उनसे मुक्त पोषक पदार्थों का अवशोषण भी कर लेती हैं।

अब आणविक जीव वैज्ञानिकों (molecular biology research) ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है कि इन पत्तियों में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन कैसे संभव हुआ।

फूलधारी पौधों के विकास के 14 करोड़ से भी ज़्यादा सालों में मांसाहारी गुण बार-बार विकसित हुआ है (evolution of carnivory) और ऐसा कम से कम 12 विभिन्न कुलों में देखा गया है। पर हर बार मांसाहार के विकास की प्रेरक शक्ति एक ही थी – कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की खोज की ज़रूरत। मांसाहारी पौधे अक्सर दलदल और दलदली भूमि में पोषक तत्वों से रहित जलाशयों या हल्की उष्णकटिबंधीय मिट्टी पर ही उगते हैं। यहां पौधों के विकास और वृद्धि के लिए आवश्यक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्वों की कमी होती है। और ये उपलब्ध होते हैं प्रोटीन से भरपूर कीट-पतंगों और छोटे-छोटे जीवों में। ऐसा नहीं है कि ये मांसाहारी पौधे अपने पूरे पोषण (nutrient absorption from insects) के लिए शिकार पर निर्भर होते हैं। अन्य पौधों की तरह ये भी प्रकाश संश्लेषण करते हैं और कार्बोहायड्रेट वगैरह बना लेते हैं। लेकिन अपने आवास में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे तत्वों के अभाव की पूर्ति ये कीड़ों-मकोड़ों से करते हैं।

प्राय: पेड़-पौधे अपनी जड़ों के ज़रिए नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिट्टी से लवणों के रूप में प्राप्त करते हैं। अब यदि जमीन में ये तत्व न हों तो? कोई चिंता नहीं, हवा में तो प्रोटीन से भरपूर कीट पतंगे उड़ रहे हैं जो नाइट्रोजन का बढ़िया स्रोत है। और यहां उगने वाले कुछ पौधों ने इसी स्रोत का लाभ उठाया और बन गए मांसाहारी। परंतु सवाल तो यह है कि यह परिवर्तन हुआ कैसे कि ये पौधे प्रोटीन को पचाने लगे जबकि सामान्यत: पौधे प्रोटीन बनाते हैं, पचाते नहीं।

वर्तमान में लगभग 800 मांसाहारी पौधे ज्ञात (800 carnivorous plant species) हैं। इनमें पिचर प्लांट (कलश पादप) और ड्रॉसेरा हैं जो शिकार को अपने गतिहीन ट्रैप यानी पाश में फंसाते हैं। दूसरी ओर, कुछ शिकारी पौधों के पाश में गति होती है। जैसे वीनस फ्लाईट्रैप और यूट्रीकुलेरिया जिनके संवेदनशील रोम और खटके से बंद होने वाले पिंजड़े शिकार की उपस्थिति को भांपकर एक साथ प्रतिक्रिया करते हैं और पाश झटके से बंद हो जाते हैं।

पत्तियों से ही बने हैं सभी पाश

आकार, प्रकार और शिकारी को फंसाने के तरीकों में काफी भिन्नता होने के बावजूद, सभी शिकारी फंदे या तो पत्तियों से या पत्तियों (leaf-based traps) के कुछ भाग से बने होते हैं। जैसे ड्रॉसेरा पूरी पत्ती है, वहीं नेपेंथीज़ का कलश पत्ती के शीर्ष  से बना होता है। दरअसल, इन पौधों की पत्तियां थ्री-इन-वन हैं जो हाथ, मुंह और पेट सभी काम करती हैं, बारी-बारी। यहां तक कि वे जड़ों का भी काम करती है – नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे लवण उपलब्ध करवाकर जो काम सामान्यत: जड़ें करती हैं।

इन मांसाहारी पौधों की पत्तियां अपने सामान्य कार्य के अलावा अन्य कार्य कैसे करने लगी इस रहस्य का खुलासा आणविक जीव विज्ञान की नवीनतम तकनीकों (जैसे जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स और प्रोटीयोमिक्स) (plant genomics research) से हो पाया।

जीनोमिक्स जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी जीव में मौजूद समस्त जीन्स का मानचित्रण किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि उस जीव में कौन-कौन-सी क्षमताएं हैं। लेकिन ज़रूरी नहीं कि सारी क्षमताएं साकार हों। जीन्स के आधार पर प्रतिलेखन (ट्रांसक्रिप्शन) होकर आरएनए बनते हैं जो प्रोटीन बनवाने या कुछ अन्य कार्यों को अंजाम देते हैं। किसी भी कोशिका में उपस्थित समस्त आरएनए के समुच्चय को ट्रांस्क्रिप्टोम कहते हैं। लेकिन सारे आरएनए प्रोटीन बनाने का काम नहीं करते। किसी कोशिका में बनने वाले सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटीयोम कहते हैं और इसके विश्लेषण को प्रोटियोमिक्स (proteomics protein study)।

तो मांसाहारी पौधों के जीनोम-आरएनए ट्रांसक्रिप्ट की तुलना सामान्य पौधों से करके यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-कौन-से जीन पौधे के किस भाग में और कब सक्रिय होते हैं। प्रोटीयोमिक्स विश्लेषण से पता चल जाता है कि भोजन के समय फंदे में कौन से विशेष प्रोटीन बनते हैं।

जीन्स वही, काम नया

पौधों में मांसाहार की दो खास क्रियाओं (पाचन और अवशोषण – digestion & nutrient absorption) के अध्ययन से पता चला है कि कैसे जैव विकास के दौरान मौजूदा जीन्स को ही नए काम पर लगाया गया है। इसके अलावा कुछ जीन्स को नई भूमिकाओं (gene repurposing evolution) के अनुकूल बनाने के लिए उनमें अजीबोगरीब बदलाव किए गए हैं। मांसाहारिता पर काम करने वाले विशेषज्ञ विक्टर अल्बर्ट कहते हैं कि मांसभक्षिता के विकास के केंद्र में दरअसल पौधों की सहस्राब्दियों पुरानी रक्षा प्रणाली ही थी।

