मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

ज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.tripadvisor.in/Attraction_Review-g2282389-d3913026-Reviews-Gandhi_Sagar_Dam-Neemuch_Neemuch_District_Madhya_Pradesh.html

भवनों की मानकीकृत रिपोर्टिंग हरित विकल्पों को सशक्त बनाएगी

हर्षदा अकोलकर, श्वेता कुलकर्णी

भारत की बढ़ती आबादी के लिए आवास और बुनियादी निर्माण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए देश में भवन निर्माण (construction sector) और निर्माण सामग्री तेज़ी से बढ़ रहे हैं। लेकिन यह बढ़त ऊर्जा खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emissions) में भी काफी योगदान देती है। भवन-निर्माणों के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार ने ऊर्जा दक्षता और टिकाऊपन/वहनीयता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए हैं।

सरकार की प्रमुख पहलों में से एक है ऊर्जा संरक्षण टिकाऊ भवन संहिता (Energy Conservation Sustainable Building Code, ECSBC)। इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा विकसित किया गया है और विद्युत मंत्रालय (MoP) द्वारा लागू किया गया है। ECSBC में नए वाणिज्यिक और आवासीय भवनों के लिए न्यूनतम ऊर्जा दक्षता मानक निर्धारित हैं, और मूलत: इन्हें ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) के आधार पर विकसित किया गया है। इसमें ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और भवन के लिए अन्य हरित भवन आवश्यकताओं के मानदंड/मानक भी शामिल हैं। ECSBC के अलावा, कई निजी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समर्थित स्वैच्छिक हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम्स भी व्यापक रूप से लागू हैं।

ये हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम ऊर्जा और जल दक्षता, टिकाऊ/वहनीय निर्माण सामग्री का उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और भीतरी पर्यावरण गुणवत्ता सहित कई टिकाऊ/वहनीय मानकों के आधार पर परियोजनाओं का आकलन और प्रमाणन करते हैं। हालांकि ये रेटिंग सिस्टम्स आवासीय और वाणिज्यिक दोनों तरह के भवनों के लिए हैं, लेकिन इनका उपयोग अभी भी सीमित है – विशेष रूप से आवासीय क्षेत्र में। हालांकि न केवल केंद्र स्तर पर बल्कि नगर पालिकाओं के स्तर पर भी इन नीतियों को समर्थन हासिल है, लेकिन भारत की कुल भवन निर्माण/सामग्री का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही हरित प्रमाणित है। हरित भवन निर्माण अपनाने में एक प्रमुख बाधा है हरित इमारतों के जीवनपर्यंत मिलने वाले लाभों के बारे में सीमित जागरूकता और समझ। पूरी जानकारी का अभाव उपभोक्ताओं की सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है।

सूचना हस्तक्षेप

हमारा मानना है कि यदि उपभोक्ताओं को हरित प्रमाणन (green certification) के लाभ बताने वाली सही और प्रासंगिक जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी तो हरित भवनों को अपनाने/बनाने में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

इस कमी को दूर करने के लिए हमारा सुझाव है कि मानकीकृत वहनीयता दर्शाने वाला एक प्रारूप (standard sustainability disclosure) बनाया जाए, जिसका उपयोग निर्माता अपनी परियोजनाओं का प्रचार-प्रसार करते समय करें। यह प्रारूप संभावित खरीदारों को भवन के पर्यावरणीय फायदों और टिकाऊ/वहनीय विशेषताओं के बारे में बताने का एक स्पष्ट, विश्वसनीय और तुलनीय तरीका होगा। ऊर्जा दक्षता, जल खपत, प्रयुक्त सामग्री और प्रमाणन जैसी महत्वपूर्ण जानकारी को सुलभ और समझने योग्य बनाकर यह प्रारूप रियल एस्टेट बाज़ार में पारदर्शिता (real estate transparency) बढ़ा सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपभोक्ताओं को विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगा और हरित भवनों के लाभों के बारे में उनकी जागरूकता बढ़ाएगा। जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ेगी, पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार निर्माण की मांग भी बढ़ सकती है, जिससे बाज़ार भी टिकाऊ/वहनीय प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित होगा। भारत के तेज़ी से हो रहे शहरीकरण (urbanization in India) के मद्देनज़र, ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2047 तक 50 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहेगी। यह तरीका हरित भवन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने और संसाधन-कुशल, कम कार्बन वाले शहरी भवन निर्माण को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

हरित भवन रेटिंग प्रणालियां

पिछले दो दशकों में, भारत में हरित भवन प्रमाणन की इकोसिस्टम (green building ecosystem)  अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा शुरू की गई भारतीय हरित भवन परिषद (IGBC) पहली और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रणाली थी। इसके अलावा अन्य प्रमुख रेटिंग प्रणालियां हैं – दी एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (TERI) की GRIHA, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) की GEM और यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की LEED। ये रेटिंग प्रणालियां विभिन्न प्रकार की इमारतों के लिए दिशानिर्देश देती हैं, जिनमें व्यक्तिगत भवनों से लेकर भवन परिसरों, आस-पड़ोस और यहां तक कि शहर-स्तरीय विकास परियोजनाएं भी शामिल हैं।

परियोजनाओं को हासिल टिकाऊ स्कोर के आधार पर प्रमाण-पत्र मिलता है। हर रेटिंग सिस्टम की रेटिंग वैधता अवधि अलग है; आम तौर पर किसी परियोजना को हासिल रेटिंग 3 से 5 वर्षों तक वैध रहती है। वैधता अवधि समाप्त होने के बाद परियोजनाओं को पुन: प्रमाणन लेना पड़ता है, जो पहले से विद्यमान इमारतों के लिए अलग होता है। पुन: प्रमाणन के समय रेटिंग बदल सकती है। इसमें रहवास-उपरांत ऑडिट के आधार पर परियोजना का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि किसी परियोजना की वहनीयता की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।

समस्त रेटिंग प्रणालियां ऊर्जा दक्षता, जल दक्षता, निर्माण सामग्री एवं संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन आदि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कुछ अनिवार्य और कुछ वैकल्पिक मानदंड निर्धारित करती हैं। इनमें से कुछ रेटिंग प्रणालियां कुछ मानदंडों के अनुपालन के लिए ECBC के उपयोग की भी अनुशंसा करती हैं। गौरतलब है कि हर रेटिंग सिस्टम का समान वहनीय उपायों के लिए वेटेज और स्कोर करने का तरीका अलग होता है। इसलिए, किसी भवन को मिली हरित रेटिंग बस यह बताती है कि वह पारंपरिक/सामान्य भवनों से बेहतर है। अत: यह संभव है कि हरित रेटिंग प्राप्त भवन, हरित भवन का प्रमाणन हासिल करने के लिए निर्धारित पर्याप्त हरित विशेषताओं को पूरा न करता हो।

हरित भवन पदचिह्न

भवन की हरित भवन पदचिह्न की नवीनतम जानकारी हरित भवन रेटिंग सिस्टम के पोर्टल (green building portal)  पर डाली जाती है, और उद्योग विशेषज्ञों द्वारा भवन स्टॉक संख्या का अनुमान भी लगाया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर, देश में कुल भवन निर्माणों में से 5 प्रतिशत भवन IGBC प्रमाणित हैं, 0.4 प्रतिशत GRIHA प्रमाणित भवन हैं और 0.04 प्रतिशत भवन LEED प्रमाणित हैं। यह दर्शाता है कि भारत में हरित भवनों का उपयोग/निर्माण अभी भी काफी कम है।

मानक वहनीयता प्रारूप

हरित विशेषताओं के प्रचार-प्रसार में सुधार और जागरूकता बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है कि भवन विशेषताओं की रिपोर्टिंग का एक मानकीकृत प्रारूप (standard reporting format) बनाया जाए। इस प्रारूप से उपभोक्ता हरित रेटेड बनाम गैर-हरित रेटेड भवन की वहनीयता लागत की तुलना कर पाएंगे।

हरित बिल्डिंग काउंसिल भवन की हरित या वहनीय विशेषताओं को उजागर करने के लिए एक मानकीकृत प्रारूप बनाने में मदद कर सकती है। मानक प्रारूप दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा कर सकता है। एक तो यह किसी भवन की विशिष्ट वहनीय/टिकाऊ विशेषताओं के बारे में उपभोक्ताओं की समझ में सुधार कर सकता है। दूसरा यह तकनीकी रेटिंग को खरीदारों और उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट और सुलभ जानकारी के रूप में पेश कर सकता है, और सोचे-समझे निर्णय लेने में मदद कर सकता है।

वर्तमान में, IGBC, GRIHA, LEED और GEM जैसी विभिन्न ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन प्रणालियां हैं, जो वहनीयता का आकलन करने के लिए अलग-अलग वेटेज और स्कोर पद्धतियों का उपयोग करती हैं। मसलन, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण या सामग्री के पुन: उपयोग जैसे मापदंड पर हर रेटिंग प्रणाली का ज़ोर अलग है। इसके अलावा, दक्षता लाभ या वित्तीय लाभ का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाने वाली विधियां विभिन्न कारकों के आधार पर भी अलग-अलग होती हैं, जैसे परियोजना के चरण (डिज़ाइन बनाम रहवास-उपरांत), आधारभूत तुलना के लिए प्रयुक्त मान्यताओं और कार्यान्वित की जाने वाली तकनीकों या प्रथाओं के प्रकार के आधार पर।

