ज़ेब्रा फिश: एक सुंदर और शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार

ज़ेब्रा फिश (zebra fish) उष्णकटिबंधीय मीठे पानी की एक छोटी-सी, सुंदर मछली है। यह भारत की नदियों और तालाबों में पाई जाती है। आजकल एक्वेरियम फिश की तरह इनका काफी उपयोग हो रहा है। इनका नाम ज़ेब्रा फिश इसलिए पड़ा क्योंकि इनके शरीर के दोनों तरफ ज़ेब्रा के समान खड़ी (यानी शरीर के समांतर) नीली धारियां पाई जाती हैं। ये बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें शोल (shoal) कहते हैं।  

इसका वैज्ञानिक नाम है डेनियो रेरियो (Danio rerio)। यह नाम बांग्ला भाषा से आया है। नाम का पहला अक्षर दानी (धान के खेत की) बताता है कि यह धान के खेतों जैसे उथले पानी में रहती है। नाम का दूसरा हिस्सा भी बांग्ला है जो इसका स्थानीय नाम है। यह पूरे दक्षिण एशिया के धान के खेतों की एक खास मछली है। इस मछली का विवरण सबसे पहले एक स्कॉटिश चिकित्सक फ्रांसिस हैमिल्टन ने 1822 में दिया था। उन्होंने इसे नाम दिया था सायप्रिनस रेरिओ (Cyprinus rerio)। शोध साहित्य में कभी-कभी इसे Brachydanio rerio नाम से भी संदर्भित किया गया। इसका वर्तमान नाम डेनियो रेरिओ 1981 में स्थापित हुआ था।

देखा जाए तो जैव विकास के पायदान पर ज़ेब्रा फिश हम स्तनधारियों (Mammals) से बहुत पीछे है। फिर भी कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे और इस मछली के 70 प्रतिशत जीन्स (Genes) एक समान हैं। इसके अलावा, हमारी तरह इनमें आंखें, कान, नाक, रीढ़ की हड्डी, हृदय, मुंह और पाचन तंत्र पाए जाते हैं। शरीर के इन अंगों के विकास के लिए तमाम ज़रूरी जीन्स और प्रक्रियाएं मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में पाई जाती हैं और ‘संरक्षित’ हैं, यानी करोड़ों सालों में इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यही कारण है कि मनुष्य में इन शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाने वाली किसी बीमारी का अध्ययन सैद्धांतिक रूप से ज़ेब्रा फिश में किया जा सकता है। आज ज़ेब्रा फिश चूहों और गिलहरियों की तुलना में एक बेहतर मॉडल जीव (modal organism) बन चुकी है।

इस मछली पर शोध की शुरुआत 1960 के दशक में आणविक जीव विज्ञानी (molecular biologist) जॉर्ज स्ट्राइसिंगर ने की थी। उनके प्रयोगों ने इसमें आनुवंशिक हेरफेर किए जाने की क्षमता को पहचाना। 1980 तक ज़ेब्रा फिश मनुष्य व अन्य रीढ़धारी जीवों (vertebrates) के विकास के अध्ययन का एक अमूल्य मॉडल बन चुकी थी।

ज़ेब्रा फिश – एक मॉडल जीव

2001 में ज़ेब्रा फिश के जीनोम के अनुक्रमण से पता चला कि मानव जीनोम से इसकी समानता 70 प्रतिशत है। फिर, क्रिस्पर-कास-9 (CRISPER CAS-9) जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की प्रगति के साथ मानव रोगों की मॉडलिंग और दवा की खोज में ज़ेब्रा फिश एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में स्थापित हो गई। इसके श्रेष्ठ प्रायोगिक मॉडल होने में निम्नलिखित लक्षणों का बड़ा योगदान है:

– आकार में बहुत छोटी है, बड़े समूहों में रहना पसंद करती हैं। अतः चूहों की तुलना में इन्हें पालने में कम जगह लगती है और रख-रखाव भी सस्ता है।

– लगभग हर 10 दिन में प्रजनन करती है। एक बार में 50 से 300 तक अंडे देती है। वैज्ञानिक प्रयोगों में परिणामों की सटीकता जांचने के लिए उन्हें कई बार दोहराया जाता है। इसलिए ऐसा जीव जो बार-बार बड़ी संख्या में संतान पैदा कर सके, प्रयोगों के लिए उपयोगी होता है।

– ज़ेब्रा फिश में बाह्य निषेचन (Outer fertilization) होता है, भ्रूण भी बाहर विकसित होते हैं। इनमें इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन अर्थात शरीर से बाहर परखनली में निषेचन कराया जा सकता है।

– एक कोशिका अवस्था वाले निषेचित अंडों में डीएनए या आरएनए आसानी से डाले जा सकते हैं। इस तरह नॉक-आउट या ट्रांसजेनिक/नॉक-इन (Knock out/ transgenic knock-in) ज़ेब्रा फिश किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।

– ज़ेब्रा फिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इसके चलते निषेचित अंडे से पूर्ण विकसित शिशु मछली बनते समय आंतरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। चूहे व अन्य बड़े जंतुओं में यह संभव नहीं होता।

– भ्रूण के पारदर्शी होने के कारण उन्हें फ्लोरेसेंट (florescent) रूप से चिन्हित कर उनके ऊतकों को भी देखा जा सकता है।

एक खास बात यह है कि एक मॉडल जंतु के रूप में ज़ेब्रा फिश का उपयोग मुख्यत: जीन्स के कार्यों और विकास सम्बंधी रोगों के संदर्भ में किया गया है। इसके अलावा, इसका उपयोग कैंसर विज्ञान, विकास सम्बंधी विकारों के अध्ययन और औषधि विकास सम्बंधी अनुसंधान में भी हुआ है। इसकी एक खूबी यह है कि इसे कोई दवा देना आसान है – गलफड़ों में पानी के ज़रिए।

नॉकआउट, नॉकइन

अक्सर किसी बीमारी का कारण जानने के लिए मरीज़ के डीएनए का अनुक्रमण (DNA Sequencing) किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जीन में हुए उत्परिवर्तन अर्थात म्यूटेशन (Mutation) संभावित रूप से उस रोग का कारण हो सकते हैं। इस तरह के विश्लेषण से यह पता चलता है कि क्या किसी जीन के कामकाज में बदलाव आया है जो लक्षणों का कारण हो सकता है। फिर, ज़ेब्रा फिश में उसी जीन में उत्परिवर्तन करवाया जाता है या उसे निष्क्रिय कर दिया जाता है। और इन परिवर्तित मछलियों में वैसे ही लक्षणों की जांच की जाती है।

जब ज़ेब्रा फिश में किसी समकक्ष जीन में उत्परिवर्तन के ज़रिए उसे ठप कर दिया जाता है, तो कहते हैं कि उस जीन को नॉक-आउट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि रोगी को मांसपेशियों से सम्बंधित बीमारी है तो ज़ेब्रा फिश में जीन में परिवर्तन (नॉक-आउट) के बाद मांसपेशियों के तंतुओं की संरचना में आई असामान्यता की जांच आसानी से सूक्ष्मदर्शी से की जा सकती है।

इसी प्रकार से यदि रोग के लक्षण गर्भाशय में विकास के दौरान शुरू हुए हों तो नाक-इन या नाक-आउट ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों में जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन के असर की जांच आसानी से की जा सकती है। नॉक-इन तब कहते हैं जब ज़ेब्रा फिश में किसी जीन को जोड़ा जाए और यह देखा जाए कि इसका क्या असर होता है।

कुछ मानव रोगों के उदाहरण 

मांसपेशीय विकार

ड्यूशेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) मांसपेशियों का एक रोग है जो अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें मांसपेशियों की कमज़ोरी बचपन में ही प्रकट होने लगती है और क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है।

ऐसा अंदाज़ा था कि डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) नामक जीन में उत्परिवर्तन ही डीएमडी के लिए ज़िम्मेदार है। डिस्ट्रॉफिन जीन की पहचान 1986 में लू कुन्केल ने की थी। उन्होंने बताया था कि यह एक्स गुणसूत्र पर स्थित होता है और डीएमडी में इसकी भूमिका है। 1987 में इस जीन के द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन (डिस्ट्रॉफिन) की पहचान हुई। डिस्ट्रॉफिन प्रोटीन मांसपेशियों की रक्षा करता है, यदि यह प्रोटीन न हो तो मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनका स्थान वसा और सख्त ऊतक लेने लगते हैं।

ज़ेब्रा फिश में डिस्ट्रॉफिन जीन के नॉक-आउट प्रयोगों से पता चला कि इसके असर मानव रोग डीएमडी से काफी मिलते-जुलते हैं। डीएमडी से पीड़ित रोगियों में डिस्ट्रॉफिन में उत्परिवर्तन पाए गए हैं। मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में, डिस्ट्रॉफिन की कमी से धीरे-धीरे मांसपेशियों के तंतु नष्ट हो जाते हैं।

उम्मीद है कि ज़ेब्रा फिश पर हो रहे अनुसंधान मांसपेशियों के विकार, खास तौर से डीएमडी के लिए विभिन्न औषधियों की जांच-पड़ताल में मददगार होंगे।

कैंसर व मेलेनोमा

मेलेनोमा त्वचा कैंसर का एक प्रकार है। वैसे तो यह एक तिल के रूप में शुरू होता है लेकिन समय से सर्जरी करके न हटाया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह मुख्य रूप से त्वचा की मेलेनोसाइट (melenocyte) कोशिकाओं को प्रभावित करता है और यूवी प्रकाश या टैनिंग बेड के उपयोग से शुरू होता है।

ज़ेब्रा फिश को मानव मेलेनोमा का सफल मॉडल भी बनाया गया है। मानव मेलेनोमा में सबसे आम तौर पर पहचाना जाने वाला उत्परिवर्तन जीन BRAF में एक एकल अमीनो एसिड परिवर्तन (V600E) है। BRAF V600E उत्परिवर्तन एक अर्जित उत्परिवर्तन है। इस उत्परिवर्तित जीन द्वारा बनाए गए BRAF प्रोटीन में पोज़ीशन 600 पर वैलीन नामक अमीनो एसिड का स्थान ग्लूटेमिक एसिड ले लेता है। इस परिवर्तन की वजह से यह प्रोटीन निरंतर सक्रिय रहता है और कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर ट्यूमर तथा कैंसर का कारण बन जाती हैं।

