प्लास्टिक कचरा (plastic waste) खत्म नहीं होता। बल्कि यह धीरे-धीरे बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता जाता है, जिन्हें नैनोप्लास्टिक कहते हैं। ये कण नदियों, समुद्रों यहां तक कि मानव शरीर में भी मिल रहे हैं, जो कैंसरकारी (carcinogenic risk) भी हो सकते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें हटाना बहुत मुश्किल काम रहा है। लेकिन अब एक नया चुंबक-चालित नैनोरोबोट (magnetic nanorobot) तैयार किया गया है जो इस समस्या से निपटने में मदद कर सकता है।
एनवायरनमेंटसाइंस में प्रकाशित शोध के अनुसार ये छोटे-छोटे रोबोट पानी में खुद घूम-घूमकर नैनोप्लास्टिक कणों (water pollution cleanup) को ढूंढते और पकड़ते हैं। पहले की तकनीक में रोबोट स्थिर रहते थे और बहते हुए कण सतह से टकराकर चिपक जाते थे।
नैनोरोबोट (nanotechnology) लोहे से बने खास पदार्थों से तैयार किए गए हैं, जिनमें बहुत सारे छोटे-छोटे छेद हैं। इन छेदों की वजह से इनका सतह क्षेत्र बढ़ गया है, जिससे ज़्यादा कण चिपक सकते हैं। एक खास गर्म करने की प्रक्रिया के बाद ये पदार्थ चुंबकीय बन जाते हैं। इससे इन रोबोट्स को बाहर से चुंबक (magnetic control) की मदद से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
कणों को पकड़ने का तरीका स्थिर विद्युत आवेश पर आधारित है, ठीक वैसे जैसे गुब्बारा बालों से चिपकता है। नैनोप्लास्टिक में हल्का आवेश होता है और रोबोट उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं।
प्रयोगशाला परीक्षण में अच्छे नतीजे मिले हैं। घूमते रोबोट सिर्फ एक घंटे में लगभग 78 प्रतिशत नैनोप्लास्टिक पानी से हटा पाए, जो कि स्थिर रोबोट की तुलना में अधिक थे। रोबोट्स पर कण इकट्ठा होने पर वैज्ञानिकों ने एक साधारण चुंबक की मदद से रोबोट्स को पानी से बाहर निकाल लिया और साफ पानी अलग कर लिया।
लेकिन यह तकनीक अभी शुरुआती दौर (early stage technology) में है। समुद्र या भूजल जैसे जटिल स्रोत में इसकी क्षमता कम हो जाती है, क्योंकि उनमें घुले लवण विद्युत आकर्षण को कमज़ोर कर देते हैं। ऐसी स्थिति में इनकी सफाई करने की क्षमता एकदम से घट जाती है। इसके अलावा, ये रोबोट बहुत धीरे चलते हैं, इसलिए बड़े जल स्रोतों (large scale cleanup) को साफ करना मुश्किल है। समय के साथ इनके छेद भी बंद हो जाते हैं, जिससे बार-बार इस्तेमाल करने पर इनकी क्षमता और कम हो जाती है। हालांकि यह तकनीक पानी साफ करने वाले प्लांट्स (water treatment plants) जैसी नियंत्रित जगहों पर काम आ सकती है।
वैसे भविष्य में नैनोरोबोट या ऐसे अन्य उपाय (future technology) प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ने का नया तरीका तो दे देंगे, लेकिन एक सवाल सदैव सर उठाए खड़ा रहेगा कि पानी से हटाने के बाद इन नैनोप्लास्टिक का क्या होगा? यदि ये ऐसे ही पर्यावरण में कहीं अन्यत्र फेंक दिए जाएंगे, तो ये ‘यहां’ से निकलकर ‘वहां’ मुश्किलें बढ़ाएंगे (waste management issue)। साथ ही, ऐसे समाधानों का टिकाऊ और समतामूलक भविष्य कम दिखता है। संभव है ये रोबोट्स बाज़ार में आएं और धनवानों के घर की पानी की टंकियों में फिट हो जाएं, जैसे एयर प्यूरीफायर (home filtration systems) फिट होते जा रहे हैं। जो इन उपायों को वहन नहीं कर सकते वे प्रदूषण से दामन छुड़ा नहीं पाएंगे। यदि वास्तव में प्लास्टिक या अन्य प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है, तो प्लास्टिक उपयोग (plastic reduction) सीमित करना होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s.yimg.com/lo/mysterio/api/ae2dd2ab6b186c2846a924e1701ae222557fd342016cf4591c55b1d7efe71cd2/lightyear_networkapi/resizefill_w976;quality_80;format_webp/https:%2F%2Fmedia.zenfs.com%2Fen%2Ftechradar_949%2F4e3c69d864e38ff6318218c19222794e
जल ही जीवन है, यह बात शाकीय पौधों के संदर्भ में सौ फीसदी प्रत्यक्ष लागू देखी जा सकती है। धनिया, पालक, मेथी जैसी पत्तेदार सब्ज़ियों के पौधे पानी की ज़रा-सी कमी होने पर तुरंत मुरझा जाते हैं।
अधिकांश पादप प्रजातियां (plant species) उनके अंदर पानी की मात्रा 60 प्रतिशत से कम होने पर संकट में पड़ जाती हैं या मर जाती हैं। वहीं, कुछ मांसल पौधे उनमें पानी की मात्रा 50 या 40 प्रतिशत तक रह जाने पर भी जीवित रह पाते हैं। उनमें पानी को बचाए रखने के कुछ तरीके (water retention mechanism) भी हैं। उनकी मोटी फूली-फूली पत्तियां मोम जैसी परतों से ढंकी होती हैं, जिसके चलते पानी का वाष्पन (transpiration control) कम होता है। इन पौधों में एक और विशेषता पाई जाती है। पानी पत्तियों पर उपस्थित महीन छिद्रों (स्टोमेटा) के रास्ते वाष्पीकृत होता रहता है और उन्हीं छिद्रों के रास्ते प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण की जाती है। अत: ऐसे में पानी को बचाने के लिए ये पौधे अपने स्टोमेटा रात में खोलते हैं ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो और उस समय कार्बन डाईऑक्साइड का भंडारण कर सकें। दिन के समय यह प्रकाश संश्लेषण में काम में आती है।
परंतु कुछ पौधे ऐसे भी पाए जाते हैं जो पूरी तरह सूख जाने के बाद भी फिर से पानी मिलने पर पुनर्जीवित (resurrection plants) हो जाते हैं। इनका व्यवहार एकदम विपरीत होता है। जब इनके अंदर पानी की मात्रा कम होने लगती है तो वे अपनी शेष नमी को भी पूरी तरह से त्याग देते हैं (desiccation tolerance)। परिणाम यह होता है कि उनके अंदर जल स्तर घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह जाता है और वे मुरझाकर एक भूरी टहनी भर रह जाते हैं। देखकर ऐसा लगता है कि वे मर ही गए हैं, परंतु पानी मिलते ही फिर से जी उठते हैं, हरे-भरे हो जाते हैं।
पुनर्जीवित होने वाले पौधों की बात हो तो हमारे यहां सबसे पहले संजीवनी बूटी (Sanjeevani plant) का नाम ज़ेहन में आता है। इसे लक्ष्मण बूटी भी कहते हैं।
पुनर्जीवन की क्षमता वाले पौधों पर सर्वाधिक शोध कार्य एक अफ्रीकन वैज्ञानिक जिल फैरेन्ट (Jill Farrant) ने किया है। वे वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन विश्वविद्यालय में आणविक और कोशिका विज्ञान की प्रोफेसर हैं जिनके खास विषय हैं पुनर्जीवन पौधों की खोज और उनकी कार्य प्रणाली का अध्ययन करना।
उन्होंने 2025 में केप टाउन के एक पुराने स्मारक के पास एक रेतीले रास्ते पर झाड़ियों के पास भूरे रंग की सूखी हुई मुरझाई कुछ टहनियों को उठाया जो देखने में बिल्कुल बेजान-सी लगती थीं। यह वही पौधा था जिसे उन्होंने बरसों पहले बचपन में देखा था।
यह एनीमियाएफ्रोरम (Anemia affrorum) नाम का एक फर्न (fern) था। वे इसकी चमत्कारी शक्ति से प्रभावित थीं। उन्होंने प्रयोगशाला में इसकी कुछ सूखी टहनियों को पानी भरी तश्तरी में रख दिया। कुछ ही घंटों में टहनियों पर छोटे-छोटे हरे पत्ते खुलने लगे। अगली सुबह तक सभी शाखाएं हरी-भरी नज़र आने लगीं, बिलकुल एक नन्ही क्रिसमस ट्री के समान।
दरअसल, एनीमियाएफ्रोरम पुनर्जीवित होने वाला एक फर्न (resurrection fern) है जो महीनों या वर्षों तक भीषण सूखे को सहन करके पानी मिलने पर दो-तीन दिन में ही फिर से जीवित हो जाता है; यह लंबे और इन्तहाई शुष्क मौसम वाले क्षेत्रों में उगने वाले पौधों में पाया जाने वाला एक दुर्लभ अनुकूलन है, जो जैव विकास (evolutionary adaptation) के लंबे दौर में पैदा हुआ है। अक्सर ये पौधे पानी की कमी होने पर अपनी कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाले क्लोरोफिल रंजक को नष्ट कर देते हैं और कोशिकाओं में लगभग हर जगह मौजूद पानी की जगह शर्करा और प्रोटीन भर लेते हैं। फैरेन्ट इसे बिना मरे सूख जाना कहती हैं यानी ‘प्लेईंग डेड’ या मरने का स्वांग।
प्रयोगशाला में फैरेन्ट ने जो किया था, वह हमारे यहां सड़कों पर कांच की बोतलों में किया जाता है। ऐसा नज़ारा अक्सर धार्मिक मेलों (traditional plant selling) में देखने को मिल जाता है। सड़कों पर कुछ लोग एक वनस्पति का ढेर लिए बैठे रहते हैं और उसके कुछ पौधों को वे पानी की बोतल में भरकर रखते हैं जो बिल्कुल ताज़ा एवं हरे भरे दिखते हैं जबकि ढेर के पौधे एकदम सूखे और मुड़े-तुड़े होते हैं। इस पौधे को वे संजीवनी बूटी के नाम से बेचते हैं। यह भी एनीमियाएफ्रोरम की तरह एक फर्न है और नाम है सेलेजिनेलाड्रायोप्टेरिस (Selaginella bryopteris)। यह हमारे देश में अरावली और विंध्य पर्वत शृंखला तथा दक्षिण भारत के शुष्क और चट्टानी इलाकों में मिलता है। यह एक लिथोफाइट (शैलोद्भिद) है जो 200 से 8000 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानों की दरारों में उगता है।
