जलवायु बदलाव का समाधान आजीविका रक्षा से जुड़े

भारत डोगरा

लवायु बदलाव (climate change) की समस्या के समाधान के रूप में विश्व स्तर पर दो तरह के प्रयास चर्चित हैं। पहला तो यह है कि इसके लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाऊस गैसों (greenhouse gases) के उत्सर्जन को कम किया जाए। दूसरा, कि इस समस्या का सामना करने के लिए लोगों व समुदायों की तैयारी बेहतर हो। इन दो पक्षों को प्रायः मिटिगेशन व एडाप्टेशन कहा जाता है व ये दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आगे चुनौती ऐसा कार्यक्रम बनाने की है जिनसे लोगों की आजीविका भी बेहतर हो तथा साथ में जलवायु बदलाव संकट के इन दोनों पक्षों पर भी कार्य आगे बढ़ सके।

भारत जैसे विकासशील देशों (developing countries) के संदर्भ में तो यह चुनौती और भी अहम है क्योंकि जहां जलवायु बदलाव के संदर्भ में हमें अपनी ज़िम्मेदारी अवश्य निभानी है पर साथ में आजीविका व आर्थिक पक्ष (economic development) को भी आगे बढ़ाना है। ऐसे कार्यक्रम बनाने होंगे जिनमें उचित समन्वय बन सके। फिर भारत जैसे देश में यह समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में बनाना तो और भी ज़रूरी हो गया है।

यदि हम पहले पक्ष ‘मिटिगेशन’ या ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की बात करें तो प्राकृतिक खेती (natural farming) व बागवानी (sustainable agriculture) को बढ़ाना इसमें अहम कदम है। प्राकृतिक खेती व बागवानी को बढ़ाकर कृषि पर ग्रीनहाऊस गैस का अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले जीवाश्म ईंधन का जो बड़ा बोझ है, उसे कम किया जा सकता है। यदि किसी गांव में प्राकृतिक खेती के त्वरित प्रसार से रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा आदि का उपयोग कम होता है तो जीवाश्म ईंधन का उपयोग व ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अनेक छोटे औज़ारों के उपयोग को प्रोत्साहित कर बड़ी मशीनों व ट्रैक्टरों आदि में डीज़ल की अधिक खपत की संभावना भी कम होती है।

प्राकृतिक खाद (organic manure) के उपयोग से व प्राकृतिक खेती से खेतों की मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ता है, उसकी मिट्टी में कार्बन संजोने की क्षमता (carbon sequestration) बढ़ती है व वायुमंडल में कार्बन डाईक्साइड का उत्सर्जन कम होता है।

किसान छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगा सकते हैं, गावों के आसपास मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष (native species) इस तरह साथ-साथ लगाए जा सकते हैं कि वे एक साथ एक-दूसरे से सहयोग करते हुए पनप सकें।

दूसरी ओर, जलवायु बदलाव व उससे जुड़े प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना बेहतर ढंग से करने की क्षमता यानी एडाप्टेशन (climate resilience) के लिए जल व मिट्टी संरक्षण (water and soil conservation) सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल व मिट्टी संरक्षण से सूखे व बाढ़ (drought and flood) दोनों तरह की आपदाओं को कम करने में मदद मिलती है व साथ में ग्रामीण आजीविकाओं का मज़बूत आधार तैयार होता है। सामान्य वर्ष में भी कुछ महीनों के लिए अनेक गांवों के जल-स्रोत सूख जाते हैं। यह स्थिति गांववासियों के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों के लिए भी बड़ा संकट बन जाती है।

वन्य जीव-जंतुओं (wildlife) व आवारा घूम रहे पशुओं के लिए भी प्यास का संकट बढ़ जाता है। जल-संरक्षण से यह संभावना बढ़ती है कि इन जल-स्रोतों में वर्ष भर पानी की उपस्थिति बनी रहेगी। जल संरक्षण से भूजल स्तर (groundwater level) ठीक बना रहता है जिससे कुंओं व हैंडपंप आदि से पानी मिलता रहता है। अधिक वर्षा के समय बहुत-सा पानी विभिन्न गांवों में व उनके जल-स्रोतों व खेतों में संरक्षित रह जाए तो विभिन्न स्थानों पर बाढ़ की संभावना अपने आप कम हो जाएगी।

प्रतिकूल मौसम (extreme weather) के समय में मिश्रित खेती (mixed cropping) की पद्धति से फसल के कुछ हिस्से को बचाने की संभावना बढ़ जाती है। मिश्रित खेती को कई स्तरों पर बढ़ावा देकर व छोटे किसानों को खेतों में अनाज, दलहन, तिलहन के साथ कई तरह की सब्ज़ियां व फल लगाने को प्रोत्साहित कर उन्हें प्रतिकूल मौसम में भी सशक्त रहने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है।

प्राकृतिक खेती की इन तकनीकों से किसानों का खर्च बहुत कम (low-cost farming) हो सकता है। यदि खर्च कम होगा तो कर्ज़ की ज़रूरत भी कम हो जाएगी। इस तरह, छोटे किसान जलवायु बदलाव के अधिक कठिन दौर का सामना करने में सक्षम हो जाएंगे। दूसरी ओर, किसानों की बीज सम्बंधी आत्म-निर्भरता (seed self-reliance) को बढ़ाने पर भी अधिक ध्यान देना चाहिए। आत्म-निर्भरता बढ़ने से जलवायु बदलाव का सामना करने की क्षमता बढ़ जाती है।

जिन समुदायों में आपसी सहयोग व एकता (community cooperation) बढ़ती है, उनकी जलवायु बदलाव के दौर का आपसी सहयोग से बेहतर ढंग से सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है। ज़रूरत है कि ग्रामीण समुदाय आपसी सहयोग को बढ़ाएं, उनके स्व-सहायता समूह (self-help groups) गठित किए जाएं, अधिक व्यापक स्तर पर भी संगठन बनाए जाएं, सबके सहयोग से सामाजिक उद्यम (social enterprises) स्थापित किए जाएं।

उपरोक्त सभी प्रयास सृजन संस्था ने निरंतर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए किए हैं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य ग्रामीण आजीविकाओं (जैसे कृषि, बागवानी, बकरी-पालन) को टिकाऊ तौर पर बेहतर और समृद्ध करना है व इसमें विशेष तौर पर कमज़ोर वर्ग व उसमें भी महिलाओं (women empowerment) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सृजन के कार्यक्रमों के अन्तर्गत छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगाने के अतिरिक्त तपोवन नामक मानव-निर्मित वन (community forests) अनेक गांवों में लगाए गए हैं जिनमें मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के हज़ारों वृक्ष साथ-साथ लगाए गए हैं। कार्यक्रम जलवायु बदलाव के संकट के दोनों पहलुओं के लिहाज़ से बहुत मददगार सिद्ध हो रहा है।