चूंकि कैंसर कई जेनेटिक परिवर्तनों के संयोजन से होते हैं, इसलिए इस नॉक-इन ज़ेब्रा फिश लाइन का उपयोग अन्य संभावित कैंसर पैदा करने वाले उत्परिवर्तनों की जांच के लिए किया गया था। जब BRAF नॉक-इन ज़ेब्रा फिश में SETDB1 नामक एक अन्य सामान्य रूप से देखे जाने वाले मेलेनोमा उत्परिवर्तन को जोड़ा गया, तो तेज़ी से मेलेनोमा विकसित हुआ।

हृदय रोग

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी ज़ेब्रा फिश मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। ज़ेब्रा फिश का हृदय हमारे समान चार प्रकोष्ठ वाला नहीं बल्कि दो प्रकोष्ठ का होता है। लेकिन हृदय का शुरुआती विकास लगभग वैसा ही होता है जैसा अन्य एम्नियॉटिक जंतुओं में (एम्नियोटिक जंतु उन्हें कहते हैं जिनमें भ्रूण के विकास के दौरान उसके आसपास एक विशेष झिल्ली (एम्नियॉन) बनती है। इस झिल्ली से बनी एम्नियोटिक थैली (amniotic sac) की बदौलत ही इन जंतुओं के भ्रूण का विकास पानी से बाहर शुष्क वातावरण में भी हो पाता है।चूहों के विपरीत, ज़ेब्रा फिश को भ्रूण अवस्था में जीवित रहने के लिए एक कार्यात्मक हृदय प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती है। कारण यह है कि इतने छोटे जंतु को ज़रूरी ऑक्सीजन सीधे विसरण के ज़रिए मिल जाती है। इसलिए, शोधकर्ता गंभीर हृदय विकृतियों वाली ज़ेब्रा फिश में ऐसे शारीरिक अंतरों का अवलोकन कर पाते हैं जिनका अध्ययन चूहों में नहीं किया जा सकता है। 

वैसे कशेरुकी जंतुओं में मायोसाइट एनहांसर फैक्टर (हृदय कोशिकाओं को उन्नत बनाने वाले कारक) के चार रूप पाए जाते हैं Mef2A, Mef2B, Mef2C और Mef2D। जहां इनसे बनाए जाने वाले प्रोटीन्स हृदय के विकास में भूमिका निभाते हैं, वहीं यह भी देखा गया है कि इनमें से Mef2C प्रमुख है।

अब बात आती है ज़ेब्रा फिश की। एक तो हम देख चुके हैं कि ज़ेब्रा फिश कई दिनों तक हृदय के बगैर भी जी पाती हैं। दूसरा, पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में जैव-विकास के किसी चरण में Mef2C जीन दो भागों में बंट गया था – Mef2ca और Mef2cb।

2012 के एक शोध से पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में Mef2ca और Mef2cb पहले और दूसरे हृदय क्षेत्र दोनों की कोशिकाओं के विभेदन के लिए आवश्यक हैं। Mef2ca और Mef2cb कोशिकीय विभेदन के महत्वपूर्ण नियामक हैं। इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि जब ज़ेब्रा फिश भ्रूण में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीनों की हानि हो जाए तो क्या होता है। पाया गया कि जिन भ्रूणों में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीन की कमी होती है, उनमें हृदय में मांसपेशीय कोशिका विभेदन में दोष होते हैं। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, Mef2ca या Mef2cb जीन में से किसी एक की कमी हृदय के कार्य को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि Mef2 गतिविधि सभी हृदय कोशिका विभेदन के लिए आवश्यक है।

विष विज्ञान

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेन्यूब नदी के पानी के विभिन्न नमूनों में ज़ेब्रा फिश रखीं और भ्रूण की असामान्यताओं के विकास का अवलोकन किया। पता चला कि सभी 22 नमूने कुछ हद तक मृत्यु का कारण बन सकते थे। चूंकि शोधकर्ता ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के विकास का अवलोकन कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इन भ्रूणों में आंखों की विकृतियां, असामान्य रंजक और बहुत कम या न के बराबर रक्त संचार देखा। ज़ेब्रा फिश की मदद से शोधकर्ताओं ने पानी में मौजूद विषैले पदार्थों की पहचान भी की। ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों को कृत्रिम रूप से तैयार किए गए एक मिश्रण में डाला गया। कुल मिलाकर उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या ज़ेब्रा फिश का उपयोग पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन करने में किया जा सकता है।

इसी प्रकार के प्रयोग कई अन्य नदियों/तालाबों में किए गए हैं। जैसे मुंबई महानगर की मीठी नदी के पानी का ज़ेब्रा फिश भ्रूणों पर असर 2023 में एन्वायर्मेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन के लिए मीठी नदी से 10 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए थे। इन सभी नमूनों में ज़ेब्रा फिश भ्रूण विषाक्तता परीक्षण किया गया। प्रयोग में पता चला कि सामान्य पानी में रखे गए भ्रूणों और विभिन्न स्थलों के पानी में रखे गए भ्रूणों के बीच मृत्यु दर, अंडे में कोग्यूलेशन, पेरिकार्डियल एडीमा (pericardial edima), योक थैली के एडीमा, पूंछ की ऐंठन और कंकाल (skeleton) सम्बंधी विकारों की दृष्टि से काफी अंतर रहा। एक तो इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ की मीठी नदी का पानी जलीय जीवों के लिए घातक है। साथ ही पानी की गुणवत्ता को परखने के लिए ज़ेब्रा फिश की उपयोगिता भी प्रमाणित हुई।

टॉक्सिकोलॉजी साइंसेस में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में विष वैज्ञानिक अध्ययनों में ज़ेब्रा फिश के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका उपयोग आणविक स्तर से लेकर पूरे जीव की सेहत और व्यवहार पर असर के अध्ययन तक में किया जा रहा है। दरअसल, समीक्षा पर्चे में कहा गया है कि ज़ेब्रा फिश कांच के उपकरणों (in-vitro) में किए जाने वाले अध्ययनों और उच्चतर जीवों पर असर के बीच एक सेतु बन गया है।

विकास/परिवर्धन की विकृतियां

ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक उत्परिवर्ती (हेडलेस) में T-cell factor-3 में उत्परिवर्तन हुआ था जिसके चलते उसके सिर के विकास में गड़बड़ियां पैदा हुईं। इन प्रयोगों से यह स्थापित हुआ कि हेडलेस उत्परिवर्ती Wnt संकेतन मार्ग से नियंत्रित जीन्स का दमन करता है। ये जीन्स कोशिकाओं की संख्यावृद्धि, उनके विभेदन और स्टेम कोशिका (stem cells) अवस्था बनाए रखने का नियंत्रण करते हैं।

इसी प्रकार से ज़ेब्रा फिश ने तंत्रिकाओं की पहचान करने और मस्तिष्क की बनावट (आर्किटेक्चर) को समझने में भी योगदान दिया है। इसमें शुरुआती तंत्रिका प्लेट अवस्था में तंत्रिकाओं के निर्माण से लेकर वयस्क मस्तिष्क के विकास तक की अवस्थाओं को देखा जा सका है।

मानसिक विकार

ज़ेब्रा फिश अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में रहते हैं। लिहाज़ा, इनका उपयोग मानसिक विकारों के व्यवहारगत परीक्षणों में संभव है। चिओल-ही किम व उनके साथियों ने ज़ेब्रा फिश में मानसिक विकारों से सम्बंधित एक जीन समूह की खोज की है। इस जीन परिवार को सैमडोरी (सैम) नाम दिया गया है। पांच जीन्स के इस समूह में से sam2 मस्तिष्क के हैबेन्यूलर न्यूक्लिआई में अभिव्यक्त होता है। इसका सम्बंध बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से देखा गया है।        sam2 नॉक-आउट से चूहों व ज़ेब्रा फिश दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया (जैसे डर और दुश्चिंता) में गड़बड़ी देखी गई जो दुश्चिंता सम्बंधी विकारों और ऑटिज़्म में भी दिखती है।

वायरस संक्रमणों का अध्ययन

हाल के वर्षों में ज़ेब्रा फिश वायरस संक्रमणों की तहकीकात के लिए भी एक मॉडल बनकर उभरा है। ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से वायरस की रोगजनन क्रियाविधि, मेज़बान की प्रतिक्रिया तथा संभावित उपचारों की दिशा में मदद मिली है। खास तौर से ज़ेब्रा फिश मॉडल्स से वायरस संख्यावृद्धि, टिशू ट्रॉपिज़्म (tissue tropism) (यानी कोई वायरस किन ऊतकों को संक्रमित करेगा), और प्रतिक्षा तंत्र को चकमा देने की विभिन्न वायरसों की रणनीतियों को उजागर करने में मदद मिली है। इनमें चिकनगुनिया वायरस, डेंगू वायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस टाइप-1 और इंफ्लुएंज़ा-ए वायरस शामिल हैं।

इसके अलावा कई वायरसों जैसे, सार्स-सीओवी-2, ज़िका वायरस और डेंगू वायरस के खिलाफ विकसित एंटी-वायरल (anti-viral) पदार्थों तथा प्राकृतिक एजेंट्स की प्रभाविता की जांच करने में भी मदद मिली है।

खास तौर से ज़ेब्रा फिश भ्रूणों की पारदर्शिता तथा जेनेटिक तहकीकात की सरलता के चलते वायरस के प्रसार और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करना सुगम हुआ है।

ज़ेब्रा फिश की सीमाएं

ज़ेब्रा फिश को एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ सीमाएं भी है। जैसे ज़ेब्रा फिश में ऐसी इंसानी बीमारियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता जो ऐसे जीन्स की वजह से होती हैं जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते। जैसे ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के पैंक्रियास की रचना तो एक सी है लेकिन उनके बीच जेनेटिक अंतर हैं। इस वजह से मोटापे जैसे कई चयापचय रोगों (metabolic diseases) का अध्ययन नहीं हो पाता। इसके अलावा, ज़ेब्रा फिश की मदद से उन अंगों से सम्बंधित अध्ययन भी नहीं किए जा सकते जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते – जैसे प्रोस्टेट ग्रंथि (prostrate gland), स्तन ग्रंथियां या फेफड़े।

ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि जहां मनुष्य व अन्य स्तनधारी समतापी होते हैं वहीं ज़ेब्रा फिश (अन्य मछलियों व सरिसृपों के समान) विषमतापी होते हैं यानी इनके शरीर का तापमान आसपास के वातावरण के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश को कृत्रिम रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रखा जाता है। इसलिए इन पर किए गए प्रयोगों के परिणाम शायद मनुष्यों पर लागू न हो पाएं।

ज़ेब्रा फिश सांस लेने का काम गलफड़ों (gills) से करती है जबकि मनुष्य इसके लिए फेफड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके चलते ज़ेब्रा फिश में हृदय और गलफड़ों के बीच परिवहन तंत्र नहीं पाया जाता। इसी वजह से कई बीमारियों का अध्ययन ज़ेब्रा फिश मॉडल में नहीं किया जा सकता – जैसे श्वसन रोग, हार्ट अटैक।