1970 के दशक में शोधकर्ताओं ने आजकल की त्वरित और सस्ती जीन अनुक्रमण तकनीक से देखा कि मांसाहारी पौधों के फंदों में पाए जाने वाले एंज़ाइम सिर्फ पत्तियों में ही बनते हैं। आणविक जीव वैज्ञानिकों ने इन पाचक एंज़ाइम्स (digestive enzymes in plants) को कोड करने वाले कई जीन्स की पहचान कर ली है। एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इन पौधों ने मांसाहारिता से सम्बंधित जीन्स जाल में फंसने वाले जंतुओं से हासिल नहीं किए हैं बल्कि ये जीन्स पौधों में पहले से उपस्थित जीन्स को नए कामों में उपयोग करके या उनमें फेरबदल करके पैदा हुए हैं।

1970 के दशक में जीव वैज्ञानिक यह पता कर पाए थे कि इन फंदों में जो एंज़ाइम पाए जाते हैं, वे वैसे ही काम करते जैसे पौधे बैक्टीरिया, फफूंद और कीटों के खिलाफ अपनी रक्षा के लिए करते हैं। काफी शोध के बाद पता चला है कि ऐसे एंज़ाइम पौधे स्वयं बनाते हैं और कुछ नए एंज़ाइम भी बनाते हैं।

पाचक एंज़ाइम्स की सूची में कायटीनेस, प्रोटीएस और पर्पल एसिड फॉस्फेटेस (पीएपी) शामिल हैं। कायटीनेस वे एंज़ाइम होते हैं जो कीटों के कायटीन से बने बाह्य कंकाल को पचाने में काम आते हैं। प्रोटीएस प्रोटीन को पचाने का और पीएपी फॉस्फोरस प्राप्त करने में मदद करते हैं।

ये सभी एंज़ाइम फूलधारी पौधों की प्राचीन सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और आज भी निभा रहे हैं। जैसे, संभवत: कायटीनेस फफूंदों से रक्षा करते होंगे क्योंकि फफूंदों की भित्ती कायटीन से ही बनी होती है। आगे चलकर कीटों के कंकाल के कायटीन को पचाने-गलाने में इन्हीं जीन्स का उपयोग किया गया।

जीन्स को नई भूमिका में इस्तेमाल करना जैव विकास में एक महत्वपूर्ण चालक रहा है। इसकी शुरुआत प्राय: संयोगवश किसी जीन के दोहराव से होती है। अधिकांश ऐसे दोहरे जीन्स कोई काम नहीं करते। मगर यदि किसी ऐसे जीन में कोई उपयोगी उत्परिवर्तन हो जाए, तो वह नई भूमिका अख्तियार कर सकता है। अल्बर्ट के मुताबिक मांसाहारिता का विकास शायद इसी प्रक्रिया से हुआ है। 

मौजूदा संसाधनों को नई भूमिकाओं के लिए ढालने की यह प्रवृत्ति कीटों के पाचन से कहीं आगे पोषक तत्वों के अवशोषण तक ले जाती है। जब पाचन प्रक्रिया के फलस्वरुप काइटिन, प्रोटीन और डीएनए छोटे-छोटे अणुओं में टूटते हैं, ये विशेष पत्तियां उन्हें पौधों के अंदर ले लेती हैं। सामान्य पौधों में पोषक तत्वों का अवशोषण जड़ों द्वारा किया जाता है। ट्रांसपोर्टर प्रोटीन उन्हें मिट्टी से पौधे में पहुंचाते रहते हैं।

आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक सोन्के शेरज़र ने नाइट्रोजन और पोटेशियम के लिए ट्रांसपोर्टर प्रोटीन की खोज वीनस फ्लाईट्रैप की इन शिकारी पत्तियों में की है। ऐसा लगता है कि पत्ती को इन पोषक तत्वों को अवशोषित करने में सक्षम बनाने के लिए जैव विकास ने जड़ों के जीन्स को उठाया और नई जगह पर काम पर लगा दिया है। जड़ों में तो ये ट्रांसपोर्टर जीन्स हमेशा सक्रिय रहते हैं लेकिन शिकारी पत्तियों के ट्रांसपोर्टर जीन्स तभी सक्रिय होते हैं जब शिकार किए गए जंतु का पाचन होकर पोषक तत्व बाहर निकलने लगते हैं।

विक्टर अल्बर्ट और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा एक ऑस्ट्रेलियाई मांसाहारी पौधे सीफेलोटस फॉलिकुलेरिस (Cephalotus follicularis) के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला कि कैसे परस्पर असम्बंधित पौधों (नेपेंथीस एलाटा, सेरासेनिया पर्प्य़ूरिया, ड्रॉसेरा एडेलेNepenthes alata, Sarracenia purpurea,  Drosera adelae) ने एक-से जीन्स को अपनाकर उनको नए काम में उपयोग करके मांसाहारी कौशल विकसित किया है।

इसी सिलसिले में यह भी पता चला है कि जब कोई एंज़ाइम नई मांसाहारी भूमिका निभाने लगता है तो उसका विकास चलता रहता है ताकि वह बेहतर ढंग से काम कर सके। इसके लिए एंज़ाइम में अमीनो अम्लों को बदला जाता है। आश्चर्य की बात है कि विभिन्न असम्बंधित पौधों में एक-से अमीनो अम्लों की अदला-बदली हुई है।

मांसाहारी ट्रैप के समान जैस्मोनेट्स का उत्पादन सामान्य पौधों में भी होता है। उनमें कोशिकाएं कीटों के हमलों के जवाब में सिग्नल प्रेषित करके आसपास की कोशिकाओं को सचेत करती हैं। इस तरह शाकाहारी आक्रमण से बचने के लिए यह पौधे रक्षात्मक प्रोटीन का उत्पादन शुरू कर देते हैं।

यह प्रतिरक्षा प्रणाली सभी फूलधारी पौधों में मौजूद है। जैस्मोनेट्स की यह बदली हुई भूमिका मांसाहारी पौधों के विकास में एक प्रमुख कारण हो सकती है।

सचमुच पौधों की दुनिया अजब गजब है। यह कुदरत का कमाल ही तो है कि जो पत्तियां सामान्य पौधों में भोजन बनाने का काम करती है, वही इन खनिज लवणों की कमी से जूझते दलदली आवासों में फूलों जैसी रंगीन, रसीली व आकर्षक बन गई हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फफूंद पर परजीवी पौधे यानी चोर के घर में चोरी