एक और मशहूर पुनर्जीवन पौधा है मायरोथेम्नसफ्लेबेलीफोलिया (Myrothamnus flabellifolia)। यह मध्य और दक्षिणी अमेरिका में पाया जाने वाला एकमात्र काष्ठीय पुनर्जीवन पौधा है। इसका उपयोग पारंपरिक अफ्रीकी चिकित्सा पद्धति (traditional medicine) में घावों के लिए मरहम बनाने तथा सांस की तकलीफों में धूम्रपान या औषधि चाय के रूप में किया जाता है।
मरनेकास्वांगऔरपुनर्जीवनकाविज्ञान
पुनर्जीवित होने वाली प्रजातियों में सूखने पर भी जीवित बने रहने के लिए कई रणनीतियां (survival strategies) विकसित हुई हैं। प्रोफेसर फैरेन्ट ने इस जटिल सुनियोजित परिवर्तन (cellular adaptation) का खुलासा किया है।
इस प्रक्रिया के दौरान होता यह है कि कोशिकाओं के अंदर का पानी सुक्रोज़ और रैफीनोस जैसी शर्कराओं (sugar molecules) और विभिन्न प्रोटीन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है। इससे एक कांच जैसा पदार्थ (vitrification process) बनता है जो कोशिका झिल्ली को सिकुड़ने से रोकता है। कोशिकाओं में कुछ विशेष प्रोटीन पाए जाते हैं जिन्हें शेपरॉन प्रोटीन (chaperone proteins) कहते हैं। ये कोशिका में विभिन्न विशाल अणुओं (जैसे डीएनए और आरएनए) की संरचना को बनाए रखने में मदद करते हैं। जैसे-जैसे कोशिका का आयतन कम होता है वैसे-वैसे सैल्यूलोज़ से बनी कोशिका भित्ती (cell wall structure) अंदर की ओर मुड़ने लगती है ताकि वह कोशिका झिल्ली के संपर्क में बनी रह सके। तनाव के दौरान सक्रिय ऑक्सीजन मूलक भी बनने लगते हैं जो डीएनए, प्रोटीन व कोशिका झिल्ली को नुकसान पहुंचा सकते हैं। और इन्हें कई एंटीऑक्सीडेंट अणु (antioxidant defense) तोड़ देते हैं।
प्रकाश संश्लेषण ऐसे सक्रिय ऑक्सीजन मूलकों का एक प्रमुख स्रोत (oxidative stress source) होता है। इन पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगभग रुक जाती है। इसके अलावा, कुछ पुनर्जीवन पौधे अपनी पत्तियों को इस तरह मोड़ लेते हैं कि सूर्य की रोशनी क्लोरोफिल तक न पहुंचे (light protection mechanism)। अन्य पौधे प्रकाश संश्लेषण तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं और पानी मिलने पर फिर से उसका निर्माण करते हैं।
मरने-जीने की इस जटिल प्रक्रिया के अंतिम चरण में, जब पौधे में पानी 20 प्रतिशत से कम हो जाता है, तब पौधा कई आरएनए और अन्य अणु (gene expression storage) पैदा करके संग्रहित कर लेता है ताकि पुनर्जीवन के लिए ऊर्जा की व्यवस्था की जा सके। इसके बाद सब कुछ थम जाता है।
जीर्णताऔरपुनर्जीवनपौधे
पादप प्रजनकों (plant breeding) ने ऐसी कई किस्में विकसित की है जो अधिक पानी संग्रहित कर सकती हैं, ये वाष्पीकरण के ज़रिए पानी कम उड़ाती हैं या पानी सोखने के लिए गहरा जड़ तंत्र विकसित कर लेती हैं ताकि सूखे की स्थिति में भी जीवित रह सकें। लेकिन इनमें जरावस्था आती है और इसकी परिणति को जीर्णता कहते हैं। परंतु पुनर्जीवन पौधों में यह स्थिति नहीं आती। फैरेन्ट की टीम ने दो प्रजातियों में जीर्णता रोकने वाले तंत्रों (anti aging mechanism plants) का पता लगाया है। इनमें एक मक्का है और दूसरी फसल इथियोपिया की टेफ (Eragrostis tef) है। उनका अगला कदम जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering crops) के माध्यम से फसलों में जरावस्था को रोकने वाले तंत्र को शामिल करने का प्रयास है।
फैरेन्ट का कहना है कि अधिकांश फसल प्रजातियों में पहले से ही वे जीन मौजूद होते हैं जिनकी उन्हें पुनर्जीवन पौधों की नकल करने के लिए ज़रूरत होती है। ये जीन इन पौधों के बीजों (seed dormancy genes) में सक्रिय होते हैं जो वर्षों तक या दशकों तक जीवित रह सकते हैं और सही समय और स्थान पर अंकुरित होते हैं। ऐसा लगता है कि पुनर्जीवन पौधों का विकास (plant evolution) इन जीन्स की अभिव्यक्ति को पौधे के अन्य भागों में विस्तार देकर हुआ है। इस तंत्र को सक्रिय करने वाले जीन्स की खोज फसलों को सूखा प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने की कुंजी हो सकती है।
वैज्ञानिकों कि इस टीम को उम्मीद है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की कमी या अनियमितता के चलते खाद्य सुरक्षा (food security) की दृष्टि से ऐसे कुछ तंत्रों को आम फसलों में जोड़ा जा सकता है। हालांकि ऐसे जीन्स को आम फसलों में जोड़ना आसान नहीं होगा।
2017 में फैरेन्ट और एक बीज वैज्ञानिक हेंक हिलहोर्स्ट ने नेचर में एक पुनर्जीवन पौधे ज़ीरोफायटाविस्कोसा (Xerophyta viscosa genome) के जीनोम सम्बंधी एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। इस शोध ने इस बात की पुष्टि की थी कि ये प्रजातियां उन जीन्स पर निर्भर होती हैं जो सामान्यत: उनके बीज में सक्रिय रहते हैं।
अलबत्ता, सूखा-सहिष्णु फसलों (drought tolerant crops) के विकास की दृष्टि से अभी दिल्ली दूर है। एक कारण तो यह कि ऐसे शोध के लिए फंडिंग (research funding) का अभाव है।
वैसे, फैरेन्ट की टीम इस बात का भी अध्ययन कर रही है कि पुनर्जीवन पौधों की जड़ों में सूक्ष्मजीवों का कैसा संसार (माइक्रोबायोम) बसता है। यह माइक्रोबायोम (root microbiome) इनकी जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है और पोषण के अवशोषण में भी मदद करता है। फसली पौधों में ऐसा माइक्रोबायोम विकसित करके उन्हें सूखा-सहिष्णु बनाया जा सकेगा। यदि ऐसा हो सका तो खाद्य सुरक्षा के लिहाज़ से क्रांतिकारी होगा। (स्रोतफीचर्स)
पुनर्जीवन की इस करामात का लुत्फ उठाइए इन वीडियो पर
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://powo.science.kew.org/taxon/urn:lsid:ipni.org:names:77110541-1
भवन लोगों को सुरक्षित आवास (safe housing) देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि आजकल जिस ढंग से इनका निर्माण व प्रबंधन किया जाता है, वह अक्सर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है। निर्माण कार्य से कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions), जल प्रदूषण (water pollution) और कचरा उत्पन्न होता है। विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और कचरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा निर्माण कार्य से आता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारे लिए विकास की परिभाषा में प्रकृति शामिल ही नहीं है। हम प्रकृति को एक असीम संसाधन और कूड़ागाह की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी असंतुलन के कारण पर्यावरण को नुकसान और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम (environmental health risks) बढ़ रहे हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए अब केवल ‘टिकाऊ’ यानी नुकसान कम करने की सोच (sustainable development) से आगे बढ़कर ‘रीजनरेटिव डिज़ाइन’ की बात हो रही है। इसका मकसद ऐसे भवन और शहर बनाना है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे सुधारें। यानी सिर्फ संसाधनों का कम इस्तेमाल नहीं, बल्कि प्राकृतिक चक्रों को फिर से मज़बूत करना, जैव विविधता बढ़ाना और पर्यावरण को स्वस्थ बनाना इसका लक्ष्य है। यह सोच प्रकृति से प्रेरित (nature inspired design) है, जहां हर चीज़ संतुलन में रहती है और संसाधनों का बार-बार उपयोग होता है।
शहरएकजीविततंत्र
रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक अहम विचार यह है कि शहरों को एक जीवित तंत्र (urban ecosystem) की तरह देखा जाए। जैसे प्रकृति में एक ही समय पर कई काम होते हैं – पानी साफ करना, ऑक्सीजन बनाना, कार्बन थामना और जीवों को आश्रय देना – वैसे ही शहरों को भी इस तरह डिज़ाइन किया जा सकता है कि वे ये सब काम एक साथ कर सकें। इसके लिए योजनाकार किसी क्षेत्र के प्राकृतिक तंत्र (ecological planning) के काम करने के काम तरीके को समझकर उसके अनुसार शहर को विकसित करने की कोशिश कर सकते हैं।
