महासागर की गहराई में विस्फोट का नज़ारा!

टिल और अनगिनत रहस्यों से भरी महासागर की दुनिया (ocean world) को समझने के लिए शोधकर्ता आए दिन नए-नए प्रयोग आज़माते रहते हैं। लेकिन अप्रैल 2025 में हुई एक बेहद रोमांचक और गहरी समुद्रतल (deep sea dive) यात्रा ने वैज्ञानिकों की पुरानी समझ को बदलकर रख दिया। साइंस पत्रिका में प्रकाशित यह खोज समुद्र तल के निर्माण और उससे जुड़े राज़ खोल देने वाली साबित हुई है।

‘ईस्ट-पैसिफिक राइज़’ (east pacific rise) के अध्ययन के दौरान भू-रसायन शास्त्री एंड्र्यू वोज़्नियाक और उनकी टीम गहरी-समुद्री पनडुब्बी एल्विन में सवार होकर समुद्र की 2500 मीटर गहराई में उतरी। उनका उद्देश्य ‘टीका’ (Tica) नामक हाइड्रोथर्मल क्षेत्र का अध्ययन करना था। अमूमन यह इलाका ट्यूबवर्म, विशाल सीपों, और पेल्ट मछलियों से भरा होता है। लेकिन जब एल्विन टीका के इलाके में पहुंची तो वहां का नज़ारा हैरतअंगेज़ था।

जहां रंग-बिरंगे समुद्री जीव होने थे, वहां कालिख तैर रही थी; ट्यूबवर्म मलबे में लिपटे हुए थे; कुछ दूरी पर चमकीली-पीली रोशनी भी दिखी, जो वास्तव में जलमग्न ज्वालामुखी (immersed volcano) का ताज़ा बहता लावा था। यह मानव इतिहास में पहला मौका था जब वैज्ञानिकों ने मध्य-महासागरीय रिज (पर्वतमाला) में हुए किसी ज्वालामुखी विस्फोट को अपनी आंखों से देखा था।

क्या है मध्यसागरीय रिज?

यह महासागर के भीतर जलमग्न पर्वतों की लंबी कतारें हैं, जो ज़मीनी (टेक्टॉनिक प्लेटों के) खिसकाव के कारण बनती हैं। ये पूरे महासागर में फैली दुनिया की सबसे लंबी पर्वत शृंखलाएं हैं। महासागरीय प्लेटों के दूर जाने, टकराने या रूपांतरण के कारण लावा बाहर की ओर रिसता है, जिससे समुद्र के पेंदे पर नई परत बनती है। इन्हीं प्लेटों की हलचल के कारण समुद्र में पर्वत और गहरी खाइयां (Mid-ocean ridges) बनती हैं।

एक शृंखला मध्य अमरीका के कोस्टा रिका से लगभग 2000 किलोमीटर दूर है। ‘टीका’ ऐसा ही सक्रिय क्षेत्र है, जहां एल्विन (Alvin) टीम ने परीक्षण के दौरान समुद्री ज्वालामुखी का अवलोकन किया।

अलबत्ता, सक्रिय विस्फोट के जोखिम को देखते हुए वैज्ञानिकों ने एल्विन टीम को दोबारा भेजने की बजाय परीक्षण करने के लिए वहां स्थापित अस्थायी कैमरे का इस्तेमाल किया। उन्होंने पाया कि विस्फोट वाले क्षेत्र का तापमान बढ़कर 10 डिग्री सेल्सियस हो चुका था (सामान्य स्थिति में समुद्रतल का तापमान 1 से 2 डिग्री सेल्सियस होता है); विस्फोट के कारण भारी मात्रा में लौह उत्सर्जन (iron emission) हुआ, जो पूरे महासागर के सालाना लौह उत्सर्जन के बराबर था। साथ ही, विस्फोट वाली जगह के ठंडे लावा पर महज़ डेढ़ दिन में समुद्री जीवन भी दोबारा पनपता दिखा। 

