कोशिकाओं के अनजाने-अनसमझे उपांग को काम पर लगाया

डॉ. सुशील जोशी


म तौर पर कोशिकाओं (cells) के बारे में बताया जाता है कि उनमें एक कोशिका झिल्ली होती है, पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ती होती है, एक केंद्रक होता है, माइटोकॉण्ड्रिया होते हैं, रिक्तिकाएं (vacuoles) होती हैं। लेकिन कोशिकाओं में हज़ारों की संख्या में एक ऐसा उपांग होता है जिसके बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं हैं।

इन उपांगों को वॉल्ट (तिज़ोरी-vault) कहते हैं और इनकी खोज कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेल्स (UCLA research)  के जीव वैज्ञानिक लियोनार्ड रोम और नैन्सी केडेर्शा ने 1986 में की थी। तभी से वे इनकी गुत्थी सुलझाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। बहरहाल, रहस्य बरकरार है लेकिन इनका एक उपयोग खोज लिया गया है।

वॉल्ट्स मनुष्यों सहित अधिकांश यूकेरियोटिक (केंद्रक-युक्त) कोशिकाओं (eukaryotic cells) के कोशिका द्रव्य में पाए जाने वाले खोखले, बैरल के आकार के राइबोन्यूक्लिक प्रोटीन कण होते हैं। ये कोशिकाओं में पाए जाने वाले सबसे बड़े कणों में से हैं (70 नैनोमीटर)। इनका आवरण मेजर वॉल्ट प्रोटीन (MVP) से बना होता है और अंदर छोटे वॉल्ट आरएनए (vault RNA) सहित तीन प्रोटीन होते हैं। एक औसत मानव कोशिका में लगभग 10,000 से 1,00,000 वॉल्ट्स होते हैं, विशेष रूप से मैक्रोफेज (macrophage immune cells) जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं में। ये मुख्य रूप से कोशिका द्रव्य में और कोशिका कंकाल से जुड़े पाए जाते हैं और साथ ही नाभिकीय छिद्र (nuclear pore complex) पर भी पाए जा सकते हैं।

कोशिकाओं में क्या चल रहा है यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिक आम तौर पर या तो किसी कोशिका में किसी क्षण पाए गए प्रोटीन्स (प्रोटियोम) का अध्ययन करते हैं या किसी कोशिका में पाए गए आरएनए अणुओं (ट्रांसक्रिप्टोम – transcriptome) का अध्ययन करते हैं। प्रोटीन्स कोशिका की क्रिया के प्रमुख उत्पाद होते हैं और इन्हें देखकर बताया जा सकता है कि उस समय किसी कोशिका में क्या-क्या क्रियाएं हुई हैं। दूसरी ओर, आरएनए (RNA molecules) वह अणु होता है जिसके आधार पर प्रोटीन्स बनते हैं। केंद्रक में मौजूद डीएनए (DNA genetic information) के रूप में इस बात की समस्त सूचना होती है कि किसी कोशिका में कौन-कौन से प्रोटीन बन सकते हैं। इस डीएनए के खंड जीन्स कहलाते हैं। ज़रूरत के अनुसार इन जीन्स के अनुलेख बनाए जाते हैं। ये अनुलेख आरएनए के रूप में होते हैं और यही कोशिका द्रव्य में जाकर सम्बंधित प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं। तो किसी कोशिका के समस्त आरएनए का विश्लेषण करके यह बताया जा सकता है कि उसमें किन प्रोटीन्स का निर्माण हो रहा है या हाल ही में हुआ है। इस विश्लेषण को ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण (transcriptome profiling) कहते हैं।

इस मामले में दिक्कत यह है कि आरएनए अत्यंत अस्थिर अणु (unstable RNA molecules) होता है और सम्बंधित प्रोटीन बनवाने का काम पूरा होने के बाद जल्द ही (मिनटों में) नष्ट हो जाता है। तो ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण से आपको कुछ समय पहले की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिल सकती। यहीं पर वॉल्ट्स (vault nanoparticles) का पदार्पण हुआ।

ब्रॉड इंस्टीट्यूट के जैव-चिकित्सा इंजीनियर फाइ चेन यह जानना चाहते थे कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स प्रोटीन निर्माण में सक्रिय रहे हैं। विचार यह था कि संदेशवाहक आरएनए (m-RNA, जो प्रोटीन बनवाते हैं) (messenger RNA – mRNA) को कैद कर लिया जाए, ताकि बाद में पता लगाया जा सके कि पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स से m-RNA बने थे।

पहला विचार यह आया कि इसके लिए पोली (A) बाइंडिंग प्रोटीन (PABP) की मदद ली जाए। यह वह प्रोटीन है जिसे स्वाभाविक रूप से m-RNA के एक सिरे पर जोड़ा जाता है और यह m-RNA की हिफाज़त करता है। कोशिश यह थी कि इस प्रोटीन (PABP) को किसी अन्य टिकाऊ अणु से जोड़ दिया जाए। जब यह संकुल m-RNA से जुड़ेगा तो m-RNA संरक्षित रहेगा जिसे बाद में देखा जा सकेगा।

इसके लिए सर्वप्रथम उन्होंने PABP को एक बैक्टीरिया प्रोटीन से जोड़ा। मगर इससे काम नहीं बना। तब सुझाव मिला कि इस काम के लिए रहस्यमयी वॉल्ट्स (vault nanostructures) की मदद ली जाए। अंदर से तो वॉल्ट्स खोखले होते हैं। m-RNA को वॉल्ट के अंदर पहुंचाने के लिए टीम ने यह रणनीति अपनाई कि PABP के जीन को MVP से जुड़ने वाले अंदरुनी प्रोटीन के जीन से संलग्न कर दिया।

जैसा कि हमने देखा ये वॉल्ट प्रोटीन की तीन परतों से घिरे होते हैं। सबसे ऊपर होता है मेजर वॉल्ट प्रोटीन (major vault protein – MVP)और अंदर दो छोटे वॉल्ट प्रोटीन के अस्तर होते हैं। अलबत्ता, बाहरी आवरण गतिशील होता है और इसमें समय-समय पर छिद्र खुलते हैं। इन्हीं छिद्रों से होकर छोटे अणु (small biomolecules)  अंदर जा सकते हैं।

वॉल्ट के आवरण में अंदर घुसने के लिए बाहर से आने वाले प्रोटीन या अन्य अणुओं को आवरण के वॉल्ट पोली (एडीपी राइबोस) पोलीमरेज़ प्रोटीन (VPARP) से जुड़ना होता है। यह एक संकेत के रूप में काम करता है। जब कोई प्रोटीन या अन्य अणु इससे जुड़ जाता है तो उसे वॉल्ट के अंदर प्रवेश मिल जाता है।

शोधकर्ता इसी मार्ग का उपयोग करके मनचाहे अणु को वॉल्ट के अंदर पहुंचाते हैं। इसके लिए MVP प्रोटीन पर ऐसे स्थल तैयार किए जाते हैं जो मनचाहे अणु से जुड़ सकें।

इस परिवर्तित PABP जीन को कोशिका में जोड़ दिया गया और साथ में MVP जीन की अतिरिक्त प्रतियां भी डाल दी गईं। हुआ यह कि इस परिवर्तित PABP ने m-RNA को पकड़ा (जो वह सामान्य तौर पर भी करता है) (gene expression signal) और उसे वॉल्ट के अंदर पहुंचा दिया। इसके बाद टीम ने यह किया कि वॉल्ट्स को रासायनिक विधि से खोला और वहां मौजूद m-RNA का क्षार अनुक्रम (RNA sequencing) पता किया। इससे यह पता चल सका कि वहां उपस्थित m-RNA अणुओं की उत्पत्ति किन जीन्स (gene origin analysis)  से हुई है।

