नेवियर स्टोक्स पहेली और एआई से जुड़े व्यापक मुद्दे

विवेक मेहता

विज्ञान की दुनिया में कई ऐसी समस्याएं हैं जो कि सालों से अनसुलझी रही हैं। इनमें से कई समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े-बड़े इनाम भी घोषित किए गए हैं। वैज्ञानिक अक्सर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने समय की मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे अपने समय में जो एक तकनीक प्रभावी तौर पर उभरी है, वह है एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धि। हाल ही में एक ऐसी ही समस्या पर एआई द्वारा सुझाए गए हल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

नेवियर स्टोक्स पहेली

सामान्य वस्तुओं की गति को समझने के लिए हम न्यूटन के नियमों की मदद लेते हैं। लेकिन अगर इन नियमों को किसी तरल की गति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो हमें जो गणितीय समीकरण मिलता है उसे नेवियर-स्टोक्स समीकरण के नाम से जाना जाता है। यह समीकरण विमान के डिज़ाइन में, मौसम की भविष्यवाणी में, रक्त के प्रवाह को समझने में एवं पानी और हवा के प्रवाह के अध्ययन में मदद करता है। इन तमाम परिस्थितियों एवं उनसे जुड़े सवालों के अलावा वैज्ञानिक इस सवाल से भी लगातार जूझते रहते हैं कि किसी एक वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करता हुआ उनका कोई गणितीय मॉडल या समीकरण किस हद तक विश्वसनीय है। उसकी हद क्या है?

नेवियर-स्टोक्स समस्या के साथ भी ऐसा ही है, या कहें, ऐसी ही था। लगभग 90 वर्षों से यह सवाल अनसुलझा था कि किसी तरल की सामान्य और सुचारु त्रि-आयामी गति क्या अचानक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां गणितीय रूप से उसका व्यवहार बिगड़ जाए? नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के संदर्भ में कहें तो क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ समय बाद एक भले से दिखने वाले तरल  का प्रवाह अचानक इतनी तेज़ी से बदल जाए कि नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के अनुसार उसकी गति अनंत हो जाए?

अब चूंकि हकीकत में किसी भी वस्तु की गति अनंत नहीं हो सकती, ऐसे में अगर गणितीय मॉडल में तरल की गति अनंत हो जाती है तो इसे उस मॉडल की सीमा के रूप में देखा जाएगा।

ओपनएआई (OpenAI) कंपनी ने सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में यह दावा पेश किया कि उनके नए एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या को सुलझा दिया है। उनके दावे के मुताबिक, एक भले से दिखने वाले प्रवाह की गति भी गणितीय मॉडल के मुताबिक अनंत हो सकती है। इसके साथ ही ओपनएआई ने इस दावे का एक गणितीय प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। अब यह दावा कितना सही है या गलत इसकी पड़ताल तो चल ही रही होगी, लेकिन ओपनएआई ने समस्या को सुलझाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

विवाद

जैसा है कि हम जानते हैं एआई मॉडल ट्रेनिंग या सीखने के लिए डैटा का इस्तेमाल करते हैं। इस सीखने-सिखाने के प्रक्रिया में लगभग हर स्तर पर इंसान व इंसानों के द्वारा सृजित ज्ञान का इस्तेमाल होता है। कई दफे तो बाकायदा हाथ पकड़कर एआई या एआई एजेंट को सही हल के बारे में बताया जाता है, जैसे किसी छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया जाता है।

ओपनएआई की घोषणा से कुछ घंटे पहले न्यूयार्क युनिवर्सिटी के गणितज्ञ ट्राइस्टन बकमास्टर ने एक सम्बंधित गणितीय परिणाम प्रकाशित किया था। जिस समस्या पर बकमास्टर अपने सहयोगी लेवेंट एल्पोग के साथ काम कर रहे थे, उसे ओयलर (Euler) पहेली के नाम से जाना जाता है। अलबत्ता, यह समस्या नेवियर-स्टोक्स समस्या से मुख्य तौर पर इस मामले में अलग है कि ओयलर पहेली में तरल की श्यानता (घर्षण) को नकार दिया जाता है। बकमास्टर व एल्पोग इस पहेली पर काम करने के दौरान एआई तकनीक का सहारा भी ले रहे थे। ओपनएआई के ही एक एआई एजेंट कोडेक्स (Codex) पर लगातार पिछले कई महीनों से वे अपने काम व उससे जुड़े मसौदों को साझा कर रहे थे। 

बकमास्टर ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई जिस रास्ते से नेवियर-स्टोक्स समस्या के हल तक पहुंचा है, वह उनके ओयलर समस्या के हल से जुड़ा हो सकता है जिस पर वे पहले से काम कर रहे थे। मुख्य तौर पर बकमास्टर का कहना है कि ओपनएआई एजेंट ने समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया में उन मसौदों से भी सीखा होगा जो कि ओपनएआई के डैटाबेस में पहले से ही मौजूद हैं। ओपनएआई ने ऐसी किसी भी संभावना को नकारा है।

लेकिन शक बे-बुनियाद नहीं है और बहस जारी है। कई गणितज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में नेवियर-स्टोक्स समस्या पर काफी हद तक समझ बनाई जा चुकी थी और यह समस्या बस हल होने की कगार पर ही थी। ऐसे में ओपनएआई का दावा ज्ञान-सृजन की बजाय बाज़ार में अपनी छवि चमकाने व मूल्य बढ़ाने का प्रयास अधिक नज़र आता है।

