जीवाश्म ने खोला एक मीटर लंबे बिच्छू का रहस्य

विपुल कीर्ति शर्मा

क्या आप ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां न पेड़ हों, न जंगल, न पक्षियों का कलरव, न डायनासौर और न ही इंसान? चारों ओर चट्टानें, उथले समुद्र, कीचड़ भरे तटीय मैदान, आकाश में बार-बार कड़कड़ाती बिजली और जब-तब फूटते हुए ज्वालामुखी और जीवन की बस शुरुआती आहट। लेकिन इस वीरान-सी लगने वाली दुनिया में एक ऐसा शिकारी घूम रहा था, जिसे देखकर आज के जांबाज़ भी शायद पीछे हट जाएं। यह कोई काल्पनिक राक्षस नहीं, बल्कि करीब एक मीटर लंबा बिच्छू (1 meter scorpion) था।

हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस प्राचीन जी व के बारे में नई जानकारियां दी हैं। ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर  क्षेत्र में एक जीवाश्म 1870 में मिला था और उस समय इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को पता चला था कि यह विशाल बिच्छू (giant scorpion) लगभग 43 करोड़ वर्ष पहले, यानी सिल्यूरियन काल में पृथ्वी पर विचरण करता था। इसे नाम दिया गया था प्रेआरक्टुरस गिगास (Praearcturus gigas) यह वह समय था जब धरती पर घने जंगलों का अस्तित्व नहीं था और भूमि पर जीवन अपने शुरुआती चरण में था। यह खोज केवल एक बड़े बिच्छू की कहानी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन के विकास को लेकर वैज्ञानिकों की कई पुरानी धारणाओं को चुनौती भी देती है।

करोड़ों वर्षों की समययात्रा

43 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी का स्वरूप बिल्कुल भिन्न था। अधिकांश जीवन समुद्रों में बसता था। भूमि पर कुछ छोटे-छोटे आदिम पौधे उगने लगे थे, लेकिन आज जैसे विशाल वृक्षों और घने जंगलों का विकास अभी नहीं हुआ था। इसी काल में शरीर पर कठोर कवच और जोड़ वाली टागों वाले आर्थ्रोपोड (संधिपाद प्राणि) (Arthropod) धीरे-धीरे समुद्र से निकलकर ज़मीन की ओर बढ़ रहे थे। आर्थ्रोपोड समूह में ही मकड़ियां, बिच्छू, केकड़े, झींगे और कीट शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विशाल बिच्छू इसी संक्रमण काल का एक महत्वपूर्ण जीव था, जो संभवतः पानी और ज़मीन दोनों परिवेशों में रहने का अभ्यस्त था।

आखिर मिला क्या था?

ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर में मिले जीवाश्म पहले भी वैज्ञानिकों के पास थे, लेकिन आधुनिक त्रि-आयामी इमेजिंग (3-D imaging) तकनीक और सूक्ष्म विश्लेषण से अब इनके बारे में कहीं अधिक जानकारी मिल सकी है। जीवाश्म से पता चलता है कि इस जीव के पंजे अत्यंत शक्तिशाली थे। उसका शरीर लंबा था और मज़बूत बाहरी कवच (बाह्य कंकाल) से ढंका हुआ था। अनुमान है कि उसकी कुल लंबाई लगभग एक मीटर रही होगी। तुलना करें तो आज अधिकांश बिच्छू 5 से 15 सेंटीमीटर लंबे यानी उससे करीब 10 गुना छोटे होते हैं और बहुत कम प्रजातियां 20 सेंटीमीटर तक पहुंचती हैं। अर्थात यह प्राचीन बिच्छू (ancient scorpion) अपने आधुनिक रिश्तेदारों से कई गुना बड़ा था।

जीवाश्म आखिर होते क्या हैं?

जब कोई जीव मर जाता है तो सामान्यतः उसका शरीर समय के साथ नष्ट हो जाता है। लेकिन यदि वह विशेष परिस्थितियों में मिट्टी, रेत या तलछट के नीचे दब जाए तो लाखों-करोड़ों वर्षों में उसके अवशेष चट्टानों का हिस्सा बन सकते हैं। इन्हीं संरक्षित अवशेषों को जीवाश्म (fossil) कहते है। इनमें कभी हड्डियां बचती हैं, कभी दांत, कभी पंजे, तो कभी केवल शरीर की छाप। कई बार मूल जैविक पदार्थ पूरी तरह नष्ट हो जाता है और उसकी जगह खनिज भर जाते हैं। वैज्ञानिक इन्हीं जीवाश्मों के अध्ययन से पृथ्वी के अतीत की कहानी समझने की कोशिश करते हैं।

यह वाकई ज़मीन पर रहता था?

यही सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। आज के बिच्छू पूरी तरह स्थलीय जीव हैं, लेकिन इस प्राचीन जीव के शरीर की बनावट बताती है कि वह संभवत: पूरी तरह ज़मीन पर नहीं रहता था। वैज्ञानिकों के अनुसार उसका जीवन उथले समुद्रों, ज्वारीय मैदानों, दलदली तटों और पानी से लगे क्षेत्रों में बीतता होगा। संभव है कि वह पानी में शिकार करता हो और समय-समय पर ज़मीन पर भी निकल आता हो। यही कारण है कि इसे समुद्री जीवन से स्थलीय जीवन की ओर बढ़ते आर्थ्रोपोडों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि (ancient representative) माना जा रहा है।

क्या इसमें विष वाला डंक था?

यह प्रश्न स्वाभाविक है। जीवाश्मों से यह तो स्पष्ट होता है कि इसकी शारीरिक बनावट आधुनिक बिच्छुओं से मिलती-जुलती थी। संभव है कि इसकी पूंछ के अंतिम भाग में डंक भी रहा हो। लेकिन जीवाश्मों में विष संरक्षित नहीं रहता, इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनमें विष भी था या नहीं। यदि विष (venom) था तो वह कितना शक्तिशाली था या क्या वह आज के बिच्छुओं जैसा ही था। वैसे उसके विशाल पंजे ही इतने मज़बूत रहे होंगे कि छोटे जीवों के लिए उससे बच पाना आसान नहीं रहा होगा।

उम्र कैसे पता की?

जब कोई कहता है कि कोई जीव 43 करोड़ वर्ष पुराना है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतनी सटीक उम्र कैसे पता चलती है? वैज्ञानिक सबसे पहले उस चट्टान की परत का अध्ययन करते हैं जिसमें जीवाश्म मिला है। पृथ्वी की चट्टानों की परतें समय के क्रम में बनती हैं। प्रत्येक परत में मिलने वाले जीवाश्म और आसपास की भूवैज्ञानिक संरचनाएं उसकी आयु का संकेत देती हैं। यदि आसपास ज्वालामुखीय चट्टानें हों तो उनमें मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय की दर के आधार पर और भी सटीक आयु निर्धारित की जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया को रेडियोमेट्रिक डेटिंग (radiometric dating) कहते हैं।

बिच्छू इतना विशाल कैसे हुआ?

यही वह जिज्ञासा है जिसने वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित किया है। काफी समय तक यह माना जाता रहा कि प्राचीन काल में विशाल कीटों और आर्थ्रोपोडों का विकास वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने के कारण हुआ था। कार्बोनिफेरस काल (करीब 35.8 करोड़ से 29.8 करोड़ वर्ष पूर्व) (carboniferous period) में ड्रैगनफ्लाई जैसे कई विशाल कीट पाए जाते थे, जिनके पंख लगभग 70 सेंटीमीटर तक फैलते थे। लेकिन यह नया जीव तो उनसे भी पहले का है। उस समय वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बाद के युगों जितना अधिक नहीं था। इसका अर्थ है कि विशाल आकार का श्रेय केवल ऑक्सीजन को नहीं दिया जा सकता। संभव है कि उस समय बड़े शिकारी कम रहे हों, भोजन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहा हो या फिर उस समय की पारिस्थितिकी बड़े शरीर के लिए लाभकारी रही हो। यह भी संभव है कि समुद्र और ज़मीन के बीच रहने वाली जीवनशैली ने उसके विशाल आकार के विकास में भूमिका निभाई हो।

आज के बिच्छू इतने बड़े होंगे?

