क्या कॉकरोच का दूध प्रोटीन संकट का समाधान होगा?

डॉ. इरफाना बेगम (बिलन्दवी)

छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!

दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।

पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।

वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।

इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।

यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।

इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।

इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।

जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।

इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।

यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?

इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।

विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नीट घोटाला और स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र का अधोपतन

डॉ. अनंत फड़के

स वर्ष मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (MBBS) और स्नातकोत्तर (PG) प्रवेश के लिए होने वाली नीट परीक्षा (NEET Examination) व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर और अन्य शहरों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों और अन्य दबावों के चलते इस परीक्षा प्रणाली को रद्द किया जाएगा या इसमें सुधार किए जाएंगे। लेकिन केवल इतना करने से प्रवेश-प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था समाप्त नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, कॉर्पोरेटीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और महंगे निजी कोचिंग संस्थानों (private coaching centres) के बढ़ते प्रभाव जैसे मूल कारणों को समाप्त करना होगा। आइए संक्षेप में समझें कि यह स्थिति क्यों है।

सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों का विस्तार

1980 तक सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुख्य रूप से शहरों के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों और कुछ बड़े चैरिटेबल (परमार्थ) अस्पतालों में उपलब्ध थीं। यहां इलाज के लिए मुख्यतः गरीब और मध्यम वर्ग (poor & middle class) के लोग आते थे, लेकिन समाज के अन्य वर्ग भी इन अस्पतालों में इलाज करवाते थे।

पिछले 40–45 वर्षों में नई और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के आने से स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल गया। सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को पुराने सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करना चाहिए था और पर्याप्त संख्या में नए सरकारी अस्पताल भी खोलने चाहिए थे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों (cheritable hospitals) को भी ऐसी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता (subsidy) मिलनी चाहिए थी। लेकिन 1980 के बाद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजीकरण (privatization) की नीति अपनाई और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1980 से ही सिफारिश की है कि सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 5 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त स्वास्थ्य खर्च बढ़ने की बजाय 2014 के बाद GDP के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर रहा। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना था और इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 1 प्रतिशत होना था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य खर्च GDP के 0.3 प्रतिशत से भी कम रहा है।

कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

सरकार को सभी स्तरों पर आधुनिक चिकित्सा तकनीक के लिए पर्याप्त निवेश करना चाहिए था। लेकिन 1990 के बाद यह निवेश मुख्य रूप से बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों (corporate companies) ने किया है। पहले भी दवा उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश था। बाद में आधुनिक पैथॉलॉजी लैब, रक्त जांच केंद्र, स्कैन सेंटर और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल भी तेज़ी से बढ़ने लगे। कई ऐसे अस्पताल, जो केवल नाम के लिए चैरिटेबल थे लेकिन वास्तव में लाभ कमाने के उद्देश्य से चलते थे, उनमें भी कानूनी रास्ते निकालकर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने निवेश किया। 1991 से 2024 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश लगभग ₹500 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया।

कई विकसित देशों और वियतनाम जैसे देशों में यह नियम है कि डॉक्टर वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही यह तय करेंगे कि कौन-सी जांच या प्रक्रिया वास्तव में आवश्यक है। लेकिन भारत में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बहुत कम विशेषज्ञ इन वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। 1980 के बाद मरीज़ों को किसी विशेष लैब में भेजने के बदले डॉक्टरों को कमीशन (कट) (commision) मिलने की प्रथा भी बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि वास्तव में ज़रूरत हो या न हो, अधिक से अधिक जांच और प्रक्रियाएं करवाकर अधिक लाभ कमाना कई निजी अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य बन गया। ऐसे मुनाफा-केंद्रित (profit-centred) अस्पतालों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। उनके साथ काम करके कमाई करने वाले अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती गई।

मुनाफाकेंद्रित निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी

ऐसे डॉक्टर तैयार करने के लिए, जो बाद में कॉर्पोरेट अस्पतालों (corporate hospitals) में काम करें, हर साल 10-20 लाख रुपए फीस लेने वाले निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसका समर्थन यह कहकर किया जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, और केवल सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से इतने डॉक्टर तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देना ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निजी कॉलेजों (private college) से पढ़कर निकलने वाले अधिकांश डॉक्टर उन गरीब ग्रामीण या शहरी इलाकों में काम करने नहीं जाते, जहां डॉक्टरों की सबसे अधिक कमी है। कई विद्यार्थी कोचिंग पर 3-5 लाख खर्च करते हैं, और फिर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और पीजी करने में 2-5 करोड़ तक खर्च हो सकता है। इतना खर्च करने के बाद कई डॉक्टर मुख्यतः शहरों के अमीर लोगों का इलाज करते हैं और कॉर्पोरेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन जाते हैं।

अनावश्यक जांच और इलाज का खर्च केवल अमीर लोग ही उठा सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी यह अनुचित है और कभी-कभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए तो यह खर्च भारी कर्ज़ का कारण बन सकता है।

