बाढ़ और सूखे का कारण है एल नीनो

दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।

एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।

एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में  बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।

दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एल नीनो

सुशील जोशी

ने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?

एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।

परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।

यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।

इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।

दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही  मौसम की भविष्यवाणी। 

इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।

ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।

एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया। 

1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।

इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)

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नर्मदा की लड़ाई के वरिष्ठ साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे

र्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ लेखक, शोधकर्ता और पर्यावरण चिंतक रमेश बिल्लौरे का रविवार 10 मई के दिन दोपहर इंदौर में निधन हो गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने उन्हें नर्मदा संघर्ष का ‘चलता-फिरता दस्तावेज’, ‘घुमक्कड़ बुद्धिजीवी’ और ‘नर्मदा का सच्चा पुत्र’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

रमेश बिल्लौरे नर्मदा घाटी के सवालों पर उस दौर से काम कर रहे थे, जब नर्मदा बचाओ आंदोलन औपचारिक रूप से आकार भी नहीं ले पाया था। बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों को लेकर उन्होंने शुरुआती दौर में ही गंभीर अध्ययन शुरू कर दिया था और लगातार सवाल उठाए। बाद में यही चिंतन नर्मदा संघर्ष की वैचारिक ज़मीन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

बांधों की राजनीति और विकास के मॉडल पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत मानी जाती है पुस्तक डेमिंग दी नर्मदा: इंडियाज़ ग्रेटेस्‍ट प्‍लांड डिसास्‍टर जिसे उन्होंने पर्यावरण चिंतक क्‍लॉड अल्‍वारिस के साथ मिलकर तैयार किया था। 1988 में प्रकाशित यह अध्ययन नर्मदा परियोजना की शुरुआती तथ्यपरक आलोचनाओं में गिना जाता है। इसे नर्मदा आंदोलन के शुरुआती दस्तावेज़ों में एक महत्वपूर्ण कृति माना गया है।

रमेश बिल्लौरे का नर्मदा से रिश्ता केवल विचार या आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह जीवन का रिश्ता था। नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथी बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नर्मदा घाटी, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण न्याय और जनसंघर्षों के सवालों को समर्पित कर दी।

वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे; वे अनेक विषयों के गंभीर अध्येता, लेखक और संवेदनशील साहित्यकर्मी भी थे। बांधों, विकास और विस्थापन पर उन्होंने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे। सामाजिक प्रश्नों के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, लोकजीवन और राजनीति पर भी उनकी पकड़ थी।

रमेश बिल्लौरे की पहचान एक घुमक्कड़, आत्मीय और बेहद जीवंत इंसान के रूप में थी। उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था—दोस्तों के घर, आंदोलन के मोर्चे, गांवों की चौपालें और संघर्ष के मैदान ही उनका घर थे। वे छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं और जीवन के अनुभवों को इतने रोचक अंदाज़ में सुनाते थे कि कठिन संघर्षों के बीच भी हंसी और ऊर्जा का माहौल बन जाता था। (स्रोत फीचर्स)

पीछे मुड़कर देखा जो मैंने
फुरसत के समय
पीछे मुड़कर जो देखा
हुआ अवाक्
देख वह राह
चला जिस पर
हुआ विस्मय
देख उन मोड़ों को
मुड़ा जिन पर
लगा जैसे मैं देख रहा जो
पीछे मुड़ वो मेरी नहीं
किसी और की थी ज़िन्दगी
जो बीत गयी
जिसमें सब कुछ
अनियोजित
अव्यवस्थित
अनिश्चित!
हर बार जब मैं चौराहे पर ठहरा
तय करने के लिए कि
आगे जाना किधर
जाने-अनजाने
मैंने वही राह ली जो औरों ने नहीं ली
जो थी अपरिचित
मगर मुझे ज़रा भी नहीं हुआ अफ़सोस इस पर
आखिर अनजानी ही सही
मैं पहुंचा वहीं
जहां मुझे जाना था
और देख पाया तो कुल मिलाकर खूबसूरत ही रहा सफ़र!
रमेश बिल्लौरे
(29 सितंबर 2005)

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भारत के मेडिकल कॉलेजों में कमज़ोर होती समग्र देखभाल

रॉयसन डिसूज़ा

85 साल के एक बुज़ुर्ग को उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) के लिए गांव के एक द्वितीयक (सेकंडरी) स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। कथित तौर पर आत्महत्या के इरादे से कीटनाशक खाने के बाद उनके बाएं हाथ में गैंग्रीन (रक्त संचार रुकने से ऊतकों का मरना) हो गया था। वे ऐसे क्षेत्र के रहवासी हैं जहां बहुतायत में हाथी पाए जाते हैं और उनके यहां से नज़दीकी तृतीयक (टर्शियरी) स्वास्थ्य केंद्र 5 घंटे की दूरी पर है।

चूंकि आत्महत्या के मामलों को मेडिको-लीगल केस माना जाता है और स्वास्थ्य कार्यकर्ता इनमें हाथ डालने से घबराते हैं, इसलिए उन्हें एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से दूसरे उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया जाता रहा; अंत में उन्हें मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। तब तक कीटनाशक उनके शरीर में फैलकर अवशोषित हो चुका था, और उसके बुरे असर की शुरुआत हो चुकी थी। इस वजह से उन्हें गहन देखभाल इकाई (ICU) में रखने की ज़रूरत पड़ी।

