विपुल कीर्ति शर्मा

क्या आप ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां न पेड़ हों, न जंगल, न पक्षियों का कलरव, न डायनासौर और न ही इंसान? चारों ओर चट्टानें, उथले समुद्र, कीचड़ भरे तटीय मैदान, आकाश में बार-बार कड़कड़ाती बिजली और जब-तब फूटते हुए ज्वालामुखी और जीवन की बस शुरुआती आहट। लेकिन इस वीरान-सी लगने वाली दुनिया में एक ऐसा शिकारी घूम रहा था, जिसे देखकर आज के जांबाज़ भी शायद पीछे हट जाएं। यह कोई काल्पनिक राक्षस नहीं, बल्कि करीब एक मीटर लंबा बिच्छू (1 meter scorpion) था।
हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस प्राचीन जी व के बारे में नई जानकारियां दी हैं। ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर क्षेत्र में एक जीवाश्म 1870 में मिला था और उस समय इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को पता चला था कि यह विशाल बिच्छू (giant scorpion) लगभग 43 करोड़ वर्ष पहले, यानी सिल्यूरियन काल में पृथ्वी पर विचरण करता था। इसे नाम दिया गया था प्रेआरक्टुरस गिगास (Praearcturus gigas) यह वह समय था जब धरती पर घने जंगलों का अस्तित्व नहीं था और भूमि पर जीवन अपने शुरुआती चरण में था। यह खोज केवल एक बड़े बिच्छू की कहानी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन के विकास को लेकर वैज्ञानिकों की कई पुरानी धारणाओं को चुनौती भी देती है।
करोड़ों वर्षों की समय–यात्रा
43 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी का स्वरूप बिल्कुल भिन्न था। अधिकांश जीवन समुद्रों में बसता था। भूमि पर कुछ छोटे-छोटे आदिम पौधे उगने लगे थे, लेकिन आज जैसे विशाल वृक्षों और घने जंगलों का विकास अभी नहीं हुआ था। इसी काल में शरीर पर कठोर कवच और जोड़ वाली टागों वाले आर्थ्रोपोड (संधिपाद प्राणि) (Arthropod) धीरे-धीरे समुद्र से निकलकर ज़मीन की ओर बढ़ रहे थे। आर्थ्रोपोड समूह में ही मकड़ियां, बिच्छू, केकड़े, झींगे और कीट शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विशाल बिच्छू इसी संक्रमण काल का एक महत्वपूर्ण जीव था, जो संभवतः पानी और ज़मीन दोनों परिवेशों में रहने का अभ्यस्त था।
आखिर मिला क्या था?
ब्रिटेन के हियरफोर्डशायर में मिले जीवाश्म पहले भी वैज्ञानिकों के पास थे, लेकिन आधुनिक त्रि-आयामी इमेजिंग (3-D imaging) तकनीक और सूक्ष्म विश्लेषण से अब इनके बारे में कहीं अधिक जानकारी मिल सकी है। जीवाश्म से पता चलता है कि इस जीव के पंजे अत्यंत शक्तिशाली थे। उसका शरीर लंबा था और मज़बूत बाहरी कवच (बाह्य कंकाल) से ढंका हुआ था। अनुमान है कि उसकी कुल लंबाई लगभग एक मीटर रही होगी। तुलना करें तो आज अधिकांश बिच्छू 5 से 15 सेंटीमीटर लंबे यानी उससे करीब 10 गुना छोटे होते हैं और बहुत कम प्रजातियां 20 सेंटीमीटर तक पहुंचती हैं। अर्थात यह प्राचीन बिच्छू (ancient scorpion) अपने आधुनिक रिश्तेदारों से कई गुना बड़ा था।
जीवाश्म आखिर होते क्या हैं?
जब कोई जीव मर जाता है तो सामान्यतः उसका शरीर समय के साथ नष्ट हो जाता है। लेकिन यदि वह विशेष परिस्थितियों में मिट्टी, रेत या तलछट के नीचे दब जाए तो लाखों-करोड़ों वर्षों में उसके अवशेष चट्टानों का हिस्सा बन सकते हैं। इन्हीं संरक्षित अवशेषों को जीवाश्म (fossil) कहते है। इनमें कभी हड्डियां बचती हैं, कभी दांत, कभी पंजे, तो कभी केवल शरीर की छाप। कई बार मूल जैविक पदार्थ पूरी तरह नष्ट हो जाता है और उसकी जगह खनिज भर जाते हैं। वैज्ञानिक इन्हीं जीवाश्मों के अध्ययन से पृथ्वी के अतीत की कहानी समझने की कोशिश करते हैं।
यह वाकई ज़मीन पर रहता था?
यही सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। आज के बिच्छू पूरी तरह स्थलीय जीव हैं, लेकिन इस प्राचीन जीव के शरीर की बनावट बताती है कि वह संभवत: पूरी तरह ज़मीन पर नहीं रहता था। वैज्ञानिकों के अनुसार उसका जीवन उथले समुद्रों, ज्वारीय मैदानों, दलदली तटों और पानी से लगे क्षेत्रों में बीतता होगा। संभव है कि वह पानी में शिकार करता हो और समय-समय पर ज़मीन पर भी निकल आता हो। यही कारण है कि इसे समुद्री जीवन से स्थलीय जीवन की ओर बढ़ते आर्थ्रोपोडों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि (ancient representative) माना जा रहा है।
क्या इसमें विष वाला डंक था?
