प्राचीन शिकारी-संग्रहकर्ता कुम्हार भी थे

त्तरी युरेशिया में मिले लगभग 8000 साल पुराने टूटे और जले हुए भोजन अवशेष लगे मिट्टी के बर्तन चीनी मिट्टी के बर्तनों जैसे तो नहीं लगते लेकिन मांस और तरकारी रखने और पकाने की यह टिकाऊ तकनीक इस क्षेत्र में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के लिए एक बड़ा कदम था। और हालिया शोध बताता है कि यह तकनीक उन्होंने खुद विकसित की थी।

दरअसल वैज्ञानिक मानते आए थे कि युरोप में मिट्टी के बर्तनों का आगमन लगभग 9000 साल पहले कृषि और जानवरों के पालतूकरण के प्रसार के साथ हुआ था। उत्तरी युरोप में मिले लगभग इसी काल के बर्तनों के आधार पर माना जाता था कि यह तकनीक शिकारी-संग्रहकर्ताओं ने अपने अधिक प्रगतिशील किसान पड़ोसियों से सीखी था।

लेकिन नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित एक अध्ययन बिलकुल अलग कहानी कहता है। लगभग 20,000 साल पहले, सुदूर पूर्वी इलाकों में शिकारी-संग्रहकर्ताओं के समूहों के बीच मिट्टी के बर्तन बनाने और उपयोग करने के ज्ञान का प्रसार हो चुका था। ये बर्तन तब उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले चमड़े के बर्तनों से अधिक टिकाऊ थे, और पकाने में उपयोग किए जाने वाले लकड़ी के बर्तनों की तरह आग में जलते नहीं थे। लगभग 7900 साल पहले तक यूराल पर्वत से लेकर दक्षिणी स्कैंडिनेविया तक मिट्टी के बर्तनों का उपयोग आम हो चुका था।

मिट्टी के बर्तनों का फैलाव देखने के लिए नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ऑयरलैंड के पुरातत्वविद रोवन मैकलॉफ्लिन और उनके साथियों ने बाल्टिक सागर और भूतपूर्व सोवियत संघ के युरोपीय हिस्से के 156 पुरातात्विक स्थलों से इकट्ठा किए गए मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों का विश्लेषण किया। इनमें से कई अवशेष वर्तमान रूस और यूक्रेन के संग्रहालयों में संग्रहित थे। बर्तनों में चिपके रह गए जले हुए भोजन का रेडियोकार्बन काल-निर्धारण करके शोधकर्ता इनकी समयरेखा पता कर पाए।

चिपके हुए वसा अवशेषों से पता चला कि वे या तो जुगाली करने वाले जानवरों (जैसे हिरण या मवेशियों) का मांस पकाते थे, या मछली, सूअर या सब्ज़ी-भाजी उबालते थे। इसके अलावा, बर्तनों पर की गई कलाकारी और बर्तनों के आकार की तुलना करके शोधकर्ता पता लगा सके कि मिट्टी के बर्तनों का प्रसार एक से दूसरे समुदाय में कैसे हुआ।

वैसे तो मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए कच्चा माल हर जगह उपलब्ध था, लेकिन उन्हें आकार देने और पकाने जैसा तकनीकी ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित हुआ होगा। और साथ ही खाना पकाने की नई तकनीक भी सीखी गई होगी।

सारे डैटा को एक साथ रखने पर टीम ने पाया कि उत्तरी युरेशिया के कुछ हिस्सों में मिट्टी के बर्तन तेज़ी से फैले थे। कुछ ही शताब्दियों में यह तकनीक कैस्पियन सागर से उत्तरी और पश्चिमी हिस्से में फैल गई थी।

जिस तेज़ी से इस क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन बनाने का ज्ञान फैला, उससे लगता है कि यह ज्ञान लोगों के प्रवास के साथ आगे नहीं बढ़ा बल्कि एक समूह से दूसरे समूह में हस्तांतरित हुआ। ऐसा लगता है एक जगह से दूसरी जगह तक सफर ज्ञान ने किया, लोगों ने नहीं।

यदि ऐसा है, तो ये नतीजे हाल ही में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से विपरीत हैं जो बताता है कि एनातोलिया में यह तकनीक किस तरह से फैली। हालिया जेनेटिक साक्ष्य बताते हैं कि लगभग इसी समय एनातोलिया से दक्षिणी युरोप आए किसान अपने साथ मिट्टी के बर्तन बनाने के तरीके और परंपराएं लाए थे।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पर अधिक शोध यह जानने में मदद कर सकता है कि वास्तव में यह ज्ञान कैसे फैला। जैसे यदि शिकारी-संग्रहकर्ता समाज पितृस्थानिक थे (जहां महिलाएं शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं) तो मिट्टी के बर्तन बनाना महिलाओं द्वारा किया जाने वाला कार्य हो सकता है जो विवाह सम्बंधों के माध्यम से एक गांव से दूसरे गांव तक फैला होगा।

बहरहाल, अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हम जितना समझते थे शिकारी-संग्रहकर्ता उससे कहीं अधिक नवाचारी थे। प्रागैतिहासिक जापान से बाल्टिक सागर के किनारों तक घूमने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता लोगों ने अपनी घुमंतु जीवन शैली को छोड़े बिना नई तकनीकों को गढ़ा और अपनाया था: वे किसानों का अनुसरण नहीं कर रहे थे बल्कि सर्वथा अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। इस मायने में देखा जाए तो शिकारी-संग्रहकर्ता समाज आविष्कारी समाज था।

हालांकि रूस के वैज्ञानिक इस बारे में पहले से जानते थे और इसके अधिकतर साक्ष्य रूसी भाषा में प्रकाशित हुए थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युरोप में खिंच गई अदृश्य दीवार के चलते इस जानकारी से बाकी लोग अनभिज्ञ रहे और बर्तनों का उपयोग किसानों और पशुपालकों की तकनीक माना जाता रहा। 1990 से यह अदृश्य दीवार ढहने लगी थी; पश्चिमी युरोप और रूस, यूक्रेन व बाल्टिक क्षेत्र के शोधकर्ता संयुक्त अध्ययनों में शामिल होने लगे थे। हालिया अध्ययन भी इसी सहयोग की मिसाल है। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इस दीवार को फिर ऊंचा कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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निएंडरथल पके खाने के शौकीन थे

गर आप सोचते हैं कि निएंडरथल मानव कच्चा मांस और फल-बेरियां ही खाते थे, तो हालिया अध्ययन आपको फिर से सोचने को मजबूर कर सकता है। उत्तरी इराक की एक गुफा में विश्व के सबसे प्राचीन पके हुए भोजन के जले हुए अवशेष मिले हैं, जिनके विश्लेषण से लगता है कि निएंडरथल मानव खाने के शौकीन थे।

लीवरपूल जॉन मूर्स युनिवर्सिटी के सांस्कृतिक जीवाश्म विज्ञानी क्रिस हंट का कहना है कि ये नतीजे निएंडरथल मानवों में खाना पकाने के जटिल कार्य और खाद्य संस्कृति का पहला ठोस संकेत हैं।

दरअसल शोधकर्ता बगदाद से आठ सौ किलोमीटर उत्तर में निएंडरथल खुदाई स्थल की एक गुफा शनिदार गुफा की खुदाई कर रहे थे। खुदाई में उन्हें गुफा में बने एक चूल्हे में जले हुए भोजन के अवशेष मिले, जो अब तक पाए गए पके भोजन के अवशेष में से सबसे प्राचीन (लगभग 70,000 साल पुराने) थे।

शोधकर्ताओं ने पास की गुफाओं से इकट्ठा किए गए बीजों से इन व्यंजनों में से एक व्यंजन को प्रयोगशाला में बनाने की कोशिश की। यह रोटी जैसी, पिज़्ज़ा के बेस सरीखी चपटी थी जो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट थी।

टीम ने दक्षिणी यूनान में फ्रैंचथी गुफा, जिनमें लगभग 12,000 साल पहले आधुनिक मनुष्य रहते थे, से मिले प्राचीन जले हुए भोजन के अवशेषों का भी स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से विश्लेषण किया।

दोनों जानकारियों को साथ में देखने से पता चलता है कि पाषाणयुगीन आहार में विविधता थी और प्रागैतिहासिक पाक कला काफी जटिल थी, जिसमें खाना पकाने के लिए कई चरण की तैयारियां शामिल होती थीं।

शोधकर्ताओं को पहली बार दोनों स्थलों पर निएंडरथल और शुरुआती आधुनिक मनुष्यों (होमो सेपिएन्स) द्वारा दाल भिगोने और दलहन दलने के साक्ष्य मिले हैं।

शोधकर्ताओं को भोजन में अलग-अलग तरह के बीजों को मिलाकर बनाने के प्रमाण भी मिले हैं। उनका कहना है कि ये लोग कुछ खास पौधों के ज़ायके को प्राथमिकता देते थे।

एंटीक्विटी में प्रकाशित यह शोध बताता है कि शुरुआती आधुनिक मनुष्य और निएंडरथल दोनों ही मांस के अलावा वनस्पतियां भी खाते थे। जंगली फलों और घास को अक्सर मसूर की दाल और जंगली सरसों के साथ पकाया जाता था। और चूंकि निएंडरथल लोगों के पास बर्तन नहीं थे इसलिए अनुमान है कि वे बीजों को किसी जानवर की खाल में बांधकर भिगोते होंगे।

हालांकि, ऐसा लगता है कि आधुनिक रसोइयों के विपरीत निएंडरथल बीजों का बाहरी आवरण नहीं हटाते थे। छिलका हटाने से कड़वापन खत्म हो जाता है। लगता है कि वे कड़वेपन को कम तो करना चाहते थे लेकिन दालों के प्राकृतिक स्वाद को खत्म भी नहीं करना चाहते थे।