इलाज के दौरान, उनके बाएं हाथ में खून पहुंचाने वाली एक मुख्य धमनी में रक्त का थक्का जम गया था, जिसकी वजह से उन्हें बहुत दर्द हो रहा था और हाथ का रंग बदल गया था। इस स्थिति को तुरंत संभाला गया और थक्का हटाने के लिए सर्जरी की गई। हालांकि, हाथ को जो नुकसान पहले ही हो चुका था उसे ठीक नहीं किया जा सकता था, और इससे हाथ में पूरी तरह से गैंग्रीन हो गया था। वे मेडिकल कॉलेज में कुछ और दिन भर्ती रहे, इस दौरान कई विभागों से उनके लिए परामर्श लेकर टेस्ट करवाए गए और फिर उन्हें मेडिकल कॉलेज से छुट्टी देकर रुलर पैलिएटिव केयर सेंटर में भेज दिया गया।

जब इस मरीज़ की देखभाल कर रहे डॉक्टरों ने सर्जिकल परामर्श के लिए मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि शायद गैंग्रीन के बारे में बात करने हेतु किया होगा। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि यह संपर्क उस दर्द के लिए था जिसकी शिकायत मरीज़ अपने गुदा नाल (एनल कैनाल) में कर रहा था। मरीज़ को देखने और उसकी जांच करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेडिकल कॉलेज ने मुख्य समस्या पर तो ध्यान ही नहीं दिया था और इससे मरीज़ की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी और बाकी सभी जटिलताएं हुई थीं। मरीज़ ने कीटनाशक इसलिए खाया था क्योंकि उसे गुदा नाल में बहुत ज़्यादा दर्द और रक्तस्राव हो रहा था। जितने दिन वे भर्ती रहे किसी ने इस बारे में पूछने का सोचा तक नहीं। बस एक साधारण सी गुदा (रेक्टल) जांच से पता चल गया कि इसका असली कारण रेक्टल कैंसर था जो बहुत बढ़ चुका था और जिससे बहुत ज़्यादा दर्द और मल त्यागने में दिक्कत हो रही थी।

इस हादसे ने मुझे एक अत्यंत परेशानीजनक सवाल पर सोचने को मजबूर कर दिया कि हमारे मेडिकल संस्थानों में ‘समग्र देखभाल’ (कॉम्प्रिहेंसिव केयर) से हमारा क्या मतलब है – खासकर मेडिकल कॉलेज, जिन्हें गर्व होता है कि वे समग्र देखभाल और उपचार देते हैं।

समग्र देखभाल का महत्व

लंबे समय से भारत में मेडिकल कॉलेजों को हर मुमकिन चिकित्सकीय अवस्था की समग्र/तफसील से पड़ताल और प्रबंधन का केंद्र माना जाता रहा है। ये हर उस मरीज़ के लिए एक भरोसेमंद आखरी सहारा/उम्मीद होते हैं जिन्हें अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों द्वारा (जब मामला उनके वश में नहीं रहता तब) यहां रेफर किया गया होता है।

मेडिकल कॉलेज में, मरीज़ को अलग-अलग स्तर के कई डॉक्टर देखते हैं। यह अक्सर मरीज़ के लिए परेशानी का सबब होता है, क्योंकि उसे एक ही जानकारी कई बार देनी पड़ती है और हरेक के हिसाब से जांच करानी पड़ती है। जिस मेडिकल कॉलेज में मैंने ट्रेनिंग ली, वहां अगर किसी मरीज़ का कोई (पूर्व) नियोजित ऑपरेशन होना होता था तो उसकी कम से कम पांच स्तरों पर जांच होती थी – पहले बाह्य मरीज़ क्लिनिक में प्रशिक्षु/कंसल्टेंट द्वारा, उसके बाद इंटर्न, जूनियर रेसिडेंट, सीनियर रेसिडेंट, कंसल्टेंट, और आखिर में एडमिशन के बाद यूनिट के हेड द्वारा।

यह व्यवस्था मुख्य रूप से जूनियर डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए बनाई गई थी, लेकिन इससे भी ऊपर यह कारण था कि यह व्यवस्था मरीज़ का सही निदान करने और सबसे सही इलाज देने में एक असरदार प्रक्रिया के तौर पर काम करती है। उदाहरण के लिए, हर्निया के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए एक मरीज़ में आंत के कैंसर का पता इसलिए चला था क्योंकि एक प्रशिक्षु ने उसकी समग्र जांच की थी। वैसे, यह भी आम प्रथा है कि सर्जरी के मरीज़ों की डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, दिल की बीमारी, या थायरॉइड जैसी कई अन्य मेडिकल स्थितियों की (संपूर्ण) जांच हो क्योंकि सर्जरी के समय इन स्थितियों के बारे में पता होना ज़रूरी होता है।

एक और उदाहरण देता हूं। मेरी रेसिडेंसी के दौरान एक मरीज़ को कोलेक्टोमी (कैंसर उपचार के लिए बड़ी आंत का हिस्सा निकालना) के लिए भर्ती किया गया था। इस ऑपरेशन में एक बड़ी दुविधा की स्थिति यह थी कि कहीं कैंसर दूसरे अंगों में फैला न हो। यदि फैल चुका है तो ऐसे में सर्जरी से इलाज/फायदा नहीं होगा। ऐसे में मरीज़ के लिए कीमोथेरेपी सही रहेगी।

कभी-कभी उन्नत किस्म के स्कैन भी लसिका ग्रंथियों जैसे छोटे अंगों में कैंसर के फैलाव को पकड़ नहीं पाते। मरीज़ की जांच की प्रक्रिया में टीम के सबसे जूनियर सदस्य ने लसिका ग्रंथि में कुछ संकेत देखे और कहा कि शायद कैंसर फैल रहा है। यह सही निकला, और मरीज़ को गैर-ज़रूरी सर्जरी से बचा लिया गया और उसे आगे यथोचित इलाज के लिए भेजा गया।

