सेप्सिस का अदृश्य खतरा और हमारी स्वास्थ्य रणनीति

कुमार सिद्धार्थ एवं डॉ. सम्‍यक जैन

मारे देश के मौजूदा स्वास्थ्य परिदृश्य में, जहां डेंगू, मलेरिया, टीबी, हृदय रोग और मधुमेह़ जैसी बीमारियां पहले से ही भारी दबाव पड़ रही हैं, सेप्सिस एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है जो अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन सबसे घातक साबित होता है। देश के अस्पतालों में सेप्सिस अब एक रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। गहन चिकित्‍सा कक्ष (ICU) में भर्ती हर चौथा मरीज़ किसी न किसी संक्रमण से उपजी सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में पाया जाता है। नवजात मृत्यु के कारणों की पड़ताल करें तो लगभग एक-तिहाई मौतें सीधे सेप्सिस से जुड़ी मिलती हैं।

ग्रामीण भारत में यह स्थिति और भी घातक रूप ले लेती है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और संक्रमण की पहचान अक्सर देर से होती है। कई बार समय पर एंटीबायोटिक या सही हस्तक्षेप न मिलने पर मरीज़ कुछ ही घंटों में मौत के करीब पहुंच जाता है।

दरअसल, सेप्सिस को केवल संक्रमण की जटिलता मानना भ्रामक है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अनियंत्रित होकर अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है और संक्रमण से पैदा हुई सूजन पूरे शरीर में फैलकर दिल, फेफड़ों, गुर्दों और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा देती है। सरल शब्दों में, सेप्सिस संक्रमण के कारण शरीर का अपने ही खिलाफ सिर उठाना है। और, यही इसे इतना घातक और उग्र बना देता है।

हमारे देश में सेप्सिस की भयावहता इस बात से भी साफ होती है कि अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीज़ों के लिए मृत्यु का बड़ा कारण अब यही बनता जा रहा है। नवजात शिशुओं में यह स्थिति कई बार जन्म के तुरंत बाद होने वाले संक्रमणों से उभरती है। प्रसूता-गर्भवती महिलाओं, बुजु़र्गों और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

हमारे देश में सेप्सिस एक छिपी महामारी की तरह व्यवहार करता है। अन्य बीमारियों की अंतिम और सबसे घातक कड़ी अक्सर यही बनता है। इसलिए सेप्सिस को अब एक अलग स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए विशेष रणनीति तैयार करने की ज़रूरत है।

आंकड़े बताते है कि दुनिया भर में सेप्सिस हर साल एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान लेता है, जो वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन और ग्‍लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ के अध्ययन बताते हैं कि सेप्सिस की सर्वाधिक मार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ती है, जिनमें भारत भी शामिल है। अपने देश में वर्ष 2017 के अनुमान के अनुसार लगभग 1 करोड़ 13 लाख मामले और करीब 29 लाख मौतें इसी के कारण हुई हैं। आईसीयू आधारित शोध बताते हैं कि देश के गहन चिकित्सा कक्षों में हर दो में से एक मरीज़ किसी न किसी रूप में सेप्सिस से पीड़ित पाया जाता है, और ऐसे मरीज़ों की अस्पताल मृत्यु दर 30–40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। नवजात शिशुओं में यह बोझ और भी भारी है, जहां करीब एक-तिहाई मौतें संक्रमणजन्य सेप्सिस से जुड़ी पाई गई हैं।

लेकिन इस गंभीर बीमारी पर हो रहे शोध की स्थिति निराशाजनक है। दुनिया और भारत में, सेप्सिस पर होने वाला अधिकांश वैज्ञानिक कार्य अभी भी उस पुराने ढांचे पर टिका है, जिसमें चूहों, खरगोशों, गिनी पिगों, बकरियों, कुत्तों और कभी-कभी बंदरों तक पर प्रयोग किए जाते हैं। इन जानवरों को प्रयोगशाला की परिस्थितियों में जबरन संक्रमित किया जाता है, आंतों में छेद करके बैक्टीरिया फैलाया जाता है या उन्हें बैक्टीरियल ज़हर की उच्च खुराक दी जाती है। लेकिन मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया इन जानवरों से इतनी अलग है कि ऐसे प्रयोगों से मिलने वाले परिणाम मनुष्यों पर लगभग कभी लागू नहीं होते।

पिछले चार दशकों में डेढ़ सौ से अधिक ऐसी दवाएं रही हैं, जो चूहों या अन्य जंतुओं में सेप्सिस का इलाज करती दिखीं, पर मानव परीक्षण में पूरी तरह असफल रहीं। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों, जैसे – स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, एनआईएच आदि का निष्कर्ष है कि जंतु-आधारित मॉडल सेप्सिस का मानव स्वरूप समझने के लिए विश्वसनीय साधन नहीं हैं।

अपने देश में भी स्थिति अलग नहीं है। आईसीएमआर के कई प्रतिष्ठित केंद्र, कुछ ऐम्‍स संस्थान और निजी बायोमेडिकल प्रयोगशालाएं आज भी जंतु-आधारित मॉडल को सेप्सिस अध्ययन का आधार बनाए हुए हैं। इन परीक्षणों की पारदर्शिता कम है और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक परिणाम अत्यंत सीमित। जिस बीमारी के कारण अस्पतालों में लाखों मरीज़ चुपचाप मौत के करीब पहुंच रहे हों, उसके शोध का तरीका अगर मानव-प्रासंगिक न हो तो समाधान हमेशा दूर ही बना रहेगा।

