क्या मंगल ग्रह के शहर बर्फ से बनाए जाएंगे?

मंगल तक पहुंचना मानव जाति का एक बड़ा सपना रहा है, और अब यह सपना सच होता दिख रहा है (Mars mission, human settlement on Mars)। लेकिन मंगल पर उतरना ही काफी नहीं है। अगर इंसानों को वहां लंबे समय तक रहना है, तो उन्हें ऐसी मज़बूत और सुरक्षित जगहों की ज़रूरत होगी जो कड़ी ठंड, खतरनाक विकिरण और अकेलेपन से बचा सकें। पृथ्वी से निर्माण सामग्री ले जाना बहुत महंगा और धीमा होगा। इसी वजह से वैज्ञानिक वहीं मौजूद एक संसाधन को समाधान मान रहे हैं – बर्फ (Martian ice) । पृथ्वी की प्राकृतिक बर्फीली गुफाओं से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि क्या मंगल पर भी ऐसे बर्फीले ढांचे बनाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि मंगल ग्रह सूखा नहीं है। उसकी सतह पर और उसके नीचे काफी मात्रा में बर्फ मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बर्फ से ऐसे मज़बूत और गर्मी कैद करने वाले घर बनाए जा सकते हैं, जिनमें मनुष्य रह सकें। ये बर्फीले घर एक तरफ तो विकिरण से सुरक्षा (radiation shielding) देंगे और दूसरी तरफ सूरज की आवश्यक रोशनी (natural light habitats) अंदर आने देंगे, जिससे जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा मिलेगा।

यह विचार भले ही विज्ञान-कथा जैसा लगे, लेकिन वैज्ञानिक इसे लेकर गंभीर हैं। लंबे समय के लिए अंतरिक्ष में इंसानों को बसाने (space habitation) की सबसे बड़ी चुनौती है बार-बार पृथ्वी से रसद भेजना, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा है। अगर मंगल पर मौजूद चीज़ों से ही काम लिया जाए, तो खर्च और खतरा दोनों कम हो सकते हैं। बर्फ इस मामले में खास है, क्योंकि इसे संभालना अपेक्षाकृत आसान है और इसके फायदे हैं।

मंगल पर निर्माण के लिए दो मुख्य चीज़ें मानी जाती हैं – बर्फ और रेगोलिथ (धूल-मिट्टी और पत्थरों की परत) (Martian regolith, space construction materials)। रेगोलिथ में उपयोगी तत्व होते हैं, लेकिन उन्हें निकालने के लिए भारी मशीनें और बहुत ज़्यादा गर्मी चाहिए। इसके उलट, बर्फ को कम ऊर्जा में पिघलाया, ढाला और फिर से जमाया जा सकता है।

यह प्रस्तावित आवास गुंबदाकार होंगे, जिनकी साइज़ लगभग एक हैक्टर (Mars habitat ice dome structures)  होगी। इनके भीतर रहने की जगह, काम करने के हिस्से और खेती के क्षेत्र अलग-अलग होंगे। कंप्यूटर मॉडल बताते हैं कि सिर्फ कुछ मीटर मोटी बर्फ की दीवारें भी मंगल के बेहद ठंडे औसत तापमान (–120 डिग्री सेल्सियस) को अंदर करीब –20 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकती हैं। यह तापमान अब भी ठंडा है, लेकिन अतिरिक्त हीटिंग से संभाला जा सकता है और इससे बर्फ पिघलती भी नहीं।

बर्फ की बनावट भी उम्मीद से बेहतर है। शोध बताते हैं कि अगर बर्फ में हाइड्रोजेल (hydrogel reinforcement) जैसे जैविक पदार्थ मिलाए जाएं, तो वह ज़्यादा मज़बूत और लचीली हो सकती है, जिससे दरार पड़ने का खतरा कम होता है। एक बड़ी चुनौती है सब्लीमेशन, यानी मंगल के विरल वातावरण में बर्फ का सीधे भाप बन जाना। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास जल-रोधी अस्तर लगाकर इसे रोका जा सकता है, हालांकि ऐसा अस्तर शायद पृथ्वी से ले जाना पड़े।

बर्फ का सबसे बड़ा फायदा सूरज की रोशनी से उसका रिश्ता है। रेगोलिथ के विपरीत, बर्फ हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है लेकिन उपयोगी रोशनी और गर्मी को अंदर आने देती है। तो विकिरण से सुरक्षा मिलेगी, साथ ही पौधे उगाने, नींद के चक्र को ठीक रखने और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा देने के लिए ज़रूरी प्राकृतिक रोशनी मिलती रहेगी।

हालांकि इस विचार की कुछ सीमाएं (technical challenges) भी हैं। बड़े बर्फीले ढांचे बनाने के लिए भारी मात्रा में बर्फ को संसाधित करना होगा। शुरुआती अनुमान बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी बिजली उपलब्ध होने पर भी रोज़ केवल लगभग 15 वर्ग मीटर बर्फ (energy constraints) ही तैयार की जा सकती है। मंगल पर आने वाले धूल भरे तूफान भी समस्या पैदा करेंगे, क्योंकि बर्फ पर जमी धूल उसकी पारदर्शिता और गर्मी रोकने की क्षमता घटा देती है। इसके अलावा बर्फ निकालने के लिए उपकरण तो पृथ्वी से ही ले जाने होंगे।

इन चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्यम अवधि के लिए बर्फ के घर रहवास के लिए काम आ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शनि के चंद्रमा टाइटन का ओझल बर्फीला महासागर

रीब दो दशकों से शनि ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (titan) वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। माना जाता था कि उसकी मोटी बर्फीली सतह के नीचे तरल पानी का एक विशाल महासागर (subsurface ocean) छिपा है, जो जीवन की संभावना के लिए काफी अहम है। लेकिन हालिया शोध के अनुसार शायद ऐसा नहीं है।

टाइटन के अंदर महासागर होने का विचार 2000 के दशक के अंत में कैसिनी अंतरिक्ष यान (Cassini spacecraft) के आंकड़ों से आया था। कैसिनी जब-जब टाइटन के पास से गुज़रा, तो रेडियो संकेतों ने उसकी गति में बहुत हल्के बदलाव दर्ज किए। इससे टाइटन के गुरुत्वाकर्षण और आकार में हल्के बदलाव का पता चला। शनि के खिंचाव से टाइटन थोड़ा फैलता-सिकुड़ता दिखा, जिससे सतह पर 10 मीटर से ऊंचे ज्वार-भाटे जैसे प्रभाव बने। वैज्ञानिकों ने तब निष्कर्ष निकाला कि इतनी लचक तभी संभव है, जब बर्फ के नीचे तरल पानी का महासागर हो (liquid water ocean)।

