इरफान ह्युमैन

खगोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट (बाह्यग्रहोंं) पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष प्रमाण देखे हैं। यह एक महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को उनके तारे के हानिकारक विकिरण से सुरक्षित रखते हैं, जिससे उन पर जीवन की संभावना बढ़ जाती हैं।
एक्सोप्लैनेट वे ग्रह होते हैं जो हमारे सूर्य के अलावा किसी अन्य तारे की परिक्रमा करते हैं। इन दूरस्थ ग्रहों पर जीवन की खोज खगोल विज्ञान के सबसे रोमांचक क्षेत्रों में से एक है। पृथ्वी पर, हमारा चुंबकीय क्षेत्र हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक सौर तूफानों और विकिरण से बचाता है, जिससे हमारे ग्रह पर जीवन संभव हो पाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी एक्सोप्लैनेट पर एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति उस ग्रह को निवास योग्य बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं।
हमारे सौरमंडल के अधिकांश ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित हैं। इस नई खोज में जिन सात एक्सोप्लैनेट का अध्ययन किया गया, वे अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रह हैं। पहले भी पृथ्वी के आकार के सात ग्रहों की खोज की गई है जो एक ही तारे की परिक्रमा कर रहे हैं, जिनमें से कुछ पर जीवन की संभावना जताई जा रही है। वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) जैसे पृथ्वी समान चट्टानी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना विशेष रूप से उत्साहजनक है।
इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने सात अत्यधिक गर्म गैसीय विशाल ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण किया है, जो इस प्रकार है:
1. खगोलविदों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर के सात ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रत्यक्ष संकेत पाए हैं।
2. यह खोज जीवन की संभावनाओं की तलाश में महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों को हानिकारक विकिरण से बचाते हैं।
3. इन ग्रहों की वायुमंडलीय गतिविधियों का विश्लेषण चिली और हवाई में स्थित दूरबीनों से प्राप्त डेटा का उपयोग करके किया गया।
4. कुछ शोधों में प्रॉक्सिमा प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत भी मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी जैसे पड़ोसी ग्रहों पर चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति का सुझाव देते हैं।
5. पृथ्वी के आकार के एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) पर चुंबकीय क्षेत्र की संभावना भी जीवन की उपस्थिति का संकेत मानी जा रही है।
ऐसे ग्रह वैज्ञानिकों की विशेष रुचि के केंद्र हैं। इनमें से कुछ पृथ्वी जैसे आकार के हैं और अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में स्थित हैं। जूलिया वी. सीडेल और उनके सहयोगियों द्वारा की गई यह खोज 2 जून, 2026 को नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में “मैग्नेटिक फील्ड स्ट्रेंथ ऑफ हॉट जाएंट एक्सोप्लेनेट्स कंसिस्टेंट विद सोलर सिस्टम वैल्यू” शीर्षक से प्रकाशित हुई है।
हाल ही में खोजे गये सात दूरस्थ बाह्यग्रह:-
ट्रापिस्ट-1ई TRAPPIST-1e
ट्रापिस्ट-1एफ TRAPPIST-1f
ट्रापिस्ट-1जी TRAPPIST-1 g
प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी Proxima Centauri b
केप्लर-186एफ Kepler-186f
एलएचएस-1140 बी LHS 1140 b
के2-18 बी K2-18b
चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता
1. हानिकारक विकिरण से सुरक्षा: तारे लगातार उच्च ऊर्जा वाले कण और विकिरण उत्सर्जित करते हैं। यदि किसी ग्रह के पास मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, तो ये कण सीधे उसके वायुमंडल और सतह तक पहुंच सकते हैं।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक ढाल (shield) की तरह कार्य करता है और अधिकांश सौर पवन को मोड़ देता है।
2. वायुमंडल की रक्षा: चुंबकीय क्षेत्र ग्रह के वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन हो जाने से बचाता है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र बहुत कमज़ोर है। परिणामस्वरूप, सौर पवन ने धीरे-धीरे उसके अधिकांश वायुमंडल को अंतरिक्ष में विलीन कर दिया। इसी कारण आज मंगल शुष्क और ठंडा दिखाई देता है।
