अपूर्वा आचार्य

कल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।
वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।
युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।
अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।
पेड़–पौधों की वंशवृद्धि
वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।
दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?
परागण: कुदरती कूरियर सेवा
फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।
परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।
देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है।
चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।
हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।
जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।
फूलदार पौधे और कीटों का सह–विकास
लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।
फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।
इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए।
पौधों और कीटों के बदलाव
विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।
साज–सज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।
मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।
चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।
कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।
परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है।
गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।
यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।
जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।
क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।
परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।
वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां
वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।
बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।
परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।
अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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