आम फलों का राजा क्यों है? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

देश में आम का मौसम जारी है, और इसी के साथ यह बहस भी कि आम की कौन सी किस्म सबसे बढ़िया है। हम तेलंगाना के लोगों का कहना है कि ‘बंगनपल्ली’ और ‘बेनिशां’ आम का कोई सानी नहीं है; आम की कोई भी अन्य किस्म इनके आसपास भी नहीं ठहरती। मेरी पत्नी और उनका परिवार गुजरात से है; उनका कहना है कि सबसे अच्छे आम रत्नागिरी या हापुस (Alphonso) हैं। और उत्तर प्रदेश के रहवासी मेरे दोस्त दसहरी आम के गुण गाते नहीं थकते।
आम के बगीचे लगाने, पैदावार और आम के शौकीन लोगों के हिसाब से भारत पहले नंबर पर है और फिर चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस, पाकिस्तान और मेक्सिको का नंबर आता है। हालांकि, दुनिया भर में पैदा होने वाले कुल आमों में से 54.2 प्रतिशत के योगदान साथ भारत आम उत्पादन में सबसे अव्वल है। हम न सिर्फ सबसे ज़्यादा आम खाते हैं, बल्कि निर्यात भी करते हैं। पिछले साल हमने 28,000 मीट्रिक टन आम निर्यात किए थे और इससे करीब 4 अरब रुपए कमाए थे।
डॉ. के. टी. अचया अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में बताते हैं कि आम मूलत: भारत का देशज है, जिसे उत्तरपूर्वी पहाड़ों और म्यांमार में उगाया जाता था, और पड़ोसी देशों में निर्यात किया जाता था। आजकल, आम के बगीचे उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लगाए जाते हैं; प्रत्येक राज्य के फलों का अपना विशेष स्वाद होता है।
पिछली गणना के अनुसार, भारत में आम की 1000 से अधिक किस्में हैं। इतनी विविध किस्मों का श्रेय जाता है आम के पौधों की आसान ग्राफ्टिंग को। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तीन केन्द्र आम अनुसंधान में अग्रणी हैं। इसके अलावा, नई दिल्ली स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी आम के पौधे के बुनियादी जीव विज्ञान को समझने के लिए उसके जीनोम का विश्लेषण कर रहा है। इस संस्थान के डॉ. नागेंद्र सिंह और उनके साथियों द्वारा इंडियन जर्नल ऑफ दी हिस्ट्री ऑफ साइंस में प्रकाशित शोध पत्र में इस पहलू पर चर्चा की गई है। हाल ही में, आर. सी. जेना और पी. के. चांद ने भारतीय आम के डीएनए में विविधता का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है, जो बताता है कि हर क्षेत्र के आम की आनुवंशिकी में विविधता होती है, नतीजतन अलग-अलग जगहों के आम का आकार, रंग और स्वाद अलग होता है (साइंटिफिक रिपोर्ट, 2021)।
आम को फलों का राजा क्यों कहा जाता है? पूरे देश में, आम के अलावा कई अन्य मौसमी फल भी मिलते हैं और खाए जाते हैं। इनमें से कुछ मौसमी फल हैं अंगूर, अमरूद, कटहल, पपीता, संतरा। फिर, केले जैसे कुछ फल साल भर मिलते हैं। फिर भी, आम को फलों का राजा कहा जाता है। इसका कारण यह है कि आम न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि यह सबसे स्वास्थ्यप्रद भी है; अन्य फलों के मुकाबले एक आम से अधिक विटामिन A, B, C, E और K, तथा अन्य धात्विक यौगिक (मैग्नीशियम, कॉपर, पोटेशियम), और एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्वास्थ्य लाभ कई अन्य फलों से भी मिलते हैं, लेकिन आम सबमें अव्वल है क्योंकि इसमें अन्य की तुलना में विटामिन, खनिज और फाइबर सबसे अधिक होते हैं। इसलिए इसकी बादशाहत है।
अमेरिका के क्लीवलैंड क्लीनिक की वेबसाइट पर एक दिलचस्प लेख है, जिसका शीर्षक है: मैंगोलिशियस: आम के प्रमुख छह स्वास्थ्य लाभ (Mangolicious: the top six health benefits of mango)। ये लाभ हैं :
यह आपका पेट दुरुस्त करता है; इसका उच्च फाइबर परिमाण कब्ज़ और पेट फूलने से निपटने में मदद करता है;
आम भूख को नियंत्रित करने में मदद करता है, जो आपको अपने स्वास्थ्यकर खाने के लक्ष्यों पर टिके रहने में मदद कर सकता है;
आम में मौजूद विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट बालों और त्वचा को स्वस्थ रखते हैं;
इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं;
आम खाने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है; और
आम में मौजूद एक एंटीऑक्सीडेंट – मैंगिफेरिन – कुछ प्रकार के कैंसर को रोकने में मदद करता है। और तो और, हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने भी यह पता लगाया है कि मैंगिफेरिन अल्सर को कम करता है।
स्वाद, किस्में, उपलब्धता और स्वास्थ्य लाभ – इन सभी के मद्देनज़र चलिए हम सभी अपने-अपने पसंदीदा बादशाह आम का लुत्फ उठाएं! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मल के ज़रिए बीज फैलाने वाला सबसे छोटा जीव

मात्र 1.1 सें.मी. लंबा, खुरदुरा-सा दिखने वाला वुडलाउज़ (Porcellio scaber) एक अकशेरुकी प्राणी है, जो सड़ती-गलती वनस्पतियों पर अपना जीवन यापन करता है। यह एक प्रकार की दीमक है। पीपल, प्लांट्स, प्लेनेट पत्रिका में प्रकाशित एक ताज़ा अध्ययन बताता है कि वुडलाउज़ एक कुशल माली की तरह काम करता है; साथ ही यह मल के ज़रिए बीज फैलाने वाला अब तक का ज्ञात सबसे छोटा जीव है।
बीजों को दूर-दूर तक फैलाने में बड़े जानवरों और पक्षियों की भूमिका तो काफी समय से पता है और सराही जाती है, लेकिन इसमें वुडलाउज़ और इस जैसे कई अन्य छोटे जीवों या कीटों की भूमिका को इतनी तवज्जो नहीं मिली है।
इसलिए कोबे युनिवर्सिटी के केंजी सुएत्सुगु और उनके दल ने कीटों की भूमिका पर थोड़ा प्रकाश डालने के उद्देश्य यह अध्ययन किया। उन्होंने एक पौधे सिल्वर ड्रैगन (Monotropastrum humile) और अकशेरुकी जीवों के आपसी सम्बंध या लेन-देन को समझने का प्रयास किया। गौरतलब है कि सिल्वर ड्रैगन के बीज धूल के कणों जैसे महीन होते हैं।
अध्ययन में उन्होंने पौधों के करीब कुछ स्वचालित डिजिटल कैमरे लगाकर इनके फलों को खाते कीटों व अन्य अकशेरुकी जीवों की 9000 से अधिक तस्वीरें प्राप्त कीं।
अब, यह पता करने की ज़रूरत थी कि कीटों के पाचन तंत्र से गुज़रने के बाद क्या फलों के बीज साबुत बचे रहते हैं? इसके लिए शोधकर्ताओं ने तीन अकशेरुकी जीवों – ऊंट-झींगुर, रफ वुडलाउज़ और कनखजूरे – को सिल्वर ड्रैगन के फल खिलाए और सूक्ष्मदर्शी से इनके मल का विश्लेषण किया।
अंत में उन्होंने यह पता किया कि मल से त्यागे गए बीज अंकुरित होने में सक्षम हैं या नहीं। ऊंट-झींगुर अंकुरण-क्षम बीजों को फैलाने में कुशल थे। इसके अलावा यह भी पता चला कि वुडलाउज़ और कनखजूरों द्वारा त्यागे गए बीजों में से करीब 30 प्रतिशत में अंकुरण की क्षमता बरकरार थी।
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस शोध से इसी तरह के बीज फैलाने वाले अन्य जीवों को पहचानने में और उनके महत्व के चलते उनका संरक्षण करने में मदद मिलेगी। क्योंकि किसी पौधे के जितने विविध बीज वाहक होंगे उतना उनके लिए बेहतर होगा। (स्रोत फीचर्स)

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नील नदी कभी पिरामिडों के पास से गुज़रती थी

