पंजीकरण करना, फॉर्म भरना,
ई-मेल अकांउट खोलना
या अनुदान के लिए आवेदन करना, ये काम अधिकांश लोगों के लिए आसान हो सकते
हैं, लेकिन कुछ लोगों के लिए नहीं।
इंडोनेशियाई लोगों की तरह दुनिया के कई
समुदाय के लोगों का सिर्फ नाम होता है, उपनाम नहीं। लेकिन वेबसाइट के माध्यम से
कोई भी फॉर्म भरते वक्त या आवेदन करते वक्त आवेदक के लिए उपनाम भरना ज़रूरी रखा
जाता है, जब तक उपनाम ना लिखो तब तक फॉर्म सबमिट नहीं किया जाता। इन
हालात में, फॉर्म में उपनाम की खानापूर्ति के लिए कई लोग दोबारा अपना
नाम, ‘NA’
(लागू नहीं), ‘NULL’ (निरंक) या ऐसा ही कोई शब्द भर देते हैं।
अनुसंधान अनुदान पाने के लिए, फेलोशिप
आवेदन के समय, स्नातक कार्यक्रमों में दाखिले के वक्त या किसी शोधपत्र के
प्रकाशन में कई वैज्ञानिकों को भी इन्हीं स्थितियों का सामना करना पड़ता है। फार्म
भरे जाने के बाद वैज्ञानिकों को संस्थानों और पत्रिका के संपादकों को ई-मेल लिखकर
अपने नाम-उपनाम की इस स्थिति को स्पष्ट करना पड़ता है। लेकिन कभी वे स्पष्ट करना भूल
जाते हैं तो उन्हें भेजे पत्र में उपनाम की जगह भी उनका नाम ही लिख दिया जाता है
या ‘Dear NULL’ या ‘Dear NA’ से सम्बोधित किया जाता है। वह भी तब जब इन वैज्ञानिकों का आवेदन स्पैम मानकर
डैटाबेस से विलोपित न कर दिया जाए।
इस मुश्किल की वजह से कई इंडोनेशियाई वैज्ञानिकों
के कुछ ही शोधपत्र अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो पाए हैं या वे कुछ ही
सम्मेलनों में शामिल हो पाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय अब तक इस मुद्दे से पूरी
तरह से वाकिफ नहीं है। यह समस्या सिर्फ इंडोनेशियाई वैज्ञानिकों के साथ नहीं है
बल्कि एशिया के कई वैज्ञानिक भी ऐसी मुश्किलों का सामना करते हैं। जैसे दक्षिण
भारतीय लोग उपनाम के विकल्प के रूप में पिता का नाम लगाते हैं; जापानी, कोरियाई
और चीनी वैज्ञानिकों का नाम नामुनासिब तरीके से छोटा कर दिया जाता है, जो
भ्रम पैदा करता है।
इन अजीबो-गरीब सम्बोधनों से बचने के लिए कई
इंडोनेशियाई वैज्ञानिक अपना पारिवारिक नाम (उपनाम) तय करने को मजबूर हो जाते हैं
या कई एशियाई वैज्ञानिक पश्चिमी नामों को अपना लेते हैं। या ई-मेल अकाउंट खोलने
जैसे कामों में परिवार के किसी सदस्य का नाम इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन इस तरह वैज्ञानिकों
के लिए सही नाम के साथ अपना वैज्ञानिक रिकॉर्ड बनाना मुश्किल है। लोग नकली उपनामों
को असली मानकर दस्तावेज़ या प्रमाण पत्र में लिख देते हैं। जब तक वैज्ञानिक स्थिति
स्पष्ट करते हैं तब तक दस्तावेज़ों पर वह नाम छप चुका होता है और उन्हें गलत नाम
वाले दस्तावेज़ स्वीकार करने पड़ते हैं। जैसे-जैसे डिजिटल दुनिया हावी हो रही है और
लिंक्डइन और रिसर्चगेट जैसी ऑनलाइन सेवाएं शक्तिशाली हो रही हैं, एकल
नाम वाले वैज्ञानिक दौड़ में पिछड़ते जा रहे हैं।
अब ज़रूरत है कि विज्ञान संस्कृति संवेदी बने। लेखकों की पहचान के लिए नाम की बजाय ORCID (ओपन रिसर्चर एंड कॉन्ट्रीब्यूटर) कोड जैसी विशिष्ट पहचान प्रणाली हो; पुष्टिकरण ई-मेल में सरनेम का आग्रह न हो; और अकादमिक जगहों पर उपनाम देना अनिवार्य ना हो।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw800/magazine-assets/d41586-020-02761-z/d41586-020-02761-z_18416114.jpg
जलवायु परिवर्तन के साथ पेड़-पौधे और जीव-जंतु अपने इलाकों, प्रजनन
के मौसम या अन्य तौर-तरीकों में बदलाव करके खुद को इस परिवर्तन के अनुकूल कर रहे
हैं। अब ऐसा ही अनुकूलन फूलों में भी दिखा है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित
अध्ययन के अनुसार पिछले 75 वर्षों में बढ़ते तापमान और ओज़ोन ह्रास के साथ फूलों की
पंखुड़ियों के अल्ट्रावायलेट (यूवी) रंजकों में बदलाव आया है।
पंखुड़ियों पर यूवी किरणें सोखने वाले रंजक
मौजूद होते हैं, जो हमें तो नज़र नहीं आते लेकिन परागणकर्ताओं को आकर्षित
करते हैं और पौधों के लिए एक तरह से सनस्क्रीन का काम भी करते हैं। मनुष्यों की
तरह यूवी विकिरण फूलों के पराग के लिए भी हानिकारक होते हैं। पंखुड़ियों पर जितने
अधिक यूवी-अवशोषक रंजक होंगे, संवेदनशील कोशिकाओं तक यूवी किरणें उतनी कम
पहुंचेंगी।
क्लेम्सन युनिवर्सिटी के पादप
पारिस्थितिकीविद मैथ्यू कोस्की ने अपने पूर्व अध्ययन में पाया था कि जिन फूलों ने
यूवी विकिरण का सामना अधिक किया, उनमें यूवी-रंजक भी अधिक थे। ऐसा प्राय:
अधिक ऊंचाई या भूमध्य रेखा के निकट उगने वाले पौधों में होता है।
कोस्की जानना चाहते थे कि मानव गतिविधि की
वजह से ओज़ोन परत में हुई क्षति और बढ़ता तापमान क्या फूलों के यूवी-रंजकों को
प्रभावित करते हैं। यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने उत्तरी अमेरिका, युरोप
और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली 42 अलग-अलग प्रजातियों के 1238 फूलों के वर्ष
1941 के संग्रह का अध्ययन किया। फिर विभिन्न समय पर एकत्रित किए गए इन्हीं
प्रजातियों के फूलों की पंखुड़ियों की यूवी-संवेदी कैमरे से तस्वीरें खींची। इस तरह
उन्होंने पंखुड़ियों में यूवी-रंजकों में आए बदलावों को देखा। इन बदलाव का मिलान
स्थानीय ओज़ोन स्तर और तापमान में बदलाव के डैटा के साथ किया।
पाया गया कि सभी स्थानों पर 1941-2017 के
बीच अल्ट्रावायलेट रंजकों में प्रति वर्ष औसतन 2 प्रतिशत वृद्धि हुई है। लेकिन
भिन्न-भिन्न बनावट के फूलों के यूवी-रंजकों में परिवर्तन में भिन्नता थी। मसलन, तश्तरी
आकार के बटरकप जैसे फूलों (जिनका पराग उजागर रहता है) में,जिन इलाकों में ओज़ोन में कमी हुई थी वहां
उनके यूवी-अवशोषक रंजकों में वृद्धि हुई और जिन स्थानों पर ओज़ोन में वृद्धि हुई थी
वहां ऐसे रंजकों में कमी आई। दूसरी ओर, कॉमन ब्लेडरवर्ट जैसे फूलों (जिनका पराग
उनकी पंखुड़ियों में छिपा होता है) में तापमान बढ़ने से यूवी-रंजकों में कमी आई, चाहे
फिर उस स्थान का ओज़ोन स्तर बढ़ा हो या कम हुआ हो।
पंखुड़ियों के भीतर छिपा पराग नैसर्गिक रूप
से यूवी विकिरण से सुरक्षित होता है। ऐसी स्थिति में पंखुड़ियों में मौजूद
यूवी-रंजकों की अतिरिक्त सुरक्षा ग्रीनहाउस की तरह कार्य करती है और गर्मी बढ़ाती
है। इसलिए जब फूल उच्च तापमान का सामना करते हैं तो पराग के झुलसने की संभावना