इसका मतलब है कि हर क्षेत्र के शहर के लिए अलग-अलग तरीके (climate responsive design) अपनाए जाएं। जैसे ठंडे इलाकों में शहरों में ज़्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं ताकि हवा साफ हो और वायुमंडलीय कार्बन में कमी आए। वहीं सूखे इलाकों में ऐसे पौधे लगाए जा सकते हैं जो कम पानी में भी जीवित रह सकते हैं।
प्रकृतिनेबदलेशहर
दुनिया के कई उदाहरण (urban design examples) दिखाते हैं कि प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन शहरों को बेहतर बना सकती हैं। दक्षिण कोरिया के सियोल में एक बड़ी सड़क हटाकर उसके नीचे छिपी नदी को फिर से जीवित किया गया, जिससे शहर में एक हरा-भरा क्षेत्र बना। इससे न सिर्फ पर्यावरण सुधरा, बल्कि शहर का तापमान और ट्रैफिक भी कम हुआ। इसी तरह चीन में स्पंज सिटी मॉडल (sponge city concept) अपनाया गया, जहां पार्क, झीलें और ऐसी सतहें बनाई गईं जो बारिश का पानी सोख लेती हैं और बाढ़ रोकती हैं। इससे पानी की बचत (rainwater management) होती है, शहर ठंडा रहता है और लोगों के लिए बेहतर जगहें बनती हैं।
संसाधनोंकापुनर्चक्रण
रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत (circular economy) है कि शहरों में संसाधनों के उपयोग को नए तरीके से समझा जाए। अभी हमारी व्यवस्था ऐसी है कि चीज़ें निकाली जाती हैं, इस्तेमाल की जाती हैं और फिर फेंक दी जाती हैं (linear economy)। लेकिन प्रकृति में ऐसा नहीं होता – वहां हर चीज़ का बार-बार उपयोग होता है, यानी एक का कचरा किसी और का संसाधन बन जाता है। अगर यही तरीका शहरों में अपनाया जाए, तो कचरा कम हो सकता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग (resource efficiency) हो सकता है।
डेनमार्क के कालुंडबर्ग (industrial symbiosis Kalundborg) में इसका अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है, जहां उद्योग एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग करते हैं। एक जगह की बची हुई ऊर्जा या कचरा दूसरी जगह काम आ जाता है। इससे ऊर्जा, जल उपयोग और प्रदूषण तीनों में कमी आती है। इसी तरह ब्रिटेन और स्वीडन में भी कचरे को उपयोगी चीज़ों में बदलने (waste recycling) के प्रयास किए गए हैं, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा हुआ है।
निर्माणसामग्रीपरविचार
निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री (building materials) को भी प्रकृति के सिद्धांतों के अनुसार बदलने की ज़रूरत है। आज कई पारंपरिक सामग्री ज़हरीले रसायनों और ऊर्जा के भारी उपभोग से बनती हैं, जो इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है। इसकी बजाय रीजनरेटिव डिज़ाइन ऐसी सामग्री (eco friendly materials) के उपयोग पर ज़ोर देता है जो सुरक्षित हों, दोबारा इस्तेमाल की जा सकें और स्थानीय रूप से उपलब्ध हों, ताकि वे आसानी से प्राकृतिक चक्र में वापस जा सकें।
प्रकृति हमें इसका अच्छा उदाहरण देती है। प्राकृतिक सामग्री (biomaterials) कुछ सीमित और सुरक्षित पदार्थों से बनती हैं, फिर भी वे मज़बूत और उपयोगी होती हैं। इन्हीं से सीखकर वैज्ञानिक नई सामग्री विकसित कर रहे हैं, जो टिकाऊ भी हों और अच्छा प्रदर्शन भी करें। जैसे पौधों के कचरे और कवक से बनी इंसुलेशन (fungal insulation) सामग्री, जो पेट्रोलियम से बने उत्पादों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।
प्रकृतिसेप्रेरितस्मार्टनिर्माण
प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि चीज़ें कम संसाधनों में और आसानी से कैसे बनाई जा सकती हैं (efficient construction)। जहां उद्योगों में सामान बनाने के लिए ज़्यादा तापमान, भारी मशीनें और अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है, वहीं प्रकृति साधारण परिस्थितियों में ही मज़बूत चीज़ें बना लेती है। मसलन, मकड़ी का जाला (spider silk strength) सामान्य तापमान पर बनता है, लेकिन वह बहुत मज़बूत और लचीला होता है।
अब नई तकनीकें, जैसे 3-डी प्रिंटिंग (3D printing construction), इन सिद्धांतों को अपनाने में मदद कर रही हैं। प्रकृति में कम सामग्री का उपयोग करके उसे इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वह ज़्यादा मज़बूत बने। इसी तरह इंजीनियर अब डिजिटल तकनीक से हल्की लेकिन मज़बूत संरचनाएं बना रहे हैं, जिनमें कम सामग्री और ऊर्जा लगती है। इस तरह बेहतर डिज़ाइन पर ध्यान देकर निर्माण को अधिक प्रभावी और टिकाऊ (smart architecture) बनाया जा सकता है।
मज़बूतऔरस्वस्थशहर
अगर इमारतों और शहरों को प्रकृति के अनुसार बनाया जाए, तो इसके कई फायदे (green buildings benefits) मिल सकते हैं। इससे पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा, जलवायु परिवर्तन (climate change adaptation) के असर से निपटना आसान होगा और लोगों के रहने के लिए अधिक स्वस्थ परिवेश मिलेगा। हरित भवन शहरों का तापमान कम कर सकते हैं, हवा को साफ कर सकते हैं और लोगों के लिए बेहतर सार्वजनिक स्थान (urban green spaces) बना सकते हैं। साथ ही, संसाधनों का पुनर्चक्रित उपयोग खर्च घटा सकता है और नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकता है।
लेकिन इसे सफल बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों – जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, डिज़ाइन और नीति – के लोगों को मिलकर काम करना होगा। अंतत: शहरों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम प्रकृति से कितना सीखते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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एक ताज़ा शोध (scientific research) में वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने में सफलता हासिल की है कि कैसे उम्रदराज़ कोशिकाओं को स्टेम कोशिकाओं में पलटा जा सकता है| स्टेम कोशिका से मतलब है, ऐसी भ्रूण कोशिकाएं जो तब तक किसी विशेष कार्य को करने के लिए विकसित नहीं हुई होती हैं। अलबत्ता, आगे चलकर वे कोई एक विशेष कार्य को करने के लिए विभेदित (cell differentiation) या विशेषीकृत हो जाती हैं। उसके बाद वे अपने बकाया जीवन में वही विशिष्ट कार्य करती रहती हैं। जैसे स्टेम कोशिकाएं विभेदित होकर रक्त कोशिकाओं, त्वचा कोशिकाओं, मांसपेशी या ऐसे ही किसी काम को करने के लिए विभेदित हो जाती हैं| स्टेम कोशिकाओं की एक खास बात यह होती है कि उनमें असीमित विभाजन क्षमता (cell regeneration) होती है।
दरअसल, वर्ष 2006 में जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका (Shinya Yamanaka) ऐसे चार विशेष प्रोटीन खोजने में सफल हुए थे जो किसी भी वयस्क कोशिका को स्टेम कोशिका में परिवर्तित कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें 2012 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से सम्मानित भी किया गया था और उन्हीं के नाम पर इन चार प्रोटीन्स को यामानाका फैक्टर्स कहते हैं।
परंतु तब शोधकर्ताओं के सामने एक बड़ी समस्या थी कि इन परिवर्तित कोशिकाओं को असीमित विभाजन (cancer risk) करने से कैसे रोका जाए। क्योंकि कोशिकाओं का अनियंत्रित विभाजन कैंसर को जन्म दे सकता है| इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने चार में से एक प्रोटीन, C-MYC (oncogene) को हटा दिया जो अनियंत्रित विभाजन का कारक था| इस प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने ‘आंशिक रीप्रोग्रामिंग’ कहा। इसमें तीन प्रोटीन्स, OCT4, SOX2, KLF4 (cell factors) का उपयोग करके कोशिका को परिवर्तित किया गया|
शोधकर्ताओं ने चूहे पर अध्ययन (mouse study) किया था, उनमें इन प्रोटीन्स के इस्तेमाल से मांसपेशियों और हृदय से सम्बंधित क्षति में सुधार, अधिक स्वस्थ त्वचा, और वृद्ध चूहों की स्मृति (memory improvement) में भी सुधार दिखा है| सात वर्ष पहले भी ऐसे ही एक और अध्ययन में चूहों की आंखों से सम्बंधित विकारों (vision disorders) में नई कोशिकाओं का निर्माण और सुधार दिखा था|
