पेरू स्थित अमेज़न जंगल (Amazon rainforest) के पंगुआना जैविक अनुसंधान केंद्र (Panguana Biological Research Station) ने अपने सभी फील्ड अध्ययन बंद कर दिए हैं। यह फैसला इलाके में सक्रिय अवैध सोना खनन करने वालों से मिल रही धमकियों के कारण सुरक्षा की दृष्टि से लिया गया। 1968 में स्थापित यह केंद्र पेरू का सबसे पुराना पर्यावरण शोध संस्थान है। यहां दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षावन, वन्यजीवों और जैव विविधता पर अध्ययन करते रहे हैं। यह केंद्र युयापिचिस नदी के किनारे बने 1600 हैक्टर के एक संरक्षित क्षेत्र (protected forest area) में स्थित है और अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है।
हाल के महीनों में अवैध खनन वाले लोग संरक्षित क्षेत्र के बहुत करीब पहुंच गए हैं। इन लोगों ने कर्मचारियों को जान से मारने की धमकियां दीं और कई बार संरक्षण क्षेत्र में घुसने की कोशिश भी की है। कुछ मौकों पर हथियारबंद टकराव (armed conflict) और गोलियां चलने की घटनाएं हुईं, जिससे वैज्ञानिकों के लिए सुरक्षित रहकर काम करना असंभव हो गया है।
आम तौर पर इस शोध केंद्र में लगभग 30 वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी काम करते थे। पिछले कई वर्षों में यहां किए गए शोध से 300 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन (scientific publications) सामने आए हैं, जिनमें कीटों, पौधों और वर्षावन की पारिस्थितिकी (rainforest ecology) पर महत्वपूर्ण काम शामिल है। लंबे समय से जुटाए गए आंकड़ों से यह समझने में मदद मिली है कि उष्णकटिबंधीय जंगल पर्यावरणीय बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।
पंगुआना शोध केंद्र में पेरू के चार जलवायु निगरानी टावरों में से एक मौजूद है। ये टावर लगातार धरती और वातावरण के बीच कार्बन, नमी और ऊर्जा के आदान-प्रदान (carbon flux monitoring) को मापते हैं। यह जानकारी जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए बेहद ज़रूरी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार टावर बताता है कि एंडीज़ पर्वत (Andes mountains) कैसे अमेज़न के मौसम को प्रभावित करते हैं।
हालांकि टावर में लगे स्वचालित उपकरण दूर से अब भी डैटा (remote sensing data) इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से वैज्ञानिकों और वालंटियर्स को वहां जाने से मना कर दिया गया है। स्टेशन प्रबंधन को डर है कि पहले की गई शिकायतों के बदले में खनन करने वाले लोग इस टावर को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पेरू में अवैध खनन एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुका है। अमेज़न कंज़र्वेशन (Amazon Conservation) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के बाद से खनन गतिविधियों ने 225 से ज़्यादा नदियों और झीलों को नुकसान पहुंचाया, करीब 1.4 लाख हैक्टर जंगल नष्ट किए, और कई आदिवासी समुदायों (indigenous communities) को प्रभावित किया है। यह काम अक्सर उन दूर-दराज़ इलाकों में फैलता है, जहां सरकार की मौजूदगी बहुत कम होती है। स्थानीय अभियोजक भी मानते हैं कि कमज़ोर निगरानी और कार्रवाई की कमी के कारण अवैध खनन लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में पुलिस और सेना ने कुछ मशीनें नष्ट कीं, लेकिन इलाके में तनाव अब भी बना हुआ है।
फिलहाल क्षेत्रीय प्रशासन ने सीमित गश्त (security patrols) का सुझाव दिया है, लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर मज़बूत सुरक्षा नहीं मिली, तो अमेज़न का यह महत्वपूर्ण वैज्ञानिक केंद्र लंबे समय तक बंद ही रह सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z5w55jt/full/_20260114_on_peru_mining_lede.jpg
ऑक्टोपस आठ भुजाओं वाला विचित्र जंतु है। मज़ेदार बात यह है कि नर अपने शुक्राणुओं को मादा के शरीर में पहुंचाने के लिए इन्हीं में से एक भुजा का उपयोग करते हैं। हेक्टोस्टायलस (hectocotylus) नामक इस भुजा में इस काम के लिए विशेष परिवर्तन हुए हैं। एक नए प्रीप्रिंट शोध पत्र में बताया गया है कि हेक्टोस्टायलस के चम्मचनुमा अग्र भाग पर रसायनग्राही (chemoreceptors) होते हैं, जो प्रमुख मादा हॉरमोन प्रोजेस्टरोन (progesterone hormone) को भांप सकते हैं।
हारवर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) के तंत्रिका जीव वैज्ञानिक पाब्लो विलार ने प्रयोगशाला में एक ऑक्टोपस (Octopus bimaculoides) को संभोग के लिए प्रेरित किया। ये जंतु बंदी अवस्था में काफी आक्रामक हो सकते हैं। इसलिए विलार ने नर व मादा ऑक्टोपस को एक्वेरियम के दो अलग-अलग कक्षों में रखा जिनके बीच एक अपारदर्शी दीवार थी और दीवार में छिद्र थे ताकि वे आपस में एक-दूसरे की भुजाओं को छूकर जान-पहचान कर सकें।
आश्चर्य कि बात थी एक-दूसरे को न देख पाने के बावजूद नर ने अपने हेक्टोस्टायलस को छिद्र के पार ले जाकर मादा से संभोग कर लिया। वैसे तो हेक्टोस्टायलस बाकी सात भुजाओं जैसा होता है लेकिन इसके आधार से लेकर सिरे तक एक खांचा होता है। जब यह अंग मादा के अंडाशय तक जाने वाले किसी मार्ग (डिंबवाहिनी) को पहचान लेता है तो वह ढेर सारे शुक्राणु (sperm transfer) उसमें छोड़ देता है। विलार ने चार जोड़ियों में ऐसा अंधा संभोग देखा।
तो विलार और उनके मार्गदर्शक निक बेलोनो (Nick Bellono) के मन में विचार आया कि क्या हेक्टोस्टायलस रसायनों की मदद से डिंबवाहिनी को भांपता है। बेलोनो और उनके साथी पहले ऑक्टोपस के चूषकों में ऐसे रसायन-ग्राही देख चुके थे। ये ग्राही किसी सतह उपस्थित विभिन्न अणुओं को भांप सकते हैं। सामान्य भुजाओं में ये ग्राही भोजन ढूंढने या हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानने में मददगार होते हैं। लेकिन हेक्टोस्टायलस में इन ग्राहियों का काम स्पष्ट नहीं था। अनुमान था कि इनका उपयोग संभोग में होता होगा।
इस विचार को परखने के लिए विलार ने बंदी ऑक्टोपसों के बीच की दीवार के छिद्रों पर छोटे-छोटे पात्रों में अलग-अलग रसायन भर दिए। देखा गया कि नर ऑक्टोपस ने अपने हेक्टोस्टायलस से उस छिद्र को ज़्यादा देर तक टटोला जिसके पात्र में मादा यौन हॉरमोन (female sex hormone) थे।
पता चला कि हेक्टोस्टायलस पर रासायनिक ग्राहियों की संख्या (chemoreceptor density) अन्य भुजाओं से तीन गुना अधिक थी। यह भी पाया गया कि सामान्यत: सेफेलोपॉड जंतुओं (cephalopods) में हेक्टोस्टायलस में रसायन संवेदना काफी अधिक होती है। ऑक्टोपस की दो अन्य प्रजातियों तथा स्क्विड (squid species) में काटकर अलग किए गए हेक्टोस्टायलस को प्रोजेस्टरोन के संपर्क में रखने पर उसमें काफी हरकत होती रही।
यह सही है कि ऑक्टोपस का दिमाग बड़ा होता है लेकिन उसकी भुजाएं अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से करती हैं। सवाल है कि ऑक्टोपस का तंत्रिका तंत्र (nervous system) डिंबवाहिनी की खोज का नियमन कैसे करता है। एक संभावना है कि हेक्टोस्टायलस की तंत्रिकाएं प्रोजेस्टरोन के संकेत की तीव्रता (hormone signal strength) भांपते हुए आगे बढ़ने के निर्देश देती हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zuzoket/full/_20251119_on_octopus_mating.jpg
भारत की बढ़ती आबादी के लिए आवास और बुनियादी निर्माण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए देश में भवन निर्माण (construction sector) और निर्माण सामग्री तेज़ी से बढ़ रहे हैं। लेकिन यह बढ़त ऊर्जा खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emissions) में भी काफी योगदान देती है। भवन-निर्माणों के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार ने ऊर्जा दक्षता और टिकाऊपन/वहनीयता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए हैं।
सरकार की प्रमुख पहलों में से एक है ऊर्जा संरक्षण टिकाऊ भवन संहिता (Energy Conservation Sustainable Building Code, ECSBC)। इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा विकसित किया गया है और विद्युत मंत्रालय (MoP) द्वारा लागू किया गया है। ECSBC में नए वाणिज्यिक और आवासीय भवनों के लिए न्यूनतम ऊर्जा दक्षता मानक निर्धारित हैं, और मूलत: इन्हें ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) के आधार पर विकसित किया गया है। इसमें ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और भवन के लिए अन्य हरित भवन आवश्यकताओं के मानदंड/मानक भी शामिल हैं। ECSBC के अलावा, कई निजी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समर्थित स्वैच्छिक हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम्स भी व्यापक रूप से लागू हैं।
ये हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम ऊर्जा और जल दक्षता, टिकाऊ/वहनीय निर्माण सामग्री का उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और भीतरी पर्यावरण गुणवत्ता सहित कई टिकाऊ/वहनीय मानकों के आधार पर परियोजनाओं का आकलन और प्रमाणन करते हैं। हालांकि ये रेटिंग सिस्टम्स आवासीय और वाणिज्यिक दोनों तरह के भवनों के लिए हैं, लेकिन इनका उपयोग अभी भी सीमित है – विशेष रूप से आवासीय क्षेत्र में। हालांकि न केवल केंद्र स्तर पर बल्कि नगर पालिकाओं के स्तर पर भी इन नीतियों को समर्थन हासिल है, लेकिन भारत की कुल भवन निर्माण/सामग्री का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही हरित प्रमाणित है। हरित भवन निर्माण अपनाने में एक प्रमुख बाधा है हरित इमारतों के जीवनपर्यंत मिलने वाले लाभों के बारे में सीमित जागरूकता और समझ। पूरी जानकारी का अभाव उपभोक्ताओं की सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है।
