विश्व दृष्टि दिवस के मौके पर आई विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में कम
से कम 2.2 अरब लोग दृष्टि सम्बंधी समस्याओं से पीड़ित हैं। और इनमें से तकरीबन एक
अरब लोग दृष्टि सम्बंधी ऐसी दिक्कतों (जैसे ग्लोकोमा,
मोतियाबिंद, निकट
और दूर-दृष्टिदोष) से पीड़ित हैं जिनसे या तो बचा जा सकता है, या
चश्मा लगाकर, मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाकर या अन्य तरीकों से जिन्हें ठीक
किया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं तथा कुछ अन्य आबादियों
में दृष्टि सम्बंधी समस्याएं अधिक हैं। जैसे ग्रामीण इलाकों, वृद्धों, विकलांगों
और निम्न और मध्यम आय वाले देशों में। रिपोर्ट के मुताबिक
निम्न
और मध्यम आय वाले इलाकों में दूरदृष्टि दोष की समस्या उच्च आय वाले इलाकों से चार
गुना अधिक हैं।
उप-सहारा
अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब इलाकों के लोगों में अंधेपन की समस्या उच्च आमदनी
वाले देशों से आठ गुना अधिक है।
मोतियाबिंद
और बैक्टीरिया संक्रमण की समस्या निम्न और मध्यम आय वाले देशों की महिलाओं में
अधिक हैं। यह अंधत्व का प्रमुख कारण है।
शहरी
जीवन शैली में निकट-दृष्टि (मायोपिया यानी दूर का देखने में समस्या) अधिक दिखाई
देती है।
रिपोर्ट दृष्टिदोष बढ़ने के कारणों के बारे
में भी बात करती है। रिपोर्ट के अनुसार अक्सर राष्ट्रीय रोकथाम नीतियां और अन्य
नेत्र सुरक्षा योजनाएं उन समस्याओं पर केन्द्रित होती हैं जिनके कारण अंधापन या
गंभीर दृष्टि दोष हो सकते हैं, जैसे मोतियाबिंद,
रोहे और अपवर्तन दोष।
लेकिन जो समस्याएं गंभीर दृष्टि समस्याओं में तब्दील नहीं होतीं वे उपेक्षित ही
रही हैं (जैसे आंखों में सूखापन, आंख आना) जबकि इन्हीं समस्याओं से बचाव और
उपचार की लोगों को अधिक आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा –
अधिक
समय कमरे या सीमित जगह में बिताने से या नज़दीक से देखने वाले कार्य करने से
मायोपिया (निकट दृष्टि) की समस्या बढ़ी है। सुझाव है कि बाहर या खुले में समय
बिताने से मायोपिया होने की संभावना को कम किया जा सकता है।
लोगों
में बढ़ता मधुमेह खास (तौर से टाइप-2) दृष्टि सम्बंधी समस्याओं को जन्म देता है।
मधुमेह से पीड़ित मरीज़ को कभी ना कभी किसी ना किसी स्तर की रेटिना विकृति की समस्या
का सामना करना पड़ता है। आंखों की नियमित जांच और मधुमेह पर नियंत्रण से इसे कम
किया जा सकता है।
कमज़ोर
और घटिया स्वास्थ्य सेवाओं के कारण कई लोग आंखों की नियमित जांच से वंचित रह जाते
हैं। इसलिए समस्या देर से पता चलती है और रोकथाम व उपचार मुश्किल हो जाते हैं।
संभावना है कि आने वाले वर्षों में विश्व
की आबादी की उम्र बढ़ने के साथ, तथा अधिक लोगों के शहरों की ओर पलायन के
साथ उपेक्षित दृष्टि समस्याओं की संख्या में भी वृद्धि होगी।
इस सम्बंध में रिपोर्ट सिफारिश करती है कि दृष्टि सम्बंधी देखभाल को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक उपेक्षित दृष्टि दोषों से बचाव या उपचार में तकरीबन 1400 अरब रुपए से अधिक निवेश की ज़रूरत होगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencealert.com/images/articles/processed/myopia-epidemic_600.jpg
1970 के दशक में, तेल संकट की शुरुआत
से ही दुनिया भर में नाभिकीय उर्जा संयंत्रों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई।
साथ ही पवन और सौर उर्जा को भी जीवाश्म र्इंधन के विकल्प के रूप में देखा गया। इन
सभी रुाोतों ने बिजली पैदा करने के लिए कम कार्बन उत्सर्जन का आश्वासन भी दिया।
वाशिंगटन के जेफ जॉनसन ने अमेरिकन केमिकल
सोसाइटी की पत्रिका केमिकल एंड इंजीनियरिंग न्यूज़ में प्रकाशित अपने लेख में इन
गैर-जीवाश्म र्इंधन आधारित संसाधनों की धीमी वृद्धि और कोयले एवं तेल पर हमारी
निर्भरता को तेज़ी से कम करने के लिए विशेष उपाय करने की ज़रूरत की ओर ध्यान आकर्षित
किया है। जेफ जॉनसन, पेरिस स्थित एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन, इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के एक अध्ययन का हवाला देते हुए
कहते हैं कि यदि सरकारें हस्तक्षेप नहीं करती हैं तो 1990 के दशक में नाभिकीय
उर्जा का जो योगदान 18 प्रतिशत था वह 2040 तक घटकर मात्र 5 प्रतिशत तक रह जाएगा।
डैटा से पता चलता है कि नवीकरणीय संसाधनों
पर ध्यान देने और उनकी बढ़ती उपस्थिति की रिपोर्ट्स के बावजूद विभिन्न प्रकार के
ऊर्जा उत्पादन में जीवाश्म र्इंधन की हिस्सेदारी लगभग आधी सदी से अपरिवर्तित रही
है। दिए गए रेखाचित्र से पता चलता है कि नवीकरणीय संसाधनों में काफी धीमी वृद्धि
हुई है, इसी तरह नाभिकीय उर्जा की हिस्सेदारी भी कम
हुई है, कोयले का उपयोग अपरिवर्तित रहा है और तेल
की जगह प्राकृतिक गैस का उपयोग होने लगा है।
स्थिति तब और अधिक भयावह नज़र जाती है जब हम
देखते हैं कि गैर-जीवाश्म बिजली में कोई बदलाव न होने के पीछे बिजली की मांग में स्थिरता
का कारण नहीं है। आंकड़ों से पता चलता है कि बिजली खपत की दर में तेज़ी से वृद्धि
हुई है जो आने वाले दशकों में और अधिक होने वाली है।