इस सोच के चलते टाइटन को महासागरीय चंद्रमा के खास समूह में रखा गया था, जिसमें युरोपा और एन्सेलेडस (Europa Enceladus) जैसे चंद्रमा भी हैं। यह विचार टाइटन में कार्बनिक रसायन की भरपूर उपस्थिति के कारण भी था।

लेकिन नेचर में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। ग्रह वैज्ञानिक फ्लावियो पेट्रिका और उनकी टीम का कहना है कि टाइटन के भीतर कभी महासागर रहा होगा, लेकिन आज वह शायद जम चुका है। हालांकि, उसकी मोटी बर्फीली परत के अंदर कुछ जगहों पर पिघले पानी के छोटे-छोटे पोखर हो सकते हैं।

इस बहस की जड़ है ऊर्जा। अगर टाइटन के अंदर अब भी बड़ा तरल महासागर होता, तो शनि के खिंचाव से पैदा होने वाली गर्मी का बड़ा हिस्सा उस महासागर को गर्म (tidal heating, internal energy) रखने में लग जाता। लेकिन कैसिनी द्वारा 124 नज़दीकी उड़ानों के डैटा का दोबारा विश्लेषण करने पर पता चला कि टाइटन बहुत ज़्यादा ऊर्जा बाहर छोड़ रहा है – करीब 4 टेरावॉट, जो आधुनिक मानव सभ्यता की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा ज़रूरत के बराबर है। इतनी अधिक गर्मी का उत्सर्जन किसी विशाल तरल महासागर की उपस्थिति से मेल नहीं खाता।

इसमें एक और उलझन है। समय के साथ शनि के ज्वारीय खिंचाव को टाइटन की कक्षा को वृत्ताकार और स्थिर (orbital dynamics) बना देना चाहिए था, लेकिन टाइटन आज भी दीर्घवृत्ताकार पथ (elliptical orbit) पर घूम रहा है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि बहुत पहले किसी क्षुद्रग्रह की टक्कर ने इसकी कक्षा बिगाड़ दी होगी। लेकिन नया मॉडल एक आसान वजह बताता है: अगर टाइटन के भीतर तरल महासागर नहीं है, तो ऊर्जा को सोखने वाला कोई माध्यम नहीं होगा और कक्षा अस्थिर बनी रहेगी।

पेट्रिका की टीम ने टाइटन के दो मॉडल बनाए – एक जिसमें भीतर महासागर हो और दूसरा जिसमें न हो (interior planetary modeling)। जिस मॉडल में महासागर नहीं है, बल्कि करीब 500 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे चट्टानी कोर है, वही टाइटन से मिलने वाले आंकड़ों से बेहतर मेल खाता है (rocky core)। यह मॉडल टाइटन की गर्मी के उत्सर्जन, उसके झुकाव और शनि के खिंचाव के प्रति उसके व्यवहार, इन सभी बातों को एक ही ढांचे में समझाता है।

हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं। कुछ का कहना है कि टाइटन को ‘महासागरीय चंद्रमाओं’ की सूची से हटाने के लिए और ठोस सबूतों की ज़रूरत (evidence based research)है।

और तो और, इस नई खोज से टाइटन पर जीवन की संभावना (life on Titan) पूरी तरह खत्म नहीं होती। उल्टा, कुछ शोधकर्ताओं को यह विचार और भी संभावनाओं से भरा लगता है क्योंकि इसके अनुसार एक बड़े महासागर की जगह टाइटन की बर्फ के नीचे कई छोटी-छोटी तरल जल-राशियां हो सकती हैं, शायद कुछ तो अटलांटिक महासागर से भी बड़ी। ऐसे सीमित जल-क्षेत्र जीवन के लिए ज़रूरी रसायनों को बेहतर ढंग से सांद्रित कर सकते हैं।

इस बहस का जवाब शायद नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन (NASA Dragonfly mission) से मिलेगा, जो 2034 में टाइटन पर उतरने वाला है। यह मिशन ऐसे उपकरण लेकर जाएगा जो भूकंपीय तरंगों (seismic waves) को माप सकेंगे, जो ठोस बर्फ और तरल पानी में अलग-अलग तरह से व्यवहार करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दूरबीनों के लिए बाधा बन रहे हज़ारों उपग्रह

दुनिया भर में इंटरनेट की मांग (internet demand) बढ़ने के कारण हज़ारों नए उपग्रह छोड़े जा रहे हैं। खगोलविद इन इंटरनेट उपग्रहों से काफी चिंतित हैं। दरअसल, ये उपग्रह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और ऐसी रेडियो तरंगें (radio waves) छोड़ते हैं जो संवेदनशील दूरबीनों के लिए बाधा बन रही हैं।

एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2040 तक लगभग पांच लाख उपग्रह (satellite mega-constellation) पृथ्वी की कक्षा में होंगे। इतनी बड़ी संख्या में उपग्रह उन्नत अंतरिक्ष दूरबीनों की तस्वीरों को बिगाड़ सकते हैं। नासा (NASA)  के सिमुलेशन से पता चला है कि उपग्रहों का महाजाल चार प्रमुख दूरबीनों – हबल, Xuntian, SPHEREx, और ARRAKIHS – पर क्या असर डालेगा। परिणाम चिंताजनक हैं।

खगोलविदों को उम्मीद थी कि यदि दूरबीनों को पृथ्वी की सतह (Earth surface) से दूर अंतरिक्ष में रखा जाए, तो वे उपग्रहों की चमकीली लकीरों (satellite streaks) से बच सकेंगे। लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह उम्मीद बेमानी थी। भविष्य में 540 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थापित हबल दूरबीन (Hubble Space Telescope) की हर तीन में से एक तस्वीर में उपग्रह का खलल दिखाई देगा। विस्तृत परास वाली अंतरिक्ष दूरबीनों की हालत इससे भी बुरी होगी – SPHEREx और ARRAKIHS की लगभग हर तस्वीर में कम से कम एक चमकीली लकीर होगी। और, 2026 में लॉन्च होने वाली Xuntian दूरबीन की एक तस्वीर में 90 से अधिक उपग्रह लकीरें दिखने की संभावना है।

