क्या मनुष्यों की ऊपरी आयु की सीमा आ चुकी है?

हाल ही में किया गया एक सांख्यिकीय अध्ययन बताता है कि मनुष्यों की आयु की ऊपरी सीमा अभी नहीं आई है हालांकि आज तक का रिकॉर्ड 112 वर्ष है। साइन्स शोध पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन इटली के राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान द्वारा संग्रहित आंकड़ों के आधार पर किया गया है।

सेपिएन्ज़ा विश्वविद्यालय की एलिसाबेटा बार्बी और उनके साथियों ने पाया कि इटली की नगर पालिकाएं अपने बाशिंदों के काफी व्यवस्थित रिकॉर्ड रखती हैं। इसलिए उन्होंने अपने अध्ययन में इन्हीं आंकड़ों का उपयोग किया।

पूर्व के अध्ययनों में देखा जा चुका है कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की अगले एक वर्ष में मृत्यु की संभावना बढ़ती जाती है। उदाहरण के लिए 50 वर्ष की उम्र में अगले एक साल में व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना 30 वर्ष की उम्र के मुकाबले तीन गुनी हो जाती है। उम्र के सातवें और आठवें दशक के बाद अगले एक वर्ष में मृत्यु की संभावना हर 8 वर्षों में दुगनी हो जाती है। और यदि आप 100 वर्ष की उम्र पर पहुंच गए हैं तो मात्र 60 प्रतिशत संभावना रहती है कि आप अपना अगला जन्म दिन देख पाएंगे।

इस तरह के रुझानों के बावजूद कम से कम मक्खियों और कृमियों में एक और बात देखी गई है। इन जंतुओं में एक उम्र पार करने के बाद मृत्यु की संभावना बढ़ना रुक जाती है। अब तक मनुष्यों में इस बात की जांच नहीं की जा सकी थी। बार्बी व उनके साथियों ने इटली के राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान के आंकड़ों में से उन लोगों के आंकड़े लिए जो 2009 से 2015 के बीच कम से कम 105 वर्ष के थे। इनकी कुल संख्या 3836 थी। आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर देखा गया कि 105 वर्ष की उम्र के बाद मत्यु की संभावना नहीं बढ़ती। कहने का मतलब है कि 106 वर्ष के किसी व्यक्ति की 107 की उम्र में मरने की संभावना उतनी ही होती है जितनी 111 वर्षीय व्यक्ति के 112 वर्ष की उम्र में मरने की।

आंकड़ों से एक बात और पता चली जन्म के वर्ष के आधार पर देखें तो सालदरसाल 105 साल जीने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह इस बात का संकेत है कि यदि मनुष्यों की आयु की कोई उच्चतम सीमा है तो हम उस सीमा तक अभी नहीं पहुंचे हैं। वैसे कई अन्य वैज्ञानिकों का ख्याल है कि यह निष्कर्ष उतना पक्का नहीं है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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पोलियो ने फिर सिर उठाया

बात भारत की नहीं, कॉन्गो प्रजातांत्रिक गणतंत्र की है। अलबत्ता, कहीं की भी हो मगर यह बात अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय है कि पोलियो ने फिर से बच्चों को लकवाग्रस्त किया है।

कॉन्गो प्रजातांत्रिक गणतंत्र (संक्षेप में कॉन्गो) में पोलियो के कारण 29 बच्चे लकवाग्रस्त हो चुके हैं और गत 21 जून को एक और मामला सामने आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम ने इसे अत्यंत चिंताजनक घटना घोषित किया है जो पोलियो उन्मूलन के हमारे प्रयासों को वर्षों पीछे धकेल सकती है।

कॉन्गो में उभरे नए मामले पोलियो उन्मूलन के प्रयासों के सबसे कठिन हिस्से की ओर संकेत करते हैं। कॉन्गो में पोलियो के ये मामले उस कुदरती वायरस के कारण नहीं हुए हैं, जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान और शायद नाइजीरिया में अभी भी मौजूद है। कॉन्गो में लकवे के नए मामले ओरल पोलियो वैक्सीन (दो बूंद ज़िंदगी की) में इस्तेमाल किए गए दुर्बलीकृत वायरस के परिवर्तित रूप के कारण सामने आए हैं। वैक्सीन का यह दुर्बलीकृत वायरस प्रवाहित होता रहा और इसमें विभिन्न उत्परिवर्तन हुए और अंतत: इसने फिर से संक्रमण करने और लकवा पैदा करने की क्षमता अर्जित कर ली है।

वास्तव में मुंह से पिलाया जाने वाला पोलियो का टीका काफी सुरक्षित और कारगर माना जाता है और यही पोलियो उन्मूलन के प्रयासों का केंद्र बिंदु रहा है। इसकी एक खूबी है जो अब परेशानी का कारण बन रही है। टीकाकरण के बाद कुछ समय तक यह दुर्बलीकृत वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैलता रहता है। इसके चलते उन लोगों को भी सुरक्षा मिल जाती है जिन्हें सीधे-सीधे टीका नहीं पिलाया गया था। मगर कई बार यह वायरस इस तरह से बरसों तक पर्यावरण में मौजूद रहकर उत्परिवर्तित होता रहता है और फिर से संक्रामक रूप में आ जाता है।