चिंताजनक बात यह है कि कैंसरकारी प्रोटीन को हटाने के बावजूद भी इसका मनुष्य पर सीधा उपयोग जोखिम भरा साबित हो सकता है| फिलहाल वर्ष 2026 में लाइफ बायोसाइंस कंपनी (Life Biosciences) पहली बार मनुष्यों पर इसका अध्ययन करेगी| उनका मुख्य लक्ष्य क्षतिग्रस्त रेटिना की तंत्रिका कोशिकाओं को ठीक करना और दृष्टि में सुधार (vision restoration) करना होगा। वैसे शुरुआत में मात्र 12-18 लोगों पर ही इसका अध्ययन सावधानीपूर्ण किया जाएगा ताकि किसी भी दिक्कत का जल्द पता किया जा सके| इस तकनीक (anti aging technology) से बढ़ती उम्र से सम्बंधित रोगों का उपचार करने में सहायता होगी; पुराने हो चुके अंगों, जैसे आंख, हृदय, गुर्दे, लिवर, और यहां तक कि मस्तिष्क का सुधार, कायाकल्प और नवीकरण करने में सफलता प्राप्त हो सकती है| यदि यह अद्भुत क्रांतिकारी तकनीक (medical breakthrough) कारगर साबित हुई तो चिकित्सा जगत में एक अमूल्य खोज साबित होगी, और किसी वरदान से कम नहीं होगी| (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/asset/49991187-f877-4849-a21c-5aa411329647/old-and-young-closeup.jpeg?m=1775759433.057&w=900
सक्रिय जीवनशैली (active lifestyle) और छरहरी काया वाले किसी किसान को टाइप-2 डायबिटीज़ हो जाए, हैरानी स्वाभाविक है। वजह अभी साफ नहीं है, लेकिन खेतों में रोज़ाना कीटनाशकों से संपर्क (pesticide exposure) को एक संदिग्ध कारण मानते हुए कुछ शोध कार्य हुए हैं।
दुनिया भर में कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ा है और अब हर साल इनका उपयोग लाखों टन है। प्राय: वैज्ञानिक इनके असर को सिर्फ तात्कालिक नुकसान (ज़हर या मस्तिष्क पर असर) तक ही देखते थे। अब समझा जा रहा है कि ये रसायन हमारे शरीर के सूक्ष्मजीवों (microbiome impact) को कैसे प्रभावित करते हैं, जिसके दीर्घकालिक असर हो सकते हैं।
उदर का सूक्ष्मजीव संसार (gut microbiome) हमारे शरीर में मौजूद लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीवों का एक जटिल समूह है, जो पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें होने वाले बदलाव मधुमेह (diabetes risk) और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। हाल के शोध यह भी बताते हैं कि कीटनाशक इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।
दक्षिण भारत के एक अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई। शहरों में डायबिटीज़ का सम्बंध मोटापे जैसे आम कारणों से दिखता है, लेकिन गांवों में बिना इन कारणों के भी मधुमेह के मामले काफी ज़्यादा थे। वैज्ञानिकों को लगा कि शायद पर्यावरण से जुड़े कारक (environmental factors) – जैसे कीटनाशक – इसमें भूमिका निभा रहे होंगे।
इसको और समझने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक आम कीटनाशक (क्लोरपायरीफॉस) (chlorpyrifos pesticide) के साथ प्रयोग किया। उन्होंने थोड़े समय के लिए अधिक मात्रा देने की बजाय, कई महीनों तक कम मात्रा में देकर इसका असर देखा, जैसा कि असल जीवन में होता है। नतीजे चौंकाने वाले थे – कीटनाशक ने उदर के सूक्ष्मजीव संसार (gut bacteria imbalance) को बदल दिया; अच्छे बैक्टीरिया कम हो गए और हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ गए। इसके साथ ही चूहों में रक्त शर्करा बढ़ गई और मधुमेह जैसे लक्षण दिखने लगे, जबकि उनके वज़न में कोई वृद्धि नहीं हुई थी।
आगे के अध्ययन (scientific findings) से यह भी संकेत मिला कि जब आंत के सूक्ष्मजीव इन कीटनाशकों को तोड़ते हैं, तो ऐसे पदार्थ बनते हैं जो लीवर में ग्लूकोज़ बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जिससे रक्त शर्करा बढ़ सकती है।
अन्य अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कीटनाशक सिर्फ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संख्या ही नहीं बदलते, बल्कि उनके काम करने के तरीके (microbial function) को भी प्रभावित करते हैं। जब इन बैक्टीरिया को अलग-अलग कीटनाशकों के संपर्क में रखा गया, तो यह देखा गया कि वे उन ज़रूरी पदार्थों का उत्पादन बदल देते हैं जो आंत की सेहत, शोथ को नियंत्रित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में मदद करते हैं। कुछ बैक्टीरिया तो इन कीटनाशकों को अपने अंदर जमा (bioaccumulation) भी कर लेते हैं, जिससे शरीर में उनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।
इन बदलावों का असर काफी दूर तक जा सकता है। हमारी आंत और मस्तिष्क के बीच एक सम्बंध (gut brain axis) होता है, जिसे ‘गट–ब्रेन एक्सिस’ कहा जाता है। अगर इसके कामकाज में गड़बड़ी आती है, तो यह हमारे मूड, व्यवहार और मस्तिष्क की सेहत को प्रभावित कर सकता है। जंतुओं पर किए गए कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि कीटनाशकों के संपर्क से अवसाद जैसे लक्षण (depression symptoms) उभर सकते हैं।
हालांकि ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों में इनके पुख्ता सबूत (human studies) अभी नहीं मिले हैं। आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार खान-पान, जीवनशैली और जीन्स से प्रभावित होता है, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि कीटनाशकों का असर कितना है। इसके अलावा, लोग लंबे समय तक कई तरह के रसायनों के संपर्क (chemical exposure) में रहते हैं, जिससे साफ निष्कर्ष निकालना और कठिन हो जाता है।
फिर भी, शुरुआती मानव अध्ययनों (early research evidence) से कुछ संकेत मिलते हैं। एक अध्ययन में सभी लोगों के शरीर में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए, खासकर उन लोगों में जो ज़्यादा फल और सब्ज़ियां (fruit vegetable intake) खाते थे। इन अवशेषों का सम्बंध आंतों के सूक्ष्मजीव-संसार में बदलाव से भी देखा गया। इस संदर्भ में और शोध ज़रूरी है।
एक बड़ा सवाल अभी भी बाकी है – क्या सूक्ष्मजीव-संसार को पहुंचे नुकसान को फिर से ठीक किया जा सकता है? लोग अक्सर सोचते हैं कि प्रोबायोटिक्स (probiotics benefits) या खान-पान बदलकर इसे ठीक किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार बहुत जटिल (complex microbiome) होता है और इसे आसानी से बहाल करना संभव नहीं है।
फिलहाल विशेषज्ञ यही सलाह देते हैं कि कीटनाशकों से संपर्क कम से कम (reduce pesticide exposure) किया जाए। इसके लिए खेती के तरीकों में बदलाव (sustainable farming), खाने की आदतों में सुधार या सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। लेकिन खासकर किसानों के लिए इससे पूरी तरह बचना आसान नहीं है। (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.ztfhacd/full/_20260409_nid_pesticides_gut.jpg
आजकल लोग अपनी त्वचा का कुछ ज़्यादा ही ख्याल रख रहे हैं। त्वचा का ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन यह जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि जितने और जिन तरीकों से आप त्वचा की देखभाल कर रहे हैं वास्तव में वे कहीं आपकी त्वचा के लिए हानिकारक तो नहीं।
सोशल मीडिया से मुतासिर (social media influence) होकर लोग अपनी त्वचा की देखभाल के लिए रोज़ाना जाने क्या-क्या करते हैं। लोग क्लींज़र, फेसवॉश, टोनर, सीरम, तरह-तरह के विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट क्रीम (vitamin C cream), मॉइश्चराइज़र, सनस्क्रीन… वगैरह-वगैरह बाज़ार के उत्पाद तो लगाते ही हैं, साथ ही उनके द्वारा अपनाए जाने वाले घरेलू उबटनों और उपायों का भी अंत नहीं है। इसमें भी आंखों के लिए अलग, गले व गरदन के लिए अलग, हाथ-पैरों और बाहों के लिए अलग-अलग उत्पाद और देखभाल के तरीके सोशल मीडिया पर खूब छाए हैं। और सिर्फ बड़े ही नहीं, बच्चे भी सोशल मीडिया के प्रभाव क्षेत्र में हैं।
त्वचा रोग विशेषज्ञ (dermatologist advice) रजनी कट्टा बताती हैं कि उन्होंने पिछले पांच सालों में देखा है कि त्वचा की देखभाल के तरीके दिन-ब-दिन पेचीदा और कई-कई स्टेप्स वाले हो गए हैं। कोई-कोई मामलों में तो ये रोज़ाना 12-12 स्टेप्स तक जाते हैं। और लोग इनमें अधिकतर ऐसे उत्पाद लगा रहे होते हैं जिनके बारे में उन्होंने बस सोशल मीडिया पर देखा होता है, इनके बारे में कहीं कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं होती। लेकिन क्या वाकई इतने उत्पाद और इतने स्टेप्स ज़रूरी हैं?