अनुमान है कि वे स्थानीय पत्थरों की मदद से बीजों को कूटते या दलते होंगे इसलिए दालों में थोड़ी किरकिरी आ जाती होगी। और शायद इसलिए निएंडरथल मनुयों के दांत इतनी खराब स्थिति में थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आठ अरब के आगे क्या?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार गत 15 नवंबर को दुनिया की आबादी 8 अरब हो गई है, और वृद्धि जारी है। वैसे, जनसंख्या वृद्धि के संदर्भ में अलग-अलग देशों की स्थिति अलग-अलग है। नाइजीरिया जैसे कुछ देशों में आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि जापान जैसे देशों में घट रही है। चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

गौरतलब है कि होमो सेपियन्स के उद्भव से लेकर वर्ष 1804 तक पृथ्वी की कुल आबादी एक अरब होने में लगभग 3,00,000 वर्षों का समय लगा था। दूसरी ओर, पृथ्वी की आबादी में एक अरब का इज़ाफा मात्र पिछले 12 साल में हुआ है।

यह कहना तो मुश्किल है कि हम 8 अरब की संख्या पर ठीक कब पहुंचे क्योंकि दुनिया के कुछ हिस्सों में जनगणना के आंकड़े दशकों पुराने हैं। कोविड-19 के समय में कुछ देशों के लिए हर एक मौत को दर्ज करना लगभग असंभव था। उत्कृष्ट कंप्यूटर मॉडल भी एक साल या उससे अधिक समय तक बंद रहे होंगे।

बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, साफ पेयजल और स्वच्छता में सुधार की बदौलत पृथ्वी पर हर जगह मनुष्यों की औसत आयु बढ़ी है। उर्वरकों और सिंचाई से फसल की पैदावार में वृद्धि हुई है जिससे पोषण में सुधार हुआ है। कई देशों में जन्म दर बढ़ रही है और मृत्यु दर कम हो रही है।

लेकिन इस रफ्तार से बढ़ती आबादी के कारण हम कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण और अत्यधिक मत्स्याखेट से महासागर प्रभावित हो रहे हैं। विकास, कृषि और पेड़ों से बने उत्पादों के लिए वनों की कटाई और कृषि हेतु वन भूमि की सफाई से वन्य जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। जीवाश्व ईंधनों के कारण जलवायु प्रभावित हो रही है, और जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा तथा पानी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

बढ़ती आबादी के मद्देनज़र पृथ्वी और हमारा अपना कल्याण इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम जलवायु परिवर्तन से कैसे निपटते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामला विभाग के पैट्रिक गेरलैंड का कहना है कि अब भी कुछ हद तक मानव जीवन पर पड़ने वाले भावी प्रभावों को सटीक ढंग से निर्धारित किया जाना बाकी है। इतिहास को देखें तो दुनिया अपनी समस्याओं के हल खोजने और अपनाने में सफल रही है। हमें आशावादी होने की ज़रूरत है। लेकिन कुछ न करना इसका हल नहीं हो सकता। हम मानें या न मानें, जलवायु परिवर्तन तो हो रहे हैं, और ये अपने आप नहीं निपट जाएंगे।

इसी दौरान, विभिन्न देशों की अलग-अलग स्थितियों के बावजूद कुल मिलाकर जनसंख्या बढ़ रही है। और दुनिया के शीर्ष जनसांख्यिकीविद इस पर एकमत नहीं हैं कि हमारी आबादी यहां से आगे कहां पहुंचेगी। एक ही समय में कहीं जनसंख्या में भारी वृद्धि हो रही है और कहीं तेज़ी से कमी हो रही है।

इस साल पहली बार चीन सबसे अधिक आबादी वाला देश नहीं रहेगा, भारत उससे आगे निकल जाएगा। चीन में 1980 में एक-बच्चा नीति लागू होने के पहले से ही जन्म दर घटने लगी थी, जो अब भी लगातार घट रही है। 1970 के दशक में ही उसकी जन्म दर घटकर आधी रह गई थी। बेहतर शिक्षा और करियर के बढ़ते अवसरों से अधिकतर महिलाओं ने प्रसव को टाला है। महामारी के दौरान जन्म दर और घटी। 2015 की तुलना में वर्ष 2020 में 45 प्रतिशत कम बच्चे पैदा हुए थे।

यहां तक कि किसी भी देश के मुकाबले सबसे लंबी जीवन प्रत्याशा, 85 वर्ष, के साथ चीन की 1.4 अरब की आबादी जल्द ही घटने की उम्मीद है – हो सकता है घटना शुरू भी हो गई हो। नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अगली चौथाई शताब्दी में चीन में 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 30 करोड़ लोग होंगे औैर इसका दबाव सार्वजनिक संसाधनों पर होगा।

वहीं दूसरी ओर, अफ्रीका में रुझान विपरीत दिशा में हैं। सहेल में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। नाइजीरिया की आयु का मध्य मूल्य (मीडियन) सिर्फ 17 वर्ष है, जो चीन के आधे से भी कम है। मध्य मूल्य या माध्यिका से यह पता चलता है कि यदि आबादी को 17 वर्ष से कम और 17 वर्ष से अधिक के समूहों में बांटा जाए तो दोनों समूहों में बराबर लोग होंगे। नाइजीरिया में भी जन्म दर गिर तो रही है, लेकिन चीन की तुलना में अब भी 20 गुना अधिक है।

यहां खाद्य सुरक्षा पहले ही एक चिंता का विषय है। देश की एक तिहाई से अधिक आबादी अत्यधिक गरीब है। हर तीसरे परिवार के एक सदस्य को कभी-कभी दिन के एक समय का भोजन छोड़ना पड़ता है ताकि बाकी लोगों को भोजन मिल सके। नाइजीरिया की वर्तमान आबादी 21.6 करोड़ है और अनुमान है कि सदी के अंत तक यह चौगुनी हो जाएगी। तब इसमें चीन की जनसंख्या से भी अधिक लोग होंगे, जबकि चीन के पास 10 गुना अधिक ज़मीन है। लेकिन वास्तविक स्थिति क्या बनेगी यह जन्म दर में कमी सहित कई बातों पर निर्भर करेगा।

जन्म दर में कमी लाने का सबसे बड़ा कारक है शिक्षा, खासकर लड़कियों की शिक्षा। एक दशक पहले, शोधकर्ताओं ने बताया था कि शिक्षा तक बढ़ती पहुंच से सदी के मध्य तक वैश्विक जनसंख्या की वृद्धि में एक अरब तक की कमी आ सकती है। लेकिन आने वाले सालों में शिक्षा कितनी तेज़ी से और कितने व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचेगी, यह एक अनुत्तरित सवाल है।

अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले पच्चीस सालों में विश्व की जनसंख्या 9 अरब से अधिक हो जाएगी।

उसके बाद अनुमान बहुत अलग-अलग हो जाते हैं। कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया था कि 2100 तक दुनिया की आबादी 11 अरब हो जाएगी। लेकिन अब प्रति परिवार में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में कमी को देखते हुए, उसने अपने अनुमानों को घटाकर लगभग 10.4 अरब कर दिया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस के शोधकर्ताओं ने 2018 में अनुमान लगाया था कि जनसंख्या 2070 में बढ़कर 9.7 अरब हो सकती है और फिर सदी के अंत तक गिरकर लगभग 9 अरब हो जाएगी। सिएटल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स के अनुसार 2064 में जनसंख्या लगभग 9.7 अरब तक बढ़ेगी, लेकिन सदी के अंत तक यह गिरकर 8.8 अरब हो सकती है। बुल्गारिया और स्पेन सहित लगभग दो दर्जन देशों में जनसंख्या आधी हो सकती है। अनुमानों में ये अंतर अनुमान लगाने की विधि सहित कई कारणों से हैं।

बहरहाल, सभी शोधकर्ता इस बात से सहमत हैं कि अब तक भविष्य के जनसंख्या अनुमानों में जलवायु परिवर्तन को शामिल करने के प्रयास अपर्याप्त रहे हैं। आंशिक रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि संभावित प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम कितनी जल्दी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करते हैं। लेकिन एक कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने को लेकर भी है। अत्यधिक गर्मी मध्य पूर्व, उप-सहारा अफ्रीका और भारत के कुछ हिस्सों को रहने के अयोग्य बना सकती है। तूफान खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों में लोग तेज़ी से बढ़ते समुद्र स्तर पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे।

वैश्विक जनसंख्या अनुमानों के अलावा, जलवायु परिवर्तन और राजनीति भी संभावित रूप से देशों के बीच प्रवासन को बहुत प्रभावित करेगी। अमेरिका और पश्चिमी युरोप काफी हद तक आप्रवासियों पर निर्भर हैं, लेकिन यह एक तल्ख राजनीतिक मुद्दा बन गया है। घटती आबादी वाले जापान जैसे अन्य देश भी आप्रवासियों को अपने यहां नहीं आने देना चाहते। फिर भी कहीं घटती कहीं बढ़ती आबादी निश्चित रूप से लगभग हर जगह प्रवासन का दबाव बढ़ाएगी। और इस जनसांख्यिकीय असंतुलन से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है – सुप्रबंधित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मतदान में विकलांगजन की भागीदारी – सुबोध जोशी

लोकतांत्रिक प्रणाली का आधार चुनाव है और मतदान का अधिकार लोकतंत्र का एक मौलिक अधिकार है। हालांकि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों में इसे स्थान नहीं दिया गया है लेकिन यह वयस्क नागरिकों का एक अघोषित मौलिक अधिकार है।