सूचना हस्तक्षेप
हमारा मानना है कि यदि उपभोक्ताओं को हरित प्रमाणन (green certification) के लाभ बताने वाली सही और प्रासंगिक जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी तो हरित भवनों को अपनाने/बनाने में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
इस कमी को दूर करने के लिए हमारा सुझाव है कि मानकीकृत वहनीयता दर्शाने वाला एक प्रारूप (standard sustainability disclosure) बनाया जाए, जिसका उपयोग निर्माता अपनी परियोजनाओं का प्रचार-प्रसार करते समय करें। यह प्रारूप संभावित खरीदारों को भवन के पर्यावरणीय फायदों और टिकाऊ/वहनीय विशेषताओं के बारे में बताने का एक स्पष्ट, विश्वसनीय और तुलनीय तरीका होगा। ऊर्जा दक्षता, जल खपत, प्रयुक्त सामग्री और प्रमाणन जैसी महत्वपूर्ण जानकारी को सुलभ और समझने योग्य बनाकर यह प्रारूप रियल एस्टेट बाज़ार में पारदर्शिता (real estate transparency) बढ़ा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपभोक्ताओं को विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगा और हरित भवनों के लाभों के बारे में उनकी जागरूकता बढ़ाएगा। जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ेगी, पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार निर्माण की मांग भी बढ़ सकती है, जिससे बाज़ार भी टिकाऊ/वहनीय प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित होगा। भारत के तेज़ी से हो रहे शहरीकरण (urbanization in India) के मद्देनज़र, ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2047 तक 50 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहेगी। यह तरीका हरित भवन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने और संसाधन-कुशल, कम कार्बन वाले शहरी भवन निर्माण को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हरित भवन रेटिंग प्रणालियां
पिछले दो दशकों में, भारत में हरित भवन प्रमाणन की इकोसिस्टम (green building ecosystem) अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा शुरू की गई भारतीय हरित भवन परिषद (IGBC) पहली और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रणाली थी। इसके अलावा अन्य प्रमुख रेटिंग प्रणालियां हैं – दी एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (TERI) की GRIHA, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) की GEM और यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की LEED। ये रेटिंग प्रणालियां विभिन्न प्रकार की इमारतों के लिए दिशानिर्देश देती हैं, जिनमें व्यक्तिगत भवनों से लेकर भवन परिसरों, आस-पड़ोस और यहां तक कि शहर-स्तरीय विकास परियोजनाएं भी शामिल हैं।
परियोजनाओं को हासिल टिकाऊ स्कोर के आधार पर प्रमाण-पत्र मिलता है। हर रेटिंग सिस्टम की रेटिंग वैधता अवधि अलग है; आम तौर पर किसी परियोजना को हासिल रेटिंग 3 से 5 वर्षों तक वैध रहती है। वैधता अवधि समाप्त होने के बाद परियोजनाओं को पुन: प्रमाणन लेना पड़ता है, जो पहले से विद्यमान इमारतों के लिए अलग होता है। पुन: प्रमाणन के समय रेटिंग बदल सकती है। इसमें रहवास-उपरांत ऑडिट के आधार पर परियोजना का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि किसी परियोजना की वहनीयता की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।
समस्त रेटिंग प्रणालियां ऊर्जा दक्षता, जल दक्षता, निर्माण सामग्री एवं संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन आदि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कुछ अनिवार्य और कुछ वैकल्पिक मानदंड निर्धारित करती हैं। इनमें से कुछ रेटिंग प्रणालियां कुछ मानदंडों के अनुपालन के लिए ECBC के उपयोग की भी अनुशंसा करती हैं। गौरतलब है कि हर रेटिंग सिस्टम का समान वहनीय उपायों के लिए वेटेज और स्कोर करने का तरीका अलग होता है। इसलिए, किसी भवन को मिली हरित रेटिंग बस यह बताती है कि वह पारंपरिक/सामान्य भवनों से बेहतर है। अत: यह संभव है कि हरित रेटिंग प्राप्त भवन, हरित भवन का प्रमाणन हासिल करने के लिए निर्धारित पर्याप्त हरित विशेषताओं को पूरा न करता हो।
हरित भवन पदचिह्न
भवन की हरित भवन पदचिह्न की नवीनतम जानकारी हरित भवन रेटिंग सिस्टम के पोर्टल (green building portal) पर डाली जाती है, और उद्योग विशेषज्ञों द्वारा भवन स्टॉक संख्या का अनुमान भी लगाया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर, देश में कुल भवन निर्माणों में से 5 प्रतिशत भवन IGBC प्रमाणित हैं, 0.4 प्रतिशत GRIHA प्रमाणित भवन हैं और 0.04 प्रतिशत भवन LEED प्रमाणित हैं। यह दर्शाता है कि भारत में हरित भवनों का उपयोग/निर्माण अभी भी काफी कम है।
मानक वहनीयता प्रारूप
हरित विशेषताओं के प्रचार-प्रसार में सुधार और जागरूकता बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है कि भवन विशेषताओं की रिपोर्टिंग का एक मानकीकृत प्रारूप (standard reporting format) बनाया जाए। इस प्रारूप से उपभोक्ता हरित रेटेड बनाम गैर-हरित रेटेड भवन की वहनीयता लागत की तुलना कर पाएंगे।
हरित बिल्डिंग काउंसिल भवन की हरित या वहनीय विशेषताओं को उजागर करने के लिए एक मानकीकृत प्रारूप बनाने में मदद कर सकती है। मानक प्रारूप दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा कर सकता है। एक तो यह किसी भवन की विशिष्ट वहनीय/टिकाऊ विशेषताओं के बारे में उपभोक्ताओं की समझ में सुधार कर सकता है। दूसरा यह तकनीकी रेटिंग को खरीदारों और उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट और सुलभ जानकारी के रूप में पेश कर सकता है, और सोचे-समझे निर्णय लेने में मदद कर सकता है।
वर्तमान में, IGBC, GRIHA, LEED और GEM जैसी विभिन्न ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन प्रणालियां हैं, जो वहनीयता का आकलन करने के लिए अलग-अलग वेटेज और स्कोर पद्धतियों का उपयोग करती हैं। मसलन, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण या सामग्री के पुन: उपयोग जैसे मापदंड पर हर रेटिंग प्रणाली का ज़ोर अलग है। इसके अलावा, दक्षता लाभ या वित्तीय लाभ का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाने वाली विधियां विभिन्न कारकों के आधार पर भी अलग-अलग होती हैं, जैसे परियोजना के चरण (डिज़ाइन बनाम रहवास-उपरांत), आधारभूत तुलना के लिए प्रयुक्त मान्यताओं और कार्यान्वित की जाने वाली तकनीकों या प्रथाओं के प्रकार के आधार पर।
मापदंडों और प्रचार प्रारूपों, दोनों में यह भिन्नता उपभोक्ताओं के लिए परियोजनाओं को दिए गए प्रमाणपत्र को पूरी तरह से समझना मुश्किल बना देती है। एक सुसंगत पैमाने या तुलना बिंदु की अनुपस्थिति में भवनों की हरित विशेषताओं की तुलना करना भ्रामक हो जाता है और अक्सर गलत समझ और निर्णय लेने में असमर्थता का कारण बनता है। इसलिए शब्दावली, मानकों को सुसंगत बनाने वाला मानकीकृत प्रारूप जानकारी को सरल बना सकता है, तुलना को आसान कर सकता है और हरित भवन के वादों पर उपभोक्ता का विश्वास बढ़ा सकता है।
टिकाऊ मानदंड
हरित रेटिंग सिस्टम द्वारा परिभाषित टिकाऊ मानदंडों का हमने विश्लेषण किया। इस आधार पर हम कुछ ऐसे चुनिंदा मानदंड सुझा रहे हैं जो उपभोक्ताओं को सोचे-समझे और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार विकल्प चुनने में सक्षम बना सकते हैं। यही मानदंड मानकीकृत रिपोर्टिंग के प्रारूप भी बन सकते हैं।
1. दिनांक और वैधता के साथ हरित रेटिंग (rating validity): रेटिंग जारी करने की तिथि और वैधता की जानकारी उपभोक्ता के लिए अहम है। यह जानकारी उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाती है कि प्रमाणपत्र हालिया है और यह भवन टिकाऊ है।
2. भवन के जीवनकाल में होने वाली बचत का अनुमानित आंकड़ा (lifecycle savings): भवन और इकाई दोनों स्तर पर ऊर्जा, जल और अपशिष्ट प्रबंधनों से होने वाली अनुमानित आर्थिक बचत दिखाई जा सकती है।
भवन स्तर पर – नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, पानी की बचत और उसके पुनर्चक्रण एवं पुनर्उपयोग, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिए लगाई गई प्रणालियां बताई जा सकती हैं।
व्यक्तिगत इकाई स्तर पर – कुशल भवन आवरण बनाकर, नलों में पानी प्रवाह कम करने वाले उपाय लगाकर किए गए ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानकारी देना। मौजूदा विभिन्न उपकरणों/सॉफ्टवेयर से हरित भवन की लागत का आकलन दर्शाया जा सकता है।
3. ऊर्जा दक्षता का मापन:
बिजली बचत की मात्रा द्वारा
सौर, SWH प्रणालियों द्वारा
कुशल उपकरणों द्वारा
नवीकरणीय प्रौद्योगिकियां अपनाकर और कुशल उपकरण लगाकर बिजली बिल कम आएगा।
4. तापीय आराम का मापन:
(एसी के साथ और बिना बिताए आरामदायक घंटे/वर्ष
दीवार और खिड़की की सामग्री के आधार पर
HVAC दक्षता (U value, WWR, RETV, EER) के आधार पर
एसी के बिना यदि भवन के भीतर आरामदायक वक्त बीतता है तो इससे बिजली बचेगी। दिए गए अंक उपभोक्ताओं को यह आकलन करने में मदद कर सकते हैं कि गर्मी से राहत पाने के लिए क्या वास्तव में एसी में ज़रूरी है?