इसका उत्तर लगभग ‘नहीं’ है। क्योंकि, आज पृथ्वी का वातावरण, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बदल चुका है। जंगल विकसित हो चुके हैं, असंख्य शिकारी जीव मौजूद हैं और प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक है। बड़े शरीर को बनाए रखने के लिए बहुत अधिक भोजन और ऊर्जा की ज़रूरत होती है। बदलते पर्यावरण में छोटे आकार वाले बिच्छू अधिक सफल साबित हुए होंगे। प्राकृतिक चयन (natural selection) ने धीरे-धीरे ऐसी शारीरिक संरचना को बढ़ावा दिया होगा जो कम संसाधनों में भी जीवित रह सके। यही कारण है कि आज हमें विशालकाय बिच्छू नहीं दिखाई देते।

पृथ्वी की अधूरी कहानी

हर जीवाश्म समय की बंद किताब का खुला हुआ एक पन्ना होता है। जितने नए जीवाश्म मिलते हैं, पृथ्वी के इतिहास (earth history) की तस्वीर उतनी ही स्पष्ट होती जाती है। एक समय था जब वैज्ञानिक मानते थे कि विशाल आर्थ्रोपोड केवल बाद के युगों में विकसित हुए। अब यह नई खोज बताती है कि प्रकृति ने अपने प्रयोग बहुत पहले ही शुरू कर दिए थे। संभव है कि आने वाले वर्षों में ऐसे और जीवाश्म सामने आएं, जो यह साबित कर दें कि जीवन का विकास हमारी कल्पना से कहीं अधिक विविध, कहीं अधिक जटिल और आश्चर्यजनक रहा है।

जब अगली बार आप किसी छोटे-से बिच्छू को देखें, तो एक पल के लिए 43 करोड़ वर्ष पीछे की पृथ्वी की कल्पना करें। उसी वीरान दुनिया में एक मीटर का बिच्छू आत्मविश्वास के साथ  निडर विचरण कर रहा था। यही विज्ञान की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह हमें बताता है कि पृथ्वी का अतीत किसी रहस्यमयी (planet’s secrets) कथा से कम रोमांचक नहीं था, और उसकी कहानी अभी भी पूरी तरह लिखी जानी बाकी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शहरों में हरियाली के लिए पेड़ सोच-समझकर चुनें

म सबने मनुष्य की सहूलियत के लिए बड़े से लेकर छोटे शहरों को तेज़ी से क्रॉन्कीट के जंगलों (concrete forests) में तब्दील होते देखा है। पहले तो शहरों के और फिर शहरों के आसपास के खेतों और जंगलों में नैसर्गिक रूप से लगे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई हुई और उनकी जगह इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर ने ले ली।

जब गर्माती दुनिया और बदलती जलवायु की समस्या ने पैर पसारे तो वनीकरण, वृक्षारोपण और शहरी हरितीकरण (green cities) के प्रयास शुरू हुए। शहरों को हरा-भरा करने के एक प्रयास में शहरों में सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों में लगाने के लिए ऐसे पेड़-पौधे चुन लिए जाते हैं जो तेज़ी से बड़े हो सकें; इससे शहर में जल्द हरियाली दिखने लगती है। लेकिन इस तरह के पेड़ों के चुनाव के अपने जोखिम हैं। वनीकरण और हरितीकरण के लिए कुछ पेड़-पौधों को चुनने से जैव-विविधता में कमी का जोखिम तो है ही, लेकिन एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये पेड़-पौधे वायु प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

पेड़ की वायु प्रदूषण में भूमिका, यह बात सुनकर हैरत हो सकती है। लेकिन कुछ पेड़ों से प्रकाश संश्लेषण के समय उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) (Volatile organic compounds) और वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड्स की अभिक्रिया से ओज़ोन बनती है। वायुमंडल की निचली परतों में ओज़ोन  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इससे श्वास नली में सूजन, दमा और फेफड़ों सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।

यहां गौरतलब बात यह है कि पेड़ों से उत्सर्जित VOC खुद वायु प्रदूषण (air pollution) में योगदान नहीं देते हैं, बल्कि जब ये मनुष्य की गतिविधियों के चलते उत्सर्जित होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) से अभिक्रिया करते हैं, तब वे हानिकारक ओज़ोन बनाते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि VOCs महज़ वनस्पतियों द्वारा उत्सर्जित नहीं होते, मनुष्य द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तमाम खुशबूदार चीज़ों, जीवाश्म ईंधनों, रसायन उद्योग वगैरह भी VOC उत्सर्जन का कारण हैं।

चीन की जिनान युनिवर्सिटी के वायुमंडल रसायन विज्ञानी बिन युआन ओज़ोन प्रदूषण (ozone pollution) पर मानवीय गतिविधियों के असर समझने की कोशिश रहे थे, तभी कुछ आंकड़ों ने उन्हें चौंकाया – उन्होंने पाया कि शहरी पेड़-पौधे ओज़ोन उत्सर्जन में पूर्व-अनुमानित स्तर से कहीं ज़्यादा योगदान दे रहे थे। इन आंकड़ों ने उन्हें आगे अध्ययन को उकसाया।

यह तो मालूम था कि कई वनस्पति प्रजातियां VOCs उत्सर्जित करती हैं, और कुछ प्रजातियां अन्य की तुलना में ज़्यादा VOCs उत्सर्जित करती हैं। इन प्रजातियों में वीपिंग विलो (Salix babylonica) और पॉपलर (Populus वंश) के पेड़ शामिल हैं। ये पेड़ आजकल शहरों को जल्दी हरा-भरा बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, खासकर चीन के शहरों में। भारत के शहरी बगीचों और सड़कों के किनारे भी आजकल वीपिंग विलो (weeping willow) काफी दिखाई देते हैं, और पॉपलर के पेड़ व्यावसायिक दृष्टि से शहरों के बाहर काफी लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में आइसोप्रीन (isoprene) नामक यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो एक प्रकार का VOC है और प्रकाश संश्लेषण के उप-उत्पाद के रूप में बनता है।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन चीन के बीज़िंग शहर पर केंद्रित किया। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बीजिंग शहर की हवा के नमूने लिए, साथ ही शहर के आसपास के निगरानी केंद्रों से ओज़ोन सम्बंधी डैटा लिया। उन्होंने पाया कि मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच बीजिंग में कुल VOC उत्सर्जन में पेड़-पौधों का योगदान लगभग 10 प्रतिशत था, बाकी हिस्सा मानवीय गतिविधियों (Human practices) से आया था।

उन्होंने 24 अन्य बड़े शहरों में लगाए गए पेड़ों की प्रजातियों का भी अध्ययन किया ताकि उनके द्वारा होने वाले संभावित आइसोप्रीन उत्सर्जन (emissions) का अंदाज़ मिल सके। पाया गया कि बीजिंग में लगभग 35 प्रतिशत पेड़ ऐसे हैं जो आइसोप्रीन उत्सर्जन करते हैं। और तो और सिडनी, मेलबर्न समेत ज़्यादातर शहरों में आइसोप्रीन का उत्सर्जन बीजिंग से भी ज़्यादा है। मसलन सिडनी में लगभग 65 प्रतिशत पेड़ आइसोप्रीन उत्सर्जन करने वाले हैं।

चूंकि VOC सीधे ओज़ोन नहीं बनाते हैं, इसलिए शहर के ओज़ोन प्रदूषण में पेड़-पौधों के योगदान का आकलन करने के लिए उन्होंने एक तरीका अपनाया। उन्होंने देखा कि वातावरण में VOCs कितनी तेज़ी से हाइड्रॉक्सिल मूलकों के साथ अभिक्रिया करते हैं। दरअसल, हाइड्रॉक्सिल VOCs के साथ अभिक्रिया करके पेरोक्सी रेडिकल (peroxy radicle) बनाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके ऐसे यौगिक बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश में ओज़ोन में बदल जाते हैं। पाया गया कि ओज़ोन बनाने वाले रसायन में 52 प्रतिशत हिस्सा पेड़-पौधों का था, आइसोप्रीन मुख्य योगदानकर्ता था।

हालांकि मानवीय गतिविधियों से होने वाला कुल VOC उत्सर्जन पेड़-पौधों से होने वाले उत्सर्जन से ज़्यादा था, लेकिन ओज़ोन बनने में उनका योगदान पेड़-पौधों की तुलना में कम था।

यह तो जानी-मानी बात है कि तापमान बढ़ने के साथ VOCs और ओज़ोन का उत्पादन बढ़ता है। पाया गया कि 35 डिग्री सेल्सियस पर VOCs के साथ हाइड्रॉक्सिल की अभिक्रिया दर 20 डिग्री सेल्सियस की तुलना में सात गुना ज़्यादा थी।