लेकिन भारत में अधिकांश विकलांगजन अपने मताधिकार का उपयोग करने और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी करने से वंचित रह जाते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि वे मतदान करना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि अनेक प्रकार की बाधाएं उन्हें मतदान करने से दूर रखती हैं। हालांकि संविधान और विकलांगजन कानून उन्हें समानता प्रदान करते हैं और विकलांगजन कानून प्रत्येक दृष्टि से उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बाधामुक्त वातावरण विकसित करने की बात भी करता है।

दुर्भाग्यवश ज़मीनी स्तर पर सच्चाई बिलकुल विपरीत है। आज़ादी के 75 सालों बाद और 1995 में विकलांगजन के लिए पहला कानून आने से लेकर 2016 में नया कानून आ जाने के बावजूद गिने-चुने अपवादों को छोड़कर बाधामुक्त वातावरण आज भी भारत में एक दिवास्वप्न ही है। इस स्थिति के चलते विकलांगजन अपने विभिन्न अधिकारों का उपयोग करने और शिक्षा, रोज़गार, समाज की विभिन्न गतिविधियों आदि में भागीदारी करने से वंचित हैं। चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी से वंचित रहना उन्हीं में से एक है। जब हम भारत की बात करते हैं तो हमें ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों को मुख्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए जहां गैर-विकलांग व्यक्ति भी अनेक बाधाओं और कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। विकलांगजन तो और अधिक मुश्किलों का सामना करते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में सितंबर 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयोग ने पंजीकृत विकलांग मतदाताओं की संख्या 77.4 लाख बताई थी जबकि वर्ष 2019 में लोक सभा चुनाव के लिए पंजीकृत विकलाग मतदाताओं की संख्या 62.6 लाख थी। 2019 के लोक सभा निर्वाचन में मतदान केंद्रों पर दी गई सुविधाओं का असर कर्नाटक व हिमाचल प्रदेश में उल्लेखनीय रहा था। कर्नाटक में कुल 4.2 लाख पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से 80.12 प्रतिशत ने और हिमाचल प्रदेश में 74 प्रतिशत ने मताधिकार का उपयोग किया था। इसी प्रकार से, हाल ही में सम्पन्न विधान  सभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश के 56 हज़ार से ज़्यादा पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से लगभग 50 हज़ार ने मतदान किया।

चुनाव प्रक्रिया के संदर्भ में स्थिति यह है कि अधिकांश विकलांगजन मतदान केन्द्रों तक जा नहीं पाते हैं और वहां उनके अनुकूल इंतज़ाम भी नहीं होते हैं। उनकी अनेक व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। इनके कारण वे चाहकर भी अपने मताधिकार का उपयोग करने नहीं जा पाते हैं। बाधामुक्त वातावरण का अभाव उनके संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के हनन का कारण बनता है।

विकलांगजन के लिए घर से मतदान केंद्र तक जाकर मतदान करने का निर्णय लेना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए उन्हें अपनी विशिष्ट व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सुविधाओं के बारे में सोच-विचार करना पड़ता है। संभव है, ज़रूरी सुविधाएं जुटाने में वे मतदान के दिन सफल न हों। यहां तक कि अगर वे किसी तरह से जाकर मतदान करने का फैसला करते भी हैं तो उन्हें और उनके सहायकों को असहनीय मानसिक पीड़ा, अपमान और प्रक्रिया सम्बंधी कठिनाइयों से गुज़रना पड़ता है। इस वजह से उनमें से बहुत से लोग मतदान करने के लिए नहीं जाते हैं, हालांकि वे मतदान करना चाहते हैं। चुनाव आयोग द्वारा उन्हें मतदान केंद्र तक ले जाने की सुविधा और व्हीलचेयर प्रदान करना एक स्वागत योग्य पहल है और संभव है इससे कई विकलांग मतदाताओं को मदद मिलेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह की व्यवस्था या सुविधा प्रत्येक विकलांग मतदाता के लिए सुविधाजनक होगी और वह आसानी से मतदान कर सकेगा। वास्तव में कई विकलांग व्यक्ति अनजान सहायक की मदद से बाहर नहीं जा सकते और यह ज़रूरी नहीं है कि मतदान के दिन प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सहायक के साथ या प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वाहन और व्हीलचेयर में वे सहज महसूस करें।

आज जब भारत तेज़ी से टेक्नॉलॉजी इस्तेमाल की दिशा में कदम बढ़ा रहा है और डिजिटल इंडिया अभियान के ज़रिए अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा रहे हैं, तब टेक्नॉलॉजी के सहारे बहुत ही आसानी से विकलांगजन के लिए मतदान सुगम और संभव बनाया जा सकता है।

जैसे, मतदान के दिन विकलांग मतदाताओं को कहीं से भी मोबाइल या कम्प्यूटर के जरिए ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा प्रदान करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। जब डिजिटल आर्थिक लेन-देन सुरक्षित ढंग से किए जा सकते हैं, तो मतदान क्यों नहीं?

विकलांग मतदाताओं की सुविधा के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

1. विकलांगजन को अपने घर या जहां कहीं भी वे हों वहां से कंप्यूटर या मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। BHIM App की तरह यह सेवा बिना इंटरनेट काम करे, तो और बेहतर होगा। डिजिटल टेक्नॉलॉजी के कारण यह अत्यंत सरल और सुरक्षित व्यवस्था साबित होगी। अनेक विकलांगों के फिंगर प्रिंट बायोमेट्रिक मशीन पर नहीं आ पाते हैं, अतः इस तरह की अनिवार्यताएं ऑनलाइन वोटिंग में नहीं रखी जानी चाहिए। आधार कार्ड से सम्बंधित प्रक्रियाओं में देखी गई ऐसी अनेक कठिनाइयां मार्गदर्शक हो सकती हैं। 

2. विकलांगजन को डाक द्वारा मतदान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जो ड्यूटी पर तैनात शासकीय कर्मचारियों और सैनिकों को पहले से प्राप्त एक मान्य सुविधा है ।

3. विकलांगजन के साथ अति-वृद्धजन और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को भी इस तरह की सुगम मतदान सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

4. ऑनलाइन वोटिंग और डाक द्वारा मतदान की सुविधा दिए जाने के बावजूद बाधामुक्त वातावरण विकसित करने का कार्य तेज़ी से किया जाना चाहिए ताकि विकलांग मतदाता मतदान केंद्रों पर जाकर मतदान करने का विकल्प भी चुन सकें।

यदि ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध करा दी जाए तो विकलांग मतदाताओं के साथ-साथ अति-वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार मतदाता अपने मताधिकार का सरलता से उपयोग कर सकेंगे और लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। निकट भविष्य में कुछ महत्वपूर्ण विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इस दिशा में शीघ्र कदम उठाना मुनासिब होगा। (स्रोत फीचर्स)

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दृष्टिबाधितों के लिए नोट पहचानने की समस्याएं – सुबोध जोशी

ज हम वस्तुएं और सेवाएं पाने के लिए मुद्रा यानी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं। मुद्रा का आविष्कार लगभग 5000 साल पहले हुआ था। इससे पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी।

मुद्रा नोटों और सिक्कों के रूप में होती है जिन्हें पहचान कर इस्तेमाल करना किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत ही आसान होता है। उन पर अंकों और अक्षरों में मूल्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखा रहता है। सिक्कों के इस्तेमाल से जुड़ी दिक्कतों की वजह से नोटों का इस्तेमाल ज़्यादा पसंद किया जाता है।

यह इतना आसान इसलिए है क्योंकि हम अपनी आंखों से देख सकते हैं। लेकिन दृष्टिहीनता, अल्पदृष्टि या वर्णान्धता (किसी एक या एक से अधिक रंगों का बोध नहीं हो पाना) से ग्रस्त व्यक्ति मुद्रा कैसे पहचानते हैं? क्या यह उनके लिए भी इतना ही आसान है?

दृष्टिबाधितों को भी मुद्रा के इस्तेमाल की ज़रूरत अन्य व्यक्तियों के समान ही होती है लेकिन मुद्रा को पहचानना उनके लिए आसान नहीं होता है। उनकी सुविधा के लिए सबसे आसान तरीका तो यह है कि कोई अन्य व्यक्ति उनकी मदद कर दे। लेकिन इसमें आत्मनिर्भरता और विश्वसनीयता के सवाल पैदा होते हैं। इसलिए दुनिया भर के देश उनकी सुविधा के लिए कई तरीके अपनाते हैं ताकि लेन-देन में वे मुद्रा की पहचान शीघ्रता और सुरक्षित ढंग से कर सकें। इन तरीकों में सुधार लाने और नए तरीके खोजने की कोशिशें भी जारी हैं।

एक तरीका यह है कि अलग-अलग मूल्य के नोट अलग-अलग आकार में जारी किए जाएं। भारत सहित कुछ देशों में मूल्य के अनुसार नोटों की लंबाई-चौड़ाई अलग-अलग है। इसके साथ ही, नेत्रहीन व्यक्ति नोटों को शीघ्र मापकर उनमें अंतर कर सके इसके लिए पहचान करने वाला एक छोटा कार्ड इस्तेमाल किया जा सकता है। इस कार्ड पर नोटों की लंबाई के अनुसार उनके मूल्य उभरे हुए अंकों में अंकित रहते हैं। कार्ड पर नोट रखकर उसका मूल्य स्पर्श द्वारा पहचाना जा सकता है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की मुद्रा के इस्तेमाल में दृष्टिबाधितों को सबसे ज़्यादा मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि वहां विभिन्न मूल्यों के नोटों के आकार और रंग एक समान होते हैं।