यह तो स्पष्ट है कि यदि कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस के उपयोग में कमी करनी है तो उसकी
भरपाई नवीकरणीय संसाधनों और नाभिकीय उर्जा में तेज़ वृद्धि से होनी चाहिए। नवीकरणीय
ऊर्जा में पनबिजली, पवन ऊर्जा और सौर उर्जा शामिल हैं। पनबिजली
संयंत्र नदियों पर उपयुक्त स्थल पर निर्भर करते हैं और नए संयंत्र लगाने का मतलब
आबादियों और पारिस्थितिक तंत्र को अस्त-व्यस्त करना है। पवन ऊर्जा की काफी गुंजाइश
है लेकिन इसका प्रसार इसकी सीमा तय करता है। साथ ही इसे स्थापित करने के लिए निवेश
की काफी आवश्यकता होती है और समय भी लगता है। सौर पैनल अब पहले की तुलना में और
अधिक कुशल हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर इन्हें स्थापित करने
के लिए काफी ज़मीन की ज़रूरत होगी और ज़मीन पर वैसे ही काफी दबाव है।
इसलिए विकल्प के रूप में हमें नाभिकीय
उर्जा को बढ़ावा देना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इसके कोई दुष्परिणाम नहीं हैं। इसके
साथ रेडियोधर्मी अपशिष्ट का उत्पन्न होना, दुर्घटना
का जोखिम और भारी लागत जैसी समस्याएं भी हैं। हालांकि, नवीकरणीय
संसाधनों की भौतिक सीमाओं को देखते हुए और जीवाश्म र्इंधन को आवश्यक रूप से कम
करने के लिए, अपशिष्ट के निपटान और सुरक्षा के मानकों के
सबसे बेहतरीन उपायों के साथ, नाभिकीय उर्जा ही
एकमात्र रास्ता है।
इसी संदर्भ में हमें देखना होगा कि वर्ष
2018 में कुल विश्व उर्जा में नाभिकीय घटक की भागीदारी केवल 10 प्रतिशत रह जाएगी।
इसके लिए कई कारक ज़िम्मेदार हैं। एक महत्वपूर्ण कारक की ओर अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा
संगठन (आईईए) ने ध्यान दिलाया है। आईईए के अनुसार उत्पादन क्षमता का निर्माण तो
हुआ है लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा काफी पुराना हो गया है जिसे प्रतिस्थापित करने की
आवश्यकता है। विकसित देशों में कुल बिजली उत्पादन में नाभिकीय उर्जा की भागीदारी
18 प्रतिशत है। 500 गीगावॉट के कुल उत्पादन में से अमेरिका अपने 98 नाभिकीय
संयंत्रों से 105 गीगावॉट का उत्पादन करता है। फ्रांस अपने 58 नाभिकीय संयंत्रों
से 66 गीगावॉट का उत्पादन करता है जो कुल बिजली उत्पादन का 70 प्रतिशत है। इसकी
तुलना में, भारत में 7 स्थानों पर स्थित 22 नाभिकीय
संयंत्रों से 6.8 गीगावॉट का उत्पादन होता है जबकि यहां बिजली का कुल उत्पादन 385
गीगावॉट है।
आईईए की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका, युरोपीय संघ और रूस के अधिकांश संयंत्र 35 वर्षों से अधिक
पुराने हैं। ये संयंत्र या तो अपना 40 वर्षीय जीवन पूरा कर चुके हैं या फिर उसके
करीब हैं। विकसित देशों में पुराने संयंत्रों के स्थान पर नए संयंत्र स्थापित करना
कोई विकल्प नहीं है। समय लगने के अलावा, नए
संयंत्रों से बिजली उत्पादन की लागत मौजूदा संयंत्रों की तुलना में काफी अधिक
होगी। इसके साथ ही नए संयंत्र प्रतिस्पर्धा में असमर्थ होंगे जिसके परिणामस्वरूप
जीवाश्म आधारित बिजली का उपयोग बढ़ जाएगा। एक ओर जहां परमाणु संयंत्रों को अपशिष्ट
निपटान और सुरक्षा के विशेष उपायों की लागत वहन करना होती है, वहीं जीवाश्म र्इंधन आधारित उद्योग को पर्यावरण क्षति के
लिए कोई लागत नहीं चुकानी पड़ती है।
इसलिए विकसित देशों में केवल 11 नए संयंत्र
स्थापित किए जा रहे हैं जिनमें से 4 दक्षिण कोरिया में और एक-एक 7 अन्य देशों में
हैं। हालांकि, आईईए के अनुसार विकासशील देशों में से, चीन में 11 (46 गीगावॉट की क्षमता वाले 46 मौजूदा संयंत्रों
के अलावा), भारत में 7, रूस
में 6, यूएई में 4 और कुछ अन्य देशों में स्थापित
किए जा रहे हैं। सारे के सारे संयंत्र शासकीय स्वामित्व में हैं।
चूंकि कम लागत वाले नए संयंत्रों के
किफायती निर्माण के लिए अभी तक कोई मॉडल मौजूद नहीं है, विकसित
देश मौजूदा संयंत्रों को पुनर्निर्मित और विस्तारित करने के लिए कार्य कर रहे हैं।
आईईए के आकलन के अनुसार, एक मौजूदा संयंत्र के
जीवनकाल को 20 वर्ष तक बढ़ाने की लागत आधे से एक अरब डॉलर बैठेगी। यह लागत, नए संयंत्र को स्थापित करने की लागत या पवन या सौर उर्जा
संयंत्र स्थापित करने की लागत से कम ही होगी और इसको तैयार करने के लिए ज़्यादा समय
भी नहीं लगेगा। अमेरिका में 98 सक्रिय संयंत्रों के लाइसेंस को 40 साल से बढ़ाकर 60
साल कर दिया गया है।
जॉनसन के उक्त लेख में एमआईटी के समूह
युनियन ऑफ कंसन्र्ड साइंटिस्ट के पेपर दी न्यूक्लियर पॉवर डिलेमा का भी ज़िक्र किया
गया है। यह पेपर, नाभिकीय उर्जा के प्रतिकूल अर्थशास्त्र और
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को थामने में इसके निहितार्थ को लेकर आइईए की चिंता को ही
प्रतिध्वनित करता है। एमआईटी का थिंक टैंक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए
राज्य के हस्तक्षेप से कार्बन क्रेडिट की प्रणाली को लागू करने और कार्बन स्तर को
कम करने वाले मानकों के लिए प्रलोभन देने की सिफारिश करता है। इसके साथ ही कम
कार्बन उत्सर्जन वाली टेक्नॉलॉजी के लिए सब्सिडी की सिफारिश भी करता है ताकि वे
प्रतिस्पर्धा कर सकें।
कितनी बिजली चाहिए?