एक और बात जो ओपनएआई के सुझाए गए हल पर सवाल उठाती है वह है संसाधनों को लेकर। ओपनएआई ने दावा किया कि दशकों पुरानी इस समस्या को लगभग 4-5 दिनों में ही सुलझा दिया। ऐसा करने के लिए उसने मल्टीएजेंट व्यवस्था का सहारा लिया, जिन्होंने पहले-पहल समस्या के कुछ सरल स्वरूपों पर काम किया और फिर मुख्य समस्या पर। सभी गणितीय समस्याओं को मिलाकर एजेंटों ने लगभग 49 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे। इन संदेशों को तैयार करने में लगभग 300 अरब आउटपुट टोकन्स का इस्तेमाल हुआ। केवल नेवियर-स्टोक्स पहेली पर एजेंटों ने लगभग 27 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे व लगभग 130 अरब आउटपुट टोकन्स बनाए।

अब अगर इन तमाम संदेशों के पीछे काम कर रही तकनीक और उससे जुड़े खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो अनुमानित एक करोड़ अमरीकी डॉलर से लेकर 2.25 करोड़ अमरीकी डॉलर के बीच बैठता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए जो इनाम था (दस लाख अमरीकी डॉलर) वह इससे कहीं कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में एआई की ‘गणितीय समझ’ की सफलता है, या बहुत बड़ी कंप्यूटेशनल शक्ति से लाखों संभावित गणितीय हलों को छांटने की सफलता?

इन जैसे तमाम सवालों को लेकर एआई पर बहस अब और भी तीखी होती जा रही है। और यह बहस अब मात्र तकनीक तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसके राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक पहलुओं व प्रभावों पर भी लगातार चर्चा हो रही है; कई अकादमिक समूह तो एआई व इससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ एक मुहिम-सी छेड़ते हुए नज़र आते हैं।

सितंबर 2026 के महीने में जहां एक ओर ओपनएआई सरीखी कंपनियां कठिन समस्याओं से जुड़े अपने दावों को लेकर सामने आती दिखलाई देती हैं तो इसी महीने में एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स (इन्सानी गणितज्ञ संगठन) नाम से एक संस्था/समूह का जन्म भी होता है। इससे जुड़े गणितज्ञ संस्था के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि “इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गणित व इसके साधकों को एआई कंपनियों के चंगुल से बचाना है। इन एआई कंपनियों के काम करने के तरीके ना केवल गणित, बल्कि पर्यावरण व वृहद समाज के लिए भी घातक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि हम एआई माडलों के उपयोग में एक आलोचनात्मक नज़रिया अपनाएं; ना केवल शोध या उससे जुड़े कामों को करते हुए, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने व उससे जुड़े कार्यकलापों में भी।”

एआई के दौर में पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत व ज़िम्मेदारी कई शिक्षण संस्थान महसूस भी कर रहे हैं। विश्व में तकनीकी ज्ञान सृजन व संचार के मामले में अग्रणी संस्थान MIT ने जनवरी 2026 में एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य संस्थान में एआई के इस्तेमाल के संदर्भ में यह सुझाव देना था कि शिक्षण और मूल्यांकन को किस तरह बदला जाना चाहिए और उसके लिए संस्थागत नियम क्या होने चाहिए। इस समिति ने अपनी रपट अगस्त 2026 में सार्वजनिक कर दी है। एआई के प्रति इस रपट का नज़रिया एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स सरीखा तीखा तो नहीं है लेकिन समिति ने युवाओं पर हो रहे इसके असर और शिक्षकों व अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि एआई को तेज़ी से अपनाए जाने का प्रभाव पहले से ही विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे लंबे समय में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। कुछ विद्यार्थी अपने शैक्षणिक कार्यों या भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं; उनमें अपने निर्णय और कार्य स्वयं करने की क्षमता, उद्देश्य-बोध और आत्मविश्वास की भावना कम हो रही है; और वे एआई से अत्यधिक प्रभावित दुनिया में अपने करियर की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं। शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों को एआई से जुड़ी शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों को पहचानने के लिए तैयार रहना चाहिए और विद्यार्थियों को आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं सम्बंधित संसाधनों तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।”

यह रपट मानवता को केंद्र में रखकर तकनीक के इस्तेमाल की बात करती है। जिस तरह के बदलावों की अपेक्षा है उनकी ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि एआई के इस दौर में “MIT में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश कक्षाओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी और कई मामलों में, उनमें पर्याप्त बदलाव भी करने होंगे, ताकि वे एआई के प्रभाव का सामना किसी गंभीर व्यवधान के बिना कर सकें। एआई उन शैक्षणिक मान्यताओं को चुनौती देगा, जिनके आधार पर पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु, शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आकलन के तरीकों का चुनाव किया गया है।”

संक्षेप में, अब समय आ गया है कि हम गहराई और व्यापकता के साथ इस बात पर विचार करें कि हम क्या पढ़ाते हैं और उसे कैसे पढ़ाते हैं। भविष्य की कक्षाओं की संरचना, मूल्यांकन पद्धतियां और नीतियां स्पष्ट उद्देश्य के साथ तैयार की जानी चाहिए। उन्हें केवल एआई की तत्काल वास्तविकताओं के जवाब में छोटे-मोटे बदलाव करके तैयार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर पाठ्यक्रम में एक ही तरह के बदलाव करने होंगे।