निजी मेडिकल शिक्षा का तेज़ी से विस्तार

इस लाभ कमाने वाली व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 1980 में देश में लगभग 110 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज (allopathic medical college) थे। इनमें हर वर्ष लगभग 10,000 विद्यार्थी प्रवेश लेते थे। इनमें से केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते थे। पीजी शिक्षा में हर वर्ष लगभग 3–4 हज़ार डॉक्टर प्रवेश लेते थे और उनमें से केवल 5 प्रतिशत निजी मेडिकल कॉलेजों में जाते थे। लेकिन 2025–26 तक देश में लगभग 800 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज हो गए और उनमें लगभग सवा लाख विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और हर साल 10–20 लाख फीस दे रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने पर्याप्त संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं खोले। इस कारण केवल योग्यता और मेहनत के आधार पर अच्छे मेडिकल करियर (medical carrer) का अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाया।

इसी तरह, 2025–26 में पीजी मेडिकल शिक्षा में लगभग 75 से 80 हज़ार डॉक्टरों ने प्रवेश लिया, जिनमें लगभग आधे निजी मेडिकल कॉलेजों में गए।

नीट परीक्षा और कोचिंग उद्योग

मेडिकल प्रवेश की प्रतिस्पर्धा (competition) लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश प्रक्रिया बनाने के लिए 2016 में नीट परीक्षा शुरू की गई। पहले वर्ष इस परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी बैठे थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 22 लाख हो गई। इतनी बड़ी संख्या और इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण महंगे निजी कोचिंग संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। 2025 तक यह नया कोचिंग उद्योग लगभग 25,000 करोड़ का हो गया। ऑनलाइन कोचिंग के लिए 15–20 हज़ार तक फीस ली जाती है, जबकि अच्छे कोचिंग संस्थानों (coaching institutes) की फीस लगभग एक लाख या उससे अधिक होती है। यह धारणा बनने लगी कि जितनी अधिक फीस, सफलता की संभावना उतनी अधिक। कुछ संस्थान ‘निश्चित चयन’ कराने का दावा करते हैं और उनके लिए विद्यार्थी 3–5 लाख तक खर्च करते हैं। यदि इनमें से कुछ विद्यार्थियों को ज़्यादा पैसे देकर प्रश्नपत्र लीक होने का लाभ भी मिलता हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केवल नीट में सुधार से समस्या हल नहीं होगी

नीट परीक्षा में हुए घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अखिल भारतीय प्रवेश प्रणाली (all india admission system)की अपनी सीमाएं और गंभीर जोखिम हैं। इस विरोध के कारण वर्तमान व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या आवश्यकता हो तो नई प्रवेश प्रणाली बनानी चाहिए। लेकिन केवल इससे प्रवेश प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार (corruption) समाप्त नहीं होगा। असल में यह प्रतियोगिता ऐसे पेशे में प्रवेश पाने की है जहां बहुत अधिक पैसा और प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। भले ही बहुत से विद्यार्थियों को यह बात पूरी तरह समझ में न आती हो, लेकिन वर्तमान व्यवस्था की यही वास्तविकता है। इसलिए समस्या की जड़ पर प्रहार करना आवश्यक है।

क्या किया जाए?

1. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर निवेश (high investement) किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च में बड़ी वृद्धि की जाए। सरकारी अस्पतालों का विस्तार हो, उनमें आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह रहे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों को भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता मिले।

2. सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए। पर्याप्त नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों को भी सरकारी कॉलेजों के बराबर ही फीस लेने की अनुमति हो। यदि इससे कई निजी मेडिकल कॉलेज बंद भी हो जाएं, तो इससे जनता का नुकसान नहीं होगा। बल्कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (medical entrance exam) के अत्यधिक महत्व और उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी।

3. निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलाया जाए। निजी अस्पतालों में इलाज केवल वैज्ञानिक चिकित्सा दिशानिर्देशों (scientific medical guidelines) के अनुसार ही किया जाए और मरीज़ों से केवल निर्धारित तथा पारदर्शी दरों पर ही शुल्क लिया जाए। यदि निजी स्वास्थ्य सेवाओं में मुनाफाखोरी, मरीजों का आर्थिक शोषण और अनावश्यक जांच तथा इलाज के माध्यम से कमाई पर रोक लगाई जाए, तो कॉर्पोरेट अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की वर्तमान अंधी दौड़ और अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी आपो-आप कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर, केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद मूल कारणों – स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण, सरकारी निवेश की कमी और कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी (corporate profit making) – को भी दूर करना आवश्यक है। ऐसा होने पर ही प्रवेश प्रक्रिया में ईमानदारी आएगी और चिकित्सा व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण तथा जनहितैषी (public friendly) बन सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कैंसर से जंग में एक नई उम्मीद – एटलस

चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।

हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।

वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक चूहा जिसकी बस्ती में सिर्फ रानी के बच्चे होते हैं

डॉ. विजय दुआ

नैकेड मोल रैट (Heterocephalus glaber) को हिन्दी में नग्न तिल चूहा कहा जाता है। इसे सैंड पपी (sand puppy) भी कहते हैं। इसके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। ये पूर्वी अफ्रीका के सूखे इलाकों में ज़मीन के नीचे सुरंग बनाकर रहने वाले अनोखे जीव हैं। ये सामाजिक जीव हैं और इनकी बस्ती में सिर्फ एक मादा (रानी) ही प्रजनन कार्य करती है।

टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा की तंत्रिका वैज्ञानिक मेलिसा होम्स के अनुसार लंबे समय से यह एक पहेली रही है कि कैसे इनके समूह में केवल एक मादा (रानी) ही प्रजनन (reproduction) का कार्य करती है जबकि समूह की शेष सभी मादाएं (females) रानी की संतानों के पालन पोषण और भोजन जुटाने जैसे काम करती हैं। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़े हैं।

