क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?

न दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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व्यायाम और मस्तिष्क

क्सरसाइज़ (व्यायाम – exercise benefits) का नाम सुनते ही क्या ख्याल आता है? मज़बूत मसल्स, स्वस्थ दिल, स्वस्थ फेफड़े यानी तंदुरुस्त शरीर। और यदि कहा जाए कि शरीर की इस तंदुरुस्ती में मस्तिष्क (brain health) भी शामिल है तो?

जी हां, न्यूरॉन जर्नल (Neuron journal study) में प्रकाशित हालिया अध्ययन यही बात कहता है; व्यायाम से मस्तिष्क की वायरिंग मज़बूत होती है, जिससे कुछ न्यूरॉन्स फटाफट सक्रिय हो जाते हैं। इससे समझ आता है कि लगातार व्यायाम करने से व्यायाम में होने वाली आसानी और बेहतर क्षमता (यानी व्यायाम सहिष्णुता (exercise tolerance)) में मस्तिष्क सक्रिय रूप से शामिल होता है। फिलहाल यह निष्कर्ष चूहों पर हुए अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है कि ऐसा मनुष्यों में भी होता हो लेकिन पहले इसे परखना होगा।

फिलेडेल्फिया में पेन्सिलवेनिया युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस बेटली और उनके साथी यह जानना चाहते थे कि जब लोग व्यायाम करते हैं तो मस्तिष्क में क्या होता है। असल में पूर्व अध्ययन में ऐसा पाया गया था कि स्टेरॉयडोजेनिक फैक्टर-1 (SF1) नामक प्रोटीन को कोड करने वाले जीन को ठप करने से चूहों में व्यायाम सहिष्णुता कम हो जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस (ventromedial hypothalamus) हिस्से के उन न्यूरॉन समूहों की निगरानी करना तय किया जो SF1 नामक प्रोटीन बनाते हैं। गौरतलब है कि वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस भूख और रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, और SF1 प्रोटीन चयापचय क्रिया को नियंत्रित (metabolic regulation) करने में भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों को ट्रेडमिल पर दौड़ाया और उनमें SF1 न्यूरॉन्स की गतिविधि देखी। ये तो उन्होंने पाया ही कि ये न्यूरॉन्य व्यायाम करने से सक्रिय हो गए थे, लेकिन और भी दिलचस्प बात उन्हें यह पता चली कि SF1 न्यूरॉन्स का एक समूह व्यायाम खत्म होने के बाद ही सक्रिय होता है। कई व्यायाम सत्रों के बाद चूहों में सक्रिय होने वाले न्यूरॉन्स की संख्या और उनकी सक्रियता के परिमाण में भी बढ़ोतरी देखी गई।

जब शोधकर्ताओं ने तीन हफ्तों तक लगातार नियमित व्यायाम करने वाले चूहों की मस्तिष्क गतिविधि की तुलना उन चूहों की मस्तिष्क गतिविधि से की जिन्होंने व्यायाम करने में नागा किया था, तो उन्हें दोनों समूह के चूहों के SF1 न्यूरॉन्स के विद्युतीय गुणों में अंतर मिला। नियमित व्यायाम करने वाले चूहों में न्यूरॉन्स को सक्रिय करना आसान हो गया था। साथ ही न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन्स (सायनेप्स) की संख्या भी दुगनी हो गई थी। अनुमान तो लगाया जा सकता है कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा कुछ होता होगा, लेकिन इसे परख कर देखना ज़रूरी है। आखिरकार यह तो देखा ही गया है कि मनुष्यों में भी व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिन थोड़ा तकलीफदेह गुज़रते हैं, लेकिन दिन-ब-दिन आसानी होने लगती है (brain exercise link)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एआई ने सुझाए प्रचीन रोमन खेल के नियम-कायदे

प्रतिका गुप्ता

बात करीब सवा सौ साल पहले की है। दक्षिण-पूर्वी नीदरलैंड्स के शहर हीरलेन में खुदाई के दौरान एक चूना पत्थर मिला था, जो फ्रांस से आयातित था। इस पर उभरी लकीरों के पैटर्न देखकर तो ऐसा लगता था जैसे यह कोई बोर्ड गेम (ancient board game) हो। रोमन म्यूज़ियम की क्यूरेटर कैरन जेनेसन के शब्दों में “पत्थर को नफासत से तराशा गया था। इसे मेज़ पर रखकर खेला जाता होगा।” लेकिन लकीरों के पैटर्न किसी भी जाने-पहचाने रोमन खेल (Roman era game) जैसे नहीं थे।

तो यह गुत्थी अनसुलझी ही रही कि यह क्या खेल है, इसे कैसे खेलते होंगे, इसके नियम क्या होंगे, वगैरह-वगैरह। इस खेल-पत्थर के आसपास कांच, हड्डी और सिरेमिक की गोटियां भी मिली थीं, जिन्हें हेट रोमाइन्स म्यूज़ियम में सहेजा गया (archaeological discovery)।

 फिर, साल 2020 में लीडेन युनिवर्सिटी के प्राचीन बोर्ड गेम्स विशेषज्ञ वाल्टर क्रिस्ट तकरीबन आठ इंच चौड़े इस बोर्ड गेम के सामने ठिठक गए। कारण इसकी सीधी-तिरछी लकीरों से बनी अष्टभुज आकृति का अब तक ज्ञात किसी भी खेल से मेल न बैठना था। उन्होंने तफ्सील से अध्ययन करने का सोचा।

क्रिस्ट ने खेल-पत्थर पर गोटियां खिसकाने से बने घिसावों को ध्यानपूर्वक देखा ताकि चालों का अंदाज़ा लगाया जा सके। फिर उन्होंने अन्य विशेषज्ञों की मदद से खेल-पत्थर का विस्तृत और सूक्ष्म 3डी स्कैन (3D scan analysis) करवाया। 3डी स्कैन में खेल-पत्थर पर बने निशान और गोटियों की चाल थोड़ा उभर कर आ रही थीं: कुछ लकीरें अन्य लकीरों की तुलना में थोड़ी ज़्यादा गहरी थीं। इससे साफ पता चलता था कि कुछ खास चालों को ज़्यादा चला गया था। चालों को देखकर यह किसी ब्लॉकिंग खेल की तरह लगता था, जिसमें एक खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी की गोटियां आगे बढ़ने से रोकने और उन्हें घेरने की कोशिश करता है, जैसे टिक-टैक-टो या ओथेलो में होता है (strategy board game)। साथ ही खेल-पत्थर के नफासत से तराशे गए किनारे बताते थे कि इसे सोच-समझकर बनाया गया था।

