वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।
हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।
इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।
बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।
पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।
एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के गैबर एगरवैरी और उनके साथियों ने चूहों (Rodents) पर कुछ मज़ेदार प्रयोग करके बताया है कि एक यौगिक (Metabolic Byproduct) है एसिटेट जो उनकी याददाश्त को सुदृढ़ करता है और यह असर सिर्फ मादा चूहों पर होता है। जिस यौगिक की बात हो रही है वह आम तौर पर शरीर में अल्कोहल, ग्लूकोज़ और अधिक रेशेदार खाद्य पदार्थों के विघटन से बनता है।
याददाश्त सम्बंधी दो प्रयोग किए गए थे। पहले प्रयोग में चूहों को दो समान वस्तुओं के साथ 10 मिनट तक खेलने दिया गया। फिर चौबीस घंटे बाद चूहों को उन्हीं वस्तुओं के संपर्क में लाया गया। लेकिन इस बार एक वस्तु की जगह बदल दी गई थी। विचार यह था कि यदि चूहे की याददाश्त अक्षुण्ण रही तो वह समझ जाएगा कि एक वस्तु की जगह बदली गई है। दूसरी ओर, यदि याददाश्त अस्त-व्यस्त हुई होगी तो वे दोनों वस्तुओं के साथ बराबर समय बिताएंगे। चूहों ने नई जगह पर रखी वस्तु से साथ ज़्यादा समय बिताया। यानी पहली बात (अक्षुण्ण याददाश्त) सही है।
दूसरे प्रयोग में चूहों को एक बार फिर दो एक-सी वस्तुओं के साथ 10 मिनट के लिए छोड़ा गया। 24 घंटे बाद वस्तुएं फिर से रखी गईं लेकिन इस बार एक वस्तु बदल दी गई थी। देखा यह गया था कि क्या चूहे नई वस्तु पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, यानी उस पर ज़्यादा समय बिताते हैं।
देखा गया कि जिन मादा चूहों को एसिटेट (Acetate) का इंजेक्शन दिया गया था उन्होंने अन्य के मुकाबले (जिन्हें प्लेसिबो इंजेक्शन दिया गया था) इन दोनों कार्यों में बेहतर प्रदर्शन किया। अलबत्ता, रोचक बात यह रही कि नर चूहों (Male Rodents) में कोई फर्क नज़र नहीं आया।
शोधकर्ताओं को पता चला है कि एसिटेट मस्तिष्क में जीन्स की अभिव्यक्ति (Gene Expression) को प्रभावित करता है। वह हिस्टोन प्रोटीन्स (Histone Proteins) में परिवर्तन कर देता है। हिस्टोन्स वे प्रोटीन होते हैं जिनके इर्द-गिर्द डीएनए (DNA) कसकर लिपटा होता है। जब हिस्टोन पर एसिटेट समूह जुड़ जाते हैं तो यह लिपटना थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसकी वजह से कई जीन्स और कोशिका की आणविक मशीनरी के बीच संपर्क आसान हो जाते हैं। ऐसे में ये जीन्स सक्रिय रहते हैं।
शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे हिस्टोन परिवर्तन देखे जिनका सम्बंध दीर्घावधि याददाश्त (Long term memory) से जाना-माना है। इसके अलावा एसिटेट ने मादा चूहों के मस्तिष्क के सीखने से सम्बंधित हिस्सों में भी जीन्स की अभिव्यक्ति पर असर डाला था।
एक तो यह महत्वपूर्ण बात रही कि फर्क सिर्फ मादा चूहों (Female Rodents) की स्मृति (Memory) पर दिखा। दूसरी बात और भी महत्वपूर्ण है। साइन्स सिग्नलिंग पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि एसिटेट तभी कारगर होता है जब मस्तिष्क में तंत्रिका गतिविधि को सीखने की किसी प्रक्रिया के दौरान सक्रिय कियी जाए; यह आम याददाश्त सुदृढ़ीकरण का तरीका नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।
इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।
इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।
शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।
यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।
इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)
वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।
अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।
आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।
यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।
नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं।
एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।
कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है।
दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।
हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।
हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।
रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)
भारत (India) ने अपनी आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। GenomeIndia Project के तहत वैज्ञानिकों ने देश के लोगों में लाखों ऐसे आनुवंशिक बदलाव खोजे हैं, जिनकी जानकारी पहले दुनिया के बड़े वैज्ञानिक डैटाबेस (Database) में मौजूद नहीं थी। इसके लिए 83 अलग-अलग आबादियों के लगभग 9800 स्वस्थ लोगों के पूरे जीनोम का अध्ययन किया गया और करीब 4.4 करोड़ नए आनुवंशिक बदलाव पहचाने गए।