मापदंडों और प्रचार प्रारूपों, दोनों में यह भिन्नता उपभोक्ताओं के लिए परियोजनाओं को दिए गए प्रमाणपत्र को पूरी तरह से समझना मुश्किल बना देती है। एक सुसंगत पैमाने या तुलना बिंदु की अनुपस्थिति में भवनों की हरित विशेषताओं की तुलना करना भ्रामक हो जाता है और अक्सर गलत समझ और निर्णय लेने में असमर्थता का कारण बनता है। इसलिए शब्दावली, मानकों को सुसंगत बनाने वाला मानकीकृत प्रारूप जानकारी को सरल बना सकता है, तुलना को आसान कर सकता है और हरित भवन के वादों पर उपभोक्ता का विश्वास बढ़ा सकता है।

टिकाऊ मानदंड

हरित रेटिंग सिस्टम द्वारा परिभाषित टिकाऊ मानदंडों का हमने विश्लेषण किया। इस आधार पर हम कुछ ऐसे चुनिंदा मानदंड सुझा रहे हैं जो उपभोक्ताओं को सोचे-समझे और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार विकल्प चुनने में सक्षम बना सकते हैं। यही मानदंड मानकीकृत रिपोर्टिंग के प्रारूप भी बन सकते हैं।

1. दिनांक और वैधता के साथ हरित रेटिंग (rating validity): रेटिंग जारी करने की तिथि और वैधता की जानकारी उपभोक्ता के लिए अहम है। यह जानकारी उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाती है कि प्रमाणपत्र हालिया है और यह भवन टिकाऊ है।

2. भवन के जीवनकाल में होने वाली बचत का अनुमानित आंकड़ा (lifecycle savings): भवन और इकाई दोनों स्तर पर ऊर्जा, जल और अपशिष्ट प्रबंधनों से होने वाली अनुमानित आर्थिक बचत दिखाई जा सकती है।

भवन स्तर पर – नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, पानी की बचत और उसके पुनर्चक्रण एवं पुनर्उपयोग, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिए लगाई गई प्रणालियां बताई जा सकती हैं।

व्यक्तिगत इकाई स्तर पर – कुशल भवन आवरण बनाकर, नलों में पानी प्रवाह कम करने वाले उपाय लगाकर किए गए ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानकारी देना। मौजूदा विभिन्न उपकरणों/सॉफ्टवेयर से हरित भवन की लागत का आकलन दर्शाया जा सकता है।

3. ऊर्जा दक्षता का मापन:

  • बिजली बचत की मात्रा द्वारा
  • सौर, SWH प्रणालियों द्वारा
  • कुशल उपकरणों द्वारा
  • नवीकरणीय प्रौद्योगिकियां अपनाकर और कुशल उपकरण लगाकर बिजली बिल कम आएगा।

4. तापीय आराम का मापन:

  • (एसी के साथ और बिना बिताए आरामदायक घंटे/वर्ष
  • दीवार और खिड़की की सामग्री के आधार पर
  • HVAC दक्षता (U value, WWR, RETV, EER) के आधार पर
  • एसी के बिना यदि भवन के भीतर आरामदायक वक्त बीतता है तो इससे बिजली बचेगी। दिए गए अंक उपभोक्ताओं को यह आकलन करने में मदद कर सकते हैं कि गर्मी से राहत पाने के लिए क्या वास्तव में एसी में ज़रूरी है?

5. ऊर्जा प्रदर्शन सूचकांक (Energy Performance Index – EPI): यह विभिन्न परियोजनाओं में ऊर्जा खपत की तुलना करने में मदद करता है – कम EPI यानी उच्च दक्षता।

6. जल दक्षता का मापन (water efficiency metrics)

  • प्रतिशत पानी की बचत
  • वर्षा जल संचयन की मात्रा
  • रीसायकल पानी की मात्रा और उसका उपयोग
  • यह मीठे पानी की बचत करेगा, स्थिरता को बढ़ाएगा और पानी का बिल कम करेगा

7. अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियां (on-site waste management): ऑन-साइट अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों और उनकी दक्षता के बारे में जानकारी देना।

8. सार्वजनिक परिवहन से निकटता (public transport accessibility): नज़दीकी सार्वजनिक परिवहन सेवा तक पैदल जाने में लगने वाला समय  – उपभोक्ताओं को रोज़ाना आने-जाने में लगने वाले समय की योजना बनाने में मददगार होगा।

9. सबकी पहुंच (universal accessibility): बुज़ुर्गों और विकलांग व्यक्तियों सहित सभी के लिए आसान पहुंच।

वर्तमान में भी कुछ हरित भवन सलाहकार और डेवलपर अपने-अपने प्रारूपों के ज़रिए (खासकर विपणन या प्रमाणन के दौरान) परियोजना की वहनीयता सम्बंधी विशेषताएं बताते हैं। हालांकि ये प्रयास पारदर्शिता के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता दर्शाते हैं लेकिन प्रारूपों में एकरूपता के अभाव के चलते उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न परियोजनाओं के लाभों की तुलना करना और मूल्यांकन एक चुनौती बन जाता है।

आगे की राह

एक मानक प्रारूप से हरित और टिकाऊ भवन विशेषताओं के बारे में जागरूकता लाने में काफी मदद मिल सकती है, और प्रमाणित हरित भवनों को खरीदने/बनाने में तेज़ी आ सकती है। यह प्रारूप उपभोक्ताओं को पारंपरिक भवनों की तुलना में टिकाऊ भवनों के लाभों के बारे में विश्वसनीय, तुलनीय और समझने में आसान जानकारी दे सकता है। इसका उपयोग रियल एस्टेट परियोजनाओं के विपणन(real estate marketing), बिक्री और प्रचार सामग्री में किया जा सकता है।

यह प्रारूप भारतीय राष्ट्रीय भवन परिषद (National Building Council) द्वारा गठित एक अंतर-परिषद समिति द्वारा तैयार करके लागू किया जा सकता है। इस समिति में केंद्र सरकार, प्रमुख हरित भवन परिषद और रियल एस्टेट हितधारक और राज्य RERA प्राधिकरणों (Real Estate Regulatory Authority) के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।

प्रस्तावित समिति को ये प्रमुख नीतिगत कार्य सौंपे जा सकते हैं:

1. विभिन्न हरित भवन रेटिंग सिस्टम के मुख्य टिकाऊ मापदंडों का समन्वय करके एकरूप प्रारूप बनाना और अधिसूचित करना।

2. सभी मान्यता प्राप्त ढांचों में सामंजस्य बनाना, जिससे एकरूपता और तुलनीयता सुनिश्चित हो।

3. कार्यान्वयन दिशानिर्देश और अनुपालन प्रोटोकॉल स्थापित करना, जिसमें राज्य-स्तरीय RERA जैसे मौजूदा प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण शामिल है, ताकि इसे अपनाना आसान हो।

4. वहनीयता के दावों को सत्यापित करने व गलतबयानी से सम्बंधित शिकायतों के समाधान के लिए एक निगरानी एवं शिकायत निवारण तंत्र बनाना।

5. प्रारूप की प्रभावशीलता की समीक्षा करने और इसके बेहतर होते वहनीयता मानकों, नियामकों और उपभोक्ता अपेक्षाओं के अनुरूप अपडेट करने के लिए सतत परामर्श करना।

प्रमुख हितधारकों के बीच समन्वय को बढ़ावा देकर समिति उपभोक्ता और डेवलपर्स के बीच मौजूदा सूचना अंतर को पाट सकती है। भारत तेज़ी से शहरीकृत हो रहा है। ऐसे प्रयास अधिक टिकाऊ निर्मित परिवेश (sustainable urban development) बनाने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गाज़ा का पुनर्निर्माण: वैज्ञानिकों की भूमिका

गाज़ा में हालिया युद्धविराम (Gaza ceasefire) की घोषणा के बाद एक ओर तो लोग खुशियां मना रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक फिलिस्तीन के स्थानीय वैज्ञानिक (Palestinian scientists), शिक्षक और योजनाकार पुनर्निर्माण की ज़िम्मेदारी नहीं संभालते, तब तक गाज़ा को फिर से खड़ा करना मुश्किल होगा।

यह चेतावनी उन शोधकर्ताओं (researchers on Gaza reconstruction) की है जो युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं। उनका मानना है कि यदि यह काम विदेशी संस्थाओं या सरकारों के हाथों में दिया गया, तो पहले जैसी गलतियां दोहराई जा सकती हैं और असली जानकार यानी जो अपनी ज़मीन और समाज की ज़रूरतों को समझते हैं वे पीछे रह जाएंगे।

गौरतलब है कि अमेरिका द्वारा तैयार और इस्राइल द्वारा मंज़ूर की गई योजना के तहत, हमास द्वारा अपने हथियार डालने (Hamas disarmament), बंधकों को रिहा करने और राजनीति से पीछे हटने की उम्मीद है। बदले में इस्राइल अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने, सेना को गाज़ा से हटाएगा, मानवीय सहायता (humanitarian aid in Gaza) बढ़ाने और संयुक्त राष्ट्र को क्षेत्र में काम करने की अनुमति देगा। हालांकि इस योजना में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि गाज़ा का पुनर्निर्माण कैसे होगा और उससे भी महत्वपूर्ण कि कौन करेगा।

अक्टूबर 2023 में शुरू हुए इस्राइल के सैन्य अभियान (Israel Gaza conflict 2023) ने गाज़ा को पूरी तरह तबाह कर दिया। अगस्त के अंत तक सहायता पर लगे प्रतिबंधों के कारण लोगों को खाने की भारी कमी का सामना करना पड़ा। एक स्वतंत्र समिति की रिपोर्ट के अनुसार, पांच लाख से अधिक लोग भुखमरी (Gaza famine crisis) से जूझ रहे हैं। वहीं, दी लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार पांच साल से छोटे लगभग 55,000 बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हैं।