इस समस्या से बचना इसलिए लगभग असंभव है क्योंकि अधिकतर उपग्रह 500 से 700 कि.मी. की ऊंचाई (Low Earth Orbit – LEO) पर परिक्रमा करते हैं; कुछ तो 8000 कि.मी. तक भी स्थापित किए जाते हैं। यानी ये उपग्रह निचली कक्षा में मौजूद हर दूरबीन की तस्वीरों में डैटा (astronomical data) को नुकसान पहुंचाएंगे।

हालांकि, कंपनियों ने इन्हें थोड़ा ‘डार्क’ (dark satellite) बनाने की कोशिश की है, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। कई उपग्रह अभी भी काफी चमकीले (optical brightness) हैं। इसके अलावा इनके रेडियो सिग्नल (radio interference) दूर-दूर तक रेडियो दूरबीनों के काम में बाधा डाल रहे हैं।

तस्वीरों से उपग्रह की लकीरों को हटाने वाला सॉफ्टवेयर (image processing software) भी पूरा समाधान नहीं दे पाता है। कई बार वह सही काम नहीं करता, और जब करता है, तो तस्वीरों में ‘शोर’ बढ़ जाता है और माप में अनिश्चितता (measurement uncertainty) आ जाती है।

नासा के सिमुलेशन मॉडल (simulation models) के अनुसार अंतरिक्ष में मौजूद दूरबीनें भी उपग्रहों की लकीरों से प्रभावित होंगी। उपग्रहों का असर दो बातों पर निर्भर करता है: एक, दूरबीन की ऊंचाई (orbital altitude) पर – जितनी ऊंचाई पर दूरबीन होगी उस पर उपग्रहों का असर उतना ही कम होगा। दूसरी, दूरबीन के दृश्य क्षेत्र (field of view) पर। जितना बड़ा दृश्य क्षेत्र होगा, उतनी ही ज़्यादा उपग्रह लकीरें दिखेंगी।

इस स्थिति में Xuntian (450 कि.मी. की कक्षा) बहुत अधिक संवेदनशील होगा। इसका दृश्य क्षेत्र हबल से 300 गुना बड़ा (wide field telescope) है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें दिखेगी। पूरे आकाश का अवरक्त सर्वे (infrared sky survey) करने वाला SPHEREx एक फ्रेम में चांद से 200 गुना बड़ा क्षेत्र कैप्चर करता है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें होंगी।

हालांकि, कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि स्थिति हर जगह इतनी भयावह नहीं होगी। उदाहरण के लिए ARRAKIHS दूरबीन ज़्यादातर ‘सीधे ऊपर’ देखेगी, इसलिए उसकी कुछ तस्वीरों में लकीरें कम हो सकती हैं। फिर भी अनुमान बताते हैं कि लगभग 96 प्रतिशत तस्वीरें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित (affected observations) होंगी।

इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक ने कुछ संभावित उपाय सुझाए हैं:

  • उपग्रहों की ऊंचाई (satellite altitude) सीमित की जाए, ताकि अंतरिक्ष दूरबीनें उनसे ऊपर की कक्षा में रखी जा सकें।
  • उपग्रहों की ट्रैकिंग (satellite tracking) को अधिक सटीक बनाया जाए, ताकि दूरबीनें उन्हें पहचानकर बच सकें या बाद में लकीरों को हटाया जा सके।
  • उपग्रहों को और अधिक ‘डार्क’ बनाया जाए, ताकि वे कम चमकें (low reflectivity)।

ये सारे उपाय कहने में आसान हैं लेकिन उपग्रहों का यह जाल चिंताजनक है। जो आकाश कभी प्राकृतिक प्रयोगशाला (natural laboratory) था, वह अब एक औद्योगिक क्षेत्र बनता जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान के नोबेल पुरस्कार 9 वैज्ञानिकों को दिए गए

स साल के नोबेल पुरस्कारों (Nobel Prize 2025) की घोषणा कर दी गई है। विज्ञान के तीन क्षेत्रों – भौतिकी, रसायन और कार्यिकी अथवा चिकित्सा – में पुरस्कार उन खोजों के लिए दिए गए हैं जो वर्षों पहले की गई थीं लेकिन विज्ञान और समाज में उनके असर का खुलासा होते देर लगी। तो एक नज़र इस वर्ष के नोबेल सम्मान पर डालते हैं।

भौतिकी (Physics Nobel Prize)

भौतिकी में क्वांटम (Quantum Physics) शब्द अब जाना-पहचाना है। क्वांटम भौतिकी का प्रादुर्भाव 1900 में मैक्स प्लांक द्वारा ब्लैक बॉडी विकिरण की व्याख्या के साथ माना जा सकता है। आगे चलकर अल्बर्ट आइंस्टाइन, नील्स बोर, एर्विन श्रोडिंजर जैसे वैज्ञानिकों ने इसे आगे बढ़ाया। यह पदार्थ और ऊर्जा को एकदम बुनियादी स्तर पर समझने का प्रयास है। इसके कई विचित्र पहलुओं में से एक है क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling)।

आम तौर पर जब हम किसी गेंद को दीवार पर मारते हैं तो वह सौ फीसदी बार टकराकर वापिस लौट आती है। लेकिन अत्यंत सूक्ष्म स्तर (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे कण) पर पदार्थ का व्यवहार थोड़ा विचित्र हो जाता है। जब एक इकलौते कण को दीवार पर मारा जाए तो कभी-कभी वह टकराकर लौटने की बजाय दीवार के पार चला जाता है। इसे टनलिंग कहते हैं। ऐसा व्यवहार सूक्ष्म कणों के संदर्भ में ही देखा गया था। लेकिन इस वर्ष के नोबेल विजोताओं ने इसे स्थूल स्तर पर भी प्रदर्शित करके सबको चौंका दिया और क्वांटम कंप्यूटर (Quantum Computer Technology) जैसी टेक्नॉलॉजी का मार्ग खोल दिया है।

इस वर्ष का भौतिकी नोबेल संयुक्त रूप से कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) के जॉन क्लार्क, येल विश्वविद्यालय के माइकेल डेवोरेट तथा कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (सांटा बारबरा) के जॉन मार्टिनिस को दिया गया है। इन्होंने यह दर्शाया कि टनलिंग स्थूल स्तर पर भी संभव है। दरअसल उनके प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि कुछ मामलों में बुनियादी कणों का पुंज भी क्वांटम कण की तरह व्यवहार कर सकता है। उनके प्रयोग विद्युत परिपथ से सम्बंधित थे और वे दर्शा पाए कि विद्युत परिपथ क्वांटम परिपथ (Quantum Circuit Research) की तरह व्यवहार कर सकता है।