होती है। यदि पंखुड़ियों में कम यूवी-रंजक हों तो कम विकिरण अवशोषित होगा और ताप भी
कम रहेगा।
लेकिन यही यूवी-रंजक हमिंगबर्ड और मधुमक्खियों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित भी करते हैं। अधिकांश परागणकर्ता उन फूलों पर बैठना पसंद करते हैं जिनकी पंखुड़ियों के किनारों पर यूवी-अवशोषक रंजक कम और बीच में अधिक हो। लेकिन यदि यूवी-अवशोषक रंजक बढ़े तो यह अंतर मिट जाएगा, नतीजतन परागणकर्ता ऐसे फूलों पर नहीं आएंगे। ये बदलाव पराग को तो सुरक्षित कर देंगे लेकिन परागणकर्ता दूर हो जाएंगे।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://thumbs-prod.si-cdn.com/tZYxg9LHYstecGHpqrqkWL83ljo=/fit-in/1600×0/https://public-media.si-cdn.com/filer/51/29/51299669-2c4c-41d2-8cb7-f0ed44b88795/bees-18192_1920.jpg
इन दिनों युरोपीय संघ पृथ्वी का ‘डिजिटल जुड़वां’ तैयार करने
की योजना पर काम कर रहा है। पृथ्वी के इस डिजिटल मॉडल की मदद से वायुमंडल, महासागर, बर्फ
और धरती की सटीक अनुकृति बनाकर बाढ़, सूखा या जंगलों की आग जैसी आपदाओं का समय
रहते पता लगाया जा सकेगा। डेस्टिनेशन अर्थ नामक इस प्रयास में मानव व्यवहार का भी
विश्लेषण किया जाएगा ताकि जलवायु सम्बंधी नीतियों के समाज पर असर का आकलन किया जा
सके। इस परियोजना के बारे में जल्दी विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाएगा और अगले
साल तीन सुपरकंप्यूटर की मदद से फिनलैंड, इटली और स्पेन में शुरू किया जाएगा।
डेस्टिनेशन अर्थ वास्तव में युरोपियन सेंटर
फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) के एक अनुसंधान कार्यक्रम ‘एक्स्ट्रीम अर्थ’ के रद्द होने
के बाद शुरू हुआ था। गौरतलब है कि युरोपीय संघ ने इस प्रमुख कार्यक्रम को रद्द तो
किया लेकिन इस विचार में रुचि बनाए रखी। इस बीच युरोप ने हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग
में 8 अरब युरो का निवेश किया और ऐसी मशीनों का निर्माण किया जो प्रति सेकंड एक
अरब-अरब गणनाएं करने में सक्षम हैं।
वर्तमान में उपयोग किए जाने वाले सबसे
सक्षम जलवायु मॉडल 9 किलोमीटर के विभेदन पर काम करते हैं। नया मॉडल केवल 1
किलोमीटर विभेदन पर काम कर सकता है। इसलिए इस मॉडल में एक स्थान के आंकड़ों के आधार
पर बड़े क्षेत्र के लिए एल्गोरिदम की मदद से अनुमान पर निर्भर नहीं रहना होगा। इसकी
बजाय यह ऊष्मा के वास्तविक संवहन के आंकड़ों पर काम करेगा जो बादलों और तूफानों के
निर्माण में महत्वपूर्ण होते हैं। इसके अलवा यह मॉडल बहुत बारीकी से महासागरों में
बनने वाले भंवरों का विश्लेषण कर सकता है जो गर्मी और कार्बन का परिवहन करते हैं।
जापान में 1 किलोमीटर के जलवायु मॉडल से तूफानों और भंवरों को सिमुलेट करके
अल्पकालिक बारिश का पता लगाया जाता है, जो वर्तमान मॉडलों से संभव नहीं था।
डेस्टिनेशन अर्थ में विस्तृत डैटा के आधार
पर पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं। इसके साथ ही मौसम और जलवायु से जुड़ी अन्य घटनाओं, जैसे
वातावरण में प्रदूषण, फसलों की वृद्धि, जंगलों की आग आदि का पता लगाया जा सकता है।
इन सभी जानकारियों से नीति निर्माताओं को यह अंदाज़ लग सकता है कि भविष्य में
जलवायु परिवर्तन किस तरह से मानव समाज को प्रभावित करेगा।
फिर भी सटीक अनुमान लगाना इतना आसान नहीं
होगा। इस मॉडल के सुपरकंप्यूटर पारंपरिक कंप्यूटर चिप्स के साथ-साथ ग्राफिकल
प्रोसेसिंग युनिट्स (जीपीयू) का उपयोग करते हैं जो जटिल गणना करने में सक्षम हैं।
जीपीयू मॉडल के घटकों को चलाने के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धि के एल्गोरिदम भी विकसित
करते जाते हैं। ऐसे में पुराने जलवायु मॉडलों के साथ इसका तालमेल बैठा पाना थोड़ा
मुश्किल होगा। इसके साथ ही इस मॉडल से प्राप्त होने वाला डैटा भी एक बड़ी समस्या
होगी। जापानी टीम ने प्रयोग के लिए 1 किलोमीटर मॉडल को चलाया था तब उनको डैटा से
लाभदायक जानकारी हासिल करने में लगभग छ: माह का समय लग गया था।
इस मॉडल को और अधिक विकसित करने की आवश्यकता है। उम्मीद है कि इस मॉडल की मदद से भविष्य में लंबे समय के पूर्वानुमान न सही, कुछ हफ्तों और महीनों के पूर्वानुमान लगा पाना संभव होगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/ca_1002NID_Globe_online_0.jpg?itok=k7T2b6HT
गुज़रे दिनों मानव गतिविधियों पर लगी पाबंदी से जीव-जंतुओं की
हलचल बढ़ने की खबरें मिली हैं। शहरों में छाई अचानक शांति में लोगों ने गौर किया कि
गोरैया पक्षी कितनी तेज़ आवाज़ निकालते हैं। जबकि साइंस पत्रिका में प्रकाशित
अध्ययन में पाया गया कि वास्तव में उनके गीतों की आवाज़ मंद पड़ी थी। गोरैयों ने
बैंडविड्थ बढ़ाकर अपने गीतों में नीचे सुरों को शामिल किया था, जो
शोधकर्ताओं के मुताबिक मादाओं को ज़्यादा लुभाते हैं।
दरअसल टेनेसी विश्वविद्यालय की जंतु
संप्रेषण विज्ञानी एलिज़ाबेथ डेरीबेरी काफी समय से सफेद मुकुट वाली नर गोरैया (ज़ोनोट्रीकिया
ल्यूकोफ्रिस) के गीतों का अध्ययन करती रही हैं। उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के
आसपास के शोर भरे शहरी वातावरण में रहने वाली गोरैया और शांत ग्रामीण वातावरण में
रहने वाली गोरैया के गीतों की तुलना की थी। (मादा गोरैया शायद ही कभी गाती हों)।
उन्होंने पाया था कि ग्रामीण इलाकों की गोरैया की तुलना में शहरी गोरैया ऊंची आवाज़
में और उच्च आवृत्ति पर गाती हैं। शायद इसलिए कि यातायात और मानव जनित शोर के बीच
साथियों तक उनकी आवाज़ पहुंच सके।
तालाबंदी के दौरान शहरों के शोर में आई कमी
के कारण गोरैया के गीतों पर पड़े प्रभावों को जानने के लिए डेरीबेरी और उनके
साथियों ने उन्हीं स्थानों पर गोरैया के गीतों का अध्ययन किया। तुलना के लिए पहले
की रिकॉर्डिंग थी ही।
चूंकि डेरीबेरी सैन फ्रांसिस्को में नहीं
थीं इसलिए उनकी साथी जेनिफर फिलिप ने उन्हीं स्थानों पर गोरैयों की आवाज़ और शोर
रिकार्ड करके डेरीबेरी को भेजा। ध्वनि के विश्लेषण में देखा गया कि ग्रामीण इलाकों
के शोर के स्तर में खास कमी नहीं आई थी लेकिन शहरी इलाके के शोर में कमी आई थी, और
वह लगभग ग्रामीण इलाकों जैसे हो गए थे। यानी इस दौरान शहरी और ग्रामीण दोनों
