ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

लवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या ‘रायशुमारी’ वैज्ञानिक सत्य बता सकती है?

अमन मदान

क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर कहीं जीवन (एलियन्स) (aliens) है? इसे लेकर बहस तो चलती ही रहती है। लेकिन लोगों की उत्सुकता होती है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे सवाल हमें दिलचस्प लग सकते हैं। खासकर यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि वैज्ञानिक इस बारे में क्या सोचते या कहते हैं क्योंकि, कम से कम, हम यह मानते हैं कि वैज्ञानिक जो सोचते या मानते हैं वह सही होगा। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि क्या सिर्फ कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन बसता है, या सभी वैज्ञानिक यह बात मानते हैं?

ऐसी रायशुमारी (ओपिनियन पोल) (opinion poll) के ज़रिए वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए इंग्लैंड की डरहम युनिवर्सिटी (durham university) ने एक केंद्र स्थापित किया है, जिसमें किसी सवाल पर वैज्ञानिकों की राय जानी जाती है। इसका नाम है सेंटर फॉर साइंटिफिक कम्युनिटी ओपिनियन पोलिंग एंड इवैल्यूएशन (C-SCOPE)। इसे स्पष्ट और सटीक सवालों के शीघ्र और सरल जवाब पाने के हिसाब से बनाया गया है। इसके तहत 2023 में पहला सर्वेक्षण किया गया था। इसमें भारत समेत 12 देशों और 30 संस्थानों के 20,085 वैज्ञानिकों से पूछा गया था: “क्या विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि COVID-19 एक वायरस की वजह से होता है?” जवाब ‘लिकर्ट स्केल’ (likert scale) पर मांगे गए थे, जिसमें पांच विकल्प थे – पूरी तरह असहमत, असहमत, तटस्थ, सहमत, पूरी तरह सहमत। 20,085 में से 6807 वैज्ञानिकों ने सवाल के जवाब दिए थे। 93.2 प्रतिशत वैज्ञानिकों ने कहा था कि वे इस बात से सहमत या पूरी तरह सहमत हैं।

यह मानना लुभावना लगता है कि यदि ज़्यादातर वैज्ञानिक किसी बात पर सहमत हैं, तो वह सत्य होनी चाहिए। या, अगर ज़्यादातर वैज्ञानिक असहमत हैं, तो वह बात असत्य होनी चाहिए। इसके बाद की गई एक अन्य रायशुमारी में एक शोध पत्र पर 494 अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों की राय ली गई थी: शोध पत्र में दावा किया गया था कि पृथ्वी से लगभग 124 प्रकाश-वर्ष दूर K2-18b नाम के एक ग्रह पर जीवन हो सकता है। इस विचार से सिर्फ 6.6 प्रतिशत लोग सहमत या पूरी तरह सहमत थे। सवाल यह है कि यदि सहमत होने वालों की संख्या इतनी कम है, तो क्या यह दावा गलत है?

रायशुमारी हमें आसानी से समझने योग्य जानकारी देती हैं। “सिर्फ 6.6 प्रतिशत वैज्ञानिक सहमत हैं!” लेकिन हमें बहुत सी ऐसी बातें नहीं पता होतीं जो उस जवाब की पृष्ठभूमि में हो सकती हैं। जैसे, यह सर्वेक्षण शोध पत्र प्रकाशित होने के महज़ 8 दिन बाद किया गया था। तो हमें पता नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल कितने अंतरिक्ष-जीव विज्ञानियों ने वह शोध पत्र पढ़ा होगा।

वैज्ञानिक शोध के लिहाज़ से सर्वेक्षण (survey) एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, बाकी सभी तरीकों या साधनों की तरह, इसका इस्तेमाल भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए और इनसे उतना ही मतलब निकालना चाहिए जितना वे बता सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उत्तरदाता सवालों का गलत मतलब निकाल सकते हैं – अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या COVID-19 वायरस से हुआ था, तो मुझे लग सकता है कि मुझसे पूछा जा रहा है कि क्या मैंने खुद ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे देखे हैं जो इसकी पुष्टि करते हों। तो मेरा जवाब होगा, ‘नहीं’। और ईमानदारी से कहूं तो (और वैज्ञानिक को ईमानदार होना चाहिए) मैंने उन प्रतिष्ठित जर्नल्स के शोध पत्र देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई है जिनमें COVID-19 के लिए ज़िम्मेदार जीव की पहचान की गई थी। मुझे अब भी थोड़ी शंका है कि इसके लिए वायरस ज़िम्मेदार था, लेकिन मैं इसे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से नहीं कह सकता। जैसे, सर्वेक्षण में शामिल 7 प्रतिशत लोगों ने इस बात से सहमति नहीं जताई कि कोविड-19 वायरस से हुआ था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जानकार वैज्ञानिकों के बीच कोई बड़ा मतभेद है। हो सकता है कि बात या सवाल स्पष्ट करने के लिए कुछ और सवाल पूछने की ज़रूरत हो। कभी-कभी एक वाक्य के सवालों का मतलब समझना मुश्किल हो सकता है। लोगों की राय लेने वाले किसी भी सर्वेक्षण या साक्षात्कार की यह जानी-मानी समस्या है।

हालांकि, रायशुमारी के नतीजे पढ़ना मज़ेदार होता है। और सही तरीके से ‘आपकी राय’ ली जाए, तो दिलचस्प रुझान इसमें नज़र आ सकते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक सत्य या तथ्य तय करने का तरीका नहीं हो सकता। यह एक ऐसी आपत्ति है जो सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक द्वारा सवाल समझने के तरीके या नमूने में त्रुटि से कहीं आगे की बात है। असल में, विज्ञान का विकास ही सर्वमान्य तथ्य के खिलाफ हुआ था। विज्ञान ने इस बात को कड़ाई से खारिज किया है कि ज्ञान की प्रामाणिकता इस बात से तय होती है कि अन्य इस बारे में क्या सोचते हैं या खासकर सत्तानशीं लोग क्या सोचते हैं। जैसे आम राय संभवत: यह थी कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन ऐसे कई अवलोकन थे जो इस परिकल्पना से मेल नहीं खाते थे। किनारे से दूर जाते समय जहाज़ पानी में डूबते और धीरे-धीरे गायब होते क्यों दिखते थे? इसे तभी समझा जा सकता था जब हम यह मान लें कि पृथ्वी गोल है, न कि चपटी। बहुमत की राय (majority opinion) और सत्ता की बात मानने की बजाय, परीक्षण किए गए और तर्कों की जांच की गई। इसे ही वैज्ञानिक सत्य तक पहुंचने का तरीका माना गया।

वैज्ञानिकों से उम्मीद की जाती है कि वे पारदर्शी (transparent) हों और अपने तरीके और नतीजे सबके साथ साझा करें। उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे एक-दूसरे के काम की जांच करें और ऐसी समझ बनाएं जो अलग-अलग अवलोकनों और नज़रियों से मेल खाती हो। इससे कुछ हद तक एक साझा समझ बनती है। आजकल विज्ञान के कई दार्शनिक सावधानीपूर्वक यह कहते हैं कि वैज्ञानिक ऐसे नियम प्रतिपादित नहीं करते जो सार्वभौमिक हों और जिन्हें हमें अंतिम सत्य की तरह पूजना पड़े। इसकी बजाय, वैज्ञानिक संभाविताओं (scientific potential) के आधार पर सामान्यीकरण (normalization) करते हैं।

पूर्व अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर इस बात की काफी संभावना है कि पृथ्वी गोल है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आ सकते जो इस ओर इशारा करें कि पृथ्वी पूरी तरह गेंद जैसी गोल नहीं है, बल्कि इसके कुछ हिस्से चपटे हैं या कहीं ऊबड़-खाबड़ है। वास्तव में, पृथ्वी ऐसी ही है।