शोधकर्ताओं ने बीजिंग के शहरी गर्म टापू प्रभाव (शहरी इलाकों का आसपास के इलाकों की तुलना में ज़्यादा गर्म होना) पर भी विचार किया। अनुमान है कि गर्मियों में दिन के समय, जब अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस होता है, तब शहर में 0.8 डिग्री सेल्सियस की अधिकता आइसोप्रीन उत्सर्जन को 12 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यानी गर्माती पृथ्वी (global warming) शहरी पेड़-पौधों से होने वाले VOC उत्सर्जन को और भी बढ़ा सकती है।

यहां सचेत रहने वाली कुछ बातें हैं। एक यह कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में VOC उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है, जिसे थामने की ज़रूरत है। साथ ही साथ NOx उत्सर्जन को कम करने की भी ज़रूरत है क्योंकि VOC और इनकी आपसी अभिक्रिया से ही ओज़ोन बनती है – NOx के बिना VOCs ओज़ोन प्रदूषण में योगदान नहीं दे सकते।

दूसरा यह कि साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित अध्ययन के इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हमें पेड़ नहीं लगाने चाहिए। पेड़ों के कई फायदे हैं, जिन्हें यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं लगती। ज़रूरत है कि शहरों का हरितीकरण करते समय शहरों और जलवायु के अनुकूल (climate adaptive trees) पेड़-पौधे चुने जाएं।

वैसे भारत के संदर्भ में भी VOC उत्सर्जक पेड़ों के असर को मापना दिलचस्प होगा क्योंकि यहां के शहरों में भी वीपिंग विलो अब काफी देखने को मिलते हैं, और पॉपलर के पेड़ों को उनके व्यवसायिक उपयोग के लिए शहरों के बाहर लगाया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जंतु संग्रहालयों के मददगार मांसभक्षी कृमि

जंतु संग्रहालयों के प्रबंधकों के सामने एक बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें प्रदर्शन के लिए मिले कंकालों की सफाई करना होती है क्योंकि इन कंकालों पर मांस चिपका होता है। फिलहाल कई संग्रहालयों (museums) में कंकालों पर से मांस साफ करने के लिए विभिन्न रसायनों या एंज़ाइमों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके महंगे होने के अलावा पर्यावरण के लिए हानिकारक भी हो सकते हैं, और कई बार कंकाल को क्षति पहुंचाते हैं।

कुछ संग्रहालयों में इस काम के लिए डर्मेस्टिड भृंग (dermestid beetle) छोड़ दिए जाते हैं ताकि वे कंकालों पर चिपका मांस चट कर जाएं। लेकिन इन भृंगों के समूहों को कैद करके रखना होता है क्योंकि इनमें जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं के कीट होते हैं। यदि वयस्क कीट कंकाल पर अपने अंडे छोड़ दें या खुद कैद से निकल भागें तो वे अन्य नमूनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

अब इस मामले में कृमि उनकी मदद करने वाले हैं। स्टुटगार्ड के स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निलूफर अलाई कहकी विचार कर रही थीं कि ऐसे कौन-से अन्य कीट हो सकते हैं जो इस काम में मदद कर सकें। उनकी टीम के दिमाग में सुपरकृमियों (superworms) का विचार कौंधा।

सुपरकृमि वास्तव में कीट नहीं हैं बल्कि भृंग (Zophobas atratus) की इल्लियां हैं। ये आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि इनका उपयोग पालतू सरिसृपों, उभयचरों, मछलियों और पक्षियों के भोजन के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि जब ये बड़े-बड़े समूहों में होते हैं तो प्यूपा में परिवर्तित नहीं होते। अर्थात इनमें से वयस्क कीट नहीं बनते यानी इनके भाग निकलने की संभावना भी नहीं होती। शोधकर्ताओं ने इस विचार को परखा।

उन्होंने अलग-अलग साइज़ और प्रजातियों के विभिन्न मृत जानवरों (dead animals) पर इन्हें छुट्टा छोड़ दिया। पहले तो उन्होंने प्रत्येक मृत जानवर की चमड़ी हटाई और उसके सारे अंग निकल दिए। बड़े जानवरों के ऊतकों को मुलायम करने के लिए उन्हें उबाला गया। इसके बाद इन शवों को एक डिब्बे में रखकर सैकड़ों इल्लियां (सुपरकृमि) डाल दिए गए।

इल्लियों के झुंड ने छोटे जानवरों का मांस तो घंटों में साफ कर दिया, पर बड़े जानवरों के लिए उन्हें एक-दो दिन लगे। और तो और, बड़े जानवरों  की सफाई (skeleton cleaning) के लिए हर आठ घंटे में नई और भूखी इल्लियां डालनी पड़ी। यदि इल्लियों की संख्या बहुत ज़्यादा रही तो उन्होंने छोटे जानवरों की हड्डियां भी चबा डालीं। हां, बड़े जानवरों की हड्डियां सलामत रहीं। कई सारे प्रयोगों के बाद टीम का निष्कर्ष है कि जानवर के प्रति ग्राम शव के लिए 10-15 ग्राम इल्लियां उपयुक्त होती हैं।

वैसे कई संग्रहालय प्रबंधकों का कहना है कि सुपरकृमियों को पालना भोजन वगैरह की दृष्टि से थोड़ा मुश्किल होगा। इसके अलावा इनके नए कीट तैयार करने के लिए (worm rearing) इल्लियों को झुंड से अलग करके रखना होगा। दूसरी ओर, कहकी का मत है कि इन्हें साधारण परिस्थितियों में रखा जा सकता है जबकि डर्मेस्टिड कीटों के लिए संग्रहालय में एक अलग प्रयोगशाला ही बनानी पड़ती है। तो अब कई संग्रहालयों में इनके उपयोग को परखने की बारी है। (स्रोत फीचर्स)

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कई टांगों वाले समुद्री कीट!

ह टांगें, दो एंटीना और तीन खंडों में बंटा शरीर – यह किसी भी कीट (insect) की बुनियादी पहचान मानी जाती है। लेकिन क्या धरती पर प्रकट हुए शुरुआती कीट भी बिलकुल ऐसे ही थे?

जैव विकास के सिद्धांतों के मुताबिक, पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत समुद्र से हुई और धीरे-धीरे जीव ज़मीन पर आ बसे। माना जाता है कि कीटों के पूर्वज  समुद्री जीव क्रस्टेशियन (जैसे झींगा और क्रिल) (crustacean) थे, लेकिन वे समुद्र से निकलकर ज़मीनी जीव कैसे बने यह सवाल अनसुलझा ही था। अब नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने कीटों की उत्पत्ति के राज़ उजागर किए हैं।  

लगभग पांच वर्ष पहले, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जीवाश्म वैज्ञानिक एरिक टिहेल्का का ध्यान 32.4 करोड़ साल पुराने एक जीवा श्म के रेखाचित्र (fossil sketch) पर गया। यह 1985 में टेक्सास के टेसनस फॉर्मेशन से मिले एक जीवाश्म का रेखाचित्र था। उस समय वैज्ञानिकों ने इसे किसी क्रस्टेशियन (झींगा प्रजाति) का शिशु माना था और सैन डिएगो नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में रख दिया था।

लेकिन जब टिहेल्का की टीम ने ध्रुवीकृत प्रकाश (polarized light) तकनीक से इसका पुनरावलोकन किया, तो कई अनदेखे तथ्य उभरे। उन्होंने पाया कि इस जीव में कीट और क्रस्टेशियन दोनों के गुण थे।

बारीकी से निरीक्षण में उन्होंने पाया कि जीव के बीच वाले हिस्से में कीटों की तरह छह टांगें, सिर पर दो एंटीना, शरीर के पिछले भाग में 11 खंडों वाला पिछला भाग था और तंतुनुमा पूंछ तथा अंडे देने की नली थी। इसके अलावा पिछले भाग पर क्रस्टेशियन जीवों की तरह ढेरों चप्पू जैसी टांगें भी थीं। शोधकर्ताओं ने इस नए जीव का नाम चोशा प्रेकर्सर (Chosha praecursor) रखा है।

वैज्ञानिकों की यह राय रही है कि कीटों के पूर्वज समुद्री क्रस्टेशियन थे। यह नया जीवाश्म स्पष्ट संकेत देता है कि ये जीव अचानक ज़मीन पर आने के बजाय जल-थल दोनों जगह (semi-aquatic) विचरते होंगे। अनुमान है कि चप्पूनुमा टांगें इसे पानी में तैरने या गलफड़ों की तरह सांस लेने में मदद करती होंगी।

इसके बाद टिहेल्का की टीम ने स्कॉटलैंड और इलिनॉय से मिले ऐसे ही तीन रहस्यमयी जीवाश्मों का भी अध्ययन किया। इनमें से स्कॉटलैंड का जीवाश्म करीब 40.5 करोड़ साल पुराना था (जिसे कनखजूरा या गोजर का रिश्तेदार माना जाता था) (millipede), जबकि इलिनॉय के दो जीवाश्म करीब 30 करोड़ साल पुराने थे, जिनके उदर पर भी टांगों जैसी संरचनाएं थी। इन चारों जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि शुरुआती पंखहीन कीटों (wingless insects) के शरीर की बनावट और टांगों की संख्या में काफी विविधता थी। 

गौरतलब, विकासक्रम में कई टांगों वाले ये शुरुआती जीव विलुप्त (extinct) होते गए। लेकिन इनकी एक शाखा में केवल छह टांगें बची रहीं और उसी से आधुनिक भृंग, मधुमक्खियों, तितलियों का विकास हुआ।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन कीटों की उत्पत्ति और उनके क्रमिक विकास (insect evolution) की हमारी पुरानी समझ को बदल सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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अंतरिक्ष यात्री कमज़ोर क्यों हो जाते हैं?