दूसरा तरीका है नोटों पर कोने में या निश्चित स्थान पर ब्रेल डॉट्स के माध्यम से मूल्य अंकित करना जिन्हें नेत्रहीन व्यक्ति स्पर्श द्वारा पढ़ सकें। इसके लिए ब्रेल लिपि का ज्ञान होना आवश्यक है। कनाडा में यह तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है।

तीसरा तरीका है ब्रेल डॉट्स की बजाय नोटों पर स्पर्श द्वारा पहचाने जाने योग्य चिन्ह अंकित करना। सबसे पहले नेदरलैंड द्वारा आज़माया गया यह तरीका ब्राज़ील और बहरीन ने भी अपनाया है। भारत में नए जारी किए गए 2000 के नोट पर एक आयत और सात उभरी हुई लकीरें, 500 के नोट पर एक गोला और पांच उभरी हुई लकीरें और 100 के नोट पर एक त्रिकोण और चार उभरी हुई लकीरें बनी हुई हैं। नए जारी किए गए 50 और 200 रुपए के नोटों पर नेत्रहीन व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसी कोई लकीरें या चिन्ह नहीं हैं, जबकि पुरानी सीरीज़ के 50 के नोट में बाईं तरफ प्रतीक चिन्ह के ऊपर एक चौकोर चिन्ह बना हुआ था।

चौथा तरीका यह है कि नेत्रहीन व्यक्ति अपने किसी भरोसेमंद व्यक्ति की सहायता से मूल्य के अनुसार नोटों को अलग-अलग ढंग से मोड़कर अपने पास रखें। उदाहरण के लिए, 5 का नोट बिना मोड़े, 10 का नोट चौड़ाई में और 20 का नोट लंबाई में मोड़कर रखा जा सकता है। बड़े मूल्य के नोट लंबाई और चौड़ाई मिलाकर और अन्य अलग-अलग ढंग से मोड़े जा सकते हैं। अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर मोड़ने के तरीके जटिल हो सकते हैं या मोड़ने के तरीके कम भी पड़ सकते हैं।

पांचवे तरीके के रूप में कुछ खंडों वाले बटुए का उपयोग किया जा सकता है; प्रत्येक मूल्य के नोट एक अलग खंड में रखना नेत्रहीन व्यक्तियों की मदद कर सकता है। यह तरीका ज़्यादातर कारगर रहता है। लेकिन अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर नोट मोड़कर रखने वाले तरीके की तरह इस तरीके की भी जटिलताएं या सीमाएं प्रकट हो सकती हैं।

ऐसे कई ऐप विकसित किए गए हैं जिनकी मदद से नेत्रहीन व्यक्ति अपने मोबाइल फोन पर मुद्रा पहचान सकते हैं। यह ऐप कैमरे की मदद से मुद्रा की पहचान कर नोट का मूल्य बोलकर बताते हैं। कोई ऐप कितना कारगर होगा यह उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

मुद्रा पहचानने वाले उपकरण भी विकसित किए जा रहे हैं। इनमें एक खास तरह से नोट रखने पर यह उसके बारे में या तो बोलकर या बीप और कंपन के मिश्रण से जानकारी प्रदान कर सकते हैं। लेकिन इसके माध्यम से खराब गुणवत्ता वाले नोटों की पहचान करना मुश्किल होता है। ऐसे उपकरण का एक उदाहरण आईबिल बैंकनोट आइडेंटिफायर है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी मोबाइल ऐडेड नोट आइडेंटिफायर (MANI) आरंभ किया है जो बिना इंटरनेट काम करता है। नोट के बारे में यह बोलकर जानकारी देता है और जो देख और सुन नहीं सकते उन्हें गैर-ध्वनिक तरीके (जैसे कंपन) से भी जानकारी देता है।

सबसे अच्छा यह होगा कि नोट को छूते ही उसे पहचाना जा सके। इससे मुद्रा पहचानने का काम बहुत तेज़ी से और अधिक सुरक्षित ढंग से करना संभव हो सकेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन को बढ़ावा मिलने से नकद रूप में मुद्रा का इस्तेमाल घट रहा है। इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन का तरीका दृष्टिबाधितों के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है बशर्ते उसमें उनकी विशेष आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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महिला वैज्ञानिकों को उचित श्रेय नहीं मिलता

वैज्ञानिक शोध कार्य टीम द्वारा मिलकर किए जाते हैं। लेकिन हमेशा टीम के सभी लोगों को काम का बराबरी से या यथोचित श्रेय नहीं मिलता। हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि करियर के समकक्ष पायदान पर खड़े वैज्ञानिकों में से महिलाओं को उनके समूह के शोधकार्य के लेखक होने का श्रेय मिलने की संभावना पुरुषों की तुलना में कम होती है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिलाओं के प्रति इस तरह की असमानताओं का असर वरिष्ठ महिला वैज्ञानिकों को करियर में बनाए रखने और युवा महिला वैज्ञानिकों को आकर्षित करने की दृष्टि से सकारात्मक नहीं होगा।

पूर्व अध्ययनों में पाया गया है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के कई क्षेत्रों में महिलाएं अपनी मौजूदगी की अपेक्षा कम शोध पत्र लिखती हैं। लेकिन ऐसा क्यों है, अब तक यह पता लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है – क्योंकि यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल था कि लेखकों की सूची में शामिल करने योग्य किन व्यक्तियों को छोड़ दिया जाता है। नए अध्ययन ने यूएस-स्थित लगभग 10,000 वैज्ञानिक अनुसंधान टीमों के विशिष्ट विस्तृत डैटा तैयार कर इस चुनौती को दूर कर दिया है। अध्ययन में वर्ष 2013 से 2016 तक इन 10,000 टीमों में शामिल रहे 1,28,859 शोधकर्ताओं और उनके द्वारा विभिन्न पत्रिकाओं में लिखे गए 39,426 शोध पत्रों से सम्बंधित डैटा इकट्ठा किया गया। इन आंकड़ों से शोधकर्ता यह पता करने में सक्षम रहे कि किन व्यक्तियों ने साथ काम किया और अंततः श्रेय किन्हें मिला। (अध्ययन में नामों के आधार पर लिंग का अनुमान लगाया गया है, इससे अध्ययन में आंकड़े थोड़ा ऊपर-नीचे होने की संभावना हो सकती है और इस तरीके से गैर-बाइनरी शोधकर्ताओं की पहचान करना मुश्किल है।)

अध्ययन की लेखक पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर ब्रिटा ग्लेनॉन बताती हैं कि अक्सर लेखकों की सूची में महिलाओं का नाम छोड़े जाने के किस्से सुनने को मिलते थे। “मैं कई महिला वैज्ञानिकों को जानती हूं जिन्होंने यह अनुभव किया है लेकिन मुझे इसका वास्तविक पैमाना नहीं पता था। वैसे हर कोई इसके बारे में जानता था लेकिन वे मानते थे कि ऐसा करने वाले वे नहीं, कोई और होंगे।”

ग्लेनॉन स्वीकार करती हैं कि यह अध्ययन हर उस कारक को नियंत्रित नहीं कर सका है जो यह निर्धारित करता है कि कौन लेखक का श्रेय पाने के योग्य है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि शोध टीमों में काम करने वाले कुछ पुरुषों ने आधिकारिक तौर पर संस्था में रिपोर्ट किए गए कामों के घंटों की तुलना में अधिक घंटे काम किया हो या समूह के काम में उनका बौद्धिक योगदान अधिक रहा हो।

हालांकि, वे यह भी ध्यान दिलाती हैं कि महिलाएं बताती हैं कि उन्हें जितना श्रेय मिलना चाहिए उससे कम मिलता है। नए अध्ययन के हिस्से के रूप में 2446 वैज्ञानिकों के साथ किए गए एक सर्वेक्षण में देखा गया कि पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने कहा कि उन्हें लेखक होने के श्रेय से बाहर रखा गया और उनके साथियों ने शोध में उनके योगदान को कम आंका था। और पिछले साल प्रकाशित 5575 शोधकर्ताओं पर हुए एक अध्ययन में बताया गया था कि पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाओं ने लेखक होने का श्रेय देने के फैसले को अनुचित माना।

ग्लेनॉन कहती हैं हर प्रयोगशाला में प्रमुख अन्वेषक स्वयं अपने नियम गढ़ता है और वही तय करता है कि लेखक का श्रेय किन्हें मिलेगा। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों और प्रयोगशालाओं में एकरूपता नहीं दिखती। यह पूर्वाग्रहों को मज़बूत कर सकता है। जैसे, किसी ऐसे व्यक्ति को श्रेय मिल सकता है जो प्रयोगशाला में अधिक दिखाई देते हों। अत: फंडिंग एजेंसियों या संस्थानों को लेखक-सूची में शामिल करने के लिए स्पष्ट नियम निर्धारित करने चाहिए। लेखक का फैसला सिर्फ मुखिया पर नहीं छोड़ा जा सकता। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंतर्राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान वर्ष – चक्रेश जैन

कोरोना वायरस की सूक्ष्म, गहन और संपूर्ण संरचना को समझने और उससे फैली महामारी का सामना करने के लिए टीका बनाने में मूलभूत यानी बेसिक विज्ञान की अहम भूमिका रही है। महत्वाकांक्षी मानव जीनोम परियोजना को पूरा करने में बुनियादी विज्ञानों का बहुत बड़ा हाथ है। आज हम इंटरनेट पर जिस ‘वर्ल्ड वाइड वेब’ (WWW) का उपयोग कर रहे हैं, वह मूलभूत विज्ञान की ही देन है। दरअसल युरोपीय प्रयोगशाला ‘सर्न’ में बुनियादी भौतिकी प्रयोगों में वैश्विक सहयोग के दौरान इसका आविष्कार हुआ था। अंतरिक्ष जगत में मिली तमाम छोटी-बड़ी सफलताओं का आधार मूलभूत विज्ञानों में दीर्घकालीन अनुसंधान है।