अलबत्ता, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ वैज्ञानिक संस्थान नई दिशाएं भी टटोल रहे हैं। आईआईटी मद्रास का ऑर्गन्स-ऑन-चिप्स कार्यक्रम, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) का सेप्सिस प्रेडिक्शन मॉडल, ऐम्‍स दिल्ली में नवजात सेप्सिस के लिए विकसित बायोमार्कर और कुछ निजी प्रयोगशालाओं में एआई आधारित सेप्सिस अलर्ट सिस्टम ये सब संकेत देते हैं कि भारत आधुनिक, मानव-आधारित विज्ञान अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दुनिया भर में अब एआई-आधारित निदान और कम्प्यूटेशनल सिमुलेशन को भविष्य की दिशा माना जा रहा है। ये पद्धतियां न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि जानवरों पर होने वाली क्रूरता और वैज्ञानिक विफलताओं से भी मुक्त हैं।

भारत में सेप्सिस की भयावहता जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से हमें विज्ञान की दिशा बदलने की ज़रूरत है। आधुनिक तकनीकें हमारे सामने उपलब्ध हैं। ज़रूरत सिर्फ यह है कि हम पुरानी, अप्रासंगिक और अमानवीय शोध पद्धतियों को पीछे छोड़कर वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक, मानवीय और प्रभावी मॉडल अपनाएं। सेप्सिस के खिलाफ यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम विज्ञान और संवेदना दोनों के सही मिश्रण के साथ आगे बढ़े। भारत को स्वास्थ्य विज्ञान के इस नए युग में कदम रखने की आवश्यकता है। यह  परिवर्तन न सिर्फ लाखों लोगों की जान बचा सकता है बल्कि अनगिनत जानवरों को अनावश्यक और पीड़ादायक प्रयोगों से भी मुक्त कर सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर

ह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।

अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।

तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।

सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।

नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।

इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।

शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।

वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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धान वगैरह को हर साल रोपने से मुक्ति का रास्ता

ह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है कि हमारे पास अनाज (Grains) की ऐसी फसलें होंगी जिन्हें हर साल नए सिरे से बोने की ज़रूरत नहीं होगी; एक बार बो दिया और साल-दर-साल दाने लेते रहिए। फिलहाल तो धान, गेहूं, तुअर जैसी फसलों को हर साल बोना ही पड़ता है। क्या ऊपर की कल्पना साकार हो सकती है?

इस सिलसिले में चीन के वैज्ञानिकों ने 2018 में धान की एक ऐसी किस्म (PR23) प्रस्तुत की थी जिससे कई सालों तक उपज ली जा सकती थी। अलबत्ता, इसे बनाने में कई दशकों तक पारंपरिक ब्रीडिंग का सहारा लेना पड़ा था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने धान की एक फसली किस्म का संकरण एक वन्य किस्म से किया था।

अब शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि यही काम द्रुत गति से किया जा सकता है यदि किसी उपयुक्त वन्य किस्म से जीन्स (Genes) चोरी कर लिए जाएं। फिर तो अलग-अलग इलाकों के लिए बहुवर्षी धान (Parennial Paddy) तैयार किए जा सकेंगे।

इस संदर्भ में हाल ही में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया है कि जंगली धान (Wild Rice) (ओराइज़ा रुफिपोगोनOryza rufipogon) साल-दर-साल फूलता-फलता है और उन्होंने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स भी खोज निकाले हैं। उन्होंने आम तौर पर फसल के रूप में उगाए जाने धान (ओराइज़ा सटाइवा- Oryza sativa) में ये जीन्स जोड़ने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इन जीन्स ने ओराइज़ा सटाइवा को बहुवर्षी गुण प्रदान कर दिए; यानी यह एक बार पुष्पन (Flowering) के बाद मरता नहीं बल्कि पुष्पन को रोककर फिर से सामान्य वृद्धि (वर्धी विकास) शुरू कर देता है। यह प्रगति तो ज़बर्दस्त है लेकिन एक दिक्कत बाकी है। जो नई वृद्धि शुरू होती है उसमें लगने वाले फूलों में दाने पैदा नहीं होते।

दरअसल, अनाजों को बहुवर्षी पौधों में तबदील करना सहस्राब्दियों में चुन-चुनकर किए गए प्रजनन को वापिस पलटने जैसा होगा। एकवर्षी पौधे (Annual Plants) ज़मीन के ऊपर तेज़ी से वृद्धि (Growth) करते हैं और वहुवर्षी पौधों की तुलना में कहीं अधिक दाने पैदा करते हैं क्योंकि वहुवर्षी पौधे अपने काफी सारे संसाधन जड़ों के विकास में निवेश करते हैं। जब इन पौधों के पालतू बनाया गया था, तब पुराने ज़माने के लोगों ने एकवर्षी पौधों को शायद उनकी अधिक दाना उत्पादन क्षमता के कारण ही चुना था।