मानव संसाधन (human resources in Gaza) के स्तर पर भी स्थिति बहुत खराब है। 2200 से अधिक डॉक्टर्स, नर्सें और शिक्षक मारे जा चुके हैं। युनेस्को के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत विश्वविद्यालय और कॉलेज या तो क्षतिग्रस्त हो गए हैं या पूरी तरह ढह गए हैं, जिससे करीब 88,000 विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी है।

दक्षिण अफ्रीका स्थित नेल्सन मंडेला युनिवर्सिटी के शोधकर्ता सावो हेलीटा का अनुमान है कि युद्ध में गाज़ा के उच्च शिक्षा क्षेत्र (higher education in Gaza) को लगभग 222 मिलियन डॉलर (1950 करोड़ रुपए) का नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि इसे दोबारा खड़ा करने में करीब एक अरब डॉलर लग सकते हैं, क्योंकि निर्माण से पहले मलबा हटाना और बमों को निष्क्रिय (bomb disposal in Gaza) करना होगा।

इस काम के लिए आवश्यक सहायता राशि मुख्य रूप से खाड़ी देशों और तुर्की से मिलने की संभावना है। हालांकि पहले के वर्षों में फिलिस्तीनी विश्वविद्यालयों को सालाना लगभग 20 मिलियन डॉलर की बहुत कम आर्थिक सहायता (financial aid for Gaza universities) मिलती थी।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्निर्माण केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके साथ में ऑनलाइन शिक्षा (online learning in Gaza) को जारी रखना होगा, विद्यार्थियों और शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा और गाज़ा के शोधकर्ताओं को दुनिया के शैक्षणिक समुदाय से दोबारा संपर्क (global academic collaboration) बनाना होगा। चूंकि गाज़ा के अधिकांश विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की फीस पर निर्भर हैं, ऐसे में सुझाव है कि अंतर्राष्ट्रीय सहायता से फीस भरी जाए ताकि विश्वविद्यालय पुनर्निर्माण के दौरान भी चलते रहें।

स्थानीय विशेषज्ञता की ताकत

विशेषज्ञों का मानना है कि गाज़ा के पुनर्निर्माण का नेतृत्व उन्हीं फिलिस्तीनियों को करना चाहिए जो अपनी ज़मीन, संस्कृति और समाज को सबसे अच्छी तरह जानते हैं। गाज़ा के शिक्षाविदों (Gaza academics) के पास अपनी धरती और लोगों की अनोखी और गहरी समझ है, जिसे कोई बाहरी व्यक्ति नहीं समझ सकता। इसके अलावा गाज़ा के माहौल को फिर से बसाने में उन लोगों की भागीदारी ज़रूरी है जो वहां रहेंगे और इसके परिणामों को झेलेंगे। इलाके के भविष्य से जुड़े फैसले उन्हीं समुदायों से आने चाहिए जो सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।

लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प की पुनर्निर्माण योजना (Trump Gaza reconstruction plan) के तहत, गाज़ा की सार्वजनिक सेवाएं एक ‘तकनीकी समिति’ चलाएगी, जिसमें कुछ फिलिस्तीनी और कुछ अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ होंगे। इस समिति की निगरानी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नामक एक अंतर्राष्ट्रीय निकाय करेगा, जिसका नेतृत्व खुद ट्रम्प करेंगे और जिसमें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल होंगे।

कई विशेषज्ञों के लिए यह व्यवस्था काफी चिंताजनक है, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे फिलिस्तीनी नेतृत्व (Palestinian leadership) को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। कतर स्थित हमद बिन खलीफा युनिवर्सिटी (Hamad Bin Khalifa University) के प्रोफेसर सुल्तान बराकात चेतावनी देते हैं कि अगर यह समिति ‘कब्ज़े का प्रबंधन’ बनकर रह गई, तो कई सम्मानित शिक्षाविद इसमें शामिल होने से इंकार कर देंगे। असली पुनर्निर्माण तभी संभव है जब फिलिस्तीनियों को योजना बनाने से लेकर शिक्षा और पर्यावरण सुधार (education and environment reform) तक में नेतृत्व और अधिकार दिया जाए।

इसी तरह का विचार गाज़ा युनिवर्सिटी (Gaza University) के पूर्व अध्यक्ष और शोधकर्ता फरीद अल-कीक का भी है जिन्होंने युद्धविराम के जश्न के दौरान कहा कि “आज खुशी और उम्मीद का दिन है, लेकिन गाज़ा का भविष्य गाज़ा के लोगों के हाथों से ही बनना चाहिए।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बच्चों का हास-परिहास और विकास

हास्य-विनोद (humor) इंसानी व्यक्तित्व (human personality)  का बहुत पुराना और रोचक पहलू है। बच्चे पूरे वाक्य बोलने या किताब पढ़ने से पहले ही हंसी-मज़ाक और शरारतें करने लगते हैं। यह उनके विकास (child development), दूसरों से जुड़ाव और बुद्धिमत्ता से जुड़ा होता है।

शोध बताता है कि बच्चे जन्म के कुछ ही महीनों बाद मुस्कराने और थोड़े समय बाद हंसने लगते है। शुरू में वे सरल खेलों (play activities) से मज़ा लेते हैं; जैसे आंख-मिचौली, गुदगुदी या टेढ़े-मेढ़े चेहरे बनाना। फिर वे अजीब जगहों पर छिपने का नाटक, उछल-कूद या चीज़ों को खिलौने बना कर मज़ा लेने लगते हैं।

धीरे-धीरे बच्चे और उन्नत हास्य (sense of humor) करने लगते हैं; जैसे चिढ़ाना, भूमिकाएं निभाना, बेतुके शब्द बोलना और अंत में शब्दों के खेल (wordplay) और चुटकुले समझना। मनोवैज्ञानिकों ने इसे ‘अर्ली ह्यूमर सर्वे’ (early humor survey) जैसे शोधों में दर्ज किया है। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे अचानक मज़ाकिया नहीं बन जाते बल्कि धीरे-धीरे यह कौशल विकसित करते हैं, जो आगे चलकर उनकी सोच और संवाद की क्षमता को मज़बूत बनाता है।

हास्य सिर्फ मनोरंजन (entertainment) नहीं है, बल्कि यह सीखने (learning process) और सामाजिक विकास का एक महत्वपूर्ण ज़रिया है। जब कोई बच्चा मज़ाक या चुटकुला समझता है, तो उसे कई बातों पर ध्यान देना पड़ता है – जैसे किसी चीज़ का सामान्य उपयोग क्या है, उसमें क्या अलग या अजीब किया गया है और क्यों वह मज़ेदार लग रहा है। इसका मतलब है कि बच्चा चीज़ों को केवल अपनी नज़र से नहीं बल्कि दूसरों के दृष्टिकोण से भी देखना सीखता है। मनोवैज्ञानिक इसे ‘थ्योरी ऑफ माइंड’ (theory of mind) कहते हैं। जो बच्चे ज़्यादा मज़ाक करते हैं या खेल-खेल में हंसी-मज़ाक करते हैं, वे सामाजिक और मानसिक रूप से ज़्यादा तेज़ी से विकसित होते हैं। वे जल्दी सीखते हैं, बेहतर संवाद करते हैं और अच्छे रिश्ते बना पाते हैं।

हंसी-विनोद हमारे रिश्तों (relationships) को मज़बूत करने का काम करते हैं। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट प्रोवाइन के अध्ययन में पाया गया कि हम दूसरों के साथ रहते हुए लगभग 30 गुना अधिक हंसते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हम केवल 20 प्रतिशत मज़ाक या चुटकुलों पर हंसते है, बकाया तो आम बातचीत के दौरान हंसते हैं। यानी हंसी जुड़ाव, भरोसे और अपनेपन से जुड़ा मामला है।

यह आदत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। चिम्पैंजी और गोरिल्ला जैसे अन्य प्राइमेट (primates) भी खेलते समय हंसी जैसी हरकतें दिखाते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि शुरू में हंसी का विकास ‘सोशल ग्रूमिंग’ (social grooming) के लिए हुआ था। क्योंकि शारीरिक ग्रूमिंग (जैसे एक-दूसरे को साफ करना) छोटे समूहों तक सीमित था और समय लेता था, हंसी शायद एक आसान और तेज़ तरीका बनी जिससे बड़े समूहों में भी अपनापन बढ़ सके। मनुष्यों में हंसी और भी मज़बूत भूमिका निभाती है। यह दो तरह की होती है। एक, स्वाभाविक हंसी (जब हमें सच में कुछ मज़ेदार लगता है)। दूसरी, जान-बूझकर की गई हंसी (जिसे हम दोस्ती जताने, तनाव घटाने या रुचि दिखाने के लिए करते हैं)। दोनों ही तरह की हंसी लोगों को जोड़ने और समूहों को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाती है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि इंसानी हंसी (human laughter) हमारी निहायत ‘नैसर्गिक’ अभिव्यक्तियों (natural expressions) में से एक है। इंसानों की खासियत यह है कि हम केवल खेल-खेल में नहीं, बल्कि व्यंग्य, कटाक्ष और यहां तक कि गहरी दार्शनिक बातों पर भी हंस सकते हैं। यह दिखाता है कि हास्य मानव स्वभाव की बुनियादी विशेषता है। इतिहास में कई दार्शनिकों ने इंसान की अनोखी पहचान को परिभाषित करने की कोशिश की है – अरस्तू ने इसे तार्किकता का नाम दिया, विट्गेंस्टाइन ने इसे भाषा बताया, और सार्त्र ने स्वतंत्र निर्णय। लेकिन हास्य की सर्वव्यापकता और बच्चों द्वारा इसे इतनी जल्दी अपनाना यह संकेत देता है कि हास्य हमारी पहचान के लिए उतना ही ज़रूरी है जितनी तार्किकता या भाषा। कहना गलत न होगा कि हम हंसते हैं इसलिए हम इंसान हैं।