डॉ. किशोर पंवार

ह तो जानी-मानी बात है कि पौधे हवा की कार्बन डाईऑक्साइड (carbon dioxide) और ज़मीन से सोखे गए पानी का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इस क्रिया को अंजाम देने के लिए उनके पास क्लोरोफिल (chlorophyll) होता है और इस प्रक्रिया के लिए ऊर्जा वे सूर्य की रोशनी से प्राप्त करते हैं। इसलिए पेड़-पौधों को स्वपोषी (ऑटोट्रॉफ- autotrophs) कहते हैं। दूसरी ओर सारे जंतु अपना भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। इन्हें हम परपोषी (हेटरोट्रॉफ – heterotrophs) कहते हैं। इस मोटी-मोटी परिभाषा के बाद थोड़ा बारीकी पर चलें।

क्या आपने कभी परपोषी पौधों (heterotrophic plants) के बारे में सुना है? चौंकिए मत, बहुत थोड़े से ही सही मगर परजीवी पौधे (parasitic plants) होते हैं। अमरबेल जैसे पौधे परजीवी हैं। ये किसी अन्य पौधे पर लिपटते हैं और अपनी विशेष चूषक जड़ें (होस्टोरियम- haustorium) उसमें घुसा देते हैं और उसके अंदर से भोजन व पानी प्राप्त करते रहते हैं। मेज़बान पौधा स्वपोषी होता है। अलबत्ता किसी अन्य पौधे का सहारा लेने वाले सभी पौधों को परजीवी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वे सिर्फ सहारा लेते हों, भोजन-पानी नहीं। कई सारी लताएं, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड्स (orchids) इस श्रेणी में आते हैं।

अब परपोषी पौधों के एक अनोखे समूह की चर्चा करते हैं। ऊपर हमने देखा कि परजीवी पौधे किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन चुराते हैं। लेकिन पौधों का एक समूह है जो फफूंद से भोजन-पानी की चोरी करते हैं। अब दिलचस्प बात यह है कि फफूंद स्वयं अपना भोजन नहीं बनातीं; उनमें क्लोरोफिल का अभाव जो होता है। फफूंद यानी कवक किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन की चोरी करती हैं (हालांकि वे बदले में कुछ देती भी हैं)। और अब हम जिन पौधों की बात करने जा रहे हैं वे फफूंद से भोजन चुरा लेते हैं – यानी चोर के घर में चोरी!

इन पौधों को कवक-परपोषी या मायकोहेटरोट्रॉफ (mycoheterotrophs) कहते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले ये पौधे अपनी जड़ों को मिट्टी में मौजूद कवक के धागों (कवक-तंतु यानी हाइफा) के साथ जोड़ते हैं।

पेड़-पौधों और कवकों का सम्बंध काफी प्राचीन और पेचीदा है। मायकोराइज़ा (mycorrhiza) के रूप में ये कवक पेड़-पौधों से कार्बन प्राप्त करते हैं और बदले में पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। यानी कवकों को परजीवी कहने की बजाय सहजीवी (symbiotic organisms) कहना बेहतर है। मायकोराइज़ा दरअसल एक सम्बंध का नाम है – फफूंद-तंतुओं और पेड़-पौधों की जड़ों के बीच परस्पर लाभदायक सम्बंध (mutualism)। इसमें फफूंद का दूर- Text Box: कुछ कवक-परपोषी पौधे
1. मोनोट्रॉपेस्ट्रम किरीशिमेन्स (Monotropastrum kirishimense): अपनी गुलाबी पंखुड़ियों के कारण, एम. किरीशिमेन्स को लंबे समय से सफेद एम. ह्यूमाइल का एक प्रकार माना जाता था जो पूरे एशिया में आम तौर पर पाया जाता है। लेकिन दो दशक पहले, वनस्पतिशास्त्री केंजी सुएत्सुगु ने पाया कि दोनों पौधों में फूल अलग-अलग समय पर आते हैं। जांच से पता चला कि एम. किरीशिमेन्स एक नई प्रजाति है जो केवल जापान में पाई जाती है। और इसमें हल्के सफेद रंग के फूल आते हैं।
2 स्पिरैन्थेस हचिजोएन्सिस (Spiranthes hachijoensis): आर्किड वंश के पौधों को आम तौर पर ‘लेडीज़ ट्रेसेस' कहा जाता है क्योंकि उनके छोटे फूल तने के चारों ओर सर्पिलाकार रूप में चोटी की तरह गुंथे होते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना था कि जापान में केवल एक ही स्पिरैन्थेस प्रजाति मौजूद है, जब तक कि वनस्पतिशास्त्रियों ने यह नहीं देखा था कि कुछ पौधे दूसरों की तुलना में पहले खिलते हैं। दस साल के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि जल्दी खिलने वाले पौधे नई प्रजाति, एस. हचिजोएन्सिस, के सदस्य हैं।
3. थिस्मिया कोबेन्सिस (Thismia kobensis): 1999 में विकास कार्यों के कारण इसके अंतिम ज्ञात नमूने का निवास स्थान नष्ट हो जाने के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था। लेकिन 2021 में एक शौकिया वनस्पतिशास्त्री को संयोग से 30 किलोमीटर दूर यह पौधा मिला। इस प्रजाति के पौधों की संख्या दो दर्जन से भी कम है।
4. ओरिऑर्चिस पेटेंस (Oreorchis patens): कुछ आर्किड प्रजातियां प्रकाश संश्लेषण और परजीवी कवक, दोनों का उपयोग करके फलती-फूलती हैं। इसका एक उदाहरण ओ. पेटेंस है। वैसे तो यह पौधा केवल प्रकाश संश्लेषण पर ही जीवित रह सकता है लेकिन अगर इसे सही जगह पर लगाया जाए, तो ओ. पेटेंस की जड़ें लकड़ी को विघटित करने वाले कवकों को खाती हैं। परिणामस्वरूप, एक अधिक मजबूत पौधा विकसित होता है।
5. रेलिक्टिथिस्मिया किमोट्सुकिएन्सिस (Relictithismia kimotsukiensis): 2022 में, एक जापानी यात्री को एक असामान्य पौधा दिखाई दिया। थिस्मियेसी कुल के पौधों को आम तौर पर फेयरी लैंटर्न (परियों का लालटेन) कहा जाता है। (जापान में इन्हें Tanuki-no-shokudai कहते हैं जिसका अर्थ होता है रैकून डॉग कैंडलस्टिक्स)। इस प्रजाति की प्रमुख विशेषता इसके भूमिगत फूल हैं।
दूर तक फैला नेटवर्क पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है, वहीं पौधे उन्हें प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) से बनी शर्करा उपलब्ध कराते हैं। यह सहजीवी सम्बंध लगभग 90 प्रतिशत थलीय पेड़-पौधों में पाया जाता है।

