एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग – 1

डॉ. सुशील जोशी

थियोडोर एशरिश ने जब एशरीशिया कोली (ई. कोली)बैक्टीरिया की खोज की थी तब उन्होंने ज़रा भी नहीं सोचा था कि साधारण-सा दिखने वाला यह बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतने अहम योगदान देगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा। तीन भागों में प्रस्तुत इस लेख शृंखला में हम ई. कोली के इन योगदान और यात्रा पर बात करेंगे। तो, चलिए चलते हैं ई. कोली के सफर पर…

सन 1885 में एक जर्मन-ऑस्ट्रियन शिशुरोग विशेषज्ञ, थियोडोर एशरिश (Theodor Escherich) ने नवजात बच्चों की आंतों में से कुछ बैक्टीरिया प्राप्त किए थे। ये बैक्टीरिया ग्राम नेगेटिव थे, थोड़ी चहलकदमी करते थे और सबसे बड़ी बात थी कि ये कई उपलब्ध कृत्रिम पोषक माध्यमों पर भलीभांति वृद्धि करते थे। एशरिश ने इन्हें नाम दिया था बैक्टीरियम कोली कम्यून (Bacterium coli commune)। आगे चलकर 1919 में इसे खोजकर्ता के नाम पर एशरीशिया कोली (Escherichia coli – ई. कोली) नाम मिला।

खोजकर्ता को तनिक भी आभास नहीं था कि सूक्ष्मदर्शी में यह साधारण-सा दिखने वाला बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतना नाम कमाएगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा।

नेचर में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे के अनुसार ई. कोली कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है। इसी बैक्टीरिया पर अनुसंधान के लिए 12 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं (अनुसंधान और नोबेल पुरस्कारों की जानकारी अगले पन्ने पर)।

फिर 1907 में रुडोल्फ मैसिनी (Rudolf Massini) ने एक सूक्ष्मजीव का विवरण प्रस्तुत किया – बैक्टीरियम कोली म्यूटेबाइल (Bacterium coli mutabile)। इसे Escherichia coli-mutabile भी कहते हैं और यह ई. कोली का एक उत्परिवर्तित संस्करण है। मैसिनी ने जब इसे प्राप्त किया तो शुरुआत में यह लैक्टोस पाचन में अक्षम (लैक्टोस नेगेटिव) था, लेकिन आगे चलकर इसमें कुछ उभार विकसित हो गए जो लैक्टोस का किण्वन कर सकते थे। यह खोज थी जिसने ई. कोली  पर आगे अध्ययन की प्रेरणा दी जिनकी बदौलत आणविक जीव विज्ञान का सूत्रपात हुआ।

1940 के दशक में एम. डेलब्रुक (M. Delbrück) और एस. ई. लूरिया (S. E. Luria) ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज या फेज) पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन स्वत: स्फूर्त होते हैं। हर्शे (A. D. Hershey) और चेज़ (M. Chase) यह भी दिखा पाए कि वायरस का जो हिस्सा बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, वह प्रोटीन नहीं बल्कि डीएनए होता है।

ग्राम और ग्राम नेगेटिवग्राम अभिरंजन (staining) की एक विधि है, जिसका विकास हांस क्रिश्चियन ग्राम नाम के वैज्ञानिक ने 1884 में किया था। ग्राम नेगेटिव का मतलब होता है कि ये बैक्टीरिया इस विधि से अभिरंजित नहीं होते। 

लगभग इसी समय एस. बेंज़र (Seymour Benzer) ने आनुवंशिकी की कामकाजी इकाई को परिभाषित किया और जे. लेडरबर्ड (J. Lederberg) और ई. टेटम (E. Tatum) ने

यह खोज की कि बैक्टीरिया में लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। कुछ वर्षों के बाद लेडरबर्ग ने गुणसूत्रों के बाहर कुछ जेनेटिक कणों (DNA fragments) की खोज की और बैक्टीरियोफेज के ज़रिए जेनेटिक हस्तांतरण का तरीका खोजा। इसे ट्रांसडक्शन कहते हैं।

1949 में पैरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में ए. ल्वॉफ (A. Lwoff) ने लायसोजेनी की विधि का खुलासा किया। (लायसोजेनी वह प्रक्रिया होती है जिसमें कोई वायरस अपना जीनोम संक्रमित बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़ देता है।) इसके बाद जल्दी ही एफ. जेकब (F. Jacob) और ई. वोलमैन (E. Wollman) ने ई. कोली

की लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्रों की वृत्ताकार संरचना को स्थापित किया।

फिर 1960 के दशक में जे. मोनोड (J. Monod) और एफ. जेकब ने ई. कोली के लैक्टोस तंत्र का विश्लेषण करके जीन नियमन का ऑपेरॉन मॉडल प्रस्तावित किया और मेसेंजर आरएनए (messenger RNA) की अवधारणा प्रस्तुत की।

आगे चलकर ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरसों की मदद से पुनर्संयोजित डीएनए (recombinant DNA) तकनीक का विकास हुआ।

ये थे ई. कोली पर हुए अनुसंधानों के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव। लेख के अगले भाग में हम चलेंगे आणविक जीव विज्ञान के एक लंबे सफर पर। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

Photo credit- https://en.wikipedia.org/wiki/Escherichia_coli

एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग 2 – अनुसंधान

डॉ. सुशील जोशी

लेख के इस भाग में हम ई. कोली की खूबियों और उस पर हुए अनुसंधानों के बारे में विस्तार से बात करेंगें।

मॉडल जीव के रूप में खूबियां

एशरीशिया कोली छड़ आकार का बैक्टीरिया है जो लगभग 2 से 5 माइक्रोमीटर लंबा और 0.5 से 1 माइक्रोमीटर चौड़ा होता है। यह इतना बड़ा होता है कि प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन किया जा सके। एक मॉडल जीव के रूप में ई. कोली में कई विशेषताएं हैं। यह तेज़ी से संख्या-वृद्धि करता है, इसमें जेनेटिक फेरबदल के लिए कई आणविक तकनीकें हैं। एक खास बात यह है कि ई. कोली प्रमुखत: अलैंगिक रूप से अपनी प्रतिलिपियां बनाता है – अर्थात किसी एक बैक्टीरिया के जीनोम में किए गए परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं और इनके असर का अध्ययन लगातार किया जा सकता है।

इन्हीं सब खूबियों के चलते ई. कोली का उपयोग करके आणविक जीव विज्ञान और आणविक आनुवांशिकी के क्षेत्र में कई प्रमुख खोजें की गई हैं। इनमें जेनेटिक कोड को समझना, डीएनए के प्रतिलिपिकरण की प्रक्रिया की समझ, जीन नियमन की ऑपेरॉन प्रणाली की खोज, और जेनेटिक रूप से परिवर्तित जीव बनाना शामिल हैं।

ई. कोली का जीनोम

ई. कोली के कई स्ट्रेन (प्रभेद) होते हैं जो आनुवंशिक रूप से थोड़े-थोड़े भिन्न समूह के द्योतक हैं। इनकी रोगजनक क्षमता अलग-अलग होती है। कुछ स्ट्रेन हैं जो गंभीर संक्रमण पैदा करते हैं – जैसे O157:H7 स्ट्रेन। जबकि कुछ अन्य स्ट्रेन रोगजनक नहीं होते। उनकी यह विविधता उनके जीनोम में नज़र आती है। प्रयोगों से पता चला है कि ई. कोली के K-12 स्ट्रेन (जिसे प्रयोगशाला में पाला जाता है और रोगजनक नहीं है) और O157:H7 तथा CFT073 स्ट्रेन (ये दोनों स्ट्रेन रोगजनक हैं) के जीनोम्स के बीच मात्र 39 प्रतिशत समानता है।

ई. कोली के सारे स्ट्रेन्स के जीनोम में कुल मिलाकर 16,000 जीन्स होते हैं जिसे पैन-जीनोम (pan-genome) कहते हैं लेकिन इस पैन-जीनोम का एक अंश ही किसी स्ट्रेन विशेष में पाया जाता है – लगभग 20 प्रतिशत। यानी शेष 80 प्रतिशत जीनोम परिवर्तनशील होता है। ये जीन्स बाहर से हासिल किए जा सकते हैं और ये ई. कोली को चयापचय में काफी लचीलापन देते हैं। परिवर्तनशील जीनोम में नए-नए घटक शामिल करने की इस खूबी के चलते ई. कोली एक बढ़िया मॉडल बन सका है। 1997 में ई. कोली उन पहले-पहले जीवों में से था जिनके पूरे जीनोम के डीएनए अनुक्रम का खुलासा हो गया था।

फेज ग्रुप

आणविक जीव विज्ञान के विकास की शुरुआत मैक्स डेलब्रुक (Max Delbrück) और साल्वेडोर ई. लुरिया (Salvador E. Luria) द्वारा 1940 में ‘फेज ग्रुप’ के गठन के साथ मानी जा सकती है, जिसमें आगे चलकर अल्फ्रेड डी. हर्शे (Alfred D. Hershey) भी जुड़ गए थे। इसी के साथ ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरस (बैक्टीरियोफेज) आणविक जीव विज्ञान अध्ययन की बुनियादी सामग्री बन गए।

मज़ेदार बात यह है कि डेलब्रुक एक क्वांटम भौतिक शास्त्री थे। वे जर्मनी से यू.एस. पहुंचे थे और एमरी हिल्स के साथ बैक्टीरियोफेज पर काम करने लगे थे। 1939 में इन दोनों ने मिलकर बैक्टीरियोफेज (फेज) की संख्या वृद्धि का एक संख्यात्मक पर्चा प्रस्तुत किया था। दूसरी ओर, लुरिया एक इतालवी डॉक्टर थे और वे भी यू.एस. पहुंचकर डेलब्रुक के साथ काम करने लगे।