विज्ञान का इतिहास हमें यह भी बताता है कि वैज्ञानिक भी बाकी लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और वे ऐसी नई जानकारी को मानने से इन्कार कर सकते हैं जो उनके पहले से बने विचारों से मेल नहीं खाती।

विज्ञान के जाने-माने दार्शनिक थॉमस एस. कुन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी में तत्कालीन मान्य सिद्धांतों को चुनौती देने वाले प्रमाण होने के बावजूद वे पुराने ‘मान्य’ सिद्धांत (accepted principles and theories) अपनी जगह डटे रहे थे। नए सिद्धांतों (new principles and theories) को या तो अपवाद मानकर या अवलोकन में गलती मानकर खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ बड़े बदलावों के बाद ही नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों की जगह ले पाए। बेशक, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैज्ञानिक सत्य के इतर हर राय उतनी ही सही हो और उसे मात्र वैज्ञानिक संस्थाओं की मनमानी या सख्ती की वजह से नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो। वैज्ञानिक विधियों से हम वाकई काफी यकीन के साथ कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है, चपटी नहीं। हम काफी हद तक यह कह सकते हैं कि कुछ सिद्धांत दूसरों के मुकाबले कम भरोसेमंद हैं। लेकिन हमें कभी भी ऐसे अडिग दावे नहीं करने चाहिए जैसा धार्मिक संस्थाएं अपनी मान्यताओं को लेकर करती हैं।

वैज्ञानिक सत्य को उन वैज्ञानिकों के एक-वाक्यीय सर्वेक्षण के नतीजों से नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने डैटा शायद ही देखा हो या न भी देखा हो और उसका विश्लेषण किया हो या न भी किया हो। इन सर्वेक्षण से जो आंकड़े मिलते हैं, वे मज़ेदार या तसल्लीबख्श हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे वास्तविकता के द्योतक हों। वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों से बात करना ज़रूरी हो सकता है जिन्होंने पेश किए गए सबूतों और दिए जा रहे तर्कों को ध्यान से देखा है, जांचा-परखा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के सर्वेक्षण और उनके आंकड़ों से महत्वपूर्ण नतीजे नहीं मिल सकते। पूर्व अध्ययनों का मेटा-विश्लेषण (meta-analysis) काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, एलिज़ाबेथ लेवी पेलक और उनके साथियों ने 2021 में ऐसे 418 प्रयोगों के नतीजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया था कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को कैसे कम किया जा सकता है। उनके विश्लेषण से पता चला था कि कुछ तरीके अन्य के मुकाबले ज़्यादा असरदार होते हैं। लेकिन उन्होंने यह दावा कदापि नहीं किया कि उनके नतीजे अंतिम सत्य हैं। ऐसा करना विज्ञान की भावना के खिलाफ होता।

वैज्ञानिकों की राय जानने के लिए रायशुमारी करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते हम यह दावा न करें कि उनसे वैज्ञानिक सत्य उजागर हो रहे हैं या सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलेगी। हमें हमेशा किसी वैज्ञानिक सत्य की ज़रूरत नहीं होती।

उदाहरण के लिए, साहित्य और कविता मनुष्यों के कई अहम सरोकारों को रखते और समझते हैं, जिन्हें विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण नहीं समझ सकता। फिर भी, ऐसे जनमतसंग्रह (referendum) – जो जानकारी देने से ज़्यादा मनोरंजन और तसल्ली देते हैं – उन्हें वैज्ञानिक सच की वैधता तय करने के काम से अलग रखना ही बेहतर है।

प्रमाणों की सावधानीपूर्वक की गई व्याख्या और विभिन्न अध्ययनों की बारीकी से तुलना करके ही वैज्ञानिक सत्य को सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह काम एक-वाक्य वाले सवाल-जवाबों के बस का नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्र तल में छिपे हैं शुरुआती जीवन के राज़!

लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति (origin of life) कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है।

जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) (phosphate) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए (DNA or RNA) की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया (reaction) करता है।

तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया? 

गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं (microbiology lab) में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया – डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) – मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण (oxidation) करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है।

फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया में से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।

इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एन्ज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक (catalyst) की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स

समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) (hydrothermal vents) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है।

एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम (palledium) जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।

इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट (phosphate) में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था। 

हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी (oxygen less earth) पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा।

आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन तो चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भूकंप जोखिम का नया नक्शा आया और चला गया

माधव केलकर

पिछले साल यानी नवंबर 2025 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेडर्ड (बी.आई.एस.) ने भारत के लिए भूकंप जोखिम वाले इलाकों का नया नक्शा जारी किया था। इससे पहले सन 2016 में भी बी.आई.एस. (BIS) द्वारा एक नक्शा जारी किया गया था, उसको आधार मानकर ही भारत में इमारतें, भवन, सड़कें, पुल, हवाई अड्डे आदि का निर्माण निर्धारित भवन मानकों के अनुसार किया जा रहा था। लगभग 9 साल बाद आए इस नक्शे के बारे में बताया गया है कि भारत की टेक्टॉनिक गतिविधियों, सक्रिय फॉल्ट ज़ोन, उपग्रहों से प्राप्त जानकारी आदि आंकड़ों की रोशनी में यह भूकंप प्रवण क्षेत्रों (earthquake-prone area/ seismic zone) को दर्शाने वाला नक्शा बनाया गया है। इस नक्शे के बारे में एक और बात कही जाती है कि यह नक्शा भूगर्भीय तथ्यों के आधार पर बनाया गया है। इसलिए ज़मीन के ऊपर मौजूद कोई जगह प्रशासनिक, सामरिक या व्यापारिक दृष्टि से कितनी भी महत्वपूर्ण हो, उसे भूकंपीय खतरे के लिहाज़ से जिस ज़ोन में होना चाहिए, उसी ज़ोन में दिखाया गया है। जगह के महत्व के आधार पर ज़ोन की सीमा-रेखा के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई है।

बहरहाल, नए भूकंपीय जोखिम नक्शे को जारी करने के महज़ चार-पांच महीनों के बाद वापस ले लिया गया। एक बार फिर हम पुराने नक्शे पर लौट आए हैं। नया नक्शा वापस क्यों हुआ इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। बस, कुछ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। चलिए, पहले नए नक्शे की कुछ खास बातों को देखने से पहले पिछले कुछ पन्ने पलटते हैं।

सन 2025 से पहले के नक्शे

भारत को भौगोलिक रूप से तीन मुख्य टेक्टॉनिक क्षेत्रों (tectonic areas) में बांटा जा सकता है: उत्तर में हिमालय,  हिमालय से सटा गंगा-सिंधु का मैदान और दक्षिण में प्रायद्वीपीय भारत। भारत में इन तीनों भौगोलिक क्षेत्रों में भूकंप के खतरे और उससे जुड़े जोखिमों का स्तर अलग-अलग है। इसलिए, 1935 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत का पहला भूकंप संभावित इलाकों का नक्शा तैयार किया। इसमें ज़मीन के हिस्सों को भारी, मध्यम और हल्के से लेकर बिना नुकसान वाले क्षेत्रों में बांटा गया था। यह भारत के उपरोक्त  तीन भौगोलिक क्षेत्रों से काफी हद तक मेल खाता था।

पूरा हिमालय क्षेत्र तेज़ तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय प्लेट युरेशियन प्लेट की ओर लगातार लगभग 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से बढ़ रही है, जिससे धरातल के नीचे की चट्टानी परतों में तनाव पैदा होता है और फिर वह छूटता है।