एक ओर तो इंजीनियर और अर्थशास्त्री बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए हरित ऊर्जा के उत्पादन के तरीकों पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं हमें अपने द्वारा उपयोग की जाने वाली उर्जा कम करने के तरीके भी खोजना होगा। यह निश्चित रूप से एक कठिन काम है क्योंकि ऊर्जा हमारी व्यापार प्रणालियों का आधार है, और ऐसे परिवर्तन जिनका थोड़ा भी भौतिक प्रभाव है वे राजनैतिक रूप से असंभव होंगे। नाभिकीय उर्जा का कोई विकल्प नहीं है और उसमें भी कई बाधाएं हैं, यह विश्वास शायद आईईए और एमआईटी जैसी शक्तिशाली लॉबियों को मजबूर करे कि वे उत्पादन समस्या का समाधान खोजने की रट लगाना छोड़कर उपभोग कम करने का संदेश फैलाने का काम करें। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.greentechmedia.com/assets/content/cache/made/assets/content/cache/remote/https_assets.greentechmedia.com/content/images/articles/Nuclear_Generation_Power_XL_500_500_80_s_c1.jpg
शायद पहली बार एक यूएस न्यायाधीश ने सार्वजनिक डीएनए डैटाबेस, GED match, को आदेश दिया है कि वह पुलिस को उसके पास
उपलब्ध 13 लाख डीएनए प्रोफाइल को खंगालने दे। वास्तव में यह अनुमति एक आदतन
बलात्कारी को पकड़ने के लिए दी गई है। पुलिस चाहती है कि बलात्कारी व्यक्ति के दूर
के रिश्तेदारों की जानकारी प्राप्त हो जाए ताकि संदिग्ध व्यक्ति को पहचाना जा
सके।
उपभोक्ताओं का मानना है कि इस तरह के
अधिकार मिलने से ancestry.com और 23and Me ग्ड्ढ जैसी डीएनए साइट्स पर भी पुलिस द्वारा खोज की संभावना बन सकती है।
गौरतलब है कि कंपनी की इन साइट्स पर लोग स्वेच्छा से अपने डीएनए का नमूना जमा करते
हैं और यह जानकारी गोपनीय रहती है।
पुलिस ने पहले भी अपराध स्थल से मिले डीएनए
की GEDmatch डैटाबेस से तुलना करके कई अन्य मामलों को
सुलझाया है। लेकिन उपभोक्ताओं में इसकी वास्तविक चिंता डैटा की गोपनीयता को लेकर
है। साथ ही ऐसी आशंका भी है कि जिन रिश्तेदारों ने कभी डीएनए परीक्षण नहीं करवाया
है वो भी संदेह के दायरे में आ सकते हैं। ज्ञात रहे कि इससे पहले GEDmatch केवल उन्हीं लोगों के डीएनए प्रोफाइल
उपलब्ध कराती थी जिसकी सहमति खुद लोगों ने दी थी। यू.एस. डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने
भी एक संशोधन जारी करके केवल हिंसक अपराधों और उपभोक्ताओं की अनुमति से ही जानकारी
देने की व्यवस्था कर दी। ताज़ा आदेश इस सबको अनदेखा करके आया है।
मेरीलैंड केरी स्कूल ऑफ लॉ की प्रोफेसर
नताली रैम से साक्षात्कार में कुछ बातें सामने आई हैं। इस मामले को एक विशेष
परिस्थिति के रूप में लिया जा सकता है। लेकिन यदि 13 लाख लोगों के डैटाबेस में 60
प्रतिशत युरोपीय मूल के अमेरिकी हैं जिनका दूर का चचेरा भाई या बहन या कोई करीबी
रिश्तेदार इस डैटाबेस में है तो उसको ट्रैक करना काफी आसान हो जाएगा। इस संदर्भ
में केवल डीएनए के आधार पर कुछ गुनहगारों को पकड़ने के लिए पुलिस एजेंसियों के हाथ
कई बेगुनाह लोगों का डीएनए होगा।
हालांकि GEDmatch तो एक छोटा मोटा डैटाबेस है लेकिन 23and Me और ancestry.com जैसी अन्य कंपनियों के पास यदि कोई ऐसा
वारंट आता है तो वे इसे चुनौती देने के लिए तैयार हैं।
यदि कोई कंपनी इस वारंट का अनुपालन करने से
मना कर देती है तब इस वारंट पर और अधिक कार्य किया जाएगा ताकि इसको वैध बनाया जा
सके। वैकल्पिक रूप से यदि कंपनियां जानकारी दे भी देती हैं और किसी व्यक्ति के
अभियोजन की संभावना भी बनती है तो व्यक्ति गैर-कानूनी खोज के खिलाफ आवाज़ उठाकर
वारंट पर ही सवाल उठा सकता है। नताली का मानना है कि यह प्रक्रिया काफी जटिल है।
इस विषय में यह स्पष्ट नहीं है कि डीएनए कंपनी या अपराधी गोपनीयता के अधिकार के
तहत इस वारंट को चुनौती दे सकते हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रभावी ढंग से वारंट को
चुनौती देना मुश्किल है।
नताली का ऐसा मानना है कि यदि इस तरह के वारंट जारी होते रहे तो डीएनए डैटा रखने वाली साइट्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इसमें सबसे पहले तो सार्वजनिक आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। एक रास्ता है कि एक कानून बना दिया जाए जिसके तहत शासकीय एजेंसियों द्वारा फॉरेंसिक वंशावली खोजों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस द्वारा आनुवंशिक वंशावली की खोज पर कुछ सीमाएं लगाई जा सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)
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अब तक हुए कई अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हम
मनुष्य आम तौर पर उच्च तारत्व (या आवृत्ति) वाली ध्वनियों यानी तीखी आवाज़ों, जैसे
सीटी की आवाज़ के साथ किसी ऊंची जगह की कल्पना करते हैं। और अब बायोलॉजी लेटर्स
में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि कुत्ते भी ऐसा ही करते हैं। शोधकर्ताओं के
अनुसार यह अध्ययन इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि क्यों हम कुछ आवाज़ों को
खास भौतिक लक्षणों से जोड़कर देखते हैं।
दरअसल कई अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते
हैं कि हम उच्च तारत्व की ध्वनियों के साथ ऊंचाई,
उजली या छोटी वस्तुओं
की कल्पना करते हैं। लेकिन अब तक वैज्ञानिक आवाज़ के साथ इनके जुड़ाव के कारण की कोई
तार्किक व्याख्या नहीं कर पाए हैं। जैसे अध्ययन कहते हैं कि संभवत: ध्वनि और स्थान, आकार
या रंग आदि का यह जुड़ाव अनुभव से बना है। उदाहरण के तौर पर चूहे और पक्षियों जैसे
छोटे जीव आम तौर पर तीखी (पतली) आवाज़ निकालते हैं जबकि भालू जैसे बड़े जानवर भारी
(निम्न तारत्व वाली) आवाज़ें निकालते हैं। या यह भी हो सकता कि यह सम्बंध इसलिए बन
गया कि अंग्रेजी में ‘हाई’ और ‘लो’ शब्दों का इस्तेमाल आवाज़ और ऊंचाई दोनों के लिए
होता है।
युनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स की जीव व्यवहार
विज्ञानी ऐना कोर्ज़ेनिवोस्का और उनके साथियों का कुत्तों पर किया गया एक अध्ययन इस