ह तो देखा गया है कि जब अंतरिक्ष यात्री लंबी अंतरिक्ष यात्रा (space travel) के बाद धरती पर लौटते हैं तो उनके शरीर में कमज़ोरी के लक्षण दिखाई देते हैं। अब शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि इसकी वजह यह है कि अंतरिक्ष के कम गुरुत्वाकर्षण (gravity) के असर से माइटोकॉण्ड्रिया के कामकाज में क्षीणता आती है। माइटोकॉण्ड्रिया समस्त जीवों की कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जो उन्हें ऊर्जा मुहैया कराता है। वैसे यह बात तो पूर्व में अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में भेजे गए कई चूहों और कोशिकाओं के अध्ययन से पता थी कि अल्प गुरुत्व की परिस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इस क्षति की क्रियाविधि क्या है। अब जापान के नेशनल साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (राइकेन) के आणविक जीव वैज्ञानिक शिनतारो इवासाकी की टीम ने इसका और बारीकी से अध्ययन किया है। इसमें उन्होंने राइबोसोम पर ध्यान दिया।

कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण तीन चरणों में होता है। सबसे पहले आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) के आधार पर एक अन्य अणु आरएनए बनाया जाता है। आरएनए कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम (ribosome) से जुड़ जाता है। फिर राइबोसोम से आरएनए के खंड कोशिका द्रव्य में से उपयुक्त अमीनो अम्लों को लाकर राइबोसोम पर सही क्रम में जमाते हैं और इन अमीनो अम्लों को जोड़कर प्रोटीन बनता है। इवासाकी देखना चाहते थे कि कम या शून्य गुरुत्व (zero gravity) का राइबोसोम के कामकाज पर क्या असर होता है।

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर कुछ कोशिकाएं 24 या 48 घंटों तक संवर्धित कीं और उन्हें फ्रीज़ कर दिया। साथ ही साथ, कुछ कोशिकाओं को सेंट्रीफ्यूज में रखकर संवर्धित किया। सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) लगभग धरती जैसी गुरुत्व परिस्थिति बनाता है।

जब सारे नमूनों का धरती पर लाकर विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन कोशिकाओं को अल्प-गुरुत्व में रखा गया था उनमें सेंट्रीफ्यूज में रखी कोशिकाओं की अपेक्षा माइटोकॉण्ड्रियल एम-आरएनए (mitochondrial m-RNA) कण कम थे और उनके माइटोकॉण्ड्रिया के राइबोसोम ने कम प्रोटीन बनाए थे।

इसी प्रकार के असर एक कृमि सी. एलेगेन्स पर देखे गए। ऐसे कुछ कृमियों को अंतरिक्ष स्टेशन के अल्प गुरुत्व में चार दिन रखा गया था जबकि कुछ को सेंट्रीफ्यूज में पाला गया था।

इवासाकी की टीम ने ऐसे ही कुछ प्रयोग धरती की एक प्रयोगशाला में किए थे। इसके लिए उन्होंने क्लिनोस्टेट नाम के उपकरण का इस्तेमाल किया था, जो अल्प-गुरुत्व की परिस्थिति पैदा करता है। जब मानव कोशिकाओं को 24 घंटे क्लिनोस्टेट (clinostat) में रखा गया तो उनमें 13 प्रोटीन का उत्पादन कम हुआ। 48 घंटे और 72 घंटे रखने पर तो माइटोकॉण्ड्रियल प्रोटीन्स का उत्पादन और भी कम हुआ।

इस असर की एक क्रियाविधि भी सुझाई गई है कि गुरुत्वाकर्षण के चलते कोशिकाएं के आपस में चिपकने के ज़रिए माइटोकॉण्ड्रिया पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण शून्य कर दिया जाए, तो यह असर भी क्षीण हो जाता है और प्रोटीन (protein) उत्पादन कम हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)

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कॉकरोच भी बन गया साईबोर्ग!

डॉ. इरफान ह्यूमन

जकल सोशल मीडिया और कुछ आंदोलनों में कॉकरोच (तिलचट्टा) का प्रतीकात्मक उपयोग चर्चा में रहा है। कॉकरोच (cockroch) व्यवस्था-विरोधी या प्रतिरोध का रूपक इसलिए कि यह अत्यंत जीवट प्राणी होता है और कठिनतम परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।

इसके इतर, वैज्ञानिक कॉकरोच पर कुछ विशेष प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डाइविंग सूट (diving suite) विकसित किया है, जिसे कॉकरोच को पहनाया जा सकता है। यह सूट कॉकरोच को पानी के भीतर भी जीवित रहने और चलने-फिरने में सक्षम बनाता है। इस तरह से कॉकरोच इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से चलने वाला जीव (साइबोर्ग) (cyborg) बन गया है।

साइबोर्ग और कॉकरोच

साइबोर्ग शब्द साइबरमेटिक ऑर्गेनिज़्म (cybermatic organism) का संक्षिप्त रूप है। यह ऐसे जीव को कहा जाता है जिसमें जैविक (बायोलॉजिकल) और इलेक्ट्रॉनिक घटक एक साथ कार्य करते हैं। दूसरे शब्दों में, जब किसी जीवित प्राणी के शरीर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सेंसर, कृत्रिम अंग या कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणालियां जोड़ी जाती हैं, तो वह साइबोर्ग कहलाता है। उदाहरण के लिए कृत्रिम (बायोनिक) हाथ या पैर वाले व्यक्ति, पेसमेकर लगे हृदय रोगी, श्रवण यंत्र का उपयोग करने वाले व्यक्ति, सेंसर और नियंत्रक लगे साइबोर्ग कॉकरोच।

डाइविंग सूट की आवश्यकता

दरअसल वैज्ञानिकों का विचार साइबोर्ग कॉकरोच (cyborg cockroch) का उपयोग खोज एवं बचाव कार्यों में करने का है। वैज्ञानिक कई वर्षों से कॉकरोचों पर छोटे सेंसर, कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक लगाकर उन्हें संकरे स्थानों में भेजने के प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या यह थी कि ये कॉकरोच केवल सूखी भूमि पर ही काम कर सकते थे। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों, जलमग्न सुरंगों, सीवर लाइनों या पानी से भरे मलबों में उनका उपयोग सीमित था। कॉकरोच पानी में अधिक समय तक नहीं रह सकते क्योंकि वे मछलियों की तरह गलफड़ों से श्वसन नहीं करते। उनके शरीर के दोनों ओर छोटे-छोटे छिद्र (स्पाइरैकल्स) होते हैं जिनके माध्यम से हवा शरीर में पहुंचती है। जब कॉकरोच पानी में डूबता है तो स्पाइरैकल्स (spiracles) पानी से ढंक जाते हैं और हवा का प्रवाह रुक जाता है। कुछ समय बाद उनका श्वसन तंत्र काम करना बंद कर सकता है। कॉकरोच को जलमग्न क्षेत्रों में सक्षम बनाने के लिए ही डाइविंग सूट का विचार उभरा है।

डाइविंग सूट में तीन प्रमुख भाग होते हैं। पहला, जलरोधी सुरक्षा कवच जो पानी को कॉकरोच के शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। इससे स्पाइरैकल्स सीधे पानी के संपर्क में नहीं आते और शरीर सुरक्षित रहता है। दूसरा, कृत्रिम ऑक्सीजन आपूर्ति। डाइविंग सूट में एक सूक्ष्म ऑक्सीजन उत्पादन प्रणाली (mini oxygen generating sysytem) लगाई जाती है जो रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन बनाती है और उसे कॉकरोच के श्वसन तंत्र तक पहुंचाती है। तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा। कैमरे, सेंसर और नियंत्रक सामान्यत: पानी से खराब हो सकते हैं। डाइविंग सूट इन्हें जलरोधी बनाकर सुरक्षित रखता है। इससे वैज्ञानिक वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं, तापमान माप सकते हैं, गैस रिसाव का पता लगा सकते हैं और वातावरण की जानकारी एकत्र कर सकते हैं।

