जेनेटिक्स और स्कूल में बिताए वर्ष

हाल ही में सम्पन्न एक अध्ययन में यह देखने की कोशिश की गई है कि किसी व्यक्ति के जीन्स और स्कूली शिक्षा के बीच क्या सम्बंध है। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता सदर्न कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डेनियल बेंजामिन ने कहा है कि इसके परिणामों को बहुत सावधानीपूर्वक समझने की ज़रूरत है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने शोध पत्र के साथ इस विषय पर कुछ आम सवालों के जवाब भी दिए हैं।

पिछले पांच वर्षों में बेंजामिन और उनकी टीम ने यह समझने की कोशिश की है कि मानव जीनपुंज में कौनसी भिन्नताओं का सम्बंध इस बात से है कि आप कितने वर्षों की स्कूली शिक्षा हासिल करेंगे। 2013 में उनकी टीम ने युरोपीय मूल के 1 लाख से ज़्यादा लोगों के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) का विश्लेषण करके पाया था कि मात्र तीन जेनेटिक भिन्नताएं स्कूली शिक्षा के वर्षों को प्रभावित करती हैं। इसके बाद 2016 में उन्होंने अपने अध्ययन का साइज़ तिगुना किया और 71 और भिन्नताएं पहचानीं।

इस टीम ने ऐसा ही अध्ययन अब युरोपीय मूल के 11 लाख लोगों पर किया है और इस बार उन्हें 1271 शिक्षासम्बंधी भिन्नताएं मिली हैं। टीम ने गणित में दक्षता और दिमागी क्षमता के परीक्षणों से जुड़े जीन्स भी देखे हैं। टीम का कहना है कि उन्होंने शिक्षा के जीन्सकी खोज नहीं की है बल्कि उपरोक्त में से कई जीन्स गर्भस्थ व नवजात शिशु में सक्रिय होते हैं और उनमें तंत्रिकाओं व मस्तिष्क की अन्य कोशिकाओं के निर्माण को और उनके द्वारा बनाए जाने वाले रसायनों तथा नई सूचनाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं।

टीम ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने ऐसा कोई जीन नहीं खोजा है जो स्कूल में बने रहने के वर्षों का निर्धारण करता है। और तो और, टीम के मुताबिक ये सारे जीन्स मिलकर भी लोगों के शैक्षिक भाग्य का निर्धारण नहीं करते। जब उन्होंने उपरोक्त 1271 जीन भिन्नताओं के आधार पर एक बहुजीन स्कोर बनाया तो उसके आधार पर स्कूली शिक्षा के वर्षों की मात्र 11 प्रतिशत व्याख्या हो पाई।

शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके इन परिणामों की व्याख्या सामाजिकआर्थिक संदर्भों में तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संदर्भों में की जानी चाहिए। उनका अध्ययन बच्चों को छांटने का नहीं बल्कि शिक्षा प्रणाली में सुधार का आधार बनना चाहिए। उदाहरण के लिए उनका कहना है कि आज से कुछ दशक पहले यदि ऐसा अध्ययन किया जाता तो पता चलता कि एक्स और वाय गुणसूत्र की उपस्थिति स्कूली शिक्षा का निर्धारण करती है। गौरतलब है कि दो एक्स गुणसूत्र हों तो लड़की और एक एक्स व एक वाय गुणसूत्र होने पर लड़का बनता है। इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि लड़के स्कूली शिक्षा में लड़कियों की तुलना में ज़्यादा अनुकूल हैं। इसके आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्व में समाज का गठन इस प्रकार हुआ था कि लड़कियों की शिक्षा को बहुत कम महत्व दिया जाता था। इसी तरह आज कुछ जीन्स शिक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण नज़र आ रहे हैं, तो इसलिए कि शिक्षा व्यवस्था उन जीन्स को ज़्यादा महत्व देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मल-जल के विश्लेषण से नशीली दवाइयों की निगरानी

चीन में वैज्ञानिक और पुलिस मिलकर नशीली दवाइयों के उपयोग व उनकी रोकथाम की निगरानी करने के लिए मल-जल (सीवेज) के नमूनों की जांच का सहारा ले रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका काफी कारगर हो सकता है और अन्य देशों में भी अपनाया जा सकता है। इस तरीके में किया यह जाता है कि मल-जल के नमूनों में नशीली दवाइयों और उनके विघटन से बने रसायनों की जांच की जाती है।

उदाहरण के लिए, चीन के दक्षिणी शहर ज़ोंगशान में नशीली दवाओं के सेवन को कम करने के लिए चलाए जा रहे एक कार्यक्रम की सफलता को जांचने के लिए इस तरीके का उपयोग किया गया है। इस विधि को मल-जल आधारित तकनीक कहा जा रहा है। ज़ोंगशान पुलिस द्वारा इसकी मदद से नशीली दवाइयों के एक निर्माता को गिरफ्तार भी किया गया है।

वैसे बेल्जियम, नेदरलैंड, स्पेन और जर्मनी जैसे कई अन्य देशों में भी इस तकनीक के अध्ययन चल रहे हैं। किंतु इन देशों में इस तकनीक का उपयोग मात्र आंकड़े इकट्ठे करने के लिए किया जा रहा है जबकि चीन में इन आंकड़ों के आधार पर नीतिगत निर्णय किए जा रहे हैं और कार्रवाई की जा रही है। इस सम्बंध में चीन के राष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग का कहना है कि नशीली दवाइयों के खिलाफ युद्ध उनके देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।

इस तकनीक के विभिन्न अध्ययनों में मल-जल में किसी नशीली दवा या उसके विघटन से बने पदार्थों के विश्लेषण से उभरी तस्वीर और अन्य विधियों से दवाइयों के उपयोग की तस्वीर काफी मिलती-जुलतीरही हैं। मसलन, 2016 में युरोप के आठ शहरों में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि मल-जल में उपस्थित कोकेन और दवाइयों की जब्ती से प्राप्त आंकड़ों के बीच समानता थी। अलबत्ता, ऐसा लगता है कि कुछ दवाइयों के संदर्भ में दिक्कत है। जैसे मेट-एम्फीटेमिन्स के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़े मेल नहीं खाते। बहरहाल वैज्ञानिक सहमत हैं कि मल-जल परीक्षण नशीली दवाइयों के उपयोग का ज़्यादा वस्तुनिष्ठ तरीका है।

इस संदर्भ में यह बात भी सामने आई है कि इस तकनीक का उपयोग ड्रग्स-विरोधी अभियानों के मूल्यांकन हेतु भी किया जा सकता है। जैसे, पेकिंग विश्वविद्यालय के पर्यावरण रसायनज्ञ ली ज़ीक्विंग और उनके दल ने चीन के विभिन्न स्थानों के मल-जल में दो नशीली दवाइयों – मेथ-एम्फीटेमिन और किटेमीन – का मापन किया था। यह मापन इन दवाइयों के खिलाफ चलाए गए अभियान के दो वर्ष पूरे होने पर एक बार फिर किया गया। पता चला कि मेथ-एम्फीटेमीन का उपयोग 42 प्रतिशत तथा किटेमीन का उपयोग 67 प्रतिशत कम हुआ था। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बीमारी की गोपनीयता पर उठे नैतिकता के सवाल