यानी इस विधि में m-RNA अणुओं को वॉल्ट में कैद कर लिया जाता है जहां ये काफी समय तक (लगभग 7 दिन तक) सुरक्षित रहते हैं। कोशिकाओं को गर्मी या कम ऑक्सीजन (hypoxia conditions) जैसी परिस्थितियां में उनकी जेनेटिक प्रतिक्रिया देखकर इस विधि की जांच की गई। टीम ने इन वॉल्ट्स का उपयोग करके उन जीन्स का पता भी लगाया जो फेफड़े के कुछ कैंसर (lung cancer research) को स्वीकृत औषधियों का प्रतिरोध करने में मदद करते हैं। m-RNA रिकॉर्ड करने वाले वॉल्ट्स को उन्होंने कैंसर कोशिकाओं में डाला और फिर उन कोशिकाओं को औषधि के संपर्क में रखा। टीम यह चिंहित कर पाई कि कौन से सुरक्षात्मक जीन्स थे जो उपचार से पहले ही सक्रिय थे। पहले के अध्ययनों में सिर्फ उन्हीं जीन्स की पहचान की गई थी जो उपचार की प्रतिक्रिया स्वरूप सक्रिय होते हैं। जब टीम ने इस नए चिंहित जीन को लक्ष्य करने वाली दवा भी जोड़ दी तो प्रथम उपचार की प्रतिरोधी अधिकांश कोशिकाएं मारी गई।

इसे टीम ने टाइम-वॉल्ट या टाइम कैप्सूल (time vault technology)  भी कहा है। कुछ लोग इसे आणविक सेल्फी भी कह रहे हैं। इसके चिकित्सा में कई उपयोग सोचे जा रहे हैं। वैसे चेन यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह विधि एक-एक कोशिका के स्तर काम करेगी जिसकी मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन सक्रिय (gene activity tracking) रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उड़ते समय भौंरे खुद को ठंडा कैसे रखते हैं?

भौंरे (bumblebees) ज़बर्दस्त उड़ाके होते हैं। वे लगभग 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकते हैं। इतनी तेज़ उड़ान के दौरान उनकी मांसपेशियां फड़फड़ाकर काफी गर्मी पैदा करती हैं। तो उड़ते समय भौंरे का शरीर बहुत गर्म हो सकता है। जैसे कार का इंजन (engine overheating), जिसे ठंडा न किया जाए तो खूब गर्म हो सकता है। तो भौंरे उड़ान के दौरान गर्म होकर झुलस क्यों नहीं जाते?

नए शोध (scientific research) से पता चला है कि वे अपने पंखों की तेज़ फड़फड़ाहट से बहने वाली हवा के ज़रिए खुद को ठंडा रखते हैं: जब भौंरा हवा में एक जगह ठहरकर उड़ता है, तो उसके पंखों से नीचे की ओर बहती हवा उसके शरीर का तापमान (body temperature cooling) लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तक कम कर देती है। इतने छोटे कीट के लिए यह बहुत बड़ी राहत है।

उड़ान के दौरान भौंरों की मांसपेशियां (flight muscles) बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करती हैं। ठंड में तो यह गर्मी उड़ान के लिए वार्मअप (muscle warm-up) में काम आ जाती है। लेकिन गर्मियों में यह खतरनाक साबित होती है।

अतिरिक्त गर्मी (heat stress) से निपटने के उनके कुछ तरीके तो पहले से मालूम हैं। वे अपने वक्षस्थल (thorax) (जहां उड़ान की मांसपेशियां होती हैं) से गर्मी को शरीर के पिछले हिस्से तक एक खास द्रव के जरिए पहुंचा सकते हैं। वैज्ञानिक यह भी देखते रहे हैं कि धूप (solar heating) उन्हें कितना गर्म करती है और पसीने जैसी प्रक्रिया (वाष्पीकरण) से उन्हें कितनी ठंडक मिलती है। इन सबको मिलाकर वैज्ञानिक ‘ऊष्मा संतुलन मॉडल’ (heat balance model) कहते हैं। लेकिन अब तक एक बात स्पष्ट नहीं थी: क्या उनके पंखों से पैदा होने वाला वायु प्रवाह (airflow from wings) भी उन्हें ठंडा करने में मदद करता है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने भौंरों को एक खास प्रयोगशाला कक्ष (laboratory experiment) में रखा, जहां हवा की गति मापने वाले उपकरण (air velocity sensors) लगे थे। जब भौंरे नकली फूलों के ऊपर मंडरा रहे थे, तब शोधकर्ताओं ने देखा कि उनके आसपास हवा लगभग 0.25 से 2 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बह रही थी। धुंध जैसी हल्की फुहार का इस्तेमाल करके उन्होंने यह भी देखा कि हवा उनके शरीर के चारों ओर कैसे फैलती है।

यह जानने के लिए कि यह हवा उन्हें कितनी ठंडक देती है, वैज्ञानिकों ने और भी परीक्षण किए। उन्होंने भौंरों के शरीर में बहुत छोटे तापमापी (micro temperature sensors) लगाए और हवा की वही स्थिति बनाई। तापमान में बदलाव (thermal measurement) की तुलना करके उन्होंने पाया कि अगर पंखों से पैदा होने वाली यह ठंडक न मिले, तो भौंरा दो मिनट से भी कम समय में तपकर टपक सकता है।

यानी भौंरों के पंखों से पैदा होने वाला हवा का बहाव (natural cooling system) एक तरह का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम है। हालांकि वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि जब भौंरे उड़ते-उड़ते आगे बढ़ते हैं, तब यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।

यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि बढ़ते वैश्विक तापमान (global warming) का सीधा असर भौंरों के जीवित रहने और परागण की क्षमता पर पड़ सकता है। अगर हम समझ लें कि भौंरे अपने शरीर की गर्मी को कैसे नियंत्रित (thermoregulation in insects) करते हैं, तो शायद भौंरो के बचाव के कुछ कारगर कदम (bumblebee conservation) उठा सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन और पौधों का जल्दी फूलना

दुनिया भर में कई पौधों में अब पहले की तुलना में जल्दी फूल खिलने लगे हैं। पूरा ध्यान बढ़ते तापमान (global warming) पर जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार केवल गर्मी बढ़ना ही इसका कारण नहीं है। जैसे, ग्रीनहाउसों (greenhouse experiments) में सिर्फ ज़्यादा तापमान देने से फूल समय से पहले नहीं खिले। एक नए अध्ययन से पता चला है कि पत्तियों पर जमा होने वाली ओस की बूंदें (dew droplets on leaves) इस जल्दबाज़ी की वजह हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब पानी की बहुत सूक्ष्म बूंदें (micro water droplets) पत्तियों पर जमती हैं, तो वे कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करवाती हैं। ये अभिक्रियाएं पौधे को संकेत देती हैं कि अब फूल बनाने का समय आ गया है। तो लगता है कि केवल बढ़ता तापमान नहीं, बढ़ती नमी के कारण बनने वाली ओस भी पौधों के व्यवहार (plant behavior) को प्रभावित कर सकती है।

पहले किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट था कि थोक पानी (bulk water) की तुलना में पानी की बहुत छोटी बूंदें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। जब ऐसी सूक्ष्म बूंदें किसी ठोस अजैविक सतह पर बनती हैं, तो उनमें खास रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। देखा गया था कि इन अभिक्रियाओं के कारण वहां मूलक (free radicals)  बनते हैं जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) होते हैं। इस अवलोकन से यह सवाल पैदा हुआ कि यदि ऐसी ही बूंदें किसी सजीव सतह (जैसे पत्ती) पर जमें तो क्या परिणाम होगा।

इसको समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक छोटे फूलदार पौधे एरेबिडॉप्सिस थैलियाना (Arabidopsis thaliana plant)पर प्रयोग किए। यह ब्रेसिकेसी कुल (Brassicaceae family) का पौधा है।