टीके से उत्पन्न पोलियो वायरस सबसे पहले वर्ष 2000 में खोजा गया था। इसकी खोज होते ही, विश्व स्वास्थ्य सभा ने घोषित किया था कि कुदरती वायरस के समाप्त होते ही मुंह से पिलाए जाने वाले टीके को बंद कर देना चाहिए। फिर 2016 में पता चला कि टीका-जनित पोलियो वायरस अब कहीं अधिक घातक हो चला है और यह कुदरती वायरस की अपेक्षा ज़्यादा लोगों को लकवाग्रस्त बना रहा है। उसके बाद से इसे एक वैश्विक समस्या मानते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम ने पोलियो उन्मूलन की रणनीति में कई बदलाव किए हैं और देशों को प्रसारित किए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि बदली हुई रणनीतियां कामयाब होंगी।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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बीमारियों के शहंशाह पर विजय – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कैंसर तब होता है जब स्वस्थ कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती है, उनमें अनियंत्रित विकास होता है जो स्वास्थ को प्रभावित करता है।

कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ मुखर्जी की कैंसर पर लिखी किताब पुलित्ज़र पुरस्कार के लिए चुनी गई थी। उनकी इस किताब का नाम था एम्परर ऑफ ऑल मेलेडीज़ (बीमारियों का शहंशाह)। यह कैंसर जैसे शत्रु द्वारा प्रस्तुत चुनौती के प्रति विस्मय और खेल भावना से अपने शत्रु की प्रशंसा का मिलाजुला प्रस्तुतीकरण है। इससे पहले 1971 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कैंसर पर युद्ध की घोषणा की थी और इसके लिए 1.4 अरब डॉलर की राशि प्रदान की थी। इन 47 वर्षों में अकेले यू.एस. राष्ट्रीय कैंसर संस्थान ने ही कैंसर पर युद्ध में 90 अरब डॉलर खर्च किए हैं। और विजय अभी हमारा मुंह चिढ़ा रही है।

प्रति वर्ष अमेरिका में 173 लाख नए कैंसर मरीज़ रिपोर्ट होते हैं। और हर 20 मिनिट में एक कैंसर मरीज़ की मृत्यु होती है। भारत में यह आंकड़ा 25 लाख है और हर 8 मिनिट में एक मृत्यु। इस प्रकार सभ्यता की शुरुआत से ही हमारे साथ चली आ रही इस घातक बीमारी का समाधान बेहद ज़रूरी और महत्वपूर्ण है।

कैंसर तब होता है जब शरीर में कोई स्वस्थ कोशिका क्षतिग्रस्त हो जाती है और अनियंत्रित वृद्धि करने लगती है जिससे स्वास्थ्य प्रभावित होता है। कोशिका में क्षति या तो कोशिका के जीन्स को प्रभावित करने वाली जन्मजात या आनुवंशिक त्रुटियों की वजह से हो सकती है या जीवन शैली और पर्यावरणीय कारकों के कारण हो सकती है। सामान्य कोशिका में यह शुरू से तय होता है कि वह एक निश्चित समय तक विभाजन करेगी और एक निश्चित आकार तक वृद्धि करेगी। लेकिन कैंसर कोशिकाओं के डीएनए में क्षति के कारण वे बेलगाम वृद्धि करती रहती हैं जिसकी वजह से ट्यूमर (गठान) बनता है। कैंसर विशेषज्ञ दवाइयों या सर्जरी से इस ट्यूमर को हटा देते हैं। लेकिन बड़ी चुनौती इसका यह पहला उपचार नहीं है बल्कि यह है कि कैंसर फिर से सिर न उठाए या इसका मेटास्टेसिस (शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचकर उन्हें नुकसान पहुंचाना) न होने पाए। अर्थात कैंसर से लड़ाई का मकसद इसकी जड़ तक पहुंचकर उसे उखाड़ फेंकना है।

इसी संदर्भ में हम अपने अंदर कुदरती रूप से मौजूद प्रतिरक्षा तंत्र का रुख करते हैं। प्रतिरक्षा तंत्र कोशिकाओं, ऊतकों और अणुओं का एक जटिल नेटवर्क है। यह तंत्र संक्रमण और अन्य बीमारियों के साथसाथ कैंसर से लड़ने में मदद करता है। श्वेत रक्त कोशिकाएं (लिम्फोसाइट्स) इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। विशेष रूप से बीलिम्फोसाइट्स नामक कोशिकाएं हमलावरों में अणुओं की आकृति को पहचानती हैं और फिर एंटीबॉडीज़ बनाती हैं, जो हमलावरों को घेरकर शरीर से हटा देते हैं। (महत्वपूर्ण बात यह है कि लिम्फोसाइट इस आकृति को याद रखते हैं, और जब भी इस हमलावर द्वारा पुन: हमला हो तो बीलिम्फोसाइट तैयार रहते हैं।) कोशिकाओं का एक समूह टीकोशिकाओं का होता है जो कुछ रसायन छोड़ती हैं। ये रसायन हमलावर कोशिकाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इस प्रक्रिया में इन टीकिलर कोशिकाओं को टीहेल्पर कोशिकाओं की मदद मिलती है। इसके अलावा डेंड्राइटिक कोशिकाओं का एक और समूह होता है जो बीकोशिकाओं और टीकोशिकाओं दोनों को सक्रिय करने में मदद करता है, और वे विशिष्ट खतरे का जवाब देने में समर्थ हो जाती हैं।

प्रत्येक कोशिका की सतह पर एक छोटा मार्कर होता है, एक छोटे आण्विक पहचान पत्र के समान। इसे एंटीजन कहते हैं। ये छोटेछोटे अणु होते हैं जो कोशिका की सतह पर पाए जाते हैं। शरीर की सामान्य कोशिकाओं पर उपस्थित एंटीजन को शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाएं अपनेके रूप में पहचानती है और उन्हें हाथ नहीं लगाती। लेकिन जैसे ही कोई अन्य कोशिका (जैसे हमलावर सूक्ष्मजीव या वायरस) इस तंत्र में घुसपैठ करने की कोशिश करती है तो उसके पराए एंटीजन का पता लगाया जाता है और बी और टी लिम्फोसाइट्स द्वारा हमलावर को शरीर से बाहर फेंक दिया जाता है।