खेल के नियमों को डिकोड करने में शोधकर्ताओं का अगला कदम था कृत्रिम बुद्धि (एआई- artificial intelligence AI) की मदद लेना। नियमों को समझने के लिए, क्रिस्ट ने मास्ट्रिख्ट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस सोमर्स के साथ मिलकर दो एआई एजेंट्स को सौ से अधिक प्रचलित रोमन-युरोपियन खेलों के नियमों से प्रशिक्षित किया (AI game simulation)। फिर AI एजेंट्स ने हर नियम सेट के अनुसार 1000 राउंड खेले। शोधकर्ताओं ने विभिन्न नियमों के अनुसार खेले गए खेलों में मोहरों की चालों को देखा। फिर उन्होंने चालों की तुलना खेल-पत्थर पर मिले घिसावों से की ताकि यह पता चल सके कि किन नियमों के मुताबिक गोटियां चली गई थीं। शोधकर्ताओं को नौ नियम मिले जो खेल-पत्थर के घिसावों के साथ मेल खा रहे थे; ये सभी नौ नियम ब्लॉकिंग (घेराबंदी) खेलों के थोड़े परिवर्तित रूप थे। पैटर्न को देखकर ऐसा लगता था कि इस खेल में ज़्यादा गोटियों वाला खिलाड़ी कम गोटियों वाले खिलाड़ी को बढ़ने से रोकने या घेरने की कोशिश करता है।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने इस खेल को पुनर्निमित किया और इसे खेलने के कुछ नियम बताए। खेल को उन्होंने लुड्स कोरिओवल्ली (Ludus Coriovalli) नाम दिया है जिसका मतलब है कोरिओवलम का खेल। कोरिओवलम हीरलेन शहर का प्राचीन रोमन नाम है, जहां से यह खेल-पत्थर मिला था।

शोधकर्ता खेल के नियम तो बताते हैं लेकिन थोड़ा सतर्क भी करते हैं कि यह चालों और ज्ञात अन्य खेलों के नियमों के आधार पर एक निष्कर्ष है; हो सकता है रोमन लोग वास्तव में इसे थोड़े अलग ढंग से खेलते हों।

उम्मीद है कि इस अध्ययन के बाद अन्य प्राचीन खेलों के नियम वगैरह सुलझाने में मदद मिलेगी। बहरहाल, अध्ययन यह बात साफ उभारता है कि काम के अलावा, मनोरंजन भी प्राचीन लोगों के जीवन का अहम हिस्सा था (Roman civilization lifestyle)। वे न सिर्फ खोज, नए आविष्कार या दिन-रात काम करते थे बल्कि अपने मनोरंजन का ख्याल भी रखते थे और मनोरंजन के नए-नए तरीके, नए खेल भी गढ़ते थे। (स्रोत फीचर्स)

कैसे खेलें लुड्स कोरिओवल्ली

बोर्ड: कागज़ या तख्ती पर चित्र 1 के अनुसार बिसात बनाएं।

खिलाड़ी: इस खेल को दो खिलाड़ी (चोर और पुलिस) खेल
सकते हैं। चोर खिलाड़ी के पास दो गोटियां होंगी और पुलिस
खिलाड़ी के पास चार गोटियां होंगी।

लक्ष्य: पुलिस खिलाड़ी को कम से कम चालों में चोर को चारों
ओर से घेरना है, ऐसे कि चोर खिलाड़ी की गोटियों को आगे
चलने के लिए कोई चाल न बचे।

नियम

  • खेल दो पारियों में खेला जाता है। खेल शुरू करने के पहले खिलाड़ी यह तय कर लें कि पहली पारी में कौन सा खिलाड़ी चोर बनेगा और कौन सा खिलाड़ी पुलिस।
  • चित्र के अनुसार गोटियां जमा लें। चित्र में काली गोटियां पुलिस की हैं और सफेद गोटियां चोर की।
  • बिसात में दो या दो से अधिक रेखाओं के जोड़ बिंदु ‘घर’ हैं।
  • एक खिलाड़ी एक चाल में नज़दीकी एक घर आगे बढ़ सकता है।
  • कोई भी खिलाड़ी अपनी या विरोधी खिलाड़ी की गोटी को लांघकर आगे नहीं बढ़ सकता।
  • एक घर पर एक ही गोटी रह सकती है, एक से ज़्यादा नहीं।
  • खिलाड़ी बारी-बारी से अपनी चाल चलेंगे। एक खिलाड़ी एक चाल में अपनी गोटी एक घर ही खिसका सकता है। और अपने द्वारा चली चालों का हिसाब रखता जाता है।
  • यदि चोर की गोटी को अगली चाल चलने के लिए कोई रास्ता न बचे, वह अपनी गोटी कहीं भी आगे न बढ़ा पाए तो इस सूरत में गोटी घिरी हुई कहलाएगी।

पारी खत्म कब होगी

पारी तब खत्म होगी जब चोर की दोनों गोटियां पुलिस से पूरी तरह घेर ली जाएंगी। एक पारी के अंत में पुलिस ने कितनी चालों में चोर को पूरी तरह घेर लिया इसे गिना जाएगा।

अगली पारी, भूमिका बदली

अगली पारी खिलाड़ियों की भूमिकाएं आपस में बदलकर खेली जाएगी। यानी अगली पारी में पुलिस खिलाड़ी चोर बनेगा और चोर खिलाड़ी पुलिस बनेगा। और, फिर खेल
दोहराया जाएगा। खेल के अंत में दोनों पुलिस खिलाड़ियों
की चालों को गिना जाएगा। जिस खिलाड़ी ने सबसे कम
चालों में चोर को घेरा होगा वह विजेता कहलाएगा। यदि
खेल ड्रॉ होता है, तो खेल शुरू से दोबारा खेला जाएगा। तो चलिए, यह प्राचीन लेकिन नया खेल खेलकर देखिए।
वैसे खेल के नियम आप अपने हिसाब से मुश्किल और
मज़ेदार बना सकते हैं, थोड़े बदल सकते हैं। क्योंकि
मतलब खेलने के मज़े से है। किसी भी तरह खेलें और
मज़ा लें! चाहें तो आप बिसात थोड़ा बदल भी सकते हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान की प्रयोगशाला बनता ग्रीनलैंड

वंबर में ग्रीनलैंड की राजधानी नूक की सड़कें दुनिया भर के वैज्ञानिकों से भरी थीं। वे ‘ग्रीनलैंड साइंस वीक’ (Greenland Science Week)  नामक एक बड़े सम्मेलन में शामिल होने आए थे, जिसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र (Arctic region research) में हो रहे वैज्ञानिक शोध के बढ़ते महत्व को दिखाना था। सम्मेलन की थीम थी – ‘All Eyes on Greenland (सबकी नज़र ग्रीनलैंड पर)’। इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने का विवादित बयान दिया।