विस्तृत प्रयोगों में पाया गया कि इस पौधे की पत्तियों पर ओस जमने पर, वहां होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (hydrogen peroxide)  और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide molecule)  बनते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड पौधों और जंतुओं में एक जाना-माना महत्वपूर्ण संकेतक अणु है। यह बूंद से पौधे की कोशिकाओं में पहुंचकर ऐसी जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू करवाता है, जो अंतत: पुष्पन की प्रक्रिया (flowering process) को सक्रिय कर देती हैं।

पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों में जुटाए गए ब्रेसिकेसी कुल के लगभग 1.2 करोड़ पौधों के पुष्पन रिकॉर्ड (plant flowering data) का विश्लेषण किया। उन्होंने फूल खिलने के समय की तुलना 11 अलग-अलग मौसम सम्बंधी कारकों से की। फूल खिलने के समय का सम्बंध तापमान (temperature change) और दिन की लंबाई के अलावा ओस बिंदु से भी देखा गया। ओस बिंदु हवा में उपस्थित नमी (air humidity) और हवा के तापमान से जुड़ा है।

हालांकि सभी वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं लेकिन यदि ये निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो वैज्ञानिकों की यह समझ बदल सकती है कि गर्माती जलवायु (climate change) में पौधे कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यदि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा की नमी में छोटे बदलाव भी फूल आने के समय को प्रभावित कर सकते हैं, तो इस शोध का व्यावहारिक उपयोग (agricultural application) भी हो सकता है। भविष्य में किसान नियंत्रित फुहार या हल्की नमी देकर फूलने का समय बदल सकते हैं और फसल उत्पादन (crop yield improvement) बढ़ा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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चंद्रमा के प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र का रहस्य

गभग पचास वर्ष पूर्व अपोलो मिशन (Apollo Moon mission) से लाई गई चंद्रमा की चट्टानों (Moon rocks samples) में मौजूद खनिज बताते हैं कि करीब 3.5 अरब साल पूर्व चंद्रमा पर बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र था, जो लाखों साल तक बना रहा। लेकिन इतनी ताकतवर चुंबकीय शक्ति के लिए चंद्रमा के भीतर पिघला और गतिशील कोर (molten lunar core) होना ज़रूरी है। वैज्ञानिकों का मानना था कि चांद का अपेक्षाकृत छोटी साइज़ का कोर जल्दी ठंडा हो गया होगा। लेकिन उसी समय की कुछ अन्य चट्टानें संकेत दे रही थीं कि चंद्रमा का चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर था। इन दोनों अवलोकनों के कारण रहस्य पैदा हुआ।

अब एक नए अध्ययन से राह खुली है। नेचर जियोसाइंस (Nature Geoscience journal) में प्रकाशित शोध के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि 4 अरब से 3.5 अरब साल पूर्व के दरम्यान बार-बार सीमित समय के लिए लेकिन बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनता था।

अपोलो मिशन द्वारा लाई गई कुछ ज्वालामुखीय चट्टानों (volcanic lunar rocks) की ध्यानपूर्वक जांच से पता चला कि उनमें कम टाइटेनियम वाली चट्टानों की तुलना में अधिक टाइटेनियम वाली चट्टानों में चुंबकीय शक्ति अधिक थी। यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों तरह की चट्टानें चुंबकीय जानकारी सहेजकर रखने में समान रूप से सक्षम थीं। यानी फर्क चट्टानों की चुंबकीय सूचना को सहेजने की क्षमता (magnetic record) में नहीं, बल्कि इस बात में था कि उनकी चुंबकीय क्षेत्र पैदा करने की क्षमता में अंतर था।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अरबों साल पहले चंद्रमा के अंदर, मेंटल (lunar mantle) की गहराई में मौजूद टाइटेनियम-समृद्ध चट्टानें (titanium rich rocks) समय-समय पर पिघलती थीं। जिसके लिए गर्मी कोर तथा आसपास के पदार्थ से मिलती था। इससे कुछ समय के लिए कोर में मंथन शुरू हो जाता और एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (planetary magnetic field) बन जाता था। जब यह पिघला हुआ मैग्मा सतह पर ठंडा होकर ठोस बन जाता, तो उस समय का चुंबकीय असर उसके भीतर दर्ज रह जाता था।

इस नए विचार के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार और लंबे समय तक बना रहने वाला चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि वहां बार-बार बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र थोड़े-थोड़े समय (5,000 साल से भी कम के समय) के लिए बनता था। शेष लंबे समय तक कमज़ोर चुंबकीय क्षेत्र (weak magnetic field) रहता था। यही वजह हो सकती है कि कुछ चट्टानों में शक्तिशाली चुंबकीय गुण (magnetic signatures) दिखता है, जबकि उसी समय की अन्य चट्टानों में नहीं।

यह अंतर शायद नमूने इकट्ठा करने की जगह (sample collection sites) के कारण हो सकता है। अपोलो मिशन ज़्यादातर ज्वालामुखीय मैदानों में उतरे थे, जहां बार-बार लावा बहा था। संभव है कि वहां ऐसी चट्टानें ज़्यादा मिली हों जो विस्फोटों के दौरान बनी थीं, जिससे ऐसा लगा कि चुंबकीय क्षेत्र लंबे समय तक लगातार शक्तिशाली था।

कुछ विशेषज्ञों का मत है कि यह नया विचार चंद्रमा के पूरे चुंबकीय इतिहास (lunar magnetic history) को नहीं समझा पाता। फिर भी यह जांच के लिए एक नई दिशा (future lunar research) ज़रूर देता है।

आगे की प्रगति नए मिशनों से लाए जाने वाले नमूनों (lunar sample return missions) की मदद से आगे बढ़ेगी, जैसे चीन के चंद्रमिशन (China Moon mission) के नमूनों के अध्ययन से। (स्रोत फीचर्स)

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क्यों आती है चिपकू टेप से चर्रर्रर्रररर की आवाज़

स्कॉच टेप (Scotch Tape) क्या है? एक पतली प्लास्टिक का लंबा फीता जिसकी एक सतह पर चिपकू गोंद (adhesive glue) होती है, जिसे एक गोले पर सलीके से लपेटा होता है। (कुछ किस्म के टेप में कागज़ या कपड़े के फीते होते हैं।) जब गोले से टेप निकालते हैं, तो अक्सर यह होता है कि शुरुआत में तो टेप ठीक से निकलता है, लेकिन फिर हल्का-सा अटककर निकलता है, और इसी के साथ आती है चर्रर्ररर-चर्रर्ररर की आवाज़। खासकर एक साथ लंबा टेप निकालते समय आपने ज़रूर यह आवाज़ सुनी होगी। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा कि यह आवाज़ आती क्यों है? चलिए आपने सोचा हो या नहीं, लेकिन वैज्ञानिकों ने ज़रूर इस बारे में सोचा और इसका कारण पता करने में जुट गए।

2010 में किंग अब्दुल्ला युनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी (KAUST University) के भौतिकशास्त्री सिगुरदुर थोरोडसन ने उच्च क्षमता वाले कैमरों (high-speed cameras) की मदद टेप निकालने की बारीक से बारीक हरकत को रिकॉर्ड किया था। तब उन्होंने पाया था कि जब टेप आसानी से निकलता हुआ दिखता है, तब भी बहुत सूक्ष्म स्तर पर अटक-अटक कर निकलता है जो पता नहीं चलता। इसे उन्होंने स्लिप-स्टिक मोशन (फिसलना-चिपकना – slip-stick motion) कहा था।

इसके अलावा, उन्होंने पाया था कि टेप निकालने में जब सूक्ष्म स्तर पर (अगोचर) अटकाव होता है तब स्लिप फेज़ (फिसलने- slip phase) के दौरान टेप की चिपकू सतह (adhesive surface) पर महीन दरारें बन जाती हैं। ये दरारें टेप खींचने की दिशा के लंबवत बनती हैं। ये टेप निकालते समय टेप पर लकीरें बनी दिखती हैं।