यही टीकाकरण की बुनियाद है। टीके में, हम रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं (या तो मृत या अक्षम बनाए हुए) को शरीर में प्रवेश कराते हैं। इसे प्रतिरक्षा तंत्र पराएविदेशी एंटीजन के रूप में पहचानता है और उसे पकड़कर (एंटीबॉडी प्रोटीन की मदद से) शरीर से बाहर फेंक देता है। साथ ही प्रतिरक्षा तंत्र इस पराए एंटीजन को याद रखता है और जब भी हमलावर फिर से आता है, बी कोशिकाएं इसके खिलाफ एंटीबॉडीज़ बनाती हैं और इसे हटा देती हैं। इस प्रकार शरीर को लंबे समय तक सुरक्षा मिलती है। ह्रूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) जैसे कैंसरकारक वायरस और हेपेटाइटिस बी और सी के वायरस सहित कई बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण के पीछे यही आधार रहा है।

अन्य प्रकार के कैंसर के लिए इसका क्या महत्व है? कैंसर कोशिकाओं की सतह पर भी एंटीजन होते हैं। ये कैंसरसम्बंधी एंटीजन हैं। इनमें कुछ एंटीजन को शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा पहले नहीं देखा गया था। ये नवएंटीजन्स कहलाते हैं। ये शरीर के लिए पराए होते हैं जो हमलावर से आते हैं।

वर्तमान में कैंसर के इलाज को लेकर उत्साह के माहौल में, प्रतिरक्षा तंत्र का इस्तेमाल करके एक कैंसररोधी टीका बनाने का यह विचार सूची में सबसे आगे हैं। यह रोकथाम का टीका नहीं होगा (जैसे कि एचपीवी या हिपेटाइटिस के टीके होते हैं) बल्कि एक उपचारात्मक टीका होगा। इसमें पहले तो मौजूदा तरीकों से कैंसर का इलाज किया जाता है। इलाज के बाद कैंसर फिर से सिर न उठाए और न ही (मेटास्टेसिस के ज़रिए) अन्य अंगों में फैले, इसके लिए रोगी के शरीर से कैंसर ऊतक का एक टुकड़ा लिया जाता है और इसमें नवएंटीजन की पहचान की जाती है। इसके बाद वैज्ञानिकों का एक समूह कंप्यूटर विधि का उपयोग यह जांचने के लिए करता है कि कौनसा टुकड़ा रोगी के प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर कोशिकाओं से लड़ने के लिए सबसे अच्छी तरह से सक्रिय करेगा। इस तरह चुने गए नवएंटीजन का इस्तेमाल करके टीका बनाया जाता है। और यह टीका मरीज़ों को दिया जाता है ताकि कैंसर की पुनरावृत्ति न हो। उम्मीद है कि इस प्रकार हमेशा के लिए कैंसर से निजात मिल जाएगी।

कैंसर के कुछ टीके तो बाज़ार में उपलब्ध भी हो चुके हैं। उदाहरण के लिए स्तन कैंसर के खिलाफ एचईआर-2, प्रोस्टेट कैंसर के खिलाफ प्रोवेन्ज और मेलानोमा के खिलाफ टीवीईसी। वैसे आजकल कुछ शोधकर्ता रोगी के पूरे जीनोम को पढ़ कर ट्यूमर के डीएनए या आरएनए के क्षारों का अनुक्रमण करना चाहते हैं ताकि उसमें हुए उत्परिवर्तन की पहचान करके हर मरीज़ के लिए व्यक्तिगत टीका बनाया जा सके। सम्राटहमला कर सकता है और घायल कर सकता है। लेकिन अब हम बॉय स्काउट का नारा अपना रहे हैं कि तैयार रहो, तो शायद सम्राट की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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अड़ियल फिलामेंट बल्ब – आदित्य चुनेकर, संजना मुले, मृदुला केलकर

भारत में वर्ष 2014 से एलईडी बल्ब की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह वृद्धि मुख्य रूप से उजाला कार्यक्रम के तहत सस्ते एलईडी बल्ब उपलब्ध कराने की योजना की बदौलत हुई है। हालांकि, फिलामेंट बल्ब की मांग अभी भी काफी है, हालांकि धीरेधीरे घट रही है। 2017 में, भारत में लगभग 77 करोड़ फिलामेंट बल्ब बेचे गए थे, जो उस वर्ष बल्ब और ट्यूबलाइट की कुल बिक्री के 50 प्रतिशत से भी अधिक था।

इस आलेख में, हम भारत में फिलामेंट बल्ब के निरंतर उपयोग की जांच के लिए भारतीय घरों के लिए उपलब्ध विभिन्न प्रकाश विकल्पों की मांग और आपूर्ति के कुछ पहलुओं की जांच करेंगे। इस विश्लेषण के आधार पर, हम भारत में फिलामेंट बल्ब के उपयोग को कम करने और अंतत: समाप्त करने करने के लिए कुछ कार्यक्रम और नीतिगत हस्तक्षेपों के सुझाव भी देंगे।

हमने अपने द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया कि लोग, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में, एलईडी बल्ब और उसके लाभों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं। संभावित उपभोक्ता की प्रमुख चिंता एलईडी बल्ब द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की गुणवत्ता और देश में खराब बिजली आपूर्ति के मद्देनज़र उनके टिकाऊपन को लेकर है। एलईडी बल्ब की एकमुश्त ऊंची कीमत अभी भी एक चुनौती है क्योंकि अधिकांश सर्वेक्षित घरों ने वित्त पोषित योजना को पसंद किया है। सर्वेक्षण में स्थानीय बाज़ारों, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में एलईडी बल्बों की सीमित उपलब्धता का भी पता चला है।