बात को और समझने में मदद कर सकता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 101 कुत्तों को एक
गेंद के ऊपर-नीचे जाने का एनीमेशन दिखाया और कभी-कभी गेंद की गति के साथ ध्वनियां
सुनाई गर्इं। कभी गेंद के ऊपर जाने के साथ ध्वनि का तारत्व बढ़ता और नीचे आने के
साथ कम होता या, कभी इसके विपरीत होता। 64 प्रयोगों के बाद उन्होंने पाया कि
जब गेंद के ऊपर जाने के साथ तारत्व बढ़ता है तो
कुत्तों ने गेंद को 10 प्रतिशत अधिक वक्त तक देखा। इससे लगता है कि जानवर
आवाज़ का तारत्व बढ़ने को ऊंचे स्थान से जोड़कर देखते हैं। इस निष्कर्ष के आधार पर
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आवाज़ के प्रकार के साथ स्थान का सम्बंध भाषा की वजह से
नहीं बल्कि जन्मजात होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है।
बर्मिंगहैम युनिवर्सिटी के संज्ञान
विज्ञानी मार्कस पर्लमेन का कहना है कि इस अध्ययन की डिज़ाइन तो उचित है लेकिन
संभावना है कि कुछ अन्य कारक भी नतीजों पर असर डाल रहे हों। जैसे प्रयोग के दौरान
कुत्तों के मालिक नज़दीक बैठे थे, हो सकता है गेंद के ऊपर जाने और उसके साथ
उच्च तारत्व वाली आवाज़ बजने के वक्त अनजाने में उन्होंने कुत्तों को कुछ संकेत दिए
हों। या हो सकता है कि कुत्तों के मालिकों ने पहले कभी कुत्तों को आवाज़ पर प्रतिक्रिया
देने के लिए प्रशिक्षित किया हो।
लिहाज़ा,
पर्लमैन का सुझाव है
कि एक अन्य अध्ययन किया जाना चाहिए जिसमें कुत्ते के मालिक ऐसी भाषा बोलते हों
जिसमें ध्वनि के तारत्व को स्थान सम्बंधी शब्द से संबोधित ना किया जाता हो, जैसे
फारसी। फारसी भाषा में उच्च तारत्व की आवाज़ को पतली आवाज़ और निम्न तारत्व की आवाज़
को मोटी आवाज़ कहते हैं।
बहरहाल इस सम्बंध की व्याख्या के लिए आगे और विस्तार से अध्ययन करने की आवश्कता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/dog_1280p_0.jpg?itok=XXaw0X8a
एक नए आनुवंशिक अध्ययन का दावा है कि आधुनिक मनुष्य (होमो
सेपियन्स) की उत्पत्ति का विशिष्ट स्थान पता चल गया है। जीवाश्म और डीएनए
अध्ययनों के आधार पर यह तो पहले ही पता चल चुका है कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति
अफ्रीका में लगभग ढाई से तीन लाख वर्ष पहले हुई थी। लेकिन होमो सेपियन्स के
प्राचीन जीवाश्म पूरे अफ्रीका में पाए जाते हैं और अफ्रीकी जीवाश्मों में डीएनए
बहुत कम मिला है। इसलिए वैज्ञानिक एक विशिष्ट जन्मस्थान का पता लगाने में असमर्थ
रहे हैं।
इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 200 जीवित
लोगों के रक्त के नमूने लिए जिनके डीएनए के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। इनमें
खोइसन भाषा बोलने वाले नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के शिकारी और संग्रहकर्ता भी
शामिल थे। शोधकर्ताओं ने उनके माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mtDNA) की तुलना डैटाबेस में उपलब्ध 1000 से
अधिक अफ्रीकियों, खासकर दक्षिण अफ्रीकी लोगों,
के माइटोकॉन्ड्रियल
डीएनए से की। गौरतलब है कि mtDNA एक ऐसा डीएनए है जो केवल माताओं से विरासत में मिलता है।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने सभी डीएनए नमूनों में आपस में सम्बंध देखने की कोशिश
की।
पूर्व में किए गए अध्ययनों के इस निष्कर्ष
की पुष्टि इस अध्ययन से प्राप्त डैटा से हुई कि खोइसन भाषियों में पाया जाने वाला mtDNA क्रम – L0 – जीवित लोगों में सबसे पुराना mtDNA वंशानुक्रम है। नेचर में प्रकाशित
रिपोर्ट के अनुसार इस शोध से L0 की उत्पत्ति का समय भी निर्धारित हो जाता है – आज से लगभग
2 लाख वर्ष पूर्व। चूंकि यह क्रम आज केवल दक्षिण अफ्रीका के लोगों में पाया जाता
है तो इसका मतलब है कि L0 क्रम वाले लोग दक्षिण अफ्रीका में रहा करते थे और वही
समस्त जीवित मनुष्यों के पूर्वज हैं। सिडनी स्थित गार्वन मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट
की वेनेसा हेस और उनके साथियों का मानना है कि विशिष्ट रूप से यह स्थान आज के
उत्तरी बोत्सवाना का कालाहारी क्षेत्र है। हालांकि इसका अधिकतर क्षेत्र रेगिस्तान
में बदल चुका है लेकिन जलवायु आंकड़ों के अनुसार,
डेढ़-दो लाख वर्ष
पूर्व यह काफी हरा-भरा था जिसके नज़दीक अफ्रीका की सबसे बड़ी झील स्थित थी। टीम का
मानना है कि L0 mtDNA वाले लोग लगभग 1.3 से 1.1 लाख साल पूर्व
कालाहारी क्षेत्र में रहते थे।
बहरहाल,
कई विशेषज्ञ दक्षिण
अफ्रीका को मानव विकास का महत्वपूर्ण क्षेत्र तो मानते हैं लेकिन इस अध्ययन को
इतना व्यापक नहीं मानते हैं कि जीवित लोगों के डीएनए से मानव प्रजाति के जन्मस्थान
का सटीकता से पता लगाया जा सके। इन विशेषज्ञों का मानना है कि mtDNA के अलावा यदि शोधकर्ता पिता से प्राप्त
वाय गुणसूत्र के विकास या माता-पिता से प्राप्त जीन का पता लगाते तो उन्हें अलग
जवाब मिल सकते थे। हेस का मत है कि mtDNA भ्रूण के विकास के दौरान अन्य डीएनए की तरह नहीं बदलता है।
इसलिए इसका उपयोग महिला पूर्वजों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।
कुछ आलोचकों का मानना है कि खोइसन बोलने वाली L0 mtDNA वाली महिला पूर्वज 2 लाख वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका की एक बड़ी आबादी का हिस्सा थीं जिनके वंशज दक्षिण अफ्रीका के बाहर फैल गए। लंदन स्थित फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के आनुवंशिकीविद पोंटस स्कोग्लुंड का मानना है कि आबादियों में इतना अधिक मेलजोल होता है कि जीवित मनुष्यों के डीएनए से 70 हज़ार से 2 लाख वर्ष पहले की जनसंख्या के बारे में पता कर पानी काफी हद तक सीमित हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/homeland-map_1280p.jpg?itok=qH0hIqxX
न्यूयॉर्क में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर हाल ही में आयोजित
बैठक में स्वीडिश छात्रा ग्रेटा थनबर्ग ने सौ से भी अधिक देशों के प्रतिनिधियों को
दो तीखे बयान दिए। पहला, “आपने अपनी खोखली बातों से मुझसे मेरा बचपन
छीन लिया।” और दूसरा, “आप सभी, हम युवाओं के पास (पर्यावरण को पहुंचे
नुकसान को कम करने की…) उम्मीद लेकर आए हैं। आप लोगों की हिम्मत कैसे हुई?” जैसा