इससे सिर्फ 10 साल आगे चलें तो ऐसा लगता है कि मेडिकल कॉलेजों की समग्र जांच की बात पूरी तरह खत्म हो गई है। मरीज़ को समय देना, उनकी हिस्ट्री (बीमारी और उससे जुड़ी अन्य जानकारियां) लेना और जांच करना निहायत ज़रूरी है, जिसे कम करके नहीं आंका जा सकता। कई तरह के परीक्षण और स्कैन आ जाने के बावजूद, मरीज़ की हालत पता लगाने में एक अच्छी हिस्ट्री और जांच-पड़ताल करना बहुत ज़रूरी होता है।

शुरुआती उदाहरण में, अगर मरीज़ की पूरी हिस्ट्री ली गई होती, तो कोई भी यह बता देता कि उसकी समस्या मल त्यागने से जुड़ी थी, जिसमें रेक्टल जांच करनी पड़ती और बीमारी आसानी से पता चल जाती। मरीज़ को कई अलग-अलग विशेषज्ञ विभागों ने देखा, लेकिन किसी ने भी सबसे ज़रूरी बात जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि असल में उसने अपनी जान लेने जैसा इतना बड़ा कदम उठाया क्यों?

हाल के दिनों में क्या बदला

मौजूदा चिकित्सा शिक्षा तंत्र लगातार जांच के दायरे में रहा है। (अधिक जानने के लिए निवारण की वेबसाइट पर ‘The Pathophysiology of Declining Medical Education in India/भारत में घटती मेडिकल शिक्षा की पैथोफिज़ियोलॉजी’ लेख पढ़ें – https://nivarana.org/reality-check/the-pathophysiology-of-declining-medical-education-in-india)

कई कारण हैं जिनमें से एक पर आम तौर पर बहस होती है: क्लीनिकल पोस्टिंग के दौरान मरीज़ों के साथ तफसील से समय बिताने पर ज़ोर न होना। एमबीबीएस के पाठ्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों पर केंद्रित पढ़ाई का है, जिसे क्लीनिक्स कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को मरीज़ों से बात करने, उनकी जांच करने और एक अनुमानित निदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। फिर सीनियर डॉक्टर विद्यार्थियों के साथ मरीज़ के विवरण पर बात करते हैं, उन्हें हिस्ट्री लेने, जांच करने और सही निदान करने के लिए ज़रूरी जांचों का महत्व सिखाते हैं। इस आकलन में एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों से बात करने और उनकी जांच-पड़ताल करने का होता है, और परीक्षण इसका सिर्फ एक सीमित हिस्सा होते हैं।

लेकिन आज की प्रैक्टिस में ऐसा लगता है मरीज़-केंद्रित आकलन/जांच पीछे छूट गई है, और प्रबंधन पूरी तरह से परीक्षण-आधारित हो गया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में, व्यस्त दिनचर्या, ओपीडी और आकस्मिक चिकित्सा विभाग में भीड़भाड़, और बिस्तरों की कमी सर्वांगीण/संपूर्ण निदान (आकलन) को मुश्किल बना देती है, और अक्सर मरीज़ों के लक्षण नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। इसके विपरीत, प्राइवेट अस्पताल सबसे गैर-ज़रूरी लक्षणों को बहुत अधिक तवज्जो देते हैं जिससे मरीज़ों को बेवजह बड़ी-बड़ी जांचें और सर्जरी करवानी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, एक बिलकुल स्वस्थ अधेड़ आदमी फुंसी (फोड़ा) के साथ एक प्राइवेट क्लीनिक जाता है। सर्जन उसे बताता है कि यह जानलेवा हो सकता है और उसे तुरंत भर्ती करके, ऑपरेशन से इसे हटाने की ज़रूरत है। इसके बाद कुछ और दिनों तक भर्ती रहना होगा क्योंकि एंटीबायोटिक्स और ड्रेसिंग करने की ज़रूरत होगी।

सिस्टम में लापरवाह सरकारी स्वास्थ्य तंत्र और अति-सतर्क निजी स्वास्थ्य तंत्र के बीच सही संतुलन की कमी है।

एमबीबीएस पाठ्यक्रम मरीज़-केंद्रित होना चाहिए, न कि NEET सुपर स्पेशिलिटी-केंद्रित। युवा डॉक्टरों को मरीज़ों के टेस्ट-परीक्षण-स्कैन जैसी जांचों को कराने के लिए आतुर होने की बजाय उनका सर्वांगीण आकलन करने और ‘उनकी बात सुनने’ का महत्व सिखाया जाना चाहिए। आज मरीज़ों की सबसे आम शिकायत यह है कि डॉक्टर उनकी बात नहीं सुनते, या उन्हें बोलने का मौका नहीं देते। अक्सर, डॉक्टर की 80 प्रतिशत बातचीत मरीज़ की स्वास्थ्य रिपोर्टों को दिखाने वाली कंप्यूटर स्क्रीन को देखते हुए होती है। मरीज़ अभी भी एक और सिर्फ एक चीज़ चाहते हैं कि एक सहृदय/हमदर्द डॉक्टर उनका इलाज करे।

फैमिली डॉक्टर की कमी

30 या उससे ज़्यादा उम्र के ज़्यादातर लोग ऐसे डॉक्टर के आस-पास बड़े हुए हैं जो हमारी स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखते थे – जिन्हें हम अपना ‘फैमिली डॉक्टर’ कहते थे। वायरल बुखार, फूड पॉइज़निंग, डायरिया, पेट दर्द, त्वचा के संक्रमण, सिरदर्द, गैस्ट्राइटिस, या सीने में दर्द – ऐसा लगता था कि उनके पास सभी इलाज हैं। बहुत लंबे समय तक मुझे नहीं पता था कि हमारे फैमिली डॉक्टर असल में एक त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं, क्योंकि वे हर एक मेडिकल स्थिति को बहुत अच्छी तरह से जानते थे और उनमें से ज़्यादातर का इलाज कर सकते थे। ट्रेनिंग का मकसद डॉक्टरों को हर काम/इलाज का जानकार बनाना है, भले ही वे किसी एक के विशेषज्ञ न हों।