सीखने में हास्य का महत्व (importance of humor in learning)

हास्य सीखने को आसान और मज़ेदार बना देता है। शोध बताते हैं कि यदि बच्चों को पढ़ाते समय हंसी-मज़ाक (fun learning) का इस्तेमाल किया जाता है तो बच्चे जल्दी और बेहतर सीखते हैं। यहां तक कि खबरें भी मज़ेदार अंदाज़ में सुनाई जाएं तो लोग उन्हें ज़्यादा दिलचस्पी से सुनते हैं।

बच्चों द्वारा हास्य और कल्पना (creativity) को मिलाना भी सीखने का हिस्सा है। जैसे केले को फोन बनाना या अजीब से शब्द गढ़ना – ये केवल खेल नहीं बल्कि रचनात्मकता की शुरुआत हैं। हास्य बच्चों को सुरक्षित और मज़ेदार तरीके से नियम तोड़ने का मौका देता है, जिससे वे नई बातें सोच पाते हैं और आगे बढ़ते हैं। धीरे-धीरे यही खेल-खेल में किया गया हास्य उन्हें कहानी कहने, नकल करने और गहराई से सोचने की क्षमता तक ले जाता है।

हालांकि बच्चों में हास्य (child humor) बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इस पर उतना शोध नहीं हुआ है जितना अन्य मनोवैज्ञानिक विषयों (psychology research) पर हुआ है। इसका कारण यह है कि छोटे बच्चे अक्सर कहे जाने पर मज़ाक नहीं करते और शोधकर्ताओं के सामने शर्माते भी हैं। कभी-कभी उनका हास्य समझना भी मुश्किल होता है। फिर, कुछ विद्वान हास्य को हल्का-फुल्का विषय मानते हैं और शोध के लायक नहीं समझते।

लेकिन हाल के अध्ययनों (recent studies) ने इस सोच को बदला है। एलेना होइका जैसे मनोवैज्ञानिकों ने बच्चों के हास्य के विकास (humor development) को बारीकी से ट्रैक किया और दिखाया कि यह उनके मानसिक विकास से जुड़ा है। यानी यह केवल हंसी-मज़ाक नहीं है, बल्कि बच्चों के विकास में गंभीर और अहम भूमिका निभाता है।

बहरहाल, हास्य का महत्व (importance of humor) सिर्फ बचपन के विकास या सामाजिक रिश्तों तक सीमित नहीं है। इसकी असली ताकत यह है कि यह हमें इंसान बनाता है। हास्य हमें दुनिया को अलग नज़रिए से देखने, नियमों पर सवाल उठाने, दूसरों से जुड़ने और समाज निर्माण (social development) की क्षमता देता है। यह हमारी बुद्धि, रचनात्मकता और खुश रहने की क्षमता को दर्शाता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विकलांगजन समावेशी कानून

सुबोध जोशी

भारत में विकलांगजन (disabled persons) के लिए कानून (disability law) बनने के बाद उनके समावेश की बात होने लगी। समावेश का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि विकलांगजन भी गैर-विकलांगों की तरह रोज़मर्रा की गतिविधियों और जीवन के सभी क्षेत्रों में समान रूप से पूरी तरह भाग ले सकें। इसमें समाज में उनकी पूर्ण भागीदारी की राह में आने वाली सभी बाधाएं दूर करते हुए उन्हें बाधामुक्त वातावरण (accessible environment) एवं सुगमता उपलब्ध कराना, भागीदारी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि समाज, समुदाय या संगठन में पर्याप्त विकलांग-हितैषी दृष्टिकोण, नीतियां और प्रथाएं लागू हों। सफल समावेश उसे कहा जा सकता है जिसकी बदौलत जीवन की सामाजिक रूप से अपेक्षित भूमिकाओं और गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़े। यह समावेश संपूर्ण समाज का कार्य है।

वर्तमान में विकलांगजन के हित में की जाने वाली बातें और कार्रवाई मुख्य रूप से विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के संधि पत्र (UNCRPD) की रोशनी में की जाती है। यह मौजूदा मानव अधिकारों को विकलांग व्यक्तियों की जीवन स्थितियों से जोड़ने वाला सार्वभौमिक दस्तावेज है। इस संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की संख्या 200 से कुछ ही कम है जिनमें से भारत भी एक है। UNCRPD एक तरह से विकलांगजन के हित में कार्य करने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों के लिए एक साझा मार्गदर्शिका (disability rights treaty) है। भारत सहित अधिकांश देशों में इसी के आधार पर विकलांगता सम्बंधी कानून, नीतियां और योजनाएं तैयार कर उन पर अमल करने की कोशिशें की जा रही हैं। इसके अनुसार, “विकलांग व्यक्तियों में वे लोग शामिल हैं जिन्हें ऐसी दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदी क्षतियां हुई हैं, जो विभिन्न बाधाओं के कारण समाज में दूसरों के साथ समानता से उनकी पूर्ण और प्रभावी भागीदारी में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।” इस प्रकार विकलांगता उन क्षतियों और बाधाओं के मेलजोल से निर्मित होती है जिनका सामना प्रभावित व्यक्ति को करना होता है। बाधाओं का अर्थ सिर्फ भौतिक बाधाओं के रूप में लगाया जाना गलत है। इसमें दृष्टिकोण सम्बंधी बाधाएं भी शामिल होती हैं जिनकी तरफ न के बराबर ध्यान दिया जाता है।

विकलांगजन के समावेश के लिए इन दोनों प्रकार की बाधाओं को हटाया जाना ज़रूरी है। जीवन का कोई भी क्षेत्र केवल भौतिक बाधाओं (physical barriers) के ही हटने पर सुगम्य नहीं हो सकता। इसके लिए दृष्टिकोण सम्बंधी बाधाओं (attitudinal barriers) का हटना भी उतना ही ज़रूरी है। सच तो यह है कि सुगम्यता और समावेश की राह में आने वाली भौतिक बाधाओं का मूल कारण ही विकलांगजन के प्रति समाज के दृष्टिकोण सम्बंधी बाधाएं हैं। दृष्टिकोण सम्बंधी बाधाएं पूर्वाग्रह और विचार-पद्धतियां हैं जो विकलांग व्यक्तियों के प्रति भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। उन्हें ज़रूरतमंद और असमर्थ बताना गलत है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे समाज का एक अंग होते हैं। गहराई से देखने पर यह मालूम पड़ता है कि विकलांग व्यक्तियों को अपनी क्षति के कारण उतनी असुविधाओं और बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता जितना अपने प्रति समाज के दृष्टिकोण के कारण करना पड़ता है। उनके प्रति अन्य व्यक्तियों, समुदाय, समाज और संगठनों का यह उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण वास्तव में वह बाधा है जो भौतिक बाधाओं से कहीं ज़्यादा गंभीर होता है। जहां ऐसी स्थिति होती है वहां एक तरह से समाज ही उन्हें विकलांग बनाता है।

बाधामुक्त वातावरण में केवल चलने-फिरने सम्बंधी विकलांगता के कारण व्हीलचेयर (wheelchair users), बैसाखी वगैरह सहायक उपकरण इस्तेमाल करने वाले व्यक्तियों के लिए रैंप, चौड़े दरवाज़े और सुगम्य शौचालय की व्यवस्था करना ही शामिल नहीं है। इसमें दृष्टिबाधित (visually impaired), श्रवणबाधित (hearing impaired), बहु-विकलांग व्यक्तियों और यहां तक कि बौद्धिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए विकलांगता-विशिष्ट व्यवस्थाएं करना भी शामिल है। इनके अलावा और भी विकलांगताएं होती हैं; भारत में विकलांगजन के लिए बनाए गए पहले कानून में सात विकलांगताएं परिभाषित कर शामिल की गई थी जिनकी संख्या वर्तमान में लागू दूसरे कानून में इक्कीस कर दी गई है। बाधामुक्त वातावरण में विकलांगता-विशिष्ट व्यवस्थाएं करने की यह ज़रूरत सभी सेवाओं, अवसरों, सार्वजनिक स्थलों, यातायात, आयोजनों, सूचना सामग्री, शिक्षा प्रणाली, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल, मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में लागू होती हैं ताकि विभिन्न विकलांगताओं वाले व्यक्ति जानकारी प्राप्त कर सकें और निर्बाध भागीदारी कर सकें। शिक्षा और प्रशिक्षण की कमी के चलते भारत में बड़ी संख्या में ऐसे विकलांग व्यक्ति हैं जो सूचनाओं, जानकारी और विभिन्न उपायों, जैसे ब्रेल लिपि, दृश्य संकेत, सांकेतिक भाषा वगैरह का लाभ नहीं ले पाते हैं। इसलिए उनकी सहायता के लिए जगह-जगह संवेदनशील एवं प्रशिक्षित व्यक्ति होने चाहिए। चलने-फिरने और हाथों का इस्तेमाल करने में असमर्थ व्यक्तियों के लिए भी इस तरह की व्यक्तिगत सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।