डाइविंग सूट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कॉकरोच ज़मीन और पानी में दोनों में कार्य करता रह सकता है। इसे उभयचर कार्यक्षमता (apmhibian function) कहते हैं।

विशेष डाइविंग सूट पहने साइबोर्ग कॉकरोच के परीक्षण के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे। साइबोर्ग कॉकरोच लगभग 3 घंटे तक पानी के भीतर सक्रिय बना रहा। और केवल जीवित ही नहीं रहा, बल्कि पानी में चल सकता था, दिशा बदल सकता था, बाधाओं को पार कर सकता था तथा आगे बढ़ सकता था।

जब कॉकरोच को पानी से बाहर निकाला गया, तब भी वह सामान्य रूप से चलने में सक्षम था। उसकी गति भूमि पर लगभग उतनी ही रही जितनी सूट-रहित कॉकरोच की होती है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अतिरिक्त उपकरण किसी जीव की गति और संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। प्रयोगों में पाया गया कि सेंसर सुरक्षित रहे, नियंत्रण प्रणाली कार्य करती रही, जलरोधी आवरण ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (electronic instruments) को नुकसान से बचाया। इससे भविष्य में कैमरे, माइक्रोफोन और अन्य सेंसर जोड़ने की संभावना मजबूत हुई।

उपयोग

प्राकृतिक आपदाओं (natural calamities) और दुर्घटनाओं के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लोगों तक शीघ्र पहुंचने की होती है। भूकंप, भवन ध्वंस, बाढ़, खदान दुर्घटनाएं तथा अन्य आपातकालीन स्थितियां अक्सर ऐसे हालात उत्पन्न कर देते हैं, जहां मानव बचावकर्मी या बड़े रोबोट आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में साइबोर्ग कॉकरोच एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इनके कई उपयोग हो   सकते हैं:

1. मलबे में फंसे लोगों की खोज: ऐसी दुर्घटनाओं में कई बार लोग मलबे के नीचे जीवित फंसे रहते हैं, लेकिन उनकी सही स्थिति का पता लगाना कठिन होता है। साइबोर्ग कॉकरोच कुछ मिलीमीटर चौड़ी दरारों में प्रवेश कर सकते हैं। और मलबे के जटिल रास्तों से गुज़र सकते हैं। कैमरे और सेंसर की सहायता से अंदर की वास्तविक स्थिति की जानकारी भेज सकते हैं। इससे बचाव दल को यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि कोई व्यक्ति कहां फंसा है और उसे निकालने का सबसे सुरक्षित मार्ग कौन-सा होगा।

2. जीवन के संकेतों का पता लगाना: साइबोर्ग कॉकरोचों पर विभिन्न प्रकार के सेंसर (sensor) लगाए जा सकते हैं। इनकी सहायता से वे ध्वनि, हलचल या कंपन का पता लगा सकते हैं। ऊष्मा और कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा भांप सकते हैं, जो किसी जीवित व्यक्ति की उपस्थिति का संकेत हो सकती है। मलबे के नीचे फंसे व्यक्ति की पुकार को माइक्रोफोन बचाव दल तक पहुंचा सकता है।

3. बाढ़ और जलमग्न क्षेत्रों में उपयोग: साईबोर्ग कॉकरोच बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों (flood affected area) का निरीक्षण कर सकते हैं। जलमग्न सुरंगों और पाइपलाइनों में प्रवेश कर सकते हैं। पानी के भीतर मौजूद अवरोधों का पता लगा सकते हैं मानव गोताखोरों की पहुंच से बाहर के स्थानों की जानकारी एकत्र कर सकते हैं। यह क्षमता उन्हें पारंपरिक बचाव उपकरणों की अपेक्षा अधिक बहुमुखी (diverse) बनाती है।

4. खदान दुर्घटना जोखिम क्षेत्रों में उपयोग: खदान दुर्घटनाओं में सुरंगें ध्वस्त हो सकती हैं या विषैली गैसें भर सकती हैं। ऐसी स्थिति में साइबोर्ग कॉकरोच गैस सेंसर द्वारा वातावरण व ऑक्सीजन स्तर की जांच कर सकते हैं, फंसे हुए श्रमिकों का पता लगा सकते हैं। इसी तरह, रासायनिक दुर्घटना स्थल, परमाणु विकिरण वाले क्षेत्र और अस्थिर भवन आदि में मदद कर सकते हैं।

5. बड़े रोबोटों की तुलना में लाभ: साइबोर्ग कॉकरोच की लागत अपेक्षाकृत कम है। लिहाज़ा वैज्ञानिक इन्हें भविष्य की खोज एवं बचाव तकनीक का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।

कॉकरोच ही क्यों?

साइबोर्ग कॉकरोच परियोजना में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के कीटों और छोटे जीवों पर विचार किया, लेकिन अंतत: कॉकरोच को सबसे उपयुक्त पाया। इसका कारण केवल उसका छोटा आकार नहीं है, बल्कि उसकी असाधारण शारीरिक क्षमता, सहनशीलता और अनुकूलनशीलता भी है। कॉकरोच सबसे मज़बूत और जीवट जीवों (resilient oraganism) में से एक माना जाता है। यह विभिन्न वातावरणों में जीवित रह सकता है; गर्मी और ठंड दोनों सहन कर सकता है’ सीमित भोजन-पानी में भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है। कॉकरोच का शरीर लचीला और चपटा होता है, वह बहुत छोटी दरारों में घुस सकता है।

कृत्रिम सूक्ष्म रोबोट को चलाने के लिए बैटरी और मोटरों की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी ऊर्जा जल्दी चुक सकती है। इसके विपरीत, कॉकरोच अपने शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करता है और बहुत कम ऊर्जा में लंबे समय तक काम चला सकता है। कॉकरोच अपने वज़न की तुलना में काफी अधिक भार वहन कर सकता है। इस विशेषता के कारण उसके शरीर पर सेंसर, कैमरे, माइक्रोफोन, संचार उपकरण, नियंत्रण प्रणाली लगाने के बाद भी उसकी गतिशीलता पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। छोटे रोबोट अक्सर उबड़-खाबड़ सतहों पर फंस जाते हैं, लेकिन कॉकरोच ऊबड़-खाबड़ सतहों पर चल सकता है और छोटे अवरोधों को पार कर सकता है। वह तेज़ी से दिशा बदल सकता है और गिरने के बाद स्वयं संतुलन बना सकता है। ये सभी गुण उसे प्राकृतिक रूप से एक उत्कृष्ट ‘जैविक रोबोट’ (biological robot) बनाते हैं; खोज एवं बचाव कार्य के लिए आदर्श जैविक मंच (बायोलॉजिकल प्लेटफॉर्म) बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उंगलियां चटकाने का सुख और कष्ट

डॉ. सुशील जोशी

उंगलियां चटकाना तो सभी जानते हैं। हालांकि कुछ लोग आदतन ऐसा करते हैं जबकि कुछ नहीं करते। इसके अलग-अलग तरीके भी होते हैं; कुछ लोग उंगलियों को सीधी रखकर उन्हें खींचते हैं, तो कुछ लोग उंगलियों को जोड़ों पर से मोड़कर उन्हें दबाते हैं। परिणाम कुल मिलाकर एक ही होता है – उंगलियों से चटक की आवाज़ आती है और कहते हैं कि इससे सुकून मिलता है। तो सवाल यह उठता है कि यह आवाज़ कहां से आती है और सुकून क्यों मिलता है। साथ में सवाल यह भी है कि क्या उंगलियां चटकाना (knuckle cracking) लंबे समय में नुकसानदायक भी हो सकता है।

दरअसल, उंगलियां चटकाने पर तमाम तरह की क्रियाएं होने लगती हैं। सबसे पहले तो यह देखिए कि चटक की आवाज़ कहां से निकलती है। बात की शुरुआत यह बताकर करना मुनासिब होगा कि वैज्ञानिकों-चिकित्सकों-अस्थि विशेषज्ञों के बीच इस सम्बंध में आम सहमति नहीं है।

