डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जैसे-जैसे भारत ने तरक्की की, ‘संपेरों का देश’ वाली छवि धुंधली पड़ती गई है। आज हमारे पास सांपों को बचाने वाले लोग हैं। अलबत्ता, ग्रामीण इलाकों में हर साल सर्पदंश (snake bite cases) के कारण 58,000 लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। ये मुख्यत: धान के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों और सीमान्त व छोटे किसानों को प्रभावित करते हैं (India snakebite deaths)।
सांप के ज़हर (snake venom effects) आम तौर पर तीन तरह से नुकसान पहुंचाते हैं: रक्त विकार, मांसपेशीय लकवा और ऊतकों की मृत्यु। वाइपर के काटने पर सामान्यत: रक्त सम्बंधी दिक्कतें पैदा होती हैं जबकि कोबरा, करेत जैसे इलेपिड सांपों के ज़हर तंत्रिका सम्बंधी लकवे के कारण बनते हैं (neurotoxic venom)।
भारत के ‘चार बड़े’ सांपों (नाग, सामान्य करेत, रसल्स वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर) (Big Four snakes India) के विष के खिलाफ एक मानक एंटीवीनम (प्रति-विष) (anti-venom treatment) डिज़ाइन किया गया है। इस एंटीवीनम को बनाने के लिए इन सांपों के ज़हर की आवश्यकता होती है। भारत में सांपों के विष की आपूर्ति मुख्य रूप से धान के खेतों से और तमिलनाड़ु में झाड़-झंखाड़ वाली भूमि से आदिवासियों द्वारा पकड़े गए सांपों से होती है। ये आदिवासी इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसायटी (Irula snake catchers Tamil Nadu) के साथ जुड़े हैं।
इन चार प्रजातियों के विष के एक मिश्रण की गैर-जानलेवा खुराक घोड़ों में इंजेक्ट की जाती है। इसके बाद कई बार इंजेक्शन देकर इन प्राणियों की प्रतिरक्षा को काफी सक्रिय किया जाता है। घोड़ों को इसलिए चुना गया है कि ये बड़े प्राणी हैं और इन्हें संभालना आसान है। उनका प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होकर इन विषों के खिलाफ बड़ी मात्रा में एंटीबॉडीज़ (antibody production) बनाता है। जब काफी एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं, तब इन घोड़ों से खून लिया जाता है। एंटीबॉडी युक्त प्लाज़्मा को प्रोसेस करके उसमें से टॉक्सिन से जुड़ने वाले एंटीबॉडी खंड पृथक कर लिए जाते हैं, जिनका परीक्षण किया जाता है और फ्रीज़ड्राइ कर वायल्स में भरकर रखा जाता है (horse serum antivenom)।
यह विधि 1950 के दशक से चली आ रही है लेकिन इसकी कई सीमाएं हैं। भारत में 60 से ज़्यादा विषैले सांप (venomous snakes India) पाए जाते हैं। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के सांपों में, यहां तक कि एक ही प्रजाति के सांपों में विषैले पदार्थों (टॉक्सिन्स) का संघटन अलग-अलग (regional venom variation) होता है। इस लिहाज़ से ‘चार बड़े’ सांपों के लिए बनाया एंटीवीनम पर्याप्त नहीं है। इसके चलते ऐसे उपचार विकसित करने पर ध्यान दिया गया, जो किसी क्षेत्र के लिए कारगर हों या सार्वभौमिक रूप से कारगर हों।
नेचर में प्रकाशित (Nature journal research) ताज़ा निष्कर्ष हमें सर्पदंश के विरुद्ध एक व्यापक परास वाले उपचार की ओर ले जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के साथ मिलकर डेनमार्क की एक प्रयोगशाला ने उप-सहारा अफ्रीका के सांपों (sub-Saharan snakes) पर शोध किया। इस इलाके में सर्पदंश के चलते साल में 10,000 अंग-विच्छेदन करना पड़ते हैं। शोधकर्ताओं ने इस इलाके की 18 प्रमुख सांप प्रजातियों (जिनमें कोबरा और मम्बा शामिल थे) (cobra, mamba venom) से विष एकत्रित किया और मिश्रण का इंजेक्शन अल्पाका और लामा को लगाया। दोनों ही ऊंट कुल के प्राणी हैं। ऊंट कुल का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इनमें असाधारण एंटीबॉडी बनती हैं जो छोटी व स्थिर होती हैं। इन्हें नैनोबॉडी (nanobodies technology) कहते हैं। टॉक्सिन का इंजेक्शन देने पर ज़ोरदार प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उभरती है और कारगर एंटीवीनम मिलता है। इस स्थिति में रक्त से बी-कोशिकाएं एकत्रित कर ली जाती है जो एंटीबॉडी उत्पन्न करती हैं। इसके बाद नैनोबॉडीज़ को कोड करने वाले डीएनए को जेनेटिक इंजीनियरिग की मदद से बैक्टीरिया-भक्षी वायरसों के जीनोम में जोड़ दिया जाता है। ये वायरस अपनी सतह पर नैनोबॉडीज़ प्रदर्शित करने लगते हैं। इनमें से उन नैनोबॉडीज़ के चुना जाता है जो सशक्त रूप से सांप के ज़हर के तत्वों से जुड़ें। इसका मतलब हुआ कि अब घोड़ों की बजाय बैक्टीरिया में एंटीवीनम का उत्पादन (recombinant antivenom) किया जा सकेगा। चूहों पर किए गए प्रयोगों में 18 में से 17 सांपों के विष के विरुद्ध एंटीवीनम क्रिया देखी गई।
भारतीय सांपों पर लौटते हैं। बीकानेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल (National Research Centre on Camel) के शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि ऊंटों में तैयार किया गया एंटीवीनम इस इलाके में पाए जाने वाले सॉ-स्केल्ड वायपर के खिलाफ कारगर है (Saw-scaled viper treatment)। इस अनुसंधान को अन्य सर्प प्रजातियों तक विस्तार देना काफी मददगार होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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