अत्यंत प्राचीन जीवाश्मों में चयापचय रसायनों के निशान

लाखों साल पहले इस धरती पर विचरने वाले जीव (prehistoric animals) क्या खाते होंगे? क्या वे कभी किसी बीमारी (ancient diseases) का शिकार बनें होंगे? इन सवालों के जवाब दे पाना मुमकिन नहीं लगता। नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इन नामुमकिन लगने वाले सवालों के जवाब दिए हैं। उन्होंने बताया है कि लाखों साल पहले विचरने वाले जीवों ने क्या खाया, उनका रहवास कैसा था, और वे कैसी बीमारियों से जूझ रहे थे।

इन सवालों का जवाब देने के लिए शोधकर्ताओं ने सहारा लिया है मेटाबोलाइट्स (metabolites) का। मेटाबोलाइट किसी जीव के शरीर की चयापचय प्रक्रिया में बने उप-उत्पाद होते हैं। दरअसल हम जो भी खाते हैं, किसी भी संक्रमण की चपेट में आते हैं, या जिन भी परिस्थितियों को हमारा शरीर झेलता है चयापचय प्रक्रिया में बने मेटाबोलाइट उस सबके गवाह बन जाते हैं।

जीवित जीवों के खान-पान या रोग सम्बंधी छान-बीन करने के लिए तो उनके रक्त या मूत्र के नमूनों से मेटाबोलाइट्स (biological samples, disease analysis) हासिल कर लिए जाते हैं। लेकिन अश्मीभूत जीवों में तो रक्त-मूत्र मिलना संभव नहीं है। लेकिन यह भी होता है कि जैसे-जैसे दांत, हड्डियां या हाथीदांत जैसे सख्त ऊतक विकसित होते हैं, वृद्धि करते हैं, रक्त के साथ मेटाबोलाइट्स उनमें पहुंचते रहते हैं और ये मेटाबोलाइट्स इन सख्त ऊतकों की खुरदरी, छिद्रदार संरचनाओं में फंस जाते हैं। इस आधार पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जैविक नृविज्ञानी टिम ब्रोमेज के मन में यह सवाल आया कि क्या हड्डियों, दांतों और हाथीदांत जैसी सख्त और छिद्रदार जगह पर मेटाबोलाइट्स फंसकर संरक्षित भी रह सकते हैं (bone preservation, fossil chemistry)।

हालांकि, कुछ हालिया अध्ययनों में ऐसे मेटाबोलाइट्स मृत्यु के बाद कंकाल के अवशेषों (skeletal remains, post-mortem biomarkers) में संरक्षित पाए गए हैं, लेकिन वे कंकाल महज कुछ दशक पुराने थे। लेकिन ये शोधकर्ता तो लाखों साल (13 से 30 लाख साल तक) प्राचीन जीवाश्मों में मेटाबोलाइट्स खोजना चाह रहे थे।

ब्रोमेज और उनके साथियों ने प्राचीन तंज़ानिया की ओल्डुवाई गॉर्ज, और दक्षिण अफ्रीका की मकापंसगैट और मलावी के होमिनिन खुदाई स्थलों से प्राप्त अश्मीभूत हड्डियों और दांतों से नमूने लेकर उनकी मास स्पेक्ट्रोग्राफी (mass spectrometry, chemical analysis) करके प्रत्येक जीवाश्म में कैद रासायनिक पदार्थों का पता लगाया। एक बार जब उन्होंने नमूनों के भीतर संभावित मेटाबोलाइट्स की पहचान कर ली, तो उन्होंने उनकी तुलना वर्तमान में जीवित उनके जैसे जीवों के मेटाबोलाइट्स से की।

शोधकर्ताओं को विश्लेषण में प्रत्येक नमूने में हज़ारों मेटाबोलाइट्स मिले, जिनमें से सैकड़ों ऐसे थे जो वर्तमान जीवों द्वारा बनाए जाने वाले मेटाबोलाइट से मेल खाते थे।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने प्राचीन जानवरों के जीवन (ancient life reconstruction) के बारे में अनुमान लगाए। जैसे, मेटाबोलाइट के आधार पर शोधकर्ता यह अंदाज़ा कर पाए कि कई अश्मीभूत जीव मादा थे। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले दो जेरबिल और एक गिलहरी के जीवाश्म में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो एस्ट्रोजन को पचाने (estrogen metabolism) वाले जीन से जुड़े थे। अश्मीभूत उल्लू के पेट में से मिली जेरबिल की एक अन्य हड्डी से भी मादा (sex identification)होने के अतिरिक्त रासायनिक संकेत मिले।

आगे के विश्लेषण में शोधकर्ताओं को अतीत की बीमारियों के संकेत भी मिले। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले गिलहरी, चिवोंडो से मिले हाथी और मकापंसगैट से मिले बोविड के जीवाश्म से ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो संभवत: ट्रायपैनोसोमा ब्रूसाई (Trypanosoma brucei) परजीवी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े थे। यह परजीवी मनुष्यों में निद्रा रोग का कारण बनता है।

फिर, जीवाश्म मेटाबोलाइट्स की तुलना ज्ञात पौधों के मेटाबोलाइट्स से करके शोधकर्ता कुछ जानवरों के आहार और वातावरण के बारे में भी बता पाए। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिली 18 लाख साल पुरानी गिलहरी में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो शतावरी और एलो कुल पौधों के भक्षण का संकेत देते हैं। इस आधार पर लगता है कि उस समय जंगल घना रहा होगा। ऐसे ही पता चला कि 24 लाख साल पहले मलावी में विचरने वाला एक जीव मृत्यु के समय बच्चा था, वर्मवुड की छाल और शहतूत की पत्तियां खाता था और जब वह मरा तो शायद किसी संक्रमण से ग्रस्त था।

हालांकि अन्य वैज्ञानिक चेताते है कि शोधकर्ताओं को जीवाश्मों से जुड़े मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण करते समय सावधान रहना चाहिए। क्योंकि यह दुविधा हमेशा होती है कि मेटाबोलाइट्स उस अश्मीभूत जानवर द्वारा बनाए गए थे या आसपास की मिट्टी से जीवाश्म में समा गए हैं।

अलबत्ता, शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के आसपास की मिट्टी की जांच करके इस समस्या का ध्यान रखा है। वे यह भी कहते हैं कि “मिट्टी कोई संदूषक नहीं है बल्कि यह तो उस जीवन का प्रतिबिंब है जो उस पर बसा था।”

बहरहाल यह बड़ी बात है कि वैज्ञानिक लाखों साल पुराने जीवाश्म नमूनों से मेटाबोलाइट हासिल करके उनका विश्लेषण कर सके। ऐसे विश्लेषण अतीत के बारे में लगाए गए कई अनुमानों को मज़बूती दे सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zok1cz1/full/_20251222_on_metabolites.jpg

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