कई अन्य देशों की तरह भारत में भी एआई की संभावनाओं को लेकर एक उत्साह का माहौल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे कई समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। उम्मीद है, नीति-निर्माता इस तकनीक के व्यापक असर से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार कर रहे होंगे। दुनिया भर में लोग एआई व उसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता बेवजह नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मंगल टर्बाइन के प्रसार में और देरी न हो

भारत डोगरा

किसी भी देश में विज्ञान व तकनीकी का विकास केवल बड़ी व प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होता है, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आम लोगों में, जनसाधारण में जो वैज्ञानिक सोच व प्रतिभा छिपी है, उसे भलीभांति खिलने के अवसर मिलें व इसके आधार पर जनजीवन में सुधार के अवसर विकसित हों।

इस तरह ग्रासरूट पर विज्ञान व तकनीकी का जो विकास है, उसका एक बहुत उपयोगी उदाहरण हमारे देश में मंगल टर्बाइन के रूप में सामने आया है। किसानों का खर्च कम करने की बात हो, जीवाश्म ईंधन पर खेती की निर्भरता कम करके जलवायु परिवर्तन को थामने में योगदान की बात हो या गांवों की आत्म-निर्भरता बढ़ाने की महात्मा गांधी की सोच, सभी दृष्टियों से मंगल टर्बाइन बहुत उपयोगी है।

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त मैथानी समिति ने मंगल टर्बाइन के व्यापक प्रसार की सिफारिश की है। इसके बावजूद मंगल टर्बाइन का उचित प्रसार नहीं किया गया है। इसके आविष्कारक मंगल सिंह अब वृद्ध हो गए हैं, 79 वर्ष की आयु के हैं। अत: यह और ज़रूरी हो गया है कि अब उनकी सेवाओं का उचित उपयोग कर मंगल टर्बाइन के द्रुत प्रसार में और देरी न की जाए।

हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीज़ल पंप से पानी उठाते हैं। अनेक गांवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीज़ल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है; प्रदूषण होता है, सो अलग। ललितपुर ज़िले (उत्तर प्रदेश) के एक किसान व ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा व मंगल टर्बाइन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीज़ल व बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पहुंचाया जा सके।

अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह स्वयं बताते हैं, “मंगल टर्बाइन गांव में ही बनने वाली एक ऐसी मशीन है, ऐसी ग्रामीण तकनीकी है, जो जलधारा के प्रवाह से चलती है। इसमें आवश्यकता के अनुरूप छोटा-बड़ा व्हील बनाते हैं और उसे एक गियर बॉक्स से जोड़ते हैं जो उसके चक्कर बढ़ा देता है। लिहाज़ा इंजन मोटर की भांति तेज़ स्पीड से चक्कर लगाने लगता है। गियर बॉक्स की आउटपुट शाफ्ट दोनों तरफ निकली होती है जिससे क्लॉकवाइज़ या एंटी-क्लॉकवाइज़ कोई एक या दोनों भी एक साथ पंप चला सकते हैं। गियर बाॅक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर घिरनी लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पिराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी-नालों से डीज़ल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टर्बाइन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीज़ल, बिना बिजली के सिंचाई कर सकते हैं। पाइपों के द्वारा पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं।

मंगल टर्बाइन का उपयोग यदि उन सभी स्थानों पर किया जाए जो इसके अनुकूल हैं तो इससे सालाना करोड़ों लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है, और किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।

मंगल टर्बाइन को सिंचाई व कुटीर उद्योगों के लिए वरदान बताते हुए आई.आई.टी. दिल्ली व विज्ञान शिक्षा केंद्र के एक अध्ययन में बताया गया है कि पूरी तकनीक ऐसी है जो गांव स्तर पर अपनाई जा सकती है व इससे गांवों में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन भी होगा।

यदि एक मंगल टर्बाइन दिन में 11 घंटे चले तो (25 एच.पी. डीज़ल पंप की 4 लीटर प्रति घंटे की खपत के आधार पर) दिन में 44 लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है। यदि वर्ष में 190 दिन सिंचाई हो तो एक मंगल टर्बाइन से वर्ष में 8360 लीटर डीज़ल की बचत होती है। यदि एक मंगल टर्बाइन 15 वर्ष तक कार्य करे तो अपने जीवन काल में एक मंगल टर्बाइन से 1,25,400 लीटर डीज़ल की बचत होती है। डॉ. जय शंकर सिंह के अनुमान के अनुसार यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 335 टन कमी के बराबर है।

ग्रीनहाऊस गैस के उत्सर्जन में कमी विश्व का पर्यावरण बचाने के लिए तो ज़रूरी है ही, साथ ही इसमें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने पर देश अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहायता का हकदार भी बनता है। इस तरह मंगल टर्बाइन के सभी उचित व अनुकूल स्थानों पर विभिन्न सावधानियों के साथ उपयोग होने से किसानों, सरकार, पर्यावरण सभी का लाभ है।

देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों व अघिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टर्बाइन का अध्ययन किया है और इस आविष्कार की प्रशंसा करते हुए इसकी व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया है। मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव बी. के. साहा ने लिखा है कि स्टॉप डैम के खर्च को जोड़ लिया जाए तो भी मंगल टर्बाइन की व्यवस्था छोटी नदियों से जल उठाने की अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक सस्ती है। मंगल टर्बाइन से डीज़ल व बिजली की बचत होती है तथा यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक डॉ. टी. पी. ओझा ने लिखा है कि मंगल टर्बाइन में बड़ी संभावनाएं निहित हैं। भारत सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व सचिव बी. के. सिन्हा ने कई बार मंगल टर्बाइन व इसके आविष्कारक की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रीय हित में इन्हें प्रोत्साहित करने को कहा है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जाने-माने विद्वानों व संस्थानों ने मंगल टर्बाइन की उपयोगिता व संभावनाओं को स्वीकार किया है। इसके बावजूद इसका उचित प्रचार नहीं हो सका। दरअसल, सरकार को मंगल सिंह जैसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना चाहिए एवं अनुकूल अवसर देना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या एआई को सारा मज़ा लूटने देंगे?

कृत्रिम बुद्धि यानी एआई आजकल बहुत प्रचलित लफ्ज़ बन गया है। इसका मतलब यह माना जाने लगा है कि मशीनें सोचने-विचारने, विश्लेषण करने, निष्कर्ष निकालने वगैरह सारे काम कर डालेंगी। और कई कंपनियां एआई के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर निवेश कर रही हैं। इसी प्रवृत्ति के मद्देनज़र नेचर पत्रिका ने अपने पाठकों का एक सर्वेक्षण किया था कि वे अपने काम के कौन-से हिस्से एआई को सौंप देंगे और कौन-से हिस्से अपने हाथों में ही रखना चाहेंगे। कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं देखने से लगता है कि अनुसंधान में लगे अधिकांश लोग अपने काम का आनंद अपने पास ही सुरक्षित रखना चाहेंगे। इनमें से कुछ प्रतिक्रियाएं देखिए।

इस्तांबुल (तुर्की) के मुलेक ओज़्कामेक (Müleyke Özçakmak) का कहना था कि वे एआई और चेतना के क्षेत्र में अनुसंधान करते हैं और उनके विचार से सबसे रोमांचक हिस्सा है जिज्ञासु रहना, अनपेक्षित कड़ियां देखना और मौजूदा मान्यताओं को चुनौती देना। ऐसे क्षण प्राय: मार्गदर्शक के साथ बातचीत, सहकर्मियों के साथ चर्चाओं और खुद मनन करने से आते हैं, न कि किसी एल्गोरिद्म से।

मेक्सिको सिटी (मेक्सिको) के एल्वा एस्कोबार (Elva Escobar) गहरे समुद्र के शोधकर्ता हैं। उनके विचार से खोज का रोमांच और प्रयोग डिज़ाइन करने की सृजनात्मकता को एआई के सुपुर्द करना मुश्किल होगा। बातचीत के लिए गहरे समुद्र से एक निजी जुड़ाव होना ज़रूरी है। इसके अलावा उनका कहना है कि विज्ञान में उनकी एक नैतिक जवाबदेही भी है।

मेनचेस्टर (यूके) की ल्यूसी न्जोकी न्जुकी (Lucy Njoki Njuki) जैव-सांख्यिकी (बायो-स्टेटिस्टिक्स) में प्रशिक्षित हैं और उन्हें गड्ड-मड्ड आंकड़ों के साथ काम करना और उन्हें साफ-सुथरे ढंग से प्रस्तुत करना इतना आनंददायक लगता है कि यह काम वे खुद करना चाहेंगी।

पीटरमार्टिज़बर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के रिचर्ड कुंज़ (Richard Kunz) कहते हैं कि हालांकि कोड लिखने में एआई की कुशलता मुझमें ईर्ष्या पैदा करती है, लेकिन फिर भी मैं खुद कोड लिखना पसंद करता हूं। मुझे अपने काम के इस हिस्से से प्रेम है। वैसे भी एआई द्वारा लिखित कोड मुश्किल होते हैं और उन्हें डीबग करने (यानी गलत अंशों को सुधारने) में बहुत वक्त ज़ाया होता है।

हॉन्गकॉन्ग के शेंग बाओ (Sheng Bao) कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति सिर्फ उत्तर पा लेने का नाम नहीं है। इसमें दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान, मान्यताओं को चुनौती देना, और वार्तालाप के ज़रिए विचारों/धारणाओं का विकास करना भी शामिल है। कई सारे उम्दा अनुसंधान विचार नाहक चर्चाओं से उभरते हैं।

पोर्टो एलेग्रे (ब्राज़ील) के एनरिके फाल्सेटो डी बोरोस (Enrique Falceto De Barros) का मत है कि एक डॉक्टर और स्वास्थ्य सम्बंधी शोधकर्ता होने के नाते वे मरीज़ के हित को सबसे ऊपर रखते हैं। लिहाज़ा, यदि एआई कोई काम उनसे बेहतर कर सकता है, तो उस काम में उसे उनका स्थान ले लेना चाहिए। यह विचार डरावना है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि एआई उनकी भूमिका को सुदृढ़ करेगा, उनका स्थान नहीं लेगा। वह दूसरों की देखभाल करने की उनकी चाहत, उनके मानवीय स्पर्श, जिज्ञासा-प्रेरित अनुसंधान की जगह नहीं लेगा। वह अन्य लोगों के साथ जुड़कर सृजन करने के आनंद और स्वास्थ्य-समता में सुधार की नैतिक ज़रूरत को भी समाप्त नहीं करेगा।

