भोजन में समुद्री घास शामिल करने की ज़रूरत – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

र्यटन वर्तमान में पूरे विश्व में लगभग 37 प्रतिशत जमीन ही कृषि भूमि है। इसका भी सिर्फ एक तिहाई हिस्सा (यानी कुल भूमि का लगभग 11 प्रतिशत) फसलें उगाने में उपयोग होता है। अगले 30 सालों में विश्व की जनसंख्या लगभग 9.7 अरब हो जाएगी और तब खेती के लिए उपलब्ध भूमि और भी कम होगी। इसलिए अब यह ज़रूरी है कि भविष्य के लिए खाद्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए जाए। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक पैदावार को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की ज़रूरत है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी पैदावार बढ़ाएं कैसे।

पौधे सूर्य की रोशनी की ऊर्जा का उपयोग अपनी चयापचय क्रियाओं और भोजन बनाने के लिए करते हैं। पौधों की यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण कहलाती है। किंतु खाद्य उत्पादन की दृष्टि से प्रकाश संश्लेषण की कार्यक्षमता बहुत कम होती है। अधिकतर फसली पौधों में यह क्षमता लगभग 5 प्रतिशत होती है। सबसे अधिक क्षमता (लगभग 8 प्रतिशत) वाली फसल गन्ना है। किंतु गन्ना खाद्य के तौर पर उपयोग में नहीं लिया जाता, सिवाय शक्कर के। काश हम गेहूं, चावल जैसे अनाजों की दक्षता बढ़ा पाते।

अर्बाना स्थित इलिनॉय युनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों का एक समूह इसी तरह की एक योजना, प्रकाश संश्लेषण की उन्नत क्षमता (RIPE), पर काम कर रहा है। इस योजना को बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन वित्तीय सहायता दे रहा है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग

वैज्ञानिकों ने पैदावार बढ़ाने के प्रयास में तम्बाकू के पौधे के तीन जीन के व्यवहार में बदलाव करके एक मॉडल पौधा तैयार किया है। इससे तम्बाकू का उत्पादन 20 प्रतिशत तक बढ़ गया है। वैज्ञानिकों की यह टीम अन्य पौधों में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से बदलाव करने की कोशिश कर रही है। ऐसा ही एक पौधा है कसावा (जिसे टेपिओका, सागो या साबुदाना के नाम से भी जानते हैं)। इस पौधे की जड़ों में भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है। यह लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में लगभग 50 करोड़ लोगों का भोजन है। भारत में आंध्र प्रदेश, केरल और असम के पहाड़ी इलाकों में इसे भोजन के रूप में खाया जाता है। तम्बाकू की तरह, इस पौधे में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से बदलाव किए गए हैं और परिणाम भी सकारात्मक मिले हैं।

उत्पादन बढ़ाने के एक अन्य प्रयास में, वैज्ञानिक पौधे में होने वाले प्रकाशीय श्वसन को कम करने की कोशिश में हैं। प्रकाशीय श्वसन में पौधों द्वारा दिन में प्रकाश क्रिया के दौरान निर्मित रासायनिक ऊर्जा और ऑक्सीजन, रात के समय चलने वाली अंधकार क्रिया के दौरान अनुपयोगी उत्पाद बनाने में खर्च हो जाती है। यदि हम प्रकाशीय श्वसन को कम करने के तरीके ढूंढ पाए तो पैदावार को बढ़ाया जा सकता है।

फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किए जा रहे अधिकतर शोध, पौधों में बाहरी जीन या जीन उत्पाद प्रवेश करवाकर पैदावार बढ़ाने से सम्बंधित है। इन तरीकों से पैदावार बढ़ाने का विरोध वे लोग कर रहे हैं जो पौधों के जीन में बदलाव या बाहरी जीन प्रवेश कराए गए अनाज या खाद्य नहीं खाना चाहते। यह काफी दुविधापूर्ण स्थिति है, जहां एक ओर वैज्ञानिकों को पौधों के जीन में परिवर्तन करके पैदावार बढ़ाने का रास्ता मिला है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सुरक्षा और खाद्यान्नों पर पेटेंट कर एकाधिकार जमाने जैसी चिंताओं के कारण समाज के कुछ लोग इन तरीकों का विरोध कर रहे हैं। इनके बीच का रास्ता खोजना होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो निरंतर बढ़ रही आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति नहीं की जा सकेगी।

समुद्री शैवाल

इस स्थिति में हमें अपनी भोजन-शैली को विस्तार देने और उसमें नई चीज़ें शामिल करने की ज़रूरत है। ज़मीनी पौधों की बजाए सूक्ष्म और बड़ी शैवाल प्रकाश संश्लेषण का बेहतर उपयोग करती हैं। विश्व स्तर पर प्रकाश संश्लेषण में शैवालों का योगदान लगभग 50 प्रतिशत है। इनमें से खास तौर से गहरे हरे, लाल और कत्थई रंग की शैवालों को  खाया जा सकता है। ये शैवाल पोषक तत्वों से लबरेज़ और कम कैलोरी वाले हैं। इन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों, फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन, कोरिया, जापान और अटलांटिक सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में खाया जाता है। इस तरह के भोजन के बारे में नेट पर दी डेफिनेटिव गाइड टू एडिबल सीवीड (foodrepublic.com) साइट पर विस्तार से जानकारी मिल सकती है।

भारत की तटरेखा लगभग 7500 कि.मी. लंबी है। जिसमें गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल तक की तटरेखा लगभग 5200 कि.मी. लंबी है और अंडमान और निकोबार की कुल तटरेखा 2300 कि.मी. है। यहां समुद्री घास की लगभग 844 प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में लगभग 63 प्रतिशत भूमि कृषि-भूमि है लेकिन भारत के इतने बड़े तटीय क्षेत्र को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अधिकतर तटीय क्षेत्रों में समुद्री घास (सीवीड) पाई जाती है। भारत में खाने योग्य सीवीड पर पिछले 40 सालों से शोध हो रहे हैं। गुजरात के भावनगर स्थित दी सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट का कार्य इस क्षेत्र में अग्रणी है। संस्थान के निदेशक डॉ. अमिताव दास बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों से यहां के 20 से अधिक वैज्ञानिक सीवीड की खाद्य संभावना पर शोध और प्रसार की दिशा में कार्य कर रहे हैं। साथ ही वैज्ञानिक सीवीड से पैदावार बढ़ाने वाले रसायन को अलग करने के प्रयास भी कर रहे हैं ताकि अन्य फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सके।

संस्थान के पूर्व प्रोफेसर और वर्तमान में इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल टेक्नॉलॉजी मुम्बई में कार्यरत सी. आर. के. रेड्डी सीवीड को भोजन के रूप में शामिल करने की वकालत करते हैं। उनके अनुसार भरपूर मात्रा में पाए जाने वाले सीवीड में अल्वा, पायरोपिया, पोरफायरा और कैपाफायकस खाने योग्य हैं।  जापान की तरह भारत में भी इन्हें बड़े पैमाने पर उगाया जाना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया के 12 जनवरी 2016 के अंक में डॉ. अरोकियाराज जॉनबॉस्को लिखते हैं कि मन्नार की खाड़ी में पाई जाने वाली 306 प्रजातियों में से 252 खाने योग्य हैं। भारत को उतने ही जोश के साथ समुद्री खेती शुरू करना चाहिए जिस जोश से वह ज़मीनी खेती कर रहा है। और तो और, समुद्री खेती में कीटनाशक, उर्वरक और सिंचाई की ज़रूरत भी नहीं होती।

सीवीड में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, सी और कई खनिज जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम, ज़िंक, सेलेनियम, आयरन होते हैं। साथ ही इनमें काफी मात्रा में वनस्पति प्रोटीन, ओमेगा 3 और 6 फैटी एसिड होते हैं। और सबसे मुख्य बात कि सीवीड वीगन (अतिशाकाहारी) हैं। इनमें मछली की बू तक नहीं है। जिन्हें सीवीड जैसे नए खाद्य भोजन में शामिल करने में झिझक है उन्हें याद दिला दें कि भारत में आलू, चाय और सोयाबीन भी बाहर से आए थे और बहुत जल्द हमारे आहार में शामिल हो गए थे।

प्रोफेसर रेड्डी का सुझाव है कि हम इसकी शुरुआत पिज़्ज़ा सीज़निंग और मसाले की तरह उपयोग से कर सकते हैं ताकि लोग इसके आदी हो जाएं। आखिर जब पूर्वी एशिया में इसे इतनी मात्रा में चाव से खाया जाता है तो दक्षिण एशिया के लोग क्यों नहीं खा सकते। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खेती के लिए सौर फीडर से बिजली – अश्विन गंभीर और शांतनु दीक्षित

भारत में कुल सींचित क्षेत्र में से दो तिहाई भूजल के पंपिंग पर आश्रित है। इसके लिए 2 करोड़ पंप को बिजली से तथा 75 लाख पंप को डीज़ल से ऊर्जा मिलती है। भूजल की उपलब्धता मूलत: विश्वसनीय और किफायती बिजली आपूर्ति पर निर्भर होती है। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि इसका सम्बंध ग्रामीण गरीबों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा से है। कृषि क्षेत्र बिजली का एक प्रमुख उपभोक्ता है। कई राज्यों में कुल बिजली खपत में से एक-चौथाई से लेकर एक-तिहाई तक कृषि में जाती है।

1970 के दशक से कई राज्यों में खेती के लिए बिजली या तो निशुल्क या बहुत कम कीमत पर मिल रही है। अधिकांश कृषि सप्लाई का मीटरिंग नहीं किया जाता। कम कीमत और राजस्व वसूली की खस्ता हालत के चलते कृषि को दी गई बिजली को वितरण कंपनियों के वित्तीय घाटे का प्रमुख कारण माना जाता है। इस घाटे की कुछ भरपाई तो अन्य उपभोक्ताओं (जैसे औद्योगिक व व्यावसायिक) पर अधिक शुल्क लगाकर की जाती है। इसे क्रॉस सबसिडी कहते हैं। शेष घाटे की पूर्ति सरकार द्वारा सीधे सबसिडी देकर की जाती है।

चूंकि कृषि को बिजली सप्लाई की दृष्टि से घाटे का क्षेत्र माना जाता है, इसलिए खेती को अक्सर घटिया गुणवत्ता की सप्लाई मिलती है। इसकी वजह से पंप का बार-बार जलना और बिजली न मिलने जैसे समस्याएं पैदा होती हैं। सप्लाई को बहाल करने में बहुत समय लगता है। इसके अलावा नए कनेक्शन मिलने में काफी समय लगता है। और तो और, सप्लाई अविश्वसनीय होती है और प्राय: देर रात में ही मिल पाती है। इन सब कारणों से किसानों में वितरण कंपनियों को लेकर अविश्वास पनपा है।

अगले 10 वर्षों में खेती में बिजली की मांग दुगनी होने की संभावना है। सप्लाई की लागत बढ़ने के साथ-साथ कृषि सबसिडी की समस्या भी विकराल होती जाएगी। यदि इस मामले में नए विचार नहीं आज़माए गए तो खेती में बिजली सप्लाई की स्थिति बिगड़ती जाएगी। समाधान कुछ भी हो किंतु उसमें सबसे पहले किसानों को दिन के समय पर्याप्त बिजली की विश्वसनीय सप्लाई उचित दरों पर सुनिश्चित करनी होगी। इससे किसानों और वितरण कंपनियों के बीच परस्पर विश्वास बढ़ेगा। यदि ऐसे किसी समाधान को राष्ट्र के स्तर पर कारगर बनाना है तो इसमें सबसिडी की मात्रा भी कम की जानी चाहिए।

इस संदर्भ में तीन ऐसे विकास हुए हैं जो सर्वथा नई उत्साहवर्धक संभावनाएं प्रस्तुत करते हैं। पहला, सौर ऊर्जा से सस्ती दरों पर बिजली की उपलब्धता – चूंकि इसमें र्इंधन की कोई लागत नहीं है इसलिए यह बिजली स्थिर कीमत के अनुबंध के आधार पर अगले 25 वर्षों तक 2.75 से लेकर 3.00 रुपए प्रति युनिट की दर से मिल सकती है। दूसरा, सौर ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि का राष्ट्रीय लक्ष्य पूरा करने के लिए राज्यों को सौर ऊर्जा की खरीद में तेज़ी से वृद्धि करनी होगी। तीसरा और अंतिम, कि भारत में ग्रिड हर गांव में पहुंच चुकी है तथा कृषि फीडर्स को अलग करने का काम भी काफी तेज़ी से आगे बढ़ा है। फीडर पृथक्करण के ज़रिए पंप को मिलने वाली बिजली और गांव को मिलने वाली बिजली को भौतिक रूप से अलग कर दिया जाता है। फीडर पृथक्करण का दो-तिहाई लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।

इन तीन चीज़ों का फायदा उठाते हुए महाराष्ट्र में मुख्य मंत्री सौर कृषि फीडर कार्यक्रम के तत्वाधान में एक नवाचारी कार्यक्रम शुरू किया गया है। सौर कृषि फीडर मूलत: 1-10 मेगावॉट का समुदाय स्तर का सौर फोटो-वोल्टेइक संयंत्र होता है जिसे 33/11 केवी सबस्टेशन से जोड़ा जाता है। एक मेगावॉट क्षमता का सौर संयंत्र 5-5 हॉर्स पॉवर के करीब 350 पंप को संभाल सकता है और इसे लगाने के लिए लगभग 5 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत होती है। संयंत्र को लगाने में कुछ महीने लगते हैं और किसानों को अपने छोर पर कोई परिवर्तन नहीं करने पड़ते। उन्हें इसकी स्थापना और संचालन की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठानी पड़ती। पृथक्कृत कृषि फीडर से जुड़े सारे पंप्स को दिन के समय (सुबह 8 से शाम 6 बजे तक) 8-10 घंटे विश्वसनीय बिजली मिलेगी। जब सौर बिजली का उत्पादन कम होगा तब शेष बिजली वितरण कंपनी से ली जा सकती है। दूसरी ओर, जब पंपिंग की मांग कम है (जैसे बरसात के मौसम में) तब अतिरिक्त बिजली वितरण कंपनी को दी जा सकती है। इसके चलते संयंत्र का यथेष्ट आकार निर्धारित किया जा सकता है। प्रोजेक्ट डेवलपर्स का चयन प्रतिस्पर्धी नीलामी के द्वारा होता है और संयंत्र से बनने वाली सारी बिजली को वितरण कंपनी 25 साल के अनुबंध के ज़रिए खरीद लेगी। इसके एवज में वितरण कंपनी सम्बंधित फीडर से जुड़े किसानों को बिजली देती रहेगी।

किसानों को दिन के समय विश्वसनीय बिजली मिलने के अलावा इस तरीके का एक फायदा यह है कि इसके लिए सरकार की ओर से किसी पूंजीगत सबसिडी की ज़रूरत नहीं होगी। दरअसल यह तरीका लागत-क्षम है और इससे सबसिडी में कमी आएगी। एक फायदा यह भी है कि इसके लिए कोई नई ट्रांसमिशन लाइन डालने की ज़रूरत नहीं है। नई ट्रांसमिशन लाइन डालने का काम कई बड़े पैमाने के पवन व सौर ऊर्जा की निविदाओं के संदर्भ में प्रमुख अवरोध बन गया है। ऐसे सौर फीडर स्थापित करना वर्तमान नियामक व्यवस्था के तहत संभव है और यह बिजली उत्पादन कंपनियों के नवीकरणीय ऊर्जा खरीद दायित्व (आरपीओ) की पात्रता रखता है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस तरीके में स्थानीय युवाओं को संयंत्र के निर्माण, संचालन व रख-रखाव के कार्य में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के रास्ते भी खुलेंगे। इस तरीके के लाभों का प्रदर्शन करने के बाद ऐसे सौर फीडर्स को आपस में जोड़ा सकता है। इससे अनाधिकृत उपयोग/कनेक्शंस कम किए जा सकेंगे, मीटरिंग व शुल्क वसूली को बेहतर बनाया जा सकेगा। ऊर्जा-क्षम पंप तथा पानी की बचत के कार्यक्रम लागू किए जा सकेंगे।

फिलहाल महाराष्ट्र में इस योजना के तहत कुल लगभग 2-3 हज़ार मेगावॉट के सौर संयंत्र निविदा और क्रियांवयन के विभिन्न चरणों में हैं। यह करीब 7.5 लाख पंप यानी महाराष्ट्र के कुल पंप्स में 20 प्रतिशत को सौर बिजली सप्लाई करने के बराबर है। दिसंबर 2018 तक लगभग 10 हज़ार किसानों को इस योजना के तहत दिन के समय विश्वसनीय बिजली सप्लाई मिलने भी लगी है। और तो और, वितरण कंपनी अगले तीन से पांच सालों में इसे 7.5 लाख पंप के शुरुआती लक्ष्य से आगे ले जाने पर विचार कर रही है। राज्य वितरण कंपनी द्वारा बिजली सप्लाई की लागत करीब 5 रुपए प्रति युनिट है (और बढ़ती जा रही है), वहीं सौर बिजली की कीमत अगले 25 वर्षों के लिए 3 रुपए प्रति युनिट पर स्थिर रहेगी। 2 रुपए प्रति युनिट की यह बचत 5 हॉर्स पॉवर के एक पंप के लिए सालाना 10,000 रुपए होती है। किसी फीडर पर 500 पंप हों तो अगले 20 वर्षों में यह बचत 4.5 करोड़ रुपए होगी। भारत सरकार ने इसी तरह की एक योजना राष्ट्रीय स्तर पर भी घोषित की है। कुसुम नामक इस योजना का लक्ष्य 10,000 मेगावॉट है।

देश के हर गांव में बिजली ग्रिड की उपस्थिति तथा साथ में राष्ट्रीय फीडर पृथक्करण कार्यक्रम मिलकर इस लागत-क्षम व आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले इस तरीके को समूचे राष्ट्र में व्यावहारिक बना देते हैं। कृषि क्षेत्र के लिए दिन के समय किफायती व विश्वसनीय बिजली उपलब्ध कराने का लक्ष्य इस तरीके को अनिवार्य बना देता है। यह किसान, सरकार व वितरण कंपनियों तीनों के लिए लाभ का सौदा है और यह बिजली क्षेत्र के लिए किसान-केंद्रित रास्ता खोलता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उजड़े वनों में हरियाली लौट सकती है – भारत डोगरा

मारे देश में बहुत से वन बुरी तरह उजड़ चुके हैं। बहुतसा भूमि क्षेत्र ऐसा है जो कहने को तो वनभूमि के रूप में वर्गीकृत है, पर वहां वन नाम मात्र को ही है। यह एक चुनौती है कि इसे हराभरा वन क्षेत्र कैसे बनाया जाए। दूसरी चुनौती यह है कि ऐसे वन क्षेत्र के पास रहने वाले गांववासियों, विशेषकर आदिवासियों, की आर्थिक स्थिति को टिकाऊ तौर पर सुधारना है। इन दोनों चुनौतियों को एकदूसरे से जोड़कर विकास कार्यक्रम बनाए जाएं तो बड़ी सफलता मिल सकती है।

ऐसी किसी परियोजना का मूल आधार यह सोच है कि क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों को हराभरा करने का काम स्थानीय वनवासियोंआदिवासियों के सहयोग से ही हो सकता है। सहयोग को प्राप्त करने का सबसे सार्थक उपाय यह है कि आदिवासियों को ऐसे वन क्षेत्र से दीर्घकालीन स्तर पर लघु वनोपज प्राप्त हो। वनवासी उजड़ रहे वन को नया जीवन देने की भूमिका निभाएं और इस हरेभरे हो रहे वन से ही उनकी टिकाऊ आजीविका सुनिश्चित हो।

आदिवासियों को टिकाऊ आजीविका का सबसे पुख्ता आधार वनों में ही मिल सकता है क्योंकि वनों का आदिवासियों से सदा बहुत नज़दीकी का रिश्ता रहा है। कृषि भूमि पर उनकी हकदारी व भूमिसुधार सुनिश्चित करना ज़रूरी है, पर वनों का उनके जीवन व आजीविका में विशेष महत्व है।

प्रस्तावित कार्यक्रम का भी व्यावहारिक रूप यही है कि किसी निर्धारित वन क्षेत्र में पत्थरों की घेराबंदी करने के लिए व उसमें वन व मिट्टी संरक्षण कार्य के लिए आदिवासियों को मज़दूरी दी जाएगी। साथ ही वे रक्षानिगरानी के लिए अपना सहयोग भी उपलब्ध करवाएंगे। जल संरक्षण व वाटर हारवेस्टिंग से नमी बढ़ेगी व हरियाली भी। साथसाथ कुछ नए पौधों से तो शीघ्र आय मिलेगी पर कई वृक्षों से लघु वनोपज वर्षों बाद ही मिल पाएगी।

अत: यह बहुत ज़रूरी है कि आदिवासियों के वन अधिकारों को मज़बूत कानूनी आधार दिया जाए। अन्यथा वे मेहनत कर पेड़ लगाएंगे और फल कोई और खाएगा या बेचेगा। आदिवासी समुदाय के लोग इतनी बार ठगे गए हैं कि अब उन्हें आसानी से विश्वास नहीं होता है। अत: उन्हें लघु वन उपज प्राप्त करने के पूर्ण अधिकार दिए जाएं। ये अधिकार अगली पीढ़ी को विरासत में भी मिलने चाहिए। जब तक वे वन की रक्षा करेंे तब तक उनके ये अधिकार जारी रहने चाहिए। जब तक पेड़ बड़े नहीं हो जाते व उनमें पर्याप्त लघु वनोपज प्राप्त नहीं होने लगती, तब तक विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती रहनी चाहिए ताकि वे वनों की रक्षा का कार्य अभावग्रस्त हुए बिना कर सकें।

प्रोजेक्ट की सफलता के लिए स्थानीय व परंपरागत पेड़पौधों की उन किस्मों को महत्व देना ज़रूरी है जिनसे आदिवासी समुदाय को महुआ, गोंद, आंवला, चिरौंजी, शहद जैसी लघु वनोपज मिलती रही है। औषधि पौधों से अच्छी आय प्राप्त हो सकती है। ऐसी परियोजना की एक अन्य व्यापक संभावना रोज़गार गारंटी के संदर्भ में है। एक मुख्य मुद्दा यह है कि रोज़गार गारंटी योजना केवल अल्पकालीन मज़दूरी देने तक सीमित न रहे अपितु यह गांवों में टिकाऊ विकास व आजीविका का आधार तैयार करे। प्रस्तावित टिकाऊ रोज़गार कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत कई सार्थक प्रयास संभव हैं। (स्रोत फीचर्स)

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दाल की खाली होती कटोरी – भारत डोगरा

भारत में सदियों से दालें जनसाधारण के लिए प्रोटीन का सबसे सामान्य व महत्त्वपूर्ण रुाोत रही हैं। अत: यह गहरी चिंता का विषय है कि दाल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में बहुत गिरावट आई है। इस स्थिति को तालिका से समझा जा सकता है।

भारत में प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता
वर्ष मात्रा (ग्राम में)
1951 60.7
1961 69.0
1971 51.2
1981 37.5
1991 41.6
2001 30.0
2003 29.1
2007 35.5
2011 43.0
2016 43.6
रुाोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18

तालिका से स्पष्ट है कि वर्ष 1961 में हमारे देश में प्रति व्यक्ति 70 ग्राम दाल उपलब्ध थी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 80 ग्राम के सुझाव के बहुत पास थी। पर इसके बाद इसमें तेज़ी से गिरावट आई व एक समय यह उपलब्धता 29 ग्राम तक गिर गई। इसके बाद इसमें कुछ वृद्धि तो लाई गई पर यह वृद्धि काफी हद तक दाल के आयात द्वारा प्राप्त की गई जिसका हिस्सा कुछ वर्षों तक 14 प्रतिशत के आसपास रहा।

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वर्ष 1966 के बाद जो हरित क्रांति आई उसमें दलहन की उपेक्षा हुई व विशेषकर मिश्रित फसल में दलहन को उगाने की उपेक्षा भी हुई। पंजाब में तो इसके बाद के 16 वर्षों में दलहन का क्षेत्रफल कुल कृषि क्षेत्रफल में 13 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत रह गया।

इसके बाद आयात से दलहन उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास हुए। आयात की गई बहुत सी दालों पर खतरनाक रसायनों, विशेषकर ग्लायफोसेट का छिड़काव होता रहा है।

दलहन की फसलों को अधिक उगाने से मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन बनाए रखने में मदद मिलती है क्योंकि इनकी जड़ें वायुमंडल से स्वयं नाइट्रोजन ग्रहण कर धरती को दे सकती हैं।

अत: देश में दलहन का उत्पादन बढ़ाने पर व इसकी मिश्रित खेती बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमारे देश की धरती अनेक तरह की दालों के लिए उपयुक्त है व हमारे किसानों के पास दलहन के उत्पादन का समृद्ध परंपरागत ज्ञान है। उन्हें सरकार की ओर से अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए।(स्रोत फीचर्स)

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खरपतवारनाशी – सुरक्षित या हानिकारक

ग्लायफोसेट, दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला खरपतवारनाशी यानी हर्बीसाइड है। ऐसा बताया गया था कि यह जंतुओं के लिए हानिकारक नहीं है। लेकिन शायद यह मधुमक्खियों के लिए घातक साबित हो रहा है। यह रसायन मधुमक्खियों के पाचन तंत्र में सूक्ष्मजीव संसार को तहस-नहस करता है, जिसके चलते वे संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। इस खोज के बाद दुनिया में मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट की आशंका और भी प्रबल हो गई है।

ग्लायफोसेट कई महत्वपूर्ण एमिनो अम्लों को बनाने वाले एंज़ाइम की क्रिया को रोककर पौधों को मारता है। जंतु तो इस एंज़ाइम का उत्पादन नहीं करते हैं, लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा अवश्य किया जाता है।

टेक्सास विश्वविद्यालय की एक जीव विज्ञानी नैंसी मोरन ने अपने सहकर्मियों के साथ एक छत्ते से लगभग 2000 मधुमक्खियां लीं। कुछ को चीनी का शरबत दिया और अन्य को चीनी के शरबत में मिलाकर ग्लायफोसेट की खुराक दी गई। ग्लायफोसेट की मात्रा उतनी ही थी जितनी उन्हें पर्यावरण से मिल रही होगी। तीन दिन बाद देखा गया कि ग्लायफोसेट का सेवन करने वाली मधुमक्खियों की आंत में स्नोडग्रेसेला एल्वी नामक बैक्टीरिया की संख्या कम थी। लेकिन कुछ परिणाम भ्रामक थे। ग्लायफोसेट का कम सेवन करने वाली मक्खियों की तुलना में जिन मधुमक्खियों ने अधिक का सेवन किया था उनमें 3 दिन के बाद अधिक सामान्य दिखने वाले सूक्ष्मजीव संसार पाए गए। शोधकर्ताओं को लगता है कि शायद बहुत उच्च खुराक वाली अधिकांश मधुमक्खियों की मृत्यु हो गई होगी और केवल वही बची रहीं जिनके पास इस समस्या से निपटने के तरीके मौजूद थे।

मधुमक्खी में सूक्ष्मजीव संसार में परिवर्तन घातक संक्रमण से बचाव की उनकी प्रक्रिया को कमजोर बनाते हैं। परीक्षणों में ग्लायफोसेट का सेवन करने वाली केवल 12 प्रतिशत मधुमक्खियां ही सेराटिया मार्सेसेंस के संक्रमण से बच सकीं। सेराटिया मार्सेसेंस मधुमक्खियों के छत्तों में पाए जाने वाले आम जीवाणु हैं। दूसरी ओर, ग्यालफोसेट से मुक्त 47 प्रतिशत मधुमक्खियां ऐसे संक्रमण से सुरक्षित रहीं।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ जर्नल में प्रकाशित इस शोध ने मधुमक्खियों की तादाद में कमी के लिए एक संभावित कारण और जोड़ दिया है।

यह खोज मानव तथा जंतुओं पर ग्लायफोसेट के प्रभाव पर भी सवाल उठाती है। क्योंकि मानव आंत और मधुमक्खी की आंत में सूक्ष्म जीवाणुओं की भूमिका में कई समानताएं हैं। इस खोज ने विवादास्पद खरपतवारनाशी को दोबारा से शोध का विषय बना दिया है।(स्रोत फीचर्स)

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आनुवंशिक इंजिनियरिंग द्वारा खरपतवार का इलाज – डॉ. अरविंद गुप्ते

हमारी अधिकांश खाद्यान्न फसलें घास कुल की सदस्य होती हैं। ज्वार, चावल, गेहूं आदि फसलों में अनचाहे पौधे (खरपतवार) निकल आते हैं तथा वे फसलों से पोषण के लिए प्रतिस्पर्धा करके उनके पोषण में कमी लाकर फसल को कमज़ोर कर देते हैं। इस समस्या का हल इस प्रकार खोजा गया कि फसल के पौधों में खरपतवारनाशक के लिए प्रतिरोध पैदा करने वाला जीन प्रविष्ट करा दिया जाता है। इस जीन के कारण खरपतवारनाशक का छिड़काव करने पर खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और फसल के पौधों पर असर नहीं होता।

समस्या तब आ जाती है जब फसल के और खरपतवार के पौधे एक ही कुल के हों और वे आपस में प्रजनन कर लें। इस प्रकार बनने वाले संकर पौधों में फसल के पौधों से वह जीन आ सकता है जो नाशक रसायन के लिए प्रतिरोध पैदा करता है। ऐसे संकर खरपतवारों पर नाशक का असर नहीं होता।

चीन के फुदान विश्वविद्यालय के लु बरॉन्ग ने इस समस्या का हल खोजने का दावा किया है। ट्रांसजेनिक रिसर्च नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में उन्होंने इसका विवरण दिया है। जंगली घास के पौधों में च्ण्4 नामक एक जीन होता है जिसके कारण इन पौधों के बीज परिपक्व होने पर अपने आप बिखर जाते हैं। फसलों की किस्मों का चयन करके मनुष्य ने ऐसे पौधे बना लिए हैं जिनमें यह जीन कमज़ोर हो जाता है या बिल्कुल काम नहीं करता क्योंकि किसान चाहता है कि उसकी फसल के दाने अपने आप न बिखर जाएं ताकि वह उनके परिपक्व होने पर उन्हें सहेज ले। डॉ. लु के अनुसार फसल के पौधों में Sh4 को निष्क्रिय करने वाला जीन भी जोड़ दिया जाए तो इस बात का खतरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है कि पकने पर भी फसल के दाने बिखर जाएं। इसका परिणाम और भी बेहतर होता है और ऐसी रूपांतरित फसल का उत्पादन मूल फसल से किसी भी प्रकार उन्नीस नहीं होता। यदि कोई खरपतवार ऐसे फसली पौधे के साथ प्रजनन कर ले (जिसमें यह Sh4 को निष्क्रिय करने वाला जीन जोड़ दिया गया है) तो यह जीन संकरों में प्रवेश कर जाएगा और फिर संकरों के बीज पकने पर बिखर नहीं सकेंगे। इन संकरों को फसल के साथ काट लिया जाएगा और उन्हें निकालकर फेंक देना आसान हो जाएगा। इस प्रकार खरपतवार कालांतर में समाप्त हो जाएंगे।

अपनी परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए डॉ. लु और उनके दल ने चावल की एक खरपतवार का प्रजनन चावल की फसल के पौधों के साथ करवाया। फिर उन्होंने इस प्रकार बने संकर खरपतवारों का आपस में प्रजनन करवाया। यह देखा गया कि इन संकरित खरपतवारों में Sh4 बहुत कमज़ोर हो गया था।

एक बहुत लंबी अवधि के बाद जब सब खरपतवार इस प्रकार नष्ट हो जाएंगे तब खरपतवारनाशक रसायनों की आवश्यकता नहीं रहेगी। किंतु डॉ. लु ने फौरी उपाय की एक योजना भी बनाई है। उनका विचार है कि यदि खरपतवारनाशक से सुरक्षा करने वाले जीन और Sh4 को निष्क्रिय करने वाले जीन दोनों को एक ही गुणसूत्र पर पासपास रख दिया जाए तो कोई खरपतवार फसली पौधे से खरपतवारनाशक को निष्प्रभावी करने वाला जीन ले भी ले तो उसे इसके साथ Sh4 को निष्क्रिय करने वाला जीन अपने आप मिल जाएगा और उसके बीज अपने आप बिखर नहीं सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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औद्योगिक कृषि से वन विनाश

विश्व स्तर पर जंगली क्षेत्र में हो रही लगातार कमी का मुख्य कारण औद्योगिक कृषि को बताया जा रहा है। प्रति वर्ष 50 लाख हैक्टर क्षेत्र औद्योगिक कृषि के लिए परिवर्तित हो रहा है। बड़ीबड़ी कंपनियों द्वारा वनों की कटाई ना करने की प्रतिज्ञा के बावजूद, ताड़ एवं अन्य फसलें उगाई जा रही हैं जिसके चलते पिछले 15 वर्षों में जंगली क्षेत्र का सफाया होने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आई है।

इस विश्लेषण से यह तो साफ है कि केवल कॉर्पोरेट वचन से जंगलों को नहीं बचाया जा सकता है। 2013 में, मैरीलैंड विश्वविद्यालय, कॉलेज पार्क में रिमोट सेंसिंग विशेषज्ञ मैथ्यू हैन्सन और उनके समूह ने उपग्रह तस्वीरों से 2000 और 2012 के बीच वन परिवर्तन के मानचित्र प्रकाशित किए थे। लेकिन इन नक्शों से वनों की कटाई और स्थायी हानि की कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल पाई थी।

एक नए प्रकार के विश्लेषण के लिए सस्टेनेबिलिटी कंसॉर्शियम के साथ काम कर रहे भूस्थानिक विश्लेषक फिलिप कर्टिस ने उपग्रह तस्वीरों की मदद से जंगलों को नुकसान पहुंचाने वाले पांच कारणों को पहचानने के लिए एक कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया है। ये कारण हैं जंगलों की आग (दावानल), प्लांटेशन की कटाई, बड़े पैमाने पर खेती, छोटे पैमाने पर खेती और शहरीकरण। सॉफ्टवेयर को इनके बीच भेद करना सिखाने के लिए कर्टिस ने ज्ञात कारणों से जंगलों की कटाई वाली हज़ारों तस्वीरों का अध्ययन किया।

यह प्रोग्राम तस्वीर के गणितीय गुणों के आधार पर छोटेछोटे क्षेत्रों में अनियमित खेती और विशाल औद्योगिक कृषि के बीच भेद करता है। साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2001 से लेकर 2015 के बीच कुल क्षति का लगभग 27 प्रतिशत बड़े पैमाने पर खेती और पशुपालन के कारण था। इस तरह की खेती में ताड़ की खेती शामिल है जिसका तेल अधिकतर जैव र्इंधन एवं भोजन, सौंदर्य प्रसाधन, और अन्य उत्पादों में एक प्रमुख घटक के तौर पर उपयोग किया जाता है। इन प्लांटेशन्स के लिए जंगली क्षेत्र हमेशा के लिए साफ हो गए जबकि छोटे पैमाने पर खेती के लिए साफ किए गए क्षेत्रों में जंगल वापस बहाल हो गए।

कमोडिटी संचालित खेती से वनों की कटाई 2001 से 2015 के बीच स्थिर रही। लेकिन हर क्षेत्र में भिन्न रुझान देखने को मिले। ब्राज़ील में 2004 से 2009 के बीच वनों की कटाई की दर आधी हो गई। मुख्य रूप से इसके कारण पर्यावरण कानूनों को लागू किया जाना और सोयाबीन के खरीदारों का दबाव रहे। लेकिन मलेशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में, वनों की कटाई के खिलाफ कानूनों की कमी या लागू करने में कोताही के कारण ताड़ बागानों के लिए अधिक से अधिक जंगल काटा जाता रहा। इसी कारण निर्वनीकरण ब्राज़ील में तो कम हुआ लेकिन दक्षिण पूर्व एशिया में काफी बढ़ोतरी देखी गई।

कई कंपनियों ने हाल ही में वचन दिया है कि वे निर्वनीकरण के ज़रिए पैदा किया गया ताड़ का तेल व अन्य वस्तुएं नहीं खरीदेंगे। लेकिन अब तक ली गई 473 प्रतिज्ञाओं में से केवल 155 ने वास्तव में 2020 तक अपनी आपूर्ति के लिए वनों की शून्य कटाई के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। इसमें भी केवल 49 कंपनियों ने अच्छी प्रगति की सूचना दी है।

विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, मैडिसन की भूगोलविद लिसा रॉश के अनुसार कंपनियों के लिए शून्यकटाई वाले सप्लायर्स को ढूंढना भी एक चुनौती हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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