पिछले सवा सौ साल में हिमालय क्षेत्र में चार बड़े भूकंपों का रिकॉर्ड है: शिलांग भूकंप (1897, तीव्रता 8.1), कांगड़ा भूकंप (1905, तीव्रता 7.9), बिहार-नेपाल भूकंप (1934, तीव्रता 8.3), और असम-तिब्बत भूकंप (1950, तीव्रता 8.6)।

इनमें से शिलांग भूकंप के अलावा बाकी भूकंप सीधे तौर पर हिमालयी प्लेट की सीमा से जुड़े हैं। इसके अलावा, हिमालय के कई हिस्सों की पहचान ‘सिस्मिक गैप’ (भूकंपीय अंतराल) के तौर पर की गई है, जहां भविष्य में कभी भी विनाशकारी भूकंप आने की आशंका है।

हिमालयी प्लेट-टकराव वाले इलाके से सटे घनी आबादी वाले सिंधु-गंगा के मैदान भी बड़े हिमालयी भूकंपों और तेज़ स्थानीय भूकंपों के प्रति बहुत संवेदनशील हैं, क्योंकि यहां की मोटी अवसादी परत ज़मीन की हलचल को बढ़ा देती है। साथ ही, प्रायद्वीपीय भारत के कुछ अलग-थलग हिस्सों में मध्यम तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं, जिनसे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।

1935 तक प्रायद्वीपीय भारत में कोई उल्लेखनीय भूकंप दर्ज नहीं हुआ था। इसलिए इस पूरे इलाके को तीव्र भूकंप संभावित ज़ोन से बाहर रखा गया था।

1960 के दशक में प्लेट टेक्टॉनिक्स (tectonic plates) के सिद्धांत को मान्यता मिलने के बाद भारत में भारतीय प्लेट, युरेशियन प्लेट के खिसकने की गति, हिमालय की ऊंचाई बढ़ने, हिमालय के इलाके में मौजूद भ्रंश रेखा वगैरह का अध्ययन किया जाने लगा। इसी समय नर्मदा-सोन-ताप्ती नदी घाटियों में मौजूद भ्रंश रेखा के बारे में भी जानकारियां जुटाने का सिलसिला शुरू हुआ। इन सब शोधकार्यों की वजह से 1970 में भारत को भूकंप प्रवणता वाले पांच क्षेत्रों (ज़ोन) में बांटा गया। ज़ोन 2 में भूकंप का खतरा बेहद कम था। जबकि ज़ोन 5 में भूकंप का सबसे ज़्यादा खतरा था। ज़ोन 5 में हर साल कम तीव्रता के दर्ज़न भर भूकंप दर्ज होते थे। लेकिन खतरनाक तीव्रता के भूकंप कुछेक सालों में एक बार आते थे। ज़ोन 3 और 4 में भूकंप का खतरा तो था लेकिन यहां भी बड़े भूकंप की आशंका कम आंकी गई थी।

भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहला भूकंपीय ज़ोन मानचित्र जारी किया था। 1970 में इसका संशोधित रूप ज़ारी किया गया। सन 2002 में जो भूकंपीय मानचित्र जारी किया गया उसमें ज़ोन 1 को खत्म कर उसे ज़ोन 2 में मिला दिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में भारत के कई शहरों में भूकंप मापी उपकरण (seismograph) लगाकर इनका एक नेटवर्क बनाया गया है। इसकी बदौलत ज़ोन 2, 3 व 4 में भी ज़मीन के भीतर की हलचलों पर करीबी नज़र रखना संभव हुआ है। साथ ही, हिमालय, तराई इलाके, कच्छ का रन, राजस्थान और उत्तर-पूर्व के राज्यों के नीचे की ज़मीनी हलचलों को बेहतर तरीके से परखा गया है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लेते हैं। इस प्रदेश में ऊपरी सतह जितनी स्थिर दिखती है सतह के कुछ किलोमीटर नीचे उतनी स्थिरता नहीं है। सोन-नर्मदा उत्तरी भ्रंश, सोन-नर्मदा दक्षिणी भ्रंश, बड़वानी-सुक्ता भ्रंश, ताप्ती उत्तरी भ्रंश, गोविलगढ़ भ्रंश जैसी कई टूट-फूट व दरारें हैं, और वहां की चट्टानी परतों में ढेर सारी ऊर्जा संचित है।

भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2016 में भी नक्शा जारी किया था।

सन 2025 का नक्शा

पिछले तीन-चार दशक के दौरान भारत और पड़ोसी देशों में आए प्रमुख भूकंपों में शामिल हैं: बिहार-नेपाल भूकंप (1988, तीव्रता 6.8), उत्तरकाशी भूकंप (1991, तीव्रता 6.8), किल्लारी-लातूर भूकंप (1993, तीव्रता 6.3), जबलपुर भूकंप (1997, तीव्रता 6.1), चमोली भूकंप (1999 तीव्रता 6.5), भुज भूकंप (2001, तीव्रता 7.7), हिंद महासागर सुनामी (2004, तीव्रता 9.3), कश्मीर भूकंप (2005, तीव्रता 7.6), सिक्किम भूकंप (2011, तीव्रता 6.9) और नेपाल भूकंप (2015, तीsव्रता 7.9)।

इन भूकंपों के बाद की गई जांच-पड़ताल से पता चला कि इनमें ज़्यादातर मौतें मुख्य रूप से उन इमारतों और ढांचों के ढहने से हुईं जो भूकंप-रोधी डिज़ाइन नियमों का पालन नहीं करते थे। दुनिया के कई अन्य हिस्सों में इतनी ही तीव्रता वाले भूकंपों से जान-माल का इतना भारी नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि वहां इमारतें और ढांचे भूकंप-रोधी खूबियों के साथ और सख्त तकनीकी-कानूनी नियमों के अंतर्गत  बनाए गए थे। इसलिए, यह समझदारी की बात है कि भारत में विकास की प्रक्रिया में भूकंप से होने वाले जोखिम को कम करने के उपायों को शामिल किया जाए। इसके लिए देश के भूकंप जोखिम ज़ोन्स (जो मात्रात्मक रूप से और अधिक वास्तविक डैटा पर आधारित हों) के आधार पर भूकंप-रोधी डिज़ाइन (earthquake resistant designs) वाली इमारतें और बुनियादी ढांचे बनाए जाने चाहिए।

अपने अनुभवों और युरोप, जापान वगैरह द्वारा अपनाए जा रहे मानकों की रोशनी में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा सन 2025 में नया भूकंपीय जोखिम का नक्शा जारी किया गया। सन 2025 में जारी किए गए नक्शे में पूर्ववर्ती नक्शों के मुकाबले एक नया ज़ोन यानी ज़ोन नंबर 6 जोड़ा गया है। पूर्ववर्ती बाकी ज़ोन के एरिया को भी बढ़ाया-घटाया गया है।

नए नक्शे में छत्तीसगढ़, मध्य भारत, दक्कन के पठार के कुछ इलाकों के अलावा दक्षिण भारत के राज्यों को ज़ोन 2 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की आशंका बेहद कम है।

मध्य भारत, नर्मदा घाटी, झारखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा के कुछ इलाकों को ज़ोन 3 में शामिल किया गया है। यहां तीव्र भूकंप आने की मध्यम संभावना है।

ज़ोन 4 में उत्तरी मैदान, दिल्ली के कुछ इलाके शामिल हैं। नर्मदा-सोन घाटी के कुछ इलाके भी ज़ोन 4 में शामिल किए गए हैं। यह वह इलाका है जहां भूकंप का उच्च खतरा मौजूद है।