कृन्तकों (rodents) के विपरीत ज़ेब्रा फिश और अन्य मछलियां, अंतःप्रजनन (inbreeding) को सहन नहीं कर पातीं और अंतःप्रजनन से तेज़ी से प्रजनन क्षमता खो देती हैं। अंत:प्रजनन इसलिए करवाया जाता है ताकि जेनेटिक संरचना कई पीढ़ियों तक बनी रहे।

ज़ेब्रा फिश पानी में रहती हैं। इनके भ्रूणों के थ्री-डी विश्लेषण (3-D analysis) के दौरान प्रकाश के अपवर्तन की वजह से छवियां ठीक से नहीं बन पातीं। दूसरी दिक्कत यह आती है कि ये भ्रूण हिलते-डुलते रहते हैं।

आम तौर पर किसी दवा का असर जांचने के लिए वह दवा पानी में घोल दी जाती है और भ्रूण उसे गलफड़ों के ज़रिए ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन पानी में अघुलनशील दवाइयां इस तरह से देना कठिन होता है।

प्रतिरक्षा के संदर्भ में भी ज़ेब्रा फिश में कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखते हैं।

हालांकि ज़ेब्रा फिश कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, फिर भी उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च-थ्रूपुट तकनीक ने रसायनों और दवाओं की जांच में विषाक्तता परीक्षणों में ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के उपयोग की संभावना को बढ़ा दिया है।

प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश उन अनुसंधान क्षेत्रों की पूर्ति कर सकती हैं जिनमें चूहे के मॉडल असफल हुए हैं। शायद अगले कुछ वर्षों में, विज्ञान की अगली बड़ी खोज का श्रेय ज़ेब्रा फिश को दिया जाएगा (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://cdn.britannica.com/96/219196-050-9DD604F0/Zebra-Fish-Danio-Zebrafish.jpg

धरती का चढ़ता पारा और आसमानी बिजली

सुदर्शन सोलंकी

र्मियों में चलने वाली भीषण ग्रीष्म लरहों के बाद जब आसमान में घने काले ‘क्युमुलोनिम्बस बादल’ (cumulonimbus clouds) घुमड़ते हैं, तो वे केवल बारिश का संदेश नहीं लाते। दरअसल, ये बादल हवा में तैरते हुए एक बिजली संयंत्र की तरह काम करते हैं। इन बादलों से अचानक कड़कती बिजली प्रकृति की सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक है।

आधुनिक मौसम विज्ञान और पर्यावरण वैज्ञानिकों के नए अनुसंधानों ने बताया है कि आसमान से बरसने वाली बिजली का सीधा सम्बंध धरती के बढ़ते तापमान से जुड़ चुका है।

बादलों का ‘पावर बैंकऔर तड़ित का विज्ञान

भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, बादल सिर्फ पानी की बूंदों के समूह नहीं हैं, बल्कि वे हवा में तैरते हुए विशालकाय प्राकृतिक संधारित्र (natural capacitor) की तरह हैं। जब तेज़ गर्मी के कारण नमी से भरी गर्म हवा तेज़ी से ऊपर की ओर उठती है तो वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में अत्यधिक ठंड के कारण यह नमी बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदलने लगती है। 

हवा के इस तेज़ ऊर्ध्वाधर बहाव के दौरान, कुछ कण बड़े होने लगते हैं और वज़न बढ़ने के कारण वे नीचे गिरने लगते हैं। दूसरी ओर, बारीक हिम कण (snow crystals) हवा के साथ ऊपर उठते रहते हैं। जब नीचे गिरते और ऊपर उठते ये बर्फ के कण आपस में टकराते हैं, तो उनके बीच घर्षण के कारण स्थिर विद्युत पैदा होती है। कुल मिलाकर परिणाम यह होता है कि बादलों का ऊपरी हिस्सा धनावेशित (positively charged) और निचला हिस्सा ऋणावेशित (negatively charged) हो जाता है। जब इन दोनों विपरीत आवेशों के बीच का विद्युत क्षेत्र वायु की अवरोधक क्षमता को तोड़ देता है, तो बादलों के भीतर ही बिजली (lightening) कौंधने  लगती है।

लेकिन जब बादलों का यह भारी-भरकम ऋणावेश धरती की तरफ लपकता है, तो इसे ‘क्लाउड-टू-ग्राउंड’ लाइटनिंग (cloud-to-ground lightening) यानी ज़मीन पर बिजली गिरना कहा जाता है। पल भर के लिए गिरने वाली इस एक कड़क में करीब 10 करोड़ से 100 करोड़ वोल्ट का क्षणिक वोल्टेज और हज़ारों एम्पीयर (ampere) का करंट हो सकता है। इस दौरान पैदा होने वाला तापमान सूर्य की दृश्य सतह से भी पांच गुना ज़्यादा (लगभग 30,000 डिग्री सेल्सियस) होता है, जो आसपास की हवा को अचानक फैलाता है। हवा के इसी तीव्र  और तात्कालिक फैलाव से उत्पन्न होने वाली शॉक वेव (shock wave) हमें भयानक गड़गड़ाहट के रूप में सुनाई देती है।

कैटाटुम्बो: जहां कभी शांत नहीं होता आसमान

अगर हमें प्रकृति के इस अद्भुत बिजलीघर को करीब से समझना है, तो वेनेज़ुएला में कैटाटुम्बो नदी (catatumbo river) और मैराकैबो झील (maracaibo lake) के संगम पर जाना होगा। यहां के संगम पर प्रकृति का एक ऐसा अनूठा नज़ारा दिखता है, जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है।

इस अनोखे क्षेत्र में साल के 365 दिनों में से लगभग 300 रातों को लगातार बिजली कड़कती है। एंडीज़ पर्वतों (andes mountains) से आने वाली बर्फीली हवाएं जब मैराकैबो बेसिन (meracabo basin) की अत्यधिक गर्म और नम हवाओं से टकराती हैं, तो यह पूरा इलाका एक कड़कड़ाते अखाड़े में बदल जाता है। यहां एक मिनट में दर्जनों बार बिजली कौंधती है, जिससे रातें भी दिन की तरह उजली हो जाती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह प्रक्रिया पृथ्वी के पर्यावरण के लिए एक वरदान है, क्योंकि इस उच्च-स्तरीय बिजली से उत्पन्न नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (nitrogen oxides) वर्षा जल के साथ मिलकर मिट्टी में पहुंचते हैं, जिससे प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है और पौधे इसे पोषक तत्व के रूप में ग्रहण करते हैं। कहते हैं कि इतनी बिजली कड़कने से ओज़ोन (ozone) भी बनती है लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह धरती के ओज़ोन कवच को सुदृढ़ करती है।                                                                        

ग्लोबल वॉर्मिंग: बारूद के ढेर पर मौसम

चिंताजनक बात यह है कि जो प्रक्रिया पृथ्वी के वायुमंडलीय संतुलन के लिए ज़रूरी थी, वह अब मानवीय हस्तक्षेप के कारण एक घातक आपदा बनती जा रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और दुनिया भर के जलवायु वैज्ञानिकों के हालिया अनुसंधानों ने एक गंभीर चेतावनी दी है। जैसे-जैसे कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, वायुमंडल में गर्मी और नमी सोखने की क्षमता अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। वायुमंडल में अधिक ऊष्मा का सीधा सा मतलब है बादलों के भीतर हवा का और तेज़ बहाव और कणों का अधिक आक्रामक घर्षण। वैज्ञानिक गणना के अनुसार, यदि पृथ्वी के औसत तापमान में केवल 1 डिग्री सेल्सियस की भी वृद्धि होती है, तो आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में सीधे 12 प्रतिशत का इज़ाफा हो जाता है। इसके अतिरिक्त शहरों का बढ़ता प्रदूषण और हवा में तैरते धूल के सूक्ष्म कण बादलों के भीतर चार्जिंग की इस प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में ‘मल्टीपल लाइटनिंग स्ट्रोक्स’ (Multiple Lightening strokes) (एक साथ कई बार बिजली गिरना) की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं।

साइड फ्लैशका खतरा और ग्रामीण भारत का संकट

चक्रवात, बाढ़ या भारी बारिश जैसी आपदाएं दूर से आती दिखाई देती हैं, जिससे जान-माल को सुरक्षित करने का कुछ वक्त मिल जाता है। लेकिन आकाशीय बिजली एक ‘अदृश्य और तात्कालिक आपदा’ (invisible and emergency disaster) है, जो पलक झपकते ही सब कुछ खत्म कर देती है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली कुल मौतों में से लगभग 40 प्रतिशत अकेले बिजली गिरने से होती हैं, जो बाढ़ और भूकंप से भी ज़्यादा हैं।

इसका एक सामाजिक-आर्थिक पहलू भी है। इससे प्रभावित होने वाले 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों के किसान, चरवाहे और खेत मज़दूर होते हैं। अक्सर खेतों में काम करते समय जब अचानक बारिश शुरू होती है, तो बचाव के लिए किसी ऊंचे पेड़ के नीचे खड़े हो जाते हैं। लेकिन कई बार बिजली आसपास के क्षेत्र को भी प्रभावित करती हैं। इसे ‘साइड फ्लैश’ कहते हैं। बिजली गिरती तो सीधे पेड़ पर है लेकिन पेड़ की उच्च विद्युत प्रतिरोधकता (high electrical resistivity) के कारण वह हवा या ज़मीन के रास्ते पास खड़े इंसानों के शरीर में डिस्चार्ज हो जाती है। जिससे पल भर में कार्डिएक अरेस्ट (cardiac arrest) हो जाता है।

सुरक्षा के उपाय 

बिजली कड़के तब तुरंत किसी पक्के मकान या बंद कार के अंदर चले जाएं। और अंतिम गर्जना के बाद भी कम से कम 30 मिनट तक अंदर ही रहें।

तकनीक का सहारा: भारत सरकार का ‘दामिनी ऐप’ सैटेलाइट डैटा के ज़रिए 20 से 40 किलोमीटर के दायरे में बिजली गिरने से आधा घंटा पहले सटीक अलर्ट दे देता है। सुरक्षा के लिए इस डिजिटल सुरक्षा कवच को हर किसान तक पहुंचाना आवश्यक है।

तड़ित चालक: बहुमंज़िला इमारतों, ग्रामीण स्कूलों और पंचायत भवनों पर बेंजामिन फ्रैंकलिन द्वारा आविष्कृत तड़ित चालक (Lightening rod) लगाना अनिवार्य होना चाहिए, जो आसमानी बिजली को सुरक्षित रूप से ज़मीन के अंदर भेज देता है।