अनुमान था कि चर्रर्ररर की आवाज़ इन दरारों के आगे वाली किनोर से आती है। इसे जांचने के लिए उन्होंने टेप की चिपकू सतह पर बनी दरारों (micro cracks)  और टेप निकालते समय आसपास की हवा में उत्पन्न तरंगों (sound waves)  को रिकॉर्ड करने का सेटअप जमाया।

उन्होंने दो सेंटीमीटर मोटी कांच की पट्टी (glass plate experiment) पर टेप चिपकाया। इस पट्टी के नीचे की ओर से एक हाई-स्पीड कैमरा (high-speed imaging) निकाले जा रहे टेप की हरकत रिकॉर्ड कर रहा था। और, टेप की चौड़ाई के दो किनारों पर लगे माइक्रोफोन (sensitive microphones) टेप निकालने से उत्पन्न आवाज़ें रिकॉर्ड कर रहे थे। दोनों तरह की रिकॉर्डिंग के विश्लेषण से पता चला कि दरारें टेप के एक किनारे से शुरू होकर टेप की चौड़ाई में फैलती हैं, और अक्सर कई दरारें तेज़ी से एक के बाद एक, एक ही दिशा में फैलती चली जाती हैं। शोधकर्ताओं को अगले किनारे पर इस हरकत से उत्पन्न कोई तरंगें नहीं दिखी। यानी, उनका पूर्वानुमान गलत निकला। लेकिन, जब दरारें फैलकर टेप के दूसरे छोर पर पहुंचीं, तो माइक्रोफोन ने हवा में तीव्र तरंग रिकॉर्ड कीं।

फिज़िकल रिव्यू ई (Physical Review E journal)में शोधकर्ताओं ने बताया कि दरारें सुपरसोनिक गति से चलती हैं – यानी, ध्वनि की गति से भी तेज़। इतनी तेज़ गति चर्रर्ररर की आवाज़ पैदा करने में अहम भूमिका निभाती है।

होता यह है कि जैसे ही टेप की चिपकू सतह (adhesive layer) पर दरार बनने की शुरुआत होती है वहां निर्वात (vacuum formation) बनता जाता है। हवा दरार से बने निर्वात को भरने के लिए घुसती है। लेकिन, चूंकि दरार के फैलने की गति ध्वनि से भी तेज़ होती है, हवा पूरे निर्वात को तुरंत नहीं भर पाती। इसलिए दरार के टेप के दूसरे छोर तक पहुंचने तक कम दबाव (low pressure zone) बना रहता है, और अंतत: दूसरे छोर पर पहुंचने के बाद खत्म होता है। यानी हम जो चर्रर्ररर की आवाज़ सुनते हैं ये कम दबाव की रेखाओं के दूसरे छोर पर पहुंचकर हवा से भर जाने के कारण आती है।

उम्मीद है टेप निकालने की यांत्रिकी (peeling mechanics)  और ध्वनिकी (acoustics research) को बेहतर ढंग से समझकर टेप निकालने की आवाज़ को कम किया जा सकेगा। हो सकता है टेप निकालने की यह आवाज़ हम-आपको इतना परेशान न करती हो, क्योंकि हमारा टेप चिपकाने-निकालने से इतना वास्ता नहीं पड़ता। लेकिन जो लोग पैकेजिंग का काम करते हैं उन्हें शायद लगातार टेप की चर्रर्ररर की आवाज़ आती रहती हो जो उन्हें परेशान करती हो। बहरहाल, इस शोध का विषय इगनोबल (Ig Nobel Prize) के लिए भी उम्मीदवार लगता है। (स्रोत फीचर्स)

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विश्वास, उम्मीद और अच्छी सेहत का जीवविज्ञान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

मेरिकी लेखक और एक्टिविस्ट हेलन केलर (Helen Keller) इंसानी क्षमता और संभावना की एक अंतर्राष्ट्रीय मिसाल हैं। बहरेपन और अंधेपन से ग्रसित हेलन केलर ने लिखा था, “आशावाद (inspirational mindset) वह विश्वास है जो कामयाबी की ओर ले जाता है। उम्मीद और भरोसे के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता।”

आशावाद को भविष्य में अच्छा और हितकर होने की सकारात्मक उम्मीद रखने के रूप में समझा जा सकता है। यह एक इंसानी खूबी है जिसे बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी से भी जोड़ कर देखा जाता है। आशावाद तय करता है कि हम भविष्य को कैसे देखते-सोचते हैं। यह एक मॉड्युलेटर की तरह काम करता है जो सकारात्मक संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा-चढ़ा देता है और नकारात्मक विचारों और ख्यालों को दूर रखता है। इस्राइली-ब्रिटिश तंत्रिका विज्ञानी ताली शारोट (Tali Sharot neuroscientist) का अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत मनुष्य आशावादी हैं, लेकिन अधिकतर लोग ‘थोड़े ही’ आशावादी होते हैं।

यह कहा जा सकता है कि आशावाद वास्तविकता से अलग, एकतरफा सोच दिखाता है। जैव-विकास (evolutionary biology) ऐसी खूबी को क्यों तरजीह देगा जो आपको पूरी तरह निष्पक्ष रखने की बजाय एकतरफा ढंग से पूर्वाग्रह से लैस करे? वैज्ञानिकों के बीच आम राय यह है कि आशावाद की बदौलत अनुकूलन (adaptive advantage) काफी ज़्यादा होता है, अर्थात आशावाद किसी जीव की उत्तरजीविता (survival benefit) को बढ़ाता है।

कल्पना कीजिए कई हज़ार साल पहले कोई महिला जिस तरह रहती थी। मान लीजिए वह एक गुफा के अंदर रहती है और उस समय उस क्षेत्र में सूखा पड़ रहा है। अगर वह बाहर भोजन (कोई खरगोश या फल से लदी झाड़ी) मिलने की संभाविता निकालकर निर्णय करे, तो शायद ही भोजन की तलाश में बाहर जाए। ऐसे में निष्क्रिय रहना उसके लिए सही चुनाव रहता, क्योंकि इससे यहां-वहां भटकने में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती। दूसरी ओर, (कुछ-न-कुछ मिल जाने की) उम्मीद उसे भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलने की हिम्मत दे सकती है। बाहर कुछ-न-कुछ भोजन मिल जाने की संभावना ज़्यादा मानकर, उसके पास कोशिश करने की ज़्यादा संभावना होगी। किसी एक तरफ यह थोड़ा अधिक झुकाव उसे कोशिश करने के लिए बढ़ावा (risk taking behavior) देता है, जिससे उसके जीने की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि, इसकी भी एक सीमा है कि आप कितने आशावादी होकर इससे फायदा उठा सकते हैं। फायदे के लिए जो तरीका सबसे अच्छा काम करता है वह है एक सामान्य सकारात्मक सोच रखना, जिसे आशावादी स्वभाव कहा जाता है। असल ज़िंदगी में कुछ बुरा होने पर किसी निराशावादी व्यक्ति की प्रतिक्रिया होगी “मैं जानता था, ऐसा ही होगा”। जबकि आशावादी लोग कहेंगे “कल बेहतर होगा”।

वर्ष 2007 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन (Nature journal research) के अनुसार यह लचीलापन ‘आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टिमिज़्म बायस)’ से बना रहता है, जो मस्तिष्क में सूचनाओं की प्रोसेसिंग में गैर-बराबरी का परिणाम है: मस्तिष्क द्वारा अच्छी बातों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है और बुरी बातों को कम।

मस्तिष्क के अग्र और मध्य भाग का एक क्षेत्र है रोस्ट्रल एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (rACC)। जब आशावादी लोग अच्छे और सुखद भविष्य की कल्पना करते हैं तब यह क्षेत्र बहुत सक्रिय होता है। इस हिस्से में अधिक सक्रिय न्यूरॉन अच्छी संभावनाओं की एन्कोडिंग को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत, नकारात्मक जानकारियों पर rACC कम प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप असफलताओं का व्यक्ति की भविष्य की उम्मीदों पर कम असर पड़ता है।

रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (Life Orientation Test) एक छोटा-सा परीक्षण है जिसका इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में आशावादिता है या नहीं। इसमें स्थिति आधारित 10 वक्तव्य होते हैं जिन्हें आपको 0 से 4 के बीच अंक देने होते हैं (‘पूरी तरह असहमत’ के लिए 0 से ‘पूरी तरह सहमत’ के लिए 4 तक)। मसलन, ऐसे वक्तव्य होते हैं: “कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता हूं” और “यदि कुछ बुरा होना है, तो होकर रहेगा।” (psychological assessment)।

जिन लोगों में आशावादिता अधिक होती है, उनका हृदय अधिक स्वस्थ (heart health benefits) पाया गया है। बुज़ुर्गों में, आशावादी स्वभाव को न्यूरॉन्स का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो मस्तिष्क को बुढ़ापे की मार से बचाता है। वर्ष 2024 में एजिंग एंड डिसीज़ जर्नल (Aging and Disease journal study) में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) का उच्च स्तर बुढ़ापे में लचीलापन बढ़ाता है। बुढ़ाने के कारण भले ही कुछ न्यूरॉन्स खत्म होते जाते हैं, लेकिन BDNF बचे हुए न्यूरॉन्स को ज़्यादा असरदार तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति की इंद्रियां चाक-चौबंद रहती हैं और दिमाग समझदार बना रहता है। (स्रोत फीचर्स)

क्या आप आशावादी हैं? रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (LOT-R)

देखें कि यहां दिए गए वक्तव्यों से आप कितना सहमत हैं? सहमति की गंभीरता के अनुसार आपको इन वक्तव्यों को अंक देना है।

वक्तव्य

  1. कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता/ती हूं।
  2. मुश्किलों या चिंता को भूलना/हावी न होने देना मेरे लिए आसान है।
  3. यदि मेरे साथ कुछ बुरा होना है तो वह होकर रहेगा।
  4. मैं अपने भविष्य को लेकर हमेशा सकारात्मक रहता/ती हूं।
  5. मुझे अपने दोस्तों के साथ बहुत मज़ा आता है।
  6. मेरे लिए व्यस्त रहना ज़रूरी है।
  7. मुझे शायद ही कभी लगता है कि चीज़ें मेरे हिसाब से/अच्छे के लिए होंगी।
  8. मैं बहुत जल्दी परेशान नहीं होता/ती।
  9. मेरे साथ शायद ही कभी अच्छा हुआ है।
  10. कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि मेरे साथ बुरी चीज़ों की तुलना में अच्छी चीज़ें अधिक होंगी।

नोट: अंक ईमानदारी से दें। कोशिश करें कि किसी एक सवाल का जवाब, दूसरे सवाल के जवाब को ध्यान में रखकर न दिया जाए। जवाब वे चुनें जो आप पर लागू होते हों, न कि आदर्श जवाब हों या दूसरों को ध्यान में रखकर चुनें हों। ध्यान रहे यहां कोई भी जवाब सही या गलत नहीं हैं।

अंक कैसे दें?

ध्यान दें: स्कोर के लिए केवल कथन क्रमांक 1, 3, 4, 7, 9, 10 नंबर के सवालों अंकों को जोड़ा जाता है। वक्तव्य क्रमांक 2, 5, 6, 8 के अंकों को नहीं जोड़ा जाता।

वक्तव्य क्रमांक 1, 2, 4, 5, 6, 8 और 10 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह असहमत – 0
असहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
सहमत – 3
पूरी तरह सहमत – 4

वक्तव्य क्रमांक 3, 7 और 9 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह सहमत – 0
सहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
असहमत – 3
पूरी तरह असहमत – 4 

आपके द्वारा दिए गए जवाबों के अंक जोड़कर जो स्कोर निकलेगा उसकी व्याख्या का तरीका

19-24 घोर आशावादी;
14-18 मध्यम आशावादी;
9-13 उदासीन;
4-8 मध्यम निराशावादी; और
0-3 घोर निराशावादी।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/2d6p7g/article70654691.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/pablo-guerrero-I6QTv5pjq0E-unsplash.jpg

जेलीफिश मनुष्यों के समान सोती है

जेलीफिश (jellyfish) एक समुद्री अकशेरुकी जीव है जो आम तौर पर अपने छतरी जैसी आकृति से पहचाना जाता है। यह निडेरिया फायलम में कैसियोपिडी कुल में आता है और कैसिओपी जीनस का सदस्य है जिसमें 12 प्रजातियां हैं। देखा जाए तो यह हायड्रा, सी-एनीमोन, कोरल जैसे अन्य जलचर जंतुओं का सम्बंधी है। यहां जिस जेलीफिश (Cassiopea andromeda) की बात हो रही है वह उल्टी छतरी जैसा दिखता है। यानी छत्ता ज़मीन पर और झालर ऊपर।

यह शैवालों के साथ सहजीवी सम्बंध (symbiotic relationship) में रहता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के ज़रिए भोजन का निर्माण करते हैं। ये शैवाल इसके छाते में बसते हैं और यही कारण है कि ये जेलीफिश छाते को उल्टा रखती हैं ताकि इन शैवालों को भोजन निर्माण के लिए प्रकाश मिलता रहे। जेलीफिश विभिन्न रंगों में मिलती है और यह रंग इन्हें शैवालों की बदौलत ही मिलता है।

अब वैज्ञानिकों ने नेचर कम्यूनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया है कि जेलीफिश और स्टारलेट सी-एनीमोन (Nematostella vectensis) में नींद जैसे पैटर्न नज़र आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि नींद लेने के लिए दिमाग ज़रूरी है लेकिन उक्त अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है।

देखा जाए तो नींद (sleep behavior) एक जोखिम भरा व्यवहार है – उस दौरान जंतु शिकारियों के प्रति कमज़ोर हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि फिर भी नींद आती है, तो इसकी कुछ तो लाभदायक भूमिका होनी चाहिए। इस्राइल के शोधकर्ता उपरोक्त दो प्रजातियों में इसी की छानबीन कर रहे थे। ये दोनों जंतु उथले लैगून्स के पेंदों में अपने टेन्टेकल्स को लहराते पड़े रहते हैं। टेन्टेकल्स शिकार को पकड़ने का काम करते हैं (marine animal behavior)।

इनमें नींद जैसी अवस्था देखी गई थी। यह देखा गया था कि दिन के कई घंटे ये ऊंघते रहते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन जंतुओं में मस्तिष्क तो छोड़िए, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) भी नहीं होता। इनकी तंत्रिकाएं पूरे शरीर में बिखरी होती हैं।

बार-इलान विश्वविद्यालय के लियोर एपलबॉम और उनके साथी देखना चाहते थे कि इनमें नींद का पैटर्न कैसा होता है और नींद की भूमिका क्या है। अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने एक एक्वेरियम में कई सारी जेलीफिश रखीं और कई दिनों तक उन्हें 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधकार में रखा (light dark cycle experiment), यह देखने के लिए कि जेलीफिश इन अवधियों में कितनी बार अपनी छतरी नुमा तोंद को ऊपर-नीचे करती हैं। यह फूलना-पिचकना इनके जागे होने का एक संकेत है।

प्रयोग में देखा गया कि रात में जेलीफिश कम सक्रिय रहती हैं और अपनी तोंद को प्रति मिनट लगभग पांच बार कम ऊपर-नीचे करती हैं। अब यह देखना था कि क्या इस क्रिया का सम्बंध निद्रावस्था से है। शोधकर्ताओं ने जेलीफिश पर रोशनी चमकाई और देखा कि वे कितनी जल्दी अपनी धड़कन से प्रतिक्रिया देती हैं। किसी ऊंघते मनुष्य के ही समान जेलीफिश ने अंधकार में रोशनी की प्रतिक्रिया देने में 20 सेकंड का टाइम लिया। जबकि दिन में चौकन्नी अवस्था में उन्हें मात्र 10 सेकंड लगते हैं।