5. ऊर्जा प्रदर्शन सूचकांक (Energy Performance Index – EPI): यह विभिन्न परियोजनाओं में ऊर्जा खपत की तुलना करने में मदद करता है – कम EPI यानी उच्च दक्षता।
6. जल दक्षता का मापन (water efficiency metrics)
प्रतिशत पानी की बचत
वर्षा जल संचयन की मात्रा
रीसायकल पानी की मात्रा और उसका उपयोग
यह मीठे पानी की बचत करेगा, स्थिरता को बढ़ाएगा और पानी का बिल कम करेगा
7. अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियां (on-site waste management): ऑन-साइट अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों और उनकी दक्षता के बारे में जानकारी देना।
8. सार्वजनिक परिवहन से निकटता (public transport accessibility): नज़दीकी सार्वजनिक परिवहन सेवा तक पैदल जाने में लगने वाला समय – उपभोक्ताओं को रोज़ाना आने-जाने में लगने वाले समय की योजना बनाने में मददगार होगा।
9. सबकी पहुंच (universal accessibility): बुज़ुर्गों और विकलांग व्यक्तियों सहित सभी के लिए आसान पहुंच।
वर्तमान में भी कुछ हरित भवन सलाहकार और डेवलपर अपने-अपने प्रारूपों के ज़रिए (खासकर विपणन या प्रमाणन के दौरान) परियोजना की वहनीयता सम्बंधी विशेषताएं बताते हैं। हालांकि ये प्रयास पारदर्शिता के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता दर्शाते हैं लेकिन प्रारूपों में एकरूपता के अभाव के चलते उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न परियोजनाओं के लाभों की तुलना करना और मूल्यांकन एक चुनौती बन जाता है।
आगे की राह
एक मानक प्रारूप से हरित और टिकाऊ भवन विशेषताओं के बारे में जागरूकता लाने में काफी मदद मिल सकती है, और प्रमाणित हरित भवनों को खरीदने/बनाने में तेज़ी आ सकती है। यह प्रारूप उपभोक्ताओं को पारंपरिक भवनों की तुलना में टिकाऊ भवनों के लाभों के बारे में विश्वसनीय, तुलनीय और समझने में आसान जानकारी दे सकता है। इसका उपयोग रियल एस्टेट परियोजनाओं के विपणन(real estate marketing), बिक्री और प्रचार सामग्री में किया जा सकता है।
यह प्रारूप भारतीय राष्ट्रीय भवन परिषद (National Building Council) द्वारा गठित एक अंतर-परिषद समिति द्वारा तैयार करके लागू किया जा सकता है। इस समिति में केंद्र सरकार, प्रमुख हरित भवन परिषद और रियल एस्टेट हितधारक और राज्य RERA प्राधिकरणों (Real Estate Regulatory Authority) के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।
प्रस्तावित समिति को ये प्रमुख नीतिगत कार्य सौंपे जा सकते हैं:
1. विभिन्न हरित भवन रेटिंग सिस्टम के मुख्य टिकाऊ मापदंडों का समन्वय करके एकरूप प्रारूप बनाना और अधिसूचित करना।
2. सभी मान्यता प्राप्त ढांचों में सामंजस्य बनाना, जिससे एकरूपता और तुलनीयता सुनिश्चित हो।
3. कार्यान्वयन दिशानिर्देश और अनुपालन प्रोटोकॉल स्थापित करना, जिसमें राज्य-स्तरीय RERA जैसे मौजूदा प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण शामिल है, ताकि इसे अपनाना आसान हो।
4. वहनीयता के दावों को सत्यापित करने व गलतबयानी से सम्बंधित शिकायतों के समाधान के लिए एक निगरानी एवं शिकायत निवारण तंत्र बनाना।
5. प्रारूप की प्रभावशीलता की समीक्षा करने और इसके बेहतर होते वहनीयता मानकों, नियामकों और उपभोक्ता अपेक्षाओं के अनुरूप अपडेट करने के लिए सतत परामर्श करना।
प्रमुख हितधारकों के बीच समन्वय को बढ़ावा देकर समिति उपभोक्ता और डेवलपर्स के बीच मौजूदा सूचना अंतर को पाट सकती है। भारत तेज़ी से शहरीकृत हो रहा है। ऐसे प्रयास अधिक टिकाऊ निर्मित परिवेश (sustainable urban development) बनाने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://img.etimg.com/thumb/width-1200,height-900,imgsize-28874,resizemode-75,msid-111003760/industry/services/property-/-cstruction/green-buildings-market-in-india-to-reach-39-billion-by-2025.jpg
अंतरिक्ष की गुरुत्वाकर्षण रहित दुनिया में विषाणु अर्थात वायरस (virus) और जीवाणु यानी बैक्टीरिया (bacteria) की लड़ाई कैसे बदल जाती है?