फोर्ट कोलिन्स (कोलेरेडो) की एना हॉडशायर (Anna Hodshire) का मत है कि वे नहीं चाहेंगी उनका लेखन और समीक्षा का कार्य कोई चैटबॉट छीन ले। लिखने से उन्हें वे पहलू पकड़ में आते हैं जो वे अन्यथा नहीं समझतीं। अन्य लोगों के काम की समीक्षा से उन्हें आलोचनात्मक सोच में मदद मिलती है। उनका तो यहां तक कहना है कि उबाऊ इमेल लिखते हुए भी उन्हें संवाद के अपने हुनर को तराशने में मदद मिलती है।

बेजिंग (चीन) के लिआओ मेंगचाओ (Liao Mengchao) का कहना है कि वे प्रारंभिक डैटा संग्रह, वास्तविक स्थल पर अवलोकन करने और रूबरू साक्षात्कार खुद करने को तरजीह देते हैं। इसमें गहरे सवालों वाली प्रश्नावलियों और मैदानी सर्वेक्षण करना तथा चिकित्सा उपचार पा रहे लोगों से बातचीत करना शामिल होता है। इन कामों के लिए हमदर्दी, लचीलापन, तत्काल रिस्पॉन्स और आमने-सामने की चर्चाएं शामिल हैं। एआई प्रत्यक्ष जानकारी जुटाने के लिए वास्तविक दुनिया के परिदृश्यों तक पहुंच नहीं बना सकता। लिहाज़ा, वे इस काम को एल्गोरिद्म के भरोसे कदापि नहीं छोड़ना चाहेंगे।

हैनोवर (जर्मनी) के फ्रांज़िस्का मुलर (Franziska Müller) कहते हैं कि वे प्रस्तुतीकरण के लिए रेखाचित्र बनाना या पोस्टर, प्रकाशन की रचना करना एआई के सुपुर्द नहीं करेंगे। किसी डिज़ाइन के घटकों का मिलान करना या उन्हें किसी तस्वीर में सही तरह से जोड़ना, ताकि एक बेतरतीबी में तरतीब पैदा हो जाए, और एक कहानी सुनाना अपने आप में बहुत संतोषप्रद होता है।

तालसेरी (भारत) की अदिति अनिल (Adithi Anil) संज्ञान मनोविज्ञान में पीएच.डी. कर रही हैं। यह विषय इंसानों से, उनके दिमागों से और इस बात से ताल्लुक रखता है कि वे अपने पर्यावरण से कैसे अंतर्क्रिया करते हैं। हो सकता है कि एआई के साधन कोडिंग, प्रयोग की डिज़ाइन और आंकड़ों के विश्लेषण को तेज़ कर दें, लेकिन जोखिम यह रहेगा कि हम दिमाग और व्यवहार के उस अनोखे झरोखे को गंवा दें, जो एक इंसानी शोधकर्ता के साथ आते हैं।

नेशविले, टेनेसी की एलेना इवान्स (Elena Evans) को लगता है कि विज्ञान को व्यापक श्रोताओं तक ले जाना इंसानों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्हें पेचीदा विषयों को लोगों तक सृजनात्मक ढंग से संप्रेषित करने में आनंद मिलता है और वे यह काम एआई को सौंपना नहीं चाहेंगी।

रिगा (लाटविया) की एग्नेस उसाका (Agnese Ušacka) आंकड़ों का विश्लेषण छोड़ना नहीं चाहेंगी। वे कहती हैं कि ज़रा उस रोमांच की कल्पना कीजिए जो महीनों या बरसों तक आंकड़े जुटाने के बाद तब मिलता है जब पता चलता है कि वे आंकड़े आपकी परिकल्पना की पुष्टि करते हैं। वे मानती हैं पूरी प्रक्रिया के इस सबसे मज़ेदार हिस्से को एआई को सौंप देना नासमझी होगी। (स्रोत फीचर्स)

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इन्सानों ने नशा करना कब शुरू किया?

आम तौर पर माना जाता था कि शराब या अन्य मादक पदार्थों का इस्तेमाल तकरीबन 13,000 साल पहले खेती के विकास के साथ शुरू हुआ। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध से मनुष्य और नशीले पदार्थों के इस नाते के इससे भी पहले के सबूत मिले हैं। साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार एक इंडोनेशियाई द्वीप से सुपारी सेवन के ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं।

आस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ युनिवर्सिटी के शोधकर्ता सुलावेसी द्वीप की अलग-अलग गुफाओं से मिले दो खानाबदोश मानव कंकालों का अध्ययन कर रहे थे। इनमें से एक अवशेष लगभग 7000 साल पुराना था, जबकि दूसरा करीब 16 से 25 हज़ार साल पुराना था। अध्ययन के दौरान दोनों कंकालों की दाढ़ में कुछ असामान्य, गोल और गहरे गड्ढे दिखाई पड़े। दाढ़ इतनी बुरी तरह घिस चुकी थीं कि दंत-मज्जा दिखने लगी थी। वैज्ञानिकों के लिए इस पहेली के नतीजे हैरतअंगेज़ थे।

जब दांतों के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो उनमें एरेकोलाइन नामक रसायन के अवशेष मिले। एरेकोलाइन मन-मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला एक प्राकृतिक ‘साइकोऐक्टिव’ पदार्थ है। यह सुपारी में पाया जाने वाला मुख्य उत्तेजक और सक्रिय एल्केलॉइड है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है।