हालांकि, बाद में सैन्य कार्रवाई से इन्कार से तनाव कुछ कम तो हुआ, लेकिन अनिश्चितता बनी रही। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस राजनीतिक रुचि का ग्रीनलैंड में हो रहे वैज्ञानिक शोध पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन एक बात बिलकुल स्पष्ट है, ग्रीनलैंड, – जिसे स्थानीय लोग ‘कालालित नूनात’ (Kalaallit Nunaat) कहते हैं – आज जलवायु परिवर्तन (climate change research) जैसे अहम मुद्दों पर शोध के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक बन चुका है – एक अनोखी प्राकृतिक प्रयोगशाला साबित हो रहा है।

विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ग्रीनलैंड की भौगोलिक बनावट (geography of Greenland), उसका इतिहास और वहां के लोग – तीनों ही खास हैं। सैकड़ों सालों से इनुइट समुदाय (Inuit indigenous knowledge) का पारंपरिक ज्ञान इलाके के मौसम और पर्यावरण को समझने में मदद करता रहा है। आगे चलकर युरोप के खोजकर्ताओं और अमेरिका के अभियानों ने यहां वैज्ञानिक अध्ययनों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

1990 के दशक तक ग्रीनलैंड जलवायु विज्ञान (climate science) का एक बड़ा केंद्र बन गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने यहां की मोटी बर्फ की चादर में गहराई तक जाकर बर्फ के नमूने (ice core samples) निकाले। इन नमूनों से यह समझने में मदद मिली कि हज़ारों सालों में पृथ्वी का मौसम कैसे बदलता रहा है।

आज ग्रीनलैंड की बर्फ पर वैज्ञानिक लगातार नज़र रख रहे हैं, जिसका असर पूरी दुनिया के समुद्र स्तर पर पड़ता है। अगर ग्रीनलैंड की पूरी बर्फ पिघल जाए, तो समुद्र का स्तर लगभग 7.4 मीटर तक बढ़ सकता है। अभी भी हर साल यहां बहुत बड़ी मात्रा में बर्फ पिघल रही है (Greenland ice melt) – सिर्फ 2024 में करीब 129 अरब टन – जो दुनिया भर में समुद्र के स्तर को बढ़ाने में बड़ा योगदान दे रही है।

ग्रीनलैंड की अहमियत केवल बर्फ तक सीमित नहीं है। वहां की ज़मीन में लीथियम (lithium mining) जैसे महत्वपूर्ण खनिज मिलने की संभावना है, जो बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों (renewable energy technology) के लिए बेहद ज़रूरी हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड आनुवंशिक और जैव-चिकित्सीय शोध के लिए भी एक खास जगह है। यहां की अधिकतर आबादी इनुइट समुदाय की है, जो हज़ारों वर्षों तक बाकी दुनिया से काफी हद तक अलग-थलग रहे। इस कारण उनके जीनोम (Inuit genome studies) में ऐसे खास गुण पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और बदलते वातावरण के अनुसार शरीर के ढलने की प्रक्रिया को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करते हैं।

ग्रीनलैंड के बढ़ते वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए, वहां की सरकार ने 2022 में पहली बार एक राष्ट्रीय शोध नीति (national research policy) जारी की। इस नीति में 2030 तक की प्राथमिकताएं तय की गई हैं। इसमें कहा गया है कि शोध ग्रीनलैंड की ज़मीन और समाज से जुड़ा होना चाहिए, स्थानीय लोगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए और साथ ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों के साथ सहयोग (international scientific collaboration) के लिए खुला रहना चाहिए। इसका मकसद यह है कि शोध के नतीजों का फायदा ग्रीनलैंड के लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया को मिले।

इस नीति का असर अब दिखने लगा है और ग्रीनलैंड का छोटा लेकिन बढ़ता हुआ शोध तंत्र (research ecosystem) मज़बूत हो रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘ताराजोक’ (research vessel Tarajoq) नाम का शोध पोत, जो ग्रीनलैंड सरकार द्वारा अब तक की सबसे बड़ी वैज्ञानिक परियोजना है। 2022 से संचालित यह जहाज़ वैज्ञानिकों को दूर-दराज़ के फ्योर्ड्स और समुद्री इलाकों तक पहुंचने में मदद करता है, जहां पहले अध्ययन करना मुश्किल था।

हाल के एक अभियान में इसी पोत की मदद से वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि ग्लेशियर से पिघलने वाला पानी समुद्री पारिस्थितिकी (marine ecosystem) से कैसे अंतर्क्रिया करता है। बर्फ से ढंके तटों के पास काम करने की इसकी क्षमता लंबे समय तक आर्कटिक क्षेत्र के अध्ययन के लिए अहम साबित होगी।

तकनीक और भविष्य

ग्रीनलैंड अब आधुनिक तकनीकों को भी तेज़ी से अपना रहा है। पिछले साल ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन संस्थान ने देश का पहला कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence AI) आधारित कंप्यूटर सिस्टम लगाया। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक समुद्र के भीतर की वीडियो और आवाज़ों का तेज़ी से विश्लेषण (marine data analysis) कर सकते हैं, समुद्री जीवों की पहचान कर सकते हैं और मछलियों की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। जो काम पहले महीनों में होता था, अब कुछ ही दिनों में पूरा हो जाता है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन (global climate change) तेज़ हो रहा है और ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया की वैज्ञानिक, आर्थिक और राजनीतिक रुचि (scientific and geopolitical interest) बढ़ रही है, यह द्वीप एक अहम मोड़ पर खड़ा है। आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतर्राष्ट्रीय ध्यान और स्थानीय ज़रूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। भावी फैसले न सिर्फ आर्कटिक विज्ञान (Arctic science) की दिशा तय करेंगे, बल्कि पूरी पृथ्वी को समझने के हमारे नज़रिए को भी प्रभावित करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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बास्केट बॉल: गेंद बास्केट से लौट क्यों आती है?