एक मरीज़ का कई विभागों में, कई परामर्श सत्रों से गुज़रना और फिर भी मुख्य तकलीफ पता न चलना, एक नाकाम तंत्र का द्योतक है। हमारे जैसे देश में, फैमिली डॉक्टर एक अहम कड़ी है – आम बीमारियों को संभालने और स्पेशलिटी क्लीनिक और टर्शियरी केयर में रुकावट को कम करने के बीच।

इससे टेंशन वाले सामान्य सिरदर्द के लिए न्यूरोसर्जन, आम गैस्ट्राइटिस और फूड पॉइज़निंग को संभालने के लिए मेडिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, और छोटे-मोटे यूरीन इंफेक्शन को संभालने के लिए यूरोलॉजिस्ट की ज़रूरत कम हो जाएगी। लगभग हर एमबीबीएस सुपर स्पेशलिटी और सब-स्पेशलिटी की तलाश में है, इसलिए देश में जल्द ही ऐसे ऑलराउंडर की कमी महसूस होने लगेगी जो मरीज़ों के लक्षणों का पता लगा सकें, ज़्यादातर बीमारियों का इलाज कर सकें, और ज़रूरी मामलों को विशेषज्ञ के पास भेज सकें।

भारत में अभी पारिवारिक चिकित्सा का पोस्टग्रेजुएट कोर्स होता है, लेकिन होना तो यह चाहिए कि मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करके निकलने वाला हर डॉक्टर एक काबिल पारिवारिक चिकित्सक हो। पारिवारिक चिकित्सा में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा जैसे कोर्स को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो मरीज़ों पर ध्यान देने को अहमियत देते हैं। रूरल सेंसिटाइज़ेशन प्रोग्राम, रूरल हेल्थ फेलोशिप, ट्रैवल फेलोशिप और NIRMAN जैसे मौकों को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाया जाना चाहिए ताकि युवा डॉक्टरों को समाज में ज़्यादा बड़ी और सार्थक भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

समग्र देखभाल की बहाली

यदि मेडिकल कॉलेजों में ‘समग्र देखभाल’ के विचार को फिर से हासिल करना है, तो इसका हल ज़्यादा प्रोटोकॉल, ज़्यादा स्कैन या ज़्यादा सब-स्पेशलिटीज़ में नहीं हो सकता। इसकी शुरुआत क्लीनिकल मेडिसिन – मरीज़ की हिस्ट्री लेना, शारीरिक जांच करना और सतत देखभाल – की प्राथमिकता को एक ऐसी ज़रूरी काबिलियत के तौर पर फिर से स्थापित करने से होनी चाहिए, जिस पर कोई समझौता न हो।

सबसे पहले, चिकित्सा शिक्षा को इस तरह से डिज़ाइन किया जाना चाहिए कि मरीज़ों के साथ बिताए गए समय को महत्व दिया जाए। क्लीनिकल पोस्टिंग को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित होने से बचाया जाना चाहिए। बेडसाइड टीचिंग, देखरेख में हिस्ट्री लेना और संपूर्ण शारीरिक जांच को उतनी ही गंभीरता से परखा जाना चाहिए, जितना प्रवेश परीक्षा और परीक्षा के अंकों को जांचा जाता है। ज़ाहिर है, जिस चीज़ का मूल्यांकन नहीं होता, उसकी कभी कद्र नहीं होती।

दूसरा, मेडिकल कॉलेजों को सिर्फ प्रक्रियाओं के नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारी की सही पहचान (नैदानिक पूर्णता) के लिए भी जवाबदेह होना चाहिए। अगर कोई मरीज़ बिना किसी एक पक्की पहचान/निदान हुए कई विभागों से गुज़रता है, तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए – इसे सिर्फ ‘जटिलता’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। नियमित रूप से अलग-अलग विभागों के बीच ऑडिट और बातचीत होनी चाहिए, जिसमें यह पूछा जाए कि क्या छूटा, क्यों छूटा और पहला सवाल पूछने की ज़िम्मेदारी किसकी थी – इससे उपरोक्त गलतियों को दोबारा होने से रोका जा सकता है।

तीसरा, पारिवारिक चिकित्सा और जनरल डॉक्टर की ट्रेनिंग को केंद्र में रखा जाना चाहिए, न कि हाशिए पर। हर एमबीबीएस ग्रेजुएट को मेडिकल कॉलेज से इतना काबिल होकर निकलना चाहिए कि वह एक सक्षम फैमिली डॉक्टर के तौर पर काम कर सके – जो मरीज़ की बात सुन सके, जांच कर सके, प्राथमिकताओं को तय कर सके और ज़रूरत पड़ने पर सही जगह रेफर कर सके। पारिवारिक चिकित्सा के रास्तों, ग्रामीण फेलोशिप और समुदाय-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम को बढ़ाना और मान्यता देना, स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत बनाने का एक अहम हिस्सा है।

चौथा, स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों को उस कानूनी डर से बचाना चाहिए, जिसकी वजह से वे देखभाल करने की बजाय मरीज़ों को दूसरे डॉक्टरों के पास भेज देते हैं। आत्महत्या की कोशिशों, पैलिएटिव देखभाल के मामलों और जटिल सामाजिक स्थितियों में कानूनी डर की बजाय नैतिक साहस की ज़रूरत होती है। कानूनी ढांचों और संस्थागत नेतृत्व को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि मरीज़ की देखभाल करना, उसे दूसरे डॉक्टर के पास भेजने से ज़्यादा सुरक्षित लगे।