ज़ोन 5 में गुजरात और उत्तर पूर्वी राज्य और हिमालय के तराई वाले इलाके भी शामिल हैं। यहां तीव्र भूकंप का खतरा है।

ज़ोन 6 में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक का पूरा हिमालय क्षेत्र शामिल है, जहां तीव्रतम भूकंप का खतरा है।

इस नए नक्शे के मुताबिक भारत का काफी बड़ा इलाका ज़ोन 4, 5, 6 यानी तीव्र भूकंप प्रवण इलाके में आता है।

इस नक्शे में यदि कोई शहर निम्न जोखिम वाले ज़ोन में है लेकिन निम्न और उच्च जोखिम ज़ोन की सीमा पर है, तो उस शहर को उच्च ज़ोन में गिना जाएगा और उस पर वे सब मानक लागू होंगे जो ज़्यादा खतरे वाले ज़ोन पर लागू होते हैं।

नया नक्शा, नए पेंच

नया नक्शा प्रस्तावित करते ही यह समझ में आने लगा कि इस नक्शे के ज़ोन 5 और ज़ोन 6 में उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत, हिमालय की तराई और मध्य हिमालय के इलाके शामिल हैं। इसलिए भविष्य में प्रस्तावित परियोजनाओं, पुलों, सुरंगों, सड़कों, भवनों, अस्पतालों, बांधों, पर्यटन विस्तार कार्यक्रम सभी पर उस ज़ोन के भूकंप सुरक्षा मानक लागू होंगे और जो परियोजनाएं शुरू हो रही हैं उनकी लागत नए मानकों को लागू करने की वजह से बढ़ जाएगी।

इसी तरह ज़ोन 5 में पुरानी इमारतों का मज़बूतीकरण करना भी अनिवार्य हो जाएगा।

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और आपदा प्रबंधन टीमों को एक बड़े इलाके में राहत और बचाव का काम करने के लिए तैयार रहना होगा।

शायद, एक बेहतर तकनीक के सहारे भूवैज्ञानिकों ने भारत के भूकंप प्रवण इलाके का नक्शा तैयार किया है। जिसमें हिमालय, तराई, भुज-कच्छ जैसे भूकंप के पारंपरिक इलाकों के अलावा भारत के कई अन्य इलाकों की भूगर्भीय स्थितियों का आकलन करके खतरे के दायरे को बताया गया है। भारतीय मानक ब्यूरो ने इन खतरों को समझते हुए हर इलाके के लिए सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं के लिए मानक तैयार किए थे।

अब मामला आता है इन मानकों का पालन करवाने का। यहां आकर हम सिर्फ कयास ही लगा सकते है कि शायद आगे की परियोजनाओं और इन मानकों में ताल-मेल बिठाना कठिन लगने लगा हो। यह भी सोचा गया हो कि पुराने मानक अब भी उपयोगी हैं। इसलिए पुराने मानकों को लागू रखने पर लौट आए हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जेनेरिक दवाइयों के उत्पादन पर संकट

डॉ. अनंत फड़के

जेनेरिक यानी मूल नाम (Generic Name) से बेची जाने वाली दवाइयां। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में जनौषधी दुकानों में लगभग एक-चौथाई कीमत पर उपलब्ध होती हैं और उनकी गुणवत्ता भी ब्रांडेड दवाओं से कम नहीं होती — यह बात अब अधिकाधिक लोगों को समझ में आने लगी है। लेकिन अब जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के सम्बंध में मात्र एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है। लेकिन इसके पहले कुछ बुनियादी चीजें समझ लेते हैं।

जेनेरिक दवाइयां और गुणवत्ता

जेनेरिक दवा शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि ‘जेनेरिक दवा’ यानी किसी दवा के आविष्कार के बाद शोधकर्ता कंपनी को पेटेंट कानून के तहत उस दवा के लिए जो पेटेंट प्राप्त होता है, उस पेटेंट की अवधि समाप्त हो चुकी हो। ऐसी दवा अब जेनेरिक कहलाती है और अन्य कंपनियां शोधकर्ता कंपनी से अनुमति लिए बिना उसका उत्पादन कर सकती हैं। भारतीय बाज़ार में उपलब्ध 90 प्रतिशत से अधिक दवाइयां ऐसी ही जेनेरिक दवाएं हैं, अर्थात उनकी पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी है। “मैं जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखता” ऐसा कहने वाले अधिकांश डॉक्टर भी जेनेरिक (पेटेंट-मुक्त) दवाइयां ही लिखते हैं।

जेनेरिक दवा का दूसरा अर्थ है कि दवा के पैकेट पर उसका मूल यानी जेनेरिक नाम लिखा हो। सभी चिकित्सा पुस्तकों और वैज्ञानिक साहित्य में दवाइयों के जेनेरिक नामों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन शोधकर्ता कंपनियां जब कोई नई दवा बनाती हैं तो उसे अपना एक व्यावसायिक नाम (ब्रांड-नेम) दे देती हैं। उदाहरण के लिए, पार्क-डेविस कंपनी ने 1985 में रक्त में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली एटरवेस्टैटिन (Atorvastatin) नामक दवा की खोज की थी, जिसके लिए उसे 1986 से 2011 तक पेटेंट प्राप्त था। लेकिन इस अवधि में कंपनी ने इसे एटरवेस्टैटिन नाम से नहीं, बल्कि ‘लिपिटॉर’ (Lipitor) ब्रांड नाम से महंगे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया। 2011 में पेटेंट समाप्त होने के बाद एटरवेस्टैटिन जेनेरिक बन गई और अन्य कंपनियों ने उसका उत्पादन शुरू कर दिया। लेकिन उन्होंने भी उसे जेनेरिक नाम से बेचने के बजाय अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचा। इन्हें ‘ब्रांडेड-जेनेरिक’ कहा जाता है।

इस प्रकार, लगभग 900 जेनेरिक दवाइयों से बनीं लगभग 60,000 ब्रांडेड-जेनेरिक दवाइयां भारत के बाज़ार में उपलब्ध हैं। अपना-अपना ब्रांड नाम डॉक्टरों के मन में बैठाने के लिए दवा कंपनियां भारी पैसा खर्च करती हैं और कई बार अनैतिक तरीके भी अपनाती हैं, ताकि डॉक्टर उनके ब्रांड की दवाएं लिखें। यह खर्च कंपनियों द्वारा दवाइयों की अधिक कीमत रखकर वसूला जाता है। इसके विपरीत, डॉक्टरों की शिक्षा जेनेरिक नामों के माध्यम से ही हुई होती है, इसलिए जेनेरिक नामों को डॉक्टरों के मन में बैठाने, याद रखवाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि जेनेरिक दवाएं अपेक्षाकृत काफी सस्ती होती हैं।

दवाइयां कैसे बनती हैं?