ई. कोली से प्रमुख खोजें

बैक्टीरिया में वायरस प्रतिरोध

डेलब्रुक और लुरिया ने बैक्टीरिया में वायरस-प्रतिरोध पर काम करना तय किया। वे जानना चाहते थे कि बैक्टीरिया में वायरस के विरुद्ध प्रतिरोध क्या बेतरतीब उत्परिवर्तनों में से चयन के ज़रिए होता है या क्या यह वायरस से संपर्क से जनित अनुकूलन का परिणाम होता है। इसके लिए उन्होंने ई. कोली-बी  स्ट्रेन पर प्रयोग किए। उन्होंने कुछ बैक्टीरिया को अलग-अलग संवर्धन नलिका (कल्चर ट्यूब) में पनपाया। कुछ समय बाद इन अलग-अलग कल्चर्स में से बराबर-बराबर आयतन लिए और उन्हें टी-1 नामक फेज से युक्त पैट्रीप्लेट्स में डाल दिया। यह माना गया था कि यदि वायरस के खिलाफ प्रतिरोध संपर्क के बाद पैदा होता है तो सारी प्लेट्स में लगभग बराबर-बराबर प्रतिरोधी बैक्टीरिया मिलने चाहिए। प्रयोग में देखा गया कि विभिन्न प्लेट्स में प्रतिरोधी बैक्टीरिया की औसत संख्या में बहुत अंतर हैं। निष्कर्ष यह था कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध बेतरतीब उत्परिवर्तनों की वजह से पैदा होता है और यह वायरस की उपस्थिति से स्वतंत्र है। इस प्रयोग को आधुनिक बैक्टीरियल जेनेटिक्स की शुरुआत माना जाता है। इस प्रयोग में उत्परिवर्तन की दर का निर्धारण भी किया जा सका था।

जैव विकास का लंबा प्रयोग

रिचर्ड लेंस्की (Richard Lenski) ने 1988 में ई. कोली के साथ जैव विकास का एक प्रयोग शुरू किया था। इस प्रयोग में उन्होंने ई. कोली की 12 समांतर आबादियों की 80,000 पीढ़ियों का अवलोकन किया था। इस प्रयोग में ई. कोली की 12 अलग-अलग आबादियों को ग्लूकोज़-सीमित पोषक माध्यम में पनपने दिया गया था और ग्लूकोज़ की सांद्रता प्रतिदिन कम-ज़्यादा की जाती थी। हर 500वीं पीढ़ी के बाद बैक्टीरिया के नमूने शून्य से 80 डिग्री नीचे तापमान पर फ्रीज़ कर दिए जाते थे ताकि बाद में प्रत्येक पीढ़ी की तुलना उससे पहले वाली पीढ़ी से की जा सके।

प्रयोग से पता चला कि बैक्टीरिया तेज़ी से अपनी फिटनेस (वृद्धि दर) में सुधार करते हैं लेकिन समय के साथ सुधार की दर घटती जाती है। लगभग 30,000 पीढ़ियों (करीब 15 वर्ष) के बाद एक आबादी में साइट्रेट को ऑक्सीजनयुक्त पर्यावरण में पचाने की क्षमता आ गई थी।

बैक्टीरिया जीन्स का पुनर्संयोजन

इसी दौरान हर्शे भी इस ‘फेज ग्रुप’ में शामिल हो गए। वे पहले ही ई. कोली को संक्रमित करने वाले वायरसों पर शोध कर दर्शा चुके थे कि जब एक ही कोशिका में एक से अधिक वायरस हों, तो उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हो जाता है। इसके लिए उन्होंने एक ही ई. कोली कोशिका को वायरस के दो प्रभेदों से संक्रमित किया। इनसे जो वायरस संतति प्राप्त हुई उनमें मूल वायरस जैसी जेनेटिक संरचना वाले वायरस तो थे ही, साथ में कुछ ऐसे वायरस भी थे जिनमें जीन्स का लेन-देन हो चुका था।

आनुवंशिकी पदार्थ की पहचान

बहरहाल, हर्शे को शोहरत मिली मार्था चेज़ (Martha Chase) के साथ किए गए प्रयोगों से। हर्शे और चेज़ ने टी-2 फेज के डीएनए को रेडियोसक्रिय फॉस्फेट (32P) से चिन्हित कर दिया, और उन्हें ई. कोली कोशिकाओं को संक्रमित करने दिया। गौरतलब है कि फॉस्फोरस डीएनए में ही पाया जाता है, प्रोटीन में नहीं। इन संक्रमित कोशिकाओं से फेज का प्रोटीन आवरण हटा दिया और फिर संक्रमित कोशिकाओं तथा वायरस के आवरणों को अलग-अलग कर लिया। देखा गया कि रेडियोसक्रियता सिर्फ नीचे बैठी बैक्टीरिया कोशिकाओं में थी जबकि ऊपर के द्रव (जिसमें प्रोटीन आवरण थे) में नहीं थी। यानी डीएनए ही बैक्टीरिया कोशिका में प्रवेश कर गया था।

इसी तरह के एक अन्य प्रयोग में उन्होंने फेज को रेडियोसक्रिय सल्फेट से चिन्हित कर दिया, चूंकि सल्फर प्रोटीन में पाया जाता है, डीएनए में नहीं। अलग-अलग करने पर रोडियोसक्रियता सिर्फ प्रोटीन आवरण में मिली, संक्रमित बैक्टीरिया में नहीं।

इन परिणामों से हर्शे और चेज़ ने निष्कर्ष निकाला कि आनुवंशिक पदार्थ डीएनए है, प्रोटीन नहीं। यह प्रयोग आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आनुवंशिक जानकारी का वहन डीएनए करता है, प्रोटीन नहीं।

डेलब्रुक, लुरिया और चेज़ को प्रतिलिपिकरण तथा वायरस की जेनेटिक संरचना सम्बंधी खोजों के लिए 1969 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

इसके बाद ग्रुप ने तय किया कि वे कई अन्य टी-फेज पर काम करेंगे जो ई. कोली के बी स्ट्रेन के विरुद्ध सक्रिय होते हैं। इनमें से एक फेज (टी-4) का शानदार उपयोग सीमोर बेंज़र (Seymour Benzer) ने किया। यहां बताना लाज़मी है कि बेंज़र ने अपना करियर एक सॉलिड स्टेट भौतिक शास्त्री के रूप में शुरू किया था लेकिन इर्विन श्रोडिंगर (Erwin Schrodinger) की प्रभावशाली पुस्तक व्हाट इज़ लाइफ? (What Is Life?) से प्रभावित होकर वे टी-4 के एक खास प्रकार (rII) की ओर मुड़ गए। प्रयोगों से उन्होंने साबित किया कि न्यूक्लियोटाइड्स की एक न्यूनतम लंबाई ही जेनेटिक इकाई होती है, जिसे उन्होंने सिस्ट्रॉन नाम दिया था।

जेनेटिक लेन–देन

द्वितीय विश्व युद्ध की रुकावट के बाद शोध परिणामों का आदान-प्रदान फिर शुरू हुआ। एक तो डेलब्रुक और हर्शे ने फेज वायरसों में जेनेटिक पुनर्संयोजन की अपनी खोज प्रस्तुत की और इसी के साथ जोशुआ लेडरबर्ग ने ई. कोली (स्ट्रेन के-12) पर अपने प्रयोगों के आधार पर दर्शाया कि बैक्टीरिया के बीच लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। आगे बैक्टीरियल जेनेटिक्स पर लगभग सारा अनुसंधान इसी स्ट्रेन पर हुआ। यह खोज इस मायने में महत्वपूर्ण थी कि इससे पता चला था बैक्टीरिया में परस्पर जेनेटिक सूचना का लेन-देन हो सकता है जो उन्हें नए गुणधर्म प्रदान कर सकता है। यह खोज बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध के तेज़ी से प्रसार को समझने में मददगार है।

लेडरबर्ग ने ही गुणसूत्र के बाहर जेनेटिक कणों (प्लास्मिड) की खोज की थी। यह खोज उन्होंने अपनी पत्नी एस्थर मिरियम लेडरबर्ग, एन.डी. ज़िन्डर और एम.एल. मोर्स के साथ की थी। इसके बाद उन्होंने बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक लेन-देन की एक नवीन विधि की खोज की थी जो बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज) के ज़रिए संपन्न होती है। यह खोज आगे चलकर जेनेटिक पुनर्संयोजन का आधार बनी।

जेनेटिक पुनर्संयोजन/हस्तांतरण

लेडरबर्ग और टैटम ने काफी परिष्कृत प्रयोगों की मदद से ई. कोली में जेनेटिक हस्तांतरण की खोज की थी (1946)। पुनर्संयोजन सम्बंधी प्रयोगों के लिए लेडरबर्ग ने टेटम द्वारा विकसित पोषण बाधित दोहरे उत्परिवर्तियों का उपयोग किया था। अलबत्ता, उस समय वे नहीं जानते थे कि यह ई. कोली स्ट्रेन (k-12) उन बिरले स्ट्रेन्स में से है जिनमें एफ-प्लास्मिड पाया जाता है। एफ-प्लास्मिड को फर्टिलिटी फैक्टर भी कहते हैं और यह बैक्टीरिया के संयुग्मन में भूमिका निभाता है। प्लास्मिड की खोज का श्रेय भी ई. कोली की मदद से लेडरबर्ग को ही जाता है। उनके समूह ने यह भी बताया था कि प्लास्मिड ही नर व मादा बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक गुणधर्मों के हस्तांतरण का साधन होता है। आम तौर पर यह जानकारी है कि कोशिकाओं में जेनेटिक जानकारी गुणसूत्रों में सहेजी होती है। लेडरबर्ग व अन्य ने स्पष्ट किया था कि बैक्टीरिया व कुछ अन्य जीवों में गुणसूत्र से अलग जेनेटिक सामग्री वृत्ताकार अणुओं के रूप में पाई जाती है, जिन्हें प्लास्मिड कहते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्रयोग के लिए ई. कोली के ऐसे स्ट्रेन्स चुने थे जो उत्परिवर्तनों के कारण कतिपय ज़रूरी वृद्धि कारक बनाने में अक्षम थे। इन दोनों स्ट्रेन्स को एक ऐसे माध्यम में रखा गया जिसमें बैक्टीरिया वृद्धि के कुछ विशिष्ट पोषक तत्व नहीं थे। यानी ये दोनों ही अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी के कारण उस माध्यम में नहीं पनप सकते थे।