कि ग्रेटा के वक्तव्य पर दी हिंदू के 1 नवंबर के अंक में कृष्ण कुमार का
संवेदनशील विश्लेषण कहता है, वहां मौजूद (देश के प्रतिनिधि) श्रोताओं ने
यह नहीं स्वीकारा कि जलवायु परिवर्तन के लिए उनके उद्योग ज़िम्मेदार हैं; इसकी
बजाय वे इस बात पर सहमत हुए कि वे आने वाले दशक में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने
के सुविधाजनक लक्ष्यों को पूरा करेंगे। कृष्ण कुमार अपने लेख में आगे बताते हैं कि
ना सिर्फ हर अमीर देश, बल्कि सभी देशों में रहने वाले प्रत्येक अमीर व्यक्ति को अब
भी यह लगता है कि वे अपने और अपनी संतानों के लिए जलवायु परिवर्तन की समस्याओं से
राहत खरीद सकते हैं और उन्हें जलवायु परिवर्तन के परिणामों से बचा सकते हैं।
कार्बन-प्रचुर जीवाश्म र्इंधन को जला-जलाकर, जो
1750 के दशक में औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ था,
ही पृथ्वी का तापमान
2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। तापमान में यह वृद्धि मानव जीवन, जानवरों, पेड़-पौधों
और सूक्ष्मजीवों को प्रभावित कर रही है। समुद्र गर्म हो रहे हैं, बर्फ
पिघल रही है, और इसलिए ग्रेटा का यह आरोप पत्र है।
भारत की चुनौतियां
2015 में दुनिया भर के देश पेरिस में
इकट्ठे हुए थे और तब 197 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे कि वे साल 2030
तक वैश्विक तापमान को उद्योग-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री से अधिक नहीं होने देंगे।
इन हस्ताक्षरकर्ता देशों में भारत भी शामिल था। विष्णु पद्मनाभन ने अपने ब्लॉग में
भारत के समक्ष तीन बड़ी जलवायु चुनौतियों का ज़िक्र किया है। भारत ने वादा किया है
कि वह साल 2015 की तुलना में, साल 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को 33-35
प्रतिशत तक कम करेगा। ऐसा लगता है कि यह ज़रूरी है और इसे पूरा भी किया जा सकता है।
लेकिन इसे पूरा करने में भारत के सामने पहली चुनौती यह है कि भारत का ज़्यादातर
कार्बन उत्सर्जन (लगभग 68 प्रतिशत) ऊर्जा उत्पादन से होता है, जो
अधिकतर कोयला आधारित है। इसके बाद उद्योगों (लगभग 20 प्रतिशत) और खेती, खाद्य
और भूमि उपयोग (10 प्रतिशत) का नंबर है। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम
ऊर्जा के अन्य साधनों या रुाोतों का उपयोग करें,
जैसे पनबिजली, पवन, सौर, नाभिकीय
ऊर्जा वगैरह। भारत को उम्मीद है कि वह अपनी 40 प्रतिशत ऊर्जा इस तरह के गैर-कोयला
रुाोतों से प्राप्त कर पाएगा।
दूसरी चुनौती: खेती, भूमि
उपयोग और जल संसाधनों की बात करें तो ये भी जलवायु परिवर्तन में योगदान देते हैं।
कैसे? न्यूनतम समर्थन मूल्य,
सब्सिडी (रियायतें), 24
घंटे मुफ्त बिजली प्रदाय और अधिक पानी की ज़रूरत वाली फसलें इसके कुछ कारण हैं। समय
आ गया है कि हमें इन्हें रोकें और जांचे-परखे तरीकों को अपनाएं और नवाचारी तरीकों
पर काम करें। इनमें से कुछ तरीके हैं ड्रिप या टपक सिंचाई (जैसा कि इरुााइल ने
किया है), एयरोबिक खेती (जो पानी की बचत के लिए खेती का एक तरीका है
और इसमें खास गुणधर्मों के विकास पर शोध किया जाता है ताकि जड़ें अच्छे से फैलें और
ज़मीन में गहराई तक जाएं (जैसा कि बैंगलुरू की युनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस ने
किया है), बेहतर और अधिक पौष्टिक अनाज। भारत की सबसे अधिक पानी की खपत
करने वाली फसल धान पर इस तरीके को आज़मा कर पानी की बचत की जा सकती है। किसानों के
बीच अधिक पौष्टिक किस्मों (जैसे सीसीएमबी और एनआईपीजीआर द्वारा विकसित साम्बा मसूरी)
को बढ़ावा देना चाहिए। इत्तफाकन इस किस्म में कार्बोहाईड्रेट भी कम है तो यह
डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए अच्छी भी है। नरवाई (पराली) जलाना पूरी तरह बंद होना
चाहिए, हमें इसके बेहतर रास्ते तलाशने होंगे। इसके लिए किसी रॉकेट
साइंस की ज़रूरत नहीं है, भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ यह कर
सकते हैं। उन्हें इससे निपटने के बेहतर और सुरक्षित तरीके ढूंढने चाहिए।
और तीसरी चुनौती है प्राकृतिक तरीकों से
वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर को कम करना। इसके लिए वनीकरण और स्थानीय
किस्मों के पौधारोपण बढ़ाना चाहिए। यहां फिलीपींस सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का
अनुसरण करना फायदेमंद होगा। फिलीपींस में प्रत्येक छात्र/छात्रा को अपना स्कूली
प्रमाण पत्र या कॉलेज की डिग्री प्राप्त करने के पहले 10 स्थानीय पेड़ लगाकर उनकी
देखभाल करनी होती है। दरअसल स्थानीय पेड़ पानी सोखकर उसे जमीन में पहुंचाते हैं।
भारत ने वृक्षारोपण और वनीकरण के माध्यम से अतिरिक्त ‘कार्बन सोख्ता’ बनाने की
योजना बनाई है ताकि ढाई से तीन अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड कम की जा सके।
स्वास्थ्य के मुद्दे
कई अध्ययन बताते हैं कि कैसे जलवायु
परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान धीरे-धीरे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन गए हैं।
2010 में दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एमिली शुमैन का
पेपर – वैश्विक जलवायु परिवर्तन और संक्रामक रोग (Global climate
change and infectious diseases) – बताता है कि जब हम जीवाश्म र्इंधन जलाते हैं तो तापमान में वृद्धि होती है, जिससे
ग्रीष्म लहर (लू) चलती है और भारी वर्षा होती है। यह कीटों (और उनमें पलने वाले
जीवाणुओं और वायरस) के पनपने के लिए माकूल वातावरण होता है। गर्म होती जलवायु की
बदौलत ही हैजा, डायरिया जैसे जल-वाहित रोगों के अलावा मलेरिया, डेंगू
और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां भी बढ़ी हैं। ये बीमारियां हर भौगोलिक परिवेश में बढ़
रही हैं: पहाड़ी इलाके, ठंडे इलाके, रेगिस्तान जैसे गर्म इलाके और तटीय इलाके।
इसी संदर्भ में वी. रमना धारा द्वारा साल 2013 में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल
रिसर्च में प्रकाशित एक अन्य महत्वपूर्ण पेपर – जलवायु परिवर्तन और भारत में