आसमान में बिजली का कौंधना प्रकृति की एक आवश्यक और खूबसूरत वैज्ञानिक प्रणाली है। लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ता वैश्विक तापमान बादलों को अधिक आक्रामक और हिंसक बना रहा है। यदि हमने आज भी अपने कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले दिनों में बादलों की यह गड़गड़ाहट हमारी तबाही का संगीत बन जाएगी। प्रकृति के इस बढ़ते गुस्से का मुकाबला अंधविश्वास या डर से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण से ही किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सौरमंडल के बाहर भी मौजूद हैं चुंबकीय क्षेत्र वाले ग्रह

इरफान ह्युमैन

गोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट (बाह्यग्रहोंं) पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष प्रमाण देखे हैं। यह एक महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को उनके तारे के हानिकारक विकिरण से सुरक्षित रखते हैं, जिससे उन पर जीवन की संभावना बढ़ जाती हैं।

एक्सोप्लैनेट वे ग्रह होते हैं जो हमारे सूर्य के अलावा किसी अन्य तारे की परिक्रमा करते हैं। इन दूरस्थ ग्रहों पर जीवन की खोज खगोल विज्ञान के सबसे रोमांचक क्षेत्रों में से एक है। पृथ्वी पर, हमारा चुंबकीय क्षेत्र (electromagnetic space) हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक सौर तूफानों और विकिरण से बचाता है, जिससे हमारे ग्रह पर जीवन संभव हो पाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी एक्सोप्लैनेट (exoplanet) पर एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति उस ग्रह को निवास योग्य बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं।

हमारे सौरमंडल (solar system) के अधिकांश ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित हैं। इस नई खोज में जिन सात एक्सोप्लैनेट का अध्ययन किया गया, वे अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रह हैं। पहले भी पृथ्वी के आकार के सात ग्रहों की खोज की गई है जो एक ही तारे की परिक्रमा कर रहे हैं, जिनमें से कुछ पर जीवन की संभावना जताई जा रही है। वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) जैसे पृथ्वी समान चट्टानी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना विशेष रूप से उत्साहजनक है।

इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने सात अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण किया है, जो इस प्रकार है:

1. खगोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर के सात ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष संकेत पाए हैं।

2. यह खोज जीवन की संभावनाओं की तलाश में महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को हानिकारक विकिरण से बचाते हैं।

3. इन ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण चिली और हवाई में स्थित दूरबीनों से प्राप्त डेटा का उपयोग करके किया गया।

4. कुछ शोधों में प्रॉक्सिमा (proxima) प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत भी मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी जैसे पड़ोसी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति का सुझाव देते हैं।

5. पृथ्वी के आकार के एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना भी जीवन की उपस्थिति का संकेत मानी जा रही है।

ऐसे ग्रह वैज्ञानिकों की विशेष रुचि के केंद्र हैं। इनमें से कुछ पृथ्वी जैसे आकार के हैं और अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में स्थित हैं। जूलिया वी. सीडेल और उनके सहयोगियों द्वारा की गई यह खोज 2 जून, 2026 को नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में “मैग्नेटिक फील्ड स्ट्रेंथ ऑफ हॉट जाएंट एक्सोप्लेनेट्स कंसिस्टेंट विद सोलर सिस्टम वैल्यू” शीर्षक से प्रकाशित हुई है।

हाल ही में खोजे गये सात दूरस्थ बाह्यग्रह:- 
ट्रापिस्ट-1ई TRAPPIST-1e
ट्रापिस्ट-1एफ TRAPPIST-1f
ट्रापिस्ट-1जी TRAPPIST-1 g
प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी Proxima Centauri b
केप्लर-186एफ Kepler-186f
एलएचएस-1140 बी LHS 1140 b
के2-18 बी K2-18b

चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता

1. हानिकारक विकिरण से सुरक्षा: तारे लगातार उच्च ऊर्जा वाले कण और विकिरण उत्सर्जित करते हैं। यदि किसी ग्रह के पास मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, तो ये कण सीधे उसके वायुमंडल और सतह तक पहुंच सकते हैं।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक ढाल (shield) की तरह कार्य करता है और अधिकांश सौर पवन (solar air) को मोड़ देता है।

2. वायुमंडल की रक्षा: चुंबकीय क्षेत्र ग्रह के वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन हो जाने से बचाता है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र बहुत कमज़ोर है। परिणामस्वरूप, सौर पवन ने धीरे-धीरे उसके अधिकांश वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन कर दिया। इसी कारण आज मंगल (mars) शुष्क और ठंडा दिखाई देता है।

3. तरल जल का संरक्षण: यदि वायुमंडल सुरक्षित रहेगा तो सतह पर तापमान नियंत्रित रहेगा और पानी लंबे समय तक तरल अवस्था में रह सकता है। जीवन के लिए यह एक महत्वपूर्ण शर्त मानी जाती है।

चुंबकीय क्षेत्र की खोज

एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्रों का पता लगाना एक जटिल कार्य है क्योंकि ये ग्रह बहुत दूर हैं और सीधे अवलोकन करना मुश्किल है। खगोलविद आमतौर पर अप्रत्यक्ष तरीकों पर निर्भर करते हैं।

1. रेडियो उत्सर्जन: जब किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने तारे से आने वाले आवेशित कणों (जैसे सौर पवन) के साथ अंतर्क्रिया करता है, तो इससे अक्सर रेडियो तरंगें (radio waves) उत्पन्न होती हैं। इन रेडियो तरंग संकेतों को पृथ्वी पर स्थित रेडियो दूरबीनों (radio telescopes) द्वारा पता लगाया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, पृथ्वी के आकार के चट्टानी एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) से लगातार आने वाले रेडियो संकेतों का पता लगाया गया है। यह संकेत उस ग्रह पर एक चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का एक मज़बूत संकेतक माना जाता है।

2. वायुमंडलीय अवलोकन और क्षरण का विश्लेषण: किसी ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके वायुमंडल को तारे के हानिकारक विकिरण (radiations)और सौर पवन से बचाता है। यदि किसी ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर या अनुपस्थित है, तो उसका वायुमंडल समय के साथ क्षरित हो सकता है। खगोलविद एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल के संघटन और उसके क्षरण की दर का अध्ययन करके चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अनुमान लगा सकते हैं।

3. तारे और ग्रह के बीच चुंबकीय अंतःक्रिया: कुछ मामलों में, किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने मेज़बान तारे के चुंबकीय क्षेत्र के साथ अंतःक्रिया कर सकता है। यह अंतःक्रिया तारे की गतिविधि (जैसे सौर फ्लेयर्स या स्टारस्पॉट) में परिवर्तन ला सकती है, जिसे दूरबीनों द्वारा मापा जा सकता है। इस तरह की अंतःक्रियाओं का पता लगाना ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अप्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान कर सकता है।

उदाहरण के लिए, प्रॉक्सिमा बी (Proxima b) जैसे पड़ोसी एक्सोप्लैनेट के लिए प्रॉक्सिमा प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी पर एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की संभावना का संकेत देते हैं।

4. ध्रुवीकरण मापन: चुंबकीय क्षेत्र प्रकाश के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से, एक्सोप्लैनेट से परावर्तित या उत्सर्जित प्रकाश के ध्रुवीकरण का मापन उसके चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है। हालांकि, यह विधि अत्यधिक संवेदनशील और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।

चुंबकीय क्षेत्र और जीवन संभावना

किसी ग्रह पर जीवन को संभव बनाने के लिए चुंबकीय क्षेत्र एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच हो सकता है, लेकिन यह जीवन के अस्तित्व की गारंटी नहीं देता। जीवन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए कई भौतिक, रासायनिक और जैविक परिस्थितियों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है।

इसे एक घर के उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि चुंबकीय क्षेत्र घर की मज़बूत दीवार है, तो जीवन के लिए जल, वायुमंडल, तापमान और आवश्यक रासायनिक तत्व उस घर की नींव, छत और भोजन के समान हैं। केवल दीवार होने से घर रहने योग्य नहीं बन जाता। इसके लिए निम्नलिखित अन्य तत्व भी आवश्यक हैं:

1. तरल जल की उपलब्धता: वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल में हुई थी। पानी को ‘सार्वभौमिक विलायक’ (universal solvent) कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न रासायनिक पदार्थों को घोलकर जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं को संभव बनाता है। सजीव कोशिकाओं में होने वाली लगभग सभी प्रक्रियाएं पानी की उपस्थिति में ही संपन्न होती हैं।

यदि किसी ग्रह पर पानी पूरी तरह बर्फ बन जाए, या अत्यधिक गर्मी के कारण वाष्पित हो जाए, तो जीवन की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसी कारण वैज्ञानिक किसी ग्रह को रहने योग्य मानने से पहले यह देखते हैं कि वह अपने तारे के रहने योग्य क्षेत्र (हैबिटेबल ज़ोन) (habitable zone) में स्थित है या नहीं, जहां पानी तरल रूप में मौजूद रह सकता है।

2. स्थिर वायुमंडल: वायुमंडल किसी ग्रह के लिए सुरक्षा चादर की तरह कार्य करता है। इसके प्रमुख कार्य हैं-

– तापमान को नियंत्रित करना

– हानिकारक विकिरण रोकना

– पानी को संरक्षित रखना

– जीवन के लिए आवश्यक गैसें उपलब्ध कराना

पृथ्वी का वायुमंडल लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन से बना है। यही संतुलन जीवन को संभव बनाता है। यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना हो, तो दिन में भीषण गर्मी और रात में कड़ाके की ठंड हो सकती है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना है, जिसके कारण वहां जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पातीं।

3. उपयुक्त तापमान: जीवन के लिए तापमान का संतुलित होना आवश्यक है। अत्यधिक ठंड में पानी जम जाता है, रासायनिक अभिक्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं। अत्यधिक गर्मी में जैविक अणु टूट सकते हैं, पानी वाष्पित हो सकता है। पृथ्वी पर औसत तापमान जीवन के लिए अनुकूल है। इसके विपरीत शुक्र ग्रह का सतही तापमान लगभग 460 डिग्री सेल्सियस है। मंगल पर तापमान अक्सर शून्य से बहुत नीचे चला जाता है। दोनों जगह जीवन के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं।

4. आवश्यक रासायनिक तत्व: पृथ्वी पर ज्ञात सभी जीव मुख्य रूप से कुछ मूल तत्वों से बने हैं-