यह एक सच्चाई है कि भारत में विकलांगता के सामाजिक पहलू (social aspect of disability) पर न के बराबर ध्यान दिया जाता है, और इसे विशुद्ध रूप से एक चिकित्सीय विषय (medical model) माना जाता है। शिक्षा की कमी, विकलांगता के बारे में सही जानकारी का अभाव और गलत धारणाओं की व्यापकता के कारण देश में दृष्टिकोण सम्बंधी बाधा एक बहुत बड़ी समस्या है। स्थिति इतनी खराब है कि वर्तमान वैज्ञानिक युग में भी यह माना जाता है कि विकलांगता विकलांग व्यक्ति और उसके परिजनों के पूर्वजन्म के कर्मों का फल है जो उन्हें भोगना ही होगा। यह सोचकर समाज खुद को विकलांग व्यक्ति और उसके परिवार से दूर कर लेता है और यह मान लेता है कि प्रभावित व्यक्ति या परिवार के प्रति उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। नतीजतन विकलांग व्यक्ति की ज़िम्मेदारी पूरी तरह उसके परिवार पर छोड़ दी जाती है। उसे कोई सामाजिक सहायता या सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाती है। शिक्षा की कमी और गरीबी समस्या को और बढ़ा देती है।

देश में विकलांगजन के लिए कानून बहुत देर से आने का मुख्य कारण संवेदनशीलता (social sensitivity) की कमी ही है और यह कमी कानून के अमल (policy implementation) में भी साफ देखी जा सकती है। न तो देश में विकलांगजन-हितैषी वातावरण बन सका है, न ही उनकी  ज़रूरतों के मान से पर्याप्त नीति निर्माण और नियोजन हो रहा है और न ही कल्याणकारी योजनाएं लागू की जा रही हैं। संवेदनशीलता की कमी दूर करना पहली प्राथमिकता मानकर इसके लिए विशेष अभियानों के माध्यम से संपूर्ण समाज को विकलांगता की सामाजिक और मानवाधिकार-आधारित समझ के बारे में जागरूक किया जाना ज़रूरी है। विकलांगजन के समावेश पर राजनैतिक और शासन के स्तर पर भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। भारत में यह विशेष रूप से ज़रूरी है क्योंकि बदकिस्मती से यहां सामाजिक बदलाव का कार्य भी राज्य को करना पड़ता है। इसके लिए समावेश का मुद्दा नीति निर्माण और नियोजन का एक अनिवार्य पहलू होना चाहिए क्योंकि शायद ही कोई विभाग ऐसा होता होगा जिसका समावेश से किसी न किसी तरह से सम्बंध न हो। नीतियों और योजनाओं के अमल में भी ईमानदारी होनी चाहिए। कार्यप्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि समावेश की पुष्टि भी की जा सके। समावेश कोई ऐसा कार्य नहीं है जो एक बार कर दिया जाने के बाद बंद कर दिया जाए, बल्कि यह हमेशा जारी रहने वाली एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए इसकी सतत मॉनीटरिंग भी ज़रूरी है।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात जोड़ना उचित होगा। समावेशिता (inclusivity) के दायरे में विकलांगजन के साथ बुज़ुर्गों (elderly people), किसी क्षति के कारण अस्थाई रूप से अशक्त व्यक्तियों और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि इनकी ज़रूरतें विकलांगजन की ज़रूरतों के समान ही हो जाती हैं। इन ज़रूरतों में देखभाल की ज़रूरत भी शामिल है। इसी तरह विकलांग व्यक्ति के बुज़ुर्गावस्था में पहुंचने पर उसकी भी आयु-आधारित कठिनाइयां एवं ज़रूरतें शुरू हो जाती हैं और उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती हैं।

भारत एक ऐसा देश है जहां अब तक गैर-विकलांगों के लिए भी बुनियादी ढांचा (infrastructure) हर जगह तैयार नहीं हुआ है। उनके लिए भी अवसरों और भागीदारी की समानता (equal opportunities) सुनिश्चित नहीं हुई है। स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के क्षेत्रों पर नज़र डालने से ही यह सच्चाई आसानी से समझी जा सकती है। आज भी अनेक इलाके ऐसे हैं जहां स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध न होने के साथ आवागमन की सुविधा का भी अभाव है जिसके कारण प्रसव और इलाज के लिए कष्टप्रद यात्रा कर दूर जाना पड़ता है। आए दिन गर्भवती महिला और गंभीर मरीज़ को गांव या बस्ती वालों द्वारा खटिया पर दूरस्थ अस्पताल ले जाए जाने की घटनाएं सुनने में आती है। ऐसे में विकलांगजन और बुज़ुर्गों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। इसके अलावा बड़े-छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में बुनियादी ढांचे तथा सेवाओं एवं सुविधाओं में ज़मीन-आसमान का फर्क है।

ऐसी स्थिति में विकलांगजन और बुज़ुर्गों के समावेश की कितनी भी बात कर ली जाए वह बेमानी ही होगी। इतने बड़े देश में इक्का-दुक्का विकलांग-अनुकूल स्थल या सेवा (disabled-friendly services) उपलब्ध करा देना सिर्फ एक ‘नमूना’ कहा जा सकता है; उदाहरण के लिए दिल्ली मेट्रो रेल सेवा। किसी खास स्थल या खास योजना के तहत आने वाले शहर या फिर कुछ ही समय के लिए होने वाले किसी खास आयोजन को सुगम्य बनाना मन समझाने की कवायद मात्र है। सिर्फ हेरिटेज सिटी या स्मार्ट सिटी परियोजना के अधीन आने वाले खास शहरों को ही सुगम्य बनाने से क्या होगा? सिर्फ कुंभ जैसे खास आयोजन को ही सुगम्य बनाने से क्या होगा?

वास्तव में ज़रूरत इस बात की है कि समावेशिता (inclusive development) के लिए पूरे देश को एक इकाई मानकर काम किया जाए। निश्चित लक्ष्य और ज़िम्मेदारियों के साथ एक समयबद्ध योजना बनाकर लागू की जाए। पूरे देश में जागरूकता एवं संवेदनशीलता (awareness) पैदा की जाए। दृष्टिकोण सम्बंधी बाधाएं और भौतिक बाधाएं एक साथ हटाने के लिए काम किया जाए। चूंकि बुनियादी ढांचे पर काफी काम किया जाना अब भी बाकी है इसलिए सख्ती से ऐसी नीति लागू की जानी चाहिए कि बनाया जाने वाला हर नया ढांचा शुरू से ही समावेशी हो। और पूर्ववर्ती ढांचों को समावेशी ढांचे में ज़रूर बदला जाना चाहिए। एक निश्चित समय बाद समाज में ऐसा वातावरण बन जाना चाहिए कि समावेश के लिए अलग से बात करने या प्रयास करने की ज़रूरत ही न पड़े।

अंत में, विकलांगजन के समावेश (social inclusion) के विषय में यह समझ लेना सबसे महत्वपूर्ण है कि समस्या विकलांगजन में नहीं बल्कि समाज (society) में निहित है। उनका समावेश समाज में होना है लेकिन समाज यह होने नहीं दे रहा है। इसलिए ध्यान समाज पर केंद्रित किया जाना चाहिए, न कि विकलांगजन पर। समावेश के लिए ज़रूरत समाज में बदलाव लाकर उसे समावेशी बनाने की है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारतीय उपमहाद्वीप की आबादी

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

म, भारत के लोग (Indian population), कहां से और कैसे आए? इस सम्बंध में 2009 में हारवर्ड और एमआईटी युनिवर्सिटी (Harvard University, MIT) के डेविड रीच और सीसीएमबी (हैदराबाद – CCMB Hyderabad) के के. थंगराज और लालजी सिंह ने संयुक्त रूप से एक शोध पत्र लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘रिकंस्ट्रक्टिंग इंडियन पॉप्युलेशन हिस्ट्री (भारतीय आबादी के इतिहास का पुनर्निर्माण – Reconstructing Indian Population History)’। इसमें भारत में 25 विविध समूहों का आनुवंशिक विश्लेषण (genetic analysis) किया गया था। इसमें पता चला था कि अधिकांश भारतीयों के पूर्वज जेनेटिक रूप से पृथक दो प्राचीन आबादियों के हैं।  

मेरी सलाह है कि आप यह शोधपत्र डाउनलोड करें और पढ़ें। (लिंक यह रही – https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC2842210/.) खासकर इसमें प्रस्तुत चित्र 1 देखें और तालिका 1 पढ़ें।

हम कितने जुदा हैं? उन्होंने हमारे पूर्वजों के मुख्य रूप से दो अलग समूह पाए हैं। ‘उत्तर भारतीय पूर्वज’ (ANI- Ancestral North Indians) समूह, इस समूह के लोग जेनेटिक रूप से पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और युरोप के लोगों के नज़दीकी है। अधिकांश ANI वंशज मुख्य रूप से भारत के उत्तरी राज्यों के रहवासी हैं। दूसरा है ‘दक्षिण भारतीय पूर्वज (ASI- Ancestral South Indians)’ समूह, जो स्पष्ट रूप से ANI से अलग है और इनके पूर्वज पूर्वी युरेशियन मूल के हैं।

एक अधिक विस्तृत विश्लेषण में उन्होंने मध्य एशिया और उत्तरी दक्षिण एशिया के 500 से अधिक लोगों के प्राचीन जीनोम-व्यापी डैटा (ancient DNA data) का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि ASI प्रत्यक्ष वंशज हैं जो दक्षिण भारत में जनजातीय समूहों में रहते हैं। और ऐसा लगता है कि ANI और ASI समूह के लोगों का प्रवास (migration) लगभग 3-4 हज़ार साल पहले हुआ था। इस प्रकार देश भर में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय (जिन्हें द्रविड़ – Dravidian भी कहा जाता है) लोगों का मिश्रण रहता है।