साल 2022 को निर्वहनीय विकास के लिए मूलभूत विज्ञान अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (IYBSSD-2022) के रूप में मनाया जा रहा है। इसके लिए चुनी गई थीम में जिन मुद्दों को सम्मिलित किया गया है, उनमें अंतर्राष्ट्रीय संवाद और शांति के लिए मूलभूत विज्ञानों की भूमिका, विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाना, नवाचार और आर्थिक विकास, वैश्विक चुनौतियों का समाधान और शिक्षा तथा मानव विकास प्रमुख हैं।

वर्ष 2022 इंटरनेशनल युनियन ऑफ प्योर एंड एप्लाइड फिज़िक्स (आईयूपीएपी) और इंटरनेशनल मैथेमेटिकल युनियन (आएमयू) का शताब्दी वर्ष भी है। अतः IYBSSD के माध्यम से विज्ञान जगत में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विस्तार में एक और नया अध्याय जोड़ने में मदद मिलेगी। संस्था की वेबसाइट में बताया गया है कि कोई भी वैज्ञानिक संस्थान और विश्वविद्यालय IYBSSD-2022 के लिए गतिविधियां भेज सकता है।

2017 में माइकल स्पाइरो ने युनेस्को द्वारा आयोजित वैज्ञानिक बोर्ड की बैठक में 2022 को अंतर्राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान वर्ष के रूप में मनाने का विचार रखा था। उन्होंने बैठक में 2005-2015 के दौरान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाए गए विज्ञान वर्षों का ज़िक्र करते हुए इस मुद्दे पर विचार मंथन और समीक्षा का विचार भी रखा था। हम लोग वर्ष 2005 में भौतिकी, 2008 में पृथ्वी ग्रह, 2009 में खगोल विज्ञान, 2011 में रसायन विज्ञान, 2014 में क्रिस्टलोग्रॉफी और वर्ष 2015 में प्रकाश एवं प्रकाश आधारित प्रौद्योगिकी थीम पर अंतर्राष्ट्रीय वर्ष मना चुके हैं। स्पाइरो ने बैठक में एक अहम विचार यह रखा था कि मूलभूत विज्ञानों के सभी विषयों के वैज्ञानिकों को एक साथ लाने की आवश्यकता है, ताकि वैज्ञानिकों के अनुसंधानों का उपयोग टिकाऊ विकास के 17 लक्ष्यों को पूरा करने में किया जा सकेगा। स्पाइरो फ्रांस के विख्यात भौतिकीविद हैं और पार्टिकल फिज़िक्स की सर्न प्रयोगशाला से जुड़े हुए हैं।

संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा के 76 वें सत्र (2 दिसंबर 2021) में साल 2022 को IYBSSD-2022 के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी। घोषणा में कहा गया है कि मूलभूत विज्ञान की चिकित्सा, उद्योग, कृषि, जल संसाधन, ऊर्जा नियोजन, पर्यावरण, संचार और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है।

गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान, ये चारों विषय मूलभूत विज्ञान के दायरे में आते हैं, जो प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय घटनाओं की व्याख्या और गहन समझ बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इतना ही नहीं, इन्हीं विषयों की बदौलत प्राकृतिक संसाधनों के रूपांतरण में भी मदद मिली है। विज्ञान को मोटे तौर पर मूलभूत और प्रयुक्त विज्ञानों में बांटा गया है।

मूलभूत विज्ञान की कोख से ही प्रयुक्त विज्ञान का उद्गम होता है। प्रयुक्त विज्ञान में अनुसंधान से प्रौद्योगिकी और नवाचारों का विस्तार हुआ है। समाज में प्रौद्योगिकी की चकाचौंध, वर्चस्व और विस्तार से मूलभूत विज्ञान की उपेक्षा हुई है। बीते दशकों में विश्वविद्यालयों में मूलभूत विज्ञान में विद्यार्थियों की दिलचस्पी घटी है। विज्ञान संस्थानों में समाज और बाज़ार की ज़रूरतों पर आधारित अनुसंधान पर ज़ोर है।

विश्व के अधिकांश देशों में सरकारों ने मूलभूत विज्ञानों में शोध-बजट में बढ़ोतरी को आवश्यक नहीं समझा है। इसके कारण हैं। पहला, मूलभूत विज्ञानों का समाज से सीधा सरोकार नहीं है। दूसरा, तत्काल लाभ नहीं मिलता। एक और कारण है कि इसकी बाज़ार को प्रतिस्पर्धी बनाने में भूमिका दिखाई नहीं देती।

IYBSSD-2022 एक महत्वपूर्ण अवसर है, जब आर्थिक और राजनैतिक नेतृत्व और सभी देशों के नागरिकों को इस बात के लिए राजी करने का प्रयास किया जा रहा है कि पृथ्वी ग्रह का संतुलित, टिकाऊ और समावेशी विकास मूलभूत विज्ञानों में अनुसंधानों पर निर्भर है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने टिकाऊ विकास के 17 लक्ष्य निर्धारित किए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि मूलभूत विज्ञानों के इनपुट के बिना इन लक्ष्यों को पाना संभव नहीं है। खाद्य, ऊर्जा, स्वास्थ्य और संचार जैसी बड़ी चुनौतियों का समाधान मूलभूत विज्ञानों में अनुसंधानों की बदौलत ही प्राप्त हो सकेगा। यही नहीं मूलभूत विज्ञानों से पृथ्वी पर निवास कर रही लगभग आठ अरब जनसंख्या के विभिन्न अच्छे-बुरे प्रभावों को समझने और किसी-न-किसी तरीके से समाधान खोजने में सहायता मिलेगी।

टिकाऊ विकास के निर्धारित 17 लक्ष्य इस प्रकार हैं – गरीबी उन्मूलन, शून्य भुखमरी, अच्छा स्वास्थ्य एवं खुशहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल और स्वच्छता, किफायती और स्वच्छ ऊर्जा, समुचित कार्य और आर्थिक वृद्धि, उद्योग, नवाचार तथा आधारभूत सुविधाएं, असमानताओं में कमी, निर्वहनीय शहर एवं समुदाय, निर्वहनीय उपभोग और उत्पादन, जलवायु कार्य योजना, जलीय जीवन, थलीय जीवन, शांति, न्याय एवं सशक्त संस्था और लक्ष्यों हेतु सहभागिता।

मूलभूत विज्ञानों में अनुसंधान से ओज़ोन परत के क्षरण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों में कमी को रोकने और विलुप्ति की कगार तक पहुंच चुकी वनस्पति और जन्तु प्रजातियों को बचाने में मदद मिलेगी।

IYBSSD-2022 को मनाने के सिलसिले में 8 जुलाई को युनेस्को के मुख्यालय पेरिस में शुभारंभ और विज्ञान सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसमें दुनिया भर के वैज्ञानिक मूलभूत विज्ञानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार मंथन करेंगे। इसी शृंखला में 13-15 सितंबर को वियतनाम में ‘टिकाऊ विकास के लिए विज्ञान और नैतिकता’ पर सेमीनार होगा। 20-22 सितंबर के दौरान बेलग्राड में ‘मूलभूत विज्ञान और टिकाऊ विकास’ विषय पर विश्व सम्मेलन होगा। इन आयोजनों में विज्ञान के क्षेत्र में समावेशी प्रतिभागिता का विस्तार, शिक्षा और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का सशक्तिकरण, मूलभूत विज्ञानों का वित्तीय पोषण और विज्ञान का सरलीकरण जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

इसी वर्ष भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्टेट साइंस एंड टेक्नॉलॉजी प्रोग्राम डिवीज़न ने आज़ादी की 75वीं सालगिरह के मौके पर जून में ‘मूलभूत विज्ञान और आत्मनिर्भरता’ थीम पर ऑनलाइन विचार मंथन आयोजित किया था, जिसमें 20 राज्यों की विज्ञान परिषदों ने भाग लिया। इस विचार मंथन में शामिल वैज्ञानिकों का विचार है कि मूलभूत विज्ञानों के विषयों में प्रोत्साहन और शोध कार्यों के लिए धनराशि बढ़ा कर आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

IYBSSD-2022 को पूरे साल मनाने के लिए क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न गतिविधियां और कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को मूलभूत विज्ञानों में उच्च अध्ययन और रिसर्च के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। स्कूली बच्चों को मूलभूत विज्ञानों में योगदान करने वाले वैज्ञानिकों की जीवनी और अनुसंधान कार्यों से परिचित कराया जा सकता है। वैज्ञानिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में सेमीनार और संगोष्ठियों का आयोजन भी किया जा सकता है।

राज्यों की विज्ञान परिषदें मूलभूत विज्ञानों को प्रोत्साहित करने के लिए बजट प्रावधानों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। महिला वैज्ञानिकों को मूलभूत विज्ञानों में रिसर्च के लिए छात्रवृत्तियां उपलब्ध कराई जा सकती हैं। आम लोगों को मूलभूत विज्ञानों के महत्व से परिचित कराने के लिए व्याख्यान और प्रदर्शनियां आयोजित की जा सकती हैं।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग व समावेश के विस्तार और वैश्विक चुनौतियों के समाधान में मूलभूत विज्ञान वर्ष के कार्यक्रम अहम भूमिका निभा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विकलांग अधिकार आंदोलन: समान अवसर, पूर्ण भागीदारी – सुबोध जोशी

