विश्वास, उम्मीद और अच्छी सेहत का जीवविज्ञान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

मेरिकी लेखक और एक्टिविस्ट हेलन केलर (Helen Keller) इंसानी क्षमता और संभावना की एक अंतर्राष्ट्रीय मिसाल हैं। बहरेपन और अंधेपन से ग्रसित हेलन केलर ने लिखा था, “आशावाद (inspirational mindset) वह विश्वास है जो कामयाबी की ओर ले जाता है। उम्मीद और भरोसे के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता।”

आशावाद को भविष्य में अच्छा और हितकर होने की सकारात्मक उम्मीद रखने के रूप में समझा जा सकता है। यह एक इंसानी खूबी है जिसे बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी से भी जोड़ कर देखा जाता है। आशावाद तय करता है कि हम भविष्य को कैसे देखते-सोचते हैं। यह एक मॉड्युलेटर की तरह काम करता है जो सकारात्मक संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा-चढ़ा देता है और नकारात्मक विचारों और ख्यालों को दूर रखता है। इस्राइली-ब्रिटिश तंत्रिका विज्ञानी ताली शारोट (Tali Sharot neuroscientist) का अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत मनुष्य आशावादी हैं, लेकिन अधिकतर लोग ‘थोड़े ही’ आशावादी होते हैं।

यह कहा जा सकता है कि आशावाद वास्तविकता से अलग, एकतरफा सोच दिखाता है। जैव-विकास (evolutionary biology) ऐसी खूबी को क्यों तरजीह देगा जो आपको पूरी तरह निष्पक्ष रखने की बजाय एकतरफा ढंग से पूर्वाग्रह से लैस करे? वैज्ञानिकों के बीच आम राय यह है कि आशावाद की बदौलत अनुकूलन (adaptive advantage) काफी ज़्यादा होता है, अर्थात आशावाद किसी जीव की उत्तरजीविता (survival benefit) को बढ़ाता है।

कल्पना कीजिए कई हज़ार साल पहले कोई महिला जिस तरह रहती थी। मान लीजिए वह एक गुफा के अंदर रहती है और उस समय उस क्षेत्र में सूखा पड़ रहा है। अगर वह बाहर भोजन (कोई खरगोश या फल से लदी झाड़ी) मिलने की संभाविता निकालकर निर्णय करे, तो शायद ही भोजन की तलाश में बाहर जाए। ऐसे में निष्क्रिय रहना उसके लिए सही चुनाव रहता, क्योंकि इससे यहां-वहां भटकने में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती। दूसरी ओर, (कुछ-न-कुछ मिल जाने की) उम्मीद उसे भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलने की हिम्मत दे सकती है। बाहर कुछ-न-कुछ भोजन मिल जाने की संभावना ज़्यादा मानकर, उसके पास कोशिश करने की ज़्यादा संभावना होगी। किसी एक तरफ यह थोड़ा अधिक झुकाव उसे कोशिश करने के लिए बढ़ावा (risk taking behavior) देता है, जिससे उसके जीने की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि, इसकी भी एक सीमा है कि आप कितने आशावादी होकर इससे फायदा उठा सकते हैं। फायदे के लिए जो तरीका सबसे अच्छा काम करता है वह है एक सामान्य सकारात्मक सोच रखना, जिसे आशावादी स्वभाव कहा जाता है। असल ज़िंदगी में कुछ बुरा होने पर किसी निराशावादी व्यक्ति की प्रतिक्रिया होगी “मैं जानता था, ऐसा ही होगा”। जबकि आशावादी लोग कहेंगे “कल बेहतर होगा”।

वर्ष 2007 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन (Nature journal research) के अनुसार यह लचीलापन ‘आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टिमिज़्म बायस)’ से बना रहता है, जो मस्तिष्क में सूचनाओं की प्रोसेसिंग में गैर-बराबरी का परिणाम है: मस्तिष्क द्वारा अच्छी बातों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है और बुरी बातों को कम।

मस्तिष्क के अग्र और मध्य भाग का एक क्षेत्र है रोस्ट्रल एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (rACC)। जब आशावादी लोग अच्छे और सुखद भविष्य की कल्पना करते हैं तब यह क्षेत्र बहुत सक्रिय होता है। इस हिस्से में अधिक सक्रिय न्यूरॉन अच्छी संभावनाओं की एन्कोडिंग को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत, नकारात्मक जानकारियों पर rACC कम प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप असफलताओं का व्यक्ति की भविष्य की उम्मीदों पर कम असर पड़ता है।

रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (Life Orientation Test) एक छोटा-सा परीक्षण है जिसका इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में आशावादिता है या नहीं। इसमें स्थिति आधारित 10 वक्तव्य होते हैं जिन्हें आपको 0 से 4 के बीच अंक देने होते हैं (‘पूरी तरह असहमत’ के लिए 0 से ‘पूरी तरह सहमत’ के लिए 4 तक)। मसलन, ऐसे वक्तव्य होते हैं: “कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता हूं” और “यदि कुछ बुरा होना है, तो होकर रहेगा।” (psychological assessment)।

जिन लोगों में आशावादिता अधिक होती है, उनका हृदय अधिक स्वस्थ (heart health benefits) पाया गया है। बुज़ुर्गों में, आशावादी स्वभाव को न्यूरॉन्स का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो मस्तिष्क को बुढ़ापे की मार से बचाता है। वर्ष 2024 में एजिंग एंड डिसीज़ जर्नल (Aging and Disease journal study) में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) का उच्च स्तर बुढ़ापे में लचीलापन बढ़ाता है। बुढ़ाने के कारण भले ही कुछ न्यूरॉन्स खत्म होते जाते हैं, लेकिन BDNF बचे हुए न्यूरॉन्स को ज़्यादा असरदार तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति की इंद्रियां चाक-चौबंद रहती हैं और दिमाग समझदार बना रहता है। (स्रोत फीचर्स)

क्या आप आशावादी हैं? रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (LOT-R)

देखें कि यहां दिए गए वक्तव्यों से आप कितना सहमत हैं? सहमति की गंभीरता के अनुसार आपको इन वक्तव्यों को अंक देना है।

