प्रकाश प्रदूषण: विकास की चकाचौंध में गुम होती रातें 

सुदर्शन सोलंकी

रोशनी को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण (light pollution) एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।

भारतीय शहरों की स्थिति 

क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश (illuminated sky) तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।

भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:

– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।

– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।

– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।

एलईडी का विरोधाभास

भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों (energy efficient technology) का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।

हालांकि सोडियम वैपर लाइट (sodium vapour light) की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

जैवविविधता पर प्रहार

पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।

प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों (high voltage LED’s) के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।

कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।

मानव स्वास्थ्य 

अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन (melatonin hormone) का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।

भारत में नीतिगत शून्य

दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प (hallogen lamp) की रोशनी इस तरह की होती है।

फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।

भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।

समाधान

प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:

– डाउन-शिल्डेड लाइटें (down shielded lights) लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।

– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।

– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।

प्राकृतिक अंधेरा (natural darkness) कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन (invaluable resource) है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://darksky.org/app/uploads/2015/06/LA_light_pollution.jpg

डार्विन का अंदाज़ा सही था: यह पौधा कीटभक्षी है

दौलत सिंह तंवर

विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।

सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।

चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।

हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।

शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।

अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।

इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।

विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।

यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcTbWhgWDhur-FG0bQ87Yd6UVPVaqaHhyqkprrAWHyNDlls2FntCYibPeCM&s=10

वनों की अनोखी अनुकूलन क्षमता

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में उष्णकटिबंधीय जंगलों (tropical forests) को सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता रहा है। लेकिन नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक खोज ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। शोधकर्ताओं ने कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको के वनों के विभिन्न पेड़ों पर सूखे के प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया।

पाया गया कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग पेड़ों में पानी की उपलब्धता और वातावरण के अनुकूल अपने हिसाब से परिवर्तन (adaptations) होते हैं। इस तरह के पूर्व अध्ययन अलग-अलग प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित थे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना था कि एक ही प्रजाति के सभी पेड़ सूखे के प्रति लगभग एक जैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिको में प्राकृतिक वर्षा की मात्रा के आधार पर छह वन क्षेत्रों को चिन्हित किया। सालाना  85 सेंटीमीटर वर्षा वाले सूखे ग्वानिका वन (guanica forest) से लेकर 450 सेंटीमीटर वाले लुक्विलो वर्षावन (luquilo rainforest) में 18 विभिन्न प्रजातियों के 290 पेड़ों का परीक्षण किया। हर एक पेड़ से शाखाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनके सूखने की प्रक्रिया को जांचा। जांच के दौरान हर पांच मिनट के अंतराल पर शाखाओं की तस्वीर ली गईं। तनों के जल विभव (वाटर पोटेंशियल) और वाहिका-रोध (एम्बोलिज़्म) को भी मापा गया। जल विभव से आशय होता है कि किसी स्थान से पानी किस ओर बहेगा और वाहिका-अवरोध का मतलब होता है कि पानी की कमी का कितना तनाव होने पर संवहनी ऊतक (ज़ायलम) की नलिकाओं में हवा के बुलबुले बनकर पानी का प्रवाह रोक देंगे।

18 में से 17 प्रजातियों के पेड़ों में वर्षा की मात्रा से सम्बंधित अंतर साफ दिखे। सूखे क्षेत्र वाले पेड़ों के संवहनी ऊतकों में एम्बोलिज़्म (embolism) के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। ये पेड़ सूखे के हालत में भी पर्ण रंध्रों (स्टोमैटा) को खुले रखने में सक्षम थे, जिससे पानी की कमी होते हुए भी नियंत्रित तौर पर भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) जारी रही।

दूसरी ओर, नमी वाले वन क्षेत्रों के पेड़ों के तनों और पत्तियों में पानी संग्रह करने की अधिक क्षमता पाई गई।

शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate areas) में एक ही प्रजाति के पेड़ों में वातावरण के अनुसार ऐसा अनुकूलन अक्सर कम ही देखने को मिलता है, लेकिन प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। इस अनुकूलन क्षमता का एक कारण वर्षावन की ज्वालामुखीय मिट्टी है, जो नमी बेहतर ढंग से सोखती है। जबकि सूखे क्षेत्र में चूना पत्थर (limestone) की मिट्टी पानी नहीं रोक पाती। 

यह खोज जलवायु परिवर्तन के अनुसार वन संरक्षण मॉडलों (forest conservation models) को ज़्यादा सटीक बनाने में मददगार साबित होगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक किसी प्रजाति की एक निश्चित क्षमता के बजाय स्थानीय स्तर पर होने वाले अनुकूलन को भी शामिल कर सकेंगे। यह अध्ययन पेड़ों के लचीले स्वभाव को तो दर्शाता है, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक एक चेतावनी भी दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता वैश्विक तापमान और सूखे जैसे हालात इन पेड़ों की सहनशीलता की सीमा को लांघ सकते हैं, जिससे भविष्य में वनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://lacgeo.com/sites/default/files/el_yunque_rain_forest_opt%20%281%29.jpg

ये शैल चित्र क्या इंसानी खून से बनाए गए हैं?

म तौर पर प्राचीन समय के शैल चित्र ऐसी चट्टानों पर मिलते हैं जो थोड़ी गुफानुमा या ढंकी हुई हों। प्राचीन लोगों ने जब खुली चट्टान या खड़ी-चट्टानों पर चित्रकारी की भी है तो उनका मौसम-पानी की मार के कारण सलामत बचा रहना मुश्किल रहा है। लेकिन अब शैल चित्रों (Rock paintings) का ऐसा समूह मिला है जो खड़ी चट्टान के खुले पहलू पर होने के बाद भी सदियों से सही-सलामत है।

चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी (Zuojiang River Valley) की सपाट, खड़ी चट्टानों पर बने शैल चित्र हवा-पानी की सीधी मार पड़ने के बावजूद आज भी एकदम नुमाया और अक्षुण्ण हैं। ये रंग चट्टानों से इतनी मज़बूती से चिपके हैं कि यदि वे उखड़ते हैं, तो रंग के साथ चूना-पत्थर की परत भी साथ झड़ जाती है। ये शैल-चित्र ज़ुओजियांग नदी के साथ-साथ 260 किलोमीटर लंबाई में फैली चूना-पत्थर (कार्स्ट लाइमस्टोन) की खड़ी चट्टानों पर करीब 80 पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं। ये स्थल ज़ुओजियांग हुआशान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप (Zuojiang rock art cultural landscape) नाम से जाने जाते हैं।

ये चित्र लगभग 2000 साल से अधिक पुराने हैं। इन्हें लोयुए संस्कृति के लोगों ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवीं के बीच लगभग लगभग 700 साल की अवधि में बनाया था। लोयुए समाज (luoyue) दक्षिणी चीन में रहने वाला एक मातृसत्तात्मक समाज (matrilineal society) था। ये लोग प्राय: शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे।

लोयुए संस्कृति के लोगों ने कमोबेश इन चित्रों में दोनों हाथ ऊपर किए हुए उकड़ू बैठी मुद्रा में नग्न पुरुषों की टोली, पंखों का ताज पहने एक विशालकाय व्यक्ति, आसपास कुछ जानवर और प्राचीन रस्मों में बजने वाले ढोल और घंटियां गेरुआ लाल रंग में बनाए हैं। साथ ही, गर्भवती महिलाओं और प्रसव का चित्रण मिलता है।

काफी समय से वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे यह मुक्ताकाश शैल चित्र दीर्घा मौसम की इतनी कड़ी मार कैसे झेल पाई, जबकि अन्य स्थलों पर इसके सैकड़ों साल बाद बने शैल चित्र मिट चुके हैं या धुंधले पड़ चुके हैं।