3. तरल जल का संरक्षण: यदि वायुमंडल सुरक्षित रहेगा तो सतह पर तापमान नियंत्रित रहेगा और पानी लंबे समय तक तरल अवस्था में रह सकता है। जीवन के लिए यह एक महत्वपूर्ण शर्त मानी जाती है।
चुंबकीय क्षेत्र की खोज
एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्रों का पता लगाना एक जटिल कार्य है क्योंकि ये ग्रह बहुत दूर हैं और सीधे अवलोकन करना मुश्किल है। खगोलविद आमतौर पर अप्रत्यक्ष तरीकों पर निर्भर करते हैं।
1. रेडियो उत्सर्जन: जब किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने तारे से आने वाले आवेशित कणों (जैसे सौर पवन) के साथ अंतर्क्रिया करता है, तो इससे अक्सर रेडियो तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन रेडियो तरंग संकेतों को पृथ्वी पर स्थित रेडियो दूरबीनों द्वारा पता लगाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, पृथ्वी के आकार के चट्टानी एक्सोप्लैनेट वाईज़ेड सेटी बी (YZ Ceti b) से लगातार आने वाले रेडियो संकेतों का पता लगाया गया है। यह संकेत उस ग्रह पर एक चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का एक मज़बूत संकेतक माना जाता है।
2. वायुमंडलीय अवलोकन और क्षरण का विश्लेषण: किसी ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके वायुमंडल को तारे के हानिकारक विकिरण और सौर पवन से बचाता है। यदि किसी ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर या अनुपस्थित है, तो उसका वायुमंडल समय के साथ क्षरित हो सकता है। खगोलविद एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल के संघटन और उसके क्षरण की दर का अध्ययन करके चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अनुमान लगा सकते हैं।
3. तारे और ग्रह के बीच चुंबकीय अंतःक्रिया: कुछ मामलों में, किसी एक्सोप्लैनेट का चुंबकीय क्षेत्र अपने मेज़बान तारे के चुंबकीय क्षेत्र के साथ अंतःक्रिया कर सकता है। यह अंतःक्रिया तारे की गतिविधि (जैसे सौर फ्लेयर्स या स्टारस्पॉट) में परिवर्तन ला सकती है, जिसे दूरबीनों द्वारा मापा जा सकता है। इस तरह की अंतःक्रियाओं का पता लगाना ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति का अप्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान कर सकता है।
उदाहरण के लिए, प्रॉक्सिमा बी (Proxima b) जैसे पड़ोसी एक्सोप्लैनेट के लिए प्रॉक्सिमा प्रणाली में तारों और ग्रहों के बीच चुंबकीय अंतःक्रियाओं के संकेत मिले हैं, जो प्रॉक्सिमा बी पर एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की संभावना का संकेत देते हैं।
4. ध्रुवीकरण मापन: चुंबकीय क्षेत्र प्रकाश के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से, एक्सोप्लैनेट से परावर्तित या उत्सर्जित प्रकाश के ध्रुवीकरण का मापन उसके चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है। हालांकि, यह विधि अत्यधिक संवेदनशील और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।
चुंबकीय क्षेत्र और जीवन संभावना
किसी ग्रह पर जीवन को संभव बनाने के लिए चुंबकीय क्षेत्र एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच हो सकता है, लेकिन यह जीवन के अस्तित्व की गारंटी नहीं देता। जीवन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए कई भौतिक, रासायनिक और जैविक परिस्थितियों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है।
इसे एक घर के उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि चुंबकीय क्षेत्र घर की मज़बूत दीवार है, तो जीवन के लिए जल, वायुमंडल, तापमान और आवश्यक रासायनिक तत्व उस घर की नींव, छत और भोजन के समान हैं। केवल दीवार होने से घर रहने योग्य नहीं बन जाता। इसके लिए निम्नलिखित अन्य तत्व भी आवश्यक हैं:
1. तरल जल की उपलब्धता: वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल में हुई थी। पानी को ‘सार्वभौमिक विलायक’ (युनिवर्सल सॉल्वेंट) कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न रासायनिक पदार्थों को घोलकर जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं को संभव बनाता है। सजीव कोशिकाओं में होने वाली लगभग सभी प्रक्रियाएं पानी की उपस्थिति में ही संपन्न होती हैं।