सभी दवाएं पहले पावडर के रूप में बनाई जाती हैं। बाद में उनसे गोलियां, कैप्सूल, इंजेक्शन, मलहम आदि विभिन्न ‘फॉर्म्युलेशन’ तैयार किए जाते हैं।

दवा कंपनियां कुछ दवा-पावडर स्वयं बनाती हैं, जबकि कुछ दवा-पावडर रासायनिक उद्योगों से खरीदे जाते हैं। लगभग 30 प्रतिशत दवा-पावडर चीन आदि देशों से आयात किए जाते हैं। अधिकांश छोटी और कई मंझोली दवा कंपनियां स्वयं पावडर नहीं बनातीं, बल्कि खुले बाज़ार से खरीदकर उनसे विभिन्न फॉर्म्युलेशन तैयार करती हैं। इसलिए भारत का अधिकांश दवा उद्योग ‘फॉर्म्युलेशन उद्योग’ है।

इन फॉर्म्युलेशन्स का निर्माण भी गुणवत्तापूर्ण तरीके से होना चाहिए। प्रत्येक दवा के गुणधर्म इंडियन फार्माकोपिया में निर्धारित मानकों के अनुरूप होने चाहिए। दवा की प्रत्येक खेप को निर्धारित परीक्षणों की कसौटी पर खरा उतरना होता है और निर्माता को अपने कारखाने की प्रयोगशाला में इसकी जांच करनी होती है।

उदाहरण के लिए, इंडियन फार्माकोपिया में यह निर्धारित है कि किसी गोली को पेट में टूटने और घुलने में कितना समय लगता है। उत्पादन कंपनी की कानूनी ज़िम्मेदारी होती है कि दवा इन मानकों पर खरी उतरे। यदि उत्पादन औषधि विज्ञान के अनुसार किया जाए तो छोटे कारखानों में भी यह सुनिश्चित करना संभव है। भारत के अधिकांश छोटे दवा-उद्योग ऐसा करते हैं, वैसे इस क्षेत्र में भी कुछ अप्रामाणिक उद्योग मौजूद हैं।

राज्य सरकारों के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के निरीक्षकों का दायित्व है कि वे कारखानों का निरीक्षण करें और बाज़ार से नमूने लेकर उनकी जांच कराएं। यद्यपि यह व्यवस्था संसाधनों की कमी और भ्रष्टाचार से प्रभावित है। फिर भी, 2024-25 में केंद्र सरकार द्वारा करवाई गई जांच में 1,16,323 नमूनों में से केवल 3104 (2.7 प्रतिशत) नमूने निम्न गुणवत्ता के पाए गए थे। आदर्श स्थिति में यह संख्या शून्य होनी चाहिए।

कुछ महीने पहले, एक सामाजिक संस्था द्वारा 22 आम दवाओं के 131 नमूनों की जांच प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराई गई। जांच में पाया गया कि प्रसिद्ध ब्रांड नाम, कम प्रसिद्ध ब्रांड नाम और मात्र जेनेरिक नाम वाली दवाओं की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं था।

(विस्तार से यहां देखें – https://meshindia.org/citizens-generic-vs-branded-drugs-project/ ).

अतिरिक्त मानदंडजैविक तुल्यता

सरकार 384 ‘आवश्यक दवाइयों’ में से 140 दवाओं के लिए जेनेरिक कंपनियों की गोलियों पर जैविक तुल्यता यानी बायो-इक्विवेलेंस (Bio-equivalence) परीक्षण अनिवार्य करने की तैयारी कर रही है। किसी दवा की जैव-तुल्यता जांचने के लिए उसकी गोली स्वस्थ व्यक्ति को दी जाती है और निश्चित समयांतराल (जैसे 15 मिनट, आधा घंटा, एक घंटा आदि के) बाद उसके रक्त में दवा की मात्रा मापी जाती है। यदि शोधकर्ता कंपनी की गोली और जेनेरिक गोली की समान समयांतरालों पर रक्त में समान मात्रा पाई जाती है, तो जेनेरिक गोली को ‘जैविक-तुल्य’ माना जाता है। यह प्रश्न केवल गोलियों और कैप्सूलों पर लागू होता है; सिरप, इंजेक्शन, मलहम, ड्रॉप्स आदि पर नहीं। बड़ी शोधकर्ता कंपनियों का मत है कि केवल जैविक-तुल्य जेनेरिक गोलियां ही मूल दवा जितनी प्रभावी मानी जा सकती हैं। विकसित देशों ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया है और वहां जैविक-तुल्यता परीक्षण पास करने के बाद ही जेनेरिक गोलियों को बिक्री की अनुमति मिलती है। भारत में भी लगभग 140 दवाओं के लिए इसे अनिवार्य बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन इसके सम्बंध में कई प्रश्न हैं।

1) क्या यह सभी दवाइयों के लिए आवश्यक है?: चंद ‘संवेदनशील’ दवाइयों के मामले में यकीनन रक्त में दवा की मात्रा का थोड़ा भी अंतर स्वीकार्य नहीं होता। ऐसी खास दवाइयों के लिए जैविक-तुल्यता परीक्षण आवश्यक होना चाहिए। लेकिन अन्य जेनेरिक दवाइयों के लिए ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि यदि वे जैविक-तुल्य न हों तो वे अप्रभावी हो जाती हैं। भारत में करोड़ों मरीज़ दशकों से ऐसी जेनेरिक गोलियां उपयोग कर रहे हैं जिनका जैविक-तुल्यता परीक्षण नहीं हुआ है, फिर भी ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि वे असरहीन हैं।

2) अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों का प्रश्न: भारतीय बाज़ार की लगभग 40 प्रतिशत ब्रांडेड-जेनेरिक दवाओं में दो या अधिक औषधियों का मिश्रण होता है। इनमें से अधिकांश मिश्रण वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं हैं। इनके लिए कोई मूल मानक ही उपलब्ध नहीं है, इसलिए इनके लिए जैव-तुल्यता का प्रश्न ही नहीं उठता। सरकार को पहले ऐसी अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

3) तकनीकी और आर्थिक बोझ: यदि जैविक-तुल्यता को अनिवार्य किया गया तो प्रत्येक कंपनी को प्रत्येक जेनेरिक दवा के लिए स्वयं वह तकनीक विकसित करनी होगी जिससे उसकी गोली जैविक-तुल्य बन सके। ये तकनीकी विवरण व्यावसायिक गोपनीयता का हिस्सा होते हैं। यदि 140 दवाओं का औसतन 10-10 कंपनियां उत्पादन करती हैं, तो लगभग 1400 कारखानों को यह तकनीक अलग-अलग विकसित करनी होगी। इससे अत्यधिक खर्च होगा।

4) छोटे उद्योगों पर मंडराता संकट: प्रत्येक निर्माता को अपनी गोली के जैविक-तुल्य होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा, जिस पर लगभग 20-60 लाख रुपये का खर्च आएगा। भारत में लगभग 10,000 दवा उत्पादकों में से 2-3 हज़ार छोटी कंपनियां हैं। इनमें से अनेक इस खर्च को वहन नहीं कर पाएंगी और उत्पादन बंद करने को मजबूर हो जाएंगी। नतीजतन, सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता घटेगी और हज़ारों मजदूर बेरोज़गार हो सकते हैं। विकसित देश यह खर्च वहन कर सकते हैं, लेकिन क्या भारत भी कर पाएगा?

5) मानवगिनी पिगका नैतिक प्रश्न: जैविक-तुल्यता परीक्षण के लिए स्वस्थ मनुष्यों का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग पैसे लेकर इसमें भाग लेते हैं। यदि प्रत्येक कंपनी को अलग-अलग परीक्षण करना पड़े, तो बड़ी संख्या में मानव वालंटीयर्स का उपयोग करना होगा। 140 दवाओं और औसतन 10 कंपनियों के हिसाब से लगभग 1400 मानव समूहों पर परीक्षण करने पड़ेंगे। यह गरीब लोगों का अतिरिक्त और नैतिक रूप से अनुचित उपयोग होगा।

विकल्प

अलबत्ता, यदि वास्तव में जैविक-तुल्यता का परीक्षण ज़रूरी हो, तो भी भारी खर्च और इतने बड़े पैमाने पर मानव परीक्षणों से बचा जा सकता है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रयोगशाला में इन 140 दवाइयों को मूल दवाइयों के समकक्ष बनाने की तकनीक विकसित करके जैविक-तुल्यता  परीक्षण संभव है। केवल एक मानव समूह पर्याप्त होगा, यानी कुल लगभग 140 समूह। इसके बाद सरकार यह तकनीक उचित मूल्य पर जेनेरिक कंपनियों को उपलब्ध करा सकती है। दवा नियामक तंत्र यह सुनिश्चित करे कि कंपनियां सरकार द्वारा दिए गए मानकों के अनुसार ही उत्पादन करें। यदि ऐसा किया जाए तो जनता को सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलती रहेंगी और छोटी जेनेरिक कंपनियां भी टिक सकेंगी। अन्यथा बड़ी दवा कंपनियों का प्रभुत्व और मज़बूत हो जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वीनस फ्लाईट्रैप झट से कैसे बंद हो जाता है?