यदि आप किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ से यह सवाल पूछेंगे तो उनका जवाब होगा – सामान्यत: नहीं। त्वचा विशेषज्ञ कहते हैं कि चेहरे या त्वचा को अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़र (skin moisturizer) लगाना और (सनस्क्रीन या किसी अन्य तरीके से) धूप से बचाना स्वस्थ त्वचा के लिए पर्याप्त है। लेकिन साथ में स्वस्थ और नियमित जीवनशैली और पोषणयुक्त भोजन बहुत ज़रूरी है। बल्कि, विशेषज्ञ कहते हैं, अधिक (और गलत) उत्पाद और देखभाल के गलत तरीके त्वचा को अस्वस्थ और बेजान बना सकते हैं। कट्टा का कहना है कि अक्सर सोशल मीडिया पर बताए जाने वाले उत्पादों और उनके फायदों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। और सबसे बड़ी बात तो यह कि लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि वे ऐसे प्रोडक्ट लगा रहे हैं जो वास्तव में त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं।
दरअसल, आजकल दुनिया भर में त्वचा की देखभाल (स्किनकेयर) (global skincare trends) के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा दिलचस्पी दिख रही है। टिकटॉक, इंस्टा, यूट्यूब-शॉर्ट्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों में जवां दिखने और चमकदार त्वचा पाने की चाहत बढ़ा रहे हैं, और फिर इसे पाने के लिए वे इसके उपाय और उत्पाद भी बता रहे हैं। लोगों में जवां दिखने की चाहत का आलम इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि #SkinTok जैसे हैशटैग को हर महीने एक अरब से ज़्यादा बार देखा जाता है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक यह इंडस्ट्री (beauty industry growth) दुनिया भर में 200 अरब डॉलर से ज़्यादा का कारोबार करेगी।
त्वचा की बनावट
एसिड मेंटल
लिपिड लेयर
स्ट्रैटम कॉर्नियम
एपिडर्मिस
डर्मिस
सूक्ष्मजीवीय संसार
विशेषज्ञों की सुनें तो उनका कहना है कि स्वस्थ त्वचा का मतलब सिर्फ निखरी और दमकती त्वचा (glowing skin) नहीं है बल्कि इससे परे है। स्वस्थ त्वचा आपके संपूर्ण स्वास्थ्य (overall health) को दुरुस्त रखती है। तो स्वस्थ त्वचा का मतलब क्या? इसे समझने के लिए हम त्वचा, उसकी बनावट और भूमिका के बारे में समझते हैं।
त्वचा शरीर का सुरक्षा कवच है, जो बाहरी रोगाणुओं, रसायनों और पराबैंगनी विकिरण (UV) एवं अन्य खतरों को शरीर में प्रवेश नहीं करने देता। त्वचा मुख्यत: तीन परतों से बनी होती है: हाइपोडर्मिस (सबसे निचली परत), डर्मिस (मध्य परत) और एपिडर्मिस (सबसे बाहरी परत)। एपिडर्मिस में लगातार कोशिकाएं मरती रहती हैं और इनके बदले नई त्वचा कोशिकाएं बनती हैं: रोज़ाना लगभग 40,000 कोशिकाएं मिटती-बनती हैं।
एपिडर्मिस में भी कई परतें होती हैं। इसकी सबसे बाहरी परत है स्ट्रैटम कॉर्नियम, जिसे आम तौर पर ‘स्किन बैरियर (त्वचा अवरोध)’ कहा जाता है। यह केरेटिन-युक्त चपटी, मृत कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) (corneocytes structure) से बनी होती हैं, जो मज़बूत और जलरोधी होती हैं। कॉर्नियोसाइट्स के चारों ओर ‘सेरामाइड्स’ नामक लिपिड्स होते हैं, जो नमी को अंदर रोके रखते हैं और बाहरी हमलावरों को त्वचा के अंदर आने से रोकते हैं। और इसके ऊपर होती है वसा अम्लों, अमीनो अम्ल और तेल की परत, जिसे एसिड मेंटल (acid mantle skin) कहते हैं। यहां त्वचा के लिए फायदेमंद सूक्ष्मजीव पनपते हैं। यानी त्वचा किसी निर्जीव ढाल समान नहीं है, बल्कि वह एक फलता-फूलता इकोसिस्टम है जिसमें भौतिक, रासायनिक, सूक्ष्मजीवीय और प्रतिरक्षा क्रियाएं चलती रहती हैं।
त्वचा जटिल चीज़ों का एक तंत्र ज़रूर है, लेकिन है बहुत नाज़ुक है। लापरवाहियां इसे आसानी से तबाह कर सकती है। उदाहरण के लिए, झुर्रियां कम करने वाली और मुंहासों के दाग-धब्बे हटाने के लिए की जाने वाली कुछ प्रचलित कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं (जैसे, केमिकल पील्स, जिसमें त्वचा की परत हटाई जाती है) अगर गलत तरीके से या बहुत ज़्यादा बार की जाएं तो ये त्वचा अवरोध (स्किन बेरियर) को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं और त्वचा को अतिसंवेदी बना सकती हैं। हालांकि, त्वचा खुद को ठीक कर सकती है, लेकिन कुछ उपचार इस क्षमता को भी खत्म कर सकते हैं। अस्वस्थ त्वचा अवरोध के लक्षण हैं त्वचा में रूखापन, खुजली, लाल चकते, मुंहासे और संक्रमण।
फिर, त्वचा अवरोध की क्षति न सिर्फ त्वचा को अस्वस्थ करती है बल्कि अधिक गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है – जैसे एटोपिक डर्मेटाइटिस, सोरायसिस और एलर्जी जैसी समस्याएं। अस्वस्थ त्वचा स्टैफिलोकॉकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया का त्वचा में प्रवेश करना आसान बना सकती है। स्टैफिलोकॉकस ऑरियस एक ऐसा बैक्टीरिया है जो फोड़े-फुंसी और रक्त संक्रमण पैदा करता है।
आम तौर पर लोग तीक्ष्ण साबुन, डिटर्जेंट और एस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल करते हैं। यह आम गलती शरीर के ऊतकों की नमी खत्म कर देती है। त्वचा से अतिरक्त तेल, मेकअप और मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया हटाने के लिए लोग अल्कोहल और विच हेज़ल युक्त उत्पाद (जैसे मेकअप रिमूवर) इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये उत्पाद त्वचा से वे नैसर्गिक तेल भी हटा देते हैं जो स्किन बैरियर को सलामत रखते हैं। बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाना भी त्वचा अवरोध को क्षति पहुंचा सकता है। अगर पानी इतना गर्म है कि उससे बर्तनों का तेल आसानी साफ हो जाता है, तो ज़ाहिर है, इतना गर्म पानी त्वचा के प्राकृतिक तेलों को भी हटा देगा। नतीजतन, त्वचा को नुकसान होगा।
एसिड मेंटल की परत त्वचा पर स्वस्थ सूक्ष्मजीवों को पनपने के लिए ज़रूरी स्थितियां बनाती है। यदि त्वचा साफ करने के लिए सख्त और तीक्ष्ण उत्पाद उपयोग करते हैं तो ये त्वचा का pH स्तर बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि त्वचा पर फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की कमी हो जाती है और नुकसानदेह सूक्ष्मजीव पनपने लगते हैं।
आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी स्किन-केयर उत्पाद अपना रहे हैं। नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पीटर लियो कहते हैं कि बच्चों की त्वचा कोमल होती है। अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़ करना और सनस्क्रीन लगाना ही उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित है। बड़ों के लिए बने अन्य तमाम उत्पाद बच्चों की त्वचा पर बहुत बुरा असर डाल सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि दिन में दो बार किसी सौम्य साबुन/फेसवॉश से चेहरा धोकर मॉइश्चराइज़र लगाना चाहिए। और, यदि दिन का समय है तो, सनस्क्रीन लगाना चाहिए और त्वचा को धूप से बचाने के लिए ढंककर रखना चाहिए (कपड़े, टोपी या छाते से)।
धूप से बचाव
नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टीट्यूट की त्वचा विशेषज्ञ एल्समीक प्लास्मीइर बताती है कि लंबे समय तक त्वचा का सीधे और बहुत ज़्यादा अल्ट्रावॉयलेट (पराबैंगनी) विकिरण के संपर्क में रहना खतरनाक है, चाहे वह संपर्क सीधे धूप के ज़रिए हो या टैनिंग बेड के ज़रिए। अल्ट्रावॉयलेट विकिरण मेलेनोमा का मुख्य कारण है। मेलेनोमा एक तरह का त्वचा कैंसर है जो सबसे घातक कैंसरों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2022 में लगभग 60,000 लोगों की मृत्यु मेलेनोमा से हुई थी।
दरअसल, भारत में तो नहीं लेकिन, कुछ देशों में त्वचा को टैन करने का बहुत चलन है। लोग घंटों-घंटों समुद्र किनारे धूप सेंकते रहते हैं और त्वचा को टैन करते हैं। पृथ्वी तक पहुंचने वाली धूप में अल्ट्रावॉयलेट किरणें भी होती हैं; मुख्यत: दो प्रकार की अल्ट्रावॉयलेट विकिरण (UV) हम तक पहुंचते हैं, UVA और UVB। ये दोनों त्वचा को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। UVA विकिरण ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करती हैं और कोलाजेन तथा इलास्टिन को तोड़कर त्वचा की डर्मिस को नुकसान पहुंचाते हैं। कोलाजेन और इलास्टिन ऐसे प्रोटीन हैं जो ऊतकों को आकार और लचीलापन देते हैं। और, UVB विकिरण केवल एपिडर्मिस तक पहुंचता है, लेकिन यह त्वचा को झुलसाता (सनबर्न) है और डीएनए को क्षति पहुंचाता है, जिससे त्वचा का कैंसर हो सकता है। इसके अलावा, दोनों प्रकार के UV विकिरण एक ऐसे प्रोटीन को बाधित करते हैं जो त्वचा की सुरक्षा परत में कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) को आपस में जोड़े रखते हैं। नतीजतन, कॉर्नियोसाइट्स के आपसी जोड़ कमज़ोर हो जाते हैं, और त्वचा की सुरक्षा परत कमज़ोर पड़ जाती है।