मिस्र के पिरामिड प्राचीन दुनिया के सात अजूबों में शुमार हैं, और पुरातत्वविदों के लिए पड़ताल का विषय रहे हैं। गौरतलब है कि ये पिरामिड गीज़ा से लेकर लिश्त तक के रेगिस्तानी इलाके में फैले हुए हैं। यहां से नील नदी कई किलोमीटर दूर बहती है। पुरातत्वविदों को इस सवाल ने हमेशा से परेशान किया है कि यदि प्राचीन समय में भी नील नदी इतनी दूर बह रही थी तो पिरामिडों को बनाने के लिए इतने भारी-भरकम पत्थरों को ढोना कितना मुश्किल रहा होगा। कैसे ढोया गया होगा इस सामग्री को? जबकि कुछ दस्तावेज़ कहते हैं कि पिरामिड को बनाने के लिए सामग्री नावों से लाई जाती थी, लेकिन यदि नदी इतनी दूर है तो ढुलाई कैसे होती होगी?
अलबत्ता, वैज्ञानिकों को काफी समय से यह भी संदेह था कि हो न हो, उस समय नील नदी इन स्थानों के नज़दीक से गुज़रती होगी, जिसने पत्थरों की ढुलाई में मदद की होगी। उनके इस संदेह का आधार था नील नदी के रास्ता बदलने की प्रवृत्ति; देखा गया है कि टेक्टोनिक प्लेटों में हुई बड़ी हलचल के कारण पिछली कुछ सदियों में नील नदी पूर्व की ओर कई किलोमीटर खिसक गई है। साथ ही, अध्ययनों में गीज़ा और लिश्त के बीच के स्थलों पर अतीत में कभी यहां बंदरगाह की उपस्थिति और ऐसे अन्य सुराग मिले थे जो कभी यहां नदी होने के संकेत देते थे। लेकिन इन अध्ययनों में नदी के सटीक मार्ग पता नहीं लगाया जा सका था।
ताज़ा अध्ययन में नॉर्थ कैरोलिना युनिवर्सिटी के भू-आकृति विज्ञानी एमान गोनीम की टीम को इन स्थलों पर एक सूखे हुए नदी मार्ग सरीखी रचना दिखी, जो लगभग 60 किलोमीटर लंबी थी, खेतों के बीच से गुज़र रही थी और करीब उतनी ही गहरी और चौड़ी थी जितनी आधुनिक नील नदी है।
अब बारी थी यह जांचने की कि क्या यह मार्ग किसी प्राचीन नदी का हिस्सा था? मार्ग से लिए गए तलछट के नमूनों की जांच में उन्हें अमूमन नदी के पेंदे में मिलने वाली बजरी और रेत की एक तह मिली। इस जानकारी को शोधकर्ताओं ने उपग्रह से ली गई तस्वीरों के साथ मिलाया और उनका विश्लेषण किया, जिससे वे नदी के बहने का रास्ता चित्रित कर पाए। पता लगा कि नील नदी की यह शाखा लगभग 2686 ईसा पूर्व से लेकर 1649 ईसा पूर्व के बीच बने 30 से अधिक पिरामिडों के पास से होकर बहती थी। शोधकर्ताओं ने इस नदी को अरबी नाम ‘अहरामत‘ दिया है, जिसका अर्थ है पिरामिड।
ऐसा लगता है कि सहारा रेगिस्तान से उड़कर आने वाली रेत और नील नदी के रास्ता बदलने के कारण अहरामत शाखा सूख गई और नौका परिवहन के लायक नहीं रह गई। फिलहाल कुछ जगहों पर कुछ झीलें और नाले ही बचे हैं।
कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित ये नतीजे उन दस्तावेज़ों के कथन से मेल खाते हैं जो बताते हैं कि पिरामिड निर्माण के लिए सामग्री नाव से लाई जाती थी। अर्थात मिस्रवासी हमारी सोच से कहीं अधिक व्यावहारिक थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शुक्र ग्रह से पानी शायद तेज़ी से गायब हुआ होगा

हमारे पड़ोसी ग्रह शुक्र की सतह का आजकल का तापमान सीसे को भी पिघला सकता है लेकिन अध्ययन बताते हैं कि किसी समय यहां समुद्र लहराते रहे होंगे और वातावरण जीवन के अनुकूल रहा होगा। तो सारा पानी गया कहां? यह एक मुश्किल सवाल रहा है।
नेचर पत्रिका में प्रकाशित हालिया अध्ययन ने पानी के ह्रास की एक ऐसी क्रियाविधि को उजागर किया है जो शुक्र के वायुमंडल में अत्यधिक ऊंचाई पर काम करती है और दुगनी रफ्तार से पानी के ह्रास के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है। इसका यह भी मतलब है कि शुक्र ज़्यादा हाल तक जलीय व जीवनक्षम रहा होगा।
दूरबीनों व अंतरिक्ष यानों से प्राप्त आंकड़े शुक्र के वायुमंडल में जलवाष्प की उपस्थिति दर्शा चुके थे। 1970 के दशक में पायोनीयर वीनस ऑर्बाइटर से शुक्र पर अतीत में समुद्र की उपस्थिति के संकेत मिले थे; वहां के वायुमंडल में हाइड्रोजन के भारी समस्थानिक (ड्यूटीरियम)की उपस्थिति। आगे चलकर किए गए मॉडलिंग से अनुमान लगाया गया था कि किसी समय शुक्र पर इतना पानी थी कि उसकी पूरी सतह पर 3 किलोमीटर गहरी पानी की परत रही होगी।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अरबों वर्ष पूर्व शुक्र ग्रह पर महासागर रहे होंगे, लेकिन ज्वालामुखी गतिविधि और ज़ोरदार ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण संभवत: अधिकांश पानी वाष्पित हो गया होगा। लेकिन शेष बचेे थोड़े से पानी (अंतिम लगभग 100 मीटर की परत) के खत्म होने की व्याख्या नहीं कर सके हैं।
इस नए अध्ययन में एक नई प्रक्रिया – HCO+ क्रियाविधि – पर चर्चा की गई है जो शुक्र के ऊपरी वायुमंडल में चलती है। इसमें सूर्य का प्रकाश न सिर्फ पानी के अणुओं को बल्कि कार्बन डाईऑक्साइड को भी तोड़ देता है। कार्बन डाईऑक्साइड के टूटने से कार्बन मोनोऑक्साइड बनती है। जलवाष्प और कार्बन मोनोऑक्साइड की परस्पर क्रिया के परिणामस्वरूप HCO+ नामक एक अस्थिर आयन का निर्माण होता है। यह आयन तत्काल विघटित हो जाता है। चूंकि हाइड्रोजन अत्यंत हल्की होती है, वह वायुमंडल से पलायन कर जाती है। यह प्रक्रिया शुक्र के वायुमंडल से रहे-सहे पानी को खत्म करने के अवसर प्रदान करती है।
इस नए पहचानी गई प्रक्रिया को पहले से ज्ञात प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर शोधकर्ताओं का सुझाव है कि शुक्र का पूरा पानी उड़ने में केवल 60 करोड़ वर्ष लगे होंगे। यह अवधि पूर्व अनुमान से आधी है। इसका तात्पर्य यह है कि शुक्र पर, आज की दुर्गम दुनिया बनने से पहले, संभवत: 2 से 3 अरब साल पहले तक महासागर रहे होंगे।
शुक्र के विकास को समझना न केवल हमारे सौर मंडल के रहस्यों को जानने बल्कि सुदूर चट्टानी ग्रहों का अध्ययन करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। शुक्र और पृथ्वी के बीच समानताएं इस बात की जांच के महत्व पर प्रकाश डालती हैं कि समान संघटन वाले ग्रह किस तरह अलग-अलग तरीके से विकसित हो सकते हैं। शुक्र के इतिहास से प्राप्त जानकारी ब्रह्मांड में अन्यत्र जीवन योग्य वातावरण की पहचान करने के लिए मूल्यवान सबक प्रदान कर सकती है। एक अनुमान है कि शुक्र के समान मंगल से पानी के ह्रास में भी इस प्रक्रिया की भूमिका रही हो सकती है।
हालांकि, निकट भविष्य में कोई मिशन प्रत्यक्ष रूप से शुक्र पर HCO+ प्रक्रिया की खोजबीन नहीं कर पाएंगे, लेकिन शुक्र की वायुमंडलीय गतिशीलता को समझना जारी है। जल्दी ही कोई उपकरण ऊपरी वायुमंडल में हाइड्रोजन के ह्रास की जांच के लिए सामने आ जाएगा।
तब भविष्य के मिशन शुक्र पर पानी की उपस्थिति और ग्रह विज्ञान के व्यापक क्षेत्र पर इसके प्रभाव पर अधिक जानकारी एकत्रित कर पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

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भारत में कोविड-19 टीकाकरण: विज्ञान बनाम राजनीति – डॉ. अनंत फड़के

भारत में कोविड-19 टीके का इस्तेमाल एक अंतर्विरोध का शिकार रहा। एक ओर था कोविड-19 टीका शीघ्र उपलब्ध कराने वाले अद्भुत तकनीकी-वैज्ञानिक विकास तथा दूसरी ओर था सरकार का संकीर्ण, लोकलुभावन राजनीतिक हित जिसके चलते लोगों के बीच अपनी छवि को मसीहा के रूप में पेश करना था लेकिन साथ ही टीका निर्माताओं के हितों को भी साधना था।

गैरमुनाफा पहलों का स्वागत

आम तौर पर कोई भी नया टीका विकसित करने में 5 से 15 साल तक का समय लग जाता है, क्योंकि यह वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है। लेकिन, SARS-Cov-2 वायरस, दरअसल SARS-CoV-1 वायरस और MERS वायरस के जैसा था जिन पर पहले ही काफी काम किया जा चुका था।

इसके अलावा, WHO तथा कुछ अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की पहल के चलते वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति बन पाई कि सामान्य क्रमिक परीक्षण की प्रक्रिया की बजाय चरण-1 व चरण-2 की प्रक्रिया को तेज़ी से सम्पन्न करने के लिए उन्हें साथ-साथ चलाया जाए और आंकड़ों की समीक्षा की जाए।

सरकारों द्वारा भारी निवेश और नवाचारी वित्तीय मॉडल्स ने दवा कंपनियों को मदद की कि वे पूरा का पूरा वित्तीय जोखिम झेले बिना टीका विकसित करने का काम कर सकें। ऐसी गैर-मुनाफा पहलों (निवेश) से टीका विकास में जुटी कंपनियां काफी लाभान्वित भी हुईं। उदाहरण के लिए, ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने कोविशील्ड टीका बनाने वाली ब्रिटिश फार्मा कंपनी एस्ट्राज़ेनेका से कोई पेटेंट शुल्क नहीं लिया। अपने तईं एस्ट्राज़ेनेका ने भी सहमति जताई कि वह महामारी खत्म होने तक इस टीके पर कोई मुनाफा नहीं कमाएगी। लिहाज़ा, उसने सीरम इंस्टीट्यूट से इस टीके का उत्पादन करने के एवज में अत्यधिक शुल्क नहीं लिया।

अलबत्ता, दवा कंपनियों के मुनाफा हितों और विभिन्न दक्षिणपंथी सरकारों के राष्ट्रवादी दिखावे (अंधराष्ट्रवाद की हद तक) ने इस अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट में वैश्विक मानवतावादी प्रतिक्रिया को बहुत नुकसान पहुंचाया। यहां मैं सिर्फ भारत का उदाहरण लेकर यह दर्शाने की कोशिश करूंगा कि लोकलुभावन, राष्ट्रवादी दिखावे और मुनाफा-केंद्रित दवा कंपनियों की भूमिका कैसी रही।

टीके की भूमिका और राजनीति

वायरस संक्रमण वाली कोई भी महामारी असुरक्षित या कमज़ोर आबादी (अधिकांश मामलों में बच्चों) को अपना शिकार बनाती है और फिर ‘सामूहिक प्रतिरक्षा’ (हर्ड इम्युनिटी) विकसित होने के बाद खत्म हो जाती है।