दरअसल, फफूंद तंतुओं (हायफा) (hyphal network)का एक जाल बनाती हैं जो मिट्टी में दूर-दूर तक फैला होता है। इसकी मदद से वे पानी के अलावा नाइट्रोजन (nitrogen) व फॉस्फोरस (phosphorus) जैसे अनिवार्य पोषक खनिज प्राप्त करती हैं। इनमें कुछ पानी तथा खनिज पौधे की जड़ों को मिल जाते हैं। बदले में पौधा शर्करा प्रदान कर देता है। माना जाता है कि पौधों की जड़ों का भूमिगत कवकों से सम्बंध पौधों के ज़मीन पर पहुंचने और बसने में निर्णायक रहा है।

लेकिन हम जिन कवक-परपोषियों की बात कर रहे हैं, वे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल पर निर्भर रहने की बजाय कवक से कुछ कार्बनिक पदार्थ चुरा लेते हैं। यानी यह सम्बंध सहजीवन का नहीं बल्कि परजीविता (parasitism) का है।

ऐसा अनुमान है कि 33,000 से ज़्यादा पादप प्रजातियां अंकुरण और प्रारंभिक विकास के दौरान कवक-परपोषी होती हैं। इनमें कुछ क्लब मॉस (club moss), फर्न, लिवरवर्ट (liverworts) और सभी ऑर्किड शामिल हैं। वनस्पति शास्त्रियों ने लगभग 600 ऐसी पादप प्रजातियों की भी पहचान की है जो जीवन भर कवक-परपोषी होती हैं। इनमें से लगभग आधी तो ऑर्किड प्रजातियां हैं। 10 वनस्पति कुलों की करीब 400 प्रजातियों में क्लोरोफिल पूरी तरह समाप्त हो चुका है और ये फफूंद के ज़रिए अन्य हरे पेड़-पौधों से कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। इसके अलावा लगभग 20,000 प्रजातियां आंशिक रूप से कवक-परपोषी हैं, जो प्रकाश संश्लेषण भी करती हैं और कवक से भी कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। ये अधिकांशत: अंकुरण के कुछ समय बाद तक ही फफूंदों पर निर्भर होती हैं।

वैसे ऑर्किड्स में फफूंद मायकोराइज़ा (orchid mycorrhiza) पर निर्भरता विवाद का विषय रही है। हालांकि सारे ऑर्किड्स अपने शुरुआती विकास के दौरान कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करने के लिए फफूंदों पर निर्भर रहते हैं लेकिन कई ऑर्किड्स वयस्क अवस्था में इस निर्भरता से मुक्त हो जाते हैं। रेडियोकार्बन ट्रेसिंग (radiocarbon tracing) के आधार पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक हरे ऑर्किड गुडयेरा रेपेन्स (Goodyera repens) का अपने फफूंद साथी (Ceratobasidium cornigerum) से सम्बंध परपोषिता का नहीं बल्कि सहजीविता का होता है।

कवक-परपोषी पौधे: इकॉलॉजी

कवक-परपोषिता एक प्रकार का परजीवी पोषण (parasitic nutrition) तरीका है जहां कुछ पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की बजाय फफूंद से सीधे कार्बनिक पदार्थों (organic nutrients) के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह सम्बंध कई वनस्पति समूहों में पाया गया है जो या तो केवल बीजों के अंकुरण के समय या जीवन भर के लिए होता है। क्लोरोफिल के अभाव वाले गैर प्रकाश संश्लेषी पौधों (non-photosynthetic plants) में यह पूर्णकालिक होता है और ये पीले या क्रीम रंग के होते हैं।

ये पौधे वहां अक्सर पाए जाते हैं जहां पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होती है या घने जंगलों की तलहटी में पाए जाते हैं जहां प्रकाश नहीं पहुंचता।

कवक-परपोषी वस्तुत: जड़ फफूंद जाल (नेटवर्क) (fungal root network) को धोखा देते हैं और उनसे होने वाले कार्बन प्रवाह पर निर्भर रहते हैं जो सामान्यत: अन्य पौधों में परस्पर लेन-देन वाला होता है। कुल मिलाकर ये पौधे चोर हैं जो फफूंदों से सिर्फ लेते ही हैं, बदले में कुछ देते नहीं। किसी स्थान पर इनका पाया जाना प्रकाश की कमी और मिट्टी में पोषक पदार्थ के अभाव से सम्बंधित होता है। लगता है, मिट्टी में फॉस्फोरस की कमी (phosphorus deficiency) भी कवक-परपोषिता को बढ़ावा देती है।

आखिर क्यों?