आखिर में, हमें एक कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा: टेक्नॉलॉजी ने सोचने-समझने की क्षमता की जगह ले ली है। टेस्ट-स्कैन जैसी जांच-पड़ताल हमेशा क्लीनिकल तर्क के आधार पर होनी चाहिए – न कि उसकी जगह ले लेनी चाहिए। गुदा की जांच कोई महंगी नहीं है, इसमें किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती, फिर भी यह एक बुज़ुर्ग को अपना हाथ, अपनी गरिमा और अपनी बची हुई ज़िंदगी खोने से बचा सकती थी। किसी मेडिकल कॉलेज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसमें कितने विभाग हैं या उसके कितने आईसीयू कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से होती है कि जब कोई मरीज़ वहां आता है, तो क्या वह कॉलेज सबसे बुनियादी सवाल का जवाब दे पाता है: “समस्या क्या है?” और “अभी आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या है?” जब तक हम ऐसी व्यवस्थाएं फिर से नहीं बनाते जो इस सवाल को पूछने की अनुमति दें और इसकी मांग भी करें तब तक ‘संपूर्ण देखभाल’ अस्पताल की दीवारों पर लिखा एक खोखला वादा ही बनकर रह जाएगा, जो मरीज़ के लिए कभी पूरा नहीं होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु सम्बंधित निर्णयों में वैज्ञानिकों की भूमिका

हाल ही में सान्टा मार्टा में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में 50 से अधिक देश शामिल हुए। यह एक अलग तरह का जलवायु सम्मेलन था, जिसमें फैसलों में वैज्ञानिकों को ज़्यादा महत्व दिया गया, न कि सिर्फ राजनीति को। Transitioning Away from Fossil Fuels नाम का यह सम्मेलन इस ओर इशारा करता है कि कुछ देश अब प्रदूषण कम करने के नए तरीके अपनाना चाहते हैं।

आम तौर पर COP30 जैसी बैठकों में वैज्ञानिकों की बात राजनीतिक चर्चाओं के बीच कमज़ोर पड़ जाती है। लेकिन इस बैठक में वैज्ञानिकों को सीधे निर्णय लेने वालों से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसी दौरान एक समूह बनाया गया, जो सरकारों को स्वतंत्र और वैज्ञानिक स्तर पर सलाह देगा, ताकि वे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सकें।

पूर्व में आयोजित वैश्विक बैठकों में कई तेल उत्पादक देशों ने जीवाश्म ईंधन को कम करने के स्पष्ट कदमों का विरोध किया, जिससे निराशा बढ़ी। इसी वजह से कोलंबिया और नीदरलैंड जैसे देशों ने एक अलग बैठक आयोजित की, जिसमें सिर्फ उन्हीं देशों को बुलाया गया जो बदलाव के लिए तैयार थे।

इस बैठक में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट और काम करने लायक सुझाव दिए। यह रिपोर्ट लंबी-चौड़ी बातों की बजाय सीधे लागू होने वाली नीतियों पर केंद्रित थी। इसमें मुख्य सुझाव थे—नए फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाना, इन पर मिलने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना, और सौर व पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।

इस प्रक्रिया में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सम्मेलन को एक खास मौका बताया, जहां वे सीधे उन नीति-निर्माताओं से बात कर सके जो वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर फैसले लेना चाहते हैं। उनका मानना है कि इस तरीके से ज़्यादा साफ और असरदार नीतियां बन सकती हैं, क्योंकि इसमें वे समझौते कम होते हैं जो अक्सर अंतर्राष्ट्रीय संधियों को कमज़ोर कर देते हैं।

इस सम्मेलन की अहमियत सिर्फ इसके सुझावों में ही नहीं, बल्कि इसके तरीके में भी है। इसमें विज्ञान को प्राथमिकता दी गई, जो ऐसे समय में ज़रूरी है जब दुनिया में प्रदूषण अभी भी काफी अधिक है। भले ही इसमें कम देश शामिल हुए, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर आगे चलकर बड़े पैमाने पर दिख सकता है। इस बैठक से यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि मज़बूत वैज्ञानिक समझ भी ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु संकट से निपटने में पेड़ व तकनीक दोनों ज़रूरी

जैसे-जैसे कंपनियां और सरकारें जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास बढ़ा रही हैं, यह सवाल उठ रहा है कि हवा से कार्बन डाईऑक्साइड हटाने का सबसे सही तरीका क्या है? पेड़ लगाने जैसे प्राकृतिक उपाय या मशीनों से कार्बन कैप्चर वाली तकनीक? इस पर नियम तय किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी यह साफ नहीं है कि किसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल, ‘प्रकृति बनाम तकनीक’ का विवाद सही नहीं है। ज़रूरी यह है कि हम समझें कि कौन सा तरीका कैसे काम करता है, कब उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और वह किस समस्या का समाधान करता है। अगर इन दोनों को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा जाएगा, तो ज़रूरी कदम उठाने में देरी हो सकती है।

कम समयावधि में, पेड़ लगाना और मिट्टी में कार्बन वृद्धि जैसे प्राकृतिक उपाय बहुत काम के होते हैं। इन्हें जल्दी लागू किया जा सकता है और ये अगले 20 सालों में हवा से कार्बन कम करने में मदद करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सबसे अहम समय है। भले ही यह कार्बन हमेशा के लिए न रुके, लेकिन जल्दी किया गया यह काम भी काफी फायदा देता है।

