फफूंद पर परजीवी पौधे यानी चोर के घर में चोरी

डॉ. किशोर पंवार

ह तो जानी-मानी बात है कि पौधे हवा की कार्बन डाईऑक्साइड (carbon dioxide) और ज़मीन से सोखे गए पानी का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इस क्रिया को अंजाम देने के लिए उनके पास क्लोरोफिल (chlorophyll) होता है और इस प्रक्रिया के लिए ऊर्जा वे सूर्य की रोशनी से प्राप्त करते हैं। इसलिए पेड़-पौधों को स्वपोषी (ऑटोट्रॉफ- autotrophs) कहते हैं। दूसरी ओर सारे जंतु अपना भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। इन्हें हम परपोषी (हेटरोट्रॉफ – heterotrophs) कहते हैं। इस मोटी-मोटी परिभाषा के बाद थोड़ा बारीकी पर चलें।

क्या आपने कभी परपोषी पौधों (heterotrophic plants) के बारे में सुना है? चौंकिए मत, बहुत थोड़े से ही सही मगर परजीवी पौधे (parasitic plants) होते हैं। अमरबेल जैसे पौधे परजीवी हैं। ये किसी अन्य पौधे पर लिपटते हैं और अपनी विशेष चूषक जड़ें (होस्टोरियम- haustorium) उसमें घुसा देते हैं और उसके अंदर से भोजन व पानी प्राप्त करते रहते हैं। मेज़बान पौधा स्वपोषी होता है। अलबत्ता किसी अन्य पौधे का सहारा लेने वाले सभी पौधों को परजीवी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वे सिर्फ सहारा लेते हों, भोजन-पानी नहीं। कई सारी लताएं, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड्स (orchids) इस श्रेणी में आते हैं।

अब परपोषी पौधों के एक अनोखे समूह की चर्चा करते हैं। ऊपर हमने देखा कि परजीवी पौधे किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन चुराते हैं। लेकिन पौधों का एक समूह है जो फफूंद से भोजन-पानी की चोरी करते हैं। अब दिलचस्प बात यह है कि फफूंद स्वयं अपना भोजन नहीं बनातीं; उनमें क्लोरोफिल का अभाव जो होता है। फफूंद यानी कवक किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन की चोरी करती हैं (हालांकि वे बदले में कुछ देती भी हैं)। और अब हम जिन पौधों की बात करने जा रहे हैं वे फफूंद से भोजन चुरा लेते हैं – यानी चोर के घर में चोरी!

इन पौधों को कवक-परपोषी या मायकोहेटरोट्रॉफ (mycoheterotrophs) कहते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले ये पौधे अपनी जड़ों को मिट्टी में मौजूद कवक के धागों (कवक-तंतु यानी हाइफा) के साथ जोड़ते हैं।

पेड़-पौधों और कवकों का सम्बंध काफी प्राचीन और पेचीदा है। मायकोराइज़ा (mycorrhiza) के रूप में ये कवक पेड़-पौधों से कार्बन प्राप्त करते हैं और बदले में पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। यानी कवकों को परजीवी कहने की बजाय सहजीवी (symbiotic organisms) कहना बेहतर है। मायकोराइज़ा दरअसल एक सम्बंध का नाम है – फफूंद-तंतुओं और पेड़-पौधों की जड़ों के बीच परस्पर लाभदायक सम्बंध (mutualism)। इसमें फफूंद का दूर- Text Box: कुछ कवक-परपोषी पौधे
1. मोनोट्रॉपेस्ट्रम किरीशिमेन्स (Monotropastrum kirishimense): अपनी गुलाबी पंखुड़ियों के कारण, एम. किरीशिमेन्स को लंबे समय से सफेद एम. ह्यूमाइल का एक प्रकार माना जाता था जो पूरे एशिया में आम तौर पर पाया जाता है। लेकिन दो दशक पहले, वनस्पतिशास्त्री केंजी सुएत्सुगु ने पाया कि दोनों पौधों में फूल अलग-अलग समय पर आते हैं। जांच से पता चला कि एम. किरीशिमेन्स एक नई प्रजाति है जो केवल जापान में पाई जाती है। और इसमें हल्के सफेद रंग के फूल आते हैं।
2 स्पिरैन्थेस हचिजोएन्सिस (Spiranthes hachijoensis): आर्किड वंश के पौधों को आम तौर पर ‘लेडीज़ ट्रेसेस' कहा जाता है क्योंकि उनके छोटे फूल तने के चारों ओर सर्पिलाकार रूप में चोटी की तरह गुंथे होते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना था कि जापान में केवल एक ही स्पिरैन्थेस प्रजाति मौजूद है, जब तक कि वनस्पतिशास्त्रियों ने यह नहीं देखा था कि कुछ पौधे दूसरों की तुलना में पहले खिलते हैं। दस साल के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि जल्दी खिलने वाले पौधे नई प्रजाति, एस. हचिजोएन्सिस, के सदस्य हैं।
3. थिस्मिया कोबेन्सिस (Thismia kobensis): 1999 में विकास कार्यों के कारण इसके अंतिम ज्ञात नमूने का निवास स्थान नष्ट हो जाने के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था। लेकिन 2021 में एक शौकिया वनस्पतिशास्त्री को संयोग से 30 किलोमीटर दूर यह पौधा मिला। इस प्रजाति के पौधों की संख्या दो दर्जन से भी कम है।
4. ओरिऑर्चिस पेटेंस (Oreorchis patens): कुछ आर्किड प्रजातियां प्रकाश संश्लेषण और परजीवी कवक, दोनों का उपयोग करके फलती-फूलती हैं। इसका एक उदाहरण ओ. पेटेंस है। वैसे तो यह पौधा केवल प्रकाश संश्लेषण पर ही जीवित रह सकता है लेकिन अगर इसे सही जगह पर लगाया जाए, तो ओ. पेटेंस की जड़ें लकड़ी को विघटित करने वाले कवकों को खाती हैं। परिणामस्वरूप, एक अधिक मजबूत पौधा विकसित होता है।
5. रेलिक्टिथिस्मिया किमोट्सुकिएन्सिस (Relictithismia kimotsukiensis): 2022 में, एक जापानी यात्री को एक असामान्य पौधा दिखाई दिया। थिस्मियेसी कुल के पौधों को आम तौर पर फेयरी लैंटर्न (परियों का लालटेन) कहा जाता है। (जापान में इन्हें Tanuki-no-shokudai कहते हैं जिसका अर्थ होता है रैकून डॉग कैंडलस्टिक्स)। इस प्रजाति की प्रमुख विशेषता इसके भूमिगत फूल हैं।
दूर तक फैला नेटवर्क पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है, वहीं पौधे उन्हें प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) से बनी शर्करा उपलब्ध कराते हैं। यह सहजीवी सम्बंध लगभग 90 प्रतिशत थलीय पेड़-पौधों में पाया जाता है।

दरअसल, फफूंद तंतुओं (हायफा) (hyphal network)का एक जाल बनाती हैं जो मिट्टी में दूर-दूर तक फैला होता है। इसकी मदद से वे पानी के अलावा नाइट्रोजन (nitrogen) व फॉस्फोरस (phosphorus) जैसे अनिवार्य पोषक खनिज प्राप्त करती हैं। इनमें कुछ पानी तथा खनिज पौधे की जड़ों को मिल जाते हैं। बदले में पौधा शर्करा प्रदान कर देता है। माना जाता है कि पौधों की जड़ों का भूमिगत कवकों से सम्बंध पौधों के ज़मीन पर पहुंचने और बसने में निर्णायक रहा है।

लेकिन हम जिन कवक-परपोषियों की बात कर रहे हैं, वे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल पर निर्भर रहने की बजाय कवक से कुछ कार्बनिक पदार्थ चुरा लेते हैं। यानी यह सम्बंध सहजीवन का नहीं बल्कि परजीविता (parasitism) का है।

ऐसा अनुमान है कि 33,000 से ज़्यादा पादप प्रजातियां अंकुरण और प्रारंभिक विकास के दौरान कवक-परपोषी होती हैं। इनमें कुछ क्लब मॉस (club moss), फर्न, लिवरवर्ट (liverworts) और सभी ऑर्किड शामिल हैं। वनस्पति शास्त्रियों ने लगभग 600 ऐसी पादप प्रजातियों की भी पहचान की है जो जीवन भर कवक-परपोषी होती हैं। इनमें से लगभग आधी तो ऑर्किड प्रजातियां हैं। 10 वनस्पति कुलों की करीब 400 प्रजातियों में क्लोरोफिल पूरी तरह समाप्त हो चुका है और ये फफूंद के ज़रिए अन्य हरे पेड़-पौधों से कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। इसके अलावा लगभग 20,000 प्रजातियां आंशिक रूप से कवक-परपोषी हैं, जो प्रकाश संश्लेषण भी करती हैं और कवक से भी कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। ये अधिकांशत: अंकुरण के कुछ समय बाद तक ही फफूंदों पर निर्भर होती हैं।

वैसे ऑर्किड्स में फफूंद मायकोराइज़ा (orchid mycorrhiza) पर निर्भरता विवाद का विषय रही है। हालांकि सारे ऑर्किड्स अपने शुरुआती विकास के दौरान कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करने के लिए फफूंदों पर निर्भर रहते हैं लेकिन कई ऑर्किड्स वयस्क अवस्था में इस निर्भरता से मुक्त हो जाते हैं। रेडियोकार्बन ट्रेसिंग (radiocarbon tracing) के आधार पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक हरे ऑर्किड गुडयेरा रेपेन्स (Goodyera repens) का अपने फफूंद साथी (Ceratobasidium cornigerum) से सम्बंध परपोषिता का नहीं बल्कि सहजीविता का होता है।

कवक-परपोषी पौधे: इकॉलॉजी

कवक-परपोषिता एक प्रकार का परजीवी पोषण (parasitic nutrition) तरीका है जहां कुछ पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की बजाय फफूंद से सीधे कार्बनिक पदार्थों (organic nutrients) के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह सम्बंध कई वनस्पति समूहों में पाया गया है जो या तो केवल बीजों के अंकुरण के समय या जीवन भर के लिए होता है। क्लोरोफिल के अभाव वाले गैर प्रकाश संश्लेषी पौधों (non-photosynthetic plants) में यह पूर्णकालिक होता है और ये पीले या क्रीम रंग के होते हैं।

ये पौधे वहां अक्सर पाए जाते हैं जहां पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होती है या घने जंगलों की तलहटी में पाए जाते हैं जहां प्रकाश नहीं पहुंचता।

कवक-परपोषी वस्तुत: जड़ फफूंद जाल (नेटवर्क) (fungal root network) को धोखा देते हैं और उनसे होने वाले कार्बन प्रवाह पर निर्भर रहते हैं जो सामान्यत: अन्य पौधों में परस्पर लेन-देन वाला होता है। कुल मिलाकर ये पौधे चोर हैं जो फफूंदों से सिर्फ लेते ही हैं, बदले में कुछ देते नहीं। किसी स्थान पर इनका पाया जाना प्रकाश की कमी और मिट्टी में पोषक पदार्थ के अभाव से सम्बंधित होता है। लगता है, मिट्टी में फॉस्फोरस की कमी (phosphorus deficiency) भी कवक-परपोषिता को बढ़ावा देती है।

आखिर क्यों?