संक्रामक रोग: स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए निहितार्थ (Climate change and infectious diseases in
India: implications for health care providers) – बताता है कि किस तरह समुद्र की सतह के बढ़ते तापमान के
कारण ऊष्णकटिबंधीय इलाकों में चक्रवात और तूफानों की संख्या बढ़ रही है जिससे बंगाल
की खाड़ी और अरब सागर के तटीय इलाकों में प्रदूषित पानी,
अस्वास्थ्यकर
परिस्थितियां, जनसंख्या का विस्थापन,
विषैलापन, भूख
और कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कुछ बीमारियां जानवरों से मानवों में फैलती
हैं और कुछ मानव से मानव में। इसका सबसे हालिया उदाहरण है निपाह वायरस जो चमगाड़ों
से मानव में फैलता है। इस मामले में केरल सरकार द्वारा उठाए गए त्वरित कदम सराहनीय
हैं जिसमें सरकार ने संक्रमित लोगों को अलग-थलग करने की फौरी व्यवस्था की थी।
सौभाग्य से, हमारी कई प्रयोगशालाएं और दवा कंपनियां, अन्य बीमारियों के लिए स्थानीय वनस्पति रुाोतों से दवाइयों और टीकों का निर्माण करने में स्वयं व अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर अनुसंधान कर रही हैं। हम इस कार्य को बखूबी कर सकते हैं और विश्व में इस क्षेत्र के अग्रणी भी बन सकते हैं। ध्यान रखने वाली बात है कि हमारी दवा कंपनियां विश्व भर में लोगों को वहनीय कीमत पर दवाइयां उपलब्ध कराती रही हैं, हमारी दवा कंपनियां विश्व के लगभग 40 प्रतिशत बचपन के टीके उपलब्ध कराती हैं और इनमें से कुछ दवा कंपनियां मौजूदा महामारियों के टीके बनाने के लिए प्रयासरत हैं। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th.thgim.com/sci-tech/science/u3zg0f/article29931762.ece/alternates/FREE_660/10TH-SCIDRIP-IRRGN1
अतीत में हुर्इं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं ने बड़ी
संख्या में प्रजातियों को खत्म कर दिया था,
लेकिन उस वक्त कई
प्रजातियों को इतना वक्त मिला था कि वे इस परिवर्तन के साथ तालमेल बना सकीं और
बेहतर समय आने तक अपने वंश को जीवित रख सकीं। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की हालिया
रफ्तार को देखते हुए एक सवाल यह उठता है कि क्या वर्तमान जलवायु परिवर्तन प्रकृति
को इतनी गुंजाइश देगा।
इस संदर्भ में विक्टोरिया रैडचक और जर्मनी, आयरलैंड, फ्रांस, नेदरलैंड, यू.के., चेक
गणतंत्र, बेल्जियम, स्वीडन,
कनाडा, स्पेन, यू.एस., जापान, फिनलैंड, नॉर्वे, स्विटज़रलैंड
और पोलैंड के 60 अन्य वैज्ञानिकों ने नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित पेपर
में इस सवाल का जवाब देने का प्रयास किया है। यह पेपर 58 पत्रिकाओं में प्रकाशित
10,090 अध्ययनों के सार और 71 अध्ययनों के डैटा पर आधारित है। इसमें उन्होंने इस
बात का आकलन किया है कि जीवों में हो रहे शारीरिक बदलाव क्या जलवायु परिवर्तन के
साथ अनुकूलन बनाने की दृष्टि से हो रहे हैं। अध्ययन के अनुसार कई प्रजातियों में
तो अनुकूलन हो रहा है लेकिन अधिकांश प्रजातियां इस दौड़ में हारती नज़र आ रही हैं।
अध्ययन के अनुसार,
जलवायु परिवर्तन
प्रजातियों के जीवित रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और प्रजातियों की
विलुप्ति के चलते पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों के परस्पर समर्थक संतुलन में
कमी आती है। जीव अपनी आबादी को तब ही बनाए रख सकते हैं जब उनमें जलवायु परिवर्तन
की प्रतिक्रिया स्वरूप इस तरह के शारीरिक या व्यावहारिक बदलाव हों,
जो जलवायु परिवर्तन
के प्रभाव को कम करते हों या उसके अनुकूल हों। ऐसा या तो शारीरिक अनुकूलन के
द्वारा हो सकता है (जैसे आहार में परिवर्तन के साथ-साथ पाचक रसों में परिवर्तन) या
विकास के छोटे-छोटे कदमों से हो सकता है, या फिर किसी अन्य क्षेत्र में प्रवास करने
से संभव हो सकता है। लेकिन शारीरिक अनुकूलन में भी वक्त लगता है। जैसे पर्वतारोही
अधिक ऊंचाइयों पर चढ़ने के पहले बीच में रुककर खुद को पर्यावरण के अनुरूप ढालते हैं, तब
आगे चढ़ाई करते हैं। किसी प्रजाति में वैकासिक परिवर्तन पर्यावरण के प्रति ज़्यादा
अनुकूलित किस्मों के चयन द्वारा होता है, और ऐसा होने में तो कई पीढ़ियां लग जाती
हैं। पेपर के अनुसार, प्रजातियों की संख्या का पूर्वानुमान लगाने और योजनाबद्ध
तरीके से हस्तक्षेप करने के लिए यह पता करना महत्वपूर्ण है कि पिछले कुछ दशकों में
प्रजातियों में आए बदलावों में से कितने ऐसे हैं जो जलवायु परिवर्तन के जवाब में
हुए हैं।
अनुकूलन का एक उदहारण है – प्रजनन करने या अंडे देने का समय इस तरह
बदलना कि उस समय संतान को खिलाने के लिए भोजन के स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध
हों। लेखकों ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया है कि यूके में पिछले 47 वर्षों
में पक्षियों की एक प्रजाति के अंडे देने का समय औसतन 14 दिन पहले खिसक गया है।
अध्ययन के अनुसार यह एक ऐसा मामला है जहां “पर्यावरण के हिसाब से एक-एक जीव के
व्यवहार में बदलाव ने पूरी प्रजाति को तेज़ी से बदलते परिवेश के साथ बारीकी से
समायोजन करने में सक्षम बनाया है।”
एक अन्य अध्ययन में, प्रतिकूल-अनुकूलन
का एक मामला सामने आया है। एक पक्षी प्रजाति है जो आर्कटिक ग्रीष्मकाल के दौरान
प्रजनन करती है। जब ये पक्षी जाड़ों में उष्णकटिबंधीय इलाके की ओर पलायन करते हैं
तब वे काफी अनफिट साबित होते हैं। गर्मियों में जन्मे चूज़ों में अनुकूलन यह होता
है कि वे छोटे आकार के होते हैं ताकि शरीर से अधिक ऊष्मा बिखेरकर गर्मियों का
सामना अधिक कुशलता से कर सकें। लेकिन छोटे पक्षियों की चोंच भी छोटी होती है जिससे
उनको सर्दियों में प्रवास के दौरान काफी नुकसान होता है क्योंकि इन इलाकों में
भोजन थोड़ा गहराई में दबा होता है और छोटी चोंच के कारण वे पर्याप्त भोजन नहीं जुटा
पाते।
रेनडियर जैसे शाकाहारी ऐसे मौसम में संतान
पैदा करने के लिए विकसित हुए थे जब पौधे उगने का सबसे अच्छा मौसम होता है। प्रजनन
काल तो दिन की लंबाई से जुड़ा होने के कारण यथावत रहा जबकि पौधों की वृद्धि का मौसम
स्थानीय तापमान से जुड़ा था। जलवायु परिवर्तन के साथ यह समय बदल गया (जबकि दिन-रात