इस तरह अनेक स्तरों पर जो कार्य ग्रामीण आजीविका आधार को मजबूत करते हैं, वे जलवायु बदलाव (climate action) की गंभीर समस्या के संदर्भ में भी मददगार होते हैं। एक ओर वे जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में सहयोग करते हैं तो दूसरी ओर, प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना करने की ग्रामीण समुदायों की क्षमता को बढ़ाते भी हैं। इन कार्यक्रमों के इस व्यापक महत्व व समन्वय क्षमता को देखते हुए इन्हें सरकारी व सी.एस.आर. स्तर (CSR initiatives) पर अधिक सहयोग व समर्थन प्राप्त होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं? सुनकर क्या करते हैं? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

क्या आप अपने पौधों को संगीत (music for plants) सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद (plant perception) कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भांप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ (herbivore vibration) सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों (plant defense response) का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति (frequency discrimination) एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं।

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण (seed germination) पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियां पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियां, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति (gene expression) और हॉरमोन नियंत्रण (plant hormone) को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान (Plant acoustics)

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि (crop yield, sustainable agriculture) आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि (plant growth) पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर (music effect on plants) का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जांचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा (sound frequency, plant development)।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया (classical music, meditation music)। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स (psychoacoustics, plant response to sound) के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएं, पौधे अच्छे से लहलहाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अत्यंत प्राचीन जीवाश्मों में चयापचय रसायनों के निशान

लाखों साल पहले इस धरती पर विचरने वाले जीव (prehistoric animals) क्या खाते होंगे? क्या वे कभी किसी बीमारी (ancient diseases) का शिकार बनें होंगे? इन सवालों के जवाब दे पाना मुमकिन नहीं लगता। नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इन नामुमकिन लगने वाले सवालों के जवाब दिए हैं। उन्होंने बताया है कि लाखों साल पहले विचरने वाले जीवों ने क्या खाया, उनका रहवास कैसा था, और वे कैसी बीमारियों से जूझ रहे थे।

इन सवालों का जवाब देने के लिए शोधकर्ताओं ने सहारा लिया है मेटाबोलाइट्स (metabolites) का। मेटाबोलाइट किसी जीव के शरीर की चयापचय प्रक्रिया में बने उप-उत्पाद होते हैं। दरअसल हम जो भी खाते हैं, किसी भी संक्रमण की चपेट में आते हैं, या जिन भी परिस्थितियों को हमारा शरीर झेलता है चयापचय प्रक्रिया में बने मेटाबोलाइट उस सबके गवाह बन जाते हैं।

जीवित जीवों के खान-पान या रोग सम्बंधी छान-बीन करने के लिए तो उनके रक्त या मूत्र के नमूनों से मेटाबोलाइट्स (biological samples, disease analysis) हासिल कर लिए जाते हैं। लेकिन अश्मीभूत जीवों में तो रक्त-मूत्र मिलना संभव नहीं है। लेकिन यह भी होता है कि जैसे-जैसे दांत, हड्डियां या हाथीदांत जैसे सख्त ऊतक विकसित होते हैं, वृद्धि करते हैं, रक्त के साथ मेटाबोलाइट्स उनमें पहुंचते रहते हैं और ये मेटाबोलाइट्स इन सख्त ऊतकों की खुरदरी, छिद्रदार संरचनाओं में फंस जाते हैं। इस आधार पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जैविक नृविज्ञानी टिम ब्रोमेज के मन में यह सवाल आया कि क्या हड्डियों, दांतों और हाथीदांत जैसी सख्त और छिद्रदार जगह पर मेटाबोलाइट्स फंसकर संरक्षित भी रह सकते हैं (bone preservation, fossil chemistry)।

हालांकि, कुछ हालिया अध्ययनों में ऐसे मेटाबोलाइट्स मृत्यु के बाद कंकाल के अवशेषों (skeletal remains, post-mortem biomarkers) में संरक्षित पाए गए हैं, लेकिन वे कंकाल महज कुछ दशक पुराने थे। लेकिन ये शोधकर्ता तो लाखों साल (13 से 30 लाख साल तक) प्राचीन जीवाश्मों में मेटाबोलाइट्स खोजना चाह रहे थे।

ब्रोमेज और उनके साथियों ने प्राचीन तंज़ानिया की ओल्डुवाई गॉर्ज, और दक्षिण अफ्रीका की मकापंसगैट और मलावी के होमिनिन खुदाई स्थलों से प्राप्त अश्मीभूत हड्डियों और दांतों से नमूने लेकर उनकी मास स्पेक्ट्रोग्राफी (mass spectrometry, chemical analysis) करके प्रत्येक जीवाश्म में कैद रासायनिक पदार्थों का पता लगाया। एक बार जब उन्होंने नमूनों के भीतर संभावित मेटाबोलाइट्स की पहचान कर ली, तो उन्होंने उनकी तुलना वर्तमान में जीवित उनके जैसे जीवों के मेटाबोलाइट्स से की।

शोधकर्ताओं को विश्लेषण में प्रत्येक नमूने में हज़ारों मेटाबोलाइट्स मिले, जिनमें से सैकड़ों ऐसे थे जो वर्तमान जीवों द्वारा बनाए जाने वाले मेटाबोलाइट से मेल खाते थे।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने प्राचीन जानवरों के जीवन (ancient life reconstruction) के बारे में अनुमान लगाए। जैसे, मेटाबोलाइट के आधार पर शोधकर्ता यह अंदाज़ा कर पाए कि कई अश्मीभूत जीव मादा थे। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले दो जेरबिल और एक गिलहरी के जीवाश्म में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो एस्ट्रोजन को पचाने (estrogen metabolism) वाले जीन से जुड़े थे। अश्मीभूत उल्लू के पेट में से मिली जेरबिल की एक अन्य हड्डी से भी मादा (sex identification)होने के अतिरिक्त रासायनिक संकेत मिले।

आगे के विश्लेषण में शोधकर्ताओं को अतीत की बीमारियों के संकेत भी मिले। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले गिलहरी, चिवोंडो से मिले हाथी और मकापंसगैट से मिले बोविड के जीवाश्म से ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो संभवत: ट्रायपैनोसोमा ब्रूसाई (Trypanosoma brucei) परजीवी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े थे। यह परजीवी मनुष्यों में निद्रा रोग का कारण बनता है।