जीव वैज्ञानिकों (evolutionary biologists) को यह सवाल सताता रहा है कि आखिर स्वपोषी पौधों में यह कवक-परपोषिता क्योंकर विकसित हुई होगी। वैकासिक जीव विज्ञानियों ने इस बात के प्रमाण पाए हैं कि जैव विकास की प्रक्रिया में पूर्ण कवक-परपोषिता कम से कम 50 से ज़्यादा बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है। हो सकता है यह घने जंगलों, जहां प्रकाश कम होता है, में जीवित रहने के लिए एक अनुकूलन हो। लेकिन वैसे अभी कोई निश्चित कारण सामने नहीं आया है।

कोबे विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री केन्जू सुएत्सुगु कहते हैं कि जवाब न मिलने का कारण शायद यह है कि कवक-परपोषी पौधों पर बहुत कम शोध (limited research) किया गया है।

दरअसल, कवक-परपोषी वनस्पतियों पर सुएत्सुगु के अद्भुत वैज्ञानिक कार्य के चलते आज उन्हें इस विषय का प्रमुख विद्वान माना जाता है। पिछले वर्षों में उन्होंने इन पौधों के अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया है।

बीजों का बिखराव और परागण

एक सवाल यह भी था कि ऐसे पौधों में परागण कैसे होता है और इनके बीज दूर-दूर तक बिखरते कैसे हैं। ऐसा माना जाता था कि कई कवक-परपोषी अपने धूल के कणों के आकार के बीजों को बिखेरने के लिए हवा पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके विरुद्ध तर्क यह था कि यह थोड़ा जोखिम भरा होगा क्योंकि एक तो इन पौधों का कद छोटा है और घने जंगलों में हवाएं भी कमज़ोर होती हैं।

सुएत्सुगु ने तीन प्रजातियों – योनिया अमाजिएंसिस, फेसेलैंथस ट्यूबिफ्लोरस और मोनोट्रॉपेस्ट्रम ह्यूमाइल (Yoania amagiensis, Phacellanthus tubiflorus, Montropastrum humile) – का गति-संचालित कैमरों (motion-triggered cameras) से 190 घंटे तक अवलोकन किया। पता चला कि गुफा झींगुर और ज़मीनी गुबरैले इन पौधों के बीजों से लदे फल खा गए। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इन पौधों के सैकड़ों बीज गुफा झींगुरों के पेट से गुज़रने के बाद भी जीवनक्षम बने रहे; जबकि ज़मीनी भृंगों द्वारा निगले जाने पर एक भी बीज जीवित नहीं बचा। पता चला कि एक काष्ठ आवरण बीजों को झींगुर के पाचक रस से तो बचाता है, लेकिन भृंग के चबाने से नहीं।

सुएत्सुगु ने अन्य अप्रत्याशित परागणकर्ताओं और बीज बिखेरने वालों की पहचान की है। कैमरा ट्रैप में एक क्लबियोना मकड़ी को आर्किड नियोटिएन्थे क्यूकुलेटा (Neottianthe cucullata) का रस चूसते और अपने जबड़ों में परागकणों को चिपकाए फूलों के बीच घूमते हुए कैद किया गया। उनके समूह ने पहली बार दिखाया कि गुफा झींगुर (cave crickets) और ऊंट झींगुर तथा चींटियां परागण और बीज बिखेरने दोनों का  काम करते हैं। वुडलाउस (Porcellio scaber) एम. ह्यूमाइल के फल खाकर मल के साथ जीवनक्षम बीज उत्सर्जित कर सकते हैं। देखा जाए, तो ये वुडलाइस जीवजगत में सबसे नन्हे बीज प्रकीर्णक हैं। 

वैसे कवक-परपोषी पौधों में स्व-परागण भी होता है। जैसे एक आर्किड, स्टिग्मैटोडैक्टाइलस सिकोकिएनस (Stigmatodactylus sikokianus) स्व-परागण और पर-परागण दोनों आज़माता है। इसका फूल शुरू में तो खुला होता है, जिससे परागणकर्ताओं को मौका मिलता है। लेकिन कुछ ही दिन बाद, वर्तिकाग्र, यानी मादा अंग, संकुचित हो जाता है, जिससे एक छोटा, उंगली जैसा उपांग फूल के नर अंग (परागकोश) के संपर्क में आ जाता है और परागकण अंडाशय तक पहुंच जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर रहे टैटू

क हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि टैटू (tattoo) सिर्फ त्वचा पर डिज़ाइन बनाने तक सीमित नहीं रहते बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) पर भी असर डाल सकते हैं। स्विट्ज़रलैंड के शोधकर्ताओं ने टैटू में इस्तेमाल होने वाले तीन आम रंगों (काला, लाल और हरा) की जांच के बाद टैटू सम्बंधी दीर्घकालिक सुरक्षा (long-term safety) को लेकर कई सवाल उठाए हैं।

अध्ययन में पाया गया कि टैटू की स्याही (tattoo ink) त्वचा में बनी रहने की बजाय शरीर के अंदर फैल जाती है। जब स्याही त्वचा की निचली परत (डर्मिस- dermis) में डाली जाती है, तो उसके बेहद छोटे-छोटे कण शरीर में भटकते-भटकते लसिका ग्रंथियों (lymph nodes) में जमा हो जाते हैं, ये ग्रंथियां प्रतिरक्षा प्रणाली की महत्वपूर्ण अंग होती हैं। ये कण कई सालों तक वहीं बने रह सकते हैं।

प्रतिरक्षा कोशिकाएं (जैसे मैक्रोफेज) इन कणों को तोड़ने की कोशिश में सफल नहीं होतीं और मरने लगती हैं। इस वजह से शरीर में हमेशा हल्की सूजन (chronic inflammation) बनी रहती है। यह निरंतर तनाव प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर सकता है; खास तौर पर काली और लाल स्याही में यह प्रभाव अधिक देखा गया।

चूहों पर किए गए प्रयोगों (animal studies) में पाया गया कि टैटू की स्याही के सूक्ष्म कण (nanoparticles) कुछ ही घंटों में लसिका ग्रंथियों तक पहुंच जाते हैं और कम से कम दो महीने तक टिके रहते हैं। इस दौरान चूहों में कोविड-19 टीके (COVID-19 vaccine) के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कमज़ोर हो गई, जबकि हैरानी की बात यह थी कि पराबैंगनी विकिरण से निष्क्रिय फ्लू टीके (influenza vaccine) के प्रति उनकी प्रतिक्रिया बेहतर हो गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों पर शोध ज़रूरी है, क्योंकि अलग-अलग टीके, टैटू स्याही के साथ अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

बहरहाल आज टैटू पहले से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय (tattoo popularity) हो चुके हैं। लेकिन एक चिंता यह है कि टैटू की स्याही में लगभग 100 तरह के रसायन होते हैं, जिनमें कई औद्योगिक पिगमेंट (industrial pigments) भी शामिल होते हैं। यही वजह है कि अब कई देशों में निगरानी कड़ी की जा रही है। युरोप ने 2022 में रेस्ट्रिक्शन ऑफ हैज़ार्डस सब्सटेंसेस इन टैटू इंक्स एंड पर्मानेंट मेक-अप (REACH) नियम के तहत टैटू स्याही के लिए कड़े रासायनिक मानक (chemical safety standards) लागू कर दिए।

टैटू जितने ज़्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को समझना और भी ज़रूरी हो गया है। अन्यत्र भी मानक (regulatory guidelines) लागू करने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दूरबीनों के लिए बाधा बन रहे हज़ारों उपग्रह

दुनिया भर में इंटरनेट की मांग (internet demand) बढ़ने के कारण हज़ारों नए उपग्रह छोड़े जा रहे हैं। खगोलविद इन इंटरनेट उपग्रहों से काफी चिंतित हैं। दरअसल, ये उपग्रह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं और ऐसी रेडियो तरंगें (radio waves) छोड़ते हैं जो संवेदनशील दूरबीनों के लिए बाधा बन रही हैं।

एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2040 तक लगभग पांच लाख उपग्रह (satellite mega-constellation) पृथ्वी की कक्षा में होंगे। इतनी बड़ी संख्या में उपग्रह उन्नत अंतरिक्ष दूरबीनों की तस्वीरों को बिगाड़ सकते हैं। नासा (NASA)  के सिमुलेशन से पता चला है कि उपग्रहों का महाजाल चार प्रमुख दूरबीनों – हबल, Xuntian, SPHEREx, और ARRAKIHS – पर क्या असर डालेगा। परिणाम चिंताजनक हैं।