तर्क था कि यदि ये स्ट्रेन्स जेनेटिक पदार्थों का लेन-देन नहीं करेंगें, तो दोनों ही पनप नहीं पाएंगे। लेकिन यदि जेनेटिक पदार्थ का लेन-देन हो जाता है तो दोनों स्ट्रेन्स में से कुछ बैक्टीरिया तो पनपेंगे। इस माध्यम को बैक्टीरिया वृद्धि के लिए सही तापमान वगैरह दिया, कुछ समय बाद देखा गया कि इस अभावग्रस्त माध्यम में भी बैक्टीरिया की कुछ कॉलोनियां विकसित हो गईं। यानी कुछ बैक्टीरिया ने दूसरे स्ट्रेन से जेनेटिक सामग्री प्राप्त कर ली थी। अर्थात उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हुआ था।

लेकिन इस प्रयोग से यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि क्या इस तरह के लेन-देन के लिए बैक्टीरिया का संपर्क में आना ज़रूरी है। वह प्रमाण बर्नार्ड डेविस ने एक सुंदर प्रयोग से मिला।

बर्नार्ड डेविस का U-tube प्रयोग

उन्होंने एक U आकार की नली ली जिसमें पेंदे पर एक फिल्टर लगा था। फिल्टर ऐसा था कि उसमें से पोषक माध्यम के पदार्थ तो आ-जा सकते थे लेकिन बैक्टीरिया की कोशिकाएं नहीं। दोनों तरफ की नलियों में संवर्धन माध्यम भर दिया गया और दोनों तरफ अलग-अलग स्ट्रेन के बैक्टीरिया (जिनकी पोषक तत्वों की ज़रूरतें अलग-अलग थीं) डाले गए। एक पंप की मदद से नली के एक हिस्से से दूसरे में लगातार पोषक माध्यम की आवाजाही चलती रही।

कुछ समय बाद जब इन बैक्टीरिया को एक पेट्रीप्लेट में डाला गया, जहां ऐसा पोषक माध्यम था जिसमें किसी विशेष पोषक पदार्थ की कमी थी, ऐसी स्थिति में एक भी कॉलोनी विकसित नहीं हुई। यानी जेनेटिक लेन-देन नहीं हुआ था। इस प्रयोग के आधार पर डेविस यह दिखा पाए कि जेनेटिक लेन-देन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं का सीधे संपर्क ज़रूरी है।

इस खोज का बैक्टीरियल जेनेटिक्स में तो खासा असर रहा ही, इसने आगे चलकर क्षैतिज जेनेटिक स्थानांतरण (horizontal genetic transfer) को समझने का रास्ता भी खोला। यानी बैक्टीरिया आपस में जेनेटिक सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि जेनेटिक सूचनाओं में फेरबदल मात्र लैंगिक प्रजनन या उत्परिवर्तनों के द्वारा नहीं होता।

लेडरबर्ग ने ई. कोली पर प्रयोगों के आधार पर बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक हस्तांतरण की एक नवीन विधि भी खोजी थी, जो बैक्टीरियोफेज के मार्फत होती है। इसे उन्होंने ट्रांसडक्शन की संज्ञा दी थी। 1958 में लेडरबर्ग, जॉर्ज बीडल और ई. टेटम को संयुक्त रूप से नोबेल से सम्मानित किया गया था। लेडरबर्ग को यह पुरस्कार बैक्टीरिया में जेनेटिक सामग्री के संगठन तथा पुनर्संयोजन सम्बंधी खोज के लिए दिया गया था, जो ई. कोली पर हुए प्रयोगों से संभव हुई थीं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

(जारी…)

एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग 3 – अनुसंधान

डॉ. सुशील जोशी  

लेख के इस भाग में हम कुछ और महत्वपूर्ण अनुसंधानों पर बात करेंगे।

ट्रांसडक्शन

दरअसल, बैक्टीरिया में जेनेटिक फेरबदल की दो विधियां तो ज्ञात थीं – एक थी उत्परिवर्तन (mutation) यानी बैक्टीरिया की जेनेटिक संरचना में स्वतः परिवर्तन और दूसरी थी संयुग्मन (conjugation)। लेडरबर्ग और ज़िंडर ने एक तीसरी विधि की खोज की थी। इसकी खोज उन्होंने साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के एक प्रतिरोधी स्ट्रेन के साथ प्रयोग करके की थी।

वे देखना चाहते थे कि क्या उनके प्रयोग वास्तव में जेनेटिक पुनर्संयोजन को दर्शाते हैं। उन्होंने एक U आकार की नली लेकर उसके निचले मोड़ पर एक अत्यंत महीन कांच का फिल्टर फिट कर दिया। इसमें उन्होंने एक पोषक माध्यम भर दिया जिसमें उनके द्वारा चुने गए साल्मोनेला उत्परिवर्तित रूपों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व नहीं थे।

फिर उन्होंने एक-एक उत्परिवर्ती स्ट्रेन को नली की दोनों भुजाओं में डाल दिया और माध्यम को एक पंप की मदद से दोनों तरफ बहाते रहे। उम्मीद थी कि कोई पुनर्संयोजन नहीं होगा क्योंकि बर्नार्ड डेविस ऐसे ही एक प्रयोग में दर्शा चुके थे कि पुनर्संयोजन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं के बीच सीधे संपर्क ज़रूरी है।

लेकिन आश्चर्जनक रूप से, कई बैक्टीरिया पनपे और संख्यावृद्धि भी करते दिखे। यानी पुनर्संयोजन हुआ था। और इसने दोनों उत्परिवर्तियों को अपनी-अपनी पोषण की कमी की भरपाई करने में मदद की थी।

इसका मतलब था कि ऐसा कोई एजेंट था जो उस महीन फिल्टर में से आ-जा सकता था। जब उन्होंने उस एजेंट का शुद्धिकरण किया तो पाया कि वह न तो शुद्ध डीएनए से बना था और न ही आरएनए से क्योंकि इन्हें तोड़ने वाले एंज़ाइम का उस पर कोई असर नहीं हुआ। दरअसल, यह एजेंट एक बैक्टीरियोफेज निकला।

हुआ यह था कि लेडरबर्ग और ज़िंडर ने जिस साल्मोनेला का उपयोग किया था वह काफी पहले एक लायसोजेनिक वायरस से संक्रमित था, जिसका डीएनए साल्मोनेला के जीनोम में जुड़ गया था और बैक्टीरिया के प्रजनन के साथ वायरस डीएनए की प्रतिलिपियां भी आगे बढ़ती गई थीं। प्रयोग के दौरान वह वायरस डीएनए से अलग हो गया, खुद की प्रतिलिपियां बनाने लगा और फिर बैक्टीरिया कोशिका फट गई और वायरस बाहर रखे माध्यम में जा पहुंचा। बैक्टीरिया जीनोम से अलग होने से पहले वह वायरस अपने साथ बैक्टीरिया के डीएनए के कुछ खंड भी लेता गया। फिल्टर वायरसों की आवाजाही के लिए ठीक था। तो वायरसों के साथ बैक्टीरिया के जीन्स भी नली की दूसरी भुजा में पहुंचे, वहां उन्होंने उस भुजा के बैक्टीरिया को संक्रमित किया और उनके जीनोम्स में फिट हो गए। लेडरबर्ग और ज़िंडर का निष्कर्ष था कि नए-नए संक्रमित बैक्टीरिया में वे जीन पहुंच गए जो उनके पोषण सम्बंधी अभाव की भरपाई करते थे।

यहां यह स्पष्ट कर देना लाज़मी है कि वायरस किसी बैक्टीरिया को संक्रमित करने के बाद दो रास्ते अपना सकता है – लायसोजेनिक और लायसिस। लायसोजेनिक मार्ग में होता यह है कि वायरस अपना पूरा जीनोम बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़कर सुप्त हो जाता है। फिर बैक्टीरिया की कोशिका के विभाजन के साथ वायरस के जीनोम की भी प्रतिलिपि बनती रहती है। मौका आने पर वायरस का जीनोम अलग होकर स्वयं की प्रतिलिपियां बनाने लगता है (यानी नए वायरस बनने लगते हैं) जो बैक्टीरिया कोशिका को फोड़कर बाहर निकल आते हैं। लायसिस की प्रक्रिया में वायरस संक्रमण के तत्काल बाद अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और कोशिका के विनाश कारण बन जाता है। कतिपय तनाव की परिस्थितियों में (जैसे पराबैंगनी विकिरण) वायरस का जीनोम मेज़बान के गुणसूत्र से अलग होकर अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और मेज़बान कोशिका को फोड़कर सारे वायरस बाहर निकल जाते हैं। लायसोजेनी की क्रियाविधि का खुलासा आंद्रे ल्वॉफ ने ई. कोली पर काम करते हुए किया था।

यह सही हैं कि ट्रांसडक्शन प्रक्रिया की खोज साल्मोनेला में हुई, लेकिन इसे मनचाहा जीन हस्तांतरण की विधि के रूप ई. कोली में ही विकसित किया गया।

ट्रांसडक्शन की खोज और आगे का विकास बुनियादी महत्व का साबित हुआ। एक तो इससे स्पष्ट हुआ कि प्रोकेरियोट्स (जिनमें एक सुपरिभाषित केंद्रक नहीं होता) में ज़रूरी नहीं कि दो जीवों की पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का पुनर्संयोजन हो। उनमें आपस में डीएनए के छोटे-छोटे खंड का लेन-देन भी होता है। दूसरी ओर केंद्रक युक्त (यूकेरियोट्स) कोशिकाओं में पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का मिलन ज़रूरी होता है। प्रोकेरियोट्स और यूकेरियोट्स के बीच विभेद का यह मापदंड आणविक जीव विज्ञान की एक बुनियादी अवधारणा है।

बहरहाल, ट्रांसडक्शन ने चिकित्सा और जैव-टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में भी भारी योगदान दिया है। इसने बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के त्वरित प्रसार की एक नई प्रक्रिया का खुलासा किया।

ट्रांसडक्शन जेनेटिक इंजीनियरिंग में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। इसकी मदद से जीन्स का हस्तांतरण करवाया जा सकता है। 1970 के दशक में वैज्ञानिक डीएनए के मनचाहे खंडों को बैक्टीरियोफेज में जोड़कर उसे किसी अन्य बैक्टीरिया में पहुंचाना सीख गए थे। फिर 1990 के दशक में किसी वायरस-वाही की मदद से किसी गड़बड़ जीन के स्थान पर स्वस्थ जीन पहुंचाना जीन थेरपी का आधार बना।