टीके विकसित होने के पहले तक खसरा, गलसुआ जैसी महामारियां फैलती रहती थीं और लोगों के स्वास्थ्य को क्षीण कर देने के बाद बिना किसी टीकाकरण के ही खत्म भी हो जाती थीं। स्वाइन फ्लू महामारी भी बिना किसी टीके के खत्म हो गई थी। 1918 की कुख्यात फ्लू महामारी को छोड़ दें तो अन्य किसी भी वायरल महामारी की तुलना में कोविड-19 महामारी कहीं अधिक क्षतिकारक थी, और अन्य वायरल महामारियों की तुलना में सिर्फ एक वर्ष में कोविड-19 से कहीं अधिक लोगों की मौतें हुई।

अलबत्ता, शुक्र है चमत्कारी वैज्ञानिक-तकनीकी विकास का, जिसने मानव इतिहास में पहली बार हमें एक ऐसा टीका दिया जो किसी नई बीमारी की पहली महामारी में ही लोगों को उसके प्रकोप से बचा सके। अन्य सभी टीकों ने केवल महामारी की रोकथाम की है और कुछ ने असुरक्षित या कमज़ोर लोगों को संक्रमित होने से बचाया है। कोविड-19 टीका दुनिया का पहला ऐसा टीका था जिसने महामारी के दौरान ही लोगों के स्वास्थ्य को कुछ हद तक सुरक्षित रखने में मदद की।

हालांकि इस पर शंका है कि क्या कोविड-19 के टीके ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वायरस के प्रसार को कम करके महामारी को फैलने से रोका है। लेकिन कोविड-19 का टीका असुरक्षित या कमज़ोर लोगों, जैसे वृद्धजनों और मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा एवं फेफड़ों के जीर्ण रोग वगैरह से पीड़ित लोगों, में बीमारी के बिगड़ने और इसके चलते उनकी मृत्यु की संभावना को कम करता है। (कोविड-19 का टीका बच्चों के लिए उपयोगी नहीं है क्योंकि सामान्यत: छोटे बच्चों में कोविड-19 विकसित नहीं होता है और वे कोविड-19 से नहीं मरते हैं। दूसरी ओर, अति बुज़ुर्ग लोगों में कोविड-19 की मृत्यु दर बहुत अधिक है)।

देखा जाए तो, भारत के संदर्भ में कोविड-19 टीके को रक्षक कहने की बात बकवास है। इस महामारी पर काबू पाने में इस टीके की भूमिका के बारे में भारत सरकार और उसके समर्थकों के दावे वास्तविक कम और प्रपोगंडा अधिक थे। सरकार ने तरह-तरह से यह दावा किया है कि भारत में कोविड-19 टीकाकरण से महामारी पर अंकुश लगाने में काफी मदद मिली और लोगों को कोविड-19 के कारण होने वाली स्वास्थ्य-क्षति से काफी हद तक बचाया जा सका।

वैज्ञानिक साहित्य पहले दावे की पुष्टि नहीं करते हैं कि टीके ने SARS-Cov-2 के प्रसार को कम किया है, लेकिन इस बात के प्रमाण हैं कि समय पर टीकाकरण ने असुरक्षित आबादी में गंभीर संक्रमण पनपने को रोका है और मृत्यु दर को कम किया है। बहरहाल, जैसा कि हम आगे देखेंगे, भारत में कोविड-19 के नैसर्गिक तरह से फैलने की रफ्तार टीकाकरण की रफ्तार से कहीं अधिक थी क्योंकि टीकाकरण कार्यक्रम बहुत धीमी गति से चला था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि भारत में इस टीकाकरण ने कोविड-19 की गंभीरता और मृत्यु दर को कम करने में कोई खास भूमिका निभाई हो।

विपणन अनुमति पर सवाल

किसी भी नई औषधि या टीके के विपणन या प्रचार-प्रसार की अनुमति प्राप्त होने के लिए उसे पहले जंतु मॉडल परीक्षण से गुज़रना होता है, फिर मानव प्रतिभागियों पर तीन चरणों (चरण-I, II, III) के क्लीनिकल परीक्षणों से गुज़रना होता है। चरण-I व चरण-II के अध्ययन मुख्य रूप से औषधि या टीके की सुरक्षितता और प्रतिरक्षा उत्पन्न करने की क्षमता का आकलन करते हैं, और चरण-III में बड़े पैमाने पर क्लीनिकल परीक्षण किए जाते हैं जिसमें मुख्यत: प्लेसिबो से तुलना करते हुए टीके की प्रभाविता परखी जाती है।

भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एस्ट्राज़ेनेका के साथ विनिर्माण समझौते की मदद से ‘कोविशील्ड’ टीके का उत्पादन किया। इस टीके के विकास में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका के टीके को इंग्लैंड और ब्राज़ील में तीसरे चरण के परीक्षण को पूरा करने के बाद यूके के नियामक प्राधिकरण से विपणन (या इस्तेमाल) की अनुमति मिल गई। भारत में यहां के ‘न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल रूल्स, 2019′ के तहत,  किसी अन्य देश में अनुमति प्राप्त किसी भी औषधि या टीके को भारत में उपयोग से पहले एक सेतु परीक्षण (ब्रिज ट्रायल) से गुज़रना पड़ता है ताकि यह जाना जा सके कि क्या वह औषधि या टीका भारतीय आबादी पर प्रभावी है या नहीं। लेकिन, तीसरे चरण के परीक्षण का भारतीय डैटा न होने के बावजूद भी सीरम इंस्टीट्यूट ने कोविशील्ड की विपणन अनुमति के लिए भारत के औषधि नियंत्रक को आवेदन दे दिया था। ऐसा करने के लिए कोई भी विस्तृत एवं विश्वसनीय वैज्ञानिक तर्क नहीं दिया गया था। लेकिन 2 जनवरी 2021 को अनुमति मिल गई; वैज्ञानिक रूप से और ‘न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल रूल्स, 2019′ के मद्देनज़र इसे उचित ठहराना मुश्किल है।

विषय विशेषज्ञ समिति, भारत के औषधि नियामक को भारत में किसी नए टीके या दवा अपनाने के बारे में सलाह देती है। 30 दिसंबर, 2020 को इस समिति ने मीटिंग के दौरान, सीरम इंस्टीट्यूट को ‘पर्याप्त डैटा’ प्रस्तुत करने को कहा था। 1 जनवरी, 2021 को सीरम इंस्टीट्यूट ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा इंग्लैंड और ब्राज़ील में किए गए परीक्षण के आंकड़े पेश किए थे, जिसके अनुसार कोविड-19 की गंभीर स्थिति न बनने देने और मृत्यु न होने देने में टीके की प्रभाविता औसतन 70 प्रतिशत है। इसे भारत के संदर्भ में चरण-I और चरण-II के परीक्षण का डैटा माना गया था। इसके आधार पर, 2 जनवरी 2021 को इस समिति ने चरण-III के भारतीय डैटा के बिना ही कोविशील्ड के उपयोग को हरी झंडी दिखा दी और चरण-III का डैटा न होने के पीछे कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया।

कोवैक्सीन के मामले में तो चरण-III डैटा के सर्वथा अभाव में अनुमति दी गई थी!! हालांकि, अनुमति में कहा गया था कि इंग्लैंड में उभरे नए उत्परिवर्ती संस्करण के मद्देनजर कोवैक्सीन का उपयोग ‘अत्यधिक ऐहतियात’ के साथ और ‘क्लीनिकल परीक्षण शैली’ के तहत किया जाएगा। तकनीकी विवरण में गए बिना, यह कहा जाना चाहिए कि कोवैक्सीन की यह सशर्त अनुमति भी वैज्ञानिक मानदंडों और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक अधिनियम के प्रासंगिक नियमों के मद्देनज़र सवालों के घेरे में है। इसके अलावा ‘क्लीनिकल परीक्षण शैली’ का पालन बमुश्किल ही किया गया और आगे चलकर तो इसे भुला ही दिया गया।

यह तो सही है कि टीकाकरण महामारी काफी फैल जाने से पहले करना ज़रूरी होता है; लेकिन तीसरे चरण के भारतीय परीक्षणों के डैटा के अभाव में अनुमति देने की जल्दबाज़ी के पीछे इस ज़रूरत के अलावा दो अन्य बातें भी थीं।

सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक ने अनुमति का आवेदन करने से पहले ही क्रमश: 5 करोड़ और 1 करोड़ टीके बना लिए थे। सीरम इंस्टीट्यूट को इस स्टॉक को प्राथमिकता के आधार पर भारत सरकार को 200 रुपए प्रति खुराक की विशेष रियायती दर पर बेचना था, जबकि सीरम इंस्टीट्यूट के मालिक अदार पूनावाला ने कहा था कि वे कोविशील्ड की प्रति खुराक खुले बाज़ार में 1000 रुपए में बेचेंगे। यदि हम टीके की कीमत 200 रुपये प्रति खुराक भी मानें, तो यदि कोविशील्ड को अनुमति नहीं मिलती तो सीरम इंस्टीट्यूट 1000 करोड़ रुपए गंवाता और कोविशील्ड की 5 करोड़ खुराक बर्बाद हो जाती। लिहाज़ा, व्यवसाय के नज़रिए से सीरम इंस्टीट्यूट के लिए ज़रूरी था कि टीके को जल्द से जल्द अनुमति मिले। यही हाल भारत बायोटेक का भी था।

नियामक निर्णय-प्रक्रिया को व्यावसायिक मसलों से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि इस विषय विशेषज्ञ समिति के सदस्य कौन थे, क्या इन सदस्यों का सम्बंधित दवा कंपनियों के साथ कोई सम्बंध था, समिति द्वारा अनुमति देने के पक्ष में दिए गए विस्तृत वैज्ञानिक तर्क क्या थे? अमेरिका में इस तरह की विशेषज्ञ सलाहकार समिति की मीटिंग बाहरी लोगों के लिए ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। भारत में नए टीकों के बारे में सरकार को सलाह देने के लिए नेशनल टेक्निकल एडवायज़री ग्रुप ऑन इम्युनाइज़ेशन (NTAGI) है। अलबत्ता, इसकी वेबसाइट पर कोविड-19 के इन दो टीकों की अनुमति के बारे में कोई जानकारी नहीं है!