छिछोरे फिल्म का एक रोमांचक दृश्य सबको याद होगा। जीत-हार को तय करने वाले क्षण में हीरो गेंद को बास्केट में डालने का प्रयास करता है, गेंद बास्केट के किनारे को छूती है, पिछले हिस्से से टकराती है, अगली रिम को छूती है और टकराकर वापिस लौट आती है। यह घटना बास्केट बॉल के खेल (basketball physics) में तो होती ही है, गोल्फ (golf ball dynamics) के मैदान में भी अक्सर देखी जाती है। गोल्फ में कई बार गेंद छेद के रिम पर चक्कर लगाकर लौट आती है। यहां तक कि कई बार तो गेंद रिम के नीचे भी चली जाती है लेकिन वहां से अंदर जाने की बजाय ऊपर निकल जाती है। गोल्फ में इसे ‘लिप आउट’ कहते हैं। खिलाड़ियों के साथ-साथ लिप आउट भौतिक शास्त्रियों (physics problem) के लिए भी एक पहेली रहा है।

अब लगता है कि भौतिकविदों ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस (Royal Society Open Science) में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय (University of Bristol) के जॉन होगन और सेचेनी इस्तवान विश्वविद्यालय के मेट अन्ताली द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र में इस पर रोशनी डाली गई है। उन्होंने देखा कि लिप आउट कई कारणों से हो सकता है। ऐसी एक करामात को बैलिस्टिक लिप आउट (ballistic lip out) कहते हैं। गेंद छेद के केंद्र की ओर जाती है, लेकिन उसकी रफ्तार इतनी अधिक होती है कि वह छेद के सामने वाली सतह से टकराती है और उछलकर बाहर आ जाती है। इसी प्रकार छेद की रिम से होने वाली लिप आउट में गेंद छेद पर तिरछी दिशा में पहुंचती है, रिम का चक्कर काटती है और अंदर जाने की बजाय बाहर छिटक जाती है।

लेकिन सबसे नाटकीय स्थिति छेद से होने वाला लिप आउट होती है। इसमें होता यह है कि रिम का चक्कर काटते हुए गेंद छेद में गिरने तो लगती है लेकिन फिर गुरुत्वाकर्षण को मात देते हुए वापिस ऊपर चढ़कर बाहर निकल जाती है।

बैलिस्टिक और रिम लिप आउट (rim lip out)  तो समझ में आते हैं और ये सीधी-सादी उछाल (bounce mechanics) की वजह से होते हैं लेकिन गिरते-गिरते आधे रास्ते से लौट आना समझना मुश्किल रहा है।

इस पूरे मामले को न्यूटन द्वारा प्रतिपादित यांत्रिकी के नियमों (Newtonian mechanics) से समझने के प्रयास होते रहे हैं। लेकिन यथार्थ में इन नियमों को लागू करना गणित के लिहाज़ से काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि यहां गति के तीन अलग-अलग अक्ष पर ध्यान देना होता है। पहला है जिसमें मैदान क्षैतिज है और आसमान ऊपर की दिशा में। दूसरा है लुढ़कती गेंद के घूर्णन का अक्ष और तीसरा है मैदान या छेद और गेंद का संपर्क बिंदु।

विश्लेषण के लिहाज़ से ये सारी गतियां थोड़ी दिक्कत तो पैदा करती हैं लेकिन जब गेंद सपाट मैदान पर लुढ़क रही हो तो इन्हें संभाला जा सकता है। होगन के मुताबिक दिक्कतें तब उभरती हैं जब गेंद रिम से छेद की ओर बढ़ती है। उनके अनुसार इस पड़ाव पर गेंद की दो गतियां एक साथ चलती हैं – गेंद का लुढ़कना और गेंद का घूमना। इस पड़ाव पर गुरुत्व बल इन दोनों गतियों के अक्ष के लंबवत नहीं लगता है। इसकी बजाय गुरुत्व बल गेंद को उस सतह (यानी छेद की दीवार) से सटाकर खींचता है जिस पर वह लुढ़क रही है। इसलिए सपाट मैदान पर गेंद के लुढ़कने और छेद की अंदरुनी दीवार पर उसके लुढ़कने को अलग-अलग ढंग से समझने के प्रयास किए गए हैं। और इन दोनों की अंतर्क्रिया (force interaction) को समझना गणित के लिहाज़ से खासा मुश्किल हो जाता है।

लिहाज़ा होगन और अन्ताली ने इस समस्या पर बिलकुल अलग ढंग से विचार किया है। उन्होंने विश्लेषण के लिए दो अक्षों (axis of motion) को ध्यान में लिया – एक वह जो गेंद के लुढ़कने की दिशा से निर्धारित होता है और दूसरा वह जो सतह से संपर्क और उसके केंद्र बिंदु को जोड़ने वाली रेखा से। होगन के मुताबिक जब गेंद छेद में जाती है तो ये अक्ष उसके साथ ही चलते हैं।

इस विश्लेषण के द्वारा रिम और छेद से लिप आउट की घटनाओं की व्याख्या एक जैसे परिवर्तियों की मदद से की जा सकी। देखें कैसे।

जब गेंद छेद में गिरती है और दीवार पर लुढ़कती है तो वह अपने केंद्र और दीवार से संपर्क बिंदु को जोड़ने वाली अक्ष पर थोड़ा घूर्णन करने लगती है। लगभग इसी समय जड़त्व (inertia)  का प्रभाव भी हावी हो जाता है। यदि इस समय तक गेंद छेद के पेंदे में न पहुंच गई हो, तो वह घूर्णन धीमा पड़ जाता है और गेंद दीवार पर चढ़ने लगती है।

यह कहना थोड़ा कठिन होता है कि गेंद वास्तव में छेद से बाहर निकल आएगी या नहीं। दरअसल, पूर्व शोध बताते हैं कि किसी भी शॉट का परिणाम छोटी-छोटी उथल-पुथल से निर्धारित होता है। छेद में गिरना और वापिस निकल आना, इन दोनों की संभावना बराबर होती है। और किसी छोटी सी गड़बड़ (जैसे रेत का एक कण) से गेंद इनमें से कोई भी रास्ता अपना सकती है।

सवाल यह है कि क्या इस विश्लेषण से गोल्फ या बास्केट बॉल के खिलाड़ियों (sports players) को कोई मदद मिलेगी? शोधकर्ताओं का कहना है कि शायद नहीं क्योंकि अंतिम बिंदु पर बलों का संतुलन (force balance) इतनी सूक्ष्मता से होता है कि शॉट मारते वक्त नियंत्रण नामुमकिन नहीं, तो बहुत मुश्किल अवश्य है। (स्रोत फीचर्स)

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उड़ान के लिए तैयार आर्टेमिस-2

डॉ. इरफान ह्यूमन

नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस-SLS) रॉकेट और ओरायन अंतरिक्ष यान 17 जनवरी, 2026 को आर्टेमिस-2 मिशन (Artemis 2 mission) के लिए लॉन्च पैड पर पहुंच गया है। हालांकि, इस मिशन के लॉन्च की तारीख अभी भी अनिश्चित है। यह रोलआउट आर्टेमिस-2 की अंतिम तैयारी का शुरुआती चरण है। यह पहला क्रूड एसएलएस/ओरायन मिशन है और दिसंबर 1972 के बाद पहली बार मनुष्य को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट – Low earth orbit) से आगे ले जाने वाली अंतरिक्ष उड़ान बनने को तैयार है। चार अंतरिक्ष यात्री, रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैंसेन, इस दस दिवसीय मिशन पर चंद्रमा के चारों ओर घूमेंगे।