जहां तक फिलामेंट बल्ब की आपूर्ति का सवाल है, मुट्ठी भर कंपनियां भारत में अधिकांश फिलामेंट बल्ब का उत्पादन करती हैं। फिलामेंट बल्ब का उत्पादन करने वाले कारखाने पुराने, घिसेपिटे और स्वचालित हैं। फिलामेंट बल्ब के उत्पादन में शोध, गारंटी और विपणन की लागत बहुत कम होती है। इस कारण से कंपनियां फिलामेंट बल्ब बहुत कम कीमत पर बेच पाती हैं। इसके अलावा, फिलामेंट बल्ब उद्योग में कोई नया प्रवेशकर्ता भी नहीं है।

दूसरी तरफ, एलईडी लाइटिंग उद्योग हाल ही के वर्षों में उजाला कार्यक्रम द्वारा उत्पन्न मांग पर चल रहा है। चूंकि शुरुआती पूंजी निवेश कम लगता है और बल्ब के पुर्ज़ों को हाथ से जोड़ा जा सकता है, इसलिए मांग को पूरा करने के लिए लघु उद्योग भी मौजूद है। भारतीय मानक ब्यूरो और ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के पास एलईडी बल्बों के प्रदर्शन और सुरक्षा सम्बंधी अनिवार्य मानक हैं। हालांकि, बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों में इन मानकों के अनुपालन को लेकर स्थिति चिंताजनक है। मात्र कीमत में कमी पर ध्यान केन्द्रित किए जाने के कारण शायद एलईडी बल्ब की गुणवत्ता के साथ समझौता हुआ होगा। खास तौर से उन पहलुओं की उपेक्षा हुई होगी जो उनके जीवनकाल और प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं। मौजूदा मानकों में शायद इन्हें सटीक रूप से पकड़ा नहीं जा सका है।

फिलामेंट बल्ब को बाज़ार से दूर करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अब तक अपनाए गए मूल्यकेंद्रित हस्तक्षेप एलईडी बल्ब की कीमत को कम करके उनकी मांग में वृद्धि करने में सफल रहे हैं। किंतु फिलामेंट बल्ब से पूरी तरह से निजात पाने के लिए मूल्यकेंद्रित हस्तक्षेप से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। जैसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो लोगों को एलईडी बल्ब के लाभों के बारे में जागरूक करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान आयोजित कर सकता है। ऐसे अभियान ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के स्टार रेटिंग कार्यक्रम द्वारा प्रमाणित अच्छी गुणवत्ता वाले एलईडी बल्ब खरीदने के बारे में जागरूकता भी बढ़ा सकते हैं। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो और भारतीय मानक ब्यूरो समयसमय पर मानकों के अनुपालन की जांच कर सकते हैं और अनुपालन न करने वालों की जानकारी प्रकाशित भी कर सकते हैं। उजाला की कार्यान्वयन एजेंसी, ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड (ईईएसएल), खरीदे गए एलईडी बल्बों की गुणवत्ता की जांच कर सकती है और अनुपालन न करने वाले निर्माताओं को ब्लैकलिस्ट कर सकती है। ईईएसएल सुनिश्चित कर सकता है कि गारंटीशुदा बल्बों को बदलने की प्रक्रिया आसान हो। इससे लोगों में एलईडी बल्ब की गुणवत्ता को लेकर विश्वास पैदा करने में मदद मिलेगी। एलईडी बल्ब के ऊंचे मूल्य के मुद्दे को हल करने के लिए, ईईएसएल बिल भुगतान के समय वित्त पोषण प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दे सकता है। यह उजाला कार्यक्रम का हिस्सा तो रहा है, लेकिन इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। ईईएसएल ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने के लिए डाकघर, पेट्रोल पंप और ग्राम स्वराज अभियान के माध्यम से वितरण की अपनी वर्तमान पहल को जारी रख सकता है। सरकार का विद्युतीकरण कार्यक्रम सौभाग्य नव विद्युतीकृत घरों में एलईडी बल्ब के उपयोग को बढ़ावा देने का एक और तरीका हो सकता है।

एलईडी बल्ब के बारे में जागरूकता बढ़ाने, उनकी गुणवत्ता में सुधार करने, उनकी कीमत को कम करने और उनकी उपलब्धता में वृद्धि करने और आसान बनाने जैसे हस्तक्षेपों से भारत में फिलामेंट बल्ब के उपयोग को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। लेकिन आज की स्थिति में तो अन्य समस्याओं को संबोधित किए बिना फिलामेंट बल्ब को एकाएक विदा करने की सिफारिश नहीं की जा सकती है। ऐसा करने से इसका बोझ मुख्य रूप से निम्न आय वर्ग और नव विद्युतीकृत घरों पर पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)

पुणे स्थित प्रयास (ऊर्जा समूह) ने हाल ही में एलईडी बल्बों के उपयोग सम्बंधी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी ऑब्स्टिनेट बल्ब मूविंग बियॉण्ड प्राइस फोकस्ड इंटरवेंशन्स टु टेकल इंडियाज़ पर्सिस्टेंट इनकेंडेसेंट बल्ब प्रॉबलम। यह रिपोर्ट निम्नलिखित वेबसाइट पर उपलब्ध है: http://www.prayaspune.org/peg/publications/item/380यहां उस रिपोर्ट का सारांश प्रस्तुत है।

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तीन पालकों वाले एक और बच्चे की तैयारी

 सिंगापुर शायद वह दूसरा देश होगा जहां तीन पालकोंदो मां और एक पिताकी संतान पैदा करने की अनुमति मिल जाएगी। इससे पहले युनाइटेड किंगडम में इसे कानूनन वैध घोषित किया गया था। और संभवत: इस वर्ष पहली तीनपालक संतान जन्म लेगी। तो यह मामला क्या है और एक बच्चे की दो मांएं कैसे हो सकती हैं? 