कुछ लोगों ने राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काकर कोवैक्सीन की अनुमति को इस आधार पर उचित ठहराने की कोशिश की कि कोवैक्सीन को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ने विकसित किया है। यकीनन यह बहुत ही संतोष और गर्व की बात है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने एक वर्ष के भीतर कोविड-19 के लिए एक नया टीका विकसित कर लिया। लेकिन यह कतई स्वीकार्य नहीं है कि भारतीय लोगों में किसी टीके की प्रभाविता और सुरक्षितता के पर्याप्त सबूत के बिना ही उसके उपयोग की अनुमति दे दी जाए।

ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने कोई पेटेंट शुल्क नहीं लिया था, और न ही एस्ट्राज़ेनेका ने सीरम इंस्टीट्यूट से कोई पेटेंट शुल्क लिया। चूंकि सीरम इंस्टीट्यूट एक भारतीय कंपनी है इसलिए इसे कोविशील्ड के विपणन की अनुमति आत्म-निर्भर भारत की नीति के पूरी तरह अनुकूल थी, और इसीलिए कोविशील्ड को ‘विदेशी’ टीका कहने और कोवैक्सीन को भारतीय स्वदेशी टीके की तरह पेश करने का कोई तुक नहीं था।

टीकों की धीमी खरीद

सरकार ने 12 जनवरी 2021 को सीरम इंस्टीट्यूट को केवल 2.1 करोड़ खुराक और अप्रैल के अंत तक 13.1 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया था। यह तब था जब सीरम इंस्टीट्यूट ने पहले ही, दिसंबर 2020 तक, टीके की 5 करोड़ खुराकें बना ली थीं और उसके पास प्रति माह 5 करोड़ खुराक बनाने की क्षमता थी। एक बार जब कोविशील्ड को भारत में विपणन की अनुमति दे दी गई, तो सार्वजनिक क्षेत्र के टीका निर्माताओं को शामिल करने के अलावा भारत सरकार को कोविड-19 टीकों के लिए अग्रिम ऑर्डर देना चाहिए था और इसके लिए अग्रिम भुगतान करना चाहिए था, जैसा कि कई विकसित देशों ने किया था। ऐसा करने पर टीका उत्पादन क्षमता बहुत तेज़ी से बढ़ती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। 13.1 करोड़ खुराक के ऑर्डर पर करीब 200 करोड़ रुपए दिए गए थे जबकि वित्तमंत्री ने घोषणा की थी कि केंद्रीय बजट में कोविड-19 टीकाकरण के लिए 35,000 करोड़ रुपए रखे गए हैं! भारत बायोटेक की प्रति माह लगभग 2 से 3 करोड़ खुराक उत्पादन करने क्षमता थी। और यदि अग्रिम ऑर्डर मिल जाते, तो सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक मिलकर लक्ष्य (31 दिसंबर 2021 तक 200 करोड़ खुराक) को हासिल करने के लिए आवश्यक खुराकों की आपूर्ति कर सकते थे। लेकिन ऐसी योजना के अभाव में अप्रैल 2021 के बाद टीकों की कमी पड़ गई।

दूसरी बात। 45 वर्ष से अधिक उम्र के (सभी) लोगों को टीका लगाने का अपना लक्ष्य पूरा करने के पहले ही सरकार ने 18 अप्रैल को घोषणा कर दी कि अब 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी वयस्कों को टीका लगाया जाएगा! टीकाकरण केंद्रों पर बहुत अधिक तादाद में वयस्क टीका लगवाने पहुंचने लगे, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रों पर टीकों की भारी कमी पड़ गई।

उससे भी बदतर तो केंद्र सरकार की यह घोषणा थी कि वह केवल 50 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति करेगी; 25 प्रतिशत टीके निजी क्षेत्रों द्वारा खरीदे जाएंगे और 25 प्रतिशत टीके राज्य सरकारें खरीदेंगी। हालांकि कुल टीकाकरण केंद्रों में से केवल 3 प्रतिशत ही निजी टीकाकरण केंद्र थे, लेकिन निजी क्षेत्र को 25 प्रतिशत टीके आवंटित किए गए थे! जाहिर तौर पर यह फैसला इन दोनों कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए था (जिसकी कीमत आम लोगों से वसूली जाती) क्योंकि खुले बाज़ार में इन दोनों टीकों की कीमत काफी अधिक तय की गई थी।

इसके चलते बड़ा विवाद और अराजकता पैदा हो गई क्योंकि विभिन्न राज्य सरकारों ने टीके खरीदने के लिए पर्याप्त निवेश करने में असमर्थता जताई। सबके लिए मुफ्त कोविड-19 टीकाकरण की नीति को लागू करने की बजाय निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करने के लिए कई विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार की कड़ी आलोचना की। जबकि अन्य सभी देशों सरकारों द्वारा मुफ्त टीकाकरण किया जा रहा था। सौभाग्य से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया और केंद्र सरकार को यह याद दिलाया कि सबका निशुल्क टीकाकरण करना केंद्र सरकार की सामान्य ज़िम्मेदारी है और इसके लिए केंद्रीय बजट में आवंटित 35,000 करोड़ के फंड का उपयोग किया जाना चाहिए।

टीकाकरण की धीमी गति

महामारी विज्ञानियों का कहना था कि कोविड-19 बीमारी के खिलाफ सामूहिक प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) हासिल करने के लिए लगभग 70 प्रतिशत भारतीय (95 करोड़ लोग) टीकाकृत हो जाने चाहिए। इसका मतलब था कि 31 दिसंबर 2021 तक (यानी 351 दिनों में) करीब 180 करोड़ खुराकें दी जानी थीं, यानी औसतन प्रति दिन लगभग 51 लाख खुराकें। भारत सरकार द्वारा 16 जनवरी 2021 से शुरू किए गए टीकाकरण कार्यक्रम में सबसे पहले सभी स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को टीकाकृत करना था, जिनकी कुल संख्या लगभग 3 करोड़ थी। इसके बाद अप्रैल के अंत से चरणबद्ध तरीके से 50 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों (कुल संख्या 27 करोड़) को टीका लगाया जाना था। फिर 50 वर्ष से कम आयु के उन सभी लोगों को भी टीका लगाने की आवश्यकता थी जिन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, जीर्ण फेफड़ों सम्बंधी बीमारी, एचआईवी संक्रमण आदि जैसी बीमारियां थी। इस तरह कुल मिलाकर करीबन 40-50 करोड़ लोग ऐसे थे जिन्हें जल्द और पहले टीकाकृत किया जाना चाहिए था ताकि वायरस इन लोगों तक पहुंचने के पहले ये टीकाकृत हो चुके हों।

गौरतलब है कि भारत में सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हर साल पांच साल से छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को लगभग 15 करोड़ विभिन्न टीके लगाते हैं। अब उसी तंत्र से यह उम्मीद करना कि वह आने वाले तीन महीनों में अतिरिक्त 3 करोड़ कोविड-19 टीके लगाएगा, का मतलब था कि वे लगभग दुगनी गति से काम करें। कर्मचारियों की कमी और (1980 के दशक की निजीकरण की नीति की बदौलत) वित्त के अभाव से जूझती सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही थकी हुई थी क्योंकि उसे महामारी में जबरदस्त अतिरिक्त काम करना पड़ा था। सरकार द्वारा टीकाकरण की गति बढ़ाने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती भी नहीं की गई थी। सरकार ने शुरुआत में केवल 3000 टीकाकरण केंद्र स्थापित किए थे जिनमें प्रति दिन 100-100 टीके लगाए गए, यानी प्रति दिन ज़रूरी 51 लाख की बजाय मात्र 3 लाख टीके लगाए गए। इस दर से तो 3 करोड़ लोगों को टीकाकृत करने में 100 दिन लगते, और प्राथमिकता वाले 30 करोड़ लोगों को कवर करने में 1000 दिन!

टीकाकरण को रफ्तार देने के लिए, अस्थायी रूप से ही सही, प्रशिक्षित लोगों को त्वरित और बड़े पैमाने पर भर्ती करने की ज़रूरत थी, और आवश्यकतानुसार निजी क्षेत्र के डॉक्टरों को भी शामिल करना लाज़मी था। ऐसे डॉक्टरों की संख्या दस लाख से अधिक है। लेकिन इन दोनों उपायों पर कोई बात तक नहीं हुई। बस, टीकाकरण अभियान के बारे में प्रचार-प्रसार खूब हुआ! ‘कोविड-19 के खिलाफ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान’ के बारे में झूठे, दम्भी दावे किए गए!

शुरुआती महीनों में टीकाकरण की इस बहुत धीमी गति के चलते 21 जुलाई 2021 तक केवल 23 प्रतिशत भारतीयों को टीके की एक खुराक मिली थी और केवल 6.2 प्रतिशत को दो खुराक मिली थी। अलबत्ता, ICMR द्वारा किए गए अखिल भारतीय ‘सीरो-प्रिवेलेंस सर्वेक्षण’ के चौथे दौर के सर्वेक्षण से पता चला था कि जुलाई 2021 के अंत तक 67 प्रतिशत वयस्कों में कोविड-19 के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित हो गई थी। (बच्चों को टीका नहीं लगाया गया था, लेकिन लगभग इसी अनुपात में बच्चों में भी कोविड-19 के खिलाफ एंटीबॉडीज़ मिलीं!) इससे यह स्पष्ट है कि जितनी तेज़ी से कोविड-19 फैला उसकी तुलना में टीकाकरण बहुत धीमा था। इसलिए भारत में जिन लोगों ने कोविड-19 संक्रमण के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कर ली थी, उनमें से अधिकांश में यह नैसर्गिक संक्रमण के ज़रिए विकसित हुई थी। भारतीयों का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही टीकाकरण के कारण गंभीर कोविड-19 बीमारी और मृत्यु से सुरक्षित हो पाया था।

बहरहाल, उपरोक्त ‘नैसर्गिक टीकाकरण’ ने बहुत तेज़ी से अपना काम करके लोगों के स्वास्थ्य को बहुत अधिक प्रभावित किया, क्योंकि SARS-Cov-2 वायरस से संक्रमित हुए अधिकांश लोगों को कोविड-19 रुग्णता हुई; इनमें से काफी लोग मध्यम से लेकर गंभीर स्थिति तक पहुंच गए और लगभग 0.1 प्रतिशत संक्रमित लोगों की मृत्यु हुई।

अर्थात कोविड-19 के खिलाफ यह ‘नैसर्गिक टीकाकरण’ लोगों को बहुत महंगा पड़ा। इसलिए, कोविड-19 टीकों के बेतुके विरोध पर आधारित राजनीति से भी दूरी बनाने की आवश्यकता है। भारत में शुरुआती महीनों में बहुत धीमी खरीद और टीकाकरण प्रक्रिया के कारण गैर-टीकाकृत लाखों लोग कोविड-19 के संक्रमण की चपेट में आए, और सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम उन तक पहुंचने के पहले लाखों लोग मारे गए।

हैरतअंगेज़ बात है कि ICMR ने जुलाई 2021 के बाद राष्ट्रीय ‘सीरो-प्रिवेलेंस सर्वेक्षण’ करना बंद कर दिया था, और इस तथ्य के बारे में बहुत कम चर्चा हुई कि अधिकांश भारतीयों में टीकाकरण के पहले SARS-Cov-2 के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित हो चुकी थी! बाद का टीकाकरण ‘घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल का दरवाज़ा बंद करने’ जैसा था!