इससे पहले भी साल 2024 में, फ्रांस के वैज्ञानिकों की टीम ने दक्षिण-पूर्वी हिन्द महासागरीय रिज (South east Indian Ocean ridge) के क्षेत्रों की हलचल का अध्ययन करने के लिए समुद्र तल में प्रेशर सेंसर और हाइड्रोफोन लगाए थे। वैज्ञानिकों का अंदेशा था कि टेक्टॉनिक प्लेटों (tectonic plates) के खिसकने से उपकरणों में केवल कुछ सेंटीमीटर हलचल ही दर्ज होगी। लेकिन 2025 में जब उपकरणों को निकाला गया तो नतीजे उनके अनुमान से कई गुना ज़्यादा निकले। नेचर पत्रिका में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, केवल 2 हफ्तों में प्लेटें 2 मीटर से अधिक खिसक गई थीं, जिससे समुद्रतल 4 मीटर तक नीचे धंस गया और लगभग 16 करोड़ वर्ग मीटर में ताज़ा लावा फैल गया।

इस खोज के पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि महासागरीय प्लेटें (oceanic plates) धीरे-धीरे और लगातार खिसकती हैं। लेकिन इस अध्ययन से साबित हुआ कि यह खिसकाव अचानक और बड़े झटकों के रूप में होता है। हालांकि, पानी के घर्षण-रोधी स्वभाव के कारण भूकंप जैसे तेज़ झटके पैदा नहीं होते, इसलिए भूकंपीय सेंसर से इस हलचल का पता लगाना लगभग नामुमकिन-सा है। इन अवलोकनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महासागरीय गतिविधियों (oceanic activities) को लेकर अब तक की हमारी समझ में काफी खामियां थीं। बहरहाल, यह खोज महासागर के रासायनिक और कार्बन संतुलन को समझने में मदद करेगी। बेशक, महासागर अनगिनत रहस्यों का भंडार है और भविष्य में विज्ञान समय-समय पर ऐसे ही रोमांचक नतीजे पेश करता रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://images.theconversation.com/files/395742/original/file-20210419-17-14e2cz5.jpg?ixlib=rb-4.1.1&rect=1%2C0%2C794%2C396&q=75&auto=format&w=1336&h=668&fit=crop&dpr=1

https://th-thumbnailer.cdn-si-edu.com/dvpv_K7qiRsinBKxCY1TOCEm1tc=/1026×684/filters:focal(738×415:739×416)/https://tf-cmsv2-smithsonianmag-media.s3.amazonaws.com/filer_public/9e/54/9e54c52b-7417-44e5-8db6-593889a32fc3/beforeeruptionriftia1.jpg

दिल की धड़कन दिमाग के काम को प्रभावित करती है

क प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।

2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।

वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।

न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी।  विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।

इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं। 

ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://img.medscape.com/thumbnail_library/is_171108_heart_brain_800x600.jpg

मैच में कूलिंग ब्रेक और ठंडक का विज्ञान

फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।

अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।

दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।

इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।

तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।

ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।

चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई। 

दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।

ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.reuters.com/graphics/SOCCER-WORLDCUP/zgvolqqoypd/cdn/images/pics/july5-heat.jpg

मस्तिष्क हिसाब रखता है कि नींद कब पूरी हो गई

नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।  

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSA-5-l2V9WemhHOHNHJcN4oBbZNf2-zdF0D8Q0dxCYQMn8Jhf08zEPyPs&s=10

पौधों और कीटों की जुगलबंदी

अपूर्वा आचार्य

ल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।

वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।

युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।

अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।

पेड़पौधों की वंशवृद्धि

वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।

दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?

परागण: कुदरती कूरियर सेवा 

फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।

परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।

देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है। 

चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।

हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।

जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।

फूलदार पौधे और कीटों का सहविकास

लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।

फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।

इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए। 

पौधों और कीटों के बदलाव

विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।

साजसज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।

मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।

चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।

कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।

परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है। 

गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।

यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।

जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।

क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।  

हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।

परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।

वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां

वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।

बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।

परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।

अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://greenacreslandscapeinc.com/wp-content/uploads/2019/05/bee-on-yellow-flower.jpg