कई लोग जो टैनिंग चाहते हैं, वे टैनिंग बेड निर्माता कंपनियों के झूठे दावों के झांसे में आ जाते हैं। कंपनियों का दावा रहता है कि टैनिंग बेड धूप की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि वे डीएनए को नुकसान पहुंचाने वाले UVB विकिरण की तुलना में UVA विकिरण अधिक उत्सर्जित करते हैं। लेकिन नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पेद्राम गेरामी कहते हैं कि ये दावे अक्सर गलत साबित होते हैं। टैनिंग बेड से उत्सर्जित UVA की मात्रा धूप से मिलने वाले UVA की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज़्यादा होती है।
गेरामी आगे बताते हैं कि जो लोग इनडोर टैनिंग बेड का इस्तेमाल करते हैं, उनमें मेलेनोमा होने की संभावना तीन गुना ज़्यादा पाई गई है। और तो और, टैनिंग बेड इस्तेमाल करने वालों के शरीर के उन हिस्सों में भी मेलेनोमा देखा गया जहां आम तौर पर धूप से कम नुकसान पहुंचता है, जैसे जांघों पर। WHO ने टैनिंग बेड को एस्बेस्टस और सिगरेट जितना हानिकारक बताया है और इसे कैंसर-कारी श्रेणी में रखा है।
लंबे समय तक किए गए कई क्लीनिकल ट्रायल से यह पता चला है कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल करने से स्किन कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है। WHO लोगों को सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) 30 या उससे ज़्यादा वाले ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन (जो दोनों तरह की UV किरणों को रोकती है) इस्तेमाल करने की सलाह देता है। लेकिन सनस्क्रीन लगा लेने का मतलब यह नहीं कि अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, और कितना भी धूप के संपर्क में रह सकते हैं। शरीर को अच्छी तरह से ढंकने वाले कपड़े, छतरी या छायादार टोपी का इस्तेमाल और सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच (जब सूरज सबसे तेज़ होता है) धूप में जाने से बचना भी ज़रूरी है। यह उपाय अपनाना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि सनस्क्रीन की क्वालिटी में काफी अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में कई लोकप्रिय सनस्क्रीन को मार्च में बाज़ार से इसलिए हटा दिया गया था क्योंकि ड्रग रेगुलेटर टेस्ट में पता चला था कि उनके बेस फॉर्मूलेशन में गड़बड़ियों के चलते उनमें SPF दावे से काफी कम था।
वैसे, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सनस्क्रीन के बारे में बहुत सारी गलत जानकारियां भी फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सनस्क्रीन से स्किन कैंसर और विटामिन-डी की कमी होती है, जबकि वास्तविकता इसकी उलट है। ऐसी गलत बातें अक्सर उन लोगों को निशाना बनाती हैं, जो कभी त्वचा विशेषज्ञ के पास गए ही नहीं हैं। बल्कि सोशल मीडिया ने स्किनकेयर के नए-नए चलन चलाएं हैं – जैसे मॉइश्चराइज़र की जगह बीफ टैलो (जानवर की चर्बी) लगाना, रीजुरेन, ग्लास स्किन मास्क लगाना, रेड-लाइट थेरपी लेना, वगैरह-वगैरह।
लियो कहते हैं बाज़ार में हज़ारों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं जो उनमें मौजूद तरह-तरह के केमिकल का नाम लेकर दावा करते हैं कि वे आपकी त्वचा को जवां बनाए रखने और त्वचा को पहुंचे नुकसान को ठीक करते हैं। लेकिन उत्पादों में मौजूद तत्वों के पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण होने ज़रूरी हैं।
जैसे, मॉइश्चराइज़र के बारे में कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि वे त्वचा की देखभाल करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि एक सामान्य और संतुलित मॉइश्चराइज़र त्वचा अवरोध की हर परत में नमी बरकरार रखता है और उसे ठीक करने में मदद करता है। सबसे असरदार मॉइश्चराइज़र में तीन मुख्य अवयव होते हैं – इमोलिएंट्स, ह्यूमेक्टेंट्स और ऑक्लूसिव्स। इमोलिएंट्स, जैसे तेल, जो त्वचा को नर्म व मुलायम बनाते हैं और त्वचा कोशिकाओं तथा लिपिड्स के बीच की खाली जगहों को भरकर पानी की कमी को दूर करते हैं। हाइलूरोनिक एसिड जैसे ह्यूमेक्टेंट्स बाहर की हवा या डर्मिस से नमी खींचकर त्वचा की ऊपरी परत तक पहुंचाते हैं। और, पेट्रोलियम जेली जैसे ऑक्लूसिव्स त्वचा के ऊपर एक सुरक्षा कवच बना देते हैं जो नमी को बाहर जाने से रोकते हैं।
इसके अलावा मॉइश्चराइज़र में रेटिनॉइड्स, एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। रेटिनॉइड्स (विटामिन-ए से बने यौगिकों का एक समूह) कोशिकाओं के बनने और कोलाजेन के बनने को तेज़ करते हैं, जिससे झुर्रियां और काले धब्बे कम होते हैं, मुंहासों को थामते हैं। विटामिन-सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स ‘मुक्त मूलकों (फ्री रेडिकल्स)’ के प्रवेश को रोकते हैं, जो लिपिड्स, डीएनए और प्रोटीन्स को क्षति पहुंचाते हैं।
नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ ज्यूसेपे वालाकी का कहना है कि आप कितना भी बढ़िया मॉइश्चराइज़र लगा लें, लेकिन यदि आपकी जीवनशैली और खान-पान अस्त-व्यस्त और अस्वस्थ है, तो वे भी आपकी त्वचा को स्वस्थ नहीं रख सकते और आपके अस्त-व्यस्तता के बुरे असर को बेअसर नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, धूम्रपान करने से कोलाजेन और इलास्टिन कमज़ोर पड़ जाते हैं, और त्वचा तक पोषक तत्व पहुंचाने वाला रक्त प्रवाह भी मंद पड़ जाता है।
इसके अलावा त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है – पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना, जिसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, अमीनो एसिड्स और फैट्स शामिल हों। विशेषज्ञ कहते हैं कि त्वचा हमारे शरीर का आईना है, इसे देखकर पता चल सकता है कि आपके शरीर में किस पोषक तत्व की कमी है। इस बात के भी प्रमाण मिल रहे हैं कि त्वचा और पेट का आपस में बहुत गहरा सम्बंध है। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि पेट के सूक्ष्मजीव संसार में बदलाव करने से त्वचा के लक्षण भी बदल जाते हैं।
इसलिए यदि आप अपनी त्वचा वाकई स्वस्थ रखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया के झांसे या दुनिया के चलन में न आएं। और इन बातों का ख्याल रखें: अपनी दिनचर्या सही रखें; अच्छा भोजन खाएं; सौम्य साबुन या फेसवॉश से त्वचा धोएं; मॉइश्चराइज़र लगाएं; दिन के समय सनस्क्रीन लगाएं; और बाहर निकलते वक्त छाता, टोपी या कपड़े से शरीर को ढंककर रखें। ध्यान रहे, सोशल मीडिया से लेकर उत्पाद निर्माताओं को आपकी सेहत की बजाय पैसा बनाने की चिंता अधिक होती है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/w1248/magazine-assets/d41586-026-00700-y/d41586-026-00700-y_52147394.jpg?as=webp
यह जानकर हैरानी होगी कि तंबाकू (tobacco plant research) (जिससे बीड़ी-सिगरेट बनाई जाती हैं) अवसाद, चिंता और ट्रॉमा-उपरांत तनाव जैसे मानसिक विकारों का उपचार करने में सहायक हो सकती है।
हालिया शोध (scientific study) में वैज्ञानिकों ने पांच नशीले पदार्थों (psychedelic compounds) को एक साथ तंबाकू के पौधों में पनपाने का प्रयास किया है। इनमें से कुछ हैं – जादुई मशरूम के साइलोसाइबिन, अयाहुआस्का के अवयव और मेंढकों की आंखों से स्रावित होने वाले ब्यूफोटेनिन पदार्थ। यह खोज साइंस एडवांसेस पत्रिका (Science Advances journal) में प्रकाशित हुई है।
वैज्ञानिक लंबे समय से इस खोज (biochemical pathways) में लगे हैं कि पौधे और कुछ जंतु मतिभ्रामक (अफीमी) पदार्थ कैसे बनाते हैं। आखिरकार, अब वे कुछ पदार्थों के बनने की पूरी प्रक्रिया पता करने में सफल हो गए हैं। इस अध्ययन में उन्होंने ट्रिप्टोफेन नामक अमीनो एसिड से N,N-डाइमेथाइलट्रिप्टामाइन (DMT) बनने की प्रक्रिया समझी। DMT प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला मनोभ्रामक (साइकेडेलिक) पदार्थ है। यह प्रबल मतिभ्रम (hallucination effects) और मायावी मानसिक अनुभव देता है – अवास्तविक और अलौकिक चीज़ें घटने का अहसास कराता है। इसका असर तेज़ी से होता है, लेकिन बहुत कम समय तक रहता है। DMT अमेज़न के पारंपरिक नशीले पेय अयाहुआस्का का मुख्य घटक है। इसे अमेज़न के जंगल में पाए जाने वाले चक्रुना (साइकोट्रिया विरिडिस) पौधे से बनाया जाता है।
वैज्ञानिकों ने कई पौधों में DMT की मात्रा मापी (plant genetics study), जिसमें से उन्हें ऐसे दो पौधे मिले जिनमें DMT की मात्रा सबसे अधिक थी – साइकोट्रिया विरिडिस और अकेशिया एक्यूमिनाटा। उन्होंने इन दो पौधों के ऊतकों में दो ऐसे सक्रिय जीन खोजे जो DMT बनाने वाले एंज़ाइम बनाते हैं।