जब स्त्री के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु का निषेचन होता है तो दोनों की आधीआधी जेनेटिक सामग्री निषेचित अंडे में पहुंचती है। मगर कोशिका के एक खास अंग (माइटोकॉण्ड्रिया) पूरे के पूरे सिर्फ मां से आते हैं। माइटो­कॉण्ड्रिया कोशिका का वह अंग है जो ऑक्सीजन का उपयोग करके ग्लूकोज़ से ऊर्जा प्राप्त करने का काम करता है। मज़ेदार बात यह है कि माइटोकॉण्ड्रिया की अपनी स्वतंत्र जेनेटिक सामग्री होती है जो कोशिका के केंद्रक से अलग होती है। 

यदि मां के माइटोकॉण्ड्रिया की जेनेटिक सामग्री में कोई विकार हो तो वह बच्चे में भी पहुंच जाता है और बच्चे को श्वसन सम्बंधी रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क, हृदय और मांसपेशियों के काम पर होता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है कि ऐसे विकारग्रस्त माइटोकॉण्ड्रिया वाली स्त्री के अंडाणु के निषेचन के दौरान केंद्रक की जेनेटिक सामग्री तो उसकी अपनी रहे किंतु माइटोकॉण्ड्रिया किसी अन्य स्त्री का डाला जाए। तो उस बच्चे की दो मां होती हैंएक जिसके केंद्रक की जेनेटिक सामग्री अंडे में है और दूसरी जिसके माइटो­कॉण्ड्रिया बच्चे को मिले हैं।

इसे माइटोकॉण्ड्रिया प्रतिस्था­पन उपचार या माइटोकॉण्ड्रियल रिप्लेसमेंट थेरपी कहते हैं। और इसे अंजाम देने के कई वैकल्पिक तरीके हैं। इसके कई सामाजिक पक्ष हैं जिन पर विचार करना आवश्यक है। इसलिए सिंगापुर सरकार ने आम लोगों और धार्मिक समूहों को 15 जून तक का समय दिया था कि वे सिंगापुर की जैव आचार परामर्श समिति को अपनी राय बता सकते हैं। इसके आधार समिति अंतिम निर्णय लेगी। (स्रोत फीचर्स)

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फोटो क्रेडिट : Bio ethics observatory

मधुमक्खियां शून्य समझती हैं

तो पहले से पता था कि मधुमक्खियां चार तक गिन सकती हैं। यह क्षमता उन्हें शिकारियों पर निगाह रखने और भोजन के स्रोत तक पहुंचने के रास्ते में आने वाले चिंहों को याद रखने में मदद कर सकती है। मगर अब कुछ प्रयोगों से शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि वे शून्य का मतलब भी समझती हैं।

यह तो स्पष्ट ही है कि जंतुओं पर प्रयोग करके निष्कर्ष निकालना खासा मुश्किल काम है क्योंकि जो भी निष्कर्ष निकाला जाएगा वह मात्र उनके व्यवहार और प्रतिक्रिया को देखकर ही निकाला जाएगा। शोधकर्ताओं ने 10 मधुमक्खियां लीं और उन्हें दी गई दो संख्याओं में से छोटी संख्या को पहचानना सिखा दिया। इसके लिए किया यह गया था कि दो सफेद पर्दों पर कुछ काली आकृतियां बनाई गई थीं। यदि मधुमक्खी कम संख्या में आकृति वाले पर्दे की ओर जाती तो पुरस्कार स्वरूप उसे मीठा शरबत मिलता था और यदि वह ज़्यादा आकृतियों वाले पर्दे की ओर पहुंचती तो उसे जो पानी मिलता उसमें कुनैन घुला होता था यानी एक तरह से उसे दंडित किया जाता था।

धीरेधीरे मधुमक्खियांसहीपर्दा चुनना सीख गईं। अब असली प्रयोग शुरू हुआ। इस प्रयोग में उन्हें दो विकल्प दिए गएएक पर्दे पर कुछ आकृतियां बनी थीं जबकि दूसरे पर्दे पर कोई आकृति नहीं थी। हालांकि मधुमक्खियों ने खाली पर्दा पहले कभी नहीं देखा था मगर जब एक या एक से अधिक आकृति और शून्य आकृति वाले पर्दों के बीच चुनाव का समय आया तो उन्होंने 64  प्रति­शत मर्तबा खाली पर्दा चुना।

अपने प्रयोग का ब्यौरा साइन्स शोध पत्रिका में देते हुए मेलबोर्न के आरएमआईटी विश्वविद्यालय के स्कारलेट हॉवर्ड और उनके साथी शोधकर्ताओं ने कहा है कि इस प्रयोग से यह पता चलता है कि मधुमक्खियां समझती हैं कि कुछकी तुलना मेंकुछ नहींकम होता है। यानी वेकुछ नहींको भी एक संख्या मानती हैं, अर्थात वे शून्य की अवधारणा जानती हैं।

इसी प्रयोग को एक अलग ढंग से भी किया गया था। कुछ मधुमक्खियों को अधिक संख्या में आकृति वाला पर्दा चुनने पर पुरस्कृत किया जाता था। बाद में उपरोक्तानुसारशून्यवाले प्रयोग में इन्होंने ज़्यादा बारी खाली पर्दे की बजाय एक या अधिक आकृतियों वाले पर्दे को चुना।