जीव वैज्ञानिकों (evolutionary biologists) को यह सवाल सताता रहा है कि आखिर स्वपोषी पौधों में यह कवक-परपोषिता क्योंकर विकसित हुई होगी। वैकासिक जीव विज्ञानियों ने इस बात के प्रमाण पाए हैं कि जैव विकास की प्रक्रिया में पूर्ण कवक-परपोषिता कम से कम 50 से ज़्यादा बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है। हो सकता है यह घने जंगलों, जहां प्रकाश कम होता है, में जीवित रहने के लिए एक अनुकूलन हो। लेकिन वैसे अभी कोई निश्चित कारण सामने नहीं आया है।

कोबे विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री केन्जू सुएत्सुगु कहते हैं कि जवाब न मिलने का कारण शायद यह है कि कवक-परपोषी पौधों पर बहुत कम शोध (limited research) किया गया है।

दरअसल, कवक-परपोषी वनस्पतियों पर सुएत्सुगु के अद्भुत वैज्ञानिक कार्य के चलते आज उन्हें इस विषय का प्रमुख विद्वान माना जाता है। पिछले वर्षों में उन्होंने इन पौधों के अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया है।

बीजों का बिखराव और परागण

एक सवाल यह भी था कि ऐसे पौधों में परागण कैसे होता है और इनके बीज दूर-दूर तक बिखरते कैसे हैं। ऐसा माना जाता था कि कई कवक-परपोषी अपने धूल के कणों के आकार के बीजों को बिखेरने के लिए हवा पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके विरुद्ध तर्क यह था कि यह थोड़ा जोखिम भरा होगा क्योंकि एक तो इन पौधों का कद छोटा है और घने जंगलों में हवाएं भी कमज़ोर होती हैं।

सुएत्सुगु ने तीन प्रजातियों – योनिया अमाजिएंसिस, फेसेलैंथस ट्यूबिफ्लोरस और मोनोट्रॉपेस्ट्रम ह्यूमाइल (Yoania amagiensis, Phacellanthus tubiflorus, Montropastrum humile) – का गति-संचालित कैमरों (motion-triggered cameras) से 190 घंटे तक अवलोकन किया। पता चला कि गुफा झींगुर और ज़मीनी गुबरैले इन पौधों के बीजों से लदे फल खा गए। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इन पौधों के सैकड़ों बीज गुफा झींगुरों के पेट से गुज़रने के बाद भी जीवनक्षम बने रहे; जबकि ज़मीनी भृंगों द्वारा निगले जाने पर एक भी बीज जीवित नहीं बचा। पता चला कि एक काष्ठ आवरण बीजों को झींगुर के पाचक रस से तो बचाता है, लेकिन भृंग के चबाने से नहीं।

सुएत्सुगु ने अन्य अप्रत्याशित परागणकर्ताओं और बीज बिखेरने वालों की पहचान की है। कैमरा ट्रैप में एक क्लबियोना मकड़ी को आर्किड नियोटिएन्थे क्यूकुलेटा (Neottianthe cucullata) का रस चूसते और अपने जबड़ों में परागकणों को चिपकाए फूलों के बीच घूमते हुए कैद किया गया। उनके समूह ने पहली बार दिखाया कि गुफा झींगुर (cave crickets) और ऊंट झींगुर तथा चींटियां परागण और बीज बिखेरने दोनों का  काम करते हैं। वुडलाउस (Porcellio scaber) एम. ह्यूमाइल के फल खाकर मल के साथ जीवनक्षम बीज उत्सर्जित कर सकते हैं। देखा जाए, तो ये वुडलाइस जीवजगत में सबसे नन्हे बीज प्रकीर्णक हैं। 

वैसे कवक-परपोषी पौधों में स्व-परागण भी होता है। जैसे एक आर्किड, स्टिग्मैटोडैक्टाइलस सिकोकिएनस (Stigmatodactylus sikokianus) स्व-परागण और पर-परागण दोनों आज़माता है। इसका फूल शुरू में तो खुला होता है, जिससे परागणकर्ताओं को मौका मिलता है। लेकिन कुछ ही दिन बाद, वर्तिकाग्र, यानी मादा अंग, संकुचित हो जाता है, जिससे एक छोटा, उंगली जैसा उपांग फूल के नर अंग (परागकोश) के संपर्क में आ जाता है और परागकण अंडाशय तक पहुंच जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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पुनर्जनन के दौरान अंग की मूल आकृति का निर्माण

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

चाहे सुंदर दिखने के लिए या सफाई और सहूलियत के लिए हम कभी-कभी नाखून काटते हैं (nail growth), लेकिन थोड़े दिनों बाद ही वे वापस बढ़ जाते हैं। किरेटिन नामक प्रोटीन (keratin protein) से बने नाखून हमें क्षति से सुरक्षित रखते हैं। यदि किसी नवजात शिशु की उंगली के ऊपरी पोर वाला हिस्सा (जोड़ के पहले तक की किसी जगह से) (finger regeneration) कट या टूट जाता है तो उंगली अपनी मूल आकृति में पुन: बन जाती है।

वर्ष 2013 में नेचर पत्रिका में मकोतो टेकिओ और उनके साथियों ने बताया था कि नाखूनों की तली में स्टेम कोशिकाएं (stem cells) होती हैं, जो न सिर्फ निरंतर सख्त और किरेटिनयुक्त नाखून बनाने वाली कोशिकाओं में बदलती रहती हैं, बल्कि वे ऐसे संकेत भी भेजती हैं जो उंगली के पुनर्जनन (finger healing) को गति देते हैं। गौरतलब है कि स्टेम कोशिकाएं कई प्रकार की कोशिकाओं में तब्दील और विकसित (cell regeneration) हो सकती हैं। ये कोशिकाएं Wnt संकेत मार्ग को सक्रिय करती हैं; यह प्रक्रिया पुनर्जनन के लिए आवश्यक तंत्रिकाओं को आकर्षित करती है।

छिपकली हमारे घरों में एक अनचाहा मेहमान है। हम अक्सर इसे मारने की कोशिश करते हैं, लेकिन अक्सर हाथ केवल इसकी पूंछ ही आती है। भगोड़ी छिपकली (lizard tail regeneration) अपनी पूंछ छोड़कर भाग निकलती है और उसे फिर से बना लेती है, ठीक नवजात शिशु की घायल उंगली की तरह।

इस प्रक्रिया की आणविक जैविकी का सार एलिज़ाबेथ हचिन्स और उनके साथियों ने 2014 में प्लॉसवन पत्रिका में प्रस्तुत किया था। इस प्रक्रिया को अंजाम देने में 300 से अधिक जीन शामिल होते हैं। और इस दौरान घाव को भरने और पूंछ वापस उगाने के लिए कई विकासात्मक और घाव-प्रतिक्रिया पथ सक्रिय होते हैं।