अगले चरण में शोधकर्ताओं ने जीन संपादन तकनीक से इन दो जीन्स को तंबाकू के जीनोम में जोड़ दिया। तंबाकू के पौधों को ही शोधकर्ताओं ने इस कार्य के लिए इसलिए चुना क्योंकि तंबाकू के पौधे बहुत ज़्यादा ट्रिप्टोफेन (high tryptophan levels) बनाते हैं और ट्रिप्टोफेन DMT का पूर्ववर्ती है। ट्रिप्टोफेन की प्रचुरता ने ही शोधकर्ताओं को तंबाकू में अन्य ट्रिप्टोफेन-आधारित अफीमी पदार्थ (bioengineered compounds) भी बनवाने की प्रेरणा दी – जैसे साइलोसाइबिन, ब्यूफोटेनिन और 5-मेथॉक्सी-डीएमटी।
कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। जैसे शुरू में तंबाकू के पौधे ने 5-मेथॉक्सी-डीएमटी बहुत कम बनाया। तो, उन्होंने AlphaFold3 (AI protein modeling) नामक एआई सॉफ्टवेयर की मदद से पता लगाया कि मुख्य एंज़ाइम ठीक से काम क्यों नहीं कर रहा। जीन में परिवर्तन करने के बाद तंबाकू के पौधों ने पहले से 40 गुना अधिक 5-मेथॉक्सी-डीएमटी बनाया।
फिर, शोधकर्ता तंबाकू के पौधों में अलग-अलग मादक पदार्थ बनाने के जीन (synthetic biology) जोड़ते गए और एक ही पौधे में पांच अलग-अलग प्रकार के नशीले पदार्थ (multi compound production) एक साथ बनाने में सफल हुए। हालांकि एक साथ बनने के कारण हर पदार्थ कम मात्रा में बना लेकिन उम्मीद है अधिक अध्ययन करके एक दिन पदार्थों की काफी मात्रा बन पाएगी और तंबाकू के ज़रिए तनाव (mental health treatment) का इलाज संभव हो जाएगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zy5rmbg/full/_20260401_on_psychedelic_tobacco.jpg
सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के तहत संयुक्त राष्ट्र (United Nations )ने 2015 में विश्व के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया था: वर्ष 2030 तक नवजात शिशुओं की मृत्यु दर घटाकर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 12 या उससे कम करना। नवजात शिशु मृत्यु दर यानी जन्म के पहले महीने (neonatal deaths) में होने वाली मृत्यु। लक्ष्य पूरा होने में सिर्फ 4 साल बाकी हैं, और 60 से ज़्यादा देशों के लिए इस लक्ष्य को पाना दूर की कौड़ी है। मसलन, केन्या 2014 के बाद से अब तक प्रति 1000 जीवित जन्मों पर सिर्फ एक मृत्यु कम कर पाया है। वहां नवजात शिशु मृत्यु दर 22 से घटकर महज़ 21 हुई है।
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सम्मेलन (maternal neonatal health conference) हुआ, जिसमें प्रगति की धीमी रफ्तार पर और इस बात पर चर्चा हुई कि इसे गति कैसे दी जाए। इस दिशा में काम कर रहे शोधकर्ता, नीति-निर्माता और पैरोकार का कहना है कि असल में हमें मृत्यु के कारण पता हैं, उनके उपाय भी पता हैं। लेकिन वित्तीय कमी (health funding crisis) और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इस काम में रोड़े डालते हैं।
नवजात शिशु मृत्यु दर पर 17 मार्च को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि अब भी हर साल 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु होती है (अकेले अफ्रीका में सालाना 11 लाख)। यह संख्या एड्स (AIDS deaths comparison) और कई अन्य गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा है। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण है समय-पूर्व जन्म; 18 प्रतिशत मौतें इसी वजह से होती हैं। जन्म के समय दम घुटना व आघात (birth asphyxia), निमोनिया (pneumonia infection), मलेरिया और डायरिया मृत्यु के अन्य प्रमुख कारण हैं।
अफ्रीका में ज़्यादातर महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में प्रसव (hospital delivery) करती हैं, जो घर की तुलना में कहीं ज़्यादा सुरक्षित जगह है। लेकिन फिर भी वहां हर साल 11 लाख नवजातों की मृत्यु होती है। अध्ययन बताते हैं कि इसका कारण स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली अपर्याप्त देखभाल (poor healthcare quality) है। एक अध्ययन में चार देशों – मलावी, तंजानिया, नाइजीरिया और केन्या – के 60 अस्पतालों की नवजात स्वास्थ्य इकाइयों में 18 महीनों (540 दिन) तक बिजली कटौती (power outage hospitals) पर नज़र रखी गई। पाया गया कि अस्पतालों में लगभग 200 दिनों तक बिजली कटौती हुई, जिससे इनक्यूबेटर, ऑक्सीजन सप्लाई और मॉनीटरिंग उपकरणों के काम करने में बाधा आई। प्रशिक्षित नर्सों (nurse shortage) की कमी एक और बड़ी समस्या है। तंजानिया में ही नवजातों की देखभाल के लिए 2000 से अधिक नर्सों की कमी है।
केन्या में, 1,30,000 नवजात शिशुओं के आंकड़ों (data analysis) के विश्लेषण से पता चला है कि जिन शिशुओं को इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर किया गया, उनके मरने की संभावना उन शिशुओं की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी जिन्हें उसी अस्पताल में इलाज मिला जहां उनका जन्म हुआ था।
इसका एक कारण यह है कि अधिकतर गंभीर रूप से बीमार शिशुओं को ही रेफर किया जाता है। लेकिन आग में घी का काम करते हैं प्रसव वाले अस्पताल में मिली खराब या अपर्याप्त देखभाल (inadequate treatment), आवश्यक सुविधाओं-रहित वाहन (एंबुलेंस) और रेफर किए गए अस्पताल में भर्ती में देरी।
इन सब कारणों और समस्याओं के हल (healthcare solutions) हैं हमारे पास। 2019 में, 23 संगठनों (जिनमें से ज़्यादातर अफ्रीका के थे) ने मिलकर न्यूबॉर्न एसेंशियल सॉल्यूशंस एंड टेक्नॉलॉजीस (NEST360) नामक एक संगठन बनाया था, जिसका मकसद उन पांच देशों के 130 अस्पतालों में देखभाल को बेहतर करना है जहां नवजात शिशुओं की मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है: केन्या, मलावी, नाइजीरिया, तंजानिया और इथियोपिया। NEST360 ने इन अस्पतालों में सस्ते उपकरण (जैसे इनक्यूबेटर और थर्मल गद्दे), सांस लेने के सहायक उपकरण और पीलिया के इलाज के लिए मशीनें वगैरह उपलब्ध करवाईं।
इसके अलावा उन्होंने डॉक्टरों और तकनीशियनों (medical training) को उपकरणों की देखभाल तथा कामकाजी रखने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही उन्होंने उपकरण संचालकों को उपकरणों के सही इस्तेमाल के तरीके बताए। क्योंकि यदि उपकरणों का ठीक से इस्तेमाल न किया जाए, तो मामला और बिगड़ सकता है। जैसे, सांस लेने में सहायक उपकरणों के सुरक्षित उपयोग (oxygen monitoring) के लिए ऑक्सीजन के स्तर की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यक होती है, वर्ना यह आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। NEST360 गैर-तकनीकी उपायों को भी अपनाने को बढ़ावा देता है। जैसे वे कंगारू मदर केयर – यानी शिशुओं का मां से सीधा (त्वचा से त्वचा) संपर्क।
यह भी देखा गया कि जन्म के समय शिशुओं का और अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े डैटा (health data systems) को व्यवस्थित और अपडेट रखना भी उपचार के सही फैसले लेने में मदद कर सकता है। इससे अस्पताल के कर्मचारियों को बेहतर फैसले लेने (data driven decisions) में मदद मिल सकती है क्योंकि इनसे पता चलता है कि कौन-सा उपाय काम कर रहा है और कौन-सा नहीं। ये डैटा सरकारी योजनाओं को दिशा दे सकते हैं।
65 सहभागी अस्पतालों के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सबसे ज़्यादा फायदा उन शिशुओं को हुआ है जो सबसे ज़्यादा जोखिम में थे, खासकर उन समय-पूर्व जन्मे बच्चों को फायदा हुआ जिन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। मलावी (Malawi success case) इस मामले में सबसे अलग है: यहां 2019 और 2025 के बीच अस्पतालों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 23 प्रतिशत की कमी हुई है, और यह अफ्रीका के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो 2030 तक SDG लक्ष्य को हासिल कर सकता है। अफ्रीका में प्रगति तो हो रही है लेकिन रफ्तार पर्याप्त नहीं है।
दक्षिण एशिया (South Asia progress) के कुछ देश इस दिशा में प्रगति पर हैं। दी लैंसेट में प्रकाशित अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि पाकिस्तान ने 1990 से 2024 के बीच लगातार प्रगति की है, हालांकि वह अभी भी SDG लक्ष्य से बहुत पीछे है। दूसरी ओर, भारत, नेपाल और बांग्लादेश (India Nepal Bangladesh success) के प्रयास सफल दिखते हैं।
फंडिंग की कमी (global health funding) प्रगति में आड़े आ रही है। हेल्थ इकोनॉमिस्ट एलिस टारस कहती हैं कि हमेशा से नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को मातृ और प्रजनन स्वास्थ्य (maternal health funding) की तुलना में कम फंडिंग मिली है। ऐसा मान लिया जाता है कि मातृ स्वास्थ्य को फंड करने से बच्चे अपने आप पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में आ जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