मनचाहे रसायनों का उत्पादन

ट्रांसडक्शन ने ई. कोली के जीनोम में फेरबदल करने की तकनीक उपलब्ध कराई। लिहाज़ा, ई. कोली के जीनोम में परिवर्तन करके उससे मनचाहे रसायन बनवाए जा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, फिनाइलप्रोपेनॉइड यौगिकों को लेते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड समूह के पदार्थ पौधों को विभिन्न तरह से सुरक्षा प्रदान करते हैं। जैसे पौधों की कोशिका भित्ती को दृढ़ता प्रदान करने वाला लिग्निन फिनाइलप्रोपेनॉइड से बनता है। ये पदार्थ पौधों को सूक्ष्मजीवों और पराबैंगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। फूलों व फलों को रंगत देने वाले फ्लेवोनॉइड तथा एंथोसायनीन भी फिनाइलप्रोपेनॉइड से ही बनते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड्स खाद्य परिरक्षण व पैकेजिंग, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन तथा जैव ईंधन जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण हैं।

कोशिश यह है कि फिनाइलप्रोपेनॉइड्स का उत्पादन ई. कोली से करवाया जाए। इसके लिए पौधों के फिनाइलप्रोपेनॉइड बनाने वाले जीन्स को ई. कोली  के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ई. कोली ऐसे पदार्थों को सहन नहीं कर सकता। इसलिए ज़रूरी है कि ई. कोली से फिनाइलप्रोपेनॉइड्स बनवाने के लिए पौधों से इन पदार्थों के निर्माण व सहिष्णुता के जीन्स भी बैक्टीरिया में जोड़े जाएं। और कुछ मामलों में यह सफलतापूर्वक किया भी गया है।

एक महत्वपूर्ण तकनीक

ई. कोली पर काम करते हुए लेडरबर्ग और एस्थर ने रेप्लिका प्लेटिंग नामक एक तकनीक का विकास किया जो बैक्टीरिया की छंटाई की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। इसका उपयोग करके यह पता लगाया जा सकता था कि कौन-से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के या संक्रामक वायरस के प्रतिरोधी हैं। इसमें किया यह जाता है कि एक तश्तरी (मास्टर प्लेट) में बैक्टीरिया कॉलोनियों को पनपने दिया जाता है। फिर इस तश्तरी से इन बैक्टीरियल कॉलोनी की छाप को एक अन्य बैक्टीरियाविहीन तश्तरी पर आरोपित कर दिया जाता है। यह मास्टर तश्तरी की प्रतिकृति होती है। इसके बाद एंटीबायोटिक या संक्रामक वायरस को उस दूसरी तश्तरी पर छिड़का जाता है। तब सिर्फ वही कॉलोनी विकसित होंगी जो प्रतिरोधी है। इस तरह से मास्टर तश्तरी पर प्रतिरोधी कॉलोनियों की स्थिति पता चल जाती है।

रेप्लिका प्लेटिंग के प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध उत्परिवर्तनों का परिणाम है, न कि चयनकारी वातावरण के प्रति किसी अनुकूलन का।

जीन नियमन

जीन नियमन का अध्ययन पेरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में शुरू हुआ था। जीन नियमन के विकास में तीन लोगों का योगदान प्रमुख रहा – आंद्रे ल्वॉफ, जेकेस मोनोड और फ्रांस्वा जेकब। यहां बताया जा सकता है कि ये तीनों ही नाज़ी अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष में गहराई से जुड़े थे।

1941 में जैकेस मोनोड ने ई. कोली तथा बैसिलस सब्टिलिस पर काम करते हुए डाइऑक्सी (Diauxie) की खोज की थी। डाइऑक्सिक प्रयोग (Diauxic experiment) एक ऐसा प्रयोग है जिसमें एक जीव को दो अलग-अलग शर्कराओं (जैसे ग्लूकोज़ और लैक्टोज़) के मिश्रण वाले माध्यम में पनपाया जाता है। इस प्रयोग में, जीव पहले एक शर्करा (प्राय: ग्लूकोज़) का उपयोग करता है। इस दौरान, जीव तेज़ी से बढ़ता है। जब ग्लूकोज़ समाप्त हो जाता है, तो जीव को लैक्टोज़ का उपयोग करने के लिए अनुकूलित होने में कुछ समय लगता है। इस दौरान, जीव की वृद्धि धीमी हो जाती है। इसके बाद जीव लैक्टोज़ का उपयोग करना शुरू कर देता है। वृद्धि का यह दूसरा चरण पहले चरण की तुलना में धीमा होता है।

यह प्रयोग जीवों द्वारा शर्करा के चयापचय और एंज़ाइम संश्लेषण की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है और जीन नियमन के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह प्रयोग विभिन्न प्रकार के जीवों में चयापचय अनुकूलन का अध्ययन करने के लिए भी उपयोगी है। मोनोड ने इसे एंज़ाइम अवरोध या एंज़ाइमों के दमन का परिणाम बताया। मोनोड की प्रारंभिक व्याख्या इस विचार पर केंद्रित थी कि लैक्टोज़ चयापचय के लिए आवश्यक एंज़ाइम ग्लूकोज़ की उपस्थिति में बाधित या दबा दिए जाते हैं।  

मोनोड ने आगे बढ़कर ई. कोली में लैक्टोज़ तंत्र का जेनेटिक विश्लेषण किया। उन्होंने स्थापित किया कि ई. कोली में बीटा-गैलेक्टोसाइडेज़ एंज़ाइम का संश्लेषण तीन जीन्स पर निर्भर होता है। इसके उत्पादन को विशिष्ट उद्दीपनों पर शुरू करवाया जाता है। ऐसा एक उद्दीपन होता है लैक्टोज़ की उपस्थिति।

कई सारे प्रयोगों के बाद जेकब और मोनोड ने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था।

जीन नियमन का मॉडल

जेकब और मोनोड ने ई. कोली मॉडल में जीन नियमन की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया था। इसी दौरान उन्होंने संदेशवाहक यानी मेसेंजर आरएनए (एम-आऱएनए) की खोज की थी। एम-आरएनए ही डीएनए पर उपस्थित जेनेटिक सूचना को राइबोसोम तक ले जाने का काम करता है। इसके बाद उन्होंने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था। इस मॉडल के अनुसार किसी एक प्रक्रिया के लिए ज़िम्मेदार जीन्स ऑपेरॉन नामक समूह में एकीकृत होते हैं। यह भी कहा गया था कि एक ही एम-आरएनए एकाधिक सम्बंधित प्रोटीन्स का वाहक हो सकता है। इस मॉडल से यह समझने में मदद मिली कि कोशिका में विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में प्रोटीन उत्पादन का समन्वय कैसे किया जाता है। जेकब और मोनोड ने ई. कोली में लैक ऑपेरॉन (lac operon) के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया था।

यह ऑपेरॉन ई. कोली में लैक्टोज़ नामक शर्करा के पाचन के लिए ज़रूरी एंज़ाइम के निर्माण का नियमन करता है। जेकब और मोनोड यह दर्शाने में सफल रहे थे कि इस ऑपेरॉन की अभिव्यक्ति एक दमनकारी (repressor) जीन से संचालित होती है जो लैक्टोज़ की अनुपस्थिति में डीएनए के एक हिस्से से जुड़ जाता है और उसकी अभिव्यक्ति को बाधित कर देता है। जब लैक्टोज़ उपस्थित होता है तो वह (लैक्टोज़) जाकर इस दमनकारी जीन से जुड़कर उसकी क्रिया को रोक देता है और डीएनए से एम-आरएनए का निर्माण (प्रतिलेखन) शुरू हो जाता है। इस मॉडल ने न सिर्फ एम-आरएनए की उपस्थिति प्रमाणित की बल्कि यह जटिल जीवों में जीन नियमन को समझने का मॉडल बना।

इस पूरी प्रक्रिया को कदम-दर-कदम समझने और एक संपूर्ण चित्र तैयार करने में कई वैज्ञानिकों, कई सूक्ष्म जीवों की भूमिका रही है, जिनमें ई. कोली ने भी हाथ बंटाया है। और जीन नियमन की प्रक्रिया का खुलासा करने के लिए जेकब और मोनोड (साथ में आंद्रे ल्वॉफ) को 1965 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

डीएनए से प्रोटीन का सफर

वैज्ञानिकों के शोध कार्य से यह तो स्पष्ट हो गया था कि डीएनए में न्यूक्लियोटाइड के क्रम से ही यह तय होता है कि कौन-से प्रोटीन बनेंगे। लेकिन यह प्रक्रिया कैसे काम करती है, इसे लेकर कई सारे विचार थे।

एक विचार यह था कि डीएनए के अणु पर ही प्रोटीन का संश्लेषण होता है (जॉर्ज गैमोव)। दूसरी ओर, यह विचार भी था कि प्रोटीन का संश्लेषण डीएनए के अणु पर नहीं बल्कि कोशिका द्रव्य में होता है और इसके लिए आरएनए की ज़रूरत होती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि यह प्रक्रिया होती कैसे है और इसमें आरएनए की क्या भूमिका है?