हाल ही में नग्न तिल चूहे के बारे में नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रानी एक प्रकार के रसायन का स्राव करती है, जिसकी गंध से समूह में उपस्थित अन्य मादाओं की प्रजनन क्रिया रोक दी जाती है! यह गंध अन्य मादा में हॉर्मोन (hormone) बनने की प्रक्रिया पर असर डालती है, और उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता दब जाती है। यह अध्ययन बर्लिन स्थित मैक्स डेलब्रुक सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक मोहम्मद खल्लाफ और उनके साथियों ने किया है। उन्होंने एक बस्ती में अलग-अलग सामाजिक श्रेणी के नग्न तिल चूहों के शरीर पर से फोहों में सोखकर रसायन प्राप्त किए। उन्होंने पाया कि एक रसायन है (आइसोप्रोपाइल मिरिस्टेट, आई.पी.एम.) जो रानी के शरीर पर तो प्रचुरता में उपस्थित था लेकिन बस्ती के अन्य सदस्यों पर नगण्य ही था। और तो और, रानी चूहे में भी इस रसायन की मात्रा प्रजनन चक्र के अनुसार बदलती है; विशेषकर अंडोत्सर्ग के समय सर्वाधिक रहती है। मस्तिष्क इमेजिंग (brain imaging) में भी देखा गया कि प्रजनन में अक्षम मादाएं ही आई.पी.एम. (IPM) की गंध के प्रति संवेदनशील होती हैं।

हालांकि मधुमक्खियों, चींटियों, दीमकों आदि कई अन्य सामाजिक (यूसोशल) जन्तुओं में भी सिर्फ रानी प्रजनन कार्य करती है, लेकिन उनमें बस्ती की बाकी मादा सदस्यों के प्रजनन अंग अविकसित रहते हैं और उनमें एक हॉर्मोन प्रोलैक्टिन (prolectin) का स्तर भी बढ़ा हुआ रहता है। परन्तु नग्न तिल चूहों में सभी मादाओं में प्रजनन क्षमता होते हुए भी वे यौवनारंभ (प्यूबर्टी) में ही अटकी रह जाती हैं, कभी संतानोत्पत्ति नहीं करतीं।

खल्लाफ की टीम ने इस रसायन की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रयोग और किया था। उन्होंने कुछ प्रजनन-अक्षम (unreproductive) चुहियाओं को बस्ती से अलग कर दिया और शेष मादाओं में एक औषधि की मदद से उनकी गंध संवेदना (smell senses) को अवरुद्ध कर दिया। दोनों ही मामलों में ऐसी मादाओं में प्रोलैक्टिन का स्तर घट गया और वे नरों के साथ समागम करने में समर्थ हो गईं। यह भी देखा गया कि रानी की अनुपस्थिति में भी सिर्फ आई.पी.एम. की उपस्थिति प्रजनन को रोकने के लिए पर्याप्त थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डिजिटल विकास: पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का सवाल

कुमार सिद्धार्थ

पिछली शताब्दी पर नज़र डालें तो औद्योगिक विकास (industrial revolution) की पहचान विशाल कारखानों, ऊंची चिमनियों, इस्पात संयंत्रों और मशीनों की गूंज से होती थी। ये किसी देश की आर्थिक शक्ति और औद्योगिक प्रगति के प्रतीक माने जाते थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में विकास का चेहरा बदल चुका है। आज विशाल, शांत और अत्याधुनिक इमारतें नई अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही हैं। इनमें न मशीनों का शोर सुनाई देता है, न धुएं के गुबार उठते हैं, फिर भी दुनिया की लगभग हर डिजिटल गतिविधि की नींव इन्हीं पर टिकी है। इन्हीं नई आधुनिक इमारतों को हम डैटा सेंटर (data centre) के नाम से जानते हैं।

आज मोबाइल से किया गया भुगतान, किसी विद्यार्थी की ऑनलाइन कक्षा, अस्पताल का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, किसान के मोबाइल पर पहुंचा मौसम का पूर्वानुमान, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर या कोई भी संवाद, इनमें से कोई भी गतिविधि डैटा सेंटरों के बिना संभव नहीं है। हर डिजिटल क्रिया (digital action) अंतत: किसी न किसी डैटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां सूचनाएं संग्रहित होती हैं, उनका विश्लेषण होता है और वे कुछ ही क्षणों में हमारे पास वापस लौट आती हैं।

यही वज‍ह है कि डिजिटल दुनिया जितनी आभासी और अदृश्य दिखाई देती है, उसकी बुनियाद उतनी ही ठोस और वास्तविक है। यह केवल इंटरनेट या सॉफ्टवेयर का संसार नहीं, बल्कि विशाल डैटा सेंटरों, लाखों सर्वरों, निरंतर बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले संचार नेटवर्क और बड़ी मात्रा में ऊर्जा तथा जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विशाल भौतिक अधोसंरचना (giant physical infrastructure) है।

पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धि (एआई) (AI) ने इस पूरी व्यवस्था को नई गति दी है। चैटबॉट, भाषा अनुवाद, चित्र निर्माण, वीडियो विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक गणनाओं जैसे कार्यों के लिए पहले से कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता पड़ रही है। इस वजह‍ से दुनिया भर में नए डैटा सेंटर्स के निर्माण की होड़ शुरू हो गई है।