फिर, जीवाश्म मेटाबोलाइट्स की तुलना ज्ञात पौधों के मेटाबोलाइट्स से करके शोधकर्ता कुछ जानवरों के आहार और वातावरण के बारे में भी बता पाए। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिली 18 लाख साल पुरानी गिलहरी में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो शतावरी और एलो कुल पौधों के भक्षण का संकेत देते हैं। इस आधार पर लगता है कि उस समय जंगल घना रहा होगा। ऐसे ही पता चला कि 24 लाख साल पहले मलावी में विचरने वाला एक जीव मृत्यु के समय बच्चा था, वर्मवुड की छाल और शहतूत की पत्तियां खाता था और जब वह मरा तो शायद किसी संक्रमण से ग्रस्त था।

हालांकि अन्य वैज्ञानिक चेताते है कि शोधकर्ताओं को जीवाश्मों से जुड़े मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण करते समय सावधान रहना चाहिए। क्योंकि यह दुविधा हमेशा होती है कि मेटाबोलाइट्स उस अश्मीभूत जानवर द्वारा बनाए गए थे या आसपास की मिट्टी से जीवाश्म में समा गए हैं।

अलबत्ता, शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के आसपास की मिट्टी की जांच करके इस समस्या का ध्यान रखा है। वे यह भी कहते हैं कि “मिट्टी कोई संदूषक नहीं है बल्कि यह तो उस जीवन का प्रतिबिंब है जो उस पर बसा था।”

बहरहाल यह बड़ी बात है कि वैज्ञानिक लाखों साल पुराने जीवाश्म नमूनों से मेटाबोलाइट हासिल करके उनका विश्लेषण कर सके। ऐसे विश्लेषण अतीत के बारे में लगाए गए कई अनुमानों को मज़बूती दे सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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क्या मंगल ग्रह के शहर बर्फ से बनाए जाएंगे?

मंगल तक पहुंचना मानव जाति का एक बड़ा सपना रहा है, और अब यह सपना सच होता दिख रहा है (Mars mission, human settlement on Mars)। लेकिन मंगल पर उतरना ही काफी नहीं है। अगर इंसानों को वहां लंबे समय तक रहना है, तो उन्हें ऐसी मज़बूत और सुरक्षित जगहों की ज़रूरत होगी जो कड़ी ठंड, खतरनाक विकिरण और अकेलेपन से बचा सकें। पृथ्वी से निर्माण सामग्री ले जाना बहुत महंगा और धीमा होगा। इसी वजह से वैज्ञानिक वहीं मौजूद एक संसाधन को समाधान मान रहे हैं – बर्फ (Martian ice) । पृथ्वी की प्राकृतिक बर्फीली गुफाओं से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि क्या मंगल पर भी ऐसे बर्फीले ढांचे बनाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि मंगल ग्रह सूखा नहीं है। उसकी सतह पर और उसके नीचे काफी मात्रा में बर्फ मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बर्फ से ऐसे मज़बूत और गर्मी कैद करने वाले घर बनाए जा सकते हैं, जिनमें मनुष्य रह सकें। ये बर्फीले घर एक तरफ तो विकिरण से सुरक्षा (radiation shielding) देंगे और दूसरी तरफ सूरज की आवश्यक रोशनी (natural light habitats) अंदर आने देंगे, जिससे जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा मिलेगा।

यह विचार भले ही विज्ञान-कथा जैसा लगे, लेकिन वैज्ञानिक इसे लेकर गंभीर हैं। लंबे समय के लिए अंतरिक्ष में इंसानों को बसाने (space habitation) की सबसे बड़ी चुनौती है बार-बार पृथ्वी से रसद भेजना, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा है। अगर मंगल पर मौजूद चीज़ों से ही काम लिया जाए, तो खर्च और खतरा दोनों कम हो सकते हैं। बर्फ इस मामले में खास है, क्योंकि इसे संभालना अपेक्षाकृत आसान है और इसके फायदे हैं।

मंगल पर निर्माण के लिए दो मुख्य चीज़ें मानी जाती हैं – बर्फ और रेगोलिथ (धूल-मिट्टी और पत्थरों की परत) (Martian regolith, space construction materials)। रेगोलिथ में उपयोगी तत्व होते हैं, लेकिन उन्हें निकालने के लिए भारी मशीनें और बहुत ज़्यादा गर्मी चाहिए। इसके उलट, बर्फ को कम ऊर्जा में पिघलाया, ढाला और फिर से जमाया जा सकता है।

यह प्रस्तावित आवास गुंबदाकार होंगे, जिनकी साइज़ लगभग एक हैक्टर (Mars habitat ice dome structures)  होगी। इनके भीतर रहने की जगह, काम करने के हिस्से और खेती के क्षेत्र अलग-अलग होंगे। कंप्यूटर मॉडल बताते हैं कि सिर्फ कुछ मीटर मोटी बर्फ की दीवारें भी मंगल के बेहद ठंडे औसत तापमान (–120 डिग्री सेल्सियस) को अंदर करीब –20 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकती हैं। यह तापमान अब भी ठंडा है, लेकिन अतिरिक्त हीटिंग से संभाला जा सकता है और इससे बर्फ पिघलती भी नहीं।

बर्फ की बनावट भी उम्मीद से बेहतर है। शोध बताते हैं कि अगर बर्फ में हाइड्रोजेल (hydrogel reinforcement) जैसे जैविक पदार्थ मिलाए जाएं, तो वह ज़्यादा मज़बूत और लचीली हो सकती है, जिससे दरार पड़ने का खतरा कम होता है। एक बड़ी चुनौती है सब्लीमेशन, यानी मंगल के विरल वातावरण में बर्फ का सीधे भाप बन जाना। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास जल-रोधी अस्तर लगाकर इसे रोका जा सकता है, हालांकि ऐसा अस्तर शायद पृथ्वी से ले जाना पड़े।

बर्फ का सबसे बड़ा फायदा सूरज की रोशनी से उसका रिश्ता है। रेगोलिथ के विपरीत, बर्फ हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है लेकिन उपयोगी रोशनी और गर्मी को अंदर आने देती है। तो विकिरण से सुरक्षा मिलेगी, साथ ही पौधे उगाने, नींद के चक्र को ठीक रखने और मानसिक स्वास्थ्य को सहारा देने के लिए ज़रूरी प्राकृतिक रोशनी मिलती रहेगी।