आर्टिफिशियल एजेंटों का उपयोग

विवेक मेहता

र्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई, कृत्रिम बुद्धि) एजेंट ऐसी अजैविक कार्यप्रणालियां (system) हैं जिन्हें मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये कार्यप्रणालियां हमारी तरह ही सीखती हैं; अर्थात पर्यावरण के साथ संपर्क, संवाद या अन्य माध्यम से। ये प्रणालियां महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती हैं, और ले भी रही हैं, जो मानवता को प्रभावित करते हैं। समस्याओं को हल करने में दक्ष होने के साथ-साथ ये बदलते हालातों के प्रति अनुकूलनशील भी होती हैं। 

एआई प्रणालियां इतनी स्मार्ट और महत्वपूर्ण होती जा रही हैं कि वर्ष 2024 में दिए गए दो नोबेल पुरस्कार एआई से सम्बंधित थे। रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रोटीन फोल्डिंग (protein folding) की समस्या से सम्बंधित था, जिसमें प्रोटीन के 3डी आकार का पता लगाना एक महत्वपूर्ण समस्या है। बायोमेडिकल अनुसंधान (biomedical research) से जुड़ी इस महत्वपूर्ण समस्या का उद्देश्य बीमारियों से निपटने के लिए नई और बेहतर दवाइयां विकसित करना है। तीन तीन में से दो विजेताओं द्वारा विकसित एआई प्लेटफॉर्म केवल अमीनो एसिड अनुक्रम से प्रोटीन की 3डी जमावट की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम साबित हुआ है। 

हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसी ही प्रणालियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। जैसे जानकारी खोजने के लिए वेब सर्च; या हमारी स्क्रीन पर सुझाई गई कोई मूवी, वीडियो या उत्पाद। यह हमारे वॉयस असिस्टेंट (voice assistant) को दिया गया कोई आदेश हो सकता है। और अधिक उन्नत देशों में, यह एक स्वचालित टैक्सी हो सकती है। जनरेटिव एआई एप्लिकेशन जैसे ChatGPT और DALL-E के उदय के साथ, उपयोगकर्ता हर प्रकार की सामग्री बना रहे हैं।

आज तक, हम में से अधिकांश, जिन्होंने एआई का उपयोग किया है या इसके संभावित लाभों के बारे में सुना है, इससे प्रभावित हुए हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग एआई की संभावित हानियों के प्रति आलोचनात्मक है। इन कई आवाज़ों में से एक है ज्यॉफ्री एवरेस्ट हिंटन, जिन्हें एआई के ‘गॉडफादर’ (Godfather of AI) के रूप में भी जाना जाता है। उनके पथप्रदर्शक कार्य ने इन एआई प्रणालियों की उन्नत क्षमताओं को जन्म दिया। इस योगदान के लिए उन्हें 2024 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने अपनी चिंताओं को सामने रखा: “आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर भारी अनिश्चितता है! …. हो सकता है कि हम पीछे मुड़कर देखें और इसे एक ऐसा मोड़ मानें जब मानवता को यह निर्णय लेना पड़े कि क्या इन चीज़ों को आगे विकसित करना है, या अगर ये विकसित हुईं तो खुद की सुरक्षा के लिए क्या करना है।” उन्होंने और एआई क्षेत्र के कई अग्रणि शोधकर्ताओं ने एआई पर नियंत्रण रखने के लिए परमाणु तकनीक (nuclear technology) की तर्ज पर एक वैश्विक प्रणाली का आह्वान किया है। उनका मानना है कि एआई के मानव नियंत्रण से बाहर होने या इसके दुरुपयोग की संभावना, हालांकि कम है, लेकिन मौजूद है। ऐसा परिदृश्य मानवता के लिए विनाशकारी होगा।

फिर इतिहासकार युवाल नोआ हरारी जैसे लोक-बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने लोगों और सरकारों को एआई के खतरों (Dangers of AI) के बारे में चेतावनी दी है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि एआई हर चीज़ की गति को इतनी तेज़ी से बढ़ा रहा है कि हम नश्वर मनुष्यों के लिए इससे कदम मिलाना नामुमकिन है। उन्होंने एआई की अग्रणी हस्तियों की चिंताओं को साझा किया है।

इसके अलावा वे एक और मुद्दे पर प्रकाश डालते हैं: एआई और असमानता। वे हमें याद दिलाते हैं कि औद्योगिक क्रांति (Industrial revolution), जो ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका आदि जैसे देशों द्वारा शुरू की गई थी, ने हमारे जैसे देशों को उपनिवेश बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी, हम इन देशों के बीच मौजूदा असमानता और उपनिवेशवाद (colonialism) के प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। 