पहले होंगे पूर्वाभ्यास

लॉन्च पैड पर पहुंचने के बाद, यात्री वाहन की तकनीकी जांच और परीक्षण किए जा रहे हैं, जिसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी इंटरफरेंस टेस्ट (radio frequency interference test) शामिल हैं, जो वीएबी के अंदर नहीं किए जा सकते। वीएबी यानी व्हीकल असेंबली बिल्डिंग (Vehicle Assembly Building) नासा का वह विशाल भवन है जहां रॉकेट और अंतरिक्ष यान असेंबल किए जाते हैं। आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्री पैड पर इमरजेंसी एस्केप प्रक्रियाओं का पूर्वाभ्यास भी करेंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होगा वेट ड्रेस रिहर्सल, जिसमें एसएलएस को लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन जैसे ईंधन से भरा जाएगा और एक प्रैक्टिस उल्टी गिनती की जाएगी, जो टी-माइनस 29 सेकंड पर रुक जाएगा। रिहर्सल में सब कुछ असली प्रक्षेपण जैसा ही होगा, लेकिन उड़ान नहीं होगी।

नासा ने 2022 में आर्टेमिस-1 (Artemis 1) के लॉन्च से पहले तीन वेट ड्रेस रिहर्सल (wet dress rehearsal) किए थे और हाइड्रोजन लीक (hydrogen leak) जैसी समस्याओं के कारण दो लॉन्च प्रयास रद्द कर दिए थे। आर्टेमिस-1 से मिले सबक आर्टेमिस-2 की सफलता की संभावना बढ़ाएंगे।

प्रक्षेपण तिथि

वेट ड्रेस रिहर्सल लॉन्च की तारीख तय करने में मुख्य कारक होगी। हालांकि नासा 6 से 11 फरवरी को लक्ष्य बना रहा है, लेकिन एजेंसी ने औपचारिक प्रक्षेपण तारीख घोषित नहीं की है। अगर प्रक्षेपण 11 फरवरी तक नहीं हुआ, तो अगला मौका मार्च की शुरुआत में ही बनेगा।

जटिल कारक

प्रक्षेपण में एक रोड़ा है नासा का क्रू-12 लॉन्च (Crew-12 mission), जो फिलहाल 15 फरवरी से पहले नहीं होगा। क्रू-11 की 15 जनवरी को स्टेशन से जल्द वापसी ने एजेंसी को तैयारी तेज़ करने को प्रेरित किया।

हालांकि नासा प्रशासक जेरेड इसाकमैन का कहना है कि आर्टेमिस-2 और क्रू-12 स्वतंत्र अभियान हैं, लेकिन अधिकारियों ने संभावित टकराव स्वीकार किया है। दोनों के ट्रैकिंग एंड डैटा रिले सैटेलाइट नेटवर्क (Tracking and Data Relay Satellite System – TDRSS) तक पहुंच और लॉन्च साइट्स के संसाधन साझा हैं। दोनों को एक साथ लॉन्च करना समझदारी नहीं है। लेकिन नासा दोनों की तैयारी जारी रखेगा। जिसमें भी कोई समस्या आएगी वो टलेगा या प्रक्षेपण के लिए दोनों में से एक को चुनना पड़ेगा।

आर्टेमिस-1 से एक बदलाव यह है कि नासा ने मोबाइल प्रक्षेपण प्लेटफॉर्म (mobile launch platform)  पर कामकाजी प्लेटफॉर्म जोड़े हैं ताकि सिस्टम हार्डवेयर का पुन:परीक्षण पैड पर ही हो सके। अर्थात यदि पहला प्रक्षेपण सफल नहीं होता, तो यान को वीएबी में वापस रोल न करना पड़े, यह अगले प्रक्षेपण तक वहीं बना रहे।

अधिकारी यह भी कहते हैं कि वे बाहरी दबावों से सतर्क हैं जो ‘लॉन्च फीवर’ पैदा कर सकते हैं, जिसमें जनता और राजनीतिक स्वार्थ और दबाव शामिल हैं। कार्यकारी सहायक प्रशासक लकीशा हॉकिंस ने बताया कि राजनीतिक दबाव उनके मन में मिशन के प्रति रुचि और उत्साह का एक स्रोत है। दूसरी ओर, एजेंसी का ध्यान इस बात पर है कि प्रक्षेपण क्रू के लिए सही और सुरक्षित रहे।

आर्टेमिस-2 के उपकरण

आर्टेमिस-2 में कई वैज्ञानिक उपकरण और प्रयोग शामिल हैं जो अंतरिक्ष पर्यावरण, विकिरण, और मानव स्वास्थ्य (space radiation, human health in space) पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे। चूंकि अंतरिक्ष यान में जगह सीमित है, इसलिए इसमें बड़े वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि रेडिएशन सेंसर, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे कॉम्पैक्ट डिवाइस हैं। कुछ मुख्य उपकरणों की चर्चा यहां की जा रही है।

विकिरण मॉनिटरिंग उपकरण

अंतरिक्ष में विकिरण (space radiation exposure) एक बड़ी चुनौती है, इसलिए आर्टेमिस-2 में कई सेंसर लगाए गए हैं जो विकिरण स्तर को मापेंगे। ये उपकरण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य के मिशनों के लिए डैटा इकट्ठा करने में मदद करेंगे।

1. हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन असेसर्स (एचईआरए-HERA): ओरायन कैप्सूल के अंदर विभिन्न स्थानों पर छह सक्रिय विकिरण सेंसर लगाए गए हैं। ये सूर्य से उत्पन्न अंतरिक्ष मौसमी घटनाओं (जैसे सोलर फ्लेयर्स) से उत्पन्न खतरनाक विकिरण का पता लगाते हैं और चेतावनी देते हैं। अगर विकिरण अधिक हो, तो मिशन कंट्रोल अंतरिक्ष यात्रियों को शेल्टर बनाने की सलाह दे सकता है। यह आर्टेमिस-1 से सीखे गए सबकों पर आधारित है।

2. क्रू एक्टिव डोसिमीटर (crew dosimeter): प्रत्येक अंतरिक्ष यात्री को एक छोटा-सा डिवाइस दिया जाएगा, जिसे वे अपनी जेब में रखेंगे। यह व्यक्तिगत विकिरण एक्सपोज़र को मापता है। आर्टेमिस-1 में मैनेक्विन पर इसका उपयोग किया गया था, लेकिन अब पहली बार क्रू के साथ लो अर्थ ऑर्बिट से बाहर इस्तेमाल होगा।