हालांकि इस विचार की कुछ सीमाएं (technical challenges) भी हैं। बड़े बर्फीले ढांचे बनाने के लिए भारी मात्रा में बर्फ को संसाधित करना होगा। शुरुआती अनुमान बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी बिजली उपलब्ध होने पर भी रोज़ केवल लगभग 15 वर्ग मीटर बर्फ (energy constraints) ही तैयार की जा सकती है। मंगल पर आने वाले धूल भरे तूफान भी समस्या पैदा करेंगे, क्योंकि बर्फ पर जमी धूल उसकी पारदर्शिता और गर्मी रोकने की क्षमता घटा देती है। इसके अलावा बर्फ निकालने के लिए उपकरण तो पृथ्वी से ही ले जाने होंगे।

इन चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्यम अवधि के लिए बर्फ के घर रहवास के लिए काम आ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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टेक्नॉलॉजी की दौड़ में नया विश्व नेता

क हालिया वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी में नेतृत्व (global science leadership)  का संतुलन तेज़ी से बदला है। ऑस्ट्रेलियाई संस्थान ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक फॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) का दावा है कि चीन अब दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में शोध के मामले में सबसे आगे (technology dominance) है। यह स्थिति शुरुआती 2000 के दशक से बिल्कुल उलट है, जब इन क्षेत्रों में अमेरिका का दबदबा था।

ASPI ने मौजूदा और उभरती 74 तकनीकों पर प्रभावशाली शोध का अध्ययन किया। ये तकनीकें इसलिए अहम हैं क्योंकि ये किसी देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को मज़बूत भी कर सकती हैं और खतरे में भी डाल सकती हैं। नतीजों के मुताबिक चीन 74 में से 66 तकनीकों में अव्वल है – जैसे परमाणु ऊर्जा, संश्लेषण जीवविज्ञान, उन्नत सामग्री और छोटे उपग्रह (nuclear energy, synthetic biology, advanced materials, small satellites)। जबकि अमेरिका कुछ ही क्षेत्रों, जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग और जियोइंजीनियरिंग, में आगे है।

यह बदलाव ऐतिहासिक माना जा रहा है। सदी की शुरुआत में जिन तकनीकों का अध्ययन किया गया था, उनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा में अमेरिका आगे था, जबकि चीन की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम थी। लेकिन पिछले बीस वर्षों में चीन ने विज्ञान और तकनीक में बहुत तेज़ प्रगति (science power shift) की है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण शोध, शिक्षा और नवाचार में चीन का भारी निवेश है।

चीन की पकड़ खासकर नई और तेज़ी से बढ़ती तकनीकों में मज़बूत है, जिसमें उसने सोच-समझकर संसाधन लगाए हैं। हालांकि, उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स जैसे कुछ पुराने और स्थापित क्षेत्रों में चीन अभी भी अग्रणी नहीं है और इन क्षेत्रों में अन्य देशों को बढ़त हासिल है।

इन रैंकिंग्स को तय करने के लिए ASPI की टीम ने दुनिया भर में प्रकाशित 90 लाख से ज़्यादा वैज्ञानिक शोध पत्रों का अध्ययन किया (scientific publications)। हर तकनीक के लिए 2020 से 2024 के बीच छपे सबसे ज़्यादा उद्धृत 10 प्रतिशत शोध पत्र चुने गए और देखा गया कि उनमें किस देश की कितनी भागीदारी है। किसी शोध पत्र का अन्य शोध पत्रों में जितना ज़्यादा हवाला (research impact analysis) दिया जाता है, उसे उतना ही प्रभावशाली और उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह रहा कि क्लाउड और एज कंप्यूटिंग (cloud and edge computing) जैसे क्षेत्रों में चीन सबसे आगे है। ये क्षेत्र एआई के लिए बेहद अहम हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अमेरिका की वैज्ञानिक ताकत अचानक खत्म हो गई है। अमेरिका आज भी प्रभावशाली शोध कर रहा है। लेकिन, यदि वह अहम वैज्ञानिक क्षेत्रों में सोच-समझकर निवेश नहीं करता तो महत्व खो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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2026 में विज्ञान से उम्मीदें

र्ष 2026 विज्ञान (Science in 2026) के लिए एक निर्णायक साल साबित हो सकता है। इस वर्ष कृत्रिम बुद्धि (AI – एआई), चिकित्सा, अंतरिक्ष अन्वेषण और भूविज्ञान में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यहां ऐसी ही कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं की चर्चा की जा रही है।

एआई का बढ़ता दायरा

अब एआई मात्र आंकड़ों का विश्लेषण करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह शोध में भागीदार भी बन रहा है। 2026 में प्रयोगशालाओं में ऐसे एआई ‘एजेंट’ (AI in laboratories) आम हो सकते हैं, जो प्रयोगों की योजना बनाएंगे, नतीजों का विश्लेषण करेंगे और सीमित मानवीय निगरानी में फैसले भी लेंगे। एआई की भूमिका वाली ऐसी पहली बड़ी खोज इस साल आ सकती है।

हालांकि, एआई पर बढ़ती निर्भरता के साथ खतरे (AI risks) भी हैं। ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां एआई ने आंकड़ों को गलत समझा या उनको विलोपित (data misinterpretation) कर दिया। लिहाज़ा, एआई की सफलताओं के साथ-साथ उसकी सीमाओं को समझना भी ज़रूरी है।

इस बीच, एक और अहम तब्दीली हो रही है। बड़े व महंगे एआई मॉडल्स की जगह अब छोटे, तेज़ और विशिष्ट कामों (task specific AI) के लिए एआई सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। ये इबारत पैदा करने की बजाय तार्किक व गणितीय समस्याएं हल करते हैं, और कुछ मामलों में बड़े सिस्टम से बेहतर हैं।

व्यक्तिविशिष्ट जीन संपादन

जीन संपादन तकनीक अब एक नए और ज़्यादा व्यक्ति-विशिष्ट (खासकर दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों के) इलाज में दखल बना रही है। 2026 में बच्चों के लिए बनाए गए व्यक्ति-विशिष्ट जीन-उपचार (personalized gene editing) पर आधारित दो बड़े क्लीनिकल परीक्षण शुरू हो सकते हैं।