वक्तव्य

  1. कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता/ती हूं।
  2. मुश्किलों या चिंता को भूलना/हावी न होने देना मेरे लिए आसान है।
  3. यदि मेरे साथ कुछ बुरा होना है तो वह होकर रहेगा।
  4. मैं अपने भविष्य को लेकर हमेशा सकारात्मक रहता/ती हूं।
  5. मुझे अपने दोस्तों के साथ बहुत मज़ा आता है।
  6. मेरे लिए व्यस्त रहना ज़रूरी है।
  7. मुझे शायद ही कभी लगता है कि चीज़ें मेरे हिसाब से/अच्छे के लिए होंगी।
  8. मैं बहुत जल्दी परेशान नहीं होता/ती।
  9. मेरे साथ शायद ही कभी अच्छा हुआ है।
  10. कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि मेरे साथ बुरी चीज़ों की तुलना में अच्छी चीज़ें अधिक होंगी।

नोट: अंक ईमानदारी से दें। कोशिश करें कि किसी एक सवाल का जवाब, दूसरे सवाल के जवाब को ध्यान में रखकर न दिया जाए। जवाब वे चुनें जो आप पर लागू होते हों, न कि आदर्श जवाब हों या दूसरों को ध्यान में रखकर चुनें हों। ध्यान रहे यहां कोई भी जवाब सही या गलत नहीं हैं।

अंक कैसे दें?

ध्यान दें: स्कोर के लिए केवल कथन क्रमांक 1, 3, 4, 7, 9, 10 नंबर के सवालों अंकों को जोड़ा जाता है। वक्तव्य क्रमांक 2, 5, 6, 8 के अंकों को नहीं जोड़ा जाता।

वक्तव्य क्रमांक 1, 2, 4, 5, 6, 8 और 10 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह असहमत – 0
असहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
सहमत – 3
पूरी तरह सहमत – 4

वक्तव्य क्रमांक 3, 7 और 9 के लिए इस तरह अंक दें।

पूरी तरह सहमत – 0
सहमत – 1
उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2
असहमत – 3
पूरी तरह असहमत – 4 

आपके द्वारा दिए गए जवाबों के अंक जोड़कर जो स्कोर निकलेगा उसकी व्याख्या का तरीका

19-24 घोर आशावादी;
14-18 मध्यम आशावादी;
9-13 उदासीन;
4-8 मध्यम निराशावादी; और
0-3 घोर निराशावादी।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/2d6p7g/article70654691.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/pablo-guerrero-I6QTv5pjq0E-unsplash.jpg

जेलीफिश मनुष्यों के समान सोती है

जेलीफिश (jellyfish) एक समुद्री अकशेरुकी जीव है जो आम तौर पर अपने छतरी जैसी आकृति से पहचाना जाता है। यह निडेरिया फायलम में कैसियोपिडी कुल में आता है और कैसिओपी जीनस का सदस्य है जिसमें 12 प्रजातियां हैं। देखा जाए तो यह हायड्रा, सी-एनीमोन, कोरल जैसे अन्य जलचर जंतुओं का सम्बंधी है। यहां जिस जेलीफिश (Cassiopea andromeda) की बात हो रही है वह उल्टी छतरी जैसा दिखता है। यानी छत्ता ज़मीन पर और झालर ऊपर।

यह शैवालों के साथ सहजीवी सम्बंध (symbiotic relationship) में रहता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के ज़रिए भोजन का निर्माण करते हैं। ये शैवाल इसके छाते में बसते हैं और यही कारण है कि ये जेलीफिश छाते को उल्टा रखती हैं ताकि इन शैवालों को भोजन निर्माण के लिए प्रकाश मिलता रहे। जेलीफिश विभिन्न रंगों में मिलती है और यह रंग इन्हें शैवालों की बदौलत ही मिलता है।

अब वैज्ञानिकों ने नेचर कम्यूनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया है कि जेलीफिश और स्टारलेट सी-एनीमोन (Nematostella vectensis) में नींद जैसे पैटर्न नज़र आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि नींद लेने के लिए दिमाग ज़रूरी है लेकिन उक्त अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है।

देखा जाए तो नींद (sleep behavior) एक जोखिम भरा व्यवहार है – उस दौरान जंतु शिकारियों के प्रति कमज़ोर हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि फिर भी नींद आती है, तो इसकी कुछ तो लाभदायक भूमिका होनी चाहिए। इस्राइल के शोधकर्ता उपरोक्त दो प्रजातियों में इसी की छानबीन कर रहे थे। ये दोनों जंतु उथले लैगून्स के पेंदों में अपने टेन्टेकल्स को लहराते पड़े रहते हैं। टेन्टेकल्स शिकार को पकड़ने का काम करते हैं (marine animal behavior)।

इनमें नींद जैसी अवस्था देखी गई थी। यह देखा गया था कि दिन के कई घंटे ये ऊंघते रहते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन जंतुओं में मस्तिष्क तो छोड़िए, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) भी नहीं होता। इनकी तंत्रिकाएं पूरे शरीर में बिखरी होती हैं।

बार-इलान विश्वविद्यालय के लियोर एपलबॉम और उनके साथी देखना चाहते थे कि इनमें नींद का पैटर्न कैसा होता है और नींद की भूमिका क्या है। अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने एक एक्वेरियम में कई सारी जेलीफिश रखीं और कई दिनों तक उन्हें 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधकार में रखा (light dark cycle experiment), यह देखने के लिए कि जेलीफिश इन अवधियों में कितनी बार अपनी छतरी नुमा तोंद को ऊपर-नीचे करती हैं। यह फूलना-पिचकना इनके जागे होने का एक संकेत है।

प्रयोग में देखा गया कि रात में जेलीफिश कम सक्रिय रहती हैं और अपनी तोंद को प्रति मिनट लगभग पांच बार कम ऊपर-नीचे करती हैं। अब यह देखना था कि क्या इस क्रिया का सम्बंध निद्रावस्था से है। शोधकर्ताओं ने जेलीफिश पर रोशनी चमकाई और देखा कि वे कितनी जल्दी अपनी धड़कन से प्रतिक्रिया देती हैं। किसी ऊंघते मनुष्य के ही समान जेलीफिश ने अंधकार में रोशनी की प्रतिक्रिया देने में 20 सेकंड का टाइम लिया। जबकि दिन में चौकन्नी अवस्था में उन्हें मात्र 10 सेकंड लगते हैं।