रीज़ का इलाज करते समय चिकित्सकों के कुछ दायित्व होते हैं। कुछ देशों में डॉक्टर का अपने मरीज़ के मर्ज़ को गोपनीय रखना एक महत्वपूर्ण दायित्व है, चाहे मर्ज़ कितना भी गंभीर हो।

गोपनीयता के इस दायित्व के साथ अधिकार सम्बंधी सवाल उठे हैं। जैसे यदि मरीज़ की ऐसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी का पता चलता है जिसके उसके बच्चों में होने की संभावना हो तो इस परिस्थिति में डॉक्टर के दायित्व क्या और किसके प्रति होंगे? एक तरफ तो मरीज़ की गोपनीयता का सवाल है और दूसरी ओर मरीज़ के परिजनों को बीमारी होने की आशंका के बारे में उन्हें जानने का हक है।

साल 2013 में एक मामला सामने आया था। एक महिला ने अदालत में मुकदमा दायर किया था कि डॉक्टर ने उन्हें पिता की गंभीर आनुवंशिक बीमारी (हंटिंगटन) के बारे मे आगाह नहीं किया। उस वक्त भी नहीं जब वह गर्भवती थी। बीमारी की गंभीरता जानते हुए डॉक्टर को पिता की मर्ज़ी के खिलाफ उन्हें आगाह करना चाहिए था ताकि वे शिशु को जन्म देने के निर्णय को बदल पातीं।

2017 में यूके की एक अदालत ने कहा था कि यदि बीमारी गंभीर आनुवंशिक हो तो डॉक्टर के दायित्व का दायरा उसके परिजनों तक बढ़ जाता है। किंतु इसके चलते मरीज़ और डॉक्टर के बीच का विश्वास टूटता है। उम्मीद है कि 2019 में यह केस ट्रायल के लिए जाएगा। कोर्ट शायद यह कहे कि यदि बीमारी आनुवंशिक हो तो गोपनीयता का दायरा मरीज़ के बच्चों तक बढ़ जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो मरीज़ के परिजन मरीज़ के रिकार्ड की मांग करने लगेंगे। पिछले कई सालों में इस तरह के और भी मामले उठे हैं।

लाइसेस्टर लॉ स्कूल के लेक्चरर रॉय गिबलर और ग्रीन टेम्पटन कॉलेज के प्रोफेसर चाल्र्स फोस्टर का कहना है कि उपरोक्त फैसला ना सिर्फ मरीज़ के प्रति डॉक्टर के दायित्व को फिर से परिभाषित कर सकता है बल्कि ‘मरीज़’की परिभाषा को भी बदल सकता है।

एडिनबरा युनिवर्सिटी के चिकित्सा न्यायशास्त्र के प्रोफेसर ग्रेएम लॉरी के मुताबिक यह डॉक्टर के लिए असमंजस की स्थिति होगी कि उनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी किसके प्रति है – मरीज़ के प्रति या उसके परिजन के प्रति। हो सकता है डॉक्टर बीमारी को सिर्फ इसलिए उजागर करें क्योंकि यह कानूनी तौर पर ज़रूरी माना जाएगा।

गोपनीयता से सम्बंधित एक अध्ययन में गंभीर आनुवंशिक बीमारी को परिजनों को बताए जाने के बारे में डॉक्टर, मरीज़ और लोगों की राय ली गई थी। देखा गया कि ज़्यादातर लोग गंभीर बीमारियों के बारे में अपने परिजनों को बता देते हैं या बताना चाहते हैं। पर कुछ लोग दोषी ठहराए जाने, ताल्लुक अच्छे ना होने, सही वक्त ना होने, साफ-साफ ना कह पाने जैसे कारणों के चलते नहीं बता पाते। एक अध्ययन में 30 प्रतिशत मरीज़ उनकी बीमारी के बारे में उनकी मर्ज़ी के खिलाफ परिजनों को बताने के पक्ष में थे जबकि 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसके लिए डॉक्टर को सज़ा मिलनी चाहिए। एक अन्य अध्ययन में एक चौथाई से भी कम मरीज़ उनकी मर्ज़ी के विपरीत परिजनों के बताने के पक्ष में थे जबकि एक अन्य अध्ययन में रिश्तेदारों के नज़रिए से सोचने पर आधे से ज़्यादा लोग परिजनों को बताने के पक्ष में थे।

आनुवंशिक बीमारियो के मामले में दो अंतर्राष्ट्रीय संधियां ‘ना जानने के अधिकार’के बारे में बात करती हैं। यदि यह फैसला आता है तो उन लोगों के इस अधिकार के बारे में क्या होगा जो बीमारी होने की आशंका के बारे में नहीं जानना चाहते और बेखौफ ज़िंदगी बिताना चाहते हैं। मामला काफी पेचीदा है और निष्कर्ष आसानी से निकलने वाला नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मंगल ग्रह के गड्ढों से उसके झुकाव की जानकारी

ह तो हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी का अक्ष या धुरी 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इस कारण से इसके उत्तरी ध्रुव का झुकाव कभी सूरज की ओर हो जाता है तो कभी दूर हो जाता है। इस झुकाव के चलते हमें विभिन्न मौसम मिलते हैं। मंगल सहित अन्य ग्रहों की धुरियां भी झुकी हुई हैं हालांकि प्रत्येक के झुकाव का कोण अलग-अलग है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने पिछले 3.5 अरब वर्षों में मंगल के झुकाव में आए बदलाव का खुलासा किया है। इस अध्ययन के परिणामों से पता चल सकता है कि लाल ग्रह पर बर्फ कितनी बार पिघलकर पानी बना होगा।

अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने मंगल के विभिन्न कंप्यूटर मॉडल तैयार किए। प्रत्येक मॉडल में ग्रह अलग-अलग कोण पर झुका हुआ था। अब उन्होंने ग्रह के प्रत्येक मॉडल पर क्षुद्रग्रहों की बौछार की। देखा गया कि अधिक झुकाव वाले मॉडलों पर क्षुद्रग्रहों की बौछार से निर्मित अंडाकार क्रेटर बड़ी तादाद में मॉडल पर समान रूप से वितरित हुए थे। दूसरी ओर, झुकाव रहित मॉडल्स में क्षुद्रग्रहों की टक्कर के बाद अंडाकार क्रेटर भूमध्य (मंगलमध्य) रेखा के इर्द-गिर्द पाए गए। ऐसे अंडाकार क्रेटर तब बनते हैं जब कोई उल्का ग्रह की सतह से न्यून कोण पर (क्षितिज के लगभग समांतर) टकराए। यदि उल्का लंबवत गिरे या लगभग लंबवत गिरे तो क्रेटर वृत्ताकार बनता है।

अब शोधकर्ताओं ने मंगल की वास्तविक सतह पर उपस्थित 1500 से अधिक अंडाकार क्रेटर्स को देखा और उनके वितरण की तुलना मॉडलों से की। इस तुलना के आधार पर उनका निष्कर्ष है कि अतीत में मंगल 10 डिग्री से लेकर 30 डिग्री के बीच झुका हुआ था। वर्तमान में यह 25 डिग्री झुका है। शोधकर्ताओं ने अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंस लेटर्स में बताया है कि अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के चलते समय के साथ मंगल के झुकाव में परिवर्तन आया है। लेकिन उनका यह भी विचार है कि पिछले कुछ अरब वर्षों में अधिक से अधिक 20 प्रतिशत समय मंगल का झुकाव 40 डिग्री से अधिक रहा होगा।