खगोलविदों को उम्मीद थी कि यदि दूरबीनों को पृथ्वी की सतह (Earth surface) से दूर अंतरिक्ष में रखा जाए, तो वे उपग्रहों की चमकीली लकीरों (satellite streaks) से बच सकेंगे। लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह उम्मीद बेमानी थी। भविष्य में 540 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थापित हबल दूरबीन (Hubble Space Telescope) की हर तीन में से एक तस्वीर में उपग्रह का खलल दिखाई देगा। विस्तृत परास वाली अंतरिक्ष दूरबीनों की हालत इससे भी बुरी होगी – SPHEREx और ARRAKIHS की लगभग हर तस्वीर में कम से कम एक चमकीली लकीर होगी। और, 2026 में लॉन्च होने वाली Xuntian दूरबीन की एक तस्वीर में 90 से अधिक उपग्रह लकीरें दिखने की संभावना है।

इस समस्या से बचना इसलिए लगभग असंभव है क्योंकि अधिकतर उपग्रह 500 से 700 कि.मी. की ऊंचाई (Low Earth Orbit – LEO) पर परिक्रमा करते हैं; कुछ तो 8000 कि.मी. तक भी स्थापित किए जाते हैं। यानी ये उपग्रह निचली कक्षा में मौजूद हर दूरबीन की तस्वीरों में डैटा (astronomical data) को नुकसान पहुंचाएंगे।

हालांकि, कंपनियों ने इन्हें थोड़ा ‘डार्क’ (dark satellite) बनाने की कोशिश की है, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। कई उपग्रह अभी भी काफी चमकीले (optical brightness) हैं। इसके अलावा इनके रेडियो सिग्नल (radio interference) दूर-दूर तक रेडियो दूरबीनों के काम में बाधा डाल रहे हैं।

तस्वीरों से उपग्रह की लकीरों को हटाने वाला सॉफ्टवेयर (image processing software) भी पूरा समाधान नहीं दे पाता है। कई बार वह सही काम नहीं करता, और जब करता है, तो तस्वीरों में ‘शोर’ बढ़ जाता है और माप में अनिश्चितता (measurement uncertainty) आ जाती है।

नासा के सिमुलेशन मॉडल (simulation models) के अनुसार अंतरिक्ष में मौजूद दूरबीनें भी उपग्रहों की लकीरों से प्रभावित होंगी। उपग्रहों का असर दो बातों पर निर्भर करता है: एक, दूरबीन की ऊंचाई (orbital altitude) पर – जितनी ऊंचाई पर दूरबीन होगी उस पर उपग्रहों का असर उतना ही कम होगा। दूसरी, दूरबीन के दृश्य क्षेत्र (field of view) पर। जितना बड़ा दृश्य क्षेत्र होगा, उतनी ही ज़्यादा उपग्रह लकीरें दिखेंगी।

इस स्थिति में Xuntian (450 कि.मी. की कक्षा) बहुत अधिक संवेदनशील होगा। इसका दृश्य क्षेत्र हबल से 300 गुना बड़ा (wide field telescope) है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें दिखेगी। पूरे आकाश का अवरक्त सर्वे (infrared sky survey) करने वाला SPHEREx एक फ्रेम में चांद से 200 गुना बड़ा क्षेत्र कैप्चर करता है, इसलिए इसकी लगभग हर तस्वीर में उपग्रह लकीरें होंगी।

हालांकि, कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि स्थिति हर जगह इतनी भयावह नहीं होगी। उदाहरण के लिए ARRAKIHS दूरबीन ज़्यादातर ‘सीधे ऊपर’ देखेगी, इसलिए उसकी कुछ तस्वीरों में लकीरें कम हो सकती हैं। फिर भी अनुमान बताते हैं कि लगभग 96 प्रतिशत तस्वीरें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित (affected observations) होंगी।

इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक ने कुछ संभावित उपाय सुझाए हैं:

  • उपग्रहों की ऊंचाई (satellite altitude) सीमित की जाए, ताकि अंतरिक्ष दूरबीनें उनसे ऊपर की कक्षा में रखी जा सकें।
  • उपग्रहों की ट्रैकिंग (satellite tracking) को अधिक सटीक बनाया जाए, ताकि दूरबीनें उन्हें पहचानकर बच सकें या बाद में लकीरों को हटाया जा सके।
  • उपग्रहों को और अधिक ‘डार्क’ बनाया जाए, ताकि वे कम चमकें (low reflectivity)।

ये सारे उपाय कहने में आसान हैं लेकिन उपग्रहों का यह जाल चिंताजनक है। जो आकाश कभी प्राकृतिक प्रयोगशाला (natural laboratory) था, वह अब एक औद्योगिक क्षेत्र बनता जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इस मछली के सिर पर दांत होते हैं

ह तो जानी-मानी बात है कि अधिकांश रीढ़धारी यानी कशेरुकी जंतुओं (vertebrates) के मुंह में दांत पाए जाते हैं जो चबाने वगैरह का काम करते हैं। लेकिन एक मछली है जिसके सिर पर एक उभरा हुआ अंग टेनाक्युलम (tenaculum) होता है और उस पर दांत उगे होते हैं। इन विचित्र मछलियों को भूतहा शार्क (ghost shark) या शिमेरा मछली (chimaera fish) कहते हैं। 

ऐसी ही एक शिमेरा है स्पॉटेड रैटफिश (Hydrolagus colliei)। यह उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर में रहती है। लंबाई लगभग दो फुट होती है, सिर बड़ा सा होता है और एक लंबी सी पूंछ होती है।

देखा गया है कि टेनाक्युलम सभी शिमेरा मछलियों के सिर पर होता है। लेकिन टेनाक्युलम पर दांत सिर्फ नर शिमेरा में पाए जाते हैं। खास बात यह है कि नर शिमेरा में टेनाक्युलम को ऊपर उठाया जा सकता है। नर शिमेरा संभोग (mating behavior) के दौरान टेनाक्युलम पर उगे दांतों की मदद से मादा को थामकर रखते हैं। वैसे तो कई मछलियों में कूल्हों के नज़दीक ऐसे अंग (reproductive organ) होते हैं जो मादा को पकड़कर सटाए रखते हैं। गौरतलब बात है कि शिमेरा में सिर पर मौजूद टेनाक्युलम कूल्हों के अंग के अतिरिक्त होता है। लेकिन वैज्ञानिक इस बात पर विचार करते रहे हैं कि आखिर टेनाक्युलम पर दांत आए कैसे यानी जैव विकास (evolutionary origin) में इनकी उत्पत्ति कैसे हुई।

अब फ्लोरिडा विश्वविद्यालय (University of Florida) के कार्ली कोहेन और उनके साथी शोधकर्ताओं ने सिर पर उगे दांतों की उत्पत्ति का अनुमान लगा लिया है और अपने निष्कर्ष प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस (PNAS) (यूएस) में प्रकाशित किए हैं। इसके लिए उन्होंने Hydrolagus colliei के विकास के विभिन्न चरणों (developmental stages) का अध्ययन किया और साथ ही उन्होंने कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous period) में पाई जाने वाली ऐसी ही एक मछली Helodus simplex के जीवाश्मों का भी अध्ययन किया।

सबसे पहली बात तो यह पता चली कि नरों में यह उभार पहले पूरा विकसित हो चुकने के बाद ही दांत निकलते हैं। ये दांत टेनाक्युलम के अंदर से ही उगते हैं। यह भी स्पष्ट हुआ कि इस रचना का सम्बंध ऊपरी जबड़े (upper jaw) से है और दांतों का विन्यास शार्क के मुंह के दांतों (shark teeth) से मेल खाता है।

शोधकर्ताओं ने टेनाक्युलम और उस पर दांतों के विकास के लिए ज़िम्मेदार आणविक क्रियापथ (molecular pathways)  और जीन्स वगैरह को भी पहचाना है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दृष्टि बहाली के लिए एक मॉडल जीव घोंघा

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

काश ऐसा कोई स्विच होता जो ऑन होकर हमें आंखों की रोशनी (vision restoration) जैसी असाधारण क्षमताएं वापिस दे सकता? मनुष्यों और कई अन्य प्रजातियों की आंखें कैमरे की तरह होती हैं; आंख में एक लेंस होता है जो प्रकाश को रेटिना पर फोकस करता है। पुनर्जनन (regeneration) आंखों की उस क्षमता को कहेंगे जिसमें वह पूरी तरह से हटाए जाने या घायल हो जाने के बाद फिर से अपना निर्माण कर सके। नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में एलिस एकोर्सी और एलेज़ांद्रो सांचेज़ अल्वारेडो की टीम ने अपने हालिया काम में दिखाया है कि गोल्डन एप्पल घोंघे में आंख का ऐसा पुनर्निर्माण कैसे होता है।

घोंघा एक मोलस्क (mollusk) जीव है, यानी अकेशरुकी (invertebrate) जीव जिसके ऊपर खोल होती है और वह भूमि और पानी दोनों में अच्छी तरह से जीवित रह सकता है।

घोंघे में पुनर्जनन का यह कारनामा कोई जादू नहीं है, बल्कि सुंदर आणविक संयोजन (molecular mechanisms) का नतीजा है। जब घोंघा अपनी एक आंख खो देता है तो हज़ारों जीन स्विच (खटकों) की तरह ऑन हो जाते हैं: पहले वे स्विच ऑन होते हैं जो घाव भरने में मदद करते हैं, फिर वे जीन सक्रिय होते हैं जो कोशिकाओं के विकास और विभाजन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, उसके बाद नई रेटिना कोशिकाओं, प्रकाशग्रहियों और लेंस के निर्माण के लिए ज़िम्मेदार अलग-अलग जीन/नेटवर्क सक्रिय होते हैं। इनमें से एक जीन, PAX6 (eye development gene), आंख के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। घोंघे में, यह प्रक्रिया कई अन्य जीन्स द्वारा सावधानीपूर्वक प्रबंधित की जाती है। इसमें नई तंत्रिका कोशिकाओं को बनाने वाले जीन, तंत्रिका तंतुओं को उनके सही लक्ष्यों तक पहुंचाने वाले और प्रकाश को ताड़ने के लिए ज़िम्मेदार जीन शामिल हैं। आंख एकदम ठीक तरीके से विकसित हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए इनमें से प्रत्येक जीन एकदम ठीक चरण पर सक्रिय हो जाता है।