सी-एनीमोन (sea anemone organism) का पैटर्न इससे उल्टा था। वे रात में सक्रिय रहते हैं और दिन में उनकी हरकतें धीमी रहीं और प्रतिक्रिया अवधि लंबी। अलबत्ता, दोनों ही जंतु दिन की एक-तिहाई अवधि तक सोते रहे। और तो और, सी-एनीमोन के सोने जागने का क्रम उनकी अंदरुनी घड़ी (सर्काडियन क्लॉक) से संचालित था। शोधकर्ताओं ने प्रकाश व अंधकार के क्रम को पलट दिया, तब भी सी-एनीमोन का सोने-जागने का क्रम बरकरार रहा। दूसरी ओर, जेलीफिश में यह क्रम प्रकाश से प्रभावित हुआ – अंधेरे में वे उनींदे रहे और रोशनी में सक्रिय (sleep deprivation effect)।

यह भी देखा गया कि इन जंतुओं को यदि एक रात की नींद ठीक से न मिले तो उन्हें बाद में ज़्यादा आराम की ज़रूरत होती है, ठीक इंसानों के समान। शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में पानी को 6 घंटे तक उस दौरान मथा जो जेलीफिश के सोने का समय था। इससे उनकी नींद कच्ची रही और बाद में वे सामान्य जेलीफिश की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक समय तक सोते रहे।

शोधकर्ताओं ने नींद के साथ छेड़छाड़ का एक तरीका और आज़माया। उन्होंने कुछ एक्वेरियम टंकियों में मेलेटोनिन (melatonin hormone) डाल दिया। मेलेटोनिन एक हॉरमोन है, मनुष्यों में मस्तिष्क जिसका स्राव रात में करता है और यह नींद प्रेरित करता है। मेलेटोनिन का ऐसा ही असर जेलीफिश तथा सी-एनीमोन पर भी हुआ और वे दिन की उस अवधि में ऊंघने लगे जब वे सामान्य तौर पर सक्रिय होते हैं (sleep regulation)।

ज़ाहिर है कि ये दो जंतु नींद का मज़ा लेते हैं। पूर्व में कई शोधकर्ता दर्शा चुके थे कि मक्खियों, चूहों और मनुष्यों सहित कई प्रजातियों में नींद डीएनए को हुई क्षति को कम (DNA damage repair) करता है। यह क्षति जाग्रत अवस्था में होती रहती है। एपलबॉम का विचार है कि शायद जेलीफिश और सी-एनीमोन में भी ऐसा ही होता है। अपने इस विचार की जांच के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने जेलीफिश को पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश के संपर्क (ultraviolet UV radiation) में रखा। यूवी प्रकाश डीएनए क्षति के लिए जाना जाता है। यूवी के संपर्क में रहने के बाद जेलीफिश सामान्य से ज़्यादा देर तक सोती रहीं जबकि उनमें मस्तिष्क नहीं होता।

इसी प्रकार से, सी-एनीमोन को ऐसी कीमोथेरपी औषधि (chemotherapy drug) दी गई जो डीएनए क्षति करती है। इस उपचार के बाद ये सी-एनीमोन 30 प्रतिशत ज़्यादा सोए (DNA repair mechanism)।

तो, सवाल उठता है कि नींद की झपकी के सारे आसन्न खतरों के बावजूद जंतु सोते क्यों हैं। एक गोल कृमि सीनेरोब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabditis elegans worm) के नींद व्यवहार पर शोध करने वाली कैलिफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक चेरिल फान बर्सकिर्क का कहना है कि नींद तंत्रिकाओं के रख-रखाव का एक तरीका हो सकता है क्योंकि तंत्रिकाएं डीएनए क्षति का सबसे अधिक खतरा झेलती हैं। उनका तो कहना है कि नींद का उद्भव संभवत: पहली-पहली तंत्रिकाओं (early nervous system) के साथ ही हुआ होगा। यानी नींद तो मस्तिष्क के विकास से पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार कर चुकी थी। वे कहती हैं कि एपलबॉम की टीम द्वारा किए गए ये प्रयोग एक बार फिर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि नींद का विकास (evolution of sleep) जटिल मस्तिष्क  को संभालने के लिए हुआ है। (स्रोत फीचर्स)

जेलीफिश की सोनजागने की प्रक्रिया का वीडियो देखें: https://youtu.be/UPtSlvU6nh8

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://caltech-prod.resources.caltech.edu/main/images/LGoentoro_Jellyfish-Research-3782-NEWS-WEB.width-600.jpg

कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है?

जाड़े का मौसम तो चला गया है लेकिन जाते-जाते एक सवाल का जवाब मिल गया है: कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है? इसका कारण है हमारे शरीर की बनावट, अनुकूलन की क्षमता (cold adaptation) और हमें मिले वंशानुगत गुण (genetic factors)।

युनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के जीवविज्ञानी फ्रांस्वा हेमन के अनुसार, इंसान का शरीर नैसर्गिक रूप से बहुत ज़्यादा ठंड सहने में माहिर नहीं है। हम आसानी से शरीर की गर्मी गंवा देते हैं। फिर भी हर व्यक्ति को ठंड अलग-अलग तरह से महसूस होती है। और, इसमें हमारी जीवनशैली व जैविक बनावट (human physiology), दोनों की अहम भूमिका होती है।

ठंड सहने में एक भूमिका अनुकूलन की भी होती है। जो लोग गर्म इलाकों से ठंडे स्थानों पर जाते हैं, उन्हें शुरुआत में ज़्यादा दिक्कत होती है। लेकिन लगातार उस स्थान पर रहने से धीरे-धीरे शरीर ठंड के मुताबिक खुद को ढाल लेता है। इस प्रक्रिया को अनुकूलन (climate acclimatization) कहते हैं।

शरीर का आकार भी मायने रखता है। छरहरे शरीर या छोटे कद वाले लोग जल्दी गर्मी गंवाते हैं, जबकि बड़े डील-डौल वाले लोग गर्मी देर तक सहेज पाते हैं। खासकर मांसपेशियां (muscle mass) बहुत महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे काम करते समय गर्मी पैदा करती हैं। इसलिए जिन लोगों की मांसपेशियां ज़्यादा होती हैं, वे अंदर से अधिक गर्मी (heat generation in body) बनाते हैं। ठंड से बचाव के मामले में मांसपेशियां शरीर की सबसे मज़बूत ढालों में से एक हैं।