विकलांगता की बात आते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं। पहली है यूएसए, अन्य विकसित पश्चिमी देशों और जापान जैसे गैर-पश्चिमी विकसित देशों की तस्वीर, जहां विकलांगजन को अवसर, सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है, जिनका उपयोग करते हुए वे गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने में समर्थ हैं। दूसरी तस्वीर है भारत सहित विकासशील और पिछड़े देशों की, जहां संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न पहलों के बावजूद विकलांगजन घोर दुर्दशापूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

विकलांगजन के हितों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1981 को विश्व विकलांगजन वर्ष घोषित किया गया था और 1983 से 1992 के दशक को संयुक्त राष्ट्र विकलांगजन दशक। संयुक्त राष्ट्र की ही पहल पर 1992 से 3 दिसंबर प्रति वर्ष विश्व विकलांगजन दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। उसकी इन पहलों से पहले भी दुनिया के विकसित देशों में, विशेष रूप से यूएसए में, विकलांगजन के लिए उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वहां डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट काफी ज़ोर पकड़ चुका था। डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट का खासा असर रहा और इससे इतना दबाव बना कि संयुक्त राष्ट्र संघ और दुनिया भर के देशों की सरकारों को सबसे उपेक्षित वर्ग यानी विकलांग वर्ग के लिए पहल करने पर मजबूर होना पड़ा।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट इसलिए अधिक प्रभावशाली हुआ क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में वे सैनिक शामिल थे जो विश्व युद्ध में विकलांग हो गए थे। चूंकि वे युद्ध के नायक थे और जनता उनके साथ थी इसलिए उनकी बातों या मांगों को नज़रअंदाज़ करना सरकार और संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए आसान नहीं था। इसके बावजूद परिणाम सामने आने में दो-तीन दशकों का वक्त लगा और ‘समान अवसर एवं पूर्ण भागीदारी’ पर आधारित कानून और नीतियां सामने आने लगी। ‘समान अवसर एवं पूर्ण भागीदारी’ विकलांगजन का ऐसा अधिकार है जो पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि किसी देश का संपूर्ण तंत्र, सरकार, संस्थाएं और गैर-विकलांग समुदाय विकलांगजन के प्रति अपना दायित्व किस प्रकार निभाते हैं।

भारत की ही मिसाल ले लीजिए जहां संविधान के निर्माताओं को यह एहसास तक नहीं हुआ कि उनसे विकलांग वर्ग की पूर्ण उपेक्षा हो रही है। भारत में विकलांगजन के लिए कानून बनाने का अधिकार केंद्रीय सूची या समवर्ती सूची में न रखते हुए उन्होंने यह काम पूरी तरह राज्यों पर छोड़ दिया। संवेदनशीलता की कमी का नतीजा यह हुआ कि राज्यों द्वारा आधी सदी बीत जाने तक कोई प्रभावी कानून बनाए जाने की जानकारी नहीं है। विकलांगता सम्बंधी अंतर्राष्ट्रीय संधियों या घोषणा पत्रों पर हस्ताक्षर करने के बाद ही संविधान के विशेष प्रावधान का उपयोग करते हुए विकलांगजन के लिए 1995 और 2016 के केंद्रीय कानून लाए गए। लेकिन फिर भी विकलांगजन के लिए कानून बनाने का मुद्दा केंद्रीय या समवर्ती सूची में नहीं जोड़ा गया।

डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट एक अत्यंत महत्वपूर्ण आंदोलन रहा है और इस पर निगाह डालना उचित होगा। यूएसए और अन्य विकसित देशों में यह विशेष रूप से प्रभावी रहा है और इसी का नतीजा है कि भारत सहित विकासशील और पिछड़े देशों में भी विकलांगजन के अधिकारों और कल्याण की बात हो रही है। डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट एक विश्वव्यापी सामाजिक आंदोलन है लेकिन मुख्य रूप से यह यूएसए में जन्मा और पनपा और फिर दुनिया भर में फैल गया। इसका मुख्य लक्ष्य विकलांगजन को जबरन दरकिनार करने के विरुद्ध लड़ाई लड़ना है।

विकलांगजन के अधिकारों के लिए लड़ाई यूएसए में 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में शुरू हो चुकी थी और इसने धीरे-धीरे आकार लिया। लुई ब्रेल और उनके बाद हेलेन केलर ने इस दिशा में व्यक्तिगत तौर पर उल्लेखनीय कार्य किया। धीरे-धीरे स्थानीय और राज्य स्तरीय संगठन अस्तित्व में आए और पहला राष्ट्रीय संगठन – दी नेशनल एसोसिएशन ऑफ दी डेफ (बधिरों के राष्ट्रीय संगठन) – 1880 में स्थापित किया गया। 1930 के दशक में दी सोशल सिक्योरिटी एक्ट (सामाजिक सुरक्षा कानून) में दृष्टिबाधितों और विकलांग बच्चों की सहायता के लिए राज्यों को धनराशि उपलब्ध कराई गई। 1940 के दशक में नेशनल मेंटल हेल्थ एक्ट (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कानून) के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ स्थापित करने की बात कही गई थी और विकलांगजन के अधिकारों के लिए दी अमेरिकन फेडरेशन ऑफ दी फिज़िकली हैंडीकैप्ड (शारीरिक रूप से विकलांगजन संगठन) प्रथम बहु-विकलांगता संगठन के रूप में उभरा।

1950 के दशक में ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के फलस्वरूप डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट ने गति पकड़ी और 1964 के दी सिविल राइट्स एक्ट (नागरिक अधिकार कानून) से इस आंदोलन को नई दिशा मिली। 1970 के दशक में यह मांग भी उठी कि 1972 के रिहैबिलिटेशन एक्ट (पुनर्वास कानून) में विकलांगजन के नागरिक अधिकार शामिल किए जाएं। 1973 में पारित रिहैबिलिटेशन एक्ट में यह मांग पूरी की गई। इस तरह इतिहास में पहली बार विकलांगजन के नागरिक अधिकार कानूनन संरक्षित किए गए। तत्पश्चात सभी विकलांग बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच समान रूप से सुनिश्चित करने के लिए 1975 में दी एजुकेशन फॉर ऑल चिल्ड्रन एक्ट पारित हुआ  (बाद में इसे इंडिविजुअल्स विथ डिसेबिलिटिज़ एजुकेशन एक्ट कहा गया)। एक कदम और आगे बढ़ते हुए 1980 के दशक में यह मांग रखी गई कि अलग-अलग कानूनों/हिस्सों में बंटे हुए प्रावधानों को एकल कानून का रूप दिया जाए। 1990 में अमेरिकंस विद डिसेबिलिटिज़ एक्ट पारित किया गया जिसका उद्देश्य विकलांगता के आधार पर भेदभाव को रोकना है।

भारत के संदर्भ में देखें तो विकलांगजन के अधिकारों को लेकर आंदोलन इतना मज़बूत नहीं रहा है और उनके लिए कानून भी आंदोलन के परिणामस्वरूप और कानून-निर्माताओं की स्वयं की सोच और संवेदनशीलता के कारण नहीं बने। दुर्भाग्यवश बहुत से अन्य देशों की तरह भारत में भी विकलांगजन को अनुपयोगी, अनुत्पादक और बोझ समझा जाता है। भारत में विकलांगजन के अधिकारों के लिए पहला कानून एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकलांगजनों की समानता और पूर्ण भागीदारी की घोषणा के आधार पर बना – नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995। इसका स्थान लेने वाला अगला कानून विकलांगजन के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (सं.रा. विकलांगजन अधिकार संधि – UNCRPD) के आधार पर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के रूप में सामने आया। ये दोनों कानून अंतर्राष्ट्रीय संधि या घोषणा पत्र के पालन के लिए संविधान के अनुच्छेद 253 का उपयोग करते हुए बनाए गए थे। इन दोनों के बीच ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, मेंटल रिटार्डेशन और मल्टीपल डिसेबिलिटी से प्रभावित व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 पारित किया गया।

भारत में डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट की शुरुआत 1970 के दशक से मानी जा सकती है लेकिन आवाज़ उठाने वाले व्यक्ति और संगठन बिखरे हुए थे। उनकी आवाज़ मज़बूत नहीं थी और कमोबेश यही स्थिति आज भी कायम है। 1986 में रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना एक रजिस्टर्ड सोसाइटी के रूप में की गई और एक कानून के ज़रिए 1993 में इसे वैधानिक निकाय का दर्जा दिया गया। लेकिन विकलांगजन के कल्याण और पुनर्वास के लिए तब तक भी कानून का अभाव था। इस बीच मेंटल हेल्थ एक्ट 1987 पारित किया गया, जिसका स्थान मेंटल हेल्थ एक्ट 2017 ने लिया। विकलांगजन के प्रति संवेदनशीलता की कमी इस सच्चाई से भी समझी जा सकती है कि स्वतंत्र भारत में उन्हें शुरू से एक श्रेणी के रूप में राष्ट्रीय जनगणना से बाहर रखा गया। अत्यधिक दबाव पड़ने पर 2001 की जनगणना में उन्हें अलग स्थान दिया गया। तब तक सैंपल सर्वे के माध्यम से उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता रहा।

भारत में 2006 में विकलांगता सम्बंधी राष्ट्रीय नीति लागू की गई। अगली कड़ी के रूप में 2011 में तैयार किए गए विकलांगजन अधिकार विधेयक का उद्देश्य राष्ट्र संघ संधि के तहत भारत के दायित्वों को कानून का रूप देना था। इसे अमली जामा पहनाते हुए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 पारित किया गया। इसमें पूर्ववर्ती कानून में शामिल 7 विकलांगताओं के स्थान पर 21 विकलांगताएं शामिल की गईं।