फिलहाल, हम मनुष्य ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन इन जेनेटिक ट्रिगर्स (genetic triggers) को समझकर एक दिन हम अपनी सुप्त पुनर्निर्माण प्रणाली (regenerative system) को सक्रिय कर पाएंगे।

जिस तरह घोंघे अपनी आंखें फिर से विकसित सकते हैं, उसी तरह मेंढक, प्लेनेरिया (planaria) और अफ्रीकी कांटेदार चूहे (African spiny mouse) जैसे अन्य जीवों में भी मज़बूत पुनर्जनन क्षमताएं होती हैं। एक तरह के सैलेमेंडर (एक्सोलोट्ल- (axolotl)) में क्षतिग्रस्त ऊतक हरफनमौला स्टेम कोशिका (stem cells) जैसे बन सकते हैं और हड्डियों, मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। क्रिस्पर (CRISPR gene editing)  एक जीन-संपादन तकनीक है, जिसकी मदद से हम अपनी वांछित जीनोम संरचना को फिर से डिज़ाइन कर सकते हैं, रीमॉडल कर सकते हैं और पुनर्निर्मित कर सकते हैं।

हैदराबाद के एल. वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट (LV Prasad Eye Institute) में, वैज्ञानिकों ने ज़ेब्राफिश (zebrafish model) को जंतु मॉडल के तौर पर इस्तेमाल करके लेबर कॉन्जेनाइटल एमॉरोसिस (LCA) (Leber Congenital Amaurosis – LCA) और स्टारगार्ड्ट (Stargardt disease) जैसी आंखों की जेनेटिक बीमारियों को ठीक करने के लिए क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल किया है।

जंतुओं से मनुष्यों तक

शुरुआती परीक्षणों में पहले से ही क्रिस्पर संपादन का इस्तेमाल करके मनुष्यों की जेनेटिक बीमारियों (genetic disorders) को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे सिकल सेल एनीमिया (sickle cell anemia); β-थैलेसीमिया (beta thalassemia), जन्मजात खून की कमी; और LCA (genetic blindness), जो एक तरह का जन्मजात अंधापन है।

हाल ही में, हार्वर्ड युनिवर्सिटी (Harvard University) की एक टीम द्वारा क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल करके मनुष्यों में LCA के इलाज के लिए किए जा रहे पहले क्लीनिकल परीक्षण (clinical trials) के नतीजे सामने आए हैं। ये नतीजे दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं जिसमें जन्मांधता से पीड़ित लोगों की दृष्टि में सुधार दिखाई दिया है। यह प्रयास, जंतु मॉडल में पुनर्जनन को समझकर मानव कोशिकाओं में मरम्मत प्रोग्राम को फिर से सक्रिय कर सकने की उम्मीद जगाता है। यह जीन-निर्देशित पुनर्जनन चिकित्सा (gene-guided regenerative medicine) के लिए एक फ्रेमवर्क देता है।

ये उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि पुनर्जनन (biological regeneration) कोई दुर्लभ चमत्कार नहीं है। बल्कि यह एक प्राचीन जैविक कार्यप्रणाली (biological process) है जो अभी भी कई प्रजातियों के DNA (genetic code) में अंकित है, और जिसे विज्ञान धीरे-धीरे समझना और फिर से सक्रिय करना सीख रहा है।

गोल्डन एप्पल घोंघे (golden apple snail study) पर किए गए नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि कैसे उसका जीनोम (genome memory) उस अंग को पुनर्निर्मित करना याद रखता है जिसे दोबारा बनाना हमें असाध्य लगता है। और, घोंघे की इस याददाश्त (biological memory) को डीकोड करके चिकित्सा विज्ञान मनुष्य की आंखों को बहाल करने की क्षमता के करीब पहुंच सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टीकों में एल्युमिनियम को लेकर छिड़ी बहस

डॉ. सुशील जोशी

हाल में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया है कि टीकों में एल्युमिनियम (aluminum in vaccines) के उपयोग से शारीरिक नुकसान होता है और इसकी वजह से ऑटिज़्म (autism) जैसी तकलीफों में वृद्धि हो रही है। यह विवाद अमेरिका में चल रहा है। लेकिन उस विवाद में जाने से पहले यह देखना लाभप्रद होगा कि टीके काम कैसे करते हैं और उनमें एल्युमिनियम के उपयोग का आधार क्या है।

सरल शब्दों में कहें तो टीके (vaccination) किसी रोगजनक (pathogen) की नकल करते पदार्थ होते हैं जो रोग पैदा नहीं करते। तकनीकी शब्दों में इन टीकों पर उस रोगजनक का कोई अणु होता है जिसे एंटीजन कहते हैं। जब यह एंटीजन शरीर में पहुंचता है तो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) की कोशिकाएं इस पर हमला करती हैं और हमला करते हुए वे सीख जाती हैं कि यह कोई हानिकारक चीज़ है और इसे कैसे निष्क्रिय करना है। यही स्थिति तब भी होती है जब वास्तविक रोगजनक शरीर में पहुंचता है। प्रतिरक्षा तंत्र उससे निपटने की कोशिश करता है और कई बार निपट भी लेता है। टीके इसी संघर्ष के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को तैयार करते हैं। हाल में टीकों पर जो शोध कार्य हुआ है उसे छोड़ दिया जाए तो टीके दो प्रकार के होते हैं – एक प्रकार वह है जिसमें वास्तविक रोगजनक को जीवित अवस्था में दुर्बल करके (सैबिन द्वारा विकसित पोलियो (oral polio vaccine) का जीवित दुर्बल टीका) या मारकर (सैबिन का मृत पोलियो वायरस टीका) इस्तेमाल किया जाता है और दूसरा प्रकार वह है जिसमें रोगजनक के एंटीजन को पृथक करके इस्तेमाल किया जाता है (जैसे डिफ्थीरिया-टिटेनस-पर्टूसिस (DPT vaccine) या हिपेटाइटिस (hepatitis vaccine) ए व बी के टीके)।

इसके बाद मामला आता है एल्युमिनियम (aluminum adjuvant) का। दरअसल, एल्युमिनियम टीके के साथ एक सह-औषध (एडजुवेंट- adjuvant) के तौर पर मिलाया जाता है। अलबत्ता, यही एकमात्र एडजुवेंट नहीं है। पिछले लगभग 40 सालों में वैज्ञानिकों ने शोध करके कई एडजुवेंट (vaccine adjuvants) पहचाने हैं और इस्तेमाल किए हैं। वैसे तो कई लोगों में टीकों को लेकर ही शंकाएं हैं और वे मानते हैं कि टीके हानिकारक होते हैं। खैर, फिलहाल बात करते हैं एडजुवेंट्स की चूंकि वर्तमान विवाद का मुद्दा यही है।

टीकों का उपयोग तो काफी पहले शुरू हो चुका था। इसका श्रेय एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) को दिया जाता है जिन्होंने 1796 में पहली बार एक लड़के को चेचक का टीका (smallpox vaccine) लगाया था। 1926 में एक प्रतिरक्षा वैज्ञानिक एलेंक्जेंडर थॉमस ग्लेनी (Alexander Glenny) ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन किया था जिसने एडजुवेंट की बुनियाद रखी थी। उन्होंने देखा कि यदि टीकाकरण से पहले घुलनशील एंटीजन को फिटकरी (एल्यूमिनियम पोटेशियम सल्फेट) के साथ रखा जाए तो वह एंटीजन फिटकरी के साथ अवक्षेपित हो जाता है और इस प्रकार उपचारित एंटीजन कहीं बेहतर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया लगभग वैसी ही है जैसी मटमैले पानी को साफ करने के लिए फिटकरी का उपयोग। उन्होंने ये प्रयोग गिनी पिग पर किए थे और देखा था कि अवक्षेपित एंटीजन से उनमें एंटीबॉडी का उत्पादन अधिक होता है। इसी बाहर से मिलाए गए पदार्थ को एडजुवेंट कहते हैं।

इस खोज के बाद सबसे पहले एल्यूमिनियम लवण (aluminum salts) एडजुवेंट का उपयोग टिटेनस (tetanus vaccine) तथा डिफ्थीरिया टॉक्साइड के टीकों (diphtheria vaccine) में किया गया था। आजकल तो दुनिया भर में अघुलनशील एल्युमिनियम लवणों का उपयोग विभिन्न टीकों में किया जाता है।

वैसे 1940 के दशक में जूल्स फ्रायंड (Jules Freund) ने एडजुवेंट की एक और किस्म विकसित की थी। ये पानी और तेल के इमल्शन थे जो एंटीजन के साथ दिए जाने पर एंटीजन की उम्र बढ़ा देते हैं और वह काफी समय तक प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय रखता है। अलबत्ता, फ्रायंड के एडजुवेंट का उपयोग सीमित ही रहा है।

यहां एक सवाल यह उठता है कि ये एडजुवेंट करते क्या हैं। रोचक बात है कि एडजुवेंट्स (immune adjuvants) का उपयोग करते हमें एक सदी बीत चुकी है लेकिन आज भी इनकी क्रियाविधि (mechanism of action) को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं है। काफी अनुसंधान के बाद यह समझ में आया है कि एडजुवेंट दो-तीन तरह से काम करते हैं और टीके की प्रभावशीलता या उनकी क्रियाशील अवधि को बढ़ाते हैं। एक तरीका तो यह है कि एडजुवेंट शरीर में एंटीजन के प्रसार में मदद करते हैं और इस तरह से प्रतिरक्षा तंत्र की ज़्यादा कोशिकाएं उसके संपर्क में आती हैं। इसके अलावा इमल्शन में घुले हुए एंटीजन अपेक्षाकृत धीरे-धीरे विघटित होते हैं। इसके चलते प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देर तक बनी रहती है और दीर्घावधि प्रतिरक्षा (long-term immunity) प्राप्त होती है।