– कार्बन

– हाइड्रोजन

– ऑक्सीजन

– नाइट्रोजन

– फॉस्फोरस

– सल्फर

इन्हें कभी-कभी ‘सीएचएनओपीएस’ (CHNOPS) तत्व कहा जाता है। कार्बन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जटिल अणुओं और डीएनए (DNA) जैसी संरचनाओं का निर्माण कर सकता है। यदि किसी ग्रह पर ये तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं, तो जीवन के निर्माण की संभावना कम हो जाती है।

5. लंबे समय तक स्थिर पर्यावरण: जीवन को विकसित होने में लाखों या अरबों वर्ष लग सकते हैं। पृथ्वी पर जीवन लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया था; जटिल जीवों को विकसित होने में तो और भी अधिक समय लगा।

यदि किसी ग्रह पर बार-बार विनाशकारी विकिरण वर्षा, अत्यधिक ज्वालामुखीय गतिविधियां, लगातार उल्कापिंडों की बौछार, या तारे की अस्थिरता होती रहे, तो जीवन के विकास की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इसलिए केवल जीवन की उत्पत्ति ही नहीं, बल्कि उसका लंबे समय तक टिके रहना भी महत्वपूर्ण है।

चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन

क्या चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है? यह प्रश्न आधुनिक खगोलजीवविज्ञान (Astrobiology) के सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते थे कि जीवन के लिए एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र लगभग अपरिहार्य है। लेकिन हाल के दशकों में हुए अध्ययनों ने संकेत दिया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है, विशेषकर सूक्ष्मजीवी (microbial) जीवन। हालांकि, ऐसे वातावरण में जीवन का अस्तित्व और विकास अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।

किसी ग्रह के पास चुंबकीय क्षेत्र न हो तो

1. सौर पवन (सोलर विंड) सीधे ग्रह के वायुमंडल से टकराएगी।

2. उच्च-ऊर्जा कण सतह तक पहुंचेंगे।

3. वायुमंडल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में उड़ सकता है।

4. डीएनए और अन्य जैविक अणुओं को विकिरण से क्षति पहुंच सकती है।

फिर भी कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन समस्याओं को कम कर सकती हैं। जैसे,

1. अत्यंत घने वायुमंडल की प्राकृतिक ढाल: यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत घना हो, तो वह स्वयं विकिरण से रक्षा कर सकता है। पृथ्वी पर भी हमारी सुरक्षा केवल चुंबकीय क्षेत्र से नहीं होती, बल्कि वायुमंडल भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, शुक्र के पास पृथ्वी जैसा मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी उसका वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में लगभग 90 गुना अधिक घना है। ऐसा घना वायुमंडल अधिकांश कॉस्मिक किरणों (cosmic rays) को रोक सकता है; तापमान को स्थिर रखने में मदद कर सकता है; और सतह पर विकिरण का प्रभाव कम कर सकता है। हालांकि शुक्र पर अत्यधिक तापमान जीवन के लिए बाधा है, लेकिन यह उदाहरण दिखाता है कि वायुमंडल कभी-कभी चुंबकीय क्षेत्र की कमी की आंशिक भरपाई कर सकता है।

2. भूमिगत जीवन (सबसर्फेस लाइफ): पृथ्वी पर अनेक जीव ऐसे स्थानों पर पाए गए हैं जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुंचता। वैज्ञानिकों ने गहरी खानों में, भूमिगत चट्टानों में, कई किलोमीटर नीचे स्थित जलाशयों में सूक्ष्मजीव खोजे हैं। ये जीव ऊर्जा प्राप्त करते हैं रासायनिक अभिक्रियाओं से, खनिजों से और भू-तापीय (जियोथर्मल) (geothermal) स्रोतों से। अर्थात यदि किसी ग्रह की सतह विकिरण के कारण रहने योग्य न हो, तो जीवन भूमिगत विकसित हो सकता है। कुछ मीटर से लेकर कुछ किलोमीटर मोटी चट्टानें विकिरण को प्रभावी ढंग से रोक सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की सतह के नीचे आज भी सूक्ष्मजीवी जीवन मौजूद हो सकता है।

3. बर्फ के नीचे महासागर: यह संभावना वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित करती है। हमारे सौरमंडल में ऐसे कई पिंड हैं जिनकी सतह बर्फ से ढंकी है लेकिन नीचे विशाल महासागर होने की संभावना है। उदाहरण के लिए, यूरोपा (Europa)और एंसेलेडस (Enceladus)। इन पिंडों पर कई किलोमीटर मोटी बर्फ मौजूद है लेकिन नीचे तरल जल के महासागर होने के प्रमाण मिले हैं। ज्वारीय बलों (टाइडल फोर्सेस) के कारण आंतरिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।

बर्फ की मोटी परत विकिरण से सुरक्षा देती है; तापमान को स्थिर रखती है; जल को तरल अवस्था में बनाए रख सकती है। यदि वहां जीवन है, तो उसे चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।

4. समुद्र की गहराइयों में जीवन: पृथ्वी पर समुद्र की गहराइयों में स्थित हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास अद्भुत जीव समुदाय पाए गए हैं। इन स्थानों पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता। ऊर्जा का स्रोत रासायनिक पदार्थ होते हैं। जीव प्रकाश संश्लेषण नहीं बल्कि रासायनिक संश्लेषण (कीमोसिंथेसिस) (chemosynthesis)पर निर्भर रहते हैं। इस खोज ने वैज्ञानिकों की सोच बदल दी है। अब माना जाता है कि जीवन को हमेशा सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी दूरस्थ ग्रह या ग्रह के चंद्रमा पर भूमिगत समंदर और भू-तापीय ऊर्जा का स्रोत मौजूद है, तो वहां जीवन विकसित हो सकता है।

5. विकिरणसहिष्णु जीव: पृथ्वी पर कुछ जीव अत्यधिक विकिरण भी सहन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए टार्डीग्रेड (जलीय भालू) और डाइनोकोकस रेडियोड्यूरैन्स (Deinococcus radiodurans) जैसे विकिरण-रोधी जीवाणु। ये जीव डीएनए क्षति की मरम्मत कर सकते हैं। अत्यधिक विकिरण में जीवित रह सकते हैं। कठोर वातावरण में भी टिके रह सकते हैं। इससे संकेत मिलता है कि कुछ प्रकार का जीवन हमारी अपेक्षा से अधिक कठोर परिस्थितियों को सहन कर सकता है।

भविष्य की खोजें

हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रत्यक्ष प्रमाण की खोज एक्सोप्लैनेट पर जीवन की खोज के लिए एक नया मानदंड स्थापित करती है। चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति उन ग्रहों की पहचान करने में मदद करेगी जो अधिक निवास योग्य हो सकते हैं। आधुनिक वेधशालाएं (radio observatory) और अंतरिक्ष दूरबीनें (जैसे जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन) तथा आगामी रेडियो वेधशाला परियोजनाएं एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडल और चुंबकीय क्षेत्रों का अधिक सटीक अध्ययन कर रही हैं। इनके प्रयासों से आने वाले वर्षों में यह संभव है कि वैज्ञानिक किसी ऐसे ग्रह की पहचान कर लें जहां पृथ्वी जैसी परिस्थितियां और जीवन के संकेत मौजूद हों।

अतः भविष्य के अध्ययनों में इन ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की शक्ति और स्थिरता को मापना महत्वपूर्ण होगा और यह समझने में मदद करेगा कि क्या जीवन के लिए आवश्यक स्थितियां हमारे सौरमंडल से परे भी मौजूद हैं। (स्रोत फीचर्स)

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बोतल में कैद रोशनी, जब चाहें इस्तेमाल करें

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरल तैयार किया है जिसे रोशनी या अन्य किसी ऊर्जा स्रोत के संपर्क में रखा जाए तो वह एक ऊर्जा-सघन काली जेली (black gel) में बदल जाता और इस ऊर्जा को वह महीनों तक कैद रख सकता है।

दरअसल, यह जेलीनुमा पदार्थ कुछ हद तक एक बैटरी की तरह काम करता है। जैसे ही इसका संपर्क ऑक्सीजन से कराया जाता है, तो संग्रहित ऊर्जा मुक्त हो जाती है।

हाल ही में केम नामक पत्रिका में प्रकाशित यह शोध अभी टेक्नॉलॉजी के स्तर पर नहीं पहुंचा है। यह तो एक अवधारणा का प्रदर्शन मात्र है कि कैसे एक धातु-रहित पदार्थ ऊर्जा का दोहन कर सकता है, उसे संग्रहित कर सकता है और फिर से उपयोग के लिए उपलब्ध करा सकता है। यदि यह प्रयोग टेक्नॉलॉजी में तबदील होता है तो यह तरल पदार्थ हमें सेमीकंडक्टर (semiconductor) के लिए ऊर्जा का धातु-रहित स्रोत उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। यह टेक्नॉलॉजी खास तौर से चिकित्सा उपकरणों व यंत्रों में उपयोगी साबित होगी जहां धातु-उपकरणों के उपयोग में समस्याएं होती हैं।

दरअसल, इस नए पदार्थ का विचार कोशिकीय कंकाल के व्यवहार में से उपजा है। यह कोशिकीय कंकाल (cellular skeleton) कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन तंतुओं का लगातार बनता-टूटता नेटवर्क होता है। यह कोशिकाओं को गति करने और विभाजन में समर्थ बनाता है।

इस व्यवस्था को कृत्रिम तंत्र में विकसित करने के लिए नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के सेमुअल स्टुप की टीम ने एक अणु की रंचना की जिसमें दो घटक थे: एक अमीनो नेफ्थलीन एरोमैटिक इकाई (ANI) जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है; दूसरी इकाई मिथाइल वाइलोजेन (MV) की थी जो इलेक्ट्रॉन (electron) संग्रह कर सकती है। शुरुआत में यह पदार्थ एक पीला तरल होता है लेकिन जब इस पर रोशनी पड़ती है, तो ANI घटक ऊर्जा सोखता है और अपने इलेक्ट्रॉन MV को दान कर देता है। ऊर्जा के अवशोषण का परिणाम यह होता कि ये अणु टिकाऊ फीतों जैसे संकुलों में जम जाते हैं। यह जमावट काफी टिकाऊ होती है और महीनों तक बनी रह सकती है।

जैसे ही इस जेली का संपर्क ऑक्सीजन से होता है, यह वापिस तरल रूप में आ जाती है और इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। इस दौरान मुक्त ऊर्जा का उपयोग रासायनिक क्रियाओं के संचालन में किया जा सकता है, अर्थात यह एक बैटरी है। स्टुप के शब्दों में, ‘यह रोशनी को बोतल में कैद करने जैसा है।’