इस हैरानी ने ही शेडोंग युनिवर्सिटी की रसायनशास्त्री मेंग वू और उनके साथियों को चट्टानों के तीन स्थलों पर चित्रों के झड़े हुए टुकड़ों का अवरक्त प्रकाश (Infrared spectroscopy) और इलेक्ट्रॉन बीम से विश्लेषण करने को उकसाया। अवरक्त प्रकाश की मदद से उन्होंने इन चित्रों के रंगों में इस्तेमाल घटकों की आणविक स्तर पर पहचान की। और अत्यंत सूक्ष्म स्तर इसके कण-गठन (टेक्स्चर) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम का इस्तेमाल किया।

पता चला कि रंग बनाने के लिए लोयुए कलाकारों ने पहले अत्यधिक तपाए गए चूना-पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) और जानवरों की हड्डियों से एक गाढ़ा पेस्ट बनाया। इस पेस्ट में उन्होंने पानी और खून मिलाकर एक चिकना और पतला घोल तैयार किया। इस घोल में मौजूद बुझा हुआ चूना, कैल्शियम फॉस्फेट (calcium phosphate) और खून के प्रोटीन रंग को बांधे रखने का काम करते थे। लाल रंग के लिए उन्होंने स्थानीय लाल मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) का इस्तेमाल किया।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (electron microscopy) में उन्हें चित्रों की अलग-अलग परतें दिखाई दीं, जिससे पता चला कि चट्टान पर चित्रकारी दो चरणों में की गई थी। पहले चरण में चट्टान की सतह पर प्राइमर (primer) के तौर पर रक्त-युक्त घोल लगाया गया था और फिर इस अध-सूखे अस्तर पर लाल मिट्टी का रंग चढ़ाया गया था। जैसे ही बुझा हुआ चूना हवा की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ क्रिया करता था, रक्त-प्रोटीन कैल्शियम कार्बोनेट के ‘जैव-खनिजीकरण’ (biomineralization) को बढ़ावा देते थे, जिससे रंग चट्टान की सतह के साथ मज़बूती से जुड़ जाता था।

जब शोध दल ने रक्त का विश्लेषण किया, तो उन्हें उसमें जानवरों के साथ-साथ मानव रक्त के प्रोटीन (human blood protein) भी मिले। वू बताती है कि वे नमूनों में मानव रक्त के निशान मिलने से भौंचक्की रह गई थीं। वे सोचने लगीं कि क्या ये कलाकार चित्रकारी के लिए खुद अपने शरीर पर घाव करते थे? क्या लोगों की बलि दी जाती थी? लेकिन तभी उन्हें एक बात सूझी – उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। उन्होंने सोचा कि शायद खून कम हिंसक तरीके से इकट्ठा किया गया होगा, जैसे माहवारी या प्रसव का।

वू की टीम ने खून की और भी बारीकी से जांच की, तो उन्हें उसमें दो प्रोटीन – प्रोलैक्टिन-इंड्यूसिबल प्रोटीन (protein inducible protein) और लैक्टोफेरिन (lactoferin) – की थोड़ी मात्रा मिली। ये दोनों प्रोटीन रक्त में गर्भावस्था के आखिरी समय में बढ़ जाते हैं। चूंकि लोयुए लोग मातृवंशीय परंपरा को मानते थे, और भित्ति-चित्रों में गर्भवती महिलाओं और बच्चे के जन्म चित्रित किए गए हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रसव के दौरान निकलने वाले खून को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े अनुष्ठानों के लिए इकट्ठा किया जाता होगा। वैसे भी, चित्रकारी के लिए हर वर्ग मीटर पर खून की बस चंद मिलीलीटर मात्रा की ही ज़रूरत रहती होगी।

अन्य शोधकर्ता कहते हैं वैसे तो अध्ययन बहुत सावधानी से और विस्तार से किया गया है। फिर भी, इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वह खून गर्भवती महिलाओं (pregnant females) का ही था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसानी खून के संकेत बहुत हल्के थे, और इनमें 2000 सालों तक चट्टान की सतह पर मौसम की मार झेलने के कोई रासायनिक संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शायद ये रसायन नमूनों की जांच के दौरान के दौरान मिल गए होंगे।