दूसरा तरीका यह है कि (खास तौर से एल्युमिनियम लवण जैसे एडजुवेंट (aluminum-based adjuvants)) एंटीजन से जुड़ जाते हैं और उसे प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करते हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं जन्मजात प्रतिरक्षा का हिस्सा होती हैं। जब एंटीजन इनमें प्रवेश करता है तो कोशिका उसे प्रोसेस करती है और परिणाम यह होता है कि वह कोशिका की सतह पर दिखने लगता है। अब ये कोशिकाएं अनुकूली प्रतिरक्षा (adaptive immunity) कोशिकाओं (जैसे टी कोशिकाओं) के संपर्क में आती हैं और टी कोशिकाएं उस एंटीजन को पहचानकर आगे की कार्रवाई शुरू कर देती हैं। कहने का मतलब है कि जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र अनुकूली प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करता है और एडजुवेंट इसमें मदद करते हैं।

अर्थात कुल मिलाकर एडजुवेंट अनुकूली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करने में और एंटीजन को देर तक शरीर में टिके रहने में मदद करते हैं।

अब आते हैं एल्युमिनियम (aluminum exposure) पर। सबसे पहले तो यह जान लेना ज़रूरी है कि टीकों में एडजुवेंट के तौर पर एल्युमिनियम लवणों का उपयोग एक सदी से होता आया है। लिहाज़ा इनके उपयोग का परीक्षण और जांच भी सबसे अधिक हुई है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि एल्यूमिनियम से हमारा संपर्क कई तरह से होता है – खानपान (dietary aluminum) के साथ और हवा के ज़रिए। मानव शरीर में एल्युमिनियम का अवशोषण पाचन तंत्र और श्वसन तंत्र में होता है। फिर इसे बाहर निकालने का काम होता है। बहरहाल, एक इंसान द्वारा सांस के साथ लिए गए एल्युमिनियम में से 3 प्रतिशत और खानपान के रूप में लिए गए एल्युमिनियम में से 1 प्रतिशत पूरे शरीर में फैल जाता है। वैसे शरीर में जमा कुल एल्युमिनियम में से 95 प्रतिशत तो खानपान के साथ आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) ने कुल अंतर्ग्रहित एल्युमिनियम की मात्रा तय की है – 1 मिलीग्राम/प्रति किलोग्राम प्रतिदिन (safe intake limit)। यानी यदि आपका वज़न 60 किलो है तो अधिकतम 60 मि.ग्रा. एल्युमिनियम ले सकते हैं। इसके अलावा इंजेक्शन से दिया जाने वाला एल्युमिनियम तो खून के ज़रिए पूरे शरीर में फैल सकता है। इसलिए निर्धारित किया गया है कि ऐसे किसी भी घोल में एल्युमिनियम प्रति लीटर 25 ग्राम से कम होना चाहिए (vaccine safety)।

एक बार अवशोषित होने के बाद एल्युमिनियम हड्डियों, लीवर, फेफड़ों तथा तंत्रिका तंत्र (nervous system) में जमा हो जाता है। सामान्यत: यह धीरे-धीरे उत्सर्जित किया जाता है लेकिन गुर्दों की समस्याओं से ग्रस्त लोगों में उत्सर्जन बहुत प्रभावी नहीं होता। ऐसे लोगों में काफी सारा एल्युमिनियम मस्तिष्क में जमा हो सकता है। इसे लेकर कई प्रयोग हुए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वयस्कों में स्थायी रूप से जमा हुए एल्युमिनियम की मात्रा 30-50 मिलीग्राम ही पाई गई है।

टीके की प्रति खुराक में एल्युमिनियम की अधिकतम मात्रा भी निर्धारित की गई है। जैसे युरोप में यह मात्रा प्रति खुराक 1.25 मि.ग्रा. और यूएस में 0.85 मि.ग्रा. प्रति खुराक है। भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों का उपयोग होता है। गौरतलब है कि हम खानपान के ज़रिए प्रतिदिन इससे कहीं अधिक मात्रा में एल्युमिनियम का सेवन करते हैं। एक बड़ा अंतर यह भी है कि टीकों में एल्युमिनियम अघुलनशील लवणों के रूप में होता है जबकि खानपान में प्राय: घुलनशील लवण पाए जाते हैं। लिहाज़ा, टीकों के एल्युमिनियम का शरीर में अवशोषण अपेक्षाकृत कम होता है।

जंतुओं पर किए गए कुछ प्रयोगों में पता चला है कि 0.85 ग्राम एल्युमिनियम देने पर सीरम में एल्युमिनियम की मात्रा 2 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रही जो सामान्य स्तर से महज 7 प्रतिशत थी। इस प्रयोग में यह भी देखा गया था कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम की मात्रा (brain aluminum levels) कितनी रही। देखा गया कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम 0.0001 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम बढ़ा जो मस्तिष्क में एल्युमिनियम के सामान्य औसत (0.2 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम) से 2000 गुना कम है। यह संभव है कि गुर्दों की दिक्कत से पीड़ित लोगों में यह स्तर ज़्यादा होता होगा। वैसे तंत्रिका-क्षति तथा उससे जुड़े रोगों के एल्युमिनियम से सम्बंध को लेकर कोई ठोस प्रमाण भी नहीं हैं।

कुछ समय से टीकों को लेकर एक और शंका जताई जा रही है। कहा गया है कि टीके प्रतिरक्षा तंत्र को स्वयं अपनी शरीर की कोशिकाओं के विरुद्ध सक्रिय कर सकते हैं। हालांकि यह भी सामने आया है कि ऐसी प्रतिक्रिया कतिपय अन्य कारकों (जैसे किसी संक्रामक इकाई) की उपस्थिति की वजह से होती है और उस कारक को हटाने पर वह प्रतिक्रिया भी समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष के तौर पर, एल्युमिनियम एडजुवेंट को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनका कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है। दरअसल, टीकों ने और टीकों में जोड़े गए एडजुवेंट्स ने हमें कई रोगों से बचाया है। एडजुवेंट जोड़ने से एंटीजन की कम मात्रा इंजेक्ट करना होती है और वे दीर्घावधि सुरक्षा प्रदान करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जीव-जंतुओं में सुरक्षा के जुगाड़

जीवजगत में तमाम किस्म के सम्बंध पाए जाते हैं। सारे जंतु परपोषी (heterotrophic organisms) होते हैं यानी वे अपने भोजन के लिए किसी अन्य पर निर्भर रहते हैं। अधिकांश जंतु तो वनस्पतियों को खाते हैं (शाकाहारी) लेकिन कई जीव दूसरों का भक्षण करते हैं (मांसाहारी- carnivores), कुछ जंतु दूसरे जंतुओं से भोजन चुराते हैं लेकिन उन्हें मारते नहीं (परजीवी), जबकि कई जीव किसी अन्य जीव के साथ परस्पर फायदे का सम्बंध बना लेते हैं (symbiosis)।

लंबे समय से कीट सूक्ष्मजीवों (microorganisms) पर निर्भर रहे हैं। जैसे एम्ब्रोसिया गुबरैले (ambrosia beetles) पेड़ों में बिल बनाते समय साथ में फफूंद भी जमा कर लेते हैं, जो उन्हें भोजन मुहैया कराती हैं। कुछ गुबरैले अपने अंडों और इल्लियों को मकड़ियों से बचाने के लिए उन पर घातक बैक्टीरिया (bacteria) का लेप कर देते हैं। और अब इसी क्रम में एक और उदाहरण खोजा गया है।

स्टिंकबग (बदबूदार कीड़ा – stink bug) अपने अंडों पर फफूंद (protective fungus) का एक आवरण चढ़ा देता है जो उस अंडे में पनपते भ्रूण को परजीवी ततैया (parasitic wasp) से सुरक्षा प्रदान करता है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रियल साइन्स एंड टेक्नॉलॉजी (National Institute of Advanced Industrial Science and Technology) के टेकेमा फुकात्सु (Takema Fukatsu) कई वर्षों से कीटों में सहजीविता का अध्ययन कर रहे हैं। उन्हें खास तौर से स्टिंकबग की प्रजाति मेजिमेनम ग्रेसिलिकोर्न (Megymenum gracilicorne) ने आकर्षित किया था। वैसे फुकात्सु के अध्ययन का मकसद इस कीट और फफूंद के सम्बंधों को समझना नहीं था। वे तो संयोगवश यहां तक पहुंच गए।

इसी से सम्बंधित अन्य कीटों के समान मेजिमेनम ग्रेसिलिकोर्न की पिछली टांगों का एक हिस्सा काफी फूला हुआ होता है। ऐसा माना जाता था कि यह रचना कान के पर्दे (टिम्पेनल झिल्ली – tympanal membrane) के समान है और कई तरह के कीटों में पाई जाती है। लेकिन फुकात्सु को इस बात पर हैरानी हुई कि यह रचना सिर्फ मादा कीट (female insect) में पाई जाती है। आम तौर पर ऐसी श्रवण संरचनाएं (hearing structures) दोनों लिंगों में पाई जाती हैं।

तब फुकुत्सा का संपर्क एक सेवानिवृत्त स्टिंकबग विशेषज्ञ (stink bug expert) शुजी ताचीकावा (Shuji Tachikawa) से हुआ। ताचीकावा ने अपने अध्ययनों में देखा था मेजिमेनम ग्रेसिलिकोर्न की मादा की टांगों पर एक सफेद पदार्थ पाया जाता है और यह पदार्थ उनके अंडों पर भी पुता होता है।

जब फुकात्सु और उनके साथियों ने एक नदी के किनारे खीरे की बेल से मेजिमेनम ग्रेसिलिकोर्न के नमूने एकत्रित किए तो उन्होंने भी देखा कि लैंगिक रूप से परिपक्व मादाओं पर ऐसे रेशे चिपके हुए थे। यह पट्टी चावल के दाने से भी छोटी थी और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (electron microscope) से देखने पर पता चला कि इसकी सतह कान के पर्दे के समान चिकनी नहीं बल्कि खुरदरी है और उस पर महीन छिद्र थे जिनमें से फफूंद पनप रही थी। सावधानीपूर्वक विच्छेदन करने पर दिखा कि हरेक छिद्र में एक ग्रंथि है जिसमें से तरल रिस रहा है।