वैसे देखा जाए तो कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए प्रकाश को रासायनिक ऊर्जा में तबदील करने के साधन उपलब्ध हैं। जैसे फोटो-इलेक्ट्रिक सेल (photoelectric cell) में प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इन्हें फिर से जोड़ें तो ऊर्जा प्राप्त मिल सकती है या जलाकर भी ऊर्जा मिल जाएगी। लेकिन स्टुप के मुताबिक उनके द्वारा विकसित प्रक्रिया उत्क्रमणीय है और इसमें धातुओं का उपयोग भी नहीं करना होता। इस मायने में यह अतीत के प्रयासों से एकदम अलग है। (स्रोत फीचर्स)

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अंडाशय की नई प्रतिरक्षात्मक भूमिका

लंबे समय से प्रजनन वैज्ञानिक  मानते आए हैं कि प्रजनन उम्र (reproductive age) समाप्त होते ही महिलाओं में अंडाशय (ovary) की भूमिका शून्य हो जाती है, लगभग अपेंडिक्स की तरह। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस पुरानी समझ को चुनौती दी है। फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. फ्रांसिस्का डंकन और उनकी टीम ने पाया कि रजोनिवृत्ति (menopause)) के बाद अंडाशय शरीर में नई जिम्मेदारी संभालने लगता है जो महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) से जुड़ी हो सकती है।

चूहों और इंसानों के अंडाशयों पर किया गया यह अध्ययन मॉलीक्यूलर ह्यूमन रीप्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ है। दरअसल, पांच साल पहले, डॉ. डंकन ऐसी  कोशिकाओं के एक अध्ययन में जुड़ी थीं जिन्होंने विभाजन करना बंद कर दिया हो (इन्हें सेनेसेंट कोशिकाएं कहते हैं)। ऐसी कोशिकाओं की संख्या ऊतकों में बढ़ती जाने के साथ जरावस्था के लक्षण प्रकट होते हैं (senescent cells)।

इस अध्ययन के दौरान वे अंडाशय की पूरी उम्र में सेनेसेन्ट कोशिकाओं का अध्ययन करना चाहती थी। लेकिन स्वस्थ अंडाशय पर शोध संभव न होने के कारण उन्होंने रजोनिवृत्त हो चुकी (postmenopause) 50 से 75 वर्ष की महिलाओं के अंडाशय का अध्ययन किया। इन महिलाओं के अंडाशय चिकित्सकीय कारणों से निकाले गए थे।

उन्होंने पाया कि उम्र के साथ अंडाशय में अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बन रहे थे। डॉ. डंकन कहती हैं – यदि ये अंग उम्र के साथ नए प्रोटीन बना रहा है, तो इसका मतलब है कि इसमें बढ़ती उम्र के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव आ रहे हैं। यह जानकारी पुरानी सोच से अलग और चौंकाने वाली थी, क्योंकि अगर रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय कुछ काम नहीं कर रहा होता तो उसमें उम्र के साथ कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

और गहराई से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों पर शोध किया। इनमें भी एक उम्र के बाद अंडाशय अंडा निर्माण बंद कर देता है, हालांकि उनमें इंसानों जैसे रजोनिवृत्ति वाले लक्षण – जैसे एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट नहीं होती।

शोधकर्ताओं ने युवा चूहों, प्रजनन काल के आखिरी दौर वाले चूहों, और प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय निकाले। प्रत्येक चूहे के एक अंडाशय के आरएनए (RNA) का अनुक्रमण करके उसके जीन्स की सक्रियता मापी। वहीं, दूसरे अंडाशय में अलग-अलग कोशिकाओं को पहचानने और फाइब्रोसिस (fibrosis) की वृद्धि मापने के लिए सूक्ष्मदर्शी से जांच की गई। फाइब्रोसिस ऊतकों के सख्त होने की प्रक्रिया है, जो बढ़ती उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से होती है।

देखा गया कि चूहों के अंडाशयों में बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्रिया से जुड़े रसायन कम हो गए थे। लेकिन प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय में युवा चूहों की तुलना में अलग-अलग तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का भंडार पाया गया।

बूढ़े चूहों के अंडाशय में ऐसे जीन भी भारी मात्रा में सक्रिय थे जो शोथ (सूजन) (inflammation) बढ़ाने वाले  रसायन बनाते हैं। ये रसायन शरीर के रक्त प्रवाह के ज़रिए दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं। 

यह शोध रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय को एक नाकारा अंग समझने के बजाय एक नई संभावना की ओर इशारा करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंडाशय अपना मूल काम (अंडा निर्माण) समाप्त होने के बाद एक नई भूमिका अपना सकता है। अनुमान है कि यदि उम्रदराज अंडाशय रक्तप्रवाह में ये शोथ बढ़ाने वाले अणु छोड़ रहे हैं तो शायद इसी कारण महिलाओं को, उम्र पुरुषों की तुलना में लंबी होने के बावजूद, बुढ़ापे के दौरान होने वाली जीर्ण बीमारियों का अधिक सामना करना पड़ता है।

कई सालों से रजोनिवृत्त महिलाओं के अंडाशय आम तौर पर किसी भी सर्जरी के दौरान निकाल दिए जाते हैं, क्योंकि प्रजनन काल खत्म होने के बाद अंडाशय को बेकार और कैंसरकारी (cancerous) समझा जाता रहा है। यह शोध महिलाओं के शरीर को समझने में मददगार साबित हुआ है। हालांकि अभी भी महिलाओं की शारीरिक रचना को पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए रजोनिवृत्ति के दौरान व उसके बाद में होने वाली समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करने और समझ विकसित करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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‘हम साथ-साथ हैं’ की तड़प क्यों?

नुष्यों को साथियों के साथ रहना पसंद है। क्या इसके पीछे कोई जीव वैज्ञानिक कारण है?   इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जानवरों और मनुष्यों पर कुछ दिलचस्प अध्ययन किए हैं। अध्ययन बताते हैं कि समूह में रहना, मिलना-जुलना केवल पसंद -नापसंद मामला नहीं है बल्कि रोटी-कपड़ा-मकान की तरह यह भी हमारे जीवन का आधार और मूल ज़रूरत है। 

तंत्रिका वैज्ञानिक चूहों और मनुष्यों के मस्तिष्क पर शोध करके यह समझने की कोशिश करने में जुटे हैं कि ‘अकेलापन दुख का और अपनों का साथ खुशी का कारण क्यों है?’ वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा शरीर बदलती बाहरी परिस्थितियों के अनुसार तापमान, रक्तचाप और शरीर के तरल पदार्थों का आंतरिक संतुलन बनाए रखता है।  इसे समस्थापन (होमियोस्टेसिस) कहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ठीक उसी प्रकार हमारा दिमाग भी सामाजिक जीवन और अकेलेपन के बीच संतुलन की तलाश करता है। इसे उन्होंने दिमाग की मानसिक समस्थिति (mental homeostasis) नाम दिया है। हालांकि, सामाजिक संतुलन की ज़रूरतें और सीमाएं हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। किसी को अकेले रहना ज़्यादा पसंद होगा, तो किसी को बड़े समूह या लोगों के आसपास, लोगों से मिल-जुलकर रहना पसंद होगा। 

वैज्ञानिक इसे ‘अपनों के साथ की लालसा’ कहते हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत लंबे समय तक अकेले रहता है तो मस्तिष्क के एक हिस्से (हायपोथैलेमस) की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की सक्रियता के कारण अकेलापन झेल रहा व्यक्ति बेचैनी, उदासी और दुख महसूस करता है। दूसरी ओर, जब अपनों से मिलने पर अकेलापन दूर होता है तब मस्तिष्क की अन्य कोशिकाएं सक्रिय होती हैं। इससे डोपामाइन (dopamine) नाम का रसायन स्रावित होता है; जो वैसा ही सुखद एहसास देता है जैसा किसी भूखे को खाना मिलने पर होता है। 

कुदरत में कई जीवों को विभिन्न कारणों से समूह या साथ की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से चिपककर बैठने वाले पक्षी हों, दुश्मनों से सुरक्षा के लिए रेगिस्तान में बड़े समूहों में रहने वाले मीरकैट और भोजन की तलाश/शिकार करने के लिए झुंड में रहने वाली नीलगाय, ज़ेबरा, या लक्कड़बग्घे। दूसरी ओर, कुछ जानवर ऐसे भी हैं जो ज़्यादातर अकेले रहते हैं, जैसे ओरांगुटान अकेले अपना खाना ढूंढते हैं, तेंदुए अकेले ही शिकार करते हैं।

दरअसल, वैज्ञानिक चूहों पर शोध करके यह जानना चाह रहे थे कि चूहे कब और कैसे अकेलापन महसूस करते हैं? इसके लिए उन्होंने पिंजरे के बीच में ऐसी जाली लगा दी जिससे चूहे एक-दूसरे को देख सकते थे, सुन सकते थे, सूंघ भी सकते थे – केवल छू नहीं सकते थे। परिणाम यह हुआ कि साथी चूहे सामने होते हुए भी वे अकेला और उदास (sad) महसूस कर रहे थे। उसके बाद वैज्ञानिकों ने अकेले रह रहे चूहों को दो खास सुरंग वाले रास्तों का विकल्प दिया। एक रास्ते में नर्म-मखमली चादर थी और दूसरा रास्ता सख्त था। उन्होंने पाया कि अकेलेपन से जुझ रहे चूहों ने सख्त रास्ते के बजाय नर्म-मखमली चादर वाले रास्ते को चुना। इससे यह साबित हुआ कि (चूहों में) अकेलापन(lonliness) दूर करने के लिए केवल देखना, सुनना या सूंघना काफी नहीं है बल्कि शारीरिक स्पर्श सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्यों और चूहों की त्वचा में खास संवेदक और इंद्रियां (Sensors and senses) होती हैं जो स्नेह भरे स्पर्श से मस्तिष्क को तुरंत सक्रिय करके सुरक्षित महसूस करवाती हैं, इसे ‘स्पर्श की ताकत’ कहा गया।

वैज्ञानिकों ने नर और मादा चूहों में भी अकेलेपन के असर को देखा। उन्होंने पाया कि मादा चूहे लंबा वक्त अकेले बिताने के बाद ज़्यादा मिलनसार हो गईं। वहीं नर चूहे अकेले रहने से चिड़चिड़े, गुस्सैल, और अपने इलाके के प्रति संवेदनशील हो गए। 

मनुष्यों और चूहों के गहन मस्तिष्क क्षेत्र बहुत हद तक समान हैं। इसलिए चूहों के अकेलेपन वाले व्यवहार को मनुष्यों के अकेलेपन से होने वाले व्यवहारों और समस्याओं को समझने के लिए अध्ययन किया जा रहा है।