कोविशील्ड के कुप्रभाव

यह पहली बार व्यापक रूप से यूके और कुछ अन्य युरोपीय देशों में बताया गया था कि एस्ट्राज़ेनेका टीके की पहली खुराक देने के बाद पहले चार हफ्तों के भीतर टीके के कारण कुछ मुख्य शिराओं में रक्त का थक्का जमने (वैक्सीन इनड्यूस्ड थ्रम्बोसाइटोपेनिया और थ्रम्बोसिस, VITT) की स्थिति बन सकती है। इसलिए कुछ युरोपीय देशों ने इसके उपयोग को अस्थायी तौर पर बंद भी कर दिया था। बाद में यह सामने आया कि यह स्थिति करीब 10 लाख लोगों में से महज 5 मामलों में उभरने संभावना है और इनमें मृत्यु की संभावना 25 प्रतिशत है। दूसरी ओर, स्वयं कोविड-19 के कारण इस तरह के रक्त के थक्के जमने की संभावना 8-10 गुना अधिक थी। इसलिए युरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने यह सिफारिश की थी कि एस्ट्राज़ेनेका का टीका कोविड-19 के कारण अधिक गंभीर जोखिम से बचाव के लिए देना जारी रखा जाए। भारत में, कोविशील्ड पर सीरम इंस्टीट्यूट ने अपनी फैक्ट शीट में लिखा है कि लगभग एक लाख में से एक व्यक्ति में टीकाकरण की पहली खुराक के बाद रक्त का थक्का बनने की समस्या हो सकती है।

टीकाकरण उपरांत प्रतिकूल प्रभाव (AEFI) देखने के लिए भारत सरकार के निगरानी तंत्र द्वारा पहले 75 करोड़ टीकाकरणों में AEFI के केवल 27 मामले दर्ज हुए, यानी प्रति 15 लाख में 1 मामला! ऐसा इसलिए है कि 1988 में स्थापित इस तंत्र का काम संतोषप्रद नहीं रहा है। इसकी कार्यप्रणाली भी विवादास्पद है। चूंकि यह प्रणाली पारदर्शी नहीं है, इसलिए हो सकता है कि टीके से सम्बंधित किसी घटना या दुष्परिणाम को ‘टीके से सम्बंधित नहीं’ की श्रेणी में डाल दिया गया हो और इसलिए मुआवजे से कोई अनुचित इनकार नहीं किया गया है। इसके अलावा, भारत में टीके से पहुंची क्षति के लिए पीड़ितों को ‘नो-फॉल्ट मुआवज़ा’  (no fault compensation)देने की कोई व्यवस्था नहीं है, और इन 27 मामलों में से किसी को भी मुआवजा नहीं दिया गया। भारत में ‘नो-फॉल्ट मुआवज़ा’ व्यवस्था शुरू करने की सख्त ज़रूरत है। इससे सरकार पर राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत पर्याप्त जांच-परीक्षण और औचित्य के बिना नए टीके लाने पर भी लगाम लगेगी।

निजी निर्माताओं की मुनाफाखोरी

आपूर्ति की बाधा को दूर करने के लिए सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की टीका निर्माण इकाइयों में इन टीकों के उत्पादन की अनुमति देने के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग का प्रावधान लागू करना चाहिए था। ये इकाइयां आज़ादी के 40 वर्षों बाद तक राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के लिए बहुत कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाले टीकों का मुख्य स्रोत रही हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत जाकर सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र की टीका निर्माण इकाइयों को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर कर देने के बाद स्थिति काफी बदल गई है। ICMR के वैज्ञानिक एक साल के भीतर कोविड-19 का एक अच्छा टीका विकसित करने में सक्षम हुए हैं, यह बड़े गर्व की बात है। सरकार के लिए यह काफी तर्कपूर्ण होता कि वह सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को इस टीके का उत्पादन करने देती। लेकिन इस आपात स्थिति में भी, निजीकरण की नीति जारी रही और कोविड-19 टीके का निर्माण पूरी तरह से निजी कंपनियों के हाथों में ही रहा।

सरकार ने सम्बंधित निजी कंपनियों को कोविड-19 टीके पर अत्यधिक मुनाफा कमाने की अनुमति भी दी। उदाहरण के लिए, सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला ने एनडीटीवी को बताया कि जब वे केंद्र सरकार को 150 रुपए प्रति खुराक की दर पर टीका बेच रहे थे तो उन्हें घाटा तो नहीं हुआ, लेकिन यह कीमत इतना लाभ कमाने के लिए पर्याप्त नहीं है जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने हेतु निवेश किया जा सके। मान लेते हैं कि कोविशील्ड की प्रति खुराक उत्पादन लागत लगभग 125 रुपए थी और इसलिए सरकार को इस टीके की (अधिकतम) कीमत 250 रुपए प्रति खुराक रखनी चाहिए थी। यह 1995-2013 तक सरकारी नीति के अनुसार होती, जिसमें कहा गया है कि मूल्य नियंत्रण के तहत आने वाली सभी ज़रूरी दवाइयों का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) उत्पादन लागत से दुगना तक हो सकता है (उससे अधिक नहीं)। इस तथ्य को देखते हुए कि कोविशील्ड न केवल एक आवश्यक टीका था बल्कि जीवनरक्षक भी था, अत: इसकी MRP 250 रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन सरकार ने घोषणा की कि 7 जून 2021 से लोगों को कोविशील्ड 780 रुपए में उपलब्ध होगा (अस्पतालों के 150 रुपए सेवा शुल्क सहित)। इसका मतलब यह हुआ कि सीरम इंस्टीट्यूट को प्रति खुराक करीब 500 रुपए का मुनाफा होता। निजी अस्पतालों में कोवैक्सीन की कीमत 1410 रुपए प्रति खुराक घोषित की गई थी!!

निष्कर्ष में, यह कहा जा सकता है कि भारत में कोविड-19 टीकों के मामले में संकीर्ण कॉर्पोरेट हितों और लोकलुभावने, राष्ट्रवादी राजनीतिक हितों/रुखों ने इस महामारी के प्रति मानवतावादी, विज्ञान-आधारित प्रतिक्रिया को धूमिल कर दिया। सरकार के कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम का बड़े ज़ोर-शोर से प्रचार-प्रसार का उद्देश्य यह धारणा बनाना था कि इस टीकाकरण ने लोगों को महामारी से बचाया है। लेकिन कटु सत्य यह है कि भारत सरकार की कोविड-19 टीकों की खरीद और उपयोग में ढिलाई के कारण टीकारण कार्यक्रम से इस महामारी से लोगों को गंभीर हालत में पहुंचने और मौत के घाट उतरने से बचाने में बहुत मदद नहीं मिली। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या गिलहरियों को भी कुष्ठ रोग होता था?

कुष्ठ रोग लंबे समय से मानवता के लिए एक अभिशाप रहा है। यह रोग तंत्रिका को नुकसान पहुंचाता है, शरीर में घाव पैदा करता है तथा गंध व दृष्टि संवेदना को प्रभावित करता है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने कुष्ठ रोग के फैलने में मनुष्यों और गिलहरियों के बीच एक आश्चर्यजनक सम्बंध का पता लगाया है, और बताया है कि मध्य युग में गिलहरियां भी इस बीमारी की चपेट में थी।

गौरतलब है कि माइकोबैक्टीरियम लेप्रे और माइकोबैक्टीरियम लेप्रोमैटोसिस नामक बैक्टीरिया से होने वाला कुष्ठ रोग आज भी सालाना 2 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित करता है। इसके अधिकांश मामले एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में पाए जाते हैं। अब तक इस बीमारी को केवल मनुष्यों से जुड़ा माना जाता था लेकिन मध्ययुगीन गिलहरियों के अस्थि अवशेषों में कुष्ठ रोग के बैक्टीरिया (माइकोबैक्टीरियम लेप्री) की खोज इसके व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव को रेखांकित करती है। आजकल आर्मेडिलो में यह बैक्टीरिया पाया जाता है और कभी-कभार आर्मेडिलो इस बैक्टीरिया को मनुष्यों व प्राइमेट्स में पहुंचाता है।

दरअसल मध्यकालीन इंगलैंड में गिलहरियां पालतू जीव की तरह और फर के लिए पाली जाती थीं। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने विंचेस्टर शहर की मध्ययुगीन गिलहरियों के अवशेषों की जांच करके कुष्ठ रोग के संचरण को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास किया है। विंचेस्टर खास तौर से गिलहरियां पालने और उनके फर का उपयोग करने के कारोबार के लिए मशहूर था। यहां एक कुष्ठ रोग अस्पताल भी था।