जहां तक एआई का सवाल है, इसकी सफलता को मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारक सीमित करते हैं: कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा (computing power & data)। विभिन्न देशों की कंप्यूटिंग पॉवर की तुलना करने का एक आधार यह है कि प्रत्येक देश के पास कितने सुपरकंप्यूटर हैं। अगर हम दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं को देखें, तो अमेरिका के पास विश्व के कुल सुपरकंप्यूटरों (supercomputer) में से 34.6 प्रतिशत और उसके बाद चीन (12.6 प्रतिशत), जर्मनी (8.0 प्रतिशत), जापान (6.8 प्रतिशत), और भारत (1.2 प्रतिशत) का स्थान है। भारत में डैटा की उपलब्धता के बारे में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की 2019 की रिपोर्ट कहती है, “आज विभिन्न क्षेत्रों में भारी मात्रा में डैटा मौजूद है। हालांकि, यह ज़्यादातर अलग-अलग मोड में मौजूद है और प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया जा रहा है। जब इसका उपयोग होता भी है, तो यह केवल साइलो में होता है। कई बार, क्षेत्रों के बीच डैटा एकीकरण शानदार लाभ प्रदान करता है, जिन्हें नज़रअंदाज कर दिया जाता है।” 

आज के समय में, डैटा को तेल और गैस की तरह एक प्रकार की संपत्ति (wealth) माना जाता है। भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं से सम्बंधित इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित है। निश्चित रूप से, शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में होने के बावजूद, हम कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा के मामले में अन्य देशों से पीछे हैं। इस अंतर को पाटने के वित्तीय प्रभाव बहुत बड़े हैं। हालांकि, ये प्रभाव केवल वित्तीय प्रकृति के नहीं हैं। कुछ बड़ा दांव पर है।

आगे बढ़ने के लिए, मान लें कि दुनिया अचानक अधिक समान हो गई है और किसी भी देश को एआई के संदर्भ में अनुचित लाभ नहीं है। आगे मान लें कि सहयोग और विश्वास, जो फिलहाल दुर्लभ गुण हैं, ने विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच एआई को संचालित करने के लिए किसी प्रकार की नियामक रूपरेखा विकसित कर ली है। अब, इन धारणाओं के तहत, क्या यह मानवता के हित में होगा कि एआई को सामान्य उद्देश्यों के लिए विकसित और प्रयुक्त किया जाए? ऊर्जा खपत (energy consumption) के दृष्टिकोण से, इसका उत्तर सरल ‘हां’ नहीं हो सकता। 

एक उदाहरण लें: BigScience Large Open-science Open-access Multilingual (BLOOM) भाषा मॉडल का। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है जिसे प्राकृतिक व प्रोग्रामिंग भाषा प्रोसेसिंग के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस तरह के मॉडल जनरेटिव एआई चैटबॉट जैसे ChatGPT या Perplexity का आधार हैं। अब, इन मॉडलों को, तैनात होने से पहले, बड़े पैमाने पर डैटा एक्सपोज़र और प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ता है। उदाहरण के लिए, आर्काइव पर उपलब्ध एक शोध पत्र के अनुसार, BLOOM एक 176 अरब पैरामीटर मॉडल है जिसे 46 प्राकृतिक भाषाओं और 13 प्रोग्रामिंग भाषाओं में 1.6 टेराबाइट डैटा पर प्रशिक्षित किया गया था। कुल प्रशिक्षण समय 118 दिन, 5 घंटे और 41 मिनट का अनुमानित था। प्रशिक्षण के लिए उपयोग की गई कुल ऊर्जा की मात्रा 4,33,196 किलोवॉट-घंटे (kWh) थी।