शोध बताते हैं कि जेल की अकेली कोठरी में सज़ा काट रहे कैदियों को बहुत लंबे समय तक अकेले रहने के कारण बाहरी दुनिया से डर लगने लगता है, उनका मस्तिष्क लगातार खतरा (danger) और बेचैनी महसूस करता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ वे लोगों से मिलने और सामने आने से कतराने लगते हैं।

अकेलेपन से सेहत पर बुरा असर होने के कारण ज़िंदगी के साल भी कम होने लगते हैं। अकेलेपन से न सिर्फ मन दुखी रहता है बल्कि लंबे समय से अकेला महसूस करने वाले लोगों को दिल की बीमारी, स्ट्रोक, और कैंसर जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। यानी समय के साथ ये मानसिक और शारीरिक पीड़ा (physical trauma) में बदल जाता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि संतुलन बनाए रखना ही अकेलेपन की समस्या का समाधान है। खुद की सामाजिक सीमाओं को पहचानकर थोड़ा समय खुद के साथ बिताएं, थोड़ा करीबी लोगों के साथ और कभी-कभी थोड़ा समय बड़े सामाजिक कार्यक्रमों में दें। इससे हर परिस्थिति में मस्तिष्क खुश रहना सीखता है। आखिर में, वैसे तो आजकल लोगों से जुड़े रहना तकनीकी साधनों से बहुत आसान हो गया है। लेकिन जब भी मौका हो, स्नेह-स्पर्श के ज़रिए अपनापन जताना हमारे तन, मन और मस्तिष्क के लिए किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं हैं।  (स्रोत फीचर्स)

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नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री का शोधपत्र वापिस लिया गया

त्यंत चौंकाने वाले घटनाक्रम में स्प्रिंगर नेचर ने मैक्स प्लांक द्वारा लिखित शोध पत्र को वापिस लेने (रिट्रेक्शन) की घोषणा की है। गौरतलब है कि प्लांक क्वांटम मेकेनिक्स के प्रमुख विचारकों में से थे और उन्हें 1918 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से भी नवाज़ा गया था। लिहाज़ा, जब क्यूबेक विश्वविद्यालय में विज्ञान के इतिहासकार येवेस गिन्ग्रास ने एक वेबसाइट पर मैक्स प्लांक का नाम देखा तो वे चकरा गए।

दरअसल रिट्रेक्शन वॉच नामक यह वेबसाइट वैज्ञानिक धोखाधड़ी, आंकड़ों से छेड़छाड़ तथा अन्य वैज्ञानिक दिक्कतों की सूची रखती है। वहां एक लिंक का शीर्षक था :‘रिट्रेक्शन्स बाय नोबेल प्राइज़ विनर्स’ (Retraction by nobel prize winners)। गिन्ग्रास ने इस लिंक पर क्लिक किया तो सूची में चौथा नाम था मैक्स प्लांक (Max plank)। गिन्ग्रास ने प्लांक के बारे ऐसे  किसी कांड के बारे में उड़ती-उड़ती खबर भी नहीं सुनी थी। और तो और, प्लांक तो अपने चरित्र के लिए जाने जाते थे। उन्होंने यहूदियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून के संदर्भ में एडोल्फ हिटलर तक को चुनौती दी थी।

प्लांक के दोनों शोध पत्रों को चुपचाप 2022 में रिट्रेक्ट कर लिया गया था। ये शोध पत्र मूलत: जर्मन शोध पत्रिका नेचरविसेनशाफ्टेन (Naturwissenschaften) में 1940 के दशक में प्रकाशित हुए थे (आजकल यह पत्रिका स्प्रिंगर नेचर के स्वामित्व में है)।

खोजबीन करने पर पता चला कि प्लांक का एक आलेख 1942 में “Sinn und Grenzen der exakten Wissenschaft (सटीक विज्ञान का अर्थ और सीमाएं) शीर्षक से दो अन्य पत्रिकाओं में तथा किताबों में दो बार पुन:प्रकाशित हुआ था। यह एक दार्शनिक पर्चा था और इसमें इस बाबत विचार किया गया था कि वैज्ञानिक ज्ञान में निश्चितता कैसे हासिल की जाए।

एक ही रचना को एकाधिक बार रीपैकेजिंग करने को सेल्फ-प्लेजिएरिज़्म (स्वयं की रचना से  चोरी) (Sef-plagiarism) माना जाता है और आजकल इसकी बहुत निंदा होती है क्योंकि ऐसा करके उस लेखक के प्रकाशनों की संख्या बढ़ जाती है। इसके अलावा यह कॉपीराइट नियमों के उल्लंघन के आरोप का कारण भी बनता है। नेचरविसेनशाफ्टेन की वेबसाइट पर इन पर्चों के रिट्रेक्शन का कारण कॉपीराइट उल्लंघन (copyright infringement) बताया गया था।

गौरतलब बात यह है कि इंटरनेट आने से पहले एक जैसी सामग्री को एकाधिक पत्रिकाओं में प्रकाशित करना आम बात थी, शायद इसलिए कि लेखक अलग-अलग श्रोता वर्ग तक पहुंचना चाहते थे। और प्लांक जैसे प्रमुख व्यक्तियों के लिए तो यह सामान्य बात थी। आइंस्टाइन ने भी ऐसा किया था, हालांकि वे रिट्रेक्शन से बच गए।

गिन्ग्रास और विज्ञान के एक अन्य इतिहासकार माहदी खेलफायूई ने आर्काइव्स पर एक प्रीप्रिंट में लिखा है कि 1942 के किसी शोध पत्र पर आजकल के मानकों को लागू कर देना अनुचित ही कहा जाएगा। वैसे भी प्लांक का निधन 1947 में हो गया था और वर्तमान में उनकी रचनाएं सार्वजनिक दायरे में उपलब्ध हैं।

गिन्ग्रास को ज़्यादा तकलीफ एक अन्य बात से हुई। आम तौर पर जब किसी पर्चे को रिट्रेक्ट किया जाता है, तो उसके डिजिटल संस्करण पर ऊपर से RETRACTED शब्द छाप दिया जाता है। यानी लोग उसकी इबारत को पढ़ सकते हैं। लेकिन प्रकाशक स्प्रिंगर नेचर ने तो उस पर्चे की जगह खाली स्थान छोड़ दिया है और वहां लिखा है: ‘यह पर्चा आलेख-उल्लंघन की वजह से हटा दिया गया है’।

आजकल नेचरविसेनशाफ्टेन का नाम दी साइन्स ऑफ नेचर हो गया है। दी साइन्स ऑफ नेचर की संपादक सुज़ान स्कारलेटा को तो रिट्रेक्शन की खबर तक नहीं थी। उनकी प्रतिक्रिया थी कि यह अजीब है। उनके विचार में यह सिर्फ उनके एल्गोरिदम (algorithm) की वजह से हुआ है और इसे सुधारा जाना चाहिए। दूसरी ओर स्प्रिंगर नेचर के प्रतिनिधि यह कहकर टिप्पणी करने से मुकर गए कि आम तौर रिट्रेक्शन सम्बंधी जानकारी गोपनीय होती है और सिर्फ सम्बंधित लेखकों से साझा की जाती है।

बहरहाल, प्लांक के दूसरे पर्चे का रिट्रेक्शन तो और भी चिंताजनक है। 1940 में प्रकाशित उस पर्चे को भी कॉपीराइट उल्लंघन के आरोप के चलते वापिस लिया गया है। लगता है यहां भी कारस्तानी एल्गोरिदम की ही है।

1920 के दशक से भौतिक शास्त्री नील्स बोर और वर्नर हाइज़ेनबर्ग क्वांटम मेकेनिक्स (quantum mechanics) की एक व्याख्या को आगे बढ़ा रहे थे। इस कथित कोपेनहेगन व्याख्या में प्रस्ताव था कि उप-परमाणविक कण (subatomic particle) अजीबोगरीब ढंग से विभिन्न अवस्थाओं में एक साथ उपस्थित होते हैं और वे कोई निश्चित स्वरूप तभी अख्तियार करते हैं जब उनका अवलोकन किया जाए या मापन किया जाए।

प्लांक इस धारणा के विरोध में थे और उनका तर्क था कि बाह्य यथार्थ का अस्तित्व मानव द्वारा उसके अवलोकन अथवा मापन से स्वतंत्र है।

नवंबर 1940 में दार्शनिक एलोएस मुलर ने नेचरविसेनशाफ्टेन में प्लांक के नज़रिए की आलोचना अपने पर्चे नेचरविसेनशाफ्ट उंड रिएल ऑसेनवेल्ट (Naturwissenschaft und reale Aussenwelt –  प्रकृति विज्ञान और वास्तविक बाह्य विश्व) में की थी। प्लांक ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने पर्चे के लिए ठीक इसी शीर्षक का उपयोग किया था। अब कई दशकों बाद स्प्रिंगर नेचर के एल्गोरिदम को यह कॉपीराइट का उल्लंघन दिखा।

इस रिट्रेक्शन को लेकर ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि कोपेनहेगन व्याख्या (copenhagen interpretation) को लेकर आज भी जीवंत बहस जारी है। इस रिट्रेक्शन के कारण इस महत्वपूर्ण विवाद को लेकर एक प्रमुख वैज्ञानिक-दार्शनिक के विचारों को ओझल कर दिया गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

लवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या ‘रायशुमारी’ वैज्ञानिक सत्य बता सकती है?

अमन मदान

क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर कहीं जीवन (एलियन्स) (aliens) है? इसे लेकर बहस तो चलती ही रहती है। लेकिन लोगों की उत्सुकता होती है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे सवाल हमें दिलचस्प लग सकते हैं। खासकर यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते या कहते हैं क्योंकि, कम से कम, हम यह मानते हैं कि वैज्ञानिक जो सोचते या मानते हैं वह सही होगा। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि क्या सिर्फ कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन बसता है, या सभी वैज्ञानिक यह बात मानते हैं?