फिर 1940 के दशक में ज़्यां ब्रेश और टॉरब्योर्न कैस्परसन (Jean Brachet, Torbjörn Caspersson) ने ई. कोली व अन्य जीवों पर काम करके बताया कि आरएनए ज़्यादातर कोशिका द्रव्य में पाया जाता है और जिस कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण तेज़ गति से हो रहा हो उसमें आरएनए की मात्रा भी अधिक होती है। इससे लगा कि प्रोटीन संश्लेषण और आरएनए के बीच कुछ सम्बंध है।

आरएनए की भूमिका की पहली परिकल्पना आंद्रे बोइविन (André Boivin) के वर्ष 1947 के शोध पत्र में सामने आई थी। यह शोध पत्र फ्रेंच भाषा में लिखा गया था, लेकिन अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए संपादकीय में पर्चे का सार इन शब्दों में व्यक्त किया गया था: “डीएनए नामक विशाल अणु एक अन्य विशाल अणु आरएनए के निर्माण का संचालन करता है और ये आरएनए अणु कोशिका द्रव्य में प्रोटीन निर्माण का नियंत्रण करते हैं।”

इसके बाद 1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने ई. कोली के कोशिका द्रव्य का विश्लेषण करके आरएनए प्रचुर संरचनाएं खोजीं जिन्हें उस समय माइक्रोसोमल पार्टिकल कहा गया। आगे चलकर इनका नाम राइबोसोम हुआ और यह पहचाना गया कि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का प्रमुख पात्र है। राइबोसोम पर उपस्थित आरएनए के आधार पर यह विचार बना कि राइबोसोम ही प्रोटीन संश्लेषण की स्थली है।

धीरे-धीरे डीएनए से प्रोटीन तक की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हुई। डीएनए से संदेशवाहक आरएनए बनता है जो जाकर राइबोसोम से जुड़ जाता है। यहां छोटे-छोटे आरएनए अणु (ट्रांसफर आरएनए – tRNA) बनते हैं जो कोशिका द्रव्य में से एक-एक अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक लाते हैं जिन्हें जोड़कर प्रोटीन बनता है।

इन खोजों ने न सिर्फ जीव विज्ञान में समझ को आगे बढ़ाया बल्कि इसने आजकल हो रहे जीव वैज्ञानिक नवाचारों का मार्ग भी प्रशस्त किया। एम-आरएनए की खोज ने चिकित्सा के क्षेत्र में नए विचारों को जन्म दिया।

बैक्टीरिया में लैंगिक प्रजनन

एफ. जेकब और ई. वोलमैन ने बैक्टीरिया में लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्र की वृत्ताकार बनावट को उजागर किया था। इसके लिए उन्होंने एक अन्य प्रयोगशाला में पृथक किए गए ई. कोली के एक स्ट्रेन की मदद ली थी।

रीकॉम्बिनेन्ट टेक्नॉलॉजी

ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरस रिकॉम्बिनेंट डीएनए टेक्नॉलॉजी के विकास में प्रमुख रहे हैं। यह टेक्नॉलॉजी डब्ल्यू. आर्बर (Werner Arber) द्वारा रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज पर आधारित थी।

रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज भी ई. कोली और बैक्टीरियोफेज पर किए गए प्रयोगों से ही संभव हुई थी। सबसे पहले तो यह देखा गया कि कुछ फेज किसी एक बैक्टीरिया स्ट्रेन पर विकसित होने के लिए अनुकूलित होते हैं लेकिन किसी अन्य स्ट्रेन पर नहीं। इसका मतलब है कि बैक्टीरिया में बाहरी डीएनए के विरुद्ध कुछ प्रतिरोधक प्रक्रिया होती है।

इस अवलोकन ने स्टुअर्ट लिन (Stuart Linn) और आर्बर को ई. कोली में से दो तरह के एंज़ाइम पृथक करने को प्रेरित किया – रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम तथा मॉडिफिकेशन एंज़ाइम। आगे चलकर हैमिल्टन स्मिथ (Hamilton Othanel Smith) ने एक बैक्टीरिया हीमोफिलस इंफ्लुएंज़े में से एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम शुद्ध रूप में प्राप्त भी किया। लिन और आर्बर ने एक मॉडिफिकेशन एंज़ाइम (मिथायलेज़) प्राप्त किया जो डीएनए पर सुरक्षात्मक मिथाइल समूह जोड़ता है और एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम मिथाइल समूह रहित सारे डीएनए को तोड़ देता है। यानी स्वयं बैक्टीरिया का डीएनए मिथाइल समूह युक्त होने के चलते बच जाएगा जबकि बाहर से आया डीएनए नष्ट कर दिया जाएगा।

इस खोज का महत्व स्वत: स्पष्ट है – इसने हमें डीएनए के साथ खिलवाड़ का एक महत्वपूर्ण औज़ार उपलब्ध कराया है।

यह थी कुछ महत्वपूर्ण अध्ययनों पर बात। लेकिन, जैसा कि शुरू में भी कहा था, ई. कोली  कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है और इसके ज़रिए कई खुलासे हुए हैं, भविष्य में भी शोध होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

Photo credit – https://www.news-medical.net/life-sciences/What-is-Viral-Transduction.aspx

डॉल्फिन की रणनीति: खदेड़ो, उल्टी करवाओ, खाओ

जलचर स्तनधारियों को सिटेशियन कहते हैं। इनमें व्हेल, डॉल्फिन तथा पॉरपॉइज़ शामिल हैं। और इनमें भी वैज्ञानिक देखते आए हैं कि डॉल्फिन का भोजन हासिल करने का तरीका बहुत विचित्र है। आम तौर पर डॉल्फिन करती यह है कि किसी मछली का पीछा करेंगी। वे उस मछली को खाएंगी नहीं बल्कि उसने जो शिकार पकड़ा है उसे छीनकर खा जाएंगी? इसे चोर-परजीविता या क्लेप्टोपैरासिटिज़्म कहते हैं। 2015 में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के समुद्री जीव वैज्ञानिक जेनेट मैन ने बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की शार्क बे में उन्होंने देखा है कि एक डॉल्फिन ने तीन पनकौओं की चोंच से मछली छीन ली। लेकिन समुद्री जीवों में यह व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है।

और अब तो इन्तहा हो गई है। एक डॉल्फिन विशेष (जिसे स्थानीय लोग बबल्स कहते हैं) ने अजीब व्यवहार का प्रदर्शन किया है। बबल्स किसी मछली का पीछा करेगी और फिर वह उसकी कै को चट कर जाएगी। सनशाइन कोस्ट विश्वविद्यालय की समुद्री जीव वैज्ञानिक एशिया आर्मस्ट्रॉन्ग को बबल्स के बारे में जानकारी 2017 में दक्षिणी ग्रेट बैरियर रीफ के लेडी एलियट द्वीप के नज़दीक बनाए गए एक वीडियो से मिली थी। यह एक बॉटलनोज़ डॉल्फिन (टर्सिओप्स ट्रन्केटस – Tursiops truncatus) थी। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम ने आगे खोजबीन की।

जून 2021 से अक्टूबर 2025 के बीच इस टीम ने बिगआई ट्रेवेली मछली (Caranx sexfasciatus) के झुंड में शिकार करती बबल्स की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया। हालांकि डॉल्फिन कभी-कभार मछलियां खाती हैं लेकिन यहां सारी मछलियों को छोड़कर डॉल्फिन एक के पीछे पड़ गई। उसने ट्रेवेली का काफी नज़दीक से तब तक पीछा किया किया जब तक कि वह उल्टी करके भाग नहीं गई। तब उस डॉल्फिन ने वह कै खा डाली। और तो और, इस डॉल्फिन ने अगले तीस मिनट में यही वारदात 10 अन्य ट्रेवेली मछलियों के साथ दोहराई।

उसने मछली को खाने की बजाय उसके उल्टी करने का इन्तज़ार क्यों किया, इस मामले में आर्मस्ट्रॉन्ग ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की है। हो सकता है कि अतीत में बबल्स उस ट्रेवेली को खाने के इरादे से ही झपटती रही होंगी लेकिन जब उसका पचा-पचाया भोजन (वमन) मिल गया तो उन्होंने रास्ता बदल लिया। वैसे भी ट्रेवेली काफी बड़ी होती है और उसे चबाने, हजम करने में समय और मेहनत लगती होगी। उसके मुकाबले उल्टी को संभालना ज़्यादा आसान साबित हुआ होगा।

अलबत्ता, इस चोर-परजीविता में भी बबल्स ने मेहनत तो की थी। ट्रेवेली समूह से उलझने से पहले बबल्स ने अपने सिर को दाएं-बाएं करते हुए क्लिक की ध्वनि उत्पन्न की। उसके बाद एक अकेली ट्रेवेली का पीछा करते वक्त उसने बार-बार क्लिकिंग ध्वनि निकाली और कई सारी निम्न आवृत्ति की ध्वनियां भी पैदा कीं। डॉल्फिन अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि की मदद से मछली के आकार, आकृति और संघटन में बारीक फर्क का अंदाज़ा लेती हैं। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम को लगता है कि सिर को दाएं-बाएं झटके देकर बबल्स को यह पता करने में मदद मिलती होगी कि किस ट्रेवेली ने अभी-अभी किसी शिकार को चट किया है। दूसरी ओर पीछा करने को दौरान उत्पन्न क्लिक ध्वनियां ट्रेवेली को उल्टी करने को उकसाती होंगी। वैसे शोधकर्ताओं को अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्लिक की आवाज़ें ट्रेवेली से उल्टी कैसे करवाती हैं। यह भी हो सकता है कि मछली डॉल्फिन से पीछा छुड़ाने के लिए वैसे ही उल्टी कर देती हो। बहरहाल, डॉल्फिन को तो भोजन मिल ही जाता है। (स्रोत फीचर्स)

इस वारदात के वीडियो के लिए लिंक्स

https://www.smithsonianmag.com/smart-news/meet-bubbles-a-dolphin-in-australia-that-chases-fish-until-they-barf-then-eats-their-upchucked-meals-180989547/ https://www.facebook.com/AustTraveller/videos/bubbles-has-figured-out-the-ultimate-seafood-hack-%EF%B8%8Fthis-very-cheeky-dolphin-has-/2322327231671387/

Picture credit – https://www.indiatoday.in/science/story/bottlenose-dolphin-forces-fish-to-vomit-then-eats-it-australia-study-30

बीजों की सुप्तावस्था के जैविक स्विच की खोज

अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।

जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।

आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।

इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।

इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।

इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)

Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)

चूहे के मस्तिष्क में इंसान के मस्तिष्क की कोशिकाएं

हाल ही में शोध पत्रिका नेचर में स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के सर्जिउ पास्का व साथियों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि उन्होंने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को एक जीवित चूहे (माउस) के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया है।

गौरतलब है कि मानव मस्तिष्क से जुड़े विकारों को दूर करने के लिए उचित उपचार और दवाइयां विकसित करने के लिए मानव मस्तिष्क का विभिन्न परिस्थितियों में अध्ययन ज़रूरी है। अब तक जीवित मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना वैज्ञानिकों के लिए बहुत कठिन रहा है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कई तरह के मॉडल विकसित किए हैं। इनमें से एक है पेट्री-डिश में बनाए जाने वाले मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड। इसमें मनुष्य की त्वचा की कोशिकाओं  को पहले तो स्टेम कोशिका में बदला जाता है जो फिर तंत्रिका कोशिकाएं बनाती हैं। इन्हें ब्रैन ऑर्गेनॉइड कहते हैं। ये मानव मस्तिष्क के विकास के कुछ पहलुओं को समझने में उपयोगी हैं, लेकिन इनमें जीवित मस्तिष्क जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां नहीं होती: उन्हें मस्तिष्क में शरीर से आने वाले वास्तविक संकेत नहीं मिलते और उनमें सामान्य रक्त वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति भी नहीं होती।

वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को माउस के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित करने की कोशिश की है। लेकिन यहां एक समस्या सामने आई। माउस की अपनी मस्तिष्क कोशिकाएं भी लगातार विकसित हो रही थीं और मानव कोशिकाओं के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। चूंकि चूहे के मतिष्क की कोशिकाएं जल्दी वृद्धि करती हैं इस कारण मानव कोशिकाओं को पर्याप्त रूप से चूहे के मस्तिष्क में विकसित होने का अवसर नहीं मिल पा रहा था।

इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहे में कुछ आनुवंशिक परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों के कारण उसके मस्तिष्क का एक हिस्सा खाली रह गया और पर्याप्त जगह उपलब्ध हो गई। जब इस जगह पर मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं से विकसित किए गए ऑर्गेनॉइड को प्रत्यारोपित किया गया, तो वे अच्छी तरह विकसित हुए।

इस तरह वैज्ञानिकों के हाथों में चूहे और मानव कोशिकाओं से बना एक मिश्रित या शिमेरिक मस्तिष्क मॉडल आ गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव कोशिकाएं जीवित मस्तिष्क के वातावरण में विकसित हो रही थीं और उन्हें वहां मौजूद तंत्रिका तंत्र से संकेत तथा वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति मिल रही थी।

इस शोध का एक नैतिक आयाम भी है। जब किसी जानवर के मस्तिष्क में मानव मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रत्यारोपित की जाती हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे उस जानवर के व्यवहार या चेतना में मानव जैसी कोई विशेषता विकसित हो सकती है। पास्का ने बताया कि इस अध्ययन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि मानव कोशिकाओं के प्रत्यारोपण से चूहे में मानव जैसी चेतना विकसित हुई हो या उसकी बौद्धिक क्षमता में कोई असाधारण वृद्धि हुई हो। वैसे भी इस प्रयोग का उद्देश्य माउस को बुद्धिमान बनाना नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना है। (स्रोत फीचर्स)

Picture credit – https://neurosciencenews.com/hybrid-human-brain-mouse-tissue-31216/ ( human cell in mice brain )

अदृश्य धुआं: डिजिटल दुनिया के कार्बन पदचिंह

सुदर्शन सोलंकी

जब हम अपने स्मार्टफोन पर एक 15-सेकंड की रील देखते हैं या सप्ताहांत पर नेटफ्लिक्स पर हाई-डेफिनिशन (HD) क्वालिटी में कोई वेब सीरीज़ स्ट्रीम करते हैं, या 10-15 रुपए का भी छोटा सा पेमेंट पे-टीएम के ज़रिए करते हैं तो हमें इसमें कोई गड़बड़ी, कोई प्रदूषण नहीं दिखता। क्योंकि हमारे आसपास कोई धुआं नहीं उड़ता, कोई हानिकारक गंध नहीं आती और न ही कोई दृश्य कचरा जमा होता है। कैशलेस या कागज़-मुक्त होने की बात भी ठीक ही लगती है क्योंकि कागज़ का कचरा फैलते नहीं दिखता। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। हमारी इन गतिविधियों से पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार कार्बन डाईऑक्साइड गुपचुप रूप से जुड़ रही होती है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का यह गुप्त पर्यावरणीय प्रभाव आज इक्कीसवीं सदी का सबसे तेज़ी से बढ़ता ‘अदृश्य संकट’ बन चुका है।

विभिन्न पर्यावरण जर्नल्स और विज्ञान संस्थानों के शोध के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संपूर्ण डिजिटल तंत्र का योगदान वर्तमान में लगभग 2.1 प्रतिशत से 3.9 प्रतिशत के बीच आंका गया है। इस तंत्र में केवल इंटरनेट का उपयोग ही शामिल नहीं है, बल्कि विशाल डैटा सेंटर्स, वैश्विक नेटवर्क केबल्स और इन उपकरणों के निर्माण की प्रक्रिया भी जुड़ी है। यह डैटा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि यह वैश्विक विमानन उद्योग (लगभग 2.5 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार) के बराबर या उससे भी अधिक है।

इंटरनेट का उपयोग बढ़ने के साथ ही क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के आगमन ने बिजली की खपत को और बढ़ा दिया है। जब आप डैटा का उपयोग करते हैं, तो वह आपके डिवाइस से होते हुए स्थानीय इंटरनेट टॉवरों और अंततः विशाल डैटा सेंटर्स तक जाता है। ये डैटा सेंटर हज़ारों सर्वरों का एक नेटवर्क होते हैं जो चौबीसों घंटे चलते हैं और उन्हें चालू तथा ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा और पानी की आवश्यकता होती है। चूंकि वैश्विक स्तर पर आज भी बिजली का एक बड़ा हिस्सा कोयले या जीवाश्म ईंधनों से बनता है, इसलिए हर डिजिटल गतिविधि सीधे तौर पर कार्बन उत्सर्जन से जुड़ जाती है।

ऊर्जा के भूखे डैटा सेंटर

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के डैटा सेंटर्स वैश्विक बिजली आपूर्ति का लगभग 1 प्रतिशत से 1.3 प्रतिशत उपभोग करते हैं। डैटा सेंटर्स और एआई एल्गोरिदम की बढ़ती मांगों के कारण यह ऊर्जा खपत वर्ष 2026 तक दुगनी होने का अनुमान है, जो पर्यावरणीय दृष्टिकोण से एक गंभीर चिंता का विषय है।

डिजिटल कार्बन पदचिंह का एक बड़ा और ओझल हिस्सा ‘डार्क डेटा’ कहलाता है। यह वह डैटा है जिसे एक बार बनाकर या इकट्ठा करके छोड़ दिया जाता है और दोबारा कभी उपयोग नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, हमारे इनबॉक्स में पड़े हज़ारों पुराने अनरेड ईमेल, धुंधली तस्वीरें जिनका बैकअप क्लाउड पर है, और पुरानी अप्रयुक्त फाइलें। ‘दी कार्बन लिटरेसी प्रोजेक्ट’ के अनुसार, एक सामान्य ईमेल भी अपने पीछे लगभग 4 ग्राम कार्बन पदचिंह छोड़ता है, जबकि बड़ी अटैचमेंट वाला ईमेल 50 ग्राम तक कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है। लाखों-करोड़ों उपयोगकर्ताओं द्वारा छोड़े गए इस कचरे को सहेजने के लिए डैटा सेंटर्स को लगातार बिजली खर्च करनी पड़ती है।

इसके अतिरिक्त, एआई का प्रशिक्षण और संचालन इस संकट को और गहरा कर रहा है। नेचर जर्नल में प्रकाशित शोधों के अनुसार, एक विशाल भाषा मॉडल (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतनी ही कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित हो सकती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में (निर्माण से लेकर कबाड़ होने तक) करती हैं। इसका कारण यह है कि एआई को प्रोसेस करने वाले विशेष चिप्स सामान्य कंप्यूटरों की तुलना में कई गुना अधिक बिजली खींचते हैं।

स्क्रॉलिंग और स्ट्रीमिंग

अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्था Greenspector द्वारा स्मार्टफोन एप्लिकेशन्स की ऊर्जा खपत पर किए गए प्रयोगशाला अध्ययनों के तहत विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को रीयल-टाइम में टेस्ट किया गया। निष्कर्षों से पता चला कि शॉर्ट-वीडियो फॉर्मेट (जैसे टिकटॉक और इंस्टाग्राम रील्स) प्रति मिनट सबसे अधिक डैटा और बिजली का उपभोग करते हैं क्योंकि इनमें वीडियो प्री-लोडिंग और एल्गोरिदम रेंडरिंग बैकग्राउंड में लगातार चलती रहती है। जब हम लगातार स्क्रॉल करते हैं, तो सर्वर पर दबाव बढ़ता है और डिवाइस की बैटरी भी तेज़ी से खत्म होती है।

समाधान: डिजिटल डीटॉक्स और ग्रीन कंप्यूटिंग

इस डिजिटल प्रदूषण को पूरी तरह से समाप्त करना आधुनिक दुनिया में व्यावहारिक नहीं है, परंतु शोधकर्ताओं ने इसके शमन के लिए कुछ अत्यंत प्रभावी और सरल उपाय सुझाए हैं जिन्हें हम अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं:

सही नेटवर्क का चयन: मोबाइल डैटा (4G) के मुकाबले ब्रॉडबैंड वाई-फाई नेटवर्क लगभग 4 से 5 गुना कम ऊर्जा की खपत करता है। घर या कार्यालय में वाई-फाई का उपयोग डिजिटल पदचिंह को काफी हद तक घटा देता है। वैसे, 5G तकनीक भी पुरानी 4G तकनीक की तुलना में प्रति गीगाबाइट अधिक ऊर्जा-कुशल साबित हो रही है।

ऑटो-प्ले और डिवाइस दक्षता: दी कार्बन ट्रस्ट और युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोध के अनुसार, वीडियो स्ट्रीमिंग का अधिकांश कार्बन उत्सर्जन आपके घर के डिवाइस की बिजली खपत से तय होता है। वीडियो प्लेटफॉर्म पर ‘ऑटो-प्ले’ की सेटिंग को बंद रखकर और उपकरणों की ऊर्जा दक्षता को सुधारकर हम डैटा ट्रांसमिशन लोड और कार्बन उत्सर्जन दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं।

डिजिटल स्वच्छता: अपने इनबॉक्स को नियमित रूप से साफ करना, अनावश्यक क्लाउड बैकअप को हटाना और बिना वजह वीडियो कॉल की बजाय वॉयस कॉल को प्राथमिकता देना, व्यक्तिगत स्तर पर बड़े बदलाव ला सकता है।

इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव की मांग: वैश्विक स्तर पर टेक कंपनियों पर यह दबाव बनाना आवश्यक है कि वे अपने डैटा सेंटर्स को 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर या पवन ऊर्जा) पर स्थानांतरित करें। भविष्य ‘ग्रीन कंप्यूटिंग’ का है, जहां सॉफ्टवेयर के कोड और हार्डवेयर की बनावट को इस तरह डिज़ाइन किया जाएगा कि वे कम से कम बिजली का उपयोग करें। लेकिन यह दिल्ली अभी दूर है। फिलहाल अनावश्यक डैटा उपयोग से बचने और डिजिटल आदतों के प्रति सचेत रहने में ही समझदारी है, ताकि इस अदृश्य धुएं को हमारी पृथ्वी का दम घोटने से रोका जा सके। (स्रोत फीचर्स) 