हालांकि जंतुओं और वनस्पतियों दोनों में घाव की मरम्मत सम्बंधी शोध पारंपरिक रूप से जीन-नियंत्रित क्रियापथों पर केंद्रित रहा है। लेकिन हालिया शोध विकासात्मक पादप विज्ञान (plant regeneration) में भौतिक संकेतों की महत्वपूर्ण भूमिका (mechanical signals in biology) पर प्रकाश डालता हैं। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान (IISER, पुणे) की मेबेल मारिया मैथ्यू और कालिका प्रसाद ने हाल ही में करंट बायोलॉजी में प्रकाशित अपने एक अध्ययन में विकास और पुनर्जनन पर एक कम अध्ययन किए गए लेकिन महत्वपूर्ण कारक पर प्रकाश डाला है: कोशिकीय ज्यामिति(cell geometry)।

शोधकर्ताओं ने अध्ययन में देखा की कि कैसे शंक्वाकार आकृति का मूलाग्र कट जाने के बाद पुन: अपने आकार में पनप जाता है। उन्होंने पाया कि मौजूदा कोशिकाओं ने अपनी ज्यामिति को बदलकर नई बनी कोशिकाओं की कतार को एक तिरछे, झुके पथ पर संरेखित किया। अंतत: कोशिकाओं की इन तिरछी पंक्तियों ने जड़ की शंक्वाकार आकृति का पुनर्निर्माण किया। तकनीकी शब्दों में, इस प्रक्रिया को आकृति-जनन (morphogenesis process) कहा जाता है। आकृति-जनन वह जैविक प्रक्रिया (biological development) है जो किसी जीव को उसका आकार और संरचना विकसित करने में मदद करती है। इसमें कोशिकाओं की समन्वित वृद्धि, विभाजन, विभेदन और व्यवस्थापन शामिल होता है जिससे ऊतक, अंग और यहां तक कि एक संपूर्ण जीव का निर्माण होता है।

मूलाग्र पुनर्जनन की प्रणाली का अध्ययन सरसों परिवार के एरेबिडोप्सिस थैलिआना (Arabidopsis thaliana) पौधे पर किया गया था। इसमें यह समझा गया था कि कोशिका ज्यामिति में परिवर्तन आकृति-जनन में कैसे योगदान देते हैं और उसे सुगम बनाते हैं।

उन्नत सूक्ष्मदर्शी और उपकरणों (advanced microscopy) की मदद से टीम ने देखा कि जड़ों की सामान्य घनाकार कोशिकाओं की आकृति बदलकर समचतुर्भुज (rhomboid) हो गई। फिर ये परिवर्तित कोशिकाएं विकर्ण रेखा पर विभाजित हुईं जिससे त्रिकोणीय प्रिज़्म आकृति की कोशिकाएं बनीं। विकर्ण रेखा से विभाजन ने आस-पड़ोस की कोशिकाओं की वृद्धि (cell division) को एक तिरछे पथ पर मोड़ा, जिन्होंने मिलकर कटा हुआ पतला सिरा फिर से बनाया।

गणितीय और भौतिक विश्लेषण करने पर पता चला कि इन बदलावों के पीछे जो वास्तविक बल काम करता है वह है आंतरिक यांत्रिक तनाव (mechanical stress)। यह एक प्रकार का तनाव है जो कोशिकाओं को आकार बदलने और निर्धारित रूप से विभाजित होने (cell growth patterns) के लिए उकसाता है।

आकृति-जनन को समझने में जहां लंबे समय से स्टेम कोशिकाएं (stem cell research) और जेनेटिक क्रियापथ (genetic studies)  अध्ययन का केंद्र रहे हैं, वहां यह अध्ययन एक अनदेखे महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता है: कोशिकाएं तनाव में अपनी आकृति को कैसे ढालती हैं। यह दर्शाता है कि कोशिका की आकृति और ज्यामिति ऊतक पुनर्जनन (tissue regeneration) के दौरान आकृति-जनन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

ये निष्कर्ष अन्य जैविक प्रणालियों पर भी लागू हो सकते हैं। ये जीवन को आकार देने में  भौतिक संकेतों, विशेष रूप से कोशिकीय ज्यामिति की भूमिका दर्शाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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हेलिकोनिया: एक अद्भुत उष्णकटिबंधीय वनस्पति वंश

अंकुर ज्योति शईकीया

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले हेलिकोनिया वंश के पौधे अपनी चमकदार पुष्प संरचनाओं और घने पत्तों के लिए मशहूर हैं (tropical plants, heliconia flowers)। इन्हें ‘लॉब्स्टर क्लॉ'(lobster claw), ‘जंगली केला’ या ‘फाल्स बर्ड-ऑफ-पैराडाइज’ के नाम से भी जाना जाता है। ये पौधे न केवल देखने में सुंदर होते हैं बल्कि मध्य और दक्षिण अमेरिका, कैरेबियन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों के वर्षावनों में पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं (rainforest ecosystem plants)। हाल के वैज्ञानिक शोधों ने इनके विकास, पारिस्थितिक महत्व, संरक्षण की स्थिति और बागवानी व कृषि में बढ़ती भूमिका पर नई रोशनी डाली है।

हेलिकोनिया वंश में लगभग 200 प्रजातियां हैं, जिनकी पहचान वे खास सहपत्र (bracts) हैं – ये संरचनाएं चटख रंग (colorful bracts) की और मोम (wax like flower structure) जैसी होती हैं, जो अक्सर इनके वास्तविक फूलों से ज़्यादा आकर्षक होती हैं। सहपत्र लाल, नारंगी, पीले और गुलाबी रंगों में होते हैं, जिससे हेलिकोनिया बागवानों और फूल व्यापारियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन इनकी सजावटी सुंदरता के अलावा, ये पौधे उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी तंत्र में भी गहराई से रचे-बसे हैं।

हेलिकोनिया का विकास अनुकूलन और सह-विकास की कहानी है। आणविक शोध से पता चला है कि इस वंश में प्रजातियों का तेज़ी से विविधीकरण (plant speciation) हुआ है। इसका मुख्य कारण है इनका हमिंगबर्ड्स के साथ घनिष्ठ सम्बंध। कई हेलिकोनिया प्रजातियों के फूल विशिष्ट हमिंगबर्ड्स द्वारा परागण (hummingbird pollination) के लिए अनुकूलित हैं – इनके लंबे, नलीनुमा फूल हमिंगबर्ड्स की लंबी चोंच के हिसाब से ढले हैं। इनका सम्बंध इतना विशिष्ट है कि इनमें से एक में भी बदलाव होने पर दूसरे में भी विकासात्मक परिवर्तन होते हैं; इसे सह-विकास कहते हैं।