शोध से पता चलता है कि अब तक दुनिया के अधिकतर आनुवंशिक अध्ययन युरोपीय मूल के लोगों पर आधारित थे, जिनमें भारतीय और दक्षिण एशियाई (South Asian) आबादी को कम महत्व मिला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में बीमारियों की पहचान, लोगों की वंशावली समझने, व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा और दवाइयों के असर सम्बंधी बेहतर समझ बनाने में मददगार होगी।
इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिक इतने बड़े स्तर पर नए आनुवंशिक बदलाव देखकर हैरान रह गए। बहुत दुर्लभ बदलावों को हटाने के बाद भी कुल बदलावों में से 10 प्रतिशत से ज़्यादा ऐसे थे, जो पहले किसी वैज्ञानिक डैटाबेस में दर्ज नहीं थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की आनुवंशिक विविधता का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। इसकी वजह देश में हज़ारों अलग-अलग समुदायों (communities) का लंबे समय तक अलग-अलग रहना, प्रवासन और अपने ही सामाजिक समूहों में विवाह करना है।
भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से वित्तीय सहायता प्राप्त इस परियोजना में देश भर के 20 शोध संस्थानों ने मिलकर काम किया है। अभी करीब 10,000 लोगों के जीनोम (Genome) का अध्ययन किया गया है, लेकिन भविष्य में इसे बढ़ाकर 10 लाख जीनोम तक ले जाने की योजना है, जिसमें अलग-अलग बीमारियों से जुड़े समूह भी शामिल होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना बड़ा डैटा बेस भारतीय लोगों के लिए अधिक सटीक चिकित्सा प्रणाली (Perfect Medical System) बनाने में मदद करेगा।
अध्ययन में सबसे खास बात कुछ अलग-थलग रहने वाले आदिवासी समुदायों (Tribal Communities) से जुड़ी थी। इन समुदायों में आनुवंशिक एकरूपता (Gentic Uniformity) बहुत ज़्यादा पाई गई, जिसे होमोज़ायगोसिटी (Homozygosity) कहते हैं। जब छोटे समुदायों में पीढ़ियों तक अंदर ही अंदर ही विवाह होते रहते हैं, तो कुछ हानिकारक जीन ज़्यादा सामान्य हो सकते हैं, क्योंकि बच्चों को माता-पिता दोनों से एक जैसे खराब जीन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
शोध में पाया गया कि 29 में से 27 आदिवासी समूहों में बीमारी पैदा करने वाले आनुवंशिक बदलाव महत्वपूर्ण स्तर पर मौजूद थे। दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय में वैज्ञानिकों ने HGD जीन में एक हानिकारक बदलाव खोजा, जो अल्केप्टोनयूरिया ((Alkaptonuria) नाम की दुर्लभ बीमारी से जुड़ा है। यह बीमारी शरीर के जोड़ों और अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है। खास बात यह थी कि यह बदलाव अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिक डैटाबेस में मौजूद नहीं था; यानी सामान्य जांच में यह बीमारी आसानी से छूट सकती थी।
वैज्ञानिकों ने 7000 से ज़्यादा जीन्स में 15,000 से अधिक ऐसे आनुवंशिक बदलाव (Gentic Changes) भी खोजे, जो कुछ जीन्स की गतिविधि को मंद या बंद कर सकते हैं। इनमें से कुछ बदलाव बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि कुछ, शरीर को कुछ बीमारियों से बचाने में मदद भी कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इनमें से कुछ खोजों का उपयोग नई RNA आधारित चिकित्सा (RNA based Treatment) विकसित करने में किया जा सकता है, जो खराब जीन के असर को ठीक करने की कोशिश करती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज के रूप में इस्तेमाल करने से पहले अभी और प्रयोगशाला परीक्षणों की ज़रूरत है।
अध्ययन में यह भी पता चला कि भारतीय लोगों पर दवाओं का असर अलग-अलग हो सकता है। एक ऐसा आनुवंशिक बदलाव मिला, जो एनेस्थीसिया (निश्चेतन) के दौरान होने वाली जटिलताओं से जुड़ा है और पहले की सोच से कहीं अधिक लोगों में पाया गया। पहले माना जाता था कि यह सिर्फ एक खास समुदाय तक सीमित है, लेकिन नए अध्ययन में यह कई अलग-अलग समूहों में मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इससे बेहोशी की दवाएं देने के तरीके में बदलाव आ सकता है।
वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक बदलाव भी खोजे, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद (Depression), दर्द, कैंसर (Cancer) और खून से जुड़ी बीमारियों की दवाओं का किस तरह इस्तेमाल करता है। कुछ आदिवासी समुदायों में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति में ऐसे बदलाव पाए गए, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद-रोधी या तेज़ दर्द निवारक दवाओं को कैसे प्रोसेस करता है। भविष्य में ऐसी जानकारी डॉक्टरों को अलग-अलग लोगों के लिए ज़्यादा सुरक्षित और असरदार इलाज चुनने में मदद कर सकती है।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में जीन के आधार पर इलाज तय करने वाली सटीक चिकित्सा अभी शुरुआती चरण में है। दवाओं पर जीन के असर को समझने वाले परीक्षण मौजूद तो हैं, लेकिन अभी इतने सबूत नहीं हैं कि डॉक्टर हर इलाज का फैसला पूरी तरह इन पर भरोसा करके कर सकें, खासकर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़ी दवाओं में। इसे अस्पतालों में नियमित रूप से इस्तेमाल करने से पहले और बड़े क्लीनिकल अध्ययनों की ज़रूरत होगी।
इस शोध से यह भी पता चला कि अभी इस्तेमाल होने वाले आनुवंशिक जोखिम अनुमान मॉडल भारतीय लोगों के लिए पूरी तरह सही नहीं हैं। ज़्यादातर मॉडल युरोपीय आबादी के डैटा पर आधारित हैं, इसलिए वे भारतीय समुदायों पर ठीक से काम नहीं करते। इसी वजह से GenomeIndia टीम ने भारतीय लोगों के लिए एक नया संदर्भ डैटाबेस तैयार किया है, ताकि आनुवंशिक जानकारी को ज़्यादा सही तरीके से समझा जा सके।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी बड़ी खोज के बावजूद मानव जीनोम (Human Genome) का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। अभी तक का शोध मुख्य रूप से उन जीन्स पर केंद्रित रहा है, जो प्रोटीन बनाते हैं, जबकि वे पूरे डीएनए का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा हैं। बाकी 98 प्रतिशत हिस्सा, जिसे डार्क जीनोम (Drak Genome) कहा जाता है, जीन्स को नियंत्रित करने और कई बीमारियों से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव छिपाए हो सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर इस हिस्से को बेहतर तरीके से समझ लिया जाए, तो GenomeIndia Project सिर्फ जीन बदलावों की सूची न रहकर भविष्य में व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा का शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। फिलहाल यह परियोजना भारत की आनुवंशिक विविधता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)
फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।
मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।
ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।
हम अक्सर ‘समुदाय–आधारित तरीकों’ के बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।
ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी
ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।
यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।
स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।
मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।
फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।
मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।
अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।
हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।
प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।
भौगोलिक परिस्थितियां
कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।
मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार आंगनवाड़ी कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।
मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”
यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।
यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।
मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।
बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।
इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्हें ध्यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमक–दमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।
ज़मीनी स्तर पर कार्य
गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।
मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।
ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्वास्थ्य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)
यूरोप और चीन एक संयुक्त मिशन शुरू कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की चुंबकीय ढाल (Magnetic field) को बेहतर तरीके से समझना है। स्माइल (SMILE) नामक अंतरिक्ष यान (spacecraft) यह अध्ययन करेगा कि सूर्य से आने वाले खतरनाक विकिरण (solar radiation) से पृथ्वी की ,सुरक्षा कैसे होती है। उम्मीद है कि इससे उपग्रहों, संचार व्यवस्था, जीपीएस और बिजली नेटवर्क का बेहतर संचालन संभव हो सकेगा।
पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) है। यह सूर्य से आने वाले अधिकांश आवेशित कणों को रोक देता है। लेकिन जब सूर्य पर बड़े विस्फोट – जैसे सौर तूफान – होते हैं, तो यह सुरक्षा ढाल प्रभावित हो सकती है और उपग्रहों, जीपीएस (GPS), रेडियो संचार (Radio communication) और बिजली व्यवस्था (Electricity) में गड़बड़ी पैदा हो सकती है।
वैज्ञानिक कई दशकों से अंतरिक्ष यानों की मदद से मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere) का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन अब तक वे सिर्फ छोटे-छोटे हिस्सों को ही देख पाते थे। SMILE मिशन सूर्य और पृथ्वी के बीच होने वाली पूरी प्रक्रिया की बड़ी तस्वीर दिखाएगा।
यह अंतरिक्ष यान एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमेगा और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से लगभग 1,21,000 किलोमीटर दूर तक जाएगा। वहां से इसका एक्स-रे कैमरा मैग्नेटोस्फीयर के उस हिस्से को देखेगा, जो सूर्य की तरफ होता है। सूर्य से आने वाले कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से टकराकर एक्स-रे (X-Ray) उत्सर्जित करते हैं। इस उत्सर्जन के अवलोकन की मदद से समझा जा सकेगा कि पृथ्वी की चुंबकीय ढाल का आकार कैसे बदल रहा है।
उम्मीद है कि इस मिशन से सौर तूफानों की बेहतर समझ और अंतरिक्ष मौसम (space weather) की ज़्यादा सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी। यह जानकारी उपग्रह (satellite), संचार नेटवर्क और बिजली व्यवस्था जैसी तकनीकी प्रणालियों को सौर तूफानों से होने वाले नुकसान से बचाने में मददगार होगी।
यह मिशन ध्रुवीय ज्योति (ऑरोरा) (aurora) का भी अध्ययन करेगा। ये तब बनती हैं जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण मैग्नेटोस्फीयर के ज़रिए ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचकर गैस अणुओं (Gseous Atoms) से टकराकर रोशनी पैदा करते हैं। अधिकांश रोशनी अल्ट्रावायलेट (Ultraviolet) होती है, जिसे इंसानी आंखें नहीं देख सकतीं। SMILE का खास कैमरा इन अदृश्य गतिविधियों को देखकर यह समझने में मदद करेगा कि सौर कण पृथ्वी के वायुमंडल (atmosphere) में कैसे प्रवेश करते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों तरह की जानकारी को साथ मिलाकर यह बेहतर समझा जा सकेगा कि सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण में कैसे यात्रा करती है। इससे अंतरिक्ष मौसम से जुड़े कई सवालों के जवाब मिलने के अलावा, पृथ्वी की चुंबकीय सुरक्षा प्रणाली को बेहतर समझने में और तकनीक पर निर्भर दुनिया को सौर तूफानों (solar storms) के खतरों से बचाव को बेहतर बनाने में भी मदद मिलेगी।
एक और खास बात है कि यह मिशन युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और चायनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ का पहला संयुक्त मिशन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान में देशों के बीच सहयोग और मज़बूत हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)
कहा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।
मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।
सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।
यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।
एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।
इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।
एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।
युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।
एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)
दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।
एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।
एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।
दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
आने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?
एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।
परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।
यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।
इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।
दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही मौसम की भविष्यवाणी।
इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।
ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।
एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया।
1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।
इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)