अंतर्राष्ट्रीय शोध के अनुसार वर्तमान में विश्व में लगभग 11,800 डैटा सेंटर संचालित हैं। भारत में भी इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और वह एशिया के प्रमुख डैटा सेंटर बाज़ारों में शामिल हो चुका है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई, क्लाउड सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस विस्तार को और गति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डैटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने कभी सड़कें, रेलमार्ग और बिजलीघर थे। वे निवेश आकर्षित करते हैं, रोज़गार सृजित करते हैं और डिजिटल सेवाओं (digital services) की विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।

लेकिन हर ‘विकास’ अपने साथ कुछ अनदेखे प्रश्न भी लेकर आता है। लंबे समय तक डैटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल।

डिजिटल दुनिया: अदृश्य प्यास

हमारा डैटा ‘क्लाउड’ (cloud) में सुरक्षित होता है। क्लाउड कोई काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि हज़ारों सर्वरों से भरे विशाल डैटा सेंटरों का नेटवर्क है। हर ई-मेल, हर डिजिटल भुगतान, हर वीडियो, हर ऑनलाइन खोज और हर एआई अनुरोध इन्हीं सर्वरों (servers) पर संसाधित होता है।

ये सर्वर दिन-रात लगातार काम करते हैं। जितनी अधिक गणनाएं होती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि यह तापमान नियंत्रित न किया जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं बाधित हो सकती हैं, यहां तक कि ठप भी हो सकती हैं। इसलिए शीतलन (कूलिंग) (cooling) डैटा सेंटर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

बड़े डैटा सेंटरों में सर्वरों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग टॉवर, चिलर और वाष्पीकरण आधारित शीतलन प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। पानी गर्मी को तेज़ी से अवशोषित (absorb) करता है, इसलिए यह बड़े डैटा सेंटरों के लिए प्रभावी शीतलक (coolent) माना जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल सुविधाओं की बढ़ती मांग के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगती है।

यही वह प्रश्न है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस शुरू कर दी है। क्या एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया पहले से ही जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है? और यदि हां, तो क्या भविष्य का डिजिटल विकास जल सुरक्षा के साथ संतुलन (balance) बनाकर आगे बढ़ सकेगा?

इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक भी हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि डिजिटल प्रगति (digital progress) वास्तव में टिकाऊ विकास का आधार बनती है या प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) पर एक नया दबाव।

कितने प्यासे हैं डैटा सेंटर

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार लगभग 100 मेगावॉट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डैटा सेंटर (hyperscale data centre) केवल शीतलन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर तक पानी उपयोग कर सकता है। यह मात्रा कई छोटे कस्बों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर है। पानी का उपयोग केवल शीतलन टॉवरों में ही नहीं होता, बल्कि आर्द्रता नियंत्रण और अन्य सहायक प्रणालियों में भी किया जाता है।

भारत में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु पर कार्य करने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का अनुमान है कि वर्ष 2024 में देश के डैटा सेंटरों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया था। यदि वर्तमान विस्तार की गति बनी रही, तो 2030 तक यह खपत दुगनी से अधिक हो सकती है। यह अनुमान केवल उद्योग के आकार का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की नीति सम्बंधी चुनौती का भी संकेत देता है।

हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि सभी डैटा सेंटर समान मात्रा में पानी उपयोग नहीं करते। कुछ आधुनिक केंद्र कम जल-आधारित या लगभग जल-रहित शीतलन तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि पुराने केंद्र अपेक्षाकृत अधिक पानी पर निर्भर हैं। इसलिए भविष्य की दिशा केवल डैटा सेंटरों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जल-दक्षता (water-use efficiency) से भी तय होगी।

एआई ने क्यों बढ़ाई चुनौती?

एआई ने डैटा सेंटरों की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। पहले अधिकांश डैटा सेंटर ई-मेल, वेबसाइट, क्लाउड स्टोरेज और सामान्य इंटरनेट सेवाओं के लिए बनाए जाते थे। अब उन्हें लार्ड लैंग्वेज मॉडल (large language model), मशीन लर्निंग, वीडियो विश्लेषण, वैज्ञानिक अनुसंधान और जटिल गणनाओं का भार भी उठाना पड़ रहा है।

एआई आधारित प्रोसेसर पारंपरिक सर्वरों (traditional servers) की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं और अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं। जिसके कारण शीतलन प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है। आज डैटा सेंटरों की योजना केवल बिजली उपलब्धता के आधार पर नहीं बनाई जा रही, बल्कि स्थानीय तापमान, जल उपलब्धता और जलवायु जोखिम को भी ध्यान में रखा जा रहा है।

एआई ने नई विडंबना पैदा कर दी है। एक ओर, यह जलवायु परिवर्तन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। वहीं, यदि इसकी आधारभूत अधोसंरचना संसाधनों का बेतहाशा उपयोग करेगी तो वही तकनीक पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा सकती है।

दोहरी चुनौती

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं (digital economy) में से एक है। सरकार डैटा सेंटर, एआई और सेमीकंडक्टर (semiconductor) जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहन दे रही है। दूसरी ओर, देश के अनेक हिस्से पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। अनियमित मानसून, घटता भूजल, बढ़ते तापमान और तेज़ी से बढ़ते शहर जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।

यही कारण है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, डिजिटल अधोसंरचना का विस्तार आवश्यक है। दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह विस्तार स्थानीय जल संसाधनों की कीमत पर न हो। यदि भविष्य के डैटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थापित होते हैं जहां पहले से ही पेयजल संकट है, तो उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच संसाधनों को लेकर तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अब डैटा सेंटरों की योजना को केवल निवेश और रोज़गार के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि जल सुरक्षा (water savings), शहरी नियोजन और जलवायु अनुकूलन (climate adoptations) के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।

दुनिया क्या सीख रही है?