पूरे दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम इतिहास में वापिस जाकर लोयुए लोगों से बात करके कुछ पक्का नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्राचीन लोग न सिर्फ चित्रकारी करके अपनी संस्कृति की जानकारी दर्ज कर रहे थे, बल्कि वे कुशल बायोकेमिकल इंजीनियर (skilled biochemical engineers) थे। यह अध्ययन विस्तार से जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस के आगामी किसी अंक में प्रकाशित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.zism0p5/full/_20260807_on_hushan_art_lede.jpg

अगली पीढ़ी की अंतरिक्ष वेधशाला: रोमन अंतरिक्ष दूरबीन

डॉ. इरफान ह्यूमन

मनुष्यों ने सदियों से आकाश की ओर देखकर ब्रह्माण्ड (universe) के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। दूरबीनों के आविष्कार से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष वेधशालाओं (Modern Space Laboratories) तक विज्ञान ने हमें ब्रह्माण्ड की अद्भुत झलक दिखाई है। इसी क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन खगोल विज्ञान के इतिहास में एक मील का पत्थर बनने जा रही है। यह अत्याधुनिक अंतरिक्ष दूरबीन ब्रह्माण्ड के विस्तार, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी और हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित ग्रहों (एक्सोप्लैनेट) के बारे में नई जानकारियां प्रदान करेगी।

इस दूरबीन का नाम प्रसिद्ध अमेरिकी खगोलविद नैन्सी ग्रेस रोमन (Nncy grace roman) के सम्मान में रखा गया है। नैन्सी ग्रेस रोमन को आधुनिक अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की अग्रदूत माना जाता है। उन्हें अक्सर हबल स्पेस टेलीस्कोप की जननी (Mother of Hubble) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हबल मिशन की अवधारणा और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन का प्राथमिक दर्पण (प्राइमरी मिरर) 2.4 मीटर व्यास का है, जो हबल अंतरिक्ष दूरबीन के दर्पण के बराबर है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत विशाल दृष्टि क्षेत्र (फील्ड ऑफ व्यू) है, और यह हबल की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक क्षेत्र को एक साथ देख सकती है।

प्रमुख उपकरण

यह दूरबीन 21वीं सदी की सबसे उन्नत अंतरिक्ष वेधशालाओं में से एक है। इसमें मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए हैं – वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट (WFI) तथा कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (CGI)।

1. वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट: इस दूरबीन का मुख्य वैज्ञानिक उपकरण है। यह एक अत्याधुनिक निकट-अवरक्त (नीयर इन्फ्रारेड) कैमरा और स्पेक्ट्रोस्कोपिक प्रणाली (Spectroscopic system) है, जो 0.5 से 2.3 माइक्रॉन तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का अध्ययन करती है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं:

300 मेगापिक्सेल का कैमरा

0.281 वर्ग डिग्री का विशाल दृष्टि क्षेत्र

इमेजिंग तथा स्लिटलेस स्पेक्ट्रोस्कोपी, दोनों की सुविधा

अत्यंत संवेदनशील अवरक्त डिटेक्टर

विशाल खगोलीय सर्वेक्षणों के लिए उपयुक्त

डब्ल्यूएफआई के मुख्य उप घटक

(क) फोकल प्लेन ऐरे: यह डब्ल्यूएफआई का ‘हृदय’ (Heart of WFI) है। इसमें 18 उन्नत H4RG-10 डिटेक्टर लगे हैं। प्रत्येक डिटेक्टर से कुल मिलाकर लगभग 300 मेगापिक्सेल का चित्रण संभव होता है।

(ख) इमेजिंग फिल्टर प्रणाली: डब्ल्यूएफआई में 8 वैज्ञानिक फिल्टर लगाए गए हैं। इन फिल्टरों की सहायता से वैज्ञानिक विभिन्न तरंगदैर्घ्यों 9wavelength) पर निहारिकाओं, तारों और निहारिकाओं का अध्ययन कर सकेंगे।