वीनस फ्लाईट्रैप (Dionaea muscipula) उन चुनिंदा पौधों में शुमार है जो कीटों को अपना शिकार बनाते हैं और उनसे अपना कुछ पोषण हासिल करते हैं। वीनस फ्लाईट्रैप (venus flytrap) अमेरीका के उत्तरी और दक्षिणी कैरोलिना के दलदली इलाके में पाया जाता है। चूंकि इन दलदली इलाकों (wetlands) की मिट्टी में कुछ विशेष पोषक तत्व कम होते हैं इसलिए यह पौधा भरपाई लिए कीटों का शिकार करता है। वैसे तो इस मशहूर कीटभक्षी पौधे का अपने शिकार को पकड़ने का तरीका सर्वविदित है। लेकिन यही तरीका वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बनाए हुए है।

दरअसल, वीनस फ्लाईट्रैप ज़मीन सटकर लगने वाला पौधा है। जिसमें लगभग भूमिगत गांठ-नुमा संरचना (तना) से रोज़ेट जैसी आकृति बनाती 4 से 7 पत्तियां निकली होती हैं, जिनकी अधिकतम लंबाई 10 सेंटीमीटर तक जाती है। इसकी पत्तियां दो खंडों में बंटी होती हैं। पत्ती का निचला भाग सामान्य पत्ती की तरह होता है और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करता है। पत्ती के ऊपरी छोर पर शिकंजे (ट्रैप) होते हैं, जो शिकार को पकड़ने का काम करते हैं। जैसे-जैसे पत्ती लंबी और परिपक्व होती जाती है, ये शिकंजे भी परिपक्व होते जाते हैं।

परिपक्व शिकंजे शिकार पकड़ते हैं। शिकंजा हरे-लाल रंग के दो अर्ध-अंडाकार पाटों से बने होते हैं जो एक कब्जे-नुमा संरचना से जुड़े होते हैं। इनके सिरों पर कांटे-नुमा (needle-like) नुकीली संरचनाएं होती हैं, और दो अंदर की सतह पर रोम जैसी संरचनाएं होती हैं। सामान्य स्थिति में ये शिकंजा तने हुए, बाहर को थोड़ा मुड़कर (घुमाव लिए) खुले रहते हैं। किसी कीट के शिकंजा की अंदरुनी सतह पर बैठने का संकेत मिलता है तो दोनों पाट झट से बंद हो जाते हैं और कीट बेचारा फंस जाता है। पत्तियों के बंद होने की गति बहुत तेज़ होती है, कीट के बैठे होने का संकेत मिलने के सेकंड के दसवें हिस्से के भीतर ये बंद हो जाती है। और इसी गति ने वैज्ञानिकों को उलझा रखा है।

वे दशकों से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर शिकंजा इतनी तेज़ी से बंद कैसे हो जाता है। कुछ अध्ययनों ने बताया था कि जब कीट शिकंजा पर मौजूद रोम-नुमा संरचनाओं को छूते हैं, तो पत्ती में विद्युत संकेत (electric current) संचारित होता है, जिससे वह अपने शिकार को पकड़ने और पचाने के लिए हरकत में आ जाती है। फिर 2005 में, फ्रांस की ऐक्स-मार्सेली युनिवर्सिटी के भौतिक शास्त्री योएल फॉर्टेरे और उनके साथियों ने बताया था कि जब शिकंजा खुली स्थिति में होता है, यानी उसके दोनों पाट बाहर की तरफ मुड़े हुए होते हैं, तो वे तनाव की स्थिति में होते हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर बैठता है, तो यह तनाव अचानक खत्म हो जाता है — जिससे दोनों हिस्से अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं और कीट की शामत आ जाती है।

हाल ही में उन्होंने रहस्य को सुलझाने में एक कदम और बढ़ाया गया है। उन्होंने पता लगा लिया है कि यह तनाव टूटता कैसे है। दरअसल, इस सम्बंध में वैज्ञानिकों के बीच दो मत थे कि शिकंजा का यह तनाव खत्म कैसे होता है। एक मत के अनुसार, पानी शिकंजा की अंदरूनी सतह से बाहरी सतह की एपिडर्मल कोशिकाओं (epidermal cells) में तेज़ी से जाता है, जिससे सूजन आती है और तनाव खत्म होता है। दूसरे मत के अनुसार बाहरी एपिडर्मल कोशिकाओं की सख्त भित्ति अचानक नरम पड़ जाती हैं, जिससे तनाव खत्म हो जाता है।

फॉर्टेरे और उनकी टीम ने सैकड़ों फ्लाईट्रैप पौधों पर दोनों संभावनाओं को जांचने के लिए अलग-अलग कई प्रयोग किए। पाया कि कोशिकाओं की भित्ति (membrane) नरम पड़ने के कारण तनाव खत्म होता है।

क्या वास्तव में पानी के बहाव के कारण तनाव खत्म होता है? इस संभावना को जांचने के लिए उन्होंने अंदरूनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पानी के पहुंचने का समय मापा। पाया कि पानी को अंदरुनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पहुंचने में 30 से 150 सेकंड लगते हैं — यह समय शिकंजा के झटके से बंद होने की गति से कई गुना अधिक है, इसलिए यह वजह तो नहीं लगती।

दूसरी संभावना को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने शिकंजा की एपिडर्मल कोशिकाओं के तनाव को मापा और पाया कि यह तनाव खत्म होने कारण ही शिकंजा बंद होता है। यानी जब कोई कीट शिकंजा पर रेंगता है तो शिकंजा की बाहरी सतह पर मौजूद कोशिकाएं नरम पड़ जाती हैं और शिकंजा बंद हो जाता है।

हालांकि, शोधकर्ता एकदम सटीक जवाब पर अब भी नहीं पहुंचे हैं। यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि शिकंजा की कोशिका भित्ति को क्या चीज़ नरम करती है। लेकिन साइंस जर्नल में उन्होंने इसके कुछ संभावित कारणों की ओर इशारा किया है। इसके अनुसार, पौधों की कोशिका भित्ति नरम जेल जैसे मैट्रिक्स और सख्त रेशों के जाल से बनी होती हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर आता है तो कुछ एंज़ाइम्स (enzymes) स्रावित होते हैं, जो रेशों और मैट्रिक्स के बीच के जोड़ों को कमज़ोर कर देते हैं और वे नरम पड़ जाते हैं और तनाव खत्म हो जाता है।

वैसे वैज्ञानिक तो अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अनसुलझी गुत्थियां सुलझाते रहते हैं। लेकिन जिज्ञासा के साथ-साथ स्वार्थ भी चलता है। ऐसी उम्मीद जगी है कि शिकंजा बंद होने की प्रक्रिया को अच्छी तरह समझकर मनुष्य के लिए काम आने वाले रोबोट को बेहतर और लचीला (flexible) बनाया जा सकेगा: इस कार्यप्रणाली के आधार पर ऐसे रोबोट बनाए जा सकते हैं जो ज़रूरत पड़ने पर सख्त से नरम पड़ जाएं, या नरम से सख्त। (स्रोत फीचर्स)