टीम के अनुसार इतने लंबे समय तक मंगल ग्रह के कम झुकाव के चलते काफी भूमिगत स्रोत सूख गए होंगे। किंतु सारे स्रोत नहीं सूखे होंगे क्योंकि मंगल पर पानी का एक भूमिगत स्रोत हाल ही में खोजा गया है।(स्रोत फीचर्स)

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गोताखोरों के अध्ययन में नैतिक नियमों का उल्लंघन

प्रैल माह में इंडोनेशिया के बजाऊ समुदाय पर हुए अध्ययन ने मानव के चलते हुए विकास का एक आकर्षक उदाहरण प्रस्तुत करके दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा। इस समुदाय के पुरुष मछली और जलीय जीवों का शिकार करने के लिए अपना अधिकतर समय पानी के अंदर व्यतीत करते हैं। 2015 में इलार्डो ने 59 बजाऊ व्यक्तियों के अध्ययन के आधार पर पाया कि अन्य लोगों की तुलना में बजाऊ समुदाय के लोगों के स्पलीन बड़े होते हैं। ये बड़े स्प्लीन लंबे गोतों के दौरान अतिरिक्त रक्त कोशिकाएं मुक्त करके हाइपॉक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) को संभालने में मदद करते हैं। शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार एक जीन की पहचान भी की है।

लेकिन सेल में प्रकाशित इस अध्ययन ने इंडोनेशिया में अलग तरह की हलचल पैदा की है। यहां के कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि यह “हवाई शोध”का एक उदाहरण है जिसमें समृद्ध देशों के वैज्ञानिक स्थानीय नियमों और ज़रूरतों की परवाह नहीं करते।

इंडोनेशियाई अधिकारियों के अनुसार शोध दल ने स्थानीय समीक्षा बोर्ड से नैतिक अनुमोदन प्राप्त नहीं किया और बिना अनुमति डीएनए नमूने देश से बाहर ले गया। एक शिकायत यह भी है कि अध्ययन में शामिल एकमात्र स्थानीय शोधकर्ता के पास विकास या आनुवंशिकी में कोई विशेषज्ञता नहीं थी।

लेकिन टीम के प्रमुख, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय सेंटर फॉर जियोजेनेटिक्स के निदेशक एस्के विलरस्लेव के अनुसार टीम के पास इंडोनेशिया के सम्बंधित मंत्रालय से अध्ययन करने की अनुमति थी और डेनमार्क नैतिकता समिति से भी नैतिक मंज़ूरी मिली थी। उन्हें यह बताया गया था कि मंत्रालय से मिली अनुमति में सभी स्थानीय अनुमतियां भी शामिल हैं। लेकिन वास्तव में टीम को इंडोनेशिया के एक नैतिक पैनल से भी अनुमोदन लेना चाहिए था; चिकित्सा विज्ञान शोध सम्बंधी अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देश भी स्थानीय अनुमोदन की मांग करते हैं।

इस अध्ययन में शामिल रही इलार्डो ने मंत्रालय के साथ एक सामग्री स्थानांतरण समझौता भी संलग्न किया था। लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जकार्ता के अध्यक्ष सिस्वान्टो ने बताया कि टीम को मानव डीएनए के हस्तांतरण के लिए इस संस्था से मंज़ूरी लेनी चाहिए थी। इलार्डो का कहना है कि यह बात पहले ही बता देना चाहिए था।

इंडोनेशिया के संस्थानों ने उचित सहयोग की कमी, स्थानीय लोगों को शोध में न रखना, छोटे प्राइवेट संस्थानों के शोधकर्ता को शामिल करने जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया है। इन सब समस्याओं से विदेशी अनुसंधान को लेकर चिताएं झलकती हैं। भारत में भी कई विदेशी संस्थान शोध कार्य करते हैं। और कई बार ऐसी दिक्कतें सामने आती हैं। लिहाज़ा कोई प्रोटोकॉल बनाया जाना ज़रूरी लगता है। (स्रोत फीचर्स)

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मिट्टी में आर्सेनिक विषाक्तता – सरोज कुमार सान्याल

हालांकि भूमिगत जल में व्यापक आर्सेनिक प्रदूषण भारत के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बंगाल डेल्टा बेसिन के इलाकों तक सीमित है किंतु भारत के कई हिस्सों और राज्यों के भूमिगत जल में भी आर्सेनिक पाया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक की सुरक्षित मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है। किंतु वर्तमान में पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, त्रिपुरा और नागालैंड राज्यों के भूमिगत जल में 50 से 3700 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक आर्सेनिक पाया गया है। भूमिगत जल में आर्सेनिक पाए जाने के कुछ भूगर्भीय कारण माने जाते हैं। अब तक आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में सबसे अधिक ध्यान पेयजल पर दिया जा रहा था जबकि इन इलाकों में भूमिगत जल का उपयोग पेयजल से ज़्यादा सिंचार्इं में किया जाता है। आर्सेनिक युक्त भूमिगत जल वाले इलाकों में सिंचाई के कारण मिट्टीपौधेमनुष्य शृंखला पर होने वाले असर पर अध्ययन बहुत कम हुए हैं। वास्तव में बंगाल डेल्टा बेसिन समेत आर्सेनिक प्रभावित अन्य क्षेत्रों में इस तरह के शोध की आवश्यकता है। आर्सेनिक प्रदूषण के मुख्य कारण को पहचानना महत्वपूर्ण है। जहां पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का स्रोत एक बिंदु पर सिमटा होता है, वहीं खेती में आर्सेनिक प्रदूषित भूजल से सिंचाई के माध्यम से मानवखाद्य  शृंखलामेंफैलताहैऔरखाद्य शृंखलामेंआगेबढ़ते हुए इसकी गंभीरता बढ़ती है। इस लेख में आर्सेनिक प्रदूषण के महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों के साथसाथ इसके समाधान की सूची बनाने का प्रयास किया है। इसमें लोगों की भागीदारी अहम होगी। साथ ही उचित नीतियों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है।

भूमिका

आर्सेनिक फारसी शब्द ज़ार्निक से आया है जो यूनानी में आर्सेनिकॉन हुआ। हिंदी में इसे संखिया कहते हैं। पर्शिया और अन्य जगहों के लोग आर्सेनिक का उपयोग प्राचीन काल से करते रहे हैं। आर्सेनिक शाही ज़हरऔर ज़हर का राजानाम से भी मशहूर है।

कांस्य युग में आर्सेनिक कांसे में अशुद्धि के रूप में मौजूद होता था जिससे धातु कठोर हो जाती थी। माना जाता है कि अल्बर्टस मैग्नस ने 1250 ईस्वीं में इस तत्व को सबसे पहले पृथक किया था। आर्सेनिक का उपयोग कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है। कीटनाशकों के छिड़काव से मानव खाद्य और पर्यावरण में आर्सेनिक प्रदूषण हुआ है जिसका लोगों और उनकी अगली पीढ़ी के स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। भूमिगत आर्सेनिक दुनिया की कई जगहों के पेयजल स्रोतों को प्रभावित करता है। लगातार सालों तक प्रदूषित पानी पीने की वजह से लाखों लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