39-71 प्रतिशत तक ANI वंशज समूह देश भर में पारंपरिक (तथाकथित) उच्च जाति (upper caste population) के लोगों में देखे जाते हैं। लेकिन कुछ दक्षिण भारतीय राज्यों में विशिष्ट ASI वंश वाले लोग दिखते हैं। हालांकि, वास्तविक ASI, जिन्हें AASI भी कहा है, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (Andaman and Nicobar tribes) के आदिवासी हैं जो लगभग 60,000 साल पहले पूर्वी एशियाई-प्रशांत क्षेत्रों से आकर यहां बसे थे, और सामाजिक या जेनेटिक रूप से भारतीय मुख्यभूमि के निवासियों के साथ घुले-मिले नहीं हैं।

सेल (Cell journal) में प्रकाशित एक हालिया शोधपत्र में बताया गया है कि भारतीय मूल के सभी लोगों की जड़ें एक ही बड़े प्रवास से जुड़ी हैं, जिसमें लगभग 50,000 साल पहले अफ्रीका से मनुष्य बाहर निकले (Out of Africa migration) और फैले थे।

ध्यान दें कि हारवर्ड-सीसीएमबी के शोधपत्र में ‘उच्च जाति’ शब्द का उल्लेख है। तो, ‘जाति व्यवस्था’ (caste system in India) कब आई? यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था हिंदुओं में 2000 से अधिक वर्षों से है। इस चार-स्तरीय व्यवस्था में, आदिवासी सबसे निचले पायदान पर हैं। अंतर्जातीय विवाह (inter-caste marriage) बहुत कम होते हैं, और यदि होते भी हैं तो वे हिंसा का कारण बन सकते हैं।

जातीयता और हैप्लोटाइप (ethnicity and haplotype)

प्रो. पी. पी. मजूमदार के दल ने ‘हैप्लोग्रुप’ (haplogroup) नामक पद्धति का उपयोग करके जातीयता का अध्ययन किया था। हैप्लोग्रुप किसी सामाजिक समूह में साझा पितृवंश या मातृवंश के जेनेटिक संकेतक होते हैं। इस शोधपत्र में बताया गया है कि भारत भर की विभिन्न आबादियों के हैप्लोग्रुप विवरण भारत की जाति व्यवस्था की जानकारी देते हैं, जिसमें कुछ पूर्वज घटक जनजातियों में सबसे अधिक, निम्न जातियों में थोड़े कम और उच्च जातियों में सबसे कम पाए जाते हैं।

यह जाति व्यवस्था समय के साथ, विशेष रूप से शिक्षित वर्गों में, लोकतंत्र और देश के आधुनिकीकरण (modernization of India) के साथ धीरे-धीरे बदल रही है। जैसे-जैसे लोग स्कूल-कॉलेज जाने लगे, अधिक भाषाएं सीखने लगे और नौकरियों व अन्य अवसरों के लिए अपने मूल स्थानों से बाहर जाने लगे, अंतर्जातीय और अंतर्क्षेत्रीय विवाह बढ़े। 2011 की जनगणना के अनुसार, अंतर्जातीय विवाह लगभग 6 प्रतिशत और अंतर्धार्मिक विवाह (inter-religious marriage) लगभग एक प्रतिशत हुए थे। यह संभावना है कि आगामी 2027 की जनगणना तक ये संख्याएं, विशेष रूप से शहरी समूहों में, उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुकी होंगी। (स्रोत फीचर्स)

लेखक इस लेख पर डॉ. थंगराज की सलाह और टिप्पणियों के लिए आभारी हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ऑनलाइन आलोचना से स्वास्थ्य एजेंसियों पर घटता विश्वास

डिजिटल दौर (digital age) में जन स्वास्थ्य एजेंसियों (public health agencies) के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। उन्हें अब सिर्फ बीमारियों के प्रसार (disease outbreaks) से ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारियों (health misinformation) और व्यक्तिगत हमलों से भी निपटना पड़ रहा है। एक हालिया अध्ययन बताता है कि यूएस के सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) जैसी स्वास्थ्य संस्थाओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई नकारात्मक टिप्पणियां लोगों के भरोसे (public trust) को तोड़ रही हैं, उनमें गुस्सा (public anger) बढ़ा रही हैं।

हाल ही में CDC ने टेक्सास और न्यू मेक्सिको में खसरे के प्रकोप (measles outbreak)  को लेकर एक चेतावनी ट्विट की थी, जिसमें यात्रियों को टीका लगवाने (vaccination) की सलाह दी गई थी। कुछ लोगों ने इसका समर्थन किया। लेकिन कई लोगों ने इस पर शक जताया, साज़िश के आरोप (conspiracy theories) लगाए और यहां तक कि आपराधिक व्यवहार का इल्ज़ाम तक लगाया। ऐसी तीखी प्रतिक्रियाएं अब आम हो रही हैं।

इसका असर समझने के लिए स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी (Stanford University) के शोधकर्ताओं ने 6800 अमरीकियों पर अध्ययन किया। प्रतिभागियों को एक काल्पनिक सोशल मीडिया पोस्ट दिखाई, जिसमें CDC जैसी संस्था ने एक दुविधामयी स्वास्थ्य सलाह दी थी – जैसे सबको स्लीप एप्निया की जांच (sleep apnea screening) करवाने की सलाह। इसके बाद उन्हें आलोचनात्मक टिप्पणियां (critical comments) दिखाईं, जो असली ऑनलाइन टिप्पणियों की तरह बनाई गई थीं।

इन आलोचनात्मक टिप्पणियों की प्रकृति अलग-अलग थी – कुछ में सलाह से सिर्फ असहमति जताई थी, तो कुछ में संस्था की क्षमता (competence) पर या ईमानदारी (integrity) पर सवाल उठाया था, जैसे राजनीतिक हित या छुपे हुए इरादे होना।

अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले थे। महज़ एक नकारात्मक टिप्पणी (negative comment) – भले ही हल्की-फुल्की ही क्यों न हो – भी लोगों का भरोसा कम कर देती है। लेकिन सबसे ज़्यादा नुकसान वे टिप्पणियां करती हैं जो संस्था की सच्चाई (credibility)  और नैतिकता (ethics)  पर हमला करती हैं। ऐसी टिप्पणियां न सिर्फ भरोसा घटाती हैं, बल्कि लोगों में गुस्सा पैदा करती हैं और उन्हें उसे साझा करने, भावनात्मक प्रतिक्रिया देने या जवाब देने के लिए उकसाती हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि यह असर राजनीतिक सोच (political orientation) पर निर्भर नहीं था – चाहे व्यक्ति रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट, संस्था की ईमानदारी पर हमला देखकर दोनों ने समान प्रतिक्रिया दी। इससे पता चलता है कि भरोसे में कमी सिर्फ राजनीति का मसला नहीं, बल्कि इंसानों की सामान्य प्रवृत्ति है। यह अध्ययन दर्शाता है कि हर तरह की आलोचना का असर एक जैसा नहीं होता – किस तरह की आलोचना (type of criticism) की जाती है, इससे बहुत फर्क पड़ता है।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक (political analyst) जेम्स ड्रकमैन का कहना है कि गुस्से जैसी भावनाओं (anger perception) को सर्वेक्षण के ज़रिए मापना मुश्किल है – जो बात एक व्यक्ति को गुस्से जैसी लगे, वह दूसरे को चिंता जैसी लग सकती है। फिर भी, इस अध्ययन में जो पैटर्न सामने आया है, वह चिंता की बात (cause for concern) है।

स्वास्थ्य एजेंसी की तरफ से सफाई देने (official clarification) पर भी लोगों का भरोसा पहले जैसा नहीं लौटा। शोधकर्ता एवं मनोरोग विशेषज्ञ जोनाथन ली का मानना है कि इसका एक कारण यह हो सकता है कि लोग तुरंत सही बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते – उन्हें पहले थोड़ा शांत होने (cool-down time) के लिए समय की ज़रूरत होती है।

इस अध्ययन से यह बात साफ होती है कि पारदर्शिता (transparency) यानी ईमानदारी बहुत ज़रूरी है। सलाह है कि स्वास्थ्य एजेंसियों को यह स्वीकार करने में हिचकना नहीं चाहिए कि उन्हें हर सवाल का जवाब नहीं पता। खासकर महामारी (pandemic) जैसी तेज़ी से बदलती परिस्थितियों में यह ईमानदारी भरोसा बढ़ा सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विकास के लिए ज़रूरी है समावेशी संस्थाएं

अरविंद सरदाना

डैरन ऐसीमोगुलू (Daron Acemoglu), जेम्स रॉबिन्सन (James Robinson) एवं साइमन जॉनसन (Simon Johnson) को इस वर्ष के अर्थशास्त्र नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Economics) से नवाज़ा गया है। यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। उनका अध्ययन किसी भी देश में विकास (Economic Growth) के न होने पर केंद्रित है। 

डैरन ऐसीमोगुलू और जेम्स रॉबिन्सन अपनी चर्चित किताब व्हाय नेशन्स फेल: दी ओरिजिन ऑफ पॉवर, प्रॉस्पेरिटी एंड पॉवर्टी (Why Nations Fail: The Origins of Power, Prosperity, and Poverty) में पूछते हैं कि विभिन्न देशों में किस प्रकार की सामाजिक और आर्थिक संस्थाएं बनीं और उनमें क्या अंतर रहा, जिसने विकास की राह को प्रभावित किया? 