नए अध्ययन में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्स के सेंटर फॉर एक्सेलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइन्सेस के बिन हान और जिया-वाई वांग ने उन जीन्स की तलाश की जो धान में वहुवर्षिता का नियमन करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले तो वे ओ. रुफिपोगोन पर गए। उन्होंने अनुसंधान के दौरान विकसित एक किस्म का प्रजनन एक आम तौर पर अध्ययन की जाने वाली किस्म से करवाया ताकि ऐसी ढेर सारी संतानें पैदा कर सकें जिनमें से प्रत्येक में वन्य किस्म के डीएनए (DNA) का अलग-अलग छोटा-छोटा खंड हो। बड़े होने के बाद उन्होंने एक पौधा चुना जिसमें यह गुण था कि वह पुष्पन को रोककर वर्धी विकास जारी रख सके। इसे उन्होंने नाम दिया G43।

सारे धान के पौधों, चाहे वे कृष्य वार्षिक किस्म के हों, में एक मुख्तसर द्वितीय जीवन होता है। वार्षिक धान के पौधे से जब दानों की उपज प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद वे एक दूसरा शाखित तना पनपाते हैं, जिन्हें टिलर (Tiller)कहते हैं। इनसे भी एक कमतर उपज पैदा होती है जिसे रैटून राइस (Ratoon Rice) कहते हैं। इसे प्रक्रिया को रैटूनिंग (Ratooning) कहते हैं।

बहुवर्षी धान

बहरहाल, हान और वांग ने जो G43 धान विकसित किया था वह ऐसे टिलर्स पैदा करने में काफी उदार था – जहां एकवर्षी धान में 10-12 टिलर बनते हैं, वहीं G43 में 70 ऐसे द्वितीयक टिलर्स (Secondary Tillers) बने।

अब शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स का स्थान निश्चित किया – ये गुणसूत्र-1 पर पाए गए और शोधकर्ताओं ने इन्हें नाम दिया ‘एंडलेस ब्रांचेज़ एंड टिलर्स’ (EBT1)। इसके बाद उन्होंने दो विशिष्ट जीन्स की पहचान की – MIR156B और MIR156C। ये दोनों ही माइक्रो-आरएनए (Micro-RNA) का निर्माण करते हैं और ये माइक्रो-आरएनए विशिष्ट संदेशवाहक आरएनए (mRNA) से जुड़ जाते हैं। जुड़ने के बाद ये कुछ अन्य जीन्स की गतिविधि को ठप्प कर देते हैं जो युवा पौधे को परिपक्वता की ओर ले जाएंगे।

इसी प्रकार के MIR156 जीन्स घास की अन्य प्रजातियों में भी पाए जाते हैं। गौरतलब है कि गेहूं, धान आदि भी घास कुल में ही आते हैं। आम तौर पर इनकी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद थम जाती है जिसके चलते वृद्धि रुक जाती है। लेकिन G43 में इनका व्यवहार अलग रहा। इनकी भी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद कम हुई लेकिन फिर से बढ़ गई और टिलर्स का वर्धी विकास फिर चल निकला। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यदि अन्य बहुवर्षी अनाजों में ऐसी ही क्रियाविधि हुई तो अचरज नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में मक्का की एक उत्परिवर्तित किस्म (Mutated Species) खोजी गई थी जो लगातार एक झाड़ीनुमा ढंग से बढ़ती है। Corngrass1 नामक इस उत्परिवर्ती में MIR156 जीन पाया जाता है और शायद इसका व्यवहार बहुवर्षी धान के समान ही होगा।

G43 किसी भी वार्षिक पौधे की तरह ही बढ़ता है – एक दम सीधा खड़ा। यह ज़मीन पर फैलकर नहीं बढ़ता, जिस गुण की वजह से . रुफिपोगोन के द्वितीयक टिलर्स जड़ें उगाकर नए पौधे बन जाते हैं। पौधे की बनावट को बदलने के लिए हान और वांग की टीम ने . रुफिपोगोन के दो जीन्स (PROG1 और TIG1) G43 में जोड़ दिए थे। इस तरह जो पौधा विकसित हुआ वह ज़मीन पर आड़ा विकसित हुआ। यह एक आशाजनक संकेत है।

लेकिन अभी एक बड़ी बाधा सामने है। हालांकि ये द्वितीयक टिलर्स काफी अच्छे से बढ़े लेकिन उनसे बने पौधों पर वंध्या फूल आए और दाने नहीं बने। यह समस्या तब भी आई जब . रुफिपोगोन का समूचा EBT1 खंड एक वार्षिक किस्म में रोपा गया।

ज़ाहिर है, इस काम को अंजाम देने के लिए अन्य जीन्स की ज़रूरत है। हान और वांग इन जीन्स की तलाश में हैं ताकि द्वितीयक टिलर्स भी उपजाऊ फूल पैदा कर सकें। (स्रोत फीचर्स)

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https://www.science.org/content/article/rice-needs-be-replanted-every-year-genetic-tinkering-could-make-it-more-apples

घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है

घोड़े के हिनहिनाने (Neigh) की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) (Vocal Folds) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं।

आम तौर पर स्तनधारी (Mammals) आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ (Voice) पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एक एकदम पतली कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बचैन करता रहा है।

फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनाहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृतियों (Frequencies) में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक (Biphonic) होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं – डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।

तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप (Endoscope) की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरुनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।

देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती हैं जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स (Larynx)के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।

प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम (Helium) प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाएं तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती है।

उन्होंने उन परिस्थितियां में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।

तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली’ मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आती है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)

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जंक फूड से परेशान बंदरों का अजीब व्यवहार

जिब्राल्टर की चट्टानों पर रहने वाले मशहूर बंदरों में इन दिनों एक अजीब आदत देखी जा रही है। वे भोजन के बाद मिट्टी भी खा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उनके अस्वस्थ खान-पान की वजह से हो रहा है जो उस इलाके में आने वाले पर्यटक (Tourists) उनको खिला रहे हैं।

गौरतलब है कि जिब्राल्टर (Gibraltar) में करीब 230 मकाक (Macaque) बंदर हैं, जो अलग-अलग समूहों में रहते हैं। हालांकि वहां के अधिकारी उन्हें संतुलित भोजन देते हैं, लेकिन कई पर्यटक नियम तोड़कर उन्हें चिप्स, चॉकलेट, आइसक्रीम और मीठे पेय दे देते हैं। इस कारण धीरे-धीरे उनके खाने की आदत बदल गई है। 2022 से 2024 के बीच किए गए अध्ययन में पाया गया कि उनके भोजन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अब मनुष्यों द्वारा दिया जा रहा जंक फूड (Junk Food) है।

वैज्ञानिकों ने देखा कि जो बंदर पर्यटकों के ज़्यादा संपर्क में आते हैं, वे सबसे ज़्यादा जंक फूड  और मिट्टी खाते हैं। छुट्टियों के समय, जब पर्यटक अधिक आते हैं और उन्हें ज़्यादा खाना  देते हैं, तब मिट्टी खाने की यह आदत और बढ़ जाती है। वहीं जो बंदर पर्यटन इलाकों से दूर रहते हैं, वे मिट्टी बिल्कुल नहीं खाते – इससे पता चलता है कि यह व्यवहार मनुष्यों के चलते है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी उनके पाचन तंत्र (Digestive System) को बचाने में मदद करती है। जंक फूड में वसा, शर्करा और नमक अधिक होता है लेकिन फाइबर कम होता है, जिससे पेट के अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है। मिट्टी में मौजूद खनिज और सूक्ष्मजीव (Microbes) इस संतुलन को सुधारने में मदद कर सकते हैं। कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि बंदर आइसक्रीम या ब्रेड खाने के तुरंत बाद मिट्टी खाते हैं, जिससे लगता है कि वे पेट ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह भी पता चला है कि मिट्टी खाने की यह आदत एक-दूसरे से सीखकर आती है। बंदरों के अलग-अलग समूह अलग तरह की मिट्टी पसंद करते हैं। ज़्यादातर लाल मिट्टी (टेरा रोसा) खाते हैं, जबकि सड़क के पास रहने वाले कुछ बंदर (Monkey) डामर मिली मिट्टी खाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह आदत अधिक पोषण पाने के लिए नहीं है, क्योंकि गर्भवती या बच्चे को दूध पिलाने वाली मादा बंदरों में यह आदत नहीं देखी गई। यानी यह जंक फूड के बुरे असर को बेअसर करने के लिए ही खाई जाती है।

लेकिन मिट्टी खाने का यह तरीका सुरक्षित नहीं है। ज़्यादातर वे जो मिट्टी खाते हैं, सड़क किनारे की होती है, जहां गाड़ियों का प्रदूषण हो सकता है। यह स्वास्थ्य (Health) पर बुरा असर डाल सकता है। इसलिए वैज्ञानिक अब इस मिट्टी की जांच कर देखना चाहते हैं कि यह बंदरों के लिए कितनी सुरक्षित है।

वैसे, मिट्टी खाना (जियोफैगी) मनुष्यों और जानवरों दोनों में देखा जाता है और आम तौर पर शरीर को साफ करने या खनिज पाने से जुड़ा होता है। लेकिन बंदरों में यह आदत मनुष्यों की संगत के चलते आई है।

भलाई इसी में है कि लोग बंदरों को खाना देना बंद करें। क्योंकि आपकी साधारण-सी लगने वाली बातें भी उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर बुरा असर डाल सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

ज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉफी का दिमाग और मूड पर सकारात्मक प्रभाव

हाल ही प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कॉफी (Coffee) पीने से बात सिर्फ ऊर्जा बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मूड को बेहतर करने, चिंता कम करने और मस्तिष्क के काम करने के तरीके पर भी असर डाल सकती है। एपीसी माइक्रोबायोम आयरलैंड के शोधकर्ताओं के अनुसार कैफीन-युक्त और कैफीन-मुक्त, दोनों तरह की कॉफी पेट के सूक्ष्मजीव-संसार को बदलकर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं।

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित इस शोध में पेट-और मस्तिक (गट–ब्रेन) सम्बंध पर ध्यान दिया गया है। हालांकि कॉफी के फायदे पहले भी बताए जाते रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन खास तौर पर दिखाता है कि कॉफी इस सम्बंध को कैसे सीधे प्रभावित करती है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 62 लोगों पर अध्ययन किया। इनमें से आधे लोग रोज़ 3–5 कप कॉफी पीते थे और बाकी कॉफी नहीं पीते थे। जब कॉफी पीने वालों ने दो हफ्ते तक कॉफी बंद की, तो उनके पेट के बैक्टीरिया में बदलाव दिखा। लेकिन जब दोनों समूहों ने कॉफी पीना शुरू किया, तो दोनों समूहों ने बेहतर मूड, कम तनाव (less stress) और कम अवसाद महसूस किया।