दुनिया की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस चुनौती को स्वीकार कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कंपनियां ऐसे डैटा सेंटर विकसित कर रही हैं जिनमें कम पानी का उपयोग हो, उपचारित अपशिष्ट जल (waste water) का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए और वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) को अनिवार्य बनाया जाए। माइक्रोसॉफ्ट का दावा है कि उसने पिछले दो दशकों में अपने डैटा सेंटरों की वॉटर यूज़ इफेक्टिवनेस में लगभग 90 प्रतिशत सुधार किया है।

युरोप और अमेरिका के कई क्षेत्रों में अब नए डैटा सेंटरों की स्वीकृति देते समय केवल बिजली की उपलब्धता नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी आकलन किया जाता है कि उनका स्थानीय जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में डैटा सेंटरों की सफलता केवल उनकी कंप्यूटिंग क्षमता (computing capacity) से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा और जल दक्षता से भी आंकी जाएगी।

भारत के पास मौका है कि वह डैटा सेंटर उद्योग को ऐसी दिशा दे, जो डिजिटल विकास और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करे। इसके लिए डैटा सेंटरों की स्थापना की प्रक्रिया में जल उपलब्धता और जल प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन आवश्यक होता है, उसी प्रकार बड़े डैटा सेंटरों के लिए स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन भी अनिवार्य रूप से निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।

जल ही नहीं, ऊर्जा भी अहम

यह भी गौरतलब है कि डैटा सेंटरों पर चर्चा अक्सर पानी तक सीमित रह जाती है, जबकि उनका ऊर्जा उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई के विस्तार के साथ दुनिया भर में बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि यह ऊर्जा कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त होगी, तो निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) बढ़ेगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और गंभीर होगी।

इसलिए भविष्य का टिकाऊ डैटा सेंटर वह होगा, जो कम पानी ही नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का भी उपयोग करे। सौर व पवन ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल सर्वर, उन्नत चिप प्रौद्योगिकी तथा स्मार्ट कूलिंग सिस्टम (smart cooling system) इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल संरचना का भविष्य केवल अधिक शक्तिशाली कंप्यूटरों में नहीं, बल्कि संसाधन-दक्ष प्रणालियों (resource efficient systems) में निहित है।

विकास की नई कसौटी

इक्कीसवीं सदी का विकास केवल तकनीकी विस्तार का नाम नहीं है। वह इस बात की भी परीक्षा है कि हम प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) का उपयोग कितनी ज़िम्मेदारी से करते हैं। यदि डिजिटल विकास की कीमत सूखते भूजल, बढ़ते जल संघर्ष और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में चुकानी पड़े, तो वह विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता। इसलिए अब विकास का नया सूत्र केवल डिजिटल फर्स्ट नहीं, बल्कि डिजिटल एंड मोस्ट सस्टेनेबल (digital & most sustainable) होना चाहिए।

डिजिटल भारत का सपना केवल तेज़ इंटरनेट, विशाल डैटा सेंटरों और अत्याधुनिक एआई से पूरा नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात से भी तय होगी कि इन तकनीकों के विकास में पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का कितना नुकसान या सम्मान किया जाता है। यदि आज दूरदर्शी नीतियां अपनाई जाती हैं, तो भारत डिजिटल प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच एक संतुलित मॉडल (balanced model) प्रस्तुत कर सकता है। ज़ाहिर है, यही भविष्य की टिकाऊ अर्थव्यवस्था की वास्तविक पहचान होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैश्विक महाप्रयोग: वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

दौलत सिंह तंवर

जकल हम हर दिन जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के बारे में सुनते हैं। गर्मियां लगातार लंबी और अधिक गर्म होती जा रही हैं, बेमौसम बारिश हो रही है और सर्दियां सिकुड़ रही हैं। जब मौसम अचानक बदलता है, तो मनुष्य तो अपने घरों में एसी या हीटर चालू कर लेते हैं। जानवर और पक्षी ठंडी या गर्म जगहों की ओर पलायन कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन पेड़-पौधों का क्या होता है, जो अपनी जड़ों से ज़मीन से बंधे होते हैं? उनके पास भागने या छिपने का कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें तो उसी जगह पर रहकर बदलते मौसम से लड़ना होता है।

अलबत्ता, किसी भी जीव को नए माहौल में खुद को ढालने में हज़ारों-लाखों साल लगते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) तो बहुत तेज़ी से हो रहा है। तो क्या पौधे इतनी जल्दी खुद को बदल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान के इतिहास का बहुत बड़ा और अद्भुत प्रयोग एरेबिडॉप्सिस थेलियाना पर किया है।