आम तौर पर माना जाता है कि शून्य की समझ ज़्यादा विकसित जंतुओं में ही होती है मगर उक्त प्रयोग से लगता है कि यह क्षमता जंतु जगत में व्यापक रूप से विद्यमान है। (स्रोत फीचर्स)

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गुरुत्व तरंग प्रयोग का और विश्लेषण

पिछले साल लिगो (लेज़र इंटरफेरोमीटर गुरुत्वतरंग प्रेक्षक) टीम ने दो न्यूट्रॉन तारों के परस्पर विलय के फलस्वरूप उत्पन्न हुई गुरुत्व तरंगों को पकड़ा था। वैज्ञानिकों का ख्याल है कि उस अवलोकन से जो आंकड़े मिले थे उनके विश्लेषण से नए-नए निष्कर्ष निकालने की अभी और संभावना है। यह काम किया भी जा रहा है।

हाल ही में उन आंकड़ों के नए सिरे से विश्लेषण के आधार पर न्यूट्रॉन तारों की आंतरिक संरचना के बारे में नए सुराग मिले हैं। न्यूट्रॉन तारा तब बनता है जब कोई विशाल तारा फूटता है और उसका अधिकांश पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाता है किंतु अंदर का पदार्थ अत्यंत घना हो जाता है। इतने घने पदार्थ का गुरुत्वाकर्षण भी बहुत अधिक होता है किंतु ब्लैक होल जितना नहीं होता।

पिछले साल अगस्त में जो गुरुत्व तरंगें देखी गई थीं वे पृथ्वी से 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर दो न्यूट्रॉन तारों के आपस में विलय की घटना में उत्पन्न हुई थीं। लेकिन तब यह नहीं बताया गया था कि इस विलय के बाद क्या बना – क्या विलय के उपरांत एक और न्यूट्रॉन तारा बना या ब्लैक होल?

अब उस विलय के आंकड़ों का एक बार फिर विश्लेषण किया गया है। विश्लेषण से पता यह चला है कि जब उक्त दो न्यूट्रॉन तारे एक दूसरे का चक्कर काटते हुए संयुक्त विनाश की ओर बढ़ रहे थे, तब उनकी परिक्रमा ऊर्जा अंतरिक्ष में बिखर रही थी। साथ ही अपने-अपने गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वे एक-दूसरे की सतह पर ज्वार भी उत्पन्न कर रहे थे। ज्वार-आधारित परस्पर क्रिया की वजह से उनकी परिक्रमा ऊर्जा और तेज़ी से कम हुई और उनकी टक्कर अपेक्षा से जल्दी हुई।

उपरोक्त ज्वारीय अंत र्क्रिया की प्रकृतिव परिमाण उन तारों की आंतरिक संरचना पर निर्भर होगा। वैज्ञानिकों का ख्याल है कि लिगो प्रेक्षण के दौरान जो आंकड़े मिले थे, उनका और अधिक बारीकी से विश्लेषण करके न्यूट्रॉन तारों की आंतरिक रचना के बारे में पता चल सकेगा। एक अनुमान यह भी है कि आंतरिक दबाव के चलते शायद उनमें न्यूट्रॉन और भी मूलभूत कणों (क्वार्क्स) में टूट गए होंगे और शायद हमें इनके बारे में कुछ और पता चले। तो प्रयोग के आंकड़ों की बाल की खाल निकालकर वैज्ञानिक अधिक से अधिक समझ बनाने की जुगाड़ में हैं। (स्रोत फीचर्स)

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प्रयोगशाला बनी आंत की लंबाई बढ़ाने की कोशिश

 वैज्ञानिकों ने मानव स्टेम कोशिकाओं को संवर्धित करने की तकनीक को इतना परिष्कृत कर लिया है कि अब प्रयोगशाला में मानव अंगों के छोटे रूप बनाए जा सकते हैं। ये वास्तविक अंग की सूक्ष्म अनुकृति होते हैं और इन्हें अंगाभ या ऑर्गेनॉइड कहते हैं। ये उस अंग के कामकाज की अच्छी नकल कर लेते हैं और इनका उपयोग उस अंग के कामकाज और बीमारियों के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। किंतु फिलहाल यह स्थिति नहीं आई है कि ऐसे अंगाभों का प्रत्यारोपण वास्तविक अंग की जगह किया जा सके। अब एक अध्ययन में पता चला है कि यदि मानव आंत के अंगाभ में कुछ स्प्रिंग का इस्तेमाल किया जाए तो उसकी लंबाई बढ़ने लगती है।

सामान्यत: शरीर में जब आंत का विकास होता है तो उसपर तमाम खिंचाव और तनाव के बल लगते हैं। इन बलों के प्रभाव से आंत लंबी होने लगती है। शोधकर्ताओं ने किया यह कि मानव स्टेम कोशिकाओं से ऊतक विकसित किया और उसे चूहे के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया। जब चूहे के शरीर में 10 सप्ताह तक इसका विकास हो चुका था, तब उन्होंने इसके अंदर एक स्प्रिंग को जिलेटिन में लपेट कर डाला। शुरू में स्प्रिंग अच्छे से दबाकर जिलेटिन में लपेट दी गई थी। इस दबी स्प्रिंग को चूहे के शरीर में विकसित हो रहे आंतअंगाभ के अंदर डाला तो जिलेटिन घुल गया और स्प्रिंग फैलने लगी।