सी-एनीमोन (sea anemone organism) का पैटर्न इससे उल्टा था। वे रात में सक्रिय रहते हैं और दिन में उनकी हरकतें धीमी रहीं और प्रतिक्रिया अवधि लंबी। अलबत्ता, दोनों ही जंतु दिन की एक-तिहाई अवधि तक सोते रहे। और तो और, सी-एनीमोन के सोने जागने का क्रम उनकी अंदरुनी घड़ी (सर्काडियन क्लॉक) से संचालित था। शोधकर्ताओं ने प्रकाश व अंधकार के क्रम को पलट दिया, तब भी सी-एनीमोन का सोने-जागने का क्रम बरकरार रहा। दूसरी ओर, जेलीफिश में यह क्रम प्रकाश से प्रभावित हुआ – अंधेरे में वे उनींदे रहे और रोशनी में सक्रिय (sleep deprivation effect)।

यह भी देखा गया कि इन जंतुओं को यदि एक रात की नींद ठीक से न मिले तो उन्हें बाद में ज़्यादा आराम की ज़रूरत होती है, ठीक इंसानों के समान। शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में पानी को 6 घंटे तक उस दौरान मथा जो जेलीफिश के सोने का समय था। इससे उनकी नींद कच्ची रही और बाद में वे सामान्य जेलीफिश की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक समय तक सोते रहे।

शोधकर्ताओं ने नींद के साथ छेड़छाड़ का एक तरीका और आज़माया। उन्होंने कुछ एक्वेरियम टंकियों में मेलेटोनिन (melatonin hormone) डाल दिया। मेलेटोनिन एक हॉरमोन है, मनुष्यों में मस्तिष्क जिसका स्राव रात में करता है और यह नींद प्रेरित करता है। मेलेटोनिन का ऐसा ही असर जेलीफिश तथा सी-एनीमोन पर भी हुआ और वे दिन की उस अवधि में ऊंघने लगे जब वे सामान्य तौर पर सक्रिय होते हैं (sleep regulation)।

ज़ाहिर है कि ये दो जंतु नींद का मज़ा लेते हैं। पूर्व में कई शोधकर्ता दर्शा चुके थे कि मक्खियों, चूहों और मनुष्यों सहित कई प्रजातियों में नींद डीएनए को हुई क्षति को कम (DNA damage repair) करता है। यह क्षति जाग्रत अवस्था में होती रहती है। एपलबॉम का विचार है कि शायद जेलीफिश और सी-एनीमोन में भी ऐसा ही होता है। अपने इस विचार की जांच के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने जेलीफिश को पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश के संपर्क (ultraviolet UV radiation) में रखा। यूवी प्रकाश डीएनए क्षति के लिए जाना जाता है। यूवी के संपर्क में रहने के बाद जेलीफिश सामान्य से ज़्यादा देर तक सोती रहीं जबकि उनमें मस्तिष्क नहीं होता।

इसी प्रकार से, सी-एनीमोन को ऐसी कीमोथेरपी औषधि (chemotherapy drug) दी गई जो डीएनए क्षति करती है। इस उपचार के बाद ये सी-एनीमोन 30 प्रतिशत ज़्यादा सोए (DNA repair mechanism)।

तो, सवाल उठता है कि नींद की झपकी के सारे आसन्न खतरों के बावजूद जंतु सोते क्यों हैं। एक गोल कृमि सीनेरोब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabditis elegans worm) के नींद व्यवहार पर शोध करने वाली कैलिफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक चेरिल फान बर्सकिर्क का कहना है कि नींद तंत्रिकाओं के रख-रखाव का एक तरीका हो सकता है क्योंकि तंत्रिकाएं डीएनए क्षति का सबसे अधिक खतरा झेलती हैं। उनका तो कहना है कि नींद का उद्भव संभवत: पहली-पहली तंत्रिकाओं (early nervous system) के साथ ही हुआ होगा। यानी नींद तो मस्तिष्क के विकास से पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार कर चुकी थी। वे कहती हैं कि एपलबॉम की टीम द्वारा किए गए ये प्रयोग एक बार फिर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि नींद का विकास (evolution of sleep) जटिल मस्तिष्क  को संभालने के लिए हुआ है। (स्रोत फीचर्स)

जेलीफिश की सोनजागने की प्रक्रिया का वीडियो देखें: https://youtu.be/UPtSlvU6nh8

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है?

जाड़े का मौसम तो चला गया है लेकिन जाते-जाते एक सवाल का जवाब मिल गया है: कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है? इसका कारण है हमारे शरीर की बनावट, अनुकूलन की क्षमता (cold adaptation) और हमें मिले वंशानुगत गुण (genetic factors)।

युनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के जीवविज्ञानी फ्रांस्वा हेमन के अनुसार, इंसान का शरीर नैसर्गिक रूप से बहुत ज़्यादा ठंड सहने में माहिर नहीं है। हम आसानी से शरीर की गर्मी गंवा देते हैं। फिर भी हर व्यक्ति को ठंड अलग-अलग तरह से महसूस होती है। और, इसमें हमारी जीवनशैली व जैविक बनावट (human physiology), दोनों की अहम भूमिका होती है।

ठंड सहने में एक भूमिका अनुकूलन की भी होती है। जो लोग गर्म इलाकों से ठंडे स्थानों पर जाते हैं, उन्हें शुरुआत में ज़्यादा दिक्कत होती है। लेकिन लगातार उस स्थान पर रहने से धीरे-धीरे शरीर ठंड के मुताबिक खुद को ढाल लेता है। इस प्रक्रिया को अनुकूलन (climate acclimatization) कहते हैं।

शरीर का आकार भी मायने रखता है। छरहरे शरीर या छोटे कद वाले लोग जल्दी गर्मी गंवाते हैं, जबकि बड़े डील-डौल वाले लोग गर्मी देर तक सहेज पाते हैं। खासकर मांसपेशियां (muscle mass) बहुत महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे काम करते समय गर्मी पैदा करती हैं। इसलिए जिन लोगों की मांसपेशियां ज़्यादा होती हैं, वे अंदर से अधिक गर्मी (heat generation in body) बनाते हैं। ठंड से बचाव के मामले में मांसपेशियां शरीर की सबसे मज़बूत ढालों में से एक हैं।

लेकिन, सिर्फ शरीर का आकार ही पूरी कहानी नहीं है। आर्कटिक जैसे बेहद ठंडे इलाकों में रहने वाले कुछ समुदाय (जैसे ग्रीनलैंड के इनुइट लोग) अपेक्षाकृत छोटे कद के बावजूद कड़ाके की ठंड आसानी से सह लेते हैं। शोध में पाया गया है कि कुछ लोगों के जीन ऐसे होते हैं जो ‘भूरी वसा’ (brown fat tissue) नाम की खास वसा के विकास से जुड़े हैं। यह वसा शरीर में गर्मी पैदा करने में मदद करती है। इसके अलावा, जीन यह भी तय करते हैं कि शरीर में चर्बी कैसे वितरित होगी और मांसपेशियां कैसे काम करेंगी। इन कारणों से कुछ लोग अपने शरीर का अंदरूनी तापमान दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से बनाए (genetic adaptation) रख पाते हैं।

जीन इस बात को भी प्रभावित कर सकते हैं कि ठंड में हमारी रक्त वाहिकाएं (blood vessels response) कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। जब मौसम बहुत ठंडा होता है, तो त्वचा और हाथ-पैरों की ओर बहने वाला खून कम हो जाता है, ताकि हृदय और दूसरे ज़रूरी अंगों के आसपास गर्मी बनी रहे। इसी कारण उंगलियां और पैर ज़्यादा ठंडे महसूस होते हैं, लेकिन इससे शरीर का केंद्रीय तापमान सुरक्षित रहता है। कुछ लोगों में जीन इस प्रक्रिया को और बेहतर तरीके से नियंत्रित (blood circulation in cold)  करने में मदद करते हैं।