इनमें से एक परीक्षण उन बच्चों पर केंद्रित होगा जिन्हें कुछ जीन-विशेष (rare genetic disorders) में बदलाव के कारण चयापचय से जुड़ी दुर्लभ बीमारियां होती हैं, जबकि दूसरा परीक्षण जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र की बीमारियों पर केंद्रित होगा। अगर ये प्रयास सफल होते हैं तो इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है – एक-से इलाज की बजाय, मरीज़ के जीन के अनुसार उपचार मिल सकेगा।

सभी कैंसर के लिए एक परीक्षण

2026 में कैंसर से जुड़ी एक बहुत बड़ी उम्मीद ब्रिटेन में पूरी हो सकती है। वहां एक ऐसा रक्त परीक्षण जारी है, जो लक्षण उभरने से पूर्व ही लगभग 50 तरह के कैंसर की पहचान (early cancer detection) कर सकता है। यह परीक्षण खून में मौजूद कैंसर कोशिकाओं से निकले बेहद छोटे डीएनए टुकड़ों के आधार पर बताता है कि कैंसर शरीर के किस हिस्से में है। इस परीक्षण में 1.4 लाख से ज़्यादा लोग शामिल हैं। नतीजे अच्छे रहे तो कैंसर की शीघ्र पहचान आसान हो सकेगी और हज़ारों जानें बच सकेंगी।

साथ ही, दवा के परीक्षण से जुड़े नियमों में भी बदलाव हो रहे हैं। ब्रिटेन में प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाया जाएगा, जिसमें नैतिक और नियामक मंज़ूरी (fast track drug approval) एक ही आवेदन से ली जा सकेगी। पहले इन मंज़ूरियों के लिए दो पृथक आवेदन करने होते थे। वहीं, नई दवाओं के परीक्षण चरण के लिए एफडीए द्वारा प्रस्तावित तब्दीली – दो क्लीनिकल परीक्षण की जगह एक परीक्षण – पर चर्चा जारी रहेगी।

चंद्रमा पर बढ़ती भीड़

2026 में चंद्रमा पर हलचल तेज़ हो सकती है (moon mission)। नासा का आर्टेमिस-II मिशन 1970 के दशक के बाद पहली बार अब इंसानों को चंद्रमा के चारों ओर घुमाएगा। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री होंगे। भले ही वे चंद्रमा पर उतरेंगे नहीं लेकिन यह भविष्य में मानव अवतरण की दिशा में एक अहम कदम होगा।

वहीं चीन चांग-ए-7 मिशन (Chang’e-7 mission) की तैयारी कर रहा है, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाएगा। यह इलाका बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन यहां हमेशा छाया में रहने वाले गड्ढों में बर्फ छिपी होने की संभावना है। भारत के सफल चंद्रयान-3 से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (lunar south pole)  को लेकर वैश्विक वैज्ञानिक रुचि और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ गई हैं।

मंगल के चंद्रमाओं की ओर

चंद्रमा से आगे अब वैज्ञानिकों का ध्यान मंगल ग्रह और उससे भी दूर की दुनिया पर है। जापान अपने MMX मिशन (Mars exploration) के ज़रिए मंगल के दो चंद्रमाओं – फोबोस और डाइमोस – का अध्ययन करने जा रहा है। इस मिशन की खास बात यह होगी कि फोबोस से नमूने पहली बार पृथ्वी पर आएंगे।

युरोपियन स्पेस एजेंसी 26 कैमरों से लैस PLATO नाम का एक शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन मिशन तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य पास के तारों के आसपास पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज करना है।

इसी दौरान भारत का आदित्य-L1 मिशन (solar observation, Aditya-L1 mission) सूर्य की गतिविधियों पर नज़र बनाए रखेगा। इससे वैज्ञानिक सूर्य से उठने वाले तूफानों को बेहतर समझ सकेंगे।

पृथ्वी में छिपे रहस्यों की खोज

पृथ्वी के रहस्यों को समझने के लिए चीन का उन्नत समुद्री ड्रिलिंग (deep sea drilling) जहाज़ मेंग शियांग अपना पहला अभियान शुरू करेगा। यह जहाज़ समुद्र के पेंदे के नीचे गहराई तक ड्रिल कर पृथ्वी की अंदरूनी परतों तक पहुंचने की कोशिश करेगा। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि टेक्टोनिक प्लेटें (tectonic plates research) कैसे खिसकती हैं और पृथ्वी का अंदरूनी ढांचा उसकी सतह को कैसे आकार देता है।

कुल मिलाकर, 2026 विज्ञान के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण वर्ष होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पर्यावरणविद माधव गाडगिल

माधव गाडगिल (मई 1942-जनवरी 2026)

र्यावरण और पारिस्थितिकी संरक्षण में अहम योगदान देने वाले माधव धनंजय गाडगिल (Madhav Gadgil, environmentalist) विगत 7 जनवरी को इस संसार से विदा हो गए।

24 मई 1942 को पुणे में जन्मे माधव गाडगिल ने फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे से जीव विज्ञान में स्नातक और मुंबई युनिवर्सिटी से प्राणि विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। आगे की पढ़ाई के लिए वे हारवर्ड युनिवर्सिटी (Harvard University) गए।

भारत लौटकर वे पुणे स्थित आगरकर शोध संस्थान से जुड़ गए। इसके बाद वे बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट आफ साइंस से जुड़े, जहां उन्होंने पारिस्थितिक विज्ञान केंद्र (Indian Institute of Science, ecological sciences) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई जो भारत में आधुनिक पारिस्थितिकी अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

भारत की पारिस्थितिकी के संरक्षण (ecological conservation) में उनका अतुलनीय योगदान रहा। नीलगिरी पर्वतों को जैवमंडलीय संरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिलाने से लेकर गाडगिल आयोग (Gadgil Committee, Western Ghats ecology) के तहत पश्चिमी घाट को इकॉलॉजिकली सेंसिटिव एरिया घोषित किए जाने तक उनका योगदान रहा। जैव विविधता अधिनियम, 2002 के निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने सदैव संरक्षण के प्रयासों में ज़मीन से जुड़े समुदायों को शामिल रखने की पैरवी की और इस शामिलियत के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी के लिए पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर का मैनुअल तैयार किया, जिसकी मदद से कोई भी जैव विविधता और उससे जुड़े ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण कर सकता है। वे वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन में भी शामिल रहे और प्रधानमंत्री की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार परिषद के सदस्य (science policy advisor) भी रहे।

पर्यावरण व इकॉलॉजी के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण (Padma Bhushan awards), चैम्पियन ऑफ दी अर्थ, शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार वगैरह से नवाज़ा गया।