मिट्टी, पानी, वनस्पति, पशु और मानव में विषैले आर्सेनिक की मौजूदगी पर्यावरणीय चिंता का विषय है। जैवमंडल में इसके अति विषैलेपन और बढ़ी हुई मात्रा ने सार्वजनिक और राजनीतिक चिंता को जन्म दिया है। अर्जेंटाइना, चिली, फिनलैंड, हंगरी, मेक्सिको, नेपाल, ताइवान, बांग्लादेश और भारत समेत दुनिया के 20 देशों में भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण और इसके कारण मानव स्वास्थ सम्बंधी समस्या दर्ज हुई है। सबसे अधिक प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या बांग्लादेश में है। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। बंगाल डेल्टा बेसिन के लाखों लोग खतरे में हैं। पश्चिम बंगाल में भागीरथी नदी के किनारे बसे 5 ज़िलों और इसकी सीमा से लगे बांग्लादेश के ज़िलों में मुख्य रूप से भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण है। बंगाल डेल्टा बेसिन के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से भी अधिक निकली है। इसके अलावा चट्टानों, अन्य पदार्थों और पानी के विभिन्न स्रोतों में आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है।

अधिकतम की सीमा

डब्ल्यूएचओ ने अस्थायी तौर पर पेयजल में आर्सेनिक की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है क्योंकि इससे कम स्तर के प्रदूषण का मापन बड़े पैमाने पर संभव नहीं है। भारत और बांग्लादेश समेत कई देशों में डब्ल्यूएचओ की इससे पूर्व 1971 में निर्धारित स्वीकार्य सीमा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर थी। हाल ही में भारत ने भी पेयजल में आर्सेनिक की स्वीकार्य सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है।

मनुष्यों में अकार्बनिक आर्सेनिक यौगिकों के कारण कैंसर होने के पर्याप्त प्रमाण और जानवरों में सीमित प्रमाण मिले हैं। इसी आधार पर अकार्बनिक आर्सेनिक यौगिकों के समूह को कैंसरजनक समूह में रखा गया है। इसलिए पेयजल में आर्सेनिक की उपस्थिति की स्वीकार्य सीमा को घटाकर 5 माइक्रोग्राम प्रति लीटर करना विचाराधीन है। किंतु कार्बनिक आर्सेनिक की कैंसरकारिता के पर्याप्त प्रमाण नहीं है। 1983 में एफएओ/डब्ल्यूएचओ की एक संयुक्त विशेषज्ञ समिति द्वारा मनुष्यों द्वारा अकार्बनिक आर्सेनिक के दैनिक सेवन की अधिकतम सीमा शरीर के प्रति किलोग्राम वज़न पर 2.1 माइक्रोग्राम तय की गई है। इसके बाद 1988 में साप्ताहिक स्वीकार्य सेवन की सीमा शरीर के प्रति किलोग्राम वजन पर 15 माइक्रोग्राम निर्धारित की गई। किंतु इस तरह के मानक मिट्टी, पौधे और पशुओं के लिए निर्धारित नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल के प्रभावित क्षेत्रों के भूमिगत जल में आर्सेनिक सांद्रता (50-3700 माइक्रोग्राम प्रति लीटर) भारत और डब्ल्यूएचओ की निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक है। इसके अलावा, पंजाब के भूमिगत जल में आर्सेनिक सांद्रता 4 से 688 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक है। 1978 में पहली बार पश्चिम बंगाल में भूजल में आर्सेनिक की निर्धारित सीमा से अधिक उपस्थिति का पता चला था और मनुष्यों में आर्सेनिक के विषैले असर का पहला मामला 1983 में कलकत्ता के स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन में सामने आया था। पेयजल में अकार्बनिक आर्सेनिक और वयस्कों में इसके स्वास्थ्य सम्बंधी प्रभावों को चिकित्सक भलीभांति स्थापित कर चुके हैं।

अब तक भूमिगत जल में आर्सेनिक की उपस्थिति को पेयजल की समस्या के तौर पर ही देखा जा रहा था जबकि पश्चिम बंगाल के इन इलाकों में भूमिगत जल का उपयोग सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। तो मिट्टी और कृषि उपज में आर्सेनिक अधिक मात्रा में होने की संभावना है। दरअसल आर्सेनिक युक्त मिट्टी में खेती और आर्सेनिक युक्त जल से सिंचाई के कारण कृषि उपज में आर्सेनिक पहुंचने की बात कई शोधकर्ता बता चुके हैं। इस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है। जहां पेयजल में आर्सेनिक की समस्या किसी ट्यूब वेल जैसे स्पष्ट स्रोत से जोड़ी जा सकती है वहीं कृषि उपज में आर्सेनिक की उपस्थिति एक विस्तृत और अनिश्चितसा स्रोत है। इस बात का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब यह देखा जाता है कि ऐसे लोगों के मूत्र के नमूनों में भी उच्च मात्रा में आर्सेनिक निकला है जिन्होंने कभी आर्सेनिक युक्त पानी नहीं पीया। दिलचस्प बात यह है कि आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में सतही जल स्रोत आर्सेनिक मुक्त हैं। इससे लगता है कि मिट्टी आर्सेनिक युक्त पानी लेती है और इसे अपने में ही रोक कर रखती है और आस पास के जलस्रोतों में इसे फैलने नहीं देती।

स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में आर्सेनिक विषैला तत्व है। आर्सेनिक ट्राईऑक्साइड की अत्यंत कम मात्रा (0.1 ग्राम) भी इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। आर्सेनिक विषाक्तता के शुरुआती लक्षण त्वचा सम्बंधी विकार, कमज़ोरी, थकान, एनोरेक्सिया (भूख न लगना), मितली, उल्टी और दस्त या कब्ज़ हैं। जैसेजैसे विषाक्तता बढ़ती है, लक्षण और अधिक विशिष्ट होने लगते हैं, जिनमें गंभीर दस्त, पानीदार सूजन (विशेष रूप से पलकों और एड़ियों पर), त्वचा का रंग बदलना, आर्सेनिकल काला कैंसर और चमड़ी का मोटा व सख्त होना, लीवर बढ़ना, श्वसन रोग और त्वचा कैंसर शामिल हैं। कुछ गंभीर मामलों में पैर में गेंग्रीन और ऊतकों में असामान्य वृद्धि भी देखी गई है। आर्सेनिक विषाक्तता के कारण अर्जेंटाइना में बेल विले रोग’, ताइवान में ब्लैक फुट रोगऔर थाईलैंड में काई डेमरोग व्याप्त हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों के बाल, नाखून, त्वचा और पेशाब के कई नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक आर्सेनिक था।

मनुष्यों पर प्रभाव

आर्सेनिक के रूप और विषाक्तता

भूमिगत जल और मिट्टी में आर्सेनिक कार्बनिक रूपों के अलावा आर्सेनाइट्स (तीनसंयोजी आर्सेनिक) या आर्सेनेट (पांचसंयोजी आर्सेनिक) के रूप में मौजूद रहता है। मिट्टी और फसल में आर्सेनिक की घुलनशीलता, गतिशीलता, जैव उपलब्धता और विषाक्तता मुख्य रूप से आर्सेनिक की ऑक्सीकरण अवस्था (वैलेंसी) पर निर्भर करती है। साथ ही इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अकार्बनिक रूप में है या कार्बनिक रूप में। भूमिगत जल/मिट्टी में विभिन्न आर्सेनिक यौगिकों के विषैलेपन का क्रम:

आर्सीन > ऑर्गेनोआर्सेनिक यौगिक > आर्सेनाइट्स और ऑक्साइड >  आर्सेनेट्स > एकसंयोजी आर्सेनिक >  मुक्त आर्सेनिक धातु।

जल और मिट्टी में आर्सेनेट की तुलना में आर्सेनाइट अधिक घुलनशील, गतिशील और ज़हरीला होता है। आर्सेनिक के कार्बनिक रूप मुख्य रुप से डाईमिथाइल आर्सेनिक एसिड या केकोडाइलिक एसिड भी मिट्टी में उपस्थित रहते हैं। ये मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी जैसी स्थितियों में वाष्पशील डाईमिथाइल आर्सीन और ट्राईमिथाइल आर्सीन बनाते हैं। भूमिगत जल और मिट्टी में मोनो मिथाइल आर्सेनिक एसिड (एमएमए) भी मौजूद रहता है। आर्सेनिक के कार्बनिक रूप या तो ज़हरीले नहीं होते या बहुत कम ज़हरीले होते हैं। जब फसलों को हवादार मिट्टी में उगाया जाता है तो मिट्टी में मुख्य रूप से पांचसंयोजी आर्सेनिक पाया जाता है। यह कम ज़हरीला होता है। जबकि चावल के पानी भरे खेतों में अधिक घुलनशील और ज़हरीले तीनसंयोजी रूप अधिक रहते हैं।

मिट्टीफसल में आर्सेनिक की उपस्थिति और खाद्य शृंखला पर प्रभाव

यह पाया गया कि शरद ऋतु में उगाई जाने वाली धान से प्राप्त चावल में आर्सेनिक के अधिक विषैले तीनसंयोजी रूप पाए जाते हैं। दूसरी ओर, चावल के भूसे में आर्सेनिक के पांचसंयोजी रूप मौजूद होते हैं। इसके अलावा धान की, पारंपरिक और उच्च पैदावार, दोनों ही किस्मों के साथ पारबॉइलिंग और मिलिंग जैसी प्रक्रियाओं में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ती है। जैविक खाद के माध्यम से मृदा संशोधन करने पर आर्सेनिक की मात्रा में कमी आती है। आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में उगाए जाने वाले चावल में आर्सेनिक विषाक्तता और इसके सेवन से सम्बंधित खतरों का अध्ययन किया गया है। ग्रामीण बंगाल में चावल के माध्यम से अकार्बनिक आर्सेनिक का सेवन, दूषित पेयजल की तुलना में मानव स्वास्थ के लिए ज़्यादा बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा है। जैविक संशोधन और संवर्धित फॉस्फेट तथा चुनिंदा सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जस्ता, लौह) से उर्वरीकरण चावल में आर्सेनिक को कम करता है। साथ ही इसके सेवन से होने वाला खतरा भी कम होता है।

भूजल दूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में पानी और आहार दोनों के माध्यम से आर्सेनिक सेवन और पेशाब में आर्सेनिक के उत्सर्जन को लेकर किए गए कई अध्ययन बताते हैं कि आर्सेनिक प्रदूषित इलाकों में सिर्फ पेयजल में आर्सेनिक की समस्या को दूर करने से आर्सेनिक सम्बंधी खतरे कम नहीं होंगे। चावल का नियमित सेवन शरीर में आर्सेनिक पहुंचने का एक प्रमुख ज़रिया है जिसका समाधान ढूंढने की ज़रूरत है। आर्सेनिक विषाक्तता के उपचार के लिए समग्र व समेकित तरीके की आवश्यकता है जिसमें खाद्य शृंखला में आर्सेनिक की उपस्थिति और पेयजल में आर्सेनिक सुरक्षित मात्रा की सीमा में रखने के मिलेजुले प्रयास करने होंगे।

सुधार के उपाय

चावल समेत कई उपज में आर्सेनिक की उपस्थिति को कम करने में कुछ उपाय काफी प्रभावी पाए गए हैं।

1. कम वर्षा वाली अवधि में आर्सेनिक युक्त पानी से सिंचाई कम करने के लिए सतही जल स्रोतों और भूमिगत जल का मिलाजुला इस्तेमाल हो। साथ ही वर्षा के आर्सेनिकमुक्त पानी को ज़मीन में पहुंचाने की व्यवस्था हो।

2. आर्सेनिक युक्त इलाकों में कम पानी में ज़्यादा फसल देने वाली और आर्सेनिक का कम संग्रह करने वाली किस्मों की पहचान/विकास हो। इन इलाकों में खास तौर से जनवरी से मई के कम वर्षा वाले दिनों में अनुकूल फसल चक्र अपनाया जाए। जैसे जूटचावलचावल या हरी खादचावलचावल की जगह जमीकंदसरसोंतिल, मूंगधानसरसों जैसे फसल चक्र।

3. भूजल को तालाब में भरकर उस संग्रहित पानी से सिंचाई करना। इस तरह अवसादन और वर्षा का पानी मिलने से संग्रहित पानी में आर्सेनिक की मात्रा कम की जा सकती है।

4. धान की सिचांई के लिए भूमिगत जल की दक्षता को बढ़ाना, खास तौर पर गर्मियों की धान में। उदाहरण के लिए फसल की वृद्धि के दौरान कुछकुछ समय खेतों में पानी भरा जाए और पकने के दौरान लगातार पानी भरकर रखा जाए। ऐसा करने से फसल की पैदावार पर कोई असर नहीं पड़ेगा और भूजल का उपयोग कम होने से आर्सेनिक की मात्रा में कमी आएगी।

5. कंपोस्ट और अन्य जैविक व हरी खाद का उपयोग बढ़ाएं। साथ ही अकार्बनिक लवणों का उपयुक्त उपयोग  किया जाए।

6. ऐसी फसलों की पहचान और विकास हो जो फसल के खाद्य हिस्सों में कम से कम आर्सेनिक जमा करती हों और जिनमें आर्सेनिक के अकार्बनिक रूपों का अनुपात कम हो।

7. सस्ते वनस्पति और जैविक उपचार विकल्प विकसित करना चाहिए।

8. बड़े पैमाने पर प्रचारप्रसार।

9. लोगों की भगीदारी से खतरे के बारे में जागरूकता बढ़ाएं और स्थानीय स्तर पर समस्या के समाधान के उपायों को अपनाया और लोकप्रिय बनाया जाए।

नीतिगत हस्तक्षेप

देश के कुछ हिस्सों के भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण का मुद्दा और मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रतिकूल प्रभाव वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, सामुदायिक शोधकर्ताओं, कानून बनाने वालों और आम जनता के लिए बड़ी चिंता का विषय है। आर्सेनिक प्रदूषण के संदर्भ में मुख्य रूप से पेयजल आपूर्ति की समस्या को दूर करने पर ज़ोर दिया गया है। पेयजल की समस्या अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। इन इलाकों में पेयजल के अधिकतर विकल्प या तो सतही जल स्रोत या 150-200 मीटर से अधिक गहराई के जलस्रोत के उपयोग पर आधारित हैं। इस गहराई में पानी में विषैले पदार्थ नहीं होते। इन पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता की समयसमय पर जांच भी काफी अच्छे से होती है।