3. एम-42 ईएक्सटी (M-42 EXT): जर्मन स्पेस एजेंसी (डीएलआर) के साथ साझेदारी में विकसित, यह एक अपडेटेड विकिरण सेंसर है जो ओरायन में लगाया जाएगा। यह आर्टेमिस-1 के एम-42 का उन्नत संस्करण है और विकिरण के प्रभाव को और बेहतर तरीके से माप सकेगा।

4. आर्चर प्रणाली (ARCHER system): आर्चर एक व्यापक प्रणाली है जो विकिरण स्तर को मॉनिटर करती है और क्रू की स्वास्थ्य स्थिति पर इसके प्रभाव का अध्ययन करती है। यह आंतरिक और बाहरी विकिरण को ट्रैक करेगी।

ऑर्गनऑनचिप

एवेटार (ए वर्चुअल एस्ट्रोनॉट टिशू एनालॉग रेस्पॉन्स) एक क्रांतिकारी प्रयोग है जिसमें यूएसबी ड्राइव जितने छोटे ‘ऑर्गन-ऑन-ए-चिप’ उपकरण का उपयोग किया जाएगा। ये उपकरण मानव ऊतकों की नकल करते हैं और विकिरण तथा माइक्रोग्रैविटी (microgravity) के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। मसलन, ये गुर्दे या फेफड़ों पर बढ़ते विकिरण का असर देखेंगे। यह पहली बार है जब ऐसी तकनीक वैन एलन बेल्ट (Van Allen belts) से बाहर इस्तेमाल होगी। अंतरिक्ष यात्री इन उपकरणों से रीयल-टाइम डैटा इकट्ठा करेंगे, जो अलगाव और सीमित स्थान के प्रभाव को भी मापेंगे।

ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम

ओरायन आर्टेमिस-2 ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (optical communication system – ओ2ओ) एक लेज़र-आधारित संचार प्रणाली (laser communication) है जो पृथ्वी से उच्च गति डैटा ट्रांसफर करेगी। इसमें एक 4-इंची टेलीस्कोप, दो गिंबल्स, मॉडेम और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। यह पारंपरिक रेडियो संचार से तेज़ है और भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

कैमरा और इमेजिंग उपकरण

हाई-एंड हैसलब्लाड और निकॉन डिजिटल कैमरे (Hasselblad camera, Nikon space camera) चंद्रमा की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेंगे, जो पहले के मिशनों से बेहतर होंगी।

जैविक प्रयोग

आर्टेमिस-2 में कुछ जैविक नमूने ले जाए जा सकते हैं। खमीर, हरी शैवाल, कवक और बीजों पर विकिरण के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। ये प्रयोग डीएनए पर अंतरिक्ष यात्रा के असर को समझने (DNA damage in space) में मदद करेंगे।

अंतरिक्ष यात्री विशेष कागज़ पर लार एकत्र करेंगे, क्योंकि रेफ्रिजरेशन उपलब्ध नहीं होगा। यह स्वास्थ्य और तनाव से जुड़े बायोमार्कर्स (biomarkers) का अध्ययन करेगा। साथ ही, नींद, तनाव और अलगाव के प्रभाव के अध्ययन लिए शारीरिक और व्यवहारगत डैटा भी इकट्ठा किया जाएगा। ये उपकरण मंगल जैसे लंबे मिशनों के लिए महत्वपूर्ण डैटा देंगे।

आर्टेमिस-2 दशकों बाद पहला ऐसा मिशन है जहां इंसान चंद्रमा के करीब (human return to the Moon) पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता

पाठ्यपुस्तकों में तो हमने यही पढ़ा है कि किसी व्यक्ति की सारी कोशिकाएं जेनेटिक रूप से हू-ब-हू एक जैसी होती है। यह ज़रूर संभव है कि कोशिकाओं में डीएनए की अभिव्यक्ति अलग-अलग हो लेकिन सूचना का भंडार एक ही रहता है। यह भी बताया जाता है कि उम्र के साथ डीएनए के आसपास एपिजेनेटिक परिवर्तन (epigenetic changes) होते रहते हैं, जिनकी वजह से उसके कामकाज पर असर होता है। लेकिन हाल में एक 74 वर्षीय व्यक्ति की 100 अलग-अलग कोशिकाओं के पूरे जीनोम के विश्लेषण (genome analysis) ने हैरतअंगेज़ परिणाम प्रदान किए हैं।

इन 100 कोशिकाओं में से किसी में गुणसूत्र में एक अतिरिक्त भुजा थी, किसी में डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े एक-दूसरे से भिन्न थे, विलोपित हो गए थे या दोहरे हो गए थे। कुछ कोशिकाओं में तो Y गुणसूत्र पूरी तरह नदारद (Y chromosome loss) था। बायोआर्काइव्स-1 में प्रकाशित शोध पत्र के एक लेखक हारवर्ड मेडिकल स्कूल के जो लुक्वेट कहते हैं कि कुछ कोशिकाएं तो एकदम गड्ड-मड्ड थीं।

दरअसल, एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता (genetic variation) का अध्ययन एक अहम सरोकार रहा है। कारण यह है कि एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं के बीच जेनेटिक भिन्नता (मोसेइसिज़्म या पच्चीकारिता) का असर स्वास्थ्य और कैंसर जैसी कई बीमारियों पर होता है।

जब व्यक्ति के शरीर की सारी कोशिकाएं एक ही मूल कोशिका (जॉ़यगोट) से बनी हैं, तो यह विविधता कहां से आती है। इन विविधताओं के कई स्रोत हो सकते हैं – जैसे डीएनए के प्रतिलिपिकरण या मरम्मत के दौरान होने वाली त्रुटियां, या डीएनए को क्षति पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों (पराबैंगनी प्रकाश या धूम्रपान – UV radiation, smoking) का असर।

वैसे तो इन बातों का अंदाज़ा पहले से था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डीएनए के अनुक्रमण (DNA sequencing technology) की टेक्नॉलॉजी में बहुत तरक्की हुई है। इससे यह समझने में मदद मिली है कि मोसेइसिज़्म कितना सामान्य है और यह स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, कुछ कोशिकाओं में लंबे समय में संग्रहित उत्परिवर्तन कैंसर का कारण बन सकते हैं। रक्त कोशिकाओं में Y गुणसूत्र का अभाव (Y chromosome deletion) कार्डियोवैस्कुलर रोगों और हार्ट अटैक (heart disease risk) से जुड़ा पाया गया है।