इस सवाल पर थोड़ा प्रकाश डालता है ओपन-एक्सेस जर्नल प्लॉस बायोलॉजी (PLOS Biology) में प्रकाशित हालिया अध्ययन। इस प्रयोग में जब वैज्ञानिकों ने एशरीशिया कोली (ई. कोली) बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस (फेज) को अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) (International Space Station – ISS) पर भेजा, तो इन सूक्ष्मजीवों ने वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा ये पृथ्वी पर करते हैं। माइक्रोग्रैविटी (नगण्य गुरुत्वाकर्षण) में संक्रमण तो हुआ, लेकिन समय के साथ वायरस और बैक्टीरिया दोनों ही अलग-अलग तरीके से विकसित हुए। जेनेटिक बदलाव आए, जिनसे वायरस का बैक्टीरिया से जुड़ने का तरीका बदल गया और बैक्टीरिया ने खुद को बचाने के नए हथियार विकसित किए। ये खोज फेज थेरपी (बैक्टीरियाभक्षी वायरस की मदद से उपचार की तकनीक) को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, खासकर दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों (antibiotic resistance) के खिलाफ।
फेज यानी वे वायरस जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं, और उनके एवं मेज़बान के बीच की लड़ाई सूक्ष्मजीवीय पारिस्थितिकी (microbial ecology) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसे अक्सर ‘इवॉल्यूशनरी आर्म्स रेस’ (वैकासिक हथियार दौड़) कहा जाता है, जहां बैक्टीरिया वायरस से बचने के लिए सुरक्षा उपाय बनाते हैं, और वायरस उस सुरक्षा को तोड़ने के नए-नए तरीके ईजाद करते रहते हैं। पृथ्वी पर तो इस लड़ाई का काफी अध्ययन हो चुका है।
लेकिन, नगण्य गुरुत्वाकर्षण (low gravity) में फेज-बैक्टीरिया की खींचातानी पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं। इस कमी को दूर करने के लिए, पी. हस और उनके साथियों ने ई. कोली बैक्टीरिया के दो नमूने लिए, जिन्हें टी7 नामक फेज से संक्रमित किया गया। एक नमूना पृथ्वी पर रखा और दूसरा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS experiment) पर।
अंतरिक्ष के अवलोकन
1. संक्रमण की गति में बदलाव
शुरुआत में संक्रमण धीमा हुआ, क्योंकि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया की शरीर क्रिया (cell physiology) और फेज-बैक्टीरिया के टकराव की भौतिकी को प्रभावित करती है। नगण्य गुरुत्वाकर्षण में बैक्टीरिया की कोशिकाएं अलग-अलग तरीके से इकट्ठा होती हैं, जिससे फेज का जुड़ना मुश्किल हो जाता है।
2. जेनेटिक उत्परिवर्तन
फेज में ऐसे उत्परिवर्तन हुए जो उनकी संक्रमण क्षमता यानी रिसेप्टर्स से जुड़ने की ताकत बढ़ाते हैं। वहीं, बैक्टीरिया में बचाव और अंतरिक्ष में जीवित रहने के नए जेनेटिक बदलाव (genetic adaptation) विकसित हुए। पता चला कि फेज का रिसेप्टर बाइंडिंग प्रोटीन (receptor binding protein) अंतरिक्ष में अलग तरीके से बदलता है।
3. नए रहस्य
अंतरिक्ष के फेज पृथ्वी पर दवा-प्रतिरोधी ई. कोली (drug resistant bacteria) के खिलाफ ज़्यादा प्रभावी साबित हुए। इससे पता चलता है कि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया-फेज के सह-विकास को नए तरह से ढालता है, जो सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन के बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती देता है।
अंतरिक्ष अन्वेषण (space exploration) में सूक्ष्मजीव एक बड़ी चुनौती हैं, क्योंकि वे अंतरिक्ष यान को संदूषित (spacecraft contamination) और यात्रियों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। यह शोध कई लिहाज़ से फायदे दे सकता है :
1. यात्रियों की स्वास्थ्य रक्षा
लंबे मिशन (जैसे मंगल यात्रा) (Mars mission) में नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया को ज़्यादा खतरनाक बना सकता है, लेकिन फेज उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं। इससे अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीव के नियंत्रण के लिए नए साधन मिल सकते हैं। मसलन, आईएसएस पर सूक्ष्मजीवों की 3डी मैपिंग (microbial mapping) दिखाती है कि अंतरिक्ष का वातावरण उनके मेटाबोलाइट्स को बदल देता है, जिससे संक्रमण बढ़ सकता है।
2. ग्रहीय सुरक्षा
अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन को समझने से हम अन्य ग्रहों पर पृथ्वी के जीवों को फैलने से रोक सकते हैं। शोध से पता चलता है कि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया के जीनोम में बदलाव लाता है, जो अंतरिक्षयान निर्जीवीकरण (space sterilization) के नए तरीके सुझा सकता है।
स्वास्थ्य के लिए उपयोगिता
पृथ्वी पर, एंटीबायोटिक प्रतिरोध (antibiotic resistance crisis) एक वैश्विक संकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2050 तक इससे एक करोड़ मौतें हो सकती हैं। यह शोध मानव स्वास्थ्य में क्रांति ला सकता है।
अंतरिक्ष में हुए उत्परिवर्तनों के अनुसार फेज को इंजीनियर (phage engineering) करके दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के खिलाफ ज़्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है।
नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया की प्रतिरक्षा व फेज के विकास को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है, जो पृथ्वी पर संक्रमण मॉडल्स सुधार सकता है। जैसे, अंतरिक्ष में बैक्टीरिया लाइसोजेनिक फेज (जो बैक्टीरिया के जीनोम में छिप जाते हैं) से जुड़े संस्करण विकसित करते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता समझने में मदद करता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतरिक्ष-प्रेरित बदलावों से पृथ्वी पर अत्यधिक सक्रिय फेज बन सकते हैं। इससे अस्पतालों में सुपरबग्स से लड़ना आसान हो सकता है।
पूर्व शोध
अंतरिक्ष में फेज और बैक्टीरिया (space microbiology) के आपसी सम्बंध पर शोध नया नहीं है, लेकिन आईएसएस में इसे नई दिशा मिली है। यहां प्रमुख शोधों का क्रमिक अवलोकन दिया जा रहा है।
शुरुआती इतिहास: अंतरिक्ष सूक्ष्मजीव विज्ञान की शुरुआत 1935 में हुई थी, जब बैक्टीरिया को गुब्बारा उड़ान और रॉकेट्स पर भेजा गया। अपोलो मिशन्स (1960-70) में अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीवों को जांचा गया था, लेकिन फेज पर ध्यान कम था।
2000 का दशक: आईएसएस के शुरू होने के बाद 2010-2015 में साल्मोनेला और ई. कोली की अंतरिक्ष में बढ़ी आक्रामकता पाई गई, लेकिन फेज शामिल नहीं थे।
2020 फेज इवॉल्यूशन प्रोजेक्ट (phage evolution project): रोडियम साइंटिफिक और आइएसएस नेशनल लैब ने फेज इवॉल्यूशन अध्ययन शुरू किया, जहां फेज को अंतरिक्ष में बैक्टीरिया को संक्रमित करने के लिए भेजा गया।
2024 लाइसोजेनिक बैक्टीरिया-फेज अध्ययन: नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित अध्ययन में आईएसएस से 245 बैक्टीरियल जीनोम्स का विश्लेषण किया गया। पाया कि अंतरिक्ष उड़ान के दौरान बैक्टीरिया में लाइसोजेनिक फेज से जुड़े संस्करण बढ़ते हैं, जो अनुकूलन से जुड़े हैं।
2025 आइएसएस का माइक्रोबियल मैप: सेल जर्नल में, आईएसएस के यूएसओएस में सूक्ष्मजीवों और मेटाबोलाइट्स का 3डी मैप बनाया गया, जो अंतरिक्ष के चरम वातावरण को दिखाता है। इसमें फेज की भूमिका का संकेत मिला है।
2025 में फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में आरएनए वायरस की अंतरिक्ष में लघु-कालिक वैकासिकी पर अध्ययन प्रकाशित हुआ, जो फेज से प्रेरित था। अंतत: ये सभी 2026 के अध्ययन के आधार बने, जो पहली बार पूरे जीनोम अनुक्रम (whole genome sequencing) से फेज-मेज़बान के सहविकास पर नज़र रखता है।(स्रोत फीचर्स)
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भारत के अग्रणी पर्यावरणविद डॉ. माधव गाडगिल (environmentalist Madhav Gadgil) का हाल ही में निधन हो गया। माधव गाडगिल के जाने से हमने एक ऐसा विचारक, लेखक और योद्धा खो दिया जो पर्यावरण संरक्षण और उस पर निर्भर जनजीवन, दोनों के बीच संतुलित समन्वय का पक्षधर था। वे उन दुर्लभ पर्यावरणविदों में से थे, जो प्रकृति के साथ-साथ आम इंसान से भी उतना ही प्रेम करते थे। प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग (sustainable use of natural resources) के सरल और व्यवहारिक उपाय सुझाकर लोगों का जीवन स्तर कैसे सुधारा जा सकता है, इस दिशा में उनकी जागरूकता और प्रयास उल्लेखनीय रहे हैं।
आज जब पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, माधव गाडगिल को खोना एक बहुत बड़ी क्षति है।
प्रकृति प्रेम का पहला पाठ
माधवराव प्रख्यात नियोजन विशेषज्ञ धनंजयराव गाडगिल के पुत्र थे। उन्हें प्रकृति प्रेम के शुरुआती पाठ अपने पिता से ही मिले। धनंजयराव को पक्षी निरीक्षण (bird watching) का शौक था और वे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालीम अली (Salim Ali) के मित्र थे। बर्ड वॉचिंग के दौरान माधव गाडगिल अपने पिता के साथ जंगलों और घाटियों की सैर किया करते थे। इसी घुमक्कड़ प्रवृत्ति ने उनके मन में प्रकृति प्रेम के बीज बोए और उन्होंने जंगलों में घूमकर अध्ययन करने वाला जीवविज्ञानी बनने का निर्णय लिया।