मध्य समयावधि में, कुछ उद्योग – जैसे हवाई यात्रा और बड़ी फैक्ट्री – पूरी तरह प्रदूषण कम नहीं कर पाते। ऐसे में कार्बन हटाना ज़रूरी हो जाता है। यहां ऐसे तरीके ज़्यादा काम के हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक कैप्चर रख सकें, जैसे ज़मीन के अंदर स्टोर करना या उसे ठोस रूप में बदल देना, ताकि वह लंबे समय तक हवा में वापस न जाए।

दीर्घ समयावधि में, कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए सैकड़ों साल तक लगातार प्रयास करने होंगे। यह काम किसी एक तरीके से नहीं हो सकता, बल्कि सभी उपलब्ध उपायों को साथ मिलाकर अपनाना पड़ेगा।

हालांकि, अलग-अलग अवधि के ये लक्ष्य जुड़े हुए ज़रूर हैं, लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इन्हें गड्डमड्ड करने से नीतियां बनाने और निवेश करने में उलझन पैदा होती है। इसलिए ज़रूरत है दोनों के  संतुलित इस्तेमाल की, तभी जलवायु परिवर्तन से सही तरीके से निपटा जा सकता है। बहरहाल, लंबे समय से कार्बन डाईऑक्साइड को कम करने के लिए तकनीक का उपयोग करने से हटकर एक संतुलित दृष्टिकोण पर चर्चा होने लगी है। (स्रोत फीचर्स)

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पानी की जांच से जैव विविधता के सुराग

न्यूयॉर्क के बीच बहने वाली ईस्ट रिवर के बाल्टी भर पानी ने रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मार्क स्टोकेल को न्यूयॉर्क शहर के जीवन के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी है। नदी के पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों का अध्ययन करके उन्होंने उसमें पाई जाने मछलियों, शहर के जीवों, लोगों की सेहत और उनके खानपान की आदतों तक के बारे में संकेत पाए। अध्ययन दिखाता है कि पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) पर्यावरण को समझने का एक तेज़ और सस्ता तरीका बनता जा रहा है।

यह शोध प्लॉस वन में प्रकाशित हुआ है। स्टोकेल और साथियों ने एक साल तक हर हफ्ते ईस्ट रिवर से पानी के नमूने लिए। फिर उन्होंने उस पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों की जांच की, जो जीवों की त्वचा, बाल, गंदगी या दूसरे जैविक पदार्थों के ज़रिए पानी में पहुंचे थे।

अध्ययन में पता चला कि शहर के बीच बहने वाली यह नदी जीवों से भरपूर और लगातार बदलने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है। वैज्ञानिकों ने इसमें 71 मछली प्रजातियां पहचानीं, जिनमें कुछ ऐसी भी थीं जो पहले इस इलाके में बहुत कम दिखाई देती थीं, और अब अच्छी संख्या में दिखाई दे रही हैं। अध्ययन यह दिखाता है कि ईस्ट रिवर अब पहले की तुलना में काफी साफ हो चुकी है।

गौरतलब है कि पर्यावरणीय डीएनए तकनीक पानी, मिट्टी या हवा में मौजूद जीवों के छोड़े गए छोटे-छोटे डीएनए खंडों के विश्लेषण पर आधारित है। सभी जीव लगातार अपनी कोशिकाएं और गंदगी छोड़ते रहते हैं, इसलिए उनका डीएनए कुछ दिनों तक वातावरण में बना रह सकता है।

पारंपरिक तरीकों में नाव, जाल, ट्रैप या गोताखोरों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन eDNA तकनीक बहुत कम उपकरण और खर्च में बड़ी मात्रा में जानकारी दे सकती है। यह ऐसी मुश्किल जगहों में उपयोगी है, जहां तेज़ धाराएं और चट्टानी इलाका सामान्य जांच को कठिन बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे एक साल के इस अध्ययन का खर्च किसी रिसर्च बोट को सिर्फ एक दिन चलाने जितना था।

वैज्ञानिकों को नदी के पानी में सिर्फ मछलियों के ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रहने वाले जीवों के डीएनए भी मिले। वैज्ञानिकों को गिलहरी, रैकून, बीवर, गाय, सूअर, मुर्गियों और चूहों के डीएनए के संकेत मिले, जो शायद गंदे पानी और बारिश के बहाव के ज़रिए नदी तक पहुंचे थे। खासकर चूहों का डीएनए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में शहरों में चूहों की बढ़ती संख्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि पानी में मिले जीवों के डीएनए का अनुपात लोगों के मांस खाने के आंकड़ों से काफी मेल खाता था। इससे संकेत मिलता है कि eDNA तकनीक भविष्य में लोगों की खानपान की आदतों और स्वास्थ्य के रुझानों को समझने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पहली बार गंदे पानी से मिले eDNA का इस्तेमाल लोगों की खानपान की आदतों को इतने विस्तार से समझने के लिए किया गया है।

विशेषज्ञ eDNA को पर्यावरण और वन्यजीवों की निगरानी के लिए एक बहुत उपयोगी नई तकनीक मानते हैं। यह जीवों की सही-सही संख्या तो नहीं बता सकती, लेकिन यह ज़रूर दिखा सकती है कि कोई प्रजाति समय के साथ बढ़ रही है या घट रही है। इससे पर्यावरण में हो रहे बदलावों और बाहरी प्रजातियों के फैलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

यह तकनीक अब दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल हो रही है। कनाडा में दुर्लभ वनबिलावों (लिंक्स) का पता लगाने से लेकर माउंट एवरेस्ट के आसपास पिघले बर्फ के पोखरों में तितलियों की प्रजातियों की पहचान तक, eDNA कई जगहों पर मदद कर रहा है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि eDNA पारंपरिक पर्यावरणीय जांच तरीकों की पूरी जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह एक पूरक के तौर पर उन्हें और मज़बूत बना सकती है। हवा-पानी के नमूनों से पर्यावरण की विस्तृत जानकारी निकालकर यह तकनीक शहरों और प्रकृति की अदृश्य दुनिया को समझने का नया रास्ता खोल रही है, और यह जानने में मदद कर रही है कि प्राकृतिक दुनिया कैसे बदल रही है। (स्रोत फीचर्स)