(ग) ग्रिज़्म: ग्रिज़्म, दरअसल ग्रेटिंग और प्रिज़्म का संयुक्त रूप है। इसका काम प्रकाश को विभिन्न रंगों (वर्णक्रम) में विभाजित करना, निहारिकाओं की दूरी और गति मापना और ब्रह्माण्ड के विस्तार (Universal expansion) की दर निर्धारित करना है।

(घ) लो-रिज़ोल्यूशन प्रिज़्म: इसका उपयोग मंद एवं अत्यधिक दूरस्थ निहारिकाओं का अध्ययन, प्रारंभिक ब्रह्माण्ड के अवलोकन और डार्क एनर्जी सर्वेक्षणों (Drak energy survey) में सहायता करना है।

2. कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट: यह एक तकनीकी प्रदर्शन उपकरण है जिसे तारों के प्रकाश को अवरुद्ध करने और दूरस्थ एक्सोप्लैनेट (Exoplanet) की सीधी छवि प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

सामान्यत: कोई ग्रह अपने तारे की तुलना में अरबों गुना कम चमकदार होता है। इसलिए ग्रह सीधे दिखाई नहीं देते। सीजीआई विशेष तकनीकों की सहायता से तारे के प्रकाश को दबाकर ग्रहों को देखने योग्य बनाता है।

कोरोनाग्राफ की प्रमुख तकनीकें

(क) कोरोनाग्राफ मास्क: विशेष रूप से निर्मित सूक्ष्म ऑप्टिकल मास्क (optical mask) तारे के प्रकाश को अवरुद्ध करते हैं। इसका लाभ ग्रहों को सीधे देखने में सहायता, तारकीय प्रकाश के प्रभाव को कम करना और ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन करना है।

(ख) डिफॉर्मेबल मिरर: ये ऐसे दर्पण हैं जिनका आकार अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर बदला जा सकता है। इनका कार्य प्रकाशीय विकृतियों को दूर करना, चित्रों की स्पष्टता बढ़ाना और ग्रहों की पहचान को सटीक बनाना है।

(ग) वेवफ्रंट सेंसिंग एवं नियंत्रण प्रणाली: इसका कार्य प्रकाशीय त्रुटियों का पता लगाना, स्वतः सुधार करना और उच्च कंट्रास्ट वाली छवियां प्राप्त करना है।

(घ) इलेक्ट्रॉन मल्टीप्लाइंग सीसीडी डिटेक्टर: ये अत्यंत संवेदनशील डिटेक्टर होते हैं। ये बहुत कम प्रकाश को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं।

मानवता के लिए महत्व

1. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विकास को समझने में मदद: एक बड़ा प्रश्न रहा है – ‘ब्रह्माण्ड कैसे बना और यह कैसे विकसित हो रहा है।’ रोमन अंतरिक्ष दूरबीन (Roman space telescope) अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके ब्रह्माण्ड का एक विशाल त्रि-आयामी मानचित्र (3-D structure) तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि बिग बैंग (Big bang) के बाद ब्रह्माण्ड कैसे विकसित हुआ, निहारिकाएं कैसे बनीं और समय के साथ उनकी संरचना में क्या परिवर्तन हुए। इस प्रकार रोमन दूरबीन हमें अपने ब्रह्माण्डीय इतिहास को समझने में सहायता करेगी।

2. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर के रहस्य को समझना: वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ब्रह्माण्ड का लगभग 68 प्रतिशत भाग डार्क एनर्जी से बना है। यह एक रहस्यमयी शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के विस्तार को लगातार तेज़ कर रही है। आज तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते कि डार्क एनर्जी वास्तव में क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? यह भविष्य में ब्रह्माण्ड को किस दिशा में ले जाएगी? रोमन अंतरिक्ष दूरबीन लाखों सुपरनोवा 9supernova) तथा अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके डार्क एनर्जी के व्यवहार को समझने में सहायता करेगी। यदि डार्क एनर्जी का रहस्य सुलझ जाता है, तो यह आधुनिक भौतिकी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक होगा।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्रह्माण्ड का लगभग 27 प्रतिशत भाग डार्क मैटर से बना है, लेकिन इसे प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं देखा गया है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन गुरुत्वीय लेंसिंग तकनीक (gravitational lensing technique) का उपयोग करके डार्क मैटर के वितरण का मानचित्र तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक समझ सकेंगे कि डार्क मैटर कहां स्थित है। यह निहारिकाओं को कैसे प्रभावित करता है और ब्रह्माण्ड की संरचना में इसकी क्या भूमिका है। यह अध्ययन आधुनिक खगोल विज्ञान और कण भौतिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

3. पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज: क्या ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के अतिरिक्त कहीं और जीवन मौजूद है? यह प्रश्न सदियों से मानव जिज्ञासा का विषय रहा है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन हज़ारों नए एक्सोप्लैनेट्स की खोज करेगी। इनमें से कुछ ग्रह अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में हो सकते हैं, जहां तरल जल की उपस्थिति संभव है।

इन खोजों से पृथ्वी जैसे ग्रहों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकेगा, जीवन की संभावनाओं (life expectency) का अध्ययन होगा, भविष्य के अंतरतारकीय अभियानों (interstellar mission) की दिशा तय होगी। यदि किसी ग्रह पर जीवन के संकेत मिलते हैं, तो यह मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक होगी।

4. मानव ज्ञान की सीमाओं का विस्तार: इतिहास बताता है कि प्रत्येक बड़ी वैज्ञानिक खोज ने मानव सोच को बदल दिया है। कॉपरनिकस ने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं है। गैलीलियो ने दूरबीन से आकाश का अध्ययन किया। हबल ने दिखाया था कि हमारी आकाशगंगा (galaxy) अकेली निहारिका नहीं है। जेम्स वेब दूरबीन ने प्रारंभिक ब्रह्माण्ड की झलक दिखाई थी।

उसी प्रकार रोमन अंतरिक्ष दूरबीन मानव ज्ञान की सीमाओं को और आगे बढ़ाएगी। यह हमें उन प्रश्नों के उत्तर खोजने में मदद करेगी जिनके बारे में आज केवल अनुमान लगाए जाते हैं।

5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को गति: अंतरिक्ष मिशनों के लिए विकसित तकनीकें अक्सर पृथ्वी पर भी उपयोगी सिद्ध होती हैं। भविष्य में इन तकनीकों का उपयोग चिकित्सा, दूरसंचार, रक्षा, मौसम विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान में किया जा सकता है। इस प्रकार यह मिशन अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन की गुणवत्ता (quality of life) को भी बेहतर बनाएगा।

6. अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों को प्रेरणा: बड़े वैज्ञानिक मिशन केवल अनुसंधान ही नहीं करते, बल्कि नई पीढ़ी को प्रेरित भी करते हैं। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति रुचि अवश्य बढ़ाएगी।

7. अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा: आधुनिक अंतरिक्ष अनुसंधान किसी एक देश का कार्य नहीं है। रोमन मिशन में कई देशों के वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं। लिहाज़ा, यह मिशन वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग को मज़बूत करेगा, ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाएगा और मानवता को साझा वैज्ञानिक लक्ष्यों की ओर प्रेरित करेगा।

रोमन अंतरिक्ष दूरबीन में प्रयुक्त कई तकनीकें भविष्य के मिशनों के लिए परीक्षण मंच (टेक्नॉलोजी डिमांस्ट्रेशन) का कार्य करेंगी। विशेष रूप से इसका कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (coronagraph instrument) भविष्य में ऐसी दूरबीनों के निर्माण का आधार बनेगा जो पृथ्वी जैसे बाह्यग्रहों की प्रत्यक्ष तस्वीरें ले सकें। इस प्रकार रोमन मिशन आने वाले दशकों के अंतरिक्ष अनुसंधान की नींव रखेगा।