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नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आंखें प्रकाश संश्लेषण करके अपनी सुरक्षा करेंगी

पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नामक प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, जिसमें वे सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया करवाते हैं और कार्बोहायड्रेट बनाते हैं। लेकिन मनुष्यों समेत सभी जंतुओं के पास इस क्रिया के लिए ज़रूरी आणविक मशीनरी नहीं होती।

अब एक अनुसंधान दल ने चूहों और मनुष्यों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण करने वाली संरचना जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली है। इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। लेकिन यह मत सोचिए कि ये कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषण करके कार्बोहायड्रेट बनाकर हमें पोषण प्रदान करेंगी। ये तो हमें मात्र शुष्क आंख (dry eyes) की समस्या से छुटकारा दिलाएंगी।

सेल नामक शोध पत्रिका में सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के डेविड ताई लियोंग और कुओरान ज़िंग ने बताया है कि उनकी इस रणनीति से आंखों की कोशिकाएं एक ऐसा अणु बनाने लगीं जो शोथ में राहत देता है। इसके अलावा प्रकाश संश्लेषी मशीनरी जोड़ने के बाद शुष्क आंखों की वजह से होने वाली क्षति भी दुरुस्त हो गई।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता सिर्फ पौधों, शैवाल और कुछ सूक्ष्मजीवों में ही पाई जाती है। लेकिन कुछ समुद्री स्लग्स हैं जो शैवालों का क्लोरोप्लास्ट चुराकर कुछ अतिरिक्त पोषण प्राप्त कर लेते हैं। गौरतलब है कि क्लोरोप्लास्ट (chloroplast) ही वह कोशिकांग होता है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।

इस सिलसिले में दो साल पहले टोक्यो विश्वविद्यालय (Tokyo university) के साचीहिरो मात्सुनागा की टीम ने यही करामात प्रयोगशाला में की थी। उन्होंने एक पूरा क्लोरोप्लास्ट मानव कोशिका में प्रत्यारोपित करके उसे दो दिन तक कामकाजी बनाए रखा था।

फिर कई अन्य शोधकर्ता सोचने लगे कि यदि हमारी कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की थोड़ी-बहुत क्षमता जोड़ दी जाए, तो वे ऐसे अणु बनाने लगेंगी जिनसे ऊर्जा मिलेगी या शोथ हल्का पड़ जाएगा।

मसलन, 2022 में चीन के एक दल ने गठिया पीड़ित चूहों के घुटनों के जोड़ में कुछ कण इंजेक्ट किए जिनमें प्रकाश संश्लेषी मशीनरी के कुछ हिस्से थे। शोधकर्ताओं ने नेचर में रिपोर्ट किया था कि इन चूहों के घुटनों में उपास्थियों की क्षति धीमी पड़ गई थी। दिक्कत यह है कि हमारे घुटनों को धूप बहुत कम मिलती है। इन चूहों को प्रतिदिन आधे घंटे लाल रोशनी में रखने पर ही उपरोक्त लाभ मिल पाया था।

अलबत्ता, आंखों की बात अलग है। उन पर तो दिन भर रोशनी पड़ती है। तो वर्तमान अध्ययन में लियोंग और ज़िंग ने पालक में से प्रकाश संश्लेषण मशीनरी के प्रमुख हिस्से (थाएलेकॉइड) पृथक किए। इन तश्तरीनुमा रचनाओं में क्लोरोफिल तथा ऊर्जा को कैद करने के लिए ज़रूरी अणु पाए जाते हैं। पूर्व के अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने थाएलेकॉइड (thylakoid) के टुकड़ों का इस्तेमाल किया था। लेकिन लियोंग और ज़िंग की टीम ने पूरे के पूरे थायलेकॉइड निकाले और उन्हें छोटे-छोटे कणों में पैक कर दिया।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण का अंतिम उत्पाद ऊर्जा से भरपूर ग्लूकोज़ होता है लेकिन शोधकर्ताओं की रुचि इस प्रक्रिया के दो मध्यवर्ती अणुओं में थी – एटीपी और एनएडीपीएच। ये दोनों ही शोथ को कम कर सकते हैं और तथाकथित ऑक्सीडेंट्स से निजात पाने में कोशिकाओं की मदद कर सकते हैं। रोचक बात है कि शोधकर्ताओं ने पालक आधारित इस पदार्थ को नाम दिया है लीफ (लाइट रिएक्शन एनरिच्ड थायलेकॉइड एनएडीपीएच फाउंड्री – LEAF)।

शोधकर्ताओं का ख्याल था कि कोशिकाओं में एनएडीपीएच (NADPH) का उत्पादन बढ़ने से शुष्क आंख समस्या में मदद मिलेगी। शुष्क आंख समस्या में होता यह है कि पर्याप्त मात्रा में आंसू नहीं बनते जो आंखों में स्नेहक (लुब्रिकेशन) दे सकें। कभी-कभी आंसू बहुत गाढ़े बनते हैं। परिणाम यह होता है कि आंख की सतह में क्षति होने लगती है।

प्रयोग के दौरान चूहों की कल्चर्ड कोशिकाओं ने थायलेकॉइड को अवशोषित कर लिया और ज़्यादा एनएडीपीएच बनाने लगी। टीम ने यह भी देखा कि लीफ प्रदान करने पर शोथ सम्बंधी जीन्स की सक्रियता कम हुई और शोथ से लड़ने वाले तथा ऑक्सीकारकों से निपटने वाले जीन्स की सक्रियता बढ़ी। मानव कॉर्निया (human cornea) से ली गई मानव कोशिकाओं पर भी ऐसे ही असर देखे गए।

ऐसे ही प्रयोग जीवित चूहों पर करने पर LEAF का लाभदायक असर देखने को मिला। अब बारी है इंसानों पर परीक्षणों की। उससे पहले इस उपचार की सुरक्षा व दीर्घावधि असर पर भी विचार करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चींटियां संक्रमण से कैसे बचाव करती हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।

सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।

सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं। 

इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था। 

एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।

प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।

कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।

इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।  

बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पक्षियों की लंबी-लंबी यात्राएं और वापसी

ह चमत्कार ही लगता है कि कई पक्षी (Birds) हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, साल-दर-साल सही ठिकाने पर पहुंच जाते हैं और वापिस उड़कर अपने घर भी आ जाते हैं। और पक्षी ही नहीं समुद्री कछुए (Sea Turtels) तथा कई अन्य जानवर भी यह करतब करते हैं। सवाल यह उठता है कि ये प्राणी इस प्रवास (Migration) के दौरान अपना मार्ग कैसे ढूंढते हैं।

इसका जवाब खोजते-खोजते यह समझ में आया है कि ये जीव किसकी प्रकार से पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) को ताड़कर दिशा का अंदाज़ लगा लेते हैं।

चुंबकत्व आधारित दिशा-निर्धारण की क्षमता (Magnetoreception) कई जंतुओं में देखी गई है। जैसे पक्षी, कछुए, शार्क, और कुत्ते। कुछ शोधकर्ता तो मानते हैं कि मनुष्य में भी थोड़ी बची-खुची क्षमता है। खैर, यह काफी गरमागर्म बहस का विषय रहा है कि यह चुंबकीय ज्ञानेंद्री (Magnetic Sensory) कैसे काम करती है। एक परिकल्पना यह रही है कि जंतुओं के ऊतकों में मैग्नेटाइट नामक लवण के छोटे-छोटे रवे होते हैं। ये रवे एक तरह से चुंबकीय दिक्सूचक (Compass) का काम करते हैं।