यह भी पता चला कि कॉफी पीने से पेट में पाचन और सेहत के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया बढ़ते हैं। यही बदलाव मानसिक स्थिति (Mental Condition) को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कॉफी का प्रकार भी मायने रखता है – कैफीन-मुक्त कॉफी से याददाश्त और सीखने की क्षमता बेहतर हुई, जिससे पता चलता है कि सिर्फ कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद अन्य तत्व भी दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।

कैफीन-युक्त कॉफी के कुछ अलग फायदे भी देखे गए। इसे पीने वाले लोगों में चिंता कम हुई, सतर्कता बढ़ी (more Attentive) और ध्यान बेहतर हुआ। साथ ही, यह शरीर में सूजन के खतरे को भी कम कर सकती है, जो जीर्ण बीमारियों से जुड़ी होती है।

यह नतीजे पहले के शोधों की भी पुष्टि करते हैं, जिनमें बताया गया था कि संतुलित मात्रा में कॉफी पीने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारी और दिमाग से जुड़ी कुछ समस्याओं का खतरा कम हो सकता है। लेकिन यह नया अध्ययन खास तौर पर यह दिखाता है कि कॉफी तुरंत असर डालते हुए मूड और मानसिक स्पष्टता को भी बेहतर बना सकती है, और इसका सम्बंध पेट की सेहत से है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कॉफी को सिर्फ जागने या ऊर्जा बढ़ाने वाला पेय नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह शरीर के कई हिस्सों पर असर डालने वाला एक जटिल खाद्य तत्व है। यह पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) और उनके काम करने के तरीके को बदलकर शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

यह सही है कि इसके लंबे समय के असर को समझने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है, लेकिन अब तक के नतीजे बताते हैं कि सीमित मात्रा में कॉफी पीना – चाहे उसमें कैफीन (Caffeine) हो या न हो – मूड सुधारने और रोज़मर्रा के तनाव को कम करने में मददगार हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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हू-ब-हू एक जैसे जुड़वां के बीच पहचान का संकट

पिछले दिनों फ्रांस की एक अदालत में एक अजीबो-गरीब मामला उठा। पढ़ने में अत्यंत फिल्मी लगने वाला यह मामला जब यथार्थ में सामने आया तो खलबली मचना स्वाभाविक था।

हुआ यह कि हत्या के एक मामले में दो में से एक जुड़वा लिप्त था। बंदूक पर से डीएनए प्राप्त हुआ था। डीएनए वह आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसकी मदद से सम्बंधित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। किया यह जाता है कि उस डीएनए के कुछ खंडों में क्षार का अनुक्रम पता किया जाता है। इस विधि में डीएनए के 30 विशिष्ट खंडों का क्षार अनुक्रम निकाला जाता है। ऐसा देखा गया है कि इन्हीं 30 खंडों में सबसे अधिक विविधताएं पाई जाती हैं – यानी इन हिस्सों में व्यक्ति-व्यक्ति में सबसे अधिक अंतर देखे जाते हैं और इनके आधार पर तुलना करके व्यक्ति की पहचान की जा सकती है।

लेकिन जब मामला हू-ब-हू एक जैसे या आइडेंटिकल जुड़वां का हो तो बात बदल जाती है। आइडेंटिकल जुड़वा एक ही अंडाणु के, एक ही शुक्राणु से निषेचन से बने भ्रूण के दो भागों में बंटकर अलग-अलग विकसित होने से बनते हैं। यानी इन दोनों में डीएनए एक समान होता है। तो डीएनए के 30 छोटे-छोटे खंडों की तुलना से व्यक्ति विशेष की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। तो क्या किया जाए?

इस संदर्भ में डीएनए के चंद खंडों की बजाय पूरे-के-पूरे डीएनए (यानी समूचे जीनोम) का विश्लेषण मददगार हो सकता है। इस तरीके में वैज्ञानिक यह पता कर सकते हैं कि निषेचित अंडे के विभाजन के बाद डीएनए में किस तरह के उत्परिवर्तन हुए हैं। 2014 में किए गए एक अध्ययन में दो वयस्क जुड़वा के डीएनए में मात्र 5 जेनेटिक अंतर देखे जा सके थे। समूचे जीनोम के विश्लेषण से कुछ मामलों में अदालतों को जुड़वा के बीच भेद करने में मदद ज़रूर मिली है लेकिन इस तरह के विश्लेषण के लिए ज़रूरी होता है कि पर्याप्त मात्रा में डीएनए मिल जाए, जो मिलना काफी मुश्किल होता है।

इस सिलसिले में कुछ शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए की मदद ली है। गौरतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक ऐसा उपांग है जिसके पास अपना डीएनए होता है और यह केंद्रक में पाए जाने वाले डीएनए से स्वतंत्र होता है। माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए (mtDNA) में अपेक्षाकृत तेज़ी से परिवर्तन होते हैं। अर्थात जुड़वा संतानें mtDNA के मामले में ज़्यादा अंतर दर्शाती हैं। यूएस की अदालतें आजकल mtDNA के प्रमाणों को स्वीकारने लगी हैं।