अतः रोमन अंतरिक्ष दूरबीन केवल एक दूरबीन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, विकास और भविष्य को समझने का एक शक्तिशाली साधन भी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://cdn.mos.cms.futurecdn.net/v2/t:0,l:480,cw:2880,ch:2160,q:80,w:2560/rEjCPwMF86GuMbsMMWVJUA.jpg

चौदह वर्ष की बहस के बाद एक बीमारी का नया नाम

ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।

इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।

पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।

नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।

नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।

हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।

भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।

नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।

वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://healthcare-in-europe.com/media/story_section_image/13388/image-01-pcos-pmos.jpg

महासागर की गहराई में विस्फोट का नज़ारा!

टिल और अनगिनत रहस्यों से भरी महासागर की दुनिया (ocean world) को समझने के लिए शोधकर्ता आए दिन नए-नए प्रयोग आज़माते रहते हैं। लेकिन अप्रैल 2025 में हुई एक बेहद रोमांचक और गहरी समुद्रतल (deep sea dive) यात्रा ने वैज्ञानिकों की पुरानी समझ को बदलकर रख दिया। साइंस पत्रिका में प्रकाशित यह खोज समुद्र तल के निर्माण और उससे जुड़े राज़ खोल देने वाली साबित हुई है।

‘ईस्ट-पैसिफिक राइज़’ (east pacific rise) के अध्ययन के दौरान भू-रसायन शास्त्री एंड्र्यू वोज़्नियाक और उनकी टीम गहरी-समुद्री पनडुब्बी एल्विन में सवार होकर समुद्र की 2500 मीटर गहराई में उतरी। उनका उद्देश्य ‘टीका’ (Tica) नामक हाइड्रोथर्मल क्षेत्र का अध्ययन करना था। अमूमन यह इलाका ट्यूबवर्म, विशाल सीपों, और पेल्ट मछलियों से भरा होता है। लेकिन जब एल्विन टीका के इलाके में पहुंची तो वहां का नज़ारा हैरतअंगेज़ था।

जहां रंग-बिरंगे समुद्री जीव होने थे, वहां कालिख तैर रही थी; ट्यूबवर्म मलबे में लिपटे हुए थे; कुछ दूरी पर चमकीली-पीली रोशनी भी दिखी, जो वास्तव में जलमग्न ज्वालामुखी (immersed volcano) का ताज़ा बहता लावा था। यह मानव इतिहास में पहला मौका था जब वैज्ञानिकों ने मध्य-महासागरीय रिज (पर्वतमाला) में हुए किसी ज्वालामुखी विस्फोट को अपनी आंखों से देखा था।

क्या है मध्यसागरीय रिज?

यह महासागर के भीतर जलमग्न पर्वतों की लंबी कतारें हैं, जो ज़मीनी (टेक्टॉनिक प्लेटों के) खिसकाव के कारण बनती हैं। ये पूरे महासागर में फैली दुनिया की सबसे लंबी पर्वत शृंखलाएं हैं। महासागरीय प्लेटों के दूर जाने, टकराने या रूपांतरण के कारण लावा बाहर की ओर रिसता है, जिससे समुद्र के पेंदे पर नई परत बनती है। इन्हीं प्लेटों की हलचल के कारण समुद्र में पर्वत और गहरी खाइयां (Mid-ocean ridges) बनती हैं।

एक शृंखला मध्य अमरीका के कोस्टा रिका से लगभग 2000 किलोमीटर दूर है। ‘टीका’ ऐसा ही सक्रिय क्षेत्र है, जहां एल्विन (Alvin) टीम ने परीक्षण के दौरान समुद्री ज्वालामुखी का अवलोकन किया।