गिलहरी की हड्डियों पर काम करते हुए एक अनुसंधान टीम ने प्राचीन कुष्ठ रोग बैक्टीरिया के जीनोम का पुनर्निर्माण किया तो देखा कि यह मध्ययुगीन मनुष्यों में पाए जाने वाले संस्करण से काफी मिलता-जुलता है। यह प्रजातियों के बीच बीमारी के आदान-प्रदान का संकेत देता है।

हालांकि, आजकल कुष्ठ रोग के प्रसार में गिलहरियों की कोई भूमिका नहीं हैं, लेकिन भावी जोखिमों को समझने के लिए अतीत की घटनाओं को समझना ज़रूरी है। पशु रोगविज्ञानी एलिजाबेथ उहल रोग के एक प्रजाति से दूसरी में पहुंचने को समझने के लिए बहुविषयी दृष्टिकोण पर ज़ोर देती हैं। उनका मत है कि गैर-मानव रोगवाहकों की भूमिका की उपेक्षा करने से बीमारी का प्रकोप जारी रह सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हिमालय के मैगपाई – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

हियर या मैगपाई पक्षी कॉर्विडे (Corvidae) कुल के सदस्य हैं, जिसमें कौवा, नीलकण्ठ और रैवन आते हैं। आम तौर पर इस कुल के पक्षियों को कांव-कांव करने वाले और जिज्ञासु पक्षी के तौर पर देखा जाता है। दुनिया भर की लोककथाओं में अक्सर इन्हें शगुन-अपशगुन के साथ भी जोड़ा जाता है। जैसे कुछ युरोपीय संस्कृतियों में इन्हें चुड़ैलों का साथी माना जाता हैं। अंग्रेज़ी की एक तुकबंदी कहती है कि यदि एक अकेली मैगपाई दिखे तो बुरी खबर सुनने को मिलती है: “One for sorrow, two for joy; three for a girl, four for a boy; Five for silver, six for gold; Seven for a secret never to be told,” (हिंदी में यह कुछ इस तरह होगी: “एक यानी दुख, दो यानी खुशी; तीन यानी लड़की, चार यानी लड़का; पांच यानी चांदी, छह यानी सोना; सात यानी किसी को न बताने वाला राज़।”

लेकिन यह तो सभी मानेंगे कि मैगपाई दिखने में आकर्षक होती हैं। और इसकी कुछ सबसे सजीली (रंग-बिरंगी) प्रजातियां हिमालय में पाई जाती हैं।

नीली मैगपाई की कुछ निकट सम्बंधी प्रजातियां कश्मीर से लेकर म्यांमार तक में दिखना आम हैं। सुनहरी चोंच वाली मैगपाई (Urocissa flavirostris, जिसे पीली चोंच वाली नीली मैगपाई भी कहते हैं) की आंखें शरारती लगती हैं, और यह समुद्रतल से 2000 से 3000 मीटर ऊंचे स्थलों पर मिलती है। इससे थोड़ी कम ऊंचाई पर हमें लाल चोंच वाली मैगपाई दिखाई देती हैं, और नीली मैगपाई निचले इलाकों पर पाई जाती है जहां बड़ी तादाद में इंसान रहते हैं।

ट्रेकिंग पथ

पीली और लाल चोंच वाली मैगपाई सबसे अधिक दिखाई देती हैं पश्चिमी सिक्किम के ट्रैकिंग पथ पर, जो समुद्र तल से 1780 मीटर की ऊंचाई पर स्थित युकसोम कस्बे से शुरू होता है और लगभग 4700 मीटर की ऊंचाई पर गोचे ला दर्रे तक जाता है जहां से कंचनजंगा के शानदार नज़ारे दिखते हैं। इस ट्रेकिंग में आपका सफर थोड़ी ऊंचाई पर उष्णकटिबंधीय आर्द्र चौड़ी पत्ती वाले वन से शुरू होता है, उप-अल्पाइन जंगलों से गुज़रते हुए ऊंचाई पर आप वृक्षविहीन, जुनिपर झाड़ियों वाली जगह पर पहुंचते हैं। बीच में कहीं-कहीं ऐसे जंगल भी मिलते हैं जिनके घने आच्छादन से आप ढंके होते हैं, और जहां आपको पक्षियों की हैरतअंगेज़ विविधता और आबादी दिखती है।

सिक्किम गवर्नमेंट कॉलेज के प्राणी शास्त्रियों द्वारा किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों से पता चला है कि इस क्षेत्र में पक्षियों की 250 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, और समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर आप हर पांच मिनट के अंतराल पर लगभग 60 अलग-अलग पक्षियों को देख या सुन सकते हैं। सुनहरी चोंच वाली मैगपाई की कूक अक्सर इन पक्षियों के कलरव के साथ सुनाई देती है। इस मैगपाई का शरीर लगभग कबूतर जितना बड़ा होता है, लेकिन इसकी पूंछ 45 सेंटीमीटर लंबी होती है, जिससे इसकी कुल लंबाई 66 सेंटीमीटर हो जाती है। ज़मीन पर कीड़े-मकोड़ों-कृमियों की तलाश करते समय इसकी पूंछ ऊपर की ओर उठी रहती है; लेकिन पेड़ों से जामुन तोड़ते समय इसकी पूंछ नीचे की ओर झुक जाती है। इसकी उड़ान भी खास होती है: शुरुआत में थोड़े समय तक यह लगातार पंख फड़फड़ाती है, और फिर उसके बाद देर तक हवा में शांत तैरती रहती है।

फूलदार बुरुंश

सुनहरी चोंच वाली मैगपाई बुरुंश वृक्ष पर उस जगह घोंसला बनाती है जहां शाखाएं दो में बंटती हैं। उसका घोंसला टहनियों पर जल्दबाज़ी में घास की मुलायम तह लगाकर बनाया गया लगता है। इन घोंसलों में मई-जून में तीन से छह अंडे दिए जाते हैं। चूज़ों का पालन-पोषण माता-पिता दोनों मिलकर करते हैं। अच्छी बात है, जैसा कि तुकबंदी में कहा गया है – ‘दो यानी खुशी’।

नीली मैगपाई और लाल चोंच वाली मैगपाई दिखने में बहुत हद तक एक जैसी दिखती हैं, बस एक थोड़ी छोटी होती है। नीली मैगपाई जंगलवासी पक्षी नहीं है, और अक्सर गांवों के आसपास पाई जाती हैं। मैगपाई की सभी प्रजातियां या तो अकेले फुदकते हुए, या जोड़े में, या शोरगुल मचाते हुए 8-10 के झुंड में देखी जा सकती हैं।

जैसे-जैसे इंसानों की जंगलों में मौजूदगी बढ़ रही है, इस बात की चिंता बढ़ रही है कि ये पक्षी इस दखल का कितना सामना कर पाएंगे। बुरुंश झाड़ी के रंग-बिरंगे फूल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। पर्यटकों को ठहराने और उनकी सुविधाओं के लिए ग्रामीण अक्सर जलाऊ लकड़ी जैसे वन संसाधनों को दोहते हैं। आशा है कि कृषि की तरह पर्यटन भी एक वहनीय व्यापार करना सीखेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदलने वाली शैवाल – किशोर पंवार

कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, फॉस्फोरस के समान नाइट्रोजन भी एक ज़रूरी पोषक तत्व है। पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन है लेकिन मज़ेदार बात है कि पेड़-पौधे इसका उपयोग तब तक नहीं कर सकते जब तक कि इसे यौगिकों में न बदल दिया जाए। नाइट्रोजन स्थिरीकरण का यह अत्यंत महत्वपूर्ण काम पृथ्वी पर सिर्फ आर्किया और बैक्टीरिया समूह के सूक्ष्मजीव कर पाते हैं और इन्हीं की बदौलत नाइट्रोजन पेड़-पौधों को मिलती है। लेकिन हालिया अध्ययन से पता चला है कि एक शैवाल भी यह काम कर सकती है। 

हाल ही में वैज्ञानिकों ने पहली ऐसी शैवाल की खोज की है जो उसमें पाए जाने वाली एक छोटी कोशिका संरचना की बदौलत हवा की नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदल सकती है। नाइट्रोजन सजीवों की वृद्धि एवं जीवन क्रियाओं के लिए एक अनिवार्य तत्व है लेकिन पेड़-पौधे, शैवाल वगैरह तात्विक नाइट्रोजन का उपयोग नहीं कर सकते, बल्कि तभी कर सकते हैं जब वह यौगिकों के रूप में मिले। शोधकर्ताओं ने इस शैवाल में पाई गई इस संरचना को अंगक यानी ऑर्गेनेल कहा है। और इसे नाम दिया गया है नाइट्रोप्लास्ट।

यह शोध अप्रैल 2023 में साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक से इस संरचना के जीन्स को पौधों में रोप दिया जाए तो वे स्वयं नाइट्रोजन को परिवर्तित करने में सक्षम हो सकते हैं। इससे फसलों की पैदावार बढ़ सकती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है।

अध्ययन के एक सह लेखक कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के समुद्री पारिस्थितिक वैज्ञानिक के. जोनाथन ज़ेहर कहते हैं कि अब तक पाठ्यपुस्तकों के अनुसार नाइट्रोजन स्थिरीकरण (यानी नाइट्रोजन तत्व को यौगिकों में बदलने) की क्षमता केवल बैक्टीरिया और आर्किया समूह में ही पता थी। ये प्रोकैरियोटिक जीव हैं। कोशिका बनावट के आधार पर जीव दो तरह के होते हैं – प्रोकैरियोट (जिनमें केंद्रक नहीं पाया जाता) और यूकैरियोट (जिनमें सुस्पष्ट केंद्रक पाया जाता है और जेनेटिक पदार्थ केंद्रक में होता है)। उनका अध्ययन बताता है कि शैवाल की यह प्रजाति पहला यूकैरियोटिक जीव है जिसमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता है। यूकैरियोटिक जीवों में पौधे और जंतु शामिल हैं।

2012 में ज़ेहर के शोधदल ने बताया था कि ब्रारुडोस्फेरा बिगलोवी (Braarudosphaera bigelowii) नामक एक समुद्री शैवाल UCYN-A नाम के बैक्टीरिया से करीबी रूप से जुड़ा रहता है। लगता था कि यह बैक्टीरिया शैवाल की कोशिका के अंदर या उसके ऊपर रहता है। शोधकर्ताओं का अनुमान था कि यह बैक्टीरिया नाइट्रोजन गैस को अमोनिया जैसे यौगिकों में बदल देता है जिसका उपयोग शैवाल अपनी वृद्धि में करता है। माना गया था कि नाइट्रोजन के बदले में बैक्टीरिया को शैवाल से कार्बनिक ऊर्जा स्रोत अर्थात पोषक पदार्थ मिलते होंगे।

लेकिन नवीनतम अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि UCYN-A बैक्टीरिया को एक स्वतंत्र जीव के रूप में नहीं बल्कि इस शैवाल के अंदर रहने वाले एक अंगक के रूप में देखा जाना चाहिए।

ज़ेहर का कहना है कि एक पूर्व अध्ययन में किए गए जेनेटिक विश्लेषण के अनुसार इस शैवाल और बैक्टीरिया के पूर्वजों के बीच लगभग 10 करोड़ वर्ष पूर्व एक सहजीवी सम्बंध स्थापित हुआ था। इस सहजीवी सम्बंध ने अंतत: एक अंगक का रूप ले लिया है – नाइट्रोप्लास्ट। यह अब ब्रारुडोस्फेरा बिगलोवी शैवाल के अंदर विराजमान है।

इसे अंगक क्यो कहें?