की अवधि नहीं बदली)। एक अध्ययन के अनुसार इन प्राणियों में मृत्यु दर तो बढ़ी ही है, साथ-साथ
जन्म दर में चार गुना कमी आई है।
वैसे तो समय के साथ सभी प्रजातियों के रूप
और व्यवहार में परिवर्तन होते हैं, लेकिन इस अध्ययन का उद्देश्य उन परिवर्तनों
की पहचान करना था जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन के उदाहरण हों। इस पेपर के
अनुसार ऐसा तभी माना जा सकता है जब तीन चीज़ें हुई हों। पहली यह कि जलवायु परिवर्तन
हुआ हो। दूसरी यह कि जीवों की शारीरिक विशेषताओं में बदलाव सिर्फ जलवायु परिवर्तन
के कारण हुआ हो, किसी अन्य कारण से नहीं। और तीसरी यह कि परिवर्तन उन
लक्षणों के चयन के कारण हुआ हो जो जीवों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद
करते हैं।
लेखकों के अनुसार तीसरी स्थिति के परीक्षण
के लिए ऐसे डैटा की आवश्यकता होगी जो किसी एक प्रजाति की निश्चित आबादी की कई
पीढ़ियों के लिए एकत्रित किए गए हों। शोधकर्ताओं की इस विशाल टीम ने उन अध्ययनों को
खोजा है जो इस बात की पड़ताल करते हैं कि तापमान और वर्षा या दोनों विभिन्न जीवों
की शारीरिक बनावट या जीवन की घटनाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। विशाल उपलब्ध
डैटा में से उन्हें पक्षियों के सम्बंध में उपयोगी जानकारी मिली। और यह इसलिए संभव
हुआ क्योंकि पक्षियों के बारे में लंबी अवधियों की जानकारी प्राप्त करना
अपेक्षाकृत आसान है – घोंसला बनाने का समय,
अंडे देने और उनके
फूटने का समय, और गतिशीलता।
पेपर के अनुसार,
जलवायु परिवर्तन पर
जीवों की प्रतिक्रिया सम्बंधी कई पूर्व में किए गए अध्ययन प्रजातियों के फैलाव और
उनकी संख्या में आए बदलाव पर केंद्रित थे। जलवायु परिवर्तन के चलते जीवों के
व्यवहार, आकार या शरीर विज्ञान में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन बहुत
कम किया गया है। और प्रजातियों के फैलाव तथा आबादी की गणना करने वाले मॉडल्स में
इस संभावना को ध्यान में नहीं रखा गया था कि प्रजाति में अनुकूलन भी हो सकता है।
लिहाज़ा, लेखकों के अनुसार उनके वर्तमान “अध्ययन ने बदलते पर्यावरण
में प्रजातियों की प्रतिक्रियाओं के समयगत पहलू पर ध्यान केंद्रित करके महत्वपूर्ण
योगदान दिया है।” उनके अनुसार “हमने दर्शाया है कि कुछ पक्षियों ने गर्म जलवायु के
मुताबिक अपने जीवनचक्र की घटनाओं के समय को बदल लिया है। अध्ययन इस बात को
रेखांकित करता है कि प्रजातियां अपनी ऊष्मा सम्बंधी ज़रूरतों का समाधान उसी स्थान
पर खोज सकती हैं और इसके लिए भौगोलिक सीमाओं में बदलाव ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता, हमें
सभी प्रजातियों में जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन के प्रमाण नहीं मिले हैं, और
इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अनुकूल परिवर्तन करने वाले जीव भविष्य में बने
ही रहेंगे।”
लेखक आगे बताते हैं कि जिन प्रजातियों का
अध्ययन किया गया है वे सुलभ और काफी संख्या में उपलब्ध हैं और इनके बारे में डैटा
आसानी से एकत्रित किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि “हमें डर है कि
दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों की आबादियों की निरंतरता का पूर्वानुमान अधिक
निराशाजनक होगा।”
निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि
इस सदी के अंत तक बहुत-सी प्रजातियों के विलुप्त होने की संभावना है जो काफी
चिंताजनक है। ऐसे कई लोग हैं जो यह मानते हैं कि जैव तकनीक ही वह नैया है जो हमें
21 सदी पार करा देगी।
सच है, उपरोक्त अध्ययन वनस्पति प्रजातियों पर नहीं हुए हैं। जलवायु परिवर्तन से पेड़-पौधे भी प्रभावित होते हैं। और जंतु वनस्पतियों पर निर्भर होते हैं। इस अध्ययन के परिणाम शायद बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों के मामले में भी सच्चाई से बहुत दूर न हों। इसलिए जैव विविधता में भारी गिरावट वनस्पति जगत में भी दिखाई देगी और आने वाले दशकों में यह पौधों की भूमिका के लिए ठीक नहीं होगा जिसको लेकर हम इतने आश्वस्त हैं। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cosmos-magazine.imgix.net/file/spina/photo/19794/190723-parus_full.jpg?fit=clip&w=835
कार कंपनियां काफी संख्या में बिजली-चालित वाहन (ईवी) बेच रही
हैं। इलेक्ट्रिक वाहन की सबसे बड़ी समस्या इसके चार्ज होने का समय है। पेट्रोल-डीज़ल
से चलने वाले वाहनों में जहां कुछ ही मिनटों में र्इंधन भरा सकता है, वहीं
बिजली से चलने वाले वाहनों को सुपरचार्जर की मदद से चार्ज होने में भी 50 मिनट तक
का समय लग जाता है। लेकिन एक नई तकनीक के उपयोग से इसमें बदलाव आ सकता है।
बैटरी चार्जिंग की गति को बढ़ाने का एक
तरीका तो यह है कि चार्जिंग के दौरान बैटरी का तापमान बढ़ाकर रखा जाए। तापमान बढ़ने
पर बैटरी के अंदर की रासायनिक अभिक्रियाएं तेज़ हो जाती हैं। लेकिन उच्च तापमान पर
बैटरी के घटक जल्दी खराब हो सकते हैं।
अब शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक खोज निकाली
है। उनके अनुसार यदि चार्जिंग के दौरान बैटरी का तापमान बीच-बीच में कुछ समय के
लिए बढ़ाया जाए तो घटकों के बिगड़ने की प्रक्रिया को रोका जा सकता है और चार्जिंग भी
तेज़ी से किया जा सकता है। एक चार्जिंग उपकरण को केवल 10 मिनट के लिए 60 डिग्री
सेल्सियस तक गर्म करके वे लीथियम आयनों को ग्रेफाइट की परतों में शामिल करने में
कामयाब रहे। एनोड का संघटन यही होता है। यह बैटरी को रिचार्ज करने का प्रमुख चरण
होता है। जूल पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यदि इस प्रक्रिया को
बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके तो पारंपरिक लीथियम आयन बैटरियों की ड्राइविंग
रेंज को 320 किलोमीटर बढ़ाया जा सकता है। परीक्षण के दौरान गर्म की गई बैटरियां
काफी स्थिर रहीं और 1700 बार चार्ज-डिस्चार्ज करने के बाद भी उनमें ज़्यादा बिगाड़
नहीं हुआ।
आगे शोधकर्ता चार्जिंग समय को और कम करके आधा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बिजली चालित वाहनों को 5 मिनट में चार्ज किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://i.dailymail.co.uk/1s/2019/10/30/15/14579906-0-image-a-3_1572449691343.jpg