एक मत यह भी है कि भारत में डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। कुछ व्यक्तियों और संगठनों द्वारा विकलांगजन के लिए अच्छे प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं, लेकिन वे विकलांगजन की वास्तविक आबादी के मान से बहुत ही कम हैं। ग्रामीण इलाके और छोटे कस्बे सेवाओं से पूरी तरह वंचित हैं।

पुनः अमेरिका की बात करें तो पुराने समय में लुई ब्रेल और हेलेन केलर ने जिस जुझारूपन का परिचय दिया, उसी राह पर वहां के आधुनिक समय के कुछ विकलांग भी चल रहे हैं। वे न सिर्फ डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट को नए संदर्भों में आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि विकलांगजन का जीवन आसान और बेहतर बनाने के उल्लेखनीय प्रयास भी कर रहे हैं। इनमें एसिड हमले में अपनी दृष्टि गंवा चुके युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के छात्र रह चुके जोशुआ मिली हैं जो मैकआर्थर ‘जीनियस ग्रांट’ विजेता हैं और अमेज़न जैसी कंपनी में एडाप्टिव टेक्नॉलॉजी विकसित करते हैं ताकि दृष्टिबाधिता और अन्य विकलांगताओं से प्रभावित व्यक्तियों के लिए उपभोक्ता उपकरण उपयोग में लाना सुगम हो जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि विकलांग-अनुकूल उत्पाद उपलब्ध कराने की उम्मीद अब व्यापक स्तर पर सभी उद्योगों से की जाने लगी है। यहीं के एक और छात्र मार्क सटन की कहानी भी इसी तरह प्रेरणादायक है। अपनी दृष्टिबाधिता के कारण उन्हें कंप्यूटर साइंस और वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई में घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ा, लेकिन वे आज एप्पल कंपनी में कार्य करते हुए सॉफ्टवेयर में ऐसे बदलाव लाने और ऐसे समाधान खोजने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं जिनसे दृष्टिबाधितों के लिए कंप्यूटर और मोबाइल फोन जैसे उपकरण वापरना सुगम हो जाए। इन प्रेरक प्रसंगों का परिणाम यह हुआ कि युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के छात्रों का एक नेटवर्क बन गया। इस नेटवर्क के सदस्य अपने-अपने क्षेत्र में अग्रणि रहे हैं और डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट को आगे बढ़ा रहे हैं।

बर्कले ही वह स्थान है जहां डिसेबिलिटी राइट्स मूवमेंट की शुरुआत हुई थी। नेशनल फेडरेशन ऑफ दी ब्लाइंड का जन्म भी बर्कले में ही हुआ और नागरिक अधिकार कानून तथा ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन के मुकदमे के लिए आधार भी बर्कले में कानून के एक प्रोफेसर के विश्लेषण से प्राप्त हुआ। संभव है संयुक्त राष्ट्र संघ की पहलों और संयुक्त राष्ट्र संधि के लिए आधार भी अमेरिका और उसके जैसे संवेदनशील और अग्रणि देशों द्वारा विकलांगजन के लिए किए गए कार्यों से मिला हो।

इससे यह बात समझ आती है कि भारत में विकलांगजन को अपने अधिकार तब ही मिलेंगे जब वे और उनके परिजन एकजुट होकर अपनी आवाज़ उठाकर दबाव बनाने में कामयाब होंगे। गौरतलब है कि भारतीय संविधान में संशोधन की भी ज़रूरत है ताकि अंतर्राष्ट्रीय संधियों/घोषणा पत्रों के बगैर भी केंद्रीय स्तर पर विकलांगजन के लिए स्वप्रेरित राष्ट्रीय कानून बनाने का मार्ग खुल जाए। संपूर्ण तंत्र, सरकार, संस्थाओं और गैर-विकलांग समुदाय को विकलांगजन की विशेष आवश्यकताओं के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाना होगा। ऐसी कल्याणकारी योजनाएं बनानी होंगी जो विकलांगजन के लिए वास्तव में लाभकारी हों और उनका पैमाना बढ़ती लागत के साथ बढ़ना चाहिए। राष्ट्र संघ संधि और कानून में काफी कुछ लिखा है, लेकिन संवेदनशीलता और ईमानदारी से क्रियान्वयन होने पर ही उसका लाभ मिलना संभव है। अशिक्षा और गरीबी का उन्मूलन होना चाहिए क्योंकि दोनों एक-दूसरे के कारण और परिणाम हैं। शिक्षित विकलांगजन अधिक जागरूक होकर अधिक प्रभावी ढंग से अपनी आवाज़ उठाने में सक्षम होंगे और शिक्षित समाज विकलांगजन के प्रति अपना दायित्व बेहतर ढंग से समझकर संवेदनशीलता के साथ निभा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज्ञान क्रांति की दहलीज पर टूटते पूर्वाग्रह – माधव गाडगिल

मेरा जन्म सलीम अली की शानदार सचित्र पुस्तक बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स के प्रकाशित होने के एक साल बाद 1942 में हुआ था। मेरे पिता, डी. आर. गाडगिल, सलीम अली के मित्र और उत्साही पक्षी-निरीक्षक थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने से पहले ही मैंने सलीम अली की किताब के चित्रों से अपने चारों ओर के पक्षियों की समृद्ध विविधता को पहचानना सीख लिया था। 14 साल की उम्र में मैं सलीम अली से मिला और उनके ज्ञान, विनोदबुद्धि और व्यक्तित्व से मोहित होकर उन्हें अपने गुरु के रूप में अपनाया और एक फील्ड इकॉलॉजिस्ट बन गया। वे मुझसे 46 साल बड़े थे, और हम अगले 30 वर्षों तक लगातार संपर्क में रहे। मैंने उनके कई अध्ययनों, अनुसंधानों में भाग लिया और मुझे उनके साथ पक्षियों के रैनबसेरों पर संयुक्त रूप से एक शोध निबंध लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कई बार वनकर्मी मुझ पर गुस्सा हो जाते थे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं उनके वनों के कुप्रबंधन और स्थानीय लोगों के उत्पीड़न को देखूं। ऐसे मौकों पर सलीम अली जी ने ही मेरी मदद की।

लेकिन किसी वजह से वे भारत के आम लोगों से पूरी तरह से कट गए थे और यह मानने लगे थे कि प्रकृति के सभी तरह के विनाश के लिए यही अज्ञानी, अविवेकी जनता ज़िम्मेदार है। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ये लोग कभी सुशिक्षित बनेंगे और अपने आसपास के प्राकृतिक संसाधनों को नियंत्रित करने आगे आएंगे ताकि इसके अच्छे प्रबंधन में उनकी हिस्सेदारी हो। मैं हमेशा इस बात से परेशान रहता था कि मेरे गुरु ने इस तरह के पूर्वाग्रहों को पनाह दी।

पिताजी का जीवन भर का जुनून सहकारिता आंदोलन था और उन्होंने सहकारी बैंकिंग और सहकारी चीनी कारखानों को बढ़ावा देने का प्रयास किया। इसलिए मैं लोगों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो गया और भारत के जैव विविधता अधिनियम, 2002 के एक प्रमुख प्रावधान के रूप में जैव विविधता प्रबंधन समितियों की स्थापना के प्रस्ताव का बीड़ा उठाया और वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006 को पारित करने के अभियान में भाग लिया। एफआरए के महत्वपूर्ण सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) प्रावधान के तहत ग्राम सभाओं को गैर-काष्ठ वन संसाधनों के स्वामित्व और प्रबंधन अधिकार सौंपे गए हैं। और 2009 में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले की मेंढा (लेखा) और मारडा सीएफआर सौंपे जाने वाली देश की पहली ग्राम सभाएं बन गईं।

प्रबंधन अधिकारों के तहत एक प्रबंधन योजना तैयार करना महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी होती है जिसे मात्रात्मक बनाने की आवश्यकता होती है। हमारी शिक्षा प्रणाली की शर्मनाक स्थिति से बाधित स्थानीय लोग अपने दम पर यह काम संभाल नहीं सकते हैं। इसलिए, मेरे कंप्यूटर वैज्ञानिक मित्र विजय एदलाबदकर और मैंने स्वेच्छा से मेंढा में स्थानीय बेयरफुट पारिस्थितिकीविदों के एक कैडर के साथ एक प्रबंधन योजना तैयार करने में मदद की।

ज़मीनी स्तर पर ऐसी क्षमता का निर्माण करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने गांधी जयंती (2018) से सामुदायिक वन अधिकार-धारक ग्राम सभाओं के नामांकित व्यक्तियों के लिए 5 महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन शुरू किया। विजय और मैं मेंढा के क्षेत्र में आयोजित इस कार्यक्रम से जुड़े थे। इसमें प्रशिक्षु प्रकृति के अपने अनुभव के खजाने के साथ उपस्थित थे और उन्होंने उत्साहपूर्वक मैदानी कार्य किया। वे स्मार्टफोन को संभालने और जीपीएस सुविधा का उपयोग करके गांव की सीमा जैसी भौगोलिक जानकारी अभिलिखित करने में माहिर हो गए। हमने उनकी ग्राम सभाओं के लिए सीएफआर योजनाओं और जैव विविधता रजिस्टरों को अंतिम रूप देने के लिए उनके साथ काम करना जारी रखा है।

उन सभी प्रशिक्षित युवाओं के पास स्मार्टफोन थे और उन्होंने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था। लघु वनोपज देने वाली प्रजातियों के वैज्ञानिक नाम सीएफआर योजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण ज़रूरत है| प्रशिक्षण के दौरान वे व्यापक संचार के लिए वैज्ञानिक नामों के महत्व को लेकर जागरूक हो गए थे। वे गूगल सर्च के आदी हो गए थे, बाज़ारों की जानकारी के लिए इंटरनेट की खोज करने लगे थे, और विकिपीडिया लेखों का अध्ययन कर रहे थे।