प्रयोगशाला के बाहर भी
माधव गाडगिल की उच्च शिक्षा हारवर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) में हुई। भारत लौटने के बाद, दिसंबर 1971 में उन्होंने ‘देवराइयों’ (sacred groves) का अध्ययन करना शुरू किया। देवराई वन के वे हिस्से या प्राकृतिक वनस्पतियों के वे क्षेत्र होते हैं, जिन्हें स्थानीय या अन्य समुदायों द्वारा किसी देवी-देवता या आध्यात्मिक शक्ति को समर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के कारण इन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप (जैसे पेड़ काटना, शिकार करना या खेती करना) पूरी तरह वर्जित होता है। इस तरह देवराई में प्रकृति को पनपने का मौका बनता है।
चूंकि माधव गाडगिल को जंगलों में भटकने का शौक था, इसलिए उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देवराइयों में जाकर उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया। एक वैज्ञानिक के रूप में वे कभी भी केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने प्रकृति की खुली प्रयोगशाला में दुनिया भर की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर किसी से खुलकर संवाद किया और उनकी परंपराओं व पर्यावरण के प्रति उनके ज्ञान (traditional ecological knowledge) को समझा। यही कारण है कि समाज और गाडगिल को अलग करना असंभव है। डॉ. जयराम रमेश द्वारा उन्हें लोगों का ‘वैज्ञानिक’ (People’s Scientist) कहना अत्यंत सटीक जान पड़ता है।
लेखन और सामाजिक जागरूकता
देवराइयों के अध्ययन पर आधारित माधव गाडगिल का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जो आम जनता के लिए उनका पहला लेख था। यहीं से उनकी निरंतर लेखन यात्रा शुरू हुई। विभिन्न समाचार पत्रों, साप्ताहिकों और पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए। कठिन वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने वाले माधव गाडगिल ने अपनी लेखनी से सामाजिक चेतना (public awareness) भी जाग्रत की। प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा (Ramachandra Guha) के साथ उनकी पुस्तक This Fissured Land का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है और कई विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता है। Ecology and Equity, उत्क्रांति – एक महानाट्य, निसर्गाने दिला आनंदकंद, जीवन की बहार और बच्चों के लिए लिखी गई गोडतोंड्या मुचकुंद उनकी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। सह्याचला आणि मी: एक प्रेम कहाणी उनकी आत्मकथा है।
माधव गाडगिल ने कई सरकारी समितियों में काम किया। 1975 से 1980 के बीच वे कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य थे। उन्होंने प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति (Prime Minister’s advisory committee) के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। पश्चिमी घाट, जहां उनका बचपन गुज़रा था, उसके सतत विकास कार्यक्रम में गाडगिल जी का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने स्थानीय लोगों और शासकों का ध्यान वहां के महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर आकर्षित किया। आगे चलकर उनकी ‘वेस्टर्न घाट इकॉलॉजिकल एक्सपर्ट पैनल’ (WGEEP) की रिपोर्ट बहुत चर्चित रही। हालांकि, स्थानीय लोगों की इच्छाओं और अपेक्षाओं को जानकर तैयार की गई इस रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर
जैव विविधता अधिनियम (Biological Diversity Act) का मसौदा तैयार करने वाली समिति में रहते हुए, माधव गाडगिल ने ‘पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर’ (People’s Biodiversity Register – PBR) बनाने का विचार रखा, जिसे बाद में कानून में शामिल किया गया। यह रजिस्टर स्थानीय लोगों के लिए अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण का एक महत्वपूर्ण कानूनी साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि यह ज्ञान या इन संसाधनों के आर्थिक लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचें और साथ ही वे संसाधन अक्षुण्ण भी बने रहें। कुदरती संसाधन पर लोगों के स्वामित्व को वे असली लोकतंत्र (grassroots democracy) का रूप मानते थे।
पर्यावरण बनाम विकास (environment vs development)
माधव गाडगिल की कार्यशैली सीधे लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने की थी। वे वैज्ञानिक तथ्यों को प्रत्यक्ष अनुभव से जोड़ते थे और बिना किसी संकोच के वास्तविकता को सामने रखते थे। चाहे वह वन्यजीव संरक्षण में पश्चिमी देशों का पाखंड हो, या सरकारी संस्थाओं, एनजीओ और वन विभाग की कार्यप्रणाली, वे निर्भीक होकर आलोचना करते थे।
भारत में शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच की बढ़ती खाई को उन्होंने नज़रंदाज़ नहीं किया। इसे उदाहरण के ज़रिए समझना हो तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बात हो सकती है। शहर में प्रदूषण मुक्त इलेक्ट्रिक कारों के लिए जो कोयला जलाकर बिजली बनाई जाती है, उसका कष्ट ताप बिजली घरों के पास रहने वाले ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। और यदि उन्हें कोयला खदानों के कारण विस्थापित होना पड़े तो उन्हें ‘इकॉलॉजिकल रिफ्यूजी’ (पारिस्थितिक शरणार्थी) कहा जाता है। प्रदूषण मुक्त शहर के लिए यह बड़ी कीमत ग्रामीण लोग चुकाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शहर के लोग इस तरफ ध्यान नहीं देते। माधव गाडगिल जी ऐसे कई विस्थापित समूहों से वाकिफ थे और उनके हक में लिखते थे।
जब तेंदुए जंगल छोड़कर गांवों में घुसने लगते हैं, तब इसका दोष ग्रामीणों पर यह कहकर मढ़ा जा सकता है कि वे खेती के लिए जंगल काटते हैं। उसी समय, शहरी लोगों को सुख-सुविधाएं प्रदान करने के लिए होने वाले वन्य संसाधनों के विनाश के बारे में शहरी लोग खुद अनभिज्ञ रहते हैं। जिन लोगों ने तेंदुए के हमले में अपने परिवार के किसी सदस्य को खो दिया है या जिनके खेतों का नुकसान हुआ है, वे लोग जब तेंदुए को मारने की मांग करते हैं, तब इस हमले की आंच से दूर रहने वाले लोग उन्हें ‘पर्यावरण द्रोही’ करार देते हैं। और इसी आधार पर, माधव गाडगिल के इस बयान पर भी आपत्ति जताई जा सकती है कि ‘तेंदुओं का शिकार करना चाहिए’।
लेकिन सही परिस्थिति में माधव जी ने पर्यावरण के मुद्दे पर लोगों के साथ खड़ा रहना पसंद किया। उनका यह विश्वास था कि लोग अक्सर प्रकृति बचाने के पक्ष मे होते हैं। वे ‘पर्यावरण बनाम विकास’ के विरोधाभास को भी भ्रामक मानते थे। उनका विश्वास था कि विज्ञान का सहारा लेकर, प्रकृति (science-based development) के अनुरूप और लोगों के सहयोग से ही वास्तविक विकास संभव है।
सम्मान और विरासत
वर्ष 2015 में उन्हें प्रकृति संरक्षण और मानवीय विकास के समन्वय के लिए ‘टायलर पुरस्कार’ (Tyler Prize for Environmental Achievement) प्रदान किया गया। उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (Shanti Swarup Bhatnagar Award) और पद्म भूषण (Padma Bhushan) से भी सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें पर्यावरण क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान ‘चैंपियंस ऑफ दी अर्थ’ (Champions of the Earth Award) से नवाज़ा। वे सच में पर्यावरण क्षेत्र के चैंपियन थे। माधव गाडगिल का कार्य पर्यावरण शोधकर्ताओं, कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए हमेशा प्रेरणादायी रहेगा।(स्रोत फीचर्स)
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पिछले सौ साल से भी ज़्यादा समय से च्यूइंग गम (chewing gum) सिर्फ मुखवास के तौर पर नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाली चीज़ के रूप में बेचा जाता रहा है। दावा किया जाता था कि च्यूइंग गम तंत्रिकाओं को शांत करता है और मन को हल्का (stress relief) करता है। आज वही दावे आ रहे हैं – फर्क यह है कि अब लग रहा है कि इसमें थोड़ा हाथ शायद मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान (neuroscience) का भी है।
हालांकि, थोड़ी सतर्कता ज़रूरी भी है क्योंकि ऐसे वैज्ञानिक दावे तब आ रहे हैं जब कोविड-19 के बाद च्यूइंग गम की बिक्री तेज़ी से घटी है। कोविड-19 (covid-19 pandemic) महामारी के दौरान अमेरिका में च्यूइंग गम का इस्तेमाल काफी कम हो गया था। लोग कम बाहर निकलते, कम मिलते-जुलते और सांस की ताज़गी की चिंता में कमी भी थी। अब कंपनियां लोगों को लुभाने के लिए च्यूइंग गम को मानसिक सेहत से जोड़कर पेश कर रही हैं।
च्यूइंग गम एक अजीब लत है। इससे कोई पोषण नहीं मिलता और यह जल्द ही बेस्वाद हो जाती है; फिर भी लोग इसे लंबे समय तक चबाते रहते हैं। क्यों?