इस संदर्भ में डीएनए विश्लेषण की एक और तकनीक पर शोध जारी है। यह देखा गया है कि उम्र के साथ कोशिकाओं के केंद्रक में डीएनए पर अलग-अलग स्थानों पर मिथाइल समूह चस्पा होने लगते हैं। यानी स्वयं डीएनए में तो कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन मिथाइल समूह चस्पा होने के कारण जीन्स की अभिव्यक्ति बदलने लगती है। इन परिवर्तनों को एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं और ये व्यक्ति के खानपान, धूम्रपान या शराब सेवन जैसे व्यवहारों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं; जुड़वा के बीच भी अंतर आ जाते हैं। इनके आधार पर उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सकता है। जैसे दक्षिण कोरिया में वैज्ञानिकों ने 54 नवजात आइडेंटिकल जुड़वा के जीनोम्स का विश्लेषण किया था। एपिजेनेटिक अंतरों के आधार पर वे 54 जुड़वाओं में से 50 के बीच भेद कर पाए थे। यही प्रयोग जब वयस्क जुड़वाओं पर किया गया तो 47 में से 41 जोड़ियों तथा 118 में से 105 जोड़ियों के जुड़वाओं की अलग-अलग पहचाने हो पाई थी।

फ्रांस की अदालत में तो मुकदमा जारी है लेकिन वैज्ञानिक अपने तईं कोशिशों में इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन से गायब हो सकता है कोहरा

र गर्मी के मौसम में कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली में तेज़ गर्मी से राहत एक अनोखे तरीके से मिलती है – समुद्र से आने वाली घनी धुंध। यह हवा को ठंडा करती है और ज़मीन को हल्की नमी देती है। लोगों के लिए यह कुदरती कूलर जैसा काम करती है, और खेतों व जंगलों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अधिक गर्मी के कारण यह धुंध भविष्य में कम हो सकती है।

गौरतलब है कि धुंध तब बनती है जब समुद्र की नम हवा ठंडी होकर पानी की छोटी-छोटी बूंदों में बदल जाती है और ज़मीन की ओर बढ़ती है। भले ही यह बारिश जितनी बड़ी चीज़ न लगे, लेकिन इसका असर बहुत अहम होता है। जैसे कैलिफोर्निया के रेडवुड जंगलों में यह गर्मियों में लगभग आधा पानी उपलब्ध कराती है। वहीं सैलिनास वैली जैसे खेती वाले इलाकों में यह लेट्यूस और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों को नमी देती है। शहरों में भी यह हवा में मौजूद प्रदूषण को पकड़कर उसे कम करने में मदद करती है।

इतनी महत्वपूर्ण होने के बावजूद, धुंध पर अब तक ज़्यादा वैज्ञानिक ध्यान नहीं दिया गया है। वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि कुछ सालों में धुंध ज़्यादा क्यों होती है, इसमें कौन-कौन से रसायन होते हैं और बढ़ते तापमान का इस पर क्या असर पड़ेगा। बारिश और सूखे जैसे विषयों की तुलना में धुंध को लंबे समय तक एक छोटी और स्थानीय घटना माना गया। अब इसी कमी को दूर करने के लिए बड़े स्तर पर नया शोध शुरू किया जा रहा है।

पैसिफिक कोस्टल फॉग रिसर्च नामक एक पांच साल का प्रोजेक्ट धुंध को पहले से कहीं अधिक गहराई से समझने की कोशिश करेगा। करीब 36.5 लाख डॉलर की मदद से चलने वाला यह प्रोजेक्ट ज़मीन पर किए जाने वाले माप और उन्नत कंप्यूटर मॉडल का उपयोग करेगा, ताकि यह जाना जा सके कि धुंध कैसे बनती है, इसमें क्या-क्या होता है और भविष्य में यह कैसे बदल सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक जटिल पर्यावरणीय पहेली को समझने का मौका है।

धुंध का अध्ययन करना मुश्किल इसलिए है क्योंकि यह समुद्र, हवा और भूमि तीनों के बीच बनती है। इसके बनने के लिए ठंडे समुद्र और गर्म तटीय इलाकों के बीच तापमान में अंतर होना ज़रूरी है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण जब समुद्र और भूमि दोनों का तापमान बदल रहा है, तो यह संतुलन भी बिगड़ सकता है। गर्म समुद्र धुंध बनने की प्रक्रिया को कमज़ोर कर सकते हैं, जबकि गर्म भूमि धुंध को अपनी ओर ज़्यादा खींच सकती है। इन दोनों असर को एक साथ समझना मुश्किल है, इसलिए भविष्य के सही अनुमान लगाना अभी आसान नहीं है।

कुछ संकेत ऐसे भी मिल रहे हैं कि धुंध पहले से कम हो रही है। पुराने आंकड़ों के आधार पर किए गए शोध बताते हैं कि कैलिफोर्निया में पिछले कई दशकों में धुंध की मात्रा घटी है। लेकिन यह पूरी तरह पक्का नहीं है, क्योंकि डैटा सीमित है और उपग्रह तस्वीरों में धुंध को दूसरे बादलों से अलग पहचानना मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि ज़्यादा सटीक माप की ज़रूरत है, ताकि यह पता चल सके कि यह बदलाव सच में हो रहा है या नहीं, और क्या इसके लिए जलवायु परिवर्तन ज़िम्मेदार है।