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प्रोटीन, फाइबर और सेहत से भरपूर मटर

टर हमारे यहां खूब खाई जाती है। और अब वैज्ञानिक इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं। मटर सस्ती, आसानी से उपलब्ध, लंबे समय टिकने योग्य और पोषक तत्वों से भरपूर है। नियमित रूप से खाएं तो यह सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकती है।

मटर की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रोटीन है। प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों को मज़बूत रखने, रोगों से लड़ने, शरीर की मरम्मत करने और पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं। दाल या चने जितना तो नहीं, लेकिन मटर कई दूसरी सब्ज़ियों से अधिक प्रोटीन देती है। पकी हुई हरी मटर में भी और सूखी मटर में भी काफी प्रोटीन होता है।

मटर में शरीर के लिए ज़रूरी सभी महत्वपूर्ण अमीनो एसिड पाए जाते हैं। हालांकि, इसमें मेथियोनीन नाम का एक अमीनो एसिड कम होता है, इसलिए सिर्फ मटर को ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत नहीं माना जाता। लेकिन अलग-अलग तरह का खाना खाएं, तो यह बड़ी समस्या नहीं है।

मटर की एक और बड़ी खासियत इसका फाइबर (रेशा पदार्थ) है। बहुत से लोग पर्याप्त फाइबर नहीं खा पाते, जबकि यह पाचन और शरीर की सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है। फाइबर भोजन को पाचन तंत्र में सही तरीके से आगे बढ़ाने में मदद करता है, जिससे कब्ज़ की समस्या कम होती है।

मटर का फाइबर खास तौर पर फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें दोनों तरह के फाइबर पाए जाते हैं – घुलनशील और अघुलनशील। अघुलनशील फाइबर पाचन को बेहतर बनाता है और मल को सही तरीके से बाहर निकालने में मदद करता है। वहीं घुलनशील फाइबर पानी में घुलकर जेल जैसा बन जाता है, जिससे खाना धीरे-धीरे पचता है। इससे ब्लड शुगर नियंत्रित रखने और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिक मटर में इसलिए भी रुचि ले रहे हैं क्योंकि यह पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को फायदा पहुंचाती है। इसमें ऐसे फाइबर होते हैं जो अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करते हैं और ये स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अब ऐसे खाद्य पदार्थों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जो पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं।

मटर आयरन का भी अच्छा स्रोत है। आयरन की कमी दुनिया में सबसे आम पोषण समस्याओं में से एक है, खासकर महिलाओं में। मटर में गाजर और शिमला मिर्च जैसी कई सब्ज़ियों से अधिक आयरन होता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हरी मटर का एक अतिरिक्त फायदा यह भी है कि इसमें फाइटिक एसिड कम होता है। यह पदार्थ शरीर में आयरन के अवशोषण को कम करता है। हरी मटर में आयरन और फाइटिक एसिड का संतुलन बेहतर होता है, और शरीर इसमें मौजूद आयरन का आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।

प्रोटीन, फाइबर और आयरन के अलावा मटर में पॉलीफिनॉल और फ्लेवोनॉयड जैसे पदार्थ भी होते हैं। ये शरीर में शोथ कम करने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। फ्लेवोनॉयड प्रचुर खाद्य पदार्थ दिल की सेहत बेहतर रखने, रक्त शर्करा नियंत्रित रखने और कुछ गंभीर बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकते हैं।

पोषण के अलावा मटर की एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह सस्ती और इस्तेमाल में आसान होती है। इसे ज़रूरत के हिसाब से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पकाया जा सकता है, इसलिए खाने की बर्बादी भी कम होती है।

मटर को खाने में शामिल करना आसान है और इसे बच्चों से लेकर बड़े तक सब पसंद करते हैं। और अब तो इसके फायदे पोषण विशेषज्ञ भी गिना रहे हैं। तो देरी किस बात की। (स्रोत फीचर्स)

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सेप्सिस का अदृश्य खतरा और हमारी स्वास्थ्य रणनीति

कुमार सिद्धार्थ एवं डॉ. सम्‍यक जैन

मारे देश के मौजूदा स्वास्थ्य परिदृश्य में, जहां डेंगू, मलेरिया, टीबी, हृदय रोग और मधुमेह़ जैसी बीमारियां पहले से ही भारी दबाव पड़ रही हैं, सेप्सिस एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है जो अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन सबसे घातक साबित होता है। देश के अस्पतालों में सेप्सिस अब एक रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। गहन चिकित्‍सा कक्ष (ICU) में भर्ती हर चौथा मरीज़ किसी न किसी संक्रमण से उपजी सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में पाया जाता है। नवजात मृत्यु के कारणों की पड़ताल करें तो लगभग एक-तिहाई मौतें सीधे सेप्सिस से जुड़ी मिलती हैं।

ग्रामीण भारत में यह स्थिति और भी घातक रूप ले लेती है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और संक्रमण की पहचान अक्सर देर से होती है। कई बार समय पर एंटीबायोटिक या सही हस्तक्षेप न मिलने पर मरीज़ कुछ ही घंटों में मौत के करीब पहुंच जाता है।

दरअसल, सेप्सिस को केवल संक्रमण की जटिलता मानना भ्रामक है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अनियंत्रित होकर अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है और संक्रमण से पैदा हुई सूजन पूरे शरीर में फैलकर दिल, फेफड़ों, गुर्दों और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा देती है। सरल शब्दों में, सेप्सिस संक्रमण के कारण शरीर का अपने ही खिलाफ सिर उठाना है। और, यही इसे इतना घातक और उग्र बना देता है।