कुल मिलाकर, ठंड लगना कई कारणों से तय होता है। इसमें डील-डौल, अनुकूलन क्षमता और जेनेटिक्स (human genetics) तीनों मिलकर असर डालते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खुशबू से ठगने वाले बीटल्स

ल-धोखा सिर्फ हमारे साथ नहीं होता। जीवजगत में भी कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां एक जीव अपने फायदे के लिए दूसरे जीव का इस्तेमाल (biological deception) करता है। जैसे, कुछ ऑर्किड के फूल (orchid flowers) मधुमक्खियों को छलते हैं। इन ऑर्किड के फूलों का रूप-रंग मादा मधुमक्खी की तरह होता है और वे उन्हीं की तरह महक बिखेरते हैं। मादा की तलाश कर रहीं नर मधुमक्खी इन फूलों पर चली जाती हैं। संभोग तो होता नहीं लेकिन संभोग की कोशिश में उनके शरीर पर ऑर्किड के परागकण (pollination process) चिपक जाते हैं। ऑर्किड का परागण हो जाता है, बदले में मधुमक्खी को कुछ नहीं मिलता।

वैज्ञानिकों को अब ऐसी ही एक और धोखाधड़ी के बारे में पता चला है। इसमें मधुमक्खियों को धोखा देते हैं भृंग यानी बीटल्स: ब्लिस्टर बीटल के लार्वा (blister beetle larvae) फूल जैसी महक बिखेरते हैं, जिससे मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती है। फिर, लार्वा मधुमक्खी से चिपक जाते हैं, चिपके-चिपके उनके छत्तों में पहुंच जाते हैं और उनके अंडे खा जाते हैं।

मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकॉलॉजी (Max Planck Institute for Chemical Ecology) के कार्बनिक रसायनज्ञ रयान आलम की बीटल्स के अध्ययन में दिलचस्पी थी। ब्लिस्टर बीटल आत्मरक्षा के लिए कैंथेरीडिन नामक विषैला रसायन छोड़ते हैं, जिससे त्वचा पर फफोले उभर आते हैं। जब आलम को पता चला कि ब्लिस्टर बीटल की कुछ प्रजातियां घास और पौधों के सिरे पर चढ़ जाती हैं (insect behavior)  तो वे हैरान रह गए।

वे सोचने लगे कि कहीं इनके लार्वा कोई गंध तो नहीं छोड़ते। जांच के लिए वे जर्मनी के घास के मैदानों से 40 युरोपियन ब्लैक ऑयल बीटल (Meloe proscarabaeus) इकट्ठा करके प्रयोगशाला ले आए। यहां बीटल्स ने प्रजनन किया और हज़ारों अंडे दिए। अंडे से निकलने के बाद लार्वा प्रयोगशाला की घास पर चढ़ गए। कैंथेरीडिन रसायन से बनने वाले फफोलों से बचने के लिए दस्ताने पहनकर आलम ने लार्वा इकट्ठा किए और उन्हें मसल दिया। फिर उन्होंने इस लार्वा-चटनी की गैस क्रोमैटोग्राफी की और देखा (gas chromatography analysis) कि इसमें कौन-कौन-से रसायन मौजूद हैं।

उन्हें लार्वा में मोनोटर्पिनॉइड्स नामक कुछ अणु (monoterpenoid compounds) मिले। ये कीटों में तो कम मिलते हैं, लेकिन पौधों में आम तौर पर पाए जाते हैं। लार्वा में सबसे अधिक पाए गए आठ अणुओं में से कई प्राय: फूलों में पाए जाते हैं। जैसे लिनेलूल ऑक्साइड (linalool oxide) और लिलेक एल्डिहाइड (lilac aldehyde)। फूलों में ये रसायन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन फूलों में पाए जाने वाले रसायन किसी कीट में मिलना हैरानी की बात थी (chemical mimicry)।

तो सवाल था कि क्या वाकई कीट में मौजूद ये रसायन मधुमक्खियों को न्यौता देते हैं? इसे जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने एक Y-शेप का रास्ता (Y-maze experiment) बनाया, जिसका एक रास्ता बीटल-लार्वा से बिखेरी गई खुशबू की ओर जाता था और दूसरा रास्ता व्हीटग्रास की खुशबू की ओर। मधुमक्खी दोनों में से कोई एक खुशबू चुन सकती थीं। रेड मेसन मधुमक्खियों (Osmia bicornis) और बेयर-सैडल्ड सेलोफेन मधुमक्खियों (Colletes similis), दोनों ने व्हीटग्रास की बजाय लार्वा से निकलने वाली फूल-जैसी खुशबू का मार्ग चुना।

शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि बीटल लार्वा फूल जैसे रसायन कैसे बनाते हैं। पता चला कि उनमें इन रसायनों का निर्माण उन्हीं एंज़ाइम्स (biosynthesis enzymes) से होता है, जिनसे ये पौधे में बनते हैं।

मादा-सरीखी खुशबू फैलाने की बजाय फूल-जैसी खुशबू बिखेरने से फायदा यह है कि इस खुशबू से नर और मादा दोनों मधुमक्खियां आकर्षित होती है। और सिर्फ मादा मधुमक्खियां ही अपने छत्ते में वापस लौटती हैं, नर नहीं। तो क्यों न छत्ते तक पहुंचने के लिए नर को छोड़कर सीधे मादा से लिफ्ट ली जाए। लार्वा वसंत की शुरुआत में, असली फूल खिलने से पहले, घास के तनों पर चढ़ जाते हैं। और उन्हें फूल समझकर बेचारी मधुमक्खियां उनके पास खींची चली आती हैं और ठगी जाती (parasitic strategy) हैं।

हो सकता है इस तरह की महकती नकल जीवजगत में और भी आम हो, जिन पर लोगों का ध्यान न गया हो। ध्यान न जाने का कारण यह हो सकता है कि हम मनुष्य नाक से उतना काम नहीं लेते जितना आंखों से लेते हैं। तो, आंख-नाक-कान खुले रखकर निसर्ग को निहारें, सूंघें और सुनें बहुत कुछ रोचक हाथ लग सकता है (nature science discovery)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zeydsqa/full/_20260122_on_beetle_larvae.jpg

एआई ने सुझाए प्रचीन रोमन खेल के नियम-कायदे

प्रतिका गुप्ता

बात करीब सवा सौ साल पहले की है। दक्षिण-पूर्वी नीदरलैंड्स के शहर हीरलेन में खुदाई के दौरान एक चूना पत्थर मिला था, जो फ्रांस से आयातित था। इस पर उभरी लकीरों के पैटर्न देखकर तो ऐसा लगता था जैसे यह कोई बोर्ड गेम (ancient board game) हो। रोमन म्यूज़ियम की क्यूरेटर कैरन जेनेसन के शब्दों में “पत्थर को नफासत से तराशा गया था। इसे मेज़ पर रखकर खेला जाता होगा।” लेकिन लकीरों के पैटर्न किसी भी जाने-पहचाने रोमन खेल (Roman era game) जैसे नहीं थे।

तो यह गुत्थी अनसुलझी ही रही कि यह क्या खेल है, इसे कैसे खेलते होंगे, इसके नियम क्या होंगे, वगैरह-वगैरह। इस खेल-पत्थर के आसपास कांच, हड्डी और सिरेमिक की गोटियां भी मिली थीं, जिन्हें हेट रोमाइन्स म्यूज़ियम में सहेजा गया (archaeological discovery)।