इन संख्याओं को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं। यदि एक पृष्ठ पर 100 किलोबाइट डैटा मानें, तो 1.6 टेराबाइट डैटा लगभग एक करोड़ अस्सी लाख पृष्ठों के बराबर होगा। फिर, यदि हम औसत पुस्तक का आकार 300 पृष्ठ मानें, तो यह लगभग 56,667 पुस्तकों के डैटा के बराबर होगा। ऊर्जा खपत के संदर्भ में, यदि हम भारत में एक घर को लें, जो प्रति माह 200 kWh बिजली की खपत करता है, तो 4,33,196 kWh उस भारतीय घर की 180 वर्षों की बिजली खपत के बराबर होगा या 2165 ऐसे परिवारों की एक महीने की खपत के बराबर होगा। 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि OpenAI (ChatGPT फेम) के मुख्य कार्यकारी सैम ऑल्टमैन ने सेवाओं को चलाने की लागत को ‘आंखें खोल देने वाला’ बताया है। Alphabet और उसकी सहायक कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने एक साक्षात्कार में बताया था, “एआई के लिए अधोसंरचना, जिसमें ऊर्जा शामिल है, एक प्रमुख बाधा हो सकती है।” 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2022 में ऊर्जा से सम्बंधित वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन (global carbon emission) 1.1% बढ़कर 37 अरब मीट्रिक टन से अधिक हो गया। यह उत्सर्जन वृद्धि उस समय हो रही है जब पूरी दुनिया की आबादी किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रही है। यह संभव है कि वर्तमान में इन एआई एजेंटों और प्लेटफार्मों को संचालित करने वाले बड़े डैटा केंद्रों का योगदान इतना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन इस तकनीक की पहुंच और सीमाओं को बढ़ाने की बढ़ती कोशिशें निकट भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। विशेषकर, हमारे जैसे देशों में, जो फिलहाल इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं।

दुनिया के किसी भी चिंतित नागरिक को यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान एआई दौड़ के मूल में शक्तिशाली देशों के बीच विश्वास की कमी और उनकी असुरक्षाएं हैं। साथ में बड़े कॉर्पोरेशन्स की बाजार में हिस्सेदारी और मुनाफे की सतत बढ़ती लालसा भी है। और जब ड्राइविंग सीट पर ये भावनाएं और स्वार्थ विराजमान हैं, तो दुनिया के कभी भी बेहतर बनने की उम्मीद बेमानी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.chitkara.edu.in/blogs/wp-content/uploads/2024/05/Intersection-of-AI.jpg

झगड़े से बचना हो तो गले मिलें

किसी ने खुलकर गले लगाया हो, ज़ोरदार झप्पी दी हो, तो उसके बाद उस पर बरस पड़ना या उससे जमकर झगड़ना मुश्किल होता है। हमारा यह अनुभव रहा है कि सकारात्मक स्पर्श (positive touch) – हाथ थामना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन वगैरह आपसी रिश्तों को मज़बूत करते हैं।

और अब, ऐसा वानरों में भी देखा गया है। देखा गया है कि तनाव की स्थिति में रिश्ते बनाए रखने के लिए, तनाव टालने के लिए बोनोबो और चिम्पैंज़ी (bonobo & chimpanzee) गले मिलते हैं, हाथ पकड़ते हैं। इस बात का पता लगा है दो अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ी समूहों के अवलोकन से।

डरहम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और ज़ाम्बिया के अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ियों के पांच समूह का अध्ययन किया। शोधकर्ता वानरों के बाड़े की बागड़ पास जाकर समय-समय वानरों को पुकारते थे। वानर बाड़े के किनारे आ जाते थे और भोजन का इंतज़ार करते थे। कुछ समय बाद, शोधकर्ता मूंगफली (Peanuts) से भरा एक बर्तन बाड़े में रख देते थे, जिसमें अपर्याप्त मात्रा में मूंगफली होती थी। कम मात्रा में मूंगफली होने के कारण वानरों में उन्हें लेने के लिए होड़ (competition) मच जाती थी। ऐसा करते समय शोधकर्ताओं ने मूंगफली मिलने से पहले, मूंगफली लेते और खाते समय, और खाने के बाद वानरों के आपसी व्यवहार का अवलोकन किया।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो वानर मूंगफली मिलने से कुछ देर पहले एक-दूसरे को गर्मजोशी (हाथ पकड़ना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन आदि) से स्पर्श करते थे, वे आपस में मूंगफली के लिए लड़ने की बजाय उसे मिल-बांटकर (sharing) खाते थे। ऐसा स्वभाव अधिकतर शांतिप्रिय समूहों (peace-loving groups) में देखा गया। यह दर्शाता है कि दोस्ताना स्पर्श (friendly touch) सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करता है और होड़ कम करता है। और तो और, यह तक देखा गया कि कुछ नर चिम्पैंज़ी एक-दूसरे के मुंह में अपनी उंगलियां दे रहे थे। गौरतलब है कि वानर समूहों में मुंह में उंगली देना तनाव या झगड़े की स्थिति में खतरे से खाली नहीं होता – लड़ाई-झगड़े की स्थिति में वानर प्रतिद्वंद्वी की उंगली बुरी तरह काट कर उसे चोटिल कर सकते हैं। लेकिन अपर्याप्त भोजन होने की स्थिति में भी वानरों का मुंह में उंगली डालकर जोखिम उठाना उनके भरोसे और मज़बूत रिश्ते (trust & solid relations) का द्योतक था।