जब अंगाभ को बगैर स्प्रिंग के पनपाया गया था तो उसकी लंबाई 0.5 से.मी. हो पाई थी जब किस्प्रिंग की मदद से वह 1.2 से.मी. लंबी हुई। नेचर बायोमेडिकल जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में टीम ने बताया है कि न सिर्फ इस अंगाभ की लंबाई ज़्यादा थी, इसमें आंत की कई अन्य रचनाएं भी विकसित हुईं। जैसे सामान्य आंत की अंदरुनी सतह पर उंगली जैसे उभार होते हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। ये विलाई आंत की अंदरुनी सतह का क्षेत्रफल बढ़ादेते हैं और आंत अवशोषण का अपना काम कहीं बेहतर ढंग से कर पाती है। यह भी देखा गया कि इस अंगाभ में पाचन तंत्र के कुछ जीन्स की भी बेहतर अभिव्यक्ति हुई।

इस सबके बावजूद अभी भी यह अंगाभ वास्तविक अंग या उसके खंड का स्थान लेने के लिए पर्याप्त नहीं है। किंतु शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यह प्रयोग चूहे के शरीर में किया गया था और चूहा अपेक्षाकृत छोटा जंतु है। यदि यही प्रयोग किसी बड़े जंतु में करेंगे तो उम्मीद है कि बेहतर नतीजे मिलेंगे और संभवत: एक दिन प्रत्यारोपण के लिए अंग बन पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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स्वास्थ्य और स्वच्छता को चुनौती देता ई-कबाड़ – नवनीत कुमार गुप्ता

भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल यानी एसोचैम के पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन परिषद के ताज़ा अध्ययन के अनुसार भारत दुनिया में सर्वाधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाला देश है। यहां हर वर्ष 13 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसका सिर्फ1.5 प्रतिशत भाग विभिन्न संगठित अथवा असंगठित इकाइयों में दोबारा इस्तेमाल योग्यबनाया जाता है।

असल में आज का युग उपभोक्तावाद का युग है और इस युग को तेज़ गति प्रदान की है सूचना तथा संचार क्रांति ने। अर्थ­व्यवस्था, उद्योगों तथा संस्थाओं सहित हमारे दैनिक जीवन में सूचना तथा संचार क्रांति तेज़ी से बदलाव ला रही है। एक ओर, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद हमारी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। वहीं दूसरी ओर यही उत्पाद, संसाधनों के अनियंत्रित उपभोग तथा भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न करने के लिए भी जिम्मेदार हैं। 

प्रौद्योगिकी का तेज़ विकास, तकनीकी आविष्कारों का आधुनिकीकरण तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में तेज़ी से बदलाव के कारण विश्व में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उत्पादन में भारी वृद्धि हो रही है। इलेक्ट्रॉनिक कचरा या कचरा इलेक्ट्रॉनिक तथा विद्युत उपकरणों से उत्पन्न होने वाले ऐसे सभी प्रकार के कचरे को कहते हैं, जिनकी अब मूल रूप में उप­योगिता नहीं रही है और जिन्हें दोबारा उपयोग लायक बनाने या पूरी तरह समाप्त कर देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए पुराने रेफ्रिजरेटर, खराब हो चुकी वॉशिंग मशीन, बेकार कंप्यूटर तथा प्रिंटर, टेलीविज़न, मोबाइल, आईपॉड, सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव इत्यादि। 

देश में उत्पन्न कचरे का 90% से अधिक भाग असंगठित बाज़ार में दोबारा इस्तेमाल के लिए अथवा नष्ट करने के लिए पहुंचता है। ये असंगठित क्षेत्रआम तौर पर महानगरों तथा बड़े शहरों की झुग्गीबस्तियों में होते हैं, जहां अकुशल कामगार लागत कम करने के उद्देश्य से बिलकुल अनगढ़ तरीकों से कचरे को दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाते हैं। ये कामगार खतरनाक परिस्थितियों जैसे, दस्तानों तथा मुखौटों का प्रयोग किए बिना कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया में कचरे से निकलने वाली गैसें, अम्ल, विषैला धुआं तथा विषैली राख कामगारों तथा स्थानीय पर्यावरण के लिए खतरनाक होती है

कचरे में कई प्रकार के प्रदूषण फैलाने वाले तथा विषैले पदार्थ होते हैं, जैसे, सर्किट बोर्ड में कैडमियम तथा लेड, स्विच तथा फ्लैट स्क्रीन मॉनिटर में पारा, पुराने कैपेसिटर्स तथा ट्रांसफार्मर्स में पोलीक्लोरिनेटेड बाईफिनाइल तथा प्रिंटेड सर्किट बोर्ड को जलाने पर निकलने वाली ब्रोमीनयुक्त आग। इन हानिकारक पदार्थों तथा विषैले धुएं के लगातार सम्पर्क में रहने से इस काम में लगे कामगारों में बीमारियां पनपती हैं। 

देश के 70 प्रतिशत कचरे का उत्पादन देश के 10 राज्यों में होता है, जिसमें 19.8 प्रति­शत योगदान के साथ महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। इसके बाद तमिलनाडु में 13.1 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 12.5 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 10.1 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 9.8 प्रतिशत, दिल्ली में 9.5 प्रतिशत, कर्नाटक में 8.9 प्रतिशत, गुजरात में 8.8 प्रतिशत तथा मध्यप्रदेश में 7.6 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन होता है।

देश में बढ़ते कचरे के खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कचरा प्रबंधन नियम, 2016 लागू किया है। 2018 में इसनियम में सुधार किया गया, ताकिदेश में कचरे के निस्तारण को दिशा दी जा सके तथा निर्धारित तरीके से कचरे को नष्टअथवा पुनर्चक्रित किया जा सके। कोशिश यह है किईकचरे को ठिकाने लगाने के क्षेत्रको मान्यता प्राप्त हो, कामगारों के स्वास्थ्यपर बुरा प्रभाव ना पड़े तथा वातावरण प्रदूषित हो।

