आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व विश्व भर के महासागरों के जलस्तर में वृद्धि होने
लगी थी। हिमयुग के बाद हिमनदों के पिघलने से भूमध्य सागर के तट पर बसे लोगों को इस
बढ़ते जलस्तर से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। लेकिन इस परेशानी से निपटने के
लिए उन्होंने एक दीवार का निर्माण किया जिससे वे अपनी फसलों और गांव को तूफानी
लहरों और नमकीन पानी की घुसपैठ से बचा सकें। हाल ही में पुरातत्वविदों ने इरुााइल
के तट पर उस डूबी हुई दीवार को खोज निकाला है जो एक समय में एक गांव की रक्षा के
लिए तैयार की गई थी।
इस्राइल स्थित युनिवर्सिटी ऑफ हायफा के पुरातत्वविद एहुद गैलिली के अनुसार
इरुााइल की अधिकतर खेतिहर बस्तियां, जो अब जलमग्न हैं, उत्तरी तट पर मिली हैं। ये बस्तियां रेत की एक मीटर मोटी परत के नीचे संरक्षित
हैं। कभी-कभी रेत बहने पर ये बस्तियां सतह पर उभर आती हैं।
गैलिली और उनकी टीम ने इस दीवार को 2012 में खोज निकाला था। यह दीवार तेल
हराइज़ नामक डूबी हुई बस्ती के निकट मिली है। बस्ती समुद्र तट से 90 मीटर दूर तक
फैली हुई थी और 4 मीटर पानी में डूबी हुई थी। टीम ने स्कूबा गियर की मदद से अधिक
से अधिक जानकारी खोजने की कोशिश की। इसके बाद वर्ष 2015 के एक तूफान ने उन्हें एक
मौका और दिया। उन्हें पत्थर और लकड़ी से बने घरों के खंडहर, मवेशियों
की हड्डियां,
जैतून के तेल उत्पादन के लिए किए गए सैकड़ों गड्ढे, कुछ उपकरण,
एक चूल्हा और दो कब्रों भी मिलीं। लकड़ी और हड्डियों के
रेडियोकार्बन डेटिंग के आधार पर बस्ती 7000 वर्ष पुरानी है।
प्लॉस वन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह दीवार 100 मीटर लंबी थी और
बड़े-बड़े पत्थरों से बनाई गई थी जिनका वज़न लगभग 1000 किलोग्राम तक था। गैलिली का
अनुमान है कि यह गांव 200-300 वर्ष तक अस्तित्व में रहा होगा और लोगों ने सर्दियों
के भयावाह तूफान कई बार देखे होंगे। आधुनिक समुद्र की दीवारों की तरह इसने भी ऐसे
तूफानों से निपटने में मदद की होगी। गैलिली के अनुसार मानवों द्वारा समुद्र पानी
से खुद को बचाने का यह पहला प्रमाण है।
गैलिली का ऐसा मानना है कि तेल हराइज़ पर समुद्र का जल स्तर प्रति वर्ष 4-5 मिलीमीटर बढ़ रहा है। यह प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है। कुछ समय बाद उस क्षेत्र में रहने वाले लोग समझ गए होंगे कि अब वहां से निकल जाना ही बेहतर है। समुद्र का स्तर बढ़ता रहा होगा और पानी दीवारनुमा रुकावट को पार करके रिहाइशी इलाकों में भर गया होगा। लोगों ने बचाव के प्रयास तो किए होंगे लेकिन अंतत: समुद्र को रोक नहीं पाए होंगे और अन्यत्र चले गए होंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/ancientseawall2-16×9.jpg?itok=m0fDloxu
वर्ष 2019 विज्ञान जगत के इतिहास में एक ऐसे वर्ष के रूप में
याद किया जाएगा,
जब वैज्ञानिकों ने पहली बार ब्लैक होल की तस्वीर जारी की।
यह वही वर्ष था,
जब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बन के एक और नए रूप
का निर्माण कर लिया। विदा हुए साल में गूगल ने क्वांटम प्रोसेसर में श्रेष्ठता
हासिल की। अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में आठ रासायनिक अक्षरों वाले डीएनए अणु
बनाने की घोषणा की।
इस वर्ष 10 अप्रैल को खगोल वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी की।
यह तस्वीर विज्ञान की परिभाषाओं में की गई कल्पना से पूरी तरह मेल खाती है।
भौतिकीविद अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहली बार 1916 में सापेक्षता के सिद्धांत के साथ
ब्लैक होल की भविष्यवाणी की थी। ब्लैक होल शब्द 1967 में अमेरिकी खगोलविद जॉन
व्हीलर ने गढ़ा था। 1971 में पहली बार एक ब्लैक होल खोजा गया था।
इस घटना को विज्ञान जगत की बहुत बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। ब्लैक होल का
चित्र इवेंट होराइज़न दूरबीन से लिया गया, जो हवाई, एरिज़ोना,
स्पेन, मेक्सिको, चिली और दक्षिण ध्रुव में लगी है। वस्तुत: इवेंट होराइज़न दूरबीन एक संघ है। इस
परियोजना के साथ दो दशकों से लगभग 200 वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं। इसी टीम की सदस्य
मैसाचूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी की 29 वर्षीय कैरी बोमेन ने एक कम्प्यूटर
एल्गोरिदम से ब्लैक होल की पहली तस्वीर बनाने में सहायता की। विज्ञान जगत की
अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका साइंस ने वर्ष 2019 की दस प्रमुख खोजों में ब्लैक
होल सम्बंधी अनुसंधान को प्रथम स्थान पर रखा है।
उक्त ब्लैक होल हमसे पांच करोड़ वर्ष दूर एम-87 नामक निहारिका में स्थित है।
ब्लैक होल हमेशा ही भौतिक वैज्ञानिकों के लिए उत्सुकता के विषय रहे हैं। ब्लैक होल
का गुरूत्वाकर्षण अत्यधिक शक्तिशाली होता है जिसके खिंचाव से कुछ भी नहीं बच सकता; प्रकाश भी यहां प्रवेश करने के बाद बाहर नहीं निकल पाता है। ब्लैक होल में
वस्तुएं गिर सकती हैं, लेकिन वापस नहीं लौट सकतीं।
इसी वर्ष 21 फरवरी को अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में बनाए गए नए डीएनए अणु
की घोषणा की। डीएनए का पूरा नाम डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड है। नए संश्लेषित
डीएनए में आठ अक्षर हैं, जबकि प्रकृति में विद्यमान
डीएनए अणु में चार अक्षर ही होते हैं। यहां अक्षर से तात्पर्य क्षारों से है।
संश्लेषित डीएनए को ‘हैचीमोजी’ नाम दिया गया है। ‘हैचीमोजी’ जापानी भाषा का शब्द
है,
जिसका अर्थ है आठ अक्षर। एक-कोशिकीय अमीबा से लेकर
बहुकोशिकीय मनुष्य तक में डीएनए होता है। डीएनए की दोहरी कुंडलीनुमा संरचना का