एरेबिडॉप्सिस थेलियाना

इस कहानी का मुख्य किरदार एक बहुत ही छोटा और आम-सा दिखने वाला पौधा थेल क्रेस है, जिसका वैज्ञानिक नाम एरेबिडॉप्सिस थेलियाना (Arabidopsis thaliana) है। यह सरसों वनस्पति कुल (brassica family) का एक जंगली पौधा है।

आप सोच रहे होंगे कि आम, नीम या गेहूं जैसे बड़े और ज़रूरी पौधों को छोड़कर वैज्ञानिकों ने इस छोटे से खरपतवार (weed) को क्यों चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दुनिया में यह पौधा एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। इसका आकार छोटा होता है, इसे उगाना आसान है, इसका जीवनचक्र बहुत छोटा (कुछ ही हफ्तों का) होता है। और, सबसे बड़ी बात, वैज्ञानिकों को इसकी आनुवंशिक सामग्री यानी डीएनए (DNA) की पूरी जानकारी है। इसलिए इसमें होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को वैज्ञानिक आसानी से पकड़ सकते हैं।

महा-प्रयोग

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मोई एक्सपोसिटो-अलोंसो के नेतृत्व में दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह जानने का फैसला किया कि पौधे तेज़ी से बदलते मौसम के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रयोग वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2022 के बीच 5 वर्षों तक किया गया। इसके नतीजे 26 मार्च 2026 को साइन्स में प्रकाशित किए गए हैं। प्रयोग की योजना अनोखी थी। दुनिया भर से एरेबिडॉप्सिस थेलियाना के 231 अलग-अलग स्ट्रेन्स इकट्ठे किए। ये सभी थे तो एरेबिडॉप्सिस थेलियाना, लेकिन हर एक के डीएनए में थोड़ा-थोड़ा अंतर था, जिसकी वजह से इनके गुणधर्मों (traits) में छोटे-मोटे अंतर थे। उन्होंने सभी 231 स्ट्रेन्स के बराबर-बराबर संख्या में बीजों का एक मिश्रण तैयार किया। बीजों के इस मिश्रण को दुनिया के 30 अलग-अलग स्थानों पर बोया गया। इनमें स्पेन की तेज़ गर्मी, उत्तरी युरोप की कड़ाके की ठंड और मध्य पूर्व (जैसे नेगेव रेगिस्तान) की भयंकर सूखे जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सबसे खास बात यह थी कि बीजों को बोने के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें कोई खाद-पानी या सुरक्षा नहीं दी। उन्हें पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे, प्राकृतिक रूप से बढ़ने, फूलने और अपने बीज गिराने के लिए छोड़ दिया। पांच सालों में पौधों की कई पीढ़ियां आई-गईं।

चौंकाने वाले परिणाम

डार्विन के विकासवाद (darwin’s theory of evolution) के अनुसार, विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। लेकिन जब पांच साल बाद वैज्ञानिकों ने उन 30 जगहों से पौधों के नए बीजों और डीएनए की जांच की तो नतीजे हैरान करने वाले थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 3 से 5 पीढ़ियों के भीतर ही पौधों में स्थानीय जलवायु के हिसाब से बदलाव हो गए थे। इसे रैपिड इवोल्यूशन (त्वरित विकास) (rapid evolution) कहा जाता है। हर जगह के पौधों में ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके से अनुकूलन (adaptation) हुआ। जो पौधे गर्म जगहों पर लगाए गए थे, उनके डीएनए में ऐसे बदलाव देखे गए जो उन्हें कम पानी में जीवित रहने और भीषण गर्मी सहने की ताकत देते थे। ठंडी जगहों वाले पौधों में ऐसे जीन विकसित हुए जो पाले (frost) से उनकी रक्षा कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वसंत ऋतु को पहचानने में था। गर्म इलाकों में पौधों ने जल्दी फूल देना शुरू कर दिया ताकि ज़्यादा गर्मी पड़ने से पहले ही वे बीज पैदा कर सकें। पौधों की डीएनए संरचना ही बदल गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जीन्स नए सिरे से विकसित हुए थे या कुदरती विविधता में से चुन भर लिए गए थे।

जेनेटिक विविधता का जादू

इस प्रयोग से एक बहुत बड़ा सबक यह मिला कि कोई भी प्रजाति तभी बच सकती है, जब उसके अंदर विविधता हो। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक टूलबॉक्स (toolbox) है जिसमें सिर्फ हथौड़े रखे हैं। अगर आपको कोई पेंच कसना हो, तो आप हथौड़े से वह काम नहीं कर सकते। लेकिन अगर आपके टूलबॉक्स में पेंचकस, प्लास और हथौड़ा सब कुछ है, तो आप हर तरह की समस्या सुलझा सकते हैं।

बिल्कुल इसी तरह, वैज्ञानिकों ने जो 231 तरह के बीजों का मिश्रण बनाया था वह एक टूलबॉक्स की तरह था। जब सूखा पड़ा, तो वे पौधे मर गए जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए था, लेकिन उसी मिश्रण में मौजूद वे पौधे बच गए जिनके अंदर सूखे से लड़ने वाले जीन मौजूद थे। इन्हीं बचे हुए पौधों ने आगे चलकर अपनी आबादी बढ़ाई। अर्थ सीधा-सा है, जैव विविधता (biodiversity) प्रकृति का सबसे बड़ा टूलबॉक्स है। अगर हम जंगलों और पौधों की विविधता को नष्ट करेंगे, तो हम उनसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत भी छीन लेंगे।