बोनोबो और चिंपैंज़ी हमारे करीबी रिश्तेदार हैं; इस साझा व्यवहार से लगता है कि गर्मजोशी (excitement) जताकर शांति बनाए रखने का व्यवहार हमारे साझा पूर्वजों की देन है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.istockphoto.com/id/145850056/photo/chimpanzees.jpg?s=612×612&w=0&k=20&c=d5oL_YzC8S_nGRxCfYDO2DahPGYrvLTcgsr_ZXPsdu0=

‘शाश्वत’ रसायनों से निपटने के प्रयास

कुछ रसायन बहुत टिकाऊ होते हैं, इतने टिकाऊ कि एक बार बन जाने के बाद वे बरसों तक विघटित (disintegrate) नहीं होते। औषधियों में, लीथियम आयन बैटरियों में, रेफ्रिजरेटरों में और यहां तक कि अस्थमा के इनहेलर तथा अग्निशामक मिश्रणों में भी ऐसे पदार्थों का उपयोग होता है। इन पदार्थों के अणुओं में फ्लोरीन नामक तत्व पाया जाता है। कढ़ाइयों के नॉन-स्टिक लेप और वाटरप्रूफिंग पदार्थों में भी फ्लोरीन होता है।
यह सही है कि फ्लोरीन (Flourine) की उपस्थिति की बदौलत ये पदार्थ टिकाऊ बनते हैं लेकिन समस्या यह है कि इन पदार्थों का विघटन बहुत समय तक नहीं होता। इन सब में पर- या पोली-फ्लोरो अल्काइल पदार्थ (PFAS) होते हैं। कहा जा रहा है कि दूध से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक PFAS (Per and polyfluoroalkyl substances) बिखरे हुए हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। ये शरीर का हॉर्मोन संतुलन बिगाड़ते हैं और लीवर तथा थॉयराइड जैसे अंगों के नुकसान पहुंचाते हैं।
एक और समस्या है – फ्लोरीन को यौगिकों में जोड़ने की प्रक्रिया भी घातक है। इसके लिए फ्लोरस्पार नामक एक खनिज (कैल्शियम फ्लोराइड) लिया जाता है और उसे गंधकाम्ल के साथ तपाकर हाइड्रोजन फ्लोराइड नामक रसायन प्राप्त किया जाता है। हाइड्रोजन फ्लोराइड एक खतरनाक क्षयकारक गैस है जो पानी में घुलकर हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (Hydrochloric acid) बनाती है। फायदा यह होता है कि खनिज (minerals) में उपस्थित फ्लोरीन क्रियाशील अवस्था में आ जाती है। रसायन शास्त्र का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि हाइड्रोजन फ्लोराइड (Hydrogen flouride) कितना क्षयकारक पदार्थ है।
यही कारण है कि फ्लोरीन की इस टिकाऊ उपयोगिता के बावजूद रसायन शास्त्री लोग इससे निपटने की जद्दोजहद में सदियों से लगे हैं। इनमें से एक हैं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की वेरोनिक गवर्नर।
गवर्नर फ्लोरीन की समस्या से सिरे से निपटना चाहती हैं। वे कहती हैं कि कैल्शियम फ्लोराइड पानी या अन्य कार्बनिक विलायकों (organic solvents) में घुलनशील नहीं है; इसलिए इसका उपयोग सीधे रासायनिक अभिक्रियाओं में नहीं हो सकता। फिर 2023 में उनकी प्रयोगशाला के रसायनज्ञों ने फ्लोरस्पार (flourspar) से फ्लोरीन प्राप्त करने की एक ऐसी विधि विकसित की जिसमें हाइड्रोजन फ्लोराइड बनाने की ज़रूरत नहीं होती। उन्होंने देखा कि यदि फ्लोरस्पार और पोटेशियम फॉस्फेट को एक साथ पीसा जाए तो इतना घर्षण पैदा होता है कि फ्लोरीन मुक्त हो जाती है। अब एक स्टार्ट-अप इस तरीके को व्यावसायिक स्तर पर ले जा रहा है। गवर्नर बताती हैं कि वे इस विधि से लिपिटॉर (lipitor) नामक औषधि (कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा जिसमें फ्लोरीन होता है) का निर्माण कर पा रही हैं।