खाद्य शृंखला का मुद्दा अनछुआ रह जाता है। आर्सेनिकप्रदूषित भूजल से सिंचाई के माध्यम से आर्सेनिक खाद्य पदार्थों में पहुंचता है। वैसे इस बारे में काफी समझ बनी है कि खाद्य शृंखला द्वारा ग्रामीण इलाकों में आर्सेनिक लोगों के शरीर में पहुंच रहा है। इसलिए बड़े स्तर पर आर्सेनिक विषाक्तता को दूर करने के लिए पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा को कम करने के साथसाथ खाद्य शृंखला से आर्सेनिक को दूर करने के लिए समेकित तरीके अपनाने की ज़रूरत है। जब तक यह प्रयास सफल नहीं होता तब तक सुरक्षित खाद्य की चिंता बनी रहेगी। वैज्ञानिकों के बीच इस मुद्दे की गंभीरता के एहसास के बावजूद अभी तक ठोस योजना बनाने की दरकार है। शुरू में छोटे स्तर पर प्रायोगिक कार्यक्रम लागू करके फिर इसे प्रभावित क्षेत्रों में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।

इस तरह के एकीकृत तरीकों की सफलता विभिन्न हितधारकों की प्रकृति, शोधकर्ताओं, तकनीशियनों और योजनाकारों को जोड़कर ही संभव है जिसमें वास्तविक लाभार्थियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए। लाभार्थी इस कार्यक्रम को समझ सकें और उसमें अपना योगदान दे सकें इसके लिए उन्हें जागरूक और प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है। खालिस तकनीकी तरीकों की जगह समेकित तरीके अपनाने के लिए तकनीकी व्यावहारिकता, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से मज़बूत कार्य योजना की ज़रूरत है।

निष्कर्ष

लोगो को पेयजल की गुणवत्ता जांचने के मामले में जागरूक करना और परीक्षण करने के लिए प्रेरित करना महत्वपूर्ण है। गंभीर त्वचाघाव से प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य खतरे और परेशानी को ध्यान में रखते हुए आर्सेनिक मुक्त पेयजल की आपूर्ति के साथ राज्य अस्पतालों में इन रोगियों के निशुल्क उपचार की व्यवस्था बीमारी को कम करने में मदद कर सकती है। यह ध्यान रखने की ज़रूरत है कि आर्सेनिक से प्रभावित लोग बहुत गरीब हैं व दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

जैसा कि पहले बताया गया है, बंगाल और अन्यत्र सिंचाई और पीने के लिए आर्सेनिक प्रदूषित भूजल ही समस्या की जड़ है। आर्सेनिक प्रदूषित भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी और खाद्य शृंखला में काफी आर्सेनिक प्रदूषण हुआ है। आर्सेनिक प्रदूषित जल का उपयोग कम करने और इसके उपायों के बारे में किसानों को जागरूक बनाने में काफी समय लगेगा। इसके अलावा समेकित तरीके की सफलता के लिए सिर्फ कृषि वैज्ञानिकों को नहीं बल्कि चिकित्सकों, सामाजिक वैज्ञानिकों और योजनाकारों को भी साथ लाना होगा।

फौरी तौर पर बड़े पैमाने पर आर्सेनिक की मात्रा पता करने के लिए खेतों और प्रयोगशाला प्रोटोकॉल में सुधार की ज़रूरत है ताकि भूमिगत जल में विभिन्न आर्सेनिक रूपों का मापन किया जा सके। खाद्य शृंखला में कुल आर्सेनिक के कारण कितनी विषाक्तता है इसे पहचानने की ज़रूरत है। इसके अलावा विविध संस्थाओं और विविध विषयों को जोड़कर कार्यक्रमों को मज़बूत करना होगा, तभी आर्सेनिकदूषित संसाधनों पर निर्भरता को कम करने के लिए दीर्घकालिक तकनीकी विकल्प विकसित हो सकेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मुंबई की आर्ट-डेको इमारतें विश्व धरोहर – जाहिद खान

किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति तथा सांस्कृतिक, प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहर से होती है। यह धरोहर न सिर्फ उसे विशिष्टता प्रदान करती है बल्कि दूसरे देशों से उसे अलग भी दिखलाती है। हमारे देश में हर तरफ ऐसी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक छटाएं बिखरी पड़ी हैं। प्राचीन स्मारक, मूर्ति शिल्प, पेंटिंग, शिलालेख, प्राचीन गुफाएं, वास्तुशिल्प, ऐतिहासिक इमारतें, राष्ट्रीय उद्यान, प्राचीन मंदिर, अछूते वन, पहाड़, विशाल रेगिस्तान, खूबसूरत समुद्र तट, शांत द्वीप समूह और आलीशान किले।

इनमें से कुछ धरोहर ऐसी हैं, जिनका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं। ऐसी ही अनमोल धरोहर दक्षिण मुंबई की विशेष शैली में बनीं 19वीं सदी की दर्जनों विक्टोरिया गॉथिक और 20वीं सदी की आर्ट डेको इमारतें हैं जिन्हें अब विश्व विरासत का दर्जा मिल गया है। युनेस्को की विश्व विरासत समिति ने हाल ही में बाहरीन की राजधानी मनामा में हुई अपनी 42वीं बैठक में विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। एलिफेंटा और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के बाद मुंबई को यह तीसरा विश्व गौरव मिला है। इस घोषणा के साथ ही भारत में विश्व धरोहर स्थलों की सूची में 37 स्थान हो जाएंगे। यही नहीं, सबसे अधिक 5 धरोहर स्थलों के साथ महाराष्ट्र पहला राज्य हो जाएगा। ओवल ग्राउंड के साथ यह परिसर मियामी (अमेरिका) के बाद विश्व का एकमात्र ऐसा इलाका है, जहां समुद्र तट पर अन्य विक्टोरियन गॉथिक इमारतों के साथ बड़ी तादाद में बेहतरीन आर्ट डेको इमारतें मौजूद हैं। इनकी संख्या तकरीबन 39 होगी। युनेस्को के इस फैसले के साथ ही मुंबई की पहचान अंतर्राष्ट्रीय फलक पर और भी मज़बूती के साथ दर्ज हो गई है।

विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व धरोहर की फेहरिस्त में शामिल करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बीते चार साल से लगातार कोशिश कर रही थीं। युनेस्को को प्रस्ताव तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने साल 2012 में ही भेज दिया था। कोशिश अकेली सरकार की नहीं थी, बल्कि इसमें मुंबई के नागरिक भी जुड़े हुए थे। सही बात तो यह है कि उन्होंने ही इसकी सर्वप्रथम पहल की थी। यूडीआरआई, काला घोड़ा एसोसिएशन, ओवल कूपरेज रेसिडेंट्स एसोसिएशन, ओवल ट्रस्ट, नरीमन पॉइंट चर्चगेट सिटिज़न एसोसिएशन, हेरिटेज माइल एसोसिएशन, फेडरेशन ऑफ रेसिडेंट्स ट्रस्ट, आब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन और एमएमआर हेरिटेज कंज़र्वेशन सोसायटी जैसे संगठनों ने इसके लिए जमकर मेहनत की और बाकायदा एक अभियान चलाया। युनेस्को की समिति जब इन स्थलों का दौरा करने मुंबई आई तो जानीमानी वास्तु रचनाकार आभा नारायण लांबा और नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव नितिन करीर ने मुंबई का पक्ष मज़बूती से रखा। आभा नारायण लांबा ने मुंबई के दावे का शानदार डोज़ियर बनाया और चौदह साल तक लगातार कोशिश करती रहीं कि ये इमारतें विश्व धरोहर में शामिल हो जाएं। अंतत: ये कोशिशें रंग लार्इं और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद की सिफारिश पर विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व विरासत की फेहरिस्त में शामिल कर लिया।