अनुकूलन की भी सीमा है

यह प्रयोग जहां एक तरफ उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बहुत गंभीर चेतावनी भी देता है। क्या पौधे हर तरह के खराब मौसम को झेल सकते हैं? जवाब है, नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि अत्यधिक विषम परिस्थितियों, जैसे तपते रेगिस्तान या अत्यधिक सूखे, में त्वरित विकास भी पौधों को नहीं बचा सका। तीन साल के भीतर ही इन इलाकों से पौधे पूरी तरह विलुप्त हो गए। उनके डीएनए में अनियमित बदलाव (irregular changes) होने लगे, जो इस बात का संकेत था कि तनाव इतना ज़्यादा हो चुका था कि प्रकृति का सुरक्षा तंत्र टूट गया। यह हमें बताता है कि पौधों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति और तीव्रता अगर एक सीमा से पार हो गई, तो जंगल-के-जंगल और खेत-के-खेत नष्ट हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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साल वनों का संकट और एकीकृत कीट प्रबंधन

सुदर्शन सोलंकी

ध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।

प्रकोप के कारक

यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।

परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे

आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।

दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल  जाते हैं।

शुद्ध वन और जैवविविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।

वृक्षों पर प्रभाव

वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।

लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।

भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:

सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।

सबहिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।

वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।

क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?

पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।

एकीकृत कीट प्रबंधन

घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।

इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।

एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।

जैविक नियंत्रण  भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।

डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पेड़ों का काल: एक भृंग

दुनिया भर के शहरी और जंगली पेड़ों पर भारी आक्रमण हो चुका है। एक कीट विशालकाय पेड़ों को तेज़ी से तबाह करने पर तुला है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक एक छोटे से भृंग (बीटल) की आक्रामक प्रजाति दक्षिण अफ्रीका की ‘ओक सिटी’ (oak city)कहे जाने वाले स्टेलनबोश शहर के ऐतिहासिक और विशाल इंग्लिश ओक पेड़ों को तबाह करने के बाद अब कैलिफोर्निया, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के पेड़ों को अपना शिकार बना रही है। 

पोलीफेगस शॉट-होल बोरर (Euwallacea fornicatus) (polyphagous shot hole borer beetle) भृंग मात्र 2 मि.मी. लंबा (तिल बराबर) होता है। मूल रूप से पूर्वी एशिया (चीन, वियतनाम) में पाए जाने वाला यह कीट पिद्दा होने के कारण जाने-अनजाने लकड़ी के सामान, पैकेजिंग खोकों और पौधों के आयात-निर्यात के ज़रिए दुनिया भर में अपनी जड़ें जमा चुका है।

मादा भृंग पेड़ के तनों में बारीक सुराख करके अंडे देती है और साथ में एक सहजीवी कवक छोड़ देती है। इस कवक के फलकाय (fungal fruiting bodies) को नवजात भृंग भोजन के रूप में लेते हैं। लेकिन नवजात भृंगों (infant beetels) द्वारा बनाई गई संकरी सुरंगे और कवक की लगातार वृद्धि से पेड़ की जल प्रणाली पूरी तरह ठप हो जाती है, और धीरे-धीरे पेड़ का तना भुरभुरा होकर सूख जाता है।  

चिंताजनक बात यह है कि इस भृंग की केवल एक मादा ही संक्रमण फैलाने के लिए काफी होती है। क्योंकि मादा के अनिषेचित अंडों (unfertilized egg) से नर भृंग पैदा होते हैं, जो उसी मादा से प्रजनन कर सकते हैं। मादा कीट उड़कर अन्य स्वस्थ पेड़ों को संक्रमित कर सकती है, जबकि नर भृंग उड़ नहीं पाते और उसी पेड़ पर बने रहते हैं।

शॉट-होल बोरर जैसी कई प्रजातियां हैं, जिनके बीच अंतर करना लगभग नामुमकिन है। इसी कारण लगभग एक दशक तक यह कीट कैलिफोर्निया में मौजूद होने के बावजूद ओझल रहा। शुरुआती दौर में, भ्रमवश इसे ‘टी शॉट-होल बोरर’ (Euwallacea perbrevis) मान लिया गया था। अब शोधकर्ताओं ने डीएनए अनुक्रमण की मदद से दोनों प्रजातियों में अंतर स्पष्ट कर लिया है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि ये भृंग अपने मूल स्थानों से कम से कम छह बार दूसरे देशों तक पहुंच चुके हैं। यह भी अनुमान है कि भविष्य में ये भूमध्य सागर के इलाकों, दक्षिण-पूर्वी अमेरिका, मेडागास्कर, और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में तबाही मचा सकते हैं। वन कीटविज्ञानी नकामुराकारे इसे पेड़ों के लिए ‘उभरते भयानक तूफान’ के तौर पर देखते हैं।

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में 2021 में इसकी रोकथाम के लिए चार करोड़ डॉलर और पांच हज़ार संक्रमित पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है। फिर भी इस कीट का खात्मा नहीं हो पाया। वैसे इस कीट और कवक की जोड़ी देखने के बाद रोकथाम के नए उपाय मिलने की उम्मीद है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो यह कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के फलदार पेड़ों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ऑक्टोपस ने त्रुटिरहित प्रोटीन निर्माण की राह दिखाई

क्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।

समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।

खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।

अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी . कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने . कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें  पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।

शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।

ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

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कोशिकाओं के ऊर्जा तंत्र की सुरक्षा में मददगार ल्यूसीन

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

मारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद प्रोटीन अंगों के सुचारू कामकाज और उनके विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन के निर्माण में 20 से ज़्यादा अमीनो एसिड्स (amino acids) की भूमिका होती है, ये प्रोटीन के बिल्डिंग (building blocks) ब्लॉक होते हैं। अमीनो एसिड शृंखला का क्रम ही कोशिकाओं में हर प्रोटीन की बनावट और कार्य तय करता है।

इनमें से कई अमीनो एसिड विशिष्ट कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं। मसलन, ग्लाइसिन (glycine) नामक अमीनो एसिड रक्त कोशिकाओं के लिए बहुत आवश्यक हैं; ल्यूसीन (leucine) अमीनो एसिड मांसपेशियों के विकास, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा निर्माण में शामिल होता है। शरीर में आठ और अनिवार्य अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें शरीर खुद नहीं बना सकता। अंगों को कार्यक्षम रखने के लिए इन्हें बाहर से यानी आहार (या पूरक) के रूप में लेना पड़ता है।

हर अंग के लिए ऊर्जा माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) से बनती है (प्राचीन ग्रीक में, माइटो का मतलब है धागे जैसा और कॉन्ड्रियन का मतलब है दाने)। माइटोकॉन्ड्रिया धागे जैसे अनोखे कोशिकांग होते हैं जो हर कोशिका में हज़ारों की संख्या में पाए जाते हैं। ये हमारे शरीर के ज़्यादातर अंगों के ऊर्जा के स्रोत होते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका में ऊर्जा की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। ये एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट (ATP) अणु बनाते हैं, जो कोशिका के लिए ऊर्जा का स्रोत है। कुल मिलाकर माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका की बैटरी होते हैं, जो ATP का इस्तेमाल करके उसे चार्ज करते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और मूल कोशिका के बीच का जुड़ाव बहुत ज़रूरी है क्योंकि ऑक्सीकरण (oxidation) और श्वसन के दौरान इस कोशिकांग की झिल्ली खराब हो सकती है, जिससे कोशिका का काम प्रभावित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, एक वयस्क मनुष्य के हृदय में 2 अरब से ज़्यादा मांसपेशीय कोशिकाएं होती हैं जो बिना रुके काम करती रहती हैं, और इनमें से हर कोशिका में 5000 से 8000 माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं। हृदय के धड़कने के लिए ज़रूरी ज़्यादातर ऊर्जा इन्हीं माइटोकॉन्ड्रिया से मिलती है।

शरीर के हर अंग को सुचारू काम करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहिए होती है। जब किसी अंग को ज़्यादा ऊर्जा चाहिए होती है तो नए माइटोकॉन्ड्रिया बनते हैं, लेकिन साथ ही ज़्यादा कार्यभार के कारण हुई क्षति के चलते कुछ माइटोकॉन्ड्रिया को खत्म भी करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया बनाने वाले प्रोटीन खत्म हो जाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली (membrane) के प्रोटीन खत्म नहीं होने चाहिए। बल्कि ज़रूरत उन्हें अधिक संख्या में खत्म होने से बचाने के तरीके खोजे जाने की है। वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की खोज कर रहे हैं जिनसे इन बाहरी भित्तियों को तनाव के कारण पूरी तरह ठप्प होने से बचाया जा सके, क्योंकि इससे चयापचय और बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।

ल्यूसीन की भूमिका

यहीं पर अहम अमीनो एसिड ल्यूसीन काम आता है। यह शाखित शृंखला वाले अमीनो एसिड (BCAA) परिवार का हिस्सा है, जिसमें आइसोल्यूसीन (Isoleucine) और वैलीन (valine) जैसे अमीनो एसिड भी शामिल हैं। इनकी ज़रूरत मांसपेशियों, तंत्रिका तंत्र, हृदय और मस्तिष्क जैसे अंगों के विकास और कामकाज के लिए होती है।

BCAA मानव शरीर में नहीं बनते हैं, इसलिए इन्हें आहार (भोजन) के माध्यम से ग्रहण करना पड़ता है। इनके बिना, माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली ठीक से बन नहीं पाती या टिकी नहीं रह पाती। पिछले वर्ष जर्मनी के कोलोन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एक्सेलेंस क्लस्टर ऑन एजिंग एंड एजिंग-एसोसिएटेड डिसीज़ेस के एक दल ने अध्ययन के लिए सी. एलिगेंस (Caenorhabditis elegans) नाम के छोटे गोल कृमि को मॉडल जीव के तौर पर चुना। नेचर सेल बायोलॉजी में प्रकाशित उनके नतीजों से पता चला कि BCAA ल्यूसीन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली के प्रोटीन को समय-पूर्व खराब होने से रोकता है। ल्यूसीन इस काम को अंजाम SEL1L नामक प्रोटीन के साथ मिलकर देता है। SEL1L प्रोटीन क्षतिग्रस्त या विकृत प्रोटीन्स को पहचानता और हटाता है।

इस तरह, ल्यूसीन कोशिकाओं और अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है और ज़्यादा ऊर्जा भी देता है। यह जानना अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या दूसरे BCAA भी कोशिकाओं की सुरक्षा   में ऐसी ही अहम भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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