अलबत्ता, सक्रिय विस्फोट के जोखिम को देखते हुए वैज्ञानिकों ने एल्विन टीम को दोबारा भेजने की बजाय परीक्षण करने के लिए वहां स्थापित अस्थायी कैमरे का इस्तेमाल किया। उन्होंने पाया कि विस्फोट वाले क्षेत्र का तापमान बढ़कर 10 डिग्री सेल्सियस हो चुका था (सामान्य स्थिति में समुद्रतल का तापमान 1 से 2 डिग्री सेल्सियस होता है); विस्फोट के कारण भारी मात्रा में लौह उत्सर्जन (iron emission) हुआ, जो पूरे महासागर के सालाना लौह उत्सर्जन के बराबर था। साथ ही, विस्फोट वाली जगह के ठंडे लावा पर महज़ डेढ़ दिन में समुद्री जीवन भी दोबारा पनपता दिखा। 

इससे पहले भी साल 2024 में, फ्रांस के वैज्ञानिकों की टीम ने दक्षिण-पूर्वी हिन्द महासागरीय रिज (South east Indian Ocean ridge) के क्षेत्रों की हलचल का अध्ययन करने के लिए समुद्र तल में प्रेशर सेंसर और हाइड्रोफोन लगाए थे। वैज्ञानिकों का अंदेशा था कि टेक्टॉनिक प्लेटों (tectonic plates) के खिसकने से उपकरणों में केवल कुछ सेंटीमीटर हलचल ही दर्ज होगी। लेकिन 2025 में जब उपकरणों को निकाला गया तो नतीजे उनके अनुमान से कई गुना ज़्यादा निकले। नेचर पत्रिका में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, केवल 2 हफ्तों में प्लेटें 2 मीटर से अधिक खिसक गई थीं, जिससे समुद्रतल 4 मीटर तक नीचे धंस गया और लगभग 16 करोड़ वर्ग मीटर में ताज़ा लावा फैल गया।

इस खोज के पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि महासागरीय प्लेटें (oceanic plates) धीरे-धीरे और लगातार खिसकती हैं। लेकिन इस अध्ययन से साबित हुआ कि यह खिसकाव अचानक और बड़े झटकों के रूप में होता है। हालांकि, पानी के घर्षण-रोधी स्वभाव के कारण भूकंप जैसे तेज़ झटके पैदा नहीं होते, इसलिए भूकंपीय सेंसर से इस हलचल का पता लगाना लगभग नामुमकिन-सा है। इन अवलोकनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महासागरीय गतिविधियों (oceanic activities) को लेकर अब तक की हमारी समझ में काफी खामियां थीं। बहरहाल, यह खोज महासागर के रासायनिक और कार्बन संतुलन को समझने में मदद करेगी। बेशक, महासागर अनगिनत रहस्यों का भंडार है और भविष्य में विज्ञान समय-समय पर ऐसे ही रोमांचक नतीजे पेश करता रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://images.theconversation.com/files/395742/original/file-20210419-17-14e2cz5.jpg?ixlib=rb-4.1.1&rect=1%2C0%2C794%2C396&q=75&auto=format&w=1336&h=668&fit=crop&dpr=1

https://th-thumbnailer.cdn-si-edu.com/dvpv_K7qiRsinBKxCY1TOCEm1tc=/1026×684/filters:focal(738×415:739×416)/https://tf-cmsv2-smithsonianmag-media.s3.amazonaws.com/filer_public/9e/54/9e54c52b-7417-44e5-8db6-593889a32fc3/beforeeruptionriftia1.jpg

दिल की धड़कन दिमाग के काम को प्रभावित करती है

क प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।

2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।

वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।

न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी।  विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।

इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं। 

ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://img.medscape.com/thumbnail_library/is_171108_heart_brain_800x600.jpg

मैच में कूलिंग ब्रेक और ठंडक का विज्ञान

फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।

अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।

दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।

इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।

तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।

ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।

चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई। 

दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।

ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.reuters.com/graphics/SOCCER-WORLDCUP/zgvolqqoypd/cdn/images/pics/july5-heat.jpg

मस्तिष्क हिसाब रखता है कि नींद कब पूरी हो गई

नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।  

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSA-5-l2V9WemhHOHNHJcN4oBbZNf2-zdF0D8Q0dxCYQMn8Jhf08zEPyPs&s=10