सुपारी (Areca catechu, अरेका पाम के फल का बीज) मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिणपूर्वी एशिया में पाई जाती है। सुपारी चबाने से एल्केलॉइड अवशोषित होता है, जिससे व्यक्ति सचेत, ताज़ा या हल्का उत्साह महसूस करता है।

अध्ययन के दौरान पाया गया कि ये प्राचीन मनुष्य सुपारी को लंबे समय तक दांतों के बीच दबाए रखा करते थे। प्राकृतिक तौर पर सुपारी काफी सख्त और खुरदरी होती है, जिससे दांतों की ऊपरी परत (इनेमल) घिसती गई। इसलिए लगातार सुपारी चबाने से दाढ़ों में गहरे गड्ढे बन गए।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इन प्राचीन मनुष्यों ने शायद शुरुआती तौर पर दांत के दर्द निवारण या मुंह में सुन्न-पन महसूस करने के लिए सुपारी चबाना शुरू किया होगा। लेकिन सुपारी के ज़रूरत से ज़्यादा सेवन और इसके खुरदरेपन ने इनके दांतों को इतना नुकसान पहुंचाया कि दर्द कम होने के बजाय बढ़ गया। नतीजतन, बढ़ते दर्द से राहत पाने के लिए इन्होंने और अधिक सुपारी चबाना शुरू कर दिया। इस तरह वे एक लगातार चलने वाले राहत और दर्द के चक्र में फंस गए।   

हालांकि, खुराक के मुताबिक सुपारी के सकारात्मक (जैसे सतर्कता, एकाग्रता, चिंता में कमी) और नकारात्मक (अत्यधिक लार आना, धीमी हृदय गति, कंपन, आंखों की पुतलियों का सिकुड़ना) दोनों तरह के प्रभाव हैं। इसका सेवन बंद करने पर तलब, बेचैनी जैसे लक्षण भी होते हैं। पारंपरिक तौर पर सुपारी का इस्तेमाल कई सभ्यताओं (खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र) में होता है। लेकिन इस शोध से यह साबित हुआ है कि यह परंपरा हज़ारों साल पुरानी है। अलबत्ता, मनुष्यों में यह वनस्पति आधारित नशे का सबसे प्राचीन सबूत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समन्वित सार्वभौमिक समय UTCको बदलने का प्रस्ताव

लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (atomic clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…

हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…

यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।

1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल (timekeepers) ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।

दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।

अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (neagtive leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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लाल लेट्यूस को हरा बनाकर बढ़ाया सब्ज़ी का पोषण

दौलत सिंह तंवर 

जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।

लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।

शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।

यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।

यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।

यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।

इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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 जीन को सक्रिय करने वाले  ” DNA स्विच ” का रहस्य सुलझा 

भरत नागेश 

हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में लगभग 20 हज़ार से ज़्यादा जीन्स होते हैं, लेकिन हर जीन हर समय सक्रिय नहीं रहता। शरीर का सही ढंग से विकास और कामकाज तभी संभव हो पाता है जब सही जीन, सही समय पर और सही जगह पर ‘ऑन’ हों। तो, यह कौन तय करता है कि कौन सा जीन कब ऑन होगा? इसका जवाब DNA के उन खास हिस्सों में छिपा है जो जीन्स को सक्रिय करने का संकेत देते हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब कृत्रिम बुद्धि (AI) की मदद से इसी छिपे हुए ‘जेनेटिक स्विच’ (genetic switch) को डिकोड करने में बड़ी सफलता हासिल की है।

रहस्यमयी इनिशिएटर 

वैज्ञानिकों ने डीएनए के जिस भाग पर शोध किया, उसे इनिशिएटर (initiator) कहते हैं। यह वह जगह है जहां से किसी जीन में मौजूद जानकारी को प्रतिलेखन-अनुलेखन के माध्यम से प्रोटी न या किसी अन्य ज़रूरी अणु में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इनिशिएटर वह स्टार्ट बटन है, जो तय करता है कि जीन की गतिविधि कहां से शुरू होगी। यह जीन अभिव्यक्ति (gene expression) की पूरी प्रक्रिया की नींव माना जाता है, क्योंकि शरीर में एंज़ाइम, हॉर्मोन और तमाम ज़रूरी प्रोटीन इसी प्रक्रिया के ज़रिए बनते हैं।

अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह एक बड़ी पहेली रही है कि आखिर डीएनए की अरबों क्षार-जोड़ियों (base pairs) में इस इनिशिएटर को ठीक-ठीक कैसे पहचाना जाए। इसकी बनावट इतनी जटिल और विविधतापूर्ण थी कि पारंपरिक तरीकों से इसका पूरा पैटर्न समझना मुश्किल हो रहा था।

खोज प्रक्रिया

इस शोध का नेतृत्व कैलिफोर्निया के मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेम्स टी. कैडोनागा (James T. Kadonaga) और ग्रेजुएट रिसर्चर टॉरी राइन-कैरिग (Torrey Rhyne-Carrigg) ने किया। टीम ने सबसे पहले हाई-थ्रूपुट अनुक्रमण (High-throughput DNA sequencing) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डीएनए के लगभग 5,00,000 अलग-अलग वैरिएंट अनुक्रम तैयार किए और उनकी गतिविधि को मापा। इस तकनीक की मदद से एक साथ बहुत बड़ी संख्या में डीएनए अनुक्रम को तेजी से पढ़ा जा सकता है।