लेकिन, सिर्फ शरीर का आकार ही पूरी कहानी नहीं है। आर्कटिक जैसे बेहद ठंडे इलाकों में रहने वाले कुछ समुदाय (जैसे ग्रीनलैंड के इनुइट लोग) अपेक्षाकृत छोटे कद के बावजूद कड़ाके की ठंड आसानी से सह लेते हैं। शोध में पाया गया है कि कुछ लोगों के जीन ऐसे होते हैं जो ‘भूरी वसा’ (brown fat tissue) नाम की खास वसा के विकास से जुड़े हैं। यह वसा शरीर में गर्मी पैदा करने में मदद करती है। इसके अलावा, जीन यह भी तय करते हैं कि शरीर में चर्बी कैसे वितरित होगी और मांसपेशियां कैसे काम करेंगी। इन कारणों से कुछ लोग अपने शरीर का अंदरूनी तापमान दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से बनाए (genetic adaptation) रख पाते हैं।

जीन इस बात को भी प्रभावित कर सकते हैं कि ठंड में हमारी रक्त वाहिकाएं (blood vessels response) कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। जब मौसम बहुत ठंडा होता है, तो त्वचा और हाथ-पैरों की ओर बहने वाला खून कम हो जाता है, ताकि हृदय और दूसरे ज़रूरी अंगों के आसपास गर्मी बनी रहे। इसी कारण उंगलियां और पैर ज़्यादा ठंडे महसूस होते हैं, लेकिन इससे शरीर का केंद्रीय तापमान सुरक्षित रहता है। कुछ लोगों में जीन इस प्रक्रिया को और बेहतर तरीके से नियंत्रित (blood circulation in cold)  करने में मदद करते हैं।

कुल मिलाकर, ठंड लगना कई कारणों से तय होता है। इसमें डील-डौल, अनुकूलन क्षमता और जेनेटिक्स (human genetics) तीनों मिलकर असर डालते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खुशबू से ठगने वाले बीटल्स

ल-धोखा सिर्फ हमारे साथ नहीं होता। जीवजगत में भी कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां एक जीव अपने फायदे के लिए दूसरे जीव का इस्तेमाल (biological deception) करता है। जैसे, कुछ ऑर्किड के फूल (orchid flowers) मधुमक्खियों को छलते हैं। इन ऑर्किड के फूलों का रूप-रंग मादा मधुमक्खी की तरह होता है और वे उन्हीं की तरह महक बिखेरते हैं। मादा की तलाश कर रहीं नर मधुमक्खी इन फूलों पर चली जाती हैं। संभोग तो होता नहीं लेकिन संभोग की कोशिश में उनके शरीर पर ऑर्किड के परागकण (pollination process) चिपक जाते हैं। ऑर्किड का परागण हो जाता है, बदले में मधुमक्खी को कुछ नहीं मिलता।

वैज्ञानिकों को अब ऐसी ही एक और धोखाधड़ी के बारे में पता चला है। इसमें मधुमक्खियों को धोखा देते हैं भृंग यानी बीटल्स: ब्लिस्टर बीटल के लार्वा (blister beetle larvae) फूल जैसी महक बिखेरते हैं, जिससे मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती है। फिर, लार्वा मधुमक्खी से चिपक जाते हैं, चिपके-चिपके उनके छत्तों में पहुंच जाते हैं और उनके अंडे खा जाते हैं।

मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकॉलॉजी (Max Planck Institute for Chemical Ecology) के कार्बनिक रसायनज्ञ रयान आलम की बीटल्स के अध्ययन में दिलचस्पी थी। ब्लिस्टर बीटल आत्मरक्षा के लिए कैंथेरीडिन नामक विषैला रसायन छोड़ते हैं, जिससे त्वचा पर फफोले उभर आते हैं। जब आलम को पता चला कि ब्लिस्टर बीटल की कुछ प्रजातियां घास और पौधों के सिरे पर चढ़ जाती हैं (insect behavior)  तो वे हैरान रह गए।

वे सोचने लगे कि कहीं इनके लार्वा कोई गंध तो नहीं छोड़ते। जांच के लिए वे जर्मनी के घास के मैदानों से 40 युरोपियन ब्लैक ऑयल बीटल (Meloe proscarabaeus) इकट्ठा करके प्रयोगशाला ले आए। यहां बीटल्स ने प्रजनन किया और हज़ारों अंडे दिए। अंडे से निकलने के बाद लार्वा प्रयोगशाला की घास पर चढ़ गए। कैंथेरीडिन रसायन से बनने वाले फफोलों से बचने के लिए दस्ताने पहनकर आलम ने लार्वा इकट्ठा किए और उन्हें मसल दिया। फिर उन्होंने इस लार्वा-चटनी की गैस क्रोमैटोग्राफी की और देखा (gas chromatography analysis) कि इसमें कौन-कौन-से रसायन मौजूद हैं।

उन्हें लार्वा में मोनोटर्पिनॉइड्स नामक कुछ अणु (monoterpenoid compounds) मिले। ये कीटों में तो कम मिलते हैं, लेकिन पौधों में आम तौर पर पाए जाते हैं। लार्वा में सबसे अधिक पाए गए आठ अणुओं में से कई प्राय: फूलों में पाए जाते हैं। जैसे लिनेलूल ऑक्साइड (linalool oxide) और लिलेक एल्डिहाइड (lilac aldehyde)। फूलों में ये रसायन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन फूलों में पाए जाने वाले रसायन किसी कीट में मिलना हैरानी की बात थी (chemical mimicry)।

तो सवाल था कि क्या वाकई कीट में मौजूद ये रसायन मधुमक्खियों को न्यौता देते हैं? इसे जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने एक Y-शेप का रास्ता (Y-maze experiment) बनाया, जिसका एक रास्ता बीटल-लार्वा से बिखेरी गई खुशबू की ओर जाता था और दूसरा रास्ता व्हीटग्रास की खुशबू की ओर। मधुमक्खी दोनों में से कोई एक खुशबू चुन सकती थीं। रेड मेसन मधुमक्खियों (Osmia bicornis) और बेयर-सैडल्ड सेलोफेन मधुमक्खियों (Colletes similis), दोनों ने व्हीटग्रास की बजाय लार्वा से निकलने वाली फूल-जैसी खुशबू का मार्ग चुना।

शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि बीटल लार्वा फूल जैसे रसायन कैसे बनाते हैं। पता चला कि उनमें इन रसायनों का निर्माण उन्हीं एंज़ाइम्स (biosynthesis enzymes) से होता है, जिनसे ये पौधे में बनते हैं।