ब्लैक होल विशाल खगोलीय पिंड हैं जो आसपास की हर चीज़ को निगल
जाते हैं। इनका गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि प्रकाश तक इससे बच नहीं सकता।
ब्लैक होल मूलत: विशाल तारे ही थे जो विस्फोटक अंत के बाद ब्लैक होल में परिवर्तित
हुए हैं, इसलिए इनके अध्ययन से ब्रह्मांड के कामकाज और तारों के जन्म
और मृत्यु की गाथा तैयार करने में मदद मिलती है।
तारों के ऐसे विस्फोटक अंत और पतन के बाद
दो अलग-अलग तरह के पिंड बन सकते हैं। यदि मूल तारा पर्याप्त विशाल था, तो
विस्फोट के बाद वह ब्लैक होल बन जाता है, अन्यथा वह एक छोटे न्यूट्रॉन तारे में
परिवर्तित हो जाता है।
ब्लैक होल जब अपने आसपास के तारों से
पदार्थ चूसते हैं तब एक्स किरणों का उत्सर्जन होता है। इन्हीं एक्स किरणों की मदद
से ब्लैक होल का पता चलता है। दूसरी ओर, दूर की निहारिकाओं में, दो
ब्लैक होल के विलय या न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से उत्पन्न होने वाली गुरुत्व
तरंगें इनका सुराग देती हैं।
शोधकर्ताओं के एक समूह ने सोचा कि क्या
अपेक्षाकृत कम द्रव्यमान वाले ब्लैक होल भी हो सकते हैं जो लाक्षणिक एक्स-किरणों
का उत्सर्जन नहीं करेंगे। एक संभावना यह है कि ऐसा कोई (फिलहाल काल्पनिक) ब्लैक
होल किसी अन्य तारे के साथ बाइनरी तंत्र में मौजूद हो। इसमें वह दूसरे तारे से
इतना दूर हो सकता है कि वह उसके पदार्थ को ज़्यादा न निगल सके। ये छोटे ब्लैक होल
इतनी एक्स-किरणों का उत्सर्जन नहीं करेंगे जिन्हें देखा जा सके। तो ये खगोलविदों
की नज़रों से अदृश्य रहेंगे।
थॉमसन की टीम ने ऐसे संभावित ब्लैक होल की
तलाश में बाइनरी सिस्टम के उस दूसरे पिंड में सबूत खोजने की कोशिश की है।
शोधकर्ताओं ने एपोजी दूरबीन में उपलब्ध प्रकाश वर्णक्रम की जानकारी को खंगाला।
यहां आकाशगंगा के 1 लाख से अधिक तारों द्वारा उत्सर्जित विभिन्न तरंग लंबाइयों के
प्रकाश सम्बंधी जानकारी थी।
इस सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी से
प्रत्येक तारे के बदलते वर्णक्रम यानी उनसे निकलने वाले प्रकाश में बदलती तरंग
लंबाइयों का पता चला। यदि शोधकर्ता वर्णक्रम में किसी भी प्रकार का बदलाव देखते
यानी यदि उसकी तरंग लंबाइयां लाल या नीले रंग की ओर खिसकती दिखती तो इसका मतलब यह
होता कि वह तारा एक अनदेखे साथी के साथ परिक्रमा कर रहा है।
इसके बाद,
शोधकर्ताओं ने एक
अन्य सर्वेक्षण आल-स्काई ऑटोमेटेड सर्वे फॉर सुपरनोवा की मदद से उन तारों की चमक
में बदलाव को देखा जिनके बारे में संदेह था कि वे ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहे
हैं। उन्होंने उन तारों की खोज की जिनका प्रकाश लाल और नीले की ओर सरकने के
साथ-साथ तेज़-मद्धिम भी हो रहा था।
इस प्रकार शोधकर्ताओं ने पाया कि आकाशगंगा
में 10,000 प्रकाश वर्ष दूर औरिगा तारामंडल के पास एक तारा है जो किसी एक विशाल
अदृश्य पिंड के साथ गुरुत्वाकर्षण से बंधा लगता है। अनुमान है कि उस अदृश्य पिंड
का द्रव्यमान सूर्य से 3.3 गुना अधिक होगा। यह एक न्यूट्रॉन तारे की तुलना में
काफी बड़ा है लेकिन इतना भी बड़ा नहीं कि इसकी तुलना किसी ज्ञात ब्लैक होल से की जा
सके। सबसे बड़े ज्ञात न्यूट्रॉन स्टार का द्रव्यमान सूर्य से 2.1 गुना ज़्यादा है
जबकि सबसे छोटा ज्ञात ब्लैक सूर्य के मुकाबले 5-6 गुना वज़नी है।
ब्रह्मांड विज्ञानी डेजन स्टोकोविक का विचार है कि यह शायद कम द्रव्यमान का ब्लैक होल है। दूसरी ओर थॉमसन का विचार है कि यह संभवत: आज तक ज्ञात सबसे वज़नी न्यूट्रॉन स्टार है। इतना तो तय है कि यह एक आसाधारण तारा है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.technologyreview.com/i/images/307238767079815553563o.jpg?sw=768&cx=0&cy=304&cw=1280&ch=720
टेट्रॉडोटॉक्सिन ज़हर पफरफिश का घातक हथियार है। यह ज़हर ऐसा
खतरनाक तंत्रिका विष है कि एक अकेली पफरफिश में मौजूद इसकी मात्रा दर्जनों
शिकारियों को पंगु कर सकती है और मार सकती है। और यदि कोई मनुष्य पफरफिश का मांस
खा ले तो पंगु हो सकता है। लेकिन टॉक्सिकॉन पत्रिका में प्रकाशित ताज़ा
अध्ययन बताता है कि यह ज़हर स्वयं पफरफिश में सर्वथा अलग उद्देश्य की पूर्ति करता
है: यह पफरफिश को तनाव-मुक्त रखता है।
टेट्रॉडोटॉक्सिन (TTX) दरअसल एक तंत्रिका विष है। टाइगर पफरफिश (Takifugu
rubripes) स्वयं TTX नहीं बनातीं बल्कि अपने आहार में शामिल बैक्टीरिया द्वारा बनाए गए TTX को अपने अंगों और त्वचा में जमा करके रखती है। प्रयोगशाला में देखा गया है कि
जिन पफरफिश के आहार में बदलाव किया गया उन्होंने अपनी विषाक्तता खो दी थी।
विकसित होती पफरफिश को TTX किस तरह प्रभावित करता है यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में एक
महीने तक कुछ युवा पफरफिश के आहार में शुद्ध TTX मिलाया। अध्ययन में
पाया गया कि TTX रहित आहार वाली पफरफिश की तुलना में TTX युक्त आहार वाली
पफरफिश 6 प्रतिशत अधिक लंबी और 24 प्रतिशत अधिक भारी थीं। इसके अलावा वे कम
आक्रामक थीं और एक-दूसरे के पिछले पिच्छ को कम कुतर रहीं थीं।
वृद्धि की दर और आक्रामकता, दोनों
पर तनाव का असर होता है। इसलिए शोधकर्ताओं ने पफरफिश में तनाव सम्बंधी दो हार्मोन
का भी अध्ययन किया: रक्त में कॉर्टिसोल और मस्तिष्क में कॉर्टिकोट्रॉपिन-रीलीज़िंग
हार्मोन। पाया गया कि जिन पफरफिश को TTX नहीं दिया गया था उनमें इन हार्मोन्स का
स्तर अधिक था। यानी वे अधिक तनावग्रस्त थीं।
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इन मछलियों में TTX ना सिर्फ शिकारियों से बचने या उन्हें दूर रखने का काम करता है बल्कि युवा पफरफिश के स्वस्थ विकास के लिए भी ज़रूरी होता है। कुछ अन्य अध्ययन बताते हैं कि TTX से रहित युवा पफरफिश घातक और जोखिमपूर्ण निर्णय लेती हैं। फिलहाल यह अस्पष्ट है कि TTX पफरफिश में तनाव कैसे कम करता है। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/inline__450w__no_aspect/public/pufferfish_1280p_0.jpg?itok=oxf2eSuu