अपने जीवन काल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण शोधकार्य (scientific research) किए। उनके द्वारा 250 से अधिक वैज्ञानिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। उनका मानना था कि जन चेतना के लिए विज्ञान आम लोगों की भाषा में होना चाहिए। उनकी यह सोच उनके लेखन और सार्वजनिक व्याख्यानों में भी झलकती है। उन्होंने अंग्रज़ी, मराठी, हिंदी और अन्य भाषाओं में कई किताबें (popular science books) लिखीं। उनकी कुछ उल्लेखनीय किताबें हैं ‘A Walk Up the Hill: Living with People and Nature’, ‘Ecology and Equity: The Use and Abuse of Nature in Contemporary India’, ‘यह दरकती ज़मीन’, ‘जीवन की बहार’ आदि। उनके सरल-सहज व्याख्यान और चर्चाएं (public lectures, educational videos) यू-ट्यूब पर उपलब्ध हैं।

वे हमारे बीच अब नहीं रहे लेकिन उनके कार्य, विचार और लेखन सदैव हमारे साथ रहेंगे। और, उनके द्वारा तैयार शोधार्थियों, विद्यार्थियों और प्रेरित युवाओं के ज़रिए उनका कार्य जारी रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डॉ. सिसिन्थी शिवाजी के वैज्ञानिक योगदान

डॉ. सचिन शुक्ल, डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

डॉ. सिसिन्थी शिवाजी
(1952-2025)

डॉ. शिवाजी ने 1973 में बिट्स पिलानी से एम.एससी (BITS Pilani) की और 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। इसके बाद 1980 में वे हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सी.सी.एम.बी.-CCMB, hyderabad) में वैज्ञानिक के पद पर नियुक्त हुए। इस केंद्र से वे 2012 में निदेशक-स्तर के वैज्ञानिक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। इस अवधि में उन्होंने लेबोरेटरी फॉर दी कन्ज़र्वेशन ऑफ एंडेंजर्ड स्पीशीज़ (LaCONES) की स्थापना में बहुमूल्य योगदान दिया|

तत्पश्चात, 2013 में उन्होंने एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान (LV Prasad Eye Institute) में पदभार ग्रहण किया। यहां वे 2016 से 2020 तक प्रो. ब्राइयेन होल्डेन नेत्र अनुसंधान केंद्र के निदेशक पद पर कार्यरत रहे और जीवन पर्यंत जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने नेत्र सम्बंधी सूक्ष्मजीव संसार (Ocular Microbiome) की पहचान, नेत्र रोगों में सूक्ष्मजीव संसार और बीमारियों के दौरान इसमें होने वाले परिवर्तनों के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।

डॉ. शिवाजी ने अंटार्कटिका व आर्कटिक सागर, हिमालय क्षेत्र के हिमनदों (ग्लेशियर्स), वायुमंडल के समतापमंडल एवं हिंद महासागर, अंडमान द्वीपों, तथा लोनार झील के पानी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों के वर्गीकरण एवं जैव विविधता (extremophile microbes) पर अग्रणी अध्ययन किए।

उनकी मुख्य वैज्ञानिक उपलब्धियों को निम्न बिंदुओं में निरूपित किया जा सकता है:

1. उनके तीस वर्षों से भी अधिक (1984-2015) के अध्ययनों ने तीन नए जीवाणु समूहों: लोहाफेक्स-1 (LOHAFEX1), लोहाफेक्स-2 (LOHAFEX2) एवं लोहाफेक्स-3 (LOHAFEX3); सात नए वंशों (Genera); एवं अंटार्कटिका, आर्कटिक, एवं हिमालयी क्षेत्र के हिमनदों, वायुमंडल के समतापमंडल एवं हिंद महासागर, अंडमान द्वीपसमूह, तथा लोनार झील के जल में पाए जाने वाले जीवाणुओं एवं खमीर (यीस्ट) की 81 नई प्रजातियों की पहचान की है।

2. उनके द्वारा अंटार्कटिका में पाए जाने वाले जीवाणुओं (Antarctic bacteria) की 32 नई प्रजातियों की पहचान एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज है। गौरतलब है कि यह आंकड़ा अंटार्कटिका में अब तक खोजी गई कुल नई प्रजातियों का लगभग 12 प्रतिशत है।

3. उन्होंने ही विश्व में सर्वप्रथम वायुमंडल के समतापमंडल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया (stratospheric bacteria) की सात नई प्रजातियों की उपस्थिति का प्रमाण प्रस्तुत किया|

उनके शोध अध्ययनों ने दो नए जीन्स की पहचान की जो निम्न तापमान पर जीवों के जीवन के लिए आवश्यक होते हैं – एस्पार्टेट एमीनोट्रान्सफेरेस एवं टी-आरएनए रूपांतरकारी एन्ज़ाइम जीटीपीएस का जीन (cold adaptation genes)।

4. सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण एवं विविधता पर उनके द्वारा किए गए शोधकार्यों ने ना केवल देश में अपितु विदेशों (जापान, जर्मनी एवं फ्रांस) में कार्यरत वैज्ञानिकों को भी सहयोग के लिए आमंत्रित किया है|

5. वे वर्ष 1984-85 में अंटार्कटिका पर भेजे गए चतुर्थ भारतीय अभियान दल के सदस्य थे एवं 2007 में आर्कटिक पर भेजे गए प्रथम भारतीय अभियान दल के सदस्य थे।

6. वे भारत की प्रमुख विज्ञान अकादमियों (राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, इलाहाबाद; भारतीय विज्ञान अकादमी, बंगलूरु; तेलंगाना विज्ञान अकादमी, हैदराबाद; एवं भारतीय सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक संघ) की सदस्यता (international scientific collaboration) से सम्मानित किए गए।

7. सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण पर किए गए उनके शोध कार्यों के लिए उन्हें 2002 में जीव विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्टता के अंटार्कटिक पुरस्कार; एवं 2016 में ध्रुवीय एवं हिमांक क्षेत्रीय विज्ञान के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2014 में वे भारतीय सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक संघ द्वारा स्थापित कार्ल वॉसे स्मृति पुरस्कार के प्रथम प्राप्तकर्ता थे।

8. उन्होंने सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण एवं जैव विविधता, सूक्ष्मजैविकी, एवं आणविक जीव विज्ञान के क्षेत्र में 320 से भी अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए एवं सूक्ष्मजैविकी में तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं।