रसायन (Chemistry Nobel Prize)

वर्ष 2025 का रसायन नोबेल पुरस्कार क्योतो विश्वविद्यालय के सुसुमु कितागावा, मेलबर्न विश्वविद्यालय के रिचर्ड रॉबसन और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) के ओमर एम. यागी को दिया गया है।

इन वैज्ञानिकों ने ऐसी आणविक संरचनाएं निर्मित की हैं जिनमें अंदर विशाल खाली स्थान होते हैं। इसके लिए उन्होंने धातु के आयन और कार्बनिक अणुओं के संयोजन से नवीन आणविक रचनाएं बनाने में सफलता प्राप्त की है। इन्हें मेटल ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क (एमओएफ)) (Metal Organic Framework – MOF) नाम दिया गया है। इनकी विशेषता यह है कि इनमें उपस्थित खाली स्थानों में कई अन्य पदार्थ समा सकते हैं। जैसे इनमें कार्बन डाईऑक्साइड (Carbon Dioxide Storage) भर सकती है, विभिन्न प्रदूषणकारी पदार्थ जमा हो सकते हैं, पर्यावरण में उपस्थित कणीय पदार्थ भरे रह सकते हैं। अर्थात एमओएफ जलवायु परिवर्तन(Climate Change Solutions), वातावरण के प्रदूषण वगैरह जैसी कई चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं।

चिकित्सा विज्ञान (Medicine Nobel Prize)

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल इंस्टीट्यूट फॉर सिस्टम्स बायोलॉजी (सिएटल) की मैरी ई. ब्रन्कॉव, सोनोमा बायोथेराप्युटिक्स के फ्रेड राम्सडेल और ओसाका विश्वविद्यालय के शिमोन साकागुची को संयुक्त रूप से दिया गया है।

इन्होंने मिलकर इस बात का खुलासा किया है कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System Research) अफरा-तफरी क्यों नहीं मचा देता। दरअसल हमारे प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यूनिटी) के लिए लाज़मी है कि वह बाहर से आने वाली विभिन्न चुनौतियों (जैसे बैक्टीरिया, फफूंद, वायरस वगैरह) से निपटने को तत्पर रहे। इस काम को अंजाम देने के लिए प्रतिरक्षा तंत्र में विभिन्न किस्म की कोशिकाएं होती हैं – कुछ कोशिकाएं घुसपैठियों को पहचानने का काम करती हैं, कुछ उन्हें बांध कर अन्य मारक कोशिकाओं के समक्ष पेश करती हैं। बाहर से तो कुछ भी आ सकता है। इसलिए पहचानने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं पर ऐसे अणु होते हैं जो हर उस चीज़ को पहचान लेते हैं जो पराई है। यानी उनमें अपने-पराए का भेद करने की क्षमता होनी चाहिए।

इस साल के नोबेल विजेताओं का प्रमुख योगदान यह समझाने में रहा है कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र स्वयं का नियमन करके कैसे अनुशासित व्यवहार करता है। पहले माना जाता था कि पहचानने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं का प्रशिक्षण थायमस नामक ग्रंथि (Thymus Gland Function) में होता है। वहां समस्त पहचान कोशिकाओं को शरीर की कोशिकाओं से जोड़कर परखा जाता है। जो कोशिका अपने शरीर की कोशिका से जुड़ती है, उसे नष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार से प्रतिरक्षा तंत्र की वही कोशिकाएं बचती हैं जो अपने ही शरीर की कोशिकाओं को हमलावर के रूप में नहीं पहचातीं।

फिर ब्रन्कॉव, राम्सडेल और साकागुची ने चूहों पर प्रयोगों के दम पर प्रतिरक्षा तंत्र में एक नई किस्म की कोशिकाएं पहचानी जो अन्य कोशिकाओं के निरीक्षण व नियमन का काम करती हैं। इन्हें नियामक टी-कोशिकाएं कहते हैं। तब से नियामक टी-कोशिकाओं (Regulatory T Cells – Tregs) पर काफी अनुसंधान से कई रोगों के उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। इनमें खास तौर से तथाकथित आत्म-प्रतिरक्षा रोग (Autoimmune Diseases) और कैंसर शामिल हैं। आत्म प्रतिरक्षा रोगों में टाइप-ए डायबिटीज़, आर्थ्राइटिस, ल्यूपस वगैरह शामिल हैं। इन रोगों का कारण यह है कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र स्वयं अपनी कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला कर देता है। नियामक टी-कोशिकाओं की खोज और आगे शोध ने ऐसे रोगों (Cancer Immunotherapy) के प्रबंधन के रास्ते प्रदान किए हैं। (स्रोत फीचर्स)

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असाधारण उल्कापिंड से नमूना लाने को तैयार चीन

चीन का एक नवीन मिशन धरती के पास मौजूद एक अनोखे क्षुद्रग्रह 469219 कामोआलेवा (Near-Earth Asteroid) से नमूना लाने को भेजा जा रहा है। अंतरिक्ष मिशन तियानवेन-2 (Tianwen-2 Mission) बहुत जल्द लॉन्च होने वाला है।

2016 में हवाई स्थित वेधशाला से खोजा गया कामोआलेवा कोई साधारण पिंड नहीं है। यह एक अर्ध-उपग्रह (क्वासी-सैटेलाइट) (Quasi-Satellite) है। कामोआलेवा अत्यंत दीर्घ-वृत्ताकार पथ में सूर्य की परिक्रमा करता है। पृथ्वी से देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे यह पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा हो।

कामोआलेवा में चीन के वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इसकी असाधारण प्रकृति की वजह से जागी। एरिज़ोना की एक शक्तिशाली दूरबीन ने बताया था कि यह चंद्रमा की चट्टानों के समान ही सूर्य की रोशनी परावर्तित करता है। इससे एक संभावना बनती है कि यह क्षुद्रग्रह करोड़ों साल पहले किसी बड़ी टक्कर (Lunar Impact Hypothesis) में चंद्रमा से टूट कर छिटका होगा।