अब तक इन अंतरों का मानचित्र तैयार करके यह देख पाना मुश्किल था कि ये जीवन के किस पड़ाव में पैदा होते हैं। कारण यह है कि अधिकांश जीनोम अध्ययनों में कई सारी कोशिकाओं का डीएनए एक साथ निकालकर थोक में अनुक्रमण किया जाता है। तब एक प्रारूपिक जीनोम सामने आता है और एक-एक कोशिका में डीएनए की स्थिति नहीं दिखती। इसके अलावा, एक-एक कोशिका के जीनोम विश्लेषण के तरीके (single-cell genome analysis) परिष्कृत हुए हैं लेकिन आम तौर पर इन आधुनिक तकनीकों का उपयोग डीएनए नहीं बल्कि आरएनए के अध्ययन हेतु किया गया है। बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल की डिआने शाओ के मुताबिक इसका कारण यह है कि किसी भी कोशिका में आरएनए की तो कई प्रतियां एक साथ मौजूद होती हैं लेकिन डीएनए की दो ही प्रतियां पाई जाती हैं। वर्तमान अध्ययन ने इस चुनौती को स्वीकार करके आगे की राह दिखाई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चैथम द्वीप पर प्राचीन नौका के अवशेष मिले

ह अगस्त 2024 की बात है। चैथम द्वीपसमूह (Chatham Islands) के प्रमुख द्वीप के निवासी मछुआरा निकाऊ डिक्स ने चैथम चौपाटी से इमारती लकड़ी के कुछ टुकड़े जुटाए थे। तब उन्हें भान नहीं था कि वे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज (archaeological discovery) कर रहे हैं। ये टुकड़े भारी बारिश के कारण खाड़ी से बहकर चौपाटी पर आ गए थे। अलबत्ता, वे जल्दी ही समझ गए कि ये कोई साधारण टुकड़े नहीं थे। जोड़ने पर इन्होंने एक नौका (ancient boat) का आकार ले लिया और जब वे वापिस वहां लौटे तो उन्हें लकड़ी का एक और टुकड़ा मिला जिस पर उभरे हुए खांचों की एक लड़ी थी।

उसके बाद से पुरातत्ववेत्ताओं ने उस स्थान से 450 मानव-निर्मित वस्तुएं खोजी हैं। इनमें 5 मीटर का एक पटिया है, जिसमें सुराख हैं और कई सारे छोटे-छोटे तराशे हुए लकड़ी टुकड़े हैं जिन्हें घोंघों के कवच और लावाजनित पत्थरों से सजाया गया था। इसके आसपास ही उन्हें गुंथी हुई रस्सियां भी मिलीं और लौकी की एक चिप्पी। अब वे जान गए हैं कि चौपाटी के रेत में शायद एक समूची नौका (Polynesian vaka boat) दबी हो सकती है, जिसे स्थानीय पोलीनेशियन भाषा में वाका कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन डेटिंग (radiocarbon dating)  की मदद से वाका पर चिपके रेशों की उम्र पता की है। ये रेशे 1440 से 1470 ईस्वीं के बीच के हैं। यह लगभग वही समय था जब चैथम के प्रमुख द्वीप रिकाहू पर मानव बसाहट के प्रथम अवशेष मिले हैं। देशज मोरिओरी लोग (Moriori people) इस द्वीप को इसी नाम से जानते हैं।

हवाई विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता पैट्रिक किर्क का कहना है कि लकड़ी से बनी नौका या उसके टुकड़े मिलना बहुत बिरली बात है और हर बार ऐसी खोज महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनका कहना है कि इनका काल 15वीं सदी का है, तो यह उस समय की पोलीनेशियन समुद्री यात्राओं (Polynesian navigation) का अहम प्रमाण है। वैसे काल निर्धारण अभी पक्का नहीं है लेकिन अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जस्टिन मैक्सवेल को लगता है कि इन मानव-निर्मित चीज़ों का उम्दा कुदरती परिरक्षण हुआ है और उनमें सामग्री की भरपूर विविधता दिखती है। इसके अलावा, मोरिओरी लोग इनके बारे में मौखिक परंपराओं की बातें जोड़ सकते हैं। इन सब कारणों के चलते यह खोज असाधारण है।

इससे पहले मैक्सवेल ने रिकाहू पर पहली बस्तियों का काल निर्धारण 1450 से 1650 ईस्वीं किया था। उसके लिए उन्होंने चारकोल और परागकणों के रिकॉर्ड का सहारा लिया था। रस्सी का एक टुकड़ा तो 1415 ईस्वीं का है जो इन स्थलों से भी पुराना है। और नौका के पास लौकी का टुकड़ा तो शायद 1400 ईस्वीं के आसपास का है। अलबत्ता, मैक्सवेल का मत है कि ये तारीखें सिर्फ इतना बताती (archaeological analysis) हैं कि इस वाका का आखरी उपयोग कब हुआ था; यह पता नहीं चलता कि इसे कब बनाया गया था।

अध्ययन की खास बात यह रही कि आदिवासी मुखियाओं ने वाका की लकड़ी और रेशों का काल निर्धारण करने की अनुमति दे दी थी किंतु वे अभी भी विचार कर रहे हैं कि और नमूने लेने की अनुमति दें या न दें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन आरएनए हासिल किया जा सका

पिछले कुछ दशकों से वैज्ञानिक प्राचीन डीएनए का विश्लेषण (ancient DNA research) कर अतीत के जीवन के बारे में, उद्विकास (evolution studies) के बारे में समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अकेले डीएनए पर मौजूद जीन्स आधी-अधूरी कहानी बता पाते हैं। डीएनए वह अणु होता है जिसमें किसी जीव के निर्माण व कामकाज की सारी सूचना क्षारों के क्रम के रूप में मौजूद होती है। इस डीएनए के छोटे-छोटे अनुक्रम (जीन्स) के आधार पर कोशिकाओं में एक अन्य अणु बनाया जाता है जिसे आरएनए कहते हैं। आरएनए ही कोशिकाओं में प्रोटीन बनवाने (RNA sequencing) का काम करता है।

किसी जीवित जीव में कोई जीन कब और कहां सक्रिय होता है, उससे उस जीव की समझ बनाने पर बहुत फर्क पड़ सकता है। और यह जानकारी कि कोई जीन कब और कहां सक्रिय हुआ है आरएनए में दर्ज होती है। दिक्कत यह है कि आरएनए तो डीएनए से भी जल्दी अपघटित हो जाता है; कारण है उसकी नाज़ुक बनावट और उसको अपघटित करने वाले एंज़ाइम। पाठ्यपुस्तकों की ज़ुबानी, “मृत्यु के कुछ ही मिनटों या घंटों के भीतर आरएनए बरबाद हो जाता है।” इसलिए प्राचीन नमूनों से आरएनए हासिल (ancient RNA samples) करने के गिने-चुने प्रयास ही हुए हैं।

और ये प्रयास भी पिछले कुछ सालों में ही हुए हैं। सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को पुराने मक्के और जौ के बीजों से और पर्माफ्रॉस्ट में जमे भेड़िये के ऊतक से आरएनए के खंड हासिल करने में सफलता मिली। फिर 2023 में, कुछ वैज्ञानिकों ने 132 साल पुराने तस्मानियाई टाइगर (बिल्ली जैसा मार्सुपियल) का आरएनए (Tasmanian tiger RNA) हासिल कर उसका अनुक्रमण किया। और इन्ही नतीजों से प्रेरित होकर हालिया अध्ययन किया गया (RNA preservation)

अध्ययन में, स्टॉकहोम युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी लव डालेन ने रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 10 प्राचीन वुली मैमथ (हाथी जैसा झबरीला जानवर) (woolly mammoth RNA) के ऊतकों से आरएनए हासिल करने का प्रयास किया। ये नमूने पूरे मैमथ के नहीं बल्कि छोटे-छोटे टुकड़े थे। यानी आरएनए ढूंढने का मौका भी बस आर-पार की स्थिति जैसा था।

अच्छी बात कि वे इन नमूनों से ठीक-ठीक हालत में आरएनए हासिल कर पाए। उन्होंने एंज़ाइम की मदद से आरएनए अणु से डीएनए की शृंखलाएं बनाईं, फिर उन डीएनए का अनुक्रमण किया। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया कि उन आरएनए में अनुक्रम कैसा रहा होगा। वे 10 मैमथ में से तीन मैमथ के प्राचीन आरएनए पहचान पाए (genome reconstruction); ये 39,000 से 52,000 साल प्राचीन थे।

हालांकि इन मैमथ से अधिकतर आरएनए टूटी-फूटी हालत में मिले थे, लेकिन एक मैमथ जिसका नाम यूका रखा गया है, से काफी जानकारी मिल सकी। एक तो, कुछ ऐसे आरएनए अनुक्रम मिले जो सिर्फ वाय क्रोमोसोम (Y chromosome genes) पर पाए जाने वाले जीन में होते हैं। यह हैरान करने वाली बात थी क्योंकि अब तक उनको लगता था कि यूका मादा है। यूका से मिले दूसरे आरएनए में पेशीय ऊतक बनाने और रख-रखाव रखने के निर्देश थे (mammoth biology)।

सेल पत्रिका में प्रकाशित (Cell journal study) ये नतीजे इस दिशा में शोध के और मौके खुलने की आशा जगाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शाकनाशी के असर सम्बंधी एक शोध पत्र रद्द किया गया 

शाकनाशक ग्लायफोसेट (glyphosate) के स्वास्थ्य पर असर को लेकर एक शोध पत्र 2000 में रेग्यूलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्मेकोलॉजी (Regulatory Toxicology and Pharmacology) नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। हाल ही में जर्नल ने इस शोध पत्र को निरस्त यानी रीट्रेक्ट (paper retraction) करने का निर्णय लिया है। निरस्त करने का कारण इस शोध पत्र के साथ जुड़े गंभीर नैतिक सरोकारों और इसके निष्कर्षों की वैधता के प्रति संदेहों को बताया गया है।

इस शोध पत्र में कहा गया था कि कीटनाशक ग्लायफोसेट (जिसे राउंड-अप के नाम से बेचा जाता है) मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालता है।   

दरअसल, पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब कुछ लोगों ने मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा (Monsanto lawsuit) दायर किया कि उन्हें जो कैंसर (नॉन-हाजकिन्स लिम्फोमा – non-Hodgkin lymphoma) हुआ है वह ग्लायफोसेट की वजह से हुआ है। इस मुकदमे के दौरान यह उजागर हुआ था कि 2015 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट (IARC report)  में यह निष्कर्ष दिया गया था कि संभवत: ग्लायफोसेट एक कैंसरकारी पदार्थ है। यह प्रमाण मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता था।

मॉनसेंटो इस प्रमाण को गलत साबित करने में जुट गई। सुनवाई के दौरान सामने आया कि कंपनी ने कुछ शोधकर्ताओं से संपर्क किया था कि वे एक समीक्षा पर्चे (review paper) में यह कहें कि ग्लायफोसेट का ऐसा कोई असर नहीं होता है। कंपनी अधिकारियों के आंतरिक ईमेल वार्तालाप (internal emails) से यह साज़िश उजागर हो गई।

शोध पत्र को निरस्त करते हुए जर्नल ने कहा है कि उपरोक्त शोध पत्र के लेखकों ने मात्र उन्हीं अध्ययनों को समीक्षा में शामिल किया था जो मॉनसेंटो द्वारा किए गए थे और अप्रकाशित (unpublished studies) थे। लेखकों ने कई सारे बाहरी प्रकाशित अध्ययनों को अनदेखा कर दिया था, हालांकि वे भी समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू – peer review) आधारित जर्नल्स में प्रकाशित नहीं हुए थे।

उपरोक्त शोध पत्र के तीन लेखकों में से दो (रॉबर्ट क्रोस और इयान मनरो) का निधन हो चुका है। जर्नल ने शोध पत्र निरस्त करने से पहले तीसरे लेखक गैरी विलियम्स (Gary Williams) से संपर्क किया मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

समीक्षा पर्चे के निरस्त होने के बाद मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे फरियादियों (plaintiffs) की राह की एक बाधा दूर हो गई है। इस समीक्षा पर्चे के आधार पर मॉनसेंटो दावा कर रहा था कि वैज्ञानिक अध्ययन ग्लायफोसेट को हानिरहित प्रमाणित करते हैं। वैसे मॉनसेंटो (अब बायर (Bayer acquisition) के स्वामित्व में) ने एक बयान में कहा है कि इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट मात्र एक रिपोर्ट है और दुनिया भर की नियामक संस्थाएं सहमत हैं कि ग्लायफोसेट का उपयोग निरापद है और यह कैंसरकारी नहीं है।

अब इतना तो स्पष्ट है कि इस समीक्षा पर्चे को कहीं भी उद्धरित (citation ban) नहीं किया जा सकेगा और इसके हवाले से ग्लायफोसेट को हानिरहित नहीं बताया जा सकेगा। लेकिन अभी भी यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) और युरोपियन केमिकल्स एजेंसी (European Chemicals Agency) ने अपना निर्णय बदला नहीं है। दूसरी ओर, मॉनसेंटो के प्रभाव में लिखे गए कुछ अन्य शोध पत्रों (industry-funded research) पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zccwjp8/full/_20251204_on_roundup.jpg