यह सवाल वैज्ञानिकों को लंबे समय से परेशान करता रहा है। शोध बताते हैं कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान (concentration) थोड़ा बेहतर होता है और कुछ हद तक तनाव कम (stress reduction) होता है, लेकिन इसका कारण अब तक पूरी तरह समझ में नहीं आया है। दिलचस्प बात यह है कि मनुष्य हज़ारों सालों से च्यूइंग गम जैसी चीज़ें चबा रहे हैं।
पुरातात्विक सबूत (archaeological evidence) बताते हैं कि मनुष्य करीब 8000 साल पहले भी चिपचिपी चीज़ें चबाया करते थे। स्कैंडिनेविया में पेड़ों की छाल से बनी प्राचीन गम (ancient chewing gum) मिली है, जिस पर दांतों के निशान मौजूद हैं। कुछ निशान छोटे बच्चों के भी थे। इससे लगता है कि पुराने समय में गोंद चबाना सिर्फ औज़ारों के लिए गोंद नरम करने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों को इससे आनंद भी मिलता होगा।
अमेरिका में च्यूइंग गम
आधुनिक समय में च्यूइंग गम की शुरुआत अमेरिका में 1800 के दशक में हुई थी। अलबत्ता, च्यूइंग गम को लोकप्रिय बनाने का काम विलियम रिग्ले जूनियर (William Wrigley Jr.) ने किया। पहले साबुन और बेकिंग सोडा के साथ च्यूइंग गम मुफ्त दिए गए। लोकप्रियता बढ़ने पर 1890 के दशक में सिर्फ च्यूइंग गम का कारोबार शुरू कर दिया। 20वीं सदी की शुरुआत तक च्यूइंग गम हर जगह दिखने लगी। हालांकि इससे सभी खुश नहीं थे – सार्वजनिक जगहों पर च्यूइंग गम चबाने की आलोचना हुई और सड़कों पर थूके गए च्यूइंग गम से प्रशासन परेशान रहने लगे।
युद्ध में च्यूइंग गम
पहले विश्व युद्ध (World War I) के दौरान विलियम रिग्ले ने अमेरिकी सेना को सुझाव दिया कि च्यूइंग गम सैनिकों के लिए फायदेमंद हो सकता है। उनका कहना था कि इससे भूख कुछ हद तक दबाई जा सकती है, दांत साफ रहते हैं और तनाव कम होता है। सेना ने यह बात मान ली।
इसके बाद च्यूइंग गम सैनिकों के राशन (military ration) का हिस्सा बन गई। अमेरिकी सैनिकों के साथ च्यूइंग गम युरोप, एशिया और बाकी दुनिया में फैली। इसी दौरान अखबारों में यह बातें छपने लगीं कि च्यूइंग गम चबाने से चिंता कम होती है, नींद अच्छी आती है और उदासी दूर होती है। इन्हीं दावों से वैज्ञानिकों की इसमें रुचि बढ़नी शुरू हुई।
शुरुआती अध्ययन
1940 के दशक में अमेरिका के बार्नार्ड कॉलेज (Barnard College) में च्यूइंग गम पर किए गए शोध में पाया गया कि च्यूइंग गम चबाने वाले लोग थोड़ा कम तनाव महसूस करते थे और उनका काम करने का तरीका कुछ बेहतर लगता था। तब वैज्ञानिक यह नहीं समझ पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है।
कई साल बाद कार्डिफ युनिवर्सिटी (Cardiff University) के मनोवैज्ञानिक एंड्र्यू स्मिथ (Andrew Smith) ने करीब 15 साल तक च्यूइंग गम चबाने के असर का अध्ययन किया। उनके कुछ शोध च्यूइंग गम बनाने वाली कंपनी के सहयोग से हुए थे, इसलिए नतीजों पर सवाल भी उठे। स्मिथ ने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त में कोई खास सुधार नहीं होता – लोग कहानियां या शब्द दूसरों से बेहतर याद नहीं रख पाते। अलबत्ता, कुछ और असर ज़रूर देखने को मिले। कई शोधों में यह बात सामने आई कि च्यूइंग गम के दो असर साफ हैं। पहला, इससे सतर्कता और एकाग्रता थोड़ी देर तक बेहतर बनी रहती है। दूसरा, कुछ स्थितियों में तनाव कम महसूस होता है।
अध्ययनों के अनुसार च्यूइंग गम चबाने से सतर्कता (alertness) लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, खासकर तब जब काम बहुत लंबा, उबाऊ या मशीनी हो। जैव-मनोवैज्ञानिक (biopsychology) क्रिस्टल हैस्केल-रैम्से के शोध में भी यही नतीजे मिले। उन्होंने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान लगाने में तब ज़्यादा मदद मिलती है, जब व्यक्ति पहले से थका हुआ या मानसिक रूप से बोझिल हो (mental benefit)। लेकिन अगर कोई पहले ही पूरी तरह सतर्क है, तो गम से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। तनाव कम होने के मामले में, इसके असर के प्रमाण अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत पाए गए।
प्रयोगशाला (laboratory studies) में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जब लोग सार्वजनिक भाषण देने या गणित के कठिन सवाल हल करने जैसे तनाव वाले काम के दौरान च्यूइंग गम चबाते हैं, तो उनकी घबराहट कुछ कम हो जाती है। अस्पतालों में हुए अध्ययनों में दिखा कि कुछ सर्जरी से पहले च्यूइंग गम चबाने वाली महिलाओं की चिंता कम थी।
हालांकि च्यूइंग गम कोई जादू नहीं है। बहुत ज़्यादा तनाव की स्थिति में – जैसे ऑपरेशन से ठीक पहले या बेहद कठिन हालात में – यह मददगार साबित नहीं होता। कुल मिलाकर, च्यूइंग गम मानसिक रूप से थोड़ा फायदा ज़रूर देता है। लेकिन इसके पीछे के कारण अब भी पूरी तरह समझ में नहीं आए हैं। अलबत्ता, कुछ संभावनाएं बताई गई हैं।
एक विचार यह है कि चबाने से चेहरे की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जिससे मस्तिष्क तक खून का प्रवाह बढ़ जाता है। दूसरी धारणा यह है कि मांसपेशियों की हल्की गतिविधि एकाग्रता में मदद करती है, जिससे दिमाग अधिक सक्रिय रहता है।
तीसरा विचार है कि चबाना शरीर की तनाव-नियंत्रण प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जो कॉर्टिसोल नामक हार्मोन को नियंत्रित करती है। यह हार्मोन सतर्कता और तनाव दोनों से जुड़ा होता है। अध्ययनों में इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं – कभी कॉर्टिसोल (cortisol hormone) बढ़ा, जो ध्यान बढ़ने के संकेत है, तो कभी यह घटा, जो तनाव कम होने का संकेत है।
चबाना क्या नैसर्गिक आदत है?
कुछ वैज्ञानिकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या चबाने की आदत (chewing behavior) बहुत पुराने समय से हमारे भीतर मौजूद है। कई जानवर तनाव में कुछ न कुछ चबाते हैं – जैसे कुत्ते खिलौने कुतरते हैं और शाकाहारी जानवर लगातार जुगाली करते रहते हैं। इसलिए माना गया कि शायद चबाना एक स्वाभाविक तरीके से मन को शांत करने वाली क्रिया हो।
लेकिन वैज्ञानिक एडम वैन कैस्टरेन (Adam van Casteren) इससे अलग बात कहते हैं। उनके अनुसार इंसान अपने करीबी प्राइमेट (primates) रिश्तेदारों की तुलना में बहुत कम चबाता है। चिंपैंज़ी दिन में 4–5 घंटे और गोरिल्ला करीब 6 घंटे तक चबाते रहते हैं, जबकि इंसान औसतन सिर्फ 35 मिनट ही भोजन चबाता है। खाना पकाने और औज़ारों के विकास से इंसानों को ज़्यादा चबाने की ज़रूरत नहीं रही, और बची हुई ऊर्जा मस्तिष्क के विकास में लगी।
इसलिए च्यूइंग गम को किसी पुरानी जीवन-रक्षा आदत का हिस्सा नहीं माना जाता। वैन कैस्टरेन का मानना है कि इसकी वजह कहीं ज़्यादा सरल है – इंसानों को बार-बार होने वाली हल्की और दोहराई जाने वाली गतिविधियां पसंद आती हैं।
सोचते वक्त लोग अक्सर पैर हिलाते हैं, पेन क्लिक करते हैं, स्ट्रेस बॉल दबाते हैं या कागज़ पर कुछ बनाते रहते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसी छोटी-छोटी दोहराई जाने वाली हरकतें लंबे काम के दौरान ध्यान बनाए रखने में मदद करती हैं।
कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी (University of California) के शोध में पाया गया कि जब एकाग्रता के अभाव और अति सक्रियता (ADHD) से पीड़ित बच्चों को काम करते समय खुलकर हिलने-डुलने दिया गया तो उनका प्रदर्शन बेहतर रहा। च्यूइंग गम भी कुछ ऐसा ही काम करता है और दिमाग बेहतर तरीके से ध्यान लगा पाता है।
आज की तेज़ रफ्तार, स्क्रीन और तनाव से भरी दुनिया में च्यूइंग गम से मिलने वाली ज़रा-सी राहत शायद इसकी सबसे बड़ी ताकत है। वैज्ञानिक जब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर की हलचल मस्तिष्क (brain function) को कैसे प्रभावित करती है, तब च्यूइंग गम हमें याद दिलाता है कि मस्तिष्क अकेले काम नहीं करता। कई बार जबड़ा हिलाने जैसी क्रिया भी हमारे सोचने और महसूस करने के तरीके को बदल सकती है।(स्रोत फीचर्स)
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जलवायु बदलाव (climate change) की समस्या के समाधान के रूप में विश्व स्तर पर दो तरह के प्रयास चर्चित हैं। पहला तो यह है कि इसके लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाऊस गैसों (greenhouse gases) के उत्सर्जन को कम किया जाए। दूसरा, कि इस समस्या का सामना करने के लिए लोगों व समुदायों की तैयारी बेहतर हो। इन दो पक्षों को प्रायः मिटिगेशन व एडाप्टेशन कहा जाता है व ये दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आगे चुनौती ऐसा कार्यक्रम बनाने की है जिनसे लोगों की आजीविका भी बेहतर हो तथा साथ में जलवायु बदलाव संकट के इन दोनों पक्षों पर भी कार्य आगे बढ़ सके।
भारत जैसे विकासशील देशों (developing countries) के संदर्भ में तो यह चुनौती और भी अहम है क्योंकि जहां जलवायु बदलाव के संदर्भ में हमें अपनी ज़िम्मेदारी अवश्य निभानी है पर साथ में आजीविका व आर्थिक पक्ष (economic development) को भी आगे बढ़ाना है। ऐसे कार्यक्रम बनाने होंगे जिनमें उचित समन्वय बन सके। फिर भारत जैसे देश में यह समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में बनाना तो और भी ज़रूरी हो गया है।