इलाकों का शोर का स्तर लगभग समान हो गया था।
यह भी देखा गया कि जब शहरों का शोर कम हुआ
तो शहरी गोरैया की आवाज़ भी मद्धम पड़ गई। उनकी आवाज़ में लगभग 4 डेसिबल की कमी देखी
गई। उनके गीतों की आवाज़ मंद हो जाने के बावजूद उनके गीत स्पष्ट और अधिक दूरी तक
सुनाई दे रहे थे, क्योंकि उनकी आवाज़ में आई कमी शहर के शोर में आई कमी से कम
थी। स्पष्ट है कि तालाबंदी के दौरान पक्षी ज़ोर से नहीं गाने लगे थे।
आवाज़ कम होने के अलावा, गोरैया
के गीतों की बैंडविड्थ भी बढ़ गई थी। खासकर उन्होंने निचले सुर वाले गीत गाए, जो
पहले शोर भरे माहौल में गुम हो जाते थे। पूर्व के अध्ययनों में यह देखा गया है कि
मादा गोरैया को वे नर अधिक आकर्षित करते हैं जो जिनके गीतों की बैंडविड्थ अधिक
होती है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस वसंत
में परिवर्तित गीतों के कारण शहरी गोरैया की प्रजनन सफलता प्रभावित हुई है या
नहीं। लेकिन यह अध्ययन बताता कि प्राकृतिक तंत्र मानव हस्तक्षेप में कमी आने पर
तुरंत प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है।
भले ही शोरगुल फिर बढ़ने लगा है लेकिन उम्मीद है कि इन नतीजों को देखकर लोग शोर कम करने की सोचें। संभवत: वे अधिक घर से काम करने के बारे में सोचें, या ध्वनि रहित इलेक्ट्रिक वाहन लेने पर विचार करें।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.the-scientist.com/assets/articleNo/67966/aImg/39610/sparrow-l.jpg
आमाशय के अल्सर या आहार नाल के अन्य घावों से कई लोग पीड़ित
होते हैं। इलाज के पारंपरिक तरीकों के साथ कुछ ना कुछ समस्याएं हैं। अब
वैज्ञानिकों ने जैविक मुद्रण की मदद से अल्सर के उपचार का रास्ता सुझाया है।
दरअसल पेट के घावों के उपचार में दी जाने
वाली दवाइयां धीरे-धीरे काम करती हैं, और कभी-कभी तो उतनी प्रभावी भी नहीं होती।
एंडोस्कोपिक सर्जरी केवल छोटे घावों को ठीक कर पाती है। और एंडोस्कोपिक विधि से
दिए गए स्प्रे रक्तस्राव तो रोक पाते हैं लेकिन घावों की मरम्मत नहीं कर पाते।
जैविक मुद्रण की मदद से जटिल अंगों को
विकसित करने के प्रयास कई शोधकर्ता कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली अभी दूर है। फिलहाल
इसकी मदद से शरीर की अन्य सरल संरचनाएं जैसे बोन ग्राफ्ट विकसित कर प्रत्यारोपित
करने के प्रयोग किए गए हैं। अभी तरीका यह है कि पहले कोशिकाओं को शरीर के बाहर
विकसित करके प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके लिए बड़े चीरे लगाने पड़ते हैं, जो
संक्रमण की संभावना बढ़ाते हैं और ठीक होने में लंबा वक्त लेते हैं।
इसलिए कुछ शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में
कोशिकाओं को सीधे शरीर के अंदर प्रिंट करने के प्रयास किए। लेकिन प्रिंटिंग उपकरण
बड़े होने के कारण मामला सिर्फ बाहरी अंगों पर प्रिंटिंग तक सीमित हैं, पाचन
तंत्र या शरीर के अन्य अंदरूनी अंगों में जैविक मुद्रण इन उपकरणों से संभव नहीं।
बीज़िंग स्थित शिनहुआ युनिवर्सिटी के
बायोइंजीनियर ताओ शू और उनके साथियों ने जैविक मुद्रण की मदद से पेट के अल्सर के
उपचार के लिए एक लघु रोबोट तैयार किया, ताकि शरीर में चीरफाड़ कम हो और प्रिंटिंग
उपकरण शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाए। यह लघु रोबोट गुड़ी-मुड़ी अवस्था में महज़
सवा 4 सेंटीमीटर लंबा और 3 सेंटीमीटर चौड़ा है। शरीर में प्रवेश के बाद यह खुलकर 6
सेंटीमीटर लंबा हो जाता है, और फिर जैविक मुद्रण शुरू कर सकता है।
जैविक मुद्रक एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें स्याही के स्थान पर जीवित कोशिकाएं एक
जेल में मिलाकर भरी होती हैं। सही स्थान पर पहुंचकर जेल के साथ सजीव कोशिकाओं को
परत-दर-परत जमाया जाता है।
परीक्षण के लिए शोधकर्ताओं ने पेट का एक
पारदर्शी प्लास्टिक मॉडल तैयार करके लघु रोबोट को एंडोस्कोपी की मदद से उसमें
सफलतापूर्वक प्रवेश कराया। वहां उन्होंने पेट के अस्तर और पेट की मांसपेशियों की
कोशिकाओं को प्रिंट किया। बायोफेब्रिकेशन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार
मुद्रित कोशिकाओं में कोई क्षति नहीं हुई और 10 दिनों में उनमें काफी वृद्धि हुई।
लेकिन प्रयोग में शोधकर्ताओं के सामने कुछ
चुनौतियों भी आर्इं। उन्होंने पाया कि जो प्रिटिंग ‘स्याही’ इस्तेमाल की गई वह कम
तापमान पर ही स्थायी रहती है, शरीर के सामान्य तापमान पर तरल हो जाती है
जिससे उसे ढालना मुश्किल हो जाता है। इसका समाधान ओहायो स्टेट युनिवर्सिटी के
डेविड होएज़्ले द्वारा विकसित स्याही कर सकती है,
जो शरीर के सामान्य
तापमान पर स्थायी रहती है और दृश्य प्रकाश की मदद से गाढ़ी की जा सकती है।
जैविक मुद्रण की एक चुनौती यह है कि मुद्रित
कोशिकाओं को अंगों और ऊतकों के साथ प्रभावी ढंग से कैसे जोड़ा जाए। होएज़्ले की टीम
ने एक संभावित समाधान खोजा है, जिसमें 3-डी प्रिंटर की नोज़ल घाव में पहले प्रिंटिंग
स्याही से एक छोटी घुंडी बनाएगी, जो इसे बायोप्रिंटेड संरचना से जोड़ देगी।
बहरहाल, शोधकर्ताओं की योजना इससे भी छोटा (लगभग सवा सेंटीमीटर चौड़ा) रोबोट तैयार करने की है, जिसमें वे कैमरा और अन्य सेंसर भी जोड़ना चाहते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/249CC62E-2665-471B-A05B192EAEA29D59_source.jpg?w=590&h=800&0D8A9DFC-BE58-4047-9FBD27F3B36D62E6
वैसे तो यहां जिन मिथकों की चर्चा की गई है, वे मूलत: संयुक्त राज्य अमेरिका के सोशल मीडिया पर किए गए शोध और अन्य जानकारियों पर आधारित हैं। लेकिन थोड़े अलग रूप में ये भारत के सोशल मीडिया में भी नज़र आ जाते हैं।
कोरोनावायरस महामारी के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से लड़
रहा है जिसे ‘इंफोडेमिक’ का नाम दिया गया है। इस ‘सूचनामारी’ के चलते लोग रोग की
गंभीरता को कम आंकते हैं और सुरक्षा के उपायों को अनदेखा करते हैं। यहां इस
महामारी से सम्बंधित कुछ मिथकों पर चर्चा की गई है।
मिथक 1: नया कोरोनावायरस चीन की प्रयोगशाला
में तैयार किया गया है
चूंकि इस वायरस का सबसे पहला संक्रमण चीन
में हुआ था, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी सबूत के यह