आखिर किसी कोशिका के अंदर रहने वाले जीव को स्वतंत्र जीव न मानकर अंगक क्यों माना जाए? किसी मेज़बान कोशिका के अंदर रहने वाला बैक्टीरिया अंगक है या नहीं, यह तय करने के लिए दो प्रमुख मापदंडों का उपयोग किया जाता है। पहला तो यह है कि विचाराधीन कोशिका संरचना (बैक्टीरिया) मेज़बान कोशिका में पीढ़ी-दर-पीढ़ी साथ चलना चाहिए। अर्थात जब मेज़बान कोशिका विभाजित होकर दो कोशिकाएं बनें तो दोनों में वह संरचना पहुंचनी चाहिए।

दूसरी कसौटी यह है कि वह संरचना मेज़बान कोशिका द्वारा मिलने वाले प्रोटीन पर निर्भर होना चाहिए।

नाइट्रोप्लास्ट इन दोनों मापदंडों पर खरा पाया गया है। इस कोशिका के विभाजन के विभिन्न चरणों में दर्जनों शैवाल कोशिकाओं की इमेजिंग करके शोधकर्ताओं ने पाया कि मेज़बान कोशिका के विभाजन के ठीक पूर्व नाइट्रोप्लास्ट दो भागों में विभाजित हो जाता है। इस तरह यह नाइट्रोप्लास्ट मूल कोशिका से उसकी संतान कोशिकाओं में स्थानांतरित होता रहता है।

यह ठीक वैसा ही है जैसा कि कोशिका में उपस्थित अन्य अंगकों में होता है। उल्लेखनीय है कि क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉण्ड्रिया भी अंगक ही हैं और उनमें भी कोशिका विभाजन के दौरान ऐसा ही होता है। इसके अलावा क्रोमोप्लास्ट, एमायलोप्लास्ट आदि भी अंगक ही हैं। माना जाता है कि ये भी कभी स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीव थे जो अब पौधों की कोशिकाओं में स्थाई रूप से बस गए हैं और पादप अंगक कहलाते हैं। क्लोरोप्लास्ट के कारण ही पौधों में प्रकाश संश्लेषण संभव हुआ है और माइटोकॉण्ड्रिया ऑक्सी-श्वसन क्रिया को संभव बनाता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इस नाइट्रोप्लास्ट को सारे ज़रूरी प्रोटीन्स शैवाल की कोशिका से ही मिलते है। हालांकि नाइट्रोप्लास्ट मेज़बान कोशिका के आयतन का 8 प्रतिशत से ज़्यादा होता है लेकिन इसके पास वे मुख्य प्रोटीन ही नहीं होते जो प्रकाश संश्लेषण और आनुवंशिक पदार्थ बनाने के लिए ज़रूरी हैं। ये प्रोटीन उसे शैवाल से ही प्राप्त होते हैं।

आंतरिक सहजीवी

सर्व प्रथम एंड्रियास शिंपर ने सन 1883 में यह प्रस्ताव रखा था कि वर्तमान पेड़-पौधों की कोशिकाओं में पाया जाने वाला क्लोरोप्लास्ट कोशिकीय सहजीविता का एक उदाहरण है। इस परिकल्पना के अनुसार क्लोरोप्लास्ट उन सायनोबैक्टीरिया के वंशज हैं जो किसी जीव द्वारा भक्षण के दौरान कोशिका के अंदर ले लिए गए थे। किसी कारण से ये पचने से बच गए और अब वहां आंतरिक सहजीवी के रूप में निवास कर रहे हैं। सायनोबैक्टीरिया और क्लोरोप्लास्ट द्वारा निर्मित प्रोटीन में समानताओं के आधार पर इस परिकल्पना को बल मिलता है। समय के साथ यह आंतरिक सहजीवी स्वतंत्र रूप से रहने की क्षमता खो बैठे क्योंकि उनकी अनुवांशिक सूचनाओं (डीएनए) का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे मेज़बान कोशिका के केंद्रक में स्थानांतरित हो गया।

उपरोक्त तथ्यों के चलते क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉण्ड्रिया के लिए आंतरिक सहजीवी शब्द का उपयोग उचित ही लगता है। इन अंगों की आंतरिक झिल्ली प्रोटोक्लोरोफाइट की प्लाज़्मा झिल्ली से मिलती-जुलती है और बाहरी झिल्ली मेज़बान कोशिका की भित्ति से। यह सिद्धांत माइटोकॉण्ड्रिया की दोहरी दीवार की उपस्थिति को भी उचित रूप से समझाता है। माइटोकॉण्ड्रिया की बाहरी दीवार पर उपस्थित छिद्र (पोरिंस) भी इसका एक प्रमाण है। गौरतलब है कि पोरिंस कुछ बैक्टीरिया की बाहरी झिल्ली में भी पाए जाते हैं। इससे भी उनके आंतरिक सहजीवी होने की पुष्टि होती है। सायनोबैक्टीरिया सामान्य रूप से कई जंतुओं और पौधों के अंदर आज भी मिलते हैं।

पौधों में फेरबदल

ज़ेहर कहते हैं कि नाइट्रोप्लास्ट मेज़बान कोशिका के साथ कैसे तालमेल बैठाता है यह समझ में आने से जेनेटिक इंजीनियरिंग के प्रयासों में मदद मिलेगी। फसलों की पैदावार काफी हद तक नाइट्रोजन की सीमित उपलब्धि से प्रभावित होती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए यदि नाइट्रोप्लास्ट को कोशिकाओं में डाल दिया जाता है तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी। नाइट्रोप्लास्ट युक्त पौधे अपनी नाइट्रोजन सम्बंधी ज़रूरतें स्वयं पूरी कर सकेंगे। यदि ऐसा हो जाता है तो नाइट्रोजन आधारित कृत्रिम उर्वरकों जैसे यूरिया, अमोनियम आदि की आवश्यकता कम हो जाएगी। साथ ही रासायनिक उर्वरकों के मृदा और पर्यावरण पर होने वाले हानिकारक प्रभावों से भी काफी हद तक बचा जा सकेगा।

लेकिन नाइट्रोप्लास्ट को फसली पौधों में रोपना कोई आसान काम नहीं होगा। नाइट्रोप्लास्ट के जीन्स युक्त पादप कोशिकाओं को इस तरह से इंजीनियर करने की आवश्यकता होगी कि नाइट्रोप्लास्ट पादप कोशिका के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते रहें। ऐसा क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉण्ड्रिया में तो प्राकृतिक रूप से होता रहता है। यदि नाइट्रोप्लास्ट के मामले में भी ऐसा हो पाता है तो कृषि जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोयले की कमी और आयात पर चर्चा ज़रूरी – अशोक श्रीनिवास, मारिया चिरायिल, रोहित पटवर्धन और प्रयास (ऊर्जा समूह)

र्मी का मौसम आते ही बिजली संकट मंडराने लगा है। हाल के वर्षों में, अप्रत्याशित मौसम पैटर्न और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से बिजली की मांग में वृद्धि हुई है, जिसको पूरा करना एक चुनौती बन गया है। इस संदर्भ में कुछ मुद्दे विचारणीय हैं।

पहला मुद्दा घरेलू थर्मल कोयले की कमी का है जिसका उपयोग बिजली उत्पादन में किया जाता है। इसकी कमी को बिजली संकट का मुख्य ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष अगस्त के महीने पर विचार करते हैं जो बिजली की अत्यधिक कमी वाला महीना रहा। वैसे गर्मियों के अन्य महीनों की कहानी कुछ अलग नहीं है। अगस्त 2023 में लगभग 84 करोड़ युनिट बिजली का अभाव रहा। इसका कारण मुख्य रूप से खराब मानसून के कारण मांग में वृद्धि और कुछ स्रोतों से बिजली आपूर्ति में कमी था। यहां यह ज़िक्र करना लाज़मी है कि यह कमी उस महीने की मांग का सिर्फ 0.55 प्रतिशत थी। इस कमी की पूर्ति 6 लाख टन घरेलू कोयले से आसानी से की जा सकती थी, चूंकि अगस्त और सितंबर के दौरान कोयला खदानों में 3 करोड़ टन से अधिक कोयला उपलब्ध था।

स्पष्ट है कि समस्या वास्तव में घरेलू थर्मल कोयले की अनुपलब्धता की नहीं बल्कि इसे बिजली संयंत्रों तक पहुंचाने के लिए अपर्याप्त परिवहन व्यवस्था की थी। ऊर्जा मंत्रालय का एक हालिया परामर्श (एडवाइज़री) इसकी पुष्टि करता है, जिसमें कहा गया था, “रेलवे नेटवर्क से जुड़े विभिन्न परिचालन (लॉजिस्टिक) मुद्दों के कारण घरेलू कोयले की आपूर्ति बाधित रहेगी।”