यह राजनीतिक अर्थशास्त्र (Political Economy) का पुराना सवाल है। जैसे लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व एडम स्मिथ (Adam Smith) की मशहूर किताब दी वेल्थ ऑफ नेशन्स (The Wealth of Nations) थी। इस वर्ष का पुरस्कार इस बात की स्वीकार्यता का द्योतक है कि अर्थशास्त्रीय अध्ययन (Economic Analysis) में विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया जाता है। 

“विभाजन के लगभग आधी सदी बाद, 1990 के दशक के आखिर में, दक्षिण कोरिया (South Korea) का विकास और उत्तर कोरिया (North Korea) के ठहराव ने इस एक देश के दो हिस्सों के बीच दस गुना का अंतर पैदा कर दिया है। उत्तर कोरिया की आर्थिक आपदा (Economic Crisis), जिसके कारण लाखों लोग भुखमरी का शिकार हुए, की तुलना जब दक्षिण कोरिया की आर्थिक सफलता (Economic Success) के साथ की जाती है, तो यह चौंकाने वाली बात है: उत्तर और दक्षिण कोरिया के अलग-अलग विकास मार्ग की व्याख्या न तो संस्कृति (Culture), न भूगोल (Geography) और न ही अज्ञानता (Ignorance) कर सकती है। हमें जवाब के लिए संस्थाओं (Institutions) को देखना होगा (व्हाय नेशन्स फेल)।” 

उनका मुख्य फोकस इस बात पर है कि किसी देश में सामाजिक और आर्थिक संस्थाओं का स्वररूप समावेशी यानी इंक्लूसिव (Inclusive Institutions) रहा है या फिर शोषणकारी। उनका विश्लेषण बताता है कि समावेशी संस्थाएं आम लोगों को मौके देती हैं, बाज़ार व्यवस्था (Market Economy) को बढ़ने का अवसर प्रधान करती हैं और नई टेक्नोलॉजी (New Technology) को अपनाने का वातावरण बनाए रखती हैं। किसी भी व्यवस्था में जब विकास का लाभ अधिक लोगों में बंटता है और उसकी नींव संस्थानों में है, तो यह समावेशी स्वरूप लेता है। इसके विपरीत जब विकास एक सीमित वर्ग की ओर केन्द्रित होता है तो वहां शोषणकारी संस्थाएं बनती हैं और उन्हें पोषित करती रहती हैं। इस प्रकार एक अभिजात्य वर्ग का मज़बूत वर्चस्व लगातार बना रहता है। 

यह बात इतनी नई नहीं है, परंतु उनका शोध अलग-अलग देशों का तुलनात्मक विश्लेषण (Comparative Analysis) इस दृष्टिकोण को आंकड़ों के साथ अनूठे रूप से प्रस्तुत करता है।   इसे एक उदाहरण से समझते हैं। स्वतंत्रता के समय 1966 में बोत्सवाना (Botswana), दुनिया के सबसे गरीब देशों (Poorest Countries) में से एक था। यहां “कुल बारह किलोमीटर पक्की सड़कें थीं, बाईस व्यक्ति विश्वविद्यालय से स्नातक थे, और सौ माध्यमिक विद्यालय थे। यह दक्षिण अफ्रीका (South Africa), नामीबिया (Namibia) और रोडेशिया (Rhodesia) के श्वेत शासनों से घिरा हुआ था, जो सभी अश्वेतों द्वारा संचालित स्वतंत्र अफ्रीकी देशों (Independent African Nations) के प्रति नफरत पालते थे। फिर भी अगले चालीस वर्षों में, बोत्सवाना दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते देशों (Fastest Growing Economies) में शुमार हो गया। आज सब-सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) में बोत्सवाना की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) सबसे अधिक है, और यह एस्टोनिया (Estonia) और हंगरी (Hungary) जैसे सफल पूर्वी युरोपीय देशों के बराबर के स्तर पर है। 

बोत्सवाना ने तेज़ी से समावेशी आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं (Inclusive Economic and Political Institutions) का विकास किया। वह लोकतांत्रिक (Democratic Governance) बना रहा है और वहां नियमित रूप से चुनाव होते रहे हैं। उसने कभी भी गृह युद्ध (Civil War) या सैन्य हस्तक्षेप (Military Intervention) का सामना नहीं किया है। सरकार ने संपत्ति के अधिकार (Property Rights) को लागू करने, व्यापक आर्थिक स्थिरता (Economic Stability) सुनिश्चित करने और समावेशी बाज़ार अर्थव्यवस्था (Inclusive Market Economy) के विकास को प्रोत्साहित किया। सब-सहारा अफ्रीका के अधिकांश देशों, जैसे सिएरा लियोन और जिम्बाब्वे, में स्वतंत्रता के बाद बदलाव का जो अवसर मिला था, उसे उन्होंने खो दिया। आज़ादी के बाद, औपनिवेशिक काल के दौरान मौजूद शोषणकारी संस्थाओं का फिर से निर्माण हुआ। इनकी तुलना में स्वतंत्रता के शुरुआती चरण में बोत्सवाना अलग था और कबीला मुखियाओं का लोगों के प्रति कुछ हद तक जवाबदेही वाली संस्थाओं का इतिहास बना रहा। “इस तरह की संस्थाओं के लिए बोत्सवाना निश्चित रूप से अफ्रीका में अद्वितीय नहीं था लेकिन इस हद तक तो अद्वितीय था कि ये संस्थाएं औपनिवेशिक काल में बिना ज़्यादा नुकसान के बची रहीं।”

उदाहरण के लिए, आज़ादी के बाद बोत्सवाना में बने मांस आयोग ने पशु अर्थव्यवस्था को विकसित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई, फुट एण्ड माउथ रोग को नियंत्रित करने के लिए काम किया और निर्यात को बढ़ावा दिया। इससे आर्थिक विकास में योगदान मिला और समावेशी आर्थिक संस्थाओं के लिए समर्थन बढ़ा। बोत्सवाना में शुरुआती विकास मांस निर्यात पर निर्भर था, लेकिन हीरे की खोज के बाद चीज़ें नाटकीय रूप से बदल गईं। बोत्सवाना में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन भी अन्य अफ्रीकी देशों से काफी अलग था। औपनिवेशिक काल के दौरान, बोत्सवाना प्रमुखों ने खनिजों की खोज को रोकने का प्रयास किया था क्योंकि वे जानते थे कि अगर युरोपीय लोगों ने कीमती धातुओं या पत्थरों की खोज की, तो उनकी स्वायत्तता खत्म हो जाएगी। आज़ादी के बाद सबसे बड़ी हीरे की खोज नग्वाटो भूमि के नीचे हुई थी, जो एक कबीले की पारंपरिक मातृभूमि थी। देश के नेताओं ने खोज की घोषणा से पहले, कानून में बदलाव किया ताकि खनिज सम्पदा का अधिकार राष्ट्र में निहित हो, न कि जनजाति में। इसने राज्य में केंद्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया। हीरे के राजस्व का इस्तेमाल अब नौकरशाही, बुनियादी ढांचे के निर्माण और शिक्षा में निवेश के लिए किया गया। यह अन्य अफ्रीकी देशों से अलग है।

इस प्रकार कई तुलनात्मक अध्ययनों (Comparative Studies) से यह स्पष्ट होता है कि विकास के लिए समावेशी संस्थाओं का बनना ज़रूरी है। इनके बनने के पीछे राजनीतिक समीकरण (Political Equations) और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Context) का विश्लेषण करना होगा। बदलाव के खास मौके कुछ देशों में कैसे बने? इस अध्ययन से कुछ सीख ली जा सकती है पर इतिहास भविष्य के लिए कोई नुस्खे नहीं प्रदान करता। पुस्तक में बताया गया है कि आजकल एक्सपर्ट यह भ्रम पालते हैं कि विकास को ढांचाबद्ध किया जा सकता है, बस जानकारी की कमी है। पर वास्तव में वे संस्थाओं की जटिलता को नज़रअंदाज कर रहे होते हैं जो उनकी योजनाओं को विफल कर देती हैं। उसी प्रकार, यह भी बताया गया है कि विदेशी मदद की भूमिका नहीं है। इसी प्रकार से, आजकल कई मुल्कों में तानाशाही व्यवस्था विकास के लिए लुभावनी दिखती है और कुछ समय के लिए इसका असर होता भी है, परन्तु यह एक समय बाद बिखरने लगता है क्योंकि केंद्रीकृत सत्ता समय के साथ आने वाले आवश्यक बदलाव नहीं होने देती।

बहरहाल, चाहे हम सहमत हों या नहीं, इनकी पुस्तक पढ़ने योग्य है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हड्डियों के विश्लेषण से धूम्रपान आदतों की खोज

हालिया अध्ययन में सदियों पुरानी हड्डियों (bones) का सूक्ष्म विश्लेषण कर धूम्रपान (smoking) करने वालों की पहचान की गई है। ये नतीजे इंग्लैंड (England) में 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान तम्बाकू सेवन की आश्चर्यजनक जानकारी देते हैं कि न केवल पुरुष, बल्कि महिलाएं और समाज के सभी वर्गों के लोग तम्बाकू (tobacco) सेवन किया करते थे। 

ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में यह उल्लेख तो मिलता था कि 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में धूम्रपान एक आम आदत थी – हर वर्ग के पुरुष तम्बाकूपान (tobacco consumption) करते थे। यहां तक कि मांग को पूरा करने के लिए अमेरिका (America) से भारी मात्रा में तम्बाकू आयात होती थी। लेकिन धूम्रपान के पुरातात्विक साक्ष्य दुर्लभ हैं। क्योंकि पहचान के पारंपरिक तरीके दांतों के घिसाव (teeth wear) और मिट्टी के पाइप जैसे सुरागों पर निर्भर थे, लेकिन खुदाई में सलामत बत्तीसी वाले कंकाल और पाइप बहुत ही कम मिले हैं। और कंकाल से फेफड़ों की क्षति का भी पता नहीं चलता। फिर, यह भी ज़रूरी नहीं कि हर व्यक्ति धूम्रपान करके ही तम्बाकू सेवन करता हो, नसवार या खैनी भी तम्बाकू सेवन का माध्यम हो सकते हैं।  

इसलिए साइंस एडवांसेस (Science Advances) में प्रकाशित इस अध्ययन में मानव हड्डियों में तम्बाकू के रासायनिक हस्ताक्षर (chemical signatures) पता लगाने के लिए मेटाबोलोमिक्स (metabolomics) का उपयोग किया गया। मेटाबोलोमिक्स का मतलब होता है कि शरीर में भोजन, दवाइयों व अन्य पदार्थों के पाचन से उत्पन्न पदार्थों का विश्लेषण। शोधकर्ताओं ने तरल क्रोमेटोग्राफी (liquid chromatography) की मदद से हड्डियों से चयापचय पदार्थ अलग किए। ये रासायनिक उप-उत्पाद (chemical byproducts) हैं और तम्बाकू जैसे पदार्थों को पचाने के बाद शरीर में बने रहते हैं। फिर उन्होंने इंग्लैंड में तम्बाकू के आने से पहले की हड्डियों और बाद की हड्डियों की तुलना करके रासायनिक अंतरों से उन लोगों की पहचान की जिन्होंने तम्बाकू सेवन किया था। विश्लेषण किए गए 323 से अधिक कंकालों में से आधे से अधिक नमूनों में लंबे समय तक तम्बाकू सेवन के प्रमाण मिले हैं। ये आंकड़े वर्तमान ब्रिटेन (Britain)  में धूम्रपान दर से चार गुना अधिक हैं।

हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हैं कि विक्टोरिया युग (1830 से 1900) में धूम्रपान मुख्यत: पुरुष करते थे, इसमें बहुत कम महिलाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि विक्टोरियन महिलाएं (Victorian women), यहां तक कि अमीर घरानों की महिलाएं, भी अक्सर धूम्रपान करती थीं। गरीब महिलाएं धूम्रपान के लिए सस्ते मिट्टी के पाइप का इस्तेमाल करती थीं जिससे उनके दांतों में गड्ढे बन जाते थे, वहीं अमीर महिलाएं एम्बर, लकड़ी या हड्डी से बने पाइप का इस्तेमाल करती थीं। ऐसे पाइप दांतों पर कोई स्पष्ट निशान नहीं छोड़ते। इससे यह समझा जा सकता है कि पिछले अध्ययनों में महिलाओं की धूम्रपान आदतें क्यों अनदेखी रहीं। शोध से स्पष्ट है कि तम्बाकू सेवन सभी सामाजिक वर्गों में आम था।

चूंकि ये चयापचय जनित पदार्थ लाखों वर्षों तक हड्डियों में बने रह सकते हैं, यह तकनीक प्राचीन मनुष्यों के व्यवहार (behavior) जैसे उनके आहार, मादक सेवन या तपेदिक जैसी बीमारियों को उजागर करने में मदद कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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अभिव्यक्ति में कविताएं गद्य से बेहतर हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

युनिसेफ ने 21 मार्च के दिन को विश्व कविता दिवस (World Poetry Day) के रूप में घोषित किया है। विश्व कविता दिवस मनाने का उद्देश्य काव्यात्मक अभिव्यक्ति (poetic expression) के माध्यम से भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है। हर साल इस दिन के लिए कोई एक थीम (theme) चुनी जाती है। वर्ष 2022 में इस दिन की थीम ‘पर्यावरण’ रखी गई थी। 2023 की थीम थी, ‘सदैव कवि, गद्य में भी (Always a poet, even in prose)’ और इस साल की थीम है ‘दिग्गजों के अनुभव पर बढ़ना (Standing on the shoulders of giants)’।

कविता का उपयोग भावनाएं जगाने के लिए, बिंब रचने के लिए, और विचारों को सुगठित और कल्पनाशील तरीके से व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इसमें लय होती है, छंद या मीटर (meter) होता है, भावनात्मक अनुनाद होता है। पाठक या गायक कवि की भावना को महसूस करते हैं और यह उनके दिल-ओ-दिमाग में प्रभावी ढंग से उतर जाती हैं। इसमें किफायत, अलंकरण (embellishment) और लय की समझ होती है। ये अक्सर गाई जा सकती हैं। जैसे, हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’; यह रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई एक कविता है, जिसे हम सभी जोश-ओ-खरोश से गाते हैं। वहीं, हममें से कई अपनी भाषा में दुख-दर्द भरे नगमे भी गुनगुनाते हैं, गाते हैं, सुनते हैं।

वर्ष 2022 का विश्व कविता दिवस लुप्तप्राय भाषाओं (endangered languages), इन भाषाओं में कविताओं, गद्य और गीतों पर केंद्रित था। दुनिया भर में, 7000 से अधिक भाषाएं लुप्तप्राय हैं। यूनेस्को के अनुसार भारत में, 42 भाषाएं लुप्तप्राय (10-10 हज़ार से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली) हैं। 2013 से, भारत ने अपनी लुप्तप्राय भाषाओं के बचाव और संरक्षण (preservation) के लिए एक योजना शुरू की है। वेबसाइट ‘Endangered languages in India (भारत में लुप्तप्राय भाषाएं)’ पर इन लुप्तप्राय भाषाओं की सूची दी गई है। इस सूची में ‘ग्रेट अंडमानी’, लद्दाख में बोली जाने वाली ‘तिब्बती बलती’ और झारखंड की ‘असुर’ भाषाएं शामिल हैं। मैसूर स्थित स्कीम फॉर प्रोटेक्शन एंड प्रिवेंशन ऑफ एन्डेंजर्ड लैंग्वैज (SPPEL) इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत है।

2023 में विश्व कविता दिवस की थीम थी: ‘Always a poet, even in prose’। शेक्सपियर इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। उनके गद्य (prose) में भी काव्यात्मक लय थी। यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं: ‘Brevity is the soul of wit’; और ‘my words fly up, but my thoughts remain below’। हिंदी, उर्दू और तमिल में कई विद्वानों ने इसी तरह की कविताएं/बातें लिखी हैं।

जब हम गद्य में अपने मन की बात कह सकते हैं तो कविता क्यों लिखना? जहां गद्य में प्रयुक्त भाषा स्वाभाविक और व्याकरण-सम्मत होती है, वहीं काव्यात्मक भाषा आलंकारिक (figurative) और प्रतीकात्मक होती है। ऑक्सफोर्ड स्कोलेस्टिका एकेडमी बताती है कि कविता साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक ऐसा रूप है जिसमें भाषा का उपयोग होता है। और एनसायक्लोपीडिया ब्रिटानिका (Encyclopedia Britannica) कहता है, कविता में आप भाषा (के शब्दों) को अर्थ, ध्वनि और लय के मुताबिक काफी सोच-समझकर चुनते और जमाते हैं। कविता पढ़ते या सुनते समय, आपके मस्तिष्क का ‘आनंद केंद्र’ (pleasure center) सक्रियता से बिंबों का अर्थ खोजने और रूपकों की व्याख्या करने में तल्लीन हो जाता है।

वैज्ञानिक और कविता

‘Scientists take on poetry (साइंटिस्ट टेक ऑन पोएट्री)’ नामक साइट बताती है कि गणितज्ञ एडा लवलेस, रसायनज्ञ हम्फ्री डेवी और भौतिक विज्ञानी जेम्स मैक्सवेल ने अपने काम के बारे में कविताएं लिखी हैं। भारत में, वैज्ञानिक एस. एस. भटनागर ने हिंदी में कविताएं लिखीं। वैसे सी. वी. रमन कवि तो नहीं थे, लेकिन वायलिन की संगीतमय ध्वनियों (musical tones) का वैज्ञानिक आधार जानने में उनकी रुचि थी और उन्होंने ‘Experiment with mechanically played violin (यांत्रिक तरीके से बजाए जाने वाले वायलिन के साथ प्रयोग)’ शीर्षक से एक शोधपत्र लिखा था, जो 1920 में प्रोसिडिंग्स ऑफ दी इंडियन एसोसिएशन फॉर दी कल्टीवेशन ऑफ साइंस में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने भारतीय आघात वाद्य यंत्रों (percussion instruments) की विशिष्टता का भी अध्ययन किया। तबला और मृदंग की ध्वनियों की हारमोनिक प्रकृति का उनका विश्लेषण भारतीय ताल वाद्यों पर पहला वैज्ञानिक अध्ययन था।

इसी तरह, भौतिक विज्ञानी एस. एन. बोस तंतु वाद्य एसराज बजाया करते थे। बर्डमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर प्रकृतिविद सालिम अली ने भारत के पक्षियों पर कई किताबें लिखीं। और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर श्रीराम रंगराजन (जिनका तखल्लुस ‘सुजाता’ है) ने तमिल में बेहतरीन किताबें और लेख लिखे, जिन्हें उनके भाषा कौशल (language proficiency) के कारण हर जगह सराहा जाता है। क्या ऐसे और वैज्ञानिक नहीं होने चाहिए जो संगीत पर कविताएं और निबंध लिखें? (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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