हमारे शरीर के जोड़ों में हड्डियों को आपस में जोड़ने की तीन व्यवस्थाएं होती हैं। एक होती है जिसमें हड्डियां तंतुओं या रेशों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। कपाल (cranium) की हड्डियों के बीच जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। इन जोड़ों में गति नहीं होती। दूसरी होती है जिसमें हड्डियों को उपास्थियों के ज़रिए जोड़ा जाता है। इनमें थोड़ी गति संभव होती है। और तीसरी व्यवस्था में हड्डियों के जोड़ों पर एक रेशेदार कैप्सूल में तरल भरा होता है। कोहनी, घुटनों, कलाइयों, ऐड़ियों के जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। हमारी उंगलियों के जोड़ों में भी एक तरल भरा होता है जो उन्हें गति करने में घर्षण से बचाता है। इस तरल को सिनोवियल द्रव (synovial fluid) कहते हैं। इसके अलावा यह एक नरम गद्दी की तरह कार्य करता है और उपास्थियों को पोषण भी पहुंचाता है। जोड़ों में यह तरल न हो या कम हो तो कई तरह की दिक्कतें हो सकती है।

हाथ की संरचना और खास तौर से उसमें हड्डियों की जमावट चित्र 1 की तरह होती है। कलाई और हथेली के जोड़ पर कई सारी हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल्स कहते हैं। कार्पल्स अनियमित आकार की हड्डियां होती हैं जो अनियमित ढंग जमी होती हैं। इसके बाद आती हैं बेलनाकार मेटाकार्पल्स (metacarpels) जो हथेलियों में जमी होती हैं, और अलग-अलग उंगली की हड्डियों से जुड़ी होती हैं। चार उंगली और एक अंगूठे के लिए पांच मेटाकार्पल्स होती हैं। फिर आती हैं उंगलियों की हड्डियां – फैलेंजेस (phalanges)। चारों उंगलियों में तीन-तीन फेलेंजेस होती हैं जबकि अंगूठे में मात्र 2। मेटाकार्पल्स से लेकर फैलेंजेस तक के सारे जोड़ सिनोवियल होते हैं। चटकाने की मुख्य क्रिया को मेटाकार्पल और फैलेंजेस के जोड़ों पर अंजाम दिया जाता है। इन्हें संक्षेप में एमसीपी (MCP) जोड़ कहते हैं।

चटकाने की क्रिया

उंगलियां चटकाने पर काफी अनुसंधान हुए हैं। इस सामान्य सी क्रिया पर ध्यान देने का प्रमुख कारण यह रहा है कि इसे लेकर तमाम धारणाएं-मान्यताएं हैं, खास तौर से इसके कारण होने वाले नुकसान को लेकर।

1947 में जे. बी. रोस्टन और आर. व्हीलर हैन्स ने जर्नल ऑफ एनाटॉमी में पहली बार MCP जोड़ों की क्रमिक रेडियोग्राफी (sequential radiography) के आधार पर उंगलियां चटकाने के चार चरणों का विवरण दिया था:

विश्राम की अवस्था, जब जोड़ पर कोई बल नहीं लगाया जा रहा है और सतहें लगभग परस्पर संपर्क में होती हैं;

जब थोड़ा बल लगाया जाता है तो जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर जाने लगती हैं;

बल का परिमाण एक सीमा से अधिक होने पर सतहें इतनी दूर हो जाती हैं कि बीच में एक खाली जगह बन जाती है। तब चटकने की अवस्था आती है;

अंतिम चरण बहाली का होता है जिसके दौरान उंगलियों को फिर से नहीं चटकाया जा सकता। यह चरण लगभग 20 मिनट का होता है।

आवाज़ का उद्गम

एक मत यह है कि सिनोवियल द्रव में गैसें (मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन) घुली होती हैं। जब जोड़ों को तेज़ी से खींचा जाता है तो बीच की जगह में एक खाली स्थान पैदा हो जाता है। इस निर्वात की वजह से गैस के बुलबुले (gas bubbles) सिनोवियल द्रव से बाहर निकलकर इस जगह में भर जाते हैं। फिर जब बुलबुले खूब फूल जाते हैं तो अपने ही तनाव की वजह से गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं। आवाज़ इन्हीं बुलबुलों के फूटने की होती है। और यही कारण है कि एक बार चटकाने के बाद कुछ समय तक ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि बुलबुलों को फिर से बनने में समय लगता है।

लेकिन… विज्ञान में लेकिन तो हमेशा बना रहता है।  

रोस्टन और हैन्स की परिकल्पना थी कि जोड़ों की सतहों के बीच खाली स्थान पर जलवाष्प (watervapour) भरी होती है। उनका मत था कि आवाज़ जोड़ों की तेज़ गति के कारण उत्पन्न कंपनों से पैदा होती है।

इस संदर्भ में ए. अन्सवर्थ, डी. डावसन और वी. राइट ने अपने प्रयोगों के परिणाम 1971 में एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीसेज़ में प्रकाशित करके बताया था कि बुलबुलों का बनना और फूटना ही चटकने की आवाज़ का स्रोत है। जैसे-जैसे जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहां कम दबाव का क्षेत्र (low pressure zone) बन जाता है। परिणामस्वरूप, द्रव का वाष्पीकरण होता है और द्रव में घुली गैसें बुलबुले बन जाती हैं।

हालांकि इस बात पर सहमति है कि उंगली चटकाने के दौरान जोड़ों पर बुलबुले बनते हैं लेकिन बुलबुलों के बनने की क्रियाविधि और आवाज़ का स्रोत विवाद का विषय रहा है।

जैसे 2015 में अलबर्टा विश्वविद्यालय के ग्रेगरी कॉचुक और उनके साथियों ने चटकाने की प्रक्रिया का एमआरआई अध्ययन किया। यह अध्ययन दस MCP जोड़ों पर किया गया था। उन्होंने चटकने वाली उंगली को एक लंबी लचीली नली में पिरोकर उसका एमआरआई अध्ययन (MRI scan) किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि आवाज़ आने के बाद भी बुलबुला मौजूद था। यानी आवाज़ बुलबुले के निर्माण के समय आई थी, न कि बुलबुला फटने के कारण।

कॉचुक व साथियों ने बुलबुला बनने के कारण के रूप में ट्राइबोन्यूक्लिएशन (tribonucleation) नामक क्रियाविधि सुझाई थी। इसमें होता यह है कि दो सतहें एक आसंजन (चिपकू) बल द्वारा चिपकी होती हैं। जब उन्हें अलग-अलग करने के लिए लगाया जा रहा बल इस आसंजन बल से अधिक हो जाता है तो सतहें अलग-अलग होने लगती हैं लेकिन उन्हें चिपकाकर रखने वाला द्रव उतनी तेज़ी से फैल नहीं पाता। लिहाज़ा वहां वाष्प की एक गुहा (कैविटी) बन जाती है। द्रव में मौजूद गैसें बुलबुले के रूप में बाहर निकलने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ट्रायबोन्यूक्लिएशन कहते हैं। लेकिन चटकने की आवाज़ इस खाली स्थान के बनने के समय ही पैदा हो जाती है, उसके वापिस पिचकने से पहले।

इसके बाद 2017 में रॉबर्ट बूटिन और उनके साथियों ने चटकते जोड़ों में सोनोग्राफी की मदद से इकोजेनिक क्षेत्रों की पहचान की। ये वे क्षेत्र होते हैं जो सोनोग्राफी (sonography) करते समय ध्वनि तरंगों को परावर्तित कर देते हैं। उनके अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि बुलबुले बनने में ट्रायबोन्यूक्लिएशन की प्रक्रिया ही क्रियाशील है।

जब कुछ शोधकर्ताओं ने चटकती उंगलियों की जांच अल्ट्रासोनोग्राफी (ultrasonography) से की तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। इस अनुसंधान में 40 सहभागी थे (23 पुरुष और 17 महिलाएं)। इनमें से 30 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 10 को ऐसी कोई आदत नहीं थी। शोधकर्ताओं ने इन सबका चिकित्सा इतिहास रिकॉर्ड किया – जैसे वे कितनी बार उंगलियां चटकाते हैं, उनकी हाथों की पकड़ कितनी मज़बूत है वगैरह। इसके बाद सभी सहभागियों के एमसीपी जोड़ की अल्ट्रासोनोग्राफी चटकाने के पहले, उसके दौरान और उसके बाद की गई।