त्सिंगहुआ युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडलिंग से इस संभावना को और मज़बूत किया: उन्होंने इसे चंद्रमा पर मौजूद जियोर्डानो ब्रूनो नामक एक बड़े गड्ढे से जोड़कर देखा था। फिर, एक अन्य अध्ययन में एक और ऐसा क्षुद्रग्रह मिला जिसमें चंद्रमा जैसी विशेषताएं थीं। इससे संकेत मिला कि सिर्फ कामोआलेवा नहीं, चंद्रमा के और भी टुकड़े अंतरिक्ष (Moon Fragments in Space) में बिखरे होंगे।

लेकिन यह साबित करने के लिए कामोआलोवा के नमूनों की जांच करना होगी। दरअसल, कामोआलेवा बहुत ही छोटा पिंड है: एक फुटबॉल मैदान के बराबर। इसकी लंबाई-चौड़ाई बमुश्किल 100 मीटर होगी। यह 28 मिनट में अपनी धुरी पर पूरा घूम जाता है। इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति बहुत कम है और संभावना है कि इसकी सतह बहुत महीन धूल जैसी है, जिससे लैंडिंग और नमूना लेना काफी मुश्किल होगा (Asteroid Sample Collection Challenges)।

चीन ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक योजना बनाई है। इसके तहत, पहले तियानवेन-2 और एक रोबोटिक हाथ की मदद से सतह को टटोला जाएगा। फिर, घूमने वाले ब्रश से गुबार उड़ाकर धूल को एक कंटेनर में भर लेंगे। यदि सब ठीक रहा तो यान थोड़ी देर के लिए क्षुद्रग्रह पर उतरेगा, तीन पैरों से खुद को टिकाएगा और पंजे जैसे एक रोबोटिक हाथ से नमूने उठाएगा। इसके बाद यान एक कैप्सूल (Sample Return Capsule) में भरकर नमूने धरती पर भेजेगा – लगभग ढाई साल बाद।

अगर यह साबित हो जाए कि कामोआलेवा सच में चंद्रमा का टुकड़ा है तो इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि चांद के टुकड़े अंतरिक्ष में कैसे छिटकते हैं और किन रास्तों से यात्रा करते हैं (Moon Debris Trajectory)। और यदि यह चंद्रमा का हिस्सा नहीं निकला, तब भी इससे हमें यह जानने में मदद मिल सकती है कि पृथ्वी के पास पिंड कैसे बने और हमारे सौरमंडल की शुरुआती कहानी क्या थी (Early Solar System Formation)।

कामोआलेवा के नमूने भेजने के साथ यान का मिशन रुकेगा नहीं। इसके बाद यान एक धूमकेतु (Comet 311P/PANSTARRS) की ओर रवाना होगा। और आने वाले कई वर्षों तक इसका अध्ययन करेगा। (स्रोत फीचर्स)

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मैग्नेटार: अंतरिक्ष में बेशकीमती धातुओं का कारखाना

क्या आप जानते हैं कि बेशकीमती सोना-चांदी (gold-silver origin in universe) संभवत: अरबों साल पहले एक ज़बर्दस्त ब्रह्मांडीय विस्फोट (cosmic explosion) में बने थे? दशकों तक वैज्ञानिकों का मानना था कि ऐसे भारी तत्व केवल तब बनते हैं जब दो मृत तारे (न्यूट्रॉन स्टार) (neutron star collision) आपस में टकराते हैं। लेकिन अब शोधकर्ताओं को ऐसी कीमती धातुएं बनने एक और तरीका पता चला है।

दी एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित नए अध्ययन (astrophysical journal research) में बताया गया है कि एक विशेष प्रकार के तारे, जिन्हें मैग्नेटार (magnetar flares) कहा जाता है, से निकली उग्र लपटों (flare) में भी सोना, चांदी और प्लेटिनम जैसे भारी तत्व बन सकते हैं।

गौरतलब है कि मैग्नेटार उन विशाल तारों के बचे हुए केंद्र होते हैं जो सुपरनोवा (supernova remnant) में फट चुके होते हैं। इनका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के मुकाबले खरबों गुना शक्तिशाली होता है। इस कारण ये तारे कभी-कभी बहुत तेज़ी से भभकते हैं।

2004 में एक मैग्नेटार ऐसी ही भयंकर उग्र लपटें निकली थीं, जिसने कुछ ही सेकंड में उतनी ऊर्जा फेंकी जितना हमारा सूरज लाखों सालों में छोड़ता है। दस मिनट बाद उसी जगह से कुछ और हल्की लपटें निकलीं, जिन्हें आफ्टरग्लो (afterglow radiation) कहा गया। तब वैज्ञानिक इस रहस्यमयी संकेत को समझ नहीं पाए थे लेकिन अब उन्हें इसका मतलब समझ आने लगा है।

इस खोज की अहमियत समझने के लिए पहले यह जान लेते हैं कि भारी तत्व कैसे बनते हैं। सोना, चांदी और प्लेटिनम जैसे भारी तत्व आम तारों के अंदर नहीं बनते। इन्हें बनने के लिए एक बेहद तेज़ और उग्र प्रक्रिया की ज़रूरत होती है, जिसे आर-प्रक्रिया (r-process nucleosynthesis) कहते हैं। इस प्रक्रिया में परमाणु नाभिक बहुत तेज़ी से न्यूट्रॉन्स सोखते हैं और भारी तत्वों में बदल जाते हैं।

अब तक वैज्ञानिकों को आर-प्रक्रिया का एक ही पुष्ट स्रोत पता था – दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर। लेकिन ऐसी टक्करें बहुत बिरली होती हैं और हमारी निहारिका के ‘जीवन’ के आखिरी समय में होती हैं। तो फिर शुरुआती समय में भारी तत्व कैसे बने (early universe element formation)?

कोलंबिया युनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री अनिरुद्ध पटेल और उनकी टीम ने 2004 में मैग्नेटार से निकली लपटों के डैटा को फिर से देखा। उन्होंने कंप्यूटर सिमुलेशन (astrophysics simulation) के ज़रिए यह जांचा कि क्या इस तरह की भभक से आर-प्रक्रिया हो सकती है। उन्होंने पाया कि भभक के बाद दिखी आफ्टरग्लो में बिल्कुल वैसी ही गामा किरणें थीं जैसी आर-प्रक्रिया के दौरान निकलती हैं। ये गामा किरणें उस ऊर्जा का संकेत थीं जो भारी तत्व बनने के समय निकलती हैं।