यदि किसी ग्रह पर पानी पूरी तरह बर्फ बन जाए, या अत्यधिक गर्मी के कारण वाष्पित हो जाए, तो जीवन की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसी कारण वैज्ञानिक किसी ग्रह को रहने योग्य मानने से पहले यह देखते हैं कि वह अपने तारे के रहने योग्य क्षेत्र (हैबिटेबल ज़ोन) में स्थित है या नहीं, जहां पानी तरल रूप में मौजूद रह सकता है।
2. स्थिर वायुमंडल: वायुमंडल किसी ग्रह के लिए सुरक्षा चादर की तरह कार्य करता है। इसके प्रमुख कार्य हैं-
– तापमान को नियंत्रित करना
– हानिकारक विकिरण रोकना
– पानी को संरक्षित रखना
– जीवन के लिए आवश्यक गैसें उपलब्ध कराना
पृथ्वी का वायुमंडल लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन से बना है। यही संतुलन जीवन को संभव बनाता है। यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना हो, तो दिन में भीषण गर्मी और रात में कड़ाके की ठंड हो सकती है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह का वायुमंडल बहुत झीना है, जिसके कारण वहां जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पातीं।
3. उपयुक्त तापमान: जीवन के लिए तापमान का संतुलित होना आवश्यक है। अत्यधिक ठंड में पानी जम जाता है, रासायनिक अभिक्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं। अत्यधिक गर्मी में जैविक अणु टूट सकते हैं, पानी वाष्पित हो सकता है। पृथ्वी पर औसत तापमान जीवन के लिए अनुकूल है। इसके विपरीत शुक्र ग्रह का सतही तापमान लगभग 460 डिग्री सेल्सियस है। मंगल पर तापमान अक्सर शून्य से बहुत नीचे चला जाता है। दोनों जगह जीवन के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं।
4. आवश्यक रासायनिक तत्व: पृथ्वी पर ज्ञात सभी जीव मुख्य रूप से कुछ मूल तत्वों से बने हैं-
– कार्बन
– हाइड्रोजन
– ऑक्सीजन
– नाइट्रोजन
– फॉस्फोरस
– सल्फर
इन्हें कभी-कभी ‘सीएचएनओपीएस’ (CHNOPS) तत्व कहा जाता है। कार्बन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जटिल अणुओं और डीएनए जैसी संरचनाओं का निर्माण कर सकता है। यदि किसी ग्रह पर ये तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं, तो जीवन के निर्माण की संभावना कम हो जाती है।
5. लंबे समय तक स्थिर पर्यावरण: जीवन को विकसित होने में लाखों या अरबों वर्ष लग सकते हैं। पृथ्वी पर जीवन लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया था; जटिल जीवों को विकसित होने में तो और भी अधिक समय लगा।
यदि किसी ग्रह पर बार-बार विनाशकारी विकिरण वर्षा, अत्यधिक ज्वालामुखीय गतिविधियां, लगातार उल्कापिंडों की बौछार, या तारे की अस्थिरता होती रहे, तो जीवन के विकास की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इसलिए केवल जीवन की उत्पत्ति ही नहीं, बल्कि उसका लंबे समय तक टिके रहना भी महत्वपूर्ण है।
चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन
क्या चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है? यह प्रश्न आधुनिक खगोलजीवविज्ञान (एस्ट्रोबायोलॉजी) के सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते थे कि जीवन के लिए एक मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र लगभग अपरिहार्य है। लेकिन हाल के दशकों में हुए अध्ययनों ने संकेत दिया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में चुंबकीय क्षेत्र के बिना भी जीवन संभव हो सकता है, विशेषकर सूक्ष्मजीवी (माइक्रोबियल) जीवन। हालांकि, ऐसे वातावरण में जीवन का अस्तित्व और विकास अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
किसी ग्रह के पास चुंबकीय क्षेत्र न हो तो
1. सौर पवन (सोलर विंड) सीधे ग्रह के वायुमंडल से टकराएगी।
2. उच्च-ऊर्जा कण सतह तक पहुंचेंगे।
3. वायुमंडल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में उड़ सकता है।
4. डीएनए और अन्य जैविक अणुओं को विकिरण से क्षति पहुंच सकती है।
फिर भी कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन समस्याओं को कम कर सकती हैं। जैसे,