प्रयोग के दौरान 40 सहभागियों के 400 एमसीपी जोड़ों का अवलोकन किया गया। 400 एमसीपी में 62 के तोड़ने-मरोड़ने पर चटक की आवाज़ सुनाई पड़ी। साथ में अल्ट्रासाउंड तस्वीर में चटकाने की क्रिया के दौरान एक चमक दिखाई दी। अल्ट्रासाउंड तस्वीरों में उत्पन्न चमक की मदद से रेडियोलॉजिस्ट सुनाई पड़ने वाली चटक को 94 प्रतिशत सटीकता से पहचान पाए। इससे इतना तो पता चलता है कि चटकने की आवाज़ का सम्बंध जोड़ में गैस के बुलबुले के दबाव में परिवर्तन से जुड़ा है। अलबत्ता, अभी भी यह कहना मुश्किल है कि पहले क्या होता है – चटकने की आवाज़ या चमक। लेकिन अल्ट्रासोनोग्राफी जांच ने इतना तो स्पष्ट कर ही दिया कि चटकने की आवाज़ गैस का बुलबुला फटने से 10 मिलीसेकंड पहले सुनाई पड़ती है। बुलबुले का फटना सोनोग्राम (sonogram) में एक चमक के रूप में दिखता है।

इस मामले में अलबर्टा विश्वविद्यालय के इमेजिंग विशेषज्ञ रिचर्ड थॉमसन ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि आवाज़ सुनाई पड़ने से पहले ही बुलबुले का बनना शुरू हो जाता है लेकिन अल्ट्रासाउंड तस्वीर में वह पूरा बनने के बाद ही नज़र आता है। यही वह क्षण होता है जब आपको आवाज़ सुनाई पड़ती है। वैसे थॉमसन ने इसी तरह के शोध के लिए एमआरआई का उपयोग किया था। चूंकि उसमें प्रति सेकंड बहुत ज़्यादा तस्वीरें नहीं मिलती हैं (जो उस अध्ययन की सीमा थी) इसलिए वे यह नहीं बता पाए थे कि पहले आवाज़ आती है या बुलबुला बनता है।

और इस सिलसिले में सबसे हालिया शोध चंद्रन सूजा और अब्दुल बरकत (2018) का रहा है। इन्होंने साइन्टिफिक रिपोर्ट्स में उंगलियां चटकाने की आवाज़ की व्याख्या करते हुए एक गणितीय मॉडल प्रकाशित किया था। उनका मत था कि एमआरआई या सिनेरेडियोग्राफी जैसी तकनीकों में विभेदन बहुत कम है (क्रमश: 80-100 फ्रेम प्रति सेकंड और 100 फ्रेम प्रति सेकंड)। जबकि चटकने की आवाज़ का स्रोत पकड़ने के लिए कम से कम 1200 फ्रेम प्रति सेकंड का विभेदन चाहिए। इसलिए उन्होंने एक गणितीय मॉडल (mathematical model) विकसित किया।

उन्होंने दर्शाया कि उनके मॉडल में बुलबुले के आंशिक फूटने के ध्वनि हस्ताक्षर वैसे ही रहे जैसे प्रयोगों में देखे गए थे। तो संभव है कि वाष्प गुहा (vapour cavity) बनने और आंशिक रूप से बुलबुलों के फूटने को मिलाकर चटक की आवाज़ आती हो।

उंगलियां चटकाने का सुख

तो, सवाल यह है कि यदि जोड़ों में सिर्फ गैस के बुलबुले पिचक और फूट रहे हैं तो सुकून क्यों मिलता है।

इस संदर्भ में कैलिफोर्निया के अस्थि सर्जन रोजे मेलिकन का मत है कि जोड़ों की त्वरित हरकत वहां उपस्थित तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर सकती है, जिसकी वजह से दर्द में कमी आती है और एंडॉर्फिन (endorphin) नामक पदार्थ मुक्त होते हैं। वैसे यह बात अभी प्रमाणित नहीं हुई है।

लगता है कि मामला सिर्फ शरीर की अंदरुनी क्रियाओं यानी कार्यिकी का न हो। कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी इसमें जुड़े हैं। जैसे एक तो यह है कि उंगलियां चटकाना कुछ लोगों के लिए एक आदत बन जाती है। और जब इससे सुकून मिलता है तो इस आदत को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को सिर्फ चटकने की आवाज़ सुनना अच्छा लगने लगता है। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी आसपास के लोगों को इससे परेशानी होती है।

नुकसान

अक्सर अत्यधिक उंगलियां चटकाने वालों को टोका जाता है। कहा जाता है कि इससे नुकसान होगा, उंगलियां कमज़ोर पड़ जाएंगी, गठिया (arthritis) का खतरा बढ़ जाएगा। इस मामले में किए गए कई अध्ययनों में ऐसी सारी चेतावनियों को खारिज किया गया है। हां, कुछ अध्ययनों में यह बात ज़रूर सामने आई है कि आदतन उंगलियां चटकाने से व्यक्ति की उंगलियों में सूजन आ सकती है या पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।

उंगलियां चटकाने के हानिकारक असर को लेकर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर प्रयोग कैलिफोर्निया के एक चिकित्सक डॉ. डोनाल्ड एल. उन्गर ने किया था। वे यह देखना चाहते थे कि क्या उंगलियां चटकाने से गठिया (आर्थ्राइटिस) होता है। उन्होंने पूरे 50 साल तक अपने बाएं हाथ की उंगलियों को रोज़ाना कम से कम दो बार चटकाया जबकि दाएं हाथ को अछूता छोड़ रखा। बाद में जब उन्होंने दोनों हाथों का एक्सरे (X-Ray) निकाला तो उनमें कोई अंतर नहीं था। किसी में भी गठिया का कोई प्रमाण नहीं था।

खैर, यह तो हुई एक व्यक्ति के निजी प्रयोग की बात लेकिन ज़्यादा व्यापक अध्ययनों के परिणाम भी ऐसे ही रहे हैं।

उदाहरण के लिए, 2017 में हैंड सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन जर्नल में प्रकाशित एक पर्चे में 35 उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की तुलना की गई थी। आदतन उंगलियां चटकाने वाले लोग दिन में कम से कम पांच बार ऐसा करते थे। यह देखा गया कि उंगलियां चटकाने वालों में मेटाकार्पल के सिरों की उपास्थियां (cartilages) अपेक्षाकृत मोटी हो गई थीं। अलबत्ता, उनके हाथों की पकड़ पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ था।

ऐसा एक प्रयोग 1975 में रॉबर्ट स्वीज़ी और स्टुअर्ट स्वीज़ी ने किया था। इसके परिणाम वेस्टर्न जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि कम उम्र में उंगलियां चटकाने की आदत से बुढ़ापे में एमसीपी जोड़ों में किसी क्षतिकारक परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है।

दूसरी ओर, जे. कोस्टेलोन और डी. एक्सलरॉड द्वारा एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीज़ेस में 1990 में प्रकाशित अध्ययन में 45 वर्ष से अधिक उम्र के 300 मरीज़ों को शामिल किया गया था। 300 में से 74 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 226 गैर-चटकाने वाले। दोनों समूहों के हाथों में अतिरिक्त गठिया का कोई लक्षण नहीं दिखा। अलबत्ता, आदतन उंगलियां चटकाने वालों के हाथों में सूजन और पकड़ की कमज़ोरी की संभावना ज़्यादा पाई गई। एक अवलोकन यह था कि उंगलियां चटकाने की आदत का सम्बंध शारीरिक श्रम वाले काम, नाखून चबाने, धूम्रपान और शराब पीने से होता है।

बैंगलुरु प्रयोग

यह प्रयोग एस. कांचन तथा आर. मेघना द्वारा बेंगलुरु में 18-25 वर्ष के 150 कॉलेज छात्रों पर किया गया था। जर्नल ऑफ इकोफिज़ियोलॉजी एंड हेल्थ में 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि आदतन उंगलियां चटकाने के प्रमुख हाथ (यानी जिस हाथ का वह व्यक्ति प्रमुखता से इस्तेमाल करता है – डॉमिनेन्ट हाथ) के एमसीपी जोड़ों की गतिशीलता में कमी आती है और पकड़ की मज़बूती (hand grip) भी कम हो जाती है।

2001 में क्रिस्टोफर पीटरसन, चेरिल बार्नेस और लोरेटा डेविस ने उंगलियां चटकाने को लेकर एक अलग ही किस्म का अध्ययन किया था। पीडियॉट्रिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में जोड़ों पर आने वाले उभारों (नकल पैड्स) पर ध्यान दिया गया था। प्राय: इन सूजननुमा उभारों का कारण पता नहीं चल पाता। और इनके प्रभावों की बात बहुत कम हुई है। यह अध्ययन एक ही मरीज़ (14 वर्षीय बच्ची) पर किया गया था जिसकी कई उंगलियों के जोड़ों पर 3 साल से गठान जैसी दिख रही थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये गठानें (knots) उसकी उंगलियां चटकाने की आदत के चलते उभरी हैं।