उनके द्वारा खोजी गई नवीन जीवाणु प्रजातियां वर्तमान में राष्ट्रीय जैव-संसाधन (national bio resources) बन चुकी हैं। इनकी खोज में अनोखी जैव-तकनीक सामर्थ्य (उदाहरणस्वरूप हिमालय के सियाचिन क्षेत्र में रह रही हमारी सेनाओं के मानव अवशिष्ट का जैव-अपघटन) झलकती है।

विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. शिवाजी को उनके विशिष्ट योगदान के लिए एक ऐसे वैज्ञानिक के रूप में सदैव सम्मानपूर्वक याद किया जाएगा जिन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों, जैसे प्रजनन जीव विज्ञान, वन्यजीव संरक्षण, हिमजैविकी, एवं नेत्र सूक्ष्मजैविकी में अनूठा शोध किया (multidisciplinary scienceandIndian microbiologist); जैसा कि वे स्वयं अपने व्याख्यानों में कहा करते थे – “साइंस इज़ बेसिक, वाइल्ड, एंड कूल (science is basic, wild and cool)!” एक परोपकारी व्यक्ति होने के नाते उन्होंने अपने नेत्र दान कर दिए ताकि वे मरणोपरांत किसी ज़रूरतमंद के काम आ सकें| (स्रोत फीचर्स)

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शनि के चंद्रमा टाइटन का ओझल बर्फीला महासागर

रीब दो दशकों से शनि ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (titan) वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। माना जाता था कि उसकी मोटी बर्फीली सतह के नीचे तरल पानी का एक विशाल महासागर (subsurface ocean) छिपा है, जो जीवन की संभावना के लिए काफी अहम है। लेकिन हालिया शोध के अनुसार शायद ऐसा नहीं है।

टाइटन के अंदर महासागर होने का विचार 2000 के दशक के अंत में कैसिनी अंतरिक्ष यान (Cassini spacecraft) के आंकड़ों से आया था। कैसिनी जब-जब टाइटन के पास से गुज़रा, तो रेडियो संकेतों ने उसकी गति में बहुत हल्के बदलाव दर्ज किए। इससे टाइटन के गुरुत्वाकर्षण और आकार में हल्के बदलाव का पता चला। शनि के खिंचाव से टाइटन थोड़ा फैलता-सिकुड़ता दिखा, जिससे सतह पर 10 मीटर से ऊंचे ज्वार-भाटे जैसे प्रभाव बने। वैज्ञानिकों ने तब निष्कर्ष निकाला कि इतनी लचक तभी संभव है, जब बर्फ के नीचे तरल पानी का महासागर हो (liquid water ocean)।

इस सोच के चलते टाइटन को महासागरीय चंद्रमा के खास समूह में रखा गया था, जिसमें युरोपा और एन्सेलेडस (Europa Enceladus) जैसे चंद्रमा भी हैं। यह विचार टाइटन में कार्बनिक रसायन की भरपूर उपस्थिति के कारण भी था।

लेकिन नेचर में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। ग्रह वैज्ञानिक फ्लावियो पेट्रिका और उनकी टीम का कहना है कि टाइटन के भीतर कभी महासागर रहा होगा, लेकिन आज वह शायद जम चुका है। हालांकि, उसकी मोटी बर्फीली परत के अंदर कुछ जगहों पर पिघले पानी के छोटे-छोटे पोखर हो सकते हैं।

इस बहस की जड़ है ऊर्जा। अगर टाइटन के अंदर अब भी बड़ा तरल महासागर होता, तो शनि के खिंचाव से पैदा होने वाली गर्मी का बड़ा हिस्सा उस महासागर को गर्म (tidal heating, internal energy) रखने में लग जाता। लेकिन कैसिनी द्वारा 124 नज़दीकी उड़ानों के डैटा का दोबारा विश्लेषण करने पर पता चला कि टाइटन बहुत ज़्यादा ऊर्जा बाहर छोड़ रहा है – करीब 4 टेरावॉट, जो आधुनिक मानव सभ्यता की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा ज़रूरत के बराबर है। इतनी अधिक गर्मी का उत्सर्जन किसी विशाल तरल महासागर की उपस्थिति से मेल नहीं खाता।

इसमें एक और उलझन है। समय के साथ शनि के ज्वारीय खिंचाव को टाइटन की कक्षा को वृत्ताकार और स्थिर (orbital dynamics) बना देना चाहिए था, लेकिन टाइटन आज भी दीर्घवृत्ताकार पथ (elliptical orbit) पर घूम रहा है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि बहुत पहले किसी क्षुद्रग्रह की टक्कर ने इसकी कक्षा बिगाड़ दी होगी। लेकिन नया मॉडल एक आसान वजह बताता है: अगर टाइटन के भीतर तरल महासागर नहीं है, तो ऊर्जा को सोखने वाला कोई माध्यम नहीं होगा और कक्षा अस्थिर बनी रहेगी।

पेट्रिका की टीम ने टाइटन के दो मॉडल बनाए – एक जिसमें भीतर महासागर हो और दूसरा जिसमें न हो (interior planetary modeling)। जिस मॉडल में महासागर नहीं है, बल्कि करीब 500 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे चट्टानी कोर है, वही टाइटन से मिलने वाले आंकड़ों से बेहतर मेल खाता है (rocky core)। यह मॉडल टाइटन की गर्मी के उत्सर्जन, उसके झुकाव और शनि के खिंचाव के प्रति उसके व्यवहार, इन सभी बातों को एक ही ढांचे में समझाता है।

हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं। कुछ का कहना है कि टाइटन को ‘महासागरीय चंद्रमाओं’ की सूची से हटाने के लिए और ठोस सबूतों की ज़रूरत (evidence based research)है।

और तो और, इस नई खोज से टाइटन पर जीवन की संभावना (life on Titan) पूरी तरह खत्म नहीं होती। उल्टा, कुछ शोधकर्ताओं को यह विचार और भी संभावनाओं से भरा लगता है क्योंकि इसके अनुसार एक बड़े महासागर की जगह टाइटन की बर्फ के नीचे कई छोटी-छोटी तरल जल-राशियां हो सकती हैं, शायद कुछ तो अटलांटिक महासागर से भी बड़ी। ऐसे सीमित जल-क्षेत्र जीवन के लिए ज़रूरी रसायनों को बेहतर ढंग से सांद्रित कर सकते हैं।

इस बहस का जवाब शायद नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन (NASA Dragonfly mission) से मिलेगा, जो 2034 में टाइटन पर उतरने वाला है। यह मिशन ऐसे उपकरण लेकर जाएगा जो भूकंपीय तरंगों (seismic waves) को माप सकेंगे, जो ठोस बर्फ और तरल पानी में अलग-अलग तरह से व्यवहार करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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आग पर काबू का सबसे प्राचीन सबूत

