सेप्सिस का अदृश्य खतरा और हमारी स्वास्थ्य रणनीति

कुमार सिद्धार्थ एवं डॉ. सम्‍यक जैन

मारे देश के मौजूदा स्वास्थ्य परिदृश्य में, जहां डेंगू, मलेरिया, टीबी, हृदय रोग और मधुमेह़ जैसी बीमारियां पहले से ही भारी दबाव पड़ रही हैं, सेप्सिस एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है जो अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन सबसे घातक साबित होता है। देश के अस्पतालों में सेप्सिस अब एक रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। गहन चिकित्‍सा कक्ष (ICU) में भर्ती हर चौथा मरीज़ किसी न किसी संक्रमण से उपजी सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में पाया जाता है। नवजात मृत्यु के कारणों की पड़ताल करें तो लगभग एक-तिहाई मौतें सीधे सेप्सिस से जुड़ी मिलती हैं।

ग्रामीण भारत में यह स्थिति और भी घातक रूप ले लेती है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और संक्रमण की पहचान अक्सर देर से होती है। कई बार समय पर एंटीबायोटिक या सही हस्तक्षेप न मिलने पर मरीज़ कुछ ही घंटों में मौत के करीब पहुंच जाता है।

दरअसल, सेप्सिस को केवल संक्रमण की जटिलता मानना भ्रामक है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अनियंत्रित होकर अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है और संक्रमण से पैदा हुई सूजन पूरे शरीर में फैलकर दिल, फेफड़ों, गुर्दों और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा देती है। सरल शब्दों में, सेप्सिस संक्रमण के कारण शरीर का अपने ही खिलाफ सिर उठाना है। और, यही इसे इतना घातक और उग्र बना देता है।

हमारे देश में सेप्सिस की भयावहता इस बात से भी साफ होती है कि अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीज़ों के लिए मृत्यु का बड़ा कारण अब यही बनता जा रहा है। नवजात शिशुओं में यह स्थिति कई बार जन्म के तुरंत बाद होने वाले संक्रमणों से उभरती है। प्रसूता-गर्भवती महिलाओं, बुजु़र्गों और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

हमारे देश में सेप्सिस एक छिपी महामारी की तरह व्यवहार करता है। अन्य बीमारियों की अंतिम और सबसे घातक कड़ी अक्सर यही बनता है। इसलिए सेप्सिस को अब एक अलग स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए विशेष रणनीति तैयार करने की ज़रूरत है।

आंकड़े बताते है कि दुनिया भर में सेप्सिस हर साल एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान लेता है, जो वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन और ग्‍लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ के अध्ययन बताते हैं कि सेप्सिस की सर्वाधिक मार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ती है, जिनमें भारत भी शामिल है। अपने देश में वर्ष 2017 के अनुमान के अनुसार लगभग 1 करोड़ 13 लाख मामले और करीब 29 लाख मौतें इसी के कारण हुई हैं। आईसीयू आधारित शोध बताते हैं कि देश के गहन चिकित्सा कक्षों में हर दो में से एक मरीज़ किसी न किसी रूप में सेप्सिस से पीड़ित पाया जाता है, और ऐसे मरीज़ों की अस्पताल मृत्यु दर 30–40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। नवजात शिशुओं में यह बोझ और भी भारी है, जहां करीब एक-तिहाई मौतें संक्रमणजन्य सेप्सिस से जुड़ी पाई गई हैं।

लेकिन इस गंभीर बीमारी पर हो रहे शोध की स्थिति निराशाजनक है। दुनिया और भारत में, सेप्सिस पर होने वाला अधिकांश वैज्ञानिक कार्य अभी भी उस पुराने ढांचे पर टिका है, जिसमें चूहों, खरगोशों, गिनी पिगों, बकरियों, कुत्तों और कभी-कभी बंदरों तक पर प्रयोग किए जाते हैं। इन जानवरों को प्रयोगशाला की परिस्थितियों में जबरन संक्रमित किया जाता है, आंतों में छेद करके बैक्टीरिया फैलाया जाता है या उन्हें बैक्टीरियल ज़हर की उच्च खुराक दी जाती है। लेकिन मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया इन जानवरों से इतनी अलग है कि ऐसे प्रयोगों से मिलने वाले परिणाम मनुष्यों पर लगभग कभी लागू नहीं होते।

पिछले चार दशकों में डेढ़ सौ से अधिक ऐसी दवाएं रही हैं, जो चूहों या अन्य जंतुओं में सेप्सिस का इलाज करती दिखीं, पर मानव परीक्षण में पूरी तरह असफल रहीं। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों, जैसे – स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, एनआईएच आदि का निष्कर्ष है कि जंतु-आधारित मॉडल सेप्सिस का मानव स्वरूप समझने के लिए विश्वसनीय साधन नहीं हैं।

अपने देश में भी स्थिति अलग नहीं है। आईसीएमआर के कई प्रतिष्ठित केंद्र, कुछ ऐम्‍स संस्थान और निजी बायोमेडिकल प्रयोगशालाएं आज भी जंतु-आधारित मॉडल को सेप्सिस अध्ययन का आधार बनाए हुए हैं। इन परीक्षणों की पारदर्शिता कम है और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक परिणाम अत्यंत सीमित। जिस बीमारी के कारण अस्पतालों में लाखों मरीज़ चुपचाप मौत के करीब पहुंच रहे हों, उसके शोध का तरीका अगर मानव-प्रासंगिक न हो तो समाधान हमेशा दूर ही बना रहेगा।

अलबत्ता, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ वैज्ञानिक संस्थान नई दिशाएं भी टटोल रहे हैं। आईआईटी मद्रास का ऑर्गन्स-ऑन-चिप्स कार्यक्रम, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) का सेप्सिस प्रेडिक्शन मॉडल, ऐम्‍स दिल्ली में नवजात सेप्सिस के लिए विकसित बायोमार्कर और कुछ निजी प्रयोगशालाओं में एआई आधारित सेप्सिस अलर्ट सिस्टम ये सब संकेत देते हैं कि भारत आधुनिक, मानव-आधारित विज्ञान अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दुनिया भर में अब एआई-आधारित निदान और कम्प्यूटेशनल सिमुलेशन को भविष्य की दिशा माना जा रहा है। ये पद्धतियां न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि जानवरों पर होने वाली क्रूरता और वैज्ञानिक विफलताओं से भी मुक्त हैं।

भारत में सेप्सिस की भयावहता जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से हमें विज्ञान की दिशा बदलने की ज़रूरत है। आधुनिक तकनीकें हमारे सामने उपलब्ध हैं। ज़रूरत सिर्फ यह है कि हम पुरानी, अप्रासंगिक और अमानवीय शोध पद्धतियों को पीछे छोड़कर वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक, मानवीय और प्रभावी मॉडल अपनाएं। सेप्सिस के खिलाफ यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम विज्ञान और संवेदना दोनों के सही मिश्रण के साथ आगे बढ़े। भारत को स्वास्थ्य विज्ञान के इस नए युग में कदम रखने की आवश्यकता है। यह  परिवर्तन न सिर्फ लाखों लोगों की जान बचा सकता है बल्कि अनगिनत जानवरों को अनावश्यक और पीड़ादायक प्रयोगों से भी मुक्त कर सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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