खुलासा 1953 में जेम्स वाट्सन और फ्रांसिक क्रिक ने किया था। यह वही डीएनए अणु है, जिसने जीवन के रहस्यों को सुलझाने और आनुवंशिक बीमारियों पर विजय पाने में अहम
योगदान दिया है। मातृत्व-पितृत्व का विवाद हो या अपराधों की जांच, डीएनए की अहम भूमिका रही है।
सुपरकम्प्यूटिंग के क्षेत्र में वर्ष 2019 यादगार रहेगा। इसी वर्ष गूगल ने 54
क्यूबिट साइकैमोर प्रोसेसर की घोषणा की जो एक क्वांटम प्रोसेसर है। गूगल ने दावा
किया है कि साइकैमोर वह कार्य 200 सेकंड में कर देता है, जिसे
पूरा करने में सुपर कम्प्यूटर दस हज़ार वर्ष लेगा। इस उपलब्धि के आधार पर कहा जा
सकता है कि भविष्य क्वांटम कम्यूटरों का होगा।
वर्ष 2019 में रासायनिक तत्वों की प्रथम आवर्त सारणी के प्रकाशन की 150वीं
वर्षगांठ मनाई गई। युनेस्को ने 2019 को अंतर्राष्ट्रीय आवर्त सारणी वर्ष मनाने की
घोषणा की थी,
जिसका उद्देश्य आवर्त सारणी के बारे में जागरूकता का
विस्तार करना था। विख्यात रूसी रसायनविद दिमित्री मेंडेलीव ने सन 1869 में प्रथम
आवर्त सारणी प्रकाशित की थी। आवर्त सारणी की रचना में विशेष योगदान के लिए
मेंडेलीव को अनेक सम्मान मिले थे। सारणी के 101वें तत्व का नाम मेंडेलेवियम रखा
गया। इस तत्व की खोज 1955 में हुई थी। इसी वर्ष जुलाई में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ प्योर
एंड एप्लाइड केमिस्ट्री (IUPAC) का
शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस संस्था की स्थापना 28 जुलाई 1919 में उद्योग जगत के
प्रतिनिधियों और रसायन विज्ञानियों ने मिलकर की थी। तत्वों के नामकरण में युनियन
का अहम योगदान रहा है।
विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के अनुसार गुज़िश्ता साल रसायन
वैज्ञानिकों ने कार्बन के एक और नए रूप सी-18 सायक्लोकार्बन का सृजन किया। इसके
साथ ही कार्बन कुनबे में एक और नया सदस्य शामिल हो गया। इस अणु में 18 कार्बन
परमाणु हैं,
जो आपस में जुड़कर अंगूठी जैसी आकृति बनाते हैं। शोधकर्ताओं
के अनुसार इसकी संरचना से संकेत मिलता है कि यह एक अर्धचालक की तरह व्यवहार करेगा।
लिहाज़ा,
कहा जा सकता है कि आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिकी में इसके उपयोग
की संभावनाएं हैं।
गुज़रे साल भी ब्रह्मांड के नए-नए रहस्यों के उद्घाटन का सिलसिला जारी रहा। इस
वर्ष शनि बृहस्पति को पीछे छोड़कर सबसे अधिक चंद्रमा वाला ग्रह बन गया। 20 नए
चंद्रमाओं की खोज के बाद शनि के चंद्रमाओं की संख्या 82 हो गई। जबकि बृहस्पति के
79 चंद्रमा हैं।
गत वर्ष बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा पर जल वाष्प होने के प्रमाण मिले। विज्ञान
पत्रिका नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोपा की मोटी
बर्फ की चादर के नीचे तरल पानी का सागर लहरा रहा है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार
इससे यह संकेत मिलता है कि यहां पर जीवन के सभी आवश्यक तत्व विद्यमान हैं।
कनाडा स्थित मांट्रियल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बियर्न बेनेक के नेतृत्व में
वैज्ञानिकों ने हबल दूरबीन से हमारे सौर मंडल के बाहर एक ऐसे ग्रह (के-टू-18 बी)
का पता लगाया है,
जहां पर जीवन की प्रबल संभावनाएं हैं। यह पृथ्वी से दो गुना
बड़ा है। यहां न केवल पानी है, बल्कि
तापमान भी अनुकूल है।
साल की शुरुआत में चीन ने रोबोट अंतरिक्ष यान चांग-4 को चंद्रमा के अनदेखे
हिस्से पर सफलतापूर्वक उतारा और ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। चांग-4
जीवन सम्बंधी महत्वपूर्ण प्रयोगों के लिए अपने साथ रेशम के कीड़े और कपास के बीज भी
ले गया था।
अप्रैल में पहली बार नेपाल का अपना उपग्रह नेपालीसैट-1 सफलतापूर्वक लांच किया
गया। दो करोड़ रुपए की लागत से बने उपग्रह का वज़न 1.3 किलोग्राम है। इस उपग्रह की
मदद से नेपाल की भौगोलिक तस्वीरें जुटाई जा रही हैं। दिसंबर के उत्तरार्ध में युरोपीय
अंतरिक्ष एजेंसी ने बाह्य ग्रह खोजी उपग्रह केऑप्स सफलतापूर्वक भेजा। इसी साल
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजा गया अपार्च्युनिटी रोवर पूरी तरह
निष्क्रिय हो गया। अपाच्र्युनिटी ने 14 वर्षों के दौरान लाखों चित्र भेजे। इन
चित्रों ने मंगल ग्रह के बारे में हमारी सीमित जानकारी का विस्तार किया।
बीते वर्ष में जीन सम्पादन तकनीक का विस्तार हुआ। आलोचना और विवादों के बावजूद
अनुसंधानकर्ता नए-नए प्रयोगों की ओर अग्रसर होते रहे। वैज्ञानिकों ने जीन सम्पादन
तकनीक क्रिसपर कॉस-9 तकनीक की मदद से डिज़ाइनर बच्चे पैदा करने के प्रयास जारी रखे।
जीन सम्पादन तकनीक से बेहतर चिकित्सा और नई औषधियां बनाने का मार्ग पहले ही
प्रशस्त हो चुका है। चीन ने जीन एडिटिंग तकनीक से चूहों और बंदरों के निर्माण का
दावा किया है। साल के उत्तरार्ध में ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने शरीर की
नरम हड्डी अर्थात उपास्थि की मरम्मत के लिए एक तकनीक खोजी, जिससे
जोड़ों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
बीते साल भी जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता की लकीर लंबी होती गई। बायोसाइंस
जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार पहली बार विश्व के 153 देशों के 11,258
वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन पर एक स्वर में चिंता जताई। वैज्ञानिकों ने
‘क्लाइमेट इमरजेंसी’ की चेतावनी देते हुए जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण
कार्बन उत्सर्जन को बताया। दिसंबर में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में संयुक्त
राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में विचार मंथन का मुख्य मुद्दा पृथ्वी
का तापमान दो डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बढ़ने से रोकना था।
इसी साल हीलियम की खोज के 150 वर्ष पूरे हुए। इस तत्व की खोज 1869 में हुई थी।
हीलियम का उपयोग गुब्बारों, मौसम विज्ञान सम्बंधी उपकरणों
में हो रहा है। इसी वर्ष विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के
प्रकाशन के 150 वर्ष पूरे हुए। नेचर को विज्ञान की अति प्रतिष्ठित और
प्रामाणिक पत्रिकाओं में गिना जाता है। इस वर्ष भौतिकीविद रिचर्ड फाइनमैन द्वारा
पदार्थ में शोध के पूर्व अनुमानों को लेकर दिसंबर 1959 में दिए गए ऐतिहासिक
व्याख्यान की हीरक जयंती मनाई गई।
विदा हो चुके वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ (IAU) की स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाया गया। इसकी स्थापना 28 जुलाई 1919 को ब्रुसेल्स
में की गई थी। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ के 13,701 सदस्य हैं। इसी साल
मानव के चंद्रमा पर पहुंचने की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। 21 जुलाई 1969 को अमेरिकी
अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चांद की सतह पर कदम रखा था।
इसी वर्ष विश्व मापन दिवस 20 मई के दिन 101 देशों ने किलोग्राम की नई परिभाषा
को अपना लिया। हालांकि रोज़मर्रा के जीवन में इससे कोई अंतर नहीं आएगा, लेकिन अब पाठ्य पुस्तकों में किलोग्राम की परिभाषा बदल जाएगी। किलोग्राम की नई
परिभाषा प्लैंक स्थिरांक की मूलभूत इकाई पर आधारित है।
गत वर्ष अक्टूबर में साहित्य, शांति, अर्थशास्त्र
और विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई। विज्ञान के नोबेल पुरस्कार
विजेताओं में अमेरिका का वर्चस्व दिखाई दिया। रसायन शास्त्र में लीथियम आयन बैटरी
के विकास के लिए तीन वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया – जॉन गुडइनफ, एम. विटिंगहैम और अकीरा योशिनो। लीथियम बैटरी का उपयोग मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक कार, लैपटॉप आदि में होता है। 97 वर्षीय गुडइनफ
नोबेल सम्मान प्राप्त करने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति हो गए हैं। चिकित्सा
विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को प्रदान किया गया –
विलियम केलिन जूनियर, ग्रेग एल. सेमेंज़ा और पीटर रैटक्लिफ।
इन्होंने कोशिका द्वारा ऑक्सीजन के उपयोग पर शोध करके कैंसर और एनीमिया जैसे रोगों
की चिकित्सा के लिए नई राह दिखाई है। इस वर्ष का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जेम्स
पीबल्स,
मिशेल मेयर और डिडिएर क्वेलोज़ को दिया गया। तीनों
अनुसंधानकर्ताओं ने बाह्य ग्रहों खोज की और ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा हटाया।
ऑस्ट्रेलिया के कार्ल क्रूसलेंकी को वर्ष 2019 का विज्ञान संचार का
अंतर्राष्ट्रीय कलिंग पुरस्कार प्रदान किया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले
वे पहले ऑस्ट्रेलियाई हैं।
वर्ष 2019 का गणित का प्रतिष्ठित एबेल पुरस्कार अमेरिका की प्रोफेसर केरन
उहलेनबेक को दिया गया है। इसे गणित का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। इसकी स्थापना
2002 में की गई थी। पुरस्कार की स्थापना के बाद यह सम्मान ग्रहण करने वाली केरन
उहलेनबेक पहली महिला हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने वर्ष 2019 के दस प्रमुख
वैज्ञानिकों की सूची में स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को शामिल किया
है। टाइम पत्रिका ने भी ग्रेटा थनबर्ग को वर्ष 2019 का ‘टाइम पर्सन ऑफ दी
ईयर’ चुना है। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में
पहचान बनाई और जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयासों का ज़ोरदार अभियान चलाया।
5 अप्रैल को नोबेल सम्मानित सिडनी ब्रेनर का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें 2002 में मेडिसिन का नोबेल सम्मान दिया गया था। उन्होंने सिनोरेब्डाइटिस एलेगेंस नामक एक कृमि को रिसर्च का प्रमुख मॉडल बनाया था। 11 अक्टूबर को सोवियत अंतरिक्ष यात्री अलेक्सी लीनोव का 85 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। लीनोव पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में चहलकदमी करके इतिहास रचा था। (स्रोत फीचर्स)
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व्यायाम करने के मामले में हर व्यक्ति अनूठा होता है। कुछ होंगे
जो खुशी से रोज़ाना कई किलोमीटर दौड़ेंगे जबकि अन्य को यह बिलकुल पसंद नहीं आएगा कि
बगैर किसी गंतव्य के दौड़ लगाएं। नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित एक ताज़ा
अध्ययन के अनुसार व्यायाम करने की ललक पर शुरुआत विकास के दौरान हुए एपिजेनेटिक
परिवर्तनों का असर पड़ता है। गौरतलब है कि यह अध्ययन चूहों पर किया गया है।
पहला सवाल तो यही उठता है कि एपिजेनेटिक परिवर्तन क्या होते हैं। हमारे शरीर
की विभिन्न क्रियाओं का संचालन कोशिकाओं में उपस्थित डीएनए नामक अणु के द्वारा
किया जाता है। डीएनए तो हमें माता-पिता से विरासत में मिलता है लेकिन समय के साथ
इस पर कुछ अन्य अणु जुड़ जाते हैं जो इसके कामकाज पर असर डालते हैं। डीएनए पर ऐसे
अणुओं के जुड़ने को एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं। ऐसा एक एपिजेनेटिक परिवर्तन होता
है डीएनए पर मिथाइल समूहों का जुड़ना जिसे वैज्ञानिक लोग मिथायलेशन कहते हैं।
बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के रॉबर्ट वॉटरलैंड एपिजेनेटिक्स का अध्ययन करते हैं।
उनकी टीम शुरुआती विकास के दौरान ऊर्जा संतुलन का अध्ययन करती है। ऊर्जा संतुलन का
मतलब होता है कि कोई जंतु कितनी कैलोरी का उपभोग करता है और कितनी कैलोरी खर्च
करता है। वे जानना चाहते थे कि ऊर्जा संतुलन पर एपिजेनेटिक परिवर्तनों का क्या असर
होता है।
उन्होंने हायपोथेलेमस नामक अंग में एक विशेष किस्म की तंत्रिकाओं पर ध्यान केंद्रित
किया जिनके बारे में माना जाता है कि वे इस बात का नियंत्रण करती हैं कि कोई जंतु
कितना खाएगा। इन्हें AgRP तंत्रिका कहते हैं। इसी से यह
भी तय होता है कि वह जंतु मोटापे का शिकार होगा या नहीं। तो वॉटरलैंड की टीम ने
दूध पीते चूहों में AgRP
तंत्रिकाओं में मिथायलेशन का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं की परिकल्पना थी कि यदि इन
तंत्रिकाओं में मिथायलेशन को तहस-नहस कर दिया जाए तो ऐसे चूहे सामान्य चूहों के
मुकाबले अधिक खाएंगे और मोटे हो जाएगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तो टीम ने एक बार फिर कोशिश की। इस बार उन्होंने विकास की एक ही अवस्था में एक जीन को एक ही स्थान पर ठप किया। सारे चूहों को एक ही खुराक दी गई। लेकिन इस बार अंतर यह था कि उन्हें आठ हफ्तों तक दौड़ने के लिए एक ट्रेडमिल उपलब्ध कराई गई थी। और दो तरह के चूहों में सबसे अधिक फर्क ट्रेडमिल के इस्तेमाल में देखा गया। सामान्य चूहे जहां प्रतिदिन करीब छ: कि.मी. दौड़ते हैं, वहीं परिवर्तनशुदा चूहे उससे मात्र आधा दौड़े। ज़ाहिर है, ज़्यादा दौड़ने वाले चूहों ने ज़्यादा कैलोरी खर्च की, जबकि दोनों के खाने की मात्रा में ज़्यादा फर्क नहीं था। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह रहा कि शुरुआती विकास के दौरान होने वाले एपिजेनेटिक परिवर्तन इस बात पर असर डालते हैं कि कोई चूहा कितना व्यायाम करेगा। अब मनुष्यों में इस बात की जांच करने की तमन्ना है। (स्रोत फीचर्स)
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जब डार्विन ने जैव विकास का सिद्धांत प्रकाशित किया था, तब दुनिया में तहलका मच गया था। सिद्धांत का आशय यह था कि जैव विकास ऐसी
प्रक्रिया है जिसमें नई प्रजातियां बनती रहती हैं और पुरानी प्रजातियां नष्ट होती
जाती हैं। इस सिद्धांत का एक निष्कर्ष यह भी था कि मनुष्य का विकास बंदरों के समान
जंतुओं से हुआ है। विज्ञान ने इस सिद्धांत की पुष्टि निर्विवाद रूप से कर दी है।
यह बात आज भी कई लोगों के गले नहीं उतरती। वे सोचते हैं कि हमारे आसपास पाया
जाने वाला कोई बंदर मनुष्य कैसे बन सकता है। किंतु ऐसा नहीं होता, आज का कोई बंदर मनुष्य नहीं बन सकता। इस प्रक्रिया में लाखों-करोड़ों वर्ष लग
जाते हैं। सबसे सटीक उदाहरण डायनासौर का है जो मगरमच्छों और छिपकलियों के सम्बंधी
थे और 25 करोड़ से लेकर 6 करोड़ वर्ष पूर्व तक पृथ्वी पर उनकी बादशाहत थी। कुछ
मांसाहारी डायनासौर बहुत खूंखार और विशालकाय थे। किंतु कालांतर में सभी डायनासौर
नष्ट हो गए और जैव विकास की प्रक्रिया में कुछ डायनासौर से पक्षी विकसित हो गए।
बंदर से मनुष्य बनना कुछ ऐसा ही है जैसा डायनासौर से पक्षियों का बनना।
आज से 70 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में रहने वाले कपि सहेलोन्थ्रोपस से दो
अलग-अलग जंतुओं,
चिम्पैंज़ी और आदिम मानव, का
विकास हुआ (चिम्पैंज़ी, गोरिल्ला, ओरांगउटान
जैसे पूंछ-रहित बड़े बंदरों को कपि और अंग्रेजी में ऐप कहते हैं)। पेड़ों पर रहने
वाला यह आदिम मानव आज के मनुष्य से इतना अलग था कि उसे ऑस्ट्रेलोपिथेकस नाम
दिया गया है।
अन्य कपियों के समान ही आदिम मानव के शरीर पर भी घने बालों का आवरण था। जैव
विकास के दौरान मनुष्य के शरीर के बाल गायब हो गए। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? मानव की हड्डियों के जीवाश्मों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह तो पता लगा सकते
हैं कि मनुष्य की शरीर रचना में कब-कब और कैसे-कैसे परिवर्तन हुए। किंतु चूंकि
मृत्यु के कुछ समय बाद त्चचा नष्ट हो जाती है, उससे
सम्बंधित कोई भी अध्ययन लगभग असंभव होता है। फिर भी, जंतुओं
और वनस्पतियों के जीवाश्मों का अध्ययन करके वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि
मनुष्य के शरीर से बालों के गायब होने का प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है।
यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि जीवधारियों में जो भी परिवर्तन होते हैं
वे लाखों वर्षों की अवधि में होते हैं। इस प्रक्रिया में कई नमूने बनते हैं
किंतु जीवित रहने योग्य नहीं पाए जाने पर वे नष्ट हो जाते हैं। जो नमूने सफल
होते हैं वे बच जाते हैं और उनमें और अधिक परिवर्तन होते जाते हैं। इस प्रकार
नई-नई प्रजातियां बनती रहती हैं।
मनुष्य का उद्भव तथा प्रारंभिक जैव विकास अफ्रीका में हुआ
और उसके अधिकांश शारीरिक परिवर्तन उस महाद्वीप की परिस्थितियों से जुड़े हैं। आज से
लगभग 30 लाख वर्ष पहले पूरे विश्व में एक ज़बरदस्त शीत लहर आई थी जिससे संसार के
सारे जीवधारी प्रभावित हुए थे। आदिमानव के निवास स्थान – मध्य और पूर्वी अफ्रीका –
में वर्षा में कमी के कारण जंगल नष्ट हो गए और उनका स्थान घास के खुले मैदानों ने
ले लिया। इन जंगलों में रहने वाले ऑस्ट्रेलोपिथेकस नामक आदिमानव के प्रमुख
आहार फल,
पत्तियों, जड़ों और बीजों की उपलब्धता कम
हो गई। इसी प्रकार, जल के स्थायी स्रोत सूख जाने के कारण पीने
के पानी की भी कमी हो गई। परिणामस्वरूप, मनुष्य को भोजन और पानी
की खोज में अधिक दूर तक जाना पड़ता था। भोजन के वनस्पति स्रोतों की कमी के चलते
मनुष्य ने लगभग 26 लाख वर्ष पहले अन्य जंतुओं का शिकार कर उन्हें खाना शुरू कर
दिया। शिकार की खोज में अधिक लंबी दूरियां तय करने और उनका पीछा करने के लिए अधिक
तेज़ भागने के लिए अधिक ऊर्जा खर्च करना ज़रूरी हो गया। प्राकृतिक वरण के फलस्वरूप
पेड़ों पर रहने वाले मानव की तुलना में ज़मीन पर रहने वाले मानव के हाथों और टांगों
की लंबाई बढ़ गई।
अधिक तेज़ गतिविधि करने के कारण शरीर के तापमान के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया।
शरीर के बढ़े हुए तापमान को कम करने में दो बातों से फायदा मिला – शरीर से बालों का
आवरण कम होना और त्वचा में स्थित पसीने का निर्माण करने वाली स्वेद ग्रंथियों की
संख्या में वृद्धि।
त्वचा से बालों का आवरण हट जाने के कारण शुरूआती दौर में मनुष्य की त्वचा अन्य
कपियों की त्वचा के समान हल्के गुलाबी रंग की थी। किंतु सूर्य के प्रकाश में मौजूद
पराबैंगनी किरणें इस अनावृत त्वचा के लिए घातक सिद्ध होने लगीं। शरीर के लिए
अत्यावश्यक विटामिन फोलेट पराबैंगनी किरणों से नष्ट हो जाता है, इसके अलावा त्वचा के कैंसर का भारी खतरा होता है। एक बार फिर प्रकृति ने अपना
चमत्कार दिखाया और लगभग 12 लाख वर्ष पहले मनुष्य में एक ऐसे जीन MC1R का उद्भव हुआ जो त्वचा में मेलानिन नामक काले रंग के पदार्थ के बनने के लिए
उत्तरदायी होता है। पराबैंगनी किरणों से बचने के लिए मेलानिन एक प्रभावशाली साधन
है। यही कारण है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और तेज़ धूप वाले समशीतोष्ण क्षेत्रों
में मनुष्य की त्वचा में मेलानिन अधिक मात्रा में पाया जाता है।
जब मनुष्य ने अफ्रीका से निकल कर युरोप जैसे ठंडे प्रदेशों में रहना शुरू किया
तब वहां धूप की तीव्रता कम होने के कारण पराबैंगनी किरणों का खतरा तो कम हो गया
किंतु एक नया खतरा सामने आया। वह खतरा यह था कि धूप तेज़ न होने के कारण शरीर में
विटामिन-डी बनना बंद हो गया। विटामिन-डी हड्डियों की मजबूती के लिए आवश्यक होता
है। अत: इन क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्य की त्वचा में मेलानिन की मात्रा कम हो
गई और उनकी त्वचा श्वेत होती गई।
शरीर का तापक्रम कम करने का अन्य प्रभावशाली उपाय पसीना बहाना है। कपि समूह
में (जिसका सदस्य मनुष्य भी है) स्वेद ग्रंथियां पाई जाती हैं। किंतु मनुष्य में
इनकी संख्या बहुत अधिक बढ़ गई है और वे त्वचा के ठीक नीचे स्थित हो गई हैं। किसी
बहुत गरम दिन पर तेज़ गतिविधि करने पर एक मनुष्य के शरीर से 12 लीटर तक पसीना निकल सकता
है। पसीने और बाल-रहित त्वचा का यह गठजोड़ शरीर को ठंडा करने के लिए इतना
प्रभावशाली होता है कि वैज्ञानिकों के एक अनुमान के अनुसार किसी बहुत गरम दिन पर
लंबी दौड़ में एक स्वस्थ मनुष्य घोड़े को भी पीछे छोड़ सकता है।
मनुष्य और चिम्पैंज़ी के डीएनए में 99 प्रतिशत समानता होती है किंतु उनमें एक
महत्वपूर्ण अंतर यह होता है कि मनुष्य में ऐसे जीन पाए जाते हैं जो उसकी त्वचा को
जल और खरोचों के प्रति रोधक बनाते हैं। बालरहित त्वचा के लिए यह गुणधर्म ज़रूरी है।
ये जीन चिम्पैंज़ी में नहीं पाए जाते।
इस सबके बावजूद यह सवाल रह जाता है कि मनुष्य के सिर और बगलों तथा जांघों के
जोड़ों पर बाल क्यों रह गए। सिर के बालों के कार्य के बारे में वैज्ञानिकों का कहना
है कि अफ्रीका में रहने वाले पूर्वज मनुष्य के बाल घने और घुंघराले थे (जैसे आज भी
अफ्रीकी मूल के लोगों के होते हैं)। ऐसे बालों के कारण सिर की त्वचा और बालों के
बीच एक रिक्त स्थान बन जाता है जिसमें हवा की एक परत होती है। तेज़ धूप में बाल
ऊष्मा को सोख लेते हैं और सिर की त्वचा से निकलने वाले पसीने की भाप हवा की परत
में चली जाती है और सिर का तापक्रम कम हो जाता है। बगलों तथा जांघों के जोड़ों पर स्थित
बालों के बारे में वैज्ञानिकों की राय है कि वे चलने या दौड़ने के दौरान इन जोड़ों
में घर्षण को कम रखते हैं।
बालों का एक उपयोग स्तनधारी आक्रामकता को प्रदर्शित करने के लिए भी करते हैं। सबसे परिचित उदाहरण कुत्तों और बिल्लियों में देखा जाता है जो खतरे से सामना होने पर अपने बालों को खड़ा कर लेते हैं। मनुष्य के पास अब यह सुविधा नहीं है, किंतु उसने कई अन्य तरीकों से अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीख लिया है, जैसे चेहरे तथा शरीर के हावभावों से या बोल कर या लिख कर। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/b/bd/Sahelanthropus_tchadensis_reconstruction.jpg
हाल ही में अंग प्रत्यारोपण का एक विचित्र मामला सामने आया
है। एक व्यक्ति क्रिस लॉन्ग को किसी अन्य व्यक्ति की अस्थि मज्जा का प्रत्यारोपण
किया गया था। इस प्रक्रिया में यह तो अपेक्षित है कि लॉन्ग के खून में दानदाता का
डीएनए मिलेगा। लेकिन प्रक्रिया के चार वर्ष बाद की गई जांच में पता चला कि उसके
होठों और गाल से रूई के फोहे की मदद से लिए गए नमूनों में दानदाता का डीएनए पाया
गया। और तो और,
लॉन्ग के वीर्य में भी दानदाता का ही डीएनए था।
गौरतलब है कि डीएनए वह पदार्थ है जो हर कोशिका में पाया जाता है और यह
वंशानुगत गुणधर्मों का वाहक है। प्रत्येक व्यक्ति का डीएनए अनूठा होता है। एक ही
व्यक्ति में दो व्यक्तियों के डीएनए होने का मतलब है कि वह व्यक्ति एक से अधिक
जीवों का मिश्रित जीव है। ऐसे जीव को जीव वैज्ञानिक शिमेरा कहते हैं। अपराध
वैज्ञानिक मामले की जांच में लगे हैं। वैसे तो वैज्ञानिकों को बरसों से पता है कि
कतिपय चिकित्सकीय प्रक्रियाएं व्यक्ति को शिमेरा में तबदील कर सकती हैं लेकिन यह
पहला मामला है जहां खून के अलावा विभिन्न अंगों में भी दानदाता का डीएनए प्रकट हो
रहा है।
हर वर्ष रक्त कैंसर, ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित हज़ारों लोग अस्थि मज्जा का प्रत्यारोपण
करवाते हैं। प्रत्यारोपण के बाद उनका डीएनए संघटन बदल जाता है। ज़रूरी नहीं कि ऐसे
सब लोग जाकर कोई अपराध करेंगे या हादसों के शिकार होंगे मगर खुदा न ख्वास्ता ऐसा
हो गया तो डीएनए की मदद से उनकी पहचान मुश्किल हो जाएगी। लॉन्ग का प्रकरण जब
अंतर्राष्ट्रीय अपराध विज्ञान सम्मेलन में प्रस्तुत हुआ तो सबके कान खड़े हो गए और
अब यह डीएनए विश्लेषकों के लिए एक मिसाल बन गया है।
वैसे प्रत्यारोपण करने वाले डॉक्टरों को इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं होती कि
दानदाता का डीएनए मरीज़ के शरीर में कहां-कहां प्रकट हो जाएगा क्योंकि इस किस्म का
शिमेरिज़्म हानिकारक नहीं होता और न ही यह उस व्यक्ति की शख्सियत को बदलता है। कई
बार मरीज़ों को चिंता होती है कि पुरुष के शरीर में महिला या महिला के शरीर में
पुरुष डीएनए आने पर समस्या होगी लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कोई फर्क
नहीं पड़ता।
लेकिन अपराध वैज्ञानिकों के लिए इसके मायने एकदम अलग हैं। जब लॉन्ग की जांच की गई तो पता चला था कि उसके शरीर के अलग-अलग अंगों में दानदाता का डीएनए नज़र आ रहा है और अलग-अलग समय पर इसका प्रतिशत भी बदलता रहता है। और जब लॉन्ग का समूचा वीर्य दानदाता का हो गया तो अपराध वैज्ञानिकों का चौंकना स्वाभाविक था। ऐसे कुछ मामले अतीत में सामने आ चुके हैं और अपराध वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि डीएनए आधारित पहचान की प्रामाणिकता पर इसका क्या असर होगा। (स्रोत फीचर्स)
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गर्भ के कुछ हफ्तों बाद गर्भवती महिलाओं को शिशु के लात
मारने का एहसास होने लगता है। लेकिन सवाल यह है कि गर्भ में शिशु लात क्यों मारते
हैं। इम्पीरियल कॉलेज लंदन की बायो-इंजीनियर नियाम नोवलन ने लाइव साइंस को
बताया है कि गर्भ वैसे तो काफी तंग जगह होती है लेकिन लातें चलाना हड्डियों और
जोड़ों के स्वस्थ विकास के लिए ज़रूरी व्यायाम है।
वास्तव में गर्भ के शुरूआती 7 हफ्ते के बाद भ्रूण हरकत करने लगता है जिसमें
आहिस्ता-आहिस्ता वह अपनी गरदन घुमाने लगता है। जैसे-जैसे भ्रूण का विकास होता है
वह हिचकी,
हाथ-पैर हिलाना, अंगड़ाई लेना, उबासी लेना और अंगूठा चूसने जैसी हरकतें भी करने लगता है। लेकिन गर्भवती
महिलाओं को हाथ-पैर हिलाने जैसी बड़ी हरकतें 16 से 18 हफ्तों के बाद ही महसूस होने
लगती हैं।
हालांकि अध्ययनों में अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि गर्भ में शिशु की हरकतें
स्वैच्छिक हैं या अनैच्छिक, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि
जन्म के बाद शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए गर्भ में हाथ-पैर मारने जैसी ये
हरकतें आवश्यक हैं, खासकर जोड़ों और हड्डियों के लिए। युरोपियन
सेल एंड मटेरियल में प्रकाशित एक समीक्षा में नोवलन बताती हैं कि कैसे भ्रूण
की कम हरकत के कारण कुछ जन्मजात विकार (जैसे छोटे जोड़ या पतली हड्डियां) हो सकते
हैं,
जिनकी वजह से फ्रैक्चर की संभावना अधिक रहती है।
लेकिन फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि गर्भ में शिशु की कितनी हरकत सामान्य
कहलाएगी और कितनी कम या ज़्यादा क्योंकि भ्रूण की हरकतों पर निगरानी सिर्फ
अस्पतालों में ही रखी जा सकती है और गर्भवती महिलाएं अस्पताल में तो थोड़े समय के
लिए ही होती हैं। इसलिए भ्रूण की हरकत का तफसील से अध्ययन करना अब तक मुश्किल रहा
है।
इस समस्या के समाधान के लिए नोवलन की टीम ने एक ऐसा मॉनीटर बनाया है जिसे
महिलाएं दिन भर पहने रख सकती हैं और रोज़मर्रा के सारे काम भी करती रह सकती हैं।
नोवलन के दल ने इस मॉनीटर को 24 से 34 सप्ताह के गर्भ वाली 44 गर्भवती महिलाओं पर
आज़माया। इसकी मदद से वे शिशुओं की सांस लेने, चौंकने
और अन्य सामान्य शारीरिक हरकतें सटीकता से रिकॉर्ड कर पाए। उनका यह अध्ययन प्लॉस
वन नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
हालांकि शिशु की हरकत सम्बंधी कई अध्ययन किए जाना या निष्कर्षों की पुष्टि किया जाना अभी बाकी है – जैसे कौन-सी बार गर्भधारण किया है, क्या इससे शिशु के लात मारने पर कोई प्रभाव पड़ता है? या शिशु के लिंग और लात मारने के परिमाण के बीच कोई सम्बंध है? उम्मीद है कि इस नए विकसित मॉनीटर से शिशु की हरकत के बारे में और विस्तार से जानने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)
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मीठा खाना हम सबको पसंद है, लेकिन
अधिक चीनी के सेवन से वज़न बढ़ने, मोटापे, टाइप-2 मधुमेह और दंत रोग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मीठा खाने से
खुद को रोक पाना इतना कठिन होता है कि मानो मस्तिष्क को मीठा खाने के लिए
प्रोग्राम किया गया हो। वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि मोटापा बढ़ाने
वाला भोजन मस्तिष्क और व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है और इससे निपटने के लिए
क्या किया जा सकता है।
ग्लूकोज़ मस्तिष्क कोशिकाओं सहित अन्य कोशिकाओं के लिए र्इंधन का काम करता है।
हमारे आदिम पूर्वजों के लिए मीठे खाद्य पदार्थ ऊर्जा के बेहतरीन स्रोत थे जिसके
चलते मनुष्य विशेष रूप से मीठे खाद्य पदार्थों को पसंद करने लगे। कड़वा, खट्टा स्वाद कच्चे फलों का या ज़हरीला हो सकता है।
मीठे का सेवन करने पर हमारे मस्तिष्क की डोपामाइन प्रणाली सक्रिय हो जाती है
जो एक तरह के पारितोषिक का काम करती है। इस रसायन को मस्तिष्क एक सकारात्मक संकेत
के रूप में दर्ज करता है। यह रसायन उसी कार्य को फिर से करने के लिए प्रेरित करता
है और हमारा आकर्षण मिठास के प्रति बढ़ जाता है। लेकिन क्या चीनी का अत्यधिक सेवन
मस्तिष्क पर कोई नकारात्मक प्रभाव डालता है?
न्यूरोप्लास्टिसिटी नामक प्रक्रिया के माध्यम से मस्तिष्क खुद का पुनर्लेखन
करता है। दवा या अधिक चीनी युक्त पदार्थों का बार-बार सेवन करने से यह प्रणाली
मस्तिष्क को इस उद्दीपन के प्रति उदासीन कर देती है और एक तरह की सहनशीलता उत्पन्न
होती है। इसके चलते वही असर प्राप्त करने के लिए आपको उस चीज़ का ज़्यादा मात्रा में
सेवन करना होता है। इसे लत लगना कहते हैं। यह विवाद का विषय रहा है कि क्या भोजन
की लत लग सकती है।
ऊर्जा के स्रोत के अलावा कई लोगों में खाने की लालसा तनाव, भूख या भोजन के आकर्षक चित्र देखकर पैदा होती है। इस लालसा को रोकने के लिए
हमें अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है। इसमें
निषेध न्यूरॉन्स की प्रमुख भूमिका होती है। ये न्यूरॉन्स निर्णय लेने के साथ-साथ
नियंत्रण तथा संतुष्टि को टालने का काम करते हैं। ये न्यूरॉन्स मस्तिष्क में ब्रेक
की तरह काम करते हैं। चूहों में अध्ययन से पता चला है कि उच्च चीनी युक्त आहार
लेने से निषेध न्यूरॉन्स में बदलाव आ सकता है। ऐसे चूहे अपने व्यवहार को नियंत्रित
करने में और निर्णय लेने में कम सक्षम पाए गए। इससे लगता है हम जो भी खाते हैं वो
इन प्रलोभनों का विरोध करने की हमारी क्षमता को प्रभावित कर सकता है और आहार में
बदलाव करना मुश्किल हो सकता है।
हाल के अध्ययन से मालूम चला है कि जो लोग नियमित रूप से उच्च वसा, उच्च चीनी वाले आहार खाते हैं वे भूख न लगने पर भी खाने की लालसा महसूस करते
हैं। यानी नियमित रूप से उच्च चीनी युक्त खाद्य पदार्थ खाने से लालसा बढ़ती जाती
है।
अध्ययन से पता चला है कि उच्च मात्रा में चीनी आहार लेने वाले चूहों में
याददाश्त की समस्या उत्पन्न हुई। चीनी के कारण हिप्पोकैम्पस में नए न्यूरॉन्स की
कमी पाई गई जो याददाश्त बढ़ाने और उत्तेजना से जुड़े रसायनों में वृद्धि करने के लिए
महत्वपूर्ण हैं।
अब सवाल यह है कि अपने मस्तिष्क को चीनी से कैसे बचाएं? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमें अपने दैनिक कैलोरी सेवन की मात्रा में शक्कर का सेवन केवल 5 प्रतिशत तक सीमित करना चाहिए जो लगभग 25 ग्राम (छह चम्मच) के बराबर है। इसके मद्देनज़र आहार में काफी परिवर्तन की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)
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अपराध विज्ञान में शिनाख्त की एक नई विधि जुड़ने वाली है जो
बाल के विश्लेषण पर टिकी है। पहले भी बालों की मदद से व्यक्ति की पहचान की जाती
रही है लेकिन वह विधि डीएनए के विश्लेषण पर आधारित रही है। उसके लिए ज़रूरी होता है
कि बाल का वह हिस्सा आपके हाथ में आए जिसमें त्वचा का टुकड़ा जुड़ा हो। तथ्य यह है
कि बाल का बाहर निकला हिस्सा तो मृत ऊतक होता है जिसमें डीएनए नहीं होता। नई तकनीक
बालों में उपस्थित प्रोटीन के विश्लेषण पर आधारित है।
यह तो पहले से पता रहा है कि बालों में उपस्थित प्रोटीन की संरचना
व्यक्ति-व्यक्ति में थोड़ी अलग-अलग होती है। प्रोटीन और कुछ नहीं, अमीनो अम्ल से जुड़कर बने पोलीमर होते हैं। अमीनो अम्ल एक खास क्रम में जुड़े
होते हैं और इनका क्रम जेनेटिक कोड में विविधता के कारण अलग-अलग हो सकता है। यानी
प्रोटीन में अमीनो अम्ल के क्रम से व्यक्ति की पहचान संभव है। लेकिन इसमें एक
दिक्कत रही है।
बाल में से प्रोटीन प्राप्त करने की जो विधियां उपलब्ध हैं उनमें बाल को पीसने
और तपाने के कई चरण होते हैं। इस दौरान अधिकांश प्रोटीन नष्ट हो जाता है। बचे-खुचे
प्रोटीन से हमेशा इतनी विविधता को नहीं पकड़ा जा सकता कि शिनाख्त एकदम विश्वसनीय
हो। लेकिन अब नज़ारा बदलने को है।
ज़ेंग ज़ांग के नेतृत्व में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैण्डर्ड्स एंड टेक्नॉलॉजी
के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित कर ली है। जर्नल ऑफ फॉरेंसिक साइन्सेज़
में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि नई तकनीक में पिसाई की ज़रूरत नहीं है, मात्र डिटर्जेंट के घोल में बाल को उबालकर पर्याप्त प्रोटीन मिल जाता है। इसके
बाद मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से प्रोटीन का विश्लेषण करके ज़ांग की टीम ने
कई सारे पेप्टाइड्स (प्रोटीन के छोटे-छोटे खंड) प्राप्त करके उनमें विविधता को
रिकॉर्ड किया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि निकट भविष्य में यह तकनीक अदालतों में पहुंच जाएगी। लेकिन उससे पहले देखना होगा कि दो व्यक्तियों में एक-से प्रोटीन मिलने की संभावना कितने प्रतिशत है। इसके अलावा इस बात की भी जांच करनी होगी कि बालों को डाई करने का प्रोटीन पर क्या असर पड़ता है और उम्र के साथ प्रोटीन की संरचना कैसे बदलती है। कुल मिलाकर, ‘निकट भविष्य’ उतना निकट भी नहीं है। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://assets.newatlas.com/dims4/default/591af89/2147483647/strip/true/crop/749×500+63+0/resize/1160×774!/quality/90/?url=https://assets.newatlas.com/archive/criminals-identify-hair-1.jpg
धान की एक किस्म विकसित की गई है जिसमें ऐसे गुण जोड़ दिए गए
हैं कि वह बचपन के अंधत्व की रोकथाम में मदद करता है। इसे गोल्डन राइस नाम दिया
गया है। गोल्डन राइस का विकास लगभग 20 वर्ष पहले हुआ था और तब से ही यह जेनेटिक
रूप से परिवर्तित फसलों की बहस का केंद्र रहा है। समर्थकों का दावा है कि अंधत्व
निवारण में मदद करके यह मानवता के लिए लाभदायक साबित होगा, वहीं
विरोधियों का मत है कि इसे उगाने में कई खतरे हैं और विकाससील देशों में स्वास्थ्य
सुधार की दृष्टि से यह अनावश्यक है क्योंकि स्वास्थ्य सुधार के लिए अन्य उपाय
अपनाए जा सकते हैं।
अब लग रहा है कि शायद बांग्लादेश गोल्डन धान को उगाने की अनुमति देने वाले
पहला देश बन जाएगा। इंग्लैंड के रॉथमस्टेड रिसर्च स्टेशन के पादप बायोटेक्नॉलॉजी
विशेषज्ञ जोनाथन नेपियर का कहना है कि बांग्लादेश इसे अनुमति देता है, तो स्पष्ट हो जाएगा कि सार्वजनिक पैसे से खेती में बायोटेक्नॉलॉजी का विकास
संभव है। पर्यावरणविद अभी इस तरह की फसलों का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें
लगता है कि ऐसी फसलों को उगाना पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करने जैसा है।
गोल्डन धान का विकास 1990 के दशक में जर्मन वैज्ञानिकों इंगो पॉट्राइकस और पीटर
बेयर ने किया था। उन्होंने इसमें एक ऐसा जीन जोड़ा था जो धान के पौधे में विटामिन ए
की मात्रा बढ़ाएगा। यह जीन उन्होंने मक्का से निकाला था। इस तरह विकसित पौधा
उन्होंने सार्वजनिक कृषि संस्थानों को सौंप दिया था। विटामिन ए की कमी बचपन में
होने वाले अंधत्व का एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा, विटामिन
ए की कमी से बच्चे ज़्यादा बीमार पड़ते हैं। बांग्लादेश जैसे जिन इलाकों में चावल
मुख्य भोजन है,
वहां विटामिन ए की कमी एक प्रमुख समस्या है। बांग्लादेश में
लगभग 21 प्रतिशत बच्चे इससे पीड़ित हैं।
पिछले दो वर्षों में यू.एस., कनाडा, न्यूज़ीलैंड
तथा ऑस्ट्रेलिया गोल्डन चावल के उपभोग की अनुमति दे चुके हैं किंतु इन देशों में
इसे उगाने की कोई योजना फिलहाल नहीं है।
बांग्लादेश में जिस गोल्डन धान को उगाने की बात चल रही है वह वहीं की एक स्थानीय किस्म धान-29 में नया जीन जोड़कर तैयार की गई है। बांग्लादेश के कृषि वैज्ञानिकों का मत है कि इसे उगाने में कोई समस्या नहीं आएगी और गुणवत्ता में भी कोई फर्क नहीं है। बांग्लादेश राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (बी.आर.आर.आई.) ने अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी है और जैव सुरक्षा समिति ने भी इसकी जांच लगभग पूरी कर ली है। लगता है जल्दी ही इसे मंज़ूरी मिल जाएगी। (स्रोत फीचर्स)
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विष्ठा प्रत्यारोपण यानी किसी स्वस्थ व्यक्ति की विष्ठा में
उपस्थित सूक्ष्मजीव किसी ऐसे व्यक्ति की आंतों में प्रविष्ट कराए जाते हैं जो
आंतों में सूक्ष्मजीव संसार के अभाव के कारण रोगग्रस्त है। फिलहाल विष्ठा
प्रत्यारोपण जैसे उपचार का सहारा उन मामलों में लिया जा रहा है जहां कोई व्यक्ति क्लॉस्ट्रिडियम
डिफिसाइल के संक्रमण से त्रस्त हो, जो जानलेवा भी साबित हो
सकता है। अब विष्ठा प्रत्यारोपण को सामान्य रूप से ऐसी तकलीफों के लिए भी आज़माया
जा रहा है जो क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसाइल के कारण उत्पन्न न हुई हों।
पहले किसी स्वस्थ व्यक्ति की विष्ठा में से सूक्ष्मजीवों को पृथक किया जाता है
और फिर इनकी गोली/कैप्सूल बनाकर या एनिमा के माध्यम से रोगी व्यक्ति की आंतों में
पहुंचाया जाता है। इस उपचार के क्लीनिकल परीक्षण के दौरान काफी सावधानी की
आवश्यकता होती है। यह क्लीनिकल परीक्षण मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में किया जा रहा
है। दी न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस
परीक्षण में दो व्यक्ति शामिल थे और दोनों को एक ही व्यक्ति की विष्ठा
प्रत्यारोपित की गई थी। जांच इस बात की हो रही थी कि लीवर के रोग के मामले में
विष्ठा प्रत्यारोपण कितना कारगर हो सकता है।
प्रत्यारोपण के अंतिम चरण के आठ दिन बाद एक 73 वर्षीय मरीज़ को बुखार आ गया और
ठंड लगने लगी। उसकी मानसिक हालत भी बिगड़ गई और पूरे शरीर में ऐसे लक्षण दिखने लगे
जैसे उसका शरीर किसी संक्रमण से लड़ रहा हो। दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके
रक्त में दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया ई. कोली पाया गया।
दूसरा मरीज़ 69 वर्षीय था। वह भी इसी प्रकार की अस्वस्थता का शिकार हुआ और उसके खून में भी दवा-प्रतिरोधी ई. कोली मिला लेकिन उसके संक्रमण को दवाइयों से काबू कर लिया गया। इस क्लीनिकल परीक्षण की सुनवाई करके तय किया जाएगा कि यदि आगे बढ़ना है तो कैसे कदम उठाने होंगे। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQC-sBsA1UlrStv8hvmtsPIK9tuDhsrB_wyQPNkxyeF3zvhzOVd