Picture credit- https://escp.eu/news/reduce-your-digital-carbon-footprint-shape-greener-future

कोशिका के प्रकाश स्विच के लिए नोबेल पुरस्कार

इस वर्ष के पहले नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है। जीव विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से कार्ल डाइसरॉथ (हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट तथा स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय), पीटर हेगेमन (बर्लिन के हम्बोल्ड विश्वविद्यालय) तथा जॉर्ज नागेल (वुर्ज़बर्ग विश्वविद्यालय) को प्रदान किया जाएगा। इन्हें यह पुरस्कार प्रकाश-चालित आयन मार्गों तथा ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज के लिए दिया गया है।

ऑप्टोजेनेटिक्स एक ऐसी विधि है जिसकी मदद से यह समझना संभव हो गया है कि तंत्रिकाएं स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों को कैसे आकार देती हैं और संजोती हैं।

शुरुआत हुई थी एक सरल से सवाल से। पीटर हेगेमन की जिज्ञासा यह जानने में थी कि एक-कोशिकीय शैवाल क्लैमायडोमोनास प्रकाश की ओर कैसे तैर जाती है। इसी बात को समझते-समझते हेगेमन और जॉर्ज नागेल ने एक चैनल-रोडॉप्सिन की खोज कर ली। चैनल-रोडॉप्सिन शैवालों में पाया जाने वाला एक अनोखा प्रोटीन है। यह कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। जब कोशिका की सतह पर नीला प्रकाश पड़ता है तो इस प्रोटीन के ज़रिए एक प्रवाह मार्ग (चैनल) खुल जाता है और इस मार्ग से आवेशित आयन कोशिका में प्रवाहित होने लगते हैं। इस प्रवाह के कारण एक विद्युत आवेग उत्पन्न होता है। हेगेमन और नागेल ने पाया कि यह प्रोटीन किसी भी कोशिका में डाल दिया जाए, वह कोशिका प्रकाश संवेदी हो जाती है।

अगला कदम कार्ल डाइसरॉथ ने उठाया। उन्होंने क्लैमायडोमोनास के चैनल-रोडॉप्सिन का जीन एक चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में रोप दिया। इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डालकर वे तंत्रिका संकेत प्रेषित करवा पाए थे। यानी यह प्रोटीन एक प्रकाश-नियंत्रित स्विच की तरह काम करता है। यह खोज 2005 में करने के 2 साल बाद डाइसरॉथ ने जीवित चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में इस प्रकाश-चालित स्विच को जोड़कर काम करवाया।

तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश की मदद से संकेतों का नियंत्रण करवाने की इस विधि को ऑप्टोजेनेटिक्स कहते हैं और यह अत्यंत प्रभावशाली तकनीक साबित हुई है। इसकी मदद से शोधकर्ता तंत्रिका सम्बंधी विकारों तक मनो-चिकित्सकीय संदर्भों में विशिष्ट स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों के तंत्रिका सर्किट्स का खुलासा कर पाए हैं। और तो और, दृष्टि बाधित व्यक्तियों में इस तकनीक का उपयोग करके दृष्टि बहाल करने के प्रयास भी जारी हैं। इस तकनीक ने मस्तिष्क को लेकर हमारी समझ को नए आयाम दिए हैं। यह समझने की दिशा में रोज़ नई खोजें हो रही हैं कि हमारा अद्भुत दिमाग काम कैसे करता है। (स्रोत फीचर्स)

Picture Credit – https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/NP_POM_2026_3-2_01.jpg ( Nobel Prize in Physiology

नेवियर स्टोक्स पहेली और एआई से जुड़े व्यापक मुद्दे

विवेक मेहता

विज्ञान की दुनिया में कई ऐसी समस्याएं हैं जो कि सालों से अनसुलझी रही हैं। इनमें से कई समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े-बड़े इनाम भी घोषित किए गए हैं। वैज्ञानिक अक्सर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने समय की मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे अपने समय में जो एक तकनीक प्रभावी तौर पर उभरी है, वह है एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धि। हाल ही में एक ऐसी ही समस्या पर एआई द्वारा सुझाए गए हल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

नेवियर स्टोक्स पहेली

सामान्य वस्तुओं की गति को समझने के लिए हम न्यूटन के नियमों की मदद लेते हैं। लेकिन अगर इन नियमों को किसी तरल की गति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो हमें जो गणितीय समीकरण मिलता है उसे नेवियर-स्टोक्स समीकरण के नाम से जाना जाता है। यह समीकरण विमान के डिज़ाइन में, मौसम की भविष्यवाणी में, रक्त के प्रवाह को समझने में एवं पानी और हवा के प्रवाह के अध्ययन में मदद करता है। इन तमाम परिस्थितियों एवं उनसे जुड़े सवालों के अलावा वैज्ञानिक इस सवाल से भी लगातार जूझते रहते हैं कि किसी एक वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करता हुआ उनका कोई गणितीय मॉडल या समीकरण किस हद तक विश्वसनीय है। उसकी हद क्या है?

नेवियर-स्टोक्स समस्या के साथ भी ऐसा ही है, या कहें, ऐसी ही था। लगभग 90 वर्षों से यह सवाल अनसुलझा था कि किसी तरल की सामान्य और सुचारु त्रि-आयामी गति क्या अचानक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां गणितीय रूप से उसका व्यवहार बिगड़ जाए? नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के संदर्भ में कहें तो क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ समय बाद एक भले से दिखने वाले तरल  का प्रवाह अचानक इतनी तेज़ी से बदल जाए कि नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के अनुसार उसकी गति अनंत हो जाए?

अब चूंकि हकीकत में किसी भी वस्तु की गति अनंत नहीं हो सकती, ऐसे में अगर गणितीय मॉडल में तरल की गति अनंत हो जाती है तो इसे उस मॉडल की सीमा के रूप में देखा जाएगा।

ओपनएआई (OpenAI) कंपनी ने सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में यह दावा पेश किया कि उनके नए एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या को सुलझा दिया है। उनके दावे के मुताबिक, एक भले से दिखने वाले प्रवाह की गति भी गणितीय मॉडल के मुताबिक अनंत हो सकती है। इसके साथ ही ओपनएआई ने इस दावे का एक गणितीय प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। अब यह दावा कितना सही है या गलत इसकी पड़ताल तो चल ही रही होगी, लेकिन ओपनएआई ने समस्या को सुलझाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

विवाद

जैसा है कि हम जानते हैं एआई मॉडल ट्रेनिंग या सीखने के लिए डैटा का इस्तेमाल करते हैं। इस सीखने-सिखाने के प्रक्रिया में लगभग हर स्तर पर इंसान व इंसानों के द्वारा सृजित ज्ञान का इस्तेमाल होता है। कई दफे तो बाकायदा हाथ पकड़कर एआई या एआई एजेंट को सही हल के बारे में बताया जाता है, जैसे किसी छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया जाता है।

ओपनएआई की घोषणा से कुछ घंटे पहले न्यूयार्क युनिवर्सिटी के गणितज्ञ ट्राइस्टन बकमास्टर ने एक सम्बंधित गणितीय परिणाम प्रकाशित किया था। जिस समस्या पर बकमास्टर अपने सहयोगी लेवेंट एल्पोग के साथ काम कर रहे थे, उसे ओयलर (Euler) पहेली के नाम से जाना जाता है। अलबत्ता, यह समस्या नेवियर-स्टोक्स समस्या से मुख्य तौर पर इस मामले में अलग है कि ओयलर पहेली में तरल की श्यानता (घर्षण) को नकार दिया जाता है। बकमास्टर व एल्पोग इस पहेली पर काम करने के दौरान एआई तकनीक का सहारा भी ले रहे थे। ओपनएआई के ही एक एआई एजेंट कोडेक्स (Codex) पर लगातार पिछले कई महीनों से वे अपने काम व उससे जुड़े मसौदों को साझा कर रहे थे। 

बकमास्टर ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई जिस रास्ते से नेवियर-स्टोक्स समस्या के हल तक पहुंचा है, वह उनके ओयलर समस्या के हल से जुड़ा हो सकता है जिस पर वे पहले से काम कर रहे थे। मुख्य तौर पर बकमास्टर का कहना है कि ओपनएआई एजेंट ने समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया में उन मसौदों से भी सीखा होगा जो कि ओपनएआई के डैटाबेस में पहले से ही मौजूद हैं। ओपनएआई ने ऐसी किसी भी संभावना को नकारा है।

लेकिन शक बे-बुनियाद नहीं है और बहस जारी है। कई गणितज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में नेवियर-स्टोक्स समस्या पर काफी हद तक समझ बनाई जा चुकी थी और यह समस्या बस हल होने की कगार पर ही थी। ऐसे में ओपनएआई का दावा ज्ञान-सृजन की बजाय बाज़ार में अपनी छवि चमकाने व मूल्य बढ़ाने का प्रयास अधिक नज़र आता है।

एक और बात जो ओपनएआई के सुझाए गए हल पर सवाल उठाती है वह है संसाधनों को लेकर। ओपनएआई ने दावा किया कि दशकों पुरानी इस समस्या को लगभग 4-5 दिनों में ही सुलझा दिया। ऐसा करने के लिए उसने मल्टीएजेंट व्यवस्था का सहारा लिया, जिन्होंने पहले-पहल समस्या के कुछ सरल स्वरूपों पर काम किया और फिर मुख्य समस्या पर। सभी गणितीय समस्याओं को मिलाकर एजेंटों ने लगभग 49 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे। इन संदेशों को तैयार करने में लगभग 300 अरब आउटपुट टोकन्स का इस्तेमाल हुआ। केवल नेवियर-स्टोक्स पहेली पर एजेंटों ने लगभग 27 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे व लगभग 130 अरब आउटपुट टोकन्स बनाए।

अब अगर इन तमाम संदेशों के पीछे काम कर रही तकनीक और उससे जुड़े खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो अनुमानित एक करोड़ अमरीकी डॉलर से लेकर 2.25 करोड़ अमरीकी डॉलर के बीच बैठता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए जो इनाम था (दस लाख अमरीकी डॉलर) वह इससे कहीं कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में एआई की ‘गणितीय समझ’ की सफलता है, या बहुत बड़ी कंप्यूटेशनल शक्ति से लाखों संभावित गणितीय हलों को छांटने की सफलता?