वे लगातार व्हाट्सएप ग्रुप पर स्थानीय पौधों और जानवरों की तस्वीरें डाल रहे थे। हालांकि अधिकांश से परिचित हूं, लेकिन मैं टैक्सॉनॉमी का विशेषज्ञ तो हूं नहीं और जब विशेषज्ञों ने मदद करने से इन्कार कर दिया तो चौंकने की बारी मेरी थी।

फिर एक दिन समूह के एक सदस्य सदुरम मडावी ने कई तस्वीरों के वैज्ञानिक नाम पोस्ट करना शुरू कर दिया। जांच करने पर मैंने पाया कि वह हमेशा सही नाम बता रहा था। उसने हमें बताया कि उसने दो बहुत ही महत्वपूर्ण ऐप्स खोजे हैं: गूगल इमेज और गूगल लेंस। ऐप्स का उपयोग करने पर ये अपलोड की गई तस्वीरों को गूगल के जीवित वास्तविक प्राणियों की एक अरब से अधिक छवियों के विशाल डैटाबेस से जांचते हैं, और तुरंत एक या अधिक संभावित अंग्रेज़ी और वैज्ञानिक नाम बताते हैं। इस तरह, आदिवासी युवा अनायास विशेष ज्ञान पर एकाधिकार प्राप्त विशेषज्ञों के चंगुल से मुक्त हो जाते हैं और सक्षम रूप से अपनी सीएफआर प्रबंधन योजना और जैव विविधता रजिस्टर तैयार कर सकते हैं।

सदुराम बहुत बुद्धिमान है लेकिन खराब शालेय शिक्षा के कारण 10वीं कक्षा की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया है। आधुनिक ज्ञान के युग में ये बाधाएं तेज़ी से लुप्त होती जा रही हैं। उन्होंने अपने गांव में एक दुर्लभ ऑर्किड की खोज की, जो उसकी ज्ञात सीमा से काफी बाहर है। उन्होंने इसे जिओडोरम लैक्सीफ्लोरम के रूप में पहचाना और गढ़चिरोली में कुछ वनस्पति शास्त्रियों के साथ मिलकर वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा में एक शोध निबंध प्रकाशित किया। इससे सदुराम एक वैज्ञानिक समुदाय का सदस्य बन गया। मेरे गुरु सलीम अली एक अमीर, प्रतिष्ठित परिवार से थे लेकिन गणित से चिढ़ के कारण उपाधि प्राप्त करने में असफल रहे थे। फिर भी उन्हें भारत के अग्रणी पक्षी विज्ञानी के रूप में पहचाना जाता है। अत्यधिक वंचित पृष्ठभूमि से आने वाला सदुराम भी प्रथम श्रेणी के वनस्पति शास्त्री के रूप में विकसित होने का माद्दा रखता है। तो, मेरे शिष्य मेरे गुरु के पूर्वाग्रहों का मुकाबला कर रहे हैं! इस बात की पूरी उम्मीद है कि उभरते हुए ज्ञान युग में हम एक ऐसे समतामूलक समाज की ओर तेज़ी से आगे बढ़ेंगे, जिसमें सभी लोगों की पहुंच भाषा की बाधाओं से मुक्त होकर समस्त मानवीय ज्ञान तक होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत ने ‘जनसंख्या बम’ को निष्क्रिय किया

1960 के दशक में भारत ने जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि का सामना किया था। उस समय प्रजनन दर लगभग छह बच्चे प्रति महिला थी। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को विस्तार दिया जिसमें पुरुषों और महिलाओं दोनों को नसबंदी के लिए नकद प्रोत्साहन की पेशकश की गई।

अगले 60 वर्षों तक भारत ने नसबंदी के साथ-साथ गर्भ-निरोधकों और बालिका-शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। अब स्वास्थ्य अधिकारियों का दावा है कि भारत ने अंतत: जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि देश की प्रजनन दर पहली बार 2.1 संतान प्रति महिला के ‘प्रतिस्थापन स्तर’ से नीचे आ गई है। पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की निदेशक पूनम मुतरेजा के अनुसार भारत की महिलाएं अब कम बच्चे पैदा करने को उचित मान रही हैं।

हालांकि, जनसंख्या फिलहाल बढ़ती रहेगी क्योंकि पूर्व की उच्च प्रजनन दर के कारण भारत की दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और एक बड़ा समूह बच्चे पैदा करने की उम्र में पहुंच रहा है। लिहाज़ा, प्रतिस्थापन-दर पर भी जनसंख्या में वृद्धि जारी रहेगी और शायद अगले साल ही भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

फिर भी भारत की जनसंख्या लगभग 3 दशकों में घटने की संभावना है जिससे भारत बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे कई अन्य विकासशील देशों के रास्ते पर चल पड़ेगा। लेकिन प्रजनन दर में गिरावट के मामले में भारत चीन (1.7 बच्चे प्रति महिला) से काफी पीछे है।

विशेषज्ञों का मत है कि जन्म दर में गिरावट के संदर्भ में सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रमुख कारक रहा है। एनएफएचएस सर्वेक्षण के अनुसार 55 प्रतिशत दंपति आधुनिक गर्भ-निरोधकों का उपयोग करते हैं। इनमें से बीस प्रतिशत कंडोम और दस प्रतिशत गोलियों का उपयोग करते हैं। अलबत्ता, सभी गर्भनिरोधकों में से कम से कम दो-तिहाई तो महिला नसबंदी है।

भारत में नसबंदी कार्यक्रम का इतिहास काफी उबड़-खाबड़ रहा है। 1970 के दशक के मध्य में राज्यों को अनिवार्य नसबंदी शिविर संचालित करने के आदेश दिए गए थे। इस दौरान लगभग 1.9 करोड़ लोगों की नसबंदी की गई जिनमें से दो-तिहाई पुरुष थे। वर्तमान में सरकारी नसबंदी क्लीनिकों का ध्यान मुख्य रूप से महिला नसबंदी पर केंद्रित है। कुल गर्भ निरोधकों में से मात्र 0.5 प्रतिशत हिस्सा पुरुष नसबंदी का होता है। आम तौर पर महिलाओं की नसबंदी औसतन 25 की उम्र के आसपास की जाती है जिनके पहले से बच्चे हैं। नसबंदी के लिए नकद प्रोत्साहन के अलावा जबरन नसबंदी की शिकायतें भी मिलती रहती हैं।                        

वैसे तो भारत में शहरी महिलाओं की तुलना में ग्रामीण महिलाएं अधिक बच्चे पैदा करती हैं लेकिन दोनों ही समूहों की प्रजनन दर में लगातार कमी आई है। इसके साथ ही 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर घटकर 34 (प्रति 1000 जीवित जन्म) रह गई है जो 1960 में 241 थी। बच्चों के लंबी उम्र तक जीवित रह पाने के आश्वासन के चलते महिलाएं परिवार नियोजन को ज़्यादा स्वीकार करने लगी हैं।

छोटा परिवार रखने के लिए प्रोत्साहित करने में शिक्षा की भी बड़ी भूमिका रही है। 1960 के दशक में महिलाओं में निरक्षरता दर लगभग 90 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 35 प्रतिशत रह गई। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पापुलेशन साइंस की शोधकर्ता मिलन दास के विश्लेषण के अनुसार 2005 के बाद के दशक में बेहतर शिक्षा के कारण प्रजनन दर में 47 प्रतिशत की कमी आई है। मुतरेजा के अनुसार भारत की महिलाओं की आकांक्षाओं में भी बदलाव आया है। वे अब शादी और बच्चे पैदा करने की बजाय बेहतर नौकरी के अवसरों की तलाश कर रही हैं।     

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रजनन दर भी शिक्षा की भूमिका को दर्शाती है। केरल की साक्षरता दर सबसे अधिक है। केरल ने 1988 में ही प्रतिस्थापन प्रजनन दर हासिल कर ली थी। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुसार बिहार जैसे सबसे कम साक्षर राज्य में 2039 तक प्रतिस्थापन प्रजनन दर प्राप्त करना मुश्किल होगा।

कुछ भारतीय राजनेता अभी भी जनसंख्या विस्फोट पर चर्चा कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश में तो दो से अधिक बच्चे वाले परिवारों को सरकारी नौकरी या राज्य की कल्याण योजनाओं से वंचित रखने का प्रस्ताव है। आलोचकों के अनुसार इस तरह के बयान अक्सर देश के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए दिए जाते हैं। लेकिन 2015-16 के एनएफएचएस सर्वेक्षण के अनुसार हिंदू महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं के औसतन 0.5 प्रतिशत अधिक बच्चे हैं। स्पष्ट है कि प्रजनन सम्बंधी फैसलों में धर्म एक छोटा कारक है।

लेकिन भारत की प्रजनन दर कितनी कम हो सकती है? विशेषज्ञों के अनुसार कम प्रजनन दर वाले राज्यों की दर 1.6 से 1.9 बच्चे प्रति महिला पर स्थिर है। यदि देश में महिला सशक्तिकरण की नीतियों को जारी रखा जाए तो यह दर 1.4 या उससे नीचे जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र के 2019 के जनसंख्या अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 2050 तक 1.64 अरब तक पहुंच कर इस सदी के अंत तक 1.45 अरब रह जाएगी। एक चिंता यह भी व्यक्त की गई है कि यदि प्रजनन दर में तेज़ी से गिरावट आती है तो अर्थव्यवस्था को नुकसान भी हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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