मादा-सरीखी खुशबू फैलाने की बजाय फूल-जैसी खुशबू बिखेरने से फायदा यह है कि इस खुशबू से नर और मादा दोनों मधुमक्खियां आकर्षित होती है। और सिर्फ मादा मधुमक्खियां ही अपने छत्ते में वापस लौटती हैं, नर नहीं। तो क्यों न छत्ते तक पहुंचने के लिए नर को छोड़कर सीधे मादा से लिफ्ट ली जाए। लार्वा वसंत की शुरुआत में, असली फूल खिलने से पहले, घास के तनों पर चढ़ जाते हैं। और उन्हें फूल समझकर बेचारी मधुमक्खियां उनके पास खींची चली आती हैं और ठगी जाती (parasitic strategy) हैं।

हो सकता है इस तरह की महकती नकल जीवजगत में और भी आम हो, जिन पर लोगों का ध्यान न गया हो। ध्यान न जाने का कारण यह हो सकता है कि हम मनुष्य नाक से उतना काम नहीं लेते जितना आंखों से लेते हैं। तो, आंख-नाक-कान खुले रखकर निसर्ग को निहारें, सूंघें और सुनें बहुत कुछ रोचक हाथ लग सकता है (nature science discovery)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zeydsqa/full/_20260122_on_beetle_larvae.jpg

एआई ने सुझाए प्रचीन रोमन खेल के नियम-कायदे

प्रतिका गुप्ता

बात करीब सवा सौ साल पहले की है। दक्षिण-पूर्वी नीदरलैंड्स के शहर हीरलेन में खुदाई के दौरान एक चूना पत्थर मिला था, जो फ्रांस से आयातित था। इस पर उभरी लकीरों के पैटर्न देखकर तो ऐसा लगता था जैसे यह कोई बोर्ड गेम (ancient board game) हो। रोमन म्यूज़ियम की क्यूरेटर कैरन जेनेसन के शब्दों में “पत्थर को नफासत से तराशा गया था। इसे मेज़ पर रखकर खेला जाता होगा।” लेकिन लकीरों के पैटर्न किसी भी जाने-पहचाने रोमन खेल (Roman era game) जैसे नहीं थे।

तो यह गुत्थी अनसुलझी ही रही कि यह क्या खेल है, इसे कैसे खेलते होंगे, इसके नियम क्या होंगे, वगैरह-वगैरह। इस खेल-पत्थर के आसपास कांच, हड्डी और सिरेमिक की गोटियां भी मिली थीं, जिन्हें हेट रोमाइन्स म्यूज़ियम में सहेजा गया (archaeological discovery)।

 फिर, साल 2020 में लीडेन युनिवर्सिटी के प्राचीन बोर्ड गेम्स विशेषज्ञ वाल्टर क्रिस्ट तकरीबन आठ इंच चौड़े इस बोर्ड गेम के सामने ठिठक गए। कारण इसकी सीधी-तिरछी लकीरों से बनी अष्टभुज आकृति का अब तक ज्ञात किसी भी खेल से मेल न बैठना था। उन्होंने तफ्सील से अध्ययन करने का सोचा।

क्रिस्ट ने खेल-पत्थर पर गोटियां खिसकाने से बने घिसावों को ध्यानपूर्वक देखा ताकि चालों का अंदाज़ा लगाया जा सके। फिर उन्होंने अन्य विशेषज्ञों की मदद से खेल-पत्थर का विस्तृत और सूक्ष्म 3डी स्कैन (3D scan analysis) करवाया। 3डी स्कैन में खेल-पत्थर पर बने निशान और गोटियों की चाल थोड़ा उभर कर आ रही थीं: कुछ लकीरें अन्य लकीरों की तुलना में थोड़ी ज़्यादा गहरी थीं। इससे साफ पता चलता था कि कुछ खास चालों को ज़्यादा चला गया था। चालों को देखकर यह किसी ब्लॉकिंग खेल की तरह लगता था, जिसमें एक खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी की गोटियां आगे बढ़ने से रोकने और उन्हें घेरने की कोशिश करता है, जैसे टिक-टैक-टो या ओथेलो में होता है (strategy board game)। साथ ही खेल-पत्थर के नफासत से तराशे गए किनारे बताते थे कि इसे सोच-समझकर बनाया गया था।

खेल के नियमों को डिकोड करने में शोधकर्ताओं का अगला कदम था कृत्रिम बुद्धि (एआई- artificial intelligence AI) की मदद लेना। नियमों को समझने के लिए, क्रिस्ट ने मास्ट्रिख्ट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस सोमर्स के साथ मिलकर दो एआई एजेंट्स को सौ से अधिक प्रचलित रोमन-युरोपियन खेलों के नियमों से प्रशिक्षित किया (AI game simulation)। फिर AI एजेंट्स ने हर नियम सेट के अनुसार 1000 राउंड खेले। शोधकर्ताओं ने विभिन्न नियमों के अनुसार खेले गए खेलों में मोहरों की चालों को देखा। फिर उन्होंने चालों की तुलना खेल-पत्थर पर मिले घिसावों से की ताकि यह पता चल सके कि किन नियमों के मुताबिक गोटियां चली गई थीं। शोधकर्ताओं को नौ नियम मिले जो खेल-पत्थर के घिसावों के साथ मेल खा रहे थे; ये सभी नौ नियम ब्लॉकिंग (घेराबंदी) खेलों के थोड़े परिवर्तित रूप थे। पैटर्न को देखकर ऐसा लगता था कि इस खेल में ज़्यादा गोटियों वाला खिलाड़ी कम गोटियों वाले खिलाड़ी को बढ़ने से रोकने या घेरने की कोशिश करता है।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने इस खेल को पुनर्निमित किया और इसे खेलने के कुछ नियम बताए। खेल को उन्होंने लुड्स कोरिओवल्ली (Ludus Coriovalli) नाम दिया है जिसका मतलब है कोरिओवलम का खेल। कोरिओवलम हीरलेन शहर का प्राचीन रोमन नाम है, जहां से यह खेल-पत्थर मिला था।

शोधकर्ता खेल के नियम तो बताते हैं लेकिन थोड़ा सतर्क भी करते हैं कि यह चालों और ज्ञात अन्य खेलों के नियमों के आधार पर एक निष्कर्ष है; हो सकता है रोमन लोग वास्तव में इसे थोड़े अलग ढंग से खेलते हों।

उम्मीद है कि इस अध्ययन के बाद अन्य प्राचीन खेलों के नियम वगैरह सुलझाने में मदद मिलेगी। बहरहाल, अध्ययन यह बात साफ उभारता है कि काम के अलावा, मनोरंजन भी प्राचीन लोगों के जीवन का अहम हिस्सा था (Roman civilization lifestyle)। वे न सिर्फ खोज, नए आविष्कार या दिन-रात काम करते थे बल्कि अपने मनोरंजन का ख्याल भी रखते थे और मनोरंजन के नए-नए तरीके, नए खेल भी गढ़ते थे। (स्रोत फीचर्स)