ऐसा ही लीक से हटकर एक और अध्ययन गौरतलब है। एडवर्ड रॉस, जेनिफर पॉग-मिलर और रॉबर्ट नेप्पो का यह अध्ययन क्लीनिकल किडनी जर्नल में 2023 में प्रकाशित हुआ था। देखा गया कि किडनी रोग के अंतिम दौर के मरीज़ों में सेकंडरी हायपरथॉयराइडिज़्म (यानी थॉयराइड की अति-सक्रियता) प्रकट होती है और मांसपेशियों और कंकाल तंत्र पर उसके विविध लक्षण नज़र आते हैं। इन शोधकर्ताओं के कई मरीज़, जो डायलिसिस पर थे, ने स्वत: बताया था कि उनमें अब उंगलियां चटकाने की क्षमता नहीं रही। आश्चर्य की बात यह रही कि पैराथॉयराइड ग्रंथि को सर्जरी के ज़रिए निकाल देने के बाद उंगली चटकाने की क्षमता लौट आई। मतलब है कि पैराथॉयराइड से सम्बंधित खनिज लवण तथा अस्थि विकारों (bone disorders) का असर उंगलियां चटकाने के कार्यिकीय व यांत्रिकी आधार पर होता है।

कुल मिलाकर लगता है कि उंगलियां चटकाने के तात्कालिक या दीर्घावधि नुकसान का कोई सुस्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछेक अध्ययनों में नकारात्मक परिणाम दिखे हैं। लेकिन सभी शोधकर्ता यह चेतावनी दोहराते हैं कि शरीर के बाकी जोड़ों के साथ खिलवाड़ सही नहीं है क्योंकि उनमें से कई जोड़ सिनोवियल जोड़ (synovial joints) नहीं होते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अब लैब में बनेंगे ‘मिनी’ मस्तिष्क!

हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल  विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है। 

पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।  

हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना। 

शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।

पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा। 

शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।

भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पदचिन्ह ने दिए डायनासौर के समकालीन बड़े स्तनधारी के सुराग

क ज़माना था जब पृथ्वी पर डायनासौर का वर्चस्व था। सरीसृप (reptile) की श्रेणी में आने वाले ये डायनासौर शाकाहारी से लेकर शिकारी, और छोटे (लोमड़ी बराबर) से लेकर विशालकाय शरीर वाले थे। लेकिन उस ज़माने में स्तनधारी जीव इतने बड़े नहीं होते थे – प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना जाता था कि उस युग में स्तनधारी अधिक से अधिक गिलहरी जितने बड़े होते थे और वे अपने से विशाल काया वाले और शिकारी डायनासौरों से डरा करते थे, छिप-छिपाकर अपनी जान बचाया करते थे।

इसी दौरान, लगभग 13 करोड़ साल पहले अपने शिकारियों से बचने और प्रजनन के लिए एक छोटा स्तनधारी जीव वर्तमान के दक्षिणी ब्राज़ील (south brazil) के नम रेत के टीलों की ओर पलायन कर गया। लेकिन हाल ही में मिले एक प्राचीन जीव के अश्मीभूत पदचिन्ह इस ओर इशारा करते हैं कि एक स्तनधारी (mammal) आकार में इतना बड़ा हो गया था कि अपने कुछ डायनासौर प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला कर सकता था। अश्मीभूत पैरों के निशानों के दो समूह के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि यह जीव लगभग कुत्ते की साइज़ का होगा और उस समय का अब तक का ज्ञात सबसे बड़ा स्तनधारी जीव होगा।

पंजों के निशान दक्षिणी ब्राज़ील के बोटुकाटू फॉर्मेशन में वर्ष 2019 की खदान खुदाई में मिले थे। 13 करोड़ साल पहले भी यह इलाका एक विशाल रेगिस्तान का हिस्सा था जो ब्राज़ील और पश्चिमी अफ्रीका के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। यहां बलुआ पत्थरों पर कई जीवों के अश्मीभूत पंजों के निशान बड़ी संख्या में मिलते हैं, लेकिन यहां कोई भी अश्मीभूत कंकाल (fossilized skeleton) नहीं मिला है। बलुआ पत्थरों पर डायनासौर, छिपकलियों, स्तनधारियों, टेरोसॉर और आर्थ्रोपोड जीवों की पद-छाप मिलती हैं।

मिनास गेरैस स्टेट युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी पेड्रो विक्टर बक और उनके साथियों ने इन निशानों की तुलना बोटुकाटू में मिले अन्य पंजे के निशानों और शुरुआती क्रेटेशियस काल (crestaceous period) में रहने वाले अन्य स्तनधारियों के पंजे के निशानों से की।

उन्होंने पाया कि अश्मीभूत पंजे की लंबाई (10 सेंटीमीटर) के मुकाबले चौड़ाई (13 सेंटीमीटर) अधिक है और पंजे में चार उंगलियां हैं जिनके सिरे गोलाई लिए हुए हैं। ज़मीन पर इनकी एक-दूसरे के सापेक्ष स्थिति और दूरी बताती है कि जिस जीव के ये पंजों के निशान हैं वो चौपाया रहा होगा। इन विशेषताओं के आधार पर बक का अनुमान है कि ये किसी स्तनधारी जीव के पदचिन्ह (footprints) हैं।

यह तो समझ आ गया कि पंजों के निशान किसी स्तनधारी जीव के हैं, लेकिन सवाल था कि किस जीव के? दिलचस्प बात यह थी कि इन पंजों की लंबाई-चौड़ाई इस इलाके में मिलने वाले किसी भी अन्य स्तनधारी जीव के पंजों से लगभग दुगनी बड़ी थी। तब शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना क्रेटेशियस काल के एक अन्य स्तनधारी जीव एडालाथेरियम हुई (Adalatherium hui) की कद-काठी से की। एडालाथेरियम हुई की लंबाई लगभग 52 सेंटीमीटर थी। तुलना के आधार पर बक का अनुमान है कि यह नया खोजा गया जीव 1.55 मीटर लंबा रहा होगा, यानी किसी बड़े कुत्ते या माउंटेन लॉयन जितना बड़ा जो अब तक का ज्ञात उस समय का सबसे बड़ा स्तनधारी है। ये नतीजे जर्नल ऑफ साउथ अमेरिकन अर्थ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं।

हालांकि सिर्फ निशानों से यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि वे किस जीव के होंगे, लेकिन शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ये ट्राइकोनोडोंट्स या क्लैडोथेरियन (triconodont/ cladotherian) के होंगे – ये दोनों समूह शुरुआती स्तनधारी हैं जिनके बारे में पहले माना जाता था कि वे चूहे से लेकर रैकून जितने बड़े होते थे।

यह भी रहस्य ही है कि उस समय ये स्तनधारी अन्य की तुलना में इतने बड़े (huge) कैसे हो गए। एक संभावना यह हो सकती है कि जहां यह पाया गया है उस रेगिस्तान में बहुत कम बड़े डायनासौर विचरते थे, जिससे कुछ स्तनधारियों को बड़ा होने का मौका मिल गया होगा। लेकिन ये महज़ अटकलें हैं, पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा सकता।

इससे पहले, वर्ष 2023 में, शोधकर्ताओं को ऐसे जीवाश्मीय सबूत मिले थे जो इशारा करते थे कि कुछ स्तनधारी कभी-कभार छोटे डायनासौर का शिकार कर लिया करते थे। यदि बोटुकाटू में मिला स्तनधारी वाकई इतना ही बड़ा था, तो हो सकता है कि इसने शायद और भी बड़े डायनासौरों (dinosaur) का शिकार किया होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रकाश प्रदूषण: विकास की चकाचौंध में गुम होती रातें 

सुदर्शन सोलंकी

रोशनी को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण (light pollution) एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।

भारतीय शहरों की स्थिति 

क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश (illuminated sky) तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।

भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:

– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।

– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।

– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।

एलईडी का विरोधाभास

भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों (energy efficient technology) का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।

हालांकि सोडियम वैपर लाइट (sodium vapour light) की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

जैवविविधता पर प्रहार

पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।

प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों (high voltage LED’s) के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।

कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।

मानव स्वास्थ्य 

अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन (melatonin hormone) का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।

भारत में नीतिगत शून्य

दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प (hallogen lamp) की रोशनी इस तरह की होती है।

फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।

भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।

समाधान

प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:

– डाउन-शिल्डेड लाइटें (down shielded lights) लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।

– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।

– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।

प्राकृतिक अंधेरा (natural darkness) कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन (invaluable resource) है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://darksky.org/app/uploads/2015/06/LA_light_pollution.jpg