इसी दौरान कीट के एक विचित्र व्यवहार (insect behavior) ने शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा। अंडे देते समय मादा हरेक टांग पर उग रही फफूंद को कुरेद रही थी। इसके बाद मादा ने प्रत्येक नवीन अंडे को रगड़ा। यह देखा गया कि इसके बाद हरेक अंडे पर फफूंद फैल गई। तीन दिनों के अंदर फफूंद ने अंडों पर 2-2 मिलीमीटर मोटी परत बना डाली। ज़ाहिर था कि फफूंद की परत अंडे से कहीं अधिक वज़नी थी।

प्रयोगशाला (laboratory experiment) में देखा गया कि मादा स्टिंकबग अपने नखरों से अपनी पिछली टांगों पर बनी फफूंद की पट्टी को छूती है और फिर उसे अंडों पर पोत देती है।

देखा जाए तो अंडों पर फफूंद का उगना अच्छी बात नहीं है। लेकिन डीएनए अनुक्रमण (DNA sequencing) से पता चला कि वहां उपस्थित सारी फफूंदें कीट के लिए लाभदायक (beneficial microbes) हैं। तो सवाल उठा कि क्या यह फफूंद आवरण उस ततैया (Trissolcus brevinotaulus) को अंडों से दूर रखने काम करेगी जो स्टिंकबग के अंडों के अंदर अपने अंडे देती है। यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में तैयार की गई पांच ततैया मादाओं (wasp females) को एक चेम्बर में रख दिया। इस चेम्बर में स्टिंकबग के करीब 20 अंडे रखे गए थे। इनमें से आधे अंडों पर फफूंद का आवरण था जबकि शेष आधे अंडों पर से फफूंद को पोंछकर हटा दिया गया था।

यानी फफूंद का आवरण स्टिंकबग के अंडों को सुरक्षा (egg protection) प्रदान करता है। लेकिन एक आश्चर्यजनक बात सामने आई है। शोधकर्ताओं को फफूंद आवरण में किसी रासायनिक सुरक्षा (जैसे कोई बैक्टीरिया वगैरह) (chemical defense)  के संकेत नहीं मिले। दूसरा, शोधकर्ताओं का विचार है कि संभवत: फफूंद को उस ग्रंथि के स्राव से कुछ पोषण (nutrient secretion) मिलता है।

आगे और प्रयोगों में पता चला कि जब फफूंद आवरण वाले अंडे फूटते हैं, तो उनमें से निकलने वाले शिशु स्टिंकबग थोडी फफूंद साथ लेकर जाते हैं (fungal transfer) लेकिन निर्मोचन के बाद वे उसे झड़ा देते हैं। यानी वयस्क होने पर अगली पीढ़ी को यह फफूंद फिर से हासिल करनी होगी। तो एक सवाल जिस पर फुकुत्सा काम करने जा रहे हैं, वह यही है कि हर मादा स्टिंकबग दोस्ताना फफूंद (symbiotic fungi) का चयन कैसे करती है। (स्रोत फीचर्स)

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शाकनाशी के असर सम्बंधी एक शोध पत्र रद्द किया गया 

शाकनाशक ग्लायफोसेट (glyphosate) के स्वास्थ्य पर असर को लेकर एक शोध पत्र 2000 में रेग्यूलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्मेकोलॉजी (Regulatory Toxicology and Pharmacology) नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। हाल ही में जर्नल ने इस शोध पत्र को निरस्त यानी रीट्रेक्ट (paper retraction) करने का निर्णय लिया है। निरस्त करने का कारण इस शोध पत्र के साथ जुड़े गंभीर नैतिक सरोकारों और इसके निष्कर्षों की वैधता के प्रति संदेहों को बताया गया है।

इस शोध पत्र में कहा गया था कि कीटनाशक ग्लायफोसेट (जिसे राउंड-अप के नाम से बेचा जाता है) मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालता है।   

दरअसल, पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब कुछ लोगों ने मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा (Monsanto lawsuit) दायर किया कि उन्हें जो कैंसर (नॉन-हाजकिन्स लिम्फोमा – non-Hodgkin lymphoma) हुआ है वह ग्लायफोसेट की वजह से हुआ है। इस मुकदमे के दौरान यह उजागर हुआ था कि 2015 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट (IARC report)  में यह निष्कर्ष दिया गया था कि संभवत: ग्लायफोसेट एक कैंसरकारी पदार्थ है। यह प्रमाण मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता था।

मॉनसेंटो इस प्रमाण को गलत साबित करने में जुट गई। सुनवाई के दौरान सामने आया कि कंपनी ने कुछ शोधकर्ताओं से संपर्क किया था कि वे एक समीक्षा पर्चे (review paper) में यह कहें कि ग्लायफोसेट का ऐसा कोई असर नहीं होता है। कंपनी अधिकारियों के आंतरिक ईमेल वार्तालाप (internal emails) से यह साज़िश उजागर हो गई।

शोध पत्र को निरस्त करते हुए जर्नल ने कहा है कि उपरोक्त शोध पत्र के लेखकों ने मात्र उन्हीं अध्ययनों को समीक्षा में शामिल किया था जो मॉनसेंटो द्वारा किए गए थे और अप्रकाशित (unpublished studies) थे। लेखकों ने कई सारे बाहरी प्रकाशित अध्ययनों को अनदेखा कर दिया था, हालांकि वे भी समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू – peer review) आधारित जर्नल्स में प्रकाशित नहीं हुए थे।

उपरोक्त शोध पत्र के तीन लेखकों में से दो (रॉबर्ट क्रोस और इयान मनरो) का निधन हो चुका है। जर्नल ने शोध पत्र निरस्त करने से पहले तीसरे लेखक गैरी विलियम्स (Gary Williams) से संपर्क किया मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

समीक्षा पर्चे के निरस्त होने के बाद मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे फरियादियों (plaintiffs) की राह की एक बाधा दूर हो गई है। इस समीक्षा पर्चे के आधार पर मॉनसेंटो दावा कर रहा था कि वैज्ञानिक अध्ययन ग्लायफोसेट को हानिरहित प्रमाणित करते हैं। वैसे मॉनसेंटो (अब बायर (Bayer acquisition) के स्वामित्व में) ने एक बयान में कहा है कि इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट मात्र एक रिपोर्ट है और दुनिया भर की नियामक संस्थाएं सहमत हैं कि ग्लायफोसेट का उपयोग निरापद है और यह कैंसरकारी नहीं है।

अब इतना तो स्पष्ट है कि इस समीक्षा पर्चे को कहीं भी उद्धरित (citation ban) नहीं किया जा सकेगा और इसके हवाले से ग्लायफोसेट को हानिरहित नहीं बताया जा सकेगा। लेकिन अभी भी यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) और युरोपियन केमिकल्स एजेंसी (European Chemicals Agency) ने अपना निर्णय बदला नहीं है। दूसरी ओर, मॉनसेंटो के प्रभाव में लिखे गए कुछ अन्य शोध पत्रों (industry-funded research) पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु, सूक्ष्मजीवों की याददाश्त और कृषि

डॉ. इरफान ह्यूमन

पृथ्वी पर जीवन सबसे पहले सूक्ष्मजीव (microorganisms) के रूप में प्रकट हुआ था। ये मिट्टी, पानी, हवा, मानव शरीर, गर्म झरनों से लेकर गहरे समुद्र तक हर जगह पाए जाते हैं। हाल ही में अमेरिका के कैंसास और नॉटिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का एक अध्ययन नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल (Nature Microbiology) में प्रकाशित हुआ है, जो दिखाता है कि सूखी मिट्टी, देशी पौधों को 20-30 प्रतिशत बेहतर अनुकूलन देती है। इस अध्ययन का दूसरा पहलू, सूक्ष्मजीवों का तनाव, उनके याद रखने की क्षमता से जुड़ा हुआ है।

जैसा कि हम जानते हैं, जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो पौधों और फसलों की वृद्धि को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव (जैसे बैक्टीरिया और कवक) (soil microbes) पिछले पर्यावरणीय तनावों को ‘याद’ रख सकते हैं, और पौधों को भविष्य के सूखों से लड़ने में मदद कर सकते हैं। इसे ‘सूक्ष्मजीवी स्मृति’ या विरासत प्रभाव (लेगसी इफेक्ट) कहते हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कैंसास के छह घास के मैदानों (प्रेयरी) से मिट्टी (prairie soils) के नमूने लिए। नमूना स्थल पूर्वी कैंसास (पर्याप्त वर्षा) से लेकर पश्चिमी हाई प्लेन्स (सूखा) तक फैले हुए थे। विभिन्न वर्षा इतिहास वाली इन सूक्ष्मजीवी मिट्टियों में दो प्रकार के पौधे उगाए गए – देशी पौधे गैमाग्रास, जो कैंसास की देशज घास है और गैर-देशी फसल मक्का, जो मध्य अमेरिका से आया है और कैंसास में केवल कुछ हज़ार वर्ष पुराना है। इन सूक्ष्मजीवी समुदायों को प्रयोगशाला में दो स्थितियों में रखा गया – एक में पर्याप्त पानी और दूसरे में सीमित पानी। प्रयोग के बाद पता चला कि इससे सूक्ष्मजीवों में सूखे की यादें विकसित हुईं। वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि ये यादें (microbial memory) हज़ारों पीढ़ियों के बाद भी बनी रह सकती हैं।

कैसे संजोते हैं यादें

इस अध्ययन के निष्कर्ष में पाया गया कि सूखा इतिहास वाली मिट्टी के सूक्ष्मजीव पौधों को सूखे के दौरान बेहतर वृद्धि और उत्तरजीविता प्रदान करते हैं। ये यादें समुदाय की संरचना और जीन अभिव्यक्ति (gene expression) में बदलाव के रूप में प्रकट होती हैं। सूखे वाली मिट्टी के सूक्ष्मजीव पौधों में निकोटियानामाइन सिंथेज़ जीन को सक्रिय करते हैं, जो सूखे में लौह की कमी को दूर करता है। इससे पौधे अधिक मज़बूत हो जाते हैं। सामान्य पानी वाली मिट्टी के सूक्ष्मजीव यह लाभ नहीं देते।