कैसे खेलें लुड्स कोरिओवल्ली

बोर्ड: कागज़ या तख्ती पर चित्र 1 के अनुसार बिसात बनाएं।

खिलाड़ी: इस खेल को दो खिलाड़ी (चोर और पुलिस) खेल
सकते हैं। चोर खिलाड़ी के पास दो गोटियां होंगी और पुलिस
खिलाड़ी के पास चार गोटियां होंगी।

लक्ष्य: पुलिस खिलाड़ी को कम से कम चालों में चोर को चारों
ओर से घेरना है, ऐसे कि चोर खिलाड़ी की गोटियों को आगे
चलने के लिए कोई चाल न बचे।

नियम

  • खेल दो पारियों में खेला जाता है। खेल शुरू करने के पहले खिलाड़ी यह तय कर लें कि पहली पारी में कौन सा खिलाड़ी चोर बनेगा और कौन सा खिलाड़ी पुलिस।
  • चित्र के अनुसार गोटियां जमा लें। चित्र में काली गोटियां पुलिस की हैं और सफेद गोटियां चोर की।
  • बिसात में दो या दो से अधिक रेखाओं के जोड़ बिंदु ‘घर’ हैं।
  • एक खिलाड़ी एक चाल में नज़दीकी एक घर आगे बढ़ सकता है।
  • कोई भी खिलाड़ी अपनी या विरोधी खिलाड़ी की गोटी को लांघकर आगे नहीं बढ़ सकता।
  • एक घर पर एक ही गोटी रह सकती है, एक से ज़्यादा नहीं।
  • खिलाड़ी बारी-बारी से अपनी चाल चलेंगे। एक खिलाड़ी एक चाल में अपनी गोटी एक घर ही खिसका सकता है। और अपने द्वारा चली चालों का हिसाब रखता जाता है।
  • यदि चोर की गोटी को अगली चाल चलने के लिए कोई रास्ता न बचे, वह अपनी गोटी कहीं भी आगे न बढ़ा पाए तो इस सूरत में गोटी घिरी हुई कहलाएगी।

पारी खत्म कब होगी

पारी तब खत्म होगी जब चोर की दोनों गोटियां पुलिस से पूरी तरह घेर ली जाएंगी। एक पारी के अंत में पुलिस ने कितनी चालों में चोर को पूरी तरह घेर लिया इसे गिना जाएगा।

अगली पारी, भूमिका बदली

अगली पारी खिलाड़ियों की भूमिकाएं आपस में बदलकर खेली जाएगी। यानी अगली पारी में पुलिस खिलाड़ी चोर बनेगा और चोर खिलाड़ी पुलिस बनेगा। और, फिर खेल
दोहराया जाएगा। खेल के अंत में दोनों पुलिस खिलाड़ियों
की चालों को गिना जाएगा। जिस खिलाड़ी ने सबसे कम
चालों में चोर को घेरा होगा वह विजेता कहलाएगा। यदि
खेल ड्रॉ होता है, तो खेल शुरू से दोबारा खेला जाएगा। तो चलिए, यह प्राचीन लेकिन नया खेल खेलकर देखिए।
वैसे खेल के नियम आप अपने हिसाब से मुश्किल और
मज़ेदार बना सकते हैं, थोड़े बदल सकते हैं। क्योंकि
मतलब खेलने के मज़े से है। किसी भी तरह खेलें और
मज़ा लें! चाहें तो आप बिसात थोड़ा बदल भी सकते हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/m/7e1f9d133bec2c01/original/Roman-game-cropped.jpg?m=1770756397.469&w=1200
https://www.researchgate.net/publication/400677952/figure/fig3/AS:11431281933993895@1770835319942/Glass-game-pieces-from-Coriovallum-Het-Romeins-Museum-object-numbers-clockwise-from-top.ppm


व्यायाम और मस्तिष्क

क्सरसाइज़ (व्यायाम – exercise benefits) का नाम सुनते ही क्या ख्याल आता है? मज़बूत मसल्स, स्वस्थ दिल, स्वस्थ फेफड़े यानी तंदुरुस्त शरीर। और यदि कहा जाए कि शरीर की इस तंदुरुस्ती में मस्तिष्क (brain health) भी शामिल है तो?

जी हां, न्यूरॉन जर्नल (Neuron journal study) में प्रकाशित हालिया अध्ययन यही बात कहता है; व्यायाम से मस्तिष्क की वायरिंग मज़बूत होती है, जिससे कुछ न्यूरॉन्स फटाफट सक्रिय हो जाते हैं। इससे समझ आता है कि लगातार व्यायाम करने से व्यायाम में होने वाली आसानी और बेहतर क्षमता (यानी व्यायाम सहिष्णुता (exercise tolerance)) में मस्तिष्क सक्रिय रूप से शामिल होता है। फिलहाल यह निष्कर्ष चूहों पर हुए अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है कि ऐसा मनुष्यों में भी होता हो लेकिन पहले इसे परखना होगा।

फिलेडेल्फिया में पेन्सिलवेनिया युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस बेटली और उनके साथी यह जानना चाहते थे कि जब लोग व्यायाम करते हैं तो मस्तिष्क में क्या होता है। असल में पूर्व अध्ययन में ऐसा पाया गया था कि स्टेरॉयडोजेनिक फैक्टर-1 (SF1) नामक प्रोटीन को कोड करने वाले जीन को ठप करने से चूहों में व्यायाम सहिष्णुता कम हो जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस (ventromedial hypothalamus) हिस्से के उन न्यूरॉन समूहों की निगरानी करना तय किया जो SF1 नामक प्रोटीन बनाते हैं। गौरतलब है कि वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस भूख और रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, और SF1 प्रोटीन चयापचय क्रिया को नियंत्रित (metabolic regulation) करने में भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों को ट्रेडमिल पर दौड़ाया और उनमें SF1 न्यूरॉन्स की गतिविधि देखी। ये तो उन्होंने पाया ही कि ये न्यूरॉन्य व्यायाम करने से सक्रिय हो गए थे, लेकिन और भी दिलचस्प बात उन्हें यह पता चली कि SF1 न्यूरॉन्स का एक समूह व्यायाम खत्म होने के बाद ही सक्रिय होता है। कई व्यायाम सत्रों के बाद चूहों में सक्रिय होने वाले न्यूरॉन्स की संख्या और उनकी सक्रियता के परिमाण में भी बढ़ोतरी देखी गई।