20 साल से ऐसे ही पड़े डैटा ने अंतत: साबित कर दिया कि सोना और अन्य भारी तत्व केवल एक ही तरह की ब्रह्मांडीय घटना से नहीं बनते। बल्कि इन्हें बनाने वाली आर-प्रक्रिया के और भी स्रोत हो सकते हैं (alternative r-process sources), जो अभी तक अनदेखे हैं। ये नतीजे अधिक शोध के रास्ते खोलते हैं। 2017 में हुई न्यूट्रॉन तारों की टक्कर धरती से बहुत दूर थी, इसलिए वैज्ञानिक उस घटना को ठीक से नहीं देख सके। लेकिन भविष्य में अगर किसी नज़दीकी मैग्नेटार से लपटें उठती हैं तो शायद वैज्ञानिक सोना-चांदी बनने के चश्मदीद बन जाएं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक ग्रह को तारे में समाते देखा गया

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक दुर्लभ और रोमांचक खगोलीय घटना (rare astronomical event) देखी है। उन्होंने पहली बार एक विशाल ग्रह (giant exoplanet) को खुद अपने तारे में समाते देखा है। आम तौर पर माना जाता है कि जब कोई तारा बूढ़ा होता है, तब वह फैलकर एक लाल दानव (red giant) में बदल जाता है और अपने पास के ग्रहों को निगल लेता है। लेकिन यहां ग्रह को खुद-ब-खुद तारे में छलांग लगाते देखा गया है। यह ग्रहों के खत्म होने का एक बिलकुल नया तरीका है।

दरअसल 2023 में वैज्ञानिकों ने हमसे 12,000 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक तारे (distant star system) में अचानक तेज़ चमक देखी थी। उनका अनुमान था कि तारा अपने जीवन के आखिरी दौर में पहुंच गया है, लाल दानव बन रहा है और इस प्रक्रिया में उसने पास के किसी ग्रह को निगल लिया है।

लेकिन वर्तमान घटना में नासा के JWST से मिली नई जानकारी ने यह साफ किया है कि वह तारा बहुत छोटा और युवा है, इसलिए वह लाल दानव तो नहीं बना होगा। तो फिर यह तेज़ चमक कैसी?

वैज्ञानिकों का दावा है कि बृहस्पति जितना बड़ा ग्रह पहले से ही अपने तारे के बेहद पास चक्कर लगा रहा था – उतना ही करीब जितना बुध सूर्य के करीब है। लाखों वर्षों तक तारे का गुरुत्वाकर्षण (stellar gravity pull) ग्रह को धीरे-धीरे खींचता रहा, जैसे चंद्रमा पृथ्वी पर ज्वार लाता है। इस लगातार खिंचाव से ग्रह के अंदर घर्षण हुआ, उसकी ऊर्जा खत्म होने लगी और उसका रास्ता तारे की ओर मुड़ता चला गया।

अंतत:, वह ग्रह तारे के बहुत नज़दीक पहुंच गया। उसने तारे के बाहरी वायुमंडल को छू लिया, जहां उसे भारी खिंचाव का सामना करना पड़ा और उसकी रही-सही ऊर्जा भी खत्म हो गई। फिर हुई उसकी नाटकीय मौत – वह तारे से टकरा गया और उस टक्कर से अंतरिक्ष में बहुत ज़्यादा ऊर्जा, गैस और धूल (cosmic dust and gas explosion) फैल गई। यही था वो चमकदार धमाका जिसे खगोलविदों ने देखा था।

वैज्ञानिक इस घटना को “ग्रह की खुदकुशी” (planetary suicide) कह रहे हैं – क्योंकि यहां ग्रह धीरे-धीरे खुद ही तारे में समाता चला गया। इस तरह किसी ग्रह के अंत होने की प्रक्रिया (planetary destruction process) को पहली बार इतने साफ रूप में देखा गया है।

हालांकि JWST द्वारा प्राप्त यह जानकारी अभी शुरुआती है और इसके हर पहलू की पुष्टि के लिए और अध्ययन करने की ज़रूरत है। साथ ही, यह भी संभव है कि तारे की जो चमक हमें दिख रही है, उसका कारण यह भी हो सकता है पहले अंतरतारकीय धूल (interstellar dust interference) की वजह से वह धुंधला नज़र आ रहा हो। भविष्य में JWST की पूरी इन्फ्रारेड तरंगदैर्घ्य में किए जाने वाले अवलोकनों से तारे के आसपास धूल के गुबार की स्थिति के बारे में और जानकारी मिल सकती है।

यह खोज कुछ बड़े सवाल उठाती है: क्या ग्रह अक्सर इस तरह खत्म होते हैं? क्या हम पहले ऐसी घटनाएं देखने से चूके हैं? नई शक्तिशाली दूरबीनों (next generation telescopes) से इनके जवाब मिलने की उम्मीद है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी की घूर्णन शक्ति से बिजली

क हालिया अध्ययन का दावा है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s magnetic field) में घूर्णन से बिजली उत्पन्न (electricity generation) की जा सकती है। हालांकि अध्ययन में एक विशेष उपकरण से मात्र 17 माइक्रोवोल्ट (17 microvolts) की बेहद कम विद्युत धारा उत्पन्न की गई है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रभाव वास्तविक है और इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है, तो यह बिना प्रदूषण के ऊर्जा उत्पादन (pollution-free energy generation) का नया तरीका हो सकता है। खास तौर पर दूरदराज़ के इलाकों (remote areas) और मेडिकल उपकरणों (medical devices) के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यह शोध प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (Princeton University) के क्रिस्टोफर चायबा (Christopher Chyba) के नेतृत्व में किया गया और फिजिकल रिव्यू रिसर्च (Physical Review Research) में प्रकाशित हुआ है।

आम तौर पर चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) में एक सुचालक (conductor) को घुमा कर बिजली उत्पन्न की जाती है, जैसा कि पावर प्लांट्स (power plants) में होता है। पृथ्वी का भी एक चुंबकीय क्षेत्र (geomagnetic field) होता है, और जब पृथ्वी घूमती है (Earth’s rotation) तो इस चुंबकीय क्षेत्र का एक हिस्सा स्थिर बना रहता है। सैद्धांतिक रूप से (theoretically), यदि कोई चालक (conductor) पृथ्वी की सतह पर रखा जाए तो वह इस चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) से गुज़रकर विद्युत धारा (electric current) उत्पन्न कर सकता है। हालांकि, पृथ्वी के सामान्य चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s magnetism) में ऐसा नहीं होता, क्योंकि चालक के अंदर मौजूद आवेश (electrons inside the conductor) खुद को इस तरह व्यवस्थित कर लेते हैं कि बिजली पैदा (electricity production) ही नहीं हो पाती।