विश्व धरोहर सूची में किसी जगह का शामिल होना ही ये बताता है कि उस जगह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी कीमत होगी। युनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद निश्चित तौर पर मुंबई में पर्यटकों की संख्या और बढ़ेगी।

आर्ट डेको इमारतों की बात करें, तो ये इमारतें मुंबई के वास्तुकला का अलंकार हैं। आर्ट डेको इमारतें (बॉम्बे डेको) दरअसल, युरोप और अमेरिका में 1920 और 1930 के दशक में फैले स्थापत्य आंदोलन की देन हैं। दक्षिण मुंबई में चर्चगेट स्टेशन और मंत्रालय के बीच स्थित अंडाकार क्रिकेट ग्राउंड ओवल मैदान के नाम से मशहूर है। ओवल मैदान के दाहिनी ओर करीब एक ही शैली में कतार से आर्ट डेको या मुंबई डेको शैली में बनी 125 से अधिक इमारतें हैं। इनका निर्माण प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साल 1920 से 1935 के बीच हुआ। उस समय मुंबई के नवधनाढ्यों द्वारा बनवाई गई इन इमारतों की शृंखला ओवल मैदान के किनारे तक ही सीमित नहीं रही। समुद्री ज़मीन पाटकर एक ही शैली की ये आर्ट डेको इमारतें मरीन ड्राइव पर भी बनाई गर्इं। ये आज भी नरीमन पॉइंट से गिरगांव चौपाटी तक खड़ी दिखाई देती हैं। इस शैली की इमारतों को विभिन्न वास्तुकारों ने डिज़ाइन किया था। आर्ट डेको इमारतों में रीगल सिनेमा, रजब महल, इंडिया इंश्योरेंस बिल्डिंग, न्यू एम्पायर सिनेमा, क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया, इंप्रेस कोर्ट, सूना महल, ओशियाना, इरोस सिनेमा और मरीन ड्राइव की कई रिहाइशी इमारतें शामिल हैं। कुछ आर्ट डेको इमारतें मुंबई के उत्तरी क्षेत्र में भी हैं।

ओवल मैदान के बार्इं ओर विक्टोरियन गॉथिक शैली की पुरानी बेहद खूबसूरत इमारतें हैं। इन इमारतों को सर गिल्बर्ट स्कॉट, जेम्स टिबशॉ और ले. कर्नल जेम्स फुलर जैसी हस्तियों ने डिज़ाइन किया था। इनका निर्माण ज़्यादातर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था। फोर्ट क्षेत्र की विक्टोरियन शैली की इमारतों का वैभव चमत्कृत कर देने वाला है। इन इमारतों में मुंबई हाई कोर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय, एलफिंस्टन कॉलेज, डेविड ससून लाइब्रोरी, छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय, पुराना सचिवालय, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, पश्चिम रेल मुख्यालय, क्रॉफर्ड मार्केट, सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज व एशियाटिक लाइब्रोरी और महाराष्ट्र पुलिस मुख्यालय प्रमुख हैं। 19वीं सदी की ये इमारतें ओल्ड बांबे फोर्ट की दीवारों से घिरी हुई थीं। बाद में दीवारें गिरा दी गर्इं, लेकिन इलाके के नाम के साथ फोर्ट शब्द जुडा रह गया। 11वीं सदी में विकसित युरोपियन शैली की इन इमारतों में गॉथिक शैली का वास्तुशिल्प है। इमारतों में लेसेंट खिड़कियां और दागे हुए कांच का भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जो इन्हें बेहद आकर्षक बनाता है। मुंबई में हर साल आने वाले लाखों पर्यटक इन्हें देखकर कहीं खो से जाते हैं। 

युनेस्को द्वारा विश्व विरासत में शामिल कर लिए जाने के बाद कोई भी जगह या स्मारक पूरी दुनिया की धरोहर बन जाता है। इन विश्व स्मारकों का संरक्षण युनेस्को के इंटरनेशनल वर्ल्ड हेरिटेज प्रोग्राम के तहत किया जाता है। वह इनका प्रचारप्रसार करती है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पर्यटक इन स्मारकों के इतिहास, स्थापत्य कला, वास्तु कला और प्राकृतिक खूबसूरती से वाकिफ हों। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने का एक फायदा यह भी होता है कि उससे दुनिया भर के पर्यटक उस तरफ आकर्षित होते हैं। अब केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे दक्षिण मुंबई की इन शानदार इमारतों को सहेजने और संवारने के लिए एक व्यापक कार्य योजना बनाए। न सिर्फ सरकार बल्कि हर भारतीय नागरिक की भी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपनी अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेज कर रखे। इनके महत्व को खुद समझे और आने वाली पीढ़ियों को भी इनकी अहमियत समझाए। एक महत्वपूर्ण बात और, जो भी विदेशी पर्यटक इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को देखने आए, उन्हें यहां सुरक्षा, अपनत्व और विश्वास का माहौल मिले। वे जब अपने देश वापिस लौटकर जाएं, तो भारत की एक अच्छी छवि और यादें उनके संग हों। (स्रोत फीचर्स)

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जापान: युग की समाप्ति और कंप्यूटर की दशा

ताया जा रहा है कि जापान में कंप्यूटर प्रणाली पर एक बड़ा संकट आने वाला है। दिक्कत कंप्यूटर की तारीखों के साथ है और लगभग वैसी ही है जैसी वर्ष 2000 में दुनिया भर के कंप्यूटरों के साथ पेश आई थी। उसे वाय-टू-के (Y2K) समस्या कहा गया था।

जापान में नए सम्राट के राज्याभिषेक के साथ नया युग शुरू होता है। वर्तमान सम्राट अकिहितो ने 1989 में गद्दी संभाली थी। उस समय जो युग जापान में शुरु हुआ था उसका नाम है हाईसाई (यानी सर्वत्र शांति)। यही वह समय था जब कंप्यूटरों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर शुरू हुआ था।

अब स्वास्थ्य सम्बंधी कारणों के चलते सम्राट अकिहितो सिंहासन छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने यह ऐलान किया है कि वे 30 अप्रैल 2019 के दिन सिंहासन छोड़ देंगे और उनके उत्तराधिकारी पुत्र 57-वर्षीय नारुहितो की ताज़पोशी हो जाएगी। अकिहितो के सिंहासन छोड़ने के निर्णय के अनुरूप जापान की केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि वहां 24 फरवरी 2019 के दिन सम्राट के 30 साल के राज का जश्न मनाया जाएगा।

चूंकि अकिहितो का शासन और कंप्यूटर क्रांति लगभग साथ-साथ शुरू हुए थे इसलिए कंप्यूटर की तारीखों में कोई समस्या नहीं आई थी। लेकिन अब जापान में नए युग की शुरुआत होगी और तब कंप्यूटरों की तारीख और नए युग की तारीख के बीच अंतर के चलते समस्याओं की आशंका है। और सरकार नए युग की शुरुआत की घोषणा जल्दी नहीं करना चाहती क्योंकि उससे गलत संदेश जाने का डर है।