जब शोधकर्ताओं ने तीन हफ्तों तक लगातार नियमित व्यायाम करने वाले चूहों की मस्तिष्क गतिविधि की तुलना उन चूहों की मस्तिष्क गतिविधि से की जिन्होंने व्यायाम करने में नागा किया था, तो उन्हें दोनों समूह के चूहों के SF1 न्यूरॉन्स के विद्युतीय गुणों में अंतर मिला। नियमित व्यायाम करने वाले चूहों में न्यूरॉन्स को सक्रिय करना आसान हो गया था। साथ ही न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन्स (सायनेप्स) की संख्या भी दुगनी हो गई थी। अनुमान तो लगाया जा सकता है कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा कुछ होता होगा, लेकिन इसे परख कर देखना ज़रूरी है। आखिरकार यह तो देखा ही गया है कि मनुष्यों में भी व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिन थोड़ा तकलीफदेह गुज़रते हैं, लेकिन दिन-ब-दिन आसानी होने लगती है (brain exercise link)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?

न दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड वैक्सीन और कभी-कभार खून के थक्के बनना

वैश्विक कोविड-19 टीकाकरण (COVID-19 vaccination) के दौरान वैज्ञानिकों ने एस्ट्राज़ेनेका (AstraZeneca vaccine) और जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा विकसित टीका लेने वाले कुछ लोगों में एक गंभीर दुष्प्रभाव पाया, हालांकि यह दुष्प्रभाव दुर्लभ है। इन लोगों में असामान्य तरीके से खून के थक्के बने और प्लेटलेट्स की संख्या घट गई थी। शोधकर्ताओं ने अब इस बीमारी के के लिए ज़िम्मेदार जैविक प्रक्रिया को समझ लिया है।

VITT यानी वैक्सीन इंड्यूस्ड इम्यून थ्रम्बोसायटोपीनिया एंड थ्रम्बोसिस) की स्थिति अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन टीका लेने वाले लगभग 2 लाख में से 1 व्यक्ति और ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका टीका लेने वाले लगभग 1 लाख में से 3 व्यक्तियों में देखी गई थी। दोनों टीकों को बनाने में एडेनोवायरस (adenovirus vector vaccine) के परिवर्तित रूप का उपयोग किया गया था। हालांकि इन टीकों ने लाखों लोगों की जान बचाई, फिर भी VITT के चंद मामलों के बाद कुछ देशों ने अपनी टीका नीति बदल (vaccine policy change) ली। उदाहरण के तौर पर, 2021 में ब्रिटेन ने 40 साल से कम उम्र के लोगों को ऐसा दूसरा टीका लेने की सलाह दी, जिनमें खून के थक्के बनने का जोखिम नहीं था।

गौरतलब है कि 2021 में वैज्ञानिकों ने पाया था कि VITT से प्रभावित लोगों के शरीर में PF4 (Platelet Factor 4)नामक एक प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बन रही थीं, जो खून के थक्के बनने में भूमिका निभाता है। लेकिन यह साफ नहीं था कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अचानक इस प्रोटीन पर हमला क्यों करने लगी (autoimmune reaction)।

हाल ही में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन (New England Journal of Medicine study) में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इसका कारण बताया है। जब एक विशेष जीन संस्करण वाले लोग एडेनोवायरस का सामना करते हैं, तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली आम तौर पर pVII नामक वायरल प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ज़्यादातर लोगों में यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित होती है। लेकिन थोड़े-से लोगों में एक छोटा-सा जेनेटिक बदलाव (genetic mutation) इन एंटीबॉडीज़ की बनावट बदल देता है। इसमें सिर्फ एक अमीनो अम्ल का परिवर्तन होता है, जिसके कारण एंटीबॉडी pVII की बजाय PF4 प्रोटीन से चिपकने लगती है। यदि टीकाकरण के बाद ऐसी गलत दिशा में काम करने वाली एंटीबॉडीज़ ज़्यादा बनने लगें, तो इससे शरीर में खतरनाक थक्के बनने लगते हैं और साथ-साथ प्लेटलेट्स की संख्या भी घट जाती है (abnormal immune response)।

शोधकर्ताओं ने जिन 21 लोगों में VITT पाया, उन सभी में एक अमीनो अम्ल का यह जेनेटिक बदलाव मौजूद था। जब वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के बिना एंटीबॉडी बनाकर उन्हें चूहों पर परखा, तो खून के थक्के बनना काफी कम हो गया (preclinical research)।

फ्लिंडर्स युनिवर्सिटी के प्रतिरक्षा विशेषज्ञ टॉम गॉर्डन के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी ऑटोइम्यून बीमारी को उसके अंतिम असली कारण तक साफ-साफ जोड़ा जा सका है।

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि टीकों में कोई कमी या खोट नहीं थी। इस अध्ययन से भविष्य में और ज़्यादा सुरक्षित टीके बनाने में मदद मिल सकती है, साथ ही ऐसी दुर्लभ ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं की पहले पहचान भी बेहतर तरीके से हो सकेगी (vaccine safety research)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नए कोशिका एटलस से प्रतिरक्षा व्यवस्था में विविधता उजागर

क ऐसा कोशिका एटलस (cell atlas study) तैयार किया गया है जो चीन के 400 व्यक्तियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज (immune cells profiling) का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। इस एटलस से पता चला है कि अलग-अलग आबादियों के लोगों में कई जीव वैज्ञानिक अंतर (population level differences) होते हैं।

साइंस (Science journal research) में प्रकाशित इस अध्ययन में खून में उपस्थित प्रतिरक्षा कोशिकाओं का एक मल्टी-ओमिक विवरण (multi-omics analysis) दिया गया है। ओमिक शब्द आजकल काफी प्रचलन में है – किसी कोशिका के सारे जीन्स को मिलाकर जीनोम कहते हैं, सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटियोम और किसी मनुष्य के सारे सूक्ष्मजीवों के समूह को माइक्रोबायोम कहते हैं। यह अध्ययन विभिन्न ओम्स का परिचय देता है। इसे चाइनीज़ मल्टी-ओमिक्स एटलस (CIMA- Chinese Multi-Omics Atlas) नाम दिया गया है। इस एटलस में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज में महत्वपूर्ण विविधता पहचानी गई है जो इसी तरह के युरोपीय और जापानी समूहों में नहीं देखी गई थीं। एटलस के रचयिताओं ने कहा है कि यह डैटाबेस अन्य ऐसे ही डैटाबेस का पूरक है जो मूलत: युरोप-केंद्रित हैं।