विकास का सहगान

हमिंगबर्ड्स द्वारा हेलिकोनिया का परागण पारिस्थितिक विशेषज्ञता का उत्कृष्ट उदाहरण (ecological pollination systems) है। कुछ हेलिकोनिया प्रजातियां ‘ट्रैपलाइनर’ हमिंगबर्ड्स द्वारा परागित होती हैं – ये पक्षी दूर-दूर के, यहां तक कि अपने इलाके के बाहर के फूलों को भी परागित (trapliner hummingbirds) हैं। हेलिकोनिया टोर्टुओसा जैसी प्रजातियों की आनुवंशिक संरचना पर इस व्यवहार का गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे वनों के खंडित होने के बावजूद जनसंख्या में जीन प्रवाह बना रहता (gene flow in fragmented forests) है। अर्थात, जंगल के टुकड़ों में बंट जाने के बाद भी, इन पौधों के बीच उनके जीन्स एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं और उनकी आबादी में विविधता बनी रहती है।

ये जटिल पारस्परिक सम्बंध पौधों और उनके परागणकर्ताओं दोनों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते (plant-pollinator conservation) हैं। एक के नुकसान से दूसरे की भी हानि हो सकती है, जिससे उष्णकटिबंधीय जैव विविधता का संतुलन बिगड़ सकता (tropical biodiversity loss) है।

संरक्षण संकट की आहट

अपनी पारिस्थितिक महत्ता और बागवानी में लोकप्रियता के बावजूद, जंगली हेलिकोनिया प्रजातियां गंभीर खतरे का सामना कर (threatened plant species) रही हैं। हाल ही में हुए एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि लगभग आधी हेलिकोनिया प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण है वनों की कटाई, कृषि विस्तार और शहरीकरण। कई प्रजातियां बहुत सीमित क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जिससे वे और भी संवेदनशील हैं।

चिंता की बात यह है कि संकटग्रस्त हेलिकोनिया प्रजातियों का एक बड़ा हिस्सा संरक्षित क्षेत्रों या वनस्पति उद्यानों में संरक्षित नहीं है। संरक्षण के इस अंतर को दूर करने के लिए अध्ययन में प्राथमिकता वाली प्रजातियों की पहचान, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार और हेलिकोनिया को पुनर्वनीकरण और कृषि परियोजनाओं में शामिल करने की सिफारिश की गई है।

जंगल से गुलदस्ते तक

हेलिकोनिया की आकर्षक बनावट और लंबे समय तक टिकने वाले फूलों ने इसे वैश्विक पुष्प उद्योग में लोकप्रिय बना दिया है। हाल के वर्षों में अनुसंधान ने हेलिकोनिया पुष्पों की ताज़गी बनाए रखने, निर्जलीकरण, फफूंदी, और परिवहन के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्नत संरक्षण तकनीकों और विशेष पैकेजिंग के उपयोग से हेलिकोनिया की ताज़गी और बाज़ार में पहुंच बढ़ी है।

भारत में इसकी खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। शोध से पता चला है कि नारियल के बागानों में हेलिकोनिया को अंतर-फसल के रूप में उगाने से किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है और भूमि की पारिस्थितिकी व सुंदरता भी बढ़ती है। हेलिकोनिया आंशिक छाया में भी अच्छी तरह बढ़ता है और इसकी देखभाल आसान है, जिससे यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय कृषि प्रणालियों के लिए उपयुक्त है।

हालांकि हेलिकोनिया के व्यापारिक भविष्य की संभावनाएं उज्ज्वल हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। खेती में प्रयुक्त किस्मों की आनुवंशिक विविधता जंगली प्रजातियों की तुलना में कम है; जिससे वे कीट, रोग और पर्यावरणीय तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। जंगली हेलिकोनिया की आनुवंशिक सामग्री का संरक्षण और सतत उपयोग आवश्यक है, ताकि इनसे नई किस्मों का विकास हो सके।

इसके अलावा, फूलों के रूप में हेलिकोनिया की सफलता न केवल संरक्षण तकनीक पर निर्भर करती है बल्कि नई किस्मों के विकास पर भी निर्भर करती है; जिनमें आकर्षक रंग, सुगठित आकार और रोग प्रतिरोध जैसी विशेषताएं हों। इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी, ऊतक संवर्धन और आणविक प्रजनन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।

हेलिकोनिया की कहानी उष्णकटिबंधीय जैव विविधता के समक्ष खड़ी चुनौतियों का प्रतीक है। यह वंश पौधों, जानवरों और मनुष्यों के बीच जटिल सम्बंधों और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को दर्शाता है। संरक्षण विशेषज्ञ हेलिकोनिया को पुनर्वनीकरण, कृषि और सामाजिक वानिकी में शामिल करने की सलाह देते हैं, ताकि न केवल इस वंश की रक्षा हो, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र सुदृढ़ हों।

वनस्पति उद्यान और बाह्य-स्थान संरक्षण संग्रहालय इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हेलिकोनिया प्रजातियों की खेती और उन्हें शोधकर्ताओं व किसानों के लिए उपलब्ध कराने से ये वनस्पति उद्यान और संरक्षण संग्रहालय संरक्षण और व्यापार के बीच सेतु का कार्य कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक पादप मॉडल का अनदेखा पहलू

रसों परिवार (ब्रेसिकेसी) का एक छोटा सा पौधा है थेल क्रेस (Arabidopsis thaliana)। 20-25 से.मी. लंबे इस पौधे में अधिकतर पत्तियां ज़मीन से सटकर, फूलनुमा आकृति बनाते हुए लगती हैं और बहुत थोड़ी पत्तियां ऊपर तने पर भी लगती हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। यह पौधा मूलत: युरेशिया और अफ्रीका (Eurasia native weed plant) में पाया जाता है। भारत में यह हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है। यह खाली पड़े मैदान, सड़क किनारे, रेललाइन किनारे, खेतों में, कहीं भी उगता देखा जा सकता है, इसलिए इसे खरपतवार की तरह देखा जाता है, हालांकि कुछ जगहों पर इसे खाया भी जाता है।