ग जलाना, उसका इस्तेमाल करना हमारी दिनचर्या में रचा-बसा है। हम शायद ध्यान भी नहीं देते कि हमने दिन में कितनी बार आग जलाई, वो भी अपनी सहूलियत के समय (use of fire) और जगह पर – खाना पकाने से लेकर सिगरेट जलाने या आग तापने तक के लिए।

ऐसा लग सकता है कि आग जलाने में कौन-सी बड़ी बात है, दियासलाई या लाइटर निकालो और लगा दो आग। लेकिन मानव इतिहास में इसका बड़ा महत्व है। किसी नैसर्गिक आग या दावानल के उपयोग से आगे बढ़कर मनुष्यों द्वारा जान-बूझकर नियंत्रित आग जलाना सीख लेना विकास में कई बड़े बदलाव ला सकता है। यह जैविक विकास (human evolution) और सामाजिक और सांस्कृतिक विकास (cultural evolution) में भी महत्वपूर्ण रहा है।

नियंत्रित आग शिकारी जानवरों से बचने, अंधेरी जगह पर उजाला करने और खाना पकाने में तो प्राचीन समय में मनुष्यों की मदद करती ही होगी। लेकिन आग जलाना सीखने से मनुष्यों को ठंडी जगहों पर बसने, रात में सक्रिय रहने और एक जगह इकट्ठा होने वगैरह में भी मदद मिली होगी। वैज्ञानिकों के लिए यह हमेशा रुचि का विषय रहा है कि मनुष्यों ने इरादतन सबसे पहले आग कब जलाई (controlled fire use)।

अब, हाल ही में इंग्लैंड में बर्नहम गांव के पास एक खुदाई स्थल ईस्ट फार्म से मिले प्रमाण इस बात का इशारा देते हैं कि निएंडरथल (Neanderthals) मनुष्यों ने करीब चार लाख साल पहले इरादतन और बार-बार आग जलाई थी। खुदाई में लाल रंग की (आग में पकी) गाद, ताप से विकृत चकमक पत्थर की कुल्हाड़ियां और आयरन पाइराइट के टुकड़े मिले (archaeological evidence) हैं जिनका इस्तेमाल आग जलाने के लिए चिंगारी पैदा करने में होता होगा।

दरअसल, ईस्ट फार्म का पुरातात्विक महत्व तकरीबन 100 साल पहले उजागर हुआ था। तभी से यहां खुदाई कार्य चालू है। पूर्व खुदाई में यहां से जो पत्थर के औज़ार मिले थे वे पुरापाषाण युग (Paleolithic period) (करीब चार लाख साल पहले) के हैं। अन्य सबूत इशारा करते हैं कि यहां संभवतः होमो हाइडलबर्गेंसिस समूह रहता होगा और इस जगह का उपयोग एक पड़ाव की तरह करता होगा। इस जगह के आसपास की कुछ पुरातात्विक जगहों से मिले सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि प्रारंभिक होमिनिन आग का इस्तेमाल करते होंगे। लेकिन यह बता पाना मुश्किल रहा कि यह आग जानबूझकर जलाई गई थी या दावानल थी। क्योंकि मनुष्य द्वारा जलाई (human-made fire) गई आग और दावानल काफी एक जैसे पुरातात्विक निशान छोड़ती हैं।

लेकिन अब शोधकर्ताओं को इस इलाके में ताप से विकृत हुई कुल्हाड़ियों और पकी हुई तलछट के साथ आयरन पाइराइट (iron pyrite) के टुकड़े मिल रहे हैं। आयरन पाइराइट आयरन डाईसल्फाइड का एक खनिज रूप है। जब इसे चकमक पत्थर से तेज़ी से रगड़ा या मारा जाता है तो चिंगारियां पैदा होती हैं, जिससे लकड़ी के बुरादे या सूखे मशरूम जैसे ज्वलनशील पदार्थों में आग लगाई जा सकती है।

प्रकृति में वैसे तो आयरन पाइराइट स्वाभाविक रूप से बन सकता है और मिलता है। ईस्ट फार्म (east farm) में भी यह नैसर्गिक रूप से मौजूद है, लेकिन सतह से सैकड़ों मीटर नीचे। अब शोधकर्ताओं को इस स्थल पर आयरन पाइराइट के टुकड़े महज चंद फीट नीचे मिल रहे हैं, वह भी चकमक कुल्हाड़ियों के साथ। इसलिए ऐसा लगता है कि इन्हें होमिनिन (hominin) द्वारा यहां लाया गया था।

इसके अलावा, शोधकर्ताओं को चूल्हे के आसपास की तलछट के भू-चुंबकत्व (earth magnetism) में बदलाव के प्रमाण मिले हैं। ये प्रमाण भी यहां बार-बार आग जलाए जाने की ओर इशारा करते हैं। शोधकर्ताओं को इस तलछट की इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी (infrared spectrometry) करने पर पता चला की तलछट को बार-बार गर्म किया गया था, कभी-कभी तो यह तलछट 1300 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक गर्म हुई होगी। इसके साथ यहां पॉलीसायक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन्स (PAH) के निशान मिले हैं जो आम तौर पर लकड़ी जलाने से बनते हैं।

उपरोक्त सभी प्रमाणों को एक साथ देखने पर ऐसा लगता है यहां जली आग प्राकृतिक आग (natural fire) नहीं थी बल्कि प्राचीन मनुष्यों ने इरादतन (human intervention) जलाई थी।

पूर्व में भी अन्य निएंडरथल स्थलों से उनके द्वारा आग जलाने के प्रमाण (ancient fire use) मिले थे, हालांकि ये प्रमाण लगभग 50,000 साल पुराने थे। और उस समय उनके आसपास होमो सेपियन्स (homo sapiens) रह रहे थे, इसलिए वैज्ञानिकों ने सोचा था कि निएंडरथल ने शायद उनसे आग जलाना सीखा होगा। लेकिन ईस्ट फार्म से मिले पुराने सबूत इससे भी साढ़े तीन लाख साल पहले के हैं। बहरहाल, नेचर में प्रकाशित इन निष्कर्षों को पुख्ता करने के लिए और अधिक अध्ययन की ज़रूरत तो है ही। कई वैज्ञानिक इस पर आगे काम करने को तैयार हैं। (स्रोत फीचर्स)

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