जापान के घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के स्वतंत्र विश्लेषक एन-लिओनोर डार्डेने का कहना है कि खास तौर से डाक विभाग, बैंक और स्थानीय सरकारों द्वारा रखे जाने वाले आवासीय पतों के रजिस्टर के रख-रखाव का काम प्रभावित होगा क्योंकि इनके कंप्यूटर अपने कामकाज के लिए जापानी युग की तारीखों पर निर्भर हैं। लिहाज़ा कंप्यूटर तकनीशियनों को ओव्हरटाइम काम करके समस्या का हल निकालना होगा। (स्रोत फीचर्स)

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जैव-विकास को दिशा देकर संरक्षण के प्रयास

स्ट्रेलिया वह महाद्वीप है जहां स्तनधारियों की आबादी में सबसे तेज़ गिरावट दर्ज की जा रही है। यहां जो स्तनधारी निवास करते हैं उनमें मार्सुपियल बड़ी तादाद में हैं। मार्सुपियल प्राणियों की विशेषता यह होती है कि इनकी संतानें पैदाइश के समय पूर्ण विकसित नहीं होतीं और उन्हें शरीर से बाहर एक थैली में पाला जाता है। इस थैली को मार्सुपियम कहते हैं।

ऐसा एक जोखिमग्रस्त मार्सुपियल प्राणि उत्तरी क्वोल (Dasyurus hallucatus) है। यह गिलहरी के बराबर होता है। इसके साथ दिक्कत यह हुई है कि यह ज़हरीले मेंढकों को पहचान नहीं पाता और उन्हें खा जाता है। यह मेंढक एक टोड (Rhinella marina) है जिसे ऑस्ट्रेलिया के कृषि अधिकारियों ने करीब 80 वर्ष पहले यहां छोड़ा था। इस टोड को वहां एक अन्य जीव – गुबरैलों – पर नियंत्रण पाने के मकसद से छोड़ा गया था। ये गुबरैले ऑस्ट्रेलिया की गन्ने की फसल को बहुत नुकसान पहुंचा रहे थे।

उत्तरी क्वोल को लगा कि यह बढ़िया भोजन है लेकिन यह टोड ज़हरीला था। अपने भोजन को न पहचान पाने के चक्कर में क्वोल की आबादी आज मात्र 25 प्रतिशत रह गई है। मेलबोर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एला केली और बेन फिलिप्स को अपने अनुभव से यह पता था कि क्वोल आबादी में कुछ क्वोल ऐसे भी हैं जो इस ज़हरीले टोड को नहीं खाते। तो केली और फिलिप्स ने सोचा कि क्यों न इन होशियार क्वोल का यह प्राणरक्षक गुण सभी क्वोल में पहुंचा दिया जाए ताकि वे इस ज़हरीले भोजन से बचने की क्षमता से लैस होकर अपनी रक्षा कर सकें।

अपने विचार को परखने के लिए उक्त वैज्ञानिकों ने टोड-प्रभावित क्षेत्रों से कुछ ऐसे क्वोल लिए जो ज़हरीले टोड से बचकर रहते थे। फिर वे एक टोड-मुक्त टापू से कुछ क्वोल लेकर आए और इन दो आबादियों के बीच प्रजनन होने दिया। इनकी संतानों को भोजन के रूप में उसी ज़हरीले टोड की टांगें दी गर्इं तो पता चला कि अधिकांश शिशु क्वोल टोड की टांग से दूर ही रहे।

केली और फिलिप्स का मत है कि इस प्रयोग से स्पष्ट हो जाता है कि टोड से कतराने का गुण जेनेटिक है और उसे संकरण के ज़रिए अन्य क्वोलों में भी पहुंचाया जा सकता है। अब वे बड़े पैमाने पर इस परीक्षण को प्राकृतिक परिस्थिति में करने की योजना बना रहे हैं।(स्रोत फीचर्स)

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टेस्ट ट्यूब शिशु के चालीस साल

लुईस ब्राउन वह पहली बच्ची थी जिसका जन्म टेस्ट ट्य़ूब बेबी नाम से लोकप्रिय टेक्नॉलॉजी के ज़रिए हुआ था। आज वह 40 वर्ष की है और उसके अपने बच्चे हैं। एक मोटेमोटे अनुमान के मुताबिक इन 40 वर्षों में दुनिया भर में 60 लाख से अधिक टेस्ट ट¬ूब बच्चेपैदा हो चुके हैं और कहा जा रहा है कि वर्ष 2100 तक दुनिया की 3.5 प्रतिशत आबादी टेस्ट ट्यूब तकनीक से पैदा हुए लोगों की होगी। इनकी कुल संख्या 40 करोड़ के आसपास होगी।

वैसे इस तकनीक का नाम टेस्ट ट्यूबबेबी प्रचलित हो गया है किंतु इसमें टेस्ट ट्यूब का उपयोग नहीं होता। किया यह जाता है कि स्त्री के अंडे को शरीर से बाहर एक तश्तरी में पुरुष के शुक्राणु से निषेचित किया जाता है और इस प्रकार निर्मित भ्रूण को कुछ दिनों तक शरीर से बाहर ही विकसित किया जाता है। इसके बाद इसे स्त्री के गर्भाशय में आरोपित कर दिया जाता है और बच्चे का विकास मां की कोख में ही होता है।

इस तकनीक को सफलता तक पहुंचाने में ब्रिटिश शोधकर्ताओं को काफी मेहनत करनी पड़ी थी। भ्रूण वैज्ञानिक रॉबर्ट एडवड्र्स ने अंडे का निषेचन शरीर से बाहर करवाया, जीन पर्डी ने इस भ्रूण के विकास की देखरेख की और स्त्री रोग विशेषज्ञ पैट्रिक स्टेपटो ने मां की कोख में बच्चे की देखभाल की थी। लेकिन प्रथम शिशु के जन्म से पहले इस टीम ने 282 स्त्रियों से 457 बार अंडे प्राप्त किए, इनसे निर्मित 112 भ्रूणों को गर्भाशय में डाला, जिनमें से 5 गर्भधारण के चरण तक पहुंचे। आज यह एक ऐसी तकनीक बन चुकी है जो सामान्य अस्पतालों में संभव है।

बहरहाल, इस तरह प्रजनन में मदद की तकनीकों को लेकर नैतिकता के सवाल 40 साल पहले भी थे और आज भी हैं। इन 40 सालों में प्रजनन तकनीकों में बहुत तरक्की हुई है। हम मानव क्लोनिंग के काफी नज़दीक पहुंचे हैं, भ्रूण की जेनेटिक इंजीनियरिंग की दिशा में कई कदम आगे बढ़े हैं, तीन पालकों वाली संतानें पैदा करना संभव हो गया है। सवाल यह है कि क्या इस तरह की तकनीकों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो ऐसे परिवर्तन करती है जो कई पीढ़ियों तक बरकरार रहेंगे। कहीं ऐसी तकनीकें लोगों को डिज़ायनर शिशु (यानी मनचाही बनावट वाले शिशु) पैदा करने को तो प्रेरित नहीं करेंगी?(स्रोत फीचर्स)

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