यदि हम पहले पक्ष ‘मिटिगेशन’ या ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की बात करें तो प्राकृतिक खेती (natural farming) व बागवानी (sustainable agriculture) को बढ़ाना इसमें अहम कदम है। प्राकृतिक खेती व बागवानी को बढ़ाकर कृषि पर ग्रीनहाऊस गैस का अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले जीवाश्म ईंधन का जो बड़ा बोझ है, उसे कम किया जा सकता है। यदि किसी गांव में प्राकृतिक खेती के त्वरित प्रसार से रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा आदि का उपयोग कम होता है तो जीवाश्म ईंधन का उपयोग व ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अनेक छोटे औज़ारों के उपयोग को प्रोत्साहित कर बड़ी मशीनों व ट्रैक्टरों आदि में डीज़ल की अधिक खपत की संभावना भी कम होती है।
प्राकृतिक खाद (organic manure) के उपयोग से व प्राकृतिक खेती से खेतों की मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ता है, उसकी मिट्टी में कार्बन संजोने की क्षमता (carbon sequestration) बढ़ती है व वायुमंडल में कार्बन डाईक्साइड का उत्सर्जन कम होता है।
किसान छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगा सकते हैं, गावों के आसपास मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष (native species) इस तरह साथ-साथ लगाए जा सकते हैं कि वे एक साथ एक-दूसरे से सहयोग करते हुए पनप सकें।
दूसरी ओर, जलवायु बदलाव व उससे जुड़े प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना बेहतर ढंग से करने की क्षमता यानी एडाप्टेशन (climate resilience) के लिए जल व मिट्टी संरक्षण (water and soil conservation) सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल व मिट्टी संरक्षण से सूखे व बाढ़ (drought and flood) दोनों तरह की आपदाओं को कम करने में मदद मिलती है व साथ में ग्रामीण आजीविकाओं का मज़बूत आधार तैयार होता है। सामान्य वर्ष में भी कुछ महीनों के लिए अनेक गांवों के जल-स्रोत सूख जाते हैं। यह स्थिति गांववासियों के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों के लिए भी बड़ा संकट बन जाती है।
वन्य जीव-जंतुओं (wildlife) व आवारा घूम रहे पशुओं के लिए भी प्यास का संकट बढ़ जाता है। जल-संरक्षण से यह संभावना बढ़ती है कि इन जल-स्रोतों में वर्ष भर पानी की उपस्थिति बनी रहेगी। जल संरक्षण से भूजल स्तर (groundwater level) ठीक बना रहता है जिससे कुंओं व हैंडपंप आदि से पानी मिलता रहता है। अधिक वर्षा के समय बहुत-सा पानी विभिन्न गांवों में व उनके जल-स्रोतों व खेतों में संरक्षित रह जाए तो विभिन्न स्थानों पर बाढ़ की संभावना अपने आप कम हो जाएगी।
प्रतिकूल मौसम (extreme weather) के समय में मिश्रित खेती (mixed cropping) की पद्धति से फसल के कुछ हिस्से को बचाने की संभावना बढ़ जाती है। मिश्रित खेती को कई स्तरों पर बढ़ावा देकर व छोटे किसानों को खेतों में अनाज, दलहन, तिलहन के साथ कई तरह की सब्ज़ियां व फल लगाने को प्रोत्साहित कर उन्हें प्रतिकूल मौसम में भी सशक्त रहने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है।
प्राकृतिक खेती की इन तकनीकों से किसानों का खर्च बहुत कम (low-cost farming) हो सकता है। यदि खर्च कम होगा तो कर्ज़ की ज़रूरत भी कम हो जाएगी। इस तरह, छोटे किसान जलवायु बदलाव के अधिक कठिन दौर का सामना करने में सक्षम हो जाएंगे। दूसरी ओर, किसानों की बीज सम्बंधी आत्म-निर्भरता (seed self-reliance) को बढ़ाने पर भी अधिक ध्यान देना चाहिए। आत्म-निर्भरता बढ़ने से जलवायु बदलाव का सामना करने की क्षमता बढ़ जाती है।
जिन समुदायों में आपसी सहयोग व एकता (community cooperation) बढ़ती है, उनकी जलवायु बदलाव के दौर का आपसी सहयोग से बेहतर ढंग से सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है। ज़रूरत है कि ग्रामीण समुदाय आपसी सहयोग को बढ़ाएं, उनके स्व-सहायता समूह (self-help groups) गठित किए जाएं, अधिक व्यापक स्तर पर भी संगठन बनाए जाएं, सबके सहयोग से सामाजिक उद्यम (social enterprises) स्थापित किए जाएं।
उपरोक्त सभी प्रयास सृजन संस्था ने निरंतर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए किए हैं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य ग्रामीण आजीविकाओं (जैसे कृषि, बागवानी, बकरी-पालन) को टिकाऊ तौर पर बेहतर और समृद्ध करना है व इसमें विशेष तौर पर कमज़ोर वर्ग व उसमें भी महिलाओं (women empowerment) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सृजन के कार्यक्रमों के अन्तर्गत छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगाने के अतिरिक्त तपोवन नामक मानव-निर्मित वन (community forests) अनेक गांवों में लगाए गए हैं जिनमें मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के हज़ारों वृक्ष साथ-साथ लगाए गए हैं। कार्यक्रम जलवायु बदलाव के संकट के दोनों पहलुओं के लिहाज़ से बहुत मददगार सिद्ध हो रहा है।
इस तरह अनेक स्तरों पर जो कार्य ग्रामीण आजीविका आधार को मजबूत करते हैं, वे जलवायु बदलाव (climate action) की गंभीर समस्या के संदर्भ में भी मददगार होते हैं। एक ओर वे जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में सहयोग करते हैं तो दूसरी ओर, प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना करने की ग्रामीण समुदायों की क्षमता को बढ़ाते भी हैं। इन कार्यक्रमों के इस व्यापक महत्व व समन्वय क्षमता को देखते हुए इन्हें सरकारी व सी.एस.आर. स्तर (CSR initiatives) पर अधिक सहयोग व समर्थन प्राप्त होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
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“क्या आप अपने पौधों को संगीत (music for plants) सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।
इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?
दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद (plant perception) कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भांप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।
एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ (herbivore vibration) सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों (plant defense response) का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति (frequency discrimination) एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं।
कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण (seed germination) पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियां पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियां, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति (gene expression) और हॉरमोन नियंत्रण (plant hormone) को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।
पादप ध्वनि विज्ञान (Plant acoustics)
20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि (crop yield, sustainable agriculture) आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि (plant growth) पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर (music effect on plants) का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जांचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।
अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा (sound frequency, plant development)।
भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया (classical music, meditation music)। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स (psychoacoustics, plant response to sound) के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।
इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएं, पौधे अच्छे से लहलहाएंगे। (स्रोत फीचर्स)
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लाखों साल पहले इस धरती पर विचरने वाले जीव (prehistoric animals) क्या खाते होंगे? क्या वे कभी किसी बीमारी (ancient diseases) का शिकार बनें होंगे? इन सवालों के जवाब दे पाना मुमकिन नहीं लगता। नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इन नामुमकिन लगने वाले सवालों के जवाब दिए हैं। उन्होंने बताया है कि लाखों साल पहले विचरने वाले जीवों ने क्या खाया, उनका रहवास कैसा था, और वे कैसी बीमारियों से जूझ रहे थे।
इन सवालों का जवाब देने के लिए शोधकर्ताओं ने सहारा लिया है मेटाबोलाइट्स (metabolites) का। मेटाबोलाइट किसी जीव के शरीर की चयापचय प्रक्रिया में बने उप-उत्पाद होते हैं। दरअसल हम जो भी खाते हैं, किसी भी संक्रमण की चपेट में आते हैं, या जिन भी परिस्थितियों को हमारा शरीर झेलता है चयापचय प्रक्रिया में बने मेटाबोलाइट उस सबके गवाह बन जाते हैं।