अध्ययन में देशी पौधे (जैसे गैमाग्रास) (native plants) में सूक्ष्मजीवी विरासत प्रभाव बहुत मज़बूत पाया गया। ये पौधे स्थानीय सूक्ष्मजीवों के साथ लंबे समय से सह-विकास के कारण बेहतर अनुकूलित होते हैं। सूखे इतिहास वाले सूक्ष्मजीव इनकी वृद्धि को 20-30 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं। वहीं मक्का जैसे गैर-देशी पौधों में प्रभाव कमज़ोर रहा। मक्का सूखे में उतना लाभ नहीं उठा पाता, क्योंकि यह स्थानीय सूक्ष्मजीवों से कम जुड़ा हुआ है। इससे पता चलता है कि बाहरी फसलें जलवायु तनाव में कम अनुकूलित होती हैं। यह अध्ययन दिखाता है कि मिट्टी के सूक्ष्मजीव जलवायु परिवर्तन के प्रति पौधों की स्मृति का काम करते हैं। इससे पारिस्थितिकी तंत्र अधिक लचीले बन सकते हैं; कार्बन संग्रहण और पोषण चक्रण बेहतर होगा। यह अध्ययन पर्यावरणीय स्मृति के महत्व को रेखांकित करता है और दर्शाता है कि प्रकृति खुद को कैसे अनुकूलित करती है (plant-microbe interaction)।

खोज का वैज्ञानिक इतिहास

सूक्ष्मजीवों में पारिस्थितिक स्मृति की वैज्ञानिक खोजबीन का इतिहास नया नहीं है। इसकी शुरुआती बुनियाद पादप उत्तराधिकार और भूमि उपयोग विरासत के रूप में रखी गई थी। 1916 में फ्रेडरिक क्लेमेंट्स ने पादप उत्तराधिकार (प्लांट सक्सेशन) (plant succession) का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो बताता है कि अतीत के वनस्पति समुदाय भविष्य की संरचना को प्रभावित करते हैं। यह विरासत प्रभाव की मूल अवधारणा का आधार बना, हालांकि इसमें सूक्ष्मजीव पहलू अनुपस्थित था। 1980-90 में भूमि उपयोग परिवर्तनों के लंबे प्रभावों पर फोकस रहा। 1997 में, जॉन अबर और सहयोगियों ने वन पारिस्थितिक तंत्रों में नाइट्रोजन संतृप्ति के मॉडल विकसित किए, जो कृषि या कटाई जैसी प्रथाओं के सदियों तक चलने वाले प्रभाव दिखाते थे। लेगसी इफेक्ट शब्द 1990 के दशक में पादप उत्तराधिकार और आक्रामक प्रजातियों (ecosystem legacy effects) के अध्ययनों से प्रचलित हुआ था।

1998-2003 में पारिस्थितिक स्मृति का औपचारिक आगाज़ हुआ। जे. के. हार्डिंग ने 1998 में अतीत के विक्षोभों को स्मृति के रूप में वर्णित किया, जो पारिस्थितिक लचीलापन बढ़ाती है। 2003 में, जे. बेंग्टसन और ड्रू फोस्टर ने इसे वैश्विक परिवर्तन के संदर्भ में विस्तारित किया – अतीत के तनाव वर्तमान प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करते हैं।

2005 में मृदा संपीड़न के प्रभावों पर अध्ययन (बैसेट एवं साथियों) ने दिखाया कि अतीत के भूमि उपयोग से जड़ विकास बाधित होता है, जो मिट्टी की स्मृति को दर्शाता है। इसी वर्ष, डेन्समोर ने नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मिट्टी विरासत को पादप-वृद्धि से जोड़ा। 2008 में पादप-मृदा फीडबैक (plant–soil feedback) पर महत्वपूर्ण खोज हुई। जैकबिया वल्गेरिस के अध्ययन में प्रजातियों के बीच नकारात्मक फीडबैक दिखे – अतीत के पौधे सूक्ष्मजीव समुदाय को बदलते हैं, जो उत्तराधिकार को प्रभावित करते हैं।

2009-2010 में पूरा ध्यान सूक्ष्मजीवी विरासत पर रहा। जापानी बरबेरी के आक्रामक प्रभावों ने मृदा की सूक्ष्मजीवी संरचना और एंज़ाइम गतिविधियों में स्थायी बदलाव दिखाए। 2010 में, जंगलों की अंडरस्टोरी वनस्पति के प्रयोग से पता चला कि अतीत की सूक्ष्मजीवी संरचना वनस्पति और पोषक चक्रण को निर्धारित करती है।

2011-2020 के काल को सूक्ष्मजीवी स्मृति का उदय माना जाता है। 2011 में पी. कडोल और सहयोगियों ने भूमि उपयोग विरासतों को जैव विविधता से जोड़ा, जो सूक्ष्मजीवी स्मृति की दिशा में एक कदम था। 2014 में सूखे पर प्रारंभिक सूक्ष्मजीवी अध्ययन हुए। एस. ई. इवांस ने बैक्टीरियल नमी निशे का वर्णन किया, जो समुदाय में दीर्घकालिक परिवर्तनों की भविष्यवाणी करता है। एल. फुच्स्लूगर ने दिखाया कि सूखा होने पर पौधे मृदा सूक्ष्मजीवों तक कम कार्बन पहुंचाते हैं, जो समुदाय की संरचना को बदलता है। 2017 के अध्ययनों में कुल और सक्रिय मृदा सूक्ष्मजीवी समुदायों की सूखे के प्रति संवेदनशीलता (soil drought response) दिखाई दी। वहीं, 2020 में सूखे से सूक्ष्मजीवी जीन अभिव्यक्ति और मेटाबोलाइट उत्पादन में बदलाव दिखा, जो स्मृति निर्माण के आणविक आधार को इंगित करता है।

2021 में नेचर कम्यूनिकेशन में प्रकाशित एक लैंडमार्क अध्ययन से ज्ञात हुआ कि बार-बार सूखे से सूक्ष्मजीवी समुदायों में विविधता बढ़ी, जो मिट्टी बहुकार्यता को मज़बूत करती है। इससे साबित होता है कि सूखे की स्मृति पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को संशोधित करती है। 2022 में सूखे के सूक्ष्मजीवी लक्षण वितरण पर प्रभाव अध्ययन ने एक लक्षण-आधारित फ्रेमवर्क प्रदान किया। सूखा धीमी-वृद्धि वाले सूक्ष्मजीवों को चुनता है। 2023 में अल्पाइन घासभूमियों की सूखी मिट्टी में सूक्ष्मजीव वृद्धि के एक अध्ययन से भविष्य की जलवायु परिस्थितियों में सूक्ष्मजीवों की प्रतिक्रिया का अनुमान मिला। 2025 में कैंसास प्रेयरी पर किया गया अध्ययन वर्षा विरासत प्रभावों को पौधे की जीन अभिव्यक्ति से जोड़ता है।

समग्र विकास और महत्व की बात की जाए तो 1990 से 2010 के दौरान यह क्षेत्र सामान्य पारिस्थितिकी से सूक्ष्मजीव-केंद्रित खोजों तक विकसित हुआ। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, ये खोजें बताती हैं कि स्मृति पारिस्थितिक लचीलापन बढ़ाती है, लेकिन गहन तनाव से हम इसे खो सकते हैं।

सूक्ष्मजैविक कृषि उद्योग

किसानों के लिए अच्छी खबर है कि अब सूखा-सहिष्णु सूक्ष्मजीवों (microbial biofertilizer) को व्यावसायिक रूप से विकसित किया जा सकता है। जैसे, गैमाग्रास के जीन मक्का में डाले जा सकते हैं ताकि फसलें सूखे में बेहतर उगें। सूक्ष्मजैविक कृषि उद्योग (जो जैव उर्वरकों, कीटनाशकों और मिट्टी सुधारकों का उत्पादन करता है) में यह स्मृति एक क्रांतिकारी तत्व है। यह उद्योग टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देगा।

स्मृति वाले सूक्ष्मजीव समुदाय फसल उपज और पोषण दक्षता बढ़ाते हैं। जैसे, चावल उत्पादन में सूक्ष्मजीव-आधारित एकीकृत पोषक प्रबंधन से मृदा स्वास्थ्य संरक्षित होता है। सूखे जैसे वैश्विक परिवर्तनों के प्रति सूक्ष्मजीवों की चयनात्मक प्रतिक्रियाएं पौधों की रक्षा करती हैं। यही नहीं, गोबर प्रबंधन से मृदा सूक्ष्मजीव संसार का प्रबंधन करके कृषि उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

भविष्य की चुनौतियां

शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि सूक्ष्मजीवों की स्मृति लाभदायक होने के बावजूद, जलवायु परिवर्तन की अनियमितताएं (जैसे अचानक वर्षा) (extreme rainfall) नई समस्याएं पैदा कर सकती हैं। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी, आनुवंशिकी और कृषि को एकीकृत करके एक बहु-विषयी सोच प्रदान करता है। जैसे, सूखे के बाद अचानक भारी वर्षा सूक्ष्मजीवों के लिए शॉक की तरह काम करती है। सूखे में सूक्ष्मजीव निष्क्रिय हो जाते हैं और ऊर्जा संरक्षित रखते हैं। लेकिन अचानक पानी आने पर उनकी गतिविधि तेज़ी से बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी से कार्बन डाईऑक्साइड का विस्फोटक उत्सर्जन होता है। यह मिट्टी के कार्बन स्टॉक को 10-20 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इससे जीवाणु और कवक की कोशिकाएं फट सकती हैं। अध्ययन में पाया गया कि सूखा-स्मृति वाली मिट्टी में यह तनाव अधिक गंभीर होता है, क्योंकि सूक्ष्मजीव अनुकूलित हो चुके होते हैं लेकिन अचानक बदलाव के लिए तैयार नहीं। इससे पौधों की जड़ें जल-जमाव के चलते ऑक्सीजन की कमी का सामना कर सकती हैं, जो वृद्धि रोकता है। जलवायु मॉडल्स के अनुसार, 2050 तक अनियमित वर्षा 30 प्रतिशत बढ़ सकती है। तब मृदा-स्मृति का लाभ उल्टा पड़ सकता है, कार्बन संग्रहण घटेगा और ग्रीनहाउस गैसें बढ़ेंगी।