इन जैसे तमाम सवालों को लेकर एआई पर बहस अब और भी तीखी होती जा रही है। और यह बहस अब मात्र तकनीक तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसके राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक पहलुओं व प्रभावों पर भी लगातार चर्चा हो रही है; कई अकादमिक समूह तो एआई व इससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ एक मुहिम-सी छेड़ते हुए नज़र आते हैं।

सितंबर 2026 के महीने में जहां एक ओर ओपनएआई सरीखी कंपनियां कठिन समस्याओं से जुड़े अपने दावों को लेकर सामने आती दिखलाई देती हैं तो इसी महीने में एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स (इन्सानी गणितज्ञ संगठन) नाम से एक संस्था/समूह का जन्म भी होता है। इससे जुड़े गणितज्ञ संस्था के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि “इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गणित व इसके साधकों को एआई कंपनियों के चंगुल से बचाना है। इन एआई कंपनियों के काम करने के तरीके ना केवल गणित, बल्कि पर्यावरण व वृहद समाज के लिए भी घातक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि हम एआई माडलों के उपयोग में एक आलोचनात्मक नज़रिया अपनाएं; ना केवल शोध या उससे जुड़े कामों को करते हुए, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने व उससे जुड़े कार्यकलापों में भी।”

एआई के दौर में पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत व ज़िम्मेदारी कई शिक्षण संस्थान महसूस भी कर रहे हैं। विश्व में तकनीकी ज्ञान सृजन व संचार के मामले में अग्रणी संस्थान MIT ने जनवरी 2026 में एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य संस्थान में एआई के इस्तेमाल के संदर्भ में यह सुझाव देना था कि शिक्षण और मूल्यांकन को किस तरह बदला जाना चाहिए और उसके लिए संस्थागत नियम क्या होने चाहिए। इस समिति ने अपनी रपट अगस्त 2026 में सार्वजनिक कर दी है। एआई के प्रति इस रपट का नज़रिया एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स सरीखा तीखा तो नहीं है लेकिन समिति ने युवाओं पर हो रहे इसके असर और शिक्षकों व अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि एआई को तेज़ी से अपनाए जाने का प्रभाव पहले से ही विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे लंबे समय में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। कुछ विद्यार्थी अपने शैक्षणिक कार्यों या भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं; उनमें अपने निर्णय और कार्य स्वयं करने की क्षमता, उद्देश्य-बोध और आत्मविश्वास की भावना कम हो रही है; और वे एआई से अत्यधिक प्रभावित दुनिया में अपने करियर की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं। शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों को एआई से जुड़ी शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों को पहचानने के लिए तैयार रहना चाहिए और विद्यार्थियों को आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं सम्बंधित संसाधनों तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।”

यह रपट मानवता को केंद्र में रखकर तकनीक के इस्तेमाल की बात करती है। जिस तरह के बदलावों की अपेक्षा है उनकी ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि एआई के इस दौर में “MIT में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश कक्षाओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी और कई मामलों में, उनमें पर्याप्त बदलाव भी करने होंगे, ताकि वे एआई के प्रभाव का सामना किसी गंभीर व्यवधान के बिना कर सकें। एआई उन शैक्षणिक मान्यताओं को चुनौती देगा, जिनके आधार पर पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु, शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आकलन के तरीकों का चुनाव किया गया है।”

संक्षेप में, अब समय आ गया है कि हम गहराई और व्यापकता के साथ इस बात पर विचार करें कि हम क्या पढ़ाते हैं और उसे कैसे पढ़ाते हैं। भविष्य की कक्षाओं की संरचना, मूल्यांकन पद्धतियां और नीतियां स्पष्ट उद्देश्य के साथ तैयार की जानी चाहिए। उन्हें केवल एआई की तत्काल वास्तविकताओं के जवाब में छोटे-मोटे बदलाव करके तैयार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर पाठ्यक्रम में एक ही तरह के बदलाव करने होंगे।

कई अन्य देशों की तरह भारत में भी एआई की संभावनाओं को लेकर एक उत्साह का माहौल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे कई समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। उम्मीद है, नीति-निर्माता इस तकनीक के व्यापक असर से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार कर रहे होंगे। दुनिया भर में लोग एआई व उसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता बेवजह नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://openai.com/index/navier-stokes-solution/

मंगल टर्बाइन के प्रसार में और देरी न हो

भारत डोगरा

किसी भी देश में विज्ञान व तकनीकी का विकास केवल बड़ी व प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होता है, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आम लोगों में, जनसाधारण में जो वैज्ञानिक सोच व प्रतिभा छिपी है, उसे भलीभांति खिलने के अवसर मिलें व इसके आधार पर जनजीवन में सुधार के अवसर विकसित हों।

इस तरह ग्रासरूट पर विज्ञान व तकनीकी का जो विकास है, उसका एक बहुत उपयोगी उदाहरण हमारे देश में मंगल टर्बाइन के रूप में सामने आया है। किसानों का खर्च कम करने की बात हो, जीवाश्म ईंधन पर खेती की निर्भरता कम करके जलवायु परिवर्तन को थामने में योगदान की बात हो या गांवों की आत्म-निर्भरता बढ़ाने की महात्मा गांधी की सोच, सभी दृष्टियों से मंगल टर्बाइन बहुत उपयोगी है।

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त मैथानी समिति ने मंगल टर्बाइन के व्यापक प्रसार की सिफारिश की है। इसके बावजूद मंगल टर्बाइन का उचित प्रसार नहीं किया गया है। इसके आविष्कारक मंगल सिंह अब वृद्ध हो गए हैं, 79 वर्ष की आयु के हैं। अत: यह और ज़रूरी हो गया है कि अब उनकी सेवाओं का उचित उपयोग कर मंगल टर्बाइन के द्रुत प्रसार में और देरी न की जाए।

हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीज़ल पंप से पानी उठाते हैं। अनेक गांवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीज़ल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है; प्रदूषण होता है, सो अलग। ललितपुर ज़िले (उत्तर प्रदेश) के एक किसान व ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा व मंगल टर्बाइन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीज़ल व बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पहुंचाया जा सके।

अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह स्वयं बताते हैं, “मंगल टर्बाइन गांव में ही बनने वाली एक ऐसी मशीन है, ऐसी ग्रामीण तकनीकी है, जो जलधारा के प्रवाह से चलती है। इसमें आवश्यकता के अनुरूप छोटा-बड़ा व्हील बनाते हैं और उसे एक गियर बॉक्स से जोड़ते हैं जो उसके चक्कर बढ़ा देता है। लिहाज़ा इंजन मोटर की भांति तेज़ स्पीड से चक्कर लगाने लगता है। गियर बॉक्स की आउटपुट शाफ्ट दोनों तरफ निकली होती है जिससे क्लॉकवाइज़ या एंटी-क्लॉकवाइज़ कोई एक या दोनों भी एक साथ पंप चला सकते हैं। गियर बाॅक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर घिरनी लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पिराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी-नालों से डीज़ल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टर्बाइन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीज़ल, बिना बिजली के सिंचाई कर सकते हैं। पाइपों के द्वारा पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं।

मंगल टर्बाइन का उपयोग यदि उन सभी स्थानों पर किया जाए जो इसके अनुकूल हैं तो इससे सालाना करोड़ों लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है, और किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।

मंगल टर्बाइन को सिंचाई व कुटीर उद्योगों के लिए वरदान बताते हुए आई.आई.टी. दिल्ली व विज्ञान शिक्षा केंद्र के एक अध्ययन में बताया गया है कि पूरी तकनीक ऐसी है जो गांव स्तर पर अपनाई जा सकती है व इससे गांवों में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन भी होगा।

यदि एक मंगल टर्बाइन दिन में 11 घंटे चले तो (25 एच.पी. डीज़ल पंप की 4 लीटर प्रति घंटे की खपत के आधार पर) दिन में 44 लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है। यदि वर्ष में 190 दिन सिंचाई हो तो एक मंगल टर्बाइन से वर्ष में 8360 लीटर डीज़ल की बचत होती है। यदि एक मंगल टर्बाइन 15 वर्ष तक कार्य करे तो अपने जीवन काल में एक मंगल टर्बाइन से 1,25,400 लीटर डीज़ल की बचत होती है। डॉ. जय शंकर सिंह के अनुमान के अनुसार यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 335 टन कमी के बराबर है।

ग्रीनहाऊस गैस के उत्सर्जन में कमी विश्व का पर्यावरण बचाने के लिए तो ज़रूरी है ही, साथ ही इसमें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने पर देश अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहायता का हकदार भी बनता है। इस तरह मंगल टर्बाइन के सभी उचित व अनुकूल स्थानों पर विभिन्न सावधानियों के साथ उपयोग होने से किसानों, सरकार, पर्यावरण सभी का लाभ है।

देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों व अघिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टर्बाइन का अध्ययन किया है और इस आविष्कार की प्रशंसा करते हुए इसकी व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया है। मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव बी. के. साहा ने लिखा है कि स्टॉप डैम के खर्च को जोड़ लिया जाए तो भी मंगल टर्बाइन की व्यवस्था छोटी नदियों से जल उठाने की अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक सस्ती है। मंगल टर्बाइन से डीज़ल व बिजली की बचत होती है तथा यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक डॉ. टी. पी. ओझा ने लिखा है कि मंगल टर्बाइन में बड़ी संभावनाएं निहित हैं। भारत सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व सचिव बी. के. सिन्हा ने कई बार मंगल टर्बाइन व इसके आविष्कारक की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रीय हित में इन्हें प्रोत्साहित करने को कहा है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जाने-माने विद्वानों व संस्थानों ने मंगल टर्बाइन की उपयोगिता व संभावनाओं को स्वीकार किया है। इसके बावजूद इसका उचित प्रचार नहीं हो सका। दरअसल, सरकार को मंगल सिंह जैसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना चाहिए एवं अनुकूल अवसर देना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://ruralindiaonline.org/article/%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E