इसके अलावा, उनके दल ने इस यांत्रिक विधि का उपयोग PFAS को तोड़कर वापिस कच्चा माल प्राप्त करने के लिए आज़माया है। PFAS को पोटेशियम फॉस्फेट लवण के साथ पीसकर वे लोग पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट प्राप्त करने में सफल रहे हैं। ये दो फ्लोराइड लवण (पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट) हैं जिनका उपयोग उद्योगों में बहुतायत से होता है। लेकिन यह काम आगे तो तब बढ़ेगा जब सारे लोग यह समझ पाएं कि यह तरीका हाइड्रोजन फ्लोराइड मार्ग का एक अच्छा विकल्प है क्योंकि यह विकल्प सुरक्षित और सस्ता भी है।
अन्य रसायनज्ञ पूरी प्रक्रिया को चक्रीय बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं – ताकि फ्लोरो-पोलीमर्स (flourine polymers) और अन्य फ्लोरीन युक्त पदार्थों को फिर से उपयोगी शुरुआती पदार्थों में बदला जा सके। जैसे इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के एक रसायन शास्त्री मार्क क्रिमिन ने ऐसा एक चक्र विकसित किया है। संयोगवश हाथ लगे इस तरीके में कार्बन-फ्लोरीन बंध को तोड़ा जा सकता है।
क्रिमिन ने ऐसी अभिक्रियाएं विकसित कर ली हैं जिनकी मदद से फ्लोरो-यौगिकों को इस तरह बदला जा सकता है कि उनका उपयोग अन्य नवीन संश्लेषणों में किया जा सके। पहली अभिक्रिया वह है जिसे क्रिमिन ट्रांसफर फ्लोरिनेशन (transfer flourination) कहते हैं। इसमें रेफ्रिजरेटरों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यौगिकों (HFC) की अभिक्रिया पोटेशियम क्षार से करवाकर पोटेशियम फ्लोराइड प्राप्त कर लिया जाता है। यह अन्य कई पदार्थों के निर्माण में उपयोगी है।
क्रिमिन द्वारा विकसित दूसरी प्रक्रिया (जिसे एचएफ शटलिंग कहते हैं) में एक अणु (जैसे पोलीविनाइलीडीन फ्लोराइड, PVDF) में से हाइड्रोजन व फ्लोरीन के परमाणु निकाले जाते हैं और एक उत्प्रेरक की मदद से इन्हें किसी अन्य अणु में जोड़कर फ्लोरोअल्काइन बनाया जाता है जो कई रसायनों के निर्माण का कच्चा माल है। PVDF का उपयोग लीथियम आयन बैटरियों में अस्तर के रूप में किया जाता है। क्रिमिन का विचार है कि पुरानी लीथियम आयन बैटरियों (lithium ion battery) से इसे प्राप्त करके फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है। अलबत्ता, अभी ये प्रक्रियाएं प्रयोगशाला के स्तर पर हुई हैं और वास्तविक परिस्थितियों में इन्हें आज़माकर देखना होगा। इस दिशा में काम चल रहा है।
एक प्रमुख सवाल यह होगा कि उद्योगों को कैसे राजी किया जाए कि वे इसमें निवेश करें। इस संदर्भ में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक नज़ीर है। ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) यौगिकों पर प्रतिबंध लगाने के लिए 1987 में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल) (montreal protocol) अपनाई गई थी और उसके परिणाम सकारात्मक रहे हैं। आगे चलकर इस संधि में हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC) को भी शामिल किया गया था।
फिलहाल PFAS पर रोक लगाने सम्बंधी नियम-कायदे अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। इनमें से कुछ रसायनों (जैसे पर-फ्लोरो-ऑक्टेनोइक एसिड – PFOA और पर-फ्लोरो-ऑक्टेन सल्फोनेट – PFOS) पर युरोप व यूएस में प्रतिबंध है। इनका उपयोग नॉन-स्टिक लेपन (non-stick coating) और ऊष्मा-सह चीज़ों में किया जाता है। इनके कई हानिकारक असर प्रमाणित हुए हैं। एक तो, ये पर्यावरण में टिके रहते हैं। और दूसरा, इनका सम्बंध कैंसर तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.licdn.com/dms/image/v2/D5612AQHWgJvKra3iTw/article-cover_image-shrink_600_2000/B56ZfTaVBSGQAQ-/0/1751598585417?e=2147483647&v=beta&t=SIW-clJFe6B2B2OKBIhBXCIoaFHgSy-ApvleWfr0JiY