हमारे देश में सेप्सिस की भयावहता इस बात से भी साफ होती है कि अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीज़ों के लिए मृत्यु का बड़ा कारण अब यही बनता जा रहा है। नवजात शिशुओं में यह स्थिति कई बार जन्म के तुरंत बाद होने वाले संक्रमणों से उभरती है। प्रसूता-गर्भवती महिलाओं, बुजु़र्गों और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

हमारे देश में सेप्सिस एक छिपी महामारी की तरह व्यवहार करता है। अन्य बीमारियों की अंतिम और सबसे घातक कड़ी अक्सर यही बनता है। इसलिए सेप्सिस को अब एक अलग स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए विशेष रणनीति तैयार करने की ज़रूरत है।

आंकड़े बताते है कि दुनिया भर में सेप्सिस हर साल एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान लेता है, जो वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन और ग्‍लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ के अध्ययन बताते हैं कि सेप्सिस की सर्वाधिक मार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ती है, जिनमें भारत भी शामिल है। अपने देश में वर्ष 2017 के अनुमान के अनुसार लगभग 1 करोड़ 13 लाख मामले और करीब 29 लाख मौतें इसी के कारण हुई हैं। आईसीयू आधारित शोध बताते हैं कि देश के गहन चिकित्सा कक्षों में हर दो में से एक मरीज़ किसी न किसी रूप में सेप्सिस से पीड़ित पाया जाता है, और ऐसे मरीज़ों की अस्पताल मृत्यु दर 30–40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। नवजात शिशुओं में यह बोझ और भी भारी है, जहां करीब एक-तिहाई मौतें संक्रमणजन्य सेप्सिस से जुड़ी पाई गई हैं।

लेकिन इस गंभीर बीमारी पर हो रहे शोध की स्थिति निराशाजनक है। दुनिया और भारत में, सेप्सिस पर होने वाला अधिकांश वैज्ञानिक कार्य अभी भी उस पुराने ढांचे पर टिका है, जिसमें चूहों, खरगोशों, गिनी पिगों, बकरियों, कुत्तों और कभी-कभी बंदरों तक पर प्रयोग किए जाते हैं। इन जानवरों को प्रयोगशाला की परिस्थितियों में जबरन संक्रमित किया जाता है, आंतों में छेद करके बैक्टीरिया फैलाया जाता है या उन्हें बैक्टीरियल ज़हर की उच्च खुराक दी जाती है। लेकिन मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया इन जानवरों से इतनी अलग है कि ऐसे प्रयोगों से मिलने वाले परिणाम मनुष्यों पर लगभग कभी लागू नहीं होते।

पिछले चार दशकों में डेढ़ सौ से अधिक ऐसी दवाएं रही हैं, जो चूहों या अन्य जंतुओं में सेप्सिस का इलाज करती दिखीं, पर मानव परीक्षण में पूरी तरह असफल रहीं। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों, जैसे – स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, एनआईएच आदि का निष्कर्ष है कि जंतु-आधारित मॉडल सेप्सिस का मानव स्वरूप समझने के लिए विश्वसनीय साधन नहीं हैं।

अपने देश में भी स्थिति अलग नहीं है। आईसीएमआर के कई प्रतिष्ठित केंद्र, कुछ ऐम्‍स संस्थान और निजी बायोमेडिकल प्रयोगशालाएं आज भी जंतु-आधारित मॉडल को सेप्सिस अध्ययन का आधार बनाए हुए हैं। इन परीक्षणों की पारदर्शिता कम है और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक परिणाम अत्यंत सीमित। जिस बीमारी के कारण अस्पतालों में लाखों मरीज़ चुपचाप मौत के करीब पहुंच रहे हों, उसके शोध का तरीका अगर मानव-प्रासंगिक न हो तो समाधान हमेशा दूर ही बना रहेगा।

अलबत्ता, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ वैज्ञानिक संस्थान नई दिशाएं भी टटोल रहे हैं। आईआईटी मद्रास का ऑर्गन्स-ऑन-चिप्स कार्यक्रम, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) का सेप्सिस प्रेडिक्शन मॉडल, ऐम्‍स दिल्ली में नवजात सेप्सिस के लिए विकसित बायोमार्कर और कुछ निजी प्रयोगशालाओं में एआई आधारित सेप्सिस अलर्ट सिस्टम ये सब संकेत देते हैं कि भारत आधुनिक, मानव-आधारित विज्ञान अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दुनिया भर में अब एआई-आधारित निदान और कम्प्यूटेशनल सिमुलेशन को भविष्य की दिशा माना जा रहा है। ये पद्धतियां न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि जानवरों पर होने वाली क्रूरता और वैज्ञानिक विफलताओं से भी मुक्त हैं।

भारत में सेप्सिस की भयावहता जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से हमें विज्ञान की दिशा बदलने की ज़रूरत है। आधुनिक तकनीकें हमारे सामने उपलब्ध हैं। ज़रूरत सिर्फ यह है कि हम पुरानी, अप्रासंगिक और अमानवीय शोध पद्धतियों को पीछे छोड़कर वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक, मानवीय और प्रभावी मॉडल अपनाएं। सेप्सिस के खिलाफ यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम विज्ञान और संवेदना दोनों के सही मिश्रण के साथ आगे बढ़े। भारत को स्वास्थ्य विज्ञान के इस नए युग में कदम रखने की आवश्यकता है। यह  परिवर्तन न सिर्फ लाखों लोगों की जान बचा सकता है बल्कि अनगिनत जानवरों को अनावश्यक और पीड़ादायक प्रयोगों से भी मुक्त कर सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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