नए नियमों में इलेक्ट्रॉनिक सामग्रियों के उत्पादकों के लिए उनके निस्तारण, प्रबं­धन तथा परिचालन के लिए दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि 2018 के संशोधन के बाद अब यह इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कचरे को एकत्र करके निस्तारण करें। इससे उत्पादक भी कम विषैले तथा पर्यावरण के अनुरूप उत्पाद तैयार करने के लिए प्रेरित होंगे, और उपभोक्ता स्वस्थ वातावरण में प्रौद्योगिकी के विकास का सार्थक एवं स्वस्थ उपयोग कर सकें (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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बैक्टीरिया का इलाज बैक्टीरिया से – डॉ. अरविंद गुप्ते

तपेदिक यानी टीबी की बीमारी सदियों से अनगिनत इंसानों की मृत्यु का कारण बन चुकी है। किसी रोग का इलाज तभी हो सकता है जब उसके कारण का पता हो। उन्नीसवीं शताब्दी में पता चला कि टीबी का रोग फेफड़ों में रहने वाले एक बैक्टीरिया, म्युको­बैक्टीरियम टयुबरकूलोसिस, के कारण होता है। बीसवीं शताब्दी के मध्य में एन्टीबायोटिक दवाओं का आविष्कार हुआ और इनके कारण टीबी का इलाज आसान हो गया। 

इलाज तो संभव हुआ किंतु अब एक नई समस्या सामने गई है। इस बैक्टीरिया की कुछ किस्मों पर दवाओें का असर होना बंद हो गया है और मरीज़ फिर इस रोग के शिकार होने लगे हैं। संसार में वर्तमान में लगभग एक करोड़ टीबी मरीज़ों में से लगभग 5 लाख मरीज़ों पर टीबी उपचार के परम्परागत दवा मिश्रण रिफेम्पिसिन और आइसो­नियाज़िड का असर नहीं हो रहा है। डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को यह डर सताने लगा है कि आने वाले दिनों में ये दवाप्रतिरोधी बैक्टीरिया महामारी का रूप धारण कर लेंगे और बड़ी संख्या में मौतें फिर होने लगेंगी। अतः टीबी की अधिक कारगर दवाओं की खोज तेज़ी से की जा रही है। हाल में इस खोज में आशा की एक धुंधलीसी किरण दिखाई दी है। इसे समझने के लिए थोड़ा विषयांतर करना होगा।

सिस्टिक फाइब्रोसिसनामक रोग के मरीज़ों के फेफड़ों और श्वसन तंत्र तथा शरीर के अन्य भागों में सामान्य से अधिक चिपचिपा पदार्थ श्लेष्मा भरा होता है। इस चिपचिपे पदार्थ की अधिकता के कारण मरीज़ों को केवल सांस लेने में बहुत तकलीफ होती है, बल्कि पाचन अन्य क्रियाओं में भी परेशानी होती है। इस श्लेष्मा में बर्खोल्डेरिया ग्लैडिओली नामक एक बैक्टीरिया बहुतायत से पाया जाता है। ब्रिटेन के कार्डिफ विश्वविद्यालय के डॉ. ईश्वर महेन्तिरालिंगम और ब्रिटेन के ही वॉरिक विश्वविद्यालय के डॉ. ग्रेग चैलिस ने इस बैक्टीरिया द्वारा बनाया जाने वाला एक रसायन खोजा है जिसे उन्होंने ग्लॅडिओलिन नाम दिया है। इस पदार्थ की विशेषता यह है कि यह अन्य बैक्टीरिया के जीवित रहने के लिए आवश्यक एक एंज़ाइम को निष्क्रिय करके उन्हें मार देता है। यह एंज़ाइम एक आरएनए पॉलीमरेज़ होता है। इससे टीबी के बैक्टीरिया की दवा प्रतिरोधक किस्में भी मारी जाती हैं। जाहिर है, ग्लैडिओलिन का असर स्वयं बर्खोल्डेरिया पर नहीं होता जो इसे बनाता है।

ग्लैडिओलिन के परीक्षण के दौरान एक रोचक तथ्य सामने आया। टीबी की परम्परागत दवा रिफेम्पिसिन और आइसोनियाज़िड ऐसे बैक्टीरिया के खिलाफकारगर होती हैं जिनमें इनके खिलाफ प्रतिरोध क्षमता विकसित नहीं हुई है। ग्लैडिओलिन इन बैक्टीरिया के खिलाफ कारगर नहीं होता। किंतु रिफेम्पिसिन और आइसोनियाज़िड जिन प्रतिरोधी बैक्टीरिया का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, ग्लैडिओलिन उनके खिलाफ काफी असरकारक होता है।

इस शोध कार्यसे यह उम्मीद जागी है कि दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता वाले बैक्टीरिया जनित टीबी का इलाज संभव हो सकेगा, किंतु इसका अंतिम परिणाम तभी सामने आएगा जब इस दवा का पर्याप्त परीक्षण हो जाएगा। सन 2007 में इसी प्रकार की एटान्जिन नामक एक दवा खोजी गई थी जो बैक्टीरिया के जीवन के लिए आवश्यक एंज़ाइम आरएनए पॉलिमरेज को निष्क्रिय कर देती है। किंतु बाद में किए गए परीक्षणों में यह पाया गया कि एटान्जिन रासायनिक रूप से अस्थायी होती है और इसी कारण इसे दवा के रूप में बाज़ार में नहीं लाया जा सकता। तो अभी इन्तज़ार करें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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