अलग-अलग अध्ययनों के अंतर्गत विभिन्न कोशिका प्रकारों के लिए मल्टी-ओमिक एटलस तैयार किए हैं और इनका उपयोग मस्तिष्क, अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s research) और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े सवालों को समझने में किया गया है। लेकिन ये एटलस अक्सर युरोपीय मूल के लोगों से प्राप्त डैटा पर निर्भर रहे हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि इनके आधार पर विकसित औषधियां शायद अन्य मूल के लोगों के लिए प्रभावी न साबित हों। इसी खामी को भरने के लिए चीन के शांक्सी मेडिकल युनिवर्सिटी-बीजीआई कोलेबोरेटिव सेंटर फॉर फ्यूचर मेडिसिन के जुआनहुआ यिन और उनके साथियों ने चीन के 428 वयस्कों के खून में उपस्थित एक करोड़ से ज़्यादा कोशिकाओं का मल्टी-ओमिक विश्लेषण (large scale genomic profiling) किया।

इस एटलस में प्रत्येक व्यक्ति के जैव-आणविक सूचक (biomolecular markers) पता चलते हैं। इनमें चयापचय उत्पादों की तस्वीर, रक्त के जैव रासायनिक चिंह, क्रोमेटिन एक्सेसिबिलिटी (यानी सक्रिय डीएनए) डैटा और विभिन्न कोशिका आबादियों में जीन्स की अभिव्यक्ति में फर्क नज़र आते हैं।

इससे पहले OneK1K नामक परियोजना (OneK1K database) के तहत एक डैटाबेस बन चुका था, जिसमें उत्तर युरोपीय मूल के लोगों का विश्लेषण किया गया था। इसके अलावा जापान का ImmuNexUT project नामक डैटाबेस भी मौजूद था। इनसे तुलना करके शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न आबादियों में प्रमुख प्रतिरक्षा क्रियामार्ग और कोशिका प्रकार एक जैसे हैं।

इस समानता के बावजूद इन तीन एटलसों के बीच जेनेटिक नियमन (genetic regulation differences) और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की अवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर दिखे। जैसे उन्होंने कतिपय जीन्स के निकट उपस्थित विविधताओं पर ध्यान दिया जो इस बात पर असर डालती है कि वह जीन कितना सक्रिय होगा। पाया गया कि CIMA डैटा में 93 प्रतिशत लक्षित जीन्स और जापानी समूह के ऐसे जीन्स में समानता थी लेकिन युरोपीय समूह के साथ यह समानता मात्र 44 प्रतिशत ही देखी गई (population genomics)।

एक उदाहरण के तौर पर rs11886530 जीन (gene variant rs11886530) के परिवर्तित रूप पूर्वी एशियाई आबादी में तो आम थे मगर युरोपीय आबादी में बिरले थे। यह जीन प्रतिरक्षा कोशिकाओं (टी-कोशिकाओं) की अंदरुनी दैनिक घड़ी को प्रभावित करता है। इससे पहले यह क्रियाविधि प्रतिरक्षा कोशिकाओं में कभी नहीं देखी गई थी।

चीनी परियोजना में जिन लोगों (189 पुरुषों और 239 महिलाओं) का अध्ययन किया गया उनकी उम्र 20 से 77 वर्ष के बीच थी। शोधकर्ताओं ने देखा कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तियों में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, जो शोथ (इन्फ्लेमेशन) का कारण बनती है। इसके अलावा, डेंड्राइटिक कोशिकाओं में जीन्स की अभिव्यक्ति बदल जाती है। ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र में संदेशवाहक का काम करती हैं।

कुल मिलाकर CIMA का यह एटलस चिकित्सा के क्षेत्र में हमारी समझ को बढ़ाएगा और व्यक्ति-आधारित चिकित्सा व औषधि चयन में योगदान देगा। (स्रोत फीचर्स)

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Photo Credit : https://www.science.org/cms/asset/7e077147-9398-479d-8967-b89f9d87cecf/atlas_16_9.jpg

खुद को आस्तीन की तरह सीधा-उल्टा करता कृमि

जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के मेकेनिकल इंजीनियर डेविड हू जानना चाहते थे कि ये ब्लडवर्म इस कारस्तानी में इतने कुशल कैसे हैं? और ऐसा करते हुए उनकी मांसपेशियों को क्षति क्यों नहीं होती?

शोधकर्ताओं ने जब ब्लडवर्म (Glycera dibranchiata) की इस हरकत को रिकॉर्ड करके बारीकी से अध्ययन किया तो लगा कि ऐसा सूंड पर हर ओर मौजूद अत्यधिक झुर्रियों/सिलवटों की बदौलत संभव है। बहुत ही ज़्यादा झुर्रियां/सिलवटें होने से जब शुण्ड को बाहर की ओर उलटा जाता है, तो अंदर की त्वचा सामान्य से तीन गुना ज़्यादा फैल जाती हैं और मांसपेशियों को कोई क्षति भी नहीं होती। यह कुछ-कुछ हाथी की सूंड पर मौजूद झुर्रियों की तरह काम करता है(flexible biological structure)।

वीडियो यहां देखें
HTTPS://WWW.SCIENCE.ORG/CONTENT/ARTICLE/WATCH-SUPERSTRETCHY-BLOODWORMS-TURN-THEMSELVES-INSIDE-OU

ब्लडवर्म अपनी शुण्ड को 2 सेकंड से भी कम समय में पूरा पलटकर बाहर कर लेते हैं। वहीं इसे वापिस अंदर करने में लगभग 8 सेकंड लगते हैं और इसके लिए ज़्यादा जटिल हरकतें भी करनी पड़ती हैं।

ब्लडवर्म की यह बनावट ऐसे उलटने-पलटने वाले और लचीले रोबोट बनाने में सहायक हो सकती है। ऐसे लचीले रोबोट(soft robotics) मरीज़ों की मदद कर सकते हैं; ये रोबोट बिस्तर पर पड़े मरीज़ों के नीचे जाकर फैल और फूल सकते हैं, जिससे नर्सें उन्हें धीरे से इधर-उधर खिसका कर उनकी चादरें आसानी से बदल सकेंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/9d/Glycera_dibranchiata_%28YPM_IZ_071023%29_002.jpeg/960px-Glycera_dibranchiata_%28YPM_IZ_071023%29_002.jpeg