ऐसी रायशुमारी (ओपिनियन पोल) (opinion poll) के ज़रिए वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए इंग्लैंड की डरहम युनिवर्सिटी (durham university) ने एक केंद्र स्थापित किया है, जिसमें किसी सवाल पर वैज्ञानिकों की राय जानी जाती है। इसका नाम है सेंटर फॉर साइंटिफिक कम्युनिटी ओपिनियन पोलिंग एंड इवैल्यूएशन (C-SCOPE)। इसे स्पष्ट और सटीक सवालों के शीघ्र और सरल जवाब पाने के हिसाब से बनाया गया है। इसके तहत 2023 में पहला सर्वेक्षण किया गया था। इसमें भारत समेत 12 देशों और 30 संस्थानों के 20,085 वैज्ञानिकों से पूछा गया था: “क्या विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि COVID-19 एक वायरस की वजह से होता है?” जवाब ‘लिकर्ट स्केल’ (likert scale) पर मांगे गए थे, जिसमें पांच विकल्प थे – पूरी तरह असहमत, असहमत, तटस्थ, सहमत, पूरी तरह सहमत। 20,085 में से 6807 वैज्ञानिकों ने सवाल के जवाब दिए थे। 93.2 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने कहा था कि वे इस बात से सहमत या पूरी तरह सहमत हैं।

यह मानना लुभावना लगता है कि यदि ज़्यादातर वैज्ञानिक किसी बात पर सहमत हैं, तो वह सत्य होनी चाहिए। या, अगर ज़्यादातर वैज्ञानिक असहमत हैं, तो वह बात असत्य होनी चाहिए। इसके बाद की गई एक अन्य रायशुमारी में एक शोध पत्र पर 494 अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों की राय ली गई थी: शोध पत्र में दावा किया गया था कि पृथ्वी से लगभग 124 प्रकाश-वर्ष दूर K2-18b नाम के एक ग्रह पर जीवन हो सकता है। इस विचार से सिर्फ 6.6 प्रतिशत लोग सहमत या पूरी तरह सहमत थे। सवाल यह है कि यदि सहमत होने वालों की संख्या इतनी कम है, तो क्या यह दावा गलत है?

रायशुमारी हमें आसानी से समझने योग्य जानकारी देती हैं। “सिर्फ 6.6 प्रतिशत वैज्ञानिक सहमत हैं!” लेकिन हमें बहुत सी ऐसी बातें नहीं पता होतीं जो उस जवाब की पृष्ठभूमि में हो सकती हैं। जैसे, यह सर्वेक्षण शोध पत्र प्रकाशित होने के महज़ 8 दिन बाद किया गया था। तो हमें पता नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल कितने अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों ने वह शोध पत्र पढ़ा होगा।

वैज्ञानिक शोध के लिहाज़ से सर्वेक्षण (survey) एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, बाकी सभी तरीकों या साधनों की तरह, इसका इस्तेमाल भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए और इनसे उतना ही मतलब निकालना चाहिए जितना वे बता सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उत्तरदाता सवालों का गलत मतलब निकाल सकते हैं – अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या COVID-19 वायरस से हुआ था, तो मुझे लग सकता है कि मुझसे पूछा जा रहा है कि क्या मैंने खुद ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे देखे हैं जो इसकी पुष्टि करते हों। तो मेरा जवाब होगा, ‘नहीं’। और ईमानदारी से कहूं तो (और वैज्ञानिक को ईमानदार होना चाहिए) मैंने उन प्रतिष्ठित जर्नल्स के शोध पत्र देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई है जिनमें COVID-19 के लिए ज़िम्मेदार जीव की पहचान की गई थी। मुझे अब भी थोड़ी शंका है कि इसके लिए वायरस ज़िम्मेदार था, लेकिन मैं इसे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से नहीं कह सकता। जैसे, सर्वेक्षण में शामिल 7 प्रतिशत लोगों ने इस बात से सहमति नहीं जताई कि कोविड-19 वायरस से हुआ था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जानकार वैज्ञानिकों के बीच कोई बड़ा मतभेद है। हो सकता है कि बात या सवाल स्पष्ट करने के लिए कुछ और सवाल पूछने की ज़रूरत हो। कभी-कभी एक वाक्य के सवालों का मतलब समझना मुश्किल हो सकता है। लोगों की राय लेने वाले किसी भी सर्वेक्षण या साक्षात्कार की यह जानी-मानी समस्या है।

हालांकि, रायशुमारी के नतीजे पढ़ना मज़ेदार होता है। और सही तरीके से ‘आपकी राय’ ली जाए, तो दिलचस्प रुझान इसमें नज़र आ सकते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक सत्य या तथ्य तय करने का तरीका नहीं हो सकता। यह एक ऐसी आपत्ति है जो सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक द्वारा सवाल समझने के तरीके या नमूने में त्रुटि से कहीं आगे की बात है। असल में, विज्ञान का विकास ही सर्वमान्य तथ्य के खिलाफ हुआ था। विज्ञान ने इस बात को कड़ाई से खारिज किया है कि ज्ञान की प्रामाणिकता इस बात से तय होती है कि अन्य इस बारे में क्या सोचते हैं या खासकर सत्तानशीं लोग क्या सोचते हैं। जैसे आम राय संभवत: यह थी कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन ऐसे कई अवलोकन थे जो इस परिकल्पना से मेल नहीं खाते थे। किनारे से दूर जाते समय जहाज़ पानी में डूबते और धीरे-धीरे गायब होते क्यों दिखते थे? इसे तभी समझा जा सकता था जब हम यह मान लें कि पृथ्वी गोल है, न कि चपटी। बहुमत की राय (majority opinion) और सत्ता की बात मानने की बजाय, परीक्षण किए गए और तर्कों की जांच की गई। इसे ही वैज्ञानिक सत्य तक पहुंचने का तरीका माना गया।

वैज्ञानिकों से उम्मीद की जाती है कि वे पारदर्शी (transparent) हों और अपने तरीके और नतीजे सबके साथ साझा करें। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे एक-दूसरे के काम की जांच करें और ऐसी समझ बनाएं जो अलग-अलग अवलोकनों और नज़रियों से मेल खाती हो। इससे कुछ हद तक एक साझा समझ बनती है। आजकल विज्ञान के कई दार्शनिक सावधानीपूर्वक यह कहते हैं कि वैज्ञानिक ऐसे नियम प्रतिपादित नहीं करते जो सार्वभौमिक हों और जिन्हें हमें अंतिम सत्य की तरह पूजना पड़े। इसकी बजाय, वैज्ञानिक संभाविताओं (scientific potential) के आधार पर सामान्यीकरण (normalization) करते हैं।

पूर्व अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर इस बात की काफी संभावना है कि पृथ्वी गोल है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आ सकते जो इस ओर इशारा करें कि पृथ्वी पूरी तरह गेंद जैसी गोल नहीं है, बल्कि इसके कुछ हिस्से चपटे हैं या कहीं ऊबड़-खाबड़ है। वास्तव में, पृथ्वी ऐसी ही है।

विज्ञान का इतिहास हमें यह भी बताता है कि वैज्ञानिक भी बाकी लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और वे ऐसी नई जानकारी को मानने से इन्कार कर सकते हैं जो उनके पहले से बने विचारों से मेल नहीं खाती।

विज्ञान के जाने-माने दार्शनिक थॉमस एस. कुन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी में तत्कालीन मान्य सिद्धांतों को चुनौती देने वाले प्रमाण होने के बावजूद वे पुराने ‘मान्य’ सिद्धांत (accepted principles and theories) अपनी जगह डटे रहे थे। नए सिद्धांतों (new principles and theories) को या तो अपवाद मानकर या अवलोकन में गलती मानकर खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ बड़े बदलावों के बाद ही नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों की जगह ले पाए। बेशक, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैज्ञानिक सत्य के इतर हर राय उतनी ही सही हो और उसे मात्र वैज्ञानिक संस्थाओं की मनमानी या सख्ती की वजह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो। वैज्ञानिक विधियों से हम वाकई काफी यकीन के साथ कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं। हम काफी हद तक यह कह सकते हैं कि कुछ सिद्धांत दूसरों के मुकाबले कम भरोसेमंद हैं। लेकिन हमें कभी भी ऐसे अडिग दावे नहीं करने चाहिए जैसा धार्मिक संस्थाएं अपनी मान्यताओं को लेकर करती हैं।

वैज्ञानिक सत्य को उन वैज्ञानिकों के एक-वाक्यीय सर्वेक्षण के नतीजों से नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने डैटा शायद ही देखा हो या न भी देखा हो और उसका विश्लेषण किया हो या न भी किया हो। इन सर्वेक्षण से जो आंकड़े मिलते हैं, वे मज़ेदार या तसल्लीबख्श हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे वास्तविकता के द्योतक हों। वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों से बात करना ज़रूरी हो सकता है जिन्होंने पेश किए गए सबूतों और दिए जा रहे तर्कों को ध्यान से देखा है, जांचा-परखा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के सर्वेक्षण और उनके आंकड़ों से महत्वपूर्ण नतीजे नहीं मिल सकते। पूर्व अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण (meta-analysis) काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, एलिज़ाबेथ लेवी पेलक और उनके साथियों ने 2021 में ऐसे 418 प्रयोगों के नतीजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया था कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को कैसे कम किया जा सकता है। उनके विश्लेषण से पता चला था कि कुछ तरीके अन्य के मुकाबले ज़्यादा असरदार होते हैं। लेकिन उन्होंने यह दावा कदापि नहीं किया कि उनके नतीजे अंतिम सत्य हैं। ऐसा करना विज्ञान की भावना के खिलाफ होता।

वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए रायशुमारी करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते हम यह दावा न करें कि उनसे वैज्ञानिक सत्य उजागर हो रहे हैं या सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलेगी। हमें हमेशा किसी वैज्ञानिक सत्य की ज़रूरत नहीं होती।

उदाहरण के लिए, साहित्य और कविता मनुष्यों के कई अहम सरोकारों को रखते और समझते हैं, जिन्हें विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण नहीं समझ सकता। फिर भी, ऐसे जनमतसंग्रह (referendum) – जो जानकारी देने से ज़्यादा मनोरंजन और तसल्ली देते हैं – उन्हें वैज्ञानिक सच की वैधता तय करने के काम से अलग रखना ही बेहतर है।

प्रमाणों की सावधानीपूर्वक की गई व्याख्या और विभिन्न अध्ययनों की बारीकी से तुलना करके ही वैज्ञानिक सत्य को सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह काम एक-वाक्य वाले सवाल-जवाबों के बस का नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्र तल में छिपे हैं शुरुआती जीवन के राज़!

लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति (origin of life) कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है।

जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) (phosphate) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए (DNA or RNA) की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया (reaction) करता है।

तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया? 

गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं (microbiology lab) में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया – डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) – मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण (oxidation) करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है।

फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया में से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।

इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एन्ज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक (catalyst) की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स

समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) (hydrothermal vents) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है।

एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम (palledium) जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।

इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट (phosphate) में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था। 

हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी (oxygen less earth) पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा।

आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन तो चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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