बहरहाल, परिवहन सम्बंधी चुनौतियों से निपटने में कुछ समय लगेगा। इस दौरान बिजली की कमी से कैसे निपटा जाए? चूंकि इस कमी को पूरा करने के लिए फिलहाल कोयला सबसे अच्छा विकल्प है, इसलिए इसका उचित जवाब है कि कोयले के वैकल्पिक स्रोत खोजे जाएं। इससे दूसरा भ्रम जुड़ा है कि एकमात्र वैकल्पिक स्रोत तो कोयले का आयात है।

वर्तमान स्थिति देखें तो कोल इंडिया लिमिटेड अपने उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत यानी प्रति वर्ष 7-8 करोड़ टन स्पॉट नीलामी के माध्यम से बेचता है। हालांकि ऐसे कोयले की कीमत कई संयंत्रों को मिलने वाले कोयले से कहीं अधिक है फिर भी यह आयातित कोयले की कीमत से बहुत कम है। हालांकि, कुछ संयंत्रों के पास नीलामी स्थलों से कोयला प्राप्त करने के लिए परिवहन सम्बंधी बाधाएं तो नहीं हैं लेकिन फिर भी ऐसे संयंत्र नीलामी को एक विकल्प के रूप में नहीं देखते हैं।

भले ही नीलामी का सहारा लिया जाए, तब भी घरेलू कोयले के साथ मिश्रण करने के लिए कुछ थर्मल कोयले के आयात की आवश्यकता बनी रह सकती है। सवाल यह है कि किस संयंत्र के लिए कितना आयात पर्याप्त है। ऊर्जा मंत्रालय ने बिजली उत्पादकों को जून 2024 तक अपने कोयला स्टॉक की निगरानी जारी रखने और आवश्यकतानुसार (वज़न के हिसाब से 6 प्रतिशत तक) कोयला आयात करने के लिए परामर्श जारी किया है। लेकिन कई लोगों ने इस परामर्श की व्याख्या की है यह 6 प्रतिशत कोयला आयात का फरमान है। यह व्याख्या कोयला-आधारित बिजली उत्पादकों के लिए काफी सुविधाजनक हो सकती है क्योंकि वे आयातित कोयले की बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। इस स्थिति में बिजली लागत को कम रखने के लिए ज़िम्मेदार बिजली नियामकों को इस परामर्श को आदेश के रूप में देखने को निरुत्साहित करना चाहिए। ऊर्जा मंत्रालय के परामर्श में स्पष्ट कहा गया है कि यह मात्र एक सलाह है और बार-बार कहा गया है कि “आवश्यकता अनुसार” आयातित कोयले का मिश्रण किया जाए। इसके अलावा, प्रारंभिक विश्लेषण से पता चलता है कि मात्र 0.3 प्रतिशत अतिरिक्त आयातित कोयले का मिश्रण करके कमियों को पूरा किया जा सकता था। इस प्रकार, तीसरा भ्रम 6 प्रतिशत कोयला आयात को अनिवार्य बताना है।

मंत्रालय के परामर्श को एक आदेश के रूप में देखने से लागत पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ सकते हैं। चूंकि कोयला अभी भी भारत की 70 प्रतिशत से अधिक बिजली की आपूर्ति करता है इसलिए सभी कोयला-आधारित उत्पादन में 6 प्रतिशत आयातित कोयले का अनिवार्य सम्मिश्रण, कोयला-आधारित बिजली की परिवर्तनीय (variable) लागत को 4.5-7.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। एनुअल रेटिंग ऑफ पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन की रिपोर्ट के अनुसार बिजली की मांग में वृद्धि, कोयले के आयात और आयातित कोयले की कीमतों में वृद्धि के कारण वित्त वर्ष 2023 में बिजली खरीद लागत में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऐसे में जब वितरण कंपनियों की सलाह के बिना आयातित कोयले का सम्मिश्रण किया जाता है, तो आवश्यकता से अधिक लंबे समय तक उच्च लागत की स्वीकृति मिलने का खतरा है।

दरअसल, सभी बिजली संयंत्र एक जैसे नहीं होते। आम तौर पर सबसे अधिक उत्पादन करने वाले तथाकथित पिट-हेड संयंत्र खदानों के करीब और बंदरगाहों से दूर होते हैं। इसलिए उन्हें कोयले की कमी का सामना नहीं करना पड़ता। उच्च मांग की अवधि में खदानों से दूर स्थित संयंत्रों में कोयले की कमी की संभावना अधिक होती है, लेकिन वे आमतौर पर उतना उत्पादन नहीं करते हैं। इस प्रकार, देश के सभी संयंत्रों के लिए 6 प्रतिशत कोयला आयात करने की सलाह को आदेश के रूप में देखने का कोई औचित्य नहीं है।

इन सबसे इतना तो स्पष्ट है कि देश में कोयले की कमी को लेकर चल रहे विमर्श में सुधार की आवश्यकता है। ऐसा कहना उचित नहीं है कि कोयले का आयात इस कमी को दूर करने का एकमात्र तरीका है। इसमें बुनियादी चुनौती कोयले को ज़रूरतमंद बिजली घरों तक पहुंचाने में बाधक परिवहन दिक्कतों को दूर करना है। इसके साथ ही नियामक आयोगों और वितरण कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी कोयला-आधारित संयंत्र कोयले की कमी की संभावना के प्रति सतर्क रहें और अंतर को पाटने के लिए सबसे सस्ते वैकल्पिक स्रोतों की पहचान करें। ज़ाहिर है, यह विकल्प कोयले का आयात तो नहीं है। यदि ऐसा होता है तो असहाय उपभोक्ता को अनुचित कोयला खरीद का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु मॉडल्स के अपने कार्बन पदचिन्ह

न दिनों जलवायु वैज्ञानिक एक पेचीदा मुद्दे पर संतुलन बनाने में जुटे हैं – स्वयं उनके द्वारा किए जा रहे पर्यावरण अध्ययन के प्रयासों के पर्यावरणीय प्रभाव। पिछले कई दशकों में सुपर-कंप्यूटर सिमुलेशन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को और विभिन्न कारणों से उसमें संभावित परिवर्तनों को समझने के अहम साधन रहे हैं। इन सिमुलेशन मॉडल्स में वायुमंडल, महासागरों और भूमि के बीच होने वाली अंतर्क्रिया पर बढ़ती ग्रीनहाउस गैसों के असर को समझने के प्रयास किए जाते हैं।

पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी की जलवायु के सुपर-कंप्यूटर सिमुलेशन्स ने हमारी समझ को काफी बढ़ाया है। लेकिन ये मॉडल जटिल से जटिल होते गए हैं और इन्हें चलाने के लिए लगने वाली बिजली की मात्रा इतनी अधिक हो गई है कि वैज्ञानिकों को इनके अपने पर्यावरणीय प्रभावों की चिंता सताने लगी है।

हालांकि, एक-एक मॉडल उतना प्रभाव नहीं डालता, लेकिन ऐसे कई मॉडल्स को लंबे समय के लिए चलाने के लिए बड़े पैमाने पर कम्प्यूटेशनल क्षमता और मेमोरी की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप सिमुलेशन मॉडल मेगावाट तक बिजली की खपत करते हैं जो अक्सर जीवाश्म ईंधन से प्राप्त होती है।

दुनिया भर के जलवायु सिमुलेशन प्रयासों का समन्वय करने वाले कपल्ड मॉडल इंटरकंपेरिज़न प्रोजेक्ट (सीएमआईपी) के 2022 में समाप्त हुए अंतिम दौर में लगभग 50 मॉडलिंग केंद्रों ने योगदान दिया था। इन सबमें बड़ी मात्रा में डैटा विकसित हुआ और काफी बिजली की खपत हुई। लेकिन सीएमआईपी की सह-अध्यक्ष का कहना है कि इनमें से बहुत थोड़े से केंद्रों ने कंप्यूटिंग क्षमता और ऊर्जा खपत की निगरानी की है।

इस मामले में शोधकर्ता मॉडलिंग के कामकाज में अधिक पारदर्शिता और कार्यकुशलता की वकालत कर रहे हैं जिससे इस समस्या के समाधान प्रयास काफी गति पकड़ रहे हैं। ऊर्जा उपयोग की निगरानी, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करना, सुव्यवस्थित मॉडलिंग प्रक्रियाओं और वैज्ञानिक निष्ठा से समझौता किए बिना उत्सर्जन को कम करने की रणनीति इसका हिस्सा है। हालांकि, इन परिवर्तनों को लागू करने में चुनौतियां भी है। इसमें मॉडलिंग केंद्रों को उनके वैज्ञानिक लक्ष्यों के साथ-साथ पर्यावरणीय सरोकारों को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करना शामिल होगा।

वर्तमान में, सीएमआईपी में रणनीति परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है। इसके तहत बहुत सारे मॉडल चलाने की बजाय, संकेंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जा रहा है। सीएमआईपी का लक्ष्य है कि आवश्यक मॉडल के एक मुख्य सेट का समर्थन करके और सामुदायिक भागीदारी वाले प्रयोगों का समन्वय करके, वैज्ञानिक गुणवत्ता को संरक्षित करते हुए अनावश्यक उत्सर्जन को कम किया जाए।

अलबत्ता, कार्बन अनुशासन का उद्देश्य मॉडलिंग के दायरे से भी परे फैला हुआ है। इसमें कर्मचारियों की यात्रा के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करना और अनुसंधान संस्थानों के भीतर उपयुक्त तरीके अपनाने जैसे व्यापक विचार शामिल हैं। वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिए तत्काल कार्रवाई की वकालत करते हैं, ऐसे में मॉडलिंग केंद्रों को मिसाल बनाना एक नैतिक अनिवार्यता है। अपनी कार्यप्रणाली के पर्यावरणीय परिणामों का सामना करते हुए जलवायु वैज्ञानिक न केवल अपने मॉडल को परिष्कृत कर रहे हैं बल्कि अधिक टिकाऊ भविष्य के लिए अपनी प्रतिबद्धता को पुन: परिभाषित भी कर रहे हैं। कार्बन अनुशासन को अपनाकर और पर्यावरणीय विचारों को अपने अनुसंधान कार्य में एकीकृत कर वे एक हरित, अधिक लचीले वैज्ञानिक उद्यम का रास्ता दिखा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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