बेहतर जानकारी जुटाने के लिए वैज्ञानिक कैलिफोर्निया के समुद्री किनारों पर कई जगहों – शहरों, जंगलों और खेतों – में खास उपकरण लगाएंगे। ये उपकरण हवा से धुंध की पानी की छोटी-छोटी बूंदों को पकड़ते हैं, जिससे पता चल सके कि धुंध कितना पानी देती है और उसमें कौन-कौन से पदार्थ मौजूद हैं। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि धुंध पर्यावरण को कितनी नमी देती है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव आ रहा है।

इस प्रोजेक्ट में यह भी देखा जाएगा कि धुंध अपने साथ क्या-क्या लेकर आती है। पहले के अध्ययनों में पाया गया है कि इसमें कुछ विषैले हानिकारक पदार्थ भी हो सकते हैं, जो मनुष्यों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अब वैज्ञानिक इसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों का भी अध्ययन करेंगे, जो समुद्र से भूमि तक आ सकते हैं। इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर इसके असर को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

फील्ड पर किए जा रहे काम के साथ-साथ वैज्ञानिक बेहतर कंप्यूटर मॉडल का भी इस्तेमाल करेंगे, जो तटीय इलाकों को करीब से समझते हुए पूरे विश्व के पैटर्न को भी ध्यान में रखते हैं। इन मॉडलों की मदद से वे अतीत और आने वाले समय की स्थिति का अनुमान लगाकर यह समझने की कोशिश करेंगे कि धुंध में हो रहे बदलाव प्राकृतिक हैं या ग्लोबल वार्मिंग की वजह से। इससे भविष्य में धुंध के व्यवहार का ज़्यादा साफ अंदाज़ा मिल सकेगा।

फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इतने जटिल सिस्टम को समझने के लिए पांच साल का समय कम हो सकता है, क्योंकि इसमें कई चीज़ें एक साथ असर डालती हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग मानते हैं कि यह प्रयास एक ऐसे क्षेत्र में बहुत ज़रूरी और बड़ा कदम है, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया था।

यह शोध सिर्फ कैलिफोर्निया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्र किनारे बनने वाली धुंध दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे इलाकों में भी पाई जाती है, जहां यह सूखे क्षेत्रों में पानी का अहम स्रोत बन सकती है। वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इस काम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ेगा और नए तरीके सामने आएंगे – जैसे धुंध से पीने का पानी प्राप्त करना।

आखिर में, धुंध सिर्फ एक साधारण मौसमी घटना नहीं है। यह समुद्र, ज़मीन और हवा को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे वैज्ञानिक अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। जैसे-जैसे जलवायु गर्म हो रही है, धुंध को समझना और भी ज़रूरी हो जाएगा – ताकि हम पर्यावरण में हो रहे बदलावों का सही अनुमान लगा सकें और उन जल स्रोतों व पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा कर सकें, जो इस नाज़ुक धुंध पर निर्भर हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चमकते मशरूम से रोशनी देने वाले पौधे बनाने का सफर

दौलत सिंह तंवर

ल्पना कीजिए, रात के घने अंधेरे में सड़क के किनारे लगे पेड़-पौधे बिना किसी बिजली या तार के एक हल्की, सुकून देने वाली रोशनी बिखेर रहे हों। आधुनिक वनस्पति विज्ञान (botany) और जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) ने इस कल्पना को हकीकत में बदलना शुरू कर दिया है। यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि कैसे प्रयोगशालाओं में आज ‘बायोलुमिनेसेंट’ (जैव-संदीप्त – bioluminescent plants) पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो भविष्य में हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का एक हरा-भरा विकल्प बन सकते हैं।

जैवसंदीप्ति

गर्मियों की रात में चमकते जुगनुओं को हम सभी ने देखा है। गहरे समुद्र में रहने वाली कुछ मछलियां, जेलीफिश या जंगलों में पाए जाने वाले कुछ कवक भी अंधेरे में चमकते हैं। जीवों द्वारा अपने शरीर के भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करने की इस अद्भुत प्रक्रिया को ‘बायोलुमिनेसेंस’ यानी जैव-संदीप्ति कहा जाता है।

मुख्य रूप से यह चमक दो रसायनों का प्रभाव होती है: ‘ल्यूसिफेरिन’ (luciferin) जो ऑक्सीजन से क्रिया करके प्रकाश उत्पन्न करने वाला अणु है, और ‘ल्यूसिफेरेज़’ (luciferase enzyme)  वह एंज़ाइम है जो इस अभिक्रिया को गति देता है। प्रकृति में यह गुण जीवों के शिकारियों से बचने, साथी को आकर्षित करने या शिकार को लुभाने में मदद करता है। लेकिन वनस्पति जगत में, प्राकृतिक रूप से पौधों में यह गुण नहीं पाया जाता।

पौधों से रोशनी पैदा करवाने का विचार वनस्पति विज्ञानियों के लिए नया नहीं है। 1980 के दशक के अंत में वैज्ञानिकों ने जुगनू का जीन तंबाकू के पौधे में डालकर उसे संदीप्त बनाने का प्रयास किया था। प्रयोग काफी हद तक सफल रहा था, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी व्यावहारिक खामी थी। पौधा लगातार रोशनी दे पाए, उसके लिए बाहर से ल्यूसिफेरिन का छिड़काव करना पड़ता था। वैज्ञानिकों को एक ऐसे तरीके की तलाश थी जिसमें पौधा अपनी चयापचय प्रक्रिया (plant metabolism) के ज़रिए खुद अपना प्रकाश उत्पन्न करे – बिना किसी बाहरी रसायन या मदद के।