थेल क्रेस पौधे की कुछ खास बातें हैं। एक तो इसका जीवन चक्र छोटा होता है, अंकुरण से लेकर वापस बीज बनने तक का इसका चक्र 6 हफ्तों में पूरा हो सकता है; यह खरपतवार की तरह आसानी से फल-फूल जाता है; इसका पौधा साइज़ में छोटा तो होता ही है, साथ ही इसका जीनोम भी सरल होता है (simple genome model plant)। अपनी इन सभी खूबियों के कारण 1900 के दशक से ही पादप विज्ञान में थेल क्रेस पर अध्ययन किए जाने लगे थे(model organism in plant biology)। फूलदार पौधों की जेनेटिक, आणविक कार्यप्रणाली को समझने में थेल क्रेस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सबसे पहला संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण भी इसी पौधे का किया गया था(first plant genome sequencing)। और तो और, पादप विज्ञान का यह मॉडल पौधा 2019 में चांग ई-4 लैंडर के साथ चांद की भी सैर कर चुका है(Arabidopsis on Moon)।

और अब, इस पौधे के एक अनछुए पहलू का अध्ययन कर पादप विज्ञानी रियुशिरो कासाहारा और उनके दल ने इसकी एक ओर खासियत उजागर की है जो खेती के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है(crop yield improvement)। पता चला है कि (कम से कम) यह पौधा बड़ी चतुराई से अपने सिर्फ उन्हीं बीजांडों तक पोषण पहुंचने देता है जो निषेचित हो चुके होते हैं। और, अपने गैर-निषेचित बीजांड तक पोषण पहुंचने से रोकता है, जिससे पोषण का सदुपयोग होता है और बीज बड़ा बनता है(seed size enhancement)। और, बड़ा बीज यानी पैदावार में वृद्धि।

लेकिन अन्य फसलों में बीज कैसे बड़ा किया जाए? इस पर बात करने के पहले थोड़ा इस पर बात कर लेते हैं कि शोधकर्ताओं को यह बात पता कैसे चली। दरअसल, कासाहारा यह समझना चाह रहे थे कि पौधे बीज कैसे बनाते हैं(seed development in plants)? इसके लिए कासाहारा ने थेल क्रेस को अध्ययन के लिए चुना और अपना सारा ध्यान इसके फूल के उस स्थान पर केंद्रित किया जहां कई सारी नलिकाओं (फ्लोएम) के माध्यम से पोषक तत्व पहुंचकर विकासशील भ्रूण को पोषण देते हैं(phloem transport in plants)।

नीले रंजक का इस्तेमाल कर उन्होंने इस हिस्से में कैलोस का असर देखा। गौरतलब है कि कैलोस पौधों में अस्थायी कोशिका भित्ति बनाकर पौधों के लिए कई काम करता है और पौधों को सुरक्षा प्रदान करता है; जैसे यह पौधों के घावों को भरने में मदद करता है। पता चला कि फ्लोएम के अंतिम छोर पर बीजांड के पास की कोशिकाओं में कैलोस बन रहा था (callose formation in plants)। कैलोस ने फ्लोएम के सिरे के चारों ओर एक तश्तरी जैसा अवरोध (भित्ति) बना दिया था। फिर, अधिकांश निषेचित बीजांडों से वह अवरोध गायब हो गया था, और वहां मात्र एक छल्ला रह गया था – जल्द ही वह छल्ला भी लुप्त हो गया था। लेकिन जो बीजांड निषेचित नहीं हुए थे उनमें अवरोध जस-का-तस बना रहा। इससे समझ आया कि कैलोसयुक्त कोशिकाएं एक दीवार का काम करती हैं, जो फ्लोएम के पोषक तत्वों को गैर-निषेचित बीजांडों में जाने से रोकती हैं(nutrient regulation in fertilized ovules)। इस तरह पौधा गैर-निषेचित बीजांड में अतिरिक्त पोषण ज़ाया करने से बच जाता है।

अब सवाल था कि वह क्या शय है जो निषेचित बीजांड से कैलोस-अवरोध हटा देती है। शोधकर्ताओं की यह तलाश एक ऐसे एंज़ाइम, AtBG_ppap, पर जाकर खत्म हुई जो कैलोस को विघटित करने (या हटाने) की क्षमता रखता है(AtBG_ppap enzyme function)। और इसी एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को अधिक सक्रिय कर कुछ फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है(gene expression for higher yield)।

इस बात का खुलासा भी थेल क्रेस पर किए गए अध्ययन से हुआ। शोधकर्ताओं ने जब इस पौधे में AtBG_ppap एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को शांत किया तो पाया कि पौधे में सभी बीजांड (निषेचित और गैर-निषेचित) पर कैलोस भित्ति काफी हद तक वैसी की वैसी बनी रही थी। इसके कारण इस जीन के प्रभाव से मुक्त पौधों के बीज सामान्य पौधों के बीज के साइज़ की तुलना में 8 प्रतिशत छोटे बने थे। लेकिन जब टीम ने इन पौधों में AtBG_ppap एंज़ाइम के जीन को अति सक्रिय किया तो पाया कि ऐसा करने पर बीज सामान्य पौधों के बीजों की तुलना में 17 प्रतिशत बड़े विकसित हुए(enhanced seed size via gene editing)। संभवत: इसलिए कि निषेचित बीजांड की कैलोस-भित्ति आसानी से टूट गई होगी और अधिक पोषक तत्व निषेचित बीजांड तक पहुंचे होंगे।

ऐसा ही उन्होंने धान के पौधों पर भी करके देखा तो उन्हें ऐसे ही नतीजे मिले – AtBG_ppap एंज़ाइम के जीन को अधिक व्यक्त करवाने पर चावल के दाने की साइज़ 9 प्रतिशत बढ़ गई थी(larger rice grain size)। लेकिन चावल के बड़े दाने होने से शायद इसके स्वाद पर फर्क पड़े, हालांकि स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने जैसी बात तो अध्ययन में सामने नहीं आई है। लेकिन बड़े बीज वाली फसलें सोयाबीन, मक्का और गेहूं जैसी फसलों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं (yield optimization in soybean and maize)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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