 फिर, साल 2020 में लीडेन युनिवर्सिटी के प्राचीन बोर्ड गेम्स विशेषज्ञ वाल्टर क्रिस्ट तकरीबन आठ इंच चौड़े इस बोर्ड गेम के सामने ठिठक गए। कारण इसकी सीधी-तिरछी लकीरों से बनी अष्टभुज आकृति का अब तक ज्ञात किसी भी खेल से मेल न बैठना था। उन्होंने तफ्सील से अध्ययन करने का सोचा।

क्रिस्ट ने खेल-पत्थर पर गोटियां खिसकाने से बने घिसावों को ध्यानपूर्वक देखा ताकि चालों का अंदाज़ा लगाया जा सके। फिर उन्होंने अन्य विशेषज्ञों की मदद से खेल-पत्थर का विस्तृत और सूक्ष्म 3डी स्कैन (3D scan analysis) करवाया। 3डी स्कैन में खेल-पत्थर पर बने निशान और गोटियों की चाल थोड़ा उभर कर आ रही थीं: कुछ लकीरें अन्य लकीरों की तुलना में थोड़ी ज़्यादा गहरी थीं। इससे साफ पता चलता था कि कुछ खास चालों को ज़्यादा चला गया था। चालों को देखकर यह किसी ब्लॉकिंग खेल की तरह लगता था, जिसमें एक खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी की गोटियां आगे बढ़ने से रोकने और उन्हें घेरने की कोशिश करता है, जैसे टिक-टैक-टो या ओथेलो में होता है (strategy board game)। साथ ही खेल-पत्थर के नफासत से तराशे गए किनारे बताते थे कि इसे सोच-समझकर बनाया गया था।

खेल के नियमों को डिकोड करने में शोधकर्ताओं का अगला कदम था कृत्रिम बुद्धि (एआई- artificial intelligence AI) की मदद लेना। नियमों को समझने के लिए, क्रिस्ट ने मास्ट्रिख्ट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस सोमर्स के साथ मिलकर दो एआई एजेंट्स को सौ से अधिक प्रचलित रोमन-युरोपियन खेलों के नियमों से प्रशिक्षित किया (AI game simulation)। फिर AI एजेंट्स ने हर नियम सेट के अनुसार 1000 राउंड खेले। शोधकर्ताओं ने विभिन्न नियमों के अनुसार खेले गए खेलों में मोहरों की चालों को देखा। फिर उन्होंने चालों की तुलना खेल-पत्थर पर मिले घिसावों से की ताकि यह पता चल सके कि किन नियमों के मुताबिक गोटियां चली गई थीं। शोधकर्ताओं को नौ नियम मिले जो खेल-पत्थर के घिसावों के साथ मेल खा रहे थे; ये सभी नौ नियम ब्लॉकिंग (घेराबंदी) खेलों के थोड़े परिवर्तित रूप थे। पैटर्न को देखकर ऐसा लगता था कि इस खेल में ज़्यादा गोटियों वाला खिलाड़ी कम गोटियों वाले खिलाड़ी को बढ़ने से रोकने या घेरने की कोशिश करता है।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने इस खेल को पुनर्निमित किया और इसे खेलने के कुछ नियम बताए। खेल को उन्होंने लुड्स कोरिओवल्ली (Ludus Coriovalli) नाम दिया है जिसका मतलब है कोरिओवलम का खेल। कोरिओवलम हीरलेन शहर का प्राचीन रोमन नाम है, जहां से यह खेल-पत्थर मिला था।

शोधकर्ता खेल के नियम तो बताते हैं लेकिन थोड़ा सतर्क भी करते हैं कि यह चालों और ज्ञात अन्य खेलों के नियमों के आधार पर एक निष्कर्ष है; हो सकता है रोमन लोग वास्तव में इसे थोड़े अलग ढंग से खेलते हों।

उम्मीद है कि इस अध्ययन के बाद अन्य प्राचीन खेलों के नियम वगैरह सुलझाने में मदद मिलेगी। बहरहाल, अध्ययन यह बात साफ उभारता है कि काम के अलावा, मनोरंजन भी प्राचीन लोगों के जीवन का अहम हिस्सा था (Roman civilization lifestyle)। वे न सिर्फ खोज, नए आविष्कार या दिन-रात काम करते थे बल्कि अपने मनोरंजन का ख्याल भी रखते थे और मनोरंजन के नए-नए तरीके, नए खेल भी गढ़ते थे। (स्रोत फीचर्स)

कैसे खेलें लुड्स कोरिओवल्ली

बोर्ड: कागज़ या तख्ती पर चित्र 1 के अनुसार बिसात बनाएं।

खिलाड़ी: इस खेल को दो खिलाड़ी (चोर और पुलिस) खेल
सकते हैं। चोर खिलाड़ी के पास दो गोटियां होंगी और पुलिस
खिलाड़ी के पास चार गोटियां होंगी।

लक्ष्य: पुलिस खिलाड़ी को कम से कम चालों में चोर को चारों
ओर से घेरना है, ऐसे कि चोर खिलाड़ी की गोटियों को आगे
चलने के लिए कोई चाल न बचे।

नियम

  • खेल दो पारियों में खेला जाता है। खेल शुरू करने के पहले खिलाड़ी यह तय कर लें कि पहली पारी में कौन सा खिलाड़ी चोर बनेगा और कौन सा खिलाड़ी पुलिस।
  • चित्र के अनुसार गोटियां जमा लें। चित्र में काली गोटियां पुलिस की हैं और सफेद गोटियां चोर की।
  • बिसात में दो या दो से अधिक रेखाओं के जोड़ बिंदु ‘घर’ हैं।
  • एक खिलाड़ी एक चाल में नज़दीकी एक घर आगे बढ़ सकता है।
  • कोई भी खिलाड़ी अपनी या विरोधी खिलाड़ी की गोटी को लांघकर आगे नहीं बढ़ सकता।
  • एक घर पर एक ही गोटी रह सकती है, एक से ज़्यादा नहीं।
  • खिलाड़ी बारी-बारी से अपनी चाल चलेंगे। एक खिलाड़ी एक चाल में अपनी गोटी एक घर ही खिसका सकता है। और अपने द्वारा चली चालों का हिसाब रखता जाता है।
  • यदि चोर की गोटी को अगली चाल चलने के लिए कोई रास्ता न बचे, वह अपनी गोटी कहीं भी आगे न बढ़ा पाए तो इस सूरत में गोटी घिरी हुई कहलाएगी।

पारी खत्म कब होगी

पारी तब खत्म होगी जब चोर की दोनों गोटियां पुलिस से पूरी तरह घेर ली जाएंगी। एक पारी के अंत में पुलिस ने कितनी चालों में चोर को पूरी तरह घेर लिया इसे गिना जाएगा।

अगली पारी, भूमिका बदली

अगली पारी खिलाड़ियों की भूमिकाएं आपस में बदलकर खेली जाएगी। यानी अगली पारी में पुलिस खिलाड़ी चोर बनेगा और चोर खिलाड़ी पुलिस बनेगा। और, फिर खेल
दोहराया जाएगा। खेल के अंत में दोनों पुलिस खिलाड़ियों
की चालों को गिना जाएगा। जिस खिलाड़ी ने सबसे कम
चालों में चोर को घेरा होगा वह विजेता कहलाएगा। यदि
खेल ड्रॉ होता है, तो खेल शुरू से दोबारा खेला जाएगा। तो चलिए, यह प्राचीन लेकिन नया खेल खेलकर देखिए।
वैसे खेल के नियम आप अपने हिसाब से मुश्किल और
मज़ेदार बना सकते हैं, थोड़े बदल सकते हैं। क्योंकि
मतलब खेलने के मज़े से है। किसी भी तरह खेलें और
मज़ा लें! चाहें तो आप बिसात थोड़ा बदल भी सकते हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/m/7e1f9d133bec2c01/original/Roman-game-cropped.jpg?m=1770756397.469&w=1200
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