यह प्रश्न स्वाभाविक है। जीवाश्मों से यह तो स्पष्ट होता है कि इसकी शारीरिक बनावट आधुनिक बिच्छुओं से मिलती-जुलती थी। संभव है कि इसकी पूंछ के अंतिम भाग में डंक भी रहा हो। लेकिन जीवाश्मों में विष संरक्षित नहीं रहता, इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनमें विष भी था या नहीं। यदि विष (venom) था तो वह कितना शक्तिशाली था या क्या वह आज के बिच्छुओं जैसा ही था। वैसे उसके विशाल पंजे ही इतने मज़बूत रहे होंगे कि छोटे जीवों के लिए उससे बच पाना आसान नहीं रहा होगा।
उम्र कैसे पता की?
जब कोई कहता है कि कोई जीव 43 करोड़ वर्ष पुराना है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतनी सटीक उम्र कैसे पता चलती है? वैज्ञानिक सबसे पहले उस चट्टान की परत का अध्ययन करते हैं जिसमें जीवाश्म मिला है। पृथ्वी की चट्टानों की परतें समय के क्रम में बनती हैं। प्रत्येक परत में मिलने वाले जीवाश्म और आसपास की भूवैज्ञानिक संरचनाएं उसकी आयु का संकेत देती हैं। यदि आसपास ज्वालामुखीय चट्टानें हों तो उनमें मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय की दर के आधार पर और भी सटीक आयु निर्धारित की जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया को रेडियोमेट्रिक डेटिंग (radiometric dating) कहते हैं।
बिच्छू इतना विशाल कैसे हुआ?
यही वह जिज्ञासा है जिसने वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित किया है। काफी समय तक यह माना जाता रहा कि प्राचीन काल में विशाल कीटों और आर्थ्रोपोडों का विकास वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने के कारण हुआ था। कार्बोनिफेरस काल (करीब 35.8 करोड़ से 29.8 करोड़ वर्ष पूर्व) (carboniferous period) में ड्रैगनफ्लाई जैसे कई विशाल कीट पाए जाते थे, जिनके पंख लगभग 70 सेंटीमीटर तक फैलते थे। लेकिन यह नया जीव तो उनसे भी पहले का है। उस समय वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बाद के युगों जितना अधिक नहीं था। इसका अर्थ है कि विशाल आकार का श्रेय केवल ऑक्सीजन को नहीं दिया जा सकता। संभव है कि उस समय बड़े शिकारी कम रहे हों, भोजन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहा हो या फिर उस समय की पारिस्थितिकी बड़े शरीर के लिए लाभकारी रही हो। यह भी संभव है कि समुद्र और ज़मीन के बीच रहने वाली जीवनशैली ने उसके विशाल आकार के विकास में भूमिका निभाई हो।
आज के बिच्छू इतने बड़े होंगे?
इसका उत्तर लगभग ‘नहीं’ है। क्योंकि, आज पृथ्वी का वातावरण, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बदल चुका है। जंगल विकसित हो चुके हैं, असंख्य शिकारी जीव मौजूद हैं और प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक है। बड़े शरीर को बनाए रखने के लिए बहुत अधिक भोजन और ऊर्जा की ज़रूरत होती है। बदलते पर्यावरण में छोटे आकार वाले बिच्छू अधिक सफल साबित हुए होंगे। प्राकृतिक चयन (natural selection) ने धीरे-धीरे ऐसी शारीरिक संरचना को बढ़ावा दिया होगा जो कम संसाधनों में भी जीवित रह सके। यही कारण है कि आज हमें विशालकाय बिच्छू नहीं दिखाई देते।
पृथ्वी की अधूरी कहानी
हर जीवाश्म समय की बंद किताब का खुला हुआ एक पन्ना होता है। जितने नए जीवाश्म मिलते हैं, पृथ्वी के इतिहास (earth history) की तस्वीर उतनी ही स्पष्ट होती जाती है। एक समय था जब वैज्ञानिक मानते थे कि विशाल आर्थ्रोपोड केवल बाद के युगों में विकसित हुए। अब यह नई खोज बताती है कि प्रकृति ने अपने प्रयोग बहुत पहले ही शुरू कर दिए थे। संभव है कि आने वाले वर्षों में ऐसे और जीवाश्म सामने आएं, जो यह साबित कर दें कि जीवन का विकास हमारी कल्पना से कहीं अधिक विविध, कहीं अधिक जटिल और आश्चर्यजनक रहा है।
जब अगली बार आप किसी छोटे-से बिच्छू को देखें, तो एक पल के लिए 43 करोड़ वर्ष पीछे की पृथ्वी की कल्पना करें। उसी वीरान दुनिया में एक मीटर का बिच्छू आत्मविश्वास के साथ निडर विचरण कर रहा था। यही विज्ञान की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह हमें बताता है कि पृथ्वी का अतीत किसी रहस्यमयी (planet’s secrets) कथा से कम रोमांचक नहीं था, और उसकी कहानी अभी भी पूरी तरह लिखी जानी बाकी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.sciencedaily.com/images/1920/praearcturus-gigas-life-reconstruction.webp