इसके बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल एक मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस मॉडल ने लाखों अनुक्रमों का विश्लेषण करके यह सीखा कि इनिशिएटर की पहचान करने वाला क्षार-जोड़ी पैटर्न (base pair pattern) आखिर होता क्या है। यह मॉडल पहली बार मानव जीन्स में इनिशिएटर की उपस्थति या अनुपस्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सफल रहा, और लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इस इनिशिएटर को सफलतापूर्वक पहचान लिया गया।

प्रोफेसर कैडोनागा के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एआई मॉडल ने डीएनए में मौजूद इनिशिएटर की मौजूदगी का इतना मज़बूत और भरोसेमंद अनुमान दिया है। इसके आधार पर डीएनए के इस क्षार अनुक्रम पैटर्न को असल मायनों में डिकोड (decode) किया जा सका।

खोज का महत्व

यह शोध सिर्फ अकादमिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी हैं:

1. बीमारियों को समझने में मदद: जब इनिशिएटर जैसे नियामक क्षेत्रों में उत्परिवर्तन होता है, तो जीन की गतिविधि गड़बड़ा सकती है, जिससे कोशिकाओं में खराबी आ सकती है। यह गड़बड़ी कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से जुड़ी मानी जाती है। अब वैज्ञानिक इस नए मॉडल की मदद से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कोई खास उत्परिवर्तन इनिशिएटर को कैसे प्रभावित करेगा और उससे जीन गतिविधि (gene activtiy) में क्या बदलाव आ सकता है।

2. सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करना: इस शोध से मिले आंकड़े भविष्य में सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करने में मदद कर सकते हैं। ये ऐसे कृत्रिम डीएनए अनुक्रम (artificila DNA sequences) होते हैं जिन्हें खास मकसद के हिसाब से जीन्स को चालू या बंद करने के लिए तैयार किया जाता है। इनका इस्तेमाल जीन थेरपी, बायोटेक्नोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में हो सकता है।

3. जीनोम की समझ: मानव जीनोम में सिर्फ जीन्स ही नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले असंख्य नियामक घटक भी मौजूद हैं। इन घटकों को डिकोड करना पूरे जीनोम की भाषा (genome understanding) को समझने की दिशा में एक अहम कदम है।

वास्तविक प्रयोग और कृत्रिम बुद्धि का मेल

डीएनए का यह चालू-बंद स्विच (DNA switch) दशकों से एक पहेली बना हुआ था। इस अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक प्रयोगों और कृत्रिम बुद्धि (एआई) की आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लाया गया। पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाए और फिर उस एक एआई मॉडल को इन आंकड़ों के आधार पर प्रशिक्षित किया ताकि वह पैटर्न पहचान सके। यह तरीका भविष्य में जीनोम की अन्य उलझनों को समझने के लिए भी एक मॉडल के तौर पर काम आ सकता है।

आगे की राह

हालांकि इस शोध ने लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इनिशिएटर को पहचान लिया है, फिर भी बाकी बचे जीन्स में इनकी पहचान करना अभी बाकी है। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य होगा कि वे मॉडल (model) को और बेहतर बनाएं, ताकि बाकी जीन्स में भी इनिशिएटर या उससे मिलते-जुलते नियामक घटकों को खोजा जा सके। इसके अलावा, यह समझना भी ज़रूरी होगा कि अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं और ऊतकों में यह स्विच किस तरह अलग-अलग व्यवहार करता है। (स्रोत फीचर्स)

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एक जीन में उत्परिवर्तन का दोहरा प्रभाव

अर्पिता व्यास 

मच्छर मलेरिया सहित कई रोगों का वाहक है। एक अनुमान के मुताबिक 2024 में दुनिया के 80 देशों में मलेरिया के पौने तीन करोड़ से ज़्यादा मामले सामने आए थे और इसकी वजह से 6 लाख से अधिक मौतें हुई थीं। मलेरिया के प्रमुख वाहक मच्छर एनॉफिलीज़ प्रजातियों के होते हैं। मलेरिया पर नियंत्रण का एक प्रमुख तरीका मच्छरों पर नियंत्रण का रहा है। इसके लिए कीटनाशकों (insecticide) का व्यापक उपयोग भी किया गया है।

1950 के दशक में मलेरिया की रोकथाम के लिए डाइएल्ड्रिन नामक कीटनाशक का छिड़काव किया गया था। यह एनॉफिलीज़ मच्छर को मारता था। लेकिन कुछ ही सालों में इसका असर होना बंद हो गया क्योंकि डाइएल्ड्रिन छिड़काव के बाद वही मच्छर जिंदा बचे जिनमें Rdl (resistance to dieldrin) जीन में उत्परिवर्तन मौजूद था और उनकी संख्या बढ़ने लगी। प्रतिरोध पैदा हो जाने के कारण डाइएल्ड्रिन का उपयोग बंद कर दिया गया। साथ ही डाएल्ड्रिन की विषाक्तता को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई थीं।

दशकों बाद भी मच्छरों में इनमें से एक उत्परिवर्तन बना रहा। क्योंकि इस उत्परिवर्तन का एक असर यह भी था कि यह इन मच्छरों को डाइएल्ड्रिन के अलावा अन्य कीटनाशकों के खतरे से भी सुरक्षा प्रदान करता था। Rdl मच्छरों में डाइएल्ड्रिन एक रिसेप्टर (GABA receptor) पर काम करता है। अन्य कई कीटनाशक भी इसी रिसेप्टर को निशाना बनाते हैं। लेकिन साथ ही यह उत्परिवर्तन उनकी सक्रियता को कम करता था।