1. अत्यंत घने वायुमंडल की प्राकृतिक ढाल: यदि किसी ग्रह का वायुमंडल बहुत घना हो, तो वह स्वयं विकिरण से रक्षा कर सकता है। पृथ्वी पर भी हमारी सुरक्षा केवल चुंबकीय क्षेत्र से नहीं होती, बल्कि वायुमंडल भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, शुक्र के पास पृथ्वी जैसा मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी उसका वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में लगभग 90 गुना अधिक घना है। ऐसा घना वायुमंडल अधिकांश कॉस्मिक किरणों को रोक सकता है; तापमान को स्थिर रखने में मदद कर सकता है; और सतह पर विकिरण का प्रभाव कम कर सकता है। हालांकि शुक्र पर अत्यधिक तापमान जीवन के लिए बाधा है, लेकिन यह उदाहरण दिखाता है कि वायुमंडल कभी-कभी चुंबकीय क्षेत्र की कमी की आंशिक भरपाई कर सकता है।
2. भूमिगत जीवन (सबसर्फेस लाइफ): पृथ्वी पर अनेक जीव ऐसे स्थानों पर पाए गए हैं जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुंचता। वैज्ञानिकों ने गहरी खानों में, भूमिगत चट्टानों में, कई किलोमीटर नीचे स्थित जलाशयों में सूक्ष्मजीव खोजे हैं। ये जीव ऊर्जा प्राप्त करते हैं रासायनिक अभिक्रियाओं से, खनिजों से और भू-तापीय (जियोथर्मल) स्रोतों से। अर्थात यदि किसी ग्रह की सतह विकिरण के कारण रहने योग्य न हो, तो जीवन भूमिगत विकसित हो सकता है। कुछ मीटर से लेकर कुछ किलोमीटर मोटी चट्टानें विकिरण को प्रभावी ढंग से रोक सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की सतह के नीचे आज भी सूक्ष्मजीवी जीवन मौजूद हो सकता है।
3. बर्फ के नीचे महासागर: यह संभावना वैज्ञानिकों को सबसे अधिक उत्साहित करती है। हमारे सौरमंडल में ऐसे कई पिंड हैं जिनकी सतह बर्फ से ढंकी है लेकिन नीचे विशाल महासागर होने की संभावना है। उदाहरण के लिए, यूरोपा और एंसेलेडस। इन पिंडों पर कई किलोमीटर मोटी बर्फ मौजूद है लेकिन नीचे तरल जल के महासागर होने के प्रमाण मिले हैं। ज्वारीय बलों (टाइडल फोर्सेस) के कारण आंतरिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।
बर्फ की मोटी परत विकिरण से सुरक्षा देती है; तापमान को स्थिर रखती है; जल को तरल अवस्था में बनाए रख सकती है। यदि वहां जीवन है, तो उसे चुंबकीय क्षेत्र की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
4. समुद्र की गहराइयों में जीवन: पृथ्वी पर समुद्र की गहराइयों में स्थित हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास अद्भुत जीव समुदाय पाए गए हैं। इन स्थानों पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता। ऊर्जा का स्रोत रासायनिक पदार्थ होते हैं। जीव प्रकाश संश्लेषण नहीं बल्कि रासायनिक संश्लेषण (कीमोसिंथेसिस) पर निर्भर रहते हैं। इस खोज ने वैज्ञानिकों की सोच बदल दी है। अब माना जाता है कि जीवन को हमेशा सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी दूरस्थ ग्रह या ग्रह के चंद्रमा पर भूमिगत समंदर और भू-तापीय ऊर्जा का स्रोत मौजूद है, तो वहां जीवन विकसित हो सकता है।
5. विकिरण–सहिष्णु जीव: पृथ्वी पर कुछ जीव अत्यधिक विकिरण भी सहन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए टार्डीग्रेड (जलीय भालू) और डाइनोकोकस रेडियोड्यूरैन्स (Deinococcus radiodurans) जैसे विकिरण-रोधी जीवाणु। ये जीव डीएनए क्षति की मरम्मत कर सकते हैं। अत्यधिक विकिरण में जीवित रह सकते हैं। कठोर वातावरण में भी टिके रह सकते हैं। इससे संकेत मिलता है कि कुछ प्रकार का जीवन हमारी अपेक्षा से अधिक कठोर परिस्थितियों को सहन कर सकता है।
भविष्य की खोजें
हमारे सौरमंडल के बाहर स्थित सात एक्सोप्लैनेट पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रत्यक्ष प्रमाण की खोज एक्सोप्लैनेट पर जीवन की खोज के लिए एक नया मानदंड स्थापित करती है। चुंबकीय क्षेत्रों की उपस्थिति उन ग्रहों की पहचान करने में मदद करेगी जो अधिक निवास योग्य हो सकते हैं। आधुनिक वेधशालाएं और अंतरिक्ष दूरबीनें (जैसे जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन) तथा आगामी रेडियो वेधशाला परियोजनाएं एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडल और चुंबकीय क्षेत्रों का अधिक सटीक अध्ययन कर रही हैं। इनके प्रयासों से आने वाले वर्षों में यह संभव है कि वैज्ञानिक किसी ऐसे ग्रह की पहचान कर लें जहां पृथ्वी जैसी परिस्थितियां और जीवन के संकेत मौजूद हों।
अतः भविष्य के अध्ययनों में इन ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की शक्ति और स्थिरता को मापना महत्वपूर्ण होगा और यह समझने में मदद करेगा कि क्या जीवन के लिए आवश्यक स्थितियां हमारे सौरमंडल से परे भी मौजूद हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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