इस दिशा में संतुलित जल प्रबंधन (water management) की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। सूक्ष्मजीवों की स्मृति को बनाए रखने के लिए धीमी और नियंत्रित जल आपूर्ति ज़रूरी है। इससे सूक्ष्मजीवों को अनुकूलन का समय मिलता है, और कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इससे मिट्टी की बहुकार्यता को संरक्षित रखा जा सकता है।

हमारे देश में किसानों को प्रशिक्षण और सस्ती तकनीक की आज भी कमी है। विकासशील देशों में, जहां 60 प्रतिशत कृषि वर्षा-निर्भर है, जल प्रबंधन नीतियों का अभाव एक बड़ा जोखिम है। शोधकर्ता सुझाते हैं कि कृत्रिम-बुद्धि आधारित मौसम पूर्वानुमान से स्मार्ट इरिगेशन (smart irrigation) अपनाने की ज़रूरत है।

स्मृति को व्यावसायिक रूप से स्थिर रखना (भंडारण और क्षेत्र अनुकूलन) मुश्किल है। 2025 में, क्रिस्पर (CRISPR) जैसी तकनीकों से सुपर सूक्ष्मजीव विकसित हो रहे हैं, जो स्मृति को बढ़ाकर टिकाऊ कृषि को नया आयाम देंगे। जैविक खेती के बढ़ते चलन में यह उद्योग किसानों की आय बढ़ा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.nature.com/articles/s41564-025-02148-8/figures/1

मौन कैदी ‘क्षामेन्क’ और हमारी नैतिकता की परीक्षा

कुमार सिद्धार्थ

र्जेंटीना के तट पर स्थित एक छोटा-सा समुद्री पार्क आज संसार के सबसे गूंगे श्रुति-स्थलों में से एक बन चुका है। पार्क के कॉन्क्रीट के टैंक में लहरों की आवाज़ें नहीं, बल्कि एक स्थिर सन्नाटा पसरा है। उस सन्नाटे का नाम है क्षामेन्क। यह एक नर ओर्का व्हेल (समुद्री व्याघ्र मछली) (orca captivity) है, जो पिछले तैंतीस वर्षों से कैद में है और बीस वर्षों से पूरी तरह अकेला है। यह दक्षिण अमेरिका में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा हुआ है।

टैंक का आकार क्षामेन्क के शरीर के हिसाब से बहुत छोटा है – एक निर्जीव अंडाकार कटघरा, जिसमें धूप से चमकता कॉन्क्रीट और क्लोरीनयुक्त पानी है। घंटों तक क्षामेन्क बिल्कुल निष्क्रिय तैरता रहता है। वहां लहरें नहीं, वहां जीवन नहीं, वहां सिर्फ प्रतीक्षा है। उसकी कहानी आज सिर्फ एक जीव की नहीं, बल्कि उन अनगिनत समुद्री प्रजातियों की कहानी है जिन्हें हमारी तमाशा देखने की भूख ने समुद्र से काट दिया है(marine animal captivity)।

व्हेल, डॉल्फिन और ओर्का जैसी प्रजातियां पृथ्वी के सबसे जटिल, सबसे सामाजिक और सबसे बुद्धिमान जीवों में गिनी जाती हैं। जंगल में नहीं, समुद्र की अनंत गहराई में ये प्रजातियां मातृवंशीय समूहों में रहती हैं, ध्वनि-भाषा सीखती हैं, शोक मनाती हैं, सहयोग करती हैं। रोज़ाना सौ किलोमीटर से अधिक दूरी तय करना इनके लिए सहज है। किंतु जब इन्हें समूह से अलग कर कैद में रखा जाता है, तो यह केवल बंदीकरण नहीं, बल्कि उनका संवेदनात्मक ध्वंस है(animal welfare issues)।

आंकड़ों के अनुसार, ओर्का की वैश्विक आबादी अनुमानित पचास हज़ार है। कुछ स्थानों पर यह संख्या और अधिक बताई गई है, किंतु निरंतर गिरावट की आशंका (orca population decline) भी जताई गई है। उदाहरण के लिए, अंटार्कटिक सागर के दक्षिणी भाग में लगभग 25 हज़ार ओर्का हो सकते हैं।

इन विशाल और बुद्धिमान जीवों के लिए समुद्र-आश्रय उपयुक्त था लेकिन मानव गतिविधियों ने उन्हें उनके प्राकृतिक घर से बेदखल कर दिया।

क्षामेन्क की ही तरह, ये जीव न केवल प्राकृतिक घर से बेदखल हो रहे हैं, बल्कि उनका जीवन भी मानव मनोरंजन के लिए नुमाया किया जा रहा है। पार्कों में बताया जाता है कि ये व्हेल-डॉल्फिन हमारी पृथ्वी के राजदूत हैं, प्रकृति और मनुष्य के बीच सेतु हैं। परंतु हर टिकट, हर शो उस संदेश के विपरीत सिद्ध हो रहा है। यह मात्र दर्शनीय-मनोरंजन बन जाता है और उस मनोरंजन के पीछे पसरी है एक भय, विषाद और उपेक्षा से भरी कहानी(marine theme parks impact)।

भारत ने इस संदर्भ में एक साहसिक कदम उठाया है। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने डॉल्फिनों को ‘गैर-मानव व्यक्ति’ का दर्जा दिया था(non-human person dolphins)। यह दुनिया में ऐसा पहला कदम था, जिसने यह माना कि अत्यधिक बुद्धिमान और संवेदनशील प्रजातियों को मनोरंजन-उद्देश्य से कैद में रखना न केवल अनैतिक है, बल्कि समय की मांग के अनुरूप नहीं है। इसके बाद भारत ने डॉल्फिन शो व मनोरंजन-उद्देश्य से प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया। भारत की गंगा-डॉल्फिन का संरक्षण भी इसी दृष्टिकोण का उदाहरण है, जहां नदी का सफाई अभियान और जलीय परितंत्र का पुनरुद्धार करते हुए इन जीवों की भूमिका ध्यान में रखी गई है(river dolphin conservation)।

शायद यही बदलाव संसार के लिए संकेत है कि मनोरंजन के नाम पर वन्यजीवों को कैद में रखना अब विवेचना का विषय बन गया है। फ्रांस ने डॉल्फिन शो बंद कर दिए हैं; कनाडा ने मनोरंजन-उद्देश्य के लिए व्हेलों व डॉल्फिनों का प्रजनन व आयात बंद कर दिया है; अमेरिका में कुछ समुद्री पार्कों ने अपने गेट बंद कर दिए हैं। परंतु क्षामेन्क जब तक उस टैंक में तैरता रहेगा, हमारा सवाल अनुत्तरित रहेगा कि क्या हमने वास्तव में उसकी आज़ादी की ओर कदम उठाया है (end captivity movement)।

मण्डो मरीनो नामक उस पार्क का तर्क है कि क्षामेन्क को 1992 में किनारे पर फंसे होने से बचाया गया था और वह अब प्राकृतवास में जीवित नहीं रह पाएगा। हालांकि यह तर्क भावनात्मक दिखता है, पर न्याय-विचार के तहत यह उचित नहीं कि जीवनभर का कारावास ही एकमात्र विकल्प हो। ठीक यही विचार विश्व स्तर पर फैल रहा है। अब ‘कैद बंद करो’ और ‘प्राकृतिक आश्रय दो’ की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं (marine sanctuary concept)।

उदाहरण के रूप में, उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में ‘व्हेल सेंक्चुरी प्रोजेक्ट’ नामक पहल ने कैद से लाई गई व्हेलों के लिए समर्पित प्राकृतिक ठंडे पानी का संरक्षण-स्थल स्थापित करने की तैयारी शुरू की है। गहरे समुद्री जल, खुले समुद्री प्रवाह और पेशेवर देखभाल, यह वहां का आधार होगा जहां ये जीव नियंत्रण से करुणा की ओर बढ़ेंगे।

समुद्री पार्कों का स्वरूप आज मनोरंजन और संरक्षण के बीच बहुत धुंधला गया है। वे कहते हैं कि यह शोध है, पुनर्वास है, शिक्षा है। लेकिन उनकी आमदनी प्रदर्शन और तमाशे पर टिकी है। परिणामस्वरूप, हमारी नैतिकता को धोखा दिया जा रहा है।

और हम पूछते हैं, जब कोई बच्चा उस ऐक्रेलिक शीशे को छूकर अंदर तैरते व्हेल को देखता है, तो क्या उसे यह संदेश नहीं मिलता कि वर्चस्व और आनंद के नाम पर किसी जीव की स्वतंत्रता छीनी जा सकती है? क्षामेन्क की कहानी अब असाधारण नहीं रही। यह एक आईना है जो दिखाता है कि हम क्या जानते हैं, किन्ही नियमों में बंधे हुए हैं, किन बातों को स्वीकार कर लेते हैं।

वैज्ञानिक शोध स्पष्ट कर चुके हैं व्हेल-डॉल्फिन जैसी प्रजातियों को सामाजिक समूह, गहरी समुद्री गतियां, सुनने-सुनाने का तरीका, संवाद की भाषा प्राप्त है। प्राकृतिक परिस्थितियों में उनका जीवन अलग हैै। कैद में इनके लिए वह जीवन मजबूरी-सा हो जाता है। हमने कानूनी ढांचा तो बना लिया है, उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन अब वक्त है कार्रवाई करने का।

क्षामेन्क बहुत लंबे समय से अकेला है। हमें यह तय करना होगा कि अगली सुर्खियां उसके बारे में क्या होंगी। क्या यह अंत की खबर होगी “एक ओर्का की मृत्यु” या यह घोषणा होगी “कैद से मुक्ति, स्वाभाविक जीवन की ओर पहला कदम”? हमें स्वीकार करना होगा कि करुणा कमज़ोरी नहीं, बल्कि सभ्यता की सच्ची पहचान है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.cnn.com/api/v1/images/stellar/prod/03-mundo-marino.jpg?q=w_1160,c_fill/f_webp