जीवित जीवों के खान-पान या रोग सम्बंधी छान-बीन करने के लिए तो उनके रक्त या मूत्र के नमूनों से मेटाबोलाइट्स (biological samples, disease analysis) हासिल कर लिए जाते हैं। लेकिन अश्मीभूत जीवों में तो रक्त-मूत्र मिलना संभव नहीं है। लेकिन यह भी होता है कि जैसे-जैसे दांत, हड्डियां या हाथीदांत जैसे सख्त ऊतक विकसित होते हैं, वृद्धि करते हैं, रक्त के साथ मेटाबोलाइट्स उनमें पहुंचते रहते हैं और ये मेटाबोलाइट्स इन सख्त ऊतकों की खुरदरी, छिद्रदार संरचनाओं में फंस जाते हैं। इस आधार पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जैविक नृविज्ञानी टिम ब्रोमेज के मन में यह सवाल आया कि क्या हड्डियों, दांतों और हाथीदांत जैसी सख्त और छिद्रदार जगह पर मेटाबोलाइट्स फंसकर संरक्षित भी रह सकते हैं (bone preservation, fossil chemistry)।
हालांकि, कुछ हालिया अध्ययनों में ऐसे मेटाबोलाइट्स मृत्यु के बाद कंकाल के अवशेषों (skeletal remains, post-mortem biomarkers) में संरक्षित पाए गए हैं, लेकिन वे कंकाल महज कुछ दशक पुराने थे। लेकिन ये शोधकर्ता तो लाखों साल (13 से 30 लाख साल तक) प्राचीन जीवाश्मों में मेटाबोलाइट्स खोजना चाह रहे थे।
ब्रोमेज और उनके साथियों ने प्राचीन तंज़ानिया की ओल्डुवाई गॉर्ज, और दक्षिण अफ्रीका की मकापंसगैट और मलावी के होमिनिन खुदाई स्थलों से प्राप्त अश्मीभूत हड्डियों और दांतों से नमूने लेकर उनकी मास स्पेक्ट्रोग्राफी (mass spectrometry, chemical analysis) करके प्रत्येक जीवाश्म में कैद रासायनिक पदार्थों का पता लगाया। एक बार जब उन्होंने नमूनों के भीतर संभावित मेटाबोलाइट्स की पहचान कर ली, तो उन्होंने उनकी तुलना वर्तमान में जीवित उनके जैसे जीवों के मेटाबोलाइट्स से की।
शोधकर्ताओं को विश्लेषण में प्रत्येक नमूने में हज़ारों मेटाबोलाइट्स मिले, जिनमें से सैकड़ों ऐसे थे जो वर्तमान जीवों द्वारा बनाए जाने वाले मेटाबोलाइट से मेल खाते थे।
इस आधार पर शोधकर्ताओं ने प्राचीन जानवरों के जीवन (ancient life reconstruction) के बारे में अनुमान लगाए। जैसे, मेटाबोलाइट के आधार पर शोधकर्ता यह अंदाज़ा कर पाए कि कई अश्मीभूत जीव मादा थे। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले दो जेरबिल और एक गिलहरी के जीवाश्म में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो एस्ट्रोजन को पचाने (estrogen metabolism) वाले जीन से जुड़े थे। अश्मीभूत उल्लू के पेट में से मिली जेरबिल की एक अन्य हड्डी से भी मादा (sex identification)होने के अतिरिक्त रासायनिक संकेत मिले।
आगे के विश्लेषण में शोधकर्ताओं को अतीत की बीमारियों के संकेत भी मिले। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले गिलहरी, चिवोंडो से मिले हाथी और मकापंसगैट से मिले बोविड के जीवाश्म से ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो संभवत: ट्रायपैनोसोमा ब्रूसाई (Trypanosoma brucei) परजीवी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े थे। यह परजीवी मनुष्यों में निद्रा रोग का कारण बनता है।
फिर, जीवाश्म मेटाबोलाइट्स की तुलना ज्ञात पौधों के मेटाबोलाइट्स से करके शोधकर्ता कुछ जानवरों के आहार और वातावरण के बारे में भी बता पाए। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिली 18 लाख साल पुरानी गिलहरी में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो शतावरी और एलो कुल पौधों के भक्षण का संकेत देते हैं। इस आधार पर लगता है कि उस समय जंगल घना रहा होगा। ऐसे ही पता चला कि 24 लाख साल पहले मलावी में विचरने वाला एक जीव मृत्यु के समय बच्चा था, वर्मवुड की छाल और शहतूत की पत्तियां खाता था और जब वह मरा तो शायद किसी संक्रमण से ग्रस्त था।
हालांकि अन्य वैज्ञानिक चेताते है कि शोधकर्ताओं को जीवाश्मों से जुड़े मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण करते समय सावधान रहना चाहिए। क्योंकि यह दुविधा हमेशा होती है कि मेटाबोलाइट्स उस अश्मीभूत जानवर द्वारा बनाए गए थे या आसपास की मिट्टी से जीवाश्म में समा गए हैं।
अलबत्ता, शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के आसपास की मिट्टी की जांच करके इस समस्या का ध्यान रखा है। वे यह भी कहते हैं कि “मिट्टी कोई संदूषक नहीं है बल्कि यह तो उस जीवन का प्रतिबिंब है जो उस पर बसा था।”
बहरहाल यह बड़ी बात है कि वैज्ञानिक लाखों साल पुराने जीवाश्म नमूनों से मेटाबोलाइट हासिल करके उनका विश्लेषण कर सके। ऐसे विश्लेषण अतीत के बारे में लगाए गए कई अनुमानों को मज़बूती दे सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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मंगल तक पहुंचना मानव जाति का एक बड़ा सपना रहा है, और अब यह सपना सच होता दिख रहा है (Mars mission, human settlement on Mars)। लेकिन मंगल पर उतरना ही काफी नहीं है। अगर इंसानों को वहां लंबे समय तक रहना है, तो उन्हें ऐसी मज़बूत और सुरक्षित जगहों की ज़रूरत होगी जो कड़ी ठंड, खतरनाक विकिरण और अकेलेपन से बचा सकें। पृथ्वी से निर्माण सामग्री ले जाना बहुत महंगा और धीमा होगा। इसी वजह से वैज्ञानिक वहीं मौजूद एक संसाधन को समाधान मान रहे हैं – बर्फ (Martian ice) । पृथ्वी की प्राकृतिक बर्फीली गुफाओं से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि क्या मंगल पर भी ऐसे बर्फीले ढांचे बनाए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि मंगल ग्रह सूखा नहीं है। उसकी सतह पर और उसके नीचे काफी मात्रा में बर्फ मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बर्फ से ऐसे मज़बूत और गर्मी कैद करने वाले घर बनाए जा सकते हैं, जिनमें मनुष्य रह सकें। ये बर्फीले घर एक तरफ तो विकिरण से सुरक्षा (radiation shielding) देंगे और दूसरी तरफ सूरज की आवश्यक रोशनी (natural light habitats) अंदर आने देंगे, जिससे जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा मिलेगा।
यह विचार भले ही विज्ञान-कथा जैसा लगे, लेकिन वैज्ञानिक इसे लेकर गंभीर हैं। लंबे समय के लिए अंतरिक्ष में इंसानों को बसाने (space habitation) की सबसे बड़ी चुनौती है बार-बार पृथ्वी से रसद भेजना, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा है। अगर मंगल पर मौजूद चीज़ों से ही काम लिया जाए, तो खर्च और खतरा दोनों कम हो सकते हैं। बर्फ इस मामले में खास है, क्योंकि इसे संभालना अपेक्षाकृत आसान है और इसके फायदे हैं।
मंगल पर निर्माण के लिए दो मुख्य चीज़ें मानी जाती हैं – बर्फ और रेगोलिथ (धूल-मिट्टी और पत्थरों की परत) (Martian regolith, space construction materials)। रेगोलिथ में उपयोगी तत्व होते हैं, लेकिन उन्हें निकालने के लिए भारी मशीनें और बहुत ज़्यादा गर्मी चाहिए। इसके उलट, बर्फ को कम ऊर्जा में पिघलाया, ढाला और फिर से जमाया जा सकता है।
यह प्रस्तावित आवास गुंबदाकार होंगे, जिनकी साइज़ लगभग एक हैक्टर (Mars habitat ice dome structures) होगी। इनके भीतर रहने की जगह, काम करने के हिस्से और खेती के क्षेत्र अलग-अलग होंगे। कंप्यूटर मॉडल बताते हैं कि सिर्फ कुछ मीटर मोटी बर्फ की दीवारें भी मंगल के बेहद ठंडे औसत तापमान (–120 डिग्री सेल्सियस) को अंदर करीब –20 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकती हैं। यह तापमान अब भी ठंडा है, लेकिन अतिरिक्त हीटिंग से संभाला जा सकता है और इससे बर्फ पिघलती भी नहीं।
बर्फ की बनावट भी उम्मीद से बेहतर है। शोध बताते हैं कि अगर बर्फ में हाइड्रोजेल (hydrogel reinforcement) जैसे जैविक पदार्थ मिलाए जाएं, तो वह ज़्यादा मज़बूत और लचीली हो सकती है, जिससे दरार पड़ने का खतरा कम होता है। एक बड़ी चुनौती है सब्लीमेशन, यानी मंगल के विरल वातावरण में बर्फ का सीधे भाप बन जाना। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास जल-रोधी अस्तर लगाकर इसे रोका जा सकता है, हालांकि ऐसा अस्तर शायद पृथ्वी से ले जाना पड़े।
बर्फ का सबसे बड़ा फायदा सूरज की रोशनी से उसका रिश्ता है। रेगोलिथ के विपरीत, बर्फ हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है लेकिन उपयोगी रोशनी और गर्मी को अंदर आने देती है। तो विकिरण से सुरक्षा मिलेगी, साथ ही पौधे उगाने, नींद के चक्र को ठीक रखने और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा देने के लिए ज़रूरी प्राकृतिक रोशनी मिलती रहेगी।
हालांकि इस विचार की कुछ सीमाएं (technical challenges) भी हैं। बड़े बर्फीले ढांचे बनाने के लिए भारी मात्रा में बर्फ को संसाधित करना होगा। शुरुआती अनुमान बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी बिजली उपलब्ध होने पर भी रोज़ केवल लगभग 15 वर्ग मीटर बर्फ (energy constraints) ही तैयार की जा सकती है। मंगल पर आने वाले धूल भरे तूफान भी समस्या पैदा करेंगे, क्योंकि बर्फ पर जमी धूल उसकी पारदर्शिता और गर्मी रोकने की क्षमता घटा देती है। इसके अलावा बर्फ निकालने के लिए उपकरण तो पृथ्वी से ही ले जाने होंगे।
इन चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्यम अवधि के लिए बर्फ के घर रहवास के लिए काम आ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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