एक ज़्यादा हालिया परिकल्पना आंखों के रेटिना पर केंद्रित है। इसमें माना जाता है कि रेटिना के प्रोटीन्स (क्रिप्टोक्रोम्स) (Chryptochromes) चुंबकीय क्षेत्र के प्रति संवेदी होते हैं। इसके अनुसार प्रवासी सॉन्ग बर्ड्स हल्के से धुंधलके में भी सही दिशा में उड़ते रह सकते हैं।

फिर पिछले साल होमिंग पिजन्स (घर लौटने वाले कबूतर) पर शोध करके एक और नवीन प्रक्रिया उजागर हुई है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि बदलते चुंबकीय क्षेत्र से इन कबूतरों के अंदरुनी कान में विद्युत धाराएं (Electric current) पैदा होती हैं। ये विद्युत धाराएं मस्तिष्क तक पहुंचने वाली तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती हैं।

मज़ेदार बात है कि इस अध्ययन की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के पक्षी वैज्ञानिक मार्टिन वाइकेल्स्की और बॉन विश्वविद्यालय के प्रतिरक्षा वैज्ञानिक क्रिस्टियन कर्ट्स के बीच बातचीत के दौरान वाइकेल्स्की ने जंतु प्रवास में चुंबकत्व की भूमिका का विवरण दिया। यह सुनकर कर्ट्स ने बताया कि उन्होंने चूहों और मनुष्य की तिल्ली (प्लीहा) से प्राप्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं (मैक्रोफेज) में बारीक चुंबकीय लौह कण देखे जो तब बनते हैं जब मैक्रोफेज (Macrophage) पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके उनके लौह परमाणु जज़्ब कर लेती हैं। क्या इसी तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होमिंग पिजन्स (Homing Piegons) को प्रवास के दौरान दिशा-निर्धारण में मदद कर सकती हैं?

लेकिन सवाल था इस विचार की प्रायोगिक जांच का। कर्ट्स के दिमाग में एक आइडिया था और इस आइडिया को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक शोधकर्ता क्लिविया लिसोव्स्की को शामिल कर लिया। लिसोव्स्की की रुचि यह समझने में थी कि कोशिकाएं अपने पर्यावरण को कैसे भांपती हैं।

सबसे पहले तो लिसोव्स्की ने यह जांच की कि क्या कबूतरों की विभिन्न प्रजातियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (Immune Cells) में वैसे ही चुंबकीय कण पाए जाते हैं जैसे चूहों में देखे गए थे। लिसोव्स्की और उनकी टीम को उम्मीद थी कि ऐसी कोशिकाओं का जखीरा प्लीहा में मिलेगा क्योंकि वहीं पर तो मैक्रोफेज लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने का काम करते हैं। लेकिन अपेक्षा के विपरीत, एक बढ़िया चुंबकत्व-मापी (मैग्नेटोमीटर) ने दर्शाया कि सारे ऊतकों में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय संकेत लीवर (यकृत, जिगर) में मिल रहे थे। हालांकि संकेत क्षीण थे लेकिन वे मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) के हिसाब से काफी शक्तिशाली थे।

होमिंग पिजन्स के ऊतकों की पतली-पतली स्लाइस निकालकर अभिरंजित (Staining) करके यह पक्का हो गया कि लीवर के मैक्रोफेज में फेरिटिन (Ferritin) नामक लौह कण भरपूर मात्रा में थे लेकिन ये प्लीहा, मस्तिष्क और चोंच में नदारद थे। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) से अवलोकन से यह भी स्पष्ट हो गया कि कबूतरों के लीवर के मैक्रोफेज के आसपास थे। यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों और पक्षियों में प्लीहा (Spleen) की तंत्रिकाएं मैक्रोफेज से संवाद करती हैं और दोनों में ही ये तंत्रिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ती हैं।

अब एक उम्दा प्रयोग से इस बात की जांच की गई कि ये लौह-प्रचुर मैक्रोफेज चुंबकीय कम्पास की तरह कैसे काम करते होंगे। इस प्रयोग में एक औषधि क्लोड्रोनेट लिपोसोम की मदद से मैक्रोफेज को सुप्त कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने 34 होमिंग पिजन्स को प्रशिक्षित किया कि वे ठीक पूर्व दिशा में 19 किलोमीटर की उड़ान भरें।

दिन के समय तो कबूतर दिशा-निर्धारण के लिए सूर्य की स्थिति की मदद लेते हैं। लेकिन जब घने बादल छाए हों, तो दिशा के लिए वे चुंबकत्व के सहारे रहते हैं। एक झील (लेक कॉन्स्टेन्स) के नज़दीक शोधकर्ता दल ने 18 कबूतरों को क्लोड्रोनेट (Clodronate) का इंजेक्शन दिया और 24 घंटे बाद उन्हें एक-एक करके उस समय छोड़ा गया जब घने बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ओझल था। ज़ाहिर है, इन पक्षियों पर जीपीएस चस्पा किया गया था जिसकी मदद से शोधकर्ता इनकी उड़ान पर नज़र रख सकते थे।

बादल आच्छादित आकाश के समय तो कबूतरों को 19 किलोमीटर सही-सही उड़ने में उस स्थिति में कोई दिक्कत नहीं आई जब उनके मैक्रोफेज सही-सलामत थे। लेकिन जब क्लोड्रोनेट इंजेक्शन ने उनके लीवर मैक्रोफेज को ठप कर दिया, तब वे खुले धूप वाले आकाश में तो आसानी से उड़े लेकिन मेघाच्छादित आकाश (Cloudy sky) में उन कबूतरों को दिशा तलाशने में खासी परेशानी हुई जिनके लीवर मैक्रोफेज ठप कर दिए गए थे। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं दिशा निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।

इंजेक्शन-प्राप्त समस्त 18 पक्षी बहुत भटक गए थे और तभी घर लौट पाए जब आसमान साफ हो गया। दूसरी ओर, जिन 16 पक्षियों को नकली इंजेक्शन दिया गया था वे सीधे घर लौट आए।

यह देखने के लिए कि क्या औषधि कबूतरों को सामान्य रूप से दिग्भ्रमित कर देती है, शोधकर्ताओं ने औषधि-उपचारित पक्षियों को खुले आकाश की परिस्थिति में भी छोड़ा। सारे के सारे बगैर किसी परेशानी के वापिस लौट आए।

कई वैज्ञानिकों ने इस खोज को रोमांचक बताया है लेकिन आगे और छानबीन का सुझाव दिया है। जैसे बोलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के वर्नर बिंगमैन का सुझाव है कि लीवर के मैक्रोफेज को ठप करने की बजाय लीवर की चुंबकीय सूचना के साथ छेड़चाड़ करके देखा जाए। इस तरह का एक प्रयोग 1970 के दशक में किया गया था। उस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने होमिंग पिजन्स को चुंबकीय कुंडली (Magnetic coil) पहना दी थी जो उनके सिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करती थी। देखा गया था कि ये कबूतर उल्टी दिशा में उड़ चले थे।

बहरहाल, वाइकेल्सकी का कहना है कि यदि सही साबित हुआ, तो शायद यह प्रक्रिया मधुमक्खियों से लेकर चमगादड़ों, शार्क और व्हेल्स तक के लिए एक समान हो। (स्रोत फीचर्स)

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कृत्रिम रोशनी मच्छरों को देर तक सक्रिय रखती हैं

सा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।

जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।

मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए  मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।

पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है  और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।

सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।

देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।

अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।

शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)

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