वहीं, वैश्विक स्वास्थ्य सहायता (global aid cuts) में हुई भारी कटौती पिछले दो दशकों की प्रगति को बेअसर कर सकती है। फंडिंग के हालात पिछले साल और भी खराब हो गए। स्वास्थ्य से सम्बंधित एक गैर-मुनाफा संस्था PATH की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य (maternal child health funding) को मिलने वाली वित्तीय सहायता 2025 में लगभग आधी हो गई (1.66 अरब डॉलर से घटकर 85 करोड़ डॉलर हो गई)। रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इस कमी की भरपाई नहीं की गई, तो 2040 तक 80 लाख से ज़्यादा शिशुओं की और 10 लाख से ज़्यादा माताओं की मौत हो सकती है। अफ्रीका समेत सभी देशों की सरकारों को अपने-अपने स्वास्थ्य बजट (health budget increase) बढ़ाने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images.indianexpress.com/2017/02/baby_thinkstock_759.jpg
तितलियां फूलों से मकरंद चूसती (nectar feeding) हैं। वालरस और अधिकतर मछलियां अपने भोजन का भक्षण चूस कर करती हैं। हम मनुष्य भी कितनी ही चीज़ें चूसकर निगलते हैं। लेकिन पक्षी? वैज्ञानिकों ने अब तक पक्षियों में चूसने की क्रिया नहीं देखी थी। लेकिन करंट बायोलॉजी (Current Biology journal) में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि सनबर्ड मकरंदपान चूसकर ही करते हैं। यह खोज और भी रोमांचक इसलिए है कि हम मनुष्य या अन्य कशेरुकी जब चूसकर किसी चीज़ का पान करते हैं तो मुंह थोड़ा सिकोड़ते हैं। लेकिन सनबर्ड में यह पहला मामला देखने को मिला है जब कोई कशेरूकी बिना अपने मुंह का आकार बदले, सिर्फ अपनी जीभ से पैदा किए गए सक्शन (खिंचाव) (tongue suction mechanism) के ज़रिए कुछ पान करता है।
सनबर्ड और हमिंगबर्ड (hummingbird comparison) की चोंच पतली व लंबी होती है, जो अभिसारी विकास का उदाहरण है। अभिसारी विकास यानी कई अलग-अलग असम्बंधित प्रजातियों में एक से पर्यावरणीय दवाब के कारण एक जैसे अंगों का विकास। जीवविज्ञानी डेविड क्यूबन (David Hu research) की इनमें दिलचस्पी जगी। ये दोनों तरह के पक्षी आम तौर पर अपनी चोंच की मदद से घंटीनुमा फूलों के अंदर मौजूद मकरंद को पी लेते हैं। हमिंगबर्ड के मकरंद पीने का तरीका ऐसा है कि वे अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालते हैं, जिससे जीभ की नोक पर मकरंद चिपक जाता है। फिर वे जीभ को चोंच के अंदर ले जाते हैं और चोंच को कसकर बंद करके जीभ को निचोड़ते (capillary action feeding) हैं जिससे मकरंद उनके मुंह में आ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तौलिए को निचोड़ने से पानी निकलता है।
वाशिंगटन युनिवर्सिटी (University of Washington study) के क्यूबन जानना चाहते थे कि क्या सनबर्ड भी ऐसा ही करती हैं या उनके रसपान का तरीका अलग है। यह पता करने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया में सनबर्ड की सात प्रजातियों का हाई-स्पीड कैमरे (high speed camera analysis) की मदद से मकरंदपान का वीडियो बनाया। इसके लिए उन्होंने थ्री-डी प्रिंटर की मदद से नकली फूल बनाए। इन फूल के निचले हिस्से को एक स्क्रीन के नीचे रखा, ताकि वे पक्षियों को परेशान किए बिना उनकी जीभ की हरकत को फिल्मा सकें। चूंकि सनबर्ड की जीभ पारभासी होती है, इसलिए वे जीभ से बहते हुए मकरंद को देख सकते थे। आप भी इस प्रक्रिया का आनंद इन वेबसाइट्स पर ले सकते हैं:
वीडियो ध्यान से देखने पर पता चला कि हमिंगबर्ड के विपरीत, सनबर्ड ने अपनी जीभ को फूल के अंदर सिर्फ एक बार डाला। उन्होंने जीभ को वहीं रखा जब तक कि पूरा मकरंद नहीं पी लिया और तब तक अपनी चोंच भी बंद नहीं की। देखा गया कि सनबर्ड मकरंदपान (feeding pattern) करते समय अपनी जीभ को बस थोड़ा सा ही अंदर खींचते थे। और कभी-कभी चोंच के अंदर जीभ को ऊपर-नीचे भी करते थे।
क्यूबन और उनके साथियों (scientific findings) का कहना है कि जीभ की ऐसी हरकत सनबर्ड की जीभ की बनावट के साथ मिलकर, एक खिंचाव (suction) पैदा करती है। इन पक्षियों की जीभ के ऊपरी हिस्से पर एक V-आकार की नाली होती है। जब वे अपनी जीभ को चोंच के ऊपरी हिस्से से दबाते हैं, तो वह चपटी हो जाती है और नाली सिकुड़ जाती है। जीभ को नीचे की ओर खींचने से चोंच के ऊपरी हिस्से और नाली के बीच जगह बन जाती है, जिससे एक खिंचाव (fluid dynamics mechanism) पैदा होता है जो फूलों से रस को अंदर खींच लेता है। टीम ने तरल पदार्थों की गतिशीलता की कंप्यूटर मॉडलिंग की और इससे उन्हें समझ आया कि रस को अंदर खींचने के संभावित अन्य कारणों, जैसे केशिका क्रिया (capillary action), इस मामले में काम नहीं करते। यह जानना कि सनबर्ड अपनी जीभ का इस्तेमाल खाने के लिए कैसे करते हैं, इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि फूलों के साथ उनका विकास एक साथ कैसे हुआ और हमिंगबर्ड की तुलना में उनके खाने का तरीका अलग क्यों है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://news.berkeley.edu/wp-content/uploads/2026/04/Malachite-Sunbird_Photo_Keith-Barnes-crop-1536×878.jpg
लॉस एंजिल्स की अदालत (Los Angeles court case) के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की मांग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ (addictive platforms) लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली – के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की ज़िम्मेदारी (platform accountability) को कैसे देखता है।
कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम (YouTube Instagram usage) का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता और अवसाद (anxiety depression) जैसी समस्याएं होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा चिंता रहने लगी।
ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (Meta platforms) (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप) और गूगल (यूट्यूब) (Google YouTube) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज़्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज़्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों (legal precedent) के लिए भी महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।
इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स – जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना (content recommendation system) – इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज़्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूज़र्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य (user engagement strategy) था।
कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इन्कार (legal appeal) किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएं कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा (video platform) है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही (corporate negligence) की है।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर (social media effects on children) को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूज़र एंगेजमेंट (profit vs safety) से ज़्यादा यूज़र की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।
अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम (government regulation) उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएं तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन (UK social media policy) में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों (strict laws) की ज़रूरत है।
अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों (advocacy groups) ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम (policy reforms) और कंपनियों में सुधार भी ज़रूरी होंगे।
बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है – तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s.yimg.com/lo/mysterio/api/EAA607D8402D3D247AA84161D5576550FAA67D5C1D3A51F03683C6AF850BDBC0/subgraphmysterio/resizefit_w960_h640;quality_80;format_webp/https:%2F%2Fmedia.zenfs.com%2Fen%2Faol_bbc_articles_618%2Fb43bc078cf7a0ce4f38750618f63782a