ज़ेब्राफिश हमारी तरह सोती है

क हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।

हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।

यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।

सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।

गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।

इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।

हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।

(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.popsci.com/wp-content/uploads/2019/07/12/VS67QYVGDYR7RJ2EVB2VHECT2I.jpg?quality=85&w=1200

अलविदा डॉ. एम.पी. परमेश्वरन

न विज्ञान के क्षेत्र में एमपी के नाम से लोकप्रिय लेखक, विचारक, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट एम. पी. परमेश्वरन (M.P. Parmeswaran) अब हमारे बीच नहीं रहे। 11 अगस्त 2026 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए। परमाणु वैज्ञानिक (nuclear scientist) के रूप में प्रशिक्षित परमेश्वरन ने विज्ञान की प्रयोगशालाओं में विज्ञान करने की बजाय समाज के बीच विज्ञान पहुंचाने और वैज्ञानिक चेतना जगाने की राह चुनी। वे केरल शास्त्र साहित्य परिषद के संस्थापकों में से थे।

एम. पी. परमेश्वरन का जन्म 18 जनवरी 1935 को केरल में हुआ था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मॉस्को से परमाणु इंजीनियंरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की और फिर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre) में वैज्ञानिक रहे। उन्होंने मलयालम भाषा के लिए की-बोर्ड विकसित करने में भूमिका निभाई, जो आगे चलकर इनस्क्रिप्ट (INSCRIPT) की-बोर्ड (key board) का आधार बना।

1975 में उन्होंने अपना वैज्ञानिक करियर छोड़कर केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) के साथ काम करना चुना। यह निर्णय उनके जीवन की ही नहीं बल्कि समस्त भारत के जन-विज्ञान आंदोलन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। उन्होंने 1987 में देश भर के जन विज्ञान संगठनों के साथ मिलकर भारत जन विज्ञान जत्था की नींव रखी। आगे चलकर उन्होंने ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (All India Peoples Science Network) के निर्माण में भूमिका निभाई जिसके माध्यम से देश भर के जन विज्ञान में सक्रिय संगठन एक साथ आए।

उन्होंने विज्ञान और विकास के सम्बंधों पर मलयालम और अंग्रेज़ी में लगातार लिखा और चर्चाएं की। उनका आग्रह था कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता; उसे मनुष्य, प्रकृति, समता और स्थानीय समुदायों की ज़रूरतों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

परमेश्वरन के लिए विज्ञान मात्र एक विषय नहीं था और उनके लिए विज्ञान का प्रसार केवल वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना नहीं था। वे विज्ञान को समाज को समझने, सवाल उठाने और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का साधन और माध्यम मानते थे। केरल शास्त्र साहित्य परिषद (Science writers’ forum of Kerela) के ज़रिए उन्होंने विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण और विकास के सवालों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परमेश्वरन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने विज्ञान को केवल जानने और जिज्ञासा को शांत करने का साधन नहीं, बल्कि समाज को बदलने और लोकतांत्रिक (democratic) बनाने की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वैचारिक विरासत हमारे साथ है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://images.indianexpress.com/2026/08/Nuclear-scientist-Parameswaran.jpg