अब एक नए अध्ययन ने इस मामले में और प्रकाश डाला है। अपने मूल रूप में Rdl कई जंतुओं की संवेदनाओं को मंद करता है। यह देखा गया कि एनॉफिलीज़ मच्छरों में यह उनकी आवाज़ के प्रति संवेदना को मंद करता है। लेकिन उत्परिवर्तन के बाद इसकी यह भूमिका जाती रही और परिणामस्वरूप उत्परिवर्तित Rdl वाले मच्छर आवाज़ों के प्रति अधिक संवेदनशील (auditory sensitivity) हो गए।  गौरतलब है कि मच्छर संभोग के लिए साथी की तलाश के लिए मुख्यत: ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं। नर मच्छर मादा के पंखों की हल्की फड़फड़ाहट पर ध्यान देकर साथी ढूंढते हैं। ध्वनि संवेदना बढ़ जाने पर वे शहरी इलाकों के शोर में भी अपने लिए साथी ढूंढ लेते हैं। यानी यह उत्परिवर्तन ज़हर से तो बचाता ही है, साथी ढूंढने में भी मददगार (mating advantage) होता है।

स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल की न्यूरोबायोलॉजिस्ट मार्टा एंड्रेस ने इसकी जांच करने के लिए प्रयोग किए। उन्होंने अपने प्रयोगों में पाया था कि Rdl वह जीन है जिसमें उत्परिवर्तन से डाइएल्ड्रिन-प्रतिरोध (dieldrin resistance) पैदा होता है। यह जीन मूल रूप में मच्छर की श्रवण तंत्रिकाओं की सक्रियता को कम करता है। Rdl में उत्परिवर्तन होने से श्रवण तंत्रिकाएं ज़्यादा क्रियाशील हो जाती हैं। यानी वे मादा मच्छरों के पंखों की फड़फड़ाहट की ध्वनि को बेहतर सुन पाते हैं। बारी आई प्रयोगशाला में अध्ययन की।

उन्होंने एक स्पीकर से 300–550 हर्ट्ज़ आवृत्ति की आवाज़ पैदा जो मादा के पंखों की फड़फड़ाहट के लगभग समान थी। प्रयोग में देखा गया कि Rdl उत्परिवर्तित (Rdl mutated mosquitoes) नर मच्छरों की स्पीकर पर पहुंचने की संभावना अपेक्षाकृत ज़्यादा थी।

लेकिन मादा को खोज लेने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि नर उनके साथ संभोग (successful mating) में भी सफल होंगे। इसकी जांच के लिए शोधकर्ताओं ने 25 नर मच्छरों को 25 मादाओं के साथ छोटे पिंजरों में रखा, फिर उन्हें 48 घंटे के लिए दो अलग-अलग इनक्यूबेटर में रखा – एक में शोर 70 डेसीबल का था और दूसरे में 93 डेसीबल का (लगभग शहरों जैसा) था। दोनों परिस्थितियों उत्परिवर्तित मच्छरों में तो संभोग लगभग बराबर (40 प्रतिशत) रहा जबकि गैर-उत्परिवर्तित मच्छरों में यह दर ज़्यादा शोर वाले इन्क्यूबेटर में घटकर 33 प्रतिशत रह गई।

इस प्रयोग से स्पष्ट निष्कर्ष निकालने में एक समस्या यह है कि मच्छरों और हम मनुष्यों में ध्वनि संवेदना के ढंग थोड़े अलग-अलग हैं। जहां मनुष्य मूलत: ध्वनि स्रोत से उत्पन्न दबाव की तंरगों का सहारा लेते हैं, वहीं मच्छर ध्वनि स्रोत के आसपास कणों के कंपनों को भांपते हैं। इस वजह से दोनों मामलों में शोर को परिभाषित करने में अंतर होगा।

शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की जांच वास्तविक परिस्थिति में भी की है। उन्होंने पाया कि शोरगुल वाले परिवेश में उत्परिवर्तन की दर ज़्यादा थी। और तो और, जिन मादाओं में यह उत्परिवर्तन नहीं था उनमें संभोग करने की संभावना ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शोर भरे शहरों में कम थी। अलबत्ता, सीधे-सीधे कोई निष्कर्ष निकालना मुश्किल है क्योंकि शहरी और ग्रामीण परिवेश में और भी कई अंतर होते हैं।

कीटनाशक का उपयोग समाप्त होने के लंबे समय बाद भी उत्परिवर्तन की निरंतरता का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि हम कुछ समय के लिए किसी कीटनाशक का उपयोग करते हैं और जेनेटिक बदलाव (genetic modifications) कर देते हैं, तो जीवों की शारीरिक क्रिया में परिवर्तन आ जाता है। यह वास्तव में पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बिगाड़ देता है। यहां एक और महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है: एक जीन में होने वाले परिवर्तन दो अलग-अलग तरह के प्रभाव दर्शा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समन्वित सार्वभौमिक समय UTCको बदलने का प्रस्ताव

लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (nuclear clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…

हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (Leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…

यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।

1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।

दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल (global timekeepers) जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।

अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (negative leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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