दावा कर दिया कि इसे चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालांकि अमेरिकी
खुफिया एजेंसियों ने इन सभी दावों को खारिज करते हुए कहा है कि न तो यह मानव
निर्मित है और न ही आनुवंशिक फेरबदल से बना है। साइंटिफिक अमेरिकन में
प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी वायरोलॉजिस्ट शी ज़ेंगली और उनकी टीम द्वारा इस
वायरस के डीएनए अनुक्रम की तुलना गुफावासी चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोनावायरसों
से करने पर कोई समानता नज़र नहीं आई। इस वायरस के प्रयोगशाला में तैयार न किए जाने
पर ज़ेंगली ने एक विस्तृत आलेख साइंस पत्रिका में प्रकाशित भी किया है।
गौरतलब है कि ट्रम्प ने ज़ेंगली की प्रयोगशाला पर वायरस विकसित करने का इल्ज़ाम
लगाया था। इस मुद्दे पर स्वतंत्र जांच की मांग को देखते हुए चीन ने विश्व
स्वास्थ्य संगठन के शोधकर्ताओं को भी आमंत्रित किया है। लेकिन सबूत के आधार पर यही
कहा जा सकता है कि सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया गया है।
मिथक 2: उच्च वर्ग के लोगों ने ताकत और
मुनाफे के लिए वायरस को जानबूझकर फैलाया है
जूडी मिकोविट्स नामक एक महिला ने सोशल
मीडिया पर 26 मिनट की षडयंत्र-सिद्धांत आधारित फिल्म ‘प्लानडेमिक’ और अपने ही
द्वारा लिखित एक किताब में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीज़ के
निर्देशक एंथोनी फौसी और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स पर इल्ज़ाम लगाया
है कि उन्होंने इस बीमारी से फायदा उठाने के लिए अपनी ताकत का उपयोग किया है। यह
वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 80 लाख से अधिक लोगों ने देखा।
साइंस और एक अन्य वेबसाइट politifact ने जांच करने के बाद इस दावे को झूठा
पाया। हालांकि इस वीडियो को अब सोशल मीडिया से हटा लिया गया है लेकिन इससे स्पष्ट
है कि गलत सूचनाएं बहुत तेज़ी से फैलती हैं।
मिथक 3: कोविड-19 सामान्य फ्लू के समान ही
है
महामारी के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रपति
ट्रम्प ने बार-बार दावा किया कि कोविड-19 मौसमी फ्लू से अधिक खतरनाक नहीं है।
लेकिन 9 सितंबर को वाशिंगटन पोस्ट ने ट्रम्प के फरवरी और मार्च में लिए गए
साक्षात्कार की एक रिकॉर्डिंग जारी की जिससे पता चलता है कि वे (ट्रम्प) जानते थे
कि कोविड-19 सामान्य फ्लू से अधिक घातक है लेकिन इसकी गंभीरता को कम करके दिखाना
चाहते थे।
हालांकि कोविड-19 की मृत्यु दर का सटीक
आकलन तो मुश्किल है लेकिन महामारी विज्ञानियों का विचार है कि यह फ्लू की तुलना
में कहीं अधिक है। फ्लू के मामले में टीकाकरण या पूर्व संक्रमण के कारण कई लोगों
में कुछ प्रतिरोधक क्षमता तो है, जबकि अधिकांश विश्व ने अभी तक कोविड-19 का
सामना ही नहीं किया है। ऐसे में कोरोनावायरस सामान्य फ्लू के समान तो नहीं है।
मिथक 4: मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है
हालांकि सीडीसी और डब्ल्यूएचओ द्वारा मास्क
के उपयोग पर प्रारंभिक दिशानिर्देश थोड़े भ्रामक थे लेकिन अब सभी मानते हैं कि
मास्क का उपयोग करने से कोरोनावायरस को फैलने से रोका जा सकता है। काफी समय से पता
रहा है कि मास्क का उपयोग किसी संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी प्रभावी है। अब
तो यह भी स्पष्ट है कि कपड़े से बने मास्क भी कारगर हैं। फिर भी कई साक्ष्यों के
बावजूद कुछ लोगों ने मास्क को नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए पहनने से
इन्कार कर दिया।
मिथक 5: हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन एक प्रभावी
उपचार है
फ्रांस में किए गए एक छोटे अध्ययन के आधार
पर सुझाव दिया गया कि मलेरिया की दवा हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का उपयोग इस बीमारी
के इलाज में प्रभावी हो सकता है। इसकी व्यापक आलोचना और इसके प्रभावी न होने के
साक्ष्य के बावजूद ट्रम्प और अन्य लोगों ने इसे जारी रखा। फूड एंड ड्रग
एडमिनिस्ट्रेशन ने भी शुरुआत में अनुमति देने के बाद ह्रदय सम्बंधी समस्याओं के
जोखिम के कारण इसे नामंज़ूर कर दिया। कई अध्ययनों से पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद
भी ट्रम्प ने इस दवा का प्रचार जारी रखा।
मिथक 6: ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ प्रदर्शन के
कारण संक्रमण में वृद्धि हुई है
अमेरिका में पुलिस द्वारा जॉर्ज फ्लॉयड की
हत्या के बाद मई-जून में अश्वेत अमरीकियों के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ बड़े स्तर पर
लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। कई लोगों ने दावा किया कि इन प्रदर्शनों
में भीड़ जमा होने से कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि हुई। लेकिन नेशनल ब्यूरो ऑफ
इकॉनोमिक रिसर्च द्वारा अमेरिका के 315 बड़े शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों के एक
विश्लेषण से ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं जिससे यह कहा जा सके कि इन प्रदर्शनों
के कारण कोविड-19 मामलों में वृद्धि हुई है या अधिक मौतें हुई हैं। वास्तव में
प्रदर्शन करने वाले लोगों में संचरण का जोखिम बहुत कम था और अधिकांश
प्रदर्शनकारियों ने मास्क का उपयोग किया था।
मिथक 7: अधिक परीक्षण के कारण कोरोनावायरस
मामलों में वृद्धि हुई है
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह दावा किया कि
अमेरिका में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों का कारण परीक्षण में हो रही वृद्धि है।
यदि यह सही है तो परीक्षणों में पॉज़िटिव परिणामों के प्रतिशत में कमी आनी चाहिए
थी। लेकिन कई विश्लेषणों ने इसके विपरीत परिणाम दर्शाए हैं। यानी वृद्धि वास्तव
में हुई है।
मिथक 8: संक्रमण फैलेगा तो झुंड प्रतिरक्षा
प्राप्त की जा सकती है
महामारी की शुरुआत में यूके और स्वीडन ने
झुंड प्रतिरक्षा के तरीके को अपनाया। इस तकनीक में वायरस को फैलने दिया जाता है जब
तक आबादी में झुंड प्रतिरक्षा विकसित नहीं हो जाती है। लेकिन इस दृष्टिकोण में एक
बुनियादी दोष है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के लिए
60 से 70 प्रतिशत लोगों का संक्रमित होना आवश्यक है। कोविड-19 की उच्च मृत्यु दर