मशरूम से मिला समाधान

सफलता हाल ही के वर्षों में मिली, जब वैज्ञानिकों ने जुगनू को छोड़कर प्राकृतिक रूप से चमकने वाले कवक (फफूंद) (glowing fungi) का रुख किया। नियोनोथोपेनस नंबी नामक एक ज़हरीले और चमकने वाले मशरूम (Neonothopanus nambi) का गहराई से अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह कवक एक विशेष चयापचय चक्र का उपयोग करता है जिसे ‘कैफिक एसिड चक्र’ कहते हैं। रोचक बात यह है कि           कैफिक एसिड (caffeic acid) सभी पौधों में प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। पौधे इसका उपयोग लिग्निन बनाने (lignin formation) के लिए करते हैं, जो पौधों की कोशिका भित्ति को मज़बूती और कठोरता प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने कवक के उन चार प्रमुख जीन्स की पहचान की जो कैफिक एसिड को ल्यूसिफेरिन में बदलते हैं और फिर प्रकाश उत्सर्जित करने के बाद उसे वापस कैफिक एसिड में बदल देते हैं। वनस्पति विज्ञानियों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से इन चार जीन्स को पहले                तंबाकू (Nicotiana tabaccum) और बाद में पिटूनिया (Petunia hybrida) जैसे पौधों के डीएनए में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया।

नए जेनेटिक रूप से संशोधित पौधों ने अपने पूरे जीवनचक्र में बीज से लेकर अंकुरण, पत्तियों के विकास और परिपक्वता तक निरंतर हरे रंग की रोशनी उत्सर्जित की। यह प्रकाश पत्तियों, तनों, जड़ों और फूलों, सभी हिस्सों से निकल रहा था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसके लिए किसी बाहरी रसायन, पराबैंगनी प्रकाश या बिजली की कोई आवश्यकता नहीं थी। पौधे की               अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली ही इस रोशनी का स्थायी स्रोत बन गई थी।

भविष्य की संभावनाएं 

रोशनी देने वाले पौधे महज़ प्रयोगशाला का चमत्कार नहीं हैं। इनके कई व्यावहारिक और पर्यावरणीय उपयोग (sustainable innovation) हो सकते हैं:

शून्यकार्बन स्ट्रीट लाइट्स (zero carbon lighting): दुनिया भर में स्ट्रीट लाइट्स और सजावटी रोशनी में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन और बिजली की खपत होती है। यदि भविष्य में इन जैवसंदीप्त पेड़ों                    की चमक को बढ़ाया जा सके तो ये सड़कों, पार्कों को रोशन करने का एक प्राकृतिक, शून्य-कार्बन विकल्प बन सकते हैं। जो जलवायु परिवर्तन (climate change solution) से लड़ने में अहम होगा।

इनडोर लाइटिंग (indoor lighting plants): घरों के अंदर ये पौधे एक ‘लिविंग लैंप’ (living lamp) की तरह काम कर सकते हैं। रात के समय ये एक मंद, प्राकृतिक रोशनी देंगे जिससे बिजली की बचत होगी। हाल ही में ‘फायरफ्लाई पेटूनिया’ नाम से कुछ पौधे अमेरिकी बाज़ार में आम लोगों के लिए उतारे भी गए हैं।

फसलों की स्वास्थ्य निगरानी (crop monitoring): वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग करके         पौधों को ऐसा बनाया जा सकता है कि जब वे किसी तनाव (plant stress) में हों (जैसे पानी की कमी, कीटों का हमला, या मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी), तो उनकी चमक का रंग या उसकी तीव्रता बदल जाए।     इससे किसानों को फसल के बीमार होने से बहुत पहले ही संकेत मिल जाएगा।

चुनौतियां और आगे की राह 

हालांकि यह तकनीक बहुत आशाजनक है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले कई वैज्ञानिक और पारिस्थितिक चुनौतियों (scientific challenges) का समाधान करना बाकी है:

रोशनी की तीव्रता (light intensity): वर्तमान में इन पौधों से निकलने वाली रोशनी बहुत तेज़ नहीं है। आप इसकी रोशनी में कोई किताब नहीं पढ़ सकते। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य जेनेटिक कोड (genetic optimization)  में सुधार करके इस रोशनी को कई गुना तक बढ़ाना है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (ecosystem impact): प्रकृति में ऐसे चमकीले पेड़-पौधे लगाने से पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि स्थानीय कीटों, परागण करने वाले जीवों और रात में सक्रिय रहने वाले जंतुओं (nocturnal animals) पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। कहीं यह उनके प्राकृतिक व्यवहार या जीवन चक्र को भ्रमित तो नहीं करेगा?

पौधे की ऊर्जा खपत (energy metabolism): लगातार प्रकाश उत्पन्न करने में पौधे की काफी ऊर्जा खर्च होती है। वनस्पति विज्ञानियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रकाश उत्पन्न करने की यह प्रक्रिया पौधे के सामान्य विकास, उसके फलने-फूलने या उसकी जीवन अवधि पर कोई नकारात्मक प्रभाव न डाले। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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