लेकिन क्रिस्टोफर चायबा (Christopher Chyba) और उनकी टीम का दावा है कि उन्होंने इस समस्या का हल खोज लिया है। खास आकार में बना एक खोखला बेलन (hollow cylindrical conductor) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बिजली उत्पन्न (electricity generation from Earth’s magnetic field) कर सकता है।

इस परिकल्पना को जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने मैंगनीज़ (manganese), ज़िंक (zinc), और आयरन (iron) वाले चुंबकीय पदार्थ (magnetic material) से एक विशेष उपकरण बनाया। उन्होंने 17 माइक्रोवोल्ट (17 microvolts of electric current) की बहुत हल्की विद्युत धारा दर्ज की, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के सापेक्ष उपकरण की स्थिति बदलने पर भी बदल रही थी। लेकिन जब उन्होंने खोखले सिलेंडर (hollow cylinder) की जगह ठोस सिलेंडर (solid cylinder) का उपयोग किया तो बिजली पैदा (electricity production) नहीं हुई।

विस्कॉन्सिन-यूक्लेयर विश्वविद्यालय (University of Wisconsin-Eau Claire) के पॉल थॉमस (Paul Thomas) जैसे कुछ वैज्ञानिक इस प्रयोग को विश्वसनीय मानते हैं, लेकिन फ्री यूनिवर्सिटी ऑफ एम्स्टर्डम (Free University of Amsterdam) के रिंके विजनगार्डन (Rinke Wijngaarden) जैसे अन्य वैज्ञानिकों को संदेह है। विजनगार्डन ने 2018 में इसी तरह का प्रयोग करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। उनका मानना है कि चायबा (Chyba) की परिकल्पना सही नहीं हो सकती। उनके मुताबिक चायबा (Chyba) के दल ने काफी सावधानी बरती है, लेकिन यह भी संभव है कि दर्ज किया गया वोल्टेज (voltage measurement) तापमान में बदलाव (temperature variation) जैसी अन्य वजहों से आया हो।

फिलहाल, यह अध्ययन वैज्ञानिक समुदाय (scientific community) में बहस का विषय बन गया है। अगर आगे के प्रयोग इन नतीजों की पुष्टि कर पाते हैं तो यह बिजली उत्पादन (electricity generation technology) के नए रास्ते खोल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चंद्रमा की उम्र लगभग पृथ्वी के बराबर है!

हाल में प्रस्तुत एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि पृथ्वी (Earth) के अस्तित्व में आने के थोड़े समय बाद से ही चंद्रमा (Moon) उसका साथी रहा है। यह नया शोध बताता है कि चंद्रमा का जन्म सौर मंडल (Solar System) बनने के महज 6.5 करोड़ साल बाद ही हो गया था। यानी चंद्रमा की उम्र करीब 4.5 अरब साल है, जो पहले के अनुमानों से अधिक है।

ल्यूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC) में प्रस्तुत इस शोध में बताया गया है कि चंद्रमा का निर्माण पृथ्वी के बनने के तुरंत बाद हुआ था, जब मंगल ग्रह (Mars) के साइज़ जितना एक प्रोटो-प्लैनेट (Proto-planet) ‘थीया’ (Theia) पृथ्वी से टकराया था।

गौरतलब है कि सौर मंडल (Solar System) का निर्माण लगभग 4.56 अरब वर्ष पहले शुरू हुआ, और इसके 2-3 करोड़ साल बाद पृथ्वी आकार लेने लगी। उस समय अंतरिक्ष (Space) में भारी हलचल थी और बड़े-बड़े खगोलीय पिंडों की टक्कर एक आम बात थी। इन्हीं में से एक टक्कर युवा पृथ्वी से थीया नामक पिंड के टकराने की थी। यह टक्कर इतनी भीषण थी कि पृथ्वी से भारी मात्रा में पिघली हुई चट्टान और मलबा अंतरिक्ष में उछला, जो बाद में संघनित होकर चंद्रमा बना।

यह घटना पृथ्वी के विकास में भी महत्वपूर्ण रही। इस टक्कर से पृथ्वी की सतह पिघलकर खौलते मैग्मा के महासागर में बदल गई और इसने पृथ्वी के घूर्णन और झुकाव को स्थिर करने में मदद की। इसलिए चंद्रमा के निर्माण का सटीक समय जानकर वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि पृथ्वी अपने वर्तमान रूप में कब आई।

चंद्रमा की उम्र कैसे तय की?

कई वर्षों से वैज्ञानिक अपोलो मिशनों (Apollo Missions) द्वारा लाई गईं चंद्रमा की चट्टानों (Lunar Rocks) का अध्ययन करते आ रहे हैं। पूर्व में, जब वैज्ञानिकों ने चट्टानों का अध्ययन किया था तो पता चला था कि चंद्रमा की सतह से प्राप्त चट्टानें लगभग 4.35 अरब साल पुरानी थीं और ये चट्टानें चांद के अपने मैग्मा (Lunar Magma) से बनी थीं। तो माना गया कि चांद की उम्र लगभग उतनी ही है। लेकिन इतना युवा चंद्रमा बाकी प्रमाणों से मेल नहीं खाता।

इस पहेली को सुलझाने में बड़ी सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने चंद्रमा से मिले ज़िरकॉन क्रिस्टलों (Zircon Crystals) का अध्ययन किया। इन क्रिस्टल के रेडियोधर्मी तत्वों के विघटन से उनकी सही उम्र का पता लगाया जा सकता है। 2017 में, भू-रसायन वैज्ञानिक मेलानी बारबोनी ने आठ ज़िरकॉन रवों का विश्लेषण करके यह देखा कि इनमें मौजूद युरेनियम (Uranium) के विघटन से कितना लेड (Lead) बन चुका है। इस मापन के आधार पर बारबोनी ने निष्कर्ष निकाला कि चंद्रमा 4.51 अरब साल पुराना है।

2019 में, वैज्ञानिकों को चंद्रमा की चट्टानों में टंगस्टन (Tungsten) के हल्के आइसोटोप मिले। उस अध्ययन के मुखिया मैक्सवेल थीमेन्स ने अनुमान लगाया कि ये आइसोटोप तत्व हाफ्नियम (Hafnium) के अब विलुप्त हो चुके आइसोटोप से बने होंगे। और हाफ्नियम का यह आइसोटोप सौर मंडल के शुरू के 6 करोड़ वर्षों में ही उपस्थित था। इस खोज ने बारबोनी के निष्कर्षों को मज़बूती दी। यानी चंद्रमा उन वर्षों में बना होगा।

अब, वैज्ञानिकों ने रुबिडियम(rubidium) के स्ट्रॉन्शियम(strontium) में विघटन को मापने की एक नई विधि से इस निष्कर्ष  की पुष्टि की है। मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के थॉर्स्टन क्लाइन और उनकी टीम ने गणना की कि चंद्रमा लगभग 4.5 अरब साल पहले बना था। ये नतीजे पिछले शोधों को पुख्ता करते हैं और चंद्रमा के जन्म की एक सुसंगत समयरेखा देते हैं।

चंद्रमा बनने के बाद भी यह कोई शांत खगोलीय पिंड नहीं था। आरंभ में इसकी पूरी सतह पिघले हुए लावा के महासागर (lava ocean) से ढंकी थी, जो धीरे-धीरे ठंडी होकर ठोस बन गई। लेकिन शोध बताते हैं कि पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव ने इसकी सतह को दोबारा गर्म कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे बृहस्पति (Jupiter) के असर से उसके चंद्रमा ‘आयो’(Io) पर भीषण ज्वालामुखीय गतिविधि देखी जाती है। एक अन्य सिद्धांत के अनुसार, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (lunar south pole) पर किसी विशाल उल्कापिंड की टक्कर (asteroid impact) ने इसकी सतह को नया रूप दिया होगा। इनमें से किसी एक वज़ह से चंद्रमा की उम्र का सही अनुमान लगाना जटिल हो गया। अपोलो द्वारा लाए गए नमूनों को इस नए दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है। हो सकता है कि वे पिघलकर वापिस ठोस बन गए चंद्रमा के होंगे, मूल रूप में निर्मित चंद्रमा के नहीं।

चीन का चांग’ई-6 मिशन (Chang’e 6 Mission), जो चंद्रमा की दूरस्थ सतह से लगभग 2 किलोग्राम चट्टानें लेकर लौटा है, इस रहस्य पर और प्रकाश डाल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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बृहस्पति के चंद्रमाओं की उत्पत्ति का नया खुलासा

1600 के दशक की शुरुआत में, गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei)  ने पहली बार बृहस्पति (Jupiter) के चार सबसे बड़े चंद्रमाओं – आयो (Io), युरोपा (Europa), गैनीमीड (Ganymede), कैलिस्टो (Callisto) – को देखा था। सदियों बाद भी वैज्ञानिक यह समझने में जुटे हैं कि अरबों साल पहले गैस, धूल और बर्फ की घूमती हुई तश्तरी (protoplanetary disk) से इनका निर्माण कैसे हुआ होगा। 

हाल ही में एक कंप्यूटर सिमुलेशन(computer simulation) के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि परिग्रहीय तश्तरी (circumplanetary disk – CPD) (CPD यानी किसी ग्रह के आसपास पदार्थों की तश्तरी) के भीतरी भाग की छायाओं ने बाहरी हिस्से में ठंडी जगहें निर्मित की होंगी, जिससे चंद्रमाओं के निर्माण (moon formation process) के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनीं। दी प्लैनेटरी साइंस जर्नल (The Planetary Science Journal) में प्रकाशित इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि तश्तरी के तापमान में बदलाव (temperature variations in CPD) ने बृहस्पति के चंद्रमाओं के निर्माण को कैसे प्रभावित किया। वैज्ञानिकों ने बृहस्पति की इस प्राचीन तश्तरी (ancient Jovian disk) का एक 2डी मॉडल तैयार कर उसकी संरचना, घनत्व, तापमान और छायाओं के प्रभावों का विश्लेषण किया है।

सिमुलेशन (simulation results) से पता चला कि डिस्क का भीतरी हिस्सा घना और अपारदर्शी था, जिससे गर्मी अंदर कैद रहती थी और रोशनी बाहर नहीं जा पाती थी। वहीं, बाहरी हिस्सा झीना और पारदर्शी था। जब 2000 केल्विन तापमान (2000 Kelvin temperature) पर तपता हुआ नवजात बृहस्पति (young Jupiter) विकसित हो रहा था तब इस डिस्क का भीतरी भाग फैलने लगा और बाहरी हिस्सों पर लंबी छायाएं पड़ने लगीं। इन छायाओं ने कुछ क्षेत्रों को बेहद ठंडा (cold regions in CPD) बना दिया, और ये ठंडे क्षेत्र (cold zones) लगभग 80,000 साल तक बने रहे। 

इन ठंडी जगहों ने चंद्रमाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन क्षेत्रों में अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन डाईऑक्साइड जैसी गैसें संघनित होकर जम गईं, जिससे युरोपा वगैरह के ठोस हिस्से बने। सबसे ठंडा क्षेत्र बृहस्पति से लगभग 6,29,000 कि.मी. दूर था, जो युरोपा की कक्षा से मेल खाता है।

अगर यह सिद्धांत सही है तो बाहरी चंद्रमाओं – गैनीमीड और कैलिस्टो – की तुलना में भीतरी चंद्रमाओं – आयो और युरोपा – में अधिक मात्रा में वाष्पशील गैसें होनी चाहिए। भावी अंतरिक्ष मिशन, जैसे युरोपियन स्पेस एजेंसी का JUICE और नासा का युरोपा क्लिपर, इन चंद्रमाओं की संरचना का गहराई से अध्ययन कर इस सिद्धांत की जांच करेंगे। 

हालांकि, यह अध्ययन बृहस्पति के चंद्रमाओं (formation of Jupiter’s moons) के निर्माण को समझने के लिए एक मज़बूत मॉडल प्रस्तुत करता है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएं (limitations of the study) भी हैं। यदि चंद्रमाओं का निर्माण अपेक्षा से अधिक समय तक चला था तो छायाओं से हुआ ठंडा प्रभाव (shadow-induced cooling effect) उनके रासायनिक तत्वों को प्रभावित नहीं कर पाया होगा। इसके अलावा, युवा सूर्य (young Sun) की गतिविधियों में हुए बदलावों ने भी बृहस्पति की तश्तरी (Jupiter’s disk) को प्रभावित किया होगा, जिसे यह मॉडल पूरी तरह नहीं दर्शा सकता।

बहरहाल, बृहस्पति के चंद्रमाओं के निर्माण की प्रक्रिया को जानने से पूरे ब्रह्मांड में ग्रहों (planetary formation in the universe) के निर्माण से जुड़े रहस्यों को सुलझाने में मदद मिल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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