को देखते हुए झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त करते-करते करोड़ों लोग मारे जाते। इसी कारण
इस महामारी में यूके की मृत्यु दर सबसे अधिक है। यूके और स्वीडन में लोगों की जान
और अर्थव्यवस्था का भी काफी नुकसान हुआ। देर से ही सही,
यू.के. सरकार ने इस
गलती में सुधार किया और लॉकडाउन लागू किया।
मिथक 9: कोई भी टीका असुरक्षित होगा और
कोविड-19 से अधिक घातक होगा
एक ओर वैज्ञानिक निरंतर टीका विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ये चिंताजनक रिपोर्ट्स भी सामने आ रही हैं कि शायद कई लोग इसे लेने से इन्कार कर देंगे। संभावित टीके को साज़िश के रूप में देखा जा रहा है। प्लानडेमिक फिल्म में तो यह भी दावा किया गया है कि कोविड-19 का टीका लाखों लोगों की जान ले लेगा। साथ ही यह दावा भी किया गया है कि पहले भी टीकों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। लेकिन तथ्य यह है कि टीकों ने करोड़ों जानें बचाई हैं। यदि उपरोक्त दावा सही है, तो अलग-अलग चरणों में परीक्षण के दौरान लोगों की मौत हो जानी चाहिए थी। टीका-विरोधी समूहों द्वारा प्रस्तुत एक अन्य साज़िश-सिद्धांत में तो कहा गया है कि बिल गेट्स एक गुप्त योजना बना रहे हैं जिसके तहत टीकों के माध्यम से लोगों में माइक्रोचिप लगा दी जाएगी। इससे इतना तो स्पष्ट है कि टीके के निरापद होने की बात पर अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा ऐसी बातों को तूल मिलेगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/E4027069-A4E4-41E2-8E1556539BCCC03E_source.jpg?w=590&h=800&9E43B90F-9523-4D32-B59E75B0645A6602
दवाओं के विपरीत, लगभग सभी तरह के टीकों को उनके परिवहन से
लेकर उपयोग के ठीक पहले तक कम तापमान (सामान्यत: 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच)
पर रखने की आवश्यकता होती है। अधिक तापमान मिलने पर अधिकतर टीके असरदार नहीं रह
जाते। एक बार अधिक तापमान के संपर्क में आने के बाद इन्हें पुन: ठंडा करने से कोई
फायदा नहीं होता। इसलिए निर्माण से लेकर उपयोग से ठीक पहले तक इनके रख-रखाव और
परिवहन के लिए कोल्ड चैन (शीतलन शृंखला) बनाना ज़रूरी होता है। यदि हम सामान्य
तापमान पर रखे जा सकने और परिवहन किए जा सकने वाले टीके बना पाएं, जिनके
लिए कोल्ड चैन बनाने की ज़रूरत ना पड़े, तो यह बहुत फायदेमंद होगा।
बैंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के राघवन वरदराजन के नेतृत्व में एक भारतीय समूह ने ऐसे
ही ‘वार्म वैक्सीन’ पर काम किया है। इसमें उनके सहयोगी संस्थान हैं त्रिवेंदम
स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं
प्रौद्योगिकी संस्थान (THSTI) और IISc प्रायोजित स्टार्टअप Mynvax। Biorxive प्रीप्रिंट में प्रकाशित उनके शोधपत्र का शीर्षक है सार्स-कोव-2 के स्पाइक
के ताप-सहिष्णु, प्रतिरक्षाजनक खंड का डिज़ाइन। यहhttps://doi.org/10.1101/2020.08.18.25.237 पर उपलब्ध है।
कोविड वायरस की सतह पर एक प्रोटीन रहता है
जिसे स्पाइक कहते हैं। यह लगभग 1300 एमिनो एसिड लंबा होता है। इस स्पाइक में 250
एमीनो एसिड लंबा अनुक्रम – रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (RBD) – होता है। यह RBD मेज़बान कोशिका से जाकर जुड़ जाता है और संक्रमण की शुरुआत करता है। शोधकर्ताओं
ने प्रयोगशाला में पूरे स्पाइक प्रोटीन की बजाय RBD की 200 एमीनो एसिड
की शृंखला को संश्लेषित किया। फिर इस खंड की
संरचना (इसकी त्रि-आयामी बनावट या वह आकार जो इसे मेज़बान कोशिका की सतह पर ठीक ताला-चाबी
की तरह आसानी से फिट होने की गुंजाइश देता है) का अध्ययन किया। इसके अलावा इसकी
तापीय स्थिरता भी देखी गई कि क्या यह प्रयोगशाला की सामान्य परिस्थितियों के
तापमान से अधिक तापमान पर काम कर सकता है?
खुशी की बात है कि
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस तरह ठंडा करके सुखाने (फ्रीज़-ड्राइड करने) पर यह काफी
स्थिर होता है। यह बहुत थोड़े समय के लिए 100 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक का तापमान
झेल सकता है, और 37 डिग्री सेल्सियस पर एक महीने तक भंडारित किया जा सकता
है। इससे लगता है कि इस अणु को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड चैन की ज़रूरत नहीं
पड़ेगी।
प्रसंगवश बता दें कि पिछले 70 सालों से
भारत किसी प्रोटीन की संरचना या बनावट से उसके कार्यों के बारे में पता करने के
क्षेत्र में अग्रणी रहा है। और आज भी है। उदाहरण के लिए,
कैसे कोलेजन की तिहरी
कुंडली संरचना, जिसे दिवंगत जी. एन. रामचंद्रन ने 1954 में खोजा था,से पता चल जाता है कि
यह त्वचा और कंडराओं में क्यों पाया जाता है। यह त्वचा और कंडराओं को रस्सी जैसी
मज़बूती प्रदान करता है। प्रो. रामचंद्रन ने यह भी बताया था कि किसी प्रोटीन के
एमीनो एसिड अनुक्रम के आधार पर हम किस तरह यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह कैसी
त्रि-आयामी संरचना बनाएगा। इस समझ के आधार पर जैव रसायनज्ञ प्रोटीन के एमीनो एसिड
अनुक्रम में बदलाव करके प्रोटीन से मनचाहा कार्य करवाने की दिशा में बढ़े।
उपरोक्त अध्ययन में भी शोधकर्ताओं ने यही
किया है। उन्होंने अभिव्यक्ति के लिए RBD के खंड को ध्यानपूर्वक चुना, और
दर्शाया कि परिणामी प्रोटीन ताप सहन कर सकता है। यह प्रोटीन संरचना के विश्लेषण और
जेनेटिक इंजीनियरिंग की क्षमता की मिसाल है।
RBD प्रोटीन को काफी मात्रा में स्तनधारियों की कोशिकाओं में भी बनाया गया और पिचिया
पैस्टोरिस (Pichia pastoris) नामक एक यीस्ट में भी। यह यीस्ट बहुत किफायती और सस्ता
मेज़बान है। जब उन्होंने दोनों प्रोटीन की तुलना की तो पाया कि यीस्ट में बने
प्रोटीन में बहुत अधिक विविधता थी, और जंतु परीक्षण में देखा गया यह वांछित
एंटीबॉडी भी नहीं बनाता। उन्होंने RBD प्रोटीन को बैक्टीरिया मॉडल ई.कोली
में भी बनाकर देखा, लेकिन इसमें बना प्रोटीन भी कारगर नहीं रहा।
बहरहाल,
अब हमारे पास
ताप-सहिष्णु RBD है, तो क्या इससे टीका बनाने की कोशिश की जा सकती है? एक
ऐसा टीका जो एंटीबॉडी बनाकर वायरस के स्पाइक प्रोटीन को मेज़बान कोशिका के ग्राही
से न जुड़ने दे और संक्रमण की प्रक्रिया को रोक दे?
आम तौर पर प्रतिरक्षा
विज्ञानी टीके (कोशिका या अणु) के साथ एक सहायक भी जोड़ते हैं। जब यह टीके के साथ
शरीर में जाता है तो प्रतिरक्षा प्रणाली को उकसाता है और टीके की कार्य क्षमता
बढ़ाता है। आम तौर पर इसके लिए एल्यूमीनियम लवण उपयोग किए जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने अपने प्रारंभिक टीकाकरण के
लिए गिनी पिग को चुना, क्योंकि माइस की तुलना में गिनी पिग सांस की बीमारियों के
लिए बेहतर मॉडल माने जाते हैं। सहायक के रूप में उन्होंने MF59
के एक जेनेरिक संस्करण का उपयोग किया। MF59 मनुष्यों के लिए सुरक्षित पाया गया है।
फिर गिनी पिग में RBD नुस्खा प्रविष्ट कराया। दो खुराक के बाद गिनी पिग में
वांछित ग्राहियों को अवरुद्ध करने वाली एंटीबॉडी की पर्याप्त मात्रा दिखी। तो, यह
काम कर गया।
वे बताते हैं कि कई अन्य समूहों ने RBD, या संपूर्ण स्पाइक प्रोटीन, या
एंटीजन बनाने वाले नए आरएनए-आधारित तरीकों का उपयोग किया है। कोविड-19 के इन सारे
टीकों (जो परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं) के लिए कोल्ड चैन की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन
इस विशिष्ट ताप-सहिष्णु RBD खंड (और शायद अन्य RBD खंड भी) को कुछ समय के लिए सामान्य तापमान पर रखा जा सकता है।
शोधकर्ता अब जंतुओं में इसकी वायरस से संक्रमण के विरुद्ध सुरक्षा क्षमता की जांच कर रहे हैं और साथ ही साथ मनुष्यों पर नैदानिक परीक्षण करने के पहले इसकी सुरक्षा और विषाक्तता का आकलन कर रहे हैं। हम कामना करते हैं कि टीम को इसमें सफलता मिले।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/sites/btmt/images/stories/vaccine_660_040920115131.jpg
रेफ्रिजरेटर, बॉयलर और यहां तक कि बल्ब अपने आसपास के
वातावरण में निरंतर ऊष्मा बिखेरते हैं। सैद्धांतिक रूप से इस व्यर्थ ऊष्मा को
बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। गाड़ियों के इंजिन और अन्य उच्च-ताप वाले स्रोतों
के साथ तो ऐसा किया जाता है लेकिन इस तकनीक का उपयोग घरेलू उपकरणों के लिए थोड़ा
मुश्किल होता है क्योंकि ये काफी कम ऊष्मा छोड़ते हैं।
लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने एक ऐसा
उपकरण तैयार किया है जो तरल पदार्थों का उपयोग करके निम्न-स्तर की ऊष्मा को बिजली
में परिवर्तित कर सकता है। गौरतलब है कि वैज्ञानिक काफी समय से ऐसे पदार्थों के
बारे में जानते हैं जो ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित कर सकते हैं। यह कार्य विशेष
अर्धचालकों द्वारा किया जाता है जिन्हें ताप-विद्युत पदार्थ कहते हैं। जब इनसे बनी
चिप्स का एक सिरा गर्म और दूसरा ठंडा होता है तब इलेक्ट्रान गर्म से ठंडे सिरे की
ओर बहने लगते हैं। कई चिप्स को एक साथ जोड़ने पर एक स्थिर विद्युत प्रवाह उत्पन्न
होता है।
लेकिन जो पदार्थ अभी ज्ञात हैं वे महंगे
हैं और तापमान में सैकड़ों डिग्री सेल्सियस के अंतर पर काम करते हैं। ऐसे में यह
तकनीक रेफ्रिजरेटर जैसे निम्न-स्तर के ताप स्रोतों के लिए बेकार है। इस समस्या को
दूर करने के लिए हुआज़हौंग युनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी के भौतिक विज्ञानी
जून ज़ाऊ और उनके सहयोगियों ने थर्मोसेल्स की ओर रुख किया। इन उपकरणों में गर्म से
ठंडे की ओर विद्युत आवेश को प्रवाहित करने के लिए ठोस की बजाय तरल पदार्थों का
उपयोग किया जाता है। इनमें इलेक्ट्रॉन्स का नहीं बल्कि आयनों का स्थानांतरण होता
है।
थर्मोसेल्स कम तापमान अंतर को बिजली में
परिवर्तित करने में सक्षम होते हैं लेकिन विद्युत धारा बहुत कम होती है। कारण यह
है कि इलेक्ट्रॉन्स की तुलना में आयन सुस्त होते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉन के
विपरीत आयन अपने साथ ऊष्मा का भी प्रवाह करते हैं जिससे दोनों सिरों के बीच तापमान
का अंतर कम हो जाता है।
ज़ाऊ की टीम ने एक छोटी थर्मोसेल से शुरुआत
की जिसके निचले व ऊपरी सिरों पर इलेक्ट्रोड थे। निचले और ऊपरी इलेक्ट्रोड के बीच
50 डिग्री सेल्सियस का अंतर बनाए रखा गया। उन्होंने इस चैम्बर में फैरीसाइनाइड
नामक आयनिक पदार्थ भर दिया।
गर्म इलेक्ट्रोड के नज़दीक हों तो
फैरीसाइनाइड आयन एक इलेक्ट्रान छोड़ते हैं और चार ऋणावेश युक्त Fe(CN)6-4 से तीन ऋणावेश युक्त Fe(CN)6-3 में बदल जाते हैं।
मुक्त इलेक्ट्रॉन्स एक बाहरी सर्किट के माध्यम से गर्म से ठंडे इलेक्ट्रोड की ओर
बहते हुए सर्किट में लगे छोटे उपकरणों को उर्जा प्रदान करते हैं। ये इलेक्ट्रान जब
ठंडे इलेक्ट्रोड तक पहुंचते हैं तब ये Fe(CN)6-3 के साथ जुड़ जाते
हैं। इससे पुन: Fe(CN)6-4 आयन उत्पन्न होते हैं जो फिर से गर्म इलेक्ट्रोड की ओर
चले जाते हैं और यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
इन गतिमान आयनों द्वारा वाहित गर्मी को कम
करने के लिए ज़ाऊ की टीम ने फैरीसाइनाइड में एक धनावेशित कार्बन यौगिक गुआनिडिनियम जोड़
दिया। ठंडे इलेक्ट्रोड पर गुआनिडिनियम ठंडे Fe(CN)6-4 आयनों को क्रिस्टल्स में परिवर्तित कर देता है। क्योंकि तरल पदार्थों की
तुलना में ठोस पदार्थों की ऊष्मा चालकता कम होती है,
वे गर्म से ठंडे
इलेक्ट्रोड की ओर जाने वाली गर्मी को सोख लेते हैं। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये
क्रिस्टल्स गर्म इलेक्ट्रोड की ओर चले जाते हैं जहां गर्मी के कारण ये वापिस तरल
बन जाते हैं।
साइंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार थर्मोसेल के पिछले संस्करणों की तुलना में इलेक्ट्रोड के उतने ही क्षेत्रफल के लिए यह थर्मोसेल पांच गुना अधिक बिजली उत्पन्न करती है। यह एक सामान्य व्यावसायिक उपकरण से दो गुना अधिक दक्षता प्रदान करता है। टीम के अनुसार एक 20 थर्मोसेल वाले पुस्तक के आकार के मॉड्यूल से एक एलईडी लाइट और एक पंखे को ऊर्जा प्रदान की जा सकती है। साथ ही एक मोबाइल फोन भी चार्ज किया जा सकता है। टीम के लिए अगला कदम इस उपकरण को और सस्ता बनाना और ऐसी सामग्री का उपयोग करना है जो अधिक से अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर सके। इसकी सहायता से हम अपने आसपास के वातावरण में उपलब्ध गर्मी से छोटे गैजेट्स को उर्जा देने में सक्षम हो सकेंगे।(स्रोत फीचर्स)
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क्यूबा वैसे तो एक छोटा-सा देश है किंतु कृषि व स्वास्थ्य जैसे
कुछ क्षेत्रों में उसकी उपलब्धियां विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बनती रही हैं।
विशेषकर कृषि विकास की बहस में हाल के समय में क्यूबा का नाम बार-बार आता है। कारण
कि आज विश्व का ध्यान पर्यावरण की रक्षा आधारित खेती पर बहुत केंद्रित है व क्यूबा
ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय सफलताएं प्राप्त की हैं।
विश्व स्तर पर रासायनिक खाद व
कीटनाशक/जंतुनाशक दवाओं के अधिक उपयोग से प्रदूषण बढ़ा है,
मिट्टी के प्राकृतिक
उपजाऊपन पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ा है, किसान के मित्र अनेक जीवों व सूक्ष्म जीवों
की बहुत क्षति हुई है व जलवायु बदलाव का खतरा भी बढ़ा है। इन पर निर्भरता कम करने
की व्यापक स्तर पर इच्छा है। पर प्राय: नीति स्तर पर यह चाह आगे नहीं बढ़ पाती है
क्योंकि इस वजह से कृषि उत्पादन कम होने की आशंका व्यक्त की जाती है।
इस संदर्भ में क्यूबा की उपलब्धि निश्चय ही
उल्लेखनीय है। यहां खाद्य उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि ऐसे तौर-तरीकों से प्राप्त
की गई है जिनसे रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के उपयोग को काफी हद तक कम किया गया।
दूसरे शब्दों में, पिछले लगभग 25 वर्षों में यहां रासायनिक खाद व कीटनाशक
दवाइयों का उपयोग पहले से कहीं कम करते हुए खाद्य व कृषि उत्पादन में वृद्धि
प्राप्त की गई।
वर्ष 1990 तक क्यूबा में रासायनिक खाद व
कीटनाशक दवाओं का अधिक उपयोग होता था। इन्हें मुख्य रूप से सोवियत संघ से आयात
किया जाता था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के चलते यह आयात व खाद्य आयात दोनों
रुक गए। इस तरह यहां खाद्य व कृषि संकट उत्पन्न हुआ। वैज्ञानिकों,किसानों व सरकार के
आपसी विमर्श से यह राह निकाली गई कि एग्रोइकॉलॉजी या पर्यावरण की रक्षा पर आधारित
खेती की राह अपनाई जाए।
इसके लिए परंपरागत व आधुनिक विज्ञान, इन
दोनों उपायों से सीखा गया। अनेक किसानों ने अपने पुरखों के तरीकों, जिन्हें
वे छोड़ चुके थे, उन्हें नए सिरे से अपनाया व वैज्ञानिकों ने इन्हें सुधारने
में मदद की। मिश्रित खेती व उचित फसल चक्र को अपनाया गया। पशुपालन व कृषि में
बेहतर समन्वय किया गया। एक उत्पादन प्रणाली से दूसरी उत्पादन प्रणाली के लिए पोषण
प्राप्त किया गया। जैसे मुर्गीपालन व पशुपालन से कृषि के लिए गोबर की खाद व
वृक्षों से पत्तियों की खाद प्राप्त की गई। हानिकारक कीड़ों को दूर रखने की कई
परंपरागत व नई तकनीकें अपनाई गर्इं जबकि खतरनाक रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता
निरंतर कम की गई।
पर्यावरण आधारित कृषि को राष्ट्रीय नीति के
स्तर पर अपनाया गया व साथ में किसान संगठनों को इसके लिए निरंतर प्रोत्साहित भी
किया गया। वैज्ञानिकों ने किसानों के साथ मिलकर,
उनकी ज़रूरतों को
समझते हुए, नई वैज्ञानिक जानकारियों का योगदान दिया। परंपरा व आधुनिक
विज्ञान से, किसानों व वैज्ञानिकों ने एक-दूसरे से सीखा, सहयोग
किया।
इस तरह के कृषि विकास के उत्साहवर्धक
परिणाम मात्र छ:-सात वर्षों में मिलने लगे। 10 प्रमुख खाद्य उत्पादों के लिए वर्ष
1996-97 में रिकार्ड उत्पादन प्राप्त हुआ। वर्ष 1988 की तुलना में वर्ष 2007 में
सब्ज़ियों का उत्पादन 145 प्रतिशत रहा जबकि कृषि-रसायनों में 72 प्रतिशत की कमी आई।
वर्ष 1988 की तुलना में वर्ष 2007 में बीन्स (फलियों) का उत्पादन 351 प्रतिशत रहा
जबकि कृषि रसायनों में 55 प्रतिशत कमी आई।
पर्यावरण रक्षा आधारित खेती अधिक श्रम-सघन
होती है व इसमें रचनात्मक जुड़ाव की संभावना अधिक होती है। अत: रोज़गार उपलब्धि की
दृष्टि से भी यह क्यूबा के लिए बेहतर रही है।
विश्व के अधिकांश देश व वहां के किसान यही
चाहते हैं कि उनके खर्च कम हों और उनकी भूमि का प्राकृतिक उपजाऊपन बना रहे। क्यूबा
के अनुभव ने बताया है कि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ ये उद्देश्य भी प्राप्त किए जा
सकते है। पर्यावरण की रक्षा के साथ किसानों का खर्च कम करने की दृष्टि से भी
क्यूबा का हाल का, विशेषकर पिछले 25 वर्षों का,
अनुभव उत्साहवर्धक
रहा।
यदि भारत के दृष्टिकोण से देखें तो हाल के दशकों में किसानों का बढ़ता खर्च व कर्ज़ बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं। इसके कारण किसानों में असंतोष भी फैला है। समय-समय पर कर्ज़ में राहत देने से भी इस समस्या का समाधान नहीं हुआ है। उधर मिट्टी का प्राकृतिक उजाऊपन भी तेज़ी से कम होता जा रहा है। अन्य संदर्भों में भी कृषि से जुड़ा पर्यावरण का सकंट बढ़ता जा रहा है। अत: क्यूबा के इन अनुभवों से भारत भी सही कृषि नीतियां अपनाने के लिए बहुत कुछ सीख सकता है।(स्रोत फीचर्स)
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हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पहली नज़र में हास्यापद लगने वाली लेकिन महत्वपूर्ण खोजें इगनोबेल पुरस्कार से नवाज़ी गईं। फर्क इतना था कि कोरोना संक्रमण के चलते इस वर्ष समारोह ऑनलाइन सम्पन्न हुआ, जिसकी मेज़बानी विज्ञान की हास्य पत्रिका एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल रिसर्च ने की। इस वर्ष समारोह की थीम थी इंसेक्ट (कीट)। समारोह में पहले से रिकॉर्ड किए गए भाषण, संगीत और द्रुत व्याख्यान प्रस्तुत किए।
इस वर्ष कीट विज्ञान में इगनोबेल पुरस्कार
उस अध्ययन को दिया गया जिसमें इस बात का पता लगाया गया था कि क्यों कई कीट
विज्ञानी भी मकड़ियों से डरते हैं। यह अध्ययन 2013 में अमेरिकन एंटोमोलॉजिस्ट
पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, शीर्षक था सर्वे ऑफ एरेक्नोफोबिक
एंटोमोलॉजिस्ट्स। शोधकर्ता जानना चाहते थे कि क्यों तिलचट्टा और भुनगा जैसे
जीवों के साथ काम करने वाले कुछ कीट विज्ञानी स्वयं मकड़ियों से डरते हैं। उन्होंने
पाया कि मकड़ियों का फुर्तीला होना, उनकी अप्रत्याशित चाल और पैरों की अधिक
संख्या कुछ कीट विज्ञानियों को अधिक विचलित करती है।
श्रवण विज्ञान यानी एकूस्टिक्स में
पुरस्कार उन शोधकर्ताओं को दिया गया जिन्होंने मगरमच्छों की आवाज़ों का अध्ययन किया
था। मगरमच्छ की चिंघाड़ काफी तेज़ होती है, प्रजनन काल में यह और भी तीव्र हो जाती है।
शोधकर्ताओं ने मगरमच्छों के ध्वनि मार्ग में अनुनाद के बारे में पता करने के लिए
दो भिन्न माध्यम (साधारण हवा, और हीलियम-ऑक्सीजन मिश्रण) में उनकी चिंघाड़
की तुलना की। हीलियम की उपस्थिति में ध्वनि की तीव्रता बढ़ जाती है और श्वसन
सामान्य रहता है। इसके लिए उन्होंने पहले मगरमच्छ को एक एयरटाइट चैंबर में रखा।
चैंबर में पहले सामान्य हवा और फिर हीलियम और ऑक्सीजन का मिश्रण (हीलिऑक्स) भरा
गया। दोनों माध्यम में ध्वनि की गति की गणना की और उनके सिर की लंबाई के हिसाब से
ध्वनि मार्ग की लंबाई का अनुमान लगाया। 2015 में जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल
बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया कि हीलिऑक्स माध्यम में मगरमच्छ की ध्वनि की
तीव्रता बढ़ गई थी जो यह दर्शाता है कि गैर-पक्षी सरीसृपों में आवाज़ ध्वनि मार्ग
में कंपन के अनुनाद से उत्पन्न होती है।
मनोविज्ञान में पुरस्कार उन अमरीकी
शोधकर्ताओं की जोड़ी को दिया गया जिन्होंने 2018 में जर्नल ऑफ पर्सनैलिटी
में प्रकाशित अपने अध्ययन के ज़रिए बताया था कि लोग विशेष तरह की भौंहों को ‘घोर
आत्ममुग्धता’ का संकेत मानते हैं। इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने
कुछ फोटो लिए और लोगों को दिखाए। फोटो इस तरह दिखाए गए थे कि चेहरे के अलग-अलग
हिस्से ओझल कर दिए गए थे। प्रतिभागियों के जवाबों का विश्लेषण करने पर पता चला कि
जो लोग अपनी भौंहे लंबी व घनी रखते हैं उन्हें प्रतिभागियों ने प्राय: आत्ममुग्ध
माना। प्रतिभागियों का मानना था ये लोग अपनी भौंहे खास तरह से इसलिए रखते हैं
क्योंकि वे सबकी नज़रों में आना चाहते हैं और सबसे जुदा दिखना चाहते हैं।
चिकित्सा का इगनोबेल पुरस्कार एक मनोविकार, मिसोफोनिया, के
लिए नए नैदानिक मानदंड बताने वाले शोधकर्ताओं को दिया गया। मिसोफोनिया से पीड़ित
लोगों को कुछ आवाज़ों, जैसे सांस की, चबाने की,
गटकने आदि की आवाज़ से
चिढ़ होती है। मिसोफोनिया को अब तक मनोविकार की तरह नहीं देखा जाता था और इसकी
पर्याप्त व्याख्या नहीं की गई थी। इसका ठीक तरह से उपचार हो सके इसलिए साल 2013
में शोधकर्ताओं ने मिसोफोनिया से पीड़ित 42 लोगों पर अध्ययन कर इसके कुछ नैदानिक
मानदंड बताए थे। प्लॉस वन पत्रिका में प्रकाशित उनके मानदंडों के अनुसार
मिसोफोनिया से पीड़ित व्यक्ति सिर्फ मानव जनित आवाज़ों और उससे सम्बंधित दृश्य के
प्रति गुस्सा, चिढ़ और आक्रामता व्यक्त करता है। इससे पीड़ित व्यक्ति
सार्वजनिक स्थलों पर जाने से बचकर, कानों को बंद कर,
या किसी अन्य तरह की
आवाज़ पैदा कर इस स्थिति से बचने की कोशिश में वे अन्य लोगों से कटने लगते हैं।
अर्थशास्त्र की श्रेणी का पुरस्कार उस
अध्ययन को मिला जो बताता है कि जिन देशों में आर्थिक असमानता अधिक है वहां प्रेमी
युगल चुंबन (फ्रेंच किस, जिसमें जीभों का संपर्क होता है) अधिक लेते
हैं। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 13 देशों के
2988 प्रतिभागियों पर एक सर्वे किया। जिसमें उनसे प्रश्नपत्र के माध्यम से कुछ
सवाल पूछे गए थे। जैसे कि वे कब और कितनी बार अपने साथी का चुंबन लेते हैं।
उन्होंने पाया कि जिन देशों में आर्थिक असमानता अधिक होती है वहां लोग अपने साथी
का अधिक चुंबन लेते हैं। अध्ययन के अनुसार उन माहौल में अधिक फ्रेंच किस होते हैं
जहां लोगों के पास सहारे कम होते हैं और चुंबन रिश्ते में प्रतिबद्धता दर्शाता है।
इसके अलावा यह व्यवहार सिर्फ चुंबन के मामले में दिखा,
प्रेम के किसी अन्य
प्रदर्शन में नहीं। उन्होंने यह भी पाया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं ‘अच्छा’
चुंबन चाहती है।
पदार्थ विज्ञान में पुरस्कार से उस अध्ययन
को नवाज़ा गया जिसने इस दावे की सत्यता की जांच की जो कहता था कि एक एस्किमो पुरुष
ने कुत्ते को मारने-काटने के लिए अपने जमे हुए (फ्रोज़न) मल से चाकू बनाया था।
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में फ्रोज़न विष्ठा से चाकू बनाया और नियंत्रित
परिस्थिति में इसकी कारगरता जांची। उन्होंने पाया कि फ्रोज़न मानव विष्ठा से कारगर
चाकू बनाना संभव नहीं है।
इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को 10 ट्रिलियन जिम्बाब्वे मुद्रा दी गई (जो मात्र 50 पैसे के बराबर है)। ट्रॉफी के तौर उन्हें 6 पन्नों की पीडीएफ फाइल मेल की गई, जिसका प्रिंट लेकर विजेता